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01 अगस्त 2025

प्रेमचन्द का इस्लामिक तुष्टिकरण

आये दिन चर्चा होती है फिल्मों में तुष्टिकरण के सम्बन्ध में. नायक को हिन्दू देवी-देवताओं से नफरत होती है पर 786 के बिल्ले पर विश्वास होता है. साधु-संत ढोंगी दिखाए जाते हैं मगर मौलवी-मौलाना विश्वासी होते हैं. ऐसी अनेकानेक घटनाएँ हैं, अनेकानेक फ़िल्में हैं. गौर करियेगा, ये फ़िल्मी बातें आज़ादी के बहुत बाद की हैं. किसी दौर में तो मुस्लिम अभिनेताओं को भी अपना स्थान बनाये रखने के लिए हिन्दू नाम अपनाने पड़े थे. बहरहाल, फिल्मों में इस तरह की हरकतें आज़ादी के बहुत बाद शुरू हुईं जबकि हिन्दू पात्र खलनायक और मुस्लिम पात्र नायक दिखाए गए. हिन्दू आस्था को ढोंग बताया गया और इस्लामिक पद्धति को स्वीकारा गया.

 



आज़ादी के बहुत पहले 1933 में एक कहानी प्रकाशित हुई थी ईदगाह, आप सबने पढ़ी होगी. लेखक हैं इसके प्रेमचन्द. गौर करियेगा, इस कहानी में हामिद दया का मानक बनता है, अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है. आखिर ऐसा पात्र हिन्दू भी गढ़ा जा सकता था लेकिन प्रेमचन्द ने नहीं गढ़ा. प्रेमचन्द ने हिन्दू पात्र में रचा घीसू और माधव को, कहानी को (उपन्यास) नाम दिया कफ़न. जिस-जिसने इसे पढ़ा होगा वे अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह का हिन्दू पात्र रचा गया. ऐसा उस लेखक द्वारा किया गया जिसे उपन्यास सम्राट कहा गया. जिसकी कोई फंडिंग इस्लामिक देशों से नहीं थी. समझना कठिन नहीं कि हिन्दू विरोधी नैरेटिव बरसों से बहुत ही सहजता के साथ चलाया-फैलाया जाता रहा है.

 


07 मार्च 2025

काग दही पर जान गँवायो

‘काग दही पर जान गँवायो’ वाक्य को लगभग सभी ने पढ़-सुन रखा होगा और इससे जुड़ी कहानी से भी लगभग सभी लोग परिचित होंगे. ऐसा जानने-समझने के बाद भी इस वाक्य से जुड़ी कहानी एक बार फिर आप सबके बीच रख दी जाए ताकि जिस-जिस को विस्मृत हो गई हो या फिर सही से याद न हो तो उसे पुनः स्मरण हो जाये.

 

इससे जुड़ी कहानी कुछ इस तरह से है कि एक बार एक कवि महोदय हलवाई की दुकान पहुँचे. वहाँ उन्होंने अपने खाने के लिए जलेबी और दही खरीदी और वहीं पड़ी मेज-कुर्सी पर बैठ कर खाने लगे. इस दौरान उन कवि महोदय ने गौर किया कि एक कौआ बहुत देर से दुकान से कुछ न कुछ खाने की जुगाड़ में थे. कई-कई बार की मेहनत के बाद भी उसे कुछ खाने को नहीं मिल पा रहा था क्योंकि हलवाई पूरी तत्परता से उसे भगा देता था. इसी बीच वो कौआ कहीं से जगह बनाने में सफल हो गया और वह दही की परात में चोंच मारकर उड़ गया. ये देखकर हलवाई को बहुत गुस्सा आया, उसने बगल में वजन तौलने वाला बाँट उठा कर उस कौए को दे मारा. कौए की किस्मत ख़राब थी सो वह बाँट सीधे उसे लगा और वो मर गया.

