'अस्सी' को काशीनाथ सिंह ने 'काशी का अस्सी' लिख कर प्रसिद्ध कर दिया था, अब फेसबुक की भसड़ में अस्सी के दशक का पुनर्पाठ किया जा रहा है. जिसे देखो
वो अपनी अस्सी के दशक की फोटो बनाये-चिपकाये पड़ा है. इसमें हास्यास्पद स्थिति ये
है कि ऐसे लोग जिनका जन्म भी अस्सी के दशक में नहीं हुआ था,
वे भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहयोग से बाकियों की बुद्धि ख़राब करने में लगे हैं.
ठीक है, तकनीक का
आनंद उठाना चाहिए, जीवन में इस तरह से हलके-फुल्के पलों को
भी जीना चाहिए मगर क्या ही अच्छा और सुखद महसूस होता यदि जिन्होंने अस्सी के दशक का
खुशनुमा जीवन जिया है, जीवंत ज़िन्दगी का आनन्द उठाया है,
वे लोग बजाय AI से बनी अथवा अपनी असली फोटो लगाने
के स्थान पर उन दिनों की स्मृतियों को लिखते. गर्मी की छुट्टियों की तफरी, आम का स्वाद, तरबूज-खरबूज का रस, छतों पर बैठकर एकसाथ भोजन का मजा, लालटेन की रौशनी में
पढ़ाई, रामलीला में जगह घेरने की कवायद, मैदान पर खेलने को जगह बनाने की कुश्ती, दोस्तों के संग
शैतानियों का साम्राज्य खड़ा करना, कॉमिक्स की दुनिया में खो जाना,
राजन-इकबाल सीरीज के साथ जासूस बन जाना, किराये
की साईकिल लेकर धुरंधर हवावाजी करना आदि-आदि कितना कुछ था बताने को, लिखने को.
इन सबके बजाय उन दिनों के लोगों ने भी चित्र चिपकाना, झूठे चित्र बनाना पसंद किया. शायद लिखने
से ज्यादा आसान लगा होगा AI से फोटो बनवा कर चिपका देना या फिर
एल्बम से फोटो निकाल उसकी कॉपी लगा देना.
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