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22 दिसंबर 2025

अन्तरिक्ष तक दिव्यांगजन की उपस्थिति

बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में हुए अनेकानेक परिवर्तनों को देखते हुए ऐसा माना जाने लगा था कि ज्ञान, विज्ञान, आधुनिकता, तकनीकी, प्रौद्योगिकी, बौद्धिकता, स्वतंत्रता आदि के सन्दर्भ में इक्कीसवीं सदी क्रांतिकारी सदी होगी. ऐसा बहुत हद तक हुआ भी. समाज ने इस सदी में बहुत से बंधनों से स्वयं को मुक्त किया, विकास के अनेक नए मानकों को प्राप्त किया. बावजूद इसके बहुत से क्षेत्र ऐसे रहे जिनको लेकर समाज की सोच में बदलाव नगण्य रूप में देखने को मिला. दिव्यांगजनों के प्रति अभी भी समाज का दृष्टिकोण सहानुभूति, दया दर्शाने वाला बना हुआ है. सभी क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति को प्रदर्शित करने के बाद भी दिव्यांगजनों को कमजोर कड़ी के रूप में देखा जाता है. इसके बाद भी दिव्यांगजनों ने अपने कार्यों, अपनी क्षमताओं, अपने आत्मबल के द्वारा लगातार स्वयं को सिद्ध किया है. इस 20 दिसम्बर को जर्मनी की दिव्यांग इंजीनियर माइकला बेंथॉस ने इतिहास रचते हुए नवीन उपलब्धि हासिल की है. जर्मन एयरोस्पेस इंजीनियर माइकला रॉकेट पर उड़ान भरने वाली पैरालिसिस से ग्रस्त पहली इंसान बन गईं हैं.

 



दिव्यांग माइकला ने सबसे अलग हटते हुए अपना अलग रास्ता बनाया और खुद को अन्तरिक्ष तक पहुँचा दिया. उन्होंने अमेरिका के वेस्ट टेक्सास से ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड रॉकेट से उड़ान भरी और अन्तरिक्ष में अपनी उपस्थिति के द्वारा दिव्यांगजनों की जिजीविषा और क्षमता की उपस्थिति दर्ज की. व्हीलचेयर का प्रयोग करने वाली वे पहली व्यक्ति बन गई हैं जिसने अन्तरिक्ष की उड़ान भरी. ब्लू ओरिजिन के एनएस-37 मिशन में 33 वर्षीया माइकला के साथ पाँच अन्य यात्री भी शामिल थे. उड़ान भरने के बाद रॉकेट ने कर्मन रेखा को पार किया. यह रेखा अन्तरिक्ष की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमा है, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 100 किमी ऊपर है. इस रेखा का नामकरण वैमानिकी और अन्तरिक्ष विज्ञान में सक्रिय इंजीनियर थियोडोर वॉन कर्मन के नाम पर किया गया है. वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस ऊँचाई की गणना करते हुए बताया था कि इस ऊँचाई पर वायुमंडल इतना पतला हो जाता है कि वहाँ हवाई उड़ान सम्भव नहीं है.

 



आज से लगभग सात वर्ष पूर्व, 2018 में माइकला एक माउंटेन बाइक दुर्घटना में घायल हो गईं थीं. उस दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त होने के कारण वे कमर के नीचे लकवाग्रस्त हो गई थीं. जिसके बाद उन्होंने व्हीलचेयर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था. इस दुर्घटना के बाद जब वे व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने लगीं तो उनको लगा था कि उनका अन्तरिक्ष यात्री बनने का बचपन का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा. व्हीलचेयर पर अपने सारे काम करने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में काम करती रहीं. अन्तरिक्ष यात्रा करने के बचपन के सपने को पूरा करने के लिए माइकला लगातार इसके लिए प्रयासरत भी रहीं और कार्य भी करती रहीं. इसके लिए उन्होंने पैराबोलिक ज़ीरो-ग्रेविटी फ़्लाइट्स में हिस्सा लिया, जो भारहीनता (जीरो-ग्रेविटी) की नकल करती है. इसके अलावा उन्होंने पोलैंड में व्हीलचेयर-एक्सेसिबल लूनारेस रिसर्च स्टेशन पर दो हफ़्ते के अनुरूप अन्तरिक्ष यात्री (एनालॉग एस्ट्रोनॉट) मिशन के दौरान मिशन कमांडर के तौर पर काम भी किया. उनके पास मानव अन्तरिक्ष उड़ान से जुड़ा काफी अनुभव भी है. वे एक जर्मन एयरोस्पेस और मेक्ट्रोनिक्स इंजीनियर हैं जो अभी यूरोपियन स्पेस एजेंसी के साथ यंग ग्रेजुएट ट्रेनी के तौर पर जुड़ी हुई हैं.

