12 अगस्त 2019

तीन तलाक और धारा 370 : जिम्मेवारी के साथ सतर्कता आवश्यक


अगस्त का आरम्भ भारतीय राजनीति के लिए, समाज के लिए यादगार माना जायेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि सदन की तरफ से दो निर्णय ऐसे हुए जिनकी लम्बे समय से अपेक्षा ही नहीं थी वरन वे निर्णय देश के लिए, समाज के लिए अपरिहार्य भी थे. इन दो निर्णयों में तीन तलाक का मामला और धारा 370 का मामला रहे. दोनों निर्णयों को सदन में सत्ता पक्ष द्वारा बिना किसी हीलाहवाली के पारित करवाया गया. दोनों ही निर्णयों में सत्ता पक्ष का रवैया ठोस कार्यवाही करने जैसा रहा. उसके द्वारा जिस तरह से अपना पक्ष रखा गया, जिस तरह से इन दोनों मसलों के प्रति उसकी संवेदना साफ़ तौर पर दिखी वह प्रशंसनीय है. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि ये दोनों ही मामले सामाजिक रूप से और राजनैतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे थे. दोनों ही निर्णयों के प्रति पूर्ववर्ती सरकारों का रवैया सदैव से ढुलमुल भरा रहा है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले भाजपानीत सरकार केंद्र में नहीं थी मगर उसके द्वारा भी इस सम्बन्ध में ठोस कदम नहीं उठाया गया था. अबकी बार ऐसा साफ़-साफ़ देखने को मिला जबकि सरकार ने न केवल कठोर कदम उठाया बल्कि किसी भी तरह से विपक्ष को हावी न होने दिया.


सरकार की प्रशंसा इस रूप में भी की जानी चाहिए कि इन दोनों निर्णयों को सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के आरम्भ में ही लागू किया. ऐसा करने के पीछे उसकी मंशा साफ़ तौर पर ऐसे निर्णय लागू करने की दिखी. किसी भी तरह से उसके द्वारा इन निर्णयों का राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास नहीं दिखा. किसी भी सरकार द्वारा जब भी इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर कोई निर्णय लिया जाता है तो विपक्ष से, सरकार विरोधियों की तरफ से आरोप लगाया जाता है ऐसे मामलों के द्वारा चुनावी लाभ लेने का. यहाँ ऐसा कुछ नहीं है. इसके साथ-साथ सरकार के इन निर्णयों की प्रशंसा इस रूप में भी की जा सकती है कि इन दोनों मामलों में उसके द्वारा पर्याप्त सुरक्षात्मक कदम उठाये गए थे, जिसके चलते किसी भी तरह से उपद्रव नहीं हो सका. दोनों ही मुद्दे किसी न किसी रूप में मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए थे जिसमें तीन तलाक से ज्यादा संवेदित मामला जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाये जाने का था. इसमें जहाँ कश्मीर के अलगाववादियों का जुड़ा होना तो था ही साथ ही इस मामले में पाकिस्तान भी पर्याप्त रुचि दिखा रहा था. रुचि तो वह आज भी दिखा रहा है किन्तु उसके द्वारा कोई भी कदम सफल सिद्ध नहीं हो रहा है. 


जम्मू-कश्मीर मामले में सरकार की तारीफ इसके लिए भी करनी होगी कि उसके द्वारा इतने पुख्ता इंतजाम कर लिए गए थे कि न तो उस राज्य के अलगाववादी किसी तरह का उपद्रव कर सके, न पत्थरबाज़ अपने हाथ फैला सके और न ही पाकिस्तान कोई हिंसात्मक कदम उठा सका. इसके साथ-साथ सबसे बड़ी बात रही वैश्विक समुदाय का इस समूचे मुद्दे पर ख़ामोशी बनाये रखना. इससे स्पष्ट है कि विगत कार्यकाल में प्रधानमंत्री का वैश्विक नेताओं के साथ संबंधों का लाभ अब मिला है. ऐसे में पाकिस्तान बिलकुल अलग-थलग दिखाई देने लगा है. सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को उसके भौगौलिक हिसाब से दो राज्यों में बाँट देने का निर्णय भी सराहनीय कहा जायेगा. केंद्र शासित राज्यों की श्रेणी में आने से इन दोनों के केंद्र सरकार का नियंत्रण रहेगा और लद्दाख भी अपना पर्याप्त विकास कर सकेगा.

अब सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि उसने जिस तीव्रता के साथ, जिस कठोरता के साथ दोनों निर्णयों को लागू किया है उनको उसी जिम्मेवारी से सफलता की तरफ ले जाये. स्पष्ट है कि मुस्लिम समुदाय में जिस तरह से महिलाओं को लेकर, तीन तलाक को लेकर सोच बनी हुई है उसमें एकदम से उनके लिए स्वीकारना सहज नहीं होगा कि ये मामला अब गैर-कानूनी हो गया है. ऐसे में कानूनी रूप से प्रशासनिक रूप से सशक्त रहने की आवश्यकता है. मुस्लिम समुदाय की कमजोर तबके की महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान किये जाने की जिम्मेवारी भी अब सरकार की हो गई है. कुछ इसी तरह के एहतियात भरे कदम जम्मू-कश्मीर राज्य में उठाये जाने की आवश्यकता है. वहाँ के अलगाववादियों को, पाकिस्तान को ये कतई मंजूर नहीं होगा कि वहाँ किसी भी तरह से शांति बनी रहे. ऐसे में न केवल सेना को वरन वहाँ के नागरिकों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है. यदि शुरूआती कुछ महीनों में इन दोनों निर्णयों पर सरकार, प्रशासन गंभीरता दिखाए रहा तो निश्चित ही दोनों निर्णय भारतीय समाज, राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित होंगे.

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