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17 मार्च 2026

बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया की ख़ामोशी

इस वर्ष का आरम्भ पश्चिम एशिया को एक ऐसे दोराहे पर ले आया है, जहाँ से वापसी का रास्ता हाल-फ़िलहाल युद्ध के मैदानों से गुजरता दिख रहा है. ईरान, इज़राइल-अमेरिका के बीच का छद्म युद्ध अब एक सीधे युद्ध में बदल चुका है. यह संघर्ष केवल तीन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और नई विश्व व्यवस्था के भविष्य को निर्धारित करने वाला है. इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल तीनों देशों- ईरान, इजरायल और अमेरिका के अपने-अपने निहितार्थ हैं. ईरान एक तरह से प्रतिरोधात्मक नेतृत्व का परिचायक बना हुआ है. वह इजरायल के खिलाफ कभी परदे के पीछे से लड़ता है तो कभी मिसाइलों के द्वारा सीधी चुनौती देता है. यह ईरान की बदलती सैन्य मानसिकता को दर्शाता है. यदि इस युद्ध को इजरायल के सन्दर्भ में देखा जाये तो उसके लिए यह युद्ध केवल सैन्य अभियान नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है. उसका रणनीतिक उद्देश्य अपनी सीमाओं की रक्षा करना मात्र नहीं है बल्कि ईरान के आतंकी ढाँचे- हमास, हिजबुल्लाह और हुथी को जड़ से मिटा देना है. यदि अमेरिका की बात करें तो वह इस त्रिकोण का सबसे जटिल सिरा है. अमेरिका एक तरफ इज़राइल को पूर्ण समर्थन देने की नीति अपनाना चाहता है साथ ही वह किसी भी तरह के पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध से बचना भी चाहता है. उसका उद्देश्य कतई यह नहीं कि वह ऐसे किसी युद्ध के द्वारा मध्य-पूर्व में लम्बे समय तक उलझा रहे.

 



इन तीनों देशों की स्थितियाँ कुछ भी क्यों न रही हों, वर्तमान में कुछ भी क्यों न बनी हो किन्तु सत्य तो यही है कि ये तीनों देश आज प्रत्यक्ष युद्ध में उतर चुके हैं. इस तरह की स्थितियों से साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि किसी समय विश्व पटल पर बनी एकध्रुवीय व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है. अब विश्व जहाँ बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात तो करता है साथ ही शांति के बजाय शक्ति प्रदर्शन को तैयार रहता है. एक अकेले इसी युद्ध की बात नहीं है, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे अनेक युद्ध, संघर्ष इसी का परिचायक हैं. लम्बे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष ने साफ़ कर दिया है कि यूरोपीय सुरक्षा संरचना ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है. ऐसा ही कुछ मध्य-पूर्व क्षेत्र में नजर आ रहा है. देखा जाये तो अब मध्य-पूर्व का यह तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, इस युद्ध ने खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया है.

 

यहाँ सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि अब युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गए हैं. समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह युद्ध भी अब हाइब्रिड दौर में हैं. यहाँ सीधा हमला करने के बजाय साइबर हमला किया जा सकता है. साइबर हमला करके किसी भी देश की आंतरिक मूलभूत व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है, न केवल दैनिक जीवन वाले क्षेत्रों में सेंध लगाई जा सकती है बल्कि आर्थिक सञ्चालन को भी प्रभावित किया जा सकता है. युद्ध अब केवल दो देशों के मध्य ही नहीं लड़ा जाता है बल्कि सम्बंधित देशों से कहीं दूर जमीन पर भी यह युद्ध चलता दिखता है. यदि वर्तमान ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध की बात करें तो होर्मुज जलडमरूमध्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. ईरान के कब्जे में होने के कारण यहाँ से गुजरने वाले जहाजों को उसकी अनुमति की आवश्यकता है. ऐसा न होने की दशा में समूचे विश्व में तेल की, गैस की कमी दिख रही है. कहा जा सकता है कि अब युद्ध में केवल सैनिक नहीं मरते बल्कि आर्थिक मंदी और रसद की कमी के कारण दूर देशों के आम नागरिक भी इसकी कीमत चुकाते हैं. इसे ड्रोन, मिसाइल, बम आदि के साथ-साथ युद्ध में आर्थिक हथियार का प्रयोग करना कहा जा सकता है. होर्मुज से जहाजों का निकलना प्रतिबंधित करना, अन्य देशों पर अनेक तरह के प्रतिबंधों का लगाया जाना एक तरह का हथियार ही है, जिसमें उन देशों की आम जनता पिसती है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के चलते भारत सहित अनेक देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बाधित होने से परेशानी उत्पन्न हुई जबकि ऐसे देशों का इस युद्ध से कोई सीधे-सीधे सम्बन्ध नहीं है.

