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30 अप्रैल 2018

बौद्ध धर्म के वर्तमान परिदृश्य में उसके समर्थक पुनर्मूल्यांकन करें


            गौतम बुद्ध का आविर्भाव भारतीय इतिहास की एक विशिष्ट घटना समझी जा सकती है। वे अपने समय के महापुरुष अथवा तीर्थंकर माने जाते हैं न कि अलौकिक अवतार, जैसा कि उनकी भक्ति में लीन बौद्धों ने उन्हें समझा और समाज को समझाया। गौतम बुद्ध को कालान्तर में महिमामंडित करने की दृष्टि से उनके उपदेशों को, संदेशों को प्रमुखता देने के अतिरिक्त स्वयं गौतम बुद्ध को भी अलौकिक तत्त्व के रूप में प्रतिस्थापित करने के प्रयास किये जाने लगे। बौद्ध मतावलम्बियों द्वारा किये गये हैं जिनमें बुद्ध को अलौकिक रूप में दर्शाने का प्रयास किया गया है। बुद्ध की अलौकिकता को दर्शाते हुए बताया गया है कि सुजाता नामक कुलीन युवती द्वारा प्रदान उत्तम अन्न की भिक्षा ग्रहण करके बोधिसत्त्व पीपल के पेड़ (जिसे बोधिवृक्ष कहा गया) के नीचे जा बैठे। यहाँ रात्रि के प्रथम याम में उन्होंने अपने पूर्वजन्मों की स्मृतिरूपी विद्या प्राप्त की। रात्रि के मध्य याम में उन्होंने दिव्यचक्षु प्राप्त किये और इसके द्वारा समस्त लोक को अपने कर्मों का फल अनुभव करते देखा। बौद्ध परम्परा के अनुसार बुद्ध के अनौत्सुक को देखकर ब्रह्मा उनके सम्मुख प्रकट हुए और कहा-धर्ममय प्रासाद से शोकावतीर्ण जनता को देखिये और धर्म का उपदेश कीजिये, जानने-समझने वाले भी होंगे। ब्रह्मा की याचना से बुद्ध ने जीवों पर करुणा कर बुद्ध-चक्षु से लोक का देखा और पाया कि जैसा सरसी (तलैया) में कुछ कमल जल से अनुद्गत, कुछ समोदक और कुछ जल से अभ्युद्गत होते हैं, ऐसे ही जीव भी संसार में आध्यात्मिक विकास की नाना अवस्थाओं में है। बौद्ध धर्मावलम्बी भी इस घटना की व्याख्या अलग-अलग मतानुसार करते दिखते हैं। एक मत के अनुसार बुद्ध को देवता (ब्रह्मा) ने संसारियों का उत्पल सादृश्य दिखाया और आध्यात्मिक विकास के धर्म प्रचार को प्रेरित किया। एक अन्य मत मानता है कि बुद्ध ने निश्चय किया कि वे अतक्र्य निर्वाण के विषय में मौन धारण करेंगे और केवल मार्ग की देशना करेंगे।


            अब यदि उक्त चन्द घटनाओं के आलोक में बुद्ध और बौद्ध धर्म के आविर्भाव के मूल को जानने का प्रयास किया जाये तो कहीं न कहीं विभ्रम की स्थिति पैदा होती है। ज़रा-रोगी-मृत्यु को देखकर सांसारिक मायामोह से विरक्ति का अनुभव कर ज्ञान की खोज में निकले राजुकमार गौतम को सम्बोधि स्वतः ही बिना गुरु के प्राप्त होती है। ब्राह्मणीय कर्मकाण्डों, पुरोहितों के दुष्चक्र में फँसे समाज को अपने ज्ञान, वचनों के द्वारा मार्ग दिखाने वाले गौतम बुद्ध के संशय को भी किसी लौकिक प्राणी ने नहीं अपितु स्वयं ब्रह्मा ने दूर करते हुए उनसे समाज को धर्म सम्बन्धी उपदेश देने की याचना की थी। बुद्ध के प्रवचनों, विचारों, उपदेशों, धर्म सम्बन्धी बौद्धिक विचारों के आधार पर यह तो आसानी से कहा जा सकता है कि गौतम बुद्ध पूर्णतः बुद्धिवादी थे। वे किसी भी तथ्य को विश्वास की कच्ची नींव पर रखना नहीं चाहते थे, प्रत्युत तर्क-बुद्धि की कसौटी पर सब तत्त्वों को कसना उनकी शिक्षा का प्रधान उद्देश्य था। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि ऐसे पूर्ण बुद्धिवादी व्यक्ति को मात्र तपस्या के आधार पर-बिना किसी गुरु के द्वारा-एक रात्रि में बोधज्ञान प्राप्त होना; संसार को उपदेश देने, न देने की संशयात्मक स्थिति से बाहर लाने का कार्य ब्रह्मा जैसी अलौकिक शक्ति द्वारा करना कितना तर्कसंगत प्रतीत होता है?

            कहा जाता है कि जागतिक दुःखों से व्यथित होकर गौतम बुद्ध ने अभिनिष्क्रमण करके प्रव्रज्या ग्रहण की थी। गया के बोधि-वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर उन्होंने प्रातिभज्ञानमय अभिचिन्तन से अज्ञान, वेदना, तृष्णा, उपादान, जन्म, ज़रा, मरण, शोक आदि के रहस्य को जानकर उन्हें निष्प्रभावी करने की पद्धति का आविष्कार किया था। यदि इस पद्धति और इसकी क्रियाविधि पर विचार किया जाये तो बुद्ध ने न तो जनम-मरण के चक्र से छुटकारा पाने का कोई उपाय स्थापित किया था, न ही ज़रा, शोक, रोग से मुक्ति का कोई सूत्र निर्मित किया था और न ही अपने उपदेशों, धर्म सम्बन्धी बौद्धिक विचारों के द्वारा भी ऐसी किसी पद्धति की ओर रेखांकित किया था। उन्होंने शील अर्थात् सदाचार को जीवन में उतारने पर बल दिया था। आज हम जिन पंचशील सिद्धान्तों की वैश्विक स्तर पर चर्चा करते हैं, उन पंचशील सिद्धान्तों को महात्मा बुद्ध ने सर्वसाधारण के लिए सुनिश्चित किया था। ये पंचशील सिद्धान्त हैं- (1) अहिंसा, (2) अस्तेय (चोरी न करना), (3) ब्रह्मचर्य (यौन दुराचार से दूर रहना), (4) सत्य (झूठ न बोलना), (5) नशीली वस्तुओं का सेवन न करना। महात्मा बुद्ध द्वारा वैचारिक एवं व्यावहारिक धरातल पर मानव-कल्याण को समर्पित ये पंचशील कहीं न कहीं उस सनातन संस्कृति, हिन्दू-धर्म का ही भाग रहे जिसकी एक शाखा के रूप में एक नई धार्मिक शाखा, एक नये धर्म बौद्ध का सूत्रपात भारतभूमि पर हो रहा था।

