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06 जून 2025

दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल

1315 मीटर लम्बे और एफिल टावर से भी ऊँचे पुल का उद्घाटन 06 जून 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया. जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बना यह पुल दुनिया का सबसे ऊँचा पुल है. यह उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. चिनाब रेल सेतु इस्पात और कंक्रीट का मेहराबदार पुल है जो जम्मू-कश्मीर के जम्मू मंडल के रियासी जिले में बक्कल और कौरी के बीच स्थित है. नदी तल से इस पुल की ऊँचाई 359 मीटर (1178 फीट) है.

 

चिनाब सेतु भूकंपीय क्षेत्र पाँच में स्थित है. यह दो पहाड़ों के बीच बना है, जहाँ तेज हवाओं की वजह से विंड टनल फिनोमेना देखा जाता है. इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए पुल को इस तरह से बनाया गया का, इस तरह से इसका डिजाइन तैयार किया गया है कि यह 260 किलोमीटर प्रति घंटा की हवा की गति का भी सामना आसानी से कर सकता है. जिसे इस तरह से बनाया गया है कि यह भूकंप और तेज हवाओं को भी झेल सकता है. 

 





23 अप्रैल 2025

हिन्दुओं के विरुद्ध सुनियोजित साजिश

पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा उठाये गए नृशंस कदम को प्रथम दृष्टया भले ही आतंकी हमला कहा जाये, भले ही इसे पर्यटकों पर हमला कहा जाये मगर आतंकियों द्वारा जिस तरह से कलमा पढ़वा कर, खतना देख कर, मजहबी पहचान करने के बाद हत्याएँ की हैं वो अलग कहानी कह रहा है. हमले से स्पष्ट है कि आतंकियों का उद्देश्य पर्यटकों को मारना नहीं था, पहलगाम में दहशत फैलाना नहीं था बल्कि उनका उद्देश्य सिर्फ हिन्दुओं की हत्या करना था. इस हमले को पुलवामा आतंकी हमले के बाद बड़ा हमला बताकर पहलगाम की घटना के सन्दर्भों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है.

 

पहलगाम की इस घटना के सन्दर्भ तलाशने के लिए कुछ वर्ष पूर्व की स्थितियों का आकलन किया जाना भी आवश्यक है. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार के ठोस और दृढ़ निर्णयों के बाद से भारतीय सेना ने, यहाँ के वीर जवानों ने अपने पूरे पराक्रम, पूरे साहस के साथ पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की, आतंकवादियों की कमर तोड़ी है, वह अपने आपमें बेमिसाल है. इसके साथ ही अगस्त 2019 में केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था. इसको समाप्त करने के साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करके दोनों को केन्द्रशासित राज्य घोषित कर दिया था. अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में आतंकी घटनाओं में कमी देखने को मिली. यहाँ के सामान्य नागरिकों, विशेष रूप से हिन्दुओं ने सहजता का अनुभव किया. विगत के कुछ वर्षों में हिन्दू जनसंख्या द्वारा हर्षोल्लास के साथ अपने पर्व-त्योहारों का मनाया जाना आरम्भ हो गया. किसी समय मौत की कहानी कहते, सन्नाटों में रहने वाले लाल चौक ने भी शान से भारतीय तिरंगे को लहराते हुए देखा. यदि ऐसी अनेकानेक घटनाओं का सार निकाला जाये, उनका आकलन करके निष्कर्ष निकाला जाये तो कहीं न कहीं एहसास होगा कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जहाँ जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल होने लगी थी, वहीं हिन्दुओं में भी सुरक्षा का भाव आने लगा था.

 



जम्मू-कश्मीर की ऐसी स्थिति कम से कम उनके लिए असुविधाजनक तो है ही जो यहाँ पर आतंकवाद को फलते-फूलते देखना चाहते हैं. जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं की सहजता उन कट्टर ताकतों के लिए असहज हो गई होगी जिनके हाथ कश्मीरी हिन्दुओं के खून से रँगे हैं. यहाँ की शांति पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के पैरोकारों के लिए, उनके कट्टरपंथी आकाओं के लिए भी चुभने वाली रही होगी. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार की रणनीति जम्मू-कश्मीर क्षेत्र को लेकर स्पष्ट रही है, जिस तरह से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर, बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को लेकर भारतीय कूटनीतिज्ञ कदम सामने आते रहते हैं, उससे भी इस क्षेत्र के और सीमा-पार के आतंकवादियों में निश्चित रूप से बेचैनी रही होगी. ऐसी स्थितियों के बीच में जहाँ जम्मू-कश्मीर लगातार शांति, सुरक्षा की राह पर बढ़ता दिख रहा है वहीं पाकिस्तान की हालत लगातार अस्थिर होती जा रही है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि पाकिस्तान की, वहाँ की सरकार की अस्थिरता को रोकने का एकमात्र कदम भारत-विरोध, हिन्दू-विरोध रहा है. यह आज से नहीं बल्कि पाकिस्तान के निर्माण से ही उनका प्रमुख हथियार बना हुआ है. इस हथियार का प्रयोग पिछले सप्ताह इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने किया था. पाकिस्तानी सेना प्रमुख द्वारा उस कार्यक्रम में बयान अनायास ही नहीं दिए गए हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की उपस्थिति में पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कश्मीर को पाकिस्तान की गर्दन की नस बताया. इसके साथ-साथ उन्होंने परम्पराओं, रीति-रिवाजों, धर्म आदि को अलग-अलग मानते हुए हिन्दू-मुसलमानों को भी अलग बताया. सीमा-पार से आये इस तरह के अलगाववादी बयानों के बाद धार्मिक पहचान के आधार पर किये जाने वाला हमला न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि चिंताजनक है.

 

इधर जाँच में सामने आया है कि आतंकियों ने इस हमले की पूरी रणनीति पहले से तैयार कर रखी थी. पहलगाम पर्यटन स्थल को चुनने के पीछे उनका उद्देश्य गैर-कश्मीरियों को निशाना बनाना था. इसमें भी उनके निशाने पर हिन्दू नागरिक ही थे. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में अशांति, आतंकवाद चाहने वालों का उद्देश्य यह दिखाना है कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद भी स्थितियाँ सुधरी नहीं हैं. यहाँ पर हिन्दू अभी भी असुरक्षित है. अब जबकि इस जघन्य और सुनियोजित इस्लामिक आतंकी हत्याकांड के बाद सेना सर्च ऑपरेशन चला रही है तो निश्चित रूप से इस घटना के साजिशकर्ता भी बेनकाब होंगे किन्तु केन्द्र सरकार को और अधिक कठोरता से, दृढ़ता से सैन्य कार्यवाही के लिए भारतीय सेना को अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने होंगे. कठोर सैन्य कार्यवाई के द्वारा आतंकवादियों के, कट्टरपंथियों के आकाओं को, सीमा-पार पाकिस्तानी आतंकवाद को नेस्तनाबूद करना चाहिए. जम्मू-कश्मीर से विस्थापित हो चुके हिन्दुओं के मन में यह विश्वास जगाना होगा कि वे अब पूरी सुरक्षा, सहजता के साथ वापस लौट सकते हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह सन्देश देना होगा कि जम्मू-कश्मीर यहाँ के नागरिकों के लिए, पर्यटकों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है.


09 अक्टूबर 2024

चुनाव परिणाम भाजपा के लिए संजीवनी

अबकी बार चार सौ पार जैसा जबरदस्त नारा उछलने के बाद भी लोकसभा चुनावों में आशातीत सफलता न मिल पाने के बाद गैर-भाजपाई दलों द्वारा नए तरह के दुष्प्रचार राजनैतिक गलियारों में उछालने शुरू कर दिए थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली, भाजपा की डबल इंजन सरकार की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उठाते हुए विपक्षी दलों के उभरते गठबंधन और मुहब्बत की दुकान ने आने वाला समय अपना बताया. इस तरह की वैचारिकी को, विपक्षी दलों द्वारा फैलाये जा रहे दुष्प्रचार को उस समय और बल मिला जबकि चुनाव सर्वेक्षणों ने हरियाणा में गठबंधन को जबरदस्त सफल होते दिखाया. इसके उलट चुनाव परिणामों ने अलग कहानी लिख दी. 

 

हरियाणा विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने लगभग 40 प्रतिशत मतों के साथ 48 सीटों को भाजपा के पक्ष में देकर विपक्षी दलों द्वारा चलाये जा रहे अनेकानेक दावों, बयानों को गलत साबित कर दिया. पिछले विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने लगभग 37 प्रतिशत मतदान भाजपा के पक्ष में करते हुए 40 सीटों पर विजय दिलवाई थी. अबकी सीटों की संख्या और मतदान प्रतिशत दोनों में वृद्धि करते हुए हरियाणा के मतदाताओं ने भाजपा के विरुद्ध चलाये जा रहे तमाम दुष्प्रचार खारिज कर दिए. भाजपा की इस विजय से निश्चित ही विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस को जबरदस्त निराशा हुई होगी क्योंकि जिस तरह से हरियाणा में भाजपा विरोधी माहौल बनाया गया था, चुनाव सर्वेक्षणों में उसे एक पायदान नीचे दिखाया गया था उसके बाद कांग्रेस खुद को सत्तासीन समझ चुकी थी. यहाँ की जनता ने किसान विरोधी, पहलवान विरोधी, सेना विरोधी, सरकार विरोधी तमाम स्थितियों को आइना दिखा दिया. भाजपा की जीत ने अग्निवीर योजना पर मतदाताओं की मुहर लगाई, साथ ही यह भी साबित कर दिया कि महिला पहलवानों और किसानों का मुद्दा विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था.

 



भाजपा ने हरियाणा में आरम्भ से ही अपना ध्यान राज्य के ओबीसी मतदाताओं पर लगाया जो हरियाणा की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हैं. यहाँ की राजनीति में मुख्य रूप से जाट समुदाय का प्रभुत्व बना हुआ है जो राज्य की कुल जनसंख्या का 25 प्रतिशत हैं. कांग्रेस सहित अन्य दलों का ध्यान जहाँ जाट मतदाताओं पर रहा वहीं भाजपा ने गैर-जाट मतदाताओं को आकर्षित कर अपनी जीत सुनिश्चित की. इसके अलावा भाजपा ने गाँवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दलित परिवारों तक पहुँच बनाई, जिसमें लखपति ड्रोन दीदी अभियान ने मुख्य भूमिका निभाई.

