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13 नवंबर 2024

अपने-अपने दायरे में सिमटता समाज

एक कारोबारी ने पत्नी की सहमति के बाद अपने पूरे परिवार को मार डाला. पत्नी, बेटे और दो बेटियों को उसने नींद की गोलियाँ खिलाईं फिर रस्सी से गला कसकर मार डाला. कारोबारी स्वयं भी आत्महत्या की कोशिश करते समय पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया. समाज में आये दिन आत्महत्या किये जाने की अनेकानेक खबरें, घटनाएँ हम सभी के सामने आती रहती हैं. कभी गरीबी के चलते, कभी पारिवारिक कलह के चलते, कभी क़र्ज़ के चलते, कभी किसी अन्य कारण से इस तरह के दर्दनाक कदम उठाये जाते हैं. कहीं एक व्यक्ति अकेले इस तरह के कदम उठाता है, कहीं पूरा परिवार एकसाथ मौत के आगोश में चला जाता है.

 

इस तरह की घटनाओं के साथ-साथ समाज में अनेक तरह के आपराधिक कृत्य सामाजिक ढाँचे पर, इंसानों की मानसिकता पर, इंसानियत पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहते हैं. कहीं बहुत ही मामूली सी बात पर हत्या, कहीं किसी महिला की हत्या के बाद उसके टुकड़े-टुकड़े कर देना, कहीं किसी अबोध बच्ची के साथ बलात्कार, कहीं गैंग-रेप और हत्या जैसे जघन्य कृत्य दिल दहलाते रहते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हम और हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? मशीनों, रोबोटों, तकनीक भरे दौर में लगने लगा है कि समाज भी मशीन होता जा रहा है. आज के मशीनी युग में व्यक्ति भी मशीन की तरह व्यवहार करने लगा है. समाज का निर्माण इंसानों के समुच्चय द्वारा ही होता है ऐसे में समाज भी व्यक्तियों की मशीनी मानसिकता से अछूता नहीं है. धनोपार्जन की अंधी दौड़ में और उसके चलते दिमाग पर हावी किये मानसिक व्यस्तता के चलते अपने आसपास के वातावरण, माहौल से परिचित होने की आवश्यकता भी महसूस नहीं की जा रही है. हमारे बगल वाले घर-परिवार में क्या चल रहा है, इससे किसी तरह का कोई सरोकार नहीं है.

 



भौतिकतावादी सोच के चलते इंसान संवेदनहीन होता जा रहा है. कुतर्कों के द्वारा वह खुद को बुद्धि, ज्ञान से ऊपर समझते हुए केवल स्वार्थमय सोच में संलिप्त है. ऐसा महसूस होने लगा है कि स्वार्थ में संलिप्त होते जा रहे समाज में किसी को भी दूसरों के हित की, दूसरों के अधिकारों की कोई चिंता नहीं है. इस गम्भीर स्थिति के चलते आए दिन होती वारदातें समाज की संवेदनहीन प्रकृति को ही परिलक्षित करती हैं. यदि कहा जाये कि समाज में संवेदना, मानवता मर चुकी है तो इसमें किसी तरह की अतिश्योक्ति नहीं होगी. अब समाज में सरेआम वारदात ही नहीं हो रही हैं बल्कि उन घिनौने कृत्य को रोकने के स्थान पर उसके वीडियो बनाकर वायरल किये जा रहे हैं. अपराधी बेख़ौफ़ अपने आपराधिक कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं. दिन-दहाड़े सड़क चलते हत्या कर देना, खुलेवाम दुकान में घुसकर गला रेत देना, भीड़ भरे स्थान पर किसी पर गाड़ी चढ़ाकर उसकी हत्या कर देना अपराधियों के बुलंद हौसलों को ही दर्शाता है.

 

समाज में इस तरह की स्थितियाँ उत्पन्न होने के कारणों का विश्लेषण करने की आवश्यकता है. आखिर क्या कारण है कि हमारी युवापीढ़ी इतनी आक्रामक और संवेदनहीन हो गई है? क्या कारण है कि कोई पूरे परिवार सहित आत्महत्या करने को विवश हो जाता है मगर समाज से सहयोग की उम्मीद नहीं करता है? क्या कारण हो सकते हैं कि सड़क किनारे किसी बेटी पर चाकू से वार पर वार करते हुए उसकी हत्या कर दी जाती हो और कोई विरोध के लिए आगे नहीं आता है? क्या लालच, लोभ, स्वार्थ और दिखावे में हम सभी ने एक दूसरे की पीड़ा को समझना बंद कर दिया है? क्या सामाजिक सरोकारों से हम सभी ने अपने आपको अलग कर लिया है? क्या पड़ोस का परेशान परिवार अब हमें एक बोझ के समान नजर आने लगा है? यदि वाकई ऐसा है तो ये समाज में संवेदनहीनता बढ़ने का परिचायक है और ये हम सभी को समझना होगा कि बढ़ती संवेदनहीनता देश, समाज और भावी पीढ़ी के लिए हानिकारक है.

