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10 सितंबर 2026

अस्सी के दशक में पहुँचने की भेड़चाल

'अस्सी' को काशीनाथ सिंह ने 'काशी का अस्सी' लिख कर प्रसिद्ध कर दिया था, अब फेसबुक की भसड़ में अस्सी के दशक का पुनर्पाठ किया जा रहा है. जिसे देखो वो अपनी अस्सी के दशक की फोटो बनाये-चिपकाये पड़ा है. इसमें हास्यास्पद स्थिति ये है कि ऐसे लोग जिनका जन्म भी अस्सी के दशक में नहीं हुआ था, वे भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहयोग से बाकियों की बुद्धि ख़राब करने में लगे हैं.

 

ठीक है, तकनीक का आनंद उठाना चाहिए, जीवन में इस तरह से हलके-फुल्के पलों को भी जीना चाहिए मगर क्या ही अच्छा और सुखद महसूस होता यदि जिन्होंने अस्सी के दशक का खुशनुमा जीवन जिया है, जीवंत ज़िन्दगी का आनन्द उठाया है, वे लोग बजाय AI से बनी अथवा अपनी असली फोटो लगाने के स्थान पर उन दिनों की स्मृतियों को लिखते. गर्मी की छुट्टियों की तफरी, आम का स्वाद, तरबूज-खरबूज का रस, छतों पर बैठकर एकसाथ भोजन का मजा, लालटेन की रौशनी में पढ़ाई, रामलीला में जगह घेरने की कवायद, मैदान पर खेलने को जगह बनाने की कुश्ती, दोस्तों के संग शैतानियों का साम्राज्य खड़ा करना, कॉमिक्स की दुनिया में खो जाना, राजन-इकबाल सीरीज के साथ जासूस बन जाना, किराये की साईकिल लेकर धुरंधर हवावाजी करना आदि-आदि कितना कुछ था बताने को, लिखने को.

 

इन सबके बजाय उन दिनों के लोगों ने भी चित्र चिपकाना, झूठे चित्र बनाना पसंद किया. शायद लिखने से ज्यादा आसान लगा होगा AI से फोटो बनवा कर चिपका देना या फिर एल्बम से फोटो निकाल उसकी कॉपी लगा देना.


12 मई 2026

सोशल मीडिया और फोटो का चस्का

सोशल मीडिया और फोटो का चस्का.

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बहुतेरे लोगों को इस 'चस्का' शब्द पर आपत्ति होगी और वे ज्ञान ठेलने चले आयेंगे. इससे पहले कि ऐसे लोग अपना ज्ञान ठेलें, उनमें इस चस्का की असलियत पेल देते हैं.

 

हम सब लगभग रोज ही देखते हैं कि किसी न किसी दुखद समाचार पर पीड़ित परिवार से मिलने नेता बिरादरी पहुँचती है. सांसद-विधायक टाइप लोग भी होते हैं तो पदाधिकारी और कार्यकर्त्ता टाइप भी. दुखद समाचार कभी किसी के निधन का होता है, कभी त्रयोदशी का, कभी किसी दुर्घटना का..... ऐसे किसी भी दुखद समाचार के सन्दर्भ में अपनी संवेदना प्रकट करने वाले लोगों के चेहरे पर मुस्कान तैरती ही रहती है.

 

इन संवेदनात्मक रूप से भरे बैठे लोगों को कोई ये समझाए कि किसी के निधन पर, किसी की त्रयोदशी पर शोक-संवेदना प्रकट की जाती है. ऐसे में पहले तो फोटो सेशन से बचना चाहिए और यदि फोटो खिंचवाने का, सोशल मीडिया में अपलोड करने का लोभ संवरण नहीं हो पा रहा है तो कम से कम अपनी हँसी-मुस्कान को अपने काबू में रख लिया करें. हर जगह फोटो खिंचवाने पर हँसना अनिवार्य नहीं होता है.


15 अप्रैल 2026

सोशल मीडिया उपयोग का दबाव क्यों?

सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों को विभिन्न कार्यक्रम संपन्न करवाए जाने सम्बन्धी प्रस्ताव भेजा जाना समझ आता है. इन कार्यक्रमों की रिपोर्ट बनाना, उसको जियो-टैगिंग फोटो-वीडियो के साथ सम्बंधित कार्यालय को भेजना भी समझ आता है. इस समझ आने वाली स्थिति के बीच समझ ना आने वाली स्थिति ये है कि इन कार्यक्रमों की फोटो, वीडियो को सोशल साइट्स (फेसबुक,  इन्स्टाग्राम, यूट्यूब आदि) पर अपलोड करके उसकी लिंक भी उपलब्ध करवाना होता है. आखिर ऐसा क्यों? ये सोशल साइट्स न तो आधिकारिक रूप से सरकार के अंग हैं, न ही इनको किसी भी प्राध्यापक, संस्थान द्वारा उपयोग में लाना जाना अनिवार्य बनाया गया है.

 

सरकार की इस तरह की अनावश्यक गतिविधि ही किसी भी संस्थान के तानाशाह प्रवृत्ति की मानसिकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती है. यही कारण है कि विश्वविद्यालय स्तर पर, महाविद्यालय स्तर पर, विभागीय स्तर पर व्हाट्सएप ग्रुप की भरमार है. इस तरह के जी के जंजाल से कभी मुक्ति मिलेगी या फिर ये जंजाल किसी दिन सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था की जान लेकर ही मानेगा?


21 अगस्त 2025

डिजिटल युग में हिन्दी भाषा का विकास

समय के साथ-साथ हिन्दी भाषा अपना विस्तार करती जा रही है. अपने देश में भले ही हिन्दी को लेकर विवाद जैसी स्थिति रहती हो मगर वैश्विक स्तर पर हिन्दी लगातार विकास कर रही है. वर्तमान डिजिटल युग में अनेकानेक स्थितियाँ ऐसी हैं, जिनके सन्दर्भ में भाषाई स्तर को, उसके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है. इसी में हिन्दी भाषा ने भी अपने स्वरूप को बढ़ाया है.

 

डिजिटल युग में हिन्दी की प्रासंगिकता को लेकर किसी भी तरह के भ्रम की स्थिति नहीं है. तकनीक का भाषाई विकास में प्रमुख योगदान है. इंटरनेट, सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स और ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा ने हिन्दी के उपयोग को बढ़ाया है. तकनीक के विस्तार के चलते ही अनेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म आज समाज में प्रचलित हैं. फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि माध्यमों में आज हिन्दी भाषा में पर्याप्त सामग्री मिल रही है. रील्स के द्वारा हो या फिर वीडियो के द्वारा, लिखित सामग्री हो या फिर कोई चित्र सभी में बहुतायत में हिन्दी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है. बहुसंख्यक लोग भी अन्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ हिन्दी में संवाद करना पसंद कर रहे हैं.

 

इसके अलावा अनेक कम्पनियाँ ऐसी हैं जिनका व्यापार, कारोबार डिजिटल रूप में होता है. बहुत सारे नागरिक, युवा आज डिजिटल माध्यम से खरीददारी करने में अधिक विश्वास करते हैं. इनके लिए भी ऑनलाइन व्यापार करने वाली कम्पनियों ने हिन्दी माध्यम को भी अपना रखा है. अमेज़न, फ्लिपकार्ट जैसी कम्पनियों द्वारा अपने इंटरफेस को हिन्दी में उपलब्ध कराया जा रहा है. यह बभी हिन्दी के विस्तार को दर्शाता है. ऐसा होने के कारण इन कम्पनियों से जुड़ने वाले लोग शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों से भी हैं.

 

देखा जाये तो हिन्दी अब केवल भाषा नहीं, केवल बोलचाल का माध्यम नहीं बल्कि वह सांस्कृतिक आधार का निर्माण कर रही है, आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में भी एक सशक्त माध्यम बनकर स्थापित हो चुकी है.

 

16 जून 2025

भावनाओं से खिलवाड़

अहमदाबाद हवाई जहाज दुर्घटना के अंतिम कुछ सेकेण्ड के फोटो, वीडियो....

इस तरह की बहुत सी पोस्ट दिखाई देने लगी हैं. सोशल मीडिया में हवाई जहाज दुर्घटना के बाद से एकदम से फोटो और वीडियो की बाद सी आ गई. अपनी-अपनी पोस्ट पर लाइक, शेयर, कमेंट बटोरने के चक्कर में भावनात्मकता, संवेदना को दरकिनार करते हुए फोटो और वीडियो अपलोड करने में लगे हुए हैं. लाइक, शेयर, कमेंट करने वाले भी बिना सत्य जाने, बिना तथ्य जाने आँखें बंद किये उसी दिशा में बहे जा रहे हैं. अंतिम समय के फोटो में भी उन्हीं तीन मासूम बच्चों के फोटो सामने आ रहे हैं जो अपने माता-पिता के साथ लन्दन शिफ्ट होने के लिए जा रहे थे. निश्चित रूप से फोटो-वीडियो के द्वारा लोगों की भावनाओं से खेलने वाले जानते हैं कि किस फोटो से उनको ज्यादा से ज्यादा शेयर, लाइक मिलने वाले हैं.

 



यहाँ एक बात समझ नहीं आ रही कि ये सबकुछ ख़त्म होने के अंतिम कुछ सेकेण्ड पहले की फोटो, वीडियो किसने लिए? किसने सार्वजनिक किये?