 

ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड रॉकेट की यह यात्रा लगभग दस मिनट की रही. इस दौरान यात्रियों ने भारहीनता अर्थात ज़ीरो-ग्रेविटी का अनुभव किया और पृथ्वी का अद्भुत नज़ारा देखा. माइकला की इस स्वप्निल उड़ान के समय उनके साथ स्पेस एक्स के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैंस कोएनिग्समैन भी थे, जिन्होंने इस यात्रा को सम्भव बनाने में मदद की. इसके लिए रॉकेट में किसी तरह का व्यापक ढाँचागत परिवर्तन नहीं करना पड़ा था. एक विशेष ट्रांसफर बोर्ड और माइकला की स्थिति के अनुकूल कैप्सूल व्यवस्था के द्वारा उनको उड़ान के लिए तैयार किया गया. चूँकि माइकला व्हीलचेयर का उपयोग करती हैं, ऐसे में उनको रॉकेट में चढ़ने के लिए तथा वहाँ अपनी सीट तक पहुँचने के लिए एक विशेष ट्रांसफर बोर्ड का उपयोग किया गया. इस विशेष बोर्ड की सहायता से वे अपनी व्हीलचेयर को धरती पर छोड़ खिसककर सीट पर बैठ सकीं. अपनी शारीरिक स्थिति के बावजूद उन्होंने इस ऐतिहासिक उप-कक्षीय यात्रा में भाग लिया. उड़ान के दौरान उन्हें भारहीनता का अनुभव हुआ.

 



अन्तरिक्ष से लौटने के बाद माइकला ने कहा कि यह उनके जीवन का सबसे शानदार अनुभव था. कभी अपने सपनों को मत छोड़ो. दुनिया अभी भी दिव्यांगों के लिए पूरी तरह सुलभ नहीं है. अभी भी और अधिक बदलावों की जरूरत है. उन्होंने अपील की कि दिव्यांगजनों के लिए दुनिया को अधिक सुलभ  बनाया जाये ताकि भविष्य में उनके जैसे और लोग भी अन्तरिक्ष की यात्रा कर सकें. इस मिशन में उनका चयन इस बात का प्रमाण है कि शारीरिक अक्षमता सपनों के आड़े नहीं आ सकती. उनकी इस ऐतिहासिक उड़ान से दिव्यांगों के लिए अन्तरिक्ष यात्रा के द्वार खुलने की एक शुरुआत अवश्य हुई है. सम्भव है कि भविष्य में और भी दिव्यांग अन्तरिक्ष की यात्रा कर सकें. यह भी सम्भव है कि अब समाज दिव्यांगजनों के प्रति अपनी संकीर्ण सोच को त्यागकर उन्हें भी एक सामान्य इंसान की तरह से जानने-समझने का प्रयास करे.  


19 मार्च 2025

अन्तरिक्ष यात्री बने अनुकरणीय उदाहरण

अन्तरिक्ष में फँसने के बाद भारतीय मूल की अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स की धरती पर सकुशल वापसी हो गई है. इनके साथ क्रू-9 के दो और अन्तरिक्ष यात्री अमेरिका के निक हेग और रूस के अलेक्सांद्र गोरबुनोव भी आये हैं. सुनीता विलियम्स और उनके सहयात्री बुच विल्मोर को अन्तरिक्ष से लाने वाला स्पेसएक्स का ड्रैगन अंतरिक्ष यान भारतीय समयानुसार 19 मार्च 2025 को प्रातः 3 बजकर 27 मिनट पर फ्लोरिडा तट पर उतरा. 5 जून 2024 को सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर ने नासा और बोइंग के आठ दिन के संयुक्त क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन के लिए बोइंग के अंतरिक्ष यान द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के लिए उड़ान भरी थी. इसका उद्देश्य बोइंग के स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट द्वारा किसी अन्तरिक्ष यात्री को अन्तरिक्ष में ले जाने और वापस लाने की क्षमता का परीक्षण करना था. अन्तरिक्ष स्टेशन पर मात्र आठ दिन के परीक्षण और खोज के लिए गए इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को सम्बंधित यान के थ्रस्टर में आई गड़बड़ी के चलते नौ महीने से ज्यादा समय तक रुकना पड़ा.