 

सामाजिक सरोकारों के लिए समाज में संवेदनशीलता आवश्यक है. संवेदनाएँ, इंसानियत, समन्वय, सहयोग  ही समाज में सामाजिक सौहार्द्र को बनाये रखती है. इसे ध्यान में रखते हुए समाज में सामाजिक कार्यक्रमों का, आयोजनों का, पर्वों-त्योहारों का आयोजन होते रहना चाहिए. समाज के जिम्मेदार नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन द्वारा यथासंभव प्रयास किये जाने चाहिए कि इस तरह के आयोजनों में नागरिकों की भागीदारी तथा सहयोग हो. समाज के प्रत्येक वर्ग को उसकी सामूहिकता का बोध कराते हुए उसके कर्तव्यों से परिचित कराते हुए उसमें पारस्परिक संवेदनाओं के प्रति उत्तरदायित्व का बोध जीवंत किया जाये. परिवार में भी सभी सदस्यों के बीच सहयोग, समन्वय की भावना को विकसित करते हुए उनमें परोपकार की भावना का विकास करना चाहिए. शैक्षणिक संस्थाओं के माध्यम से विद्यार्थियों में सामाजिकता की भावना का विकास करते हुए उनको इंसानियत का, मानवता का बोध कराया जाये.

 

आज की पीढ़ी को ये समझना होगा कि एकाकी भावना के साथ, स्वार्थलिप्सा के द्वारा न तो समाज का वर्तमान सँवारा जा सकता है और न ही भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकता है. अपने-अपने दायरे में सिमटते जा रहे व्यक्तियों, परिवारों के कारण समाज में विकृतियाँ बढती जा रही हैं, अपराध बढ़ते जा रहे हैं, अपराध-बोध का जन्म हो रहा है. ऐसी स्थिति किसी भी समाज के लिए सुखद नहीं कही जा सकती है.

 


05 मई 2021

मानसिक रूप से स्वस्थ रहने को स्वार्थी बन जाएँ

कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण लोगों में बुरी तरह से दहशत दिखाई दे रही है. यह डर कोरोना को लेकर कम है. उससे ज्यादा डर लोगों की होती मौतों का है. बहुत से लोग अपने आसपास से इतर न जाने कहाँ-कहाँ की खबरों को खुद में समेट कर अपने भीतर डर का एक वातावरण पैदा कर ले रहे हैं. कोरोना की पहली लहर के बाद से सबको भली-भांति समझाया गया था कि किस तरह से इसका सामना करना है, कैसे इसका बचाव करना है. इसके बाद भी लोगों की लापरवाही भयंकर तरीके से देखने को मिली.

खैर जो हुआ सो हुआ, अब उस पर चर्चा करने से कोई फायदा नहीं है. अब बात इसकी होनी चाहिए कि कैसे इस माहौल से निकला जाये? कैसे इस माहौल को सामान्य बनाया जाये? कैसे इधर-उधर से आ रही अनावश्यक खबरों से बचा जाये? यदि हम इस समय पर निगाह दौडाएं तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि बहुत से लोग घरों में बैठे हैं. जो नहीं बैठ पा रहे थे उनके लिए लॉकडाउन जैसे प्रावधान किये गए. कुल मिलाकर घर में सबके रहने का कारण शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना है. इस समय हम सभी शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए खुद तक सीमित हैं. अपने परिवार संग अपने घरों में बैठे हैं. न पारिवारिक आयोजनों में जा रहे न सामाजिक आयोजनों में. ऐसा करना भी एक तरह का स्वार्थ है.

क्या इसी तरह का स्वार्थ हम मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए नहीं अपना सकते? जितना आवश्यक आज हमारा शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना है उतना ही महत्त्वपूर्ण है हमारा मानसिक रूप से स्वस्थ रहना. सो बस इसी तरह से मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए कुछ दिन खुद तक सीमित हो जाइए. न अपने शहर की बुरी खबरें सुनिए न दूसरों के शहर की. न किसी को बुरी खबरें सुनाइए न किसी से बुरी खबर सुनिए. जैसे पिछली बार घर में रहते हुए जलेबी बनाने, खाना बनाने, व्यंजन बनाने, ड्राइंग करने, बागवानी करने आदि की फोटो लगाते थे वैसे ही इस बार अच्छी-अच्छी खबरें फैलाइए, अच्छी-अच्छी बातें करिए, फोन करके एकदूसरे का विश्वास बनिए. ऐसा करके देखिए, ये दिन बहुत ही सहजता से निकल जाएँगे. आपके मन से, दिल से, दिमाग से सारे भय निकल जाएँगे. 

