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11 फ़रवरी 2026

सरकार ने डीपफेक और एआई पर सख्त किए नियम

ऐसा लगता है जैसे कोई चीज मुफ्त में या फिर लगभग मुफ्त जैसी कीमत में मिलती है तो उसका दुरुपयोग पूरी ताकत से किया जाने लगता है. इस मामले में अनेकानेक उदाहरण हम सबके सामने हैं. ऐसे ही उदाहरणों में से एक ताजातरीन उदाहरण कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का लिया जा सकता है. हम भारतीयों ने जिस तरह से डीपफेक सहित एआई का दुरुपयोग किया है, वैसा हाल एआई को सामने लाने वालों ने भी नहीं सोचा होगा. न जाने कितनी कृत्रिम सामग्री, बनावटी फोटो, नकली वीडियो आदि के माध्यम से सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को इतनी बुरी तरह से भर दिया गया है कि कई बार असली और नकली का अंतर ही समझ नहीं आता है.

 



सवाल अकेले नकली सामग्री बनाये जाने का नहीं बल्कि इसके माध्यम से धोखाधड़ी, अश्लीलता आदि को बढ़ावा मिलने लगा था. लगातार आती शिकायतों को दृष्टिगत रखते हुए केन्द्र सरकार ने डीपफेक सहित एआई से तैयार सामग्री के सम्बन्ध में ऑनलाइन मंचों के लिए सख्त नियम बना दिए हैं. ये नियम इसी माह की बीस तारीख से लागू हो जाएँगे. इसके तहत सोशल मीडिया के विविध मंचों से डीपफेक वाली सामग्री को तीन घंटे के भीतर ही हटाना होगा. पहले इस सम्बन्ध में समय-सीमा 36 घंटे की थी. इसके अलावा एआई के माध्यम से निर्मित सामग्री, चाहे वो फोटो हो या फिर वीडियो, उसमें एआई कंटेंट होने का लेबल स्पष्ट रूप से लगाना होगा, जिससे दर्शकों को आसानी से असली और नकली का अंतर समझ आ सके.

 

सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 में संशोधन करके इसके माध्यम से एआई से निर्मित बनावटी कटेंट को परिभाषित किया गया है. इन संशोधनों में ‘ध्वनि, दृश्य या ध्वनि-दृश्य जानकारी' और ‘बनावटी रूप से तैयार की गई जानकारी' को परिभाषित किया गया है, जिसमें एआई द्वारा निर्मित या परिवर्तित ऐसी सामग्री शामिल है जो वास्तविक या प्रामाणिक प्रतीत होती है. इस तरह के संशोधनों से निश्चित रूप से एआई का दुरुपयोग रोकने में मदद मिल सकेगी.


01 जनवरी 2026

मोबाइल से इतर भी है ज़िन्दगी

नववर्ष 2026 का आगमन हो गया है. हम सभी ने उसके स्वागत में अपनी पर्याप्त ऊर्जा और शक्ति को लगा दिया. इस आते वर्ष के साथ क्या हमने अपने उन वायदों की तरफ ध्यान दिया जिनको वर्ष 2025 के शुरू में खुद से किया था? शायद नववर्ष के स्वागत के उत्साह में ऐसा करने की याद नहीं रही. चलिए कोई बात नहीं, जब जागो तभी सबेरा वाली बात के द्वारा नए वर्ष 2026 के साथ अभी-अभी गए वर्ष 2025 के एक घटनाक्रम को याद कर लेते हैं. मैनेजमेंट गुरु के रूप में प्रसिद्ध एन. रघुराजन ने कहा कि 2025 एक स्लोगन के साथ विदा हो रहा है- मोबाइल फोन के परे भी ज़िन्दगी है. उन्होंने अपने कॉलम में एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए लिखा कि प्रवेश द्वार पर एक बड़े बोर्ड पर लिखा था कि अपना मोबाइल फोन निकालें और मेरी तस्वीर लें. जैसे ही आप प्रवेश द्वार पर अभिवादन कर रहे महिला या पुरुष की तस्वीर लेते हैं तो वे बेहद शालीनता से आपके फोन के कैमरा लेंस पर एक छोटा सा आयताकार स्टिकर चिपका देते हैं. किसी मेहमान ने इसका विरोध नहीं किया. वहीं दूसरे बोर्ड पर लिखा था कि हर बीस मेहमानों पर एक फोटोग्राफर है, उनसे जितनी चाहें तस्वीरें खिंचवाइए.

 

यह आईडिया कोई नया-नवेला नहीं है. इसे बर्लिन, लंदन और न्यूयॉर्क के मशहूर क्लबों से लिया गया है. यहाँ पर लम्बे समय से जोर दिया जाता रहा है कि वहाँ आने वाले मेहमान फोन से तस्वीरें लेना छोड़ संगीत की धुनों पर नाचें. पहले इन क्लबों में फोन प्रतिबंधित थे लेकिन अब उन पर स्टिकर लगाया जाता है. एक पल को अपने मोबाइल को जेब में डालकर सोचिए इन दोनों निवेदनों के बारे में. सोचा आपने? आप किसी कार्यक्रम का हिस्सा हैं, उसमें सहभागिता कर रहे हैं और आपका बहुत सारा समय कार्यक्रम का आनंद उठाने के बजाय फोटोग्राफी में खर्च होता है. ये समय कभी सेल्फी के नाम पर, कभी कार्यक्रम के फोटो-वीडियो बनाने के नाम पर, कभी मित्रों-परिचितों-परिजनों के साथ फोटोसेशन करवाने के नाम पर खर्च होता है. क्या कभी आपने-हमने एक पल को रुककर ये सोचा है कि उस कार्यक्रम में हमारी उपस्थिति किसलिए हुई है? हम वहाँ कार्यक्रम का आनंद उठाने के लिए उपस्थित हुए हैं अथवा फोटोग्राफी करने के लिए?

 



वर्तमान दौर में यह बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है कि हम सभी सामने उपस्थित पलों का आनंद उठाने के बजाय इधर-उधर के कार्यों में अपना समय बर्बाद कर देते हैं. इस समय बर्बादी में मोबाइल को सबसे आगे रखा जा सकता है. सिर्फ फोटोग्राफी की ही बात न करें, सिर्फ किसी कार्यक्रम की बात न करें तो भी यदि गौर करें तो लगभग प्रत्येक नागरिक का एक दिन का बहुतायत समय मोबाइल पर व्यतीत हो रहा है. हम सभी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हों अथवा किसी पारिवारिक कार्यक्रम में, कहीं नितांत फुर्सत के पलों में हों या फिर व्यस्तता भरे किसी दौर में मोबाइल से खुद को दूर नहीं कर पाते हैं. भीड़ के बीच में भी हम सब मोबाइल के कारण अकेले होते हैं.

 

मैनेजमेंट गुरु द्वारा बताया गया तरीका चूँकि अब निजी और हाई-प्रोफाइल पार्टियों में अपनाया जा रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि उन पार्टियों में, कार्यक्रमों में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति वहाँ के पलों का आनंद ले सके. ऐसा बहुतायत में देखने में आता है और लेखक का अपना नितांत व्यक्तिगत अनुभव है कि कार्यक्रमों के दौरान फोटो-वीडियो निकालने वाले बहुतायत लोग शायद ही दोबारा उनको देखते हों. उनमें से बहुसंख्यक लोग ऐसे होते हैं जो कार्यक्रम के बाद ही फोटो और वीडियो डिलीट करते देखे गए. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके मोबाइल में स्टोरेज की समस्या उत्पन्न होने लगती है. कोरोनाकाल के दौरान लॉकडाउन में मोबाइल का उपयोग बढ़ने से भले ही कुछ लोगों की दिनचर्या में इसका उपयोग शामिल हो गया हो किन्तु समय के साथ लोग महसूस करने लगे कि पूरी तरह स्क्रीन पर टिकी ज़िन्दगी ही असल में जीवन नहीं है. एक शोध के आँकड़े बताते हैं कि सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय वर्ष 2022 में चरम पर था और वर्ष 2024 में इसमें दस प्रतिशत की गिरावट दिखाई दी.