 

हरियाणा का चुनाव वहाँ की राजनैतिक स्थितियों के कारण चर्चा में रहा तो जम्मू-कश्मीर का चुनाव इसलिए राष्ट्रव्यापी विमर्श का हिस्सा बना क्योंकि धारा 370 हटाये जाने, केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद वहाँ यह पहला चुनाव था. इस चुनाव को लोकतान्त्रिक प्रणाली की परीक्षा भी माना जा रहा था. राज्य का इतिहास रहा है कि जहाँ पर आतंकवादियों और अलगाववादियों के भय के साए में चुनाव सपन्न हुआ करते थे, वहाँ भाजपानीत केन्द्र सरकार द्वारा लोकतंत्र की बहाली का रास्ता बनाते हुए 2019, 2020 एवं 2021 में क्रमशः ब्लॉक विकास परिषद् (बीडीसी), जिला विकास परिषद्  (डीडीसी) एवं पंचों-सरपंचों के चुनाव सहजता, शांतिपूर्वक करवा दिए. केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद हुए परिसीमन में जम्मू संभाग में 43 और कश्मीर संभाग में 47 सीटों का आवंटन किया गया. जम्मू-कश्मीर के चुनावों में देखा जाये तो यहाँ राष्ट्रीयता के स्थान पर क्षेत्रीयता और जनजातीय अस्मिता को महत्त्व दिया गया. राज्य में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन का पूरा जोर धारा 370 की वापसी, राज्य का दर्ज़ा बहाल करने, भू-स्वामित्व को सीमित करना आदि पर रहा. इसके माध्यम से गठबंधन राज्य के नागरिकों को लुभाने में सफल भी रहा. परिणामस्वरूप नेशनल कांफ्रेंस को 45 सीटों पर विजय प्राप्त हुई जबकि कांग्रेस को मात्र 06 सीटों से संतोष करना पड़ा.

 

भाजपा की दृष्टि से यह चुनाव कुछ लाभकारी कहा जा सकता है. पिछले चुनाव की 25 सीटों के मुकाबले इस बार उसे 29 सीटों पर विजय प्राप्त हुई. राज्य में कश्मीर मुस्लिम बहुल है जहाँ भाजपा की पैठ न के बराबर है. जम्मू में जहाँ हिन्दू जनसंख्या अपना प्रभाव रखती है वहाँ भाजपा के प्रदर्शन को संतोषजनक कहा जा सकता है. मतदाताओं के बीच भाजपा ने लोकतंत्र की स्थापना, क्षेत्रीय विकास, आतंकवाद-अलगाववाद को समाप्त करने आदि मुद्दों को पहुँचाने की कोशिश की लेकिन राज्य में उसके लिए बहुत अधिक राजनैतिक संभावनाओं के न होने के बाद भी 2014 की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन निश्चित ही भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं के लिए संजीवनी का काम करेगा. राज्य के चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि यहाँ नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनेगी किन्तु अबकी शासन, सरकार का स्वरूप पहले वाले जम्मू-कश्मीर जैसा नहीं होगा. केन्द्रशासित राज्य होने के कारण वर्तमान में उपराज्यपाल की शक्तियाँ अपना कार्य करेंगी, इस कारण अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए मुख्यमंत्री को उपराज्यपाल की अनुमति, सहमति की आवश्यकता होगी.

 

बहरहाल हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को उस क्षेत्र विशेष के सन्दर्भ में, वहाँ की राजनैतिक, नागरिक स्थितियों के सन्दर्भ में देखने की आवश्यकता है. केन्द्र की भाजपानीत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा-मुक्त, शांतिपूर्वक चुनाव करवाकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना का आधार निर्मित किया है वहीं हरियाणा में भाजपा द्वारा लगातार तीसरी जीत ने बहुत सारे दुष्प्रचारों को खारिज किया है. इस जीत से निश्चित ही चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा, उसके सहयोगी दलों और कार्यकर्ताओं में उत्साह, ऊर्जा का संचार होगा.

11 दिसंबर 2023

देश का अभिन्न अंग है जम्मू-कश्मीर

अनुच्छेद 370 को हटाने के सम्बन्ध में पाँच अगस्त 2019 की तरह ही 11 दिसम्बर 2023 का दिन ऐतिहासिक माना जायेगा. चार वर्ष पूर्व पाँच अगस्त को केन्द्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 और 35-ए को हटाने का साहसिक निर्णय लिया गया था. देश में एक विभाजक रेखा खींचने वाले अनुच्छेद के हटाये जाने के बाद भी उसकी बहाली को लेकर दिवास्वप्न देख रहे तमाम नेताओं द्वारा जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को लगातार बरगलाया जा रहा था. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णय के द्वारा ऐसी विभाजनकारी मानसिकता रखने वालों को आइना दिखाया गया है. इस निर्णय से सम्पूर्ण घाटी में और वहाँ के लोगों को झूठी तसल्ली देने वाले नेताओं तक स्पष्ट सन्देश पहुँच गया है कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था, जिसे हटाने का निर्णय विधिसम्मत था. पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की. सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. इसकी कोई आंतरिक सम्प्रभुता नहीं है. 




सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से देश की अखंडता, सम्प्रभुता को वास्तविक आयाम मिला है. इससे विरोधियों द्वारा समाज में फैलाया जा रहा यह दुष्प्रचार गलत साबित हुआ कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने का निर्णय विघटनकारी है. इस निर्णय ने विगत सत्तर वर्षों के एक ऐसे काँटे को सदा के लिए देश की देह से अलग कर दिया है जो सम्पूर्ण देश के लिए नासूर बना हुआ था. देश की आज़ादी के समय काल-परिस्थितियों के वशीभूत कुछ इस तरह का घटनाक्रम सामने आया कि राष्ट्रीय हितों को दरकिनार करके तुष्टिकरण को प्राथमिकता दी गई. तत्कालीन परिस्थितियों के हाथों में यदि मजबूरीवश अनुच्छेद 370 को लागू करना भी पड़ा था तो भी यदि उस अस्थायी प्रावधान को समय रहते समाप्त कर दिया जाता तो अपने स्वर्गिक सौन्दर्य के लिए विख्यात जम्म-कश्मीर को नारकीय यातनाओं को न सहना पड़ता.


अनुच्छेद 370 के द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार प्रदान किये गए थे. यह भारतीय संविधान का एक अस्थायी प्रावधान है. इस अस्थायी प्रावधान के द्वारा ऐसी व्यवस्था की गई थी कि जम्मू-कश्मीर में केन्द्र सरकार को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के क्षेत्र में कानून बनाने का अधिकार होगा. इसके अलावा किसी अन्य क्षेत्र, किसी अन्य विषय के बारे में कानून बनाने के बाद वह जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण देश पर लागू होता था. उस कानून को जम्मू–कश्मीर में लागू करने के लिए केन्द्र सरकार को जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार से अनुमोदन लेना पड़ता था. इसी तरह यहाँ के निवासियों को दोहरी नागरिकता (भारतीय एवं कश्मीरी) भी प्राप्त थी. यहाँ की महिला से विवाह करने वाला पाकिस्तानी नागरिक यदि कश्मीर में आकर रहने लगता है तो उसको स्वतः ही भारत की नागरिकता मिल जाती है. जम्मू-कश्मीर का अपना राष्ट्रीय ध्वज होता था और तो और यहाँ का मुख्यमंत्री वही नागरिक बन सकता था जो यहाँ का मूल निवासी होता था. ये स्थितियाँ एक देश में ही दो देश होने जैसी स्थिति का आभास कराती रही हैं. अनुच्छेद 370 की तरह 35ए के द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त था. इसके द्वारा यहाँ के नागरिकों को कुछ विशेष अधिकार प्रदान किये गए थे. इसे 1954 में पारित किया गया था.


जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान होने के कारण अभी तक एक देश में दो संविधान चलते आये हैं. अनुच्छेद 370 और 35ए के समाप्त किये जाने के बाद जम्मू-कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग बना. इसके बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग राज्यों के रूप में मान्यता प्रदान की गई. निश्चित ही इससे यहाँ निवेश के रास्ते खुले और यहाँ के युवकों को भी रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए. केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार अभी तक जम्मू-कश्मीर के बाहर के 34 लोगों ने केन्द्रशासित प्रदेश में सम्पत्ति खरीदी है. वहीं जम्मू-कश्मीर में सऊदी अरब की तीन कम्पनियाँ भारी निवेश कर रही हैं. इसके अलावा वहाँ 890 केन्द्रीय कानूनों को लागू किया गया है. इससे वहाँ की कानून व्यवस्था और कई नियम देश के अन्य राज्यों की तरह हो गए हैं. केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को केन्द्रशासित राज्य का दर्जा दिए जाने के बाद यहाँ पर विकास के लिए अनेक योजनाओं को लागू किया. सरकार की ओर से बजट आवंटन में यहाँ का विशेष ध्यान रखा गया है. लगभग 28400 करोड़ रुपये औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए बजट में उपलब्ध कराये गये. इसके साथ ही 2020-21 में उद्योगों के लिए 29030 हजार कैनाल लैंड बैंक बनाए गए हैं. अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद सरकार के द्वारा जम्मू-कश्मीर में ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट भी करवाई गई थी. इसमें 13,732 करोड़ रुपये के एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे.


ये स्थितियाँ निश्चित ही अब और तेजी से विकास की राह पकड़ेंगी जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए वर्ष 2024 में जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाने और जल्द से जल्द इसे स्वतंत्र राज्य घोषित करने का निर्देश दिया है. निश्चित ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने एक भारत, श्रेष्ठ भारत की अवधारणा को मजबूत ही किया है. देखा जाए तो सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने एक पुराने और जटिल विवाद को सुलझाने का मार्ग प्रशस्त किया है. अब जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को समग्र देश के साथ आगे बढ़ने को एक मजबूत रास्ता मिला है. उम्मीद यही की जा सकती है कि अब पूर्वाग्रह, विवाद को त्यागते हुए सभी पक्ष राज्य को शांतिपरक, सर्वश्रेष्ठ बनाने की दिशा में अपना पूरा योगदान देंगे. 



 

20 सितंबर 2023

लम्बी ऐतिहासिक यात्रा पर विराम

18 सितम्बर को भारतीय संसद के लिए एक ऐतिहासिक तिथि के रूप में याद रखा जायेगा. जिस संसद भवन ने अपनी 96 वर्षों की यात्रा में बहुत से ऐतिहासिक निर्णय होते देखे, बहुत से क्रांतिकारी परिवर्तन देखे, अनेक अप्रत्याशित घटनाक्रमों की गवाही दी, उसकी वह यात्रा इस दिन थम गई. 18 जनवरी 1927 से चली आ रही अनथक यात्रा को 18 सितंबर 2023 को विश्राम देकर नए संसद भवन को आने वाले समय के लिए तैयार कर लिया गया है. 