 
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वंदेमातरम्

12 जुलाई 2020

तन्हा, एकाकी समाज का आधार रखते हम नागरिक

क्या आने वाले दिनों में ऑनलाइन समारोह समाज की पहचान बनेंगे? क्या आने वाले दिनों में लोगों का विचार-विनिमय का माध्यम ऑनलाइन ही होगा? क्या आने वाले दिनों में हम सभी को अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों का ही उपयोग करना होगा? समाज जिस तरह से एकाकी रूप में बदलता जा रहा था क्या इस चीनी वायरस कोरोना के चलते इस व्यवस्था को सहज स्वीकृति मिल जाएगी? जी तरह से सभी लोग स्वार्थ में लिप्त होकर सिर्फ और सिर्फ खुद के लिए ही काम करने में लगे थे क्या भविष्य में इसी सोच को स्वीकार्यता मिल जाएगी?



ऐसे और भी बहुत से सवाल हैं जो विगत तीन महीनों में दिमाग में कौंधते रहे. पिछले दिनों एक कार्यालय में अत्यावश्यक कार्य से जाना हुआ. वहाँ एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक ऊँची एक सीढ़ी चढ़ने में दिक्कत हो रही थी. वे लगभग तीन-चार मिनट से प्रयास कर रहे होंगे, ऐसा उनकी हालत देखकर लग रहा था. उनके आसपास खड़े लगभग दस-पंद्रह लोगों में से किसी ने उनका हाथ पकड़ कर उनको ऊपर चढ़ाने में सहायता नहीं की. इत्तेफाक की बात कि उसी सीढ़ी से हमें भी चढ़ना था. अपने साथ-साथ एक हाथ से खुद को और एक से उन बुजुर्ग सज्जन को सहारा देकर ऊपर चढ़ाया. इस पर सबसे पहली टिप्पणी यही मिली कि अपने हाथ सेनेटाइज कर लीजिये, आपने इनको छू लिया है. समझ न आया कि आखिर हम किस तरह के पढ़े-लिखे समाज में पहुँचा दिए गए, एक वायरस के द्वारा?


कोरोना वायरस को समझना किसी राकेट साइंस का हिस्सा नहीं इसके बाद भी हम सभी जबरदस्त तरीके से एक-दूसरे को भ्रमित करने में लगे हैं. बहरहाल, आज कोरोना पर नहीं वरन उससे उपजी मानसिकता पर इतनी बात कहनी है कि इसने उन सभी स्वार्थी लोगों को मजबूत किया है जो कभी भी किसी की सहायता नहीं करते थे. वे अब कोरोना संक्रमण के नाम पर खुद को अलग किये हुए हैं. ऐसे लोग जो मदद के लिए आगे आते थे, उनको ऐसे लोगों ने कोरोना से सम्बंधित आँकड़ेबाजी में उलझाकर दूर कर दिया है. ऐसी स्थिति में बहुत कम लोग बचे हैं जो इस स्थिति में भी सहायता के लिए आगे आ रहे हैं. समझना होगा कि कोरोना आज नहीं तो कल चला ही जायेगा. भले ही समाप्त न हो मगर बहुत हद तक नियंत्रण में आ जायेगा मगर सोचना होगा कि हम आज इस दौर में किस तरह का भावी समाज निर्मित करने में लगे हैं?

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

16 फ़रवरी 2020

हुनरमंदों को उनका हुनर मुबारक


बहुत लम्बे समय से सामाजिक क्षेत्र से जुड़ाव बना हुआ है. बचपन से ही सभी की मदद करने जैसी सीख अपने बड़ों से मिलती रही. छुटपन में बहुत सारे काम ऐसे देखे जिनका उस समय सन्दर्भ, भावार्थ समझ पान मुश्किल होता था किन्तु समय के साथ उनके पीछे छिपी परोपकार की भावना समझ आने लगी. ऐसी भावना का लोप हमारे भीतर से कभी नहीं हो पाया. इसके साथ-साथ कभी भी किसी का उपयोग स्वार्थ-सन्दर्भ में कर लेने का भाव भी अपने भीतर कभी जगा नहीं सके. संबंधों, रिश्तों के नाम पर कभी किसी का दोहन करने की कोशिश नहीं की. कभी स्वार्थ-पूर्ति के लिए किसी से सम्बन्ध बनाने का प्रयास नहीं किया. अपने निकट संबंधों में भी कभी उसके पद का, उनके अधिकारों का दुरुपयोग करने का विचार तो दूर, उपयोग करने का विचार भी मन में नहीं आया. आज भी कई बार ऐसे अवसर आते हैं जबकि किसी न किसी की मदद के लिए अपने किसी परिचित का सहारा लेना पड़ता है. ऐसी स्थिति हमें बहुत बार असहज कर जाती है. समझ नहीं आता कि सामने वाले से अपने किसी काम के लिए क्या और कैसे कहा जाए? इसके उलट अपने साथ ही ऐसे कई लोगों को देखा है जो बिना किसी संकोच, शर्म के न केवल अपना काम निकाल लेते हैं, वरन समय के साथ उन संबंधों को तिलांजलि भी दे देते हैं. 