 

मोबाइल उपयोग के प्रति जिस तरह की ललक लोगों में देखी गई थी, उसी तरह की वितृष्णा भी अनेक लोगों में देखने को मिल रही है. यहाँ अनेकानेक अनुभवों को सामने रखने का मंतव्य कदापि यह नहीं कि मोबाइल को पूरी तरह से नकार दिया जाये. यहाँ उद्देश्य मात्र इतना ही है कि मोबाइल के उपयोग के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाये कि परिवार की अहमियत हमारे लिए क्या है? बच्चों का मैदान पर जाकर खेलना-कूदना कितना महत्त्वपूर्ण है? सामाजिकता के निर्वहन के लिए आज सहभागिता आवश्यक है अथवा मोबाइल का उपयोग? परिवार के साथ समय का बिताना किसी स्वप्न की तरह से हो गया है. मित्रों के साथ शाम की महफ़िलें किसी गुजरे दौर की बातें हो गईं हैं. बच्चों की हँसी, खिलखिलाहट से गुलजार रहने वाले पार्क अब बुजुर्गों के अकेलेपन के साक्षी बन रहे हैं. यह अपने आपमें कितना विद्रूपता भरा होगा कि आने वाली पीढ़ी के लिए हम इस तरह के अकेलेपन के, सुनसान के, तन्हाई के अनुभव इकट्ठे करने में लगे हैं.

 

नववर्ष की आज की इस पहली सर्द सुबह में चाय की चुस्की लेते हुए अपने मोबाइल को देखिएगा कि आपने ऐसे कितने फोटो-वीडियो हैं जो अब तक अनदेखे और बेमतलब ही मोबाइल में जगह घेरे हैं. निश्चित ही इनकी बहुत बड़ी संख्या होगी. यदि आप हमारी बात से सहमत हैं तो चाय की चुस्की के साथ नववर्ष में वादा करिए मोबाइल के बजाय अपने लोगों के साथ अधिक से अधिक समय बिताने का. आभासी अनुभवों को एकत्र करने के स्थान पर वास्तविक अनुभवों को संजोने का. याद रखिये केवल एक ही बात कि मोबाइल फोन से परे अनुभवों से भरी एक शानदार ज़िन्दगी है.

 


01 फ़रवरी 2025

वीडियो को पॉडकास्ट नहीं कहते

पॉडकास्ट एक डिजिटल माध्यम है जिसमें किसी विशिष्ट विषय से सम्बंधित ऑडियो के एपिसोड होते हैं. पॉडकास्ट के होस्ट को पॉडकास्टर कहा जाता है. यह रेडियो शो जैसा ही होता है, लेकिन अपनी सुविधानुसार इसके एपिसोड डाउनलोड या स्ट्रीम कर सकते हैं. वर्तमान में वीडियो को पॉडकास्ट के रूप में प्रसारित किया जाने लगा है. इस भेड़चाल में बड़े-बड़े ज्ञानी शामिल हैं.

 

आजकल के ज्ञानियों को समझाना नामुमकिन है. वीडियो को पॉडकास्ट बता-बताकर दिमाग का दही करने वाले विद्वतजनों के लिए एक संक्षिप्त जानकारी यहाँ दे रहे हैं इसके अलावा एक सीधी साफ़ बात, हम वीडियो को पॉडकास्ट नहीं कह सकते, नहीं कहेंगे.






11 नवंबर 2023

एआई दुरुपयोग का दुष्परिणाम है डीपफेक

पिछले दिनों फिल्म अभिनेत्री रश्मिका मंधाना का नकली वीडियो वायरल हुआ. इसके आने के बाद से भ्रम की एक स्थिति ‘फेक’ और ‘डीपफेक’ को लेकर बन गई. इंटरनेट की दुनिया में आये दिन लोग ‘फेक’ शब्द से सामना करते रहते हैं, अब उनका सामना ‘डीपफेक’ से भी हो गया. फेक कंटेंट में शामिल खबरों, वीडियो, चित्रों आदि की तरह ही डीपफेक कंटेंट भी इन्हीं सबके लिए प्रयोग किये जाने वाली तकनीक है. देखा जाये तो फेक और डीपफेक का मूल एक ही है लेकिन इनके बनाये जाने की प्रक्रिया में जमीन-आसमान का अंतर है. फेक कंटेंट में किसी फोटो, वीडियो, ऑडियो आदि की नकल की जाती है जबकि डीपफेक कंटेंट में किसी वीडियो, फोटो, ऑडियो या किसी अन्य डिजिटल सामग्री पर किसी दूसरे का चेहरा अथवा आवाज लगा कर उसे वायरल किया जाता है. डीपफेक निर्माण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस-एआई) की सहायता ली जाती है. यह मूल कंटेंट का एक अवास्तविक रूप है जिसके द्वारा वीडियो, ऑडियो बनाकर लोगों को गुमराह किया जा सकता है. डीपफेक की विशेषता ये है कि इसमें असली और नकली में अंतर कर पाना कठिन होता है. फेक कंटेंट को सामान्य रूप में किसी साधारण सॉफ्टवेयर पर बनाया जा सकता है जबकि डीपफेक कंटेंट को बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की सहायता ली जाती है. डीपफेक को डीप लर्निंग प्रक्रिया से लिया गया है, जिसका अर्थ है एआई की सहायता से किसी समस्‍या का समाधान खोजना.

 



यह एक बहुत बड़ा और दुर्भाग्ययुक्त सच है कि जैसे-जैसे नवीन तकनीक का आगमन हुआ, उसका विकास हुआ अपराधी मानसिकता वालों ने उसका दुरुपयोग किया है. एआई कोई पहली तकनीक नहीं है जिसका दुरुपयोग किया जाने लगा है, इससे पहले भी लगभग सभी तकनीकों का दुरुपयोग किया गया है. डीपफेक को पहली बार सन 2017 में अमेरिकी सामाजिक समाचार एकत्रीकरण वेबसाइट ‘रेडिट’ के उपयोगकर्ता द्वारा शुरू किया गया था. उसके द्वारा डीप लर्निंग तकनीक की मदद से अश्लील वीडियो पर प्रसिद्ध व्यक्तियों के चेहरे को लगाकर डीपफेक का निर्माण किया गया. इस घटना ने लोगों का ध्यान न केवल अपनी तरफ खींचा बल्कि तकनीक के दुरुपयोग पर भयभीत भी किया. इस तकनीक पर इंटरनेट पर उपलब्ध ओपन-सोर्स लाइब्रेरी और ऑनलाइन पाठ्य-सामग्री ने इसके दुरुपयोग को और अधिक बढ़ा दिया. अपराधी मानसिकता के लोगों के लिए अब इस तकनीक का इस्तेमाल और भी आसान हो गया था.

