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29 नवंबर 2023

हौसलों ने जीती जंग

अंततः पिछले सत्रह दिनों से देश भर की अटकी हुई साँसों ने राहत महसूस की. लगभग चार सौ घंटों के अनथक प्रयासों के बाद मंगलवार रात मजदूरों को निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई और सुरंग में फँसे सभी 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया. उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग में सत्रह दिन पूर्व रोज की तरह ही मजदूर अपने काम में लगे हुए थे. उसी समय हुए भूस्खलन के कारण ये मजदूर उसी सुरंग में फँस गए. इस सूचना पर प्रशासन ने राहत एवं बचाव कार्य तेजी से शुरू कर दिए. राहत और बचाव कार्य आरम्भ होने के समय बचाव दलों को सारी प्रक्रिया सुगमता से संपन्न होने वाली समझ आ रही थी किन्तु जैसे-जैसे बचाव कार्य आगे बढ़ा तो अनेकानेक कठिनाइयाँ सामने आने लगीं. बचाव कार्य के आरम्भ में एक राहत भरी खबर मिली. सुरंग से निकला चार इंच व्यास का सत्तर फुट लम्बा स्टील का एक पाइप सुरंग के अन्दर मजदूरों और बाहर के लोगों के बीच संपर्क का माध्यम बना. उस पाइप के द्वारा जब सुरंग में फँसे मजदूरों ने पानी बाहर भेजा तो बचाव दलों को उनके जीवित होने की खबर लगी. उनमें ख़ुशी, उत्साह का संचार हुआ. इसी पाइप के सहारे सुरंग के भीतर दवाएँ, खाद्य सामग्री और ऑक्सीजन आदि पहुँचाई जाती रही. मजदूरों के परिजनों की, प्रशासनिक अधिकारियों की, बचावकर्मियों की आवाजों का भीतर जाना भी सुरंग के भीतर के मजदूरों में आशा का संचार किये रहा. 




ऐसी स्थिति के बाद भी सवाल ज्यों का त्यों बना था कि मजदूरों को सुरंग से बाहर कैसे लाया जायेगा? बचाव कार्य युद्ध-स्तर पर चल रहा था. राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया बल (एनडीआरएफ) लगातार विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों, इंजीनियरों से संपर्क बनाये हुए था. इसके साथ-साथ रेल विकास निगम लिमिटेड, टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड, ओएनजीसी, सतलुज जल विद्युत निगम आदि भी बचाव कार्य में पूरी तत्परता से लगे थे. देश के विशेषज्ञों के साथ-साथ विदेशी विशेषज्ञों की सलाह और अनुभव का लाभ लिया जा रहा था. एकबारगी लगा कि मजदूरों तक जल्द पहुँच पाना संभव हो सकेगा और ऐसा हुआ भी. लगातार खुदाई के बाद जो पाइप सुरंग के भीतर पहुँचाया गया, उसके द्वारा एनडीआरएफ के जवानों ने प्रवेश किया. उनका उद्देश्य मजदूरों को बाहर निकलने का तरीका समझाना था. इन जवानों के द्वारा पाइप के माध्यम से पहुँच बनाये जाने पर जानकारी हुई कि पाइप किसी लोहे की ठोस रॉड के कारण बाधित हो रहा है. इसी रॉड को काटने की कोशिश में अमरीकी ऑगर मशीन भी ख़राब हो गई. ऐसी स्थिति के बाद मजदूरों तक पहुँच बनाने के दूसरी प्रक्रिया को अपनाया गया. इसमें सुरंग के ऊपर से लंबवत (वर्टिकल) खुदाई शुरू की गई.


मशीनें अपनी क्षमता से बचाव कार्य को सुगम बनाने में लगी थीं तो प्राकृतिक स्थिति उसमें रुकावट पैदा कर देती थी. मशीनों के लगातार सफल-असफल होने की स्थिति के बीच 26 नवम्बर को बचावकार्य के लिए रैट होल माइनर्स को लगाया गया. एक निजी कंपनी ट्रेंचलेस इंजीनियरिंग सर्विसेज की सहायता से इनको बचाव स्थल पर बुलाया गया. यह टीम ड्रिल मशीनों के साथ सुरंग में पहुँचने का रास्ता बनाती है. बड़ी-बड़ी मशीनों के स्थान पर इनके द्वारा खुदाई का कार्य हाथों से किया जाता है. यह टीम हाथों और छोटी ड्रिल मशीन के द्वारा मलबे की खुदाई करके सुरंग में जाने का रास्ता बनाती है. इस प्रक्रिया में एक बार में दो रैट माइनर्स ही पाइपलाइन में जाते हैं. एक व्यक्ति आगे का रास्ता बनाता है और दूसरा व्यक्ति निकले हुए मलबे को ट्रॉली में भरने और बाहर निकालने का काम करता है. जब पाइपलाइन के अंदर काम कर रहे दो लोग जब थक जाते हैं तो वे बाहर निकल आते हैं और रैट माइनर्स टीम के दो सदस्य बाहर से अंदर जाते हैं. मशीनों के बीच जिस तेजी से इन रैट माइनर्स ने अपना काम मुस्तैदी से दिखाया उसने उत्तरकाशी सुरंग बचाव कार्य में उम्मीदों को पंख दिए थे. अपने अंतिम प्रयास में एकबारगी सफलता के बीच हलकी सी मायूसी भी एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के जवानों के हाथ लगी. आखिरी पाइप के हिस्से को जब मजदूरों तक पहुँचाने के बाद ये जवान उसके द्वारा अन्दर गए तो पता चला कि निकास के सिरे पर पानी जमा है. इसके बाद पाइप का हिस्सा पुनः आगे खिसकाने का काम किया गया. तीन मीटर की दूरी तक पाइप को धकेलने के बाद मजदूरों से संपर्क किया जा सका.