            वर्ण-व्यवस्था के कारण छुआछूत का दंश सह रहे लोगों को अपना सा लगने वाला धर्म प्राप्त हो चुका था। सामाजिक परिवर्तनों के प्रति सचेत लोगों को भी कर्मकाण्ड, ब्राह्मणवाद, पुरोहित कर्म से इतर नवीन संकल्पना इस धर्म में दिखलाई दे रही थी। इसके बाद भी जो स्वरूप बौद्ध धर्म का निखरकर आना चाहिए था कदाचित् वैसा नहीं हुआ। वर्तमान में यह अपनी जन्मभूमि से लगभग विलुप्त सा होकर दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया के कुछ देशों में ही जीवित है। बौद्ध धर्म की परिणति और उसके हृास के लिए एक ओर आक्रांता शासक जिम्मेवार रहे तो दूसरी ओर स्वयं बौद्ध समर्थकों, भिक्षुओं को भी इसका उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। महात्मा बुद्ध द्वारा अपने श्रोताओं की स्थिति के अनुसार जो भेद हीनयान एवं महायान के रूप में किये गये, कालान्तर में यही भेद बौद्ध धर्म के पराभव का कारक भी बने।

            हीनयान और महायान का यह विभेद धार्मिक क्रियाकलापों, भाषा, सम्प्रदाय, दर्शन आदि में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगा। शनैः-शनैः यह विभेद अपना विस्तारक रूप धारण करता रहा जो अन्ततः बौद्ध धर्म के हृास का एक कारक समझा जा सकता है। इस विभेद ने इतना विस्तार ले लिया कि हीनयान और महायान महात्मा बुद्ध को भी अलग-अलग रूपों में देखने लगे। हीनयान सम्प्रदाय के लोग बुद्ध को केवल एक महान व्यक्ति के रूप में स्वीकारते हैं जबकि महायान के लोग बुद्ध की उपासना देवतुल्य रूप में करने लगे। इसके अतिरिक्त हीनयान सम्प्रदाय के लोग बोधिसत्त्व में विश्वास न करने वाले, मूर्ति पूजा न करने वाले, केवल अपने निर्वाण की चिन्ता करने वाले, निर्वाण प्राप्ति के लिए भिक्षु बनने की अनिवार्यता वाले माने गये। इसके विपरीत महायान बोधिसत्त्व को स्वीकारते हैं, बुद्ध की मूर्ति की उपासना करना, अपने साथ-साथ अपने साथियों के निर्वाण की भी चिन्ता करना, निर्वाण के लिए भिक्षु बनने की अनिवार्यता न मानने वाले रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध जिस दर्शन, जिन विचारों, जिस जीवनशैली, आचार-विचार के द्वारा बौद्ध धर्म को सम्पूर्ण समाज पर प्रकीर्णित करना चाहते थे, वह बौद्ध धर्म अनुयायियों के आपसी विभेद के चलते सम्भव नहीं हो सका।

            यदि धार्मिक संकल्पना को देखें तो बौद्ध दर्शन ने कहीं न कहीं उस विचारधारा को एक नये सिरे से प्रचारित-प्रसारित करना शुरू किया जो किसी रूप में हिन्दू-धर्म का अंग हुआ करती थी। बुद्ध के पंचशील तो हिन्दू धर्म-दर्शन का ही भाग कहे जा सकते हैं, यदि बौद्ध धर्म और हिन्दू-धर्म में कोई विशेष अन्तर दिख रहा था तो वह था मूर्ति पूजा का विरोध, कर्मकाण्डों का विरोध, ब्राह्मणवाद, पुरोहितवाद का विरोध, वर्ण-व्यवस्था का विरोध। जैसा कि बहुलता में होता आया है कि किसी भी धर्म के विकास की अनन्तर यात्रा में उसमें कर्मकाण्ड सम्बन्धी दोष, सामाजिक बुराइयाँ परिलक्षित होने लगती हैं, कुछ ऐसा ही बौद्ध धर्म के साथ भी हुआ। कर्मकाण्डों की शुरुआत होने लगी, संघ में प्रवेश के त्रिरत्नों (बुद्ध, धर्म, संघ) के सुनियोजन में कमी आने लगी (यद्यपि यह व्यवस्था आज भी अपनी महत्ता स्थापित किये है) संघ व्याभिचार का केन्द्र बनने लगे, आमजन की भाषा, पालि के स्थान पर विद्वानों की संस्कृत भाषा को अपनाया जाने लगा, तान्त्रिक क्रियाओं का समावेश होने लगा। तत्कालीन समाज ब्राह्मणवाद, वर्णव्यवस्था आदि से त्रस्त होकर ही व्यक्तित्व की स्वतन्त्रता हेतु, वैचारिक स्वतन्त्रता हेतु, मध्यम मार्ग अपनाने हेतु ही बौद्ध धर्म की शरण में आया था और प्रकारान्त में उसे वही बुराइयाँ संघ में, बौद्ध धर्म-दर्शन में दिखाई दी तो वह इससे छिटक कर अलग हो गया।