 

डीपफेक का निर्माण गणितीय, वैज्ञानिक परिकलन पर आधारित होता है. इसके लिए जेनरेटिव एडवरसैरियल नेटवर्क (GAN) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक में एक उत्पादक अर्थात जेनरेटर और एक विभेदक अर्थात डिस्क्रिमिनेटर नामक नेटवर्क होते हैं. इन दोनों को एक तरह से एल्गोरिदम कहा जा सकता है, जो डीपफेक निर्माण के लिए उपलब्ध डाटा का गणनात्मक आकलन करते हैं. दोनों नेटवर्क एआई की सहायता से काम करते हैं. डीपफेक निर्माण में जेनरेटर उस डिजिटल कंटेंट को तैयार करता है जो अवास्तविक चित्रों अथवा वीडियो के रूप में होता है और दिखने में वास्तविक जैसा. इसके बाद वह डिस्क्रिमिनेटर से इस बनाये गए कंटेंट की वास्तविकता पर प्रतिक्रिया माँगता है. डिस्क्रिमिनेटर बनायी गई सामग्री को वास्तविक सामग्री से अलग करते हुए जेनरेटर को अवास्तविक सामग्री का सच बताता है. उसकी लगातार मिलती प्रतिक्रिया से जेनरेटर अपनी बनायी सामग्री में तब तक सुधार करता है जब तक कि उस कंटेंट से डिस्क्रिमिनेटर भी दुविधा में नहीं आ जाता. सामान्यरूप में कहें तो यहाँ एक नेटवर्क कंटेंट तैयार करता है और दूसरा उसे डिकोड करके उसका वास्तविक जैसा अथवा बनावटी दिखना बताता है. जब डिस्क्रिमिनेटर कंटेंट को पूरी तरह से सच जैसा बता देता है तो उस वीडियो, ऑडियो आदि को वायरल कर दिया जाता है. डीपफेक बनाने के लिये किसी व्यक्ति के फोटो, वीडियो को उस व्यक्ति की जानकारी के बिना इंटरनेट पर उपलब्ध अनेक प्लेटफ़ॉर्म से एकत्र कर लिया जाता है.

 

वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित इस तकनीक का इस्तेमाल यदि सकारात्मक रूप में किया जाये तो इसका लाभ समाज को मिल सकता है. शिक्षा, चिकित्सा, इतिहास आदि के क्षेत्र में इसके उपयोग से क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है. ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की आवाज़ को, उनकी कृतियों को संग्रहीत करके न केवल सुरक्षित रखा जा सकता है बल्कि उनका पुनर्निर्माण किया जा सकता है. ऐतिहासिक व्यक्तियों की कहानियों को, उनके जीवन की घटनाओं को उन्हीं के स्वर में सुनने का अद्भुत अनुभव लिया जा सकता है. विद्यार्थियों को पढायी जाने वाली सामग्री को चित्रों, वीडियो, ऑडियो द्वारा और भी आकर्षक बनाया जा सकता है. जो व्यक्ति शारीरिक अथवा मानसिक रूप से अक्षम हैं वे लोग एआई की मदद से उत्पन्न अवतारों के द्वारा अपनी ऑनलाइन आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं. इसके उलट डीपफेक तकनीक समाज के लिए चुनौती बनी है. इसके द्वारा किसी को भी बदनाम किया जा सकता है. दुर्भावनावश अश्लील सामग्री का निर्माण, फर्जी खबरों का प्रचार-प्रसार किया जा सकता है. यह अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध व्यक्तियों, विशेषरूप से महिलाओं की विश्वसनीयता, सम्मान को नुकसान पहुँचा सकती है.

 

वर्तमान में यद्यपि भारत में ऐसे विशिष्ट कानून या नियम नहीं हैं जो डीपफेक तकनीक के उपयोग को प्रतिबंधित करते हों तथापि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, भारतीय दंड संहिता, डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण अधिनियम आदि के द्वारा कार्यवाही का विधान है. वैश्विक स्तर पर 1-2 नवम्बर को ब्रिटेन के बकिंघमशायर के बैलेचली पार्क में विश्व के प्रथम एआई सुरक्षा शिखर सम्मेलन-2023 में भारत, अमेरिका, चीन सहित 28 प्रमुख देशों ने एआई के संभावित जोखिमों को दूर करने के लिये वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता सम्बन्धी घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किये. इस तकनीक के बढ़ते खतरों, गोपनीयता, सामाजिक स्थिरता, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतंत्र पर सम्भावित प्रभाव को देखते हुए भारत को डीपफेक पर नियंत्रण हेतु एक कानूनी ढाँचा विकसित करने की आवश्यकता है. 





 

19 सितंबर 2022

कुंठित यौनेच्छा या स्वतंत्रता

समाज में किसी भी व्यक्ति द्वारा जो भी कृत्य किया जाता है वह किसी न किसी रूप में उसके द्वारा सोचा-विचारी की स्थिति के बाद ही होता है. कभी यदि कोई कदम अचानक से उठ भी जाता है तो उसके पीछे भी अचेतन में बैठी भावना या फिर तात्कालिक घटनाक्रम प्रमुख होता है. यही कारण है कि प्रत्येक कार्य के पीछे का कारण ही उस कार्य की दिशा तय करता है. अभी हाल में ही स्नान करती छात्राओं के वीडियो शेयर करने का जो मामला सामने आया, उसके पीछे भी कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा, ये और बात है कि अभी तक इस मामले की तह तक नहीं पहुँचा जा सका है. उस घटना का अंतिम और मुख्य उद्देश्य क्या होगा, ये तो यथासंभव जाँच के बाद ही सामने आएगा किन्तु समाज में जिस तरह से नग्नता को, सेक्स को पोषित-पल्लवित किया जा रहा है, उससे एक उद्देश्य यौनिक कुंठा से सम्बंधित भी समझ आता है.  


ये अपने आपमें एक परम सत्य है कि सेक्स किसी भी जीव की नैसर्गिक आवश्यकता है. न केवल इंसानों में वरन जानवरों में भी इसको देखा गया है, यहाँ तक कि पेड़-पौधों में भी आपस में निषेचन क्रिया संपन्न होती है, जो एक तरह से सेक्स का ही स्वरूप है. बहरहाल, जिस तरह से मानव समाज के विकास की स्थितियाँ बन रही हैं, विकसित हो रही हैं, उनके साथ-साथ सेक्स सम्बन्धी समस्याओं में, दुराचार की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिली है. वर्तमान में हालात ये हैं कि किसी भी तरह का कार्यक्रम हो, किसी भी तरह का विज्ञापन हो, किसी भी तरह की फिल्म या धारावाहिक हो सभी में सेक्स को, शारीरिक संबंधों को प्रमुखता से दिखाया जाता है. किसी दौर में ऐसी बातों को फिल्माने में किसी न किसी संकेत का, रूपक का सहारा लिया जाता था मगर अब स्वाभाविकता का नाम लेकर ऐसे दृश्यों का खुलेआम फिल्मांकन होता है. बच्चों के टीवी कार्यक्रमों में बच्चों को भौंड़ी, कामुक मुद्राओं में थिरकते देखा जाता है. उनको द्विअर्थी संवादों में प्रदर्शन करते देखा जा सकता है. अनेकानेक उत्पाद ऐसे हैं जिनको देखकर ऐसा ही लगता है कि उस उत्पाद का निर्माण एकमात्र इसी उद्देश्य से किया गया है कि विपरीतलिंगियों में आकर्षण पैदा हो जाये, उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाये. अब तो इनसे भी एक कदम आगे बढ़कर सोशल मीडिया में शार्ट वीडियो, रील्स आदि के माध्यम से अश्लीलता, नग्नता, कामुक मुद्राओं को हर हाथ में देखा जा रहा है. किसी भी तरह की आपत्ति पर इनको स्वतंत्रता के नाम का आवरण ओढ़ाया जाने लगता है.




