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06 अप्रैल 2026

बदलते मौसम के खतरे

प्रकृति मिजाज कब बदल जाये, कहा नहीं जा सकता है. उसके इस बदलते रुख को इस समय बहुत ही नजदीक से महसूस किया जा रहा है. दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत अचानक से बदले मौसम की चपेट में है और बारिश, ओलावृष्टि, तूफानों का सामना कर रहा है. यह आश्चर्य का विषय है कि जिस समय में इस क्षेत्र में गरम हवाओं का परिचालन होता था, तीव्र गर्मी का एहसास किया जाता था उस समय यहाँ बारिश, ओलावृष्टि हो रही है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ में व्यापक बदलाव आने के कारण ऐसा हुआ है. इसके लिए उन्होंने पॉलर जेट स्ट्रीम में गड़बड़ी और पोलर वॉर्टेक्स के बदलते रूप को जिम्मेदार बताया है. पोलर वॉर्टेक्स आर्कटिक के चारों ओर घूमता ठंडा वायुमंडल है. इसके चलते ही ओलावृष्टि में तीव्रता देखने को मिल रही है. मौसम विज्ञानियों के अनुसार गत माह मार्च में पाँच-छह पश्चिमी विक्षोभ आने चाहिए थे लेकिन इनकी संख्या आठ हो गई. वर्तमान माह अप्रैल में अनुमान है कि इनकी संख्या कम से कम तीन हो सकती है.

 


इस बदलते मौसम का कारण कुछ भी क्यों न रहा हो मगर यह जलवायु संकट का एक अत्यंत चिंताजनक और प्रत्यक्ष उदाहरण है. पारम्परिक ऋतु चक्र में परिवर्तन होने से जीवनदायिनी बारिश विनाशकारी भी बन जाती है. इस बेमौसम बारिश का प्रभाव नकारात्मक रूप से सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक ढाँचे पर हुआ है. इस असमय वर्षा ने सबसे घातक प्रहार हमारे कृषि ढाँचे पर किया है. तकनीकी विकास के बाद भी भारतीय कृषि आज भी पूरी तरह से प्रकृति के तालमेल पर निर्भर करती है. ऐसे में प्रकृति का जरा सा भी नकारात्मक बदलाव किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर देती है. असमय होने वाली इस बारिश, ओलावृष्टि, तूफ़ान ने रबी की फसल को अपनी चपेट में ले लिया है. गेहूँ, सरसों, चने जैसी फसलें मौसम की मार के कारण मिट्टी में मिल चुकी हैं.

 

ऐसी स्थिति का प्रभाव अकेले किसानों पर नहीं पड़ता है बल्कि समग्र रूप में पूरी आर्थिकी इससे प्रभावित होती है, आम जनजीवन को भी इसका प्रभाव सहना पड़ता है. असमय मौसम के बदले इस मिजाज के कारण फसल तो चौपट होती ही है और यदि किसी तरह के प्रयासों से कुछ बचाव कर भी लिया जाये तो न केवल अनाज की मात्रा कम होती है बल्कि दानों की गुणवत्ता में भी कमी आती है. इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि किसान को  अपनी फसल का उचित दाम बाजार में नहीं मिल पाता है. ऐसी स्थिति में आपूर्ति की कमी हो जाती है, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था, एक गृहिणी की रसोई भी प्रभावित होती है. बाजार में आपूर्ति की कमी के चलते खाद्य मुद्रास्फीति अर्थात महँगाई का भी तेजी से बढ़ना शुरू हो जाता है. वर्तमान दौर में जबकि न केवल वैश्विक समुदाय बल्कि भारतीय समाज भी युद्ध की विभीषिका के कारण से आर्थिकी में हो रहे परिवर्तनों को महसूस कर रहा है, तब बेमौसम की मार से इस आर्थिक तंत्र के बिगड़ने से आम जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है.

 


इस असमय मौसम परिवर्तन ने केवल कृषि को बल्कि स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है. प्रकृति में तापमान के अचानक गिरने से, नमी के बढ़ने से सूक्ष्मजीवों
, वायरस, मच्छरों आदि के पनपने का खतरा बढ़ गया है. ऐसा होने के परिणामस्वरूप सर्दी-खाँसी, बुखार, श्वसन सम्बन्धी समस्याओं के साथ-साथ डेंगू, मलेरिया आदि बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है. मौसमी बदलाव के लिए शारीरिक रूप से तैयार न होने के कारण लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है. इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है. इनके अलावा इस बदलते मौसम से हमारा पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता भी प्रभावित होती है. प्रत्येक जीव और वनस्पति का अपना एक जैविक कैलेंडर होता है, जिसमें इस असमय बदलाव के कारण भी बदलाव देखने को मिलता है. असमय बारिश से उनका प्रजनन चक्र प्रभावित होता है, बहुत से पक्षियों के घोंसले नष्ट हो जाते हैं, अनेक दुर्लभ प्रजातियों का  अस्तित्व इस असमय बदलाव के कारण खतरे में पड़ जाता है.

 

मौसम विशेषज्ञ इस बदलाव का कारण भले ही कुछ भी बताएँ मगर यदि ऐसी स्थितियों के मूल में जाया जाये तो ग्लोबल वार्मिंग, मानव-जनित प्रदूषण ही इसके सबसे प्रमुख कारण नजर आते हैं. विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने जंगलों, नदियों, पहाड़ों, वायुमंडल को नष्ट कर दिया है. इससे पारिस्थितिक तंत्र की नकारात्मकता ने प्रकृति में उथल-पुथल मचा रखी है. कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा ने धरती का तापमान खराब कर दिया है. समुद्रों, नदियों के पहले से कहीं अधिक गर्म होने के कारण बादलों का निर्माण, उनकी दिशा अनियंत्रित हो गई है. पश्चिमी विक्षोभ और समुद्री चक्रवातों के बदलते पैटर्न ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है.

 

इस संकट का समाधान मुआवजा, तात्कालिक राहत में नहीं है. इसके लिए दीर्घकालिक नीतियों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना होगा. प्रकृति से खिलवाड़ करने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा. सिंचाई के लिए जल संचयन प्रणालियों को मजबूत करना होगा ताकि बारिश के पानी का सदुपयोग हो सके. तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदलते जा रहे शहरों के नियोजन में भी आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है ताकि वे जलवायु अनुकूलन क्षमता को धारण कर सकें. यह समझना होगा कि बेमौसम बारिश कोई मौसमी परिघटना नहीं है बल्कि यह प्रकृति की चेतावनी है, जो हमें अपनी जीवनशैली बदलने को सचेत कर रही है. यदि हम अब भी नहीं जागे, पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया तो ऐसी मौसमी अनिश्चितताएँ हमारी खाद्य सुरक्षा, सामाजिक ढाँचे को हिलाकर रख देंगी.


28 नवंबर 2025

ई-कचरे का बढ़ता खतरा

जल, वायु, ध्वनि, मृदा प्रदूषणों के बीच अपना विकराल रूप धारण कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे की तरफ अभी समाज बहुत गम्भीर नहीं दिखता है. आम जनमानस समझने की कोशिश नहीं कर रहा कि इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट भी पर्यावरण के लिए, मानव के लिए खतरा बन गया है. इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट को सामान्य बोलचाल में ई-कचरा के रूप में जाना जाता है. प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण टूटने, पुराने होने के कारण फेंक दिए जाते हैं, वह ई-कचरा ही है. उचित तरीके से इसका निपटान, पुनर्चक्रण नहीं होने से ये स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा बन जाते हैं. ई-कचरे में कम्प्यूटर, मोबाइल, घरेलू उपकरण, व्यावसायिक उपकरण, माइक्रोवेव, रिमोट कंट्रोल, बिजली के तार, स्मार्ट लाइट, स्मार्टवॉच आदि आते हैं.

 

सामाजिक रूप से यह बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि समाज का जिस तेजी से डिजिटाइजेशन हो रहा है, उसी तेजी से ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. आधुनिक तकनीक और मानव जीवन शैली में आने वाले बदलाव के कारण ऐसे उपकरणों का उपयोग दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है जो विषैले, हानिकारक पदार्थों के जनक बनते हैं. ट्यूबलाइट, सीएफएल जैसी रोज़मर्रा वाली वस्तुओं में पारे जैसे विषैले पदार्थ पाए जाते हैं जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं. ऐसा अनुमान है कि पूरी दुनिया में लगभग 488 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर के चौथे संस्करण में बताया गया कि दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन दर्ज ई-कचरे के पुनर्चक्रण की तुलना में पाँच गुना तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट में बताया गया कि 2022 में रिकॉर्ड 62 मिलियन टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ जो 2010 की तुलना में 82 प्रतिशत अधिक है. इसके 2030 तक 32 प्रतिशत तक बढ़कर 82 मिलियन टन होने की सम्भावना है. विश्व स्तर पर रिकॉर्ड 62 बिलियन किलो ई-कचरा उत्पन्न हुआ जो प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष औसतन 7.8 किलो के बराबर है. 2022 में यूरोप ने प्रति व्यक्ति 17.6 किलो के हिसाब से सर्वाधिक ई-कचरा उत्पन्न किया.

