परीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
परीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

21 फ़रवरी 2026

बच्चों को इंसान बनायें न कि मशीन

अपने रंग-स्वरूप में बसंती मदहोशी ओढ़े रहने वाले मौसम में एक भय भी लिपटा रहता है. इस भय से समाज के सभी लोग प्रभावित नहीं होते बल्कि एक विशेष आयु-वर्ग के बालक-बालिका ही प्रभावित होते हैं. मौसमी सुहानेपन में परीक्षाओं का आना बच्चों को भयभीत ही करता है. इसका एक बहुत बड़ा कारण है कि अब परीक्षाओं को किसी बच्चे के द्वारा सर्वाधिक अंक लाये जाने का पैमाना मान लिया गया है. ऐसी स्थिति के कारण परीक्षाओं के नाम पर ही अभिभावकों द्वारा बालमन पर एक तरह का दबाव डाला जाने लगता है. बच्चों के सामने अनेक तरह के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन पर सभी से अधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाया जाने लगता है.

 

वर्तमान शैक्षिक वातावरण जिस तरह से बन गया है उसमें बच्चों की बुद्धिमत्ता से अधिक चर्चे उसके द्वारा प्राप्त अंकों के होते हैं. यहाँ वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के माहौल में ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि बच्चों के अंकों के कारण से उनमें हीनभावना न पनपने पाए. इसके उलट हो ये रहा है कि स्वयं अभिभावकों द्वारा न केवल परिवार के बच्चों से बल्कि मोहल्ले के, सोसायटी के, विद्यालय के अन्य बच्चों के साथ अपने बच्चे की तुलना करते हुए कम अंकों के कारण उसे कमतर महसूस कराया जाता है. सोचने वाली बात ये है कि अंकों का अधिक या कम आना एक परीक्षा की प्रक्रिया, उसकी पद्धति, मूल्यांकन के वातावरण पर आना निर्भर करता है. इसके स्थान पर बच्चों की बुद्धिमत्ता, उनके कौशल, उनकी बौद्धिकता का आकलन करते हुए उनको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास प्रत्येक अभिभावक द्वारा किया जाता है किन्तु बेहतर शिक्षा के नाम पर बच्चों पर दबाव बनाया जाना कदापि उचित नहीं.

 

अभिभावकों को ये समझना चाहिए कि बेहतर शिक्षा का सम्बन्ध किसी भी रूप में अंकों से नहीं है. उस पर भी परीक्षा जैसे मानसिक दबाव भरे माहौल में यदि परिवार का वातावरण भी बोझिल रहेगा, अभिभावकों द्वारा भी अधिकाधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाया जायेगा तो यह स्थिति बच्चों को नकारात्मक  रूप से प्रभावित करेगा. यह एक सामान्य सा मनोविज्ञान है कि कक्षा के, परिवारके वातावरण में और परीक्षा कक्ष के वातावरण में अंतर होता है. वातावरण का अंतर बच्चों को अलग तरह से प्रभावित करता है. कक्षा में, परिवार में अपनी पढ़ाई, अपनी याददाश्त पर शत-प्रतिशत विश्वास करने वाले बहुत से बच्चे परीक्षा कक्ष में चिन्तित, व्यग्र दिखाई देते हैं. निश्चित समय-सीमा में प्रश्नपत्र को हल करने की उनकी उलझन में यदि अधिकाधिक अंक लाने का बोझ डाल दिया जाये तो निश्चित ही बच्चे अपनी ही प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे.

 

संभव है कि वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों से सज्जित करना अभिभावकों की मजबूरी हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का दबाव बनाया जाने लगा हो किन्तु यह बच्चों के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि परीक्षा के दिनों में वे अपने व्यस्ततम समय में से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताएँ. आज बच्चों के लिए खेलने को पार्कों, मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों के साथ घुलना-मिलना चाहिए.