आखिरकार यहाँ समझना ही होगा कि स्वतंत्रता है क्या? जीवनशैली आखिर किस तरह से संचालित की जाये? इसे भी समझने की जरूरत है कि कहीं जीवनशैली की स्वतंत्रता के नाम पर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर व्यक्ति सेक्स संबंधों में स्वतंत्रता तो नहीं चाह रहा है? कहीं स्वतंत्रता के नाम पर सेक्स को समाज में कथित तौर पर स्थापित करने की साजिश तो नहीं? सेक्स को लेकर, शारीरिक संबंधों को लेकर, विपरीतलिंग को लेकर समाज में जिस तरह से अवधारणा निर्मित की जा रही है, उसे देखते हुए लगता है जैसे इंसान के जीवन का मूलमंत्र सिर्फ और सिर्फ सेक्स रह गया है. दृश्य-श्रव्य माध्यमों में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों, विज्ञापनों में भी सेक्स का प्रस्तुतीकरण इस तरह से किया जाता है जैसे बिना इसके इंसान का जीवन अधूरा है. समस्या यहीं आकर आरम्भ होती है क्योंकि प्रस्तुतीकरण के नाम पर फूहड़ता का प्रदर्शन ज्यादा किया जाता है; दैहिक संतुष्टि के नाम पर जबरन सम्बन्ध बनाये जाने की कोशिश की जाती है; प्यार के नाम पर एकतरफा अतिक्रमण किया जाता है; स्वतंत्रता के नाम पर रिश्तों का, मर्यादा का दोहन किया जाता है. सोचना होगा कि कल को वे मानसिक विकृत लोग, जो दैहिक पूर्ति के लिए जानवरों तक को नहीं बख्शते हैं, अपने अप्राकृतिक यौन-संबंधों को जायज ठहराने के लिए सडकों पर उतर आयें, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर, जीवनशैली चुनने की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी जानवर के साथ को कानूनी स्वरूप दिए जाने की माँग करने लगें तो क्या ऐसे लोगों की मांगों को स्वीकारना होगा?


जिस तरह से इक्कीसवीं शताब्दी के नाम पर उत्पादों, विचारों, खबरों, कार्यक्रमों, भावनाओं का प्रचार-प्रसार किया गया है उसमें इंसान की वैयक्तिक भावनाओं को ज्यादा महत्त्व प्रदान किया गया है. उसके लिए सामूहिकता, सामाजिकता, सहयोगात्मकता आदि को दोयम दर्जे का सिद्ध करके बताया गया है, व्यक्ति की नितांत निजी स्वतंत्रता को प्रमुखता प्रदान की गई है, ये कहीं न कहीं सामाजिक विखंडन जैसी स्थिति है. पाश्चात्य जीवनशैली को आधार बनाकर जिस तरह से भारतीय जीवनशैली में दरार पैदा की गई है वह भविष्य के लिए घातक है. इसके दुष्परिणाम हमें आज, अभी देखने को मिल रहे हैं. जिस उम्र में बच्चों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए वे रोमांस में घिरे हुए हैं; जिस क्षण का उपयोग उन्हें अपना कैरियर बनाने के लिए करना चाहिए उन क्षणों को वे शारीरिक सुख प्राप्त करने में व्यतीत कर रहे हैं; जो समय उनको ज्ञानार्जन के लिए मिला है उस समय में वे अविवाहित मातृत्व से निपटने के उपाय खोज रहे हैं. जिस मोबाइल को संचार का, जानकारी का केन्द्र होना चाहिए था उसके द्वारा अश्लीलता का, कामुकता का प्रदर्शन किया जा रहा है.


हमारे देश की पीढ़ी सेक्स, समलैंगिकता, अविवाहित मातृत्व, विवाहपूर्व शारीरिक सम्बन्ध, सुरक्षित सेक्स आदि की मीमांसा, चिंतन करने में लगा हुआ है. संभव है कि ऐसे लोगों के सामने भारतीय संस्कृति का कोई व्यापक अथवा सकारात्मक अर्थ ही न हो क्योंकि इस पीढ़ी ने मुख्य रूप से दैहिक सम्बन्धों की चर्चा अपने आसपास होते देखी है. यहाँ आकर समझना होगा कि सेक्स, शारीरिक सम्बन्धों के मामले में नितांत खुला जीवन जीने वाले पाश्चात्य देशवासी भी कहीं न कहीं संयमित भारतीय जीवनशैली के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. सेक्स को, दैहिक तृष्णा को एकमात्र उद्देश्य मानकर आगे बढ़ती पीढ़ी न केवल सामाजिकता का ध्वंस कर रही है बल्कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ भुलाकर समाज में एक दूसरे तरह की गुलामी को जन्म दे रही है. काश! स्वतंत्रता के नाम पर अधिकारों को समझा जाए न कि अनाधिकार चेष्टा को; काश! वैयक्तिक जीवनशैली के नाम पर रिश्तों की मर्यादा को जाना जाए न कि उनके अमर्यादित किये जाने को; काश! निजी जिंदगी के गुजारने के नाम पर पारिवारिक सौहार्द्र को समझा जाए न कि जीवन-मूल्यों के ध्वंस को; काश! जीवन को जीवन की सार्थकता के नाम पर समझा जाये न कि कुंठित सेक्स भावना के नाम पर. काश....!!!

 





 

09 जून 2021

निगेटिव रील से घर पर बनायें डिजिटल फोटो

फोटोग्राफी भी एक तरह का जूनून है. अब तो तकनीकी विकास ने फोटोग्राफी को बहुत आसान कर दिया है. किसी समय जबकि कैमरे में रील का उपयोग हुआ करता था तब फोटोग्राफी आज की अपेक्षा ज्यादा कठिन थी. एक तो रील का झंझट, प्रति रील फोटो की सीमित संख्या, रील धुलवाने, फोटो डेवलप करवाना आदि तमाम सारे कदम एक-दूसरे से जुड़े होते थे. उसके बाद जाकर एक फोटो देखने को मिलती थी.


अब रील वाला ज़माना भले न रहा हो मगर पुराने शौक़ीन लोगों के पास निगेटिव रील बहुत बड़ी संख्या में जमा हैं. पुरानी फोटो में बहुत सी तो समय के साथ मित्रों, परिजनों में बँटती रहती हैं, तो कुछ फोटो पुरानी होकर ख़राब भी होने लगती हैं. इसके अलावा पुरानी फोटो को देखकर उनसे जुड़ी यादों को एक-दूसरे तक शेयर करने के लिए भी फोटो की आवश्यकता होती है. ऐसे में या तो फोटो को स्कैन किया जाता है या फिर कैमरा/मोबाइल से उसकी फोटो खींचकर ऐसा किया जाता है.


बहुत से लोगों के मन में रहता है कि यदि निगेटिव रील से डिजिटल फोटो बन सकती तो उनके लिए अपनी यादों को शेयर करना सहज हो जाता. तो अब ऐसे लोगों का इंतजार ख़त्म हुआ. तकनीकी विकास के दौर में यह भी सुविधा प्राप्त हुई है कि अब घर बैठे अपने निगेटिव रील को डिजिटल फोटो में बदला जा सकता है. इसके लिए दो-चार आवश्यक चीजों की जरूरत होती है, उनके प्रयोग से निगेटिव रील से डिजिटल फोटो बनाई जा सकती है.


इस तरह की आवश्यक चीजों में निगेटिव तो आपके पास है ही. इसके अलावा एक कैमरा, कम्प्यूटर/ लैपटॉप, उसमें फोटोशॉप सॉफ्टवेयर चाहिए होता है. इसके साथ ही एक लाइट वाला बोर्ड भी आवश्यक है जिसके द्वारा सफ़ेद रंग का प्रकाश हो सके. ऐसे बोर्ड बाजार में बने-बनाए मिलते हैं अथवा उनको बनवाया/बनाया भी जा सकता है. किसी भी सामान्य से बिजली उपयोग वाले डिब्बे में सफ़ेद रौशनी वाला बल्ब/एलईडी/सीएफ़एल लगा सकते हैं. इस डिब्बे को सफ़ेद प्लास्टिक शीट से बंद कर दिया जाये, जिससे रौशनी सीधे न निकल कर सफ़ेद रंग का रिफ्लेक्शन दे. यहाँ ध्यान ये रखना है कि रौशनी सफ़ेद ही रखनी है.


