विसंगतियाँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विसंगतियाँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

30 सितंबर 2018

ह्युमन पप्स कम्युनिटी : विकृत यौन मानसिकता का दुष्परिणाम


इस लेख को पढ़ने के पहले इसके साथ संलग्न चित्र अवश्य देखें. एक चित्र में एक महिला के साथ बैठा हुआ कुत्ता दिख रहा है. दूसरे चित्र में एक व्यक्ति जानवरों की तरह से सड़क पर चल रहा है, जबकि वह कपड़े पहने हुए है.

चित्र एक 

चित्र दो 

पहली तस्वीर में दिखाई देने वाला कुत्ता असल में कुत्ता नहीं है बल्कि एक आदमी है. यह इस तरह की ड्रेस में इसलिए है क्योंकि इसे लगता है कि वो सेक्सुअली एक कुत्ता है. वह चाहता है कि उसके साथ एक कुत्ते की तरह ही व्यवहार किया जाये. ऐसी मानसिकता से ग्रसित लोगों के लिए ऐसी ड्रेस वे कम्पनियाँ बना रही हैं जो सेक्स टॉयज़ बना रही हैं. वे इस तरह की ड्रेस की बहुत ऊंची कीमत भी वसूलती हैं. इसके पीछे अभी मेडिकल साइंस का पूर्ण विकास न कर पाना भी है. स्त्री-पुरुष को आपस में बदल देने वाली मेडिकल साइंस अभी तक ऐसा कोई अविष्कार नहीं कर सकी है जिससे कि इंसान को कुत्ता अथवा किसी अन्य जानवर में परिवर्तित किया जा सके. परिणामस्वरूप कम्पनियाँ इन मानसिक कुत्तों को ड्रेस ही बेच रही है. ऐसे लोग अपने आपको ह्यूमन पप्स कहते हैं. सम्पूर्ण विश्व में फैली LGBT कम्युनिटी की तरह यह भी एक तरह की कम्युनिटी है. LGBT का तात्पर्य यहाँ Lesbian, Gay, Bisexual और Transgender से है. LGBT कम्युनिटी की तरह एक ह्यूमन पप्स कम्युनिटी भी दुनिया में मौजूद है.

ये कम्युनिटी शुरू में छुपी हुई थी, लेकिन अब इससे हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं. आपको जानकार शायद आश्चर्य हो कि ब्रिटेन के एंटवर्प शहर में मिस्टर पपी यूरोप की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. इनके अपने प्राइड क्लब हैं, ये अपनी इस स्थिति का आनंद लेते हैं और अपनी शर्तों पर जीनव जीने का दावा करते हैं. ब्रिटेन के एक चैनल channel4 पर 2016 में एक डॉक्युमेंट्री प्रसारित की गई थी और ह्यूमन पप्स की जिंदगी को लोगों के सामने लाया था. जहां उस समय भी कुछ लोगों को ये बहुत अजीब लगा था और कुछ ने इसका सपोर्ट किया था. सीक्रेट लाइफ ऑफ ह्यूमन पप्स डॉक्युमेंट्री में पहली बार ह्यूमन पप्स को ढंग से दिखाया गया था. जहां इसे पहले सिर्फ सेक्स एडिक्शन से जोड़कर देखा जाता था वहीं इस डॉक्युमेंट्री के बाद ये समझ आया कि इस तरह के लोगों को वाकई पूरी तरह से कुत्ता बनकर रहना पसंद है. किसी समय किसी इन्सान द्वारा शौकिया तौर पर शुरू की गई यह पप्स कम्युनिटी के सदस्यों की संख्या आज लाखों में पहुंच गई है. ऐसे मानसिक कुत्तों के तमाम सारे क्लब भी बने हुए हैं. वैश्विक स्तर पर ये अनेक शहरों में इकट्ठा होकर अपने अंदर के कुत्ते का गर्वीला आयोजन करते हैं. इस आयोजन में ये इंसानी-कुत्ते अपने अधिकारों की मांग करते हैं. इनकी माँग रहती है कि सम्पूर्ण विश्व इन्हें उसी सम्मान से स्वीकार करे जैसे आम लोगों को स्वीकार करती है.

