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25 जून 2026

श्रीराम मंदिर के प्रति आस्था का सवाल

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान और चढ़ावे की चोरी सम्बन्धी जो मामला सामने आया है, उसे लेकर उन श्रद्धालुओं को, उन हिन्दुओं को नैराश्य भाव के रसातल में जाने से ख़ुद को बचाना होगा, जो श्रीराम के प्रति, जन्मभूमि मंदिर के प्रति गहरी आस्था रखते हैं. गम्भीरता से विचार करियेगा, कालखण्ड, परिस्थिति के बदलते ही मौकापरस्त लोग, स्वार्थी लोग तत्काल बदल जाते हैं. ऐसे में उनका बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जिनके हाथों में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था सौंपी गई. निश्चित ही उन सभी लोगों के लिए ये मामला कष्टप्रद है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष किया था, कष्ट सहे थे, अपना सर्वस्व न्योछावर किया था लेकिन उनको धैर्य नहीं छोड़ना है, संयम नहीं खोना है, आस्था से विलग नहीं होना है.

 

ये समय, ये मामला भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन जैसा प्रतीत हो रहा है. लाखों नौजवानों ने निस्वार्थ भाव से आज़ादी के लिए संघर्ष किया; हजारों परिवारों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया; जान की परवाह किए बिना असंख्य लोग मौत को गले लगा गए और हमें आज़ादी दे गए. इसके बाद हुआ क्या? कुछ विशेष लोग सत्ता पर बैठे; कुछ ख़ास लोगों के हाथ में अधिकार आए; कुछ लोगों को ताक़त मिली और फिर शुरू हुआ भ्रष्टाचार का खेल. आज़ादी के बाद मिली सत्ता ऐसे लोगों के लिए राजशाही का माध्यम बनी; धन-वैभव संकलित करने का साधन बनी; पीढ़ियों के लिए लाभ की विषय-वस्तु बनी. इन लोगों ने युवाओं के संघर्ष को भुला दिया; अंग्रेजों से लड़ने वालों को विस्मृत कर दिया. ऐसा ही कुछ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मामले में हो रहा है.

 

ध्यान रखो, भले लोगों ने राजनीति से दूरी बनाई तो अपराधी, बाहुबली इसमें घुसकर सरकार चलाने लगे. ऐसे ही यदि निस्वार्थ आस्थवान लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से दूर हुए तो यहाँ भी भ्रष्टाचारी, म्लेच्छ सोच के लोग स्थापित हो जाएँगे. जैसे आज देश की हालत के लिए रोना रोया जाता है, कल को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए रोया जाएगा.


18 फ़रवरी 2026

धार्मिक विरासत का विकास मॉडल - अयोध्या

जय श्रीराम और रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे नारों के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विरोधी श्रीराम मंदिर निर्माण को सवालों के घेरे में खड़ा करते थे. उनका मानना था कि मंदिर निर्माण से आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं होने वाला. विरोधियों द्वारा मंदिर के स्थान पर चिकित्सालय बनवाए जाने के, विद्यालय बनवाए जाने के सुझाव दिए जाते. न्यायिक प्रक्रिया पश्चात् श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला और मंदिर निर्माण होने के साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हुई. अब जबकि अयोध्या में श्रीराम मंदिर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, अयोध्या में बढ़ते पर्यटकों की संख्या अपनी ही अलग कहानी कह रही है तब भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ से श्रीराम मंदिर अर्थव्यवस्था मॉडल को अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई है. संस्थान की एक अध्ययन रिपोर्ट ने श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् अयोध्या में आई व्यापक आर्थिक सक्रियता, निवेश प्रवाह और रोजगार सृजन पर प्रकाश डाला है. अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल आया है.

 



आईआईएम लखनऊ ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में मंदिर निर्माण से पहले और उसके बाद की आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थान के रूप में ही बनी हुई थी. मंदिर निर्माण के पहले यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों की वार्षिक संख्या लगभग 1.7 लाख के आसपास थी. अयोध्या के स्थानीय बाजारों का सञ्चालन भी बहुत छोटे स्तर पर होता था, जिसके चलते यहाँ की आर्थिक गतिविधियाँ भी संकुचित थीं. मंदिर निर्माण के बाद यहाँ लगभग छह हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) स्थापित हुए. अयोध्या के स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की माँग में उछाल से कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है. छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये तक पहुँच गई. यहाँ की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने पिछले वर्ष लगभग 400 करोड़ रुपये का जीएसटी योगदान दिया है.

 

किसी भी स्थान के पर्यटन को लेकर वहाँ की यातायात व्यवस्था, रुकने के स्थानों आदि का गुणवत्तापूर्ण होना बहुत अधिक महत्त्व रखता है. मंदिर निर्माण से पूर्व राष्ट्रीय स्तर के होटलों से सम्बंधित व्यावसायियों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. यातायात की सुविधाएँ भी सीमित रूप में देखने को मिलती थीं. मंदिर निर्माण पश्चात् आधुनिक रेलवे स्टेशन, चौड़ी सड़कों, नदी तट सौंदर्यीकरण और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीन स्वरूप प्रदान किया है. इन परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीनतम स्वरूप प्रदान करने के साथ-साथ निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करके स्थानीय युवाओं को काम के अवसर भी प्रदान किये. श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में सेवा-भाव, आतिथ्य सत्कार, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है. इससे यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से पर्यटन आधारित राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है. अध्ययन के अनुसार अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन के परिणामस्वरूप 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे अस्तित्व में आये हैं. यहाँ पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित होटल व्यावसायियों ने अयोध्या में अपनी योजनाओं को विस्तारित किया है. अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगले चार-पाँच वर्षों में पर्यटन, परिवहन, होटल, खान-पान और आतिथ्य क्षेत्रों में लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन सम्भव है.

 

इसी के साथ महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा संचालन से देश के विभिन्न महानगरों से सीधी हवाई सम्पर्क स्थापित होने से भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई. आईआईएम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् पहले छह महीनों में 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन अयोध्या में हुआ. इस स्थिति के चलते अयोध्या के स्थानीय बाजार, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार देखने को मिला. ऐसी सम्भावना दर्शायी गई है कि अब अयोध्या में वार्षिक स्तर पर 5 से 6 करोड़ लोगों का आना हो सकता है. पर्यटकों, आगंतुकों की अनुमानित संख्या अयोध्या को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्रों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा करती है. वर्तमान में अयोध्या में लगभग 85000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं. इनका प्रभाव केवल आधारभूत ढाँचे तक ही नहीं बल्कि निवेश और सेवा क्षेत्र तक विस्तीर्ण है. सतत शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जा रहा है. अयोध्या को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं.

 

प्रवासी भारतीयों, देशी-विदेशी शोधकर्ताओं, वैश्विक श्रद्धालुओं का अयोध्या के प्रति आकर्षित होना सिद्ध करता है कि अयोध्या ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में नई पहचान प्राप्त की है. अध्ययन के अनुसार धार्मिक विरासत आधारित विकास मॉडल यदि सुव्यवस्थित निवेश, प्रशासनिक समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ लागू किया जाए तो वह स्थानीय अर्थव्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन कर सकता है. अयोध्या का अनुभव दर्शाता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के योजनाबद्ध क्रियान्वयन से पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश से बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार निर्मित किया जा सकता है. यहाँ की आधारभूत संरचना, पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक बदलाव देखने को मिला है जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में शामिल कर दिया है.

 

 


25 नवंबर 2025

गर्व हुआ स्थापित है

 


ज़ख़्म बहुत लगे हैं लेकिन दिल को अब ये राहत है,
संस्कृति, मर्यादा, सम्मान का गर्व हुआ स्थापित है.

30 दिसंबर 2024

रामलला हम आ गए हैं, मंदिर वहीं बना गए हैं

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद से ही मन में अभिलाषा थी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर जाने की, रामलला के दर्शन करने की. इसके पीछे किसी तरह के भक्तिभाव से ज्यादा अपनी संस्कृति, अपने संस्कारों, राष्ट्रीय भाव-बोध के संवाहक के दर्शन करने का भाव था. भीड़-भाड़ के दौरान उत्पन्न होने वाली अनेकानेक दिक्कतों से बचने के लिए ही प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन अयोध्या जाने का कार्यक्रम नहीं बनाया था. बहरहाल, लगभग एक वर्ष की समयावधि में ही रामलला के दर्शन करने का अवसर स्वतः ही सामने आ गया. छोटे भाइयों की व्यापारिक-व्यावसायिक मीटिंग का केन्द्र अयोध्या होने पर उनके द्वारा साथ चलने का स्नेहिल प्रस्ताव सामने रखा गया, जिसे बिना एक पल की देरी किये हमने लपक लिया. वर्ष 2024 के निपट अंतिम दिनों में बिना किसी पूर्व-योजना के अयोध्या धाम पहुँचना हो गया.

 





29 दिसम्बर की शाम को अयोध्या धाम में प्रवेश करने के बाद छोटे भाई तो अपनी व्यावसायिक मीटिंग के लिए निकल गए, हम चल दिए रामलला के दर्शन की इच्छा लिए, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर देखने की इच्छा में. समय का तारतम्य कुछ ऐसा रहा कि रामलला के दर्शन तो आज नहीं हो सके मगर वहाँ से सम्बंधित तमाम सारी जानकारियाँ एकत्र कर ली गईं, ताकि अगली सुबह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यहाँ आने पर किसी तरह की दिक्कत न हो. रात को नौ बजे के बाद भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु, दर्शनार्थी मंदिर परिसर में नजर आ रहे थे. अगले दिन सुबह-सुबह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्रांगण में रामलला के दर्शन हेतु पहुँचना हो गया. आरम्भिक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद हम लोगों के कदम आगे की तरफ चल पड़े.