सफ़ेद रौशनी का रिफ्लेक्शन देने वाला बिजली का बोर्ड 


अब शुरू होता है आपका काम. इसी बोर्ड पर अपने निगेटिव को फँसा दीजिये. इसके लिए एक निगेटिव के आकार का कागज़ काटकर भी उसका उपयोग किया जा सकता है. निगेटिव को सफ़ेद रौशनी देते बोर्ड में लगाने पर निगेटिव स्पष्ट रूप से चमकने लगेगा.


बोर्ड में लगाई गई निगेटिव 


इसके बाद किसी कैमरे से उसकी फोटो खींचना है. यहाँ ध्यान रखना है कि फोटो साफ़ आये, वह ब्लर न करे. यदि निगेटिव की फोटो धुँधली/ब्लर आती है तो उसकी डिजिटल फोटो साफ़ न आएगी.


फोटो खींचने के बाद नंबर आएगा कम्प्यूटर/लैपटॉप का. इसमें इनस्टॉल किये फोटोशॉप सॉफ्टवेयर का. खींची गई फोटो को अपने लैपटॉप में सेव कर लीजिये. इस फोटो को फोटोशॉप सॉफ्टवेयर पर एडिट करने के लिए खोलिए.


फोटो खींचने के बाद निगेटिव की फोटो 


निगेटिव रील की फोटो खींचते समय कोशिश करिए कि उसी एक स्नैप की फोटो खींची जाए जिसे आप डिजिटल फोटो में बदलना चाहते हैं. यदि किसी कारण से अथवा फोटो साफ़ रखने के लिए अतिरिक्त हिस्सा भी फोटो में आ जाये तो उसे फोटोशॉप से हटाया जा सकता है.


फोटो को फोटोशॉप सॉफ्टवेयर में खोलने के बाद आवश्यक भाग को क्रॉप कर लें. अब आपको इस फोटो को इनवर्स करना है. इससे इसके रंग बदल जायेंगे, जिससे निगेटिव की यह फोटो डिजिटल फोटो में बदल जाएगी. इसके बाद आपको एक कमांड चलानी होती है. जो लोग विंडो बेस्ड लैपटॉप का उपयोग करते हैं, वे कंट्रोल (Ctrl) के साथ आई (I) को दबा कर फोटो को इनवर्स कर सकते हैं. मैक लैपटॉप इस्तेमाल करने वाले लोग इनवर्स करने के लिए Control+Option+Command+8 को दबा सकते हैं.


फोटो इनवर्स होते ही आपको अपनी असली फोटो दिखने लगेगी. संभव है कि इसमें मूल फोटो जैसे रंग न दिखाई दें तो उनको आप एडिट करके बना सकते हैं. इसके लिए फोटोशॉप सॉफ्टवेयर के लेवल, कलर बैलेंस, ब्राइटनैस, कंट्रास्ट आदि का सहारा ले सकते हैं.


निगेटिव फोटो को इनवर्स करने के बाद सामने आई फोटो 


ऐसा करने से आप फोटो की खूबसूरती बढ़ा सकते हैं. निगेटिव रील से डिजिटल में बदली फोटो को पहले जैसी फोटो के रूप में अपने लैपटॉप में सहेज सकते हैं. अपने मित्रों, परिजनों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं.


इस पूरी प्रक्रिया को आप वीडियो में भी देख सकते हैं. इसके लिए यहाँ क्लिक करें.

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13 अप्रैल 2020

दिव्यांगों का उपहास उड़ाते टिकटॉक वीडियो

विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द किये जाने के बाद भी समाज की मानसिकता में बदलाव क्यों नहीं आया? क्या दिव्यांगजन दया, रहम, भीख, लाचारी, करुणा, उपहास, मजाक, तिरस्कार आदि जैसे भाव के ही अधिकारी हैं? ऐसे संभवतः आप सबकी समझ में नहीं आएगा. यदि इसका मर्म समझना चाहते हैं तो पढ़िएगा इसे.


देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने पहले कार्यकाल में अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए विकलांग शब्द को परिवर्तित करते हुए इसे दिव्यांग बना दिया था. इसके पीछे उनकी सोच थी कि समाज में विकलांग शब्द से शारीरिक अक्षम व्यक्तियों के प्रति जिस तरह की मानसिकता का निर्माण होता जा रहा है वह दूर होगा. दिव्यांग शब्द देने का उनका कारण इसके पीछे छिपी दिव्यता था. उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए जो कहा था उसका भावार्थ इतना था कि प्रकृति की तरफ से, ईश्वर की तरफ से यदि किसी अंग की कमी रखी जाती है, किसी अंग को कमजोर बनाया जाता है तो उसमें वह शक्ति अपनी दिव्यता भर देती है. इसी अप्रत्यक्ष दिव्यता के चलते उन्होंने विकलांग शब्द को दिव्यांग में परिवर्तित कर दिया था. उनके इस निर्णय के तुरंत बाद ही हमने लेखों, विचारों, टिप्पणियों के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा भी था कि समाज की मानसिकता बदलने की आवश्यकता है न कि शब्द बदलने की. इस सम्बन्ध में प्रधानमंत्री जी को एक पत्र भी लिखा था.


शब्द परिवर्तन का कदम स्वयं प्रधानमंत्री जी द्वारा उठाया गया था, ऐसे में सरकारी स्तर पर तुरत-फुरत कार्यवाही करते हुए सभी जगहों पर विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द कर दिया गया, चलन में ला दिया गया. मंत्रालयों, विभागों, सरकारी तथा गैर-सरकारी कार्यालयों में भी उसी के तुरंत बाद दिव्यांग शब्द चलन में आ गया. जैसा कि आशंका थी वही हुआ. दिव्यांग शब्द तो लिखत-पढ़त में कार्य करने लगा, कागजों में इसकी उपस्थिति दिखने लगी मगर समाज की सोच से, उसकी मानसिकता से यह दूर नहीं हो सका. लोगों के दिमाग में विकलांग शब्द बना ही रहा. इस शब्द के साथ इन लोगों के प्रति दया, रहम, भीख, लाचारी, करुणा, उपहास, मजाक, तिरस्कार आदि जैसे भाव भी चिपके रहे. ऐसा इसलिए क्योंकि आज सम्पूर्ण विश्व चीनी वायरस कोरोना की चपेट में आकर महामारी से जूझ रहा है. अपना देश भी इससे अछूता नहीं रह सका है. देश में महामारी बहुत बुरी तरह न फैले, कोरोना का संक्रमण व्यापक रूप से यहाँ के नागरिकों को प्रभावित न करे इसके लिए सरकार द्वारा देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया है. इस लॉकडाउन को गंभीरता से लिया जाना चाहिए था, बहुत से लोगों द्वारा इसे गंभीरता से लिया जा रहा है. इस गंभीरता में भी बहुत से लोग मजाकिया, हास्य का संचार करते हुए वातावरण को हल्का करने का प्रयत्न कर रहे हैं. इसी प्रयत्न में कुछ असामाजिक लोग ऐसे भी हैं जो हास्य के द्वारा भी दिव्यांगजनों का मजाक उड़ाने से नहीं चूक रहे हैं.