 

इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त, विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है. अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, सहयोग की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. उनको समझाना चाहिए कि अंकों का महत्त्व उस उत्तर पुस्तिका के सन्दर्भ में है, जिस पर उनके द्वारा प्रश्नों को हल किया जाता है. जीवन की प्रतियोगिता में उनके अंकों से कहीं अधिक महत्त्व उनके कौशल का, उनकी बुद्धिमत्ता का, उनकी बौद्धिकता का है. अभिभावकों को अपने बच्चों को ये विश्वास जगाना चाहिए कि ज़िन्दगी निर्वहन के लिए, पारिवारिक सञ्चालन के लिए सिर्फ नौकरी ही अथवा बड़े-बड़े पैकेज ही एकमात्र संसाधन नहीं हैं. व्यक्तिगत अवधारणा में भले ही इनको महत्त्व दिया जा रहा हो मगर समाज की कसौटी पर आज भी ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो अपने कौशल से, अपने श्रम से, अपनी प्रतिभा से खुद को विकसित, सफलतम रूप में स्थापित कर चुके हैं.

 

घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षकों तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लादना बंद करना होगा. अपने अतृप्त सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर देना बंद करना होगा. बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक ‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने से बचना होगा. परीक्षा के दिनों में ही नहीं सामान्य दिवसों में भी बच्चों के लिए सकारात्मक वातावरण बनाया जाना चाहिए. संख्यात्मकता के स्थान पर गुणात्मकता का निर्माण करने पर जोर दिया जाना चाहिए. अपने बच्चों को मशीन बनाने के स्थान पर इंसान बनाने का प्रयास आज से ही करना होगा.


19 फ़रवरी 2023

दबाव न बनायें बच्चों पर

मौसम में बसंती रंग चढ़ने को है और बच्चों के सामने परीक्षा किसी भय की तरह खड़ी होने लगी है. विभिन्न बोर्ड परीक्षाएँ आरम्भ होने लगी हैं. बच्चों की परीक्षाएँ आरम्भ होने पर और उसके पूर्व भी उनके अभिभावकों द्वारा बालमन पर अतिरिक्त दबाव डाला जाने लगता है. सार्वजनिक रूप से भले ही अभिभावक इसे न स्वीकारें किन्तु सत्य यही है कि उनके द्वारा अपने बच्चों पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष दबाव बहुत बुरी तरह से डाला जाता है. बचपन में ही अध्ययन को लेकर अतिरिक्त सजगता दिखाना, ज्यादा से ज्यादा अंक लाने की चाह, कक्षा में-विद्यालय में सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने की कामना करना, अन्य दूसरे बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा की भावना का नकारात्मक रूप विकसित करना आदि बच्चों के कोमल मन-मष्तिष्क पर असर डाल रहा है. ये सारा दबाव समूचे वर्ष भर तो काम करता ही है किन्तु इसका विकृत और भयावह रूप परीक्षाओं के समय देखने को मिलता है. दिन-दिन भर, गई रात तक, अलस्सुबह जगाकर बच्चों के दिमाग में किताबों को लगभग ठूँस देने की मानसिकता बहुतायत अभिभावकों में देखी जा रही है.


आजकल जिस तरह से कॉन्वेंट पद्धति का विकास हुआ, जिस तरह से अत्यधिक किताबों का बोझ बच्चों पर लादा जा रहा है, जिस तरह से कठिन से कठिन पाठ्यक्रम को मंजूरी दी जा रही है, जिस तरह से कमीशन के लालच में निजी प्रकाशकों की बहुतायत किताबों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है वो चिंता का विषय होना चाहिए. ये सब कुछ अकेले विद्यालय प्रबंधन की मंशा से नहीं हो रहा है, ऐसा अकेले निजी प्रकाशकों की मंशा से नहीं हो रहा है, ऐसा शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले दलालों-माफियाओं की मंशा से नहीं हो रहा है वरन इसमें कहीं न कहीं अभिभावकों की मंशा भी अन्तर्निहित है. वे एकदम से अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ देखना चाहते हैं. वे एकदम से अपने बच्चों में विश्व के सभी क्षेत्रों का ज्ञान समाहित हुए देखना चाहते हैं.




अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास अपेक्षित है किन्तु घर में दवाब भरा माहौल बना देना उचित नहीं. बहुतायत में ये बच्चे अपने-अपने विद्यालयों में एक तरह का अनुशासनात्मक माहौल का बिगड़ा हुआ स्वरूप देखते हैं. क्लासरूम का माहौल, शिक्षा पद्धति का मानक स्वरूप न होना, अत्यधिक पाठ्यक्रम, रटने की मानसिकता आदि से बच्चों में स्कूलों के वातावरण के प्रति एक भय दिखता है. लगभग उसी तरह का माहौल वह अपने घर में देखता है, अपने अभिभावकों में भी शिक्षक का अनुशासन देखता है, अधिकाधिक अंक लाने का दबाव देखता है तो बच्चा अनजाने ही अवसाद की स्थिति में चला जाता है. ऐसी स्थिति के आने पर ऐसे बच्चे गुमसुम, शांत, बिना किसी अतिरिक्त क्रिया-प्रतिक्रिया के देखे जा सकते हैं. डरे-सहमे से ये बच्चे किसी अनजान व्यक्ति के सामने सहजता से व्यवहार नहीं कर पाते हैं. न केवल उनके साथ बल्कि हमउम्र बच्चों के साथ भी उनको समन्वय करने में, सहयोग करने में समस्या होती है. ये स्थितियाँ आगे चलकर बच्चों में एकाकीपन की, अकेलेपन की भावना पैदा करती हैं. घर-स्कूल का दबाव ही कहा जायेगा जबकि नौनिहाल आत्महत्या जैसा जघन्य कदम उठाने लगे हैं, घरों से भागने लगे हैं.


बच्चों द्वारा असफलता के भय से अथवा कुछ प्रतिशत अंक कम आने के चलते मौत की राह चले जाना समूची व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है. इक्कीसवीं सदी में जहाँ एक तरफ अधिकारों, स्वतंत्रता, फ्री-सेक्स, हैप्पी टू ब्लीड, लिव-इन-रिलेशन आदि जैसी अतार्किक चर्चाओं में बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक निमग्न हैं, वहाँ बच्चों पर लादे जाने वाले अनावश्यक, अप्रत्यक्ष बोझ को दूर करने के लिए किसी तरह की चर्चा नहीं होती है. ये सम्पूर्ण समाज के लिए क्षोभ का विषय होना चाहिए कि एक बच्चा कुछ प्रतिशत कम अंक आने के भय से अथवा कम अंक आने के कारण मृत्यु को चुन लेता है. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न विषयों में अपनी सक्रियता दिखा रहे समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इस दिशा में संज्ञाशून्य से नजर आते हैं. घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लाद रहे हैं. अपने अतृप्त सपनों को, अपने उस कैरियर को जो वे नहीं बना सके, बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर लगाये हैं. अपने बच्चों को साक्षर, शिक्षित, संस्कारित बनाने से ज्यादा ध्यान इस तरफ है कि वे कैसे अधिक से अधिक अंकों से सफलता प्राप्त करें. वे बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक ‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने में लगे हैं. इसके चलते अभिभावकों, शिक्षकों के असफल अतीत को अपने भविष्य द्वारा पूरा करने के चक्कर में बच्चों द्वारा अपना वर्तमान दोषपूर्ण बना लिया जाता है.


संभव है कि वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों से सज्जित करना अभिभावकों की मजबूरी हो गई हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का दबाव बनाया जाने लगा हो किन्तु ये सब बच्चों के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि अपने व्यस्ततम समय में से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताने का काम करें. आज के दूषित वातावरण में बच्चों के लिए खेलने को पार्कों, मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे ही छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें सहयोग की भावना विकसित करने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों के साथ घुलना-मिलना चाहिए. इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त, विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है. अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, सहयोग की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. यदि हम आने वाले समय में ऐसा कर पाए तो अवश्य ही विकास की राह प्रशस्त कर पायेंगे, अन्यथा कष्ट तो दिनों-दिन बढ़ते ही जाना है. 

