सामान्य बोलचाल में
'विद्यार्थी' शब्द के लिए 'छात्र' शब्द निःसंकोच, बहुतायत में
प्रयोग होते दिखाई देता है. कभी विचार नहीं किया था कि ऐसी गलती शासन स्तर से देखने
को भी मिलेगी. निदेशालय से जारी इस पत्र में एकाधिक जगह पर 'छात्र' शब्द का उपयोग किया गया है. यदि 'विद्यार्थी' शब्द लिखने में
समस्या या कोई तकनीकी बाध्यता थी तो छात्र/छात्रा लिखा जा सकता था. यद्यपि निदेशालय
की इस त्रुटि के लिए उनको पत्र लिख दिया गया है तथापि लगता नहीं है कि इसमें सुधार
होगा. स्व-घोषित विद्वतजनों को समझाना, विशेष रूप से उनकी गलती पर, अत्यंत दुष्कर कार्य होता है.
12 अप्रैल 2026
'विद्यार्थी' शब्द को 'छात्र' न बनायें
21 फ़रवरी 2026
बच्चों को इंसान बनायें न कि मशीन
अपने रंग-स्वरूप में बसंती मदहोशी ओढ़े रहने वाले मौसम में एक भय भी लिपटा रहता
है. इस भय से समाज के सभी लोग प्रभावित नहीं होते बल्कि एक विशेष आयु-वर्ग के
बालक-बालिका ही प्रभावित होते हैं. मौसमी सुहानेपन में परीक्षाओं का आना बच्चों को
भयभीत ही करता है. इसका एक बहुत बड़ा कारण है कि अब परीक्षाओं को किसी बच्चे के
द्वारा सर्वाधिक अंक लाये जाने का पैमाना मान लिया गया है. ऐसी स्थिति के कारण परीक्षाओं
के नाम पर ही अभिभावकों द्वारा बालमन पर एक तरह का दबाव डाला जाने लगता है. बच्चों
के सामने अनेक तरह के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन पर सभी से अधिक अंक लाने के लिए
दबाव बनाया जाने लगता है.
वर्तमान शैक्षिक वातावरण जिस तरह से बन गया है उसमें बच्चों की बुद्धिमत्ता से
अधिक चर्चे उसके द्वारा प्राप्त अंकों के होते हैं. यहाँ वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा
के माहौल में ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि बच्चों के अंकों के कारण से उनमें
हीनभावना न पनपने पाए. इसके उलट हो ये रहा है कि स्वयं अभिभावकों द्वारा न केवल
परिवार के बच्चों से बल्कि मोहल्ले के, सोसायटी के, विद्यालय के अन्य बच्चों के साथ अपने
बच्चे की तुलना करते हुए कम अंकों के कारण उसे कमतर महसूस कराया जाता है. सोचने
वाली बात ये है कि अंकों का अधिक या कम आना एक परीक्षा की प्रक्रिया, उसकी पद्धति, मूल्यांकन के वातावरण पर आना निर्भर
करता है. इसके स्थान पर बच्चों की बुद्धिमत्ता, उनके कौशल, उनकी बौद्धिकता का आकलन करते हुए उनको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. अपने
बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास प्रत्येक अभिभावक द्वारा किया जाता है किन्तु
बेहतर शिक्षा के नाम पर बच्चों पर दबाव बनाया जाना कदापि उचित नहीं.
अभिभावकों को ये समझना चाहिए कि बेहतर शिक्षा का सम्बन्ध किसी भी रूप में
अंकों से नहीं है. उस पर भी परीक्षा जैसे मानसिक दबाव भरे माहौल में यदि परिवार का
वातावरण भी बोझिल रहेगा,
अभिभावकों द्वारा भी अधिकाधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाया जायेगा तो यह स्थिति
बच्चों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा.
यह एक सामान्य सा मनोविज्ञान है कि कक्षा के, परिवारके वातावरण
में और परीक्षा कक्ष के वातावरण में अंतर होता है. वातावरण का अंतर बच्चों को अलग
तरह से प्रभावित करता है. कक्षा में, परिवार में अपनी पढ़ाई,
अपनी याददाश्त पर शत-प्रतिशत विश्वास करने वाले बहुत से बच्चे परीक्षा कक्ष में
चिन्तित, व्यग्र दिखाई देते हैं. निश्चित समय-सीमा में प्रश्नपत्र को हल करने की
उनकी उलझन में यदि अधिकाधिक अंक लाने का बोझ डाल दिया जाये तो निश्चित ही बच्चे
अपनी ही प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे.
संभव है कि वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण
के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों
से सज्जित करना अभिभावकों की मजबूरी हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का
दबाव बनाया जाने लगा हो किन्तु यह बच्चों के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर
रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि परीक्षा के दिनों में वे अपने व्यस्ततम समय में से कुछ
समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताएँ. आज बच्चों के लिए खेलने को पार्कों,
मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है
तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों
के साथ घुलना-मिलना चाहिए.
इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा
तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त,
विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना
भी नहीं की जा सकती है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन
हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय
समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है.
अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, सहयोग की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. उनको समझाना चाहिए कि अंकों का
महत्त्व उस उत्तर पुस्तिका के सन्दर्भ में है, जिस पर उनके द्वारा प्रश्नों को हल किया जाता है. जीवन की
प्रतियोगिता में उनके अंकों से कहीं अधिक महत्त्व उनके कौशल का, उनकी बुद्धिमत्ता का, उनकी बौद्धिकता का है. अभिभावकों
को अपने बच्चों को ये विश्वास जगाना चाहिए कि ज़िन्दगी निर्वहन के लिए, पारिवारिक सञ्चालन के लिए सिर्फ नौकरी ही अथवा बड़े-बड़े पैकेज ही एकमात्र
संसाधन नहीं हैं. व्यक्तिगत अवधारणा में भले ही इनको महत्त्व दिया जा रहा हो मगर
समाज की कसौटी पर आज भी ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो अपने कौशल से, अपने श्रम से, अपनी प्रतिभा से खुद को विकसित, सफलतम रूप में स्थापित कर चुके हैं.
घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों
से लेकर शिक्षकों तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लादना
बंद करना होगा. अपने अतृप्त सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर देना बंद करना
होगा. बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक
‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने से बचना होगा. परीक्षा के दिनों में ही
नहीं सामान्य दिवसों में भी बच्चों के लिए सकारात्मक वातावरण बनाया जाना चाहिए. संख्यात्मकता
के स्थान पर गुणात्मकता का निर्माण करने पर जोर दिया जाना चाहिए. अपने बच्चों को
मशीन बनाने के स्थान पर इंसान बनाने का प्रयास आज से ही करना होगा.
07 फ़रवरी 2026
जेन ज़ी की बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह
शिक्षक रह चुके न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वाथ ने अपनी रिसर्च के माध्यम से
बताया कि जेन ज़ी के रूप में पहचानी जाने वाली पीढ़ी की बुद्धिमत्ता में अपनी पिछली
पीढ़ी की तुलना में गिरावट आई है. ऐसा तब हुआ है जबकि ये पीढ़ी पिछली सदी के बच्चों
की तुलना में अपना अधिक समय शिक्षण संस्थानों में व्यतीत कर रहे हैं. इस पीढ़ी के
आईक्यू को कम बताने पर चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि सामान्य रूप में ऐसा माना जाता
है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमता वाली होती है. सोशल मीडिया के
माध्यम से हमेशा चर्चा में रहने वाली जेन ज़ी पीढ़ी का पिछली पीढ़ी से कम बुद्धिमत्ता
वाला होना प्रथम दृष्टया आश्चर्य में डालता है किन्तु जब डॉ. होर्वाथ के द्वारा
बताये गए कारणों पर गौर करते हैं तो ऐसा होना सच भी लगता है. उन्होंने ऐसा होने के
पीछे इस पीढ़ी का तकनीक और मशीनों पर अधिक से अधिक निर्भर होना बताया है. जेन ज़ी के
द्वारा बहुतायत में 'एजुकेशनल टेक्नोलॉजी'
अर्थात पढ़ाई में तकनीक और स्क्रीन्स का
उपयोग किया जाता है. इसके चलते एक तरफ उनकी एकाग्रता में कमी आई है वहीं समस्याओं को
सुलझाने की क्षमता भी घटी है.
किसी रिसर्च के आधार पर जेन ज़ी की क्षमताओं को आँकने के साथ-साथ यदि इनकी
जीवन-चर्या, कार्य-शैली
आदि का अध्ययन किया जाये तो इनकी क्षमताओं में कमी का अकेला कारण तकनीक अथवा
स्क्रीन पर अधिकाधिक समय बिताना ही नहीं है. बचपन से लेकर इनकी युवावस्था तक की
समयावधि पर गौर किया जाये तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि इस पीढ़ी की सामाजिकता, समन्वय, सहयोग आदि को आरंभिक दौर से ही कम से कमतर
किया जाता रहता है. इनके खेलने-कूदने, मैदानों में जाने, पारम्परिक खेलों में भाग लेने, शारीरिक श्रम करने
में लगातार कमी आते-आते एक तरह की शून्यता आ गई है. शिक्षा के नाम पर अधिक से अधिक
अंक लाने का दबाव, ज्ञान के बजाय तकनीकी रोजगार पाने की
आकांक्षा ने बच्चों को मशीन में परिवर्तित कर दिया है. किसी समय गर्मियों की
छुट्टियाँ खेलकूद, यात्राओं,
रिश्तेदारों से मेलजोल, कार्य-निपुणता आदि के द्वारा बच्चों का न केवल मनोरंजन
करती थीं बल्कि उनको सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सहयोग का पाठ भी सिखाती थीं. इसके उलट आज इन छुट्टियों में ये पीढ़ी अपने
संस्थानों के प्रोजेक्ट को पूरा करने में, किसी प्रतियोगी
परीक्षा को पास करने में, किसी तकनीक को सीखने में ही उलझे
रहते हैं.