 

क्या उन बच्चों के माता-पिता अपने पूरे परिवार की मौत को लेकर, हवाई जहाज की दुर्घटना को लेकर एक तरह से आश्वस्त हो चुके थे, तभी उन्होंने चिल्लाते-चीखते बच्चों को सँभालने की बजाय उनकी फोटो खींचकर अपने किसी परिचित को भेजे, अपने किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड किये?

 

क्या जहाज के अन्दर कोई सीसी टीवी कैमरा टाइप कुछ रहता है जो किसी नेटवर्क के माध्यम से लगातार फोटो, वीडियो बनाता हुआ कहीं धरती पर बने सेंटर को भेजता रहता है?

 

क्या इसी जहाज में कोई ऐसा व्यक्ति था जो बिना डर, भय, बचने की कोशिश के फोटो, वीडियो खींच कर अपने किसी परिचित को लगातार भेजता रहा?

 

क्या दुर्घटना स्थल से किसी व्यक्ति का अथवा कई व्यक्तियों के मोबाइल इस हालत में मिले हैं, जिनसे ये फोटो, वीडियो निकाल कर सार्वजनिक किये जा रहे हैं?

 

सोशल मीडिया में तैर रहे तमाम एविएशन एक्सपर्ट इस बारे में भी अपनी विशेषज्ञतापूर्ण राय दें.


20 जनवरी 2025

महाकुम्भ में बौराया सोशल मीडिया

हिन्दू धर्म की सर्वाधिक पवित्र और प्राचीन परम्पराओं में से एक कुम्भ का आयोजन है. इसके आयोजन के पीछे अनेक पौराणिक, धार्मिक और खगोलीय कारण हैं. वर्तमान में प्रयागराज में महाकुम्भ का आयोजन हो रहा है. गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों की त्रिवेणी की भांति ही यहाँ ज्ञान, भक्ति और कर्म की त्रिवेणी का संगम है. यह समय आत्मशुद्धि, आस्था और ध्यान के लिए उपयुक्त माना गया है. पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय देव और दानवों के बीच हुई रस्साकशी में अमृत की बूँदें बारह स्थानों पर गिरी थीं. जिनमें चार स्थान पृथ्वी पर और आठ देवलोक में हैं. पृथ्वी में ये चार स्थान प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक के रूप में चिन्हित हैं. प्रयागराज में संगम, हरिद्वार में गंगा, उज्जैन की क्षिप्रा और नासिक की गोदावरी नदी के तट पर कुम्भ का आयोजन होता है.

 

कुम्भ की तिथियाँ खगोलीय घटनाओं के आधार पर निर्धारित होती हैं. सूर्य और बृहस्पति ग्रह की स्थिति का इससे गहरा सम्बन्ध है. चूँकि बृहस्पति को अपनी कक्षा में बारह वर्ष का समय लगता है, इसलिए इसका आयोजन प्रत्येक बारह वर्ष में होता है. प्रयागराज में कुम्भ का आयोजन उस समय होता है जब सूर्य मकर राशि में और बृहस्पति वृष राशि में होता है. इसी तरह से सूर्य के मेष राशि में और बृहस्पति के कुम्भ राशि में आने पर हरिद्वार में, सूर्य के कर्क और बृहस्पति के सिंह में आने पर नासिक में तथा सूर्य के मेष राशि में और बृहस्पति के सिंह राशि में आने पर उज्जैन में कुम्भ मेला आयोजित होता है. प्रयागराज में दो कुम्भ पर्वों के बीच छह वर्ष के अन्तराल में अर्धकुम्भ भी होता है. नासिक और उज्जैन में बृहस्पति के सिंह राशि में होने के कारण यहाँ के कुम्भ मेले को सिंहस्थ भी कहा जाता है.

 



महाकुम्भ सनातन परम्परा के प्रतीक, गंगा स्नान, तीर्थ दर्शन और साधु-संतों के त्रिवेणी तट पर आगमन, कल्पवास करने का पर्व नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ने का सशक्त माध्यम है. इसके साथ-साथ यह भक्ति-भाव से भगवान और भक्त के आपस में मिलन का विराट आयोजन है. महाकुम्भ में परम्परा, मान्यता, वेदांती, महामंडलेश्वर, संत, गृहस्थ, विद्वान, निर्गुण, सगुण आदि के माध्यम से भारतीय संस्कृति, सनातनता के विविध मनोहारी रंग, गुण, कलाएँ आदि देखने को मिलते हैं. कहीं यज्ञ हो रहा है, कहीं कथा हो रही है, कहीं ध्यान तो कहीं प्रवचन. कहीं नागा संन्यासियों का समाधि-बोध का सुख है तो कहीं अमरत्व की चाह में त्रिवेणी के पावन जल में डुबकी लगाती श्रद्धालुओं की भीड़. पवित्रता, पावनता, ज्ञान, कर्म, भक्ति, साधना, ध्यान, योग, समाधि आदि से ओत-प्रोत सनातन संस्कृति के इस विशाल आयोजन को सोशल मीडिया के कुछ अराजक तत्त्वों ने तमाशा बना दिया है.

 

सोशल मीडिया की संपादकत्वविहीन कार्यशैली ने उच्छृंखलता को बढ़ाया है. इसके द्वारा महाकुम्भ में आये लाखों श्रद्धालुओं, साधुओं, संन्यासियों, वैरागियों की भक्ति, आस्था और वैराग्य का मजाक बनाना शुरू कर दिया गया. इनको आईआईटी का युवा साधु, माला बेचती युवती की आँखें, युवा साध्वी का दैहिक सौन्दर्य ही आकर्षण का केन्द्र समझ आया. महाकुम्भ की पावनता, ज्ञान, भक्ति से इतर सोशल मीडिया के लिए ये लोग फूहड़ सवालों, सेल्फी, वीडियो आदि का केन्द्रबिन्दु बने. विडम्बना देखिये कि इसी अतिवादिता के कारण इन तीनों को महाकुम्भ से प्रस्थान करना पड़ा. अखाड़ों के क्रिया-कलाप, नागा संन्यासियों की समाधिस्थ भावना, साधु-संतों की ध्यान प्रक्रिया, गृहस्थों द्वारा किया जा रहा कल्पवास, जगह-जगह होते प्रवचन, पौराणिक कथाएँ, सांस्कृतिकता आदि सोशल मीडिया के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रही.



 

ऐसा नहीं कि महाकुम्भ में पहुँचने वाला प्रत्येक साधु, संन्यासी शास्त्रों का ज्ञाता ही हो. अनेक तो पूर्ण निरक्षर भी होंगे किन्तु वे अपना सम्पूर्ण जीवन भगवद-भक्ति में समर्पित कर चुके हैं. सम्भव है कि उनके पास सोशल मीडिया के कथित चैनलों के अनर्गल प्रश्नों के उत्तर न हों. सम्भव है कि उनके पास फूहड़ कुतर्कों की काट भी न हो. उनके पास अपने आराध्य देव के प्रति श्रद्धा है, धर्म में आस्था है. ऐसे सहज लोगों के मुँह में जबरन माइक डाल कर कुछ व्यूज, लाइक आदि के लिए उन्हें अज्ञानी बताया जा रहा है. महाकुम्भ का उद्देश्य गंगा स्नान, संत दर्शन, और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करना है. ऐसे में धर्म, ज्ञान, साधना आदि से अनभिज्ञ सोशल मीडिया के उतावले लोग कुम्भ की प्रतिष्ठा पर चोट कर रहे हैं.

 

शासन-प्रशासन को चाहिए कि वह महाकुम्भ क्षेत्र में नियंत्रित मीडिया मंचों को ही अनुमति प्रदान करें. अनर्गल रूप से सोशल मीडिया पर दिखती रील्स, वीडियो के द्वारा जहाँ महाकुम्भ की पावनता, प्रतिष्ठा, आस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं वहीं मीडिया चैनलों की भूमिका, छवि भी धूमिल हो रही है. जिस तरह से सम्पूर्ण क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था में सुरक्षाकर्मी, कैमरे, आधुनिक तकनीक कार्य कर रही है, उसके माध्यम से ही असभ्य सोशल मीडिया, यूट्यूबरों, रील्स बनाने वालों को प्रतिबंधित किया जाये. सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपमानजनक, अमर्यादित सामग्री को हटाने सम्बन्धी निर्देश जारी करने चाहिए.

 

हम सभी को समझना होगा कि त्रिवेणी संगम को जीवन के यथार्थ में उतारना कुम्भ का संदेश है. जिसमें दृश्य और दृष्टि गंगा, यमुना की भांति प्रत्यक्ष बह रही है वहीं दर्शन सरस्वती की भांति अदृश्य होकर प्रवाह बनाये है. जो दिखता है वह तो सत्य है ही पर जो नहीं दिखता है वह भी परम सत्य है. महाकुम्भ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है बल्कि हमारी सनातन संस्कृति का प्रतीक है. इसकी पवित्रता बनाए रखना सभी का कर्तव्य है. इसे तमाशा बनाने वालों के खिलाफ खड़ा होना हम सभी का कर्तव्य है. कथित माइकधारियों और उनकी फूहड़ रिपोर्टिंग को रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों को सशक्त कदम उठाने होंगे.