 



ई-कचरे में मरकरी, कैडमियम और क्रोमियम जैसे कई विषैले तत्त्व शामिल होते हैं. इनके निस्तारण के असुरक्षित तौर-तरीकों से मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. इससे अनेक तरह की बीमारियाँ होने की आशंका रहती है. भूमि में दबाने से ई-कचरा मिट्टी और भूजल को दूषित करता है. जब मिट्टी भारी धातुओं से दूषित हो जाती है तो उस क्षेत्र की फसलें विषाक्त हो जाती हैं, जो अनेक बीमारियों का कारण बन सकती हैं. भविष्य में कृषियोग्य भूमि को भी अनुपजाऊ हो सकती है. मिट्टी के दूषित होने के बाद ई-कचरे में शामिल पारा, लिथियम, लेड, बेरियम आदि भूजल तक पहुँचती हैं. धीरे-धीरे तालाबों, नालों, नदियों, झीलों आदि का पानी अम्लीय और विषाक्त हो जाता है. यह स्थिति मानवों, जानवरों, पौधों आदि के लिए घातक हो सकती है. ई-कचरा में शामिल विषाक्त पदार्थों का नकारात्मक प्रभाव मस्तिष्क, हृदय, यकृत, गुर्दे आदि पर बहुत तेजी से दिखाई देता है. इसके साथ-साथ मनुष्य के तंत्रिका तंत्र और प्रजनन प्रणाली को भी यह प्रभावित कर सकता है.

 

ई-कचरा के निपटान की अपनी स्थितियाँ, अपनी चुनौतियाँ हैं. इस कारण सबसे ज्यादा जोर इसके पुनर्नवीनीकरण पर दिया जा रहा है. पुनर्नवीनीकरण के द्वारा प्लास्टिक, धातु, काँच आदि को अलग-अलग करके उसको पुनरुपयोग योग्य बनाया जाता है. वैश्विक स्तर पर अब 81 देश ऐसे हैं जिन्होंने ई-कचरे से संबंधित कोई नीति, कानून या विनियमन अपनाया है. इन 81 देशों में से 67 ने विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) सिद्धांत लागू किया है, 46 ने अपने नियमों में राष्ट्रीय ई-कचरा संग्रहण लक्ष्य निर्धारित किए हैं और 36 ने राष्ट्रीय स्तर पर ई-कचरा पुनर्चक्रण लक्ष्यों को अपनाया है. भारत भी ई-कचरे से संबंधित कोई नीति, कानून या विनियमन को अपनाने वाले देशों में शामिल है इसके बाद भी यहाँ ई-अपशिष्ट प्रबंधन से सम्बन्धित अनेक चुनौतियाँ हैं. सबसे बड़ी चुनौती जन भागीदारी का बहुत कम होना है. इसके पीछे उपभोक्ताओं की एक तरह की अनिच्छा है जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रीसाइक्लिंग के लिये बनी रहती है. इसके अलावा हाल के वर्षों में एक और चुनौती इस रूप में सामने आई है कि देश में बहुत से घरों में ई-कचरे का निस्तारण बड़े पैमाने पर होने लगा है. यह स्थिति तब है जबकि भारत में ई-कचरे के प्रबंधन के लिये वर्ष 2011 से कानून लागू है जो यह अनिवार्य करता है कि अधिकृत विघटनकर्त्ता और पुनर्चक्रणकर्त्ता द्वारा ही ई-कचरा एकत्र किया जाए. इसके लिये वर्ष 2017 में ई-कचरा (प्रबंधन) नियम 2016 अधिनियमित किया गया है.

 

तकनीक, आधुनिक जीवनशैली, आवश्यकता आदि की आड़ लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग भले ही अंधाधुंध तरीके से किया जाने लगा हो मगर यह स्वीकारना होगा ई-कचरा भविष्य के लिए खतरा बनता जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, गैजेट्स का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता है और बहुतायत समाज का इन्हीं पर निर्भर होते जाना खतरे का सूचक है. आज की युवा पीढ़ी के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुविधा के लिए कम, पैशन के लिए ज्यादा उपयोग किया जा रहा है. ऐसे में उनके द्वारा उपकरणों को जल्दी-जल्दी बदल दिया जाता है. नवीन तकनीक के कारण भी बहुतेरे उपकरण आउटडेटेड हो जाते हैं. यह भी ई-कचरा की मात्रा को बढ़ाने का काम कर रहा है.

 

पर्यावरण की, मानव, जीवों की सुरक्षा की खातिर लोगों को केवल हवा, पानी, भूमि, पेड़-पौधों को बचाने के बारे में ही सजग नहीं होना है बल्कि ई-कचरा के प्रति भी सावधान होने की आवश्यकता है. बेहतर हो कि जीवनशैली को संयमित, नियंत्रित किया जाये. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अत्यावश्यक होने पर ही उपयोग किया जाये. उनके निस्तारण के लिए औपचारिक क्षेत्र की सहायता ली जाये. सम्भव है कि मानव समाज कुछ हद तक आने वाले खतरे को टाल सके.  


01 सितंबर 2024

बच्चों के स्वास्थ्य पर विद्यालय समय का प्रभाव

शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए आये दिन एक विचार तैरता है कि सभी कक्षाओं में, सभी विद्यालयों में NCERT की किताबें ही होनी चाहिए; महँगी किताबों को रोका जाना चाहिए; बस्ते का बोझ कम से कम रखा जाये. इसके साथ-साथ सबको एक बात के लिए और आवाज़ उठानी चाहिए. इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए विद्यालयों का समय कम किया जाये. आज लगभग सभी विद्यालयों में समय प्रातः सात-आठ बजे से दोपहर बाद दो-तीन बजे तक का है. ऐसे समय के चलते बच्चे सुबह छह-साढ़े छह बजे घर से निकलते हैं और तीन-चार बजे तक लौटते हैं.

 

कभी विचार करिए कि इन बच्चों को सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन उचित तरीक़े से नहीं मिल पा रहा है. विद्यालयों में भोजनावकाश में बच्चे पेट ही भरते हैं, न तो उनको घर की तरह आराम से खाने का समय मिलता है और न ही वैसा भोजन. विद्यालय से तीन- चार बजे लौटने पर या तो भोजन किया नहीं जाता है या फिर बस काम चला लिया जाता है. इस तरह की भोजन स्थिति से बच्चों को दोपहर में खाद्य-पौष्टिकता नहीं मिल पा रही है. दिन में देर से भोजन करने पर रात को भी भोजन की स्थिति में अनियमितता आती है. इस स्थितियों को देखकर प्रयास किए जाएँ कि विद्यालयों का समय कम किया जाये, जिससे बच्चे दोपहर का भोजन आराम से कर सकें, पौष्टिकता के साथ कर सकें. उनकी सेहत के लिए ये आवश्यक है.


23 अप्रैल 2023

टैटू की हानिकारक दीवानगी

आजकल युवाओं की पहली पसंद टैटू है. किसी का नाम, कोई डिज़ाइन बनवाना युवाओं की पहली पसंद बनता जा रहा है. लड़कियों के बीच अत्यधिक प्रचलित रहा यह शौक अब लड़कों में भी बहुतायत में देखा जा रहा है. इसे अपनी गर्दन, कलाई, पेट, पीठ आदि सहित शरीर के विभिन्न अंगों पर टैटू बनवाना आम होता जा रहा है. टैटू बनाने में त्वचा के नीचे रंग डालकर उस डिजाइन को शरीर पर उभारा जाता है, इससे शरीर पर न मिटने वाली आकृति बन जाती है. शरीर पर बनाई जाने वाली खूबसूरत आकृतियाँ कई तरह से लोगों की सुन्दरता को बढ़ाती हैं. 


इस कला का भी अपना इतिहास है. यद्यपि किसी तरह के प्रमाणिक तथ्य ऐसे नहीं मिलते हैं जिनसे इसकी उचित समयावधि ज्ञात हो सके तथापि ऐसा माना जाता है कि टैटू कला का सबसे पहला सबूत 5000 ईसा पूर्व से है. ऐसी मान्यता है कि टैटू कला वास्तव में एक प्राचीन कला है जो 3370 ईसा पूर्व से 3100 ईसा पूर्व के बीच विकसित हुई होगी. भारत में टैटू का इतिहास बहुत पुराना है. देश में यह कला गोदना या गुदना के रूप में प्रचलित रही. आदिवासी समुदायों ने अपने शरीर पर गोदना रूप में आभूषण इस सोच के साथ बनवाए कि इस तरह के आभूषण को उनसे दूर नहीं किया जा सकता. टैटू का सर्वाधिक प्रचलन जनजातियों के माध्यम से हुआ, इसमें अपतानी टैटू सबसे ज्यादा प्रचलित था. इसे बनवाने के लिए काँटों का उपयोग किया जाता था और गहरे नीले रंग में भरने के लिए जानवरों की चर्बी में मिश्रित कालिख का उपयोग किया जाता था. कालांतर में भारत सरकार ने सत्तर के दशक में इस प्रक्रिया को प्रतिबंधित कर दिया.




अस्सी के दशक से पहले टैटू तमिलनाडु में बहुत आम थे और ये विभिन्न जनजातियों से सम्बंधित लोगों की निशानी होते थे. छत्तीसगढ़ में भगवान राम के प्रति भक्ति भावना दर्शाने के उद्देश्य से लगभग एक सदी पहले चेहरे और शरीर को राम शब्द के साथ गोद लिया था जो अत्याचार के खिलाफ एक ताबीज के रूप में भक्ति का प्रदर्शन भी बना. दक्षिण भारत में गोदना को पचकुठारथु कहा जाता है. घुमंतू जाति कोरथी व कोल्लम जाति खुद को दुष्ट प्राणियों से सुरक्षित रखने के लिए स्याही से शरीर पर भूलभुलैया डिजाइन बनवाया करते थे, वहीं टोडा जाति में व्यक्ति के शरीर को लुभावना बनाने के लिए ज्यामिट्रिक आकृतियों को गोदा जाता था. बिहार के धनुको जाति का मानना है कि गोदना से महिलाएँ सुरक्षित रहती हैं. वहीं दूसरी ओर झारखंड में मुंडा जाति के लिए गोदना साहस और मुगलों पर विजय का प्रतीक है. गोंड जनजाति शरीर के खुले हिस्सों को गोदना से ढंक कर स्वयं को सभ्य बनाती है. झारखंड की संथाल जाति में पुरुष अपनी बाँह और कलाई पर सिक्कों नामक आकृति को अंकित करते थे. संथाल महिलाओं के शरीर पर पुष्प पैटर्न बेहद खूबसूरती से अंकित किया जाता था. 