निश्चित ही सत्रह दिन तक चली इस अबाध बचाव प्रक्रिया के बाद सभी मजदूरों को सकुशल बाहर निकाल लाना ख़ुशी प्रदान करने वाला है मगर यह पुनः सवाल भी उठाता है. आखिर सुरंग बनाने के काम में लगे विशेषज्ञ, इंजीनियर और कम्पनियाँ लापरवाही क्यों बरतती हैं? क्यों उनके द्वारा ऐसी तत्परता, बचाव प्रक्रिया किसी दुर्घटना के बाद ही शुरू होती है? इन प्रश्नों के बीच विचार किया जाना चाहिए कि पहाड़ी क्षेत्रों में सर्दी के दिनों में बिना सूरज की रौशनी के सत्रह दिनों तक ये मजदूर किस तरह खुद को आशान्वित किये रहे होंगे कि वे सकुशल बाहर निकलेंगे? यह निश्चित ही श्रमिकों के हौसले की जीत है, देशी-विदेशी विशेषज्ञों, बचाव दलों की तत्परता की जीत है. इसके बाद भी सुरंग निर्माण से जुड़ी कंपनियों को, प्रशासन को, सरकारों को इस तरफ सुरक्षा व्यवस्था और चाक-चौबंद करने की आवश्यकता है. 





 

10 मई 2020

कोरोना योद्धा की काल्पनिकता से बाहर निकले मीडिया

संभव है कि हमारे मीडिया के कई साथी इस पोस्ट पर नाराजगी जताएँ. हमारे कई दोस्त, उम्र में हमसे बड़े-छोटे लोग, हमारे कई विद्यार्थी मीडिया से जुड़े हुए हैं. उनकी नाराजगी की चिंता से अधिक आवश्यक हमें उनकी चिंता करना लगा. वे सभी लोग कुछ बिन्दुओं पर गंभीरता से विचार करते हुए अपने कदम बढ़ाएंगे, ऐसी अपेक्षा ही कर सकते हैं.


पहली बात, आप ऐसी कौन सी जानकारी सरकार तक, प्रशासन तक पहुँचाना चाहते हैं, जो उनके पास अपने स्त्रोतों से उनको उपलब्ध नहीं हो सकती?

दूसरी बात, आपके द्वारा कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या, इससे होने वाली मौतों की संख्या आदि का आम नागरिकों के लिए क्या लाभ है?

तीसरी बात, विचार करिए कि लॉकडाउन के कारण उत्पन्न अनेक तरह की समस्याओं का उल्लेख करके आप जनता को सुकून दिलवा रहे हैं अथवा परेशान कर रहे हैं?

चौथी बात, इस समय किसी शहर में किसी भी तरह की राजनैतिक, सांस्कृतिक, खेलकूद आदि से सम्बंधित कार्यक्रम संचालित नहीं हो रहे हैं, जिनका प्रकाशन/प्रसारण आपके लिए आवश्यक है.

पाँचवीं बात, सामान्य दिनों में भी बहुत सी खबरों का कवरेज आपके द्वारा ही नहीं किया जाता था बल्कि सूत्रों के द्वारा आपको उनकी प्राप्ति होती थी.

छठवीं बात, प्रत्येक जिले में सूचना कार्यालय होता है, उसका काम सूचनाएँ उपलब्ध करवाना ही होता है.


चलिए मान लेते हैं कि आपका ही कवरेज करना अत्यंत आवश्यक है तो लॉकडाउन के दौरान खुद के द्वारा प्रकाशित/प्रसारित की गई खबरों पर ही निगाह डाल लीजिये. उनमें से कितनी ऐसी हैं जो अत्यावश्यक अथवा अनिवार्य हैं?

एक बात स्वीकारिये कि कोरोना से सम्बंधित किसी भी खबर का प्रसारण सरकारी गाइडलाइन के आधार पर ही हो रहा है. आप लोगों द्वारा भी प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी ही प्रकाशित/प्रसारित की जा रही है.