वर्ष 1911 में ब्रिटेन के तत्कालीन राजा जॉर्ज पंचम और महारानी ने भारत आने पर देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली बनाए जाने की घोषणा की. इसके बाद वहाँ संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, राजपथ, इंडिया गेट सहित अन्य हेरिटेज इमारतों को बनाने की जिम्मेदारी दो आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को दी गई. 1921 में संसद को बनाने का काम शुरू हुआ और 1927 में यह भवन बनकर तैयार हुआ. छह एकड़ में बने इस भवन को शुरुआत में काउंसिल हाउस के नाम से जाना जाता था. 1926 से 1931 तक भारत के वायसराय रहे लॉर्ड इरविन द्वारा इसका उद्घाटन 18 जनवरी 1927 को किया गया. बाद में वर्ष 1956 में इसमें दो फ्लोर और वर्ष 2006 में एक संग्रहालय भी बनाया गया. यह संग्रहालय ढाई सौ सालों की समृद्ध लोकतांत्रिक विरासत को दिखाता है. 




18 सितम्बर से 22 सितम्बर 2023 तक चलने वाले विशेष सत्र के पहले दिन पुरानी संसद भवन की लम्बी यात्रा को याद किया गया. पाँच दिनों तक चलने वाले विशेष सत्र के दूसरे दिन की कार्यवाही के नए भवन में आरम्भ होते ही वो पुराना संसद भवन इतिहास बन जायेगा, जो 96 वर्षों की अवधि में घटित कई घटनाओं का गवाह रहा. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की कार्यप्रणाली जिस संविधान के प्रावधानों द्वारा संचालित होती है, उस संविधान का निर्माण इसी संसद भवन में हुआ था. 26 जनवरी 1950 में जब देश का संविधान लागू हुआ और राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने तो उस ऐतिहासिक पल का साक्षी ये पुराना संसद भवन बना था. देश के संविधान को लागू किये जाने के बाद संसद भवन ने 18 जून 1951 को हुए पहले संवैधानिक संशोधन को भी देखा. इसमें धारा 15, 19, 85, 87, 174, 176, 341, 342, 372 और 376 को संशोधित किया गया. अपनी इस यात्रा में संसद भवन ने कुल 105 संवैधानिक संशोधनों को होते देखा.


संसद भवन ने जहाँ सुखद पलों को अपने में सहेज रखा है वहीं उसके पहलू में दुखद घटनाओं ने भी जगह ले रखी है. 25 जून 1975 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के द्वारा आपातकाल की घोषणा किये जाने का निर्णय हो या फिर 1996 से 1998 की दो वर्षीय अवधि में चार प्रधानमंत्रियों का आना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह है. संवैधानिक व्यवस्था के इस बुरे दौर से गुजरते हुए संसद भवन ने अपनी सुरक्षा, अपनी आन-बान-शान पर हमला होने का दर्द भी सहा है. देश की सुरक्षा व्यवस्था पर उस समय सवाल उठे जबकि संसद भवन को ही आतंकियों ने अपना निशाना बनाया. 13 दिसम्बर 2001 को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने लोकतंत्र के इस मंदिर पर हमला कर दिया. इस हमले में सुरक्षा कर्मियों और दिल्ली पुलिस के जवानों सहित कुल नौ लोग शहीद हुए. यद्यपि हमले को अंजाम देने आये सभी पाँचों आतंकवादियों को सुरक्षाबलों ने मौके पर ही मार गिराया तथापि इस हमले ने एक गहरा जख्म तो दे ही दिया.


आतंकी हमले की टीस लेकर खड़े पुराने संसद भवन ने इसके अलावा बहुत सारे ऐसे ऐतिहासिक पलों को, घटनाक्रमों को घटित होते देखा है, जिनको देश की एकता, अखंडता, गौरव आदि के लिए जाना जा सकता है. किसी समय जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं ने वहाँ के जनजीवन को अस्त-व्यस्त करके रख दिया था. पाकिस्तान की तरफ से लगातार कश्मीर को कब्जाने के कुत्सित प्रयासों के चलते और संवैधानिक प्रावधानों के चलते जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न हिस्सा होने के बाद भी अलग-थलग सा दिखाई देता था. वर्तमान केन्द्र सरकार की दृढ इच्छशक्ति का सुफल भी पुराने संसद भवन ने महसूस किया जबकि 5 अगस्त 2019 को केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 पेश किया. इस अधिनियम के लागू हो जाने के बाद से  जम्मू-कश्मीर राज्य से सम्बंधित संविधान का अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी हो गया है. इसी के साथ अब देश में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केन्द्रशासित प्रदेशों की उपस्थिति भी हो गई है.




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 28 मई 2023 को नए संसद परिसर का उद्घाटन करते समय आशा व्यक्त की थी कि नया भवन सशक्तीकरण, सपनों को प्रज्वलित करने और उन्हें वास्तविकता में बदलने का उदगम स्थल बनेगा. ऐसा होना आज समय की माँग है क्योंकि विगत कुछ वर्षों से जिस तरह से पुराने संसद भवन के दोनों सदनों ने हंगामा, शोरगुल, आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाजी, सदन सञ्चालन में व्यवधान, असंवैधानिक कृत्यों को होते देखा है उससे न केवल संसद सदस्यों की साख में गिरावट आई है बल्कि संवैधानिक व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगे हैं. पुराने संसद भवन ने पाँच दिवसीय विशेष सत्र का पहला दिन अपने नाम करके नए संसद भवन को अपने उत्तराधिकारी के रूप में शेष चार दिनों को सौंप दिया है. अब नया संसद भवन देश के विकास की कहानी का साक्षी बनेगा और पुराना संसद भवन अतीत की गाथाओं को सुनाएगा. आशा है आज़ाद भारत में भारतीयों द्वारा बनाये गए इस नए ससंद भवन में हमारा लोकतंत्र अपनी श्रेष्ठता को प्राप्त करेगा. रिकॉर्ड समय में तैयार हुआ यह भवन न सिर्फ भारतीय मेधा का प्रतीक बना है बल्कि नए भारत की छवि प्रदर्शित करेगा जो अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों से आबद्ध है और उन पर गर्व करता है. नई संसद में स्थापित चोल शासकों का राजदंड सेंगोल राजशक्ति की न्याय के प्रति समर्पण का प्रतीक बनेगा और लोकतंत्र की इस कर्मभूमि को न्याय का मंदिर बनाएगा. 





 

16 अगस्त 2019

स्वतंत्रता और सुरक्षा का संयोग

स्वतंत्रता दिवस की और पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

इस वर्ष का सावन माह अपने आपमें अभूतपूर्व घटनाओं का गवाह रहा है. इस अभूतपूर्व स्थिति में इए सुखद और पावन संयोग ही कहा जायेगा कि स्वतंत्रता का महोत्सव और भाई-बहिनों के स्नेह का पर्व एक दिन ही मनाया जा रहा है. इसी को किसी न किसी रूप में हम सभी संयोग कहते हैं, सितारों की चाल कहते हैं, सौभाग्य कहते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम सावन माह की गतिविधियों को देखें तो देशहित में कई सारे निर्णय संपन्न हुए.


देश के वैज्ञानिकों की सफल यात्रा चंद्रयान के रूप में आरम्भ हुई. इस यात्रा की कमान देश की मातृशक्ति के हाथ में थी, यह भी अपने आपमें गौरवशाली क्षण था. इस अभियान के द्वारा जो कदम अन्तरिक्ष क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकता रखने जा रही है, वैसा आज तक किसी भी देश द्वारा उठाया नहीं गया है.


चंद्रयान से शुरू वैज्ञानिक सफलता यात्रा अभी आरम्भ ही  हुई थी, देशवासी अभी इस उमंग की सराबोर से उबरे भी न थे कि एक कदम सामाजिक भेदभाव दूर करने के लिए उठाया गया. तीन तलाक की समाप्ति भले ही एक समुदाय विशेष से संदर्भित हो मगर इसके समाप्त होने से देश की मातृशक्ति को समानता का अधिकार प्रदान किया गया, उनके व्यक्तित्त्व को एक इन्सान समझने की परिभाषा से अलंकृत किया गया.


इसके ठीक एक सप्ताह बाद ही एक देश, एक संविधान के विधान को स्पष्ट स्वरूप प्रदान किया गया. किसी समय राजनैतिक प्रतिस्थितियों के चलते उठाया गया कदम कालांतर में न केवल राजनैतिक विभेद का कारक बना बल्कि देश के भूभाग को भी एक तरह से अलग-थलग किये रहा. धारा 370 की समाप्ति के साथ ही दो राज्यों का निर्माण होने ने राजनैतिक सजगता की दिशा में कदम बढ़ाया तो देश को वास्तविक रूप में कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक होने का सन्देश दिया. यह भी देश की स्वतंत्रता के प्रति सार्थकता कही जा सकती है.


इन घटनाओं का होना शायद पूर्व-निर्धारित रहा होगा, शायद एक संयोग रहा होगा कि स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन एकसाथ, एक दिन मनाने का अवसर मिला. इसको एक सन्देश के रूप में देखने की आवश्यकता है. रक्षाबंधन को महज भाई-बहिन के पवित्र प्रेम के रूप में, सुरक्षा के रूप में देखने से इतर अब व्यापकता में देखने की आवश्यकता है. सरकारी स्तर पर स्वतंत्रता के सच्चे अर्थ स्पष्ट करते हुए वैज्ञानिकता को स्थापित किया, सामाजिकता को मान्यता दी और राष्ट्रीयता को एकता प्रदान की. अब हम सभी नागरिकों की जिम्मेवारी बनती है कि इस स्वतंत्रता को सुरक्षा प्रदान करें. अपने कार्यों से, अपनी जिम्मेवारियों से, अपने कर्तव्यों से देश को, समाज को, नागरिकों को सफलता की राह प्रदान करें, सुरक्षा की भावना का विकास करें, उनको आज़ादी का भान बना रहने दें.


आशा है कि हम सभी स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन के एकसाथ मनाये जाने के सन्देश को समझेंगे, इसमें अन्तर्निहित भावना को आपस में मिलकर और पुष्ट करेंगे. यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित ही हम सभी स्वतंत्रता का महोत्सव को सही आयाम प्रदान करेंगे, रक्षाबंधन की पवित्रता को अक्षुण्य रख सकेंगे. इसी पावन भावना के साथ आइये एक कदम समानता, भाईचारे, स्नेह, सुरक्षित स्वतंत्रता की ओर बढ़ाएं.