ऐसे संबंधों से हमारा सामना अक्सर होता रहता है जबकि कई लोग हमसे सम्बन्ध बनाते हैं, इक्का-दुक्का काम निकलवा कर, अपना काम बना कर रफूचक्कर हो जाते हैं. ऐसे लोग न केवल रफूचक्कर हो जाते हैं वरन कभी मिलने पर पहचानते भी नहीं. समझ नहीं आता है कि इस तरह का हुनर ऐसे लोग कहाँ से ले आते हैं. कई बार खाली समय में ऐसे लोगों का विश्लेषण करने बैठते हैं तो लगता है कि ऐसे लोग सम्बन्ध बनाने का काम नहीं करते बल्कि अपने काम को करवाने का रास्ता खोजते हैं. ऐसे लोगों में संभव है कि बहुत से लोग भविष्य में अपने या किसी अन्य क्षेत्र में सफल हो जाते हों मगर जहाँ तक हमारे पास उदाहरण हैं ऐसे लोग जल्दी ही नाकामी का शिकार हो जाते हैं. इधर कुछ दिनों से इस तरह की घटनाएँ एक के बाद एक इस तरह से घटित हो रही हैं जिनके द्वारा ऐसे बहुत से लोग बहुत स्मृति-पटल पर उभरकर आने लगे हैं. यद्यपि ऐसे लोगों को, जो अपना काम निकल जाने के बाद हमारी ज़िन्दगी से निकल गए, उन्हें हम भी सहज भाव से अपने नजदीक से हटा देते हैं तथापि कोई न कोई घटनाक्रम उनकी याद दिला ही देता है.

ऐसे हुनरमंदों को उनका हुनर मुबारक हो.

06 फ़रवरी 2020

अपने दोस्तों के खजाने में हम भी एक नगीना रहें


आज अभी-अभी बैठे-बिठाए हिन्दी फिल्म छिछोरे देखने को मिली. पूरी फिल्म तो नहीं बस अंत की लगभग बीस-पच्चीस मिनट की. इस फिल्म के बारे में सुन रखा था कि हॉस्टल लाइफ के बारे में है, कॉलेज की कहानी है मगर कभी देखने की न तो इच्छा हुई और न ही देखने का मौका लगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमने खुद जिस तरह की बिंदास और मौज-मस्ती भरी, अल्हड़, बेख़ौफ़, बेफिक्री वाली हॉस्टल लाइफ अपने मित्रों के साथ गुजारी है उसके आगे फ़िल्मी कथानक कई बार फुस्स साबित हो जाता है. इस छिछोरे के अंत को देखकर लगा कि इसमें सिर्फ हॉस्टल की अथवा कॉलेज की कहानी नहीं रही है वरन दोस्तों की आपसी समरसता की, समन्वय की, सामंजस्य की, सहयोग की भी कहानी रही है. इस फिल्म का जितना अंत देखा उसमें उन पुराने मित्रों का एकसाथ रहना, एक-दूसरे के लिए तत्पर खड़े होना समझ आया. उसी के साथ कुछ थोड़ी सी कहानी फ्लैशबैक में चलने पर भी उनका विजय के लिए संघर्ष, लूजर से विनर बनने का किस्सा, एक-दूसरे के लिए जी-जान लगा देने वाली बात दिखाई दी. 


दोस्ती एक महसूस किया जाने वाला ही नहीं वरन उसे पूरी तरह से निभाए जाने वाला एहसास है. किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे मजबूत पक्ष उसके दोस्त, उसकी दोस्ती होती है. इस पक्ष की हमें व्यक्तिगत रूप से कभी कमी नहीं रही है. ऐसा नहीं कि सभी दोस्त पूरी तरह से निस्वार्थ भावना के मिले. कुछ लोग तो मित्रता के नाम पर लगातार संपर्क में रहे मगर मित्रभाव रहित रहे. समय के साथ उन्होंने अपना चोला बदला और वे वापस सिर्फ एक परिचित की भांति ही नजर आने लगे. बहरहाल, ऐसे लोगों की चर्चा का यहाँ कोई अर्थ भी नहीं और न ही ऐसे लोगों का यहाँ कोई सन्दर्भ. जीवन के विभिन्न पड़ावों से गुजरते रहने के दौरान विभिन्न मित्र हमारे साथ जुड़ते रहे. ये वाकई ऐसे मित्र हैं जो आज भी हमारे साथ हैं. ये और बात है कि समय के चलते हमारे बीच स्थानिक दूरी बनी हुई हो मगर आत्मिक दूरी कतई नहीं है. इस फिल्म में दोस्ती वाली गंभीर भावना को देखकर लगा कि यदि किसी व्यक्ति के साथ, व्यक्ति के पास दोस्तों का साथ है, सच्ची दोस्ती का साथ है तो वह कभी अकेले नहीं हो सकता है. उसके अकेले रहने या कहें कि उसके अकेले रहने की चाह रखने को उसके दोस्त समाप्त कर देंगे. किसी संकट के समय, मुसीबत में, आपदा में यही मित्र संबल बनते हैं, आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, आत्मबल में वृद्धि करते हैं.