इसी कम्युनिटी की तरह और भी दूसरी तरह की कम्युनिटी पाई जाती हैं, जिसे ज़ूफाइल्स कहा जाता है. ये वो लोग हैं जिन्हें इंसानों से शारीरिक आकर्षण नहीं होता है. इस कम्युनिटी में शामिल लोग सिर्फ जानवरों से सह-सम्बन्ध बनाते हैं. जानवरों से शारीरिक सम्बन्ध बनाने वालों को इस कम्युनिटी में अलग-अलग नामों से पहचाना जाता है. जैसे कुत्तों के साथ यौन सम्बन्ध बनाने वालों को साइनोफाइल्स, घोड़ों से साथ सम्बन्ध बनाने वालों को इक्विनोफाइल्स, सुअर के साथ सम्बन्ध बनाने वालों को पोर्किनोफाइल्स कहा जाता है. इसी तरह खुद को लड़की की तस्वीर में देखकर उत्तेजित होने वालों को ऑटोगाइनेफाइल्स कहा जाता है, खुद को किसी जानवर के यौन जीवन में मानने वालों को ऑटोज़ूफाइल्स, पेड़ो से सेक्स करना पसंद करने वालों को डेंड्रोफाइल्स और कीड़ों को अपने ऊपर फैलाकर यौन सुख का अनुभव लेने वालों को फॉर्मिकोफाइल्स कहा जाता है. ये सब अपने आपको सामान्य और आम लोगों की तरह बताते हैं. वर्तमान में इनकी संख्या 15 लाख से 20 लाख तक पहुंच चुकी है और अब ये अपने आयोजनों, आन्दोलनों के द्वारा अपने अधिकारों की माँग करने लगे हैं.

आधुनिकता के वशीभूत कुछ लोगों के लिए भले ही ये आश्चर्य न हो मगर सत्य यह है कि बहुत से देशों में यह वैधानिक है और बहुत से देशों में इस तरह के संबंधों को प्रतिबंधित किया गया है. जिन देशों में इसे प्रतिबंधित किया गया है वहां इसे लेकर बहुत नाराज़गी है. वे इसे भेदभाव बताते हैं और इसे समाप्त करने की बात करते हैं. देखा जाये तो सबके अपने-अपने तर्क हैं. इनका कहना है कि समलैंगिकों की संख्या ज्यादा रही इसके चलते उनकी मांगों को स्वीकार किया गया और बहुत से देशों ने समलैंगिक संबंधों को मान्यता दे दी. वे अभी संख्या में कम हैं जिसके चलते वे अभी खुली प्राइड परेड भी नहीं कर पाते हैं. ऐसी स्थिति में आकर समझ नहीं आता है कि समाज किस दिशा में जा रहा है? शिक्षा, तकनीकी के विस्तार के साथ-साथ किस तरह की मानसिकता का विकास होता जा रहा है? इसे विकास कहा जाये या मानवीय विकार की स्थिति, समझ से परे है. जीवन की सत्यता यह है कि इसकी प्रत्येक यौनिक गतिविधि का मकसद जीवन का विस्तार करना ही है. इसके बाद भी आज के तथाकथित समाजसेवी, मानवाधिकारवादी विकृति को गर्व के साथ सार्वजनिक करने से नहीं चूकते हैं. इसको समानता का अधिकार दिलाने के लिए वे लगातार आन्दोलन कर रहे हैं. 

इस तरह की असामान्य सेक्स प्रवृत्ति को मनोविज्ञान की भाषा में पैराफीलिया कहा जाता है. यहाँ खुद को विपरीत सेक्स मानने वाले समलैंगिक हों या फिर अपने आपको जानवर समझने वाले ऑटोज़ूफाइल्स, ये सब अपने आपमें असामान्य मानसिक विकृतियां ही हैं. इसके बाद भी समाज में समलैंगिकता को सामान्य व्यवहार समझा जाता है, माना जाता है. और तो और अब तो उसे क़ानूनी मान्यता मिल गई है. संभव है कि आने वाले दिनों में ह्युमन पप्स कम्युनिटी भी अपने अधिकारों और समानता के लिए आन्दोलन करे, न्यायालय में याचिका दायर करे और माननीय एक निर्णय सुनाते हुए कह दें आज से ह्युमन पप्स कम्युनिटी के सभी सदस्यों को सामाजिक स्वीकार्यता मिलती है. ऐसे सम्बन्ध गैर-आपराधिक हैं.

19 अप्रैल 2018

खुद से लड़ता हुआ इंसान


आजकल तो अब अपने से ही लड़ते रहते हैं, ये किसी भी शायराना अंदाज में कही हुई पंक्तियां मालूम हो सकती हैं पर ऐसा आजकल लगभग उन सभी के साथ हो रहा है जो दिल से देशहित में विचार करते रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि देशहित में विचार करने वालों की संख्या में कमी आ गई है अथवा लोगों ने इस ओर विचार करना बन्द कर दिया है। दरअसल हुआ यह है कि देशहित से मुख्य आजकल स्वार्थ हो गया है। इस स्वार्थ के कारण लोगों ने देशहित के स्थान पर स्वहित को तवज्जो देना शुरू कर दिया है। अपने आपसे लड़ने की बात अनायास नहीं उभरी, समाज में चल रही विचित्र-विचित्र स्थितियों के बाद लगा कि व्यक्ति स्वयं से ही लड़ने में लगा हुआ है। इस तरह के हालात सरकारों के द्वारा पैदा किये गये हैं और इन हालातों का शिकार समाज का व्यक्ति ही हो रहा है। देश के विकास की बात करता है वह आदमी जो सारा दिन अपने कार्यालय में खटने के बाद शाम को घर के सदस्यों के खाने-पीने की व्यवस्था करता है। मंहगाई की मार, सामानों की अनुपलब्धता, हर एक कदम के साथ रिश्वतखोरी जैसे हालात उसे अपने से ही लड़ने को मजबूर करते हैं।