 

श्रीराम जन्मभूमि प्रांगण में आने के बाद कदम-कदम पर न चाहते हुए भी आँखें सजल हो उठतीं. हर कदम पर याद आता वो दौर जब कारसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी. कैसे तुष्टिकरण की राजनीति ने अनेकानेक कारसेवकों को मौत की नींद सुला दिया था. मंदिर की तरफ़ बढ़ता हर कदम याद दिलाता कि किस तरह के कष्ट-अपमान सहने के बाद ये गर्व का क्षण देखने को मिला है. श्रीराम मंदिर विरोधी बात-बात पर बाबरी ढाँचे के ध्वंस को महज राजनीति बताते और कटाक्ष करते. ऐसे ही दौर में जबकि रामलला को एक टेंट की छाया उपलब्ध कराई जा रही थी, श्रीराम मंदिर के, रामलला के दर्शन हेतु अयोध्या जाना हुआ था. तत्कालीन प्रदेश सरकार की व्यवस्था इस तरह से थी जैसे रामलला के दर्शन के स्थान पर कोई अपराध करने आ गए हों. सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिसकर्मियों का व्यवहार, उनकी बातचीत, भाषा-शैली को कोई भी सामान्य व्यक्ति सुनना पसंद नहीं करेगा. उनके अन्दर ऐसा भाव था ही नहीं कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति, रामलला के दर्शन करने को आया श्रद्धालु किसी भी तरह की सामान्य जानकारी ही माँग रहा है, न कि किसी तरह का अपराध कर रहा है.

 





सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिस कर्मियों की अतिवादिता, अहंकार, अभद्र कार्य-शैली के चलते किसी दिन उस तंग गली के भीतर से टेंट में विराजमान रामलला के दर्शन हेतु पहुँचने को नकार दिया था. उन पुलिस कर्मियों के कथित अहंकार के ऊपर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का गर्वीला भाव प्रचंड रूप में हावी था. उनके व्यवहार, भाषा-शैली के बाद वहीं तुरंत ही उनके अधिकारियों के समक्ष एक जिद को पकड़ लिया. उनसे स्पष्ट भाषा में कहा कि अब उसी दिन रामलला के दर्शन करने आयेंगे जबकि हम हैलीकॉप्टर से उतरेंगे और आप लोग हमारी सुरक्षा व्यवस्था में होंगे या फिर उस दिन आयेंगे जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बन जायेगा. उस दिन अपनी जिद में रामलला के दर्शन किये बिना वापस लौट आए थे मगर मन में एक विश्वास था कि किसी न किसी दिन हम मंदिर के भीतर पहुँचकर रामलला के दर्शन करेंगे. उन तंग, सँकरी गलियों के स्थान पर चौड़ी, चमचमाती सड़कें हजारों-हजार श्रद्धालुओं को सहज भाव से आगे चलते रहने का स्थान उपलब्ध करवा रही थीं. किसी दिन पूरे अहंकारी भाव में तैनात खाकी सेना अब पूरे आदर-भाव के साथ एक-एक जानकारी देने को तत्पर थी. बात-बात पर सर-सर की अनुगूँज, हँसते-मुस्कुराते हुए हजारों की भीड़ को आगे का रास्ता बनाती सुरक्षा व्यवस्था से लग रहा था कि आज हिन्दू वास्तविक रूप में अपनी संस्कृति के प्रांगण में है.

 

उस सुसज्जित, भव्य प्रांगण में खड़े होकर स्मरण हो आया वो दौर जब छात्र-जीवन में कंठ से स्वर गूँजता था

रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे”

बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का”


उस समय में जबकि रामलला के दर्शन करने के बाद सुरक्षा व्यवस्था की औपचारिता से बाहर निकले तो खुद को उसी प्रांगण के साथ समाविष्ट करने का भाव जागा. मोबाइल, कैमरे के द्वारा पावन परिसर को सदैव के लिए सुरक्षित कर लेने का भाव जागा. ऐसी स्थिति में भाव-व्हिवल मन-संवेदन, आँखों की नमी और कैमरे में सामंजस्य बिठाना कठिन हो रहा था. दोनों का समन्वय न बन पाने से ज़्यादा मुश्किल हो रहा था ख़ुद का उस पावन भूमि के साथ तादाम्य स्थापित कर पाना. बहरहाल, “तारीख़ नहीं बतायेंगे” जैसी कटुक्ति सुनने के दौर को सहने के बाद अब स्वतः ही “रामलला हम आ गए हैं, मंदिर वहीं बना गए हैं” की गर्वोक्ति निकलनी स्वाभाविक थी और हजारों की भीड़ के बीच स्वतः प्रस्फुटित हुई भी.

 

जय श्रीराम

 


07 जून 2024

राक्षस अभी जिंदा हैं

हम लोग 1990-92 में विद्यार्थी हुआ करते थे. बाद के कालखण्ड में लोग मौज लेते थे कि रामलला हम आयेंगे, तारीख नहीं बताएँगे.... उस समय मन के किसी कोने में खुद से संशय करते थे कि क्या वाकई राममंदिर नहीं बन सकेगा?


कालांतर में मोदी जी के आने के बाद लगा कि राममंदिर बन जायेगा, बना भी. अपने आपमें गर्व की अनुभूति हुई. लगा कि उन राक्षसों को मुँहतोड़ जवाब मिला है जो राममंदिर निर्माण के विरुद्ध थे, जिन्होंने निहत्थे कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई हैं.


अब इस चुनाव परिणाम के बाद समझ आ रहा है कि राक्षसों का अस्तित्व अभी जिंदा है. श्रीराम का मंदिर बना है मगर उनकी वनवास से वापसी नहीं हुई है. कारसेवकों के हत्यारे फिर जीवन पा गए.


इस कष्ट को वही समझ सकते हैं जिन्होंने बाबरी ध्वंस के समय के कष्ट को सहा है. बाकियों के लिए ये राजनीति की गणित मात्र है.

22 जनवरी 2024

समग्र विश्व का राममय होना कल्याणकारी संकेत

पञ्च तत्वों- पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश का समन्वित स्वरूप ही सृष्टि है. इस सृष्टि के गोचर-अगोचर, दृश्य-अदृश्य, चर-अचर आदि विविध रूपों के द्वारा इसका सञ्चालन निर्बाध गति से होता रहता है. इन्हीं पञ्च तत्वों की अलौकिकता ने रामलला की जन्मभूमि पर अपना उत्कर्ष प्राप्त किया. देश की सांस्कृतिक चेतना और मर्यादा की शुचिता के मानक रूप रामलला अपनी जन्मभूमि पर, अपने प्रासाद में पूर्ण वैभव, पूर्ण दिव्यता के साथ विराजमान हुए. पृथ्वी की भांति क्षमा, अग्नि की भांति प्रकाशमान, जल की भांति शीतल, वायु के जैसे सुगंधि प्रवाह और आकाश की भांति सकल स्वरूप में विस्तारित श्रीराम को किसी अवतार से अधिक आस्था, श्रद्धा, भक्ति का केन्द्र स्वीकारा गया. अपने इन्हीं समन्वित और अलौकिक गुणों के कारण ध्वंस किये गए मंदिर से लेकर अपने अस्तित्व पर प्रश्न उठाये जाने के तक भी रामलला टेंट की छाया से समग्र सृष्टि को संचालित करते रहे.

 



भारतवर्ष की सनातन संस्कृति और परम्परा के पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का प्राण-प्रतिष्ठा के साथ अपनी जन्मभूमि में आना मात्र एक संघटना नहीं है. देशकाल, परिस्थितियों के साथ उद्घाटित होते रहने वाली ध्वंस-निर्माण की, पुनर्स्थापन की प्रक्रिया जनमानस को उद्द्वेलित करती रही. संस्कृति, धर्म, आस्था के परमपूज्य रूप में श्रीराम की जन्मभूमि के लिए कंठ-कंठ से निकले प्रण ने, संकल्प ने सोयी हुई चेतना को जगाने का कार्य किया. वर्षों-वर्षों से अपनी ही धरती, अपनी भी संस्कृति में अपनी सांस्कृतिक विरासत को पददलित होते देख, उसके प्रति नकारात्मकता देख बहुत बड़े हिन्दू समाज ने बारम्बार अपने को अपमानित महसूस किया. काल की अविरल गति के परिणामस्वरूप विधि का ऐसा विधान निर्मित हुआ कि हिन्दुओं की वर्षों से चली आ रही साध पूरी हुई. श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला के भव्य-दिव्य मंदिर की संकल्पना साकार होने तक युवाओं ने, वृद्धों ने, साधू-संतों ने बलिदान ही बलिदान दिए हैं.

