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06 जनवरी 2018

अगला कदम मानसिक, वैचारिक, सांस्कृतिक स्वच्छता के लिए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान को उनके स्वयं झाड़ू लगाने से आरम्भ होना था और हुआ भी. उसके बाद उनका अनुगमन करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही रही. आरम्भिक आलोचनाओं के बाद भी लोग स्वच्छता अभियान के साथ जुड़े रहे. लोग पूरी तन्मयता से सफाईकार्य में जुटे दिखाई देने लगे. स्वच्छता अभियान के लोगो, चश्मे को भी बहुत से मोदी-विरोधियों ने, भाजपा-विरोधियों ने आलोचना का शिकार बनाया, इसके बाद भी आम जनमानस में स्वच्छता अभियान को नकारात्मकता नहीं दी गई. ये एक तरह का शुभ और सकारात्मक सन्देश ही माना जायेगा कि वातानुकूलित कमरों-गाड़ियों में ऐशोआराम की जिंदगी भोग रहे लोग खुले आसमान के नीचे गंदगी के ढेर को साफ़ करते दिखने लगे हैं. स्वच्छता अभियान की असली सफलता इस बात पर है कि हम व्यक्तिगत रूप से इसे कितना आत्मसात कर पाते हैं.


नामधारियों के द्वारा, मंत्रियों-नेताओं के द्वारा लगातार फोटो के साथ सफाई करते हुए सामने आने ने आम आदमी को भी फोटो सहित सफाई के लिए प्रेरित कर दिया है. अब वो भी हाथों में झाड़ू लिए, लकदक, साफ़-सुथरे कपड़े पहन, चश्मा चढ़ाये सड़कों पर महज फोटो खिंचवाने की नियत से उतरता है और वापस हो लेता है. ऐसे में हमें स्वयं विचार करना होगा आखिर हम सफाई किसके लिए करना चाहते हैं? आखिर हम सफाई का नाटक किसके लिए कर रहे हैं? ऐसा भी नहीं है नरेन्द्र मोदी के इस अभियान के पूर्व सफाई का कार्य देश में नहीं होता था किन्तु जिस तरह से एक चेतना सी लोगों में दिखी है, वो पहले कभी नहीं दिखी थी. इस अभियान ने हमें न केवल अपने लिए, अपने परिवार के लिए वरन अपने आसपास के लिए, अपने मोहल्ले के लिए, अपने शहर के लिए स्वच्छता अभियान चलाने को प्रेरित किया है. ये चेतना शून्य में न बदल पाए अब प्रयास इस बात का होना चाहिए.

जरूरी नहीं कि किसी नदी के गहरे जल में उतर कर सफाई की जाए, कोई आवश्यक नहीं कि गंदगी के अम्बार को साफ़ करना ही स्वच्छता लाने का सन्देश है, झाड़ू लेकर सड़कों को साफ़ करने लगना ही सफाई-पसंद होने का प्रमाण नहीं. यदि हम लोगों को जगह-जगह थूकने, यत्र-तत्र मूत्र-विसर्जन करने, अपने घर की गंदगी को खुलेआम सड़क पर फेंकने, सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल कूड़ेदान की तरह करने आदि से ही रोक सकें तो ये भी अपने आपमें व्यापक अभियान कहलायेगा. रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों में ही यदि हम सफाई का ध्यान रखें, खाने-पीने की वस्तुओं को ढँक कर रखने का ध्यान रखें, बच्चों को सफाई से रहने की आदत डालें, उनको नियमित स्वच्छता अपनाने की सीख दें तो ये भी स्वच्छता अभियान का एक पहलू है. आइये अपने घर से ही छोटी-छोटी पहल करके देखें, बिना सेल्फी के, फोटो के चक्कर में सफाई का एक कदम उठाकर तो देखें. हमें ये हमेशा याद रखना होगा कि इस तरह के अभियान हम जनमानस के ऐसे ही छोटे-छोटे क़दमों से सफलता की मंजिल तक पहुँचते हैं, न कि नामचीन लोगों के चंद पलों की सांकेतिकता से.