अध्ययन की समयावधि के साथ-साथ अपने फुर्सत के कुछ पलों को भी लैपटॉप, मोबाइल आदि के साथ गुजारने के कारण
ये पीढ़ी खुद को सामाजिक रूप से लगभग अलग कर चुकी होती है. ऐसे में इनकी पारंपरिक
बुद्धिमत्ता जैसे तार्किकता, एकाग्रता, याददाश्त, कल्पनाशीलता आदि में कमी आना स्वाभाविक है. गैजेट्स के सहारे छोटे-छोटे
से काम करने, पुस्तकों से खुद को दूर कर लेने, रील्स जैसी अत्यधिक तीव्र दुनिया के
रोमांच में खोने, खुद को डिजिटल डिवाइस में कैद कर देने के
कारण इस पीढ़ी में निर्णय लेने की त्वरित क्षमता में कमी आना,
संकटकालीन स्थिति में अवसाद में चले जाना, जरा सी असफलता पर
घनघोर नैराश्य को अपना लेना आदि भी सहज रूप में नजर आता है.
सामान्य रूप में ऐसा वैज्ञानिक तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के लिए बातचीत के,
पुस्तकों को पढ़ने के माध्यम से सीखना सहज होता है. यही कारण है कि आज भी तकनीक के
बदलते दौर में भी शिक्षण संस्थानों का महत्त्व बना हुआ है, शिक्षकों को वरीयता प्रदान की जा
रही है. ऐसा माना भी जाता है कि इस तरह की कार्यविधि के माध्यम से किसी सामग्री को, किसी ज्ञान को मष्तिष्क जल्द से जल्द स्वीकारता है. आज की पीढ़ी में आमने-सामने
बात करने, पुस्तकों को पढ़ते हुए कल्पनाशीलता का विकास करने
के स्थान पर स्क्रीन को जल्दी-जल्दी स्क्रॉल करने, मुख्य-मुख्य बिन्दुओं को पढ़कर
सीखने में विश्वास करने लगी है. यही कारण है कि उसकी सीखने की क्षमता कम हुई है. यह
स्थिति किसी एक देश की नहीं बल्कि लगभग सभी देशों की इस पीढ़ी की है.
डॉ. होर्वाथ की खोज से निकले निष्कर्ष को किसी प्रयोग का अंतिम निष्कर्ष भले न
माना जाये किन्तु यह तो अवश्य ही माना जा सकता है कि जेन ज़ी पीढ़ी ने खुद को तकनीकी
के हाथों की कठपुतली बना दिया है. ऐसे में अब जबकि खोज बता रही है कि उनकी पिछली
पीढ़ी उनसे अधिक बुद्धिमत्ता वाली है तो पिछली पीढ़ी का दायित्व बनता है कि इस पीढ़ी
को मशीनी खिलौना बनने से बचाया जाये. तकनीकी विकास और भौतिकतावादी युग में आज भले
ही धनोपार्जन मुख्य मुद्दा बनता जा रहा हो किन्तु कुछ शारीरिक श्रम, खेलकूद,
मेल-जोल, सामाजिकता, पारिवारिकता आदि के लिए समय निकालना ही
होगा. परिवारों को एक निश्चित समय गैजेट्स, मशीनों, मोबाइल आदि के बिना रहते हुए सदस्यों के बीच बातचीत करते हुए, आपसी चुहल करते हुए बिताना शुरू करना होगा. अपने बच्चों को मशीनी खेल से
बाहर निकाल कर मैदानों में भेजना होगा. हार-जीत के रूप में सफलता-असफलता का स्वाद
चखने के लिए उनको तैयार करना होगा. हमें ही ध्यान रखना होगा कि जेन ज़ी भी अपनी
पिछली पीढ़ी की तरह एक इन्सान है न कि कोई मशीन या रोबोट. इस पीढ़ी को भी
संवेदनात्मक रूप से, भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाने की
आवश्यकता है. ऐसा नहीं कि जेन ज़ी सक्षम अथवा समर्थ नहीं है,
बस उसने खुद को तकनीक में, मशीनों में उलझा दिया है और हम
सबको उसे इसी उलझन से बाहर निकालना है.
04 जनवरी 2026
उँगलियाँ बनी आँखें, बिन्दु बने अक्षर
04 जनवरी को ब्रेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2018
में आधिकारिक रूप से 04 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस घोषित किया. इसके बाद ही पहला अंतरराष्ट्रीय
ब्रेल दिवस 04 जनवरी 2019 को मनाया गया. यह दिवस लुईस ब्रेल के सम्मान में मनाया
जाता है, जिन्होंने
दृष्टिहीनों के लिए एक लिपि का निर्माण किया. उनके नाम पर ही इस लिपि को ब्रेल
लिपि कहते हैं. इस लिपि में बिन्दु का प्रयोग किया जाता है और इनको उँगलियों के
पोरों के सहारे छू कर महसूस किया जाता है. एक-एक बिन्दु के स्पर्श से शब्द का
निर्माण होता है और दृष्टिहीन व्यक्ति अपनी पढ़ाई को पूरा करता है.
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लुईस ब्रेल का जन्म फ्रांस के कुप्रे गाँव में 04 जनवरी 1809 को हुआ था. मात्र तीन वर्ष की उम्र में खेलते समय चाकू जैसे एक औजार की चोट से उनकी एक आँख में चोट लग गई. आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण बच्चे लुईस को सही से इलाज न मिल सका. इस कारण से चोटिल आँख का इन्फेक्शन दूसरी आँख में भी फैल गया. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आठ वर्ष की उम्र तक आते-आते लुईस पूरी तरह नेत्रहीन हो गए. लुईस जब बारह वर्ष के हुए उसी समय उनको जानकारी मिली कि फ्रांसीसी सेना के लिए ‘नाइट राइटिंग’ नामक एक खास कूटलिपि बनाई गई है, इस लिपि के द्वारा सैनिक अंधेरे में गुप्त संदेश पढ़ सकते हैं. लुईस ने अपने स्कूल के पादरी के माध्यम से इस कूटलिपि को विकसित करने वाले कैप्टन चार्ल्स बार्बर से मुलाकात की. इनसे मुलाकात के बाद ही उनके मन में नेत्रहीनों के लिए एक लिपि बनाने का विचार आया. इसके बाद सन 1829 तक छह बिन्दुओं पर आधारित ‘ब्रेल लिपि’ तैयार कर ली.
वर्तमान में इस लिपि की तकनीक को इतना उन्नत कर लिया गया है कि अब इसका उपयोग कम्प्यूटर
कीबोर्ड और स्मार्टफोन के सॉफ्टवेयर में भी व्यापक रूप से किया जा रहा है.
05 नवंबर 2025
नैक के प्रति सुस्त चाल
भारत में उच्च शिक्षा
संस्थानों (कॉलेज, विश्वविद्यालय
आदि) का मूल्यांकन और प्रमाणन का कार्य राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (National
Assessment and Accreditation Council) द्वारा किया जाता है. संक्षेप में इसे नैक से सम्बोधित किया जाता है. यह यूजीसी
का एक स्वायत्त निकाय है जिसकी स्थापना 1994 में हुई थी. नैक के द्वारा गुणवत्ता के मानकों के अनुरूप
संस्थानों की ग्रेडिंग करना है. ऐसा किये जाने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि
विद्यार्थियों को सही संस्थान चुनने में मदद मिले.
नैक के मुख्य
कार्यों और उद्देश्यों में शैक्षणिक संस्थाओं की मान्यता को उनके मूल्यांकन के आधार
पर की गई ग्रेडिंग से किया जाना है. शिक्षण क्षेत्र में उच्च शिक्षा से सम्बंधित
संस्थाओं, चाहे वे
महाविद्यालय हों अथवा विश्वविद्यालय सभी का मूल्यांकन नैक द्वारा किया जाता है.
इसके माध्यम से सुनिश्चित
किया जाता है कि संस्थान गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं अथवा नहीं. इन मानकों में पाठ्यक्रम,
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, अनुसंधान, बुनियादी ढाँचा आदि के साथ-साथ अध्यापकों और
विद्यार्थियों से सम्बंधित सुविधाओं और मूलभूत ढाँचे को शामिल किया जाता है.
विगत वर्षों में
नैक को लेकर लगातार उठाये जाने वाले कदमों के बाद भी उच्च शिक्षण संस्थाओं में नैक
मूल्यांकन करवाने को लेकर जागरूकता न के बराबर है. नैक मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता
लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कदम उठा रहा है. इसके लिए उसके द्वारा ऑनलाइन और
हाइब्रिड मॉडल जैसी नई रणनीतियाँ शामिल हैं किन्तु निजी संस्थाएँ हों अथवा
सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ, सभी नैक करवाने में अभी बहुत पीछे हैं. उत्तर प्रदेश में यह स्थिति तो और भी सोचनीय है.
01 नवंबर 2025
MMTTP के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान
MMTTP के द्वारा करवाये जाने कोर्स/प्रोग्राम के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान यूजीसी की तरफ़ से किया गया है.