 

सम्पूर्ण विश्व में यह अपनी तरह का प्रथम उदाहरण कहा जायेगा जहाँ जेहादी और बर्बर आक्रान्ताओं के चंगुल से किसी समाज ने अपनी धार्मिक भूमि को, अपनी आस्था के केन्द्र को मुक्त करवाया है. ऐसे में श्रीराम मंदिर का निर्माण मात्र मंदिर का निर्माण नहीं है बल्कि सकल विश्व के लिए एक सन्देश भी है. मंदिर का निर्माण सन्देश है समानांतर रूप से विश्व की उन सभी जेहादी और बर्बर ताकतों को, जो किसी अन्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते; जो विलग पहचान और संस्कृति को कुचलने के लिए निम्न से निम्नतर स्तर तक जाने को ही वीरता समझते हैं; जो सोचते हैं कि खून से रंगी हुई तलवार के बल पर न्याय को मिटाया जा सकता है. श्रीराम मंदिर का निर्माण, श्रीराम की प्राण-प्रतिष्ठा सन्देश है उनके लिए भी जो नफरत का वातावरण निर्मित कर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं; जो उन्माद और हिंसा के द्वारा अपनी वैचारिकी की सत्ता का सञ्चालन चाहते हैं. श्रीराम मंदिर निर्माण के प्रत्येक चरण में रामभक्तों में उन्माद भले ही परिलक्षित हुआ हो मगर उसमें कट्टरता समाहित नहीं थी. सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनायेंगे के द्वारा उनका प्रण दृष्टिगोचर हुआ मगर उसके द्वारा हिंसा का परिचालन नहीं हुआ. रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे के नारे से जनसमुदाय के संकल्प का प्रकटीकरण हुआ मगर उसने किसी और की आस्था-श्रद्धा पर चोट नहीं की.

 

इसी आस्था का, विश्वास का, सहिष्णुता का, उदारता का सुखद परिणाम रहा कि अकेले अयोध्या या उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रीराम के प्रति जनसमुदाय को भाव-व्हिवल होते देखा गया. हिन्दू समाज के इन्हीं अलौकिक गुणों के कारण अकेले भारतवर्ष ने ही नहीं वरन विश्व के बहुसंख्यक देशों ने श्रीराम को आराध्य मानते हुए राममय वातावरण निर्मित किया. श्रीराम मंदिर के शिलान्यास से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा के सुअवसर तक सम्पूर्ण देश ने अपनी सहभागिता की. किसी राज्य की पावन मिट्टी ने नींव में मिलकर शक्ति का स्वरूप निर्मित किया. सुदूर क्षेत्रों की नदियों के जल ने जन्मभूमि को पवित्र करने का महती कार्य किया. जाति-धर्म के बंधनों से मुक्ति प्राप्त करते हुए अनेकानेक नागरिकों ने अपने-अपने स्तर से अपना अभीष्ट देने का प्रयास किया. किसी ने पताका प्रेषित करके धर्म-ध्वजा फहराने में अपना योगदान दिया तो किसी ने धूप-समिधा के द्वारा वातावरण को सुगन्धित किया. कहीं से पुष्पों ने आकर रामलला का श्रृंगार करने का मनोरथ पाया तो कहीं से भक्त मंडली ने आकर भक्ति के सागर को लहराया. उत्तर से दक्षिण तक, हिमालय से कन्याकुमारी तक सर्वत्र राम ही राम दृश्यमान रहे. जन-जन भक्तिभाव में लीन रहकर अपनी सामाजिकता में, अपने कर्तव्यों में मगन रहा. इससे पहले समग्र में राममय वातावरण नहीं देखा गया, न ही महसूस किया गया.

 

मंदिर शब्द का उच्चारण निश्चित ही एक ऐसे दृश्य को उकेरता है जहाँ धार्मिक कृत्य परिलक्षित हो रहे हैं, धार्मिकता का आवरण है, अनुष्ठान आदि विधि-विधान से सम्पन्न हो रहे हैं. इस शब्द के साथ ही स्थापत्य कला का, मूर्ति कला का, ऐतिहासिकता का दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक है. भारतीय सनातन संस्कृति में सदैव से मंदिरों को लेकर एक श्रद्धा-भाव, आस्था, विश्वास आदि का समन्वित स्वरूप समाज के विभिन्न वर्गों में उनके मतानुसार अपने पूर्ण बिम्ब-विधान के साथ आरोपित होता रहा है. इन सभी रंगों को अपने में समाहित करने के साथ-साथ गौरव, संस्कृति, प्रतिष्ठा, सम्मान, वैभव, स्वाभिमान का भी आरोपण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में परिलक्षित है. भारतीय सनातन संस्कृति का, जनमानस का, समग्र विश्व का राममय होना निश्चित ही कल्याणकारी संकेत है. जिस प्रकार श्रीराम ने अपने वनवासकाल में असुरों का सर्वनाश करते हुए उत्तर से दक्षिण तक सनातन संस्कृति की स्थापना की थी, धर्म-ध्वजा को फहराने का पुनीत कार्य किया था, उसी प्रकार से राममय वातावरण सनातन संस्कृति की प्रतिस्थापना को संकल्पित दिख रहा है. जय श्रीराम! 





 

20 जनवरी 2024

सांस्कृतिक वैभव की प्रतिष्ठा

श्रीराम के साथ मीडिया, सोशल मीडिया पूरी तरह से एकाकार हो चुका है. प्रत्येक प्राणी, एक-एक मंच राममय दिख रहे हैं. जो रामभक्त हैं वे उनका जयगान कर रहे हैं, जो इसके विरोधी हैं वे भी रामनाम जप रहे हैं. रामनाम की पावनता, उसकी दिव्यता, भव्यता आज सम्पूर्ण विश्व में प्रकीर्णित हो रही है. जन्मभूमि स्थल पर ही श्रीराममंदिर का निर्माण निश्चित ही गौरवान्वित करने वाला है.




22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा, घर-घर दीपोत्सव के सम्मोहन में जन-जन सम्मोहित है, आह्लादित है. अभिभूत होते इस गौरवशाली क्षण में आँखें बार-बार नम होती हैं. इसका कारण एक तरफ़ जहाँ अपने सांस्कृतिक वैभव को प्रतिष्ठित होते देखना है वहीं दूसरी तरफ़ नब्बे के दौर में इस प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से ओत-प्रोत नागरिकों का संघर्ष भी देखा है.


संघर्ष से वैभव की इस कठोर यात्रा में चटकती धूप के बाद मिली शीतल छाँव निश्चित ही उन सभी बलिदानियों की आत्मा को शांति पहुँचा रही होगी, जो इस जन्मभूमि के लिए नींव का पत्थर बन श्रीराममंदिर की विशालता को धारण कर चुके हैं.

उन सभी को बारम्बार नमन. जय श्रीराम.




 

06 दिसंबर 2022

अध्यापन के सत्रह साल

06 दिसम्बर को कोई भारतीय कभी नहीं भूल सकता है. यह वो तारीख है जिस दिन भारतीय सांस्कृतिक पहचान पर जबरिया थोपे गए निशान को हटाया गया था. यह तिथि इसलिए भी महत्त्वपूर्ण मानी जानी चाहिए क्योंकि भले ही न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह सिद्ध हो जाता कि अमुक स्थान पर भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है मगर शायद कोई भी न्यायालय उस पर बने निर्माण को गिराने की अनुमति नहीं देता, वो भी तब जबकि वह किसी मजहब विशेष से सम्बंधित हो. ऐसे में सबूतों के आने के पहले उस विवादित ढाँचे के गिर जाने ने रामलला के जन्मस्थान को पुनर्स्थापित का अवसर सुलभ करवाया.


यह तिथि और भी कारणों से अन्य लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है. हमारे लिए भी यह तिथि इसलिए भी स्मरणीय है क्योंकि इसी दिन हमने उस क्षेत्र में लगभग स्थायी रूप से कदम रख दिया था, जिस क्षेत्र में कभी भी जाने का सोचा नहीं था. प्रत्येक बच्चा अपने बचपन से लेकर कैरियर बनाने तक किसी न किसी रूप में अपने आपको स्थापित करता रहता है. कभी वह डॉक्टर को देखकर डॉक्टर बनने का सपना पाल लेता है, कभी पुलिस वाले को देखकर पुलिस सेवा में जाने का मन बना लेता है. कभी वह अध्यापक बनना पसंद करता है तो कभी उसके सपने में कोई व्यापारी आने लगता है. हमारे साथ भी ऐसा बहुत कुछ हुआ मगर कभी भी न ख्वाब में, ना वास्तविकता में यह आया कि अध्यापक बनना है. ऐसा क्यों हुआ, इस बारे में कोई स्पष्ट स्मृति नहीं है.




समय का खेल देखिये, जिस क्षेत्र में नहीं आना चाहते थे, उस क्षेत्र में आज की तारीख में आने को मिला. एक तरफ इस तारीख में संस्कृति पर कब्ज़ा करने वाला निशान ध्वस्त हुआ था और एक हम इसी तिथि में उस पहचान को अपने ऊपर स्थापित करने वाले थे जिसे हम पसंद नहीं करते थे. इसी को समय, भाग्य, तकदीर आदि कह सकते हैं कि जिस क्षेत्र को, जिस काम को पसंद नहीं करते रहे, आज उसी में आधिकारिक रूप से काम करते हुए पूरे सत्रह वर्ष बीत गए. इन सत्रह वर्षों में इस क्षेत्र में स्वयं के द्वारा की गई बहुत सारी उठापटक को किया भी, देखा भी मगर इस क्षेत्र से पीछा नहीं छूटा. अब जबकि इस पहचान पर स्थायी होने का ठप्पा लग गया है तब इससे पीछा छुड़ाना और भी कठिन हो गया है. यह सोच कर कि बहुत बार काम अपने लिए नहीं बल्कि अपने लोगों के लिए किये जाते हैं, बस उसी सोच के साथ यहाँ काम हो रहा है. देखा जाये तो यह सही भी है क्योंकि इसके द्वारा बहुत से ऐसे काम जो हमसे संभव नहीं थे, वे यहाँ से हो जाते हैं.