 


18 जनवरी 2025

मीडिया की आड़ में महाकुम्भ की नौटंकी

मीडिया में जिस तरह से असंवेदनशील लोग घुस चुके हैं, उससे विषयों का लगातार क्षरण हो रहा है. हर हाथ में स्मार्ट फोन का कैमरा, इंटरनेट, सोशल मीडिया का मंच होने से सभी को किसी न किसी मीडिया मंच का मालिक बना रखा है. जहाँ मन हुआ मुँह उठाकर घुस गए. इसी मुँह उठाकर घुसने की प्रवृत्ति के कारण विषयों का गाम्भीर्य गायब होता जा रहा है. इसका उदाहरण प्रयागराज में चल रहा पावन महाकुम्भ है. जिसे देखो वो मुँह उठाये खुद को स्वयंभू मीडिया चैनल घोषित करके गम्भीरता से इतर बस दो कौड़ी की रील बना-बना ठेलने में लगा है. किसी को माला बेचती युवती की आँखें दिख रही हैं, किसी को IIT वाला बाबा दिख रहा है, किसी को स्त्री-सौन्दर्य आकर्षित करने में लगा है.

 



मोबाइल के सहारे क्रांति करते कथित मीडिया व्यक्तियों को शायद जानकारी नहीं होगी कि महाकुम्भ किसे कहते हैं? नागा बाबा कौन हैं? अखाड़ों का वास्तविक अर्थ क्या है? पूरे महाकुम्भ में मात्र कुछ दिन ही विशेष स्नान क्यों होते हैं? त्रिवेणी में तीसरी नदी कहाँ है? और भी बहुत सी महत्त्वपूर्ण जानकारी इन कम-दिमाग वालों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं. इनको बस ये पता करना है कि किस युवती की आँखें ज्यादा मोहक हैं? कौन सी युवती सर्वाधिक मोहक साध्वी है? देह के आकर्षण में खोये ये बददिमाग कथित मीडियामैन महाकुम्भ में भी सिर्फ रील बनाने का 'माल' खोज रहे हैं. इनको महाकुम्भ की गहराई से कोई मतलब नहीं. महाकुम्भ के भावार्थ से कोई लेना-देना नहीं. प्रयागराज की गम्भीरता का कोई मोल नहीं? त्रिवेणी के अलौकिक सौन्दर्य का कोई महत्त्व नहीं.

 


08 जनवरी 2025

सोशल मीडिया की कैद में बच्चे

इंटरनेट के युग में कुछ समय पहले तक सोशल मीडिया जैसे शब्द की अवधारणा नहीं थी. समय के साथ जैसे-जैसे इंटरनेट तकनीक ने विकास-गति को पकड़ा, अनेक नए-नए शब्द जुड़ते चले गए. सोशल मीडिया ऐसे ही शब्दों में से एक है. आज स्थिति यह है कि लोगों का अधिकतम समय सोशल मीडिया पर बीत रहा है. ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि किसी दिन एक ऐसा मंच उपलब्ध होगा जिसके माध्यम से अपने मित्रों से बातचीत की जा सकेगी, जहाँ से अपने मन की खरीददारी भी हो सकेगी. पढ़ने-लिखने का माध्यम भी यह मंच बनेगा. आज सोशल मीडिया दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है. इस महत्त्वपूर्ण मंच के सुखद पहलुओं के बीच एक दुखद पहलू यह भी सामने आया कि सोशल मीडिया की गिरफ्त में बच्चे बहुतायत में हैं. उनके द्वारा दिन का बहुत सारा समय सोशल मीडिया पर गुजारा जा रहा है.

 

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ पीडियाट्रिक रिसर्च की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 88 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं. इनमें से लगभग 81 प्रतिशत व्हाट्सएप का और लगभग 55 प्रतिशत फेसबुक का उपयोग कर रहे हैं. देश में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग आदि का उपयोग करने वाले बच्चे नौ से सत्रह वर्ष की उम्र के हैं, जो प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक समय यहाँ बिताते हैं. डिजिटल युग में तेजी से उभरते इन आँकड़ों को सुखद तो नहीं कहा जा सकता है. ऐसे में जबकि कोरोनाकाल की ऑनलाइन शैक्षिक व्यवस्था के बाद से लगभग प्रत्येक बच्चे के हाथ में स्मार्टफोन, इंटरनेट की सुविधा सहज रूप में उपलब्ध है तो उसका सोशल मीडिया पर आना भी सहज ही है. सोशल मीडिया पर आने की सहजता और सोशल मीडिया का नियंत्रण मुक्त होना निश्चित रूप में बाल-मन, किशोर-मन के लिए घातक है. ऑनलाइन शिक्षा की आड़ में वे क्या देख रहे हैं, किस वेबसाइट पर जा रहे हैं इसे देखना-समझना आवश्यक है. इंटरनेट की दुनिया में मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका नकारात्मक असर बच्चों पर, किशोरों पर देखने को मिल रहा है. ओटीटी की वेबसीरीज की अश्लीलता को, गालियों को, अश्लील भाव-भंगिमा को सोशल मीडिया में तैरती बहुतायत रील्स में देखा जा सकता है. गालियों, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्म, लिहाज बना हुआ था, वह लगभग समाप्त हो गया है. इसके चलते इनके स्वभाव में, दैनिक-चर्या में फूहड़ता, अश्लीलता, हिंसा, क्रूरता आदि दिखने लगी है.

 



बच्चों के सोशल मीडिया पर बढ़ते चलन को देखते हुए पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिबंधित करने सम्बन्धी एक विधेयक पारित किया गया. इस विधेयक के आने के बाद ऑस्ट्रेलिया के सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चे फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक आदि जैसे सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. इस विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि सोशल मीडिया कम्पनियाँ बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक नहीं लगा पाती हैं तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जायेगा. ऐसा वैश्विक रूप में किसी देश द्वारा पहली बार किया गया है. इस विधेयक के पारित होने के बाद बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को प्रतिबंधित किये जाने सम्बन्धी बहस भी छिड़ी. सैद्धांतिक रूप में यह कदम भले ही सार्थक लगता हो मगर व्यावहारिक रूप में इसे अमल में लाना मुश्किल ही है. आखिर किसी सोशल मीडिया कम्पनी-एजेंसी द्वारा यह कैसे निर्धारित किया जायेगा कि सम्बंधित सोशल मीडिया मंच का इस्तेमाल सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चे द्वारा नहीं किया जा रहा है? तकनीकी ज्ञान में पूर्णतः सक्षम आज के सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए छद्म नाम, जन्मतिथि आदि के द्वारा सोलह वर्ष से अधिक का होने में कितना समय लगेगा.

 

ऐसे में यदि समाज, सरकार वाकई इसे लेकर गम्भीर है कि बच्चों का बहुतायत समय सोशल मीडिया पर गुजर रहा है तो उसे किसी विधेयक जैसी सैद्धांतिक स्थिति के साथ-साथ कुछ व्यावहारिक कदमों को भी उठाना होगा. स्मार्टफोन की पैरेंटल कंट्रोल सुविधा को और सशक्त करना होगा. इसके द्वारा अभिभावकों को भी अपने बच्चों के स्मार्टफोन में तमाम वेबसाइट को, सोशल मीडिया मंचों को प्रतिबंधित करना होगा. इसके साथ-साथ बच्चों को सोशल मीडिया से, इंटरनेट से होने वाले नुकसान के बारे में भी समझाया जाना होगा. आपराधिक दुनिया की जानकारी देते हुए उनके डिजिटल अरेस्ट, साइबर क्राइम, चाइल्ड पोर्नोग्राफी आदि जैसी नकारात्मकता से भी परिचित करवाना होगा. जरा-जरा सी बात को, घटना को सोशल मीडिया पर अपलोड करने, अपने दोस्तों, परिजनों के साथ शेयर करने की हानियों से परिचित करवाना होगा. उनकी इस प्रवृत्ति को रोकने का कार्य भी करना होगा. इसके साथ-साथ बच्चों को सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से इतर वास्तविक दुनिया की तरफ ले जाना होगा. उनको परिवार के साथ अधिक से अधिक समय बिताने को प्रोत्साहित करना होगा. मोबाइल, कम्प्यूटर, ऑनलाइन गेमिंग के स्थान पर मैदानों में खेलने को वरीयता देनी होगी. इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कम से कम उपयोग करने का कदम उठाना होगा. शिक्षा, संस्कारों को मोबाइल, कम्प्यूटर के स्थान पर परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा, शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से दिए जाने का कार्य पुनः करना होगा. पारिवारिक वातावरण को सकारात्मक, संस्कारित बनाते हुए बच्चों को सोशल मीडिया के चंगुल से मुक्त करवाया जा सकता है.

 


20 नवंबर 2024

whatsapp को अपना जीवन न बना लें

आजकल जरा-जरा से काम के लिए whatsapp का उपयोग किया जा रहा है. घरेलू, मित्रवत सम्बन्धों में इसका इस्तेमाल किये जाने के साथ-साथ सरकारी, गैर-सरकारी कार्यों में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. Whatsapp के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही इसके दुरुपयोग की घटनाएँ भी बढ़ने लगी हैं. आये दिन किसी न किसी व्यक्ति के, परिवार के इसके द्वारा ठगे जाने की खबरें पढ़ने-सुनने को मिलती हैं. ऐसे में आवश्यक है कि हम सब सुरक्षित रहें, सतर्क रहें. भले ही whatsapp के माध्यम से बहुत से कार्य सम्पन्न किये जाते हों मगर इसे अपना जीवन ना समझ लें, उसे अपनी आफ़त ना बना लें.