ये असामाजिक तत्त्व टिकटॉक पर सार्वजनिक रुप से वीडियो बनाकर दिव्यांगो का उपहास करने में लगे हैं. ये वीडियो टिकटॉक पर बनाये जाने के बाद सोशल मीडिया वायरल किये जा रहे हैं. देश में एक तरफ कोरोना से बचाव के लिए लॉकडाउन जैसी व्यवस्था लागू की गई है वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग अपने समय को व्यतीत करने के लिए दिव्यांगों का मजाक उड़ाने में लगे हुए हैं. इस तरह के वीडियो में स्पष्ट रूप से फिल्माया जा रहा है कि लॉकडाउन की स्थिति में बाहर निकला व्यक्ति (इसमें स्त्री, पुरुष दोनों दिखाए जा रहे हैं) पुलिस के हूटर की आवाज़ सुनते ही अपने आपको पुलिस से बचाने के लिए दिव्यांगजनों की तरह नकल उतारने लग जाता है. इस फिल्मांकन में बैकग्राउंड में जोरों से हँसने की आवाज़ भी स्पष्ट रूप से सुनाई देती है. यह कहीं न कहीं दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा, उपहास, मजाक का भाव है. उनके प्रति दया, लाचारी जैसा भाव भी है जो सन्देश देने की कोशिश करता है कि यदि इस लॉकडाउन जैसी गंभीर स्थिति में पुलिस की कार्यवाही से बचना है तो दिव्यांगजनों की तरह चलना, व्यवहार करना शुरू कर देना चाहिए.

टिकटॉक पर ऐसे वीडियो दिव्यांगो का उपहास करते हुए उनकी गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं. यहाँ ध्यान रखना होगा कि भारत सरकार के एक अधिनियम के अंतर्गत दिव्यांगों के मजाक उड़ाने को, उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाने को कानूनी अपराध माना जाता है. टिकटॉक पर बनाये जा रहे वीडियो समाज की मानसिकता को ही उद्घाटित करते हैं. इन वीडियो का व्यापक रूप से वायरल होना सिद्ध करता है कि हमारा समाज विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द भले ही स्वीकार कर ले मगर उनके प्रति उपेक्षा, उपहास, लाचारी जैसा भाव दूर नहीं कर पा रहा है.  


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

25 मार्च 2020

जैसी जिसके भाग्य लिखी

किसी व्यक्ति का जन्म जितना बड़ा सच है, उससे कहीं अधिक बड़ा सच उसकी मृत्यु भी है. चर हो या अचर, जीव हो या वनस्पति सभी के जन्म के साथ ही उसका मरना सुनिश्चित हो जाता है. इन्सान के जीवन में क्या-क्या घटित होगा, क्या-क्या नहीं, क्या-क्या वह कर पायेगा, क्या-क्या नहीं, कितनी सफलता उसे मिलेगी, कितनी असफलता उसके साथ है इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता मगर ये अवश्य कहा जा सकता है कि इसकी मृत्यु निश्चित है. मरना प्रत्येक व्यक्ति को है. ये अलग बात है कि उसकी मृत्यु कब, कहाँ, कैसे हो.

इस देश में मौत को लेकर तमाम दार्शनिक विचार समय-समय पर दिए जाते रहे हैं. लेखकों ने भी इस पर अपनी दार्शनिकता दिखाई है तो साधू-संतों ने भी अपने विचार रखे हैं. बहरहाल, आज जबकि सकल विश्व कोरोना वायरस से जूझ रहा है, ऐसे में भी लोग सजग नहीं हैं. लॉकडाउन जैसी स्थिति होने के बाद भी लोग अनावश्यक बाजार में टहल रहे हैं. जिन-जिन को बाजार में नहीं निकलने को मिल रहा वे अपनी गलियों, मोहल्ले में अड्डेबाजी करने में लगे हुए हैं. सरकार, परिजन, मित्र, सहयोगी, डॉक्टर्स आदि-आदि सहित वैश्विक संस्थाएँ भी लगातार अपील जारी कर रही हैं कि लोग घरों में ही रहें. अनिवार्यता जैसी स्थिति में ही घर से बाहर निकलने का प्रयास करें. सरकार की तरफ से भी लगातार इसके प्रयास किये जा रहे हैं कि लोगों को आवश्यक वस्तुओं की, राशन सामग्री की कमी न होने पाए.

इसके बाद भी जब लोग घरों में न रहकर अनावश्यक घूमते दिखाई देते हैं तो मौत के सम्बन्ध में चले आ रहे दार्शनिक विचार दिमाग में कौंधने लगते हैं. कहते हैं कि सभी की मृत्यु पहले से निश्चित है. कोई कुछ भी कर ले, कितने भी जतन कर ले मगर जिस व्यक्ति की मृत्यु जैसे लिखी है, वैसे ही होती है, उसी स्थान पर होती है, उसी निश्चित तिथि में होती है. यदि ये वाकई सत्य है तो फिर जो लोग कोरोना जैसी महामारी की विभीषिका देखने के बाद भी, रोज ही संक्रमित लोगों की, मरने वालों की संख्या देखकर भी घरों में नहीं रहना चाहते तो उनके लिए यही कहा जा सकता है कि उनको उसी भाग्य के भरोसे, नियति के हवाले कर देना चाहिए. यदि उनकी मौत कोरोना से होना ही लिखी है तो उसे कोई नहीं रोक सकता. वे चाहे घर पर रहें या घर से बाहर, यदि उनको कोरोना से ही मरना लिखा है तो ऐसा ही होगा.

फिर ऐसे में आप अनावश्यक परेशान न हों. अपना दिमाग न खर्च करें. उनको, जो अनावश्यक टहल रहे हैं, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें. उनको घर में न घुसने दें. सड़क को, बाजार को ही उनका ठिकाना बनवा दें. इसी बारे में महज दो पंक्तियाँ कहीं हैं... 
सबकी चिंता क्यों करते हो
बस अपना ध्यान रखो ना, 
जैसी जिसके भाग्य लिखी 
उस मौत का नाम कोरोना.



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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 मार्च 2019

क्षुद्र मानसिकता से संचालित विरोधी


विरोध और विरोधी विचारधारा का होना किसी भी प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्द्धा के लिए आवश्यक होता है. बिना इसके कोई प्रतियोगिता अथवा प्रतिस्पर्द्धा सफलता से संचालित नहीं हो सकती है. कुछ इसी तरह की स्थिति लोकतान्त्रिक व्यवस्था में, राजनीति में भी होती है. लोकतंत्र की सफलता के लिए, व्यवस्थित और सशक्त लोकतंत्र के लिए विरोधियों का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है. यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका अर्थ है कि या तो लोकतंत्र बीमार हो गया है अथवा जनता में, लोकतंत्र के सञ्चालन करने वालों में वैचारिकी का अभाव हो गया है. किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के सञ्चालन के लिए राजनीति उसका प्रमुख अंग है. बिना राजनीति के किसी भी संस्था का, किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का एक कदम आगे बढ़ना संभव नहीं हो सकता है. आज के दौर में जबकि सम्पूर्ण विश्व एक क्लिक पर सबके साथ जुड़ा हुआ है तब बिना राजनीति के न तो व्यक्तियों का विकास संभव है, न समाज का और न ही देश का. विकास की इस प्रक्रिया के लिए आवश्यक है कि लोकतंत्र के सभी घटकों में वैचारिक विभेद बना रहे. इस विभेद के चलते ही नए विचारों की उत्पत्ति होती है, नए-नए सूत्रों का उदय होता है, विकास की नवीन प्रक्रिया का रास्ता सुलभ होता है. 