 






 

08 जनवरी 2021

अभिभावक जाग जाये तो विद्यार्थी स्वतः ही जाग जायेगा

इन दिनों बिटिया रानी के टेस्ट चल रहे हैं. पढ़ाई की तरह टेस्ट भी ऑनलाइन हो रहे हैं. इससे पहले छमाही परीक्षा भी ऑनलाइन ही हुई थी. वैसे यदि ऑनलाइन न कह कर उस परीक्षा और इस टेस्ट को वर्क फ्रॉम होम जैसी स्थिति कहें तो ज्यादा अच्छा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि इन दोनों परीक्षाओं के लिए स्कूल से कॉपी मिल गईं थीं. सम्बंधित विषय के पेपर वाले दिन ऑनलाइन पेपर आ जाता स्कूल की वेबसाइट पर या फिर व्हाट्सएप्प ग्रुप पर. पेपर आता ठीक उसी समय जो समय पेपर शुरू होने का होता. विद्यार्थी समय के भीतर पेपर करे, इसका ध्यान अभिभावक को तो रखना ही होता, साथ ही स्कूल से एक व्यवस्था की गई थी, जिसके कारण निर्धारित समय के बाद कोई विद्यार्थी पेपर नहीं कर सकता था.


निश्चित समयावधि में अपना पेपर करने के बाद अगले दस-पंद्रह मिनट में सभी विद्यार्थियों को अपनी उत्तर-पुस्तिका की फोटो खींच उसकी पीडीएफ बनाकर सम्बंधित विषय के अध्यापक को भेजनी होती है. इसके लिए भी एक समय निर्धारित किया गया है. इसके बाद आने वाली उत्तर-पुस्तिकाओं को स्वीकार नहीं किया जाता है. इससे जब विद्यार्थियों द्वारा स्कूल में अपनी सभी विषयों की उत्तर-पुस्तिकाएँ जमा की जायेंगीं तो उनके द्वारा भेजी गई पीडीएफ से उसका मिलान करके आसानी से पता लगा लिया जायेगा कि बच्चों ने समय के बाद तो पेपर नहीं किया है. ऐसी परीक्षा में नक़ल किये जाने की पूरी सम्भावना होती है क्योंकि स्कूल द्वारा किसी भी तरह से कैमरे वाली व्यवस्था न करते हुए अभिभावकों को ही निरीक्षक की भूमिका में बनाया हुआ था. ऐसे में अभिभावकों पर निर्भर करता था कि वे बच्चों से किस तरह की अपेक्षा रखते हैं.  




हम भी निश्चित समय पर पेपर निकाल कर बिटिया रानी को देकर अपनी भूमिका में आ जाते. शिक्षा विभाग से जुड़े होने के कारण हमें स्वयं में ही एक तरह की पारदर्शिता, ईमानदारी बरतनी थी, अपनी बेटी के सामने एक आदर्श उपस्थित करना था. इसे संयोग कहा जाये या फिर पारिवारिक माहौल, न तो बिटिया ने किसी दिन कुछ पूछा और न ही परिवार में किसी ने किसी भी तरह से मदद करने की सोची. छमाही परीक्षाओं की कॉपी की पीडीएफ बनाते समय एक दिन देखा कि एक कॉपी में कुछ सवालों के जवाब छूटे हुए हैं. हमने उसी समय बिटिया से पूछा कि ये सवाल क्यों नहीं किये? उसने सहज भाव से जवाब दिया कि आये नहीं. उसके इस जवाब के मिलते ही अगले पल विचार किया कि हम सभी परिजन तो अपनी ईमानदारी भरी भूमिका निभा रहे हैं, एक बार बिटिया रानी के मन की थाह भी ले ली जाये. उससे कहा कि अरे, अपनी किताब से या नोट-बुक से देख लेती इनके जवाब. बिना एक पल की देरी किये उसने जवाब दिया कि पापा, ये तो चीटिंग हो जाती और चीटिंग करना बुरी बात है. उसके जवाब को सुनकर लगा कि अभी तक संस्कार, शिक्षा गलत दिशा में नहीं ले जा रहे उसे.