 

इस घटना को देख कवि हृदय द्रवित हो उठा. दही-जलेबी खाने के बाद कवि महोदय जब पानी पीने पहुँचे तो उन्होंने अपने हृदय की पीड़ा को वहीं बनी एक दीवार पर एक कोयले के टुकड़े से एक पंक्ति में लिख दिया-

‘काग दही पर जान गँवायो’

 



कवि महोदय तो अपना काम करके चले गए. उनके जाने के बाद वहाँ एक लिपिकीय कार्यों से सम्बंधित व्यक्ति आता है. वे महाशय अपनी नौकरी के दौरान कागजों में हेराफेरी करने के कारण निलम्बित हो गये थे. उस पानी की टंकी के पास पानी पीने के लिए आने पर उनको कवि महोदय की लिखी पंक्ति दिखाई दी. नजर पड़ते ही उनके मुँह से निकला कि बात तो सही है, बस शब्द लिखने में कुछ त्रुटि हो गई है. ऐसा मन में आते ही उन्होंने अपने मन के अनुसार कवि की लिखी पंक्ति में सुधार कर दिया. उन्होंने उस पंक्ति को कुछ इस तरह पढ़ते हुए सही कर दिया-

‘कागद ही पर जान गँवायो’

 

कवि और उस लिपिक टाइप वाले के जाने के बाद एक लड़का वहाँ आया. शक्ल-सूरत से वह आशिक टाइप, मजनू सरीखा समझ आ रहा था. चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रहीं थीं. ऐसा लग रहा था जैसे अपने प्रेम में हताश-निराश होकर कहीं से चला आ रहा है. पानी पीने के दौरान उसकी नजर भी उस पंक्ति पर पड़ी. पंक्ति पढ़ते ही उसे भी लगा कि कितनी सच्ची बात लिखी है, यदि उसे ये बात पहले पता चल जाती तो वो परेशान न होता. उसने उस पंक्ति को कुछ इस तरह से पढ़ा-

‘का गदही पर जान गँवायो’

 

सीधा सा अर्थ है कि हम सभी लोग अपनी स्थिति, अपनी मनोदशा के अनुसार ही सामने वाली स्थिति, परिस्थिति का आकलन करते हैं. हमारी मानसिकता के चलते, कई बार पूर्वाग्रह के चलते वास्तविकता से दूर होकर किसी भी स्थिति को हम सभी अपने अनुसार देखते-समझते हैं. जबकि होना नहीं चाहिए ऐसा. हम सभी को किसी भी स्थिति, परिस्थिति, घटना आदि की वास्तविकता की जानकारी कर लेने के बाद अपना मंतव्य बनाना चाहिए, उस पर कोई फैसला लेना चाहिए.


10 जून 2023

मनोभाव आपस में बाँटते रहें

पिछले दिनों एक कहानी सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है. इसमें एक तैराक को उसके कोच द्वारा बचा लेने का चित्रण किया गया है. पोस्ट को आगे लिखने-पढ़ने के पहले उस कहानी पर निगाह डाल ली जाये. कहानी कुछ इस तरह से है कि


अनीता अल्वारेज, जो अमेरिका की एक पेशेवर तैराक हैं, ने वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान परफॉर्म करने के लिए स्विमिंग पूल में जैसे ही छलांग लगाई, वो छलांग लगाते ही पानी के अंदर बेहोश हो गई. जहाँ पूरी भीड़ सिर्फ़ जीत और हार के बारे में सोच रही थी वहीं उसकी कोच एंड्रिया ने देखा कि अनीता एक नियत समय से ज़्यादा देर तक पानी के अंदर है. एंड्रिया पल भर के लिए भूल गई कि वर्ल्ड चैंपियनशिप प्रतियोगिता चल रही है. एक पल भी व्यर्थ ना करते हुए एंड्रिया ने प्रतियोगिता के बीच में ही स्विमिंग पूल में छलांग लगा दी.


वहाँ मौजूद हज़ारों लोग कुछ समझ पाते तब तक एंड्रिया पानी के अंदर अनीता के पास थी. एंड्रिया ने देखा कि अनीता स्विमिंग पूल में बेहोश पड़ी है. ऐसी हालत में वो ना हाथ पैर चला सकती ना मदद माँग सकती. एंड्रिया ने अनीता को जैसे बाहर निकाला, मौजूद हज़ारों लोग सन्न रह गए. एंड्रिया ने अनीता को तो बचा लिया.