लोगों की सहायता के लिए शायद समय ने हमें इस क्षेत्र में बनाये रखा है, यही सोचकर अठारहवें साल में प्रवेश कर लिया है. यह समयावधि कहाँ तक ले जाएगी, यह देखने का विषय है. 





 

06 दिसंबर 2021

अध्यापन कार्य और ऐतिहासिक तिथियों का जुड़ना

आज छह दिसम्बर है, किसी के लिए शौर्य दिवस किसी के लिए काला दिवस. इस दिन को यदि बाबरी ढाँचा विध्वंस से जोड़कर देखा जाये तो और भी तमाम सारे अर्थ सामने आ सकते हैं. इस दिन का बाबरी ढाँचा ध्वंस से जोड़कर देखने से हमारा भी सन्दर्भ बना हुआ है. किसी समय कॉलेज टाइम में की गई गतिविधियों, रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे के घोष के बीच यह दिन बहुत कुछ याद दिला जाता है. इधर एक बात और बताते चलें कि अदालत का फैसला राममंदिर निर्माण के पक्ष में आने के बाद से सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर इस दिन हमारी स्वीकार्यता बनी रही अन्यथा की स्थिति में पहले इस दिन किसी भी रूप में राममंदिर निर्माण की, बाबरी ढाँचा ध्वंस की पोस्ट डालते ही हम पर प्रतिबन्ध लगा दिए जाते थे. कहीं दो दिन पोस्ट न कर पाने का प्रतिबन्ध, कहीं कोई फोटो न लगा पाने का प्रतिबन्ध, कहीं एकाउंट ही लॉग इन न कर पाने का प्रतिबन्ध.


बहरहाल, हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से छह दिसम्बर का दिन यदि राममंदिर निर्माण से जुड़ा होने के कारण गर्व का एहसास कराता है वहीं हमारी आजीविका से जुड़ा होने के कारण भी एक अलग तरह की अनुभूति देता है. वर्ष 2005 की कुछ अत्यंत दुखद घटनाओं के बाद उस साल का समापन एक सुखद घटना से हुआ था. वह सुखद घटना थी हमारा मानदेय प्रवक्ता के रूप में चयनित होने को लेकर. मानदेय प्रवक्ता पर चयन होने के बाद छह दिसम्बर को ही हमने गांधी महाविद्यालय, उरई में हिन्दी विभाग में कार्य करना शुरू किया था. आज जब कैलेण्डर देखते हैं तो सोलह वर्ष की बाली उमरिया बीती हुई दिखाई देती है.


सोलह साल के लम्बे कार्यानुभव में बहुत सी खट्टी-मीठीं बातें हमारे अनुभव के पिटारे में बंद हैं. वे बातें हँसाती कम, रुलाती ज्यादा हैं. फिलहाल तो मानदेय प्रवक्ता से बाहर निकल कर अब विनियमित हो गए हैं. विनियमितीकरण के बाद फिर से एक नए सिरे से महाविद्यालय ने नियुक्ति पत्र दिया, नए रूप में नियुक्ति की गई. इस बार भी तिथि ऐतिहासिक ही रही. अबकी 08 मार्च को स्थायी शिक्षक के रूप में सहायक प्राध्यापक पद पर कार्यभार ग्रहण किया. अब स्थायी शिक्षकों के रूप में महाविद्यालय ने, विश्वविद्यालय ने, सरकार से स्वीकार कर लिया है. इसके बाद भी संघर्ष बहुत से मोर्चों पर अभी ज़ारी है. संघर्ष भरे जीवन में एक संघर्ष इस अध्यापन क्षेत्र का भी.


05 अगस्त 2020

वर्षों की तपस्या का सुफल प्राप्त हुआ

आज, 05 अगस्त 2020, एक ऐतिहासिक तिथि. एक ऐसी तिथि जिस दिन वर्षों पुराना सपना सच हुआ. यह सपना एक हमारी आँखों ने नहीं बल्कि करोड़ों-करोड़ों आँखों ने देखा था. अनेक जाने-अनजाने लोगों ने अपनी ज़िन्दगी खपा दी, अपने प्राण गँवा दिए. जी हाँ, श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ऐसा ही सपना रहा है. आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शिला पूजन किया गया. अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया का शुभारम्भ हुआ. 






हर्षोल्लास, गर्व के इस क्षण को दीपोत्सव के साथ मनाया गया, अनुभूत किया गया. आज बस इतना ही. 












जय श्री राम

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

21 जुलाई 2020

रामलला हम आ रहे, अबकी मंदिर ही बना रहे

इधर लगातार खबरें आ रही हैं कि पाँच अगस्त को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की आधारशिला रखी जानी है. इस खबर में कितनी सत्यता है, कितनी नहीं ये तो खबर प्रसारित करने वाले जानें मगर दिल को बहुत शांति मिली इस खबर के बाद. पिछले कई दशकों में अपने ही देश में अपने ही आराध्य को लेकर जिस तरह की जलालत झेलनी पड़ी है, वह असहनीय रही. इस खबर के बाद याद आ रहा है वह दौर जबकि किसी भी व्यक्ति के लिए अपना कैरियर बनाने का समय होता है. उस दौर में हमारे समय के लोगों को एक तरफ आरक्षण सम्बन्धी कानून की मार से जूझना पड़ा साथ में अपने मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा को बचाने के लिए लड़ना पड़ा.



उन दिनों को याद करते हुए आँखों में बार-बार नमी आ जाती है जबकि उन दिनों के अपने मित्रों के, अपने कार्यों को याद करते हैं. ये ईश्वर का आशीर्वाद कहा जायेगा कि हम लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण देखने के लिए जीवित हैं, बहुत से कारसेवक ऐसे हैं जो किसी और के नेत्रों से इस दृश्य को देख रहे होंगे. उन दिनों जैसे जूनून सिर पर हावी था. कारसेवकों की सूची बनानी हो, लोगों को अयोध्या के सम्बन्ध में जागरूक करना हो, श्रीराम जन्मभूमि के बारे में जानकारी देना हो सब ऐसे होता था जैसे ये जीवन के लिए अनिवार्य हो. ऐसा नहीं कि सभी साथी इसी में अपने आपको झोंक दिए हों मगर कुछ साथी ऐसे थे जिनके लिए यही एकमात्र काम था. न भविष्य की चिंता, न कैरियर की चिंता, न नौकरी की चिंता बस दिमाग में एक ही बात रहती कि कैसे भी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का सपना सच करवाना है.

हमारे हॉस्टल के बहुत से साथियों ने अपना सक्रिय योगदान इसमें दिया. बहुत से लोग दिन-रात एक करके इसी में लगे हुए थे. छोटे-छोटे ग्रुप बनकर सपने को सच करवाने के लिए लगे हुए थे. उस समय बस एक सपना सच हुआ कि एक विवादित ढाँचा गिरा. उसके बाद सपनों भरी आँखों ने और अधिक सपने सजा लिए. अबकी उन सपनों में मंदिर का निर्माण था. सपने समय के साथ सच होते हैं, ऐसा सुना था मगर आज देख लिया. तमाम कानूनी दांवपेंच, अवरोध दूर होते रहे और अब खबर आने लगी श्रीराम मंदिर निर्माण की. इन्हीं आँखों ने विवादित ढाँचा गिरते देखा था, यही आँखें श्रीराम मंदिर निर्माण भी देखेंगी.

जय श्रीराम


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09 नवंबर 2019

रामलला हम आयेंगे...


26 वर्ष 11 माह 3 दिन की समयावधि बहुत लम्बी होती है. देश की संस्कृति पर एक काले धब्बे की तरह बना ढाँचा, जो बार-बार दर्शाता था एक विदेशी आक्रान्ता के आने और भारतीय संस्कृति के मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि पर अपने निशान बना जाना. वर्षों तक हिन्दुओं-मुसलमानों में विवाद की स्थिति बनी रही. दुखद यह रहा कि देश में रहने के बाद भी मुस्लिम समुदाय द्वारा देश की संस्कृति के प्रति सद्भाव व्यक्त न किया गया. यह जानते-समझते हुए भी उस विवादित ढांचे को किसी भारतीय ने नहीं वरन एक विदेशी आक्रान्ता ने हिन्दुओं की आस्था-विश्वास के केंद्र को तोड़कर बनवाया था, कभी राम मंदिर के पक्ष में आवाज़ न उठाई गई. राजनैतिक परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि नब्बे के दशक के आरंभिक वर्षों में देश भर में श्री राम जन्मभूमि के प्रति एक तरह की संवेदनात्मक लहर दिखाई देने लगी. परिणाम यह हुआ कि उस जोश ने विवादित ढाँचे को हवा में धूल बनाकर उड़ा दिया. 6 दिसम्बर 1992 के उस दिन के बाद श्री राम जन्मभूमि मामला अदालत में भटकने लगा. लगातार राजनीति का शिकार होकर भी आस्था-विश्वास नहीं डिगा और अंततः लम्बी समयावधि के बाद हिन्दुओं को अपना गौरव पुनः प्राप्त हुआ. आस्था-विश्वास की जीत हुई.

