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25 जून 2024

आपातकाल का सच और वर्तमान दौर

भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है. रेडियो पर लगभग आधी सदी पूर्व गूँजी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस आवाज़ ने देश में हलचल मचा दी थी. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत देश में आपातकाल घोषणा किया था. 25 और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने के साथ ही यह लागू हो गया था. 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक देश में 21 महीने तक आपातकाल लागू रहा. इस कदम को आज भी लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जाता है.

 

आपातकाल की व्यवस्था किसी तरह की असंवैधानिक व्यवस्था नहीं है. देश के संविधान में ही आपातकाल लागू किये जाने की व्यवस्था है. संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है. आपातकाल में नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं. ऐसी स्थिति उस समय व्यवहार में लाई जाती है जबकि सम्पूर्ण देश अथवा किसी राज्य पर अकाल, बाहरी देशों के आक्रमण, आंतरिक प्रशासनिक अव्यवस्था अथवा अस्थिरता आदि जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए. इस तरह की विषम स्थिति में समस्त राजनैतिक और प्रशासनिक  शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में चली जाती हैं. 1975 के पूर्व वर्ष 1962 तथा वर्ष 1971 में राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था.

 



देश में पहली बार आपातकाल 26 अक्टूबर 1962 से 10 जनवरी 1968 के बीच लगा जबकि उस समय भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था. दूसरी बार 3 से 17 दिसंबर 1971 के बीच आपातकाल लगाये जाने का कारण भारत-पाकिस्तान युद्ध था. दोनों स्थितियों में देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए ऐसी घोषणा की गई थी. इन दो वास्तविक विषम परिस्थितियों के सापेक्ष वर्ष 1975 की स्थितियों को देखा जाये तो आपातकाल लागू किये जाने का तार्किक आधार नजर नहीं आता है. बावजूद इसके आपातकाल लागू किया गया. अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ-साथ नागरिकों के जीवन का अधिकार भी छीन लिया गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई. प्रत्येक मीडिया सेंटर पर सेंसर अधिकारी नियुक्त कर दिया गया. उसकी अनुमति के बाद ही समाचार का प्रकाशन हो रहा था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो रही थी.

 

दरअसल आपातकाल लगाये जाने के पीछे किसी बाहरी शक्ति से खतरा होने से ज्यादा इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता जाने का खतरा दिखाई देने लगा था. 1971 में तत्कालीन भारत-पाकिस्तान युद्ध में जबरदस्त विजय और बांग्लादेश निर्माण के बाद से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. इसी के चलते उन्होंने 1971 का लोकसभा चुनाव भी प्रचंड बहुमत से जीतकर विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया था. दरअसल 1971 में बांग्लादेश बन जाने से भले ही इंदिरा गांधी को लोकप्रियता मिली मगर उसके साथ बांगलादेशी शरणार्थियों के आने से देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा. गुजरात और बिहार में इस नकारात्मकता ने आन्दोलन का रूप ले लिया. इन दोनों राज्यों से विद्यार्थियों की जबरदस्त एकजुटता को आन्दोलन की शक्ल में बदलने का काम किया बिहार के जयप्रकाश नारायण ने. उनके नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का नारा देते हुए आन्दोलन तेज होने लगा. इसके साथ ही इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत में अपनी याचिका में आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर 12 जून 1975 को फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द करते हुए अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. जगह-जगह उनके इस्तीफे की माँग उठने लगी. इसी से आक्रोशित होकर आपातकाल जैसा कदम उठाया गया.  

 

विगत कुछ वर्षों से विपक्ष द्वारा लगातार प्रचार किया जा रहा है कि वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा आपातकाल जैसी स्थितियाँ पैदा कर दी गई हैं. अभी हाल में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों में संविधान बदल देने, आरक्षण समाप्त कर देने, भविष्य में चुनाव न होने देने जैसा दुष्प्रचार किया गया. यहाँ विशेष बात यह है कि 1975 में आपातकाल की नींव रखने वाला दल आज विपक्ष में है और आपातकाल के ज़ुल्मों को सहने वाले सरकार में हैं. ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया के पर्याप्त स्वतंत्र होने की स्थिति में किसी भी प्रचार-दुष्प्रचार का आकलन राष्ट्रीय हितों को देखते हुए किया जाना चाहिए. वर्तमान पीढ़ी के बहुसंख्यक नागरिकों ने आपातकाल में प्रशासन, पुलिस की ज्यादतियों को पढ़ ही रखा है, इसके उलट बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक भी हैं जिन्होंने आपातकाल की क्रूरता को न केवल देखा है बल्कि सहा भी है. ऐसे में उन लोगों, भले ही वे राजनीति में नहीं हैं, का भी दायित्व बनता है कि वर्तमान पीढ़ी को सत्य से परिचित करवाते रहें. आपातकाल के दौर में भुक्तभोगी रही मीडिया को भी यथोचित स्थितियों के सच के साथ सामने आने की आवश्यकता है. यदि लगता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार के कार्य, नीतियाँ इस तरह की हैं जो घोषित अथवा अघोषित आपातकाल की पीठिका निर्मित करती हैं, तो उनका मुखर विरोध किया जाना चाहिए. जिस तरह से विगत वर्षों में संसद में पक्ष और विपक्ष की भूमिकाएँ देखने को मिली हैं वे प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती हैं. देश के धन और समय के अपव्यय के बीच समाप्त होते निष्फल संसद सत्रों के बीच घोषित अथवा अघोषित आपातकाल देश को नुकसान ही पहुँचायेगा.   