हो सकता है कि बहुत से लोगों को इसमें शायराना अंदाज के साथ एक प्रकार की फिलोसॉफी दिखाई पड़े पर यह किसी प्रकार का दर्शन नहीं वरन् आज की कटु सत्यता है। आदमी हर कदम पर प्रताड़ित हो रहा है और मुंह ताकने का काम करता है सरकार की ओर, सरकार के नुमाइंदों की ओर। इसके बाद उसे पता चलता है कि सरकार और उसके तमाम सारे अवयव सिर्फ और सिर्फ स्वहित में लगे हैं तो एक अम आदमी के पास हताशा और निराशा के अलावा कुछ बचता नहीं है। ऐसी हताशा और निराशा यदि नक्सलवाद को पैदा करता है तो व्यक्ति को व्यक्ति से लड़ाती है। व्यक्ति का व्यक्ति से लड़ने का यही रूप जब सामने नहीं आता है तो आदमी अपने से ही लड़ने लग जाता है। उसकी यह लड़ाई उस हताशा का ही परिणाम होती है जो उसे किसी न किसी रूप में आये दिन परेशान करती है। घर के अन्दर रोजमर्रा की वस्तुओं से लेकर भौतिकतावादी सामानों में गिने जाने वाली वस्तुओं को देखें तो लगता है कि ये सब अब उनके लिए ही हैं जिनके पास सत्ता है अथवा उनके लिए जो किसी न किसी रूप में सत्ता के आसपास मंडरा रहे हैं।

हमारे तमाम सारे समाजशास्त्री, राजनीतिक विश्लेषक, विदेशनीति के जानकार किसी भी घटना के लिए एशियाई देशों के हालातों की व्याख्या कर उसका भारतीय संदर्भों में विश्लेषण करने लगते हैं पर विश्व स्तर पर घटित हुईं स्थितियों का भारतीय संदर्भ में किसी ने अध्ययन करने की आवश्यता महसूस नहीं की। इसका कारण क्या समझा जाये, या तो भारतीय इस प्रकार के परिवर्तन को लाने की क्षमता नहीं रखते हैं अथवा हमारे तमाम विश्लेषक विश्व स्तर की इन घटनाओं को पढ़ने और समझने में नाकाम रहे हैं। यहाँ याद रखना होगा कि देश जिस प्रकार के हालातों से जूझ रहा है; आये दिन आरक्षण के नाम पर होते हिंसात्मक प्रदर्शन से, विध्वंसात्मक प्रदर्शन से दो-चार होता है; वर्ग-संघर्ष के नाम पर आये दिन हत्याओं को होते देखा जा रहा है; इज्जत के नाम पर महिलाओं की इज्जत से खेलकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता हो; मासूम बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जा रहा हो; जनता के धन को मूर्तियों, पार्कों में खपा दिया जाता हो; ईमानदारी और मासूमियत के नाम पर करोड़ों के घोटालों का पता न चलता हो; बड़े से बड़ा भ्रष्टाचारी सिर्फ इस कारण से छूट जाता है कि उसके विरुद्ध पाये गये सबूत इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं; जहां दाल, चावल, रोटी, सब्जी मंहगी और सिम, कम्प्यूटर, मोबाइल सस्ते हों; सत्ता पाने के लिए तुष्टिकरण, हिंसा का सहारा लिया जा रहा हो वहां के हालातों के विस्फोटक होने को कौन टाल सकता है? यह और बात है कि संतोषम् परम् सुखम् की जो घुट्टी हम भारतीयों को बचपन से ही पिलाई जाती रही है, उसके असर को कम होने में अभी भी सालों लगेंगे। इसके साथ ही यह भी स्मरण रखना होगा कि जैसे ही इस घुट्टी ने असर दिखाना कम अथवा बन्द किया उस दिन............!!!!

शेष अभी बहुत कुछ समय के गर्भ में है, अब तो अपने से लड़ते हुए मन करता है कि छोड़ कर इस तरह की शब्दों की कारीगरी कुछ दूसरी तरह की कारीगरी शुरू कर दी जाये। शायद उसी से कुछ परिणाम निकलना शुरू हो क्योंकि समाज के दुश्मन अब शब्दों की तलवार से भयभीत नहीं होते और मरते भी नहीं; आखिर उनकी शर्म-लिहाज जो मर चुकी है।