वर्तमान दौर में बदलाव के शौक़ीन युवाओं ने दशकों पुरानी परम्परा को नए स्वरूप में अपनाकर एक नये ट्रेंड का आविष्कार कर लिया. दशकों पहले जिसे आम बोलचाल में गोदना कहा जाता था, वो आज टैटू के रूप में फैशन और स्टेटस सिम्बल बना हुआ है. आज की युवा पीढ़ी अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों पर अनोखे प्रकार के टैटू बनवाने में दिलचस्पी लेने लगी है. अनेक तरह की डिजाइन, नाम, कलाकृति, जीव-जन्तु, फूलों आदि के टैटू बनवाना आज फैशन बन गया है. टैटू बनवाने की दीवानगी में इसके शौक़ीन इससे होने वाले नुकसान की ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं. टैटू बनवाने के शौक में लोगों की त्वचा माँसपेशियों को नुकसान पहुँच सकता है. टैटू बनवाने की प्रक्रिया में काम आने वाली सुई शरीर में त्वचा में चुभोई जाती है. बहुत सी डिजाइन ऐसी होती हैं जिसे बनाने में सुई को शरीर में गहराई तक चुभोना पड़ता है. इससे माँसपेशियों को नुकसान पहुँचने की आशंका रहती है. इस बारे में विशेषज्ञों की राय है कि शरीर के उस स्थान पर टैटू नहीं बनवाने चाहिए जहाँ पर तिल हों. 




टैटू को रंगीन और आकर्षक बनाने के लिए अनेक प्रकार की स्याही का प्रयोग किया जाता है. कुछ स्याही और उसके रंग त्वचा के लिए हानिकारक होते हैं क्योंकि उनको बनाने में विषैले तत्त्वों का उपयोग किया गया होता है. नीले रंग की स्याही में कोबाल्ट और ऐल्युमिनियम मिला होता है जबकि लाल रंग की स्याही में मरक्यूरियल सल्फाइड की उपस्थिति रहती है. इसी तरह से बहुत से दूसरे रंगों की स्याही में शीशा, कैडियम, क्रोमियम, निकिल, टाइटेनियम, कार्सिनोजेनिक आदि सहित अनेक रासायनिक तत्त्वों और दूसरी धातुओं के होने के प्रमाण मिले हैं. ये सारे रासायनिक तत्त्व और धातु त्वचा में एलर्जी का कारण बनते हैं. इससे चर्म रोग होने की आशंका होती है. चिकित्सकों का कहना है कि टैटू की स्याही के कारण होने वाली एलर्जी से सोराइसिस जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है. इसी तरह टैटू बनवाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल की जाने वाली सुई से असावधानी होने पर चर्म रोग के साथ-साथ त्वचा कैंसर, हेपेटाइटिस, एचआईवी आदि जैसी संक्रमित बीमारियाँ होने का खतरा रहता है.


त्वचा रोग चिकित्सकों का कहना है कि टैटू बनवाने के बाद शरीर पर होने वाली समस्याओं में टैटू रिऐक्शन सबसे आम है. जब तक शरीर में टैटू की स्याही रहेगी तब तक शरीर में एलर्जी जैसी समस्या होती रहेगी. इससे त्वचा के कैंसर का खतरा बहुत कम है मगर संक्रामक बीमरियाँ होने की संभावना बहुत अधिक है. ऐसे में टैटू बनवाने में सावधानी रखनी चाहिए. इसे बनवाने से पहले हेपेटाइटिस बी का टीका लगवा लें तो इस संक्रामक बीमारी से बहुत हद तक बचा जा सकता है. इसके अलावा टैटू बनवाने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि बनाने वाला इसका अच्छा जानकार हो. उसके पास आधुनिक उपकरण और साफ-सफाई का पूरा ध्यान दिया जाता हो. टैटू बनाने वाली जगह पर नियमित रूप से ऐंटीबायॉटिक क्रीम लगाते रहें. वर्तमान दौर में टैटू के प्रति दीवानगी चरम पर है. यदि कुछ सावधानियों को अपना लिया जाये तो संभव है कि ये शौक कम समस्याओं वाला रहे.

 






 

07 अक्टूबर 2022

क्या मोबाइल वाकई समस्या बन गया है?

क्या मोबाइल वाकई हम सबके जीवन में एक समस्या बनता जा रहा है? यह एक ऐसा सवाल है जो हम लगभग रोज ही अपने से करते हैं और इसका जवाब स्वयं देने के बाद फिर इसी समस्या से घिर जाते हैं. यह सबके लिए किस हद तक सच है, ये उसके उपयोग की स्थिति पर निर्भर करता है किन्तु सत्य यही है कि आज जिस तरह से लोगों को मोबाइल की लत लग गई है, वह एक समस्या ही बन गया है. संचार के एक साधन के रूप में, आपसी संपर्क, बातचीत का माध्यम बना मोबाइल अब संचार के साथ-साथ मनोरंजन का साधन भी बन गया है. इंटरनेट और स्मार्टफोन के आने के बाद से मोबाइल ने जैसे अपने स्वरूप को विकराल कर लिया है. अब इसका उपयोग जानकारियों के आदान-प्रदान से अधिक मनोरंजन के लिए किया जाता है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों, रील्स, शॉर्ट वीडियो आदि की अधिकता जिस तरह से बाढ़ आई हुई है, उसके चलते मोबाइल अब एक समस्या ही बनता जा रहा है. 


यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मोबाइल एक नशे की तरह लोगों के जीवन में प्रवेश कर चुका है. अब मोबाइल का उपयोग उसकी सुविधा के चलते कम व्यक्ति की अपनी लत के कारण ज्यादा हो रहा है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि व्यक्ति चाहे अकेले बैठा हो या किसी भीड़ का हिस्सा हो, उसके लिए जैसे वरीयता वाला काम मोबाइल देखना है. मिनट-दो-मिनट में बार-बार मोबाइल को देखना, उसकी स्क्रीन को निहारना, बार-बार सोशल मीडिया के मंचों को खोलकर उनकी पोस्ट, फोटो, वीडियो आदि को देखना एक तरह का रोग बनता जा रहा है. अपने अनेक कामों के बीच में भी मोबाइल को खोलकर देखना, दिन का उजियारा हो या फिर रात का अंधकार, लोगों के लिए जैसे मोबाइल ही एकमात्र सहारा बना होता है. यह भी एक तरह की बीमारी कही जा सकती है कि जब लगने लगे कि इंटरनेट के माध्यम से उसके मोबाइल में कुछ नया सन्देश, फोटो, वीडियो आदि आने वाला है. सोशल मीडिया पर उसके द्वारा पोस्ट की गई सामग्री पर बार-बार लाइक, कमेंट आदि को देखने की आदत भी किसी नशे से कम नहीं.




विडम्बना यह है कि इस रोग का शिकार, इस नशे का आदी हर उम्र का व्यक्ति बना हुआ है. बच्चों में यह समस्या और तीव्रता से देखने को मिल रही है. एकल परिवार होने के कारण, माता-पिता के नौकरीपेशा होने की स्थिति में बच्चों का सबसे अच्छा साथी मोबाइल बना हुआ है. उनको कुछ खिलाना-पिलाना हो, उनकी किसी जिद को पूरा करना हो, खेलने में व्यस्त रखना हो तो बस मोबाइल पकड़ा कर माता-पिता खुद को जिम्मेवारी से मुक्त कर लेते हैं. अब बच्चों को घरों में परियों की कहानियाँ नहीं सुनाई जातीं बल्कि उनको मोबाइल पकड़ा कर रंगीन स्क्रीन में व्यस्त कर दिया जाता है. यह बच्चों के कोमल मन-मष्तिष्क पर नकारात्मक रूप से अपना प्रभाव छोड़ रहा है. देखने में आ रहा है कि अब बच्चे चिड़चिड़े होते जा रहे हैं. उनकी माँग के अनुसार यदि उनको मोबाइल न दिया जाये तो वे चिल्लाने का, सामान फेंकने का, खुद को हानि पहुँचाने का काम करने लगते हैं.   


कुछ ऐसा ही हाल युवाओं का है. वे किसी भी कार्य में व्यस्त हों किन्तु उनके हाथों से मोबाइल नहीं छूटता है. कभी किसी ऑनलाइन गेम में व्यस्त होने के कारण, कभी रील्स बनाने या फिर उनको देखने के क्रम में उनकी उंगलियाँ लगातार मोबाइल स्क्रीन पर टहलती ही रहती हैं. इसके चलते ऐसे बहुत से केस देखने को मिल रहे हैं जहाँ लोगों में आँखों की बीमारी, गर्दन का दर्द, रीढ़ की हड्डी में दिक्कत, उँगलियों की अपनी बीमारी की समस्या उत्पन्न हो रही है. इन बीमारियों के साथ-साथ लोगों की याददाश्त भी कमजोर हो रही है. छोटे से छोटे काम के लिए बच्चों, युवाओं की मोबाइल पर निर्भरता ने उनके मष्तिष्क की कार्यक्षमता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. अब वे किसी जानकारी के लिए कहीं खोजबीन करने का, अपना अनुभव जुटाने का, खुद का विश्लेषण करने का जोखिम नहीं उठाते हैं. उनके लिए एकमात्र समाधान अब उनके हाथ में दिखता मोबाइल है.