 



सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में कुल 286 दिन बिता चुकी हैं. इसके साथ ही वह एक यात्रा में आईएसएस पर सबसे ज्यादा दिन बिताने वाली तीसरी महिला वैज्ञानिक बन गई. एक यात्रा में सबसे अधिक समय बिताने वाली महिला अन्तरिक्ष यात्री के रूप में पहले स्थान पर क्रिस्टीना कोच हैं, जिन्होंने 328 दिन बिताये हैं, वहीं पिग्गी वीटस्न 289 दिन व्यतीत करने के साथ दूसरे स्थान पर हैं. सुनीता विलियम्स अब तक नौ बार स्पेस वॉक कर चुकी है. इस दौरान उन्होंने 62 घंटे 6 मिनट स्पेसवॉक में बिताए हैं. इस मामले में वे पहले स्थान पर हैं. सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर के अन्तरिक्ष स्टेशन से उनको लाने के प्रयास किये गए. तकनीकी और अन्य कारणों से हर बार वापसी के कार्यक्रम को स्थगित करना पड़ा. ऐसी विषम स्थिति के बाद भी सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर ने खुद को सक्रिय बनाये रखा. उन्होंने अंतरिक्ष में नौ महीने से अधिक अवधि तक रहने के दौरान 150 से ज्यादा प्रयोग किए. उन्होंने स्पेस स्टेशन का रखरखाव करने के साथ-साथ स्पेसवॉक करते हुए अंतरिक्ष यान की मरम्मत भी की. अन्तरिक्ष स्टेशन के उपकरणों की मरम्मत करते हुए एनआईसीईआर एक्स-रे टेलीस्कोप पर लाइट फिल्टर लगाए और एक अंतरराष्ट्रीय डॉकिंग एडेप्टर पर एक रिफ्लेक्टर डिवाइस को भी बदला.

 

अब जबकि दोनों अन्तरिक्ष यात्री धरती पर वापस लौट आये हैं तब भी उनकी दिक्कतें दूर होने वाली नहीं हैं. लौटने के बाद उन दोनों को बेबी फीट समस्या का सामना करना पड़ेगा, जिस कारण चलने में परेशानी होगी. लम्बे समय तक अंतरिक्ष में रहने के कारण पैर की ऊपरी मोटी चमड़ी खत्म हो जाती है. इससे पैर छोटे बच्चों की तरह मुलायम और कमजोर हो जाते हैं. जीरो गुरुत्वाकर्षण के कारण पैर कमजोर होने लगते हैं, चलने-फिरने, संतुलन बनाने में परेशानी होती है. इसके अलावा मनोवैज्ञानिक समस्याओं, बेचैनी, अवसाद, बोलने में दिक्कत जैसी अनेक समस्याएँ सामने आती हैं. इसके चलते सामान्य जीवन स्थिति आने में काफी समय लग सकता है.

 



इस तरह की अनेकानेक समस्याओं का सामना करने में, उनसे उबरने में अब दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को संभवतः उतनी मानसिक परेशानी नहीं होगी, जितनी कि अन्तरिक्ष में रहते हुए हुई होगी. यहाँ तो वे दोनों अब अपने परिजनों की देखभाल में, योग्य चिकित्सकों की निगरानी में, धरती के वातावरण में रहते हुए खुद को सामान्य बनाने का प्रयास करेंगे. विचार करिए अन्तरिक्ष की उस स्थिति का जहाँ न तो पृथ्वी जैसा वातावरण है, जहाँ जीरो गुरुत्वाकर्षण वाली असामान्य स्थिति है, नितान्त अकेलेपन के बीच सिर्फ मशीनों का साथ है. इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों से आज के उन युवाओं को, उन अनेकानेक लोगों को सीख लेने की आवश्यकता है जो जरा-जरा सी स्थिति में खुद को तनावग्रस्त कर लेते हैं. किसी भी छोटी सी समस्या को अपने जीवन से बड़ा मानते हुए अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. किसी भी एक-दो असफलताओं के कारण हताशा-निराशा में, अवसाद में चले जाते हैं.

 