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समाचार साभार-

दैनिक जागरण

कानपुर संस्करण

18-11-2024

 

24 सितंबर 2024

सोशल मीडिया में फैलती भ्रामकता

सामाजिक संरचना में ऐसी कोई भी स्थिति जो नियंत्रण-मुक्त है, वह अकसर अनावश्यकता को जन्म देने लगती है. वर्तमान में ऐसी स्थिति सोशल मीडिया के सन्दर्भ में नजर आ रही है. इसके विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म एक तरह के नियंत्रण में होने के बाद भी आम नागरिक के लिए मुफ्त और अनियंत्रित रूप में उपलब्ध हैं. विचारों का प्रसार करने के साथ-साथ लोगों के मन में भावना रहती है कि उनके विचारों को स्वीकारने वाले अधिक लोग हों. स्वीकारने जैसी अवस्था कब थोपे जाने में बदल जाती है पता ही नहीं चलता है. ऐसी वैचारिकी भी अक्सर भ्रामक, तथ्यहीन नजर आती है. अब विचारों के लिए किसी तरह के स्व-अध्ययन की आवश्यकता नहीं बस इंटरनेट की कृपा से घूम-टहल कर बस इतना देखना है कि खुद के मन की बात कहाँ लिखी हुई है. उसे कॉपी करना है और शेयर करके दूसरों तक पहुँचाना है.  

 

यदि पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया की विषय-सामग्री पर गौर किया जाये तो सहज एहसास हुआ होगा कि बिना सोचे-समझे, बिना तथ्यों की जाँच किये प्रकाशित, शेयर की गई विषय-वस्तु को अंतिम सत्य मानकर उसका प्रसारण चलता रहता है. आये दिन किसी बालक-बालिका की तमाम तरह के चिकित्सकीय उपकरणों से घिरी तस्वीर सोशल मीडिया में दिखती है. अत्यंत संवेदित तरीके से प्रस्तुत पोस्ट पर उसके लिए लाइक, शेयर के माध्यम से धनराशि जुटाने की चर्चा होती है. तस्वीर के बच्चे को देखकर बहुतायत लोग पोस्ट को लाइक, शेयर करने में जुट जाते हैं. क्या एक पल को विचार किया है कि आखिर सोशल मीडिया पर किये जाने वाले लाइक, शेयर पर किसके द्वारा धनराशि प्रदान की जाती है? क्या इस पर गौर किया कि यदि लाइक, शेयर करने पर धनराशि मिलेगी भी तो वह आखिर किसके खाते में जायेगी? ऐसी बातों पर विचार किये बिना सभी आँखें बंद करके किसी दूसरे के हाथों में खेलने लग जाते हैं. इसी तरह से आये दिन उन गुमशुदा बच्चों की पोस्ट भी पोस्ट, शेयर होती रहती है जो वर्षों पहले अपने-अपने घरों को सकुशल मिल चुके होते हैं. ये स्थितियाँ जानकारी का अभाव और स्वयं को सोशल मीडिया के चंगुल में फँसा होने की तरफ इशारा करती हैं.

 



इन दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों के दिमाग से खेलते हुए, उनको तथ्यहीन जानकारी के आकर्षण में फँसाते हुए एक तरह से व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा करने का काम किया जा रहा है. आपने अक्सर ऐसी पोस्ट देखी होंगी जिसमें ड्राइविंग लाइसेंस को केन्द्रित करते हुए एक निश्चित समयसीमा पश्चात् नवीनीकरण पर प्रश्न उठाया जाता है. इसी तरह एक अन्य पोस्ट के माध्यम से ड्राइविंग लाइसेंस बनाये जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया जाता है. क्या ऐसी पोस्ट को शेयर, लाइक करने के पहले या इस पर अपनी सहमति देने के पहले विचार किया गया कि आखिर उम्र के एक पड़ाव के बाद व्यक्ति के देखने की, सुनने की क्षमता कम हो जाती है. बहुत से लोगों के हाथ-पैर में कम्पन होने लगता है. अनेक व्यक्ति स्मृति-लोप का शिकार होने लगते हैं. इन्हीं स्थितियों, स्वास्थ्य की जाँच के लिए एक निश्चित समय बाद किसी भी वाहन चालक के लाइसेंस का नवीनीकरण किया जाता है. अन्य पोस्ट के सन्दर्भ में क्या विचार किया गया कि किसी वाहन का लाइसेंस बनाये जाने के पहले लर्निंग लाइसेंस बनाये जाने की व्यवस्था है. उसके बाद ही वाहन चालन पश्चात् लाइसेंस अंतिम रूप से चालक को प्रदान किया जाता है. इसके बाद भी तथ्यात्मक रूप से अनजान बनकर ऐसी पोस्ट के द्वारा लोगों के दिमाग से खेलने का काम चलता रहता है.

 

ऐसी ही तथ्यहीन जानकारियों के चलते सोशल मीडिया पर एकतरफा कुतर्क चलते रहते हैं. उम्र, अनुभव, ज्ञान को दरकिनार करते हुए लोग यहाँ सहजता से मिल जाते हैं. ऐसा व्यक्ति जिसने किसी विषय को पढ़ना तो दूर कभी देखा भी न हो, उस पर भी किसी बड़े विशेषज्ञ से ज्यादा गंभीरता से अपनी राय देता है. ऐसा किये जाने से इंटरनेट पर ऐसी सामग्री का जमावड़ा होता जा रहा है जो विशुद्ध रूप से संशय, भ्रम फ़ैलाने का काम कर रही है. इसी अनावश्यक स्वतंत्रता के चलते सभी को अपनी बात रखने का, अपने विचार पोस्ट करने का अधिकार मिला हुआ है. बिना किसी सेंसर के, बिना किसी संपादन के ऐसी सामग्री इंटरनेट पर दिखाई दे रही है जो न केवल भ्रामक है वरन अराजक भी है. इस तरह की अराजक और भ्रामक स्थिति में आने वाली उस पीढ़ी का भी नुकसान होने वाला है जो इंटरनेट की सामग्री को ही प्रमाणित मानती है. उसके लिए पुस्तकों का, बुजुर्गों के ज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं है. ऐसी स्थिति में अधकचरे ज्ञान से, अशिक्षित लोगों के विचारों से सोशल मीडिया हरा-भरा बना हुआ है. आने वाले समय में यही भ्रामक और तथ्यहीन सामग्री ही सामाजिक क्षति करवाएगी.

 

आज भले ही इसके मायने समझ न आ रहे हों मगर आने वाले समय में इसी तरह की सामग्री के सहारे लोगों के दिमाग को, उनके ज्ञान को गुलाम बनाया जा सकेगा. आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कालखंड में सेना, हथियार से ही गुलामी लायी जाए. वर्तमान समय तकनीक का है और आने वाला इससे भी ज्यादा तकनीक का, विज्ञान का, जानकारियों का, तथ्यों का होगा. ऐसे में एक गलत अथवा भ्रामक सामग्री भी किसी हथियार से कम साबित नहीं होगी. आज के लिए न सही मगर आने वाले कल के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए आज तथ्यों की गलतियों को, भ्रम को, अराजकता को सँभालना होगा. सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा.


28 अगस्त 2023

सोशल मीडिया की भेड़चाल से बचने की आवश्यकता

वर्ष 2021 का समय था जबकि खबर आई थी कि दुनियाभर में सबसे ज्यादा प्रसिद्द सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक को Meta (मेटा) के नाम से जाना जाएगा. इस नाम परिवर्तन पर कम्पनी के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने बताया कि हम इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक ही सीमित नहीं रखना चाहते हैं. अब जो हम करने जा रहे हैं, उसके लिए नए नाम के साथ आगे जाने की आवश्यकता है. मेटा का अर्थ ग्रीक भाषा में होता है हद से पार, कम्पनी के द्वारा नाम बदलने को लेकर एक कारण यह भी रहा कि वे इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से कहीं आगे एक वर्चुअल दुनिया में ले जाना चाहते हैं. इसमें कम्पनी एक ऐसी वर्चुअल दुनिया बना रही है जहाँ लोग अपने कमरे में बैठकर एक समय में कई जगहों पर वर्चुअली रूप से अलग-अलग काम कर सकते हैं. इंटरनेट की इस नई दुनिया को मेटावर्स का नाम दिया गया है.