इस सुविधाजनक समस्या से बाहर निकलने के प्रयास उन्हीं लोगों को करने होंगे, जो इसके आदी बने हुए हैं. उनको समझना होगा कि मोबाइल की ऐसी लत किसी भी नशे की तरह बुरी है. देखने में भले यह किसी तरह की बाहरी बीमारी को नहीं दिखा रहा है किन्तु शरीर को, मन को, दिमाग को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है. अनिद्रा, तनाव, अवसाद, निराशा, गुस्सा, चिड़चिड़ापन आदि की समस्याएँ इसी मोबाइल की अधिकता के कारण उत्पन्न होने लगी हैं. आइए, इस समस्या को दूर हुए मोबाइल को अपनी सुविधा का ही साधन बना दिया जाये.

 




 

05 फ़रवरी 2022

एक बीमारी ने बचाया तो दूसरी ने घेरा बच्चों को

असमंजस का दौर अभी भी समाप्त नहीं हुआ है. भयग्रस्त वातावरण अभी भी बना हुआ है. विविध प्रकार के नुकसान रोज ही सामने आ रहे हैं. विगत दो वर्षों से कोरोना वायरस से लड़ते हुए देश ने बहुत सारे मोर्चों पर सफलता भी पाई है तो बहुत सारे क्षेत्रों में नुकसान भी उठाना पड़ा है. विविध क्षेत्रों के नुकसान का आकलन लगाकर उसकी भरपाई के तरीके भी खोजे जाने लगे हैं. आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में अपनी-अपनी तरह से संसाधनों को एकत्र करके, उपलब्ध संसाधनों को पुनर्जीवन प्रदान करके नुकसान को बहुत हद तक पाटने की कोशिश जारी है. इसी में एक क्षेत्र ऐसा है जिसके नुकसान की तरफ बहुत अधिक न तो ध्यान जा रहा है और न ही उसकी भरपाई के लिए विचार किया जा रहा है.


ऐसा एक क्षेत्र शिक्षा जगत है, जहाँ विगत दो वर्षों से व्यापक असमंजस बना हुआ है. जैसे ही लगता है कि स्थिति कुछ सामान्य होने जा रही है वैसे ही कोरोना का कोई नया वेरिएंट आकर सबको भयग्रस्त कर देता है. ऐसे में सबसे ज्यादा डर बच्चों की सुरक्षा को लेकर ही उत्पन्न होता है. इस भय के चलते ही जहाँ एक तरफ अभिभावक बच्चों को शैक्षिक संस्थानों में भेजने से बचने लगते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार भी एक तरह का अभिभावकत्व भाव अपनाते हुए शैक्षिक संस्थानों को सबसे पहले बंद करवा देती है.


यह सच है कि बच्चों के स्वास्थ्य, उनकी शारीरिकता को लेकर किसी तरह की लापरवाही नहीं की जा सकती है. सरकार का आरम्भ से ही प्रयास रहा है कि बच्चों को इस बीमारी के प्रकोप से बचाए रखा जाये. वैक्सीन की अनुपलब्धता होने की स्थिति में तमाम सारे सुरक्षात्मक उपाय समय-समय पर सरकार की तरफ से, समाज की तरफ से बताये जाते रहे, अपनाये जाते रहे. शैक्षिक संस्थानों का बंद किया जाना भले ही बच्चों को इस बीमारी से बचाए रखने का एक कारगर उपाय बनकर सामने आया हो मगर इसके भी अपनी तरह के नुकसान बच्चों को उठाने पड़े हैं. ऐसे नुकसान ये बच्चे आज भी उठा रहे हैं.


संस्थानों को बंद करवा कर, बच्चों को विद्यालयों में न भेजकर उनकी स्वास्थ्य समस्या के प्रति एक तरह की जागरूकता दिखाई गई, उनको स्वास्थ्य मामलों में भले ही सुरक्षित कर लिया हो मगर इसी के दूसरे पहलू में बच्चों को असुरक्षित भी कर दिया गया है. इस सन्दर्भ में यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो ऑनलाइन कक्षाओं ने बच्चों को कई तरह से नकारात्मक रूप में प्रभावित किया है. कई-कई घंटे मोबाइल, कम्प्यूटर की स्क्रीन में आँखें लगाये बैठे बच्चों को आँखों की समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है. किसी समय मोबाइल और कम्प्यूटर की रौशनी को बच्चों की आँखों, उनके रेटिना के लिए घातक बताया जाता था. अब कोरोना के चलते हुई बंदी ने इसी खतरे के साथ बच्चों को बड़ा होने को विवश किया.


यहाँ एक बिंदु आँखों की समस्या का होना ही नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ एक और शारीरिक समस्या उभरी गर्दन में दर्द की, रीढ़ की हड्डी में विकार की. सामान्य रूप में किसी भी विद्यालय द्वारा कम से कम पाँच घंटे तक ऑनलाइन कक्षाओं का सञ्चालन किया गया. इतनी लम्बी अवधि तक एक अवस्था में बैठ कर, गर्दन को झुकाकर मोबाइल, कम्प्यूटर स्क्रीन में काम करने से बहुतायत बच्चों में रीढ़ की हड्डी की, गर्दन की समस्या उभरी है. इन शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ बहुत से बच्चों में आपसी समन्वय, सहयोग, सामंजस्य आदि जैसी स्थितियों में भी ह्रास देखने को मिला है. इस अवधि में बहुत से बच्चे मानसिक रूप से कमजोर भी हुए हैं. ये और बात है कि उनके द्वारा अपनी पाठ्य-सामग्री को, अपने पाठ्यक्रम को बखूबी पूरा किया गया, अपने शैक्षणिक अंकों के मामले में भी उनमें बहुत ज्यादा नकारात्मकता देखने को नहीं मिली है मगर जिस उद्देश्य के साथ बच्चों को किसी संस्थान में जाना होता है, उस उद्देश्य की पूर्ति न होने के कारण बच्चों के मानसिक विकास में भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.


लॉकडाउन जैसी स्थिति के कारण से बच्चों का बाहर निकलना भी बंद रहा, पार्क, मैदान में खेलना-कूदना भी बंद रहा. अपने मित्रों, विद्यालय के सहयोगियों के साथ मिलना-जुलना न होने के कारण भी उनमें अकेलेपन जैसी मानसिकता ने जन्म लिया है. समूह के साथ मिलकर काम करने की भावना में भी कमी आई है. न केवल खेलने के सन्दर्भ में बल्कि सामूहिक रूप से अध्ययन करने, परीक्षाओं की तैयारी करने के सन्दर्भ में भी इसे देखा जा सकता है. इस तरह की कमी होने से बच्चों के मानसिक विकास का एक पक्ष कहीं न कहीं कमजोर हुआ ही है. बहुत से नौनिहाल तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी आरंभिक अवस्था में विद्यालय के दर्शन ही नहीं किये हैं. उम्र की दृष्टि से उनको आगे की कक्षाओं में भले ही प्रवेश दे दिया जाये, उनके ज्ञान को, शब्द-भंडार को भले ही घर-परिवार के द्वारा समृद्ध कर दिया गया हो मगर विद्यालय की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा से वे निश्चित ही हमेशा के लिए वंचित रह गए हैं. निश्चय ही इससे उनके कोमल मन पर जिस भावना का प्रस्फुटन होना था, वह नहीं हो सका है.


शैक्षिक संस्थानों को आये दिन बंद करके सरकार ने, समाज ने, परिवार ने बच्चों को बीमारी से तो बचा लिया. उनको स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या में जाने से रोक लिया मगर उसके बदले दूसरी तरह की शारीरिक समस्या में अजनाने ही धकेल दिया है. उनके शैक्षणिक विकास के लिए तकनीक का सहारा दिलवाया तो उसके बदले मानसिक समस्या का उपहार भी दे दिया. कोरोना संक्रमण से बच्चों को बचाया गया मगर वे अकेलेपन, अवसाद, गुस्सा, तनाव आदि से संक्रमित होने लगे. बीमारी से बचाव के लिए उठाये गए कदमों ने बच्चों को, नौनिहालों को अजनाने दूसरी तरह की बीमारियों, समस्याओं से ग्रसित करवा दिया. असमंजस के वर्तमान दौर से उबरते हुए बच्चों को उनकी इस नवीन समस्या से, उनकी मानसिक परेशानी से मुक्त करवाना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए. यदि सरकार, समाज, शैक्षिक संस्थान, परिवार ऐसा करने में असफल रहते हैं तो देश की बहुत बड़ी भावी पीढ़ी एक अनचाही, अनजानी बीमारी के साथ आगे बढ़ेगी.




(उक्त आलेख दिनांक 05.02.2022 के बीपीएन टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)

30 नवंबर 2021

पान के बारे में उपयोगी जानकारी

पीठ दर्द, कमर दर्द, हड्डियों में दर्द इलाज में सबसे पहली चीज प्रिस्क्रिप्शन में होती है - कैल्शियम सप्लीमेंट। पहले जब मार्केट में सप्लिमेंट्स टेबलेट नहीं थे तब लोगों की हड्डियाँ, दांत कैसे दुरुस्त रहते थे?


ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि ताम्बूल (पान) इन तमाम समस्याओं में अत्यंत लाभकारी है। हमारे सारे परंपरागत विधि विधान में ताम्बूल का प्रयोग होता है। पान के पत्ते में बहुत ज्यादा मात्रा में कैल्शियम होता है। पान का पत्ता बहुत ही गुणकारी होता है।


इसमें एंटी ऑक्सीडेंट के गुण होते हैं। इसके अलावा पान के पत्ते में क्लोरोफिल बहुत ज्यादा होता है। इसके जूस से कई तरह की बीमारियां भी ठीक होती हैं। सर्दियों में इसका जूस पीने से मौसमी बीमारियों से भी बचाव होता है। इसे लेने से पाचन तंत्र भी ठीक रहता है। इसलिए भारतीय आहार में पान को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। परंपरागत ही नहीं बल्कि शहरों में भी रात को खाना खाने के बाद पान खाने का चलन आज भी जीवित है।


पान के पत्तों में अवसाद दूर करने के गुण भी होते हैं यानि कि ये एक अच्छा Anti depressants है। इसके पत्ते stress-reliever का काम करते हैं। इसमें thiamine, niacin और carotene भी होता है जो हमारी सेहत के लिए बहुत महत्वपूर्ण तत्व हैं। आजकल ग्रीन जूस में पान के पत्ते का खूब प्रयोग होता है।




01 अक्टूबर 2021

भयावह माहौल का इंतजार

सितम्बर माह का भी समापन होने को है। इस साल के नौ महीने बीत जायेंगे कुछ घंटों बाद। वर्ष 2020 खतरनाक आहट के साथ आया था और वर्ष 2021 ने खतरनाक रूप दिखाया भी। इस खतरनाक रूप को गुजरे अभी कुछ महीने ही बीते हैं मगर ऐसा लगता है कि जैसे लोग सबकुछ भूल चुके हैं। याद करिए पिछले वर्ष 2020 को अगस्त सितम्बर से सबकुछ सामान्य होने लगा था। इस सामान्य होती दिनचर्या को तगड़ा झटका इस साल लगा। अचानक से भयावहता दिखने लगी। एकदम से ऑक्सीजन की कमी होने लगी। भयावह तरीके से मौतों की संख्या बढ़ने लगी।


रुकिए, रुक कर सोचिए, विचार करिए कि क्या ये सब महज एक बीमारी के कारण हुआ? फिर सोचिए कि इस साल के आरम्भ में वैक्सीनेशन भी शुरू हो गया था। सबकुछ सामान्य था फिर एकदम से ये भयावह रूप? मानवजनित बीमारी के बाद क्या ये सम्भव नहीं कि मानवजनित माहौल बना दिया गया हो, लोगों के मरने के लिए? क्या ये सम्भव नहीं कि जानबूझकर ऑक्सीजन की कमी कर दी गई हो? चिकित्सकों की लापरवाही तो हमने व्यक्तिगत स्तर पर देखी, अनुभव की थी। बहरहाल, जो हुआ सो हुआ पर अब क्या करना है? क्या अब तीसरी लहर के रूप में एक और साजिश का, एक और मानवजनित माहौल का सामना करना है?


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29 सितंबर 2021

हृदय को स्वस्थ और मजबूत रखें

आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए लोगों ने अपने शरीर की परवाह किये बिना धनोपार्जन की परवाह करना शुरू कर दिया. वैश्वीकरण के दौर ने इस काम में उत्प्रेरक का काम किया है. अब लोगों को अपने स्वास्थ्य, घर-परिवार से ज्यादा चिंता अपने धन की रहती है, अपनी आर्थिक स्थिति की रहती है. इस कारण से लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है. अव्यवस्थ‍ित दिनचर्या, अनावश्यक तनाव, अशुद्ध खाना-पीना, प्रदूषण आदि के कारण इंसानों में अत्यधिक बीमारियाँ देखने को मिल रही हैं. इनमें भी सर्वाधिक मरीज हृदय रोग के मिल रहे हैं. इसमें भी सबसे बुरी बात ये है कि युवा वर्ग के लोग बहुतायत में ह्रदय रोग के बीमार हो रहे हैं.  


पूरे विश्व में हृदय के प्रति जागरूकता लाने और रोग की समस्याओं से बचने के लिए प्रतिवर्ष 29 सितम्बर को विश्व हृदय दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने की शुरूआत सन 2000 में की गई थी. आरम्भ में इसे प्रतिवर्ष सितम्बर माह के अंतिम रविवार को मनाया गया किन्तु सन 2014 में इसके लिए 29 सितम्बर की तिथि को निर्धारित कर दिया गया.




हृदय को स्वस्थ रखने के लिए निम्नलिखित उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं - 


प्रतिदिन व्यायाम के लिए समय निकालें. इसमें भी सुबह, शाम पैदल चलना अथवा सैर करना बेहतर है.

भोजन के द्वारा भी हृदय रोग की समस्या पर बहुत हद तक नियंत्रण लगाया जा सकता है. इसके लिए भोजन में नमक और वसा की मात्रा कम कर की जा सकती है. इसके साथ-साथ ताजे, मौसमी फल और सब्जियों को भोजन में नियमित रूप से लेना चाहिए.

धूम्रपान नहीं करना चाहिए. यह हृदय के साथ ही कई बीमारियों का कारक है.

इसके अलावा हृदय को तंदुरुस्त रखने के लिए नींद का भरपूर लिया जाना सर्वोत्तम उपाय है.

  

24 जून 2021

हाल्ट, हुकुम सर देयर, फंडर फ़ो

हाल्ट, हुकुम सर देयर. फंडर फ़ो. इस वाक्य से आपमें से संभव है कि बहुत से लोगों का पाला पड़ा हो और बहुत से लोगों का नहीं भी पड़ा होगा. बहुत से लोगों से ऐसे वाक्य का सामना प्रत्यक्ष रूप से किया होगा और बहुत से लोग ऐसे होंगे जिन्होंने ऐसे लोगों की जुबानी ही इस वाक्य से परिचय पाया होगा. हम भी उन्हीं लोगों में से हैं जिन्होंने इस वाक्य का परिचय अपने बाबा जी से प्राप्त किया है.


वैसे बहुत से लोग तो अभी तक कई बार पढ़ चुके होंगे इसे और इसके भीतर की टाइपिंग मिस्टेक खोजने में लगे होंगे. बहुत से लोगों ने तो टाइपिंग मिस्टेक निकाल कर इसे सही भी पढ़ लिया होगा. अब पता नहीं उन्होंने क्या गलती निकाली होगी और उसको सही करके क्या पढ़ा होगा? ये तो परदे के पीछे की बात है मगर जो लोग भी इस वाक्य से परिचित हैं वे अवश्य ही मन ही मन में या फिर खुलकर मुस्कुरा रहे होंगे.


असल में ऐसा वाक्य सुरक्षा प्रहरियों द्वारा किसी समय बोला जाता था. हमारे बाबा जी पुलिस में हुआ करते थे. उनकी पुलिस विभाग में सेवाएँ अंग्रेजी राज्य के समय से ही शुरू हो गईं थीं. उस समय के बारे में, सुरक्षात्मक कदमों के बारे में बताते समय ऐसे वाक्य से हम लोगों का परिचय करवाया था. यह वाक्य असल में ऐसा नहीं हुआ करता था बल्कि जो पहरेदार, सुरक्षाकर्मी अपनी ड्यूटी में तैनात हुआ करते थे उनके द्वारा मूल वाक्य को कुछ इस रूप में बोला जाता था.




इस वाक्य का मूल वाक्य भी आपके बीच रखेंगे पहले इसके बोले जाने का कारण तो पढ़ लीजिये. सुरक्षा बलों की तैनाती की जगह पर, कार्यालय, घरों आदि की सुरक्षा में तैनात कर्मियों द्वारा यह वाक्य उस समय जोर से बोला जाता था जब कोई उनकी निर्धारित सीमा के भीतर प्रवेश कर जाता था. इस वाक्य के द्वारा वे सामने से आने वाले की, सीमा रेखा में घुस आने वाले की पहचान करते थे कि वह दोस्त है अथवा दुश्मन. अब आप सोचेंगे कि एक जरा से वाक्य से कोई कैसे पहचान सकता था कि अन्दर आने वाला दोस्त है या दुश्मन. जी हाँ, सही सोचा आपने. असल में सुरक्षा कर्मियों को किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के अपनी सीमा रेखा में घुस आने वाले को गोली मार देने तक के आदेश हुआ करते थे. इसलिए जैसे ही कोई संदिग्ध व्यक्ति इन सुरक्षा कर्मियों को अपनी सीमा में घुसता दिखाई देता था तो वे जोर से बोलते थे, हाल्ट हुकुम सर देयर. फंडर फ़ो. ऐसा वे तीन बार जोर-जोर से बोला करते थे. उसमें जवाब मिल जाने पर तो ठीक अन्यथा की स्थिति में वे सुरक्षा कर्मी उस संदिग्ध पर गोली भी चला देते थे.


यह वाक्य सुरक्षा कर्मियों के अल्प शिक्षित होने, ग्रामीण अंचलों से होने के कारण इस तरह बोला जाने लगा था. मूल वाक्य इस तरह का नहीं हुआ करता था. हॉल्ट, हू कम्स देयर, फ्रेंड ऑर फ़ो?  के द्वारा सामने आने वाले से जानकारी ली जाती थी कि वह दोस्त है या दुश्मन. सामने वाला भी पहली बार में ही अपना जवाब दे दिया करता था.


बाबा जी बताया करते थे कि कई बार दुश्मन की तरफ से अचानक से हमला हो जाया करता था. सुरक्षा कर्मियों को बोलने का, पूछने का मौका ही नहीं मिल पाता था कि हाल्ट. हुकुम सर देयर, फंडर फ़ो? और वे इसे बोलने, पूछने के पहले ही दुश्मन के हमले का शिकार हो जाया करते थे. कुछ इसी तरह का दुश्मन अबकी हमारे बीच है, जो हमारी सुरक्षा व्यवस्था को पूछने का अवसर ही नहीं दे रहा है कि हू कम्स देयर, फ्रेंड ऑर फ़ो? वह तो बस सीधे हमला कर दे रहा है. हमारी इम्युनिटी को, हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित कर दे रहा है.


जी हाँ, सही समझे आप, कोरोना अबकी ऐसा ही दुश्मन बनके आया है जिसने पूछने का मौका ही नहीं दिया. अभी भी मौका है संभलने का, अपने सुरक्षा तंत्र को सजग बनाने का. अपनी क्षमता को मजबूत कीजिये, अपनी इम्युनिटी पॉवर को बढ़ाइए और किसी भी दुश्मन के हमला करने से पहले, उसके सीमा रेखा में घुसने के पहले ही सुरक्षा तंत्र को पूछने दीजिये, हाल्ट, हुकुम सर देयर.....