प्रशासन द्वारा जगह-जगह लॉकडाउन के पालन की स्थिति का अवलोकन, नगरीय सीमाओं पर आने वालों की भीड़, पुलिस की मुस्तैदी-जांच आदि की खबरों के लिए क्या सम्बंधित स्थान पर आपका ही रहना आवश्यक है?

अपने-अपने क्षेत्र में अपना whatsapp नंबर सबके बीच सार्वजनिक कीजिये. प्रशासन से अथवा अन्य लोगों से उसी पर खबरें, फोटो, वीडियो प्राप्त करिए.

एक विशेष बात, विगत कुछ दिनों से पत्रकारों के लिए मुआवजे की बात की जा रही है. इसका अर्थ यह निकला कि आप भी आशंकित हैं. ऐसे में एक बार अपने परिजनों से उनकी मंशा जान लीजिये कि वे आपके स्थान पर सरकारी मुआवजा स्वीकारने को तैयार हैं?

इसके अलावा एकबारगी मुआवजे की बात को सरकार मान भी ले तो क्या आप मीडिया से जुड़े होने के बाद भी मीडिया की अंदरूनी वास्तविकता से परिचित नहीं? किसी संस्थान द्वारा एक जिले में कितने लोग वास्तविक रूप में उसके कर्मियों के रूप में मान्यता प्राप्त हैं, ये आपको भी ज्ञात होगा. ऐसे में मुआवजे की स्थिति में सरकारी नीति में कितने लोग आयेंगे, ये भी आपको पता होगा.

इन सब बातों से बड़ी बात, मीडिया के लोग खुद को कोरोना योद्धा, चौथा खम्बा आदि की काल्पनिकता से भी बाहर निकलने का प्रयास करें. संवैधानिक रूप से तीन ही खम्बे हैं. कोरोना योद्धा के रूप में वे लोग ही तत्पर हैं जो सरकारी दायित्वों से बंधे हैं, अन्यथा की स्थिति में बहुतायत निजी चिकित्सक घर में ही रह रहे हैं.

एक बात पूरी तरह से दिमाग से निकाल दीजिए कि आप लोग खबरें नहीं देंगें तो लोगों को खबर न होगी. वर्षों पहले गिने-चुने समाचार-पत्र होते थे, एक ही चैनल हुआ करता था तब भी खबरें लोगों तक पहुँचती हैं. आज तो हर व्यक्ति समाचार-पत्र है, हर व्यक्ति चैनल है. आप अपने शहर की बात कर रहे, व्यक्तियों के पास अन्तरिक्ष की खबरें तक हैं.

अच्छी बात है, आप सभी बधाई के पात्र हैं कि रोज की खबरें जनता तक पहुँचाना आप अपना दायित्व समझते हैं मगर विचार करिए कि इस कोरोना के दौर में, लॉकडाउन में कितने लोग समाचारों के लिए अखबारों और न्यूज़ चैनल्स का सहारा ले रहे हैं?

खबरों के प्रसारण के लिए सरकारी तंत्र पर्याप्त सक्रिय है. कुछ महीनों के लिए खोजी पत्रकारिता टाइप कदम रुके रहेंगे तो कोई प्रलय नहीं आ रही मगर आप लोगों को कुछ होता है तो आपके घर अवश्य प्रलय आ जाएगी. यहाँ फिर वही बात कि इस लॉकडाउन में किस तरह की खोजी खबर, गुप्त जानकरी आप लाना चाहते जो नागरिकों के लिए लाभकारी होगी, ये बताएं और बन जाएँ कोरोना योद्धा.

कहना हमारा फ़र्ज़ था क्योंकि आप हमारे हैं. अब मानना या न मानना आपके ऊपर क्योंकि ये तय आपको करना है कि आपके परिजन आपके हैं या नहीं? ध्यान रखियेगा, कोरोना का संक्रमण पद, प्रतिष्ठा, प्रस्थिति, कार्य, वर्ग, धर्म, जाति, क्षेत्र आदि देखकर नहीं हो रहा.

घर में रहिये, स्वस्थ रहिये, सुरक्षित रहिये.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

06 मार्च 2020

कोरोना वायरस : सावधानी ही बचाव है

चीन के वुहान से फैला कोरोना वायरस आज वैश्विक संकट के रूप में सामने आया है. ऐसा अनुमान है कि अभी तक 79 देशों के 95,300 से अधिक लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं. इसकी वजह से होने वाली मौतों की संख्या बढ़कर 3280 से अधिक हो गई है. चीन के बाद दक्षिण कोरिया, इटली और ईरान में इसके सबसे ज़्यादा मामले मिले हैं. भारत में भी आधिकारिक तौर पर कोरोना वायरस के क़रीब 30 मामले दर्ज हो चुके हैं. इनमें से अधिकांश मामले केरल, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और दिल्ली एनसीआर में दर्ज किये गए हैं.