27 दिसंबर 2015

हैप्पी न्यू इयर शो मस्ट गो ऑन


समापन के पहले ही आगमन की तैयारी देखकर हरिवंशराय बच्चन जी की पंक्ति ‘आने के साथ ही जगत में कहलाया जाने वाला’ याद आ जाती है. ये आयोजन किसी के समर्थन में नहीं होगा, ये आयोजन कोई साधारण आयोजन नहीं होगा बल्कि ये स्वागत  होगा एक और नए वर्ष का. जिन आँखों ने किसी की मौत पर आँसू बहाए होंगे उन आँखों में नए साल की रात मादकता तैर रही होगी; जो हाथ किसी की सहायता के लिए उठे थे वे लड़खड़ाते जिस्म संभालने को आतुर हो रहे होंगे; जिन होंठों से किसी शोषित को न्याय दिलाने की आवाज़ उठी थी वे लरजते होंठों से मिलन को मचल रहे होंगे.ये सोचना दुखद है कि एक झटके में दुःख, दर्द को बिसराकर अपने में सिमट जाने का हुनर हम भारतीयों में कब से, कैसे आ गया? हमारी आदर योग्य वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा की जगह एक मैं और एक तू की संकल्पना ने कैसे जन्म ले लिया? पता ही नहीं चला कि कब यहाँ मानसिक आकर्षण से इतर शारीरिक निकटता को प्रमुखता मिल गई? इन सबके बीच कई बार ये संशय भी उभरता है कि क्या हम वाकई आभासी रिश्तों, संबंधों की इमारत तैयार करने में लगे हुए हैं? क्या वाकई में हमारे लिए संवेदनाओं, शुभकामनाओं, मंगलकामनाओं आदि का कोई मोल नहीं रह गया है? औपचारिकताओं में सिमटती जा रही जिंदगी में क्या सिर्फ औपचारिकता का ही समावेश रह गया है? क्यों साल-दर-साल अनेकानेक शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करने के बाद भी हम सब सुखों, खुशियों से कोसों दूर है? ऐसे में हर बार नववर्ष का आयोजन समझ से परे रहता है. लाख समझने की कोशिश के बाद भी नाकामी ही हाथ लगती है और ऐसे आयोजनों का औचित्य समझ नहीं आता है. बहुत-बहुत कोशिशों बाद भी नया वर्ष न तो दर्द को समाप्त कर पाता है, न ही दर्द को कम कर पाता है. कभी आतंकी गतिविधियाँ, कभी महिलाओं के साथ ज्यादती, कभी बच्चियों के साथ ह्रदयविदारक घटनाएँ दिल को दहला देती हैं. इन घटनाओं के बाद ऐसे आयोजनों का शोर-हुल्लड़-उमंग-उत्साह फौरी तौर पर निपट औपचारिक दिखाई देता है. दुखों का, दर्द की एक छोटी सी लहर सुखों के, खुशियों के पहाड़ को भी नेस्तनाबूत कर देती है किन्तु?
.
किन्तु क्या... किन्तु तो किन्तु है, कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा. इस किन्तु-परन्तु के बीच सत्यता को स्वीकार करते हुए इस तरह के आयोजनों की सार्थकता को सिद्ध करना होगा. हम सब यदि वाकई में नववर्ष को यादगार बनाना चाहते हैं; यदि सच में हम सब इंसानियत के लिए कुछ करना चाहते हैं तो हमें नववर्ष के आयोजन मात्र नहीं करने चाहिए. समाज को दिशा देने वाले, इंसानियत को सशक्त करने वाले, पर्यावरण को सुधारने