09 अगस्त 2023

संसद बना विपक्ष का प्रचार मंच

लोकसभा में मंगलवार को विपक्ष द्वारा मणिपुर हिंसा के सन्दर्भ में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई. यह चर्चा आठ अगस्त से शुरू होकर दस अगस्त तक चलेगी. इसी दिन प्रधानमंत्री अपना जबाव देंगे. कांग्रेस के गौरव गोगोई द्वारा लाये गए इस अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की शुरुआत उन्होंने करते हुए मणिपुर हिंसा पर डबल इंजन सरकार को पूरी तरह विफल बताया. उनके द्वारा सवाल किए कि प्रधानमंत्री मणिपुर क्यों नहीं गए? मणिपुर के मुख्यमंत्री को क्यों नहीं हटाया गया? इस अविश्वास प्रस्ताव से मोदी सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. लोकसभा में बहुमत के लिए 272 सांसदों की ज़रूरत है. यहाँ एनडीए के पास 331 सांसद हैं, जिसमें अकेले भाजपा के पास 303 सांसद हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि भले ही सभी ग़ैर-एनडीए दल एक साथ आ जाएँ फिर भी केंद्र सरकार के पास अविश्वास प्रस्ताव से बचने के लिए पर्याप्त संख्या है. हालांकि कांग्रेस के इस प्रस्ताव का समर्थन करने वाले नवगठित गठबंधन का संख्याबल से कोई लेना देना नहीं है उनका एकमात्र उद्देश्य मणिपुर हिंसा पर प्रधानमंत्री मोदी को सदन में बोलने के लिए मजबूर करना है. मणिपुर में इसी तीन मई से हिंसा हो रही है, जिसमें डेढ़ सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. 




लोकसभा में पक्ष और विपक्ष की संख्या स्पष्ट रूप से दिखने के बाद भी विपक्ष के द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने पर भाजपा सांसद द्वारा सोनिया गांधी पर तंज कसते हुए कहा गया कि उनके लिए अविश्वास प्रस्ताव का एकमात्र मूलमंत्र है, बेटे को सेट करना और दामाद को भेंट करना. ऐसा तंज कसने के सन्दर्भ में यह भी समीचीन है कि 136 दिन बाद राहुल गांधी की लोकसभा में वापसी इसी सात अगस्त को हुई है. मोदी सरनेम मामले में सजा के बाद चली गई उनकी संसद सदस्यता को लोकसभा अध्यक्ष ने फिर से बहाल कर दिया है. ऐसे में संसद में राहुल गांधी का दोबारा आने को कांग्रेस तथा उनके सहयोगी दलों द्वारा जनता के बीच इस तरह से प्रस्तुत किया जाने का विचार हो सकता है, जिससे लगे कि वे सड़क से लेकर संसद तक लगातार संघर्ष कर रहे हैं.  विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव राहुल गांधी के संसद में दोबारा आने से संदर्भित इसलिए भी लगता है क्योंकि उनके आने और अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने की तिथियों में समानता दिख रही है.  


यद्यपि राहुल गांधी की सदस्यता बहाल होने के बाद विपक्षी खेमा जोश में है तथापि इसी मानसून सत्र में अन्य कई विधेयकों के पारित होने के बीच दिल्ली सेवा बिल के पारित होने ने लोकसभा में विपक्ष के संख्याबल की वास्तविकता से परिचय करवा दिया है. चूँकि ना तो केंद्र सरकार को कोई खतरा है और ना ही विपक्ष संख्याबल के हिसाब से इस हैसियत में है कि सरकार को किसी भी तरह की परेशानी में डाल सके ऐसे में विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाने की अपनी मजबूरी को बताना पड़ा कि इसके द्वारा मणिपुर मामले पर प्रधानमंत्री का मौनव्रत तोड़ा जा सके. सोचने वाली बात ये है कि क्या मात्र प्रधानमंत्री का जबाव सुनने भर के लिए विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया होगा? यदि गंभीरता से आकलन किया जाये तो प्रस्ताव लाने की यह रणनीति अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए की जाने वाली कवायद है. इसके द्वारा एक तरफ राहुल गांधी को स्थापित करने वाला कदम भी उठाया जा रहा है, साथ ही नवगठित विपक्षी गठबंधन की मजबूती को भी जाँचा-परखा जा रहा है.