कोरोना वायरस कई वायरसों का एक समूह होता है. सामान्य रूप से यह वायरस बेहद आम होते हैं. इसके शुरुआती लक्षणों से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. इसके संक्रमण से व्यक्ति को साँस लेने में थोड़ी तकलीफ़, खाँसी या फिर नाक का बहना शुरू हो जाता है. सामान्य वायरस होने के बाद भी कोरोना परिवार के कुछ वायरस बेहद ख़तरनाक़ होते हैं. इनमें सार्स (सिवियर एक्यूट रेसपिरेटरी सिंड्रोम) और मर्स (मिडल ईस्ट रेसपिरेटरी सिंड्रोम) को शामिल किया जा सकता है. चीन के वुहान से शुरू हुई इस महामारी के लिए जिम्मेदार विषाणु को नॉवेल कोरोना वायरस या nCoV का नाम दिया गया है. यह वायरस कोरोना परिवार का एक नया वायरस है, जिसकी पहचान अभी तक इंसानों में नहीं हो पाई थी.


यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि ह्यूमन कोरोना वायरस (HCoV) की पहचान पहली बार 1960 के दशक में आम सर्दी के रोगियों में हुई थी. मनुष्यों के बीच कोरोना वायरस का संक्रमण अधिकांशतः सर्दियों के महीनों में या फिर शुरुआती वसंत के दौरान होता है. कोरोना वायरस के सामान्य प्रकारों में 229E (अल्फा कोरोनावायरस), NL63 (अल्फा कोरोनावायरस), OC43 (बीटा कोरोनावायरस), HKU1 (बीटा कोरोनावायरस), MERS-CoV (मर्स कोरोनावायरस) शामिल हैं. इनमें MERS-CoV को सबसे खतरनाक और दुर्लभ माना जाता है. इससे संक्रमित व्यक्ति पहले मध्य पूर्व श्वसन सिंड्रोम (Middle East Respiratory Syndrome या MERS) से और उसके बाद गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम (Severe Acute Respiratory Syndrome या SARS-CoV) से प्रभावित हो सकता है. इससे सार्स (SARS) नामक घातक बीमारी की सम्भावना बढ़ जाती है.

मध्य पूर्व श्वसन सिंड्रोम, मर्स (MERS) वायरस का हमला पहली बार 2012 में मध्य पूर्व देशों में हुआ था. इससे श्वसन संबंधी समस्या उत्पन्न हुई थी पर इसके लक्षण बहुत अधिक गंभीर थे. मर्स (MERS) से संक्रमित हर 10 में से तीन से चार रोगियों की मृत्यु हो गई थी. गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम (Severe Acute Respiratory Syndrome या SARS-CoV) सार्स का प्रकोप नवम्बर 2002 और जुलाई 2003 के मध्य देखने को मिला था. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दक्षिणी चीन के गुआंगडोंग प्रांत में पहली बार इसकी पहचान की गई थी. इसके परिणामस्वरूप विभिन्न देशों में 8273 लोग संक्रमित हुए और 775 लोगों की मृत्यु हो गयी थी. लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसीन के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर पीटर पियोट कहते हैं कि अच्छी ख़बर ये है कि कोरोना वायरस सार्स वायरस की तुलना में कम जानलेवा है.


कोरोना वायरस (कोवाइड-19) से पीड़ित व्यक्ति को लगातार छींक आने की समस्या होती है, जिससे पीड़ित की एक नाक से हमेशा पानी आने लगता है. संक्रमित व्यक्ति को खाँसी, बुखार, गले में खराश, साँस फूलने और थकान के लक्षण पाए जाते हैं. संक्रमण होने में पहले बुख़ार आता है. इसके बाद सूखी खाँसी और फिर एक हफ़्ते बाद साँस लेने में परेशानी होने लगती है. इसके बाद भी ध्यान रखा जाये कि इन लक्षणों के होने का तात्पर्य यह नहीं कि व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित है. ज़ुकाम और फ्लू में भी इसी तरह के लक्षण पाए जाते हैं, ये भी अपने आपमें वायरस हैं.

कोरोना वायरस के गंभीर मामलों में निमोनिया, साँस लेने में बहुत ज़्यादा परेशानी, किडनी फ़ेल होना है. इस संक्रमण से मौत होने की आशंका भी होती है, हालाँकि ऐसा उम्रदराज़ लोगों के साथ अथवा उन लोगों के साथ ख़तरा गंभीर हो सकता है जिनको पहले से ही अस्थमा, मधुमेह, ह्रदय सम्बन्धी कोई बीमारी है.