जय हिन्द

12 अगस्त 2019

तीन तलाक और धारा 370 : जिम्मेवारी के साथ सतर्कता आवश्यक


अगस्त का आरम्भ भारतीय राजनीति के लिए, समाज के लिए यादगार माना जायेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि सदन की तरफ से दो निर्णय ऐसे हुए जिनकी लम्बे समय से अपेक्षा ही नहीं थी वरन वे निर्णय देश के लिए, समाज के लिए अपरिहार्य भी थे. इन दो निर्णयों में तीन तलाक का मामला और धारा 370 का मामला रहे. दोनों निर्णयों को सदन में सत्ता पक्ष द्वारा बिना किसी हीलाहवाली के पारित करवाया गया. दोनों ही निर्णयों में सत्ता पक्ष का रवैया ठोस कार्यवाही करने जैसा रहा. उसके द्वारा जिस तरह से अपना पक्ष रखा गया, जिस तरह से इन दोनों मसलों के प्रति उसकी संवेदना साफ़ तौर पर दिखी वह प्रशंसनीय है. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि ये दोनों ही मामले सामाजिक रूप से और राजनैतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे थे. दोनों ही निर्णयों के प्रति पूर्ववर्ती सरकारों का रवैया सदैव से ढुलमुल भरा रहा है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले भाजपानीत सरकार केंद्र में नहीं थी मगर उसके द्वारा भी इस सम्बन्ध में ठोस कदम नहीं उठाया गया था. अबकी बार ऐसा साफ़-साफ़ देखने को मिला जबकि सरकार ने न केवल कठोर कदम उठाया बल्कि किसी भी तरह से विपक्ष को हावी न होने दिया.


सरकार की प्रशंसा इस रूप में भी की जानी चाहिए कि इन दोनों निर्णयों को सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के आरम्भ में ही लागू किया. ऐसा करने के पीछे उसकी मंशा साफ़ तौर पर ऐसे निर्णय लागू करने की दिखी. किसी भी तरह से उसके द्वारा इन निर्णयों का राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास नहीं दिखा. किसी भी सरकार द्वारा जब भी इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर कोई निर्णय लिया जाता है तो विपक्ष से, सरकार विरोधियों की तरफ से आरोप लगाया जाता है ऐसे मामलों के द्वारा चुनावी लाभ लेने का. यहाँ ऐसा कुछ नहीं है. इसके साथ-साथ सरकार के इन निर्णयों की प्रशंसा इस रूप में भी की जा सकती है कि इन दोनों मामलों में उसके द्वारा पर्याप्त सुरक्षात्मक कदम उठाये गए थे, जिसके चलते किसी भी तरह से उपद्रव नहीं हो सका. दोनों ही मुद्दे किसी न किसी रूप में मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए थे जिसमें तीन तलाक से ज्यादा संवेदित मामला जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाये जाने का था. इसमें जहाँ कश्मीर के अलगाववादियों का जुड़ा होना तो था ही साथ ही इस मामले में पाकिस्तान भी पर्याप्त रुचि दिखा रहा था. रुचि तो वह आज भी दिखा रहा है किन्तु उसके द्वारा कोई भी कदम सफल सिद्ध नहीं हो रहा है. 


जम्मू-कश्मीर मामले में सरकार की तारीफ इसके लिए भी करनी होगी कि उसके द्वारा इतने पुख्ता इंतजाम कर लिए गए थे कि न तो उस राज्य के अलगाववादी किसी तरह का उपद्रव कर सके, न पत्थरबाज़ अपने हाथ फैला सके और न ही पाकिस्तान कोई हिंसात्मक कदम उठा सका. इसके साथ-साथ सबसे बड़ी बात रही वैश्विक समुदाय का इस समूचे मुद्दे पर ख़ामोशी बनाये रखना. इससे स्पष्ट है कि विगत कार्यकाल में प्रधानमंत्री का वैश्विक नेताओं के साथ संबंधों का लाभ अब मिला है. ऐसे में पाकिस्तान बिलकुल अलग-थलग दिखाई देने लगा है. सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को उसके भौगौलिक हिसाब से दो राज्यों में बाँट देने का निर्णय भी सराहनीय कहा जायेगा. केंद्र शासित राज्यों की श्रेणी में आने से इन दोनों के केंद्र सरकार का नियंत्रण रहेगा और लद्दाख भी अपना पर्याप्त विकास कर सकेगा.

अब सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि उसने जिस तीव्रता के साथ, जिस कठोरता के साथ दोनों निर्णयों को लागू किया है उनको उसी जिम्मेवारी से सफलता की तरफ ले जाये. स्पष्ट है कि मुस्लिम समुदाय में जिस तरह से महिलाओं को लेकर, तीन तलाक को लेकर सोच बनी हुई है उसमें एकदम से उनके लिए स्वीकारना सहज नहीं होगा कि ये मामला अब गैर-कानूनी हो गया है. ऐसे में कानूनी रूप से प्रशासनिक रूप से सशक्त रहने की आवश्यकता है. मुस्लिम समुदाय की कमजोर तबके की महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान किये जाने की जिम्मेवारी भी अब सरकार की हो गई है. कुछ इसी तरह के एहतियात भरे कदम जम्मू-कश्मीर राज्य में उठाये जाने की आवश्यकता है. वहाँ के अलगाववादियों को, पाकिस्तान को ये कतई मंजूर नहीं होगा कि वहाँ किसी भी तरह से शांति बनी रहे. ऐसे में न केवल सेना को वरन वहाँ के नागरिकों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है. यदि शुरूआती कुछ महीनों में इन दोनों निर्णयों पर सरकार, प्रशासन गंभीरता दिखाए रहा तो निश्चित ही दोनों निर्णय भारतीय समाज, राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित होंगे.

23 जून 2018

वे अपने रंग में हैं, तुम अपने रंग संभालो


लोकसभा चुनावी वर्ष चालू है और राजनैतिक दलों की समस्त गतिविधियाँ अब चुनावी मंशा से संपन्न होंगी. सत्ताधारी दल का प्रयास है कि वह अपनी स्थिति को मजबूत बनाये रहे वहीं विपक्षी इस प्रयास में हैं कि कैसे भी सत्ताधारी दल को हटाया जाये. विपक्षियों का प्रयास सत्ताधारी दल से अधिक जोर मोदी को हटाने को लेकर है और इसके लिए हर तरीके से कार्य, प्रयास उनकी तरफ से किये जाने लगे हैं. गठबंधन, महागठबंधन की रणनीति के साथ-साथ आतंकियों के समर्थन की, मुस्लिम तुष्टिकरण की, गैर-हिन्दू वर्ग, विशेष रूप से मुस्लिमों से सम्बंधित खबरों को अनावश्यक तूल देने के कार्य अभी से किये जाने लगे हैं. कुछ पुराने मुद्दों को उछाला जाने लगा है. धनबल से, बाहुबल से, जुबानीबल से जनता के बीच भ्रम का माहौल पैदा किया जाने लगा है. इस भ्रम के माहौल से ज्यादा विपक्षियों द्वारा नफरत का, हिंसा का, विद्वेष का, भेदभाव का माहौल बनाया जा रहा है. कुछ हालिया घटनाओं को इस सन्दर्भ में देखा-समझा जा सकता है.


जम्मू-कश्मीर से भाजपा द्वारा समर्थन वापस लिया जाना न केवल वहां के राजनैतिक दलों को अचंभित कर गया बल्कि शेष राजनैतिक दलों में भी खलबली मचा गया. केन्द्र सरकार द्वारा जिस तरह से विगत रमजान माह में आतंकियों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही को रोके रखा गया उसका कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया. आतंकियों द्वारा, पाकिस्तान द्वारा इसका खूनी लाभ लिया गया और इसका खामियाजा हमारी सेना को उठाना पड़ा. हमारे कई जवान सरकारों की जबरिया पाकसाफ दिखने की चाह में शहीद हो गए. ऐसे में देश भर में भाजपा के खिलाफ, केन्द्र सरकार के खिलाफ माहौल बनता जा रहा था. जो लोग भी देश के साथ खड़े दिख रहे थे, जो लोग भी सेना के साथ खड़े दिख रहे थे उनके द्वारा पुरजोर आवाज़ उठाई गई कि आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाये, पाकिस्तान के खिलाफ कार्यवाही की जाये. ऐसी विषम स्थिति के बाद भाजपा का जम्मू-कश्मीर की सरकार में बने रहना उसकी बेशर्मी को ही दर्शाता. केन्द्र सरकार और भाजपा का थिंक टैंक इस बात को समझता है कि चुनावी वर्ष में उसके द्वारा बेशर्मी का नुकसान सिर्फ और सिर्फ उसे ही उठाना होगा क्योंकि विपक्षी दल इसी का लाभ लेकर जनता के बीच नकारात्मकता का प्रचार करने लग जायेंगे. जम्मू-कश्मीर में समर्थन वापसी ने उन दलों में भी बौखलाहट भी पैदा की, जो किसी न किसी रूप में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए आतंकियों का, धारा 370 का, पाकिस्तान का समर्थन करते रहते हैं. खुद महबूबा ने वहां के वोट-बैंक को अपने पक्ष में बनाये रखने के सन्दर्भ में बयान दिया कि केंद्र सरकार द्वारा, भाजपा द्वारा धारा 370 हटाये जाने का उन्होंने विरोध किया. कश्मीर के पत्थरबाजों को उनके प्रयासों से ही सजा नहीं हो पाई. इसी तरह एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ द्वारा बयान दिया जा रहा कि सेना द्वारा निर्दोष लोगों को मारा जा रहा है. विद्रूपता देखिये कि उस बयान के समर्थन में, देश की सबसे पुरानी पार्टी के बयान के समर्थन में एक आतंकी संगठन ने अपनी सहमति व्यक्त की है. इससे बड़ी विडम्बना यह कि उस दल द्वारा अथवा किसी राजनैतिक दल द्वारा आतंकी संगठन के उस समर्थन के विरोध में कोई बयान ज़ारी नहीं किया गया.