 



कम्पनी के सीईओ ने खुद इसका नाम बदलकर इसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से कहीं और आगे ले जाने का सपना देखा जबकि इसी प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लोग भेड़चाल में फँसे हुए हैं. सोशल मीडिया पर आये दिन एक तरह की भेड़चाल शुरू होती है, जहाँ पर बिना सोचे-समझे इसके उपयोगकर्ता उसके अंधानुकरण में लग जाते हैं. आप सभी ने गौर किया होगा कि आये दिन सोशल मीडिया पर कुछ इस तरह की पोस्ट तेजी से वायरल होती हैं जिसमें किसी विशेष तारीख को रात के कॉस्मिक किरणों के पृथ्वी के करीब से गुजरने से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नुकसान होने, पृथ्वी को खतरा होने की बात कही जाती है. किसी पोस्ट में किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित बच्चे के इलाज के लिए धन का एकत्रण लाइक, शेयर आदि के द्वारा किया जाता है. कभी किसी लापता बच्चे को खोजने का निवेदन होता है, कभी किसी के गुम हुए कागजात के बारे में पोस्ट वायरल होती है. सोशल मीडिया पर एकदम से फ्री बैठा उपयोगकर्ता बिना कुछ आगा-पीछा सोचे ऐसी पोस्ट को शेयर करने में लग जाता है. आजकल इसी तरह की भेड़चाल सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही है जहाँ पर मुफ्त में इस्तेमाल किये जा रहे प्लेटफ़ॉर्म को ही नोटिस देने वाली पोस्ट बुरी तरह से छाई हुई हैं.  

 

तेजी से और बुरी तरह से वायरल होती इस पोस्ट में फेसबुक को अपनी निजता का उल्लंघन न करने, अपनी फोटो, वीडियो आदि के सार्वजनिक न किये जाने के सम्बन्ध में चेतावनी, नोटिस दिए जा रहे हैं. आईपीसी की विशेष धारा का उल्लेख करते हुए फेसबुक पर कार्यवाही करने की बात इस पोस्ट में है. निजता के उल्लंघन न करने की, फोटो, वीडियो आदि को सार्वजनिक न करने की बात को लिखने वालों ने कभी विचार किया है कि इंटरनेट पर किसी भी प्लेटफ़ॉर्म का जब भी उपयोग किया जाता है तो उसकी बहुत सारी शर्तों, नियमों पर अपनी अनुमति दी जाती हैं. क्या कभी इन नियमों या शर्तों को पढ़ने की फुर्सत निकाली गई? क्या किसी भी प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करने के पूर्व उसकी चरणबद्ध प्रक्रिया को पूरा करने की जल्दबाजी में हम सबने अपनी सहमति देने के पहले उनको पढ़ने की, समझने की कोशिश की?

 

आखिर हम सभी मुफ्त के ऐसे तमाम सारे एप्लीकेशन का उपयोग करने, उस प्लेटफ़ॉर्म पर अपने आपको सर्वाधिक सक्रिय दिखाने की अतिशय जल्दबाजी में भुला बैठते हैं कि अपने उपकरण में, चाहे वह कम्प्यूटर हो या फिर मोबाइल, हम ही उस सॉफ्टवेयर को भीतर तक झाँकने की अनुमति देते हैं. उसको अपने कॉन्टेक्ट्स, अपनी गैलरी, अपनी लोकेशन, अपना कैमरा, अपना माइक आदि का उपयोग करने की अनुमति देते हैं. ऐसा करने के बाद ही सम्बंधित एप्लीकेशन हमारे उपकरण में इंस्टॉल होती है और उसके बाद ही हम उसका उपयोग कर पाते हैं. ऐसा करने के बाद हमारे हाथ में निजता जैसी, गोपनीय जैसी कोई बात रह नहीं जाती है. सोशल मीडिया के मुफ्त में मिलते प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करने की चाहत में हम स्वयं ही अपनी गोपनीयता, अपनी निजता किसी दूसरे सॉफ्टवेयर के हाथों में थमा देते हैं. अब पूर्व में दी गई हमारी अनुमति के आधार पर वह हमारे उपकरण में सेंधमारी करता रहता है; हमारी सक्रियता पर निगाह रखता है; हमारे क्रियाकलापों को देखता रखता है. क्या आपने कभी इस पर गौर नहीं किया कि सोशल मीडिया के किसी मंच पर आपकी उपस्थिति का स्वागत उन्हीं वस्तुओं, सेवाओं, उत्पादों के विज्ञापन से होती है जिनको आपने सर्च इंजन में खोजा होता है? क्या आपने कभी विचार किया है कि आपके विभिन्न एप्लीकेशन, विभिन्न वेबसाइट, विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म के पासवर्ड भूल जाने की स्थिति में यही इंटरनेट आपको दूसरा पासवर्ड उपलब्ध करवा देता है?

 

ध्यान रखिये, इंटरनेट के उपयोग की स्थिति में अब हमारा-आपका कुछ भी गोपनीय नहीं है, कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है. हमारी सारी की सारी जानकारी, क्रियाकलाप, घूमना-फिरना, खाना-पीना आदि किसी न किसी सर्वर के माध्यम से दूसरे हाथों में है. वायरल होती ऐसी अनावश्यक चेतावनी वाली पोस्ट से एकबारगी आप भले अपने आपको संतुष्ट कर लें मगर इंटरनेट की दुनिया में अपनी खुराफात के लिए सक्रिय तत्त्वों ने तो अपना काम कर ही लिया. देखा जाये तो अब हम सब इंटरनेट के गुलाम हैं. हमारे सभी कंप्यूटर, मोबाइल, तमाम संस्थान, अनेकानेक जानकारियाँ आदि किसी न किसी सर्वर के कब्जे में हैं. वर्तमान दौर में इंटरनेट से दूर रह पाना संभव नहीं ऐसे में यहाँ के आपराधिक तत्त्वों से बचने का उपाय सिर्फ सावधानी है, ऐसी बेवकूफी भरी पोस्ट का शेयर करना नहीं. इंटरनेट का उपयोग करके ज्ञानवान, प्रतिभावान बनिए न कि दूसरे के हाथों में खेलते हुए बेवकूफ बनिए.  

 






 

21 जुलाई 2023

सोशल मीडिया और मौत का जश्न

शायद शीर्षक पढ़कर आपको आश्चर्य के साथ-साथ अजीब सी अनुभूति हुई हो? आश्चर्य किये बिना एक पल को अपने आसपास फैलाते सोशल मीडिया जाल के बारे में विचार करिए तो आपको ये सच लगने लगेगा. क्या ऐसा नहीं हो रहा है कि हम लोग मौत की खबरों का, किसी की मृत्यु से पूर्व उसकी शारीरिक अवस्था का, दुर्घटनाओं के वीभत्स दृश्यों आदि का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं? मौत की खबरों का बिना सोचे-समझे शेयर करना बताता है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. संवेदनहीनता की हद से आगे जाकर कुछ लोगों को मौतों पर कार्टून, मीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करते तक देखा जा सकता है. क्या ये सोशल मीडिया पर मौत का जश्न नहीं है?  




इस तरह की मानसिकता अचानक से उत्पन्न नहीं हुई है बल्कि सोशल मीडिया को नशे की तरह से इस्तेमाल करने से ऐसा होने लगा है. देखा जाये तो ये पंक्ति वो तड़प कर अपनी जान से गया, खेल का सामान हमारे लिए बन गया सोशल मीडिया पर चरितार्थ हो रही है. अब घटना सुखद हो या फिर दुखद, विषय हास्य का हो या फिर विषाद का,  कार्यक्रम का आयोजन हो या फिर दुर्घटना की भयावहता, सबकुछ सोशल मीडिया पर शेयर करने का चलन हो गया. दरअसल हर हाथ में मोबाइल, हर हाथ में इंटरनेट, हर हाथ में तकनीक ने यदि जीवन को विविध पहलुओं के सन्दर्भ में सहज-सरल बनाया है तो उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का गला भी घोंट दिया है.


अब ये जानकारी ही नहीं कि प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज पर, समाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. लोगों को इसका भी भान नहीं है कि उनके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों से, प्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. हम रोज ही सोशल मीडिया के माध्यम से हिंसा, बलात्कार, हत्या, दुर्घटना सम्बन्धी वीभत्स दृश्यों को देख रहे हैं. रक्तरंजित शव, फंदे पर लटकती देह, दुर्घटना में क्षत-विक्षत शरीर सहित न जाने कितनी तरह के ह्रदयविदारक चित्र हमारे सामने एक क्लिक पर गुजर जाते हैं. यहाँ इन चित्रों को भेजने वालों की मंशा किसी भी रूप में किसी शरीर का, किसी देह का, किसी की नग्नता का प्रदर्शन करना नहीं होता होगा, किसी भी रूप से उसका मकसद नग्न देह को देखने-दिखाने का भी नहीं होता होगा किन्तु ऐसे लोग अनजाने में एक ऐसी प्रवृत्ति का विकास कर रहे होते हैं जो भविष्य में मानवीय संवेदनाओं को समूल नष्ट कर देगी.


सबसे पहले सूचना देने के लोभ में ऐसे-ऐसे चित्रों का, वीडियो का प्रसारण होने लगता है जिसे नैतिक नहीं कहा जा सकता है. वैसे ऐसे दौर में जबकि रिश्तों का, संबंधों का, संस्कारों का मोल न रह गया हो वहाँ नैतिकता की बात करना स्वयं को कटघरे में खड़ा करना है किन्तु समझना होगा कि जाने-अनजाने समाज को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है. कभी ऐसे चित्रों का प्रकाशन-प्रसारण निषिद्ध माना जाता था; ऐसे चित्रों को उजागर करने का अर्थ मृत व्यक्ति के साथ अन्याय करना समझा जाता था; क्षत-विक्षत देह को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करना नृशंस माना जाता था किन्तु आज तकनीकी के चलते इसे जागरूकता फ़ैलाने वाला समझा जाने लगा है. तकनीक के प्रचार-प्रसार को रोक पाना अब किसी के लिए संभव नहीं है. ऐसे में स्वयं नागरिकों को, सोशल मीडिया का अतिशय उपयोग करने वालों को सजग होना पड़ेगा कि उनके द्वारा क्या पोस्ट किया जाये, क्या प्रतिबंधित रखा जाये. ये सत्य है कि वर्तमान में सोशल मीडिया की उपयोगिता को भुलाया नहीं जा सकता है पर इसके साथ-साथ आते एक अप्रत्यक्ष सा संकट को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है.