मालवीय मिशन शिक्षक
प्रशिक्षण कार्यक्रम (MMTTP) का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों
को आधुनिक शिक्षण पद्धतियों और नेतृत्व कौशल से सशक्त बनाना है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति
(NEP) 2020 की सिफारिशों
को लागू करने पर केन्द्रित है. इस प्रशिक्षण का लक्ष्य शिक्षकों की क्षमताओं को बढ़ाना और शिक्षा की गुणवत्ता
में सुधार करना है. इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह के प्रशिक्षण शामिल
किये गए हैं.
बहुत सी संस्थाओं में देखने में आ रहा है कि इस कोर्स में सहभागिता करने वाले प्राध्यापकों को उन उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्राचार्यों द्वारा अवकाश प्रदान नहीं किया जा रहा है. ऐसे में प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन कार्य के लिए संस्था में उपस्थित रहने के दौरान ही इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करना पड़ता है. ऐसे में जहाँ अध्यापन कार्य भी प्रभावित होता है वहीं इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्देश्य में भी बाधा उत्पन्न होती है.
इसी को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करने पर अवकाश का प्रावधान किया गया है.
17 सितंबर 2025
हमारा लेखन और बाबा जी की सीख
कुछ सीखें, बातें ज़िन्दगी भर काम आती हैं. ऐसा कुछ है हमारे साथ बाबा जी की बातों को लेकर. उनका अपने साथ सुबह की सैर पर हम तीनों भाइयों को ले जाना और पूरे रास्ते किसी न किसी कहानी, किसी न किसी दृष्टान्त के माध्यम से जीवन की सच्चाई को समझाना, जीवन में आने वाली समस्याओं से निपटने की सलाह देना.
अपने बाबा जी के साथ अक्सर अपने लेखन सम्बन्धी चर्चा कर लिया करते थे. बचपने का अपरिपक्व लेखन बाबा जी की अनुभवी आँखों के सामने से गुजरता रहता, इसी कारण वे लेखन की गम्भीरता को देख भी रहे थे. सुबह की अपनी यात्रा के दौरान एक दिन बाबा जी ने हमारे लिखे किसी लेख की चर्चा करते हुए उस लेख के एकदम विपरीत बिन्दुओं पर विमर्श शुरू किया. बाबा जी के कुछ प्रश्नों का उत्तर तो हम दे सके, कुछ में अटक गए. ऐसे में बाबा जी ने हमारे लेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम लिखने लगे हो, ऐसे में किसी भी मुद्दे को, विषय को दोनों पक्षों की तरफ से देखो. जरूरी नहीं कि दोनों पक्षों को शामिल करते हुए लिखा जाये मगर दिमाग में दोनों पक्ष रहने चाहिए.
इसके अलावा और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा लेखन के सम्बन्ध में बताई गईं, जो आज भी हमारे लिए मार्गदर्शन का काम करती हैं. बचपने से पड़ी लेखन की आदत आज भी बनी हुई है, बाबा जी द्वारा दोनों पक्षों को विचार करने की बात आज भी कंठस्थ है और इसी का परिणाम है कि किसी भी मुद्दे पर, किसी भी विषय पर बाल की खाल निकालने की हद तक चले जाते हैं.
आज हमारे बाबा जी की पुण्यतिथि है. उनको सादर चरण स्पर्श... सादर श्रद्धांजलि.
04 सितंबर 2025
मशीनी शैक्षिक दौर में शिक्षकों का महत्त्व
विकास के परिवर्तनशील
चरणों में शिक्षा क्षेत्र में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. शिक्षा व्यवस्था
परिवर्तनों के दौर में गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. इसके बाद
भी समाज से शिक्षकों के महत्त्व को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. जब तकनीकी विकास
आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की
समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेदारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास
हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप
के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेदारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. किसी
भी शिक्षक का काम विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र नहीं है,
उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है. ऐसा होना भी नहीं
चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में शिक्षक की
जिम्मेदारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की
मानसिकता से निर्मित करे. अध्यापन कार्य के पीछे की मूल भावना के अनुसार एक शिक्षक
को किसी उत्पाद का निर्माण नहीं करना है वरन वह एक नागरिक तैयार करना है, एक व्यक्तित्व का विकास करना है.
आज जबकि तकनीकी
विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर
आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में
कम्प्यूटर, मोबाइल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल,
मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को ही शिक्षक मान लिया गया है. ये मशीनी
अंग शिक्षक के सहायक उपकरण तो हो सकते हैं किन्तु किसी शिक्षक का स्थान नहीं ले
सकते हैं. मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से किसी विषय को भले ही सहजता से समझाया जा सकता हो
किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों को विकसित नहीं किया जा सकता है.
तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता,
सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज
के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार
की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज
समाज में बच्चों को, नवयुवकों
को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या
नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना
और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम
होता जा रहा है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ
ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का
तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है.
सत्यता यही है कि मशीन
ज्ञान तो दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय
से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. बचपन
से संस्कार, आत्मविश्वास,
जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस
भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण
है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा
रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय
शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के
साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके
महत्त्व को समझाना होगा.
27 जून 2025
विलय नहीं समस्या का समाधान हो
उत्तर प्रदेश
सरकार द्वारा पचास से कम नामांकन वाले प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों का
नजदीकी विद्यालयों में विलय करने का निर्णय लिया है. ऐसे विद्यालयों की संख्या
हजारों में है जहाँ पर नामांकन पचास से कम है. यदि नामांकन कम है तो उसे बढ़ाया
जाये न कि विद्यालय का विलय कर दिया जाये, उसे बंद कर दिया जाये. वैसे भी सरकारों की प्राथमिकता बच्चों
को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना होता है. न केवल सरकारों द्वारा बल्कि विश्व
बैंक द्वारा भी अनेक योजनाओं को क्रियान्वित किया गया जिनसे बच्चों को विद्यालय
लाया जा सके. संविधान में 86वाँ संशोधन कर शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया. निःशुल्क
और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम अथवा शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अन्तर्गत छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं को निःशुल्क
प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत
प्राथमिक शिक्षा से वंचित बस्तियों में विद्यालय खोले गए. इन सकारात्मक कार्यों, योजनाओं के बीच सरकार द्वारा शारदा (स्कूल हर दिन आयें) योजना
क्रियान्वित है. इसमें छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के ऐसे बालक-बालिकाओं का
नामांकन होगा, जो किसी विद्यालय में नामांकित नहीं हैं अथवा
नामांकन के बाद भी अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण नहीं कर सके. ऐसे बच्चों को
चिन्हित कर उनका नामांकन नजदीकी विद्यालयों में आयु-संगत कक्षा में कराया जायेगा
और शिक्षा से लेकर प्रत्येक सामग्री निःशुल्क उपलब्ध करायी जाएगी.
बच्चों तक शिक्षा
की सुलभता सम्बन्धी योजनाओं के बाद भी यदि सरकार को विद्यालयों का विलय करना पड़े
तो स्थिति न केवल गम्भीर है बल्कि चिन्तनीय भी है. सरकार को नामांकन कम होने के
कारणों-कारकों को खोजा जाना चाहिए. उन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए जो प्राथमिक
विद्यालयों, उच्च
प्राथमिक विद्यालयों के नामांकन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं. विद्यालयों
का विलय सिर्फ एक विद्यालय बंद होना नहीं होगा बल्कि यह अनेक दुष्परिणामों को साथ
लेकर आएगा. सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर ही दिख रहा है. उत्तर प्रदेश के
बेसिक शिक्षा विभाग के हाउसहोल्ड सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 2020-21
में 4.81 लाख, 2021-22 में 4 लाख से अधिक और 2022-23 में
3.30 लाख बच्चों ने बीच में
स्कूल छोड़ दिया. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में स्कूल छोड़ने की दर अन्य
प्रदेशों की तुलना में अधिक है. इसमें भी लड़कियों का प्रतिशत लड़कों की अपेक्षा
अधिक है.
विद्यार्थियों का
बड़ी संख्या में विद्यालय छोड़ना, नामांकन न करवाना चिन्ता का विषय है. सामाजिक-आर्थिक कारक, गरीबी, लैंगिक विभेद, शिक्षकों की कमी, बुनियादी ढाँचे की समस्या, शिक्षा में अरुचि, बाल
श्रम का प्रचलन, अन्य सामजिक समस्याएँ आदि ड्रॉपआउट का कारण बनती हैं. ऐसे में
विचार किया जाये कि जब बच्चे अपने ही गाँव में अथवा न्यूनतम दूरी पर बने विद्यालय
नहीं जा रहे हैं, तो उनसे कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे कुछ किमी दूर स्थित विद्यालय
जायेंगे? विद्यालयों का दूर होना बालिकाओं के लिए और बड़ी
समस्या होगी. निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, घरेलू ज़िम्मेदारियाँ, सुरक्षा
चिंताओं आदि के कारण उनकी शिक्षा पर पहले से ही संकट छाया रहता है. विद्यालय विलय पश्चात्
उनके स्कूल छोड़ने की आशंका और ज़्यादा है. इसके साथ-साथ शिक्षकों के पदों की
कटौती, नई शिक्षक भर्ती पर संकट, रसोइयों, शिक्षामित्रों का असुरक्षित भविष्य भी इसी से
सम्बद्ध है.