वाले, व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाले कार्यों को अपनाना होगा. संकल्प लेना होगा कि जिस पर्यावरण के सहारे हम जीवित हैं, उसको मिटाने का काम नहीं करेंगे. यदि हम अपने आपको सभ्य कहने का दम भरते हैं तो महिलाओं के प्रति हिंसात्मकता न दिखाते हुए इसे सत्य भी करेंगे. किंचित स्वार्थ में पड़कर बेटियों के प्रति दुर्व्यवहार नहीं करेंगे. संस्कार, संस्कृति हमारी पहचान का मूल है, इस कारण आने वाली पीढ़ी को सभ्य-संस्कारी बनाने को संकल्पित रहेंगे. परिवार जैसी महत्वपूर्ण इकाई में आ रहे विध्वंस को रोकने की कोशिश से, दाम्पत्य जीवन में आ रहे बिखराव को रोकने से, आपसी विश्वास, सहयोग की भावना पैदा करने से, रिश्तों की गरिमा को बनाये रखकर भी हम नववर्ष के आयोजन को सम्पन्न कर सकते हैं. दूसरों के लिए न सही कम से कम अपनों की खुशी के लिए चन्द सकारात्मक कदम उठाकर हम रोज नववर्ष का आनन्द उठा सकते हैं. बस इस एहसास को समझने की जरूरत है, अपनों को करीब लाने की जरूरत है, समाज के लिए जागने की जरूरत है.
.
देखा जाये तो नववर्ष महज कैलेण्डर परिवर्तन का प्रतीक है, महज एक और दिन के उदय होने का सूचक है, एक और कालखंड व्यतीत हो जाने का द्योतक है. ऐसे सूचकों के लिए, संदेशों के लिए, प्रतीकों के लिए सामजिक विसगतियों को विस्मृत कर देना, मानसिक शांति को क्लेश में बदल देना, स्वार्थ में लिप्त रहकर सारी संवेदनाओं को तिरोहित कर देना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता है. ये अपने आपमें नितांत सत्य है कि मरना-जीना अत्यंत प्राकृतिक है, आना-जाना एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है और इस प्राकृतिक चक्र के लिए दुनिया का परिचालन रुकता नहीं है. ये भी सत्य है कि दिन की रौशनी से रात को गुलजार नहीं किया जा सकता और रात के अंधेरों को कालिख बनाकर दिन के उजालों में नहीं पोता जा सकता है. लोग कल भी मरते थे, लोग आज भी मर रहे हैं, लोग कल भी मरते रहेंगे. मोमबत्तियाँ जलाने वाले हर कालखंड में मिलेंगे, श्रद्धा-सुमन प्रत्येक वर्ष अर्पित किये जाते रहेंगे, श्रद्धांजलियाँ जीवन के साथ-साथ चलती रहेंगी. सीधा सा अर्थ है कि शोक के साथ हर्ष का साम्य ही ज़िन्दगी की जीवन्तता की निशानी है. तो... तो फिर... जस्ट चिल यार... कम ऑन कूल ड्यूड.... शो मस्ट गो ऑन, कल जिन हाथों में मोमबत्तियाँ-तख्तियाँ थी, आज छलकते जाम होंगे, मदमस्त-लड़खड़ाते बदन होंगे; कल जो होंठ चीख रहे थे न्याय के लिए, आज वो आपसी जुगलबंदी में मगन होंगे. कल जो-जो हो रहा था, वो कल फिर-फिर होगा... बस नए वर्ष की रात जश्न ही जश्न होगा, सब कुछ बिसराने का मौसम होगा. सब कुछ बिसराते हुए, बाँहों में बाँहें डाले, कमर में हाथ डाले थिरकते हुए जोर से ‘हैप्पी न्यू इयर’ चिल्लाएँ.