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11 मई 2021

प्लाज्मा और थेरेपी : सामान्य जानकारी

रक्तदान करते हुए एक लम्बी समयावधि हो चुकी है. वर्ष 1991 से आरम्भ यह अभियान आजतक निरंतर नियमित रूप से चल रहा है. अपने इस कार्य के दौरान और अध्ययन के दौरान बहुत बार प्लाज्मा शब्द से परिचय हुआ. इतने वर्षों में प्लाज्मा के बारे में सुनते रहने के बाद भी उसके उपयोग की तरफ बहुत गंभीरता से ध्यान नहीं दिया था. इधर विगत वर्ष में कोरोना का प्रकोप शुरू होने के बाद से ही प्लाज्मा के बारे में, प्लाज्मा थैरेपी के बारे में खूब चर्चा सुनाई देने लगी. आये दिन इस बारे में बहुत से लोग जानकारी चाहते हैं कि प्लाज्मा क्या है? यह कैसे काम करता है? इसके द्वारा वर्तमान कोविड-19 बीमारी में कैसे इलाज किया जा रहा है? एक प्रयास है इस बारे में संक्षिप्त जानकारी देने का. 




किसी व्यक्ति के रक्त (Blood) में चार प्रमुख चीजें होती हैं. श्वेत रक्त कोशिकाएँ (व्हाइट ब्लड सेल्स, WBC), लाल रक्त कोशिकाएँ (रेड ब्लड सेल्स, RBC), प्लेटलेट्स और प्लाज्मा. किसी स्वस्थ शरीर में रेड ब्लड सेल्स (RBC) की मात्रा सर्वाधिक होती है. शरीर में शामिल पूरे खून का 38-40 प्रतिशत भाग RBC होता है. यह रीढ़धारी जन्तुओं के श्वसन अंगों से आक्सीजन लेकर उसे शरीर के विभिन्न अंगों की कोशिकाओं तक पहुँचाने का सहज माध्यम है. इस कोशिका में केन्द्रक नहीं होता है और इसकी औसत आयु 120 दिन की होती है.


श्वेत रक्त कोशिकायें (WBC) को श्वेताणु या ल्यूकोसाइट्स भी कहा जाता है. ये शरीर को संक्रामक रोगों और बाह्य पदार्थों से रक्षा करने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकायें हैं. इन्हें सामान्य बोलचाल की भाषा में शरीर का सिपाही के नाम से भी जाना जाता है. WBC किसी व्यक्ति के शरीर में एंटीजन और एंटीबॉडी का निर्माण करती हैं. एक बार बनी हुयी एंटीबॉडी जीवन भर नष्ट नहीं होती है. श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या किसी स्वस्थ व्यक्ति में उसके रक्त का लगभग 1 प्रतिशत होती है. इन कोशिकाओं की संख्या में ऊपरी सीमा से अधिक हुई वृद्धि को ल्यूकोसाइटोसिस तथा निम्न सीमा के नीचे की संख्या को ल्यूकोपेनिया कहा जाता है.


प्लेटलेट्स को बिम्बाणु भी कहते हैं. ये शरीर में उपस्थित रक्त में अनियमित आकार की छोटी अनाभिकीय कोशिका होती है. ये वे कोशिकाएँ होती हैं जिनमें नाभिक नहीं होता है बल्कि मात्र डीएनए ही होता है. एक प्लेटेलेट कोशिका का औसत जीवनकाल 8-12 दिन का होता है. सामान्यत: किसी मनुष्य के रक्त में एक लाख पचास हजार से लेकर चार लाख प्रति घन मिलीमीटर प्लेटलेट्स होते हैं. ये थ्रोम्बोपीटिन हार्मोन की वजह से विभाजित होकर खून में समाहित होते हैं और मात्र 10 दिन के जीवनकाल तक संचारित होने के बाद स्वत: नष्ट हो जाते हैं. शरीर में थ्रोम्बोपीटिन का काम प्लेटलेट्स की संख्या को सामान्य बनाये रखना होता है.


प्लाज्मा हमारे शरीर में उपलब्ध खून में मौजूद एक तरह का तरल पदार्थ होता है. यह पीले रंग का होता है, जिसमें पानी, नमक और अन्य एंजाइम्स होते हैं. इसकी सहायता से हमारे शरीर की कोशिकाएँ और प्रोटीन शरीर के विभिन्न अंगों में खून पहुँचाते हैं. किसी भी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्लाज्मा की मात्रा 52 से 62 प्रतिशत तक होती है. वर्तमान में कोरोना संक्रमण के चलते प्लाज्मा थेरेपी का चलन तेजी से बढ़ा है. ऐसे किसी भी स्वस्थ मरीज, जिसमें एंटीबॉडीज़ विकसित हो चुकी हैं, का प्लाज़्मा निकालकर दूसरे व्यक्ति को चढ़ाना ही प्लाज्मा थेरेपी है.




कोरोना संक्रमित व्यक्ति के उपचार के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का ही प्लाज्मा लिया जा सकता है जो कोरोना संक्रमित होने के बाद ठीक हो चुके हैं. ऐसे लोगों के अंदर एंटीबॉडीज विकसित हो चुकी हो. सिर्फ वही लोग ठीक होने के 14 दिन बाद प्लाज्मा दान कर सकते हैं. यहाँ ध्यान दें वाली बात यह है कि जो व्यक्ति प्लाज्मा दान करता है उसे किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं होता है. इसके देने से हीमोग्लोबिन में भी किसी तरह की गिरावट नहीं आती है. यदि प्रक्रिया की दृष्टि से देखें तो प्लाज्मा का दान रक्तदान से ज्यादा सरल और सुरक्षित है. प्लाज्मा दान करने के बाद सिर्फ एक-दो गिलास पानी पीकर ही वापस पहली वाली स्थिति में आ सकते हैं. प्लाज्मा में सम्बंधित व्यक्ति के  खून से सिर्फ प्लाज्मा लेकर RBC, WBC और प्लेटलेट्स वापस देने वाले व्यक्ति के शरीर में पहुँचाये जाते हैं. इसलिए प्लाज्मा दान करने से शरीर पर कोई फर्क नहीं पड़ता है.


जो व्यक्ति कोविड-19 से ठीक हो गए हैं, उनके शरीर से रक्त लेकर प्लाज्मा को अलग किया जाता है. जिस स्वस्थ कोविड मरीज से प्लाज्मा लिया जाता है उसके रक्त में एंटीबॉडीज बनी होती हैं. यही एंटीबॉडीज कोविड संक्रमितों को दी जाती है. डॉक्टर्स के अनुसार एक व्यक्ति के प्लाज्मा से दो संक्रमित व्यक्तियों का इलाज किया जा सकता है. कोविड-19 संक्रमण से स्वस्थ होने के 14 दिन बाद से लेकर 04 महीने के अंदर प्लाज्मा दान किया जा सकता है.


किसी व्यक्ति के शरीर से प्लाज्मा का निकालना प्लाज्मा फेरसिस की विधि से होता है. इसमें एक मशीन में ब्लड का संचार होता है. इसमें एक हाथ से रक्त निकलता है जो मशीन से गुजरता है. इस रक्त में से एंटीबॉडी युक्त प्लाज्मा निकाल लिया जाता है और शेष रक्त को देने वाले के शरीर में वापस भेज दिया जाता है. इस प्रक्रिया के द्वारा 200 से 400 मिली के आसपास प्लाज्मा निकाला जाता है. एक बार प्लाज्मा डोनेट करने के बाद दोबारा 14 दिन बाद प्लाज्मा दिया जा सकता है. स्वस्थ शरीर में 14 दिन में प्लाज्मा का निर्माण हो जाता है.


यहाँ एक बात और विशेष है कि जिस व्यक्ति ने कोरोना संक्रमण से बचने हेतु वैक्सीनेशन करवा लिया है वह भी वैक्सीनेशन के 28 दिन बाद प्लाज्मा डोनेट कर सकता है लेकिन यहाँ शर्त वही है कि प्लाज्मा दान करने वाला व्यक्ति कोरोना संक्रमण से स्वस्थ हो चुका हो. कोरोना संक्रमित के इलाज हेतु मरीज को कोरोना वायरस के विरुद्ध बनी एंटीबॉडीज की जरूरत होती है न कि वैक्सीनेशन वाली एंटीबॉडीज की.


यद्यपि कोरोना संक्रमित व्यक्ति के उपचार में प्लाज्मा की भूमिका को लेकर चिकित्सक और चिकित्सा वैज्ञानिक स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कह रहे हैं तथापि ऐसी खबरें हैं कि इसके प्रयोग से कोरोना संक्रमित स्वस्थ अवश्य हुए हैं. इसके चलते हुए तमाम चिकित्सक और समाजसेवी लगातार अनुरोध करते दिख रहे हैं कि जो व्यक्ति कोरोना से प्रभावित होकर पूर्णतः स्वस्थ हो चुका है वह अपना प्लाज्मा अवश्य दान करे. यह तो स्पष्ट है कि प्लाज्मा देने वाले को किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं है. ऐसे में यह स्वीकारते हुए कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन अनमोल है और यह जीवन एक बार ही मिला है, यदि किसी के काम आ जाये तो इससे बेहतर कोई कार्य नहीं. समाजहित में ऐसे व्यक्तियों को कोरोना मुक्त समाज बनाने के लिए आगे आना चाहिए जो कोरोना संक्रमण से मुक्त हो चुके हैं. उनका प्लाज्मा लाभ लेकर अन्य संक्रमित व्यक्ति भी स्वस्थ हो सकते हैं.   


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17 अगस्त 2020

संदेहास्पद स्थितियाँ हैं कोरोना को लेकर

कोरोना से लड़ाई लगातार चलती जा रही है और एक तरह का अनिश्चय भी बना हुआ है. लॉकडाउन भी हुआ फिर अनलॉक भी शुरू हो गया. कोरोना से संक्रमित होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है साथ ही इससे स्वस्थ होने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. बिना इलाज ठीक होना भी एक आश्चर्य माना जा रहा है किन्तु साथ ही दावा किया जा रहा कि जिसकी प्रतिरोधक क्षमता अच्छी है तो उसे या तो कोरोना संक्रमण होगा नहीं और यदि हुआ तो वह जल्द स्वस्थ हो जायेगा. इसी के दूसरी तरफ सभी लोगों को सावधान रहने पर जोर दिया जा रहा है है. लोगों को मास्क बाँधने के लिए, मुँह-नाक ढँकने के लिए लगातार प्रेरित किया जा रहा है. इस बीमारी से लड़ते-लड़ते कई महीने निकल गए मगर अभी भी कोई ठोस धरातल पर नहीं खड़ा हो सका है. अभी भी इसके लक्षणों पर संशय बना हुआ है, इसकी संक्रमण दर पर संशय बना हुआ है, इसके संक्रमण होने अथवा न होने को लेकर भी विमर्श चलता रहता है.


यहाँ एक बात विशेष रूप से गौर करने वाली है कि जबसे देश में कोरोना ने अपने कदम पसारे हैं तबसे चिकित्सा क्षेत्र में कोई दूसरी बीमारी दिखाई ही नहीं दे रही है. अब मरने वालों की जो संख्या आ रही है, मरने वालों की जो खबरें आ रही हैं वे बहुतायत में या कहें शत प्रतिशत कोरोना से होती बताई जा रही हैं. क्या वाकई ऐसा ही है? क्या इस समय देश भर में जितनी मौतें हो रही हैं वे सिर्फ कोरोना से हो रही हैं? क्या अन्य बीमारियों से मरने वालों की संख्या शून्य हो गई है? कई बार मन में संशय उठता है कि इन सबके पीछे कहीं कोई वैश्विक साजिश तो नहीं? इसके पीछे कहीं कोई बहुत बड़ा खेल तो आम नागरिकों के साथ तो नहीं खेला जा रहा है?


ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यह बात सभी चिकित्सक या कहें कि चिकित्सा सेवा से जुड़े लोग बेहतर तरीके से जानते हैं कि कोरोना वायरस का संक्रमण उसी दशा में होना है जबकि किसी भी तरह से संक्रमण मुँह-नाक के सहारे अन्दर चला जाए. किसी संक्रमित व्यक्ति के छूने से कोरोना संक्रमण नहीं फैलना है. इसके बाद भी लगभग सभी जगहों से किसी दूसरे मरीज को चिकित्सा सेवा सहज उपलब्ध नहीं हो पा रही है. किसी भी तरह की बीमारी का इलाज करवाने के पहले मरीज को कोविड टेस्ट से गुजरना पड़ रहा है. ऐसा तब हो रहा है जबकि डॉक्टर्स पूरी तरह से किट में काम कर रहे हैं.

इसके साथ-साथ कोरोना के नाम पर किसी बड़ी साजिश का, किसी उच्च स्तरीय मिलीभगत, खेल का संदेह इस कारण भी है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी भी जाँच करवाई जा रही है और उसके कोरोना संक्रमित होने पर उसकी मृत्यु की गणना कोरोना से मरने वालों के साथ की जाने लगती है. आखिर ऐसा क्यों? जब उसकी मृत्यु कोरोना संक्रमण निर्धारित होने के पहले हो चुकी है तो फिर उसकी मौत को कोरोना से होने वाली मौतों के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है? संभव है कि अन्य सुरक्षा कारणों से मरने के बाद भी जाँच के द्वारा कोरोना संक्रमण मृत देह से और जगहों पर फैलने के इरादे से ऐसा किया जा रहा हो मगर ऐसे में भी ऐसी मृत्यु को कोरोना से होने वाली मौतों के साथ जोड़ना तर्कसंगत नहीं है.

एक और बिंदु ऐसा है जो संदेह जगाता है. आखिर कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बताते समय मात्र उतनी ही संख्या क्यों नहीं बताई जा रही जितने मरीज वर्तमान में एक्टिव हैं? आखिर ठीक पहले मरीज से लेकर अद्यतन संख्या बताने के पीछे क्या कारण है? क्यों इसमें वह संख्या भी शामिल है जो स्वस्थ हो चुके हैं? क्यों इसमें वह संख्या बताई जाती है जिनकी मृत्यु हो चुकी है?

कोरोना मामले में जिस तरह से जल्दबाजी में कदम उठाये गए उनको लेकर शायद इसलिए भी कुछ कहना उचित नहीं क्योंकि इस तरह का संकट अकेले हमारे देश पर नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विश्व इसी से जूझ रहा है. सभी के लिए यह बीमारी एकदम नई थी और सुरक्षात्मक कदमों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. ऐसे में उपायों को लेकर, सुरक्षा सम्बन्धी बिन्दुओं को लेकर लगातार सीखने और गलतियाँ करने वाली स्थिति बनी रहना स्वाभाविक है मगर इसकी आड़ में शेष बीमारियों के प्रति गैर-जिम्मेवाराना रवैया अपना लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है. ये स्थितियां ऐसी हैं जो कहीं न कहीं संदेह को बढ़ाती हैं.

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28 जुलाई 2020

कोरोना संक्रमित की जगह मानसिक बीमार न हो जाएँ

चीनी वायरस कोरोना के चलते लॉकडाउन चार महीने पहले लगाया गया था. उसके बाद अनलॉक की प्रक्रिया शुरू की गई. बहुत सारी बाध्यताओं के बीच, नियम-कानूनों के साथ लॉकडाउन जैसी स्थिति देखने को मिल रही है. इसके साथ-साथ जीवन वापस पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है. कुछ शर्तों के साथ बाजार खोल दिए गए हैं. ऑफिस भी शुरू किये गए हैं. कारखानों में काम चालू कर दिया गया है. परिवहन, यातायात के साधनों का भी दौड़ना दिखाई पड़ने लगा है. बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, दिखाई दे रहा है जो लॉकडाउन के पहले के जीवन जैसा आभास करवाता है इसके बाद भी पहले जैसी निश्चिंतता, पहले जैसी स्वतंत्रता, पहले जैसा सहज भाव देखने को नहीं मिल रहा है. बहुत कुछ खुला होने के बाद भी, संचालित होने के बाद भी लगता है जैसे बहुत बड़ा बंधन बना हुआ है. यह बंधन बाहरी कम, भीतरी ज्यादा समझ आ रहा है.



शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से बहुत कुछ बंधनों में जकड़ा हुआ लगता है. इसका एहसास भीतर ही भीतर डराता नहीं है वरन परेशान करता है. यह बंधन धीरे-धीरे लोगों के दिल-दिमाग पर हावी होता नजर आ रहा है. लोगों के काम करने में, लोगों के बाजार में खरीददारी करने में, कार्यालयों में अपने काम से जाने के दौरान उनकी क्रियाशीलता में, क्रियाविधि में सहज भाव नहीं है. लगभग सभी लोग किसी न किसी अप्रत्यक्ष शक्ति के द्वारा नियंत्रित होकर कार्य करने में लगे हैं. कोरोना वायरस के कारण उपजी स्थिति ने जैसे लोगों को मानसिक रूप से बीमार बनाना शुरू कर दिया है. सुरक्षात्मक होने के बजाय लोग पैनिक होते जा रहे हैं. लोगों के आपस में बातचीत करने के विषय बदल चुके हैं. घूम-फिर कर बात कोरोना पर, संक्रमितों की संख्या पर, मरने वालों पर आकर टिक जाती है. मेल-मिलाप के वैसे भी अवसर हाल-फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं, ऐसे में फोन द्वारा भी हालचाल लेने पर कोरोना वायरस ही उछल कर सामने आ जाता है.


यह स्थिति किसी भी रूप में सुखद नहीं है. आज न सही, कल को कोरोना वायरस का इलाज मिल ही जायेगा मगर जिस तरह से लोगों की हरकतें, मानसिक और शारीरिक स्थिति बनती जा रही है, उससे निकल पाना बहुत से लोगों के लिए आसान नहीं होगा. कोरोना वायरस से संक्रमित होने के भय, उसके द्वारा होने वाली मौत की डरावनी कल्पना चिंता का विषय है. ऐसे में सभी को आपस में मिलकर कोरोना के अलावा किसी अन्य विषय पर बातचीत करनी चाहिए. मिलने-जुलने पर, ऑफिस में काम करते समय, फोन से बात करते समय उसी तरह से व्यवहार रखना चाहिए जैसा कि कोरोना आने के पहले हुआ करता था. ध्यान रखना होगा कि कहीं हम सब एक वायरस से लड़ाई जीतने के साथ-साथ अपने लोगों की शारीरिक-मानसिक हालत से न हार जाएँ.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

02 जून 2020

ध्यान रखना, लॉकडाउन और अनलॉक तुम्हारे लिए नहीं

लॉकडाउन के बाद अब नई शब्दावली चलन में आ गई है, अनलॉक. वैसे इन दोनों शब्दों से लोग पहले से परिचित रहे हैं मगर इस सन्दर्भ में पहली बार प्रयोग कर रहे हैं. इस लॉकडाउन लगने, खुलने को लेकर लोगों में अजब सी उथल-पुथल है. जब इसे लगाया गया था तो इनके पेट में मरोड़ उठी थी. उसके बाद जब इसका दूसरा भाग शुरू हुआ तो फिर ज्यादा मरोड़ हुई. पहले मरोड़ उठी थी लगने को लेकर फिर मरोड़ उठी एकाएक लगने को लेकर. श्रमिकों, मजदूरों के परेशान होने को लेकर. इन मरोड़धारियों को जानकारी नहीं थी कि ये क्या होने लगा है. इसी कारण से उस समय बमचक नहीं मचाई जबकि लॉकडाउन शुरू हुआ था. जब कुछ दिन बाद दिमाग ने इसका विश्लेषण, आकलन करना शुरू कर दिया तो सरकार के कदमों की समीक्षा होने लगी.