 

ऐसे समय में विश्व की महाशक्तियों को समझना होगा कि शेष विश्व के लिए क्या सही है? विश्व जनसमुदाय की अपेक्षाएँ क्या हैं? अपनी शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन के स्थान पर महाशक्तियों को समझना होगा कि उनकी श्रेष्ठता सैन्य शक्ति से ज्यादा शांति बनाए रखने की क्षमता से तय होगी. यदि समय रहते हथियारों की होड़ को न रोका गया, विकास की दौड़ में शामिल न हुआ गया तो आने वाली पीढ़ियाँ बारूद की राख के भीतर ही अपना अस्तित्व खोजती रहेगी. विश्व भर में चल रहे बड़े-छोटे युद्धों, संघर्षों के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा कि अब समय आ गया है कि विश्व समुदाय केवल सीमाओं की रक्षा न करे, केवल विस्तारवाद की नीति पर काम न करे बल्कि उस साझा मानवता की रक्षा करे जो युद्ध की भेंट चढ़ रही है. सत्यता यही है कि शांति कोई विकल्प नहीं बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है.


24 जून 2025

इजराइल-ईरान युद्ध का असमंजस

ऐसा समझा जा सकता है कि पर्ल हार्बर की घटना से हम सभी परिचित ही होंगे? ऐसे समय में जबकि विश्वयुद्ध जैसा खतरा मंडरा रहा है तब पर्ल हार्बर घटना याद आना स्वाभाविक है. इसी घटना ने अलग-थलग, खामोश पड़े अमेरिका को न केवल द्वितीय विश्वयुद्ध में घसीटा बल्कि जापान पर परमाणु हमले का आधार भी तैयार किया. दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका तब तक शामिल नहीं हुआ था लेकिन जापान को भय था कि प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अपने इस नौसैनिक बेड़े के द्वारा जापान के क्षेत्रीय विस्तार को बाधित करेगा. इसी आशंका में जापानी वायुसेना ने अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर हमला करके अमेरिका को सैनिकों, नौसैनिक जहाजों, विमानों का भयंकर नुकसान पहुँचाया.

 

पर्ल हार्बर घटना का स्मरण तब हुआ जबकि इज़राइल-ईरान युद्ध से विश्वयुद्ध का खतरा नजर आया. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की अपनी जिद के चलते इज़राइल ने ईरान पर हवाई हमले कर दिए. ऐसे में ईरान ने भी पूरी तीव्रता से इजराइल पर पलटवार किया. युद्ध की इस स्थिति में अमेरिका के असमंजस भरे रुख को देखकर शंका हो रही थी कि कहीं इजराइल ने ईरान पर हमला करके गलती तो न कर दी? शंका से भरे वातावरण में अमेरिका ने ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के द्वारा ईरान के तीन परमाणु ठिकानों- फोर्दो, नतांज और इस्फहान पर हमला कर दिया. इस हमले में 125 एयरक्राफ्ट, सात बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स के द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर 13,608 किलो वजनी बस्टर बम गिराए गए. युद्ध में शामिल होने के बाद भी अमेरिका ने कहा कि वह ईरान से युद्ध नहीं चाहता है मगर यदि इस हमले का पलटवार ईरान द्वारा किया गया तो उसके परिणाम बहुत बुरे होंगे.