इधर कुछ समय से देखने में आ रहा है कि देश में राजनैतिक रूप से विरोध की स्थिति नकारात्मक होती चली जा रही है. सत्ता पक्ष और विपक्ष का विरोध तो सदैव से रहा है. यहाँ किसी एक दल को संदर्भित किया जाना उद्देश्य नहीं है. आज जो दल सत्ता में है जब वह विपक्ष में था तो उसके द्वारा तमाम सारे बिन्दुओं का विरोध किया गया था, किया जाता था मगर सत्ता में आने के बाद उन्हीं सारी प्रक्रियाओं का सञ्चालन उसे भी करना पड़ा. सत्ता में आने के बाद उसे भी उन्हीं समस्याओं से जूझना पड़ा जिनसे कि तत्कालीन सत्ता पक्ष जूझ रहा था. बहरहाल, राजनीति में यह संघर्ष सदैव से चलता रहा है, चलता रहेगा किन्तु अब देखने में आ रहा है कि इस वैचारिक विरोध के बीच से स्वस्थ मानसिकता समाप्त होती जा रही है. वर्तमान में देश के लगभग सभी सत्ता-विरोधी दलों का एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह से सत्ता पक्ष को बदनाम करना है. इसके लिए विरोधी किसी भी स्तर तक जाने को तैयार हैं. विद्रूपता तो तब हो गई जबकि राजनैतिक रूप से विरोधी माने जाने वाले दल केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करते-करते देश का, सेना का, सैनिकों का विरोध करने लगे. यह स्थिति तब भी सहन करने वाली होती यदि इसे महज राजनैतिक विरोध के रूप में देखा-समझा जाता मगर ऐसा नहीं हुआ. राजनीति में सबकुछ अपने पक्ष में करने की मंशा से, सिर्फ और सिर्फ सत्ता पाने की लालसा में इन लोगों ने सेना पर, सैनिकों पर ही सवाल खड़ा कर दिया. 

बहुत पुरानी बातें न करके अभी हाल की घटनाओं पर नजर डालें तो लगता है कि यदि देश का सञ्चालन वाकई इनके हाथों में चला गया तो ये क्या-क्या न कर गुजरेंगे. पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सीमा में घुसकर उसके आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया. इस कार्यवाही से बौखलाए पाकिस्तान ने दूसरे दिन भारत की तरफ अपने विमान दौड़ाए मगर हमारी चौकन्नी सेना के चलते वह किसी तरह की वारदात को, हमले को अंजाम नहीं दे सका. पाकिस्तान का एक विमान मार गिराया गया वहीं हमारा एक जांबाज़ विंग कमांडर उनकी गिरफ्त में आ गया. इधर सम्पूर्ण देश उस वीर की सुरक्षित वापसी के लिए मनोकामना कर रहा था वहीं विरोधी दल एक महिला को उसी वीर विंग कमांडर की पत्नी बताते हुए वीडियो ज़ारी करवा रहे थे. इसके साथ-साथ ऐसी ही विकृत सोच वालों  की तरफ से एक वीडियो और वायरल किया गया जिसमें दिखाया गया कि कैसे भारत वापसी के ठीक पहले विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तानी सैनिकों के साथ डांस कर रहे हैं, खुश हैं. इन दो वीडियो को न केवल विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं, समर्थकों द्वारा शेयर किया गया बल्कि कई दलों के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों द्वारा भी शेयर किया गया. बिना इस शर्म-लिहाज के कि एकदम झूठे वीडियो भारतीय जनता के बीच शेयर किये गए. यह दिखाया गया कि कैसे सरकार गलत बातें कर रही है, दिखाने की कोशिश की गई कि कैसे दुश्मन देश में बंद हमारा सैनिक प्रसन्न है, नाच रहा है.


ये समझने वाली बात है कि पड़ोसी देशों से मित्रता अच्छी बात है. यह भी सभी लोग मानते हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं मगर जब देश में इस तरह का संकट बना हो तब विरोधी दलों द्वारा बजाय सरकार का साथ देने के इस तरह की घिनौनी हरकत की जा रही है. सेना द्वारा की गई एयरस्ट्राइक के सबूत मांगे जा रहे हैं. आतंकियों के मारे जाने पर भी सन्देश व्यक्त किया जा रहा है. पुलवामा हमले को आतंकी घटना समझने के बजाय इसे चुनावी लाभ के लिए सत्ता पक्ष द्वारा करवाया गया हमला साबित करने के प्रयास किये जा रहे हैं. देखा जाये तो देश बहुत ही गहरे संकट से गुजर रहा है, जहाँ एक तरफ सीमा पार दुश्मन हैं वहीं देश की सीमा के अन्दर ही ऐसे न जाने कितने दुश्मन हैं जो आपातकाल में दुश्मन से भी ज्यादा घातक सिद्ध हो सकते हैं. विरोध की इतनी निकृष्ट मानसिकता के द्वारा, इतनी क्षुद्र सोच के द्वारा सबकुछ किया जा सकता है, मगर न तो राजनीति की जा सकती है, न देश का भला किया जा सकता है, न सेना का, सैनिकों का, नागरिकों का सम्मान किया जा सकता है.  

29 जून 2018

क्या वाकई यहाँ सरस्वती नदी विलुप्त हो रही है?


मजे की बात ये है कि उक्त वीडियो में आप सरस्वती नदी को लुप्त होते हुऐ देख सकते हैं.

हम सभी ने पवित्र नदियों  गँगा,  यमुना और सरस्वती के बारे मे सुना ही है मगर देखा केवल गँगा, यमुना को है. इस वीडियो में दिख रही नदी को सरस्वती बताया जा रहा है. इस स्थान पर आकर सरस्वती नदी गुप्तगामिनि हो जाती है. ये जगह उत्तराखंड मे बद्रीनाथ से आगे भीमपुर के माणा गाँव के पास है. कहते हैं कि यहीं पर व्यास जी ने महाभारत की रचना की थी. उसके लेखन में गणेश जी सहयोगी बने थे और सरस्वती नदी के बहाव के शोर मे गणेश जी व्यास जी को नहीं सुन पा रहे थे. इसलिये व्यास जी ने उसे श्राप दिया और वो धरती के अंदर लुप्त हो गई. 

वीडियो में भी कुछ ऐसा ही दिखाया गया है. असलियत क्या है, ये तो वीडियो बनाने वाला जाने या फिर वैज्ञानिक. इसके बाद भी जो कुछ वीडियो में दिख रहा है वह किसी आश्चर्य से कम नहीं. 

देखिये आप भी. 


23 अगस्त 2011

अन्ना आन्दोलन के पहले सप्ताह की चित्रमय प्रस्तुति = उरई (जालौन) उ0प्र0


अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में सम्पूर्ण देश की सहभागिता किसी किसी रूप में रही हैउत्तर प्रदेश के जनपद जालौन के उरई नगर में भी ये आदोलन अपने चरम पर बहुत ही अहिंसात्मक रूप से चल रहा हैइस आन्दोलन के पहले दिन से ही सभी वर्गों की सशक्त भूमिका रही हैप्रत्येक क्षेत्र से इस आन्दोलन के द्वारा भ्रष्टाचार को समाप्त किये जाने के सम्बन्ध में भी अपने-अपने स्तर पर प्रयास भी किये जा रहे हैं

उरई में चल रहे इस आन्दोलन के पहले सप्ताह (१६ अगस्त से २२ अगस्त २०११) तक की गतिविधियों की चित्रमय झांकी आप सभी के अवलोकनार्थ यहाँ प्रस्तुत है




31 अक्टूबर 2010

30 अक्टूबर 2010

इन युवाओं से कुछ सीखो पुरातनपंथी देशवासियों -- यही विकास है, आधुनिकता है


आई आई टी में हुआ एक ड्रामा और इसके बाद शुरू हुई बहस। कुछ कहना नहीं है बस वही ड्रामा दिखाना है। इसका समर्थन करने वाले इस ड्रामे में शामिल लड़कियों की जगह अपनी बहिन बेटियों को खडा करके इसका समर्थन करें तो बेहतर रहेगा।

जय भारत, जय युवा




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इस वीडियो को आप सभी ने देखा होगा। यदि बोर हुए हों तो माफ़ करियेगा। देश के भविष्य की तस्वीर बनाई जा सकती है।
साभार यू ट्यूब से
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कल रविवार के कारण क्षेत्र का दौरा नहीं, अवकाश भी नहीं बाक़ी काम निपटाना है। पोस्ट विश्लेषण का काम भी वाधित रहेगा चुनाव तक, क्षमा करियेगा।

27 मई 2010

दलितों के उत्थान के लिए प्रकट हुईं अंग्रेजी देवी (Godess English)

दलितों की देवी अंग्रेजी देवी के मंदिर की स्थापना

पुरुषों के लिए महात्मा बुद्ध और महिलाओं के लिए देवी अंग्रेजी (Goddess English)






NDTV पर दिखाए जा रहे कार्यक्रम से रिकोर्ड करके.....