स्वच्छ रहना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार भी है तो उसका कर्तव्य भी है. आखिर किसी को भी गन्दगी में रहना पसंद नहीं होगा. स्वच्छता की इसी श्रंखला में स्वच्छता सर्वेक्षण आरम्भ करके स्वच्छ नगरों का श्रेणीकरण किया जा रहा है. इससे भी आमजनमानस में अपने नगर को स्वच्छ रखने के प्रति जागरूकता दिखाई दे रही है. आशा की जा सकती है कि जल्द ही समाज से ये दिखाई देने वाली गन्दगी हम सब मिलकर दूर कर सकेंगे. इस स्वच्छता अभियान के साथ एक कदम मानसिक, वैचारिक, सांस्कृतिक गन्दगी को भी दूर करने के लिए बढ़ाना होगा.

27 जून 2013

सांस्कृतिक आतंकवाद के विरोध में एकजुट हों



आये दिन समाज में किसी न किसी बात को लेकर विरोध प्रदर्शन किये जाते दिख जाते हैं. कभी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर, कभी प्रशासन की गतिविधियों को लेकर, कभी राजनैतिक दलों को लेकर, कभी व्यापार को लेकर, कभी विरोध होता है टीवी/फिल्म आदि को लेकर और सबसे बड़ी बात कि कुछ दिन के इन प्रदर्शनों के बाद सब खामोश सा दिखाई देने लगता है. वर्तमान में जोधा-अकबर धारावाहिक को लेकर प्रदर्शन किये गए, इसकी कहानी पर विवाद का साया दिखा किन्तु न तो सरकार की तरफ से कोई ठोस कदम उठाये गए और न ही इस धारावाहिक के निर्माता/निर्देशक की तरफ से कोई सकारात्मक कार्यवाही के संकेत दिए गए. इसके अलावा कभी-कभी इक्का-दुक्का सोशल मीडिया में टीवी के कुछ अश्लील टाइप कार्यक्रमों के विरुद्ध कुछ न कुछ लिखा मिल जाता है पर वो भी अपनी अंतिम परिणति को प्राप्त नहीं हो पता है. 
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वर्तमान में किसी भी काम के पीछे सकारात्मकता कम और नकारात्मकता अधिक दिखाई देने लगी है. किसी एक वर्ग द्वारा किसी गलत बात का विरोध करने पर उसके प्रत्युत्तर में कोई दूसरा वर्ग खड़ा हो जाता है. आपसी विरोध की यही मानसिकता उन तत्त्वों को हावी होने देती हैं जो कहीं न कहीं समाज में विखंडन की स्थिति को मजबूत करना चाहती हैं. आजकल बहुत आसानी से देखने को मिलता है कि टीवी के ज्यादातर कार्यक्रमों में, विज्ञापनों में अश्लीलता हावी होती जा रही है. बच्चों को भी इसमें किसी न किसी रूप में शामिल कर लिया गया है. उनके द्वारा अश्लील हाव-भाव के साथ नृत्य-गायन के कार्यक्रमों को संचालित किया जा रहा है. बच्चे ऐसे-ऐसे गीतों पर नृत्य कर रहे हैं, अश्लील भाव-भंगिमाओं के साथ स्टेज पर आ रहे हैं जिनका अर्थ उन्हें स्वयं ही नहीं मालूम होगा.
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दरअसल तमाम सारी विकृतियों के साथ-साथ सांस्कृतिक आतंकवाद नाम की विकृति हमारे घरों में उतर आई है. ये बुराई, ये विकृति अब खुलेआम हमें हमारे घर में पल्लवित-पुष्पित होते दिखती है और इसका विरोध करने वाले को संकुचित मानसिकता वाला बताया जाता है. संस्कृति को अश्लीलता के द्वारा आसानी से समाप्त करने का कुचक्र रचा जा रहा है. इसके पीछे शामिल लोगों का मंतव्य केवल धन कमाना है. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि युवा पीढ़ी क्या सीख रही है, बच्चे किस बात का अनुसरण कर रहे हैं. आज जिस तरह से बच्चों का समय से पहले युवावस्था में पहुंचना हो रहा है वो परिवार के लिए, समाज के लिए घातक है. समय रहते हम सभी को इस सांस्कृतिक आतंकवाद को पहचान कर उसको मिटाना होगा. अपने लिए न सही, कम से कम अपने बच्चों के लिए अश्लीलता के विरोध में एकजुट होकर खड़ा होने की जरूरत है. 
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