            इसके अतिरिक्त ब्राह्मण-धर्म की पुनस्र्थापना, राजकीय प्रश्रय में कमी आना, मूल सिद्धान्तों में परिवर्तन होना, राजपूतों का उत्कर्ष, विदेशियों के आक्रमण भी बौद्ध धर्म के हृास का कारण बने। यह स्थिति विचार करने योग्य है कि जिस तेजी से बौद्ध धर्म का विकास हुआ वह उसी तेजी से समाप्ति की ओर भी गया। सैद्धान्तिक कारण कुछ भी रहे हों पर व्यावहारिकता में देखा जाये तो कालान्तर में बौद्ध धर्म अपनी विकासात्मक प्रक्रिया से इतर हिन्दू-धर्म के, उसके क्रियाकलापों, उसके दर्शन के विरोधात्मक रूप में कार्य करने लगा। बौद्ध धर्म चिन्तकों का निशाना ब्राह्मण वर्ग या कहें कि हिन्दू सवर्ण वर्ग बनने लगा। दया, करुणा, मानव-कल्याण का विचार देते-देते बौद्ध धर्मावलम्बी हिन्दू उच्च वर्ग को कोसने का कार्य करने लगे, इसके मूल में वे वर्ण-व्यवस्था विरोधी लोग थे जो हिन्दू-धर्म में निम्न वर्ण से आते थे। इस वर्ग ने बौद्ध धर्म में स्वयं को वर्ण-व्यवस्था से मुक्त पाकर स्वविकास, बौद्धिक विकास, वैचारिक विकास करने के स्थान पर हिन्दू उच्च वर्ग पर, ब्राह्मण वर्ग पर दोषारोपण करने का कार्य किया। इससे वह उच्च वर्ग बौद्ध धर्म से जुड़ने में असहज महसूस करने लगा हो जो बौद्ध धर्म को, दर्शन को मानव-कल्याण हेतु स्वीकारता था; वे बौद्ध मतावलम्बी पुनः हिन्दू धर्मोन्मुख हुए जो ब्राह्मण कर्मकाण्ड, पुरोहिती के चलते बौद्ध धर्म में आये।

            वर्तमान स्थिति यह है कि स्वयं बौद्ध धर्मावलम्बियों में इसको लेकर विवाद बना हुआ है कि महात्मा बुद्ध की असली विरासत किसके पास है? हीनयान और महायान में विभक्त हुई विभ्रम की स्थिति ने बौद्ध धर्म को, दर्शन को एक विचारधारा बना दिया। इस विचारधारा को जो जैसा चाहे वैसा तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकता है। गौतम बुद्ध के पंचशील सिद्धान्त को सार्वभौम समझकर बौद्ध धर्म को सर्वोच्च धार्मिक सत्ता पर प्रतिस्थापित करने के प्रयास में अवसरवादी नजरिया भी सामने आने लगा। इससे लाभान्वित लोगों ने स्वार्थपरक सोच को अपना कर बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि की प्रार्थना को भुला दिया। वहीं दूसरी ओर बौद्ध धर्म से विचलित, अलाभकारी लोगों ने बौद्ध दर्शन की बौद्धिकता को अपनी वैचारिक स्वतन्त्रता से छिन्न-भिन्न करना प्रारम्भ कर दिया। किसी ने सिद्धार्थ के गृह-त्याग को ज्ञान की खोज बताया तो किसी ने उनकी पलायनवादी प्रकृति; किसी ने बुद्ध को शान्ति, अहिंसा का प्रचारक बताया तो किसी ने धार्मिक आन्दोलन का सूत्रधार बताया; कोई आज भी बुद्ध का नाम लेकर शान्ति, अहिंसा, प्रेम का सपना देखता है तो कोई बुद्ध को मनुवादी व्यवस्था को कोसने का हथियार बनाता है; किसी के लिए बुद्ध निर्वाण प्राप्ति का मार्ग हैं तो किसी के लिए सत्ता पाने का माध्यम। इस तरह नहीं लगता कि लगभग मृतप्राय हो चुके बौद्ध धर्म को पुनर्जीवन प्राप्त हो सकेगा। बौद्ध धर्म के आविर्भाव का उद्देश्य कदापि किसी धर्म का विरोध करना नहीं था, किसी व्यवस्था का विरोध करना नहीं था। महात्मा बुद्ध ने एक महापुरुष के रूप में समाज को दिशा देने का कार्य किया था, अपने उपदेशों, वचनों के द्वारा वे समाज में फैली विषमताओं को, विसंगतियों को, भेदभाव को मिटाना चाहते थे। ऐसा कर पाने में वे कितने सफल रहे यह एक अलग विषय हो सकता है किन्तु बौद्ध धर्म के आविर्भाव से लेकर वर्तमान तक की यात्रा से यह तो स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध के उपदेशों को, विचारों को स्वयं उन्हीं के अनुयायियों द्वारा सकारात्मक रूप से आत्मसात् नहीं किया गया। देखा जाये तो वर्तमान संदर्भों में समाज को शान्ति, प्रेम, अहिंसा की आवश्यकता है, वह चाहे किसी भी धर्म के द्वारा प्राप्त हो। यदि बौद्ध धर्मावलम्बियों को ऐसा लगता है कि आज भी समाज को, विश्व को प्रेम, अहिंसा, दया, करुणा का संदेश देने के लिए बौद्ध धर्म ही एकमात्र विकल्प है तो इन धर्मानुयायियों को बौद्ध धर्म में व्याप्त हो चुकी उन बुराइयों को दूर करना होगा जिनके कारण बौद्ध धर्म रसातल की ओर गया। महात्मा बुद्ध को भगवान से इतर महापुरुष के रूप में प्रतिष्ठित कर उनके उपदेशों, विचारों को समाज के बीच प्रतिस्थापित करना होगा क्योंकि समाज का आदर्श कोई महापुरुष तो हो सकता है, ईश्वर कदापि नहीं। यदि बौद्ध धर्मावलम्बी इस धर्म को पुनर्जीवन प्रदान करना चाहते हैं; उसके दर्शन का प्रचार-प्रसार चाहते हैं; समाज में बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता स्थापित करना चाहते हैं तो समाज में पुनः बुद्ध और बौद्ध दर्शन को, उसके ज्ञान को, उसकी शिक्षाओं को केन्द्रबिन्दु बनाना होगा किन्तु उससे पूर्व उसका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

