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19 मई 2026

श्रम की महत्ता समझाएगा श्रमदान

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा विद्यालयों में बच्चों से श्रमदान करवाने वाले शिक्षकों को सम्मानित करने का विचार रखना एक प्रशासनिक औपचारिकता भर अथवा कोई तात्कालिक सुर्खी का विषय नहीं है. व्यावहारिक रूप में देखा जाये तो उनका वक्तव्य हमारी समकालीन शिक्षा व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने के प्रति एक विमर्श का सूचक है. अंकों की मारामारी के अंधे दौर में हमारी शिक्षा प्रणाली और अभिभावक सूचनाओं के संकलन, तकनीकी के नियंत्रण और अंकों की अबूझ प्रतिस्पर्धा में उलझकर रह गए हैं. इस व्यवस्था ने विद्यालयों से पारम्परिक और बुनियादी अवधारणाओं को लगभग समाप्त सा कर दिया है. श्रमदान भी इसी तरह की व्यावहारिक व्यवस्थाओं से बाहर कर दी गई है. हमें सोचना चाहिए कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या उसके द्वारा किसी इंसान को कामगार के रूप में तैयार करना है या फिर एक संवेदनशील, सामाजिक नागरिक का निर्माण करना है?

 


आधुनिक दौर की कॉरपोरेट संस्कृति ने बच्चों के मस्तिष्क
को भले ही तीक्ष्ण किया हो लेकिन उनके ह्रदय को श्रम, सामाजिकता, समन्वय से दूर ही किया है. अब न केवल बच्चों में बल्कि अभिभावकों में शिक्षा के प्रति, शिक्षण संस्थानों के प्रति आत्मीयता का, परिवारिकता का नहीं बल्कि व्यापारिकता का भाव होता है. बच्चों को अब शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए, अधिकाधिक अंक लाने के लिए भेजा जाने लगा है. अब किसी बच्चे द्वारा अपनी कक्षा की मेज साफ करना, विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना अथवा पेड़-पौधों में, क्यारियों में पानी देना उसके आन्तरिक गुणों के विकसित होने के क्रम में नहीं बल्कि शारीरिक शोषण किये जाने के रूप में देखा जाता है. वास्तविकता तो यह है कि इस तरह के छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा वह किसी शोषण का, बाल-श्रम का शिकार नहीं हो रहा होता है बल्कि वह अपने आसपास के भौतिक परिवेश के साथ एक आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर रहा होता है. इस तरह की गतिविधियाँ बच्चों के भीतर पनपने वाले अभिजात्य अहंकार, वर्ग-विभेद आदि को तोड़ती हैं. ऐसे कार्यों के द्वारा बच्चों को सिखाया जाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता और यही सीख उनके भीतर समन्वय का, सामंजस्य का निर्माण करती है.

 

समकालीन दौर में बाल विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में शारीरिक निष्क्रियता, मानसिक अवसाद, एकाकीपन आदि प्रमुख हैं. आज बच्चे मोबाइल के जाल में उलझकर प्रकृति से, शारीरिक श्रम से लगभग दूर हो चुके हैं. ऐसे में विद्यालयों में श्रमदान केवल किसी कार्य तक सीमित न समझा जाये बल्कि इसे एक तरह की शारीरिक और मानसिक चिकित्सा माना जाना चाहिए. सामूहिक रूप से किया जाने वाला शारीरिक श्रम बच्चों में सकारात्मकता बढ़ाता है, उनके मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है. श्रमदान को बालश्रम से जोड़कर देखना उचित नहीं क्योंकि यह एक सामूहिक विधा है जो अलग-अलग पृष्ठभूमि, जातियों, आर्थिक स्तरों से आने वाले विद्यार्थियों में टीम वर्क, सहानुभूति, सहयोग आदि की भावना विकसित करती है. इस तथ्य को उस समय और भी सहज भाव से देखा जा सकता है जबकि यही बच्चे उच्च शिक्षा में आने के पश्चात् बिना किसी संकोच, भेदभाव के एनसीसी, एनएसएस आदि के माध्यम से अपने आसपास की बस्तियों में श्रमदान करते हैं, स्वच्छता हेतु मिलजुल कर कार्य करते हैं.