.

07 जून 2015

बदलते सामाजिक प्रतिमान


मानव विकास की अवस्था का कारण शिक्षा को माना जाता रहा है. विकास के इस क्रम में उसने नए-नए अविष्कार किये, नए-नए तरीकों से ज्ञान अर्जित किया, नए-नए मानकों को स्थापित किया. आदिकाल में मानव ने अपने ज्ञान को प्रकृति से प्राप्त किया, अपने अनुभवों से प्राप्त किया. यहीं से उसके विभिन्न प्रकार की शिक्षा ग्रहण की. कालांतर में गुरुकुल बने, गुरु बने, आश्रम बने, विद्यालयों का निर्माण किया गया और शनैः-शनैः शिक्षा की वर्तमान पद्धति हमारे सामने आई. पढ़-लिख कर मानव ने अपना विकास किया, समाज का विकास किया, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा आदि का विकास किया. इस शैक्षिक विकास ने जहाँ एक तरफ समाज का भला किया वहीं दूसरी तरफ समाज में एक तरह का अप्रत्यक्ष नुकसान भी किया है. संभवतः ये बात स्वीकारने योग्य न लगे किन्तु ये सत्य है कि पढ़े-लिखे इन्सान से कहीं न कहीं समाज में नुकसान बहुत ज्यादा किया है. देखा जाये तो पढ़-लिख जाने के बाद इंसान ने समाज के बने-बनाये प्रतिमानों को विखंडित करने का कार्य किया, उनका ध्वंस करने का कार्य किया. यकीनन ऐसे प्रतिमानों का ह्रास होना ही चाहिए जो समाज को बाँध कर रखते हैं, समाज को पीछे ले जाते हैं, समाज में विकास की अवधारणा को खंडित करते हैं किन्तु पढ़े-लिखे समाज ने ऐसे प्रतिमानों के साथ-साथ उन सामाजिक प्रतिमानों को भी नष्ट किया जिनके सहारे समाज में एक प्रकार की सामाजिकता बनी हुई थी. शिक्षित इंसान का एक नकारात्मक पहलू ये भी रहा कि उसने विखंडित प्रतिमानों के स्थान पर ऐसे प्रतिमानों की स्थापना की जिनके द्वारा समाज नकारात्मक दिशा में भी जाता दिखा, समाज में आपसी मतभेद बढ़ते दिखे, प्रतिद्वंद्विता का विद्वेष देखने को मिला.
.
पढ़े-लिखे समाज में पारिवारिकता में ह्रास देखने को मिला, आपसी रिश्तों में मर्यादा टूटती दिखी, आधुनिकता का नाम लेकर फूहड़ता संबंधों में नजर आने लगी, प्रकृति, ईश्वर आदि को लेकर न केवल भ्रामक वरन कुत्सित तथ्यों का प्रचार-प्रसार किया गया. इस नकारात्मकता ने न मानवीय संवेदनाओं का क्षरण किया, पारिवारिकता का क्षरण किया, प्रकृति को नुकसान पहुँचाया. शिक्षित होने के बाद इंसान ने तर्क-वितर्क करने के साथ-साथ कुतर्क करना भी सीख लिया. ऐसे में उसके लिए धरती, हवा, पानी, मृदा, वृक्ष, जीव आदि में ईश्वर की उपस्थिति को सिरे से खारिज कर दिया. हम सभी जानते हैं कि भले ही इन सबमें किसी भी तरह की ईश्वरीय सत्ता का समावेश न हो किन्तु हमारे पुरखों ने इन्हें सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए ही इन सबमें ईश्वर की उपस्थिति का निर्धारण किया था. पढ़े-लिखे समाज ने सिरे से इसे नकारते हुए प्रकृति का निर्दयता से विदोहन किया. जंगलों, नदियों, जीव-जंतुओं आदि को नष्ट करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. इसी तरह का कार्य उसने पारिवारिकता को, सामाजिकता को विखंडित करने में किया.
.
यहाँ ये कहने का अर्थ कदापि ये नहीं कि इंसान जब अशिक्षित था अथवा कम पढ़ा-लिखा था तो ज्यादा  था वरन ये बताने का भाव है कि शिक्षित होने के बाद इंसान ने सही-गलत को अपने नजरिये, स्वार्थपरकता के आईने से देखना शुरू कर दिया है. जहाँ, जिस स्थिति में उसको लाभ दिखता है वो कदम उसके लिए सही है शेष गलत हैं. इसी वजह से उसने अपने सिवाय शेष अन्य को नकारने का कार्य भी किया है. इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि इंसान समाज की भरी भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस करता है, परिवार के बीच भी खुद को गैर-पारिवारिक समझता है, निराश-हताश महसूस करता है. शिक्षित होने का, पढ़े-लिखे होने का अर्थ सामाजिक प्रतिमानों का विकास करना, सामाजिकता का, पारिवारिकता का विकास करना था न कि इनका नाश करना. समाज विकास के बीच यदि इंसान इंसानियत का, मानवता का, सामाजिकता का, पारिवारिकता का विकास भी कर पाए तो उसका शिक्षित होना सही मायनों में सफल सिद्ध होगा.