जिसे भी राजनीति की, संसद में संख्याबल की जरा सी भी जानकारी होगी उसे स्पष्ट रूप से समझ आएगा कि ये सारी कवायद विशुद्ध रूप से दिखावटी संघर्ष को दिखाने वाली है. देखा जाये तो कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल बजाय किसी तरह के सार्थक संघर्ष करने के संसद को खेल का मैदान बनाने के साथ-साथ राहुल गांधी को, अपने आपको प्रचारित-प्रसारित करने का माध्यम बनाने में लगे हैं. यदि विपक्षी दलों को वाकई संघर्ष करना है, जनता को दिखाना है तो उन्हें आपातकाल का दौर याद करना होगा. तब सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास संख्याबल आज के सत्ताधारी गठबंधन से भी बहुत ज्यादा था. पाँचवीं लोकसभा के चुनाव वर्ष 1971 में संपन्न हुए. यह स्वतंत्र आजाद भारत का पाँचवाँ आम चुनाव होने के साथ-साथ देश का पहला मध्यावधि चुनाव भी था. इसमें कुल 520 लोकसभा सीटों पर चुनाव हुए जिसमें से 352 पर कांग्रेस ने जीत हासिल की थी. यहाँ ध्यान देने योग्य एक तथ्य यह भी है कि इस चुनाव में कुल 54 पार्टियों ने अपना भाग्य आजमाया था. इसमें सीपीआई (एम) 29 सांसदों के साथ दूसरे नंबर पर रही जबकि मोरारजी देसाई की कांग्रेस (ओ) 16 सांसदों के साथ तीसरे नंबर का दल था.


उस दौर में सरकार ने न केवल संवैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग किया बल्कि प्रशासनिक बल का भी दुरुपयोग किया. विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करने जबरन जेलों में डाला गया. अनावश्यक मुकदमेबाजी शुरू हुई. ऐसे तानाशाही भरे, क्रूरता भरे दौर में भी विपक्ष ने हार नहीं मानी. उसके नेताओं द्वारा बातों के बताशे नहीं फोड़े गए. जनता के सामने अपना संघर्ष दिखाने को संसद में शाब्दिक दुर्व्यवहार नहीं किया गया, टीवी, मीडिया का सहारा नहीं लिया गया, न आँख मारी गई, न फ़्लाइंग किस उछाली गई. उस समय के विपक्ष ने संख्याबल में कम होने के बाद भी सम्पूर्ण देश की जनता को सत्ताधारी दल के विरुद्ध अपनी ताकत बना लिया था. व्यावहारिक और वास्तविक संघर्ष उसी दौर में देखने को मिला था. उसी का परिणाम था कि जबकि समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण विपक्ष ने चुनाव लड़ा और 298 सीटें जीतीं. वर्ष 1977 की जनवरी को इंदिरा गांधी ने अचानक से आकाशवाणी के जरिए देश में आम चुनाव की घोषणा की. मात्र तीन दिन, 16 मार्च से 19 मार्च के बीच चुनाव संपन्न हुए. इस लोकसभा चुनाव में जनता ने विपक्ष के संघर्ष का साथ देते हुए कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया. कांग्रेस गठबंधन को मात्र 153 सीटें ही मिलीं.


यहाँ संसद को अपने नेताओं का, अपने प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाये बैठे विपक्षी दलों को यह तथ्य भी स्मरण रखना होगा कि संसद जनता के धन से संचालित हो रही है, जिस पर एक दिन का खर्च कई करोड़ रुपये आता है. संसद की कार्यवाही सामान्यतया एक सप्ताह में पाँच दिन चलती है. प्रतिदिन की कार्यवाही सात घंटे चलाने की परम्परा बनी हुई है. एक रिपोर्ट के अनुसार संसद में एक घंटे का खर्च डेढ़ से दो करोड़ रुपए बैठता है. ऐसे में यदि एक दिन का आकलन किया जाये तो यह खर्च बढ़कर बारह-तेरह करोड़ रुपए से अधिक होता है. सोचा जा सकता है कि कैसे देश के धन का अपव्यय उसी स्थान से किया जा रहा है जहाँ देश के नीति-नियंता विराजमान हैं. विपक्षी दलों को अपने व्यवहार में, अपने चाल-चलन में सकारात्मकता लानी होगी. वातानुकूलित सदन में बैठकर महज प्रधानमंत्री के मौनव्रत को तुड़वाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव को लाने, राहुल गांधी को संघर्षशील नेता के रूप में स्थापित करने जैसे संकुचित कदमों को छोड़ना होगा. उनको अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी जनता के बीच जाकर करनी चाहिए. यदि विपक्षी दल वाकई मणिपुर मामले में संवेदित है तो वह उस हिंसा को लेकर वास्तविकता में जनता के बीच उतरे. सरकार की गैर-जिम्मेवारी को बुलंद आवाज़ में उठाये. सड़कों से लेकर जेलों तक आंदोलित रूप में नजर आये. 