यदि कम नामांकन पर
ध्यान दें तो सरकारी नियम और कार्य-प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है. शिक्षा का
अधिकार अधिनियम में प्रावधान के बावजूद सरकारी प्राथमिक विद्यालय के एक किमी
परिक्षेत्र में खुलेआम निजी विद्यालयों को मान्यता दी जा रही है. निजी विद्यालयों
का लगातार बड़ी संख्या में खुलते जाना और अधिनियम के अन्तर्गत गरीब विद्यार्थियों को
प्रत्येक निजी विद्यालय द्वारा अपने यहाँ निशुल्क प्रवेश देने की बाध्यता भी कम
नामांकन का एक कारक है. नियमानुसार निजी विद्यालयों द्वारा गरीब विद्यार्थियों को
प्रवेश देने पर सरकार द्वारा निजी विद्यालयों को प्रतिपूर्ति शुल्क दिया जाता है, अभिभावकों को भी एक निश्चित राशि
प्रदान की जाती है. इस आर्थिक पक्ष के कारण अभिभावकों, निजी
विद्यालयों ने विद्यार्थियों को प्राथमिक विद्यालयों से दूर कर दिया. इसी तरह
सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश आयु छह वर्ष और निजी विद्यालय में तीन-चार
वर्ष होने के कारण भी नामांकन पर असर पड़ा है. इसके चलते भी बहुत से माता-पिता अपने
बच्चों को सरकारी विद्यालय के स्थान पर निजी विद्यालय में प्रवेश दिला देते हैं.
इनके अलावा शिक्षकों की कमी, शिक्षकों का दूसरे सरकारी कार्यों में व्यस्त रहना, विद्यालयों में प्राथमिक सुविधाओं की कमी होना,
स्मार्ट क्लासेज की शून्यता आदि भी कम नामांकन के लिए उत्तरदायी बिन्दु हैं.
विद्यालयों का
विलय स्थायी अथवा दीर्घकालिक समाधान नहीं है. इसकी गारंटी कौन लेगा कि भविष्य में
विलय किये गए विद्यालय में कम नामांकन नहीं होगा? ऐसे में विचारणीय बिन्दु यह होना चाहिए कि उन कारणों का पता
लगाकर उनका समाधान किया जाये जिनके कारण विद्यालयों में कम नामांकन हो रहा है. सरकार
को चाहिए कि विद्यालयों के मूलभूत ढाँचे को सुव्यवस्थित करे. शिक्षकों की कमी को
पूरा करने के साथ अन्य कार्यों के लिए अलग से कर्मचारियों की नियुक्ति करे. कक्षाओं
को विकसित बनाया जाये तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु नवीनतम तकनीकों से
विद्यार्थियों को परिचित कराया जाये. सरकारी नीतियों,
योजनाओं को सहज तरीके से अनुपालन योग्य बनाया जाये ताकि अभिभावक परेशान न हों. सरकार
प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र में आ रही समस्या का समाधान करे,
लगातार गहराते जा रहे रोग का इलाज करे न कि सम्बंधित अंग को ही काट कर अलग कर दे.
शिक्षक संगठनों, अभिभावकों द्वारा इस निर्णय का विरोध किये
जाने के बाद सरकार से अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करके
शिक्षा को सुलभ, सहज बनाने का प्रयास करेगी. सरकार को ध्यान
रखना चाहिए कि उसका लक्ष्य बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाना है न कि उनको शिक्षा से
वंचित करना, इसके लिए उसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ ही क्यों न
उठाना पड़े.
29 मई 2025
चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का उत्साह??
22 अप्रैल 2025
को प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा
कोष (आईएमएफ) की वर्ल्ड
इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया की सबसे बड़ी चौथी अर्थव्यवस्था बन
गया है. भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी इस बड़ी छलांग को लगाते हुए जापान
को पीछे छोड़ दिया है. आईएमएफ की रिपोर्ट के बाद इसकी पुष्टि करते हुए नीति आयोग
के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम ने बताया कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वर्तमान में चार ट्रिलियन डॉलर से
अधिक का हो गया है. इसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था अब विश्व की चौथी सबसे बड़ी
अर्थव्यवस्था हो गई ही. आईएमएफ की रिपोर्ट की पुष्टि करने के साथ-साथ उन्होंने बताया
कि यदि देश की नीतियाँ ऐसे ही काम करती रहीं तो आने वाले कुछ वर्षों में हमारा देश
जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है.
जीडीपी के आधार पर
वर्ष 2023 के आँकड़ों में विश्व
की प्रथम दस अर्थव्यवस्थाओं में देश की अर्थव्यवस्था पाँचवें स्थान पर थी. तब
हमारे देश की अर्थव्यवस्था 3.56 ट्रिलियन डॉलर थी. तत्कालीन आँकड़ों के अनुसार भारत से आगे विश्व
अर्थव्यवस्थाओं में चार देश अमेरिका (27.72 ट्रिलियन डॉलर), चीन (17.79 ट्रिलियन डॉलर), जर्मनी (4.52 ट्रिलियन डॉलर) और जापान (4.20 ट्रिलियन डॉलर) ही थे. इस वर्ष जारी की गई
रिपोर्ट में आईएमएफ का कहना यह भी है कि वर्ष 2025 में भारत की विकास दर 6.2 प्रतिशत और वर्ष 2026 में 6.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक है. इन
आँकड़ों का आईएमएफ की तरफ से जारी होने के कारण भी देश के आर्थिक क्षेत्र में तथा
सत्ता पक्ष में उत्साह दिखाई दे रहा है.
वैश्विक स्तर पर चौथी
सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का प्रभाव न केवल देश की आंतरिक स्थिति पर बल्कि
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाई देगा. ऐसी स्थिति के चलते अंतर्राष्ट्रीय स्तर के
अनेक मंचों जैसे जी-20, विश्व
बैंक, आईएमएफ आदि में भारतीय
छवि का सकारात्मक स्वरूप नजर आएगा. इसके चलते विदेशी निवेश बढ़ने की भी सम्भावना
है. विश्व स्तर की बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ वैसे भी भारतीय बाजार में अपने उत्पादों के
लिए ग्राहकों को लगातार तलाशती रही हैं. अब उनको भारत में एक आकर्षक बाजार नजर आ
रहा होगा. देखा जाये तो भारत दक्षिण एशिया में लम्बे समय से नेतृत्वकर्ता की
भूमिका में रहा है और विगत कुछ वर्षों में उसके क्षेत्र और विश्वास में भी वृद्धि
हुई है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेकानेक मंचों पर, महाशक्ति
समझे जाने वाले देशों में भारत की सकारात्मक एवं सशक्त छवि बनी है. देश की वर्तमान
आर्थिक उपलब्धि के बाद उसके आर्थिक नेतृत्वकर्ता के रूप में भी आगे बढ़ने का मार्ग
प्रशस्त होता दिखता है. भारतीय अर्थव्यवस्था के चौथे स्थान पर आने के अपने-अपने
सन्दर्भ तलाशे जा रहे हैं. इनको तलाशा भी जाना चाहिए, आखिर आम
जनमानस को भी इसके सन्दर्भों से परिचित होने की आवश्यकता है. एक तरफ आर्थिक
क्षेत्र में, सत्ता के गलियारों में उत्साह दिख रहा है, दूसरी तरफ आम नागरिक अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य, मँहगाई, बेरोजगारी, गरीबी आदि से जूझ रहा है.
देश के चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाने के बाद भी क्या भारतीय समाज की, सामान्य जन-जीवन की, भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविकता से मुँह मोड़ा जा सकता है? अर्थव्यवस्था सम्बन्धी आँकड़ों को सामने लाने का कार्य मुख्य रूप से जीडीपी को आधार बनाकर किया जाता है. जीवन-शैली और आर्थिकी के सन्दर्भ में जीडीपी और जन-जीवन दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं, दोनों के अलग-अलग स्वरूप हैं. जीडीपी से देश की अर्थव्यवस्था का आकार तो मापा जा सकता है किन्तु उसके द्वारा सामान्य जनजीवन के बारे में, आय और संपत्ति के वितरण के बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाने के बाद भी प्रति व्यक्ति आय के सन्दर्भ में देश वैश्विक स्तर पर 144वें स्थान पर आता है. यह विडम्बनापूर्ण ही है कि अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में भारत से आगे मात्र तीन देश हैं लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में 143 देश हमसे आगे हैं. यदि जापान के सन्दर्भ में ही आँकड़ों को देखें तो भारत में प्रति व्यक्ति आय तीन हजार डॉलर से कम है जबकि जापान की प्रति व्यक्ति आय 34 हजार डॉलर है. जीडीपी के सन्दर्भ में हम भले ही जापान से आगे निकल आये हों किन्तु प्रति व्यक्ति आय, जीवन प्रत्याशा, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, तकनीक आदि जैसे क्षेत्रों में जापान हमसे बहुत आगे है.
किसी भी देश के
विकास में शिक्षा की गुणवता, नागरिकों का स्वास्थ्य, उनकी जीवन प्रत्याशा, जीवन-शैली, प्रति
व्यक्ति आय आदि का बहुत बड़ा योगदान होता है. इनका सकारात्मक रूप और इसका स्तर किसी
भी देश के सामाजिक जीवन में नवाचार को दर्शाता है. अपने देश की साक्षरता दर भले ही
75 प्रतिशत से अधिक की है लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास में कमी
बनी हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति अत्यंत जटिल है. इसी तरह
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी सुखद नहीं कही जा सकती है. आय और सम्पत्ति के वितरण
में भी व्यापक असमानता दिखाई देती है. देश के संसाधनों की बहुलता मुट्ठी भर लोगों
के पास है और अधिसंख्यक नागरिकों के पास अत्यल्प संसाधन हैं. ऐसे में आँकड़ों के
सन्दर्भ में, जीडीपी के आधार पर, वैश्विक
स्थिति में वृद्धि होने को लेकर भले ही उत्साह दिखा लिया जाये मगर सामाजिक स्थिति
के सन्दर्भ में, आम जनमानस के आधार पर आईएमएफ की इस रिपोर्ट
पर अत्यधिक उत्साहित होने की, गर्वोन्नत होने की आवश्यकता
नहीं है.