इस कहानी के बाद इससे जुड़ी दार्शनिकता को, सामाजिकता को सबके बीच चर्चा के लिए छोड़ दिया गया. कहा गया कि एंड्रिया ने अनीता को बचा लिया और हम सबकी ज़िंदगी में बहुत बड़ा सवाल छोड़ दिया! सवाल यह कि हम में से बहुत सारे लोग किसी न किसी रूप में परेशान होकर एक तरह से डूब ही रहे हैं. विशेष बात यह है कि कौन हमारा कोच है जो हमारे बिना बताये, बोले हमें बचाने के लिए आ जाता है.


देखा जाये तो वाकई सवाल बहुत बड़ा है किन्तु इसी सवाल के पीछे एक सवाल और छिपा है कि हम में से कितने लोग ऐसे हैं जो अपने मिलने वालों से, अपने माता, पिता, भाई, बहिन, दोस्त से कुछ भी नहीं छिपाते हैं? उनके साथ सारी बातें बाँटते हैं? जिस कहानी को सोशल मीडिया में एक आदर्श की तरह रखकर किसी कोच को बनाने की बात कही जा रही, उसी कहानी के आलोक में यह भी समझना होगा कि उस कोच और खिलाड़ी के बीच समन्वय, सामंजस्य के बीच किसी तरह का कोई संशय नहीं होगा. पल-पल की स्थिति, उसके आगे की परिस्थिति का आकलन वे दोनों एकसाथ कितनी बार किये होंगे. सामाजिक, पारिवारिक वातावरण में अब ऐसी स्थिति देखने को बहुत कम मिल रही है जहाँ कि लोग अपनी बात को, अपनी परेशानी को, अपनी समस्या को अपने अभिन्न कहे जाने वाले के साथ बाँट रहे हों. आखिर जब तक दो लोगों के बीच आपस में समन्वय नहीं है, वैचारिक सामंजस्य नहीं है, एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की मानसिकता नहीं है तब तक कहानी के कोच और खिलाड़ी जैसा सम्बन्ध मिलना मुश्किल है. 





 

14 अक्टूबर 2021

प्रेम का मखमली एहसास - 2100वीं पोस्ट (कहानी)

मोबाइल को मेज पर टिका कर वह कुर्सी पर पसर गया. ‘कभी अपने घर को देखते हैं’ की तर्ज़ पर उसने एक नजर ड्राइंग रूम कम स्टडी रूम पर दौड़ाई. अस्तव्यस्त तो नहीं कहा जायेगा मगर करीने से लगा भी नहीं कहा जा सकता. पढ़ने के अलावा भी तमाम शौक के उसी कमरे में अपना आकार लेने के कारण बहुत सी चीजों ने जगह-जगह कब्ज़ा कर रखा था. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि अकेले प्राणी के लिए क्या ड्राइंग और क्या स्टडी.


चौंकने जैसी स्थिति में वह किताबें, कागज, कलर्स, कैनवास आदि को उनकी जगह देने के लिए उठा. उसके आने के पहले सभी चीजों को यथास्थान कर दिया जाये अन्यथा कमरे में घुसते ही इसी बात पर लेक्चर मिल जायेगा. याद आया उसे, जब पहली बार वह उसके कमरे पर आई थी तो ‘यही सब खाते-पीते हो क्या? इन्हीं पर सोते-बैठते हो?’ के साथ उसने इधर-उधर बिखरी किताबों, कागजों, पेन आदि को समेटना शुरू कर दिया था. वह दिन याद आते ही एक मुस्कान के साथ उसने हाथ में पकड़ी किताबों को ज्यों का त्यों छोड़ दिया. आज उसके हाथ से स्टडी रूम संवर जाएगा तो बहुत दिनों तक उसकी महक बनी रहेगी.