नंबर रेस में शामिल होने के लिए कभी भी उस पर दवाब नहीं बनाया. पढ़ने का अनावश्यक बोझ भी कभी नहीं डाला गया. नैसर्गिक रूप से उसके विकास के प्रति हमेशा सजगता दिखाई. ऐसे में नक़ल के प्रति उसकी मनोभावना देखकर ख़ुशी के साथ गर्व भी महसूस हुआ. उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े होने के कारण प्रतिवर्ष अभिभावकों को ही अपने बच्चों को अधिक से अधिक अंक दिलवाने के लिए परेशान होते देखते हैं. कभी प्रैक्टिकल के नाम पर, कभी कॉपी जाँचने के समय सिफारिश के साथ लगातार भटकने की स्थिति देखकर लगता है कि हम अभिभावक ही अपनी आने वाली पीढ़ी को बर्बाद करने में लगे हुए हैं. एक बार अभिभावक ही जाग जाये तो विद्यार्थी स्वतः ही जाग जायेगा, सजग, सतर्क हो जायेगा.


.
वंदेमातरम्

21 सितंबर 2020

जाने-अनजाने हो गई मदद

अक्सर ऐसा होता है कि किसी की सहायता करने का मन होता है मगर स्थितियों और नियमों के चलते ऐसा कर पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसी स्थिति बड़ी ही जटिल हो जाती है. सामने वाला समझता है कि जिस व्यक्ति से मदद माँगी जा रही है वह सहायता करना नहीं चाह रहा और जो मदद करना चाहता है वह नियमों, परिस्थितियों के कारण मजबूर रहता है. इधर पिछले तीन-चार दिन से कुछ ऐसा ही हो रहा था हमारे साथ. चीनी वायरस कोरोना के चलते विश्वविद्यालय की परीक्षाओं को बीच में ही स्थगित करना पड़ा था. उसी में परास्नातक की मौखिकी परीक्षाओं को भी टालना पड़ा था. इधर जैसे-जैसे अनलॉक की स्थिति आगे बढ़ती रही शासन स्तर से परीक्षाओं को लेकर अपने कदम बढाए जाने लगे. इसी में आदेश आया कि अंतिम वर्ष की छूटी हुई परीक्षाओं को करवाया जाएगा. इन्हीं में परास्नातक की मौखिकी परीक्षाओं को भी शामिल किया गया था.


अभी मौखिकी परीक्षा के तीन-चार दिन पहले मोबाइल पर घंटी बजी. उस नम्बर पर बहुत सीमित लोगों की ही कॉल आती है, उन सबके नम्बर उसमें सेव हैं ऐसे में अनजाना नम्बर चमकने पर आश्चर्य हुआ. फोन उठाया तो पता चला कि परास्नातक का छात्र है जिसकी मौखिकी परीक्षा से सम्बंधित समस्या है. उसके समाधान के बारे में कुछ कहने के पहले जानकारी की कि ये नम्बर उसे दिया किसने है. उसने बताया कि बहुत खोजबीन के बाद इंटरनेट से प्राप्त हुआ. वह नम्बर सार्वजनिक नहीं है फिर याद आया कि बहुत पहले उस नम्बर को कुछ जगहों पर दे रखा था, दूसरे मोबाइल नम्बर के विकल्प रूप में. उसकी बात सुनने के बाद लगा कि उसकी सहायता की जानी चाहिए मगर स्थिति ऐसी थी कि चाह कर भी मदद नहीं हो सकती थी.


उसकी पूरी बात सुनने-समझने के बाद उसको समझाया. आश्वस्त किया कि यथासंभव मदद की जाएगी. वह दिन में दो-तीन बार फोन करके किसी भी तरह से सहायता करने की बात करता और हम हर बार उसे आश्वस्त करते. असल में रविवार को मौखिकी परीक्षा थी और उसी दिन एक प्रतियोगी परीक्षा होने के कारण उसकी उपस्थिति में कुछ विलम्ब की सम्भावना थी. मौखिकी परीक्षा सम्पन्न होने, सभी विद्यार्थियों के अंक इंटरनेट के माध्यम से विश्वविद्यालय भेजने की प्रक्रिया में समय बहुत नहीं लगता है. ऐसे में आंतरिक और वाह्य परीक्षक भी अपना कार्य पूर्ण करके घर पहुँचने की कोशिश में रहते हैं. आखिर वे भी सुबह नौ बजे से आधा सैकड़ा से अधिक विद्यार्थियों के विस्मयकारी ज्ञान से जूझ रहे होते हैं.