05 मई 2025
शासनादेश के नाम पर तुगलकी फरमान
लाल बुझक्कड़ का नाम
तो सुना होगा? ऐसे ही एक नाम और
सुना होगा चतुर सुजान? इन दोनों
नामों के साथ अनगिनत किस्से जुड़े हुए हैं, बेवकूफी भरे.
ऐसे ही एक महाशय हैं,
इन दोनों नामों का संयुक्त उपक्रम/उद्यम
(वैसे संयुक्त ऊधम भी कहा जा सकता है). वैश्विक स्तर की अचूक बेइज्जती सहने वाले इन
चतुर सुजान-लाल बुझक्कड़ को आये दिन भसड़ करने की आदत है. इस भसड़ में इसे आये दिन 'मौखिक आदेश' भी मिल जाता है.
आजकल एक ऐसी ही भसड़
फैला रखी है. चित्र में दर्शाया गया पत्र सात पेज का है. यह पत्र दिनांक 10 फरवरी 2025 को उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव की ओर से उत्तर
प्रदेश शासन के समस्त अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को लिखा गया है. प्रतिलिपि जिन
दस लोगों को की गई है, उसमें कहीं
भी निदेशालय का जिक्र नहीं है.
बहरहाल, लाल बुझक्कड़-चतुर सुजान की मिक्स ब्रीड (वर्णसंकर
प्रजाति) खेलने में लगी है.
07 मार्च 2025
काग दही पर जान गँवायो
‘काग दही पर
जान गँवायो’ वाक्य को लगभग सभी ने पढ़-सुन रखा होगा और इससे जुड़ी
कहानी से भी लगभग सभी लोग परिचित होंगे. ऐसा जानने-समझने के बाद भी इस वाक्य से
जुड़ी कहानी एक बार फिर आप सबके बीच रख दी जाए ताकि जिस-जिस को विस्मृत हो गई हो या
फिर सही से याद न हो तो उसे पुनः स्मरण हो जाये.
इससे जुड़ी कहानी
कुछ इस तरह से है कि एक बार एक कवि महोदय हलवाई की दुकान पहुँचे. वहाँ उन्होंने
अपने खाने के लिए जलेबी और दही खरीदी और वहीं पड़ी मेज-कुर्सी पर बैठ कर खाने लगे.
इस दौरान उन कवि महोदय ने गौर किया कि एक कौआ बहुत देर से दुकान से कुछ न कुछ खाने
की जुगाड़ में थे. कई-कई बार की मेहनत के बाद भी उसे कुछ खाने को नहीं मिल पा रहा
था क्योंकि हलवाई पूरी तत्परता से उसे भगा देता था. इसी बीच वो कौआ कहीं से जगह
बनाने में सफल हो गया और वह दही की परात में चोंच मारकर उड़ गया. ये देखकर हलवाई
को बहुत गुस्सा आया, उसने बगल में वजन तौलने वाला बाँट उठा कर उस कौए को दे मारा.
कौए की किस्मत ख़राब थी सो वह बाँट सीधे उसे लगा और वो मर गया.
इस घटना को देख
कवि हृदय द्रवित हो उठा. दही-जलेबी खाने के बाद कवि महोदय जब पानी पीने पहुँचे तो उन्होंने
अपने हृदय की पीड़ा को वहीं बनी एक दीवार पर एक कोयले के टुकड़े से एक पंक्ति में
लिख दिया-
‘काग दही पर जान
गँवायो’
कवि महोदय तो अपना
काम करके चले गए. उनके जाने के बाद वहाँ एक लिपिकीय कार्यों से सम्बंधित व्यक्ति
आता है. वे महाशय अपनी नौकरी के दौरान कागजों में हेराफेरी करने के कारण निलम्बित
हो गये थे. उस पानी की टंकी के पास पानी पीने के लिए आने पर उनको कवि महोदय की
लिखी पंक्ति दिखाई दी. नजर पड़ते ही उनके मुँह से निकला कि बात तो सही है, बस शब्द लिखने में कुछ त्रुटि हो गई
है. ऐसा मन में आते ही उन्होंने अपने मन के अनुसार कवि की लिखी पंक्ति में सुधार
कर दिया. उन्होंने उस पंक्ति को कुछ इस तरह पढ़ते हुए सही कर दिया-
‘कागद ही पर जान गँवायो’
कवि और उस लिपिक
टाइप वाले के जाने के बाद एक लड़का वहाँ आया. शक्ल-सूरत से वह आशिक टाइप, मजनू सरीखा समझ आ रहा था. चेहरे पर
हवाइयाँ उड़ रहीं थीं. ऐसा लग रहा था जैसे अपने प्रेम में हताश-निराश होकर कहीं से
चला आ रहा है. पानी पीने के दौरान उसकी नजर भी उस पंक्ति पर पड़ी. पंक्ति पढ़ते ही
उसे भी लगा कि कितनी सच्ची बात लिखी है, यदि उसे ये बात पहले पता चल जाती तो वो
परेशान न होता. उसने उस पंक्ति को कुछ इस तरह से पढ़ा-
‘का गदही पर जान गँवायो’
सीधा सा अर्थ है
कि हम सभी लोग अपनी स्थिति, अपनी मनोदशा के अनुसार ही सामने वाली स्थिति, परिस्थिति का आकलन करते हैं. हमारी
मानसिकता के चलते, कई बार पूर्वाग्रह के चलते वास्तविकता से
दूर होकर किसी भी स्थिति को हम सभी अपने अनुसार देखते-समझते हैं. जबकि होना नहीं
चाहिए ऐसा. हम सभी को किसी भी स्थिति, परिस्थिति, घटना आदि की वास्तविकता की जानकारी कर लेने के बाद अपना मंतव्य बनाना
चाहिए, उस पर कोई फैसला लेना चाहिए.
23 फ़रवरी 2025
शिक्षकों पर कार्यवाई से पहले अनुमति लेना जरूरी
अशासकीय शिक्षण संस्थानों में आये दिन वहाँ के शिक्षक प्रबंधन समिति, संस्थान प्रमुख (प्राचार्य/प्रधानाचार्य) की तानाशाही का शिकार होते रहते हैं. इस सम्बन्ध में कई बार शिक्षकों की ओर से अपनी समस्या को सरकार के समक्ष रखा भी गया. शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही करने की मंशा को लेकर इस बार विधान परिषद् उत्तर प्रदेश सभापति कुँवर मानवेन्द्र सिंह द्वारा सकारात्मक पहल की गई है. उनके द्वारा निर्देशित किया गया है कि अब बिना अनुमति लिए शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही नहीं की जा सकेगी. प्रबंध तंत्र द्वारा निलंबन, सेवा समाप्ति जैसे कदम उठाये जाने के पहले शिक्षा सेवा चयन आयोग से अनुमति लेनी होगी.
18 फ़रवरी 2025
प्रशासनिक व्यक्तियों को रवैया सुधारने की आवश्यकता
ओडिशा के भुवनेश्वर
में कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (KIIT – केआईआईटी) के एक छात्रावास में एक नेपाली छात्रा के मृत पाए जाने के बाद इस निजी इंजीनियरिंग
संस्थान में नेपाली विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया. दरअसल नेपाली
छात्रा प्रकृति का शव मिलने के बाद संस्थान के कुछ विद्यार्थियों द्वारा इसे
आत्महत्या न बताकर हत्या बताया. विद्यार्थियों ने आरोप लगाया कि प्रकृति के बैच का
ही भारतीय छात्र उसे प्रताड़ित कर रहा था. शिकायतें करने के बाद भी संस्थान की तरफ
से उस लड़के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. यद्यपि मृतक छात्रा के चचेरे भाई की
शिकायत पर पुलिस ने आरोपी भारतीय छात्र को गिरफ्तार करके उसके खिलाफ आत्महत्या के
लिए उकसाने का केस दर्ज किया है तथापि विद्यार्थियों का कहना है कि संस्थान इस
मामले को दबाने का कार्य करता रहा.
इस घटना के बाद
कैम्पस में स्थिति तनावपूर्ण होने लगी थी. 16 फरवरी की शाम बी-टेक थर्ड ईयर की नेपाली छात्रा प्रकृति का
शव कॉलेज के हॉस्टल में मिलने के बाद नेपाली विद्यार्थियों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन
के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. इसी के बाद संस्थान द्वारा जवाबी कार्यवाही
करते हुए नेपाली विद्यार्थियों को संस्थान, हॉस्टल छोड़ने के
निर्देश दिए गए. विद्यार्थियों का कहना था कि विश्वविद्यालय के स्टाफ ने सभी
विद्यार्थियों से तत्काल हॉस्टल खाली करने को कहा. इस दौरान उनके साथ मारपीट किये
जाने का भी आरोप लगाया गया. संस्थान की तरफ से अमानवीयता सी दिखाते हुए
विद्यार्थियों को दो बसों में भरकर कटक रेलवे स्टेशन पर उतार दिया गया. ये सोचने
वाली बात है कि संस्थान के कर्मी नेपाल जाकर वहाँ से विद्यार्थियों को अपने
संस्थान में अध्ययन करने हेतु लेकर आते हैं. सैकड़ों की संख्या में नेपाली
विद्यार्थी यहाँ इंजीनियरिंग में अध्ययनरत हैं. ऐसे में संस्थान प्रशासन को इन
विद्यार्थियों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए.