ये एकमात्र स्थितियाँ नहीं हैं जो दर्शा रही हैं कि चुनावी वर्ष में गैर-भाजपाई दल अनावश्यक बयानों को जारी करेंगे. उनके द्वारा भाजपा का विरोध कब देश का, सेना का विरोध बन गया, खुद उनको भी नहीं पता. इस तरह की स्थिति को मीडिया द्वारा भी बखूबी हवा दी जाती है. मीडिया को सिर्फ और सिर्फ अपनी टीआरपी से मतलब नहीं होता है वरन उसे मतलब है भाजपा-विरोधी हवा से, उसे मतलब है मोदी-विरोधी लहर से, उसे मतलब है हिन्दू-विरोधी खबरों से. ऐसे में केन्द्र सरकार के मंत्रियों को और ज्यादा सजग रहने की, सतर्क रहने की, संयमित रहने की आवश्यकता है. विपक्षियों द्वारा, मीडिया द्वारा मुद्दे न केवल जन्मे जायेंगे बल्कि पुराने मुद्दों को भी उखाड़ा जायेगा. केन्द्र सरकार को, भाजपा को, उसके संगठन को, पदाधिकारियों को उलझाने के प्रयास भी किये जायेंगे. ऐसे में आवश्यक है कि बजाय भटकने के, स्पष्टीकरण देने के जनता से मिलते-मिलाते रहने का काम किया जाता रहे. बजाय विरोधियों को अनावश्यक जवाब देने में उलझने के जनता के बीच जाकर उनके भ्रम को, उनके सवालों को, उनकी समस्याओं को दूर किया जाये. हाल ही में उत्पन्न मुस्लिम दंपत्ति पासपोर्ट काण्ड को इसी सन्दर्भ में देखे जाने की आवश्यकता है. सम्बंधित महिला द्वारा और मीडिया द्वारा जबरिया मुस्लिम कार्ड बनाकर उछाले गए इस प्रकरण से महज एक दिन में पासपोर्ट बनाकर दिया गया, वो भी बिना किसी दस्तावेजी प्रक्रिया को पूर्ण किये बिना. केंद्र सरकार के मंत्रियों को यही समझने की जरूरत है. जल्दबाजी में, तुष्टिकरण में, खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के चक्कर में ऐसे कदम भविष्य में विरोधियों को एक तरह का हथियार उपलब्ध करवाएंगे जो भाजपा के, उनके मंत्रियों के खिलाफ ही जायेगा. यदि केंद्र सरकार के लिए वाकई देशहित सर्वोपरि है तो उनके मंत्रियों को जमीन पर उतर कर कार्य करने की जरूरत है. जनता से संवाद बनाने की जरूरत है. अपनी अतिशय जल्दबाजी पर नियंत्रण लगाने की जरूरत है. खुद को संयमित रखने की जरूरत है. उनका एक गलत कदम देश को फिर उसी स्थिति में लाकर खड़ा कर देगा, जहाँ से बाहर निकालने का प्रयास केन्द्र सरकार द्वारा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया जा रहा है.

11 जुलाई 2017

धर्म-विहीन आतंकवाद का अमरनाथ यात्रा बस पर हमला

गंगा-जमुनी संस्कृति की दुहाई के बीच, किसी के बाप का नहीं है हिंदुस्तान की मंचीय चिंघाड़ के बीच, सहिष्णुता-असहिष्णुता की नौटंकी के बीच आतंकियों ने अपना काम करके दिखा दिया. इस बार अमरनाथ यात्रा पर संकट के बादल पहले से ही मंडरा रहे थे. सुरक्षा एजेंसियों ने भी खतरे को देखते हुए हमले की आशंका व्यक्त की थी. ये हमला आतंकियों ने किया जबकि इससे कुछ समय पूर्व अमरनाथ यात्रा काफिले पर पत्थरबाजी की गई थी. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में चरमपंथी, अलगाववादी नहीं चाहते हैं कि अमरनाथ यात्रा सुचारू रूप से चले. इस हमले के सन्दर्भ में एक विशेष बात गौर करने लायक है कि आतंकियों ने हमले के लिए अनंतनाग को चुना. ये वही अनंतनाग है जहाँ लोकसभा उपचुनाव को अलगाववादियों की चुनाव बहिष्कार करने की धमकी के चलते रद्द करना पड़ा. अनंतनाग के पूर्व श्रीनगर में हुए लोकसभा उपचुनाव में सात प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ था. कुछ जगहों पर पुनर्मतदान कराया गया जो मात्र दो प्रतिशत के आसपास रहा. इससे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अलगाववादियों की हनक का पता चलता है.


देश में लोकसभा चुनाव से पूर्व ही तमाम राजनैतिक दलों द्वारा जिस तरह से भाजपा और मोदी के खिलाफ हवा बनाई गई, जिस तरह से मुस्लिमों के मन में नफरत भरी गई वो तबसे और चरम पर है जबसे भाजपा केंद्र में सत्ता में आई है. नफरत का आलम ये है कि देश के उच्च शैक्षणिक संस्थान में आतंकी के समर्थन में नारेबाजी की जाती है. ये नफरत की स्थिति उस समय और भी चरम रूप में दिखी जबकि जम्मू-कश्मीर में भाजपा गठबंधन सरकार में शामिल हुई. पाकिस्तान की तरफ से मिलती आतंकी शह का दुष्परिणाम ये हुआ कि वहाँ अलगाववादियों ने अपनी दुर्दांत हरकतों को और तेजी से करना आरम्भ कर दिया. जम्मू-कश्मीर में आतंकी के जनाजे में हजारों की भीड़ इकठ्ठा होती है वहीं दूसरी तरफ सेना के ऊपर पत्थरबाजी की जाती है. वहाँ देश का राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाता है, पाकिस्तानी झंडा लहराया जाता है, सैनिकों का अपमान किया जाता है. ये कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं की निरंतरता के बाद भी उन पर सख्ती बरतने के किसी भी प्रयास को न केवल राज्य सरकार द्वारा वरन अदालत द्वारा भी रोका गया. सेना को सैनिकों को परेशान करने वालों को भटका हुआ बताकर कहीं न कहीं अलगाववादियों को चरमपंथियों को ही संरक्षण दिया गया. इसी का दुष्परिणाम है कि सरकार के चाहने के बाद भी राज्य में शांति का माहौल नहीं है.


अमरनाथ यात्रा की बस पर हालिया आतंकी हमला विशुद्ध रूप से उस खिसियाहट के नतीजा है जो जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता, चरमपंथी नेता, पाकिस्तान समर्थित आतंकी आये दिन दर्शाते हैं. ये हमला यात्रियों को डराने की दृष्टि से नहीं वरन सरकार को सीधे-सीधे ये सन्देश देने के लिए किया गया है कि वे किसी भी तरह से सरकारी तंत्र से डरते नहीं हैं. आतंकियों ने स्पष्ट रूप से सन्देश दिया है कि तमाम सरकारी सुरक्षा व्यवस्था के बाद भी वे हमला करने में, मासूम, निर्दोष यात्रियों को मारने में सफल रहे हैं. ऐसे में अब सरकार की तरफ से सिर्फ निंदा करके, चंद श्रद्धांजलि शब्द अर्पित करके, कड़ी कार्यवाही किये जाने की बात कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाएगी. आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, कहकर कुछ धर्मनिरपेक्ष अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश करते नजर आयेंगे. कुछ अलगाववादी नेता भी अपने आपको उभारने के लिए आगे आते दिखेंगे. कुछ दिन बाद सब इस हमले को भूल जायेंगे क्योंकि संभव है तब तक नेताओं की शांति-समझौते जैसी खोखली प्रक्रिया के बीच आतंकी कोई और हमला कर बैठें.  

06 जुलाई 2017

एक देश में दो विधान, नहीं चलेंगे-नहीं चलेंगे

आज शिक्षाविद और चिन्तक होने के साथ-साथ भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्मदिन है. उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता आशुतोष मुखर्जी बंगाल के जाने-माने वकील थे. वे 1923 में ही सीनेट के सदस्य बन गये थे. सन 1926 में लिंकन्स इन में अध्ययन करने के लिए वे इंग्लैंड गए और 1927 में बैरिस्टर बन गए. उनको तैंतीस वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया. यह भी अपने आपमें विश्व रिकॉर्ड है. वे विश्व में सबसे कम उम्र के कुलपति बने. उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अनेक रचनात्मक सुधार कार्य किए तथा कलकत्ता एशियाटिक सोसायटी में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया. वे इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ़ साइंस, बंगलौर की परिषद एवं कोर्ट के सदस्य और इंटर-यूनिवर्सिटी ऑफ़ बोर्ड के चेयरमैन भी रहे. 


कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए वे कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए किंतु उन्होंने अगले ही वर्ष इस पद से त्यागपत्र दे दिया. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुए. वे हिन्दुओं के प्रवक्ता के रूप में उभरे और शीघ्र ही हिन्दू महासभा में शामिल हुए और सन 1944 में इसके अध्यक्ष नियुक्त किये गए. महात्मा गांधी ने उनके हिन्दू महासभा में शामिल होने का स्वागत किया क्योंकि उनका मत था कि हिन्दू महासभा को मदन मोहन मालवीय जी के बाद किसी योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शन की जरूरत थी. राष्ट्रीय एकात्मता एवं अखण्डता के प्रति आगाध श्रद्धा के चलते उन्होंने हिन्दू महासभा  का नेतृत्व ग्रहण कर अंग्रेज़ों की फूट डालो व राज करो और मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की नीति का विरोध किया.

जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया था. 6 अप्रैल 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक गुरु गोलवलकर जी से मिले. गुरु जी से परामर्श करने के बाद 21 अक्तूबर 1951 को उन्होंने दिल्ली में भारतीय जनसंघ की नींव रखी और इसके पहले अध्यक्ष बने. सन 1952 के चुनावों में भारतीय जनसंघ ने संसद की तीन सीटों पर विजय प्राप्त की जिनमें से एक सीट पर डॉ० मुखर्जी जीतकर आए. अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता के चलते उन्होंने संसद के भीतर राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी बनायी. जिसमें 32 सदस्य लोकसभा से तथा 10 सदस्य राज्यसभा से थे, हालांकि अध्यक्ष द्वारा एक विपक्षी पार्टी के रूप में इसे मान्यता नहीं मिली.


तत्कालीन जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान था. वहाँ के मुख्यमंत्री को  प्रधानमंत्री कहा जाता था. डॉ० मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने जोरदार नारा भी दिया एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे-नहीं चलेंगे. अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने संकल्प व्यक्त किया कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा. 11 मई 1953 को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने पर शेख़ अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार ने डॉ० मुखर्जी को हिरासत में ले लिया. इसके पीछे डॉ० मुखर्जी का बिना परमिट लिए जम्मू-कश्मीर चले जाना था. आपको बताते चलें कि उन दिनों कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारतीयों को भी पासपोर्ट के समान एक परमिट लेना पडता था. गिरफ़्तारी के बाद डॉ० मुखर्जी को नजरबंद कर लिया गया. जहाँ कुछ दिन बाद ही 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु का खुलासा आज तक नहीं हो सका है. भारत की अखण्डता के लिए आज़ाद भारत में यह पहला बलिदान था. इसका परिणाम यह हुआ कि शेख़ अब्दुल्ला हटा दिये गए और अलग संविधान, अलग प्रधान एवं अलग झण्डे का प्रावधान निरस्त हो गया। धारा 370 के बावजूद कश्मीर आज भारत का अभिन्न अंग बना हुआ है, इसका श्रेय डॉ० मुखर्जी को ही दिया जाता है. आज भी उन्हें प्रखर राष्ट्रवादी और कट्टर देशभक्त के रूप में याद किया जाता है. वे सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धांतों के पक्के इंसान थे. 