साढ़े पाँच बजे महकती पवन की तरह उसका आना हुआ. उसके आने की आहट मात्र ने उन दिनों में पहुँचा दिया जबकि वह उसे अपनी सारी ज़िन्दगी में खुशियाँ बिखेरने के सपने देखा करता था. समय का ही खेल है जिसे ज़िन्दगी भर के लिए उसके साथ होना था वह चंद पलों के लिए अपने एहसासों की बारिश करने आई है.


“आदत अभी तक न बदली तुम्हारी. अभी भी कागज, रंग ही खाते हो. इन्हीं को ओढ़ते-बिछाते हो.” स्टडी रूम में कदम रखते ही उसके वर्षों पुराने अंदाज ने उसे भावनाओं से सराबोर कर दिया.


“एक मिनट रुको” कहते हुए वह सोफे से किताबों को उठाने के लिए आगे बढ़ा.


“तुम रहने ही दो. इतने ही काम वाले होते तो कमरा ऐसा न रहता. रुको मैं सही कर देती हूँ.” पूरे अधिकार के साथ वह कमरे को सजाने में जुट गई.




पहले तो वह कमरे के दरवाजे से टिका उसे सामान लगाते और उस पर बड़बड़ाते देख मुस्कुराता रहा फिर उसकी मदद करने लगा. इस दौरान दोनों के बीच पुराने दिनों की तरह हँसी-मजाक, छेड़छाड़ चलती रही. कभी एक हलकी सी मुस्कान के साथ बात आगे बढ़ती तो कभी ठहाकों के साथ.


“अब लग रहा है जैसे कोई रहता हो यहाँ. आती रहा करो बीच-बीच में इसे भी ज़िन्दगी देने के लिए.” कह कर उसे छेड़ा.


“मैं तो ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी देने के लिए आने वाली थी....” आगे के शब्दों पर होंठों के कंपन ने अवरोध पैदा किया. ख़ामोशी ने चीखना शुरू किया ही था कि “कुछ करना सीख लो या अब भी मेरे भरोसे ही रहोगे?” कहते हुए उसने माहौल को खुशनुमा बनाया.


उसके कुछ कहने के पहले ही अन्दर से नौकर चाय लेकर आया.


“चलो जल्दी चाय पी लो फिर कहीं बाहर चलते हैं खाना खाने.....” उसने बात काटते हुए अपनी बात जोड़ी “नहीं, कहीं बाहर नहीं जायेंगे. दो दिन से बाहर का खा-खाकर बोर हो गई हूँ. यहीं कुछ बनाती हूँ मैं.”


उसे बिन माँगे बहुत कुछ मिल गया. काश यह पल यहीं रुक जाए हमेशा के लिए.


“ओ हैलो, इधर ध्यान दो. कुछ है भी तुम्हारी किचन में या ऐसे ही बना रखा है अपने स्टडी जैसा?” उसके चेहरे पर अप्रत्याशित ख़ुशी, चमक और उसे कहीं खोया सा देख उसने टोका.


थोड़ी देर बाद किचन में उसके प्यार, स्नेह की रेसिपी अपनी खुशबू बिखरने लगी. किचन के एक कोने से टिका मंत्रमुग्ध सा उसे निहारे जा रहा था. इस समय उसके विचारों पर, पूरे व्यक्तित्व पर वही छाई हुई थी. बातों का जवाब न मिलने पर उसने पलट कर देखा तो खुद को ऐसे निहारते देखने पर एक पल को वह भी असहज हो गई.


“ऐसे क्या घूरने में लगे हो? पहली बार देख रहे हो?”


“कुछ नहीं. बस.... ऐसे ही....”


“अच्छा चलो, ज्यादा नौटंकी नहीं. चलो, भागो यहाँ से. डायनिंग टेबल सही करो और हाँ सलाद काट लो.” कहते हुए उसने धक्का देकर उसकी नजरों को अपने चेहरे से हटाया.


अपनी बाँहों पर उसकी उँगलियों का एहसास लेकर वह हँसते हुए डायनिंग टेबल की तरफ चल दिया.