नज़रों के सामने से गुजरती ऐसी तस्वीरें, वीडियो शुरू में मन-मष्तिष्क को विचलित करती हैं, संवेदित करती हैं किन्तु नज़रों के सामने से लगातार इनका गुजरते रहना इसका अभ्यस्त बना देता है. मन-मष्तिष्क का ऐसे दृश्यों का अभ्यस्त होना संवेदनाओं समाप्त होना है. घटना के प्रति, दुर्घटना के प्रति, मरने वाले के प्रति, शोषित के प्रति, मृत देह के प्रति ऐसा व्यक्ति संवेदना के स्तर पर जुड़ने में असहज महसूस करता है या कहें कि जुड़ नहीं पाता है. यही कारण है कि आज हत्या, बलात्कार, आत्महत्या, हिंसा, दुर्घटना आदि की खबरें, दृश्य हमें संज्ञा-शून्य बनाये रखते हैं. हमारे लिए ऐसी खबरें मात्र खबर बनकर रह जाती हैं, सूचनाएँ बनकर समाप्त हो जाती हैं.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, मृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. कब हम इंसान से जानवर बन जाते हैं, कब इन दृश्यों को महज जानकारी आदान-प्रदान करने का माध्यम बना देते हैं हमें स्वयं ही पता ही नहीं चल पाता है. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. आखिर हम सबको उस मौत पर जश्न मनाना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्ति, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत पर हम जश्न कर सकें. काश कि हम सभी अपनी भावी पीढ़ी को नृशंसता का, वीभत्सता का, विकृतता का अर्थ समझा सकें. कहीं ऐसा न हो कि कल को ऐसे दृश्य इनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाएँ.

 







 

12 मई 2023

मोबाइल पर आये संदेशों की पुस्तक

व्हाट्सएप पर दोस्तों से बात करते समय कई बार दिल को छू लेने वाले संदेशों का आदान-प्रदान हो जाता है. उनको डिलीट करने का मन नहीं करता. इस तरह के संदेशों में कभी कविताएँ होती हैं तो कभी सामान्य सी बातें; कभी शुभकामना सन्देश तो कभी आपसी चुहल; कभी आज की बातें होती हैं तो कभी बचपन के किस्से, सभी में कुछ न कुछ ऐसा विशेष होता है जो कभी गुदगुदा देता है, कभी आँखों को नम कर देता है.


हम ऐसे सैकड़ों संदेश सुरक्षित रखे हुए हैं. विचार है कि कभी इनको लेकर एक किताब प्रकाशित करवाई जाएगी.

25 फ़रवरी 2023

गालियाँ देने का फैशन

बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका सर्वाधिक नकारात्मक असर बच्चों पर, किशोरों पर देखने को मिल रहा है. तकनीकी भरे दौर में हर हाथ में स्मार्ट फोन और इंटरनेट के होने के कारण समूचा विश्व सबकी मुठ्ठी में समाहित है. मुठ्ठी में समाये इस विश्व में अब कुछ भी गोपन नहीं रह गया है. इसी अगोपन ने ओटीटी के बहुसंख्यक कार्यक्रमों, वेबसीरीज की अश्लीलता को भी सार्वजनिक कर दिया है. इन वेबसीरीज के पल-पल बदलते दृश्यों में, बात-बात पर गालियों भरे संवादों के आने ने बच्चों, किशोरों के दिल-दिमाग में गालियों के प्रति एक अजब सा आकर्षण पैदा कर दिया है.


ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर बनने वाले कार्यक्रम हों या फिर फ़िल्में, सभी में वास्तविकता दिखाने के नाम पर गालियों को जैसे ठूँसा जाने लगा है. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर बने अनेकानेक चैनलों पर भी सार्वजनिक रूप से गालियों का दिया जाना होता है, अश्लील भाव-भंगिमा, शब्दों के साथ प्रस्तुतियाँ दी जा रही हैं. इनके इस तरह से सार्वजनिक होते रहने का दुष्परिणाम यह निकल रहा है कि गालियों को लेकर, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्म, लिहाज बना हुआ था, वह लगभग समाप्त हो गया है. कम उम्र के युवाओं में बात-बात पर गालियाँ दिया जाना आम हो गया है. बच्चों में, किशोरों में अपने हमउम्र दोस्तों के साथ बातचीत में गालियों का प्रयोग करने के पीछे मानसिकता उनके साथ वैमनष्यता करने जैसी नहीं होती है. जरा-जरा सी बात पर अशालीन शब्दों का प्रयोग करने के पीछे उनकी मंशा सामने वाले को अपमानित करने की नहीं होती है. वे ऐसा महज उस आकर्षण के वशीभूत करते हैं, जिसे उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों में, सोशल मीडिया के मंचों पर देखा होता है.  




समाज में एक सामान्य सी धारणा बनी हुई है कि एक बच्चा आज्ञाकारी होगा. वह बड़ों का आदर-सम्मान करने वाला होगा. युवावस्था आने तक वह अपने भीतर ऐसे गुणों को धारण कर चुका होगा जो समाज, परिवार के हित में होंगे. बहुतायत में ऐसा करने वाले बच्चे मिलते भी हैं. किशोरावस्था का दौर अत्यंत ही संवेदित और बेहद महत्वपूर्ण होता है. किसी भी बच्चे का व्यक्तित्व विकास इसी दौर में होता है. इसी कारण से इस दौर में बच्चों का गालियों की दिशा में जाना, अश्लील शब्दावली की तरफ भटकना चिंतनीय है. बहुतेरे किशोर इन्हीं सबके चलते अनैतिक संबंधों के बनाने की हद तक चले जाते हैं. ऐसे में किशोर उम्र में उनकी तरफ विशेष ध्यान देना आवश्यक है.


ऐसे में सवाल यही उठता है कि बच्चों में, किशोरों में इस तरह के अशालीन व्यवहार को करने के पीछे उत्प्रेरक बने इन कार्यक्रमों से बचने का क्या रास्ता है? यह बात वर्तमान दौर में पूरी तरह से सही है कि वैश्विक खुलेपन के दौर में अब किसी विषय को, किसी जानकारी को परदे में रख पाना संभव नहीं रह गया है. तकनीक के बहाव भरे इस दौर में इन बच्चों की ऊर्जा को, उनके आकर्षण को उचित दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए. यह विचार करना अनिवार्य होना चाहिए कि जिस तरह के कार्यक्रम इस आयुवर्ग के बच्चों को उकसा रहे हैं, उनसे बच्चों को दूर कैसे रखा जाये. इस बिन्दु पर आकर स्वयं अभिभावकों को विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं उनके द्वारा तो इन बच्चों के लालनपालन में कोई कमी तो नहीं रह जा रही है?


वर्तमान में जिस तेजी से नगरीकरण तथा औद्योगिकरण ने हर व्यक्ति को अपने चपेट में लिया है, उसने सभी को धन कमाने की अंधी दौर में धकेल दिया है. इससे भी परिवार अपने ही बच्चों पर नियंत्रण रखने में तथा उनको संस्कारित करने में लगभग असफल हुए हैं. समयाभाव में अपने ही बच्चों को उनकी वैयक्तिक स्वंतत्रता के नाम पर बच्चों को, किशोरों को समय से पूर्व बड़ा हो जाने दिया है. इसने बच्चों में नैतिक मूल्यों का क्षरण किया है. इस बात को परिवारों को, अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं. उनका संस्कारवान होना, शालीन होना, सभ्य होना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वे इस समाज की, इस देश की धरोहर हैं. किसी भी समाज और देश का भविष्य इन्हीं के कंधों पर अपनी विकासयात्रा को पूरा करता है. ऐसी स्थिति में न केवल सरकारों की जिम्मेवारी है बल्कि परिवार की, समाज की, अभिभावकों की भी जिम्मेवारी है कि वे बच्चों के, किशोरों के, युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिये एक स्वस्थ्य सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण प्रदान करें. मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से अशालीनता, अश्लीलता, गालियाँ, अनैतिक संबंधों का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से किया जा रहा है, उस पर नियंत्रण लगाया जाये.







 

21 जुलाई 2022

मोबाइल का उपयोग और व्यक्ति का अकेलापन

आज लगभग हर हाथ मोबाइल से और सभी मोबाइल इंटरनेट सुविधा से सुसज्जित हैं. हम सभी अपने आसपास ऐसे लोगों को अवश्य ही देखते होंगे जो लगातार मोबाइल को ही निहारते रहते हैं. मोबाइल की स्क्रीन पर अपनी उंगलियाँ घुमाते रहते हैं. जबरदस्त व्यस्तता से भरे दिखाई पड़ने वाले ऐसे लोग वास्तविकता में अन्दर से किस कदर अकेलेपन से घिर चुके होते हैं, न उनको इसका भान होता है और न ही हम सब उसे समझ पाते हैं. इस अकेलेपन को न समझ पाने का एक बहुत बड़ा कारण यह भी होता है क्योंकि हम सब भी कहीं न कहीं इसी तरह की स्थिति का शिकार होते हैं.