निश्चित ही इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों का मानसिक स्तर, उनकी मानसिक शक्ति अत्यंत प्रबल रही होगी क्योंकि अन्तरिक्ष स्टेशन के लिए उड़ान भरते समय दोनों के मन-मष्तिष्क में स्पष्ट रूप से सिर्फ आठ दिन रुकने का भाव रहा होगा जबकि उनको नौ महीने से अधिक समय तक रुकना पड़ गया. इस तरह की स्थिति निश्चित रूप से अवसाद पैदा करने वाली हो सकती थी मगर दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों ने खुद को अपने काम में लगा दिया. अन्तरिक्ष के अकेले वातावरण में खुद को किसी भी तरह की नकारात्मकता से दूर रखने के लिए उनका मिशन सम्बन्धी कामों में लगे रहना, अन्तरिक्ष सम्बन्धी भावी स्थितियों के लिए नए विकल्पों की तलाश करना उनकी जिजीविषा को दर्शाता है. शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को स्वस्थ रखने के लिए उनके द्वारा खान-पान के साथ-साथ योग, व्यायाम पर भी ध्यान दिया गया. आज अवसरों की अनुपलब्धता, सकारात्मक वातावरण की कमी का होना, कार्य स्थितियों का अनुकूल न होना आदि समस्याओं की चर्चा करना आम बात है. ऐसे में इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को अनुकरणीय उदाहरण के रूप में स्वीकार्य होना चाहिए. ये आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए समाज में अनुकूल वातावरण, सकारात्मक परिस्थितियाँ, सहयोगात्मक भूमिका आदि की उपस्थिति रहे. ऐसे में व्यक्ति को अपनी मानसिक स्थिति को, आत्मविश्वास को सकारात्मक रूप से सशक्त बनाये रखने की दिशा में काम करना चाहिए. परिस्थितियों का रोना रोने से बेहतर है कि उनको सुधारने  का प्रयास करना चाहिए. निस्संदेह दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों की सकुशल वापसी के वैज्ञानिक क्षेत्र में नासा का सफल अभियान है, इसी तरह सामाजिक क्षेत्र के लिए दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों की मानसिक शक्ति, जिजीविषा, आत्मविश्वास अनुकरणीय उदाहरण है.  


23 अगस्त 2023

चंद्रयान 3 की सफलता का समाजशास्त्रीय विश्लेषण

करोड़ों-करोड़ों देशवासियों ने साँसों को थामकर, अपनी धड़कनों की तीव्रगति को महसूस करते हुए खुद को गौरवशाली पल का साक्षी बनाया. अपने निर्धारित समय चंद्रयान 3 ने जैसे ही चंद्रमा की सतह का स्पर्श किया वैसे ही हम वैश्विक स्तर पर चौथे देश हो गए जिन्होंने अपने यान को चंद्रमा पर उतारा है. इस उपलब्धि में भले ही हम चौथे स्थान पर रहे हों मगर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर किसी भी उतारने वाले हम पहले देश बने. आज से चार वर्ष पूर्व सन 2019 में भी हमारे वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 को दक्षिणी ध्रुव पर उतारने का प्रयास किया था मगर चंद्रमा की सतह से कुछ पहले ही विक्रम का संपर्क नियंत्रण कक्ष से टूट गया था. यद्यपि प्रथम दृष्टया चंद्रयान 2 असफल समझ आ रहा हो तथापि उसके ऑर्बिटर के आज भी कार्य करने के कारण उसको आंशिक रूप से सफल कह सकते हैं. चंद्रयान 2 अभियान से जुड़े लैंडर विक्रम की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग न हो पाने और फिर ऑर्बिटर से उसका संपर्क टूट जाने बाद इसरो प्रमुख के. सिवन भाव विह्वल हो गए थे. उनका अपने आँसू न रोक पाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनको गले लगाकर उनका हौसला बढ़ाना आज भी भारतवासी भूले नहीं हैं. उन आँसुओं के पीछे छिपी भावनात्मकता को आज की सफलता के बाद उमड़े आँसुओं से समझा जा सकता है, आज की स्वर्णिम गौरवमयी गाथा को समझा जा सकता है. 




चंद्रयान 3 अब किस तरह से चंद्रमा के, अंतरिक्ष के रहस्यों को उजागर करेगा; कैसे उसके द्वारा नवीनतम खोजों को आधार मिलेगा; कैसे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में चंद्रयान 3 भारत का नाम रोशन करेगा; कैसे हमारा देश अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की राह पर लगातार उन्नति के पथ पर बढ़ सकेगा; कैसे अंतरिक्ष यात्रा के लिए अन्य देशों को अपने यान प्रक्षेपित करने के लिए विश्वसनीय मंच उपलब्ध हो सकेगा आदि पर लगातार मंथन होता रहेगा, विमर्श होता रहेगा. इन सबके सापेक्ष चंद्रयान 3 की सफलता का समाजशास्त्रीय आकलन भी अत्यावश्यक है. इस अभियान की सफलता ने सबसे प्रमुखता से सिखाया है कि किसी एक-दो असफलताओं से खुद को निराश नहीं किया जाना चाहिए. मात्र चार साल की अल्पावधि में जिस तरह से इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग की निराशा से बाहर निकल कर सफलता का झंडा चंद्रमा पर लहराया है, वह अनुकरणीय है. देश के भीतर और बाहर इस तरह की मानसिकता को बहुंख्यक लोगों में गहरे से बैठा दी गई है कि देश में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में कोई मानक स्थापित नहीं किया जा सकता है. विगत की अनेकानेक अव्यवस्थाओं, असफलताओं को उदाहरण बनाकर इस तरह से प्रचार किया जाता है कि देश में सिर्फ और सिर्फ अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है. इस अभियान ने सम्पूर्ण विश्व को स्पष्ट सन्देश दिया है कि हम वे भारतवासी हैं जो अपनी असफलता से भी सीख लेते हुए पुनः पूरी ताकत के साथ सफलता के लिए खड़े होते हैं.


चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग के बाद से लेकर चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग के बीच वैज्ञानिकों के धैर्य, उनकी मेहनत, आत्मविश्वास की कहानी उन बच्चों को अवश्य ही सुनाई जानी चाहिए जो किसी एक प्रतियोगी परीक्षा की असफलता के बाद हताशा, निराशा, अवसाद के अंधकार में जाकर अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. देश का एक शहर कोटा लम्बे समय से जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए प्रसिद्द रहा है वहीं अब वह बच्चों के द्वारा लगातार की जा रही आत्महत्याओं के लिए कलंकित हो रहा है. अभिभावकों को कोटा अथवा अन्य स्थानों पर कठिन परिश्रम कर रहे बच्चों के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह हौसला, हिम्मत बननी चाहिए. अभिभावकों को समझाना और समझना चाहिए कि दो-चार प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता ही ज़िन्दगी का अभीष्ट नहीं है. ज़िन्दगी इसके भी बहुत आगे तक है. सफलताओं के लिए और भी रास्ते हैं, और भी मंच हैं.




इस अभियान की सफलता उनके लिए भी उदाहरण बन सकती है जो बात-बात पर संसाधनों की कमी का, तनाव का, दबाव का रोना रोते हैं. यहाँ समझना चाहिए कि अंतरिक्ष अभियान में केवल वैज्ञानिक मेधा ही खर्च नहीं होती है वरन उनका समय, श्रम, देश का धन और अनेक संसाधनों का भी उपयोग होता है. चंद्रयान 2 और चंद्रयान 3 के वित्तीय बजट से इसे सहजता से समझा जा सकता है. चंद्रयान-2 मिशन पर 978 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. इसमें से 603 करोड़ रुपये ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर, नेविगेशन और ग्राउंड सपोर्ट नेटवर्क पर तथा 375 करोड़ रुपये सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल पर खर्च किए गए थे. चंद्रयान 3 में इस बजट में अभूतपूर्व कमी आई. इसके लिए लगभग 615 करोड़ रुपये का बजट तैयार किया गया. इसके लैंडर, रोवर और प्रोपल्शन मॉड्यूल में लगभग 250 करोड़ रुपये व्यय होने का तथा लॉन्च सर्विस पर अतिरिक्त 365 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया. एक ऐसे देश के लिए जहाँ पर जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है; गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या भी अधिक है; जनहितकारी योजनाओं में धन की कमी नहीं रहने दी जाती है; प्राकृतिक आपदाओं में सरकारी खजाने से बिना किसी भेदभाव के सहायता उपलब्ध करवाई जाती है वहाँ स्पष्ट है कि न केवल आर्थिक संसाधनों पर बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर, मानवजन्य संसाधनों पर भी एक तरह का दबाव बन जाता है. संभव है कि अनेकानेक भावी योजनाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित रख लिया गया होगा. संभव है कि अनेक संचालित योजनाओं के बजट को रोककर इस महत्त्वाकांक्षी अभियान को सफलता की राह ले जाया गया होगा.



इन स्थितियों का दबाव न केवल सरकार पर वरन वैज्ञानिकों पर भी रहता होगा. एक अभियान की असफल लैंडिंग का तनाव लेकर, देश की अनेकानेक परेशानियों, समस्याओं को जानते-समझते हुए, वैश्विक जगत में खुद को स्थापित करने के दबाव को लेकर भी हमारे वैज्ञानिकों ने महान उपलब्धि हासिल की है. उन्होंने दिखाया है कि हम भारतीय महज कीर्तिमान रचने के लिए नहीं वरन दुर्गम्य को सहज बनाने, अलभ्य को सुलभ बनाने के लिए पूर्ण मनोयोग, आत्मविश्वास से कार्य करते हैं. हमारे वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि एक असफलता जीवन मे संभावनाओं का अंत नहीं करती है, बस हमें ही अपनी हिम्मत बनाये रखनी चाहिए. मिशन चंद्रयान के बाद गगनयान और सूर्य मिशन के बारे में वही विचार कर सकता है जो हौसला बनाये रखेगा. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की ये पंक्तियाँ ‘क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं’ निश्चित ही कर्मशील लोगों की कहानी कहती हैं.    