कोरोना से मिलते-जुलते वायरस खाँसी और छींक से निकलने वाली बूँदों के माध्यम से फैलते हैं. ऐसे वायरस के संक्रमण से बचने के लिए अपने हाथ अच्छी तरह धोएं. खाँसते या छींकते वक़्त अपना मुँह ढँक लें. हाथ साफ़ नहीं हो तो आँखों, नाक और मुँह को छूने बचें.

इसके साथ-साथ यदि कोई व्यक्ति संक्रमित इलाक़े से आया है अथवा किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहा है तो उसे अकेले रहना चाहिए. उसे अपने घर पर ही रहना चाहिए. वह ऑफ़िस, कार्यालय अथवा किसी भी सार्वजनिक जगहों पर न जाए. बस, ट्रेन, ऑटो या टैक्सी से यात्रा करने से बचे. ऐसे व्यक्तियों को अपने घर में मेहमान को आने से रोकना चाहिए.

संक्रमित व्यक्ति यदि कई लोगों के साथ रह रहा है तो उसे और ज़्यादा सतर्कता बरतने की आवश्यकता है. वह किसी अलग कमरे में रहे. संयुक्त रूप से इस्तेमाल होने वाली जगहों को नियमित रूप से साफ़ करते रहना चाहिए. लगभग 14 दिनों तक ऐसा करना चाहिए जिससे वायरस के संक्रमण का ख़तरा कम हो सके.

यहाँ एक बात और ध्यान करने वाली है कि कोरोना वायरस फैलने के सम्बन्ध में इस तरह के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि यह वायरस पार्सल, चिट्टियों या खाने के ज़रिए फैलता है. यह संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से बहुत जल्दी फैलता है.


वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन का कहना है कि कोरोना वायरस (Covid-19) से बचने के लिए हाथों की हाइजीन सबसे ज्यादा जरूरी है. इस वायरस से ही नहीं वरन बीमारी फैलाने वाले किसी भी तरह के कीटाणु से बचने के लिए अपने हाथों को अवश्य धोना चाहिए.

अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने साबुन और पानी से हाथों को धोने को सबसे अच्छा तरीका बताया है. उसका कहना है कि सैनिटाइजर कुछ जर्म्स को मारने में नाकाम साबित हो चुका है. ग्रीसी और धूल भरे हाथों के लिए भी सैनिटाइजर अच्छा नहीं है. अगर साबुन ना हो तो अल्कोहल वाले सैनिटाइजर का इस्तेमाल किया जा सकता है.

वायरस से बचने के लिए हाथ धोने का भी अपना अलग तरीका है. महज साबुन और पानी का इस्तेमाल ही वायरस से बचाव नहीं करवा सकता है. इसके लिए सबसे पहले अपने हाथों को पानी की टैप के नीचे गीला करें और पानी की टैप बंद कर दें. इसके बाद हाथों में साबुन अच्छे से हाथों के पीछे, उंगलियों के बीच में और नाखूनों के आस-पास अच्छे से लगाएं. लगभग 20 सेकेंड के लिए हाथों को रगड़ें. साफ पानी से अपने हाथ धोएं. इसके बाद सूखे साफ कपड़े से अपने हाथों को पोछें.


हाथ धोने के अलावा चेहरे पर मास्क का लगाया जाना भी कोरोना वायरस से बचाव का एक तरीका माना जा रहा है. इस सम्बन्ध में किसी भेड़चाल की आवश्यकता नहीं है और न ही मास्क के लिए एकदम से परेशान होने की आवश्यकता है. विश्व स्वास्थय संगठन के एक अनुमान के मुताबिक़ कोरोना वायरस के प्रकोप से लड़ते हुए हेल्थ कर्मियों के लिए क़रीब 9 करोड़ मास्क, 7.6 करोड़ जोड़ी दस्ताने और क़रीब 16 लाख चश्मों की ज़रूरत पड़ने वाली है. संगठन के डायरेक्टर जनरल टेडरोस अधानोम ने कहा है कि अगर ज़रूरी मेडिकल संसाधनों की कमी होती है तो लोगों के इलाज में लगे डॉक्टरों और नर्सों के लिए यह लड़ाई और भी मुश्किल हो जाएगी. ऐसे में हम सभी को सावधानी से बुद्धिमत्तापूर्ण कदम उठाने की आवश्यकता है.  

मास्क के सम्बन्ध में कुछ सामान्य सी जानकारियाँ हम सभी को ध्यान में रखनी चाहिए. अगर हम स्वस्थ हैं तो किसी मास्क की जरूरत नहीं है. कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति की देखभाल करने वालों को मास्क पहनना अनिवार्य है. जिन लोगों को बुखार, कफ या साँस लेने में तकलीफ की शिकायत है उन्हें मास्क पहनना चाहिए और तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए.