14 अक्टूबर 2015

पुरस्कार वापसी विशुद्ध राजनैतिक शिगूफा

हिन्दू धर्म के अंधविश्वासों को दूर करने की दिशा में कार्य करते हुए एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक साहित्यकार शहीद हो गए. बहुतों को इस शहीद शब्द पर आपत्ति हो सकती है, होनी भी चाहिए क्योंकि शहीद शब्द इतना मामूली नहीं कि किसी की मौत के लिए इस्तेमाल किया जाये. यहाँ भी हमारा मकसद किसी भी रूप में उक्त दो मौतों या कहें कि हत्याओं को शहीद या शहादत उच्चारित करने  का नहीं वरन वर्तमान दौर की मानसिकता को सामने लाना है. एक साहित्यकार की हत्या वर्तमान केन्द्र सरकार के कार्यकाल में होती है और दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या पिछली केन्द्र सरकार के कार्यकाल में होती है. इन दो मौतों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं सिवाय इसके कि ये दोनों ही हिन्दू धर्म के अंधविश्वासों को दूर करने का कार्य करते थे. इससे क्या अंदाज़ा लगाया जाये कि ये हिन्दू धर्म के वफादार थे अथवा हिन्दू धर्म के मानने वालों के प्रति वफादार थे? ऐसा इस कारण क्योंकि यदि ये सामाजिक हित में कार्य कर रहे होते तो न केवल हिन्दू धर्म के अंधविश्वासों के विरुद्ध कार्य करते वरन सभी धर्मों के अंधविश्वासों को दूर करने की चेष्टा करते. ऐसा कुछ भी करने का कोई प्रमाण इनके कार्यों से नहीं मिलता है. चलिए ये स्वीकार लिया जाये कि ये किसी न किसी रूप में सिर्फ और सिर्फ हिन्दू धर्म का भला चाहते थे और इसी कारण से इस एक ही धर्म के अन्धविश्वास मिटाना चाहते थे तो उन साहित्यकार महोदय द्वारा हिन्दू देव की मूर्ति पर पेशाब करने का दाम्भिक बयान देना किस तरह से अन्धविश्वास को दूर करता? संभव है कि वे सामाजिक कार्यकर्ता भी कुछ इसी तरह के क़दमों से अन्धविश्वास को दूर करने की चेष्टा करते होंगे?
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वे दोनों किस तरह से हिन्दू धर्म के अन्धविश्वास को दूर करने में लगे थे, ये वे दोनों ही जानते होंगे किन्तु सिर्फ हिन्दू धर्म के प्रति उनके ऐसे रवैये को देखकर स्पष्ट है कि वे अन्धविश्वास दूर करने की आड़ में सिर्फ और सिर्फ हिन्दू धर्म के विरुद्ध अपने कलुषित विचार सामने लाते होंगे. अब जबकि वे दोनों उन्हीं की तरह के धार्मिक कट्टर व्यक्तियों अथवा संगठन का शिकार हो गए हैं तो उनके अनुवर्ती अनेकानेक ऐसे लोग जो किसी न किसी रूप में खुद को हिन्दू धर्म के विरुद्ध खड़ा मानते हैं, उनकी मौत पर राजनीति करते दिखने लगे हैं. यहाँ उन दोनों व्यक्तियों को कट्टर कहने के पीछे का भावार्थ महज इतना है कि अपने विचारों को किसी दूसरे पर थोपना भी एक तरह की कट्टरता है. ऐसे लोग भूल जाते हैं कि वे धार्मिक अन्धविश्वास दूर करने के नाम पर अपने अन्धविश्वास को, अन्धविचार को शेष समुदाय पर थोप रहे हैं. उनके विचारों को, उनके विश्वासों को स्वीकार न करने पर वे कभी हिन्दू देवी-देवताओं को दारू पिलाते हैं, कभी उन पर थूकने का काम करते हैं, कभी उन पर पेशाब करने जैसा बयान देते हैं. बहरहाल, हिन्दू धर्म के विरुद्ध कदम उठा-उठाकर, लेखनी चला-चला कर अपनी आजीविका कमाने वाले, अपना पेट पालने वाले लोग उन दो व्यक्तियों की मौत के बहाने से हिन्दू धर्म पर, केन्द्र सरकार पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधने का मन बनाये बैठे थे. ‘बिल्ली के भाग्य से छीका टूटने’ की भाँति ही ऐसे लोगों को दादरी का इखलाक कांड हाथ लग गया. एक साहित्यकार, एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या ने साहित्यजगत को हिलाकर रख दिया. अवसर की तलाश में बैठे लोगों ने देश में कथित रूप से शांति को, सहिष्णुता को खतरा बताते हुए साहित्य अकादमी से प्राप्त सम्मान-पुरस्कार को लौटना शुरू कर दिया.