इस सन्दर्भ में एक
स्थिति विचारणीय है कि आजकल व्यक्ति हो अथवा संस्थान सभी के ऊपर पद, प्रतिष्ठा का अहंकार बहुत बुरी तरह
से हावी है. ये आवश्यक नहीं कि व्यक्ति निजी सेवा में है अथवा सरकारी सेवा में, ये भी आवश्यक नहीं कि वह किस श्रेणी का कर्मचारी है अथवा अधिकारी है,
उसके पास यदि किसी भी तरह का अधिकार है तो बहुतायत में वह उसका दुरुपयोग ही करता
है. उसके स्तर से काम चाहे छोटा हो अथवा बड़ा, सामने वाले पर पूरी हनक दिखाई जाती
है. संस्थानों की स्थिति भी कुछ इससे अलग नहीं है. यहाँ भी विभिन्न पदों पर
व्यक्ति ही बैठे हुए हैं जो मूलरूप से अहंकारी शैली को अपनाए हुए रहते हैं. यही
कारण है कि केआईआईटी प्रशासन ने पूरे मामले को गम्भीरता से लेते हुए इस घटना के
मूल में पहुँचने की कोशिश किये बिना अपनी तानाशाही, अपने अधिकार
का प्रयोग करते हुए नेपाली विद्यार्थियों से संस्थान से बाहर निकाल दिया.
अब खबर है कि
नेपाली छात्रा की मृत्यु के मामले में अब तक छह लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका
हुई है. छात्रा के बैचमेट भारतीय छात्र के बाद संस्थान के तीन डायरेक्टर और दो
सिक्योरिटी गार्ड्स को गिरफ्तार किया गया. दो देशों के बीच का मामला होने के कारण
आनन-फानन इस मामले की जाँच के लिए ओडिशा सरकार ने गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य
सचिव, महिला एवं बाल
विकास विभाग के प्रमुख सचिव और उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त-सह-सचिव वाली हाई लेवल
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन कर दिया है. इस कमेटी की जाँच का परिणाम क्या होगा ये
तो बाद की बात है मगर इस संस्थान सहित अन्य सभी संस्थानों के पदाधिकारियों, कर्मियों को अपने व्यवहार में बदलाव लाने की आवश्यकता है.
15 फ़रवरी 2025
मौत की राह जाते बच्चे
सॉरी मम्मी-पापा, मेरा समय ख़त्म, माता रानी ने मुझे अठारह साल के लिए ही भेजा था. आत्महत्या करने के पूर्व
लिखे पत्र में अदिति मिश्रा की ये भावनात्मक पंक्ति हृदय को हिला देने वाली है. जेईई
परीक्षा में कम अंक आने से चयनित न होने के कारण निराश अदिति ने ऐसा कदम उठाया.
समाज में इस तरह का न तो ये पहला मामला है और निश्चित रूप से अंतिम भी नहीं है. देश
के विभिन्न हिस्सों से बच्चों के द्वारा परीक्षाओं में असफल रहने पर, कम अंक आने पर आत्महत्या करने की घटनाएँ सामने आती रहती हैं. आत्महत्या
एक ऐसा शब्द है जो झकझोरने के अलावा और कोई भाव पैदा नहीं करता. यह एक शब्द नहीं
बल्कि अनेकानेक उथल-पुथल भरी भावनाओं का, विचारों का समुच्चय
है. इसके अलावा न जाने कितनी त्रासदी, न जाने कितना कष्ट,
न जाने कितने आँसू, न जाने कितने सवाल भी
इसमें छिपे होते हैं. ये सवाल उस समय और अधिक हृदय विदारक हो जाते हैं जबकि मौत की
नींद सोने वाला हमारा भविष्य होता है, कोई नौनिहाल होता है.
प्रथम दृष्टया ऐसी
घटनाओं में परीक्षा प्रणाली, नंबर गेम, भारी-भरकम पाठ्य-सामग्री आदि जिम्मेदार लगती
है किन्तु यदि गम्भीरता से सम्पूर्ण सामाजिक परिदृश्य का अवलोकन किया जाये तो इसके
पीछे वर्तमान सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था का यांत्रिक होना नजर आता है. इस
यांत्रिक जीवन-शैली ने बचपन, शिक्षा, घर, परिवार आदि को प्रभावित किया है. ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण
हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे, मुरझाये बच्चे दिखाई देते हैं.
शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर
बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता
है. उन्मुक्त खेलते बच्चों को कमरों में बंद कर दिया गया है और उनके हाथों में
लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. बच्चे स्मार्टफोन की
इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं.
यांत्रिक जीवन के
लिए अनिवार्य बना दिए धन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना उनको अपने ही
बच्चों से दूर कर रहा है. उनके लिए भौतिकतावादी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित
करने को बहुतायत अभिभावकों द्वारा अपनी सफलता मान लिया गया है. तकनीक, भौतिकता की
उन्नति को विकास का सूचक मानने का दुष्परिणाम यह हुआ कि अभिभावकों की
महत्त्वाकांक्षाओं ने अनियमित राह पकड़ ली. इस अंधाधुंध दौड़ में उनके द्वारा बच्चों
से न सिर्फ अच्छे अंक लाने की जबरदस्ती की जा रही है वरन दूसरे बच्चों से गलाकाट
प्रतियोगिता सी करवाई जा रही है. बच्चों में आपसी सहयोग की, समन्वय की भावना विकसित करने के
स्थान पर आपस में चिर-प्रतिद्वंद्विता पैदा की जा रही है. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के
स्थान पर कटुता पैदा की जा रही है. ज्ञान को आपस में बाँटने की जगह उसे अपने में
ही कैद करके रखने की मानसिकता विकसित की जा रही है. बच्चों को किसी अन्य
विद्यार्थी की असफलता के समय, उसकी आवश्यकता के समय उसकी मदद
करने के बजाय उससे दूर रहने, उससे बचने की सलाह दी जा रही
है. अपने चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ सफलता प्राप्त करने का शोर, दूसरे से आगे ही आगे बने रहने की होड़, किसी भी कीमत
पर सबसे आगे आने और फिर सदैव आगे ही बने रहने का दबाव बच्चों को भीतर से खोखला बना
रहा है. यही खोखलापन उनकी असफलता में, असफलता की आशंका में उन्हें सबसे दूर कर
देता है. एक पल को विचार करिए कि कुछ अंकों के कारण एक हँसता-खेलता बच्चा सदैव के
लिए खामोश हो जाये. विचार करिए उस बच्चे के अन्दर भय का, अविश्वास
का वातावरण किस कदर भर गया होगा जो कम अंक आने के भय से दुनिया छोड़ देता है मगर अपने
अभिभावक से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है.
किसी भी परिवार के
लिए उसके किसी भी सदस्य का चले जाना कष्टकारी होता है. ये कष्ट उस समय और भी
विभीषक हो जाता है जबकि ऐसा किसी बच्चे के साथ हुआ हो. बच्चों द्वारा असफलता के भय
से, कुछ प्रतिशत अंक कम आने से मौत की राह चले जाना समूची व्यवस्था को कटघरे में
खड़ा करता है. इक्कीसवीं सदी में जहाँ एक तरफ विमर्शों, स्वतंत्रता, फ्री
सेक्स, हैप्पी टू ब्लीड, लिव-इन-रिलेशन
आदि अतार्किक चर्चाओं में बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक निमग्न रहती है वहाँ
बच्चों पर लादे जाने वाले अनावश्यक, अप्रत्यक्ष बोझ को दूर
करने के लिए कोई चर्चा नहीं होती है. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न विषयों में अपनी सक्रियता दिखा रहे समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इस दिशा में संज्ञाशून्य से दिख रहे हैं. घर से लेकर स्कूल तक,
अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के
मन-मष्तिष्क पर लाद रहे हैं. अपने अतृप्त सपनों को, अपने उस
कैरियर को जो वे नहीं बना सके, बच्चों के माध्यम से पूरा
करने का जोर लगाये हैं. अपने बच्चों को साक्षर, शिक्षित,
संस्कारित बनाये जाने से ज्यादा ध्यान इस तरफ है कि वे कैसे अधिक से
अधिक अंकों से सफलता प्राप्त करें. वे बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने
के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक पैकेज वाली जॉब को पाने का लालच भरने में लगे
हैं.
ऐसे माहौल में
जबकि बच्चे को अपनी परेशानी, अपनी निराशा, अपनी हताशा, अपनी समस्या के निपटारे के लिए कोई रास्ता नहीं दीखता है, कोई अपना नहीं दिखता है तब वह घनघोर रूप से एकाकी महसूस करता हुआ खुद को
जीवन समाप्ति की तरफ ले जाता है. अपने बच्चों के बीच बिना बैठे, उनके साथ बिना खेले, उनके मनोभावों को बिना बाँटे
हम बच्चों को बचाने में लगभग असफल ही रहेंगे. अच्छा हो कि अपना समय हम अपने बच्चों
के साथ शेयर करें जिससे हम उनके हँसते-खेलते बचपन में अपना बचपन देख सकें, अपने
बच्चों का जीवन सुरक्षित रख सकें.