 

26 जून 2020

आपातकाल के 45 वर्ष

25 जून, भारतीय सन्दर्भों में, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में यह मात्र एक तारीख भर नहीं है. इस तारीख का अपना ही एक इतिहास है, जिसे आज काले अध्याय के रूप में देखा-जाना जाता है. 25 जून 1975 की रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की नींव रखी. अगले दिन सुबह-सुबह रेडियो के द्वारा देश में आपातकाल की घोषणा हो गई. सुबह छह बजे इंदिरा गाँधी ने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए बुलाया. बैठक के तुरंत बाद ही इंदिरा गाँधी ने रेडियो पर अपने भाषण के द्वारा आपातकाल लगाये जाने की जानकारी देश को दी. उस समय फ़ख़रुद्दीन अली अहमद देश के राष्‍ट्रपति थे. कैबिनेट की बैठक में आपातकाल के प्रस्‍ताव को स्वीकृति मिल चुकी थी. उस पर अंतिम मुहर राष्‍ट्रपति को लगानी थी. इंदिरा और सिद्धार्थ शंकर ने राष्‍ट्रपति भवन पहुँच राष्‍ट्रपति को देश के हालात के बारे में अवगत कराया और आपातकाल की उपयोगिता बताई. इसके बाद राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी. यह अपने आपमें विचित्र स्थिति है कि आपातकाल की घोषणा रेडियो पर पहले कर दी गई बाद में उस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे. आपातकाल के बाद देश भर में गिरफ़्तारियों का दौर शुरू हुआ. खास बात यह रही कि महज तीन नेताओं की गिरफ़्तारी की इजाजत नहीं दी गई थी. ये तीन नेता तमिलनाडु के कामराजबिहार के जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एसएम जोशी थे.


आपातकाल लगाये जाने के पीछे उच्च न्यायालय, इलाहाबाद का एक आदेश था. 12 जून 1975 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया. उन पर वोटरों को घूस देनासरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसे चौदह आरोप लगे थे. यह मामला राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद दर्ज कराया था. इस फैसले के बाद इंदिरा गाँधी ने इस्तीफा देने से इन्कार करते हुए फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी. उच्चतम न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के इस आदेश को बरकरार रखा. यह आदेश 24 जून 1975 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश कृष्ण अय्यर ने दिया. इसके बाद इंदिरा गाँधी ने आपातकाल का सहारा लेकर राजनैतिक विरोधियों को नियंत्रण में लेने का प्रयास किया. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे. नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई. इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया. प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया था. उनके बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया. जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि कहा था. 


आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा गाँधी के राजनैतिक विरोधी और अधिक सक्रिय हो गए. विरोध की लगातार बढ़ती तीव्रता के कारण लगभग दो साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ. इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं. संसद में कांग्रेस 153 पर सिमट गई और केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ. जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस को उत्तर प्रदेशबिहारपंजाबहरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली. नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों की जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया. अपने अंदरूनी मतभेदों के कारण 1979 में जनता सरकार गिर गई. उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई लेकिन यह सरकार सिर्फ़ पाँच महीने तक ही चल सकी. इस सरकार में चौधरी चरण सिंह एक दिन के लिए भी संसद न जा सके. उनके नाम कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया.

वैसे देखा जाये तो देश में आंतरिक अशांति का खतरा होने परकिसी बाहरी देश के आक्रमण होने पर अथवा वित्तीय संकट की स्थिति दिखाई देने पर आपातकाल लगाया जा सकता है. देश ने 1962 में चीन के साथ एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान आपातकाल का सहा था. 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच का आपातकाल विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था, जिसे आंतरिक अशांति के नाम पर अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था.


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29 दिसंबर 2018

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या आपातकाल


अभी तक फिल्म का ट्रेलर देखने के अलावा कुछ और देखने को नहीं मिला मगर इसके साथ जिस तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं उनसे लग रहा है कि कहीं कुछ है जो हलचल मचाएगा. जिस फिल्म की चर्चा की जा रही है वह एक किताब पर आधारित है और वह किताब एक व्यक्ति पर आधारित है. देश के इतिहास में वह कालखंड दर्ज किया जा चुका है और उस कालखंड को सभी ने देखा भी है, उसका एहसास भी किया है. इसे लेकर लोगों में कौतूहल इसलिए भी है क्योंकि सम्बंधित किताब का रचनाकार कोई ऐसा नहीं है जिसने महज ख्याली पुलाव पकाते हुए कल्पना और वास्तविकता का सम्मिश्रण किया है. सभी को पता है कि सम्बंधित किताब का लेखक सम्बंधित व्यक्ति से अत्यंत करीब से एक-दो नहीं वरन चार साल जुड़ा रहा, वो भी मीडिया सलाहकार के रूप में. ऐसे में स्पष्ट है कि अगले ने बहुत करीब से सम्बंधित व्यक्ति को देखा-सुना है. उनके साथ होने वाली पल-पल की घटनाओं का न केवल दर्शन किया है वरन उनका विश्लेषण भी किया है. ऐसे में पुस्तक पर आधारित फिल्म को महज कल्पना या मसाला कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. 