 

06 अगस्त 2023

अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता के लिए उड़ान

14 जुलाई 2023 को दोपहर बाद प्रक्षेपित किया गया चंद्रयान-3 चंद्रमा की कक्षा में पहुँच चुका है. सब कुछ सही रहा तो चंद्रमा की सतह पर 23 अगस्त को इसकी सॉफ्ट लैंडिंग कराई जाएगी. इसके लिए इसकी गति को लगातार कम किया जायेगा. चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण चंद्रयान की वर्तमान गति, जो लगभग चालीस हजार किमी प्रति घंटा है, को कम करते हुए 3600 किमी प्रति घंटे पर लाया जाएगा. इसके लिए इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा चंद्रयान की गति की विपरीत दिशा में थ्रस्ट फायर किये जायेंगे. चंद्रयान-3 को चंद्रमा पर जिस स्थान पर लैंड कराये जाने की योजना है वह स्थान लगभग उसी तरह का है जैसा कि चंद्रयान-2 की लैंडिंग का था. यदि चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर उतरने में कामयाब रहा यह मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला मिशन बन जाएगा. 




इस मिशन की विशेष बात यह है कि चंद्रयान-3 चंद्रमा की दक्षिणी सतह पर उतरेगा. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र वहाँ का दुर्गम क्षेत्र है, जहाँ के अनेक भागों में सूरज की रोशनी बिल्कुल नहीं पहुँचती है. पूरी तरह से अँधेरे में रहने के कारण यहाँ का तापमान दो सौ डिग्री सेल्सियस भी से नीचे चला जाता है. रोशनी का न होना और अत्यंत निम्न तापमान के कारण इस क्षेत्र में उपकरणों के संचालन में कठिनाई होती है. इसके अलावा यह क्षेत्र बड़े-बड़े गड्ढों वाला है, इस कारण भी यहाँ सॉफ्ट लैंडिंग एक चुनौती होती है. अभी तक चंद्रमा पर उतरने वाले पिछले सभी अंतरिक्ष यान भूमध्यरेखीय क्षेत्र में उतरे हैं. भूमध्य रेखा से कोई भी अंतरिक्ष यान सबसे दूर गया यान चीन का चांग-ई-4 था जो 45 डिग्री अक्षांश के पास उतरा था. चंद्रमा के भूमध्यरेखा क्षेत्र के पास किसी भी यान का उतरना आसान और सुरक्षित है. यहाँ की सतह चिकनी है, ढलान न के बराबर हैं और यहाँ पर पहाड़ियाँ, गड्ढे भी नहीं हैं. इसके साथ-साथ सूर्य की रौशनी भी पर्याप्त मात्रा में इस क्षेत्र में उपलब्ध रहती है.  


भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा चंद्रयान-3 के पहले भी दो मिशन के द्वारा चंद्रमा के रहस्यों को खोजने का प्रयास किया गया है. चंद्रयान कार्यक्रम की घोषणा वर्ष 2003 में 15 अगस्त को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी. यह भारत का पहला चंद्रमा मिशन बना. चंद्रयान-1 ने सॉफ्ट लैंडिंग न होने के बाद भी 14 नवंबर 2008 को सफलतापूर्वक चंद्रमा की सतह का स्पर्श किया. इसका उद्देश्य चंद्रमा की सतह की खनिज संरचना, ध्रुवीय क्षेत्र में बर्फ के पानी की उपलब्धता और चंद्रमा की सतह पर हीलियम 3 और विकिरण प्रभावों का पता लगाना था. इसके बाद 22 जुलाई 2019 को चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान को स्वदेशी जीएसएलवी रॉकेट द्वारा सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया था. जीएसएलवी की यह पहली परिचालन उड़ान थी. यह इसरो का पहला मिशन था जिसमें लैंडर भी गया था. विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला था कि 7 सितंबर को चंद्रमा की सतह से उतरने के पूर्व लगभग दो किमी की दूरी पर लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया. इसका आर्बिटर अभी भी चंद्रमा की कक्षा में मौजूद है, इसलिए एक दृष्टि से चंद्रयान-2 को सफल भी कहा जा सकता है.