 

श्रमदान बच्चों में भावनात्मकता का विकास करता है. हम सभी अपने घरों को, अपनी सम्पत्ति को साफ़-सुथरा रखते हैं, उनके प्रति आत्मीय भाव रखते हैं किन्तु सार्वजनिक सम्पत्ति को गंदा करने में संकोच नहीं करते हैं. यह प्रवृत्ति एक गम्भीर सामाजिक बीमारी बन चुकी है. इसके मूल में नागरिकों का सार्वजनिक संपत्तियों से भावनात्मक जुड़ाव न होना है. यदि एक बच्चा पसीना बहाकर अपने विद्यालय को सँवारता है तो उसके भीतर उस स्थान के प्रति भावनात्मकता का, अपनत्व का बोध जागृत होता है. ऐसा बच्चा भविष्य में सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उदारता, अपनत्व के भाव से जुड़ेगा. श्रम की गरिमा का अभाव हमारे देश का एक कड़वा सच है. हमने मानसिक श्रम को उच्च और शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता बना ली है. यही कारण है कि आज देश का शिक्षित युवा किसी भी स्तर की नौकरी के लिए भी कतारों में खड़ा मिल जायेगा किन्तु वह किसी शारीरिक श्रम कार्य को अपनाने से बचता है. श्रमदान के द्वारा बच्चों में श्रम की महत्ता को समझाया जा सकता है, उसके प्रति निम्नता की ग्रंथि समाप्त किया जा सकता है.

 

मुख्यमंत्री के विचार के बाद विद्यालयों में बच्चों के श्रमदान को एक दिशा देने की आवश्यकता है. इसके लिए उठाने वाले तमाम उपायों के बीच देखना होगा कि श्रमदान के नाम पर उनको बालश्रम के रूप में परिवर्तित न कर दिया जाये. बच्चों को, अभिभावकों को बालश्रम और श्रमदान के अंतर को समझाना होगा. बच्चों द्वारा विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना श्रमदान है मगर उन्हीं बच्चों से मिड-डे-मील बनवाया जाना बालश्रम होगा. विद्यालय परिसर में पौधारोपण करना, उनमें पानी देना श्रमदान है मगर किसी उच्चाधिकारी के आने पर उसकी आवभगत करवाना बालश्रम होगा. श्रमदान कोई सुधार कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह एक सामाजिकता, परिवारिकता का पाठ है. यदि श्रमदान को सामाजिक सहयोग के रूप में धरातल पर क्रियान्वित किया जाए तो यह आत्मनिर्भरता का, स्वावलम्बन का, श्रम के प्रति पूजनीयता का भाव जागृत करेगा.

 


29 जुलाई 2025

समाज की कड़वी हकीकत है बाल श्रम

ऐसे दृश्य हम सबकी आँखों के सामने से आये दिन गुजरते ही होंगे जबकि छोटे-बड़े व्यापारिक संस्थानों, दुकानों, ढाबों आदि में बच्चे काम कर रहे हैं. कहीं कोई चाय-पानी पिलाने का काम कर रहा है, कहीं कोई झाड़ू-पोंछा करने का काम कर रहा है. सामान्य रूप में इस स्थिति को बाल श्रम के रूप में जाना जाता है. कृषिकार्य, पारिवारिक व्यापार में मदद, होटल, ढाबों आदि में बच्चों को जबरिया काम पर लगा दिया जाता है. कई बार इन बच्चों से बलपूर्वक भी काम लिया जाता है. ऐसा उस स्थिति में सहजता से होता दिख रहा है जबकि बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल 2016 पारित हो चुका है. इसके पश्चात् बाल श्रम के साथ-साथ किशोरों को भी श्रमिक सम्बन्धी कार्यों में लगाये जाने को प्रतिबंधित करने के सम्बन्ध में बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन नियम 2017 पारित किया गया. यह संशोधन भारत में बाल और किशोर श्रम को समाप्त करने के उद्देश्य से कानूनी ढाँचे को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. इसके द्वारा नियमों में बाल श्रम के स्थान पर बाल एवं किशोर श्रम शब्द जोड़ा गया तथा व्यापक आयु वर्ग को मान्यता दी गई. यहाँ बाल श्रम का सन्दर्भ ऐसे कार्यों से है जिसमें कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा से छोटा होता है. इसको कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने बच्चों का शोषण करने वाला माना है.