 



अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु संयत्रों पर हमला करने के बाद इस तरह की धमकी भरे अंदाज में बयान देने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि ईरान इसका जवाब नहीं देगा किन्तु जिस तरह से कतर, इराक, कुवैत पर उसने मिसाइलें दागी हैं, उससे ईरान ने दुनिया को दिखा दिया है कि वह अमेरिका की धमकी या उसकी दबंगई से डरने वाला नहीं है. ईरान के इस पलटवार को पर्ल हार्बर की घटना से इसी कारण संदर्भित किया जाने लगा क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने इस कार्यकाल में विध्वंसक मोड में दिख रहे हैं. आर्थिकी क्षेत्र हो, महाशक्तियों के साथ सम्बन्ध बनाये रखने का दौर हो, दो देशों के बीच युद्धविराम जैसी स्थिति लागू करवाने सम्बन्धी वार्ताएँ हों, अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ वार्तालाप का कूटनीतिक व्यवहार आदि ही क्यों न हो सभी जगह ट्रम्प आक्रामक रुख अपनाते ही दिखाई दिए. ऐसे में ईरान के पलटवार को विश्वयुद्ध की आहट समझा जा रहा था. यद्यपि ईरान द्वारा छोड़ी गई मिसाइलों से अमेरिकी एयरबेस को किसी भी तरह का नुकसान नहीं हुआ, किसी भी तरह के जानमाल को भी क्षति नहीं पहुँची है तथापि ये पलटवार अमेरिका के विरुद्ध था इसलिए वैश्विक चिंता होना स्वाभाविक थी.

 

शंकाओं, असमंजस भरे बादल उस समय छँटते नजर आये जबकि ईरान द्वारा अमेरिकी बेस पर मिसाइल दागने के बाद बदला पूरा हो जाने की बात कहे जाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के मिसाइल हमले को बहुत कमजोर बताते हुए मजाक उड़ाया. ट्रम्प ने ईरान को धन्यवाद देते हुए कहा कि तेहरान ने अपने परमाणु स्थलों पर अमेरिकी बी-2 स्टील्थ बॉम्बर हमले का जवाब देने का नाटक किया है. अपनी बात को अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि किसी भी अमेरिकी को ईरानी हमले में नुकसान नहीं पहुँचा है. मैं ईरान को हमें पहले से सूचना देने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ, जिससे किसी की जान नहीं गई और कोई भी घायल नहीं हुआ. शायद ईरान अब क्षेत्र में शांति और सद्भाव की ओर बढ़ सकता है. मैं उत्साहपूर्वक इजरायल को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करूँगा. इस तरह की सोशल मीडिया पोस्ट के साथ ही ट्रम्प द्वारा इजराइल और ईरान के मध्य युद्धविराम किये जाने सम्बन्धी पोस्ट भी लगाई गई. इस खबर को संतोषजनक और विश्वयुद्ध की आशंका के अंत के रूप में देखा जा रहा है.

 

इजराइल का ईरान पर हमला, ईरान द्वारा इजराइल को मुँहतोड़ जवाब देना, अमेरिका का असमंजस के बाद भी ईरान के तीन परमाणु ठिकानों को नष्ट कर देना, ईरान द्वारा अमेरिकी हमले का बदला लेने के लिए अमेरिकी एयरबेस पर मिसाइल हमला करने के भयग्रस्त वातावरण के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा इजराइल-ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा करना अल्पकालिक राहत ही समझ आता है. ऐसा इसलिए क्योंकि इजराइल-ईरान के मध्य युद्ध की स्थिति जिस कारण से बनी थी, अभी उसका समाधान नहीं हुआ है. इस युद्ध के केन्द्र में ईरान का परमाणु कार्यक्रम था, जो फोर्दो परमाणु संयंत्र के पूरी तरह से बर्बाद हो जाने के बाद भी अस्तित्व में है. ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा है कि ईरान ने अमेरिकी हमले से पहले ही संवर्द्धित यूरेनियम को किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया है. यदि यह अंदेशा सही है तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम उसे परमाणु बम बनाने तक ले जा सकता है. निश्चित है कि ऐसी कोई भी आशंका न तो अमेरिका के हित में है न ही इजराइल के. बारह दिनों तक चले युद्ध के बाद भी, अमेरिका के हमले के बाद भी यदि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अस्तित्व में बना रहा तो यह अमेरिका और इजराइल की प्रभुता, उसकी सैन्य क्षमता के लिए भी चुनौती होगी. फ़िलहाल तो देखना यह है कि जिस युद्धविराम की घोषणा ट्रम्प द्वारा की गई है वह कितने समय तक लागू रह पाता है.