इस वायरस से बचाव का एक तरीका मास्क लगा लेना भर नहीं है. इसके पहनने के तरीके के द्वारा भी संक्रमण से बचा जा सकता है. किसी भी व्यक्ति को मास्क पर सामने से हाथ नहीं लगाना चाहिए. यदि जाने-अनजाने में हाथ लग जाए तो तुरंत हाथ धोना चाहिए. मास्क को ऐसे पहनना चाहिए कि व्यक्ति की नाक, मुँह और ठोड़ी का हिस्सा उससे ढँका रहे. मास्क उतारते समय भी उसका फीता पकड़ कर निकालना चाहिए, मास्क को छूना नहीं चाहिए. ये भी ध्यान में रखा जाये कि मास्क रोज बदल दिया जाना चाहिए.

इस समय कोरोना वायरस का कोई इलाज नहीं है लेकिन इसमें बीमारी के लक्षण कम होने वाली दवाइयां दी जा सकती हैं. जब तक आप ठीक न हो जाएं, तब तक आप दूसरों से अलग रहें. इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सी फूड के सेवन से बचना चाहिए क्योंकि कोरोना वायरस के उत्सर्जन के लिए प्रमुख स्रोत के रूप में अभी सी फूड को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

हम सभी को इसकी जानकारी होनी चाहिए कि कोरोना वायरस जैसे वायरस शरीर के बाहर बहुत ज़्यादा समय तक ज़िंदा नहीं रह सकते. इस वायरस के अलग-अलग स्थितियों में जीवित रहने का समय भी अलग-अलग है. धातु की सतह पर यह 12 घंटे तक जीवित रहता है. कपड़े पर यह मात्र 9 घंटे जीवित रहता है. हाथों पर इसके जीवित रहने की अवधि मात्र 10 मिनट है. यह वायरस 26-27 डिग्री सेल्सियस के तापमान में जीवित नहीं रह सकता है. इसीलिए यह गर्म क्षेत्रों में नहीं रहता है. इस तरह यदि व्यक्ति अपने हाथों को पर्याप्त ढंग से धोता है, अपने कपड़ों को धोने के बाद सूरज की रौशनी में सुखाता है, व्यक्ति स्वयं भी धूप में कुछ देर बैठता है तो इस वायरस के नष्ट होने की सम्भावना बढ़ जाती है.


अभी कोरोना वायरस से बचने के लिए कोई वैक्सीन नहीं बनी है तो सावधानी ही बचाव के लिए बेहतर उपाय है. कोरोना वायरस के मामलों में धैर्य की आवश्यकता है. सावधानी की आवश्यकता है. बिना हड़बड़ी मचाए बचाव किया जाये तो इसके संक्रमण से बचा जा सकता है.
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07 अप्रैल 2019

सवालिया निशान हम सबके ऊपर भी हैं


किस हद तक असंवेदनशील होते जा रहे हैं हम इसका अंदाजा लगातार किसी न किसी घटना से लगता ही रहता है. कभी पढ़ने को मिलता कि खाद्य-सामग्री में मिलावट की जा रही है. दूध में यूरिया मिलाया जा रहा. दवाइयों में मिलावट की जा रही है. कुछ सालों पहले खून में भी मिलावट करके बेचने वाला गिरोह पकड़ा गया था. मानव-अंगों की तस्करी की खबरें भी सामने आती रहती हैं. किसी लालच के चलते बच्चों की बलि दिए जाने की खबरें इक्कीसवीं सदी में पढ़ने को मिलती रहती हैं. मासूम बच्चियों का शारीरिक शोषण करके उनकी बर्बर हत्या कर देने की खबरें भी इधर आम हो चली हैं. इन खबरों को पढ़ने के बाद मन खिन्न हो उठता है कि आखिर किस दिशा में समाज जा रहा है? पढ़े-लिखे होने का दंभ करने के बाद भी कैसा समाज बनाने में लगे हैं हम सभी. आज एक खबर पढ़ने को मिली तो मनोदशा अजब सी हो गई. एक बच्ची के बोर-वेल में गिरने के बाद शुरू हुआ बचाव कार्य उसे निकाले बिना ही रोक दिया गया. 


बचाव कार्य के दौरान वह बच्ची सीमा, पच्चीस फीट से सरकते हुए साठ फीट तक पहुँच गई. गड्ढे में भेजी जा रही ऑक्सीजन की पाइप भी इस दौरान टूट गई, जिससे गड्ढे में ऑक्सीजन पहुँचना भी बंद हो गया. साठ फीट पर बच्ची के पहुँच जाने के बाद और मिट्टी के रेतीली होने के कारण लगातार वह धसक रही थी. आसपास के मकानों के गिरने का भी संकट उत्पन्न हो गया था. ऐसे में बचाव कार्य में लगे लोगों द्वारा यह मानते हुए कि साठ फीट गहराई तक जा चुकी बच्ची जीवित न रही होगी, बचाव कार्य रोक दिया गया. यह अपने आपमें कितना संवेदनहीन मामला है कि एक बच्ची को बिना निकाले, बिना स्पष्ट पुष्टि हुए कि वह जीवित भी है या नहीं बचाव कार्य रोक दिया गया. मन सोच-सोच कर ही व्यथित हो उठता है कि सिर्फ बचाव कार्य ही नहीं रोका गया वरन वहाँ के सभी गड्ढों को मिट्टी डालकर बंद कर दिया गया.