 


27 अप्रैल 2020

इंतजार भरे जीवन का एक और इंतजार

सुबह के इंतजार में रात जागते-सोते काटी. सुबह होने के बाद इंतजार उसकी खबर का. थोड़ी-थोड़ी देर में मोबाइल को देखता कहीं वह घंटी सुन न पाया हो. कहीं फोन के बजाय मैसेज ही न किया हो. कभी सोचता कि वह खुद ही फोन करके जानकारी कर ले फिर कुछ सोच कर अपने को रोक लेता. व्यग्रता के बीच समय भी बहुत धीमे से आगे बढ़ रहा था. उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था. बेचैनी में इधर-उधर टहलने के बीच मोबाइल की घंटी बजते ही उसने लपक कर फोन उठाया. 


“क्या फोन पर ही बैठे थे?” दूसरी तरफ से जानी-पहचानी आवाज़ और हँसी सुनाई दी.

“इतनी देर लगा दी. बताओ, क्या प्रोग्राम बना?”

“नहीं आ पाऊँगी.” उसने बड़े धीमे से कहा.
“क्यों? क्या हो गया? क्या समस्या है? हम आ जाएँ?” उसने एक साँस में कई सारे सवाल दूसरी तरफ उछाल दिए.

इतने सारे सवालों के उत्तर में उसे जोरदार हँसी सुनाई दी, जो देर तक मोबाइल के सहारे उसके दिल-दिमाग में, उसके आसपास घूमती रही.

“इतने परेशान न हो. शाम तक आती हूँ.”

उसकी साँस में साँस आई यह सुन कर. “शाम माने, कितने बजे?” उसने आने के बारे में पूरा इत्मिनान करना चाहा.
“देखती हूँ, जैसा समय निकलेगा शाम को. अभी कुछ कह नहीं सकती.”

इधर उधर की कुछ बातों के बाद दोनों ने बातचीत को विराम दिया. शाम को उसके आने की खबर अपने आपमें खुश करने वाली थी. वह सोचने लगा कि उसके न आ पाने की बात पर वह इतना बेचैन क्यों हो गया था? उससे मिलने की इतनी बेताबी क्यों है? दो-चार पल की मुलाकात में क्या वर्षों की बातचीत समाप्त हो पायेगी? कितनी-कितनी बातें हैं जो उसके साथ करनी हैं. कितना कुछ है जो बताना है. कितना कुछ है जो उससे सुनना-जानना है.

अब फिर इंतजार शुरू. शाम का इंतजार. शाम को किस समय आएगी? कितनी देर रुकेगी? दोपहर के बाद उसने अपने हिसाब से शाम का निर्धारण करना शुरू कर दिया. शाम चार बजे के बाद तो वह बार-बार घड़ी देखता, दरवाजे की तरफ देखता. घड़ी की सुई लगातार आगे बढ़ती हुई उसी धड़कन बढ़ा रही थी. कभी मन में उसके न आने की शंका उठती. कभी समय न निकाल पाने की मजबूरी दिखाई देती. कभी उसे लगता कि अपने घर पर क्या बताएगी कि कहाँ जा रही है, इसलिए न आये. कभी सोचता कि कहीं उसने मन रखने के लिए ही आने की हामी तो नहीं भर दी?

इसी ऊहापोह में उसने कई बार मैसेज छोड़ दिए. वह मैसेज देख लेती मगर जवाब नहीं दे रही थी. समय के गुजरने के साथ उसे एहसास होने लगा कि वह आएगी नहीं. उसके आने की ख़ुशी पर उसके न आने की आशंका भारी पड़ने लगी. इस भारीपन का आभास उसे होने लगा. 

तभी मोबाइल की मैसेजटोन ने उसका ध्यान खींचा. उसी का मैसेज था, एक स्माइली के साथ, ‘आती हूँ थोड़ा सा धीरज धरो.’

मैसेज पढ़ते ही उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई. पहले सोचा कि ‘लगा दूंगी मैं प्रेम की फिर झड़ी’ लिख कर रिप्लाई कर दिया जाए. फिर कुछ सोच कर उसने अपना विचार बदल दिया.