निश्चित ही तकनीकी दौर में बिना तकनीक के आगे बढ़ना संभव नहीं है. इंटरनेट और स्मार्ट फोन ने यकीकन काम को गति दी है, सुविधाजनक बनाया है मगर इस गति और सुविधा ने व्यक्तियों को अकेला कर दिया है या कहें कि उनमें अकेलापन भर दिया है. ये चौंकने वाली बात नहीं है, बस इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, अपने आसपास जो घटनाएँ हो रही हैं उनका विश्लेषण करने की आवश्यकता है. हम सभी को वो दौर याद होगा जबकि हमें डाटा की बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ती थी. उन दिनों में भी काम हुआ करते थे, नेट का उपयोग हुआ करता था मगर उसमें एक तरह की सीमितता थी. उस समय डाटा के उपयोग में मन-मष्तिष्क में एक तरह की किफ़ायत करने का भी भान हुआ करता था. उन दिनों के उलट आज देखें तो असीमित रूप में हम सबको डाटा मिला हुआ है मगर इसका कितना सदुपयोग किया जा रहा है या कहें कि हो रहा है ये सोचने वाली बात है.


लगभग मुफ्त के भाव मिलते डाटा ने और इंटरनेट की दुनिया में उपलब्ध अनेकानेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ने जैसे हम सबके आसपास एक तरह का कल्पनालोक बना दिया है. सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की जबरदस्त उपलब्धता से व्यक्ति अपने आसपास की वास्तविक दुनिया से दूर होता गया और स्क्रीन पर दिखाई पड़ती दुनिया के करीब आता गया. इसी का दुष्परिणाम व्यक्तियों के अकेले होने के रूप में सामने आ रहा है. इसकी परिणति अवसाद, निराशा, कुंठा, अपराध, नशे की प्रवृत्ति आदि के रूप में दिखती हुई आत्महत्या तक जा पहुँची है. इसे कोई बनाई हुई आभासी स्थिति न कहिये बल्कि महसूस कीजिये.




हम, आप सभी सुबह-सुबह मोबाइल पर आते अनेकानेक सुप्रभात अथवा दार्शनिक संदेशों से दो-चार होते हैं. अक्सर इन संदेशों के प्रत्युत्तर में या तो सन्देश ही भेज दिया जाता है अथवा किसी इमोजी को भेज दिया जाता है. सन्देश भेजने वाले ने अपने दायित्व का निर्वहन कर लिया और उस सन्देश के प्रत्युत्तर में हम, आप ने अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लिया. ये क्रम सामान्य दिनों में ही नहीं अपितु विशेष दिनों, अवसरों पर भी बना रहता है. जन्मदिन, वर्षगाँठ, पर, त्यौहार अथवा किसी भी ख़ुशी या ग़म के अवसर पर अब फोन करके बात करने जैसी स्थिति न के बराबर दिखाई पड़ती है. अब घनिष्ट यार-दोस्तों में भी देर-देर रात तक चैट करने की प्रवृत्ति पनप चुकी है. परिजनों के बीच, मित्रों के बीच, सहयोगियों के बीच, शहर-मोहल्ले के परिचितों के बीच आज एक तरह का अबोलापन सा बना हुआ है. कहने को पूरे दिन चैट होती है मगर बातचीत हुए महीनों बीत जाते हैं.


इस स्थिति को सहज समझना ही नादानी है और समाज में अकेलापन भर रही है. कोई भी व्यक्ति हो वह अपनी लगातार की दिनचर्या में कभी परेशान भी होता है, कभी खुश भी रहता है. कभी उसे अपने कार्यक्षेत्र में कोई उलझन आती है तो कभी वह पारिवारिक समस्या से जूझता है. किसी समय में आपस में बातचीत से ऐसी समस्याओं, परेशानियों का हल निकल आया करता था, यदि हल न भी निकलता था तो अपनी बात कह लेने से, सामने वाले से सांत्वना के दो बोल मिल जाने से भी मन हल्का हो जाया करता था. अब मैसेज के द्वारा न तो सामने वाले की मनोस्थिति समझ आ रही है और न ही उसकी ख़ुशी, ग़म के बारे में समझना हो पा रहा है.


अपने आसपास भीड़ होने, देखने के बाद भी व्यक्ति नितांत अकेला अपने मोबाइल की स्क्रीन में ही केन्द्रित है. सोशल मीडिया, इंटरनेट के अनकहे से सम्मोहन में व्यक्ति सबकुछ भुला बैठा है. होना यह चाहिए कि जिस तरह से आये दिन युवाओं में, किशोरों में अवसाद, हताशा, निराशा, नाराजगी, चिडचिडापन, आक्रोश आदि देखने को मिलने लगा है, उसके समाधान के लिए प्रयास किये जाएँ. परिवार में, सहयोगियों में आपस में बातचीत के पुराने दौर वापस लाये जाएँ. संपर्क बनाये रखने से ज्यादा आवश्यक है कि आपस में सम्बन्ध बनाये जाएँ. शाम को निश्चित रूप से सभी को मोबाइल, सोशल मीडिया, इंटरनेट से बाहर निकल एक-दूसरे से मिलने-जुलने को अनिवार्य बनायें. युवाओं और किशोरों को इंटरनेट की आभासी रील वाली दुनिया से वास्तविक संबंधों, रिश्तों वाली दुनिया की सैर करवाएं. मोबाइल का उपयोग अत्यंत आवश्यक होने की दशा में ही करने के प्रयास किये जाने चाहिए.


यह सत्य है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में तकनीकी बहाव को रोका नहीं जा सकता है, उससे बचा भी नहीं जा सकता है मगर अपने व्यवहार से, मानसिकता से उस पर नियंत्रण अवश्य लगाया जा सकता है. जिस तरह प्राकृतिक रूप से सर्दी, गर्मी, बरसात को रोका नहीं जा सकता परन्तु उनसे बचने के उपाय अवश्य किये जा सकते हैं, कुछ ऐसा ही हम सबको मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर करना होगा. स्क्रीन की भीड़ भरी आभासी दुनिया में अकेलेपन का शिकार होने से बचने के लिए अपने आसपास की वास्तविक दुनिया से पहले की तरह सम्बन्ध बनाने होंगे.


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17 जुलाई 2022

इमोजी का रंगीन संसार

कम्प्यूटर, मोबाइल का उपयोग करने वालों के लिए इमोजी शब्द नया नहीं है. आज इमोजी का उपयोग शब्दों से अधिक होने लगा है. इमोजी के होने से आपसी संदेशों के आदान-प्रदान में शब्दों के विस्तार से इतर एक चिन्ह या चित्र के द्वारा व्यक्ति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने लगा है. इमोजी बहुत पुरानी कहावत गागर में सागर भरना को पूरी तरह से चरितार्थ करता है. यही कारण है कि आज बच्चों से लेकर वृद्ध तक इसका खूब उपयोग करते हैं. इमोजी का आशय स्मार्ट मोबाइल पर विस्तार में कुछ भी लिखने के स्थान पर एक संकेतक द्वारा अपनी सारी भावनाओं को उजागर कर देना है. इसकी बढ़ती लोकप्रियता और उपयोगिता को देखते हुए 17 जुलाई को दुनिया भर में विश्व इमोजी दिवस मनाया जाता है.

 

इमोजी जापानी भाषा का शब्द है. यह दो शब्दों इ और मोजी से मिलकर बना है. यहाँ इ का अर्थ चित्र से है और मोजी का अर्थ पात्र से है. इमोजी के जन्म की कहानी भी मजेदार है. ये सन 1998 की घटना है जबकि शिगेताका करीता नामक एक जापानी इंजीनियर वहाँ की ही एक टेलीकॉम कंपनी में नौकरी करता था. इस कंपनी की ईमेल के द्वारा एक समय में अधिकतम 250 शब्दों का ही मेल भेजा जा सकता था. कई बार इतने कम शब्दों में अपनी बात को कह पाना, भावनाओं को व्यक्त कर पाना मुश्किल हो जाता था. ऐसे में शिगेतागा के मन में आइडिया आया कि चित्र के द्वारा भावनाओं को, बातों को व्यक्त किया जाये. यह विचार उनको उस समय की कॉमिक बुक के चित्रों और मौसम विभाग के ग्राफ को देखकर आया. यह विचार आते ही उन्होंने वर्ष 1999 में बिंदु रूप में मोबाइल के लिए 176 छोटे-छोटे इमोजी तैयार किए. यह लोगों को बहुत पसंद आए और कुछ ही समय में इनकी ख्याति विश्व भर में फैल गई. इस तरह पहला इमोजी सन 1999 में सामने आया. कालांतर में सन 2010 में यूनिकोड ने इमोजी को मंजूरी दी. इसके बाद सन 2014 में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक और ट्विटर ने अपने दर्शकों के मनोरंजन के लिए इमोजी के अपने सेट बनाए. 