.

04 जून 2015

हानिकारक खाद्य पदार्थों का विरोध हो, राजनीति न हो


बच्चों के लिए ‘बस दो मिनट’ में तैयार होने वाली मैगी संकट की स्थिति में दिख रही है. मनमाफिक घरेलू पकवानों, नाश्ते की स्वादिष्ट परम्परा को समाप्त करके मैगी विगत कई वर्षों से माताओं के लिए वरदान साबित हो रही थी. किसी भी समय नाश्ते में, भोजन में. छुट्टियों में, सुबह में, शाम में, दिन में, रात में ‘कुछ भी’ बनाकर खिलाने की बचपन की जिद का समाधान मैगी ने माताओं के हाथ में थमा दिया था. मैगी और अन्य जंक फ़ूड पारंपरिक नाश्ते पर, खाद्य पदार्थ पर भारी सिद्ध हो रहे थे. भागदौड़ भरी जिंदगी में, आपाधापी के माहौल में, शारीरिक मेहनत से बचने की कवायद में कब इन खाद्य पदार्थों ने रसोई पर कब्ज़ा कर लिया, कब हमारी मानसिकता पर कब्ज़ा कर लिया हमें पता ही नहीं चल सका. समय के साथ इन खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ता ही जा रहा है. घर हो, रेस्टोरेंट हो, होटल हो, बच्चों की पार्टी हो, वैवाहिक कार्यक्रम हो अथवा किसी भी तरह का कोई भी आयोजन सभी में ऐसे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सहजता से मिलती है. ये जानते-समझते हुए भी कि ये खाद्य पदार्थ कहीं न कहीं हमारी जीवनशैली को, हमारे शरीर को, हमारी सोच को, हमारे बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं, इनका प्रयोग कम नहीं हुआ. रसोई को थकाऊ, उबाऊ प्रक्रिया मानने, अभिभावकों के नौकरीपेशा होने ने, जीवनशैली के अनियमित होने ने भी इन खाद्य पदार्थों को स्वीकार्यता प्रदान करवा दी. माता-पिता की मजबूरी का फायदा उठाते हुए मैगी जैसे अन्य खाद्य पदार्थों ने बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी अपना दीवाना बना दिया. इस दीवानगी का खामियाजा कहीं न कहीं अपने शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के चलते भुगतना पड़ रहा है.
.
ऐसे खाद्य पदार्थों के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति अकेले हम ही चिंतित नहीं दिख रहे हैं वरन वैश्विक रूप से अनेक देश इसके प्रति चिंतित नज़र आ रहे हैं. कुछ वर्ष पहले अमेरिका, चीन सहित अनेक यूरोपीय देशों ने इन जंक फ़ूड को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी, बच्चों के शारीरिक परिवर्तनों का अध्ययन करते हुए उनके प्रतिकूल व्यवहार को सामने रखा था. अब जबकि हमारे देश में मैगी में खतरनाक तत्त्व मिलने की पुष्टि हुई है, कई-कई राज्यों में मैगी अपने परीक्षण में असफल हुई है, इससे भी इसके हानिकारक होने की पुष्टि हुई है. ऐसा नहीं है कि अकेले मैगी ही हानिकारक है और अन्य दूसरे खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ आदि सुरक्षित हैं. ये समझने वाली बात है कि जब किसी खाद्य पदार्थ को उसकी प्राकृतिक अवस्था से इतर कई-कई माह के लिए सुरक्षित रखा जाना हो तो उसको किसी न किसी रासायनिक पदार्थ के द्वारा संरक्षित करना पड़ेगा. जाहिर सी बात है कि ये रासायनिक पदार्थ भले ही खाद्य पदार्थों को, पेय पदार्थों को देखने में, स्वाद में भले ही ताजा बनाये रखते हों किन्तु इनके प्राकृतिक तत्त्वों को नष्ट करके कहीं का कहीं मानव शरीर के लिए हानिकारक बना देते हैं. स्पष्ट है कि भले ही ऐसे पदार्थ अपना दुष्प्रभाव तात्कालिक रूप में न दिखाते हों किन्तु इनके दुष्प्रभाव दीर्घकालिक अवश्य ही रहता है.
.
अब जबकि किसी भी तरह से मैगी पर कार्यवाही के चलते ऐसे खाद्य पदार्थों पर अंकुश लगाये जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है तो बजाय इसका स्वागत किये जाने के दबे-छिपे स्वर में इसका विरोध किया जा रहा है. इसको भी राजनैतिक रंग दिए जाने की कोशिश की जाने लगी है. मैगी का भले ही खुलेआम समर्थन न किया जा रहा हो किन्तु अनेक अभिभावकों द्वारा अन्य दूसरे पदार्थों पर अंकुश लगाये जाने की वकालत किया जाना अप्रत्यक्ष रूप से मैगी का समर्थन ही कहा जायेगा. ऐसे मौके पर होना ये चाहिए कि समवेत रूप से ऐसे सभी पदार्थों का विरोध किया जाना चाहिए जो बचपन के साथ खिलवाड़ करने में लगे हैं, बच्चों के भविष्य को खोखला बनाने में लगे हैं. समझना होगा कि ऐसे पदार्थों के सेवन से ही बच्चों में आक्रमकता जन्म ले रही है, समय से पूर्व उनके हारमोंस विकसित होने की खबर भी आई है, मोटापा, अनिद्रा, अवसाद जैसी अनेक स्थितियों ने भी जन्म लिया है. हम सभी को अपने लिए नहीं वरन अपने बच्चों के लिए मैगी के विरुद्ध चलने वाली प्रक्रिया में सहयोग करें. मैगी पर ही ऐसी आफत क्यों आई, मैगी अकेले पर प्रतिबन्ध क्यों, अन्य नशे वाले पदार्थों पर रोक क्यों नहीं आदि-आदि कहकर मैगी का अप्रत्यक्ष सहयोग न करें. ये हम सभी कहीं न कहीं स्वीकारते ही हैं कि ये पदार्थ शरीर पर दुष्प्रभाव डालते हैं तो महज दो मिनट की सुविधा के लिए अपने बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ न हम करें न किसी और को करने दें. एक मैगी के सहारे अन्य दूसरे दूषित, हानिकारक पदार्थों का भी विरोध करें. आइये इसके लिए बिना राजनीति किये एकजुट हो जाएँ.

.