अध्यापन कार्य से जुड़े होने के कारण अन्दर से यह भी लग रहा था कि किसी विद्यार्थी का नुकसान न हो. इस सम्बन्ध में किसी तरह की सहायता न कर पाने की विवशता के कारण खुद में बुरा भी लग रहा था. उसे अपनी प्रतियोगी परीक्षा पूर्ण मनोयोग से देने की बात कहते हुए उस दिन भी उसे आश्वस्त किया. किसी बच्चे का भला हो जाने की नीयत से किये जाने वाले आश्वासन संभवतः सत्य में बदल गए. विश्वविद्यालय से सूचना प्राप्त हुई कि मौखिकी परीक्षा के अंकों को विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर शाम छह बजे के बाद ही अपलोड किया जाएगा. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि मौखिकी परीक्षा की सूचना विद्यार्थियों को अल्प समय में दी गई थी. ऐसे में विश्वविद्यालय की तरफ से शाम छह बजे तक अनुपस्थित विद्यार्थियों की प्रतीक्षा करने को कहा गया.


ऐसी जानकारी मिलते ही उस छात्र को खबर कर दी. वह अत्यंत ख़ुशी के भाव से अपनी परीक्षा देने उपस्थित हो गया. उससे मुलाकात तो नहीं हो सकी क्योंकि हम आंतरिक अथवा वाह्य परीक्षक के दायित्व से मुक्त थे. बात करते-करते उसका बार-बार गला भर आता. उसे समझाया कि इसमें हमारा कोई प्रयास नहीं है, यह विश्वविद्यालय के आदेश से स्वतः ही हुआ है. वह पिछले तीन-चार दिन से लगातार हमारे द्वारा फोन रिसीव किये जाने, उसकी बात लगातार सुनने, उसे आश्वस्त करने आदि को लेकर वह अत्यंत भावुक हो रहा था. अच्छा लगा कि भले ही कोई काम हमारे प्रयास से न हुआ हो मगर एक छात्र ख़ुशी-ख़ुशी अपने परीक्षा में शामिल हो सका.


हमसे मिलने, मिठाई खिलाने की उसकी बात पर कहा कि बस हमें याद रखना और जब नौकरी लग जाए तो आना मिठाई खिलाने. उस छात्र को शुभकामनाएँ.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

02 अगस्त 2020

ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है

एक पुरानी फिल्म का गीत है, ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, इस गीत का नहीं बस इतने शब्दों का सार वास्तविक समझ आता है। गीतों में, कविताओं में गहराई छिपी होती है, एक संदेश छिपा होता है। कुछ इसी तरह की स्थिति इन शब्दों में है। ज़िन्दगी का एक-एक पल व्यक्ति की परीक्षा तो लेता ही रहता है। बचपन से लेकर ज़िन्दगी के अंतिम क्षणों तक इंसान परीक्षाओं से दो-चार होते-होते आगे बढ़ता रहता है। शैक्षणिक संस्थानों की परीक्षाओं से इतर ये परीक्षाएँ इंसान को मजबूत भी बनाती हैं, कमजोर भी बनाती हैं। 


सोचने का विषय ये है कि क्या सभी इंसान परीक्षाओं से दो-चार होते हैं? क्या ज़िन्दगी सभी की परीक्षा लेती है? या फिर ज़िन्दगी उनका इम्तिहान लेती है जो कुछ अलग करना चाहते हैं? हम अपने आसपास देखें तो स्पष्ट समझ आता है कि समाज में व्यक्तियों की अपनी स्थिति, प्रस्थिति के अनुसार परीक्षा तो होती ही है पर उसका स्वरूप बदला हुआ होता है। एक वरिष्ठ की परीक्षा का स्तर अलग होता है, बच्चे की परीक्षा का स्तर अलग होगा। एक अमीर के लिए उसके इम्तिहान का स्तर अलग होगा, एक गरीब के लिए यही स्थिति अलग होगी। 