पृथ्वी से निर्मित होने और इसके सबसे निकट होने के कारण चंद्रमा के रहस्यों को समझने से पृथ्वी और ब्रह्मांड की बेहतर समझ विकसित हो सकेगी. चंद्रयान-3 की सफलता से भारत को दुनिया के सामने अपनी क्षमता दिखाने का मंच मिल जाएगा. रॉकेट लॉन्च, अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी, स्किल्ड मैनपावर की दिशा में बेहतरीन काम किए जा सकेंगे. ऐसा माना जाता है कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था (स्‍पेस इकॉनमी) सन 2020 तक 9.6 अरब डॉलर की थी, इसके सन 2025 तक बढ़कर 13 अरब डॉलर हो जाने के संकेत हैं. आज भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए भी खुला है. देश में डेढ़ सौ से अधिक स्‍पेस-टेक स्‍टार्टअप हैं, इनमें गूगल, स्‍कायरूट, सैटश्‍योर, ध्रुव स्‍पेस और बेलाट्रिक्‍स जैसी कंपनियाँ शामिल हैं. ये कंपनियाँ दैनिक जीवन में काम आने वाली तकनीक के लिए सैटेलाइट आधारित फोन सिग्‍नल, ब्रॉडबैंड, ओटीटी से लेकर 5जी और सौर ऊर्जा क्षेत्र में अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग के अवसर खोज रही हैं. निजी निवेशकों की बढ़ती लालसा देखकर भारत सरकार भी अंतरिक्ष उद्योग में निजी सहभागिता को अधिक से अधिक प्रोत्साहित कर रही है. इसी उद्देश्य से भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 को मंजूरी दी है जो निजी क्षेत्र के लिए भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश की संभावनाओं को बढ़ाएगी. चंद्रयान-3 की सफलता से अंतरिक्ष क्षेत्र में तो भारत की धाक बढ़ेगी ही साथ ही धरती पर जियो-पॉलिटिक्‍स के रूप में भी प्रभाव बढ़ेगा.


यद्यपि चंद्रयान-1 ऑर्बिटर का मून इम्पैक्ट प्रोब 14 नवंबर 2008 को जब चंद्रमा की सतह पर उतरा था तो भारत चंद्रमा पर अपना झंडा लगाने वाला चौथा देश बन गया था तथापि चंद्रयान-2 लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग हो जाने पर भारत ऐसा करने वाला चौथा देश होता. 2019 के सितंबर महीने में चंद्रयान-2 के वैज्ञानिकों की आँखें आँसुओं से भर गई थीं जबकि ग्यारह वर्ष की मेहनत और लम्बा रास्ता तय करने के बाद चंद्रमा की सतह के नजदीक ही लैंडर विक्रम क्रैश हो गया था. अब चार साल बाद उसी पल की प्रतीक्षा है, जब वैगानिकों की आँखें ख़ुशी के आँसुओं से भरी होंगी. यह सफलता भारत को अमेरिका, रूस और चीन के साथ दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में खड़ा कर देगी. 






 

28 मार्च 2019

अन्तरिक्ष तक सर्जिकल स्ट्राइक संभव


कल, 27 मार्च को जब डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम आईलैंड लॉन्च कॉम्पलेक्स से रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक मिसाइल ने बतौर परीक्षण एक सैटेलाइट को मार गिराया तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता रखते हैं. भारत से पहले अभी तक यह क्षमता रूस, अमेरिका और चीन के पास थी. यह एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण था, जिसे मिशन शक्ति नाम दिया गया. इसके लिए DRDO के बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया गया. यह मौजूदा बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का हिस्सा है. इस मिशन में जिस सैटेलाइट को निशाना बनाया गया, वह निचली कक्षा में घूम रहा था. यह परीक्षण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने इसके जरिये यह साबित किया है कि वह अपनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से बाहरी अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को निशाना बना सकता है. चूँकि हमारा पड़ोसी देश चीन बहुत पहले यह क्षमता विकसित कर चुका है ऐसे में भारत पर काफी दबाव था. यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आज की दुनिया में पारंपरिक हथियारों से शत्रु का मुकाबला नहीं किया जा सकता है और वह भी तब जबकि पड़ोसी देशों से आपके संबंध अच्छे नहीं हों. ऐसे में देश की तरफ से किया गया यह परीक्षण भारतीय रक्षा शक्ति को कई गुना मजबूत करता है. 