08 अगस्त 2024

शांति, अहिंसा की वैचारिक छत्रछाया में युद्ध

हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु हमले के आठ दशक बाद भी सवाल उभरते हैं कि क्या समूचे विश्व ने उन परमाणु हमलों से उत्पन्न विभीषिका से सबक लिया? क्या विश्व की तमाम महाशक्तियों सहित छोटे-छोटे देशों ने युद्ध को रोकने जैसा कोई कदम उठाया है? 6 अगस्त 1945 और 9 अगस्त 1945 को अमेरिका द्वारा जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी में गिराए गए परमाणु बम से अनुमानित रूप में ढाई लाख नागरिक मारे गए थे. परमाणु हमला अपने आपमें भयावह घटनाक्रम था, जिसका परिणाम जापान को न केवल तत्कालीन दशा में भुगतना पड़ा बल्कि उससे उत्पन्न विकिरण के कारण आज भी वहाँ के नागरिक अनेक असाध्य रोगों का सामना करने को विवश हैं.

 

आँकड़ों में दर्ज हो चुकी मौतों, वर्तमान में विकिरण का दंश झेल रहे लोग वैश्विक पटल से गायब नहीं हैं, इसके बाद भी विश्व समुदाय ने युद्ध की उस विभीषिका से सबक लेने की कोशिश नहीं की. जापान आज भी प्रतिवर्ष शांति स्मारक समारोह आयोजित करता है. इस समारोह में विश्व भर से लोग एकत्रित होते हैं, जहाँ सामूहिक रूप से परमाणु परीक्षण और ऐसे हथियारों के प्रयोग को समाप्त करने पर सहमति बनती है. द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम किसी भी युद्ध अथवा दो देशों के आपसी संघर्ष में प्रयोग किए गए एकमात्र उदाहरण हैं. यद्यपि उस विश्व युद्ध के पश्चात् वैश्विक समुदाय ने विश्व युद्ध जैसे संकट का सामना भले न किया हो मगर किसी न किसी रूप में सम्पूर्ण विश्व में युद्ध, संघर्ष चलता ही रहा है.

 



परमाणु हमलों से उत्पन्न विभीषिका को देखने, समझने के बाद वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की रोकथाम करने सम्बन्धी दिशा में कार्य करना शुरू किया गया. अनेक देशों के द्वारा चलाये गए दशकों के सार्वजनिक अभियानों और बहुपक्षीय वार्ताओं के बाद व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) को व्यावहारिक रूप प्रदान किया गया. यद्यपि सीटीबीटी को हस्ताक्षर के लिए खोले जाने के बाद भी यह अभी तक पूर्णतः लागू नहीं हो सकी है क्योंकि कुछ विशेष राष्ट्रों, जिनके जिनके हस्ताक्षर संधि के लागू होने के लिए आवश्यक हैं, ने अभी तक संधि की पुष्टि नहीं की है तथापि इसको लागू किये जाने के प्रयास वैश्विक स्तर पर लगातार होते दिखते हैं. इस तरह के निरर्थक प्रयासों के बीच समूचे विश्व में कहीं न कहीं दो देशों के बीच तनाव, संघर्ष, युद्ध आदि को देख कर लगता है कि महाशक्तियों द्वारा, अन्य छोटे राष्ट्रों द्वारा सिर्फ परमाणु हथियारों की रोकथाम के लिए प्रक्रिया को दिखावे मात्र के लिए अपनाया जा रहा है. इस तरह के प्रयासों के द्वारा वे परमाणु हथियारों के निर्माण, उनके प्रसार, उपयोग को भले ही रोकना चाह रहे हो मगर उनका उद्देश्य आपस में युद्ध को रोकना नहीं है, दो देशों के बीच संघर्ष को रोकना नहीं है. विश्व की तमाम घोषित, स्व-घोषित, स्वयंभू महाशक्तियों, शक्तियों द्वारा यदि युद्ध रोकना, संघर्ष न होने देना ही उद्देश्य होता तो आज सम्पूर्ण विश्व पुनः विश्व युद्ध जैसी स्थिति के मुहाने पर आकर न खड़ा हो गया होता.