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा जब आज इस निर्णय को सुनाया जा रहा था, तो उसे टीवी पर देखते समय फ़ैजाबाद यात्रा की एक घटना का स्मरण सहज ही हो आया. उस दिन श्री राम जन्मभूमि पहुँच कर, रामलला के द्वार पहुँच कर भी उनके दर्शन न हो सके थे. विचार आया कि हो सकता है कि उन पुलिस अधिकारियों को हमारी बात याद आई हो आज, जब उन्होंने हमारे कृत्रिम पैर के चलते रामलला के दर्शन न करने दिए थे.श्री राम जन्मभूमि के द्वार पर हम अपने एक मित्र के साथ दर्शनार्थ पहुंचे थे. प्रशासनिक औपचारिकताओं से कभी भी विरोध नहीं किया क्योंकि हमारा मानना है कि ये हम लोगों की सुविधा के लिए ही किया जाता है. उस समय की प्रशासनिक औपचारिकताओं के चलते मोबाइल सहित बहुत सारा सामान अन्दर ले जाना प्रतिबंधित सा. सबकुछ स्वीकारने-मानने के बाद भी हम अपनी छड़ी पर तैयार नहीं हो पा रहे थे. वहां तैनात कुछ पुलिसवालों को अपनी तकलीफ के बारे में बताया, अपने न चल पाने को लेकर समझाया मगर वे अपनी सहमति देने को तैयार नहीं हो रहे थे. छड़ी के बजाय अपने मित्र के कंधे का सहारा लेना एक विकल्प हमारी ही तरफ से रखा गया मगर कृत्रिम पैर का कोई विकल्प हम उनके सामने नहीं दे सके. समझ नहीं आ रहा था कि आखिर घुटने के ऊपर से कटे एक पैर के बाद हम चलकर कैसे जा सकेंगे? 

 काफी देर की झिकझिक के बाद एक अन्य अधिकारी ने मन बनाया पर तब तक हमारा मन इतना खिन्न हो चुका था कि सब कुछ रामलला पर ही छोड़ दिया. सम्बंधित अधिकारी ने अपनी औपचारिकता को निभाते हुए हमारे ऊपर स्थिति को छोड़ते हुए अन्दर जाने के लिए अपने उच्चाधिकारियों से बात करने की बात कही. मन में दर्शन करने की इच्छा जैसे अचानक से मर गई थी. जिस ताजगी, उत्साह के साथ वहां तक पहुंचे थे वह ठंडा पड़ चुका था. प्रशासनिक कार्यालय में बैठे हुए ही हमने सम्बंधित अधिकारी को किसी भी उच्चाधिकारी से बात न करने की बात कहते हुए कहा कि "अब हम तभी आयेंगे, जबकि रामलला चाहेंगे. हम या तो उनको भव्य स्वरूप में देखने आयेंगे या तब जबकि हम हैलीकॉप्टर से उतरेंगे और आप लोग ही हमारी अगवानी करोगे." तब एक कटाक्ष हुआ था कि भाईसाहब, राजनीति हो रही इस पर. ये मुद्दा कभी न सुलझेगा. किसी समय युवा जोश में जब इस आन्दोलन से जुड़े थे तब भी विश्वास था, उस दिन जबकि रामलला के द्वार पर खड़े थे और बिना दर्शन के वापस लौटने को तैयार थे तब भी मन में विश्वास था. मन का विश्वास बना रहा और आज विश्वास की जीत हुई. अब न सही हैलीकॉप्टर से पर भव्य स्वरूप निर्माण के बाद अवश्य ही जा सकेंगे.

उस दिन हमारे मित्र डॉ० डी के सिंह भारी मन से अकेले दर्शन करने चले गये, हमारी जिद से. भारी मन से इसलिए क्योंकि वे अकेले दर्शन को जाना नहीं चाह रहे थे. वैसे भी लगभग आधा घंटे चले प्रकरण के बाद मन से उत्साह ख़त्म हो चुका था. बहरहाल, वे दर्शन करके लौट आये. हम अपनी बात पर विश्वास के साथ अडिग रहे. अब निर्णय रामलला के पक्ष में आया है. मंदिर भी अपनी भव्यता के साथ बनेगा. अब हम उनके साथ जायेंगे, हर्ष से, उत्साह से, भव्य स्वरूप में.

10 जनवरी 2019

अदालती पचड़े में फँसा श्रीराम मंदिर मामला


श्रीराम जन्मभूमि मालिकाना हक़ से सम्बंधित मामला विगत कई वर्षों से भारतीय अदालती प्रक्रिया के चक्कर में फँसा हुआ है. किसी भारतीय फिल्म के एक संवाद, तारीख पे तारीख की भेंट चढ़ता हुआ उच्च न्यायालय पर एक निर्णय पर पहुँचा था लेकिन वहाँ भी गंगा-जमुनी तहजीब की कहानी कहने वालों को वह निर्णय हजम नहीं हुआ. उसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय में आ गया. यहाँ भी अदालती संस्कार ज्यों के त्यों देखने को मिले. अभी तक की कार्यवाही में महज इतना तय हो सका था कि उस मामले की सुनवाई कबसे करनी है. सोचने वाली बात है कि अभी यही तय हो पाया है कि सुनवाई की तारीख क्या होगी.


बहरहाल, तारीख पे तारीख गुजरते-गुजरते 10 जनवरी 2019 सर्वोच्च न्यायालय में श्रीराम जन्मभूमि अधिकार का मामला उस जगह आ गया जहाँ सुनवाई होनी थी. यहाँ आने के पहले विगत दिवस के चंद सेकेण्ड बहुत प्रभावी रहे जिनकी कार्यवाही के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया. इस संवैधानिक पीठ का बनाया जाना अदालती गंभीरता का सूचक जान पड़ा था. लग रहा था कि अब सुनवाई टाली न जाएगी वरन किसी दिशा की तरफ जाएगी. अबकी चर्चा के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि बेंच में शामिल जस्टिस यू०यू० ललित 1994 में कल्याण सिंह की ओर से अदालत में पेश हुए थे. इस तरह का मामला उठाने के बाद जस्टिस यू०यू० ललित ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया है. राजीव धवन द्वारा इसके साथ-साथ पीठ के तीन सदस्यीय से पाँच सदस्यीय किये जाने पर भी सवाल उठाया.

आज जिस तरह का प्रकरण उठाकर मामले को फिर लटकाया गया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि न्यायालय इस मामले को सुलझाने के मूड में दिख नहीं रहा है. हालाँकि ऐसे संकेत पहले भी दिए जा चुके थे जबकि न्याय के मंदिर में कहा जा चुका था कि श्रीराम मंदिर निर्माण का प्रकरण उनकी प्राथमिकता में नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि मुस्लिम पक्ष के वकील द्वारा उठाया गया मुद्दा ऐसा नहीं था जिसके लिए सुनवाई की तारीख आगे सरकाई जाती. इस बिंदु पर आकर न केवल तारीख टाली गई है वरन अब संवैधानिक पीठ का पुनर्गठन किया जायेगा. न्यायमूर्ति ललित ने स्वयं को इस पीठ से अलग कर लिया है. ऐसे में आवश्यक नहीं कि अगली तारीख पर सुनवाई हो ही जाये क्योंकि मुस्लिम पक्षकार मामले को लटकाने में जितना महत्त्व दे रहे हैं, उतना ही कांग्रेस की तरफ से भी इसे हवा दी जा रही है. देखा जाये तो जनवरी 2019 तक इस मामले को सरकाने की कांग्रेस से सम्बंधित एक वकील साहब की मंशा तो पूरी हो ही गई है.

यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो श्रीराम का सवाल महज हिन्दुओं की आस्था का सवाल नहीं वरन इस देश की संस्कृति, परम्परा का भी सवाल है. देखा जाये तो वे भारतीयता के प्रतीक हैं, भारतीय संस्कृति के मर्यादा शिखर-पुरुष हैं. विगत काफी समय से न केवल हिन्दू पक्षकारों की तरफ से वरन मुस्लिम समुदाय की तरफ से तथा बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, कलाकारों सहित अन्य क्षेत्रों के व्यक्तित्वों की तरफ से भी बात उठाई जा रही है कि इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा न बनाया जाये. बहुत से नामचीन लोगों द्वारा अपील की जा रही है कि मुस्लिम इसे देश की सांस्कृतिक एकता के लिए श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों. इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष से कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है. विद्रूपता इस बात की है कि आये दिन कोई न कोई इस मामले में अनर्गल बयान देकर मुद्दे को विवादित बनाने की चेष्टा करने लगता है. समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि यह हिन्दुओं की सहनशीलता का परिचायक है कि वे ख़ामोशी से अदालत के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं. इसके बाद भी हिन्दुओं को ही सांप्रदायिक बताया जाने लगता है.

अब अगली तारीख 29 जनवरी निर्धारित की गई है. ऐसे में विचारणीय यह है कि जिस तरह से मुस्लिम पक्षकार वकील की तरफ से न्यायमूर्ति पर महज इसलिए सवाल उठाया गया कि वे किसी समय भाजपा के कल्याण सिंह की तरफ से अदालत में आये थे, क्या न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर उनके पिता का कांग्रेसी मुख्यमंत्री होने के कारण सवाल नहीं उठाया जा सकता? फ़िलहाल अब मामला 29 जनवरी तक सरका दिया गया है, उस दिन का इंतजार है.