यह सफलता केवल उल्लेखनीय नहीं वरन गौरवपूर्ण है. इस सफल परीक्षण के द्वारा भारत जमीन, हवा, पानी के साथ-साथ अन्तरिक्ष में भी अपने दुश्मनों से निपटने में सक्षम हो गया है. ऐसी आशंका लम्बे अरसे से जताई जाती रही है कि आगामी युद्ध, यदि कभी हुआ तो, वह धरती, हवा या जल में लड़ने के बजाय बहुत हद तक संभावित है कि अन्तरिक्ष में हो. ऐसा नहीं कि युद्ध करने वाले देशों के द्वारा अन्तरिक्ष में सेना भेजकर वहाँ युद्ध किया जायेगा वरन जिस तरह से सम्पूर्ण विश्व आज तकनीक के हाथों से संचालित होने लगा है, आम आदमी से लेकर सरकारों तक के कार्यों में अन्तरिक्ष में तैर रहे सेटेलाईट मददगार बन रहे हैं उस स्थिति में किसी भी देश को सैकड़ों वर्ष पीछे भेजने के लिए उसके उपग्रह को नष्ट कर देना ही बहुत है. इस तरह की सम्भावना कपोल-कल्पना नहीं और न ही टीवी पर दिखाए जाने वाले स्टार वार्स जैसे कार्यक्रम हैं बल्कि वास्तविकता है. इस वास्तविकता को समझने की आवश्यकता है, जिसे भारत ने समय रहते समझने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि उस पर अमल भी किया.

इस परीक्षण के बाद जैसी कि अपेक्षा थी, विपक्ष ने सरकार पर धावा सा बोल दिया. ऐसा दावा किया जाने लगा कि इस तरह का परीक्षण पिछली सरकार में किया जा चुका है, अब मोदी ऐसा बस चुनावों में लाभ लेने के लिए खोखला सन्देश दे रहे हैं. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि पिछली सरकार में ऐसे किसी परीक्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया था. इसे खुद रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन के आला अधिकारियों द्वारा भी सामने लाया गया. बहरहाल, वर्तमान समय राजनीति के जाल में देश की इस उपलब्धि को फँसाना नहीं है वरन सभी वैज्ञानिकों को बधाई देने का है. वैश्विक स्तर पर आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सभी देश किसी न किसी तरह के कदमों को उठाते रहते हैं, ऐसे में भारत द्वारा महाशक्ति बनने की राह में उठाया गया यह कदम निश्चित ही भारतीय सामरिक शक्ति को विश्वसनीय पहचान देगा.

13 जनवरी 2019

देश के पहले अंतरिक्ष यात्री को जन्मदिन की शुभकामनायें


सन 1984 को जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पूछने पर कि अंतरिक्ष से भारत कैसा लगता है, तब सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा का जवाब देने वाले भारत के पहले अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा आज, 13 जनवरी को सत्तरवीं उड़ान की तरफ अग्रसर हैं. उनका जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था. उन्होंने अपनी सैनिक शिक्षा हैदराबाद में ली थी. पायलट बनने की इच्छा रखने वाले राकेश शर्मा भारतीय वायुसेना द्वारा टेस्ट पायलट भी चुन लिए गए. 20 सितम्बर 1982 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा तत्कालीन सोवियत संघ की अंतरिक्ष एजेंसी इंटरकॉस्मोस के अभियान के लिए चुना गया.


2 अप्रैल 1984 के रूप में वह ऐतिहासिक दिन आया जबकि सोवियत संघ के बैकानूर से सोयूज टी-11 अंतरिक्ष यान ने तीन अंतरिक्ष यात्रियों- राकेश शर्मा, अंतरिक्ष यान के कमांडर वाई०वी० मालिशेव और फ़्लाइट इंजीनियर जी० एम स्ट्रकोलॉफ़- के साथ उड़ान भरी. सोयूज टी-11 ने इन तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को सोवियत रूस के ऑबिटल स्टेशन सेल्यूत-7 में पहुँचा दिया. राकेश शर्मा विश्व के 138वें अंतरिक्ष यात्री बने. उन्होंने सात दिन स्पेस स्टेशन पर बिताए. इन सात दिनों में उन्होंने 33 प्रयोग किए. सेल्यूत-7 में रहते हुए भारत की कई तस्वीरें उतारीं.  

अंतरिक्ष मिशन पूर्ण हो जाने के बाद भारत सरकार ने राकेश शर्मा और उनके दोनों अंतरिक्ष साथियों को अशोक चक्र से सम्मानित किया. इसके साथ-साथ उन्हें हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन सम्मान से भी विभूषित किया गया था. विंग कमाडर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद राकेश शर्मा हिन्दुस्तान एरोनेट्किस लिमिटेड में टेस्ट पायलट के तौर पर कार्य करते रहे. सन 2006 में राकेश शर्मा को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की समिति में सदस्य के रूप में शामिल किया गया.

राकेश शर्मा जी के जन्मदिन पर उनको हार्दिक शुभकामनाएं.