 

विश्व में किसी भी महाद्वीप की तरफ नजर उठाई जाये, किसी भी क्षेत्र की तरफ देखा जाये, किसी भी देश की स्थिति का आकलन किया जाये वहाँ संघर्ष, युद्ध, तनाव, हिंसा ही दिखाई दे रही है. दो वर्ष से अधिक समय से चलता आ रहा रूस-यूक्रेन युद्ध, पिछले एक वर्ष से चलता इजरायल-हमास युद्ध के साथ ही आरम्भ हुआ इजरायल-ईरान युद्ध, लम्बे समय से अपना अस्तित्व बनाये सऊदी अरब और ईरान के बीच का विवाद आदि ऐसे हैं जो समूचे विश्व का ध्यान अपनी तरफ बनाये हुए हैं. विश्व की तमाम महाशक्तियाँ आये दिन किसी न किसी रूप में इन युद्धों में अपनी उपस्थिति दर्शा ही देती हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में तो परमाणु हमले की आशंका तक नजर आने लगती है. इन युद्धों के अलावा दक्षिण एशिया क्षेत्र विगत लम्बे समय से अशांत बना हुआ है. यहाँ दो देशों के बीच भले ही वर्तमान में युद्ध न चल रहा हो किन्तु स्थितियाँ युद्ध से कम नहीं हैं. भारत के अनेक पडोसी देशों से होने वाली आतंकी घटनाएँ एक तरह का युद्ध ही हैं. इसी में हाल के समय में पाकिस्तान, श्रीलंका, अफगानिस्तान, बांग्लादेश आदि की तख्तापलट की घटनाएँ, कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा अपनी जान बचाकर देश छोड़ने की घटनाएँ, इन देशों में आंतरिक हिंसात्मक घटनाएँ यहाँ के नागरिकों को युद्ध की तरफ ही धकेलती हैं.

 

सोचने वाली बात है कि आये दिन किसी न किसी कार्यक्रम, समारोह के द्वारा शांति, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव आदि का पाठ पढ़ाने वाले देश, युद्ध की विभीषिका से परिचित करवाते अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्यों अपने प्रयासों में विफल हो जाते हैं? जापान सहित अनेक देशों ने हिरोशिमा, नागासाकी परमाणु हमलों की बरसी को मनाते हुए इससे प्रभावित हुए लोगों के सम्मान में विचार भी व्यक्त करेंगे मगर इससे सबक लेते हुए खुद को युद्ध से दूर रहने का संकल्प नहीं दिखायेंगे. शांति, अहिंसा, सद्भाव की वैचारिक छत्रछाया में पूरी दुनिया युद्ध से घिरी रहेगी.   


19 मार्च 2024

पुतिन की विजय और विश्वयुद्ध की चेतावनी

रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन ने तीसरे व‍िश्‍वयुद्ध को लेकर एक बार फिर बड़ी चेतावनी दी है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यदि नाटो की सेना और रूसी सेना में संघर्ष हुआ तो दुनिया तीसरे विश्‍वयुद्ध से एक कदम दूर होगी. इस तरह का बयान उस समय आया है जबकि पुतिन राष्ट्रपति चुनाव को ऐतिहासिक बहुमत से जीत कर अगले छह वर्षों के लिए रूस के राष्ट्रपति बन गए हैं. उनको राष्ट्रपति के चुनाव में 87.29 प्रतिशत मत मिले हैं, जो रूस के सोवियत इतिहास के बाद का सबसे बड़ा परिणाम है. इन चुनावों में पुतिन को मिली जीत ने उनके पाँचवें कार्यकाल का मार्ग प्रशस्त किया. गौरतलब है कि पुतिन 1999 से राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के रूप में रूस का नेतृत्व करते आ रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान मिली विजय वहाँ के नागरिकों का उनके प्रति विश्वास और उम्मीद का सूचक है. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि पिछले तीन चुनावों में उनको प्राप्त मतों का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही रहा है. 2012 में उनको 63.6 प्रतिशत, 2018 में 76.7 प्रतिशत और 2024 में हुए चुनावों में 87.29 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं.