अब जबकि महज ट्रेलर आने के बाद से विवाद सामने आने लगे हैं, ऐसा भी सुनाई दे रहा है कि कुछ राज्यों में इस फिल्म को प्रतिबंधित किया जा रहा है तब बहुत सहजता से पूछा जाना चाहिए कि आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? जो लोग विगत चार वर्षों से देश में अघोषित इमरजेंसी जैसे हालातों की बात करते दिख रहे हैं, वे बताने का कष्ट करें कि इस तरह की हरकतों को क्या कहा जाये? हालाँकि अभी ऐसी खबरों का कोई प्रामाणिक आधार नहीं है क्योंकि फिल्म का रिलीज होना अभी शेष है. इसके बाद भी जिस तरह से सोशल मीडिया में इस फिल्म के ट्रेलर पर लोगों की बौखलाहट दिखाई दे रही है वह साबित करता है कि सच्चाई कहाँ तक है. अभी अंतिम निष्कर्ष निकाल देना गलत होगा, फ़िलहाल तो इंतजार रिलीज का है. उसी के बाद दूध का दूध, पानी का पानी होगा. इसके बाद भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खानदान आधारित दल अपनी नौटंकी अवश्य ही दिखायेगा, इसका पूर्ण विश्वास है.

26 जून 2018

आपातकाल की आशंका का सच


इंदिरा गाँधी द्वारा लगाया गया आपातकाल प्रतिवर्ष जून में सबको याद आ जाता है. वर्तमान में आपातकाल का विरोध भाजपा द्वारा करने के कारण कांग्रेस सहित अन्य दल किसी न किसी रूप में उसकी वकालत करते दिख रहे हैं. ऐसे समय में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी का बयान मुझे इतना भरोसा नहीं है कि फिर से आपातकाल नहीं थोपा जा सकतायाद आता है. इस बयान के द्वारा आडवाणी ने जहाँ एक तरफ सरकार को असहज किया था वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों को आह्लाद करने का अवसर दिया था. आज भी गैर-भाजपाई दल और तमाम व्यक्ति देश में आपातकाल जैसी स्थिति बनी होने की बात करते हैं.यहाँ महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि देश में जब 1975 में आपातकाल लगाया था उस समय की स्थितियों और आज की स्थितियों में क्या कोई साम्य है? यदि इंदिरा गाँधी के आपातकाल की स्थितियों पर दृष्टि डालें तो उसके पीछे उनकी स्वार्थपरक राजनैतिक सोच दिखाई देती है. इंदिरा सरकार के न्यायपालिका से टकराव ने आपातकाल की स्थिति बनानी शुरु कर दी थी.


इंदिरा गाँधी के सत्ता में आने के ठीक पहले 27 फरवरी 1967 को सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला आया, जिसमें चीफ जस्टिस सुब्बा राव ने अपने फैसले में निर्धारित किया कि संसद में दो-तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही सीमित किया जा सकता है. इसके अलावा इंदिरा गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट के दो अन्य फैसलों को लोकसभा चुनाव जल्दी कराने का आधार बना लिया. इनमें पहला फैसला बैंक राष्ट्रीयकरण मामले से सम्बंधित और दूसरा फैसला अध्यादेश के जरिये प्रीवी पर्स को समाप्त करने की कोशिश के बारे में था. इस दूसरे फैसले से, जो खारिज कर दिया गया था, बौखलाई इंदिरा ने लोकसभा भंग कर चुनाव करवाने का फैसला किया और जीतकर आने के बाद संविधान संशोधन के जरिये प्रीवी पर्स खत्म कर दिया. इंदिरा गांधी जहाँ एक तरफ कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं वहीं विपक्षी पार्टियों के साथ भी लड़ रही थी. महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों ने इंदिरा सरकार को घेरना शुरू कर दिया था; मुद्रास्फीति रिकॉर्ड बीस फीसदी तक पहुँच चुकी थी; गुजरात, बिहार में छात्रों के आन्दोलन तीव्रता पकड़ रहे थे; तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर द्वारा छात्रों पर गोलियां चलवा दी गई थी; जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का आवाहन कर ही दिया था; आम आदमी, श्रमिक वर्ग, सरकारी कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा था, ये सब सरकार के लिए खतरे की घंटी थी. इनके चलते इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने का बहाना मिल गया था. ऐसी कोई भी स्थिति वर्तमान में दिख नहीं रही है और न ही इसकी आहट समझ आती है. न तो उनके खिलाफ आम आदमी का असंतोष है, न ही कर्मचारियों का और न ही राजनैतिक दलों की लामबंदी जैसा कुछ है. जो कुछ हल्का-फुल्का सा विरोध है, उसके आधार पर आपातकाल की आशंका जताई नहीं जा सकती. ऐसे में ये सोचने पर विवश हुआ जाता है कि एक ऐसे व्यक्ति ने, जो स्वयं इंदिरा गाँधी द्वारा लगाये गए आपातकाल में उन्नीस माह जेल में कैद रहा हो, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आपातकाल की आशंका राजनैतिक दल, मीडिया किस कारण से  व्यक्त कर रहे हैं?