कहने का तात्पर्य महज इतना है कि हम सभी देखा-देखी दूसरे के सापेक्ष कार्य करने की प्रवृत्ति को पाल बैठे हैं। हम अपनी क्षमताओं को जाँचे-परखे बिना ही कार्य करने उतर पड़ते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि इंसान को कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ता है। इससे उसके अंदर निराशा का भाव पैदा हो जाता है। ऐसे में इस बात को स्वीकार करते हुए कि ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है और सबकी स्थिति के अनुसार अलग-अलग रूप में लेती है। बस हम सबको अपनी क्षमताओं की जानकारी रखते हुए कार्य करना चाहिए, ज़िन्दगी के इम्तिहान को पार करना चाहिए। 

12 मई 2020

तीन बोर्ड परीक्षाएँ पास करने के पुरोधा

लॉकडाउन के इस सीजन में शैक्षणिक संस्थानों के सामने छूटी परीक्षाओं को करवाने का संकट मुँह बाए खड़ा है. इससे बचने का तो कोई उपाय है ही नहीं. संकट ने मुँह खोला है तो कुछ न कुछ करेगा ही. कहीं-कहीं से ऐसी खबरें भी आने लगीं हैं कि जून में, कहीं जुलाई में शेष रह गयी परीक्षाओं को करवाकर बच्चों का भला किया जायेगा. एक तरफ कोरोना से बचने के लिए दूरी बनाये रखने के उपाय समझाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ परीक्षाओं के लिए कमर कसी जा रही है.


इधर एक तरफ संस्थाएँ परीक्षा करवाए जाने के लिए चिंतित हैं दूसरी तरफ इन्हीं संस्थानों में ऑनलाइन क्लासेज को लेकर नए नाटक चल रहे हैं. इसे नाटक ही कहेंगे, क्योंकि सबको मालूम है कि बाजार बंद है, स्टेशनरी मिलनी नहीं इसके बाद भी होमवर्क को नोट बुक पर करके अपलोड करना है. यहाँ न नोट बचे और बुक बाजार में हैं ही नहीं. बहरहाल, सरकार को दिखाने के लिए, अभिभावकों से फीस वसूलने के लिए, अध्यापकों को वेतन दिए जाने के बदले काम करवा लेने के संतोष के चलते ऐसा करना आवश्यक समझ आ रहा होगा.


ये सब अभी कोरोना, लॉकडाउन के चक्कर में शुरू हो गया है मगर देखा जाये तो भारतीय समाज में पढ़ाई को लेकर कुछ ज्यादा ही नौटंकी होने लगी है. छोटे-छोटे बच्चों की पीठ पर बोझ डालकर अभी से उनको बोझ उठाने की आदत डलवा दी जा रही है. भारी-भरकम पाठ्यक्रम के द्वारा सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही सिविल सेवा में चयनित करवाने की होड़ मची रहती है. आज बच्चों को पढ़ाई के बोझ से दबे देखते हैं तो अपना दौर याद आ जाता है. आज के दौर में बच्चों को दो-दो बोर्ड परीक्षाओं से पार होना पड़ता है, जबकि हमें तीन बोर्ड परीक्षाओं को पास करना पड़ा था. सुन कर आज के बच्चों को अजूबा लग रहा होगा सुनकर.

अजूबा आज के लिए हो सकता है मगर आपमें से बहुत से लोगों ने बोर्ड परीक्षा के तीन दौर निपटाए होंगे. कक्षा पाँच की परीक्षाएँ आने वाली थीं. स्कूल की दीदियाँ हम लोगों को समझाती थीं कि खूब पढ़ा करो, बोर्ड परीक्षा होगी. तब उस मासूमियत भरी उम्र में हम लोग समझ रहे थे कि बोर्ड में लिखना होगा. होते-करते वो दिन भी आ गया जबकि हमारी बोर्ड परीक्षाओं की शुरुआत हुई. सभी बच्चे निश्चित समय पर अपने स्कूल पहुँचे. वहाँ से दो अध्यापकों के साथ हम बच्चे पास के एक दूसरे स्कूल ले जाए गए. अपने स्कूल से अलग किसी स्कूल में परीक्षा देने का अपना ही आनंद समझ आ रहा था. परीक्षा से ज्यादा ध्यान उस स्कूल में लगे पेड़-पौधों की तरफ जा रहा था.