अब जबकि लॉकडाउन को खोल दिया गया है या कहें कि अनलॉक जैसी स्थिति का आरम्भ हो गया है तो इन्हीं लोगों को फिर समस्या होने लगी है. अब समस्या यह है कि आखिर लॉकडाउन हटाया क्यों जा रहा? इनकी समस्या ये भी है कि जब संख्या कम थी तो लॉकडाउन लगाया गया था, अब जबकि संख्या बढ़ने लगी है तो लॉकडाउन हटाया जाने लगा है. ऐसे लोगों की समस्या ठीक पहले दिन वाली है. तब भी अपना दिमाग न लगाते हुए बस विरोध करना था, आज भी दिमाग न लगाते हुए बस विरोध करना है. कभी सोचा है कि इतने लॉकडाउन के बाद भी संख्या बढ़ रही है तो यदि लॉकडाउन न किया होता तो यही संख्या मार्च के अंत में होती. फिर यही अतिबौद्धिक लोग सरकार के कार्यों की आलोचना करते. सरकार की तैयारियों की बुराई करते.


किसी ने कभी सोचा होगा कि देश को कभी इतनी बड़ी संख्या में पीपीई किट की आवश्यकता पड़ेगी? किसी ने कभी इसका आकलन किया होगा कि देश में कभी भी सामान्यजन को भी एन-95 मास्क की आवश्यकता होगी? किसी भी लैब ने या किसी भी चिकित्सकीय संस्थान सहित किसी भी बुद्धिजीवी ने विचार किया था कि देश को कभी कोरोना टेस्टिंग किट की आवश्कता पड़ेगी? क्या कभी किसी ने विचार किया था कि महज इसी एक बीमारी के लिए देश में प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोगों के सैंपल इकठ्ठा किये जायेंगे, उनकी जाँच की जाएगी? क्या किसी ने कभी अस्पताल जाने के दौरान सोचा होगा कि कोई दिन ऐसा भी आएगा जबकि किसी बीमार के लिए आइसोलेशन वार्ड जैसी जगह भी बनानी पड़ेगी? किसी ने भी ऐसा नहीं सोचा था. संभवतः ऐसा किसी भी देश की सरकार ने नहीं सोचा होगा.

ऐसे में जबकि आपके सामने, परिवार के सामने, देश के सामने, सरकार के सामने ऐसी कोई स्थिति आ जाये जो एकदम से नई हो तो क्या किया जाये? क्या उससे बिना तैयारी के लड़ना शुरू कर दिया जाये? क्या उससे निपटने के साधनों को उपलब्ध नहीं करवाया जाये? बस ध्यान रखें कि सरकार ने आरम्भिक दिनों में लॉकडाउन करके यही सब किया. इतने दिनों में लॉकडाउन के कारण मरीजों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ी. लोगों की आवाजाही कम रही, देश भर की सारी गतिविधियाँ ठप्प रहीं जिससे सरकार और उसके सहयोगीजनों को अपनी तैयारी करने का समय मिला. जो देश दे महीने पहले पीपीई किट बनाता न हो वह अब निर्यात करने की स्थिति में है. जिस देश में टेस्टिंग किट बनती न हो वह अब एक दिन में एक लाख से अधिक जाँच कर रहा है. जिस देश की चिकित्सा व्यवस्था को दोयम दर्जे का माना जाता रहा हो उसने रेलवे की बोगियों को महीने भर से कम समय में आइसोलेशन वार्ड में बदल दिया. अब लाखों की संख्या में बेड तैयार हैं, किसी भी असामान्य स्थिति से निपटने को. क्या ये आपके लिए संतोष की बात नहीं है?

संभव है कि बहुतों के लिए इसमें भी सरकारी हेरफेर दिखाई दे तो फिर स्पष्ट शब्दों में इसे ऐसे समझिये. सरकार ने लॉकडाउन आपके लिए नहीं लगाया था बल्कि अपनी तैयारियों के लिए लगाया था. सरकार ने अब अनलॉक किया है तो वो भी आपके लिए नहीं किया है बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को सँभालने के लिए किया है. दो महीने के लॉकडाउन में सरकार ने आपको खूब समझा दिया, तोते की तरह रटवा दिया कि कैसे बचना है कोरोना से. क्या-क्या सावधानियाँ अपनानी हैं. उसने आपको हर तरह से प्रशिक्षित कर दिया है. अब ये आपकी मनमर्जी पर है कि आप असावधानी में कोरोना को चपेटते हैं ये फिर कोरोना आपको अपने लपेटे में लेता है. अब ये आपके कदम बताएँगे कि आप अपने कार्य के लिए बढ़ रहे हैं या फिर कोरोना की तरफ जा रहे हैं. मर्जी आपकी क्योंकि स्वास्थ्य है आपका, परिवार है आपका, जान है आपकी.

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08 अप्रैल 2020

मानवीय जगत के लिए लाभकारी लॉकडाउन

लॉकडाउन का समय चल रहा है और लोग फुर्सत का समय भी सिर्फ चीनी वायरस कोरोना की चर्चा में बिता दे रहे हैं. या कहें कि अपना अमूल्य समय इस फिजूल विषय पर बर्बाद कर रहे हैं. इस इक्कीस दिन के लॉकडाउन के चौदह दिन बीत गए यानि कि दो हफ्ते और इन दो हफ़्तों में इसका असर हमारे ऊपर क्या हुआ, इस पर शायद ही किसी ने विचार किया होगा. यदि लॉकडाउन मात्र इन्हीं इक्कीस दिनों का ही रहा तो उससे संक्रमण रोकने में हम कितने सफल होंगे ये बात अलग होगी मगर हम व्यक्तिगत रूप से कितने सफल हो चुके होंगे, इसका आकलन अभी किया ही नहीं गया होगा. इधर देश की, राज्यों की अर्थव्यवस्था का आकलन कर लिया गया होगा. निस्संदेह इसमें जबरदस्त तरीके से गिरावट के बिंदु देखने को मिलेंगे. आर्थिक स्थिति का संतुलन अपने आपमें आवश्यक है और उससे कहीं अधिक संतुलन बनाये रखने वाला विषय है प्रकृति, मानवीय स्वास्थ्य, संवेदनाएं.



इन चौदह दिनों में आपने गौर किया होगा कि हमारे आसपास की हवा बहुत सुखद महसूस होने लगी है. आपने अनुभव किया होगा कि आसपास का प्राकृतिक वातावरण कुछ अलग सा दिखने लगा है. आपके आसपास बहने वाली नदियों की रंगत में भी सुधार आता नजर आया होगा. इस प्राकृतिक स्वरूप में सकारात्मक परिवर्तन के अलावा आपको अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य में भी परिवर्तन नजर आया होगा. अभी के चौदह दिनों और इसके बाद के सात दिनों के लॉकडाउन से आपके शरीर को और आपके बच्चों के शरीर को किसी भी तरह से जंक फ़ूड की प्राप्ति नहीं हो सकी होगी. (यहाँ उन अपवादों की चर्चा नहीं जिनके घर में ऐसे सामान उपस्थित रहते हैं.) स्वयं देखिये, आप या आपका बच्चा बाजार नहीं जा रहा. ऐसे में मोमोज, पिज्जा, बर्गर आदि जैसी खाद्य वस्तुओं से सबकी दूरी बनी हुई है. इसने निश्चित ही आपके शरीर से नकारात्मक रसायनों को दूर ही रखा होगा.


इसके साथ-साथ एक और विशेष बात देखने में आ रही है वह यह कि सभी की जीवन-शैली अत्यल्प वस्तुओं के द्वारा पूरी की जा रही है. न मॉल की सैर की जा रही है, न फिल्मों का शौक पूरा किया जा रहा है, न ही अनावश्यक कारें दौड़ाई जा रही हैं. इससे जहाँ एक तरफ अपव्यय पर रोक लगी है वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण पर भी अंकुश लगा है. इन सुखद अनुभूतियों के साथ-साथ सड़क दुर्घटनाओं में अचानक से गिरावट आई है. इसी तरह बीमारों की भीड़ भी अब चिकित्सालयों में नहीं दिखाई दे रही है. यहाँ विचार करना होगा कि भले ही सभी जगह के ओपीडी बंद करवा दिए हों मगर कहीं भी आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को बंद नहीं किया गया है. इसके बाद भी किसी चिकित्सालय में आपातकालीन सेवाओं में भी भगदड़ नहीं मची है. इसका सीधा सा अर्थ है कि बीमार लोगों की संख्या में भी गिरावट आई है.

इसे क्या माना-समझा जाये? क्या इसे स्वीकार लिया जाये कि जीवन-शैली को भौतिकतावाद से दूर रखने में ही हम सभी का लाभ है? क्या ये माना जाये कि सादा जीवन हम सभी के लिए लाभप्रद है? क्या ये मान लिया जाये कि ऐसा कदम के द्वारा एक तरफ हम प्रकृति को स्वच्छ करेंगे साथ ही खुद को भी स्वस्थ रखेंगे? कुछ भी हो मगर सत्य यह है कि जीवन को कम से कम संसाधनों में गुजारना कतई मुश्किल नहीं बस उसके लिए भौतिकतावादी संस्कृति से, दिखावे से, आडम्बर से, कथित आधुनिकता से दूर रहने की आवश्यकता है.

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