01 मई 2010

ब्लॉग जगत में आज हमने कर ली चार सौ बीसी


आखिर आज हो ही गई चार सौ बीसी। बहुत विचार किया था पहले भी कि 420 शब्द आया कहाँ से? इतना तो पता था कि 420 का अर्थ कानून की धारा से लगाया गया है और धोखाधड़ी करने वालों को इसी धारा के अन्तर्गत सजा जैसा प्रावधान होगा।

आज अपनी 420 वीं पोस्ट पर कुछ चार सौ बीसी दिखाने का विचार किया। गूगल पर जाकर इधर-उधर टहल मारी पर ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे मजा आये चार सौ बीसी का। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें? ऐसी हालत में ब्लाग जगत के कुछ प्रबुद्धजनों में से प्रमुख श्री दिनेशराय द्विवेदी जी का स्मरण हो आया।

याद आया कि माननीय द्विवेदी जी वकालत से सम्बन्धित हैं तो उन्होंने कभी न कभी तो चार सौ बीस पर प्रकाश डाला होगा। विश्वास के सहारे उनके ब्लाग ‘तीसरा खम्बा’ तक पहुँच गये। बस थोड़ी इधर, थोड़ी उधर क्लिक करनी पड़ी और हासिल हो गया वह सब जो हमें चाहिए था।

उनके हमें दो आलेख पसंद आये, दोनों का लिंक आपके लिए है। आज हमारी यही चार सौ बीसी हुई। नीचे के दोनों लिंक क्रमशः उन्हीं के आलेख हैं, उनकी बिना अनुमति के आभार सहित अपनी चार सौ बीसी के लिए। आशा है कि माननीय दिनेशराय द्विवेदी जी इस चार सौ बीसी के लिए हमें क्षमा कहेंगे और 420 नहीं कहेंगे।



बहुत पहले एक फिल्म आई थी श्री 420। हमें छोटे में भी बहुत पसंद आई थी और आज भी बहुत पसंद है। फिल्म विशेष रूप से पसंद थी उसके गानों के लिए और हमारे हमेशा से पसंदीदा रहे राजकपूर के लिए।

आप भी आज की चार सौ बीसी में ये मधुर गाना सुन लीजिये....

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गाने के वीडियो के लिए you tube का आभार तथा आलेखों के लिए श्री दिनेशराय द्विवेदी जी का आभार

30 जून 2009

राखी ने बनाया अप्रैल फूल....????

राखी ने बनाया अप्रैल फूल....????

इस वीडियो को हमारे एक मित्र ने भेजा था। इधर समझ नहीं आ रहा था कि आप लोगों तक इसे कब भेजा जाये। तभी खबर मिली कि राखी स्वयंवर कर रही है। लगा कि कहीं फूल तो नहीं बनाया जा रहा है? बस मौका यही समझ आया इस वीडियो को दिखाने का।

(यह बस एक मजाक के तौर पर है, यदि किसी की भावनायें आहत हों तो हम क्षमा चाहते हैं।)

14 अप्रैल 2009

दो सौवीं पोस्ट और जावेद भाई की नज़्म-पढ़ें भी, सुने भी

अपने ब्लाग के ग्यारह माह से कुछ ऊपर के समय में बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ समझा। यह हमारी दो सौवीं पोस्ट है। क्या देखा और क्या समझा यह तो बाद में अभी अपनी दो सौवीं पोस्ट पर आपके सामने फिर जावेद भाई की एक प्रस्तुति, आशा है कि पिछली बार की तरह आपको ये भी बहुत ही पसंद आयेगी। वर्तमान संदर्भों में यह नज़्म विशेष महत्व रखती है।
चुनावी चकल्लस से आपको आज भी दूर रखेंगे, अगली पोस्ट से फिर...............।
सुनिये भी और पढ़िये भी, जावेद भाई की ये नज़्म.....

उनसे नहीं कहो कुछ, खुद एक हो जागो,
कि सत्ता चला रहे वो, जमुहाइयों के साथ।

तुम शेर हो वतन के, क्यों माँद में घुसे हो,
दुश्मन को चीर डालो, अँगड़ाइयों के साथ।

गालिब मेरे चचा थे, तुलसी थे मेरे बाबा,
मैं शेर भी पढूँगा, चैपाइयों के साथ।

जो हाथ जोड़ते थे, अब उनके हाथ जोड़ो,
पहले रखा दी कुर्सी, ऊँचाइयों के साथ।

किसका मनायें मातम, किसकी मनायें खुशियाँ,
उस्ताद सो गये हैं, शहनाइयों के साथ।

मंदिर में जन्म अपना, मस्जिद में अपनी पूजा,
गिरजा में दुआ माँगें, ईसाइयों के साथ।

05 अप्रैल 2009

जावेद भाई की कविता - सुने भी और पढ़ें भी

आज सुबह ही एक पोस्ट लिखी थी और इस समय आने का मकसद आपके सामने अपने शहर के एक कलाकार को सामने लाना है। जावेद कुदारी तो याद है आप लोगों को? जिन्हें याद है उनका आभार कि हमारे शहर के एक कलाकार को आपने याद रखा और जिन्हें याद नहीं कृपया वे यहाँ देख लें शायद कुछ याद आ जाये। बहरहाल जावेद कुदारी जितने अच्छे चित्रकार हैं उतने ही अच्छे गायक और लेखक हैं। उनके द्वारा हर गीत का अपना अंदाज है, अपनी ही रवानी है, अपना ही दर्द है। ऐसे ही एक गीत ‘अब कुम्हारों ने सदा को चाक धोकर रख दिये’ आपके सामने है। पढ़ने और सुनने दोनों रूप में, आप जैसे चाहें वैसे आनन्द उठायें।

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अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
कोई आता ही नहीं लेने दिवाली के दिए।।
न गगरिया, न है पनघट,
न है पनिहारन कहीं,
और पथिक भी जा रहे हैं,
हाथ में थरमस लिए।
अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
हर कुँए की झिर है सूखी,
आज गगरी के बिना,
रस्सियाँ मिलती नहीं अब,
सावन में झूलों के लिए।
अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
कुल्लहड़ों, मटकों, घड़ों की,
पुतलियाँ खामोश हैं,
होंठ उनके भी हैं प्यासे,
तर गले जिसने किये।
अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
गीली माटी ने अबों से,
धूल बनकर ये कहा,
नौजवां क्यों हाथ साने,
कर रहे एम0ए0 बी0ए0।
अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।

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(जावेद भाई के सामने हमारी क्या बिसात इसलिए इस पोस्ट में चुनावी चकल्लस नहीं, क्षमा करिएगा)
सुनने में मजा अलग है, कृपया यहाँ सुनें।

03 सितंबर 2008

कार्टूनी गब्बर-ठाकुर

अभी-अभी अपने एक मित्र के मोबाईल पर एक फ़िल्म का कार्टून संस्करण देखा. वाकई कमाल है. सोचा क्यों न आप लोगों के साथ भी उसे बाँट लिया जाए. फ़िल्म शोले के गब्बर और ठाकुर के ऊपर फिल्माया गया ये सीन आपको भी हंसायेगा। उन सभी के प्रति आभार जिन्होंने इस कार्टून वीडियो को बनाया और हम सबको दिखलाने के लिए जारी किया.