 



भारत में बाल श्रम की समस्या दशकों से प्रचलित है. सरकारें लगातार इसके उन्मूलन हेतु चिन्तित दिखाई देती हैं. देश के संविधान का अनुच्छेद 23 खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है. भारत सरकार द्वारा बाल श्रम की समस्या को समाप्त करने हेतु नियमित रूप से क़दम उठाए गए हैं. 1986 में बाल श्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित किया गया. इसके अनुसार खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है. इसी तरह वर्ष 1987 में राष्ट्रीय बाल श्रम नीति बनाई गई थी. इसके बाद भी देश में बाल श्रमिकों की बड़ी संख्या है. इन बाल श्रमिकों में अधिकतर घरेलू नौकर, ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में, कृषि क्षेत्र में कार्य करते हैं. इन सामान्य से कार्यों के अलावा खतरनाक और जोखिमयुक्त माने जाने वाले उद्योगों जैसे बीड़ी बनाना, गलीचा बुनाई, चूड़ी निर्माण, काँच उद्योग, चमड़ा, प्लास्टिक का सामान निर्माण, विस्फोटक आदि में भी कम उम्र के बच्चे लगे हुए हैं. भारत की जनगणना 2011 के अनुसार 5-14 वर्ष की आयु वर्ग के लगभग एक करोड़ बच्चे कार्यरत हैं जिनमें से लगभग 80 लाख बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में कृषक और खेतिहर मजदूरों के रूप में कार्य करते हैं. 

 

किसी अधिनियम के अस्तित्व में आ जाने भर से बाल श्रम को रोका जाना सम्भव नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में अनेकानेक परिवार ऐसे हैं जिनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए, अपने जीवन को बचाए रखने के लिए न चाहते हुए भी अपने बच्चों को श्रमिक के रूप में कार्य करवाना पड़ता है. ऐसे परिवारों के माता-पिता के लिए बाल श्रम एक सामान्य सी प्रक्रिया होती है. इस तरह की सोच का मुख्य कारण गरीबी को माना जा सकता है. आज के दौर का यह बहुत बड़ा सच है कि विकास के बहुत बड़े-बड़े दावे करने के बाद भी समाज से गरीबी को दूर नहीं किया जा सका है. आज भी बहुतायत में ऐसे परिवार हैं जिनकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं. ऐसे परिवारों के सामने भोजन, पानी, वस्त्र, घर, शिक्षा, चिकित्सा आदि की समस्या विकराल रूप में होती है. ऐसी स्थिति में इन परिवारों को भरण-पोषण सहित अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने बच्चों को काम पर लगाना पड़ता है.  