06 दिसंबर 2018

सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनभावना

कुछ दिन पहले अयोध्या की गलियों में गूँज रहे जय श्रीराम के नारों में जोश वैसा ही था जैसा कि उस दिन था. उस दिन गूँज रहे नारों में अपने सांस्कृतिक प्रतीकों को मुक्त करवाए जाने का आह्वान किया जा रहा था. इन सबके बाद भी उस दिन उन्माद नहीं था. उस दिन सिर्फ भीड़ नहीं थी. उस दिन आक्रोश नहीं था. ऐसा इसलिए क्योंकि उस दिन किसी तरह की अराजकता नहीं थी. विशाल जनसमूह बिना किसी नियंत्रण के स्वतः नियंत्रित था. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि इतनी बड़ा जनसैलाब स्वतः नियंत्रित बना रहे. इसीलिए उस दिन के जनसमुदाय को भीड़ नहीं माना जा सकता क्योंकि भीड़ तो अनियंत्रित हो जाती है. उस दिन आक्रोश भी नहीं था लोगों के नारों में, उद्घोष में क्योंकि किसी तरह की हिंसा वहां नहीं थी. किसी तरह की हिंसा करने का विचार भी मन में एक पल को नहीं पनपा था. उस दिन जनसमूह था, जोश था, नारे थे और इन सबके साथ थी भक्ति, श्रद्धा, सम्मान. लोगों के दिल में थी सांस्कृतिक भावना. सारा जनसमुदाय अपने मन में अपने आराध्य के प्रति श्रद्धाभाव लिए था.


एकसाथ हजारों-हजार लोगों का एकत्र हो जाना. बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी सञ्चालन के भी सबके सब भगवा ध्वज के निर्देशन में थे. सबके सब स्व-भाव से संचालित चल रहे थे. बरसों-बरस से अपने अन्य आराध्यों के विरुद्ध चल रही साजिश को देखने के बाद का जागरण था उस दिन. बरसों-बरस से एक समुदाय विशेष के प्रति चली आ रही तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ एक आवाज़ थी उस दिन. उस दिन की भीड़ दो वर्ष पहले शहीद हुए भाइयों के सम्मान में भी थी. वही जगह थी, वही गलियाँ थीं, वही रास्ते थे मगर वे कुछ लोग नहीं थे, जो तुष्टिकरण के लिए, एक मजहब विशेष के विश्वास को पूरा करने के लिए चली गोलियों का शिकार हो गए थे. उस दिन एकत्र भीड़ में दो साल पहले की गोलियों के खिलाफ आक्रोश भी था. दो साल पहले उपस्थित जनसमुदाय ने किसी सरकार के खिलाफ हिंसात्मक आन्दोलन न किया था मगर तुष्टिकरण के लिए गोलियों का सहारा लिया गया था. दो साल बाद एकत्र जनसैलाब किसी सरकार के खिलाफ कोई उपद्रव नहीं कर रहा था. उस जनसमुदाय ने किसी हिंसा का सहारा नहीं लिया. उस भक्ति-भाव से भरे जनमानस ने किसी समुदाय विशेष के प्रति हिंसा का भाव नहीं दिखाया. न उस दिन दिखाई दिया था, न तब जबकि कारसेवक गोलियों का शिकार हुए थे. वे सब उन्मुक्त भाव से सनातन काल से चले आ रहे अपने सांस्कृतिक प्रतीक से दासता से मुक्ति चाहते थे. सरकार से बारम्बार अपील थी, सांस्कृतिक प्रतीकों को गुलामी के निशानों से मुक्त किये जाने की. उनके मन में हिंसा नहीं, नफरत नहीं वरन खुद को मुक्त कर लेने का भाव था. अपने आराध्य को दूसरे के प्रतीक चिन्ह से बाहर निकाल लाने का बोध था.


जोश, जनभावना, जयघोष का संगठित स्वरूप उस दिन दिखाई दिया. भगवा ध्वज के केसरिया रंग में सराबोर, जय श्री राम के उद्घोष से धरती-आकाश को एक करते हुए जब धूल का गुबार हटा तो सामने सबकुछ साफ़ था. सांस्कृतिक विरासत पर कब्ज़ा किये बैठी प्रतिच्छाया कहीं दूर-दूर तक नहीं थी. जनसैलाब जिस नियंत्रित रूप से आगे बढ़ा, उसी नियंत्रित रूप से वापस आने लगा. सांस्कृतिक प्रतीकों की मुक्ति का जयघोष अपना असर दिखा चुका था. पावन सरयू नदी की लहरें उन्मुक्तता से वैसी ही हिलोरें मारती नजर आने लगीं. उसने स्वयं में अपना पुराना स्वरूप अपने आसपास निर्मित होते देखा. विध्वंस पश्चात् सनातन मानक पर निर्मित ढाँचा अपने आसपास न देखकर पावन किनारों ने अपने क्रीड़ास्थल को पुनः-पुनः उसी सनातनकालीन स्थिति में महसूस किया. जनसमुदाय के आराध्य, पावन नदी में कभी किल्लोल करने वाले उसके बाल राम, कभी अयोध्या की गलियों, मैदानों में विचरण करने वाले उसके किशोर राम, वनवास के बाद नगरवासियों के ह्रदय में स्थापित उसके राजा राम स्वतंत्र आकाश में अपनी सत्ता का विस्तार पा चुके थे. राजनैतिक दंभ पाले लोग और तुष्टिकरण करते लोगों के लिए भले ही राम लला खुले आसमान के नीचे टेंट में विराजमान हो गए हों मगर अब वे किसी गुलामी के प्रतीक की तालाबंदी में नहीं थे. गुलामी के, विध्वंस के, विवाद के ढाँचे से बाहर निकल वे अब अपने देश के, अपने भक्तों के, अपने मन के प्रतीक में विराजित थे. जो राम जन-जन को सहारा देते हों, रोटी, कपड़ा, मकान का प्रबंध करते हों वे स्वतः ही किसी दिन जनमानस को जागृत करेंगे और पुनः श्रद्धाभाव लिए एकत्र होने वाला जनसमुदाय सांस्कृतिक प्रतीक के निर्माण में जुट जायेगा. 

04 दिसंबर 2018

धर्म सभा से उपजी जनभावनाओं के सहारे...


याचना नहीं अब रण होगा, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे जोशीले नारों के बीच संपन्न संतों की धर्म सभा से राम जन्मभूमि मुद्दे पर फिर राजनैतिक करवट के आसार दिखाई दिए. विश्व हिन्दू परिषद्, शिवसेना सहित अन्य हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ सहित संतों का जमावड़ा अयोध्या मुद्दे पर राजनैतिक दलों में हलचल पैदा कर गया. धर्म सभा के नाम पर हुए इस कार्यक्रम से एक तरफ राम मंदिर निर्माण के प्रति सकारात्मक भाव दिखाई दिया तो दूसरी तरफ इस आयोजन को विशुद्ध राजनीति बताने वालों की भी कमी नहीं थी. यहाँ स्मरण रखना होगा कि सन 2010 में प्रदेश उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय देते हुए अयोध्या स्थित विवादित भूमि को राम जन्मभूमि घोषित किया था. न्यायालय की पीठ ने बहुमत से निर्णय दिया था कि विवादित भूमि जिसे राम जन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिन्दू गुटों को दे दिया जाए और इस स्थल से रामलला की प्रतिमा को हटाया नहीं जाए. चूँकि इस भूमि के कुछ भाग पर मुसलमान नमाज पढ़ने के कारण एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए. इस निर्णय के पक्ष में हिन्दू-मुस्लिम, दोनों ही नहीं दिखे और निर्णय को अस्वीकार करते हुए दोनों गुट सर्वोच्च न्यायालय चले गए.


सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड के याचिका दायर कर खुद को भी पक्षकार मानने का दावा किया. इस पूरे प्रकरण में भाजपा कहीं नहीं दिखाई देती है. इसके बाद भी सत्य यही है कि अयोध्या मुद्दे का, राम जन्मभूमि विवाद का सर्वाधिक लाभ भाजपा द्वारा उठाया गया. सन 1990 में लालकृष्ण आडवाणी द्वारा की गई कार सेवा को छोड़ दिया जाये तो किसी भी समय भाजपा ने खुलकर अयोध्या मुद्दे पर अपना कदम नहीं उठाया है. भाजपा भली-भांति जानती-समझती है कि 1992 के बाबरी ढाँचे के ध्वंस के बाद और फिर गुजरात में गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया से उपजे दंगों के पश्चात् अधिसंख्यक मुसलमानों ने भाजपा को अपना शत्रु ही समझ लिया है. समाज को हिन्दू, मुस्लिम में बाँटने का आरोप उसके ऊपर लगातार लगाया जाता रहा है. देश भर में कहीं भी संपन्न होने वाले चुनावों के समय उसी को सांप्रदायिक घोषित किया जाने लगता है. इन स्थितियों के बाद भी विगत लोकसभा में बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता प्राप्त कर लेने पर भाजपा स्वयं को बड़े संतुलित रूप में जनमानस में स्थापित करने के विचार में है. ऐसे में राम जन्मभूमि मुद्दे पर उसके द्वारा अत्यंत संयम से काम लिया जा रहा है.