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पुरस्कार वापसी के कदमों के दौरान सभी ने साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और दादरी कांड को आधार बनाया. पुरस्कार वापसी के द्वारा चर्चा में जल्द से जल्द आने की होड़ में ये लोग भूल गए कि सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या पिछली केन्द्र सरकार के समय हुई थी; ये लोग भूल गए कि यदि एक दादरी कांड से देश की शांति, सहिष्णुता, एकता, सौहार्द्र आदि नष्ट हो रहे हैं तो देश में इससे पहले की सरकारों में और भी भयानक-भयानक काण्ड हुए हैं जिन्होंने एक व्यक्ति को नहीं कई-कई परिवारों को मौत की नींद सुलाया है, कई-कई शहरों को उपद्रव की आग में झुलसाया है. दरअसल पुरस्कार वापसी के ज़रिये इन लोगों का हमला हिन्दू धर्म पर है, केन्द्र सरकार पर है और साथ ही साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पर भी है. कथित रूप से साहित्यकारों की वामपंथी बिरादरी को एक हिन्दीभाषी का अकादमी का अध्यक्ष बन जाना फूटी आँख भी नहीं सुहा रहा है. ऐसे में साहित्यकार की हत्या और दादरी कांड ने उनके मन की मुराद पूरी कर दी. इसके अलावा ये लामबंदी गैर-राजनैतिक होने के बाद भी विशुद्ध राजनैतिक है. यदि पुरस्कार लौटाते इन साहित्यकारों को वर्तमान केन्द्र सरकार से इतनी ही परेशानी है, इतनी ही समस्या है तो पुरस्कार लौटाने के साथ-साथ वे सारी सुविधाएँ लेना भी बंद करें जो केन्द्र सरकार की कृपा-दृष्टि से प्राप्त हो रही हैं/उसकी कृपा से प्राप्त की जाती हैं. दरअसल इन साहित्यकारों का मकसद अपने इस विरोध से वैश्विक स्तर पर केन्द्र सरकार को बदनाम करना है; उस सरकार के पक्ष में अपनी भक्ति दर्शाना है जिसने उन्हें पुरस्कार-सम्मान से नवाजा था. यहाँ सवाल उठता है कि क्या जिस साहित्यकार की मौत से, जिस सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या से, जिस दादरी कांड से पुरस्कार वापस करते इन साहित्यकारों का दिल पसीज रहा है, उनकी सहायता के लिए इनमें से कौन-कौन से साहित्यकार जागे? ये समझना होगा कि साहित्य अकादमी अपने आपमें स्वायत्त संस्था है न कि सरकार के नियंत्रण में, ऐसे में अकादमी के पुरस्कार वापस करने के पीछे की नीयत स्पष्ट समझ आती है. ऐसे साहित्यकार पुरस्कार वापसी के द्वारा अकादमी के अध्यक्ष पर, केन्द्र सरकार पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर, हिन्दू धर्म पर हमला कर रहे हैं, वैश्विक स्तर पर सरकार की नहीं वरन सम्पूर्ण देश की छवि ख़राब कर रहे हैं. कम से कम ऐसे लोग साहित्यकार तो नहीं ही कहे जा सकते जो समाज में विभेदकारी स्थिति को पैदा करके संवेदना का नाटक कर रहे हैं. ऐसे लोगों को यदि दादरी के इखलाक की हत्या का दर्द है और विदर्भ या बुन्देलखण्ड के किसानों की आत्महत्याओं का दुःख नहीं है तो वे साहित्यकार नहीं सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक दलों के प्रवक्ता सरीखे हैं, ये साहित्यकार नहीं दुराग्रही राजनैतिक समर्थक हैं. 
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11 अगस्त 2015

धर्म के नाम पर पाखंड


एक और नाम धर्म-कर्म में उछलकर सामने आया है, साथ में परिपाटी सा बनाये रखा हुआ एक सम्मानित शब्द जोड़कर. कुछ ‘बापू’ जोड़कर सामने आये, कुछ ‘बाबा’ लगाकर, कुछ ‘साध्वी’ के साथ आये तो ये ‘माँ’ जोड़कर भक्तों के सामने प्रकट हुई. जी हाँ, उन्हीं राधे माँ की चर्चा आजकल छिड़ी हुई है जिनपर किसी समय एक महिला पर हिंसा करने का आरोप लगा था और अब अश्लीलता फ़ैलाने का आरोप लगा है. भक्तिमय दरबार की तस्वीरें आने के साथ-साथ अब जो तस्वीरें सामने आई हैं उनमें वे किसी भी कोण से धार्मिक संत, साध्वी तो समझ नहीं आती हाँ, एक अच्छी भली मॉडल का भ्रम पैदा करती हैं. इन तस्वीरों को यदि अश्लीलता का पर्याय माना-समझा जाये तो फिर फ़िल्मी हीरोइन, विज्ञापनों की तमाम मॉडल्स को, टीवी आदि सहित अन्य कार्यक्रमों में प्रस्तुतीकरण देती महिला कलाकारों के खिलाफ भी कार्यवाही की जा सकती है, जो अत्यल्प वस्त्रों में समाज में अश्लीलता फैलाती रहती हैं. राधे माँ के नाम से संत-जगत में प्रसिद्द इस महिला के बारे में कहा जाता है कि वो अपने भक्तों को अनोखे अंदाज़ में आशीर्वाद देती है, उनके साथ घुलमिल कर नाचती है, आशीर्वाद में गले लगाती है, गुलाब का फूल अपने हाथ से देती है. राधे माँ की भक्ति का आनंद उठाने पहुंचे कई भक्तों ने तो यहाँ तक आरोप लगाये हैं कि उनके भक्ति दरबार में अश्लीलता का माहौल रहता है, उनकी और शिष्यों-भक्तों की भाव-भंगिमाएँ भी अश्लील होती हैं. कुछ इसी तरह के अन्य दूसरे आरोपों के चलते कुम्भ मेले में उनके प्रवेश को निषिद्ध कर दिया गया और इधर खबर मिली है कि उनके विरुद्ध सम्मन जारी किया जा रहा है.