इस तरह के हँसी-मजाक, छेड़छाड़ उनके बीच अक्सर होती रहती थी. कई बार वह नाराज हो जाती थी. उसका नाराज होना अपने आपमें एक आश्चर्यजनक स्थिति रही है. कब किस बात पर नाराज हो जाये, कब किस बात को खुद मजाक बना दे, कहा नहीं जा सकता था. आज वर्षों बाद उसकी मुलाकात होनी थी और वह नहीं चाहता था कि उसकी किसी भी बात से वह नाराज होकर मिलने का प्लान बदल दे.

‘धीरज ही धरे हैं.’ लिख कर उसने रिप्लाई दिया और उसका इंतजार करने लगा.

इंतजार भरे उसके जीवन का एक और इंतजार.




(लिखी जा रही प्रेम कहानियों सम्बन्धी पुस्तक में से )
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16 जनवरी 2020

शबनमी ख्वाब का एहसास


मोबाइल के तेज अलार्म को खामोश करके हम आराम से चादर तानकर लेटे रहे। कुछ देर बाद दरवाजे पर आहट हुई। लगा कि दोस्त घूम-टहल कर वापस आ गया है, सो लेटे-लेटे ही सवाल दागा। उधर से कोई जवाब नहीं मिला मगर पलंग पर किसी के बैठने का एहसास हुआ। चादर के कोने से उस तरफ मुँह घुमाते ही हमारी चीख निकल गई। पलंग पर वही रहस्यमयी स्वभाव वाली लड़की बैठी मुस्कुरा रही थी, जो ट्रेन यात्रा में लगातार साथ रही। नींद, आलस, पैर का दर्द एकदम गायब। इन सबके स्थान पर कई सारे सवाल उग आये जो उस लड़की की तरफ उछाल दिए।

“आप परेशान न होइए। मैं ऊपर वाले रूम में रुकी हूँ। अभी नीचे उतरते समय आपका दरवाजा खुला देखा तो सोचा कि आप लोगों से मुलाकात कर लूँ।” उसने बिना किसी लागलपेट के सीधे-सपाट शब्दों में बताया। मैं मुँह खोले उसे निहार रहा था। ट्रेन की तरह अब उसके चेहरे पर ख़ामोशी नहीं थी। आँखों में काजलयुक्त चंचलता, होंठों पर सुर्ख रहस्यमयी मुस्कान, गालों पर स्वर्गिक लालिमा स्पष्ट दिख रही थी।

“चलिए सनराइज देखने चलते हैं।” उसकी आवाज़ में खनक थी, हावभाव में प्रफुल्लता। हमने बिना कुछ कहे अपना सूजन भरा पैर उसके सामने कर दिया। “मुझे मालूम है, कल शाम आप व्यू टावर के पास फिसल गए थे, पत्थरों पर।” आँखें आश्चर्य से फ़ैल गईं। वही डर जो ट्रेन में उपजा था, उस लड़की के आपराधिक चरित्र के होने को लेकर। कहीं ऐसा न हो कि इसके साथी आसपास छिपे हों और मौका पाकर हमला कर दें? सनराइज देखने के बहाने लूटपाट करने का इरादा तो नहीं इसका? अपने आपको संयमित कर, पैर की चोट का हवाला देते हुए उसके साथ जाने से मना किया।

तभी उस लड़की ने पर्स से एक शीशी निकाल कर अपनी हथेली में दो-चार बूँदें डाली और बिना कुछ कहे चोट की जगह मालिश करनी शुरू कर दी। बर्फ जैसी ठंडक से चौंकना लाजिमी था। किसी लड़की के द्वारा पैर छूना खुद की सामाजिकता में न होने के कारण झटके से पैर हटा लिया।


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इसके बाद क्या हुआ? कौन थी वो लड़की? क्या हुआ उस लड़के के साथ? क्यों वह उसे अपने साथ ले जाना चाहती थी? क्या वह आपराधिक प्रवृत्ति की थी? 

इसके आगे की कहानी जानने के लिए यहाँ क्लिक करें. 
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पूरी कहानी शबनमी ख्वाब का एहसास इधर भी पढ़ी जा सकती है.