जिस गंभीरता से, जिस सहयोग की भावना से, जिस निस्वार्थ भाव से हमारे बहुत से सच्चे दोस्त हमारे साथ आज भी हैं, आज भी हमारी एक आवाज़ पर अपनी पूरी तत्परता से साथ खड़े दिखाई देते हैं वह निस्संदेह गर्व करने योग्य है. कुछ मित्र तो बचपन से अभी तक साथ हैं. ‘लंगोटिया मित्रों ने भले ही लंगोट बदल ली हों मगर दोस्ती को न बदला, दोस्त को न छोड़ा’ ऐसा हम अक्सर हँसी-मजाक में अपने दोस्तों का परिचय करवाते समय गर्व से कह देते हैं. कोशिश हमारी तरफ से भी यही रहती है कि हमारा कोई दोस्त जब हमारी अनुपस्थिति में हमारी बात करे तो उसे गर्व की अनुभूति हो. कोशिश यही रहती है कि जिसे हम अपना दोस्त मानते हैं उसे किसी बुरे वक्त का शिकार ही न होने दें. प्रयास यही रहता है कि हमारा कोई दोस्त हमारे रहते अकेला महसूस न करे.

ऐसा सिर्फ हमारा ही नहीं वरन हम सभी का प्रयास होना चाहिए कि हम सभी आपस में मित्रभाव का सम्मान करें. जिन्हें अपना दोस्त मानते हैं, जो हमें अपना दोस्त मानते हैं उनके साथ पूर्ण समर्पण और ईमानदारी से जुड़ें. दोस्ती एक ऐसा रिश्ता होता है जो बिना किसी रक्त-सम्बन्ध के, बिना किसी नाम के, बिना किसी मतलब के सालों-साल, आजीवन आगे बढ़ता है. समय के साथ यही रिश्ता प्रगाढ़ होता जाता है. मित्रता की पूँजी अनमोल है और हमें गर्व है कि हमारे खजाने में अनमोल नगीने बराबर बने हुए हैं. और चाहते हैं कि अपने दोस्तों के खजाने में हम भी एक नगीना बने रहें.



02 मार्च 2019

किसी के लिए चाय का कप आप स्वयं बनते हैं

ज़िन्दगी को जितनी सहजता से जिया जाए उतना आनंद देती है. अक्सर लोग अपनी ज़िन्दगी को एक दार्शनिक अंदाज़ में जीने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसा हो पाए या नहीं, ये अलग बात है मगर उनकी बातों में, विचारों में, सार्वजनिक प्रदर्शन में एक तरह की दार्शनिकता, आदर्शवाद दिखाई देने लगता है. जीवन में दार्शनिक भाव का अथवा आदर्श का प्रकटीकरण वैचारिकता के स्तर पर तो बड़ा ही सुखद और उच्च मानकों पर स्थापित होता दिखाई देता है किन्तु वास्तविकता से इसका लेना-देना बहुत दूर-दूर तक नहीं होता है. असल में जीवन विशुद्ध दार्शनिक अंदाज में अथवा आदर्शात्मक स्थिति में नहीं चलता है. इसके लिए व्यक्ति को बहुत व्यावहारिक रूप से कार्य करने की, अपनी सोच विकसित करने की आवश्यकता होती है. बस, जीवन निर्वहन के स्तर पर, जीवन का आनंद लेने के स्तर पर बहुसंख्यक लोग इसी का पालन नहीं कर पाते हैं. जीवन निर्वहन की व्यवहारिक सोच उसी समय कुंद पड़ जाती है जैसे ही हमें लगता है कि हमारा किसी के द्वारा उपयोग किया जा रहा है, जैसे ही हमें आभास होता है हम सबके दिल-दिमाग का हिस्सा नहीं हैं. क्या वाकई समाज का कोई भी व्यक्ति, किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति, कोई भी संस्था बिना सम्बंधित व्यक्ति की मंशा के उसका दोहन कर सकती है? उसका उपयोग कर सकती है? क्या कोई एक व्यक्ति सभी के लिए पसंदीदा हो सकता है? क्या कोई एक व्यक्ति समाज के सभी अंगों के लिए एकसमान रूप से स्वीकार्य हो सकता है? फिर विचार करिए इस पर, क्या वाकई आपका व्यक्तित्व इतना कमजोर अथवा हल्का है कि समाज का कोई भी अंग चाहे तो आपका उपयोग कर जाए वो भी बिना आपकी मर्जी के? यही मर्जी, आपकी यही इच्छा ही समाज में लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम करती है.