एक बार को उस स्थिति की कल्पना कीजिये कि कैसे उस बच्ची के घरवालों ने बचाव कार्य बंद करने सम्बन्धी सहमति दी होगी? किस मनोदशा में बचाव कार्य को बंद किया गया होगा? कैसे बचाव कार्य में लगे अधिकारियों ने उन गड्ढों को मिट्टी से भरने का आदेश दिया होगा? कैसे दस-बारह मकानों का बचाया जाना एक बच्ची के बचाने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया? फ़िलहाल तो वह बच्ची जिंदा ही दफ़न कर दी गई उस बोर-वेल में, यह मानते हुए कि वह जीवित न बची होगी. क्या अब भी इस तरह की घटनाओं से सबक नहीं लिया जायेगा? क्या ऐसे मामलों में बोर-वेल खुदवाने वालों को अपराधी घोषित करते हुए उनको कानूनन सजा नहीं दी मिलनी चाहिए? क्या ऐसी घटनाएँ बस दो-चार दिन चर्चा में रहने के बाद फिर किसी बच्चे की मौत का इंतजार करने लगेंगी? क्या सिर्फ प्रशासन को ही दोष देते हुए हम नागरिक अपनी जिम्मेवारियों से बचते रहेंगे? क्या हमारा कोई दायित्व नहीं है? बहुत से बिन्दु हैं जो हमारे बुद्धिजीवी होने पर, हम सभी के इक्कीसवीं सदी के नागरिक होने पर, हम सभी के संवेदनशील होने पर सवालिया निशान लगाते हैं.

02 मई 2018

प्रदूषण की गिरफ्त में आते शहर


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने जिनेवा में विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की एक सूची जारी की. इस सूची में वैश्विक रूप से पहले स्थान पर उत्तर प्रदेश के कानपुर है. दुखद ये है कि शुरू के दस शहरों में से नौ सहित कुल बीस शहरों में देश के चौदह शहर प्रदूषित पाए गए हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी की गई सूची में देश के तैंतीस शहर प्रदूषित पाए गए हैं. इन शहरों के प्रदूषण सम्बन्धी आँकड़ों को इन शहरों की जहरीली वायु गुणवत्ता के आधार पर एकत्र कर जारी जारी किया गया है. WHO द्वारा जारी रिपोर्ट में पार्टिकुलेट मैटर यानि पीएम 10 और पीएम 2.5 के स्तर को शामिल किया गया है. पार्टिकुलेट मैटर यानि पीएम वायु प्रदूषण का बड़ा स्रोत माना जाता है. इसमें सल्फेट, नाइट्रेट और काले कार्बन जैसे घरों, उद्योग, कृषि और परिवहन से निकलने वाले प्रदूषक शामिल रहते हैं. इस रिपोर्ट में वर्ष 2016 को आधार बनाया गया है.


WHO ने यह रिपोर्ट पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 के आधार पर बनाई है. पीएम 2.5 हवा में फैले अति-सूक्ष्म खतरनाक कण हैं. जो सूक्ष्म कण 2.5 माइक्रोग्राम से छोटे होते हैं उनको पर्टिकुलेट मैटर 2.5 या पीएम 2.5 कहा जाता है. किसी भी स्थान पर पीएम 2.5 कणों के स्तर के आधार पर वायु प्रदूषण या कहें कि प्रदूषण का आकलन किया जाता है. इसके लिए इन कणों की उपस्थिति की गणना प्रति क्यूबिक मीटर हवा में माइक्रोग्राम इकाई में की जाती है. लंबे समय तक पीएम 2.5 के संपर्क में रहने से फेफड़े के कैंसर, हृदय से जुड़ी अन्य बीमारियों के होने का खतरा रहता है.

पीएम 2.5 की तरह ही पीएम 10 के आधार पर प्रदूषण का आकलन किया जाता है. इन कणों की उपस्थिति की गणना भी हवा में प्रति क्यूबिक मीटर पर की जाती है. पीएम 10 का सामान्‍य लेवल 100 माइक्रोग्राम प्रति क्‍यूबिक मीटर (MGCM) होना चाहिए. विडम्बना ये है कि देश की राजधानी दिल्ली में यह कुछ जगहों पर 1600 तक भी पहुंच चुका है. पीएम 2.5 का सामान्‍य लेवल 60 एमजीसीएम माना गया है लेकिन यह दिल्ली में 300 से 500 तक पहुंच जाता है.