सत्यता क्या है, कैसी है, कितनी है इस पर अब देशव्यापी बहस छिड़ी हुई है; सोशल मीडिया में राधे माँ के पक्ष-विपक्ष में अजब-अजब तर्कों-कुतर्कों की भरमार दिख रही है; आरोप-प्रत्यारोप के बादल गहराते, बरसते जा रहे हैं; उनके भक्त अपनी बात रख रहे हैं तो विरोधी अपने आरोपों को सत्य करने में लगे हैं. धार्मिक वातावरण में, धर्म-संसार में, संत-जगत में ये कोई पहला मामला सामने नहीं आया है जबकि किसी संत, साध्वी के चरित्र पर, उसकी हरकतों पर, उसके आश्रम, भक्ति-दरबार आदि के माहौल पर ऊँगली उठाई गई हो. इससे पहले भी कई-कई नाम संदेह के घेरे में आते रहे हैं और कई-कई का कानूनी तरीके से पर्दाफाश भी होता रहा है. अब इन संत महिला को कानूनी रूप से घेरे में लाये जाने की कवायद हो रही है, उसके विरुद्ध वातावरण का निर्माण हो रहा है, आरोपों का सिलसिला चल पड़ा है तब इसकी भी पहल आवश्यक लगती है कि ऐसे संतों-साध्वियों का वास्तविक उद्देश्य आखिर क्या होता है? एक साधारण सा व्यक्ति कैसे रातों-रात लाखों-लाख लोगों के लिए भगवान के रूप में दिखने लगता है? कैसे हजारों-लाखों लोग उसके एक इशारे पर उसकी बात मानने को तैयार हो जाते हैं? कैसे किसी अदना से व्यक्ति के पार धार्मिक कृत्य में संलिप्त होते ही अकूत संपत्ति जमा हो जाती है? इस पर भी चर्चा की जानी चाहिए कि आखिर मात्र हिन्दू धर्म से सम्बंधित संतों-साध्वियों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है? मीडिया में, समाज में, जागरूक कहे जाने वाले वर्ग में आलोचनाओं का शिकार आखिर महज हिन्दू धर्म ही क्यों होता है? ये भी गहन शोध का विषय है कि कहीं ऐसे लोगों को हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए अराजक तत्त्वों की तरफ से धन मुहैया तो नहीं करवाया जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये व्यक्तियों की धर्म सम्बन्धी कमजोर नस को पकड़ कर पहले उसकी भावनाओं के साथ स्वयं का तादाम्य स्थापित करते हैं और फिर धर्म के उच्च बिन्दु पर बैठने के बाद हिन्दू धर्म को रसातल में ले जाने के लिए संदेहास्पद कृत्यों में संलिप्त हो जाते हैं?

धर्म के नाम पर पाखण्ड फैलाते ये साधु, संत, साध्वियाँ जितने दोषी हैं उनसे कहीं कम वे लोग भी नहीं हैं जो इनके दरबारों को सजाने में लगे रहते हैं; इनके क्रियाकलापों को देव-क्रिया मानकर उनका अनुसरण करने लगते हैं; उन्हीं को भगवान समझकर उनके आगे नतमस्तक हो जाते हैं. जीवन की छोटी से छोटी ख़ुशी, समस्या के लिए ऐसे ढोंगियों का मुँह ताकना, इनके भरोसे अपनी जिन्दगी के फैसले करना, इन्हीं की तथाकथित दयादृष्टि पर अपने आपको निर्भर कर लेना आदि भी इनको समाज में स्थापित करवाता है. ऐसे में जबकि उनको आदर, सम्मान के उच्च पायदान पर बैठा दिया जाता है तब उनके विरुद्ध किसी भी तरह के आरोप समाज में वैमनष्यता को जन्म देते हैं. सामाजिक सौहार्द्र बिगाड़ने वाले प्रदूषकों के रूप में सामने आते हैं. ऐसे लोगों के विरोध के साथ-साथ चर्चा छिड़ जाती है कि गैर-हिन्दू धर्म के पाखंडियों को क्यों नहीं पकड़ा जाता है? क्यों नहीं गैर-हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों को कानूनी शिकंजे में जकड़ा जाता है? क्यों नहीं हिन्दू धर्म की कुरीतियों के नाम पर जबरन धर्मान्तरण करवाने वालों के विरुद्ध कार्यवाही की जाती है? ऐसे अन्य दूसरे सवाल भी समाज में विभेद पैदा करते हैं. एक दायित्व सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों का भी बनता है कि वे समाज में अपने क्रियाकलापों, धार्मिक अनुष्ठानों, धर्म के नाम पर लोगों को बहकाने वाले ढोंगियों का पर्दाफाश करें. लोगों को धर्म के नाम पर पाखंड कर रहे व्यक्तियों की वास्तविकता से परिचित करवाकर धर्म के साथ होने वाले खिलवाड़ को रोकने में मददगार बनें. ऐसा सबको समवेत रूप से करना होगा, भले ही वो किसी भी धर्म,जाति का ही क्यों न हो?