 



पुतिन की इस विजय को कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण इस कारण से माना जा रहा है क्योंकि उनके द्वारा अपने नागरिकों से लगातार वादा किया गया कि वे पश्चिमी देशों द्वारा रूस के वैभव को बर्बाद करने की, रूसी अर्थव्यवस्था को नकारात्मक दिशा में पहुँचाने की साजिश को सफल नहीं होने देंगे. उन्होंने ऐसा करके भी दिखाया है. यूरोपियन देशों सहित अमेरिका द्वारा किये जाने वाले विरोध और प्रतिबंधों के बाद भी रूसी अर्थव्यवस्था पर पुतिन ने संकट नहीं आने दिया. विगत लम्बे समय से यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध से उत्पन्न माहौल को भी पुतिन के खिलाफ ले जाने के सारे प्रयास असफल ही रहे हैं. इसके उलट इन दिनों में पुतिन की रेटिंग में उछाल भी आया है. यूक्रेन पर हमला किये जाने के समय पुतिन की रेटिंग 71 मानी जा रही थी जो अब बढ़कर 86 हो गई है. रूसी राष्ट्रपति भी इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि पश्चिमी देश लगातार रूस के खिलाफ साजिश करते रहे हैं. इसी कारण से उन्होंने अपनी विराट विजय के पश्चात् सबसे पहले पश्चिमी देशों को आगाह करते हुए विश्वयुद्ध जैसी स्थिति की चेतावनी दे डाली.

 

देखा जाये तो रूस-यूक्रेन युद्ध ने 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट के बाद पश्चिम के साथ रूस के सम्बन्धों में सबसे गहरा संकट पैदा कर दिया है. उस समय अमेरिका के नजदीक क्यूबा में मिसाइल तैनाती के एक मुद्दे पर तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका खुलकर आमने-सामने आ गए थे. यद्यपि पुतिन ने विश्वयुद्ध के प्रति पश्चिमी देशों को चेताया तो है तथापि उन्होंने यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध में परमाणु बम की जरूरत को नकारा.

तमाम रक्षा व‍िश्‍लेषकों का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी देशों और रूस के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँच गया है. इस तनाव का एक कारण यूक्रेन में नाटो सेनाओं की उपस्थिति की आशंका है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन पूरे विश्वास के साथ इस बात को मानते हैं कि नाटो के सैनिक और विशेषज्ञ यूक्रेन में उपस्थित हैं, जो रूस के साथ युद्ध में उनको सहायता, सलाह दे रहे हैं. ऐसी स्थिति को मानने के साथ-साथ विगत दिनों फ्रांस के राष्‍ट्रपति मैक्रां ने एक बयान में संकेत दिया कि वे भव‍िष्‍य में यूक्रेन में नाटो की जमीनी सेना की तैनाती की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकते हैं. इस बयान से यूक्रेन में नाटो सैनिकों के होने के पुतिन के दावे को बल मिलता है. यद्यपि मैक्रां के बयान के बाद कई पश्चिमी देशों ने अपने को इससे दूर बताया है तथापि फ्रांसीसी राष्‍ट्रपति को पूर्वी यूरोप के कई देशों का साथ भी मिला. पुतिन का विश्वयुद्ध की आशंका वाला बयान फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान की प्रतिक्रिया माना जा रहा है.

 

पुतिन के विश्वयुद्ध सम्बन्धी बयान को भले ही फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान की प्रतिक्रिया माना जाये किन्तु वर्तमान विजय के पश्चात् यह तो स्पष्ट है कि रूस और पुतिन पहले से ज्यादा सशक्त, मजबूत बनकर उभरे हैं. उनका यह उभार पश्चिमी देशों की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त है. विगत लगभग तीन वर्षों से चले आ रहे रूस-यूक्रेन युद्ध में अमेरिका खुलकर यूक्रेन का साथ देता दिख रहा है. रूस एक तरह से यूक्रेन के साथ-साथ अमेरिका, नाटो सेनाओं के साथ युद्ध करता आ रहा है. इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि रूस विश्व के सर्वाधिक परमाणु हथियारों और सुपरसोनिक मिसाइलों वाला देश है और पुतिन उसी देश के सर्वशक्तिमान नेता हैं. ऐसे में इस विजय के पश्चात् यह युद्ध रुकने अथवा शंतिपरक पहल के रास्ते पर जाने बजाय और तीव्र हो सकता है. अब पुतिन खुद को कमजोर सिद्ध करने के स्थान पर वैश्विक रूप से और अधिक ताकतवर महाशक्ति के रूप में उभरने का रास्ता अपना सकते हैं. ऐसे में सम्भव है कि विश्वयुद्ध की ये चेतवानी पश्चिमी देशों तक अपनी विजय की हनक को पहुँचाने का कदम हो. फिलहाल दुनिया भले ही तीसरे विश्वयुद्ध का सामना न करे किन्तु यदि जल्द ही शांति का माहौल नहीं बनता है तो दुनिया निश्चित ही विश्वयुद्ध जैसे हालातों का सामना तो कर ही सकती है. 