WHO ने वैसे तो किसी भी स्तर को सुरक्षित स्तर के रूप में मान्यता नहीं दी है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि किसी भी स्तर पर पीएम 2.5 खतरनाक होता है. इसके बाद भी पीएम 2.5 को लेकर एक मानक बनाया गया है. डब्ल्यूएचओ के ऐसे ही मानक के अनुसार पीएम 2.5 का स्तर एक साल में औसतन प्रति क्यूबिक मीटर 10-12 माइक्रोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए. इसे एक दिन में 25 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के नीचे होना चाहिए, हालंकि भारतीय परिस्थितियों में सुरक्षा का स्तर 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक माना गया है. डब्लयूएचओ की वर्तमान जारी सूची में प्रदूषण का आधार पीएम 2.5 को ही बनाया गया है. यदि भारतीय संदर्भो में पीएम 2.5 के सुरक्षा स्तर 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर को ही माना जाये तो सूची के प्रदूषित शहरों में उन्नीस शहर ऐसे हैं जिनका स्तर 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक है. यह स्थिति सुखद नहीं कही जा सकती है.

WHO द्वारा जारी सूची में भारत के प्रदूषित शहरों की स्थिति
S.No.
World Rank
City/Town
ug/m3

S.No.
World Rank
City/Town
ug/m3
1
1
Kanpur
173

18
95
Chandrapur
64
2
2
Faridabad
172

19
96
Mumbai
64
3
3
Varanasi
151

20
154
Panchkula
55
4
4
Gaya
149

21
175
Chennai
52
5
5
Patna
144

22
192
Pune
49
6
6
Delhi
143

23
224
Bangalore
47
7
7
Lucknow
138

24
241
Hyderabad
46
8
9
Agra
131

25
283
Navi Mumbai
41
9
10
Muzaffarpur
120

26
292
Udaipur
41
10
11
Srinagar
113

27
296
Gauhati
40
11
12
Gurgaon
113

28
308
Solapur
39
12
15
Jaipur
105

29
309
Jabalpur
38
13
17
Patiala
101

30
348
Trivendrum
35
14
18
Jodhpur
98

31
352
Vizag
34
15
33
Nagpur
84

32
375
Tezpur
33
16
56
Kolkata
74

33
496
Aizwal
27
17
88
Ahmedabad
65







WHO द्वारा जारी सूची में कुछ प्रमुख देशों के प्रदूषित शहरों की संख्या
देश
शहर
अमेरिका
559
चीन
314
इटली
188
जर्मनी
164
कनाडा
158
स्पेन
137
फ़्रांस
122
यूके
64
ऑस्ट्रेलिया
30
जापान
15

देश की ये स्थिति भले ही कुछ शहरों की दिखाई दे रही हो किन्तु सत्य तो ये है कि बहुसंख्यक शहरों में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है. पीएम 2.5 से बचने के लिए गैस मास्क पहनने की जरूरत नहीं. सूती कपड़े से बने मास्क को पहन कर भी ऐसे पार्टिकल को शरीर में जाने से रोका जा सकता है.

अपने आसपास की हवा में अधिक नमी हो तो वहां जाने से बचना चाहिए. कोशिश की जानी चाहिए कि अपने आसपास हवा में नमी अधिक न होने पाए. पीएम 2.5 से बचने से ज्यादा उपयुक्त है कि इसकी उत्पत्ति होने से रोकने का उपाय करना चाहिए. जिन क्रियाओं से से यह उत्पन्न होता है उन्हें कम से कम करना चाहिए या फिर नहीं करना चाहिए. कार के बेकार समान को जलाने से बचना चाहिए, कूड़े को कम से कम, अत्यावश्यक होने पर ही जलाया जाना चाहिए.

देश में एक तरफ स्वच्छ भारत अभियान चलाया जा रहा है, दूसरी तरफ देश का शहर ही वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक प्रदूषित शहर के रूप में सामने आया है. यह स्थिति सरकार से ज्यादा नागरिकों के लिए चिंताजनक है, शर्मनाक है. राजनीति के चक्कर में घिरकर बहुत से लोगों द्वारा स्वच्छ भारत अभियान का विरोध भी किया जा रहा है. स्वार्थ में घिरकर अपने आसपास के वातावरण की चिंता किये बिना अपनी जीवनशैली को संचालित किये जाते हैं. अपने लाभ के लिए पर्यावरण का विनाश करने में लगे हुए हैं. प्राकृतिक संसाधनों को मिटाने में लगे हैं. यदि हम सभी ने सजग होकर अभी से सकारात्मक कदमों को उठाना शुरू नहीं किया तो भविष्य में प्रदूषण हमारे घर-घर में पैर पसार चुका होगा. हमारी भावी पीढ़ी प्रदूषित हवा-पानी-मिट्टी में तमाम बीमारियों के साए में पलने होने को विवश होगी.

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सारणी में दिए गए आँकड़े WHO की वेबसाइट http://www.who.int/ से लिए गए हैं.