 



देखा जाये तो बाल श्रम और गरीबी का सह-सम्बन्ध बना हुआ है. इसका दुष्प्रभाव निश्चित रूप से बच्चों के स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही पड़ता है, उनकी शिक्षा भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है. जहाँ एक तरफ कुपोषण और अन्य शारीरिक बीमारियाँ आये दिन बच्चों को घेरे रहती हैं वहीं दूसरी तरफ गरीबी और बाल श्रम में संलिप्त होने के कारण बच्चों में अवसरों, शिक्षा की कमी के कारण मानसिक परेशानियाँ देखने को मिलती हैं. बाल श्रम को रोकने के लिए सरकारों द्वारा समय-समय पर अनेक कानून बनाये गए हैं. इसी तरह से बच्चों की शिक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान देते हुए शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया गया. इस कानून के द्वारा 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है. इसके पीछे सोच यही रही है कि इस आयु-वर्ग के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर खुद को बाल श्रम, गरीबी आदि के चंगुल से मुक्त कर सकें. इसके बाद भी स्थितियों को सुखद नहीं कहा जा सकता है.

 

एक कड़वा सच यही है कि सिर्फ कानूनों के द्वारा बाल श्रम को रोका जाना सम्भव नहीं. इसके लिए जनजागरूकता भी आवश्यक है, परिवारों की गरीबी दूर होना आवश्यक है. ऐसे में बाल श्रम को समाप्त करने के लिए समाज और सरकार दोनों को सामूहिक रूप से सक्रिय होना होगा. प्रत्येक नागरिक को संकल्पित होना पड़ेगा कि वह बाल श्रम में संलिप्त लोगों को जागरूक करेगा. बाल श्रमिकों के अभिभावकों को बाल श्रम से होने वाले नुकसान के बारे में समझाना होगा. सरकार को ऐसे अभिभावकों की आय निर्धारण सम्बन्धी कदम उठाने होंगे. बच्चों को स्कूली शिक्षा के साथ-साथ गरीबी उन्मूलन की दिशा में भी प्रयास करने होंगे. समवेत प्रयासों से ही बाल श्रम को समाप्त करने की उम्मीद की जा सकती है.


12 जून 2021

बाल श्रम के प्रति सामाजिक नजरिया ही सही नहीं

बाल श्रम की जब भी बात होती है तब हम सभी सार्वजनिक रूप से अपने आदर्श स्वरूप में दिखने लगते हैं. जैसे ही बाल श्रम की बात ख़त्म होती है वैसे ही तुरंत सबकुछ भूल कर हम भी एक सामान्य इंसान की तरह पेश आने लगते हैं. हमारा एक मानना ये है कि यदि हम किसी भी तरह से कोई सकारात्मक काम कर सकें तो उसे कर देना चाहिए क्योंकि वर्तमान में सकारात्मकता की कमी देखने को मिल रही है. कुछ ऐसी ही स्थिति में बाल श्रम भी आता है. आवश्यक नहीं कि बाल श्रम में किसी बालक का काम करना ही शामिल किया जाये. उसके द्वारा किसी भी तरह का ऐसा काम जो उसकी आयु, उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार सही नहीं वह उसके व्यक्तित्व विकास में बाधक है, अपने आपमें बाल श्रम की स्थिति में आता है.


इधर बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सहभागिता करने के कारण, शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण, किसी न किसी रूप में मीडिया के संपर्क में बने रहने के कारण और उससे अधिक घूमने की प्रवृत्ति होने के कारण आये दिन ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ जाता है जबकि वहाँ बाल श्रम जैसी स्थिति दिखाई देती है. आज के सन्दर्भ में एक घटना याद आ रही है जो लगभग छह-सात साल पुरानी होगी.


हमारे उरई के एक गेस्ट हाउस में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. हम अपनी आदत के अनुसार पीछे बैठे हुए फोटो खींचने में लगे हुए थे. उसी समय हमने देखा कि हॉल में पहली पंक्ति में बैठे लोगों को पानी पिलाने का काम दो बच्चे कर रहे हैं. दोनों की उम्र लगभग आठ-दस साल की रही होगी. जितना आश्चर्य उनकी उम्र को देखकर हुआ उतना ही आश्चर्य पहली पंक्ति में बैठे अतिथियों को देखकर हुआ. उसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी बैठे हुए थे. उनके पीछे की पंक्तियों में मीडिया के लोग, जनपद के गणमान्य नागरिक बैठे हुए थे मगर किसी की तरफ से उन बच्चों के काम करने पर सवाल नहीं किया गया.