 



इमोजी की बढ़ती लोकप्रियता देखकर वर्ष 2014 से विश्व इमोजी दिवस (World Emoji Day) मनाया जाने लगा. इस दिन को मनाये जाने की शुरुआत जेरेमी बर्ग ने की. वे इमोजीपिडिया के फाउंडर हैं.  17 जुलाई 2014 को पहली बार इमोजी दिवस मनाये जाने का लोगों ने उत्साह के साथ स्वागत किया. इमोजी के आरंभिक दिनों में इसका उपयोग करने वाले बहुत कम इमोजी का उपयोग किया करते थे. शुरूआती दिनों में लोग केवल 95 इमोजी का इस्तेमाल करते थे. बाद में जैसे-जैसे इसके उपयोग से लोगों को सहजता हुई, भावनाओं का इजहार करना आसान हुआ तो इसका उपयोग भी बढ़ने लगा. वर्ष 2021 के अंत तक इमोजी के उपयोग की संख्या लगभग साढ़े तीन हजार के आसपास पहुँच गई.

 

इमोजी ट्रैकर के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला इमोजी फेस विथ टियर्स ऑफ जॉय है. भारत में इस इमोजी के साथ-साथ ब्लोइंग अ किस इमोजी का उपयोग लोग सबसे अधिक करते हैं. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के ब्लॉग के अनुसार वर्ष 2021 में सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर 50 लाख से ज्यादा इमोजी का इस्तेमाल किया गया. वर्तमान में इमोजी डिजिटल संचार का एक बहुत बड़ा माध्यम हैं जो बॉडी लैंग्वेज का काम करते हैं. भावनाओं को त्वरित रूप से व्यक्त करने का सबसे अच्छा और सरल तरीका वर्तमान में यही है.

 

 

फेस विथ टियर्स ऑफ जॉय इमोजी

ब्लोइंग अ किस इमोजी


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30 जून 2022

वर्ल्ड सोशल मीडिया डे : 30 जून

कुछ साल पहले तक सोशल मीडिया जैसे किसी शब्द की अवधारणा भी नहीं थी. आज स्थिति यह है कि व्यक्ति के अधिकतम काम सोशल मीडिया पर ही होते हैं, उसका अधिकतम समय सोशल मीडिया पर ही बीतने लगा है. ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि किसी दिन एक ऐसा मंच उपलब्ध होगा जिसके माध्यम से अपने मित्रों से बातचीत की जा सकेगी, जहाँ से अपने मन की खरीददारी भी हो सकेगी. पढ़ने-लिखने का माध्यम भी यह मंच बनेगा. भले ही ऐसा सोचा न गया हो मगर किसी न किसी ने तो इसके बारे में कल्पना की होगी और उसी की काल्पनिक अवधारणा आज वास्तविक रूप में हमारे सामने है. आज सोशल मीडिया दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है. 




यह आज के समय में आश्चर्य ही होगा यदि कोई सोशल मीडिया से नहीं जुड़ा है. व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम आदि अनेक सोशल मीडिया मंच आज इंसान की ज़िन्दगी का महत्त्वपूर्ण भाग बने हुए हैं. सोशल मीडिया के बढ़ते महत्त्व को देखते हुए सन 2010 से प्रतिवर्ष 30 जून को वर्ल्ड सोशल मीडिया डे के रूप में मनाया जाना शुरू किया गया.


आज सोशल मीडिया पर फेसबुक बहुत बड़े और प्रसिद्ध प्लेटफ़ॉर्म के रूप में उपस्थित है. ऐसा लोगों का विचार है कि सोशल मीडिया पर यही पहला प्लेटफ़ॉर्म बनकर सामने आया. यहाँ आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज फेसबुक भले ही बहुत अधिक उपभोक्ता वाला मंच हो मगर यह पहला सोशल मीडिया मंच नहीं है. वैश्विक स्तर पर पहला सोशल मीडिया मंच सिक्स डिग्रीज था. जिसके फाउंडर एंड्रयू वेनरिच थे. इस सोशल मीडिया मंच को सन 1997 में न्यूयॉर्क में शुरू किया गया था. इसे सन 2001 में जब बंद किया गया तक इसके 35 लाख यूजर्स और लगभग सौ से अधिक कर्मचारी हुआ करते थे. फ्रेंडस्टर और लिंक्डइन इसके बंद होने के बाद शुरू हुए.


सन 2004 में फेसबुक के आने के बाद पूरा परिदृश्य ही बदल गया. फेसबुक ने इंटरनेट की दुनिया में हालचाल सी मचा दी. आज इस सोशल मीडिया मंच के लगभग तीन अरब यूजर्स हैं. फेसबुक के अलावा व्हाट्सएप, यूट्यूब, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि भी सबसे बड़े सोशल मीडिया मंच के रूप में जाने जाते हैं.


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08 अप्रैल 2022

सोशल मीडिया से बढ़ता अकेलापन

 हम सभी लोग अक्सर सामान्य बातचीत में आपस में पनपते जा रहे खामोश माहौल की चर्चा करने लगते हैं. यह चर्चा कहीं भी, कभी भी शुरू हो जाती है. चर्चा तो हो जाती है, चर्चा में लगभग सभी लोगों का शामिल होना भी हो जाता है मगर उस चर्चा का कोई सकारात्मक पहलू सामने नहीं आता है. ऐसा नहीं है कि चर्चा एकपक्षीय रहती हो. चर्चा में अकेलेपन के बहुत सारे बिन्दुओं पर गौर किया जाता है, उनसे सम्बंधित पहलुओं पर भी रौशनी डाली जाती है. इसके बाद भी ऐसा क्या हो जाता है कि समाज में लोगों के बीच पसरा अकेलापन दूर होने का नाम नहीं लेता? कहीं ऐसा तो नहीं कि इंसान स्वयं ही अपना अकेलापन दूर करने की मानसिकता नहीं रख रहा है?


इधर विगत कुछ वर्षों से लोगों के अकेलेपन, बच्चों की कार्यप्रणाली, उनकी मानसिकता आदि पर एक तरह का अघोषित अध्ययन बना हुआ है. ये नहीं कहा जायेगा कि यह अंतिम सत्य है मगर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हम सबके सोशल मीडिया में आवश्यकता से अधिक व्यस्त हो जाने ने अकेलेपन को बढ़ाया है. सोशल मीडिया के बहुत सारे मंचों का उपयोग हम सभी लोग जानकारियों के, सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए करते हैं. ऐसा करने को ही हम संबंधों का निर्वहन समझने लगे हैं. दिन में मिल जाने पर संभव है कि आपस में किसी तरह का वार्तालाप न होता हो मगर सोशल मीडिया के मंचों से सुबह, शाम औपचारिक अभिवादन अवश्य ही होता है. इस अभिवादन के पीछे मंशा सामने वाले के हालचाल लेना नहीं होता है बल्कि अपनी तरफ से एक तरह की औपचारिकता का निर्वहन कर लेना होता है.




असल में यही महज निर्वहन कर लेने की सोच ही सर्वाधिक कष्टकारी है. टेक्स्ट मैसेज के द्वारा, चित्रों के द्वारा हम एक-दूसरे तक अपनी बात को तो पहुँचा सकते हैं मगर किसी भी रूप में उसकी मानसिकता को, उसकी मनोदशा को, उसकी स्थिति को नहीं समझ सकते हैं. जाने कितने-कितने चेहरों को अपने चेहरों पर लगाये बैठे लोग कष्ट के दौरान भी मैसेज में हँसने की स्माइली भेजते हैं. किसी मैसेज के जवाब में मिलने वाली स्माइली, किसी कार्टून से सामने वाले की मनोदशा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. ऐसे में औपचारिकता का निर्वहन दोनों तरफ से होने के कारण एक तरह का नितांत खालीपन संबंधों में आने लगता है. यही खालीपन अकेलेपन को बढ़ाता जाता है.


यहाँ ये तो नहीं कहा जा सकता है कि जो चंद उपाय, चंद कदम दिमाग में आते हैं वे पूरी तरह से लोगों के अकेलेपन को समाप्त कर देंगे पर ये अवश्य कह सकते हैं कि उस अकेलेपन को बहुत हद तक दूर कर सकते हैं, कम कर सकते हैं. बहुतायत समय मोबाइल, लैपटॉप आदि में गुजारने की बजाय आपस में मिलना-जुलना करने से संबंधों में प्रगाढ़ता तो आती ही है, आपसी खालीपन को दूर करने में भी सहायता मिलती है. बेहतर हो कि सोशल मीडिया के द्वारा आपसी हालचाल लेने-देने के बजाय फोन करके, आमने-सामने मिलकर, बातचीत करके एक-दूसरे का हालचाल लिया-दिया जाये. संभव है कि सबके पास समय एक तरह से खाली न रहता तो मगर ऐसा भी नहीं कि दस-पंद्रह दिन में एक दिन भी खाली न निकलता हो. एक ऐसे दिन का, समय का चुनाव करें जबकि एकसाथ मिला-बैठा जाये, खूब हँसी-मजाक किया जाये, जीवन की समस्याओं को आपस में कह-सुनकर उनका समाधान खोजा जाये.


यहाँ ध्यान यह रखने की आवश्यकता है कि जब सभी लोग आपस में साथ होंगे तो समस्याएँ भी दूर होंगी और अकेलापन भी दूर होगा.


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