जिस तरह से परीक्षा होनी थी, हुई. तीन-चार दिन में कक्षा पाँच की और हमारी पहली बोर्ड परीक्षा संपन्न हुई. बचपन की उस बोर्ड परीक्षा का कोई महत्त्व आने वाले दिनों के लिए नहीं था मगर जिस बोर्ड परीक्षा का महत्त्व आने वाले दिनों के लिए था, वे भी उसी मस्ती और अल्लहड़ तरीके से पूरी की गईं. परीक्षा देने के समय ही हम दोस्तों के बीच निर्धारित कर लिया जाता था कि किस मैदान में क्रिकेट खेलने पहुँचना है, किस जगह पर बैडमिंटन की चिड़िया उड़ानी है. 

मस्ती और बेफिक्री के उस दौर के वापसी की बस कल्पना ही है और आये दिन उसी कल्पना में घूम-टहल लेते हैं.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

29 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी तू थक जाएगी इम्तिहान लेते-लेते - 1550वीं पोस्ट

ऐ ज़िन्दगी, कितनी बार इम्तिहान लेगी तू हमारा? हो सकता है कि कल को तू इम्तिहान लेती-लेती थक जाए मगर हम नहीं थकेंगे. तुम्हारा काम इन्तिहान लेना है, हमारा इम्तिहान देना. तुम थक जाओगी मगर हम नहीं. यहाँ तो एक उम्र बीत गई इसी में. ज़िन्दगी, तुमने अपने रंग-ढंग बदले मगर हम न बदले. तुम अपनी कोशिश करो, हम अपनी करते हैं. तुम जीत जाओ तो हमें ले जाना, हम जीतें तो बिना हमारी आज्ञा के न जाना. कहो, है मंजूर? ये कोई दर्शन नहीं, ये कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं वरन ज़िन्दगी के प्रति एक नजरिया होना चाहिए किसी भी आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति है. हमारा तो यही विचार है. हमारा मानना है कि ज़िन्दगी जिस परमसत्ता द्वारा दी गई है, जिस प्रकृति द्वारा दी गई है, जिस विज्ञान द्वारा दी गई है वह महज उम्र काटने के लिए नहीं दी गई है. यदि उसका उद्देश्य किसी भी जीव को, विशेष रूप से इन्सान को ज़िन्दगी देना है तो उसके पीछे अनेक अर्थ छिपे हुए हैं. यदि उसे महज जीवन देना होता, मात्र जीवित रखना होता तो वह ज़िन्दगी के साथ अनिश्चितता नहीं जोड़ता. सबकुछ निर्धारित होने के बाद भी इन्सान उससे अनभिज्ञ है, ऐसा महज इसलिए कि वह ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मकता अपनाता हुआ आगे बढ़ता रहे.


जैसा कि प्रकृति का सिद्धांत है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनीय है. एक पल में ही यहाँ सबकुछ उलट-पुलट हो जाता है. प्रकृति की गोद में एक दिन में ही जाने कितना परिवर्तन होता रहता है. पूरे चौबीस घंटों की समयावधि देखें तो पल-पल में ही परिवर्तन देखने को मिलते हैं. ऐसे में कैसे स्वीकार कर लिया जाये कि उसी प्रकृति की गोद में रहने वाले व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन नहीं होगा? कैसे मान लिया जाये कि जो पल आज है वह अगले पल बदलेगा नहीं? यह सत्य है कि जैसे दुःख आया है वैसे जाएगा भी उसी के साथ सुख भी आएगा और वह भी दुःख के जाने की तरह कुछ पल बाद चला जायेगा. इन्सान से अपने आपको इसी बदलाव के द्वारा, इस परिवर्तन के द्वारा आने वाली किसी भी घटना के लिए तैयार रहने के लिए, खुद में संतