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30 जून 2026

व्यक्तिगत स्वतंत्रता या नैतिक पतन

वर्तमान में भारतीय समाज एक तरह के वैचारिक और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि इस पर विचार करने की आवश्यकता है. आधुनिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्रगतिशीलता आदि का नाम लेकर वर्तमान समाज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहाँ नैतिक मूल्यों का पतन ही दिखता है. हास्य के नाम पर, मनोरंजन के रूप में अमर्यादित आचरण को दर्शाया जा रहा है. किसी कॉमेडी शो में एक युवक द्वारा अपनी महिला मित्र को बिरयानी खिलाने के बदले कीमत वसूलने की बात करना, किसी अन्य मंच से एक डॉक्टर युवती द्वारा शवों के साथ संवेदनहीन मजाक करने की स्वीकारोक्ति, किसी और कार्यक्रम में हास्य के नाम पर अपने माता-पिता के अंतरंग पलों में शामिल होने की बात कहना विवेकशून्यता को दर्शाता है. यह स्थिति इसलिए और भी भयावह लगती है क्योंकि इस प्रकार की फूहड़ता, अश्लीलता सार्वजनिक रूप से परोसी जा रही है और समाज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग खुलकर तालियाँ बजाते हुए खुद को कूल, प्रगतिशील साबित कर रहा है.

 

देखा जाये तो इस तरह की नैतिक गिरावट केवल मनोरंजन के मंचों तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी प्रवेश कर चुकी है. हाल ही में किशोरों और युवाओं के उजागर हुए चैट इसकी अलग ही कहानी कहते हैं. इनमें सहपाठी लड़कियों और महिलाओं के बारे में जिस स्तर की अश्लील, अमर्यादित बातें की गई हैं, उन्हें कोई भी सभ्य व्यक्ति अकेले में पढ़ते हुए भी शर्म से पानी-पानी हो जाए. यहाँ चिंताजनक यह है कि इस विकृत संवाद में केवल लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियाँ भी समान रूप से शामिल हैं. यह इस बात का संकेत है कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं से आत्मनियंत्रण, मर्यादा, शालीनता को पूरी तरह से छीन लिया है. इसी का दुष्परिणाम है कि इंटरनेट पर आए दिन निजी पलों के, अन्तरंग सम्बन्धों के वीडियो लीक तो होते ही हैं, उनको देखने की चाह रखने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी होती है. यह समाज में बढ़ती वासना, अश्लीलता का परिचायक है.

 

समाज में फैलती जा रही इस विभीषिका ने केवल युवा-वर्ग को ही अपनी गिरफ्त्त में नहीं लिया है बल्कि इसने  पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. पारिवारिक रिश्ते इसी विकृत मानसिकता की भेंट चढ़ रहे हैं. रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करने वाली घटनाएँ अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं. एक युवक का अपनी ही सास से विवाह करना, किसी युवक द्वारा अपनी भाभी को पाने की हवस में अपने ही मासूम भतीजे की बेरहमी से हत्या कर देना, विवाहेतर सम्बन्धों की खुलेआम स्वीकार्यता और अपने जीवन-साथी की हत्या करवा देना दिखाता है कि वासना ने इंसान को पथभ्रष्ट कर दिया है. रिश्तों की इस संवेदनहीनता का वीभत्स रूप तब दिखता है जब एक माँ अपने शारीरिक सम्बन्धों में बाधक बनते अपने ही बच्चे के हाथ-पैर तोड़े जाने और उसकी जान लिए जाने को मूकदर्शक बनकर देखती रहती है.

 

सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि आखिर समाज इस स्थिति पर पहुँचा कैसे? यह मानसिक पतन, सामाजिक विकृति एकाएक हो नहीं ही आई होगी. आधुनिकता के झूठे मुखौटे, सूडो-फेमिनिज्म, अत्यधिक व्यक्तिवाद, पारम्परिक परिवार व्यवस्था का अंधविरोध, विवाह संस्था के ऊपर दैहिक सम्बन्धों को वरीयता, खुलेपन की आड़ में यौन-सम्बन्धों को अपनाने आदि ने इस पतन की नींव रखी है. व्यक्ति की असीमित, अनियंत्रित स्वतंत्रता ने सामाजिक ढाँचे को ही खोखला कर दिया है. रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, लिव-इन, फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स आदि ने मूलतः व्याभिचार, अनैतिकता, अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दे दी है. इससे धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था बिखरने लगी और नई पीढ़ी संस्कार, नैतिकता, मर्यादा आदि से मुक्त होने लगी. इस भटकाव का असर यह हुआ है कि आज के युवाओं को यह अहसास ही नहीं कि वे कुछ गलत कर रहे हैं. एक साथ कई जगह सम्बन्ध बनाना, बार-बार साथी बदलना, किसी भी एक व्यक्ति या संस्था के प्रति वफादार न रहना, मर्यादा, शालीनता की सीमाओं को पार करना अब उनकी नजर में कोई गलती नहीं है. इसके उलट उन्होंने संस्कार, मर्यादा, शालीनता आदि को ही मज़ाक बना दिया है; इनका पालन करने वाले को पिछड़ा, दकियानूसी बताया है. समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने इस नकारात्मकता का विरोध करने के बजाय चुप्पी साधे रखी है परिणामतः सार्वजनिक मंचों से फूहड़ता, अश्लीलता का सहज स्वरूप हमारे घर-परिवारों तक आ चुका है.

 

हम सभी को यह समझना होगा कि उच्छ्रंखल, अनुशासनहीन, अमर्यादित आचरण का परिणाम सुखद नहीं होने वाला है. हमारे देश की सामाजिक संरचना पश्चिमी देशों जैसी नहीं है बल्कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बिना आत्म-अनुशासन के, बिना पारिवारिक सहयोग के, बिना सुदृढ़ नैतिक मूल्यों के समाज को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण रख पाना पूरी तरह संभव नहीं है. पश्चिमी सभ्यताओं की नक़ल के नाम पर हमारे समाज में फूहड़ता ही फैलती जा रही है, उन देशों जैसा अनुशासन, उनके जैसी जीवन-शैली, उनके जैसा सिविक सेंस हमारे समाज में कदाचित देखने को नहीं मिलता है. सोचने वाली बात है कि जब समाज से शर्म, मर्यादा, शालीनता, संस्कार, सम्मान आदि पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे तो समाज में अपराध, मानसिक अवसाद, अविश्वास, अश्लीलता, फूहड़ता का ही साम्राज्य दिखाई देगा. यदि हम आज भी बिना सँभले आधुनिकता के नाम पर ऐसे ही आत्मघाती मार्ग पर चलते रहे तो आने वाले समय में हमें सामाजिक और मानवीय विनाश का सामना करना पड़ेगा, यह समय जागने का, अपनी जड़ों की ओर लौटने का, मर्यादाओं को पुनः स्थापित करने का है.


25 दिसंबर 2025

स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित होते युवा

दिन का समय, चलती ट्रेन का डिब्बा, दो विषमलिंगी युवा, बेशर्म-अमर्यादित आचरण, सार्वजनिक रूप से होती अंतरंगता. अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए उन वीडियो ने दिखाया कि किस तरह से देह की माँग और यौनेच्छा की पूर्ति ने पारम्परिक मान्यताओं को ध्वस्त ही कर दिया. चलती ट्रेन के सार्वजनिक कोच में नितांत बेशर्मी के साथ युवाओं की गतिविधियों ने समाज की इस प्रचलित धारणा को और बल दिया कि आज की पीढ़ी संस्कारों, मर्यादा को भूलकर स्वार्थ में लिप्त होती चली जा रही है. इस घटना के पहले भी युवाओं की अंतरंगता सम्बन्धी वीडियो, चित्र सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे हैं. इन वीडियो, चित्रों में युवा बदलते रहे, उनके संसर्ग करने के स्थान बदलते रहे मगर सभी में मानसिकता एक ही रही, अपने परिवेश, अपने संस्कार, अपनी मर्यादा का त्याग करना. कॉलेज, लाइब्रेरी, पार्क, लिफ्ट, बाज़ार, पार्किंग आदि-आदि सार्वजनिक स्थल खुलेआम बेशर्मी भरे कृत्यों के गवाह बनने लगे.

 

वैश्वीकरण, आधुनिकता के दौर में ऐसा बहुत पहले से ही मान लिया गया था कि खुद के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए युवाओं ने किसी भी तरह के बंधन को मानना बंद कर दिया है. अभिभावकों को एक दोस्त की तरह से मान लेने की अवधारणा ने भी उनके प्रति गम्भीरता का ह्रास करवा ही दिया था. इस तरह की मानसिकता, सोच ने युवाओं को जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की, उनको स्वावलम्बी बनाया वहीं उनको उन्मुक्त भी बनाया, उद्दंड भी बनाया. ऐसे उन्मुक्त, उद्दंड युवाओं ने सामाजिक परिदृश्य में सिर्फ और सिर्फ स्वयं का ही अस्तित्व स्वीकारते हुए शेष सभी को नगण्य मान लिया है. इनको न तो उम्र का लिहाज है, न ही रिश्तों का. यही कारण है कि इनके द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ की, किसी बुजुर्ग व्यक्ति की परवाह न करते हुए अशालीन ढंग से प्रेमालाप किया जाता है, नशेबाजी की जाती है, स्टंट किये जा रहे हैं अब तो यौन-सम्बन्ध भी बनाये जाने लगे हैं. सड़कों, पार्कों, मॉल, बाजार आदि में एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घूमने से इतर अब तो एक-दूसरे के साथ चुम्बन लेते हुए भी युवा जोड़े दिख जाना आम हो गया है. उन्मुक्तता, उद्दंडता का आलम ये है कि इनको ये भी परवाह नहीं होती है कि वर्तमान दौर में जगह-जगह लगे सीसीटीवी कैमरों के द्वारा उनके कृत्य रिकॉर्ड हो रहे होंगे. उनको इस बात की भी चिंता नहीं कि आज प्रत्येक हाथ में स्मार्टफोन होने के कारण किसी भी कृत्य की, घटना की रिकॉर्डिंग हो जाना, उसका वायरल हो जाना बहुत सामान्य सी बात हो गई है.

 

ऐसी घटनाओं के पीछे के कारणों को खोजने और उनका समाधान करने पर गम्भीरता से चिंतन करने के बजाय यह कह देना आसान लगता है कि ये सब पश्चिमी सभ्यता का दुष्प्रभाव है, यह सब वैश्वीकरण के कारण हो रहा है. क्या हम सभी ने ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद भी ये विचार किया है कि हम अपने परिवार के किशोरों, युवाओं के कृत्यों, उनके व्यवहार, उनके दोस्तों आदि के बारे में जानने-समझने का प्रयास करें? क्या अपने परिवार के बच्चों के पहनावे, उनकी दिनचर्या आदि में आने वाले बदलावों को लेकर कभी उनसे कोई सवाल किया है? बहुतायत में इनका जवाब न में ही होगा क्योंकि आज बहुतायत परिवारों में बच्चों को समझाने की, उनको संस्कार सिखाने की, उनको मर्यादित आचरण करने की सीख देना लगभग बंद ही हो गया है. आज के आधुनिकता भरे दौर में ऐसा करना दकियानूसी माना जाने लगा है, पिछड़ा माना जाने लगा है और शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा को स्वयं को दकियानूसी-पिछड़ा घोषित करवाना चाहेगा.

 

संस्कार सिखाने का तात्पर्य किशोरों, युवाओं को जंजीरों में बाँधना नहीं होता है बल्कि उनको सामाजिकता का ज्ञान देना होता है. उनको मर्यादित बनाने का अर्थ पाषाणकालीन सभ्यता में भेजना नहीं होता बल्कि उम्र-रिश्तों का सम्मान करना सिखाना होता है. शालीन बनाने का तात्पर्य उनको पिछड़ा बनाना नहीं होता बल्कि उचित जीवनशैली का निर्वहन करना बताना होता है. प्रत्येक कार्य को भौतिकता से जोड़ देना, किसी भी तरह के आचरण को स्वतंत्रता समझ लेना, सार्वजनिक रूप से अशालीन हो जाने को आधुनिक मान लेना कदापि उचित सोच नहीं है. यदि इस तरह की सोच पर, ऐसे कृत्यों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, परिवार से ही संस्कारों का बीजारोपण नहीं किया गया तो ऐसी स्थितियों के निकट भविष्य में और भयावह होने में कोई संशय नहीं.


13 अगस्त 2025

बदलाव एवं उपलब्धियों भरी सुखद यात्रा

देश के गौरवशाली इतिहास की छत्रछाया में अमृतकाल जैसी अवधारणा संग स्वतंत्रता का उत्सव जोर-शोर से मनाया जा रहा है. यह समय गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे बढ़ रही है. बहुत से लोगों के लिए इसे भले राजनैतिक कदम, सरकारी एजेंडा कहा जाता हो मगर स्वतंत्रता के उत्सव को उमंग-उत्साह के साथ ही मनाये जाने की आवश्यकता है. यह एक तरफ जहाँ हमारी प्राचीन वैभवशाली संस्कृति, सभ्यता से परिचय कराता है वहीं वर्तमान युवा पीढ़ी को हमारे वीर-वीरांगनाओं का वह बलिदान याद करवाता है, जिसके चलते आज ऐसे उत्सव मना रहे हैं.

 

स्वतंत्रता के इन वर्षों में बहुत सी उपलब्धियाँ हैं जिनका सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने आज़ादी से अब तक कुछ पाया नहीं है? क्या अभी तक की यात्रा में किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है? विगत उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि पूर्वाग्रह मुक्त होकर समग्र रूप में देखें तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. यह सबसे बड़ी उपलब्धि कही जाएगी कि जब देश स्वतंत्र हुआ तब देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी. आज स्थिति यह है कि कृषिप्रधान कहे जाने के बाद भी देश का आर्थिक ढाँचा अकेले कृषि आधारित नहीं है, अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 54 प्रतिशत है.

 



शिक्षा के बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. नालंदा, तक्षशिला जैसे शैक्षणिक संस्थानों के नष्ट कर दिए जाने के बाद महसूस हो रहा था कि शायद देश का शैक्षणिक विकास बहुत देर में हो. इस आशंका को विगत वर्षों की यात्रा में गलत सिद्ध किया गया है. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. नेशनल मेडिकल काउंसिल के अनुसार 2024-25 में 766 मेडिकल कॉलेज हैं, इनमें से 423 सरकारी और 343 निजी मेडिकल कॉलेज हैं. क्या इसे विकास या उपलब्धियों के रूप में नहीं देखा जायेगा? इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. तकनीक के मामले में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले. किसी समय दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, अन्तरिक्ष स्टेशन पर किसी भारतीय का जाना, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं, उसमें अश्लीलता की, अपराध की दीमक लगा दी है.

 

ऐसे कुछ और पहलू भी हैं, जिनके आधार पर बहुत सारे लोग देश की वास्तविक उपलब्धियों को विस्मृत कर जाते हैं. वे भूल जाते हैं हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति को जहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. ये और बात है कि संवैधानिक नियमों की आड़ में यहाँ एक निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री बन जाता है मगर यही संवैधानिक खूबसूरती भी है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.


15 अगस्त 2024

स्वतंत्रता का सिर्फ जश्न न मनाएँ अपनी जिम्मेवारी भी निभाएँ

आज़ादी का जश्न मनाने वाला एक और दिन हम सबके बीच उपस्थित है. देश में स्वाधीनता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस, इन दोनों दिनों में नागरिकों में, बच्चों-बड़ों में जबरदस्त उत्साह रहता है. आखिर इन दोनों दिनों में स्वतः ही गौरव की भावना की अनुभूति होती है. ऐसी अनुभूति के चलते सारा दिन उमंग में, उल्लास में गुजर जाता है. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाते हुए अक्सर मन में सवाल उठता है कि हम सब जितना प्रसन्न, जितने उल्लासित इन दो दिनों में रहते हैं उतना शेष दिनों में क्यों नहीं रहते हैं?

 

यह सवाल कतई आश्चर्यचकित करने वाला नहीं लगेगा क्योंकि ऐसा सवाल एक अकेले हमारे मन में नहीं उठता है बल्कि उन सभी नागरिकों के मन में उठता है जो किसी न किसी रूप में देश के विकास में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं. यदि पूरी निष्पक्षता से, बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करें, इन दो दिनों पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि इन दो दिनों के उल्लास के समाप्त होने के बाद अगले दिन से दिल-दिमाग तिकड़म में व्यस्त हो जाता है. भ्रष्टाचार करने के उपाय किये जाने लगते हैं, काम निकालने को रिश्वत देने-लेने की चर्चा की जाने लगती है, स्वार्थ-लिप्सा में लिप्त कदम उठाये जाने लगते हैं.

 



सोचिए एक पल को कि क्या देश का वास्तविक विकास इसी तरह से हो सकेगा? क्या दो दिनों में अपनी राष्ट्रभक्ति दिखाने से ही देश की वास्तविक आज़ादी का मंतव्य पूरा होता है? सच्चाई तो ये है कि अब हम सभी आज़ाद हैं और अपनी स्वतंत्रता का जश्न किसी एक दिन नहीं, किसी विशेष दिन नहीं बल्कि प्रत्येक दिन मनाया जाना चाहिए. आखिर हम सभी अपनी ही आज़ादी का, अपनी ही स्वतंत्रता का एहसास स्वयं नहीं करेंगे तो कैसे अपेक्षा करेंगे कि विदेशी हमारी स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे? इसके लिए सबसे पहले हम सभी को अपने-अपने दायित्वों, कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करने की आवश्यकता है. देश के विकास के लिए किसी दूसरे की तरफ ताकने के स्थान पर हम सबका प्रयास यही होना चाहिए कि स्वतः ही अपना सकारात्मक योगदान दे सकें. जब तक इस तरफ की भावना एक-एक नागरिक में नहीं होती है तो अपनी आज़ादी का हम सब सिर्फ जश्न ही मनाते रहेंगे, उसकी वास्तविकता का लाभ नहीं उठा सकेंगे.

 

16 अगस्त 2022

आज़ादी का बदलाव भरा सफ़र

जिस देश का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है, उसी देश की महज 75 वर्ष की यात्रा का जश्न बड़े जोर-शोर से मनाया जाना अपने आपमें अजब लगता है. इसके बाद भी इस अजब से लगने वाली यात्रा की कहानी को याद रखना भी आवश्यक है. ऐसा इसलिए क्योंकि गौरवशाली परम्परा, संस्कृति, सभ्यता होने के बाद भी देश सैकड़ों वर्षों तक गुलामी में रहने का कलंक आज तक ढो रहा है. वर्तमान समय वाकई गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम सारी चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे ही बढ़ रही है.

 

वर्तमान में हम सभी आज़ादी के अमृत महोत्सव आयोजन के द्वारा अपनी आज़ादी के 75 वर्षों की यात्रा का स्मरण कर रहे हैं. वर्तमान के सापेक्ष जब इसी कालखंड पर दृष्टि डालते हैं तो बहुत सारा सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे तमाम लोगों के विचारों को जानने-सुनने के बाद सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने पिछले 75 वर्षों में कुछ पाया नहीं है? क्या देश ने इस यात्रा के किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं की है? क्या इन 75 वर्षों में हमने जो पाया है वह अंग्रेजी शासन की अपेक्षा कमतर है?



 

विगत 75 वर्षों की उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि समग्र रूप में देखा जाये तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. जिस समय देश आज़ाद हुआ, उस समय देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी और इसकी हिस्सेदारी 53.7 प्रतिशत थी. आज यह महज 18.8 प्रतिशत रह गई हो मगर इसके सापेक्ष अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी 26.9 प्रतिशत, सर्विस सेक्टर का भाग 54.3 प्रतिशत है.

 

शिक्षा किसी भी समाज के विकास हेतु अत्यावश्यक अंग है. इसके बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. आज यदि मेडिकल कॉलेज की संख्या निकाली जाये तो पूरे देश में 612 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 322 सरकारी और 290 निजी हैं. इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. अनेक नए-नए क्षेत्रों का उदय हुआ. तकनीक के मामले में जबरदस्त बदलाव देखने को मिले. किसी एक समय में दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं. हमारे समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं.

 

कतिपय राजनैतिक मूल्यों की गिरावट के कारण उनको अंग्रेजी शासन ज्यादा सुखद लगता है मगर वे भूल जाते हैं कि ये हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति है कि यहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. संवैधानिक खूबसूरती ये है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत 75 वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.

 




 

14 अगस्त 2022

तिरंगे को सच्ची सलामी कब?

स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया थातब हवा हमारी थीपानी हमारा थाजमीं हमारी थीआसमान हमारा था. सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी. पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी. स्वभाव में अभिमान था. स्वर में प्रसन्नता थी. सिर गर्व से ऊँचा उठा था. समय बदलता गयापरिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहाहर वर्ष फहराया जाता रहा. सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा. गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा. आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही. यह एहसास साल दर साल कम होता रहा. सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा. आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई.


आज समूचा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. हर देशवासी आज हर घर तिरंगा के माध्यम से अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान और आदर से देख रहा है. इसके बाद भी कई बार लगता है कि कुछ न कुछ कमी सी हम सबके आसपास है. पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे. अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्रचारित्रिक पतन को दिखा रहा है. पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारीबेबसीहताशाभयआतंकअविश्वास आदि के हैं. सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है. हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है.


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेलेवतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे. इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रताखुलकर घूमने की आजादीअपना स्वरूप तय करने की आजादी. हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर. राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है. ये सब एकाएक नहीं हो गया हैदरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लियाजिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति हैशहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह हैआजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक है. ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दताउच्शृंखलता आदि बना हुआ हैआजादी के गीतराष्ट्रगीतवन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं.




इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है. कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैंकभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है. हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं. हमारी गुरुकुल परम्परा एकदम से विलुप्त ही हो गई है. गुरु-शिष्य के संबंधों में भी लगातार गिरावट देखने को मिलने लगी. ये किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए.


अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमाउनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं. हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है. अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं कीदुष्कर्म की खबरें आ रही हैं. हमने औद्योगीकरणउपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकेंपेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये. बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं. मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं. हाथों में औजार थामे नजर आते . अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये.


देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं. मॉलजगमगाते शहरमैट्रोमल्टीस्टोरीजशॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं. जब तक एक भी बच्चा भूखा हैएक भी बच्चा अशिक्षित हैएक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं. हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है. जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगाजब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगेजब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगाजब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगेजब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगाजब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगीजब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगाजब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं.


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या काइन सबका हल हैमगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा. आपसी विभेद को समाप्त करना होगा. वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज काअपने परिवार का विकास कैसे करेगाबच्चे हमारे भविष्य का आधार हैंयदि वे ही अशिक्षितभूखेअस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है. याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैंनागरिक किसी भी धर्म के होंकिसी भी जाति के होंकिसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश केइस सोच के द्वारा हम विकास कीएकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं. यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगादृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगेजयहिन्दवन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा.

 




 

19 दिसंबर 2021

काकोरी काण्ड के स्वतंत्रता सेनानियों का 94 वां बलिदान दिवस

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड एक ऐसी घटना है जिसने अंग्रेजों की नींव झकझोर कर रख दी थी। अंग्रेजों ने आजादी के दीवानों द्वारा अंजाम दी गई इस घटना को काकोरी डकैती का नाम दिया और इसके लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों को 19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे पर लटका दिया।




अशफाक उल्ला खां

फांसी की सजा से आजादी के दीवाने जरा भी विचलित नहीं हुए और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। बात नौ अगस्त 1925 की है जब चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित 10 क्रांतिकारियों ने मिलकर लखनऊ से 14 मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया।

दरअसल क्रांतिकारियों ने जो खजाना लूटा उसे जालिम अंग्रेजों ने हिंदुस्तान के लोगों से ही छीना था। लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और आजादी के आंदोलन को जारी रखने में करना चाहते थे। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई, जिससे गोरी हुकूमत बुरी तरह तिलमिला उठी। उसने अपना दमन चक्र और भी तेज कर दिया।

अपनों की ही गद्दारी के चलते काकोरी की घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए, सिर्फ चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया जिनमें से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।

 

राजेंद्र लाहिड़ी

ब्रिटिश हुकूमत ने पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया जिसकी बड़े पैमाने पर निंदा हुई क्योंकि डकैती जैसे मामले में फांसी की सजा सुनाना अपने आप में एक अनोखी घटना थी। फांसी की सजा के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख मुकर्रर की गई लेकिन राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी पर लटका दिया गया। ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल और अशफाक उल्ला खान को इसी दिन फैजाबाद जेल में फांसी की सजा दी गई।

फांसी पर चढ़ते समय इन क्रांतिकारियों के चेहरे पर डर की कोई लकीर तक मौजूद नहीं थी और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए।

 

ठाकुर रोशन सिंह

काकोरी की घटना को अंजाम देने वाले आजादी के सभी दीवाने उच्च शिक्षित थे। राम प्रसाद बिस्मिल प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही भाषायी ज्ञान में भी निपुण थे। उन्हें अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, उर्दू और बांग्ला भाषा का अच्छा ज्ञान था।

अशफाक उल्ला खान इंजीनियर थे। काकोरी की घटना को क्रांतिकारियों ने काफी चतुराई से अंजाम दिया था। इसके लिए उन्होंने अपने नाम तक बदल लिए। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने चार अलग-अलग नाम रखे और अशफाक उल्ला ने अपना नाम कुमार जी रख लिया।

खजाने को लूटते समय क्रांतिकारियों को ट्रेन में एक जान पहचान वाला रेलवे का भारतीय कर्मचारी मिल गया। क्रांतिकारी यदि चाहते तो सबूत मिटाने के लिए उसे मार सकते थे लेकिन उन्होंने किसी की हत्या करना उचित नहीं समझा। उस रेलवे कर्मचारी ने भी वायदा किया था कि वह किसी को कुछ नहीं बताएगा लेकिन बाद में इनाम के लालच में उसने ही पुलिस को सब कुछ बता दिया। इस तरह अपने ही देश के एक गद्दार की वजह से काकोरी की घटना में शामिल सभी जांबाज स्वतंत्रता सेनानी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।

 

आज जब रोज़ रोज़ देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे है ... दिल से यही दुआ निकलती है कि ... काश यह सब अमर क्रांतिकारी दोबारा लौट आयें और देश को सही रास्ते पर ले जाने के लिए इस समाज का मार्ग दर्शन करें!

इन अमर शहीदों के बलिदान दिवस पर उनको शत शत नमन!

इंकलाब ज़िंदाबाद!!


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पोस्ट शिवम मिश्रा की पोस्ट से साभार. 

01 दिसंबर 2021

उरई में फहराया विशालकाय तिरंगा

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कहीं भी लहरा रहा हो, किसी भी आकार का हो हमें व्यक्तिगत रूप से बहुत आकर्षित करता है. किसी भी जगह पर लहराते, फहराते ध्वज को देखकर लगता है कि बस उसे देखते रहा जाये. दिल-दिमाग जैसे झंकृत होते रहते हैं और मन मंत्रमुग्ध सा होकर बस उसे ही देखता रहता है. किसी समय में राष्ट्रीय ध्वज का लहराना-फहराना सिर्फ राष्ट्रीय पर्वों पर ही होता था और वो भी शासकीय भवनों, इमारतों पर. कालांतर में कुछ कानूनी विषयों के उठाये जाने के बाद आम आदमी को भी ध्वज फहराने का अधिकार मिला. सरकारी इमारतों के साथ-साथ निजी भवनों में राष्ट्रीय ध्वज को फहराए जाने की छूट मिली. इसी क्रम में देश के विभिन्न शहरों में पार्कों में, किसी विशाल जगह पर, मुख्य स्थलों पर बड़े-बड़े ऊँचे पोल के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का भव्य स्वरूप लहराता-फहराता दिखाई देने लगा.


बरसों पहले राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का भव्य, मनमोहक रूप में फहराना दिल्ली में राजीव चौक पर देखा था. उससे पहले इतने विशालकाय तिरंगे को कहीं फहराते हुए नहीं देखा था. लगभग डेढ़ सौ फीट ऊँचे पोल पर विशालकाय तिरंगा का फहराना देखकर एक पल को हम सम्मोहन की स्थिति में आ गए थे. किस काम से वहाँ आना हुआ है, भूलकर उस भव्य स्वरूप को अपने कैमरे में कैद करने लगे थे. उसे देखकर मन में विचार आया था कि क्या इस तरह विशाल स्वरूप तिरंगा हमारे उरई में नहीं फहराया जा सकता? क्या इसके लिए स्थानीय स्तर पर पहल नहीं की जा सकती है? इस बारे में कई बार चर्चा हुई, सम्बंधित व्यक्तियों तक अपनी बात पहुंचाई गई. अनेक बार तमाम सारी बैठकों, मीटिंगों में तिरंगा शहर में लगाये जाने सम्बन्धी बातें उठीं मगर कोई भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका.


आज, दोपहर बाद महाविद्यालय से वापसी हो रही थी. मौसम बहुत सुहाना बना हुआ था. हलकी-हलकी हवा भी चल रही थी. जिसे गुलाबी सर्दी कहा जाता है, उसका एहसास हो रहा था. उसी गुलाबी एहसास में एकदम से खुली आँखों के सामने स्वप्न सा तैर गया. बादलों भरे आसमान में तिरंगा शान से लहरा रहा था. एक पल को विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा उरई में देखने को मिल रहा है. स्कूटर सी दिशा में मोड़ दिया. सामने वास्तविकता होने के बाद भी वास्तविकता स्वीकार सी नहीं हो रही थी. फिलहाल, सबकुछ भूल कर अपनी पूरी भव्यता के साथ लहराते तिरंगे को कैमरे में, दिल में कैद करने लगे.




राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा उरई शहर के टाउन हॉल परिसर में सौ फीट ऊँचे पोल पर पूरी आन-बान-शान के साथ लहरा रहा था. उसके लगाये जाने के पीछे की कहानी की यहाँ चर्चा करना उचित नहीं. उस समय जानकारी हुई कि अभी उसके आसपास रौशनी बनाये रखने की दृष्टि से लाइट लगाये जाने का काम चल रहा है, जो देर रात तक पूरा होगा. रात को दस बजे के आसपास सौ फीट ऊँचाई पर लहराते तिरंगे को रौशनी में रखने के लिए उसके चारों तरफ लाइट को व्यवस्थित करने का काम पूरा हो सका. तिरंगे का या कहें कि अपने शहर में विशाल तिरंगे को फहराते देखने की अभिलाषा के पूरा होने का सम्मोहन था कि रौशनी में जगमगाते देखने की मंशा लेकर रात दस बजे भी तिरंगे के दर्शन करने पहुँच गए.




स्थानीय जिम्मेवार लोगों के द्वारा यह पुनीत कार्य करवाया जा रहा है, सो सम्बंधित व्यक्तियों से जान-पहचान भी थी. इसी के चलते लाइट की व्यवस्था सम्बन्धी कुछ स्पेशल टिप्स भी दे डाले, जिनको माना भी गया. चारों तरफ से पड़ती रौशनी में तिरंगा अपनी आभा को बिखेरने में लगा था. किसी समय दिल्ली के राजीव चौक पर लहराते तिरंगे को देखकर मन में उपजी अभिलाषा आज पूरी हुई. उरई शहरवासियों के लिए यह गौरव का विषय है, अब हम भारतीयों की शान, गर्व के प्रतीक तिरंगे की आन-बान-शान की रक्षा करना, उसकी देखभाल करने का दायित्व समस्त उरईवासियों का है. 





20 जून 2020

सोशल मीडिया को आवश्यकता है सम्पादकीय व्यवस्था की

कई बार लगता है कि सोशल मीडिया की ऐसी स्वतंत्रता अब बंद की जानी चाहिए. एडिट फ्री व्यवस्था ने जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है वहीं विचारों की गंदगी भी फैला रखी है. किसी समय अपने आलेख, साहित्यिक रचनाओं के सम्पादक के धन्यवाद पत्र के साथ वापस आने पर बुरी तरह गुस्सा आता था. कई बार मन में आता था कि किसी न किसी जुगाड़ के बिना पत्र-पत्रिकाओं में छपना संभव नहीं. इसी में कई बार अपने बीच के कई साथियों को प्रकाशित होना देखते, बहुत सी ऐसी प्रकाशित रचनाओं को देखते और अपनी रचनाओं की उनसे तुलना करते तो विश्वास होता कि जुगाड़ से ज्यादा रचना काम करती है. बाद में बिना किसी जुगाड़ के अपनी रचना प्रकाशित करने पर इस धारणा का भी खंडन हुआ. 


उस दौर के बाद जब ब्लॉग लेखन का, सोशल मीडिया का दौर देखा तो लगा कि अब कम से कम सम्पादकों का अनावश्यक हस्तक्षेप समाप्त होगा. उनका एक तरह का एकाधिकार समाप्त होगा. आरंभिक दौर में ऐसा देख कर अच्छा भी लगा. सोशल मीडिया पर, ब्लॉग पर बहुत ही सारगर्भित सामग्री पढ़ने को मिलती. वैचारिक भिन्नता के बीच वैचारिक मतभेद देखने को मिलता मगर सामग्री के सन्दर्भ में गिरावट देखने को नहीं मिलती. ब्लॉग को इस सन्दर्भ में बहुत ही समृद्ध कहा जा सकता था. कालांतर में जैसे-जैसे सोशल मीडिया का विकास होता रहा, हर एक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलती रही सामग्री की गंभीरता का लोप होता रहा. आज स्थिति ये है कि सिवाय आपसी कटुता के बहुत कुछ देखने को नहीं मिल रहा है.


सोशल मीडिया के दौर ने, माइक्रो ब्लॉगिंग के रूप ने ब्लॉग संसार को भी दिग्भ्रमित किया है. अब यहाँ भी चोर दिखाई देने लगे हैं. यहाँ भी विरोध के नाम पर मानसिकता हावी है. यहाँ भी अधजल गगरी छलकत जाए वाली बात सिद्ध हो रही है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों की स्वतंत्रता ने लोगों को पढ़ने से दूर कर दिया है. अब उनका एकमात्र काम बस लिखना, अपनी विचारधारा से इतर व्यक्तियों को अपमानित करना, अपनी ही प्रशंसा की फोटो-सामग्री को पोस्ट करना रह गया है. यहाँ अब बड़े-छोटे का लिहाज समाप्त हो गया है. यहाँ अब रिश्तों की, अनुभव की, उम्र की मर्यादा का लोप हो चुका है. यहाँ बाप-दादा की उम्र का हो वो भी फ्रेंड है, बेटे-बेटी की उम्र का हो वो भी फ्रेंड है. इसमें भी किसी तरह का सम्पादकीय प्रतिबन्ध नहीं है, किसी भी तरह के एडिटोरियल बोर्ड से गुजरना नहीं है सो चाहे जो मन आये लिख दिया जाता है, चाहे जो मन में आता है छाप लिया जाता है.

इसी का दुष्परिणाम है कि अब गंभीर सामग्री का विलोपन हो चुका है, उसकी जगह पर गालियाँ देखने को मिलती हैं. वैचारिक रूप से कुंद व्यक्ति एक-दूसरे को ही गाली नहीं दे रहे हैं बल्कि देश के प्रधानमंत्री को, मुख्यमंत्रियों को भी गाली देने में लगे हैं. किसी व्यक्ति की पोस्ट के खिलाफ आप कुछ बोलते हैं तो आपके ऊपर व्यक्तिगत, पारिवारिक आक्षेप लगाये जाते हैं. यदि सच्चे सबूत नहीं मिलते हैं तो फोटोशॉप का सहारा लिया जाता है. कुल मिलाकर सोशल मीडिया की स्वतंत्रता दूसरों को अपमानित करने के लिए रह गई है. किसी समय एडिटोरियल बोर्ड जैसी व्यवस्था को, सम्पादकीय जैसी व्यवस्था को कोसने की गलती हमने भी की थी मगर अब लगता है कि ये अत्यंत अनिवार्य व्यवस्था है. इस व्यवस्था के कारण अश्लीलता रुकी हुई थी, भ्रामक सामग्री रुकी हुई थी, आपसी कटुता रुकी हुई थी. अब लगता है कि सोशल मीडिया पर, ब्लॉगिंग पर भी सम्पादकीय व्यवस्था लागू की जानी चाहिए.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

04 मार्च 2020

सोशल मीडिया का भारतीय स्वरूप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हैं. सोशल मीडिया पर विभिन्न मंचों पर उनके फॉलोअर की संख्या बहुत अधिक है. ट्विटर पर भी उनके 53.3 मिलियन फॉलोअर हैं. वे खुद तो सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहते ही हैं, लोगों को भी इन मंचों का लाभ उठाने की, इनसे जुड़ने की प्रेरणा देते हैं. अभी दो दिन पहले उनके एक ट्वीट ने उनके समर्थकों, फॉलोअर को परेशान कर दिया. प्रधानमंत्री जी ने ट्वीट करते हुए लिखा “इस रविवार को अपने सोशल मीडिया अकाउंट फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब को छोड़ने की सोच रहा हूं. आप सभी को आगे जानकारी दूंगा.” इस ट्वीट के बाद यहाँ नो सर टॉप ट्रेंड करने लगा. इसके बाद मोदी जी के एक अन्य ट्वीट से जानकारी मिली कि वे 08 मार्च को महिला दिवस के अवसर पर सोशल मीडिया के अपने सारे एकाउंट किसी ऐसी महिला के हवाले करेंगे जिसने वास्तविक में प्रेरणा देने का काम किया हो.


ये तो आठ मार्च के बाद पता चलेगा कि मोदी जी आगे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं अथवा नहीं मगर उनके इस तरह के ट्वीट ने उन तमाम बिन्दुओं की तरफ इशारा भी किया जो सोशल मीडिया में जाने-अनजाने झलकते रहते हैं. सोशल मीडिया के विभिन्न मंच विदेशों द्वारा संचालित हो रहे हैं. इन सभी का मुख्य सर्वर विदेशों में ही है. ऐसे में हम सभी जाने-अनजाने में, चाहते या न चाहते हुए भी अपनी जानकारियाँ विदेशी हाथों में दे दे रहे हैं. किसी समय में ये कभी-कभी हुआ करता था मगर वर्तमान में ज्यादातर पोस्टों में, चित्रों में, वीडियो में आपसी वैमनष्य, धार्मिक विभेद, जातिगत विभेद, एक-दूसरे पर हमला, हिंसा, अत्याचार, अशालीनता, अश्लीलता आदि देखने को मिलती है. इन पोस्टों के द्वारा, अपनी अभिव्यक्ति के द्वारा कहीं न कहीं हम अपने देश की, अपने समाज की, यहाँ के धर्मों की, यहाँ की जातिगत जानकारियाँ विदेशी हाथों तक सहजता से पहुँचा दे रहे हैं. अनेक बार ऐसे अवसर भी आये जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित जानकारियाँ भी सोशल मीडिया में शेयर कर दी गईं. इसके साथ-साथ अतिशय जल्दबाजी में, सबसे पहले हम की स्थिति के लिए हमारे द्वारा भ्रामक जानकारियाँ, आँकड़े भी शेयर हो जाते हैं. इसमें भी फोटोशॉप की हुई जानकारियाँ अत्यधिक होती हैं. इसी तरह दाम्पत्य जीवन के गोपन भी अब सोशल मंचों पर देखने को मिलते हैं.

ऐसी स्थिति में नरेन्द्र मोदी जी का सोशल मीडिया को छोड़ने का सोचना भी अपने आपमें एक सन्देश देता है. यद्यपि किसी भी सोशल मंच पर वे बहुत ही सीमित लोगों को फॉलो करते हैं तथापि किसी अन्य माध्यम से उनके पास सोशल मीडिया पर फैली अनर्गल पोस्ट पहुँचती होंगी तो निश्चित ही उनको भी हमारी तरह खीझ उठती होगी, गुस्सा आता होगा. इसके अलावा वे सोशल मीडिया की शक्ति को पहचानते हैं, इसकी जड़ों को भी जानते होंगे, इसके माध्यम से हमारी जानकारियों का गलत हाथों में चले जाना भी वे समझ रहे होंगे, सो जाहिर है कि वे कुछ सन्देश ही देना चाहते होंगे. सामाजिक क्षेत्र में कार्य करता हुआ कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सहज ही बता देगा कि आने वाले समय में अस्त्रों-शस्त्रों से युद्ध कम होंगे, अब आने वाला समय सूचनाओं के साथ, जानकारियों के द्वारा लड़ने का है. कौन किस स्थिति में जानकारियों में समृद्ध है, कौन किसकी जानकारियों का, सूचनाओं का सदुपयोग या दुरुपयोग अपने सन्दर्भ में कर सकता है, यह महत्त्वपूर्ण होगा. ऐसे में आवश्यक है कि सोशल मीडिया में भारतीय मंचों का निर्माण हो. इनका मुख्य सर्वर हमारा अपना हो, हमारी सूचनाओं का केन्द्र भी हमारा देश हो. इसी के साथ-साथ सोशल मीडिया की स्वतंत्रता पर भी किसी तरह का सम्पादकीय नियंत्रण लगाया जाये. इसकी खुलेहस्त मुक्तता ने इसे उन्मुक्त बना दिया है. बिना किसी शर्म, लिहाज के अशालीन सामग्री, चित्र, वीडियो बड़ी मात्रा में शेयर, पोस्ट किये जाते हैं.

संभव है कि मोदी जी का ऐसा सोचना एक संकेत मात्र हो और उनकी कोई योजना भारतीय स्वरूप का सोशल मंच निर्मित करवाने की रही हो. आने वाला समय क्या करवट लेगा कहा नहीं जा सकता है क्योंकि मोदी जी भावी रणनीति के आधार पर ही अपने निर्णय लेते हैं. न केवल निर्णय लेते हैं वरन उन पर ठोस और सक्रिय अमल भी करते हैं.
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

02 मार्च 2020

सम्पादक मुक्त स्वतंत्रता से खतरे में सोशल मीडिया

पिछले दिनों दिल्ली में हुई हिंसा ने दिल्ली को बेबस कर दिया. उसकी इस बेबसी में स्वतंत्र सोशल मीडिया अपनी तरह से चाल चलता दिखा. दिल्ली हिंसा के बेबसी भरे दौर में बहुतेरे लोग सोशल मीडिया की सम्पादक-मुक्त स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते भी दिखाई दिए. यह सही है कि सोशल मीडिया के द्वारा अपने भावों की, अपने विचारों को अभिव्यक्ति सहज रूप में होने लगी. सोशल मीडिया अपनी इसी स्वतंत्रता के कारण नागरिकों के बीच बहुत तेजी से लोकप्रिय हुआ. लगभग हर हाथ में मोबाइल होने और लगभग मुफ्त इंटरनेट सेवा मिलने के कारण प्रत्येक व्यक्ति अपने आपमें एक मीडिया संस्थान जैसा काम करने लगा. इस विशिष्टता के चलते सोशल मीडिया में बहुतायत लोगों द्वारा वैचारिकी को भले ही प्रमुखता न दी गई हो किन्तु इसके द्वारा उन्होंने अपने आपको मुखर अवश्य ही बनाया है. अपने विचारों के प्रसारण के लिए किसी मंच की तलाश को समाप्त कर कोई भी व्यक्ति सहजता से अपनी बात को वैश्विक स्तर तक पहुँचा रहा है. उसके लिए अब न किसी संस्थान की जरूरत है, न किसी सम्पादक की मनमर्जी का सवाल है, न विचारों पर किसी तरह के प्रतिबंध का डर है. अब व्यक्ति पूरी स्वतन्त्रता के साथ अपने विचारों का प्रकटीकरण कर रहा है. उसके सामने किसी तरह का कोई अवरोधक नहीं है. 


वैचारिक स्वतन्त्रता के इस दौर में जहाँ किसी व्यक्ति को असीमित आसमान मिला है, वहीं निर्द्वन्द्व रूप से एक तरह का घातक हथियार भी उसके हाथ में लग गया है. अपनी वैचारिकी से अधिक अब वह अपनी उग्रता, अपने आक्रोश को प्रकट करने में लगा है. यह आक्रोश, उग्रता, घृणा आदि दिल्ली हिंसा के दौरान भी मनमाने ढंग से सामने आता रहा. चूँकि किसी भी पोस्ट, किसी विचार, किसी चित्र, किसी वीडियो के ऊपर कोई सम्पादकीय निगरानी नहीं थी, इसके चलते दिल्ली हिंसा से जोड़ते हुए अनेक पुरानी फोटो, वीडियो आदि को प्रसारित किया गया. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हिंसा से सम्बद्ध असल सूत्रों के साथ-साथ भ्रामक तत्त्व भी हवा में तैरने लगे. भ्रम, संशय की ऐसी स्थिति का सबसे अधिक लाभ अराजक तत्त्वों द्वारा उठाया जाता है. इसी बहाने अफवाहों का बाजार गर्म होने लगता है. इससे होता यह है कि शासन-प्रशासन असल मुद्दे से भटक कर इन्हीं अफवाहों, भ्रामक वैचारिकी पर सीमित हो जाते हैं. 

सोशल मीडिया पर मिली इस स्वतन्त्रता ने एक तरह की नकारात्मकता पैदा की है. स्वतन्त्रता के अतिउत्साह और सबसे पहले हम की मानसिकता के चलते लोगों ने ऐसी स्थिति भी बना दी जो किसी भी रूप में समाज-हित में नहीं कही जा सकती हैं. ऐसा नहीं कि सोशल मीडिया की इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग दिल्ली हिंसा के दौरान किया गया. इससे इतर भी इस मंच का दुरुपयोग किया गया. सरकार, शासन, प्रशासन, नागरिकों, धर्म आदि से सम्बन्धित जानकारी को सोशल मीडिया पर प्रकट करने का कार्य किया गया. सत्य सबसे पहले दिखाने की अंधी दौड़ में खबरों को तोड़मरोड़ कर विकृत, भ्रामक रूप में प्रस्तुत किया गया. धर्म, जाति को आधार बनाकर अन्य दूसरे धर्मों, जातियों पर टिप्पणी करने का काम अब इस मंच पर बहुतायत में होता दिखता है. समाज के किसी भी वर्ग की स्थिति, उसकी क्षमताओं, जीवनशैली, कार्यक्षमताओं आदि को लेकर भी नकारात्मकता दर्शायी गई. धर्म, जाति, क्षेत्र आदि से सम्बंधित जानकारियों को लेकर अश्लील वीडियो, पोस्ट जबरदस्त तरीके से शेयर किये जाने लगे. भाषाई मर्यादा भूलकर आपस में अश्लील संवाद, अशालीन वार्तालाप, भद्दे वीडियो लगातार शेयर किये जाते हैं. 

सोशल मीडिया के तकनीकी मंच से सम्बन्ध होने के कारण उसमें संचालित प्रत्येक कदम को तकनीकी विकास की स्वतन्त्रता का मानक समझ लेना उचित नहीं है. कई बार असल जानकारी, सूचनाओं के अभाव में समाज में वैमनष्यता का खतरा पैदा हो जाता है. सोशल मीडिया पर ऐसी घटनाएँ काफी समय से हो रही हैं. ऐसे किसी भी घटनाक्रम पर, किसी भी पोस्ट पर जो किसी के स्वाभिमान के खिलाफ है, किसी के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करती है, किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाती हुई उसकी मान-मर्यादा को चोटिल करती है तो आम नागरिक को सचेत होने का परिचय देना चाहिए. 


खुद को सोशल मीडिया पर सबसे अधिक सक्रिय दिखाने वालों की भी कमी नहीं है. ऐसे लोग ही अफवाहों का बाजार गर्म करते हैं. आवश्यकता सजग रहने की है, सचेत रहने की है. तकनीकी रूप से सक्षम होने का अर्थ सोशल मीडिया में हस्तक्षेप बढ़ जाना नहीं है; तकनीकी ज्ञान का अर्थ किसी भी रूप में मोबाइल पर समूची दुनिया को कैद समझ लेना नहीं है वरन तकनीकी रूप से साक्षर होने का अर्थ है कि अपने आसपास होने वाले किसी भी घटनाक्रम के बारे में सही-सही जानकारी रखना. किसी भी अफवाह, घटनाक्रम के सामने आने टार उसकी सत्यता, उसकी प्रामाणिकता को पता करना. यदि ऐसा हम नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम सभी पढ़े-लिखे निरक्षर हैं. यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम खुद को, अपने वर्तमान को, भविष्य को खतरे में डाल रहे हैं. खुद को, परिवार को, समाज को, देश को खतरों से बचाने के लिए अफवाहों से बचने, उनके प्रचार-प्रसार से बचने, उनकी सत्यता प्रमाणित करने की आवश्यकता है. हमारी आज कि सजगता, सक्रियता आने वाले कल के लिए सुरक्षित, खुशनुमा वातावरण तैयार करेगी. 
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25 जनवरी 2020

संविधान, स्वतंत्रता, गणतंत्र को समझ न सके हैं अभी हम

राष्ट्रीय दिवसों से सम्बंधित आयोजन किसी भी व्यक्ति के अन्दर देशभक्ति की भावना का संचार करने में सक्षम होते हैं. गणतंत्र दिवस हो अथवा स्वाधीनता दिवस, सभी में बच्चों से लेकर वृद्धजनों तक उत्साह दिखाई देता है. हर तरफ देशभक्ति की बयार बहती नजर आती है. एक तरह का जूनून सबके ऊपर नशे की तरह चढ़ा होता है. समाज का कोना-कोना देशभक्ति से ओतप्रोत समझ आने लगता है. क्या समाज, क्या घर, क्या कार्यालय, क्या आभासी दुनिया, क्या सोशल मीडिया सभी जगह देशभक्ति के विचारों का गुणगान होता रहता है. एक सामान्य नागरिक भी खुद को तिरंगे में सराबोर कर देता है. गणतंत्र की बातें, संविधान की रक्षा, उसके अनुपालन की बातें लोगों के मुँह से गली, मोहल्ले, चौराहे पर सुनाई देने लगती हैं. इसके बाद भी कहीं न कहीं अंतस इसका आनंद पूर्णतः ले नहीं पाता है. कहीं न कहीं वह ऐसे आयोजनों को महज एक दिन की औपचारिकता मानकर खारिज करना चाहता है. 


संभव है कि बहुत से देशभक्ति में सजे-धजे लोगों को ये बात हजम न हो मगर आज का अंतिम सत्य यही है. एक पल को तिरंगे को सलामी देने के ठीक पहले, उसके फहराने-लहराने पर मर-मिटने की सौगंध खाने के ठीक पहले विचार करिए कि आज देश की सड़कों पर, देश की राजधानी की सड़कों पर, राजधानी के शाहीन बाग़ में अथवा अन्य राज्यों के मुख्य-मुख्य स्थलों पर जो हो रहा है, चल रहा है उसे गणतांत्रिक व्यवस्था के सशक्तिकरण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? यह व्यवस्था की नहीं वरन नीति-नियंताओं की, व्यवस्था बनाने वालों की, सत्ता-निर्धारकों की असफलता ही कही जाएगी कि आज़ादी के एक लम्बे अरसे के गुजार देने के बाद, गणतंत्र को स्वीकार कर देने के सात दशकों के बाद भी एक सामान्य नागरिक सही और गलत को परिभाषित कर पाने में अक्षम है. वह इसके लिए अभी भी अपने कथित अगुआ प्रतिनिधि का मुँह ताकता है. ऐसा क्यों? क्या कभी ये सवाल किसी ने खुद से किया है? क्या कभी कोई भी सवाल किसी ने नीति-निर्धारकों से, सत्ताधीशों से पूछने की हिम्मत जुटाई है?

ऐसा न हो पाने का ही दुष्परिणाम आज देश भुगत रहा है. चंद फिरकापरस्त ताकतें उस कानून की मुखालफत करने पर आमादा हैं, देश में आग लगवाने को आतुर हैं जो किसी भी दृष्टि से असंवैधानिक नहीं है. ये गणतांत्रिक असफलता ही है कि एक आम नागरिक अपना बुद्धि, विवेक, कौशल लगाने के बजाय किसी और के हाथ की कठपुतली बना हुआ है. सोचने की आवश्यकता है कि एक ऐसे कानून का विरोध, जिसका इस देश के नागरिकों की नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं है, देश के उन सम्बंधित नागरिकों की किस मानसिकता का परिचय देता है. ये हास्यास्पद ही नहीं वरन विचारणीय स्थिति है कि एक तरफ हम खुद को विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश कहते हैं, खुद को विश्व गुरु की राह का अगुआ कहते हैं तब ऐसे बिंदु पर समाज को बंधक बनाने की कोशिश की जा रही है जो किसी भी तरह से असंवैधानिक नहीं है.

यही स्थिति है कि हम पर, हमारे देश पर, हमारी प्रक्रिया पर, लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर, गणतांत्रिक स्थिति पर सवाल उठाये जाने लगते हैं. सवाल कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या महज एक दिन के लिए ही संवैधानिक महत्त्व है? क्या महज एक दिन ही गणतंत्र की स्वीकार्यता होती है? क्या बस इसी एक दिन के लिए गणतंत्र को, संविधान को आदर दिया जाता है? क्यों इस एक दिन की लोकतान्त्रिक शैली अपनाये जाने के बाद हम नागरिकों के व्यवहार में तानाशाही दिखाई देने लगती है? क्यों इसी एक दिन संविधान को सर्वोच्च मानने के बाद उसमें खामियां दिखाई देने लगती हैं? क्यों एक दिन के गणतंत्र के बाद फिर इसी गणतांत्रिक व्यवस्था को दोयम दर्जे का बताया जाने लगता है? जिन संवैधानिक मूल्यों की लगातार चर्चा होती है, जिन संवैधानिक अधिकारों की बात की जाती है, जिन संवैधानिक दायित्वों पर प्रकाश डाला जाता है वे क्यों यह दिन समाप्त होते ही पुरातन बातें हो जाती हैं?

आज जबकि विरोध का कारण एक व्यक्ति, एक दल, एक विचारधारा हो तब ये आवश्यक हो जाता है कि असलियत है क्या. अब ऐसे समय में जबकि कतिपय वोटबैंक के कारण, कतिपय तुष्टिकरण के कारण समाज को बरगलाया जाने लगा है, उसे हिंसात्मक, विध्वंसक गतिविधियों में लगाया जाने लगा है तब आवश्यक है कि देश की भावी पीढ़ी को लोकतंत्र का, गणतंत्र का, स्वाधीनता का उचित अर्थ और सन्दर्भ ज्ञात हो. गणतंत्र को अथवा संविधान को समझना इसलिए और भी आवश्यक हो गया है क्योंकि देश के एक-एक व्यक्ति अब राजनैतिक पूर्वाग्रहों से घिर गया है. उसकी अपनी सोच, मानसिकता पर किसी न किसी वाद का, किसी न किसी विचारधारा का कब्ज़ा सा समझ आने लगा है. ऐसा महसूस होता है जैसे सोचने-समझने की क्षमता को कहीं तिलांजलि देकर वह किसी न किसी विचारधारा की कठपुतली बना हुआ है. क्या करना है, क्यों करना है, कैसे करना है के बारे में कोई विचार किये बिना वह स्वार्थपूर्ति में संलिप्त है. अपने मनोनुकूल विचारधारा को पोषित करने में लिप्त है.


यह स्थिति वर्तमान समाज के लिए खतरनाक बनी हुई है. ऐसे में व्यक्ति स्वेच्छा से सोच-विचार करने के बजाय अपनी पुष्ट विचारधारा के अनुसार संचालित होता है. उसी के अनुसार खुद को आगे बढ़ाता हुआ कार्य करता है. इस बिंदु पर आकर वह खुद को और अपनी विचारधारा को ही एकमात्र सत्य स्वीकारता हुआ शेष सभी को ख़ारिज करता जाता है. यह स्थिति जहाँ एक तरफ तानाशाही को जन्म देती है वहीं मानसिक विकृति भी पैदा करती है, जो समाज के लिए किसी भी कीमत पर सुखद नहीं है. ऐसा आज लगातार हो रहा है. खुद को, खुद की विचारधारा को स्थापित करने के लिए व्यक्ति किसी भी हद तक जाने को बेताब सा है. इसी बेताबी, तीव्रता ने व्यक्ति व्यक्ति के मध्य आपस में तनाव को जन्म दिया है. आपसी कटुता, वैमनष्यता को बढ़ावा दिया है. अपराध, हिंसा, दुराचार, अराजकता के मूल में यही वैमनष्यता है, यही विभेद है.

इस तरह की सोच दूसरों पर कब्ज़ा करने की भावना का विकास करती है. इस बारे में प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से अध्ययन करते हुए बहुतायत लोगों को उनके विचारों, उनकी मानसिकता के अनुसार ही वातावरण का निर्माण करने की कोशिश की जा रही है. सामाजिकता को किनारे रखते हुए तथ्यों को, आँकड़ों को भी विचारधारा के अनुसार प्रदर्शित करने का कार्य किया जा रहा है. इसके लिए कभी धर्म को, मजहब को साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, कभी जाति को इसका आधार बनाया जाता है तो कभी क्षेत्र की भावना को उछालते हुए वैमनष्यता को बढ़ाया जाता है. ऐसा करने वाली ताकतें और उन ताकतों के हाथों में खेलते लोग भूल जाते हैं कि ऐसा कोई भी कदम उठाने की अनुमति न तो हमारा संविधान देता है और न ही ऐसा करना गणतांत्रिक दृष्टि से उचित है. इसके बाद भी समूचे समाज में ऐसा होते दिख रहा है. संसद द्वारा किये जा रहे संविधान संशोधनों को भले ही किसी वर्ग, क्षेत्र, राज्य आदि के हितार्थ किया जाता रहा हो मगर समाज में संविधान संशोधनों की अपनी ही परिभाषाएं निकाली जाती हैं. संविधान के अपने ही स्वरूप दिखाए जाते हैं. गणतंत्र को अपने हिसाब से परिभाषित किया जा रहा है.

समझने वाली बात है कि गणतंत्र या फिर आज़ादी महज एक दिन का समारोह नहीं, एक दिन का आयोजन मात्र नहीं. गणतंत्र हमारे देश के, हम नागरिकों के जीने का आधार है. यह महज एक दिन का वो कृत्य नहीं जो तिरंगे के फहराने के साथ शुरू किया जाता है और उसके शाम को ससम्मान उतारने के बाद समाप्त हो जाता है. किसी दिन विशेष के साथ-साथ प्रत्येक दिन सम्पूर्ण देश के लिए गणतंत्र दिवस होना चाहिए, स्वतंत्रता दिवस होना चाहिए. ऐसा न होने का ही परिणाम है कि यहाँ दूसरों के लोकतान्त्रिक मूल्यों का हनन किया जा रहा है. दूसरों की आज़ादी में जबरन दखलंदाजी की जा रही है. गणतंत्र दिवस या फिर स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने के पहले, अपने को तिरंगे या फिर भारत माता की जय के द्वारा देशभक्त बताने से पहले संविधान का, गणतंत्र का अर्थ समझना होगा. इनके मूल्यों को समझना होगा. इनके महत्त्व को समझना होगा. यदि ऐसा नहीं किया जा सकता है तो ऐसे किसी भी दिन विशेष का आयोजन खुद के प्रचार-प्रसार का तरीका भर है और कुछ नहीं.

09 सितंबर 2019

सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा


सोशल मीडिया ने नियंत्रण के सारे बिन्दुओं को किनारे लगा रखा है. इस मंच पर न रिश्तों की कोई कद्र है, न संबंधों की, न उम्र की. इसकी उन्मुक्तता ने सभी को आज़ादी दे रखी है और वह भी पूरी तरह से निरंकुशता वाली. इस निरंकुश आज़ादी की कीमत लोगों के अपमान से, लोगों की बेइज्जती से चुकाई जा रही है. कई साल पहले कहीं पढ़ रखा था कि देश की आज़ादी के समय बहुत से लोगों ने अपना विचार इस रूप में दिया था कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है कि आज़ादी का सही अर्थ समझ सके या फिर उसका सही उपयोग कर सके. उस समय बहुतेरे लोगों ने आज़ादी के बाद भी कुछ सालों तक एक तरह की तानाशाही की वकालत की थी. उन स्थितियों में ऐसा किया जाना सही होता या गलत ये तो अब विमर्श का विषय है मगर अब लगता है कि वाकई देश अभी भी ऐसी स्थिति में नहीं है कि यहाँ आज़ादी का सही उपयोग किया जा सके. इसके उदाहरण के रूप में सोशल मीडिया के तमाम मंचों को लिया जा सकता है.


यहाँ किसी भी विषय पर एकतरफा कुतर्क (इसे बहस कतई नहीं कहा जा सकता है) चलते रहते हैं. उम्र, अनुभव, ज्ञान को दरकिनार करते हुए बड़े-बड़ों की इज्जत का कचरा यहाँ सहजता से किया जाने लगता है. किसी भी विषय पर किसी भी व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा की जा सकती है कि वह किसी विशेषज्ञ की तरह अपना ज्ञान उड़ेल सकता है. अपनी बात पर ही, अपने विचार पर ही जमे रहने की कला इसी मंच पर आसानी से देखने को मिलती है. यहाँ एक अपने अलावा बाकी सभी के विचार तुच्छ और क्षुद्र की श्रेणी में शामिल मान लिए जाते हैं. ऐसा व्यक्ति जिसने किसी विषय को पढ़ना तो दूर कभी देखा भी न हो, उस पर भी किसी बड़े विशेषज्ञ से ज्यादा गंभीरता से अपनी राय दे सकता है. ऐसा किये जाने से न केवल विषय से सम्बंधित जानकारी का, सामग्री का नुकसान हो रहा है वरन इंटरनेट पर ऐसी सामग्री का भी जमावड़ा होता जा रहा है जो विशुद्ध रूप से संशय, भ्रम फ़ैलाने का काम कर रही है. इसी अनावश्यक स्वतंत्रता के चलते सभी को अपनी बात रखने का, अपने विचार पोस्ट करने का अधिकार मिला हुआ है. बिना किसी सेंसर के, बिना किसी संपादन के ऐसी सामग्री इंटरनेट पर दिखाई दे रही है जो न केवल भ्रामक है वरन अराजक भी है. इसे रोकने का या फिर इस पर नियंत्रण लगाने जैसा कोई कदम कहीं से भी उठता हुआ नहीं दिख रहा है. 

इस तरह की अराजक और भ्रामक स्थिति में आने वाली उस पीढ़ी का भी नुकसान होने वाला है जो इंटरनेट की सामग्री को ही प्रमाणित मानती है. उसके लिए पुस्तकों का, बुजुर्गों के ज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं है. ऐसी स्थिति में अधकचरे ज्ञान से, अशिक्षित लोगों के विचारों से सोशल मीडिया हरा-भरा बना हुआ है. आने वाले समय में यही भ्रामक और तथ्यहीन सामग्री ही सामाजिक क्षति करवाएगी. आज भले ही इसके मायने समझ न आ रहे हों मगर आने वाले समय में इसी तरह की सामग्री के सहारे लोगों के दिमाग को, उनके ज्ञान को गुलाम बनाया जा सकेगा. आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कालखंड में सेना, हथियार से ही गुलामी लायी जाए. वर्तमान समय तकनीक का है और आने वाला इससे भी ज्यादा तकनीक का, विज्ञान का, जानकारियों का, तथ्यों का होगा. ऐसे में एक गलत अथवा भ्रामक सामग्री भी किसी हथियार से कम साबित नहीं होगी. आज के लिए न सही मगर आने वाले कल के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए आज तथ्यों की गलतियों को, भ्रम को, अराजकता को संभालना होगा. सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा.

09 मई 2019

स्वाभिमान, पराक्रम, शौर्य के परिचायक राष्ट्रगौरव महाराणा प्रताप


दृढप्रतिज्ञ और विलक्षण व्यक्तित्व के धनी महाराणा प्रताप का जन्म वि०स० 1597 ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया यानि कि 9 मई 1540 को कुम्भलगढ, राजस्थान में सिसोदिया राजपूत राजवंश में हुआ था. महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर की संतान के रूप में राष्ट्रगौरव जन्म ले चुका है, ये किसी को भान भी न था. उनके पिता उदयसिंह के निधन पश्चात् राणा प्रताप का राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को हुआ. विरासत में उन्हें मेवाड की प्रतिष्ठा और स्वाधीनता की रक्षा करने का दायित्व मिला. इस दायित्व का निर्वहन करने में वे कभी पीछे भी नहीं रहे क्योंकि उन्होंने अपने यशस्वी पूर्वज महाराणा कुम्भा तथा राणा सांगा की शौर्य कथाओं को तथा देश, धर्म और आन-बान-शान, मान-मर्यादा पर मरने का पाठ बचपन में ही पढ़ लिया था. जिस समय उनका राज्याभिषेक हुआ उस समय मुग़ल शासक अकबर से शत्रुता के कारण समूचा मेवाड एक अजब सी स्थिति में था. इस स्थिति से बिना घबराये, बिना भयभीत हुए महाराणा प्रताप ने लगातार संघर्ष किया. आखिर उनको पितृ और मातृ उभयकुलों की स्वतंत्र-परम्परा से वीरता, साहस, सम्मान के संस्कार जो मिले हुए थे.


वीरता के किस्से महाराणा प्रताप के नाम से जुड़े हुए हैं. इसके बाद भी हल्दीघाटी का युद्ध और उनका घोड़ा चेतक सर्वाधिक चर्चा में रहते हैं. चेतक की चर्चा उसी तरह जनमानस के बीच होती है जैसी कि महाराणा प्रताप की बहादुरी की होती है. कहते हैं कि चेतक कई फीट उंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था. हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक बाज की तरह उछल कर अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊँचाई तक पहुँच गया था. इस कारण ही महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया था. इसी तरह जब मुग़ल सेना महाराणा के पीछे लगी थी तब चेतक ने 26 फीट लंबे नाले को लांघ कर महाराणा के जीवन की रक्षा की थी. उस नाले को मुग़ल फौज का कोई भी घुड़सवार पार नहीं कर पाया था. महाराणा प्रताप के साथ इसी युद्ध में घायल होने के बाद चेतक को वीरगति प्राप्त हुई थी.

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को मेवाड़ की राजपूत सेना तथा मुगलों के मध्य हुआ था. इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया है. मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया जबकि मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था. हल्दीघाटी के मैदान में हुए इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की. उनके साथ-साथ ग्वालियर नरेश राजा रामशाह तोमर ने भी अपने तीन पुत्रों कुँवर शालीवाहन, कुँवर भवानी सिंह, कुँवर प्रताप सिंह और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर राजपूत योद्धाओं समेत वीरगति प्राप्त की थी. हल्दीघाटी के इस युद्ध में बीस हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सेना के अस्सी हजार सैनिकों का सामना किया था. यह युद्ध चला तो केवल एक दिन परन्तु इसमें सत्रह हजार लोग मारे गए. इतिहासकारों का मानना है कि इस युद्ध में कोई विजयी नहीं हुआ किन्तु वास्तविकता में देखा जाए तो महाराणा प्रताप इस युद्ध में विजयी हुए. आमने-सामने चले इस युद्ध में उन्होंने अकबर की विशाल सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था.

इसके बाद 1579 से 1585 तक की स्थिति ऐसी बनी कि महाराणा प्रताप एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे. उधर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे. परिणामस्वरूप अकबर उन विद्रोहों को दबाने में उलझ गया. इसका लाभ उठाकर महाराणा प्रताप ने सन 1585 में मेवाड़ को मुक्त कराने के प्रयास और तेज कर दिए. महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और जल्द ही उदयपुर समेत कई महत्वपूर्ण स्थान महाराणा के अधिकार में आ गए. महाराणा प्रताप के सिंहासन पर बैठते समय मेवाड़ की जितनी भूमि पर उनका कब्ज़ा था, उतने पर पुनः उनका शासन स्थापित हो गया. इस स्थिति में बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर कोई परिवर्तन न कर सका. महाराणा प्रताप लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और यह मेवाड़ के लिए स्वर्ण युग साबित हुआ. मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण सन 1585 में समाप्त हुआ. इसके बाद महाराणा प्रताप राज्य के विकास में जुट गए. यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 19 जनवरी 1597 को अपनी नई राजधानी चावंड में महाराणा प्रताप का निधन हो गया. महाराणा प्रताप से भयभीत होने का उदाहरण अकबर के इसी कदम से मिलता है कि वह डर के मारे अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया था और महाराणा के निधन के बाद पुनः आगरा लौट आया. 

महाराणा प्रताप का नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी ही नहीं अपितु मंत्रदाता भी कहे जा सकते हैं. मुग़ल सल्तनत को चुनौती देने वाले महाराणा जहाँ मुगलों के लिए काल बने वहीं स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय जनमानस को प्रेरित करने वाले पथ प्रदर्शक भी बने. वे स्वतंत्रता, स्वाभिमान, सहिष्णुता, पराक्रम और शौर्य के परिचायक कहे जाते हैं. भयंकर मुसीबतों में दुःख सहते हुए भी उन्होंने हमेशा धर्म की रक्षा की. मातृभूमि के गौरव के लिए वे कभी कितनी ही बड़ी मुसीबत से विचलित नहीं हुए, न ही कभी किसी के आगे झुके. यही कारण है कि महाराणा प्रताप आज भी हिंदुस्तान के जन-जन के हृदय में बसे हुए हैं.


03 मई 2019

आज़ाद प्रेस की मानसिकता


कितना हास्यास्पद लगता है, आज़ाद प्रेस के होने के दौर में भी आज, 3 मई को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) मनाया जाना. किसी तरह के हास्य से पहले जानकारी दे दी जाये कि इसे मनाने का निर्णय 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के जनसूचना विभाग ने मिलकर किया था. इस निर्णय के पूर्व नामीबिया में हुए एक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि प्रेस की आज़ादी को जनसंचार की आज़ादी के रूप में देखा जाना चाहिए. इसके बाद प्रस्ताव पारित होने के बाद प्रतिवर्ष 3 मई को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाने लगा. अब बात की जाये हास्य की, आज़ादी उस देश में माँगी जा रही है जहाँ कि आज़ादी पहले से है. किसी देश में देखा गया है कि वहाँ के प्रधानमंत्री को हत्यारा, कातिल, खून का सौदागर कहा जाये? नहीं सुना होगा न. इसके अलावा भारत में प्रेस का काम भाजपा-विरोधी होना, हिन्दू-विरोधी होना है. यदि ऐसा न होता तो देश की मीडिया आज इस तरह से कम न कर रही होती. बहरहाल, आज दिन है प्रेस की स्वतंत्रता का तो कुछ उसी पर.


यह दिवस प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा तथा प्रेस में सेवारत रहते हुए दिवंगत हुए संवाददाताओं को श्रद्धांजलि देने का भी दिन है. इसके बाद भी देखा जाये तो प्रेस अपने इसी दायित्व का निर्वहन भी सही ढंग से नहीं कर रहा है. अपनी आज़ादी का उचित दायित्व निर्वहन तो अलग वह अपने अंग रहे लोगों को श्रद्धांजलि देने का काम भी उचित ढंग से नहीं कर रहा है. कम से कम आज के दिन तो खबरों में झूठ बोलने से, उनको टीआरपी के झमेले में पड़ने से परहेज करना चाहिए था. अनावश्यक विचारों, बयानों के प्रसारण से बचा जाना चाहिए था. जनहित सम्बन्धी खबरों के स्थान पर मिर्च-मसालेदार खबरों के प्रसारण से परहेज किया जाना चाहिए था, मगर ऐसा होता नहीं दिखता. आज यह भले ही कहा जाये कि प्रेस जनता का आइना है, मगर असलियत यह है कि प्रेस ने जनता को गुमराह करने का काम किया है. यही कारण है कि आज़ादी की माँग के साथ-साथ प्रेस पर नियंत्रण रखने के लिए कुछ नियम और संगठन बने हुए हैं. ये समय-समय पर प्रेस को अपने दायरे में रहकर काम करते रहने की याद दिलाते रहते हैं. सत्यता तो यह है कि प्रेस की आज़ादी को छीनना एक तरह से देश की आज़ादी को छीनने जैसा ही है. वर्तमान में चीन, जापान, जर्मनी, पाकिस्तान जैसे देशों में प्रेस को पूर्णत: आज़ादी नहीं है. यहां प्रेस पर सरकार का सीधा नियंत्रण है. इस दृष्टि से भारत में प्रेस की स्थिति अत्यंत सशक्त है. 

इसके बाद भी यहाँ भी प्रेस में बहुतेरे लोग अपनी हनक दिखाने के लिए प्रविष्ट होने लगे हैं. इनका उद्देश्य जन-जागरूकता फैलाने के बजाय अपनी धाक जमाना ही अधिक होता है. अपनी गाड़ियों में प्रेस लिखे लोग प्रत्येक शहर में मिल जायेंगे. ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जिनके द्वारा किसी समाचार-पत्र, पत्रिका का प्रकाशन उसी स्थिति में होता है, उन्हीं दिनों में होता है जबकि उससे संदर्भित विज्ञापन मिलना होता है. इन्हीं विज्ञापन के द्वारा वे न केवल प्रशासन पर अपनी हनक दिखाते हैं बल्कि अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ भी करते हैं. ऐसे लोग अपने आपको स्थापित करने लिए मीडिया का रास्ता चुनते हैं. ऐसे लोगों से प्रेस को बचने की आवश्यकता है. उसे समझना होगा कि प्रेस की आज़ादी का अर्थ किसी सन्दर्भ में किसी भी तरह की खबर का प्रसारण कर देना नहीं है. प्रेस को इस बात का संज्ञान लेना होगा कि किसी पूर्वाग्रह के साथ खबरों का, विचारों का प्रसारण न हो. यदि ऐसा होता है तो यह प्रेस की अक्षमता ही है, साथ ही समाज के लिए अहितकर भी है.