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29 मार्च 2015

मंदिर बने आधुनिक पर्यटन केन्द्र


नवदुर्गा का समापन हुआ, जगह-जगह मैया के दर पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली. इसी तरह भगवान के नाम पर भी भीड़ लगी हुई है. आधुनिकता भरे समाज में जहाँ माता-पिता के लिए आज के युवाओं के पास समय नहीं है, वहाँ भगवान के नाम पर जुड़ने वालों की भीड़ अधिक तेजी से बढती जा रही है. कितना हास्यास्पद है कि एक तरफ सनातन संस्कृति-सभ्यता को फूहड़ता, ढोंग करार दिया जाता है और दूसरी तरफ उसी के नाम पर इन्हीं लोगों के पास पत्थर की मूर्तियों को पूजने का समय भी निकल आता है. विद्रूपता ये आती जा रही है कि भगवान के सामने माथा रगड़ने वालों के पास सुबह-सुबह अपने माता-पिता के चरणों में शीश नवाने का समय नहीं होता है. मंदिर में भक्तों की लम्बी-लम्बी कतार बहुत कुछ कह जाती है. इधर देखने में आ रहा है कि माता-पिता बीमारी से परेशान हैं, उनके इलाज के लिए किसी को फुर्सत नहीं है किन्तु अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा भी आसान सी लगती है.
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आजकल देखने में आ रहा है कि नवयुवकों-नवयुवतियों का मंदिर के प्रति, भगवान के प्रति, देवी-देवताओं के प्रति एकाएक मोह बढ़ गया है. पब-कल्चर पसंद करने वाली इस पीढ़ी को अचानक भक्ति का माहौल कैसे और क्यों पसंद आने लगा है? डिस्को, पॉप, जैज की धुनों पर थिरकती युवा पीढ़ी आज भजनों पर सिर हिलाती, ताली बजाती, नाचती, झूमती दिख रही है. सवाल उठते हैं कि क्या वाकई युवा पीढ़ी का रुझान भारतीय संस्कृति की ओर बढ़ा है? क्या इस पीढ़ी में भगवान के प्रति श्रद्धा-भाव जागृत हो गया है? या फिर अब लोगों के पास परेशानियों का अम्बार कुछ ज्यादा ही है जिसका निपटारा वे भगवान से करवाना चाहते हैं? आखिर लोग इतनी बड़ी संख्या में, ख़ास तौर से युवा, देवी-देवताओं की शरण में क्यों चले आ रहे हैं? मन के सवाल पर मन ही जवाब देता है कि अब मंदिर, देवी-देवताओं की भक्ति का चलन एक शौक बनता जा रहा है. बहुत से लोग हैं जो अपनी समस्या लेकर जाते हैं किन्तु अधिक से अधिक लोगों का मंदिर जाना शौकिया तौर पर ही होता दिखता है. मंदिर जैसी पवित्र और पावन जगह, जहाँ किसी के मन में कलुषित विचारों के आने का सवाल ही नहीं उठता और किसी के द्वारा किसी भी तरह के हस्तक्षेप का भी सवाल नहीं उठता, उसका उपयोग अपने शौक के लिए करना समझ से परे हैं, किन्तु ऐसा ही हो रहा है. इसके अलावा आजकल मंदिरों में नामी-गिरामी लोगों के जाने का भी चलन बढ़ता जा रहा है. कभी कोई कलाकार, कभी कोई उद्योगपति, कभी कोई खिलाड़ी तो कभी कोई नेता और आश्चर्य देखिये परेशानी का समाधान खोजने, सुख की तलाश में जाने वाला मंदिर को लाखों, करोड़ों का माल दे जाता है. मंदिरों की दान-पेटियाँ एक झटके में लखपति-करोड़पति हो जातीं हैं.
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सोचिए कि लाखों के जेवरात, धन देने वालों के पास किस तरह की परेशानी होती होगी? परेशानी तो उस के पास है जो छप्पर में लेटा है और सरदी, गरमी, बरसात को अपनी देह पर सह रहा है. परेशान तो वो है जिसकी फसल नष्ट हो चुकी है, खाने के अन्न का एक दाना है है.  परेशानी तो उसके पास है जो उसी मंदिर के बाहर पड़ा इन धनकुबेरों से दो-चार रुपये देने की गुहार कर रहा है. परेशानी में वह है जो सुबह घर से निकलता है और शाम को बापस बेरोजगारी की ही स्थिति में बापस लौटता है. परेशानी में वह है जिसकी बेटी विवाह को बैठी है और उसके पास लाखों रुपये नहीं है दहेज के लिए. परेशानी में वह है जो पानी की कमी से अपने खेतों की फसल को सूखता हुआ देख रहा है. परेशानी उसके पास है जो एक समय के भोजन की व्यवस्था भी अपने बच्चों के लिए नहीं कर सकता है. परेशानी में वह है जो अभी जन्मी ही नहीं और उसको मौत देने की तैयारी होने लगी है. क्या अब भी आपको लगता है कि ये धनकुबेर और हाथों में हाथ डाले घूमती हमारी युवा पीढ़ी किसी भक्ति-भाव से देवी-देवताओं के दर्शनों के लिए मंदिर आदि में जाते हैं? देखा जाये तो आधुनिक युग में मंदिर भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो गये हैं. दो-चार घंटे की घुमक्कड़ी, प्रेमालाप और सभ्यता-संस्कृति के स्थल पर होने के कारण किसी के संदेह का शिकार भी न बनना. ज़ाहिर है कुछ ऐसे ही कारणों से आजकल देवी-देवताओं की भक्ति के नाम पर मंदिरों में युवाओं की भारी संख्या दिखने लगी है.

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24 मार्च 2014

शंकराचार्य जी, रोज खंडित होती धार्मिकता नहीं दिखती क्या




मोदी समर्थकों के उत्साहित ‘हर हर मोदी’ से शंकराचार्य जी को धार्मिकता खतरे में पड़ती नजर आई. धार्मिकता को ठेस न पहुँचे तो उन्होंने संघ प्रमुख से बात की और ‘हर हर मोदी’ को रोकने की बात कही. आखिर महादेव का पेटेंट ‘हर हर’ मोदी के समर्थक मोदी के साथ कैसे जोड़ सकते हैं. कितना हास्यास्पद लगता है कि दो शब्दों से ही धार्मिकता खतरे में पड़ जाती है, धार्मिक भावनाएँ आहत होने लगती हैं. सनातन धर्म के रूप में, सहिष्णु धार्मिक पद्धति के रूप में हिन्दू धर्म का कोई सानी नहीं किन्तु चंद धार्मिक पदाधिकारियों के कारण से हिन्दू धर्म अपनी प्रासंगिकता पर हमेशा ही प्रश्न चिन्ह लगवाता रहा है. शंकराचार्य महोदय को ‘हर हर मोदी’ से भगवान शंकर का अपमान होता दिखा किन्तु उस अपमान को वे नहीं देख पा रहे हैं जो अनजाने में रोज ही होता है.
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किसी नारे के दो शब्दों का घोष करने से धार्मिकता, धार्मिक भावनाएँ उतनी आहत नहीं होनी चाहिए, जितनी कि शंकराचार्य जी समझ रहे हैं. धार्मिकता यदि इस रूप में खंडित हो रही है तो फिर शंकराचार्य जी उन व्यक्तियों के नाम भी बदलवाने की मुहिम चलायें जिनका नाम भगवानों के नाम पर है और जो नशे का शिकार होकर नाली में गिरते-उलटते दिखते हैं. उन बलात्कारियों, हत्यारों, अपराधियों के नाम भी बदलवाएं जो किसी न किसी भगवान के नाम पर हैं. शादियों में छपने वाले कार्ड में गणेश आदि भगवान की तस्वीर लगवाना बंद करवाएं क्योंकि बाद में इन कार्डों का उपयोग कूड़ा बनने के और कुछ नहीं होता है. पूजा-सामग्री से, धार्मिक उपयोग में आने वाली सामग्री, अगरबत्ती वगैरह से भी भगवान का नाम, उनकी तस्वीर हटवाने का काम करें क्योंकि इनके पैकेट, इनके कागज, इनकी पॉलीथीन आदि उपयोग बाद नाली, नाले में तैरती दिखती है अथवा सड़क पर पैरों तले कुचलती पाई जाती है. शंकराचार्य जी क्या आपको फिल्मों में धार्मिक भावनाओं के साथ, हिन्दू देवी-देवताओं के साथ होता खिलवाड़ नहीं दिखा कभी? हिन्दू धार्मिक भावनाओं, धार्मिक प्रतीकों का उपहास उड़ाते फ़िल्मी कलाकार नहीं दिखे? कभी उपद्रवियों द्वारा मंदिरों को, देवी-देवताओं की मूर्तियों को खंडित करने में धार्मिक भावनाओं को खतरा नहीं दिखा? शायद शंकराचार्य जी को शाब्दिक धार्मिक भावना की अधिक चिंता है, तभी उनकी जागरूकता ‘हर हर मोदी’ पर तो दिखी बाकी जगहों पर होते धार्मिक खिलवाड़ पर नहीं जागी.
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शंकराचार्य जैसे लोगों को एक बात बहुत अच्छे से गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि हिन्दू धार्मिक भावनाएँ तब तक मिटने वाली नहीं जब तक कि गाँव-गाँव तक एक-एक आदमी के दिल में धार्मिकता जिन्दा है. धार्मिक भावनाएँ तब तक आहत नहीं होने वाली जब तक धर्म राजनीति के बजाय आम आदमी के हृदय में बसा हुआ है. शंकराचार्य जैसे लोगों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि ‘हर हर महादेव’ ‘जय श्री राम’ आदि घोष किसी राजनीतिक दल की, किसी धार्मिक आचार्य की बपौती नहीं-उसकी थाती नहीं.... ये आम हिन्दू की भावनाएँ हैं. और जब तक आम हिन्दू की भावनाएँ आहत नहीं हो रहीं तब तक किसी भी घोष से धार्मिकता खंडित नहीं होने वाली, आहत नहीं होने वाली.
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27 अक्टूबर 2013