आज़ादी के बाद से ही विवादित रही इस भूमि पर लम्बी चुप्पी के बाद उस समय हलचल आरम्भ हुई जबकि सन 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने विवादित ढांचे का ताला खोलने के अभियान के साथ-साथ राम जन्मभूमि को स्वतंत्र कराने और विशाल मंदिर निर्माण हेतु भी अभियान शुरू किया. इसके लिए उसके द्वारा एक समिति का भी गठन किया गया. इस अभियान की तीव्रता को देखते हुए फरवरी 1986 में फैजाबाद के तत्कालीन जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिन्दुओं को पूजा करने की अनुमति प्रदान की. पूजा करने की अनुमति, ताला खोले जाने की प्रक्रिया से नाराज मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया. इसके बाद सब कुछ शांति से चल रहा था कि सन 1989 इस विषय को आंदोलित करने आ गया. नवंबर में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवादित ढांचे के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी. मंदिर के सम्बन्ध में कांग्रेस सरकार का उक्त कदम मुस्लिमों के साथ-साथ हिन्दू वोटों पर भी सेंधमारी करना थी. उस समय यह एहसास भाजपा को नहीं रहा होगा कि राम जन्मभूमि के नाम पर एकाएक यह मुद्दा उसके हाथ लग जायेगा. सन 1992 में राम जन्मभूमि आन्दोलन के दौरान विवादित ढाँचे को गिराए जाने सम्बन्धी कोई नीति भाजपा की तरफ से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आई थी. दरअसल इस प्रतिक्रिया को जय श्री राम के उद्घोष के साथ जन्मा उत्साह तथा सन 1990 में हुए गोलीबारी में कारसेवकों की मृत्यु से उपजा आक्रोश कहा जा सकता है, जिसे विश्व हिन्दू परिषद् और शिवसेना जैसे संगठनों के नौजवानों ने विवादित ढाँचे को गिराकर समाप्त किया.

सन 1984 के खुले नरसंहार के बाद भी कांग्रेस को उतनी जलालत नहीं झेलनी पड़ी जितनी कि भाजपा आज तक सहती आ रही है. ऐसे में जबकि केंद्र की सत्ता उसके पास है, प्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ उसकी वापसी हुई है, तब वह ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहती है जो उसके सबका साथ, सबका विकास की अवधारणा को कमजोर करे. इसी कारण भाजपा का लगातार प्रयास मुस्लिम मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने का रहा है. उनकी दृष्टि में खुद को उदार, सहयोगी की भूमिका में दिखने का रहा है. धर्म सभा के द्वारा भले ही विश्व हिन्दू परिषद् ने, शिवसेना ने अपनी ताकत का एहसास कराने का प्रयास किया है मगर इस ताकत, इस भीड़ के द्वारा भाजपा निश्चित ही राजनैतिक समीकरण फिट बैठाना चाहेगी. विगत सालों में गैर-भाजपाई दलों ने हिन्दुओं को आकर्षित करने का प्रयास किया है. उनको भी समझ आ रहा है कि एकमात्र मुस्लिम वोटों के द्वारा सत्ता हासिल नहीं की जा सकती है. इसी तरह भाजपा भी इस तथ्य को समझती है कि उसके लिए सत्ता का रास्ता हिन्दू वोटों से ही निकलता है. 

संभव है कि भाजपा का थिंक टैंक इसे समझ रहा हो और वह इसकी भरपाई धार्मिक भावनाओं के द्वारा करना चाहता हो. ऐसे में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा अयोध्या में बुलाई गई धर्म सभा और आगामी माह में संतों की होने वाली धर्म संसद को भाजपा के लिए संजीवनी माना जा सकता है. जनमानस की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए एससी/एसटी एक्ट में संशोधन कर सदन में विधेयक लाने वाली केंद्र सरकार राम मंदिर निर्माण पर भी विधेयक की तैयारी कर सकती है. इसके पीछे भले ही वह अयोध्या में जुटी भीड़ को आधार बनाये क्योंकि इस भीड़ को सिर्फ हिन्दूवादी चेहरा नाम दिया गया. इस भीड़ में कोई जाति, कोई वर्ग अलग से अपना प्रतिनिधित्व करते दिखाई नहीं दे रहा था. विश्व हिन्दू परिषद् अपना काम कर चुकी है, धार्मिक मनोभावना रखने वाली जनता ने अपनी सशक्त और उत्साही उपस्थिति अयोध्या में दिखा दी है अब बाकी बचा हुआ काम केंद्र सरकार के रूप में भाजपा को करना है. लोकसभा चुनावों की आहट सुनाई दे रही है और भाजपा इसके पार्श्व से आती हिन्दू भावनाओं का शोर भी सुन रही होगी. 

29 अक्टूबर 2018

राम मंदिर, केंद्र सरकार और अदालत


अयोध्या फिर राजनीति का शिकार हुआ. राम मंदिर फिर अदालत के कारण एक अलग रंग में रँगा नजर आया. अदालत के एक आदेश के बाद इसकी सुनवाई अगले वर्ष तक के लिए सरक गई. इस आदेश के बाद भले ही केंद्र सरकार को राहत महसूस हुई हो मगर लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं में निराशा की लहर फ़ैल गई होगी. हालाँकि अदालत में आज सुनवाई किसी और मुद्दे के सन्दर्भ में होनी थी मगर आमजन में यही धारणा बना दी गई थी कि अदालत में राम मंदिर निर्माण पर फैसला होने वाला है. यहाँ सोचने-समझने वाली बात ये है कि सर्वोच्च न्यायालय को मंदिर निर्माण पर फैसला नहीं सुनाना है. अदालत का निर्णय मंदिर निर्माण से इतर अयोध्या में जमीन के स्वामित्व पर आना है. उच्चतम न्यायालय को उच्च न्यायालय के निर्णय के सन्दर्भ में अपना निर्णय देना है, जहाँ तय किया जायेगा कि सम्बंधित जमीन पर स्वामित्व किसका और कितना है.



06 दिसंबर 2017

सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनभावना

उस दिन महज उन्माद नहीं था. उस दिन सिर्फ भीड़ नहीं थी. उस दिन आक्रोश नहीं था. यह इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि उन्माद अराजक हो जाता है. भीड़ अनियंत्रित हो जाती है. आक्रोश हिंसात्मक हो जाता है. उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. ऐसा कुछ था भी नहीं. जनसमूह था. जोश था. नारे थे. तो इन सबके साथ थी भक्ति. लोगों के दिल में थी सांस्कृतिक भावना. सारा जनसमुदाय अपने मन में अपने आराध्य के प्रति श्रद्धाभाव लिए था. एकसाथ हजारों-हजार लोगों का एकत्र हो जाना. बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी सञ्चालन के भी सबके सब भगवा ध्वज के निर्देशन में थे. सबके सब स्व-भाव से संचालित चल रहे थे. बरसों-बरस से अपने अन्य आराध्यों के विरुद्ध चल रही साजिश को देखने के बाद का जागरण था उस दिन. बरसों-बरस से एक समुदाय विशेष के प्रति चली आ रही तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ एक आवाज़ थी उस दिन. उस आवाज़ ने किसी सरकार के खिलाफ कोई उपद्रव नहीं किया. उस जनसमुदाय ने किसी हिंसा का सहारा नहीं लिया. उस भक्ति-भाव से भरे जनमानस ने किसी समुदाय विशेष के प्रति हिंसा का भाव नहीं दिखाया. वे सब उन्मुक्त भाव से सनातन काल से चले आ रहे अपने सांस्कृतिक प्रतीक से दासता का निशान मिटाना चाहते थे. उनके मन में हिंसा नहीं, नफरत नहीं वरन खुद को मुक्त कर लेने का भाव था. अपने आराध्य को दूसरे के प्रतीक चिन्ह से बाहर निकाल लाने का बोध था.


जोश, जनभावना, जयघोष का संगठित स्वरूप उस दिन दिखाई दिया. भगवा ध्वज के केसरिया रंग में सराबोर, जय श्री राम के उद्घोष से धरती-आकाश को एक करते हुए जब धूल का गुबार हटा तो सामने सबकुछ साफ़ था. सांस्कृतिक विरासत पर कब्ज़ा किये बैठी प्रतिच्छाया कहीं दूर-दूर तक नहीं थी. जनसैलाब जिस नियंत्रित रूप से आगे बढ़ा, उसी नियंत्रित रूप से वापस आने लगा. सांस्कृतिक प्रतीकों की मुक्ति का जयघोष अपना असर दिखा चुका था. पावन सरयू नदी की लहरें उन्मुक्तता से वैसी ही हिलोरें मारती नजर आने लगीं. उसने स्वयं में अपना पुराना स्वरूप अपने आसपास निर्मित होते देखा. विध्वंस पश्चात् सनातन मानक पर निर्मित ढाँचा अपने आसपास न देखकर पावन किनारों ने अपने क्रीड़ास्थल को पुनः-पुनः उसी सनातनकालीन स्थिति में महसूस किया. जनसमुदाय के आराध्य, पावन नदी में कभी किल्लोल करने वाले उसके बाल राम, कभी अयोध्या की गलियों, मैदानों में विचरण करने वाले उसके किशोर राम, वनवास के बाद नगरवासियों के ह्रदय में स्थापित उसके राजा राम स्वतंत्र आकाश में अपनी सत्ता का विस्तार पा चुके थे. गुलामी के, विध्वंस के, विवाद के ढाँचे से बाहर निकल वे अब अपने देश के, अपने भक्तों के, अपने मन के प्रतीक में विराजित थे.  