समाज में आज से नहीं वरन अनादिकाल से ही मुख्य रूप से दो तरह के लोग दिखाई देते रहे हैं. एक वे जो विशुद्ध रूप से आपके अपने हैं, आपकी संवेदनाओं-भावनाओं के स्तर से आपके अपने हैं. दूसरे वे जो आपके होने का नाटक करते हैं, आपको आपके होने का आभास करवाते हैं मगर वे आपके होते नहीं हैं. ऐसे लोगों के लिए आप प्रिय नहीं वरन उपयोगी वस्तु की तरह से होते हैं. इन दो के अलावा भी समाज में व्यक्तियों की चारित्रिक रूप से अनेक संरचनाएं पायी जाती हैं, जिन पर चर्चा कभी बाद में. अभी जिन दो तरह के लोगों पर बिंदु केन्द्रित है उसमें एक तो वे हैं जो विशुद्ध रूप से आपके हैं. यहाँ विशुद्ध का सन्दर्भ समझने की आवश्यकता है. ऐसे लोग बिना किसी लालच के, निस्वार्थ भाव से आपके साथ होते हैं. उनके लिए आपके पद, आपकी प्रस्थिति, आपकी आर्थिक संरचना आदि का कोई मतलब नहीं होता है. वे बस आपके ही होते हैं, आपके लिए ही होते हैं, समय-परिस्थिति कुछ भी बनी रहे. इसके अलावा दूसरे तरह के वे लोग जो आपके साथ होकर भी आपके नहीं होते. जो आपके साथ होने का आभास करवाते हैं मगर वे आपका उपयोग कर रहे होते हैं. यहीं आकर ज़िन्दगी का दर्शन, ज़िन्दगी का आदर्श समझने की आवश्यकता है.


आप दूसरे किसी भी व्यक्ति के लिए किस तरह से उपयोग किये जा रहे हैं, यह आपको समझना पड़ेगा. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपने खुद उन लोगों में अंतर करने का विचार कभी किया ही नहीं कि कौन विशुद्ध रूप से आपका है और कौन आपके होने का आभास करवा रहा है. यह चारित्रिक त्रुटि खुद आपकी ही होती है जबकि आप समाज के सभी तरह के लोगों को एक तराजू में तौलने का काम करने लगते हैं. ऐसे में विशुद्ध रूप से आपके लोग आपको नुकसान नहीं पहुँचायेंगे, आपका उपयोग नहीं करेंगे जबकि दूसरी तरह के लोग आपका उपयोग कर जायेंगे. ये भी संभव है कि विशुद्ध आपका साथ देने वाला, आपका हित चाहने वाला कभी-कभी कठोर शब्दों में आपको समाज की वास्तविकता से अवगत कराने का कार्य करे. ऐसा निश्चित ही आपको ख़राब अनुभव देगा. इसके ठीक उलट जो व्यक्ति आपका उपयोग करना चाहता होगा वह कभी भी आपके सामने आपकी मंशा के विपरीत बात नहीं करेगा. कभी भी आपको कठोर शब्दों में समझाने का कार्य नहीं करेगा. कभी भी आपको असलियत से परिचित करवाने का काम नहीं करेगा. 


बस, यही वह बिंदु होता है जहाँ आप उस व्यक्ति के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं. यही वह क्षण होता है जहाँ आपका उपयोग कर लिया जाता है. यही वह व्यक्ति होता है जो आपका उपयोग करके सहजता से आपसे किनारा कर लेता है. सही, गलत का चयन आपको करना है. कौन आपका है, कौन आपके होने का नाटक कर रहा है ये भी आपको पता करना है. कौन आपके साथ है, कौन आपका उपयोग कर रहा है इसका आभास भी स्वयं आपको करना है. जो आपके अपने हैं, विशुद्ध आपके अपने हैं, उनको इसका एहसास करवाने की आवश्यकता है. उनके एहसासों-संवेदनाओं को समझने की, उनको एहमियत देने की जरूरत है. यदि आप ऐसा करने में असमर्थ होते हैं तो आप एक बार नहीं बार-बार उपयोग किये जाते हैं, हरेक के द्वारा उपयोग किये जाते हैं. हर बार आपको उसके प्रिय होने का एहसास करा कर आपको ठेस पहुँचाने की कोशिश होती है. उसके इस कदम को कोई भले ही किसी रूप में स्वीकार करे किन्तु ध्यान रखना चाहिए कि जिसके लिए आप अपेक्षाओं का कटोरा (या कहें कि चाय का कप) बनना चाह रहे हैं वह स्वयं में कितना बड़ा है. कहीं ऐसा तो नहीं कि आप अपेक्षाओं का/चाय का प्याला बनते जा रहे हैं और वह बस बर्बाद किये जा रहा हो. यही बर्बादी का एहसास आपको अपने उपयोग किये जाने का एहसास करवाता है. यही एहसास आपको बताता है कि आप हर एक के लिए चाय का कप बनते जा रहे हैं (जबकि असलियत में ऐसा होता नहीं है), जिसे हर आने वाला एक घूँट मारकर, जूठा करके चला जा रहा है. आपको भुलाये जा रहा है. और आप हैं कि फिर से तैयार करके, साफ़ करके किसी और के लिए अपने आपको उपयोग करने के लिए प्रस्तुत किये जा रहे हैं.

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(विशेष - यह आलेख ऊपर वाले चित्र का अनुवाद नहीं है, न ही उसकी व्याख्या है.)