19 अप्रैल 2015

आभासी दुनिया से बाहर निकलने की आवश्यकता


इधर दो-तीन दिनों से लगातार दुखद खबरें आ रही हैं जिनके द्वारा ज्ञात हुआ कि सोशल मीडिया पर नियमित रूप से सक्रिय कुछ व्यक्तियों ने किन्हीं कारणों से आत्महत्या जैसा कदम उठाया और अपने जीवन को समाप्त कर लिया. ये समझने वाली बात है कि सोशल मीडिया में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दिखाने वाले आखिर किस कारण से ऐसा कदम उठा लेते हैं? आखिर कोई न कोई समस्या ऐसा अवश्य ही उनके साथ रहती होगी जो उनको नितांत अकेला महसूस कराती होगी. समझा जा सकता है कि फेसबुक की इस दुनिया में कितनी भी अच्छाईयाँ क्यों न हों मगर सैकड़ों की संख्या में दोस्तों के होने के बाद भी व्यक्ति यहाँ खालीपन ही महसूस करता है. यदि ऐसा न होता तो क्यों फेसबुक पर नियमित रूप से सक्रिय रहने वाले 'आत्महत्या' करते??? सोचने और समझने की बात है कि एक मशीन के सामने बैठा व्यक्ति, एक मशीन को हाथ में लिए व्यक्ति किसी से वार्तालाप तो कर सकता है, पर वो न तो सामने वाले के मनोभावों को समझ सकता है, न ही उसका अकेलापन मिटा सकता है. ये सभी जानते हैं कि मृत्यु दुख देती है, परिचित की मृत्यु परेशान भी करती है और जिससे लगभग रोज ही किसी पोस्ट के ज़रिये, लाइक, कमेंट, मैसेज आदि के द्वारा मुलाकात होती रहती हो उसका जाना भी सालता है. इस दुःख में समझने की जरूरत है कि अकेलापन, खालीपन आभासी दुनिया के लोग, सोशल मीडिया के लोग नहीं मिटा सकते. अपने खालीपन को मिटाने के लिए हमें आपस में मेलजोल बढ़ाने की जरूरत है. मशीन के सामने से निकल कर वास्तविक समाज में घुलने-मिलने की जरूरत है. परिवारीजनों, दोस्तों, परिचितों, सहयोगियों आदि के साथ ज्यादा से ज्यादा समय देने की जरूरत है. क्रांति करने के लिए, सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए, सामाजिक कार्य करने के लिए इस दुनिया से बाहर आकर लोगों के बीच जाने की जरूरत है.
.
ये विचारणीय होना चाहिए और सामाजिक रूप से सक्रिय लोगों को इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि आखिर किन कारणों से आभासी दुनिया में अत्यधिक सक्रिय व्यक्ति वास्तविक जीवन में नितांत अकेलापन महसूस करता है? ये समस्या महज युवा वर्ग के सामने नहीं, पति-पत्नी के सामने नहीं, बच्चों के सामने भी आ रही है. इधर देखने में आ रहा है कि छोटे-छोटे बच्चे भी मोबाइल, कंप्यूटर आदि के द्वारा सोशल मीडिया में सक्रिय दिखते हैं, भले ही वे इसके लिए अपने ही परिवार के किसी बड़े की प्रोफाइल का सहारा लेते हों और उनके व्यवहार में भी एक प्रकार की खिन्नता, एक तरह की अराजकता, एक तरह का खालीपन दिखता है. इधर बच्चों के आत्महत्या करने की दुखद खबरें भी सुर्ख़ियों में रही हैं. ऐसे में सोशल मीडिया के, आभासी दुनिया के द्वारा उत्पन्न खालीपन को समझना, जानना और भी आवश्यक हो जाता है. संभव है कि यहाँ सक्रिय व्यक्ति पूरी तरह से समाज से कटा रहता है और उसे अपने आसपास के सक्रिय लोगों से ही भावनात्मकता बनाये रखने में आनन्द महसूस होता है. इसके बाद जब किसी वजह से उसको समुचित अथवा सकारात्मक व्यवहार सामने वाले से प्राप्त नहीं होता है तो उसे कहीं न कहीं खिन्नता सी महसूस होती होगी. इसी के साथ आभासी दुनिया में सक्रिय लोगों में बहुतायत ऐसे भी हैं जिनका वास्तविक दुनिया से संपर्क लगभग समाप्त सा हो गया होता है. इस कारण से आभासी दुनिया से प्राप्त खालीपन को वे वास्तविक दुनिया से भरने में असमर्थ रहते हैं. ऐसा होने की स्थिति उनको सभी से अलग, तन्हा साबित कर देती है. इस अकेलेपन में अवसाद की स्थिति पैदा हो जाने से उनके सामने खुद को समाप्त कर लेना ही एकमात्र विकल्प जान पड़ता है, फलतः वे लोग ऐसा कदम उठा लेते हैं.
.
बहरहाल ये समझने, समझाने की जरूरत है कि आभासी दुनिया नितांत आभासी ही है. एक बार निकल कर यहाँ से बाहर देखने की जरूरत है. यहाँ सक्रिय लोगों को अपने परिवार, समाज, दुनिया, यहाँ के लोग कतई बुरे नहीं लगेंगे. इस आभासी दुनिया से इतर कहीं अधिक भले, अपने से लगेंगे. दिल की तन्हाई को मिटाने के लिए, अपने खालीपन को भरने के लिए, अकेलापन दूर करने के लिए लोगों से मिलते-जुलते रहने से बेहतर कोई उपाय नहीं. अभी भी न जागे तो आत्महत्याओं की एक लम्बी कड़ी हमारे सामने बनती नज़र आएगी जो समूचे समाज के लिए शर्म की बात होगी.

.