कितनी विडम्बना है इस देश के सांस्कृतिक प्रतीक चिन्हों की कि उन्हें अपने होने का सबूत देना पड़ता है. भगवान श्रीराम की जन्मभूमि उनकी अपनी होकर भी उनकी अपनी नहीं हो पा रही थी. सबूतों, गवाहों, बयानों, अदालतों के मानव-निर्मित सत्य वास्तविक सत्य को झुठलाने का कार्य करने में लगे थे. देश में रहकर, देश का दाना-पानी अपने उदर में प्रविष्ट करने वाले ही देश की सांस्कृतिक विरासत को नकारने का काम करने में लगे हैं. देश में जन्मे लोग ही सांस्कृतिक प्रतीकों की बात करने वालों पर गोलियाँ चलवा रहे हैं. देश के सांस्कृतिक पुरुष के समकक्ष विदेशी आक्रान्ता को खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है. जिन आक्रान्ताओं ने देश में विध्वंस, अत्याचार, हिंसा करने के अलावा और कुछ न किया उनकी तरफदारी करने वाले इसी देश के लोग दिख रहे हैं. समय उनकी भी कहानी लिखेगा जो सांस्कृतिक विरासतों को नकारने के नाम पर अपने ही अस्तित्व को नकारने में लगे हैं. किसी विशेष के लिए तुष्टिकरण के नाम पर वैमनष्यता फैलाये हुए हैं. इन सबके बीच दिन तो आते-जाते रहेंगे. विवादों के परिणाम भी जनसमुदाय के द्वारा निकाले जाते रहेंगे. आज नहीं तो कल सांस्कृतिक विरासत के चिन्ह अपनी भव्यता को प्राप्त कर ही लेंगे. 

06 दिसंबर 2015

छह दिसम्बर : राम के स्थान पर बाबर की स्थापना का कुत्सित प्रयास


दिसम्बर का आरम्भ जहाँ सामाजिक क्षेत्र में एड्स दिवस, विकलांग दिवस से होता है वहीं राजनैतिक क्षेत्र में इसका आरम्भ अयोध्या मामले की चर्चा से होने लगता है. समूची राजनीति को अयोध्या, राम, भाजपा आदि के इर्द-गिर्द केन्द्रित कर दिया जाता है. इसके उलट बार-बार देखने में आया है कि छह दिसम्बर को एकबारगी भाजपा की तरफ से भले ही कोई बयान न दिए जाएँ किन्तु गैर-भाजपाई दलों द्वारा दिसम्बर आते ही राम मंदिर मामले को, राम नाम को, अयोध्या प्रकरण को उठा दिया जाता है और फिर पूरी राजनीति को राममय बनाये जाने का आरोप भी लगाया जाने लगता है. तथाकथित रूप से धर्मनिरपेक्षता का झंडा उठाने वाले राजनीतिज्ञ इन्हीं आरोपों की आड़ लेकर भगवा आतंकवाद जैसी शब्दावली को चलन में बनाये रखना चाहते हैं. राजनीति में जबरन राम को दृष्टिगत बनाये रखने की मंशा गैर-भाजपाई दलों और उनके आनुषांगिक संगठनों की दिखती है. इसके पीछे उनका मूल मंतव्य देश भर के गैर-हिन्दुओं में, मुसलमानों में हिन्दुओं का, भाजपा का खौफ पैदा करके, अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में मुस्लिम वोट-बैंक को स्थापित करना होता है.
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देखा जाये तो देश की वर्तमान राजनीति में राम को स्थापित करने में भाजपा से ज्यादा बड़ी और महत्त्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस सहित अन्य दलों की भी रही है. राजीव गाँधी द्वारा राममंदिर का ताला खुलवाया जाना, मुलायम सिंह द्वारा निहत्थे कार-सेवकों पर गोलियाँ चलवाना, सभी गैर-भाजपाई दलों का भाजपा-विरोधी होने से ज्यादा राम-विरोधी, हिन्दू-विरोधी हो जाना, इस्लामिक आतंकवाद के समानान्तर भगवा आतंकवाद की कपोल-कल्पना करना, मुस्लिम तुष्टिकरण की आड़ में आतंकियों की मदद करना आदि ऐसी घटनाएँ रही हैं जिनके कारण जाने-अनजाने राजनीति में राम का, हिन्दू धर्म का प्रवेश हो गया. ऐसा होने के पीछे के कारणों को बिना जाने राजनीति के राममय, हिन्दूमय होने का आरोप लगाने से पहले राजनीति के मुस्लिममय होने के आरंभिक बिंदु को भी देखना होगा. यदि विगत साथ वर्षों से अधिक के समय में चली आ रही मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति राजनीति के अल्लाहमय होने की, मुसलमानमय होने की पहचान नहीं है तो दो दशकों के आसपास का अयोध्या मामला, राम मंदिर मुद्दा कहाँ से राजनीति को राममय, हिन्दूमय साबित करता है?
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अब जबकि कुछ वर्षों पहले उच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या में राम मंदिर मामले में स्पष्ट फैसला सुना दिया गया है, जिसके चलते देश भर की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के दिलों पर साँप लोट गया. उनकी समझ में ही नहीं आ रहा है कहा क्या जाये, किया क्या जाये? अदालत के उस फैसले को हिन्दू-मुस्लिम की हार-जीत से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. इस फैसले को केवल इस दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए कि यह हिन्दुओं के पक्ष की बात करता है वरन् इसको इस दृष्टि से भी देखे जाने की आवश्यकता है कि देश में एक धरोहर पर चली आ रही बेवजह की बहस को भी विराम दिया है. उस फैसले से हिन्दुओं को इसकी राहत जरूर मिलने की सम्भावना थी कि उन्हें अब इस बात की जलालत नहीं सहनी पड़ेगी कि वे सिद्ध करते घूमें कि उनके भगवान राम अयोध्या में ही, उसी स्थान पर जन्मे थे; हिन्दुओं को इस बात से भी राहत मिलने की आशा थी कि उन्हें राम के नाम पर गाली नहीं दी जायेगी; उन्हें देश का विभाजन करने वाला और मुसलमानों की मस्जिद पर कब्जा करने वाला नहीं कहा जायेगा. हिन्दुओं को इस बात की सम्भावना नजर आई थी कि अब बेधड़क कहा जा सकता है कि राम इस देश की सांस्कृतिक विरासत हैं क्योंकि फैसला आने तक तो डर लग रहा था कि कहीं राम को भारत के अलावा किसी और देश का सिद्ध न कर दिया जाये और बाबर अथवा मीर जाकी को ही इस देश का नागरिक घोषित कर दिया जाये. ऐसे में यदि जागरूक मुसलमान लोग मिल-बैठ कर सुलझाना चाहेंगे तो देश हित में अच्छा रहेगा अन्यथा उन्हीं के द्वारा सिद्ध करने का प्रयास होगा कि वे लोग इस देश की सांस्कृतिक विरासत का नहीं अपितु विदेशी आक्रान्ताओं की जुल्म भरी विरासत को पालना-पोसना चाहते हैं. उनके लिए एक संदेश कि देश की मुख्य धारा में शामिल हों और देश की सांस्कृतिक धरोहर को, विरासत को सहेजने में अपना भी योगदान दें. राम सभी के हैं, वे समाजवादियों के भी हैं, जनताधारियों के भी हैं, लाल झंडे वालों के भी हैं तो मीडिया वालों के भी हैं, बस समझने-समझने का फर्क है. हर वर्ष छह दिसम्बर आते ही गैर-भाजपाई दलों का, मीडिया का इस मुद्दे को हवा देना देश में, समाज में हिन्दू-मुस्लिम विभेद को बनाये रखना है, तुष्टिकरण की राजनीति को सुदृढ़ करना है, इससे बचने की आवश्यकता है.
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सभी को याद होगा कि पहली बार 1992 में इस विवाद के आने के बाद मुसलमानों ने इस पर बहुत आपत्ति की थी कि उनको बाबर की औलाद के रूप में पुकारा जा रहा है. अब वही स्थिति फिर खड़ी होने वाली है, यदि बाबर मुसलमानों के लिए पूज्य नहीं है, बाबर को मुसलमानों ने अपने पूर्वज के रूप में नहीं स्वीकारा है तो फिर अब वे एकमत से, तहेदिल से अदालत के इस फैसले का सम्मान करते हुए राम जन्मभूमि पर राम का भव्य मंदिर बनने में सहयोग कर देश की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने में अपना भी योगदान देते किन्तु ऐसा नहीं हो सका. इस विवाद का हल निकालने, अदालत का सम्मान करने वाले लोग ही विवाद को और विवादित बनाए रखने की दृष्टि से उच्चतम न्यायालय में चले गए. मामला सुलझने के स्थान पर वैसे ही विवादित बना हुआ है. अदालत को जो करना था वो कर चुकी, अब मुसलमानों को यह सिद्ध करना है कि राम का वनवास यथावत बना रहे अथवा विदेशी आक्रमणकारी बाबर को इस देश की नागरिकता दे दी जाये? हमें याद रखना होगा कि हमारे लिए कोई भी इस कारण स्तुत्य नहीं हो जाता कि वह हमारे धर्म का है, हमारी जाति का है.
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