आज भाजपा-विरोधी लोगों का कहना है कि इस पीढ़ी के लोगों में लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता कम हो रही है. यदि पूर्वाग्रहरहित होकर वर्तमान परिस्थितियों पर विचार किया जाये तो इन आशंका को महज केंद्र सरकार के सन्दर्भ में अथवा मोदी के सन्दर्भ में न देखकर सम्पूर्ण राजनैतिक परिवेश के सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए. विगत वर्षों में राजनीति को धन-बल, बाहु-बल बढ़ाने वाला मंच मान लिया गया है. इसके माध्यम से अकूत संपत्ति पैदा करने, बड़े-बड़े ठेके लेने, माफियाराज स्थापित करने, करोड़ों-अरबों के घोटाले करने की तृष्णा लेकर अनेक लोगों का आना-जाना हुआ. इसके चलते व्यापक रूप से देश में भ्रष्टाचार का, घोटालों का बोलबाला विगत के दशक में देखने को मिला. लोकतान्त्रिक व्यवस्था को, संसद को, संविधान को दरकिनार कर राजनैतिक दलों द्वारा, राजनीतिज्ञों द्वारा स्वार्थमयी राजनीति की स्थापना सी कर ली गई. इसके चलते आम जनता को एकदम से विस्मृत सा कर चहुँ ओर पुरजोर रूप में राजनीति को माफियाओं का, गुंडों का, दलालों का, हत्यारों, डकैतों का अखाड़ा सा साबित करने के कुत्सित प्रयास किये जाने लगे हैं. दलबदल की निर्लज्जता, स्वार्थमयी सोच के चलते महाविलय जैसी क्षणिक, चुनावपूर्व स्थितियां, सत्ता पाने के लिए निर्दलीय व्यक्ति तक का मुख्यमंत्री बन जाना आदि से समझा जा सकता है कि राजनीति के गलियारे में लोकतंत्र का, लोकतान्त्रिक शक्तियों का, संविधान का लगातार निरादर होने लगा है. अकसर लोगों द्वारा सैनिकों को लेकर सवाल किये जाते हैं कि नेताओं, मंत्रियों के बेटे सेना में क्यों नहीं जाते, सीमा पर गोली क्यों नहीं खाते, ठीक उसी तरह से प्रश्न उठता है कि नेताओं के अलावा कितने लोग हैं जो अपने बेटे-बेटियों को कैरियर बनाने की दृष्टि से राजनीति में जाने की प्रेरणा दे रहे हैं? सबकी निगाह में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लाखों-करोड़ों रुपये के पैकेज घूमते हैं, विदेश में पूरी भौतिकता, सुख-सुविधा के साथ नौकरी करने के ख्वाब तैरते हैं. निसंदेह ऐसे में राजनीति में स्वार्थमयी सोच के लोगों का समावेश होना लाजिमी है और इनके चलते लोकतंत्र कितना सुरक्षित रह पायेगा, समझा जा सकता है. यदि ऐसे लोगों के हाथों में सत्ता का सञ्चालन होगा तो भले आज न सही, आने वाले वर्षों में लोकतान्त्रिक क्षरण और बुरी तरह से होने की आशंका है.

देखा जाये तो आन्दोलन के पार्श्व से उभरे राजनैतिक दल ने, भाजपा-विरोध के लिए बने गठबंधन ने एक तरह की अराजकता को जन्म दे दिया है. युवाओं के सामने संसद, संविधान, लोकतंत्र आदि का मखौल बनाकर एक तरफ व्यवस्था परिवर्तन के लिए आन्दोलन किया जाता है वहीं दूसरी तरफ लोगों को मुफ्त का लालच देकर उनके वोटों को प्राप्त किया जाता है, सरकार पर अनावश्यक दबाव डाला जाता है. जिस तरह से युवा-शक्ति को बरगलाने का काम किया गया और उसके बाद ईमानदारी का चोला पहनकर फर्जीवाड़ा करने वाले, हिंसा करने वाले, अपराध करने वाले यहाँ भी सत्तासीन होते दिखे तो आन्दोलनों का वर्तमान मकसद समझ आना चाहिए. किसी समय आंदोलनों का उद्देश्य जनहितकारी कार्यों की पार्टी के लिए सरकार पर दबाव डालना होता था किन्तु आज स्वार्थमयी सोच के लिए रेल पटरियों को उखाड़ना, सार्वजनिक संपत्ति में आग लगा देना, हिंसा पर उतारू हो जाना किसी भी रूप में स्वस्थ लोकतान्त्रिक व्यवस्था को स्थापित नहीं करता है. ऐसे में देखना चाहिए कि क्या ये स्थितियाँ आपातकाल में संभव हैं? जिस तरह से प्रधानमंत्री को हत्यारा सहित और भी न जाने कितने जघन्य विभूषणों से पुकारा जाता है, विदेश के चैनल में बैठकर देश के प्रधानमंत्री को हटाने की बात कही जाती है, आतंकी गुट द्वारा देश के एक राजनैतिक दल के विचारों का समर्थन किया जाता हो वहां सोचना चाहिए कि आपातकाल में अभिव्यक्ति की इतनी स्वतंत्रता हासिल हो सकती है?