14 सितंबर 2024
प्राध्यापकों का अनूठा विरोध प्रदर्शन
सत्ताएँ,
कुर्सियाँ, प्राधिकारी जब अपने-अपने दायित्वों से च्युत होने लगते हैं, हो जाते हैं तो उनको अपनी आवाज़
सुनाने के लिए प्रताड़ित पक्ष को कुछ न कुछ कदम उठाने ही पड़ते हैं. अक्सर प्रताड़ित
पक्ष अपनी अवहेलना के कारण, अपने कार्य में प्रगति होता न
देख क्षुब्ध होकर क्रोधवश ऐसे कदम उठा लेता है जिसे सहज रूप में स्वीकार नहीं किया
जाता है. ये जानते हुए भी कि विरोधात्मक कदम उठाने वाला पक्ष अपनी ओर से कतई गलत
नहीं है मगर समाज आदर्शात्मक रूप में ऐसे किसी भी कदम का समर्थन नहीं करता है जो
कि किसी भी तरह के आदर्श का ध्वंस करते हों, किसी भी तरह से
सामाजिक व्यवस्था में अवरोध पैदा करते हों. यह बिन्दु उस समय और भी महत्त्वपूर्ण
हो जाता है जबकि विरोध का मुद्दा शिक्षित वर्ग से जुड़ा हो,
शिक्षकों से सम्बंधित हो. इस को ध्यान में रखते हुए गांधी महाविद्यालय, उरई के प्राध्यापकों ने व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ भी उठाई और विरोध करने
का, अपनी नाराजगी को प्रदर्शित करने का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया.
विरोध का, नाराजगी का मामला चूँकि महाविद्यालय
के प्राध्यापकों से जुड़ा हुआ था, ऐसे में उनके द्वारा ऐसे
किसी भी कदम को गलत ठहराया जा सकता था, जिससे किसी व्यवस्था
में अव्यवस्था उत्पन्न होने लगे. गुरुतर दायित्व-बोध का भान होने के कारण प्राध्यापकों
द्वारा किये गए विरोध प्रदर्शन से महाविद्यालय के किसी भी कार्य में किसी भी तरह
की रुकावट नहीं आई. महाविद्यालय में जिन कक्षाओं में अध्यापन कार्य चल रहा था, उन कक्षाओं का सञ्चालन भी सुचारू रूप से होता रहा. स्नातक और परास्नातक
कक्षाओं में नवीन सत्र हेतु प्रवेश प्रक्रिया भी संचालित है,
प्राध्यापकों ने इसका भी ध्यान रखा और उनके विरोधात्मक कदम के बाद भी
विद्यार्थियों के प्रवेश सम्बंधित कक्षाओं में होते रहे. कार्यालयीन कार्य भी
यथोचित रूप से संपन्न होते रहे.
आपको बताते चलें
कि महाविद्यालयों में कैरियर एडवांसमेंट स्कीम के अन्तर्गत प्राध्यापकों की
प्रोन्नति प्रक्रिया को अपनाया जाता है. इस प्रक्रिया के अंतर्गत प्रोन्नति के
नियमों और सेवा-शर्तों को पूरा करने वाले प्राध्यापकों को निश्चित प्रारूप में
अपना आवेदन समस्त अभिलेखों के साथ प्राचार्य कार्यालय में जमा करना पड़ता है. गांधी
महाविद्यालय, उरई के दस
प्राध्यापकों द्वारा यथोचित सेवा-शर्तों को पूरा करने के बाद अपनी प्रोन्नति
सम्बन्धी आवेदन की फाइल को समस्त दस्तावेजों के साथ गत वर्ष, 2023 में 15 सितम्बर
को प्राचार्य कार्यालय में जमा किया गया था. उसके बाद से अद्यतन सम्बंधित
प्राधिकारी द्वारा, प्राचार्य द्वारा कोई आधिकारिक जानकारी किसी भी प्राध्यापक को
नहीं दी गई और न ही इस सम्बन्ध में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा गठित साक्षात्कार पैनल को आधिकारीक ढंग से सूचित किया गया.
सम्बंधित उच्चाधिकारी, प्राधिकारी की इस तरह की
कार्य-संस्कृति के चलते पूरा एक वर्ष हो जाने के बाद भी वे दस प्राध्यापक अपनी
प्रोन्नति की राह ताकने में लगे हैं.
इस तरह की
कार्य-संस्कृति,
कार्य-प्रणाली से क्षुब्ध होकर उन दस प्राध्यापकों के साथ-साथ अन्य जागरूक
प्राध्यापकों ने विरोध का, अपनी नाराजगी प्रदर्शित करने का एक नया तरीका अपनाया.
इस विरोध प्रदर्शन में सम्बंधित प्राध्यापकों ने एक वर्ष से फाइलों की स्थिति में
प्रगति ने देखते हुए प्राचार्य कार्यालय में फाइल जमा करने की पहली वर्षगाँठ मनाई.
अवसर भले ही विरोध करने का रहा, भले ही नाराजगी दिखाने का था, प्राचार्य की उदासीन कार्य-प्रणाली के विरुद्ध था मगर किसी भी तरह का तो
शोर-शराबा किया गया, न किसी तरह की नारेबाजी की गई, न किसी तरह से कक्षाओं में अध्यापन कार्य को बाधित किया गया. नारेबाजी, शोरगुल, हंगामा आदि से उलट इस अवसर पर प्राध्यापकों
द्वारा केक काट कर अपना विरोध जताया गया. केक के साथ-साथ महाविद्यालय के समस्त
प्राध्यापकों, कर्मचारियों को जलपान भी करवाया गया. इसमें भी
प्राध्यापकों ने गंभीरतापूर्वक व्यवहार अपनाते हुए इस बात का ध्यान रखा कि
महाविद्यालय का अध्यापन अथवा कार्यालयीन कार्य बाधित न हो, इसलिए सभी विभागों में
जलपान पहुँचाये जाने की व्यवस्था की गई.
महाविद्यालय के
प्राध्यापकों ने इस अवसर पर कहा कि वे लोग शिक्षित वर्ग से आते हैं, शिक्षा देने
का कार्य करते हैं. और तो और शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है, ऐसे में
उनके द्वारा विरोध के तरीके से एक तरह का सन्देश भी देना उनका उद्देश्य था, साथ ही विद्यार्थियों में भी
चेतनात्मक विकास करवाना था. आज विरोध, अनशन के नाम पर देश की, समाज की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है, समाज
में अराजकता फैलाई जाती है, यह सब नकारात्मक प्रवृत्ति का परिचायक है. उन्होंने
अपने इस तरह के शालीन, सभ्य, शांत
विरोधात्मक कदम के द्वारा प्रयास किया है कि अपने दायित्वों,
कार्यों के प्रति उदासीन प्राचार्य, प्राधिकारी संभवतः जाग
सकें. प्राध्यापकों ने कहा कि प्रोन्नति के इस मुद्दे के साथ-साथ एनपीएस का मुद्दा
भी उनके महाविद्यालय में उलझा हुआ है. इसके लिए भी प्राध्यापकों और कर्मियों
द्वारा इसी तरह से शालीन, सभ्य विरोध प्रदर्शन करके उदाहरण
निर्मित किया जायेगा.
विरोध प्रदर्शन के
इस अवसर पर शिक्षक संघ अध्यक्ष रोहित कुमार पाठक, महामंत्री डॉ. धर्मेन्द्र कुमार, पूर्व
नैक प्रभारी डॉ. ऋचा सिंह राठौर, पूर्व आईक्यूएसी संयोजक डॉ.
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर, डॉ. सुनीता गुप्ता, डॉ. ऋचा पटैरिया, प्रीति परमार, डॉ. मोनू मिश्रा, डॉ. के.के. गुप्ता, डॉ. के.के. त्रिपाठी, डॉ. मसऊद अंसारी, डॉ. कंचन दीक्षित, डॉ. इन्द्रमणि दूबे, डॉ. संदीप
श्रीवास्तव, डॉ. शिवसंपत्त द्विवेदी,
डॉ. वंदना सिंह, डॉ. विश्वप्रभा त्रिपाठी, कश्यप पालीवाल, महेन्द्र सिंह आदि उपस्थित
रहे.
05 सितंबर 2024
गुरु और शिक्षक का अंतर
ओ फ़ेसबुक की भेड़चाल
में बहकने वाले/वालियो
आप सबने ज़िन्दगी से
सीखा, माता-पिता पहले गुरु रहे,
प्रकृति से ज्ञान प्राप्त किया,
इससे लिया, उससे बटोरा, कण-कण ने दिया, वक्त ने सिखाया
आदि-आदि. सारी बातें सही हैं, आदर्श विचारक हैं मगर बहकते-भटकते कुछ और जानकारी भी सीख लो, सहेज लो. गुरु कोई भी हो सकता है, कोई भी से मतलब कोई भी. ज्ञान किसी से भी मिल
सकता है, किसी से भी माने किसी
से भी. ये लोग माता-पिता, कोई रिश्तेदार,
सहयोगी, मित्र, कोई भी कामगार, किसी भी व्यवसाय
का व्यक्ति, किसी भी संस्थान का
सदस्य, निरक्षर, साक्षर आदि कोई भी हो सकते हैं. ये गुरु हो सकते
हैं पर शिक्षक नहीं.
हर कोई शिक्षक नहीं
बन सकता. हर किसी को शिक्षक नहीं कहा जा सकता. प्रशासनिक अधिकारी प्रशासनिक अधिकारी
ही होगा. पुलिस वाला पुलिस वाला ही रहेगा. डॉक्टर को डॉक्टर ही कहा जायेगा. इंजीनियर
इंजीनियर ही रहेगा. व्यापारी भी यही रहेगा. हाँ, ये गुरु हो सकते हैं. इनको गुरु माना-समझा-कहा जा सकता
है. इससे इतर शिक्षक एक निश्चित प्रक्रिया के बाद शैक्षिक संस्थान में नियुक्त व्यक्ति
होता है. निश्चित डिग्री, निश्चित
अर्हता, निश्चित प्रक्रिया के बाद
ही कोई व्यक्ति शिक्षक कहलाता है.