खुदाई में सरकारी नीयत भी संदेहास्पद




बाबा को दिखाई दिए एक सपने के बाद खण्डहर में बदल चुके किले में खजाने की खोज होने लगी है. एक सप्ताह से अधिक समयावधि में खुदाई होने के बाद भी कुछ हड्डियों, कुछ कीलों, दीवारों, मटके के अलावा कुछ नहीं मिला है. खजाना तो बाद की बात है, वहाँ फूटी कौड़ी भी नहीं मिल सकी है. शोभन सरकार, जिन्हें स्वप्न आया था और उनके चेले ओम महाराज, जो लगातार खजाना मिलने का सीना ठोंक दावा कर रहे हैं, पर मुकदमा चलाये जाने की सरकारी मंशा के सामने आने की खबर आई है. पर देखा जाये तो प्रथम दृष्टया इस मसले पर केवल दो बाबा-संत ही आरोपी किस आधार पर बनाये जा सकते हैं? स्वप्न के आधार पर सोना या कुछ भी मिलने की चर्चा से अन्धविश्वास को बढ़ावा मिलता है, किन्तु यहाँ मसला दूसरी तरह का हो गया है. इन दो बाबाओं-संतों ने खजाने की खोज के लिए सरकार पर कोई जोर नहीं डाला था, कोई अनशन या जनान्दोलन नहीं किया था. इस मामले में यदि इन बाबाओं को आरोपी बनाया जाता है तो सरकार, सरकारी तंत्र, प्रशासनिक अधिकारी भी आरोपी होने चाहिए जिन्होंने एक स्वप्न के आधार पर खुदाई का काम शुरू किया.
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एक तरफ विज्ञान की बातों को बढ़ाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर सपने के आधार पर खुदाई का काम शुरू किया जाता है, यह तो अपने आपमें ही हास्यास्पद समझ आता है. समाज में आमतौर पर ये धारणा बनी हुई है कि साधू-संन्यासी-संत आदि अपने कृत्यों से अन्धविश्वास फ़ैलाने का काम करते हैं, धर्म के नाम पर आम जनमानस को बहकाने का काम करते हैं, किन्तु यहाँ सरकार ने किस आधार पर खजाने की खोज हेतु खुदाई का आदेश दिया, जबकि सरकार के पास पुरातत्त्व, भूविज्ञान से एएसआई, जीएसआई नामक संस्थाएँ भी हैं. इन संस्थाओं के माध्यम से पहले वास्तविकता को जांच-परख लेना चाहिए था, उसी के बाद आगे की कार्यवाही करनी चाहिए थी. अब शोभन सरकार के, ओम महाराज के दावों पर सवाल उठाया जा रहा है तो सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाये जाने चाहिए. यदि इस खुदाई के पूर्व कोई सर्वेक्षण करवाया गया है तो सरकार को अन्धविश्वास मिटाने की नियत से सर्वेक्षण रिपोर्ट का खुलासा करना चाहिए और यदि खुदाई का काम बिना किसी सर्वेक्षण के शुरू हुआ है तो सरकार भी उतनी दोषी है जितने ये दो साधू-संत दोषी हैं.
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इधर एक सप्ताह से अधिक का समय निकल जाने के बाद भी खजाने की झलक भी न मिल पाने से जनमानस में अन्धविश्वास भले ही न फैला हो पर अब अलग-अलग विचारधाराएँ अवश्य फैलने लगी हैं. लोगों में अजब-अजब तरीके के कयास लगाये जाने लगे हैं. कोई इस खुदाई को तत्कालीन संग्राम के हथियारों की खोज मान रहा है तो कोई एक पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा खजाना गड़बाये जाने की अफवाह को पुनर्जीवित करने में लगा है. कोई इसे साधू-संतों को कठघरे में खड़ा करके हिन्दू धर्म को कलंकित करने की बात करता है तो कोई वर्तमान मंहगाई-भ्रष्टाचार आदि से जनमानस का ध्यान हटाने की चर्चा कर रहा है. असलियत क्या है ये तो समय आने पर, खुदाई पूरा होने पर पता चलेगा किन्तु सरकार को इन दो संतों पर कानूनी कार्यवाही करने के पूर्व खुद को भी कटघरे में खड़ा करना पड़ेगा.