उन बच्चों के पानी पिलाने के बाद बाहर निकलने पर उनके पीछे हमने जाकर उनकी जानकारी ली. उन दोनों में बड़ी उम्र की एक लड़की थी. हमारी किसी भी बात का जवाब दिए बिना वह अपने साथ के छोटे लड़के को लेकर उस तरफ चली गई जहाँ नाश्ता, खाना बन रहा था. लगभग दस मिनट बाद एक आदमी हमारे पास आया. उसने जरा गम्भीर सी स्थिति बनाते हुए कारण जानना चाहा उन बच्चों से पढ़ाई के बारे में, उनकी उम्र के बारे में, उनके परिवार के बारे में पूछने को लेकर.


हमने उस व्यक्ति को आश्वस्त किया कि कोई पुलिस जैसा मामला नहीं है, बस हम सामान्य रूप से पूछ रहे थे. जब उस व्यक्ति को लगा कि हम उनका अनिष्ट नहीं करना चाहते हैं तो उसने बताया कि वह उन दोनों बच्चों का मामा है. उन दोनों बच्चों की माँ उसके साथ खाना बनाने का काम करती है. उन बच्चों के पिता का कुछ साल पहले निधन हो गया है. ऐसे में वह अपनी बहिन को अपने साथ इस खाना बनाने वाले काम में लगाये है. इसी के साथ इन बच्चों को काम करने के बदले सौ रुपये देता है. उनकी पढ़ाई के बारे में उसने जानकारी दी कि वे दोनों स्कूल में पढ़ते हैं. रात के समय का खाना होने की दशा में अथवा स्कूल की छुट्टी होने पर उनको भी साथ ले आता है.


अब इसे लेकर वह कितना सही बोला या कितना गलत ये तो वही जाने मगर जब चाय-नाश्ते के समय में उन प्रशासनिक अधिकारियों से, जनप्रतिनिधियों से उन बच्चों के बारे में सवाल किये तो कोई संतुष्टि देने वाला जवाब तो नहीं मिला बल्कि ये सुनने को मिला कि उनकी फोटो कहीं छपवा न देना. सोचा जा सकता है कि जब आँखों देखते हुए हमारे तंत्र की ऐसी स्थिति है तो परदे के पीछे कैसे-कैसे खेल न होते होंगे.


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02 अगस्त 2016

बाल श्रम का स्थायी समाधान नहीं है अधिनियम

तमाम विरोधों के बाद अंततः बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल 2016 सदन में पारित हो ही गया. बाल श्रम से तात्पर्य ऐसे कार्यों से है जिसको करने वाला व्यक्ति कानूनन निर्धारित उम्र से कम होता है. बाल श्रम को वैश्विक स्तर पर नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है. भारत में बालश्रम की समस्या दशकों से है. सरकारें लगातार इसके उन्मूलन हेतु कार्य करती हैं. देश का संविधान भी बाल श्रम उन्मूलन की बात करता है. इसके अनुच्छेद 23 में खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार को प्रतिबंधित किया गया है. भारत सरकार ने बाल श्रम को समाप्त करने हेतु 1986 में बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित किया. इसके अनुसार, खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है. इसके बाद भी एक अनुमान के अनुसार वैश्विक स्तर पर बाल श्रमिकों की संख्या भारत में सर्वाधिक है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में बाल श्रमिकों की संख्या लगभग दो करोड़ और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार लगभग पाँच करोड़ है. इसमें भी लगभग साढ़े चार लाख बाल श्रमिक पांच वर्ष से कम आयुवर्ग के हैं. इन बाल श्रमिकों में लगभग 19 प्रतिशत घरेलू नौकर हैं. वर्ष 1986 में बने बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम में 83 प्रकार के सूचीबद्ध खतरनाक एवं जोखिमयुक्त उद्योगों, व्यवसायों और व्यावसायिक प्रक्रियाओं में चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों का कार्य करना निषिद्ध था. होटलों, ढाबों, ऑटो रिपेयरिंग दुकानों के साथ-साथ घरेलू नौकरों के रूप में बच्चे कार्यरत दिखते हैं. इन कार्यों के अलावा खतरनाक और जोखिमयुक्त माने जाने वाले उद्योगों जैसे बीड़ी बनाना, गलीचा बुनाई, चूड़ी निर्माण, काँच उद्योग, चमड़ा, प्लास्टिक का सामान निर्माण, विस्फोटक आदि में भी कम उम्र के बच्चे लगे हुए हैं.

बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल लाने के पीछे सरकारी तंत्र का तर्क रहा है कि वर्ष 2009 में अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद चौदह वर्ष तक की आयु के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाना अनिवार्य है. ऐसा तभी संभव है जबकि इस आयुवर्ग के बच्चों को कार्य करने से प्रतिबंधित किया जाये. संशोधन के अनुसार यदि कोई बच्चा अपने परिवार को अथवा पारिवारिक रोजगार में मदद कर रहा हो तो उस पर यह कानून लागू नहीं होगा. इसके साथ ही स्कूल के बाद खाली समय में कार्य करने को; छुट्टियों में किसी रोजगार में संलग्न होने को भी कानूनी परिधि से मुक्त रखा गया है. इसमें एक शर्त को जोड़ा गया है कि बच्चा जिस रोजगार में संलिप्त हो वह जोखिम भरा अथवा खतरनाक न हो. इसके साथ-साथ टीवी कार्यक्रमों, फिल्मों, विज्ञापनों आदि में कलाकार के रूप में कार्यरत बच्चों पर भी यह क़ानून लागू नहीं होगा बशर्ते उसके इन कार्यों से उसकी पढ़ाई बाधित न हो. बाल श्रम उन्मूलन के लिए आवाज़ उठाने वालों की माँग रही है कि चौदह वर्ष तक के बच्चों को किसी भी व्यवसाय में कार्य करने से रोका जाये ताकि वे अनिवार्य शिक्षा क़ानून का लाभ उठा सकें. इनका तर्क है कि कमाई के लालच में परिवार वाले बच्चों को विद्यालय न भेजें, भले ही औपचारिकतावश वे बच्चों का पंजीकरण विद्यालयों में करवा दें. संशोधन का एक विरोध इस बात पर भी है कि पूर्व में उपलब्ध कानून में जोखिमयुक्त, खतरनाक व्यवसायों, उद्योगों के रूप में 83 उद्योगों की व्यापक सूची थी जबकि वर्तमान सरकार ने इन्हें कम करके मात्र तीन उद्योगों यथा खदान, ज्वलनशील पदार्थ और विस्फोटक उद्योग तक सीमित कर दिया है.


सरकार द्वारा भले ही ये तर्क दिया जाये कि वर्तमान संशोधनों को गरीब परिवारों को राहत देने के औजार के रूप में लाया गया है किन्तु यह किसी भी रूप में बच्चों के हितार्थ नहीं है. सरकार को समझना चाहिए कि होटलों, ढाबों, गुमटियों आदि में बड़ी संख्या में बच्चे काम करते दिखते हैं. अब कानून की मदद लेकर इन बच्चों को छद्म रिश्ते में बाँध दिया जायेगा. इसके साथ-साथ पारिवारिक व्यवसाय नितांत अनौपचारिक तरीके से संचालित किये जाते हैं, जहाँ काम के घंटे निर्धारित नहीं होते हैं. ऐसे में यहाँ बच्चों के अधिकारों और हितों की रक्षा कैसे  सुनिश्चित होगी