 

31 अक्टूबर 2023

युद्ध के विश्व युद्ध में बदलने की आशंका

उधर रूस-यूक्रेन युद्ध रुकने का नाम नहीं ले रहा और इधर इजरायल पर हमास के जबरदस्त हमले के बाद जिस तरह से इजरायल ने अपनी प्रतिक्रिया दी, उसे देखते हुए लगता नहीं है कि वह अपनी सैन्य कार्यवाही को जल्द रोकेगा. फरवरी 2022 में रूस ने विशेष सैन्य अभियान बताकर यूक्रेन के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया था. तब से दोनों के बीच युद्ध जारी है. इसके चलते परमाणु युद्ध का खतरा भी नजर आया. इस आशंका को बल तब मिला जबकि रूस ने परमाणु हथियारों की पहली खेप बेलारूस भेजी. इसके अलावा यूक्रेन समेत कई देश अपने नागरिकों को एक खास दवा, एंटी-रेडिएशन पिल्स बाँट रहे हैं जो परमाणु हमले के बाद लोगों को घातक रेडिएशन से बचा सकती है. 


परमाणु हमले की आशंका के बीच सशंकित विश्व के लिए एक बुरी खबर उस समय आई जबकि फिलिस्तीन के आतंकी संगठन हमास ने इजरायल पर जबरदस्त रॉकेट छोड़े. इसके साथ ही हमास के आतंकियों ने इजरायल की सीमा में घुस कर कई नागरिकों और सैनिकों को बंधक बनाया. इसके बाद इजरायल की तरफ से लगातार जबरदस्त सैन्य कार्यवाही की जा रही है. उसने गाजा पट्टी में घुसकर हमास के ठिकानों को नष्ट करना शुरू कर दिया है. उसके द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया कि वह गाजा पर कब्ज़ा नहीं करने जा रहा है किन्तु उसकी सैन्य कार्यवाही हमास को ख़त्म करके ही रुकेगी. हमास और इजरायल में जारी जंग के बीच अमेरिका ने पूर्वी सीरिया पर दो स्थानों पर एयरस्ट्राइक की है. पेंटागन ने कहा कि ये हमले अमेरिकी ठिकानों और कर्मियों के खिलाफ हाल ही में किए गए ड्रोन और मिसाइल हमलों का जवाब है. पिछले सप्ताह की शुरुआत में अमेरिकी सैनिकों पर सीरिया में हमले हुए थे.




देखा जाये तो इजरायल-हमास युद्ध में पूरी दुनिया दो खेमों में बँट चुकी है. अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस आदि इजरायल का समर्थन कर रहे हैं जबकि उसके विरोध में ईरान, सीरिया, लेबनान, सऊदी अरब, रूस आदि हैं.  रूस-यूक्रेन युद्ध में अमेरिका यूक्रेन के साथ ढाल बनकर खड़ा है. अमेरिका ही नहीं बल्कि नाटो सैन्य संगठन के सभी देशों ने यूक्रेन की मदद की. अब उसने इजरायल के साथ एकजुटता जतायी है. अमेरिका और नाटो देशों की ओर से इजरायल को हथियारों की सप्लाई होने लगी है. अमेरिका ने अरब सागर में अपने जंगी बेड़े को उतार दिया है. साथ ही उसने मिडिल ईस्ट में अपने खतरनाक टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस सिस्टम को तैनात किया है. यह अमेरिका का सबसे आधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, जो मीलों दूर से आ रही मिसाइल का पता लगाने में सक्षम है. ब्रिटेन ने भी पूर्वी भूमध्यसागर में जासूसी विमान, दो युद्धपोत, मर्लिन हेलीकॉप्टर और सौ रॉयल मरीन कमांडों की कंपनी स्टैंडबाय मोड में रखी हैं जो इजरायल को जरूरत पड़ते ही सक्रिय होंगे. ऑस्ट्रेलिया ने मिडिल ईस्ट में बड़ी संख्या में जवानों के साथ-साथ दो सुपर हरक्यूलिस विमान भी तैनात किए हैं.