03 दिसंबर 2018

विश्वास को अविश्वास में न बदलने दो


विश्वास एक ऐसा शब्द है जो बड़ी मुश्किल से पैदा हो पाता है. चाहे व्यक्ति हो या फिर कोई जानवर, सभी के लिए विश्वास का होना, सभी में विश्वास का होना आवश्यक होता है. समाज में बिना विश्वास के एक पल भी व्यक्ति का टिक पाना संभव नहीं होता है. आपसी व्यवहार में दोस्ती, सम्बन्ध आदि के बीच विश्वास का अपना ही महत्त्व है. विश्वास महज एक-दो मुलाकातों का, चंद पलों की दोस्ती का, कुछ समय के संबंधों का प्रतिफल नहीं है वरन इसके पीछे व्यक्ति की मानसिकता, उसकी कार्यशैली, उसकी सोच, उसके व्यवहार की बहुत बड़ी भूमिका होती है. किसी व्यक्ति के प्रति सामने वाले का कैसा व्यवहार रहता है, उसकी भूमिका और व्यक्तित्व को वह कैसे विश्लेषित करता है, इसके आधार पर ही विश्वास जन्मता है. 


असल में विश्वास एक भावना है, एक तरह का आवरण होता है जिसके माध्यम से व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित भी समझता है, सहज भी समझता है. विश्वास के चलते ही कोई व्यक्ति किसी अन्य के साथ अपनी बात कहने में अपनी समस्या बताने में, अपना सुख शेयर करने में, अपनी ख़ुशी बाँटने में सबसे आगे रहता है. ये विश्वास ही है जिसके कारण व्यक्ति अपने आपको अकेला नहीं पाता है. यही विश्वास है जो समाज में आपस में संबंधों का विस्तार करता है, संबंधों की, रिश्तों की सुरक्षा करता है. इसके बाद भी कई बार स्वार्थ के चलते अनेकानेक लोग आपसी संबंधों में विश्वासघात कर बैठते हैं. ऐसा करने के पीछे उनकी मानसिकता सिर्फ और सिर्फ अपना लाभ लेने की होती है. वे एक पल को भी ये याद नहीं रखते हैं कि उनके इस कदम से सामने वाले के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा. वर्तमान में जिस तरह के हालात बनते चले जा रहे हैं उससे लोगों में आपसी विश्वास में जबरदस्त तरीके से कमी आई है. आज हालत ये है कि लोग आपसी सगे रक्त-संबंधियों के बीच भी अविश्वास बनाने लगे हैं. कतिपय स्वार्थी लोगों के कारण सभी को अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में आवश्यकता इसकी है कि लोगों के बीच पुनः विश्वास कायम किया जाये. इसके लिए लोगों को न केवल अपनी मानसिकता में सुधार लाना होगा बल्कि आपसी रिश्तों में शुचिता, पवित्रता लानी होगी.

13 अप्रैल 2018

अपराध-नियंत्रण हेतु संकुचित मानसिकता से मुक्ति पानी होगी


अब हम सभी लोग वाकई बुद्धिजीवी वर्ग में शामिल हो चुके हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यही एक वर्ग ऐसा है जो भावनात्मक होकर कभी किसी बात पर विचार नहीं करता है वरन हर एक बात को बुद्धि के तराजू से तौलता है. दिल के बजाय दिमाग का उपयोग करते हुए यह वर्ग सारे पहलुओं पर सिर्फ और सिर्फ गैर-भावनात्मकता से सोचता-विचारता है. हम सब भी आजकल कुछ ऐसा ही करने लगे हैं. कितना भी बड़ा हादसा हो जाये, कितनी भी छोटी बात हो जाये हम सभी सिर्फ और सिर्फ अपनी बंधी-बंधाई विचारधारा से ही सोचने का काम करते हैं. हमारे आसपास चाहे बलात्कार हो चाहे हत्या हो, चाहे हिंसा हो, चाहे किसी महिला को परेशान किया जा रहा हो, चाहे किसी बुजुर्ग को सताया जा रहा हो हम सभी मामलों में अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार विचार करना शुरू कर देते हैं. उस समय प्रताड़ित व्यक्ति हमारे लिए इन्सान नहीं रहता है बल्कि उस समय वह किसी धर्म का होता है, किसी जाति का होता है, किसी दल विशेष का होता है. हम सब उस व्यक्ति को उसी खाँचे में फिट करके उसी के अनुसार उसके साथ घटित घटना का आकलन, विश्लेषण करने लगते हैं. उस समय हमारे दिमाग में, हमारी नजर में उस व्यक्ति के साथ घटित होने वाली घटना की वीभत्सता नहीं होती है वरन एक विशेष खाँचे में उसका फिट होना होता है.