25 जून 2018

आपातकाल : भारतीय इतिहास का काला अध्याय


25 जून, भारतीय सन्दर्भों में, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में यह मात्र एक तारीख भर नहीं है. इस तारीख का अपना ही एक इतिहास है, जिसे आज काले अध्याय के रूप में देखा-जाना जाता है. 25 जून 1975 की रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की नींव रखी. अगले दिन सुबह-सुबह रेडियो के द्वारा देश में आपातकाल की घोषणा हो गई. सुबह छह बजे इंदिरा गाँधी ने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए बुलाया. बैठक के तुरंत बाद ही इंदिरा गाँधी ने रेडियो पर अपने भाषण के द्वारा आपातकाल लगाये जाने की जानकारी देश को दी. उस समय फ़ख़रुद्दीन अली अहमद देश के राष्‍ट्रपति थे. कैबिनेट की बैठक में आपातकाल के प्रस्‍ताव को स्वीकृति मिल चुकी थी. उस पर अंतिम मुहर राष्‍ट्रपति को लगानी थी. इंदिरा और सिद्धार्थ शंकर ने राष्‍ट्रपति भवन पहुँच राष्‍ट्रपति को देश के हालात के बारे में अवगत कराया और आपातकाल की उपयोगिता बताई. इसके बाद राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी. यह अपने आपमें विचित्र स्थिति है कि आपातकाल की घोषणा रेडियो पर पहले कर दी गई बाद में उस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे. आपातकाल के बाद देश भर में गिरफ़्तारियों का दौर शुरू हुआ. खास बात यह रही कि महज तीन नेताओं की गिरफ़्तारी की इजाजत नहीं दी गई थी. ये तीन नेता तमिलनाडु के कामराज, बिहार के जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एसएम जोशी थे.


आपातकाल लगाये जाने के पीछे उच्च न्यायालय, इलाहाबाद का एक आदेश था. 12 जून 1975 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया. उन पर वोटरों को घूस देना, सरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसे चौदह आरोप लगे थे. यह मामला राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद दर्ज कराया था. इस फैसले के बाद इंदिरा गाँधी ने इस्तीफा देने से इन्कार करते हुए फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी. उच्चतम न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के इस आदेश को बरकरार रखा. यह आदेश 24 जून 1975 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश कृष्ण अय्यर ने दिया. इसके बाद इंदिरा गाँधी ने आपातकाल का सहारा लेकर राजनैतिक विरोधियों को नियंत्रण में लेने का प्रयास किया. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे. नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई. इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया. प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया था. उनके बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया. जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि कहा था. 


आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा गाँधी के राजनैतिक विरोधी और अधिक सक्रिय हो गए. विरोध की लगातार बढ़ती तीव्रता के कारण लगभग दो साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ. इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं. संसद में कांग्रेस 153 पर सिमट गई और केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ. जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली. नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों की जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया. अपने अंदरूनी मतभेदों के कारण 1979 में जनता सरकार गिर गई. उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई लेकिन यह सरकार सिर्फ़ पाँच महीने तक ही चल सकी. इस सरकार में चौधरी चरण सिंह एक दिन के लिए भी संसद न जा सके. उनके नाम कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया.

वैसे देखा जाये तो देश में आंतरिक अशांति का खतरा होने पर, किसी बाहरी देश के आक्रमण होने पर अथवा वित्तीय संकट की स्थिति दिखाई देने पर आपातकाल लगाया जा सकता है. देश ने 1962 में चीन के साथ एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान आपातकाल का सहा था. 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच का आपातकाल विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था, जिसे आंतरिक अशांति के नाम पर अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था.