07 मई 2017

सख्त कदम उठाये सरकार घाटी में

पाकिस्तान के जन्म के साथ ही जम्मू-कश्मीर का विवाद शुरू हो गया था. आज तक आमजन के समझ के परे है कि देश के लिए पाकिस्तान के अलावा मुख्य समस्या क्या है, जम्मू-कश्मीर या फिर जम्मू-कश्मीर के निवासी? इस समस्या को सरकारों ने और भी जटिल बनाया है. देश की आज़ादी के तुरंत बाद जब रियासतों के विलय की प्रक्रिया चल रही थी, उस समय जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर तत्कालीन केंद्र सरकार ने अपने लिए समस्या को पैदा कर लिया था. संभव है कि तत्कालीन परिस्थितियों में ऐसा करना उपयुक्त रहा हो पर उसके सन्दर्भ में भी कभी भी स्पष्ट नहीं किया गया कि ऐसा क्यों किया गया. उसके बाद से जो स्थितियाँ वहाँ बनती आई हैं वे किसी से छिपी नहीं हैं. पाकिस्तान ने अपने जन्म के साथ ही उत्पात मचाना शुरू कर दिया था. शांति-अहिंसा-समझौतों की राह पर चलने वाले तत्कालीन लोगों की नीतियों के कारण देश का एक हिस्सा आजतक पाकिस्तान के कब्जे में है. इतने के बाद भी पाकिस्तान की नीयत में बदलाव नहीं आया. उसकी तरफ से आतंकवाद को पोषित किया जाता रहा और किसी समय खुशहाल घाटी में हिंसा, अत्याचार, बमों, बंदूकों के शोर उभरने लगे. वहाँ के हिन्दू नागरिकों को अत्याचारों का सामना करना पड़ा. महिलाओं, बच्चियों के साथ शारीरिक अमानवीयता की पराकाष्ठा दिखाई गई. ज़ुल्मों-सितम के चलते वहाँ के हिन्दू नागरिकों को घाटी से पलायन करना पड़ा. आतंक-प्रिय लोगों को इसके बाद भी चैन नहीं मिला. आये दिन उनके द्वारा घाटी में आतंक को विस्तार दिया जाता रहा.  


समय बदलने के साथ देश में केंद्र सरकारें बदलती रही किन्तु जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के प्रति नीतियों में बदलाव देखने को नहीं मिले. केंद्र सरकार में परिवर्तन हुआ और देश की जनता ने भारी बहुमत से भाजपा को सत्ता सौंपी. इसके पीछे कहीं न कहीं इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध वातावरण का बनना, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने की संकल्पना काम कर रही थी. इस अवधारणा के बीच घाटी में हुए विधानसभा चुनावों ने भी भाजपा के लिए राह निर्मित की. लगातार राज्य की सत्ता से बाहर बनी भाजपा को वर्तमान में राज्य सरकार में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ. देश में गठबंधन सरकार के विरोध भी किया गया क्योंकि बहुसंख्यक लोगों का मानना था कि अलगाववादियों का समर्थन करने वालों के साथ भाजपा को सरकार नहीं बनानी थी. इसके बाद भी बहुसंख्यक लोग इसके पक्षधर रहे. उनका मानना था कि कम से कम इस बहाने राज्य सरकार के सञ्चालन में, वहाँ की स्थानीय व्यवस्था में भाजपा का हस्तक्षेप होने से जम्मू-कश्मीर में चले आ रहे अलगाववादी कदमों में कुछ लगाम लगे. सरकार बनने के बाद भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिले बल्कि आये दिन उत्पात की, हिंसा की, उपद्रव की घटनाएँ और तेज होने लगीं. शैक्षिक संस्थान में देश विरोधी नारे लगाये गए. भारत माता की जय कहने वालों का उत्पीड़न किया गया. सेना को पत्थरों की मार सहनी पड़ी. सैनिकों को दुर्वयवहार सहना पड़ा. पाकिस्तान की तरफ से हमलों की संख्या में वृद्धि होने लगी. वीर शहीदों के पार्थिव शवों के साथ भी हैवानियत दिखाई गई. केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार होने के बाद भी किसी दिन नहीं लगा कि जम्मू-कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए कोई प्रयास किये जा रहे हों. 


यहाँ केंद्र सरकार को और राज्य सरकार में गठबंधन करती भाजपा को सोचना होगा कि देश की तरफ से, घाटी की तरफ से उनको बहुमत मिलने के पीछे कहीं न कहीं उनका वो एजेंडा था जो धारा 370 को हटाने की बात करता था. कहीं न कहीं वो बयानबाजी थी जो पाकिस्तान को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए होती थी. ऐसे में जनसमुदाय में आक्रोश होना स्वाभाविक है. अब सरकार को या कहें कि भाजपा को विशेष रूप से इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है. घाटी के अलगाववादियों के साथ सख्ती से पेश आने की आवश्यकता है. इसके अलावा एक बात और विशेष रूप से केंद्र और राज्य सरकार को अमल में लानी होगी वो है वहाँ की स्थानीय पुलिस का हस्तक्षेप. स्पष्ट सी बात है कि सेना केंद्र के आदेशों के इंतज़ार में बनी रहती है और स्थानीय पुलिस को वहाँ के स्थानीय लोगों के समर्थन के साथ-साथ राज्य सरकार का संरक्षण मिल हुआ है. यही कारण है कि वहाँ आये दिन पाकिस्तानी झंडे लहराए जाने लगते हैं. देश विरोधी नारेबाजी की जाने लगती है. घाटी में शांति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए आवश्यक कदमों में प्राथमिकता के आधार पर स्थानीय पुलिस के स्थान पर सेना को वरीयता दी जाये. इसके अलावा किसी भी कीमत पर अलगाववादियों को मिलने वाली तमाम सुविधाओं को समाप्त कर उन पर सख्त कार्यवाही की जाये. सेना को सीमापार से घुसपैठ रोकने, सीमापार से आते आतंकियों और हमलों को रोकने, पाकिस्तानी सेना द्वारा की जा रही कार्यवाही का जवाब देने को पर्याप्त रूप से आज़ादी दी जानी चाहिए. बातचीत एक रास्ता हो सकता है मगर सभी समस्याओं का समाधान बातचीत ही नहीं है. समझने-सोचने वाली बात है कि राज्य में भाजपा सरकार के गठबंधन के बाद ही अचानक से पत्थरबाजी की, आतंकी हमलों की, पाकिस्तानी सेना के हमलों की घटनाएँ क्यों बढ़ गईं? 

14 अप्रैल 2017

सैनिकों का मनोबल न गिरे, ध्यान रखना

किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो देश का, सेना का, वीर जवानों का सम्मान करता है, उस हालिया वीडियो को देख कर आक्रोशित होना स्वाभाविक है जिसमें हमारे वीर सैनिकों को कश्मीरी युवकों की हरकतों को सहना पड़ रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपचुनाव संपन्न करवाने के बाद लौटते सैनिकों के साथ कश्मीरी युवकों का व्यवहार किसी भी रूप में ऐसा नहीं है कि कहा जाये कि वे लोग सेना का सम्मान करते हैं. सैनिकों के साथ उनके दुर्व्यवहार के साथ-साथ लगते नारे समूची स्थिति को स्पष्ट करते हैं. सैनिकों के साथ हुई ये घटना उन लोगों के लिए एक सबक के तौर पर सामने आनी चाहिए जो कश्मीरी युवकों को भोला और भटका हुआ बताते नहीं थकते हैं. जिनके लिए सेना के द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना भी उनको नहीं सुहाता है. सोचने वाली बात है कि जिस सेना के पास, सैनिकों के पास देश के उपद्रवियों से लड़ने की अकूत क्षमता हो वे चंद सिरफिरे युवकों के दुर्वयवहार को चुपचाप सहन कर रहे हैं. ये निपट जलालत जैसे हालात हैं. 


जम्मू-कश्मीर का आज से नहीं वरन उसी समय से ऐसा हाल है जबकि पाकिस्तान ने अपने जन्म के बाद से ही वहाँ अपनी खुरापात करनी शुरू कर दी थी. विगत कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में और केंद्र में सरकारों का पर्याप्त समर्थन न मिल पाने का बहाना लेकर सेना के जवानों को अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ता था. वर्तमान राज्य सरकार में जब भाजपा ने गठबंधन किया तो माना जाने लगा था कि उनके द्वारा सत्ता में भागीदारी से शायद जम्मू-कश्मीर के हालातों में कुछ सुधार आयेगा. वहाँ तैनात सैनिकों के सम्मान की चर्चा की जायेगी. इधर केंद्र-राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बाद, लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के वादे के बाद तथा जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात सुधारने की बात करने के बाद भी वहाँ की स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाई हैं. अब जो वीडियो आया है उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में वहाँ के हालात सुधरने की सम्भावना है. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार माना कि युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है मगर देश के अन्दर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करते लोगों से न निपटने के लिए कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? वीर सैनिक अपमान का घूँट पीते रहें और कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक के चलते साफ़-साफ़ बच निकलें ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है? 

सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के वीडियो ने समूचे देश को आक्रोशित कर दिया है. इससे बस वे ही लोग बचे हैं जो किसी आतंकी की फाँसी के लिए देर रात अदालत का दरवाजा खुलवा सकते हैं. वे ही आक्रोशित नहीं हैं जो पत्थरबाज़ी करते युवकों, महिलाओं, बच्चों को भटका हुआ बताते हैं. उनके ऊपर इस वीडियो का कोई असर नहीं हुआ जो सेना को बलात्कारी बताते हैं. बहरहाल, किस पर इस वीडियो का असर हुआ, किस पर असर नहीं हुआ ये आज मंथन करने का विषय नहीं है. अब सरकार को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए उसी वीडियो के आधार पर सम्बंधित युवकों पर कठोर कार्यवाही करे. इसके अलावा सेना को कम से कम इतनी छूट तो अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपने ऊपर होने वाले इस तरह के हमलों का, पत्थरबाज़ी का तो जवाब दे ही सकें. मानवाधिकार का सवाल वहाँ खड़ा होना चाहिए जबकि वे जबरिया किसी व्यक्ति को परेशान करने में लगे हों. यदि एक सैनिक अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो वो पल उसके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है. ऐसी घटनाओं पर सरकारों का शांत रह जाना, सम्बंधित अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न करना सैनिकों के मनोबल को गिराता है. यहाँ सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह से सेना का, सैनिकों का मनोबल न गिरने पाए. यदि सेना का मनोबल गिरता है तो वह देश के हित में कतई नहीं होगा. देश के अन्दर बैठे फिरकापरस्त और देश के बाहर बैठे आतातायी चाहते भी यही हैं कि हमारी सेना का, सैनिकों का मनोबल गिरे और वे अपने कुख्यात इरादों को देश में अंजाम दे सकें. देश की रक्षा के लिए, किसी राज्य की शांति के लिए, नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकारों को पहले सेना के, सैनिकों के सम्मान की रक्षा करनी होगी. कश्मीरी युवक, भले ही लाख गुमराह हो गए हों, मासूम हों, भटक गए हों मगर ऐसी हरकतों के लिए उनके पागलपन को कठोर दंड के द्वारा ही सुधारा जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटनाओं के बाद सम्बंधित पक्ष पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती है तो उनके नापाक मंसूबे और विकसित होंगे और वे सेना के लिए ही संकट पैदा करेंगे. समझना होगा कि यदि हमारी सेना, वीर सैनिक संकट में आते हैं तो देश स्वतः संकट में आ जायेगा. देश को बचाने के लिए आज ही सेना को, सैनिकों को ससम्मान बचाना होगा. ऐसी घटनाओं से निपटने को सम्पूर्ण अधिकार देना होगा.   