कभी सोचा है कि आखिर ऐसा क्यों होने लगा है? कभी विचार किया है कि ऐसा विगत तीन-चार वर्षों से ही क्यों दिखाई देने लगा है? क्या कभी इस पर विचार किया गया है कि एक सी घटना पर हम सभी दो अलग-अलग विचार कैसे अपना लेते हैं? हमारे लिए उस समय न तो पीड़ित व्यक्ति की उम्र मायने रखती है, न उसका क्षेत्र मायने रखता है, बल्कि इतना याद रहता है कि उसके प्रति वैचारिक आन्दोलन खड़ा करने के क्या लाभ, क्या हानि है. इधर भी कुछ ऐसा होने में लगा है. बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है, बच्चियों की हत्या हुई है मगर उसके बाद भी वे लोग जो खुद को बुद्धिजीवी घोषित किये फिरते हैं, इन वारदातों को भी हिन्दू-मुस्लिम नजरिये से देख रहे हैं. सोचने वाली बात है कि आप एक बच्ची के लिए न्याय मांगते हैं और दूसरी बच्ची को नजरअंदाज कर देते हैं, कैसे? आखिर बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग ऐसा किसे कर लेते हैं कि एक बच्ची के लिए आन्दोलन छेड़ देते हैं और उसी तरह की विभीषिका को झेलने वाली दूसरी बच्ची के प्रति संज्ञाशून्य बन जाते हैं? आखिर पढ़ने-लिखने वाले कैसे एक जैसी दो घटनाओं में अपनी-अपनी विचारधारा को खोज लेते हैं?

समाज में अपराध रोकना बहुत आसान है, बस हम नागरिक आपस में राजनीति करना बंद कर दें. कोई भी अपराधी इतना बलशाली नहीं होता कि वह पूरे समाज को अपने कब्जे में कर सके. देखा जाये तो वह चंद वैचारिक लोगों को अपने काबू में कर लेता है और फिर यही लोग उसके अनुसार काम करना शुरू कर देते हैं. जैसे ही उसे लगता है कि उसका लाभ किसी विषय विशेष से है वह उसी के अनुसार अपनी चालें चलने लगता है. यहाँ पढ़ने-लिखने वाले, खुद को बुद्धिजीवी बताने वाले सहज भाव से उसके साथ चलना शुरू कर देते हैं. यहाँ उन चंद लोगों को नहीं वरन हम सबको सोचने की आवश्यकता है. समझना होगा कि नुकसान हमारा हो रहा है. परिवार हमारे नष्ट हो रहे हैं. सदस्य हमारे प्रताड़ित हो रहे हैं. यदि हम सब संकुचित मानसिकता से मुक्ति नहीं पाते हैं तो फिर कल को प्रताड़ना के कदम हमारे परिवार के भीतर पहुँच सकते हैं. सोचिये क्या तब भी हम सब जाति, धर्म, क्षेत्र, दल जैसी संकुचित मानसिकता में, खाँचे में फँसे रहेंगे?

12 अप्रैल 2018

स्वार्थमय सोच


दूर कहीं से आती एक चीख ने 
दिल दहला दिया,
घबरा कर हमने
अपने को समेट कर
घोंसले रूपी घर में छिपाया,
उस चीख में छिपे भय को
अपने आसपास पाया।
कहीं वह भय, कहीं यह चीख
हमारी शांति को न छीन ले?
कहीं उस चीख में छिपी
करुणा, वेदना
हमसे कुछ माँगने न लगे?
इसी डर से, इसी भय से हम
छिपे रहते हैं।
बगल के कमरे में सोती
पुत्री को देखते हैं,
डरते हैं कि कहीं उस चीख में
छिपे न हों काले हाथ, जो
प्रविष्ट होकर हमारे घर में
लूट न लें अस्मत।
कभी माँ से लिपट कर सोते
मासूम बेटे को देखते हैं,
कभी कमरे की खिड़कियों का
ठीक से लगा होना देखते हैं।
उस समय हमारे सामने होता है
हमारा परिवार, हमारा घरबार।
वही छोटी सी दुनिया होती है
हमारा वतन, हमारा चमन।
कितने निर्मोही, स्वार्थी, अंधे होकर
बना लेते हैं
एक भरोसे का अदृश्य घेरा,
आपस में सिमट कर सभी
हो जाते हैं एकाकार,
दुबक जाते हैं अपने आप में
करके घुप्प अंधकार।
उस चीख का कारण भी नहीं खोजते।
कभी यह भी न सोचते कि
क्यों उत्पन्न हुई वह चीख?
क्यों उपजा वह शोर
खामोशी को चीर?
कहीं वह चीख भूख से दम तोड़ते
किसी बालक की तो नहीं?
किसी घर के कोने में जल रही
किसी नारी की तो नहीं?
कहीं उस चीख में
किसी बुढ़ापे का सहारा
तो नहीं छिना?
उस चीख ने किसी का
सुहाग तो नहीं उजाड़ा?
हो सकता है कि वह शोर
किसी नारी की इज्जत मिटने का हो,
मदद को, हमें,
चीख कर पुकारा हो?
पर नहीं...
हम स्वार्थपरक सोच लिए,
उन्नत विचारों और
उच्च मानसिकता का ढोंग लिए
अनसुना कर देते हैं
उस आवाज को
और समा जाते हैं
अपने संसार में,
अपने छोटे से
स्वार्थमय संसार में।