19 जून 2015

आपातकाल की आशंका वाले बयान पर बवाल नहीं चिंतन हो


लाल कृष्ण आडवाणी के आपातकाल की आशंका लगाये जाने सम्बन्धी बयान के बाद सुस्त से पड़े विपक्षी दलों में जान सी आ गई है. सबने उनके एक बयान के बहाने से मोदी सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. त्वरित प्रतिक्रिया देने की आदत के चलते और राजनैतिक मजबूरियों के चलते राजनैतिक दलों के विभिन्न नेताओं ने तो बयान देने आरम्भ कर दिए हैं. दिए जाने वाले बयानों का मंतव्य सिर्फ और सिर्फ मोदी सरकार को निशाना बनाया जाना है और ऐसा बिना आगा-पीछा सोचे किया जा रहा है. सोचने-समझने वाली बात है कि जिन आडवाणी जी ने इंदिरा गाँधी द्वारा लगाये गए आपातकाल में उन्नीस माह जेल में बिताये थे, आखिर उन्होंने किन हालातों को देख-परख लिया कि आपातकाल लगाये जाने जैसी आशंका व्यक्त की. इस बात को समझे बिना बस बयानों की बाढ़ सी आ गई है. अभी तक सहज रूप में चल रही केंद्र सरकार निरंकुश सी दिखने लगी है. अभी तक नागरिक सुविधाओं को देने वाली केंद्र सरकार आपातकाल लाने वाली लगने लगी है. सुरक्षित समझने वाला आम आदमी एकाएक खुद को असुरक्षित मानने लगा है. बयानबाजियों के खेल में ये चिंता नहीं की जा रही कि वाकई सत्य क्या है.
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मोदी सरकार ने विगत एक वर्ष में नागरिक कानूनों का, नागरिक अधिकारों का, मानवाधिकारों का, न्यायालयीन व्यवस्था आदि का किसी भी तरह से कोई हनन नहीं किया है. ऐसा भी नहीं है कि पूर्व सरकारों द्वारा जनहित में चलाई जा रही किसी भी योजना को मोदी सरकार द्वारा अवरुद्ध किया गया हो या फिर बंद किया गया हो. इसके उलट मोदी सरकार द्वारा आम जानता के हितार्थ, मजदूर, शोषित, कमजोर के लाभार्थ नई-नई अनेक योजनाओं को लागू किया गया है. लगातार आशंका जताए जाने के बाद भी किसी भी तरह की सब्सिडी को पूर्णतः समाप्त नहीं किया गया है. अल्पसंख्यक समाज में लगातार भय दिखाया गया था किन्तु आज भी अल्पसंख्यक उतने ही सुरक्षित हैं जितने की पूर्ववर्ती सरकारों में थे. यदि महंगाई, पेट्रो-कीमतों आदि को आपातकाल लगाये जाने की आहट मान लिया जाये तो फिर आपातकाल पूर्व के सरकारों में लगाये जाने की आशंका वर्तमान से अधिक प्रबल थी. इसके बाद भी न तो पूर्व में आपातकाल लगा और न ही अभी लगाया गया है.
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यदि आडवाणी जी के बयान को गंभीरता से समझा जाये तो उन्हों ने वर्तमान राजनैतिक परिपक्वता पर सवाल उठाते हुए अपनी आशंका व्यक्त की है. इस आशंका के साथ-साथ उन्हों ने अन्ना आन्दोलन पर भी सवालिया निशान लगाये हैं. यहाँ समझा जाना चाहिए कि वर्तमान हालातों में राजनीति को लोगों ने बाजारू स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है. ऐसा लगता है जैसे राजनीति देश, समाज की सबसे निकृष्टतम व्यवस्थाओं में एक है. जबकि वास्तविकता ये है कि देश, समाज, व्यक्ति, संस्थाएं एक पल को बिना राजनीति के, बिना राजनैतिक व्यवस्थाओं के चल नहीं सकती हैं. यहाँ आडवाणी जी की आशंका को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए. उन सभी लोगों को, जो राजनैतिक शुचिता की बात करते हैं सजगता से ध्यान देना चाहिए. स्वार्थपरकता में बनते गठबंधन, महाविलय जैसी स्वार्थमयी स्थितियाँ, तुष्टिकरण के नाम पर धार्मिक उन्माद फैलाया जाना, वोट-बैंक के लिए आतंकवाद का भी समर्थन कर देना आदि वे स्थितियां हैं जिनके चलते गृह युद्ध हो जाये तो आश्चर्य नहीं. और ऐसे हालातों में यदि आपातकाल लगता है तो क्या गलत होगा. लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर, राजनीति के स्थान पर व्यवस्था परिवर्तन करने आये लोगों की नजर में संविधान का, संसद का, लोकतंत्र का कोई मोल नहीं; मुफ्त के सब्जबाग दिखाकर अफरातफरी पैदा करना एकमात्र उद्देश्य हो तो आपातकाल की आशंका से कोई भी इनकार नहीं कर सकता, आडवाणी जी तो जाने-माने राजनीतिज्ञ हैं, बौद्धिक राजनीतिज्ञ हैं, चिंतनशील राजनीतिज्ञ हैं. उनके इस बयान पर बवाल नहीं बल्कि चिंतन करने की आवश्यकता है.

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