30 अगस्त 2016

बदलेंगे कश्मीर के हालात

जम्मू-कश्मीर की वर्तमान स्थिति को देखकर लगता नहीं कि वहाँ की जनता ने कुछ दिनों पहले अपना जनाधार लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए दिया था. तत्कालीन अलगाववादी ताकतों और आतंकी धमकियों को नजरअंदाज करके वहाँ की जनता ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर सरकार गठन में अपनी हिस्सेदारी की. चुनाव नतीजों से लगा जैसे कि जम्मू-कश्मीर की जनता ने मोदी जी के विकास और मुफ़्ती जी के अटल फ़ॉर्मूले को अपनाने का मन बनाया है. शायद ये जनाधार का सम्मान ही कहा जायेगा या फिर राजनैतिक मजबूरी कि एक दूसरे की विरोधी होने के बाद भी पीडीपी और भाजपा ने मिलजुल कर सरकार बनाई. आरंभिक दौर में लग रहा था कि जैसे सब सही चलने वाला है मगर मुफ़्ती जी के देहांत के बाद महबूबा मुफ़्ती के अड़ियल रुख से बात बिगड़ती सी महसूस हुई. बहरहाल जम्मू-कश्मीर में पुनः सरकार की वापसी हुई तो लगा कि शायद कुछ सकारात्मक बदलाव आयेंगे. भाजपा जहाँ मोदी जी के विकास की चर्चा करती दिखी वहीं महबूबा ने बार-बार अटल फ़ॉर्मूले का राग अलापा. इसके बाद भी एकाएक कुछ घटनाओं से विकास की, फ़ॉर्मूले की आशा को धूमिल सा कर दिया. 


पहले शैक्षणिक संस्थान में तिरंगा फहराने, भारत माता की जय सहित राष्ट्रवादी नारे लगने पर विवाद पैदा होना. उसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की इकाई को प्रतिबंधित करना भी विवादों को जन्म देता लगा. इसी तरह के छोटे-छोटे विवादों, मान-मनौवल के बीच एक आतंकी के मारे जाने की घटना ने शांति, भाईचारे, विकास जैसी अवधारणा के ढाँचे को नेस्तनाबूत करके धर दिया. एक आतंकी के मारे जाने के बाद जिस तरह से वहाँ के नागरिकों ने आक्रामक रुख दिखाया, जिस तरह से भारतीय सेना को अपना निशाना बनाया वो चिंताजनक है. इसके साथ-साथ सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात ये रही कि जम्मू-कश्मीर से इतर राज्यों से नेताओं के बोल राष्ट्रहित वाले नहीं कहे गए. अपने-अपने वोट-बैंक को साधने की मंशा के अंतर्गत भारतीय सेना की कार्यवाही को गलत सिद्ध करने का काम किया जाता रहा. आक्रामक और हिंसक भीड़ पर पैलेट गन के उपयोग को भी कानूनी चुनौती दी जाने लगी. ऐसे लोगों को हताहत होते सैनिकों की चिंता नहीं थी वरन चिंता उनकी थी, जिनके हाथों में पत्थर थे, लाठी-डंडे थे. ऐसा नहीं है कि कश्मीर के हालात कोई पहली बार ख़राब हुए हों. वहाँ के हालात पहले भी खराब होते रहे हैं. वहाँ के वाशिंदों को भागने को मजबूर होना पड़ा. पाकिस्तान के झंडे लहराते नजर आते हैं. भारतीय सेना को हमलों का दंश झेलना पड़ता है. सीमापार से चलता प्रायोजित आतंकवाद अपनी जड़ें मजबूत करने में लगा हुआ है. आतंकी की मौत पर जनाधार जुटता दिखाई देता है. ऐसे हालातों के बीच पाकिस्तान ने अवसर का लाभ उठाते हुए आतंकी बुरहान को शहीद का दर्जा देकर मामले को और हवा दे दी. ऐसी स्थिति के आने के बाद अब भारतीय सेना पर, सैनिकों पर पत्थर फेंकने वालों में बच्चे और बहुसंख्यक युवा तो शामिल हुआ ही, महिलाओं ने भी सामने आना शुरू कर दिया.


केंद्र सरकार की सार्थक पहल के बीच गृहमंत्री ने दो बार संकटग्रस्त क्षेत्र का दौरा किया. जम्मू-कश्मीर के राजनैतिक लोगों ने भी आकर प्रधानमंत्री से भेंट कर हालातों पर नियंत्रण लगाने की माँग की. अब महबूबा मुफ़्ती भी वहाँ के लोगों को उन्हीं की भाषा में समझाती दिख रही हैं. देखा जाये तो ऐसा अचानक से नहीं हुआ है. मोदी जी द्वारा लालकिले से बलूचिस्तान की आवाज़ उठाने का परिणाम ये हुआ कि न केवल बलूचिस्तान से वरन सिंध से भी अलगाववादी आवाजें आनी शुरू हो गईं हैं. बदलते हालातों में ईंट का जवाब पत्थर से देने की रणनीति के अंतर्गत बलूचिस्तान की माँग ने कहीं न कहीं पाकिस्तानियों को, अलगाववादियों को परेशान तो किया ही है. इस बदलती स्थिति में मोदी जी की आंशिक सी परिवर्तित विदेश नीति से ही पाकिस्तान में हलचल मच गयी. महबूबा मुफ़्ती अब पाकिस्तान को चेताने का काम करती हुईं उसे संयम से रहने की सलाह दे रही हैं. कश्मीर के युवकों को न बरगलाने का सन्देश प्रसारित कर रही हैं. कश्मीर की पत्थरबाज़ भीड़ पर गुस्सा व्यक्त करती हुई कह रही हैं कि वे क्या दूध बाँटने गए थे. स्पष्ट है कि पाकिस्तान अभी तक जिस तरह के हालात जम्मू-कश्मीर में बनाकर उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विवादित बनाकर भारत को अस्थिर रखने का काम करता था, कुछ वैसा ही अब उसे भी सहना पड़ रहा है. पाकिस्तानी हुक्मरान भली-भांति समझते हैं कि आंतरिक रूप से आतंकियों के चंगुल में फँसी पाकिस्तानी व्यवस्था में यदि बलूचिस्तान, सिंध की तरफ से आज़ादी की माँग पुरजोर तरीके से उठने लगी और भारतीय आवाज़ उनके साथ मिल गई तो उनके लिए नियंत्रण बनाये रख पाना संभव नहीं होगा. भारत की तरफ से चली गई इस चाल का अंतिम परिणाम क्या होगा, ये तो भविष्य बताएगा किन्तु आरंभिक तौर पर लग रहा है कि इससे शायद जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी अलगाववादी मंसूबों पर अंकुश लग सके.

11 जुलाई 2016

आतंकी का समर्थन करने वाले भी आतंकी

आतंक और आतंकी का सम्बन्ध समझ में आता है किन्तु जिस तरह से विगत कुछ वर्षों से आतंकी के समर्थन में, आतंकवाद के समर्थन में नागरिकों का हुजूम एकत्र होने लगा है, वह सम्बन्ध कुछ और कहानी कहता है. आतंकवादियों के समर्थन में नारे लगाये जाने, उनके समर्थन में रैलियाँ करना, उनको शहीद घोषित करने जैसे कृत्य होना, आतंकी के मारे जाने पर सेना के विरोध में नागरिकों का खड़े होना, आतंकवादी के अंतिम संस्कार में अप्रत्याशित भीड़ का जुड़ना आदि वे बातें हैं जो सामान्य नहीं कही जा सकती हैं. इधर राजनैतिक परिदृश्य कुछ इस तरह से बनने-बनाया जाने लगा है जिसके अंतर्गत विरोध करना मुख्य हो गया है. इसमें भी विडम्बनापूर्ण ये है कि इस विरोध का केंद्रबिन्दु भाजपा अर्थात केंद्र सरकार रहती है. जिस तरह से केंद्र सरकार का विरोध करने के लिए, उसको मुस्लिम विरोधी सिद्ध करने के लिए देश-विरोधियों का समर्थन किया जा रहा है, जिस तरह से मुस्लिमों के समर्थन में खड़े होने के कारण आतंकवादियों का समर्थन किया जा रहा है वो निंदनीय है.

जम्मू-कश्मीर की अपनी स्थिति कुछ अलग तरह की भले ही रही हो किन्तु महज इस कारण से कि वहाँ किसी आतंकी के समर्थन में आम नागरिक भी संगठित होते जा रहे हैं, किसी आतंकवादी के अंतिम संस्कार पर नागरिकों की भारी भीड़ जमा हो रही है, जम्मू-कश्मीर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. हाल ही में एक आतंकी की मौत के बाद सेना का विरोध, सम्बंधित राज्य में हिंसात्मक घटनाओं का होना, अमरनाथ यात्रियों पर, उनके लंगरों पर हमले किया जाना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए. यहाँ जो लोग भी इन घटनाओं के सन्दर्भ में जम्मू-कश्मीर को आज़ाद किये जाने के पक्ष में, वहाँ जनमत-संग्रह कराये जाने के समर्थन में, जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का अंग मान लेने के पक्ष में वकालत करते दिख रहे हैं वे वास्तविक रूप में जम्मू-कश्मीर के समर्थन वाली नहीं वरन केंद्र सरकार के विरोध वाली मानसिकता से काम कर रहे हैं.

सोचना होगा कि क्या जम्मू-कश्मीर को आज़ाद कर देने से, उसको स्वतंत्र राज्य बना दिए जाने से, उसे पाकिस्तान का अंग बना दिए जाने-मान लिए जाने से क्या देश भर में आतंकी घटनाओं की समाप्ति हो जाएगी? न सही देश भर में, क्या जम्मू-कश्मीर में ही शांति हो जाएगी? क्या उसके स्वतंत्र किये जाने भर से, उसको भारत से अलग कर दिए जाने के बाद से उस तरफ से हिंसात्मक घटनाओं में रोक लग जाएगी? जम्मू-कश्मीर में जनमत-संग्रह करवाए जाने से क्या वहाँ की सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा? जो लोग उक्त कदमों को जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापना के लिए आवश्यक मानते हैं, देश के अन्दर होने वाली आतंकी घटनाओं का समाप्त होना मानते हैं वे भयंकर भूल में हैं. उन्हें समझना होगा कि आतंकी घटनाओं का सम्बन्ध किसी एक राज्य की आज़ादी से नहीं है. जनमत-संग्रह समर्थकों को समझना होगा कि जम्मू-कश्मीर में वर्तमान में वहाँ के मूल नागरिक निवास ही नहीं कर रहे हैं. विगत कई दशकों से जिस तरह से वहाँ के मूल निवासियों को हिंसात्मक गतिविधियों के द्वारा प्रताड़ित करके भगाया जा रहा है, उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा किया जा रहा है उसके बाद से वहाँ मूल निवासियों की संख्या नाममात्र को रह गई है. पाकिस्तान समर्थित आतंकी सोच वाले, स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर की माँग करने वाले अलगाववादी मानसिकता वाले लोगों ने वहाँ कब्ज़ा कर रखा है. ऐसे में जनमत-संग्रह का कोई अर्थ नहीं रह जाता है. उस राज्य की आज़ादी से देश में आतंक अथवा आतंकी सोच नहीं रुकेगा वरन अन्य दूसरे राज्य अपनी स्वतंत्रता के लिए हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेना शुरू कर देंगे. पंजाब, नागालैंड आदि इसके जीते-जागते उदाहरण हैं.


यहाँ केंद्र सरकार को, राज्य सरकार को कठोर कदम उठाये जाने की जरूरत है. उसके कठोर कदमों के साथ-साथ नागरिकों को भी संयम बरतने की आवश्यकता है. उन्हें महज राजनैतिक कठपुतली न बनते हुए देश-हित में अपनी आवाज़ उठानी चाहिए. उन्हें समझना होगा कि सेना अपने लिए नहीं वरन देश के लिए, देशवासियों के लिए अपनी जान जोखिम में डाल कर आतंकियों का मुकाबला करती है. ऐसे में महज विरोध के लिए नागरिकों का आतंकियों के समर्थन में खड़े हो जाना, आतंकी को शहीद बताने लगना दुर्भाग्यपूर्ण है. आज़ाद देश में आज़ादी की माँग करने वाले आतंकियों की मानसिकता स्पष्ट है, उसी मानसिकता का परिचय देते आम नागरिक भी किसी रूप में आतंकवादी से कम नहीं. आतंकी जहाँ बम-बन्दूक का इस्तेमाल करते हुए मौत बाँट रहे हैं वहीं तथाकथित बुद्धिजीवी केंद्र सरकार के विरोध के लिए आतंकियों का समर्थन कर मौत बाँटने में सहयोगी बन रहे हैं. वे किसी न किसी रूप में अपने को जम्मू-कश्मीर का, आतंकवादी का, मानवाधिकार का सच्चा समर्थक नहीं वरन आतंकवादी ही सिद्ध कर रहे हैं.  

29 नवंबर 2015

रिश्ते सुधारो मगर सहजता से


पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की कवायद तबसे चलनी शुरू हो गई थी, जबसे कि उसका जन्म हुआ था. आये दिन किसी न किसी कदम के द्वारा ऐसा होता दिखता है. सम्बन्ध सुधार के दौर में पाकिस्तान की तरफ से बारम्बार सुधार प्रक्रिया के साथ-साथ इसको बाधित करने का उपक्रम भी चलाया जाता रहा है. एक तरह शांति-वार्ताएं चलती हैं तो दूसरी तरफ अशांति की हरकतें की जाने लगती हैं. एक तरफ बस चलाकर आपसी सम्बन्धों के आदान-प्रदान का रास्ता खोला जाता है तो दूसरी तरफ उसी शांति के रास्ते से कारगिल में घुसपैठ कर दी जाती है. पाकिस्तान का अपना इतिहास रहा है लगभग नित्य ही भारत के लिए समस्याएँ पैदा करने का. कभी युद्ध के द्वारा, कभी घुसपैठ के द्वारा, कभी आतंकी हमलों के द्वारा, कभी संयुक्त राष्ट्र में बेवजह कश्मीर के मुद्दे को उठाने के द्वारा. इस जोर-आजमाइश के चक्कर में कई-कई बार हमारे देश की तरफ से भी राजनीतिज्ञ विवादस्पद बयान दे बैठते हैं अथवा कोई असंवदेनशील कदम उठा बैठते हैं.
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पाकिस्तान की बात ही क्या की जाये, यदि अपने देश के इन नेताओं की, जिम्मेवार लोगों की ही बात की जाये तो ताजा घटनाक्रम में ही दो बातें ऐसी हुई हैं जिन्हें राष्ट्रीय एकता, सद्भाव की दृष्टि से कतई सुखद नहीं कहा जा सकता है. इसमें पहली घटना भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच आरम्भ करने वाली रही और दूसरी घटना जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला द्वारा दिया गया बयान रहा है. पहले चर्चा भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच सीरीज के सम्बन्ध में, दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध सहज हों, मधुर हों इसको स्वीकार करने वाले पर्याप्त संख्या में हमारे देश में मौजूद हैं. इसके साथ ही ऐसे लोग भी बहुत हैं जो खेलों के द्वारा, सांस्कृतिक वातावरण के द्वारा, साहित्य-कला के द्वारा दोनों देशों के संबंधों-रिश्तों को सुधारने की वकालत करते हैं, उसे स्वीकारते हैं. हालाँकि समस्त देशवासी ऐसा शत-प्रतिशत रूप से नहीं स्वीकारते हैं, बहुत से लोग युद्ध को एकमात्र और अंतिम विकल्प के रूप में स्वीकारते हैं तथापि दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैच सीरीज के आरम्भ करने के समय का लगभा सम्पूर्ण देश ने एकसुर से विरोध किया है. सोचने की बात है कि एक तरफ देश मुंबई हमले में मारे गए सैकड़ों लोगों को याद कर रहा था, सैनिकों के साथ-साथ अनेक मासूम, निर्दोष नागरिकों को श्रद्धांजलि दे रहा था और उधर दूसरी तरफ सम्बन्ध सुधारने की कवायद में मगन रहने वाले उसी दिन मैच खेलने पर सहमति व्यक्त करने में लगे हुए थे. ये अत्यंत शर्मनाक स्थिति तो है ही साथ ही अत्यंत अपमानजनक भी है. ये अपमान उन तमाम शहीदों का है जो आतंकी हमले का शिकार हुए; ये अपमान उन सैनिकों का है जिन्होंने अत्यल्प संसाधनों में उन आतंकियों का सामना किया जो अत्याधुनिक हथियारों से लैस खूनी खेल खेलने में लगे हुए थे.
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इस अपमानजनक स्थिति से अभी पूरी तरह उबरना भी नहीं हो पाया था कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला का बयान कि ‘पाकिस्तान अधिग्रहीत कश्मीर (पीओके) पाकिस्तान का ही हिस्सा है’ तथा ‘हमारी पूरी सेना भी पाकिस्तान के आतंकवादियों को नहीं रोक सकती, जब तक कि पाकिस्तान न चाहे’ एक तरह से राष्ट्रद्रोह वाला ही है. उनके बयान के ठीक एक दिन पहले ही नवाज शरीफ का बयान आता है कि पाकिस्तान बिना शर्त भारत से बातचीत करने को तैयार है और इस मौके को भुनाने के बजाय इसी देश के एक नेताजी इस तरह का बयान देकर मनोबल गिराने का कार्य करने में लग जाते हैं. ये स्पष्ट है कि भारतीय सेना का मनोबल किसी एक व्यक्ति, एक राजनीतिज्ञ के बयान से गिरने वाला नहीं है मगर ऐसे बयानों की आड़ में ही वे ताकतें जो देश में अशांति फ़ैलाने का, उपद्रव करने का मंसूबा संजोये बैठी रहती हैं, सक्रिय हो जाती हैं. भले ही अभी पीओके वाला मसला सुलझा नहीं हो, भले ही अभी हमारा देश पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को जड़ से न उखाड़ सका हो मगर इसका अर्थ कदापि ये नहीं कि कोई पूर्व मुख्यमंत्री ऐसे विवादस्पद बयान जारी करे. आज सम्पूर्ण विश्व इस बात को स्वीकारने लगा है कि भारत देश में आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है और इससे भी कोई इंकार नहीं करता है कि भारतीय सेना महज इस कारण खामोश रही है कि हमारे देश की सरकारों ने सदैव शांति-वार्ताओं के द्वारा हल निकालना चाहा है. सेना की ख़ामोशी को कमजोरी समझने की भूल न तो पाकिस्तान को करनी चाहिए और न ही भारत में बैठे पाकिस्तान-प्रेमियों को ऐसा करने की छूट है.
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यहाँ समझने की आवश्यकता है कि हमारा देश पाकिस्तान से किस दृष्टि से दोस्ताना सम्बन्ध बनाने को आतुर है? पाकिस्तान की तरफ से क्या-क्या हरकतें होती रही हैं, होती रहती हैं, ये अलग विषय है किन्तु शांति की राह बनाने के लिए, रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए इतनी आतुरता, आकुलता भी आवश्यक नहीं कि जिस समय हम अपने शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहे हों उसी समय पूरी बेशर्मी सबकुछ भूल जाने को आमादा हैं. एक राष्ट्र के साथ सम्बन्ध बनाने को लेकर यहाँ के राजनीतिज्ञों की तुष्टिकरण की राजनीति इतनी भी सहज न हो कि समूची सेना को चंद आतंकियों के सामने पस्त बताया जाने लगे, देश का एक हिस्सा पाकिस्तान का ही बताया जाने लगे. केंद्र सरकार को ऐसे मामलों में कठोरता, सशक्तता, दृढ़ता से निपटने की आवश्यकता है. यदि ऐसा करने में वो असफल रहती है तो देश की शांति-एकता-सद्भाव को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के साथ-साथ तुष्टिकरण की नीति अपनाने वाले नेताओं से भी खतरा हो जायेगा. क्रिकेट हो या फिर कोई और मसला सभी में देश की अखंडता का, देश की सेना के मनोबल का, देशवासियों की भावनाओं का सम्मान किया जाना अनिवार्य होना चाहिए.

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