इजरायल विरोधियों में लेबनान ने हमास के समर्थन में इजरायल पर बम बरसाए, हिजबुल्ला ने रॉकेट दागे तो हूती आतंकियों ने भी इजरायल पर हमले किये हैं. इजरायल के खिलाफ ईरान और सीरिया का आना हुआ तो सउदी अरब और ईरान जैसे धुर विरोधी भी दुश्मनी भूल कर फ़िलिस्तीन के साथ खड़े हो गए हैं. लीबिया ने भी कहा कि अगर बॉर्डर खुला तो हमास के लड़ाकों की मदद के लिए सेना और हथियार दोनो भेजेंगे. गाजा पर हमले को लेकर तुर्की ने इजरायल और पश्चिमी देशों पर भड़कते हुए कहा कि हमास आतंकवादी संगठन नहीं बल्कि मुक्ति समूह है, देशभक्त संगठन है जो अपनी जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहा है. रूस का झुकाव भी फिलिस्तीन की तरफ है. उसके कई अधिकारी काफी समय से हमास के नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं. उसने भी किंजल हाइपरसोनिक मिसाइलों सहित विमानों को काला सागर में तैनाती का आदेश दिया है. चीन ने भी मिडिल ईस्ट में अपने युद्धपोतों की तैनाती अरब देशों को समर्थन देने के उद्देश्य से की है.


इन घटनाओं के एक-एक करके सामने आने पर पहले दोनों विश्व युद्धों का स्मरण अनायास हो आता है. दोनों विश्व युद्ध आरंभिक दौर में दो देशों के बीच युद्ध ही थे जो कालांतर में अन्य देशों के शामिल होने से विश्व युद्ध में बदल गए. वर्ष 1914 से ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के उत्तराधिकारी आर्चड्यूक फर्डिनेंड की हत्या का आरोप सर्बियाई सरकार पर लगा. आस्ट्रिया ने उसके खिलाफ जंग छेड़ दी.  धीरे-धीरे बाकी देश भी शामिल होते चले गए और दो देशों की जंग विश्व युद्ध में बदल गई. वर्ष 1918 को जर्मनी के समर्पण  के साथ ही पहला विश्व युद्ध समाप्त हो सका. इस समर्पण में ही दूसरे विश्व युद्ध ने जन्म ले लिया था.


जिस तरह से सभी बड़े देशों ने जर्मनी को मजबूर किया था और उस पर अनेक प्रतिबंध लगाए. वर्ष 1933 में हिटलर के जर्मनी का सैन्य शासक बनते ही ऑस्ट्रिया उसके पक्ष में आ गया. वर्ष 1939 में चेकोस्लोवाकिया पर कब्जाकर हिटलर ने पोलैंड पर हमला कर दिया. यहीं से दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ. इसमें एक तरफ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और सोवियत संघ जैसे बड़े देश थे तो दूसरी तरफ जर्मनी, जापान और इटली. हिटलर की सेना के हावी होने पर सारे देशों ने मिलकर उस पर बमबारी कर दी. हिटलर के खुदकुशी करने पर जर्मनी चुप हो गया. अमेरिका के परमाणु हमले के बाद जापान ने भी हथियार डाल दिए. इस तरह से वर्ष 1945 को दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ.


रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल-हमास युद्ध, दोनों में विश्व के अन्य देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जंग कर रहे हैं. यदि हमास के समर्थन में खाड़ी देश एकजुट होकर इजरायल पर हमला करते हैं तो अमेरिका सहित अन्य देशों के युद्ध में कूदने की आशंका से विश्व युद्ध का खतरा है. अब यह युद्ध सिर्फ इजरायल और हमास के बीच नहीं है बल्कि आपस में प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच शक्ति प्रदर्शन है. यदि हमास और उसके समर्थक देश अपनी जिद पर अड़े रहे, जल्द ही इनके बीच युद्ध विराम नहीं होता तो इस युद्ध के विश्व युद्ध में बदलने की आशंका है.