09 फ़रवरी 2019

दो दिल अलग-अलग चलते रहे


आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी पूर्ण होकर प्रकाशनाधीन है. इसके बाद प्रेम कहानियों पर आधारित पुस्तक 'हर पल जीवन, हर पल प्रेम' का लेखन आरम्भ कर दिया गया है. इसी कड़ी में एक कहानी निम्नवत है..... ये कहानियाँ हमारी होकर भी हमारी नहीं. आप सबकी न होकर भी आप सबकी हैं. बस इनका एहसास किया जाना आवश्यक है. तो करिए इनका एहसास और एक बार फिर जीवंत करिए उसी प्रेम भरे पल को. 


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एक छोटे से शहर में कई वर्षों से रहने, जानने के बाद आज पहली बार लड़की उस लड़के के साथ अकेले यात्रा कर रही थी. उस छोटे से शहर में जहाँ कम आबादी के चलते लोग क्या कहेंगे का संकोच होने के कारण वह लड़की कभी भी लड़के के साथ न पैदल घूमने निकली न कभी उसकी बाइक पर.

ट्रेन अपनी स्पीड से दौड़ी जा रही थी. दोनों का दिल भी उसी तेजी से धड़क रहा था. दोनों के बीच खूब सारी बातें हुईं. खूब हँसी-मजाक भी हुआ. लड़के का दिल कर रहा था कि ये सफ़र कभी ख़तम न हो, बस ऐसे ही चलता रहे क्योंकि उसे पता था कि ये साथ बस इतना ही है. लेकिन ट्रेन को एक जगह से चलकर अपने गंतव्य पर पहुँचना ही था. उन दोनों के पास उतना ही समय था, जिसे वे अकेले में पूरी आज़ादी से बिताना चाह रहे थे. बिता भी रहे थे.

लड़का बहुत कुछ कहना चाहता था मगर समय ने कभी इसकी इजाजत नहीं दी. अब तो समय ने उसके पैरों में बंधन बाँध दिए थे. उसके साथ यात्रा कर रही, हँसती वह लड़की उसके साथ होकर भी उसकी न थी. उसके पास होकर भी उससे बहुत दूर थी. अपनी सीट के सामने बैठी एक महिला को उन्होंने अपनी तरफ ताकते देखा तो लड़के ने शरारत से लड़की को छेड़ा. “वो महिला सोच रही होगी कि ये कैसी लड़की इसके साथ बैठी है. जरा भी मैच नहीं कर रही.”

लड़की ने भी कोहनी मारते हुए बनावटी गुस्सा दिखाया, “तो उसी के बगल में बैठ जाओ. खुद को बहुत स्मार्ट न समझो.”

बात-बात पर इस तरह परेशान करना, चिढ़ाना लड़के को शुरू से ही अच्छा लगता था. लड़की का गुस्सा हो जाना, नाराज होकर कुछ देर न बोलना या फिर कुछ उल्टा-सीधा बोल देना दिल ही दिल में उसके प्रति और आकर्षण पैदा कर जाता.

एकसाथ कोल्ड ड्रिंक पीते, एकसाथ एक टिफिन में खाना खाते, एक दूसरे को छेड़ते कब वे अपने शहर के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े थे, उन्हें पता ही न चला. शाम गहराकर रात में बदलने वाली थी. सडकों को अँधेरे ने घेरना शुरू कर दिया था. लड़के ने लड़की से कहा “हमारे साथ चलो रिक्शे से. पहले तुमको घर छोड़ देते हैं.”  

लड़की ने फिर संकोच से कहा “न, न, मैं चली जाऊँगी. लोग देखेंगे एकसाथ तो न जाने क्या कहें. अब तो और कहेंगे.”  

लड़के का रिक्शा कुछ दूरी बनाकर लड़की के रिक्शे के पीछे तब तक चलता रहा जब तक कि वह सुरक्षित अपने घर न उतर गई. छोटे से शहर के बड़े से अनजाने भय में दो दिल बस अलग-अलग चलते रहे.