शिक्षक दिवस देश के
एक शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के सम्मान में उनके जन्मदिन पर मनाते हैं. यह
दिन उनके जन्मदिन पर शिक्षकों का सम्मान करने का दिन है. इनसे इतर किसी और से ज्ञान
पाने वाले को गुरु कहिए, उनका सम्मान
गुरु पूर्णिमा को करिए.
01 सितंबर 2024
बच्चों के स्वास्थ्य पर विद्यालय समय का प्रभाव
शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए आये दिन एक विचार तैरता है कि सभी कक्षाओं में,
सभी विद्यालयों में NCERT की किताबें ही होनी चाहिए; महँगी किताबों को रोका जाना चाहिए; बस्ते का बोझ कम से कम रखा जाये. इसके साथ-साथ
सबको एक बात के लिए और आवाज़ उठानी चाहिए. इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए विद्यालयों
का समय कम किया जाये. आज लगभग सभी विद्यालयों में समय प्रातः सात-आठ बजे से दोपहर बाद
दो-तीन बजे तक का है. ऐसे समय के चलते बच्चे सुबह छह-साढ़े छह बजे घर से निकलते हैं
और तीन-चार बजे तक लौटते हैं.
कभी विचार करिए कि इन बच्चों को सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन उचित तरीक़े से नहीं मिल पा रहा है. विद्यालयों
में भोजनावकाश में बच्चे पेट ही भरते हैं, न तो उनको घर की तरह आराम से खाने का समय मिलता है और न ही वैसा भोजन. विद्यालय
से तीन- चार बजे लौटने पर या तो भोजन किया नहीं जाता है या फिर बस काम चला लिया जाता
है. इस तरह की भोजन स्थिति से बच्चों को दोपहर में खाद्य-पौष्टिकता नहीं मिल पा रही
है. दिन में देर से भोजन करने पर रात को भी भोजन की स्थिति में अनियमितता आती है. इस
स्थितियों को देखकर प्रयास किए जाएँ कि विद्यालयों का समय कम किया जाये, जिससे बच्चे दोपहर का भोजन आराम से कर सकें,
पौष्टिकता के साथ कर सकें. उनकी सेहत के
लिए ये आवश्यक है.
30 मार्च 2024
बचपने के सुख से दूर बचपन
बोर्ड परीक्षाओं
के साथ-साथ घरेलू परीक्षाओं की समाप्ति के बाद भी बच्चे न तो उत्साहित से दिख रहे
हैं और न ही पढ़ाई से मुक्त नजर आ रहे हैं. लगभग सभी बच्चों के चेहरे पर एक तरह का
तनाव सा दिखाई पड़ रहा है. इनको देखकर लग ही नहीं रहा है कि इन्हीं बच्चों ने अभी
कुछ दिन पहले खूब मेहनत करके परीक्षाएँ दी है. ये सारे के सारे बच्चे आज भी किसी
परीक्षा को देते से नजर आते हैं. ये सच भी है, क्योंकि एक समय था जबकि परीक्षाएँ समाप्त होने के बाद कुछ
दिनों तक सभी बच्चे दबाव मुक्त होकर अपनी छुट्टियों को बिताया करते थे. आजकल देखने
में आ रहा है कि परीक्षा के दबाव से निकलते ही उनके ऊपर परीक्षा परिणाम का दबाव
हावी होने लगता है. अंक कैसे आयेंगे? कौन सा ग्रेड मिलेगा?
प्रवीणता सूची में नाम आएगा या नहीं? ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों
सवाल उनके मन-मष्तिष्क पर दबाव बनाने लगते हैं. इस दबाव के साथ-साथ एक दूसरी तरह
का दबाव भी अपनी गिरफ्त बनाने की कोशिश करता है. बच्चों के ऊपर जहाँ परीक्षा
परिणाम का दबाव उनके सामाजिक, पारिवारिक और शैक्षणिक वातावरण
के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है वहाँ एक अन्य प्रकार का दबाव उन पर व्यावसायिक
स्थिति के चलते बनाया जाने लगता है. अभी परीक्षा परिणाम निकला नहीं है मगर शिक्षण
संस्थानों द्वारा अगले सत्र में प्रवेश लेने के लिए युद्ध-स्तर पर तैयारियाँ चलने
लगी हैं. विज्ञापनों, व्यक्तिगत संपर्कों, फोन कॉल्स के द्वारा अभिभावकों पर डोरे डालने का काम शुरू हो गया है.
देखा जाये तो
समस्या न तो परीक्षा है,
न परीक्षाफल और न ही अगली कक्षा में प्रवेश की रस्साकशी, असल
समस्या है बच्चों के हिस्से में आने वाली गर्मियों की छुट्टियों पर डाका डालने की.
सुनने, पढ़ने में ये भले ही अजीब सा,
अलोकतांत्रिक सा लगे मगर सच यही है कि अब बच्चों के हिस्से में वे गर्मियों की
छुट्टियाँ नहीं आती हैं, जिन्हें वास्तविक रूप में छुट्टियाँ
कहा जाता है. परीक्षा परिणाम अभी क्या होगा, इससे किसी तरह
का सरोकार रखे बिना शिक्षण संस्थानों द्वारा बच्चों का प्रवेश अगली कक्षा में कर
लिया जाता है. नए शैक्षिक सत्र के नाम पर चंद दिनों चलाई गई कक्षाओं के बाद बोलचाल
में स्वीकारी जाने वाली गर्मियों की छुट्टियों के लिए बच्चों के बस्तों में इतना
सारा अनावश्यक काम गृहकार्य के नाम पर ठूँस दिया जाता है कि न केवल बच्चा बल्कि
उसके माता-पिता तक भूल जाते हैं कि वे गर्मियों की छुट्टियों का आनंद उठा रहे हैं.
मई-जून माह में
होने वाली गर्मियों की छुट्टियाँ विद्यालयों से दूर रहने वाले दिन अकेले नहीं हुआ
करते हैं बल्कि इन छुट्टियों के द्वारा बच्चों में अपने परिजनों से मिलने, अपने आसपास के वातावरण को
देखने-समझने, देशाटन करने, बिना किसी
तरह का मानसिक बोझ लेकर साथियों संग समन्वय-सामंजस्य आदि की समझ विकसित हुआ करती
है. अब गृहकार्य के नाम पर जिस तरह का मानसिक और किताबी बोझ बच्चों पर लाद दिया
जाता है, उससे बच्चे गर्मियों की छुट्टियों का आनंद उठाना
भूल ही गए हैं. एक पल को रुक कर सोचिए और महसूस करिए कि क्या आज के बच्चे गर्मियों
की छुट्टियों में आम के बगीचों का आनंद ले पा रहे हैं? क्या
वे ग्रामीण अंचलों में रह रहे अपने बाबा-दादी, नाना-नानी अथवा अन्य रिश्तेदारों के
पास जा पा रहे हैं? रातों को खुले आसमान के नीचे
चाँद-सितारों को निहारते हुए किस्से-कहानियों के कल्पना-लोक में विचरण करने जैसा
सुख क्या आज के बच्चे ले पा रहे हैं? क्या आज के बच्चों
द्वारा निष्फिक्र रूप में तालाब, नहर, बम्बा आदि में तैरने
का मजा लिया जा रहा है? क्या ये बच्चे इन छुट्टियों में
खेतों-खलिहानों को वास्तविक रूप में आत्मसात कर पा रहे हैं? ऐसी
स्थिति के चलते आज के बच्चे नैसर्गिक वातावरण से बहुत दूर होते चले जा रहे हैं. यह
वातावरण प्राकृतिक ही नहीं बल्कि पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि भी है.
ऐसा नहीं कि
गर्मियों की छुट्टियों में मिलने वाला गृहकार्य आवश्यक नहीं, इसके द्वारा भी
बच्चों का मानसिक और शैक्षणिक विकास होता है. छुट्टियों के दिनों में दिए गए
प्रोजेक्ट के द्वारा उनके भीतर कुछ न कुछ नया सीखने की ललक पैदा होती है, जिज्ञासा जागती है. बावजूद इसके
क्या आज मिलने वाले गृहकार्य के द्वारा ऐसा हो रहा है?
विद्यालयों से गृहकार्य के नाम पर पाठ्यक्रमों की पूर्ति करवाई जाने लगी है.
लम्बे-लम्बे लिखित किताबी कार्य देकर बच्चों को चौबीस घंटे किताबों में ही घुसे
रहने को मजबूर किया जा रहा है. गृहकार्य के द्वारा अब न बच्चों के सामान्य ज्ञान
को बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है, न उनकी हस्तलिपि को
सुधारने पर जोर दिया जा रहा है, न ही कला-संगीत आदि किसी शौक
को विकसित करने की पहल की जा रही है. अधिक से अधिक अंक लाने की अंधी दौड़, प्रवीणता सूची में सबसे ऊपर आने की कशमकश, अधिक से
अधिक किताबी ज्ञान को दिमाग में भर लेने की कवायद के द्वारा बच्चों का बचपन तो
पहले ही छीन लिया गया है, अब गर्मियों की छुट्टियों पर
अप्रत्यक्ष डाका डालकर उनको सामाजिकता, पारिवारिकता, सांस्कृतिकता आदि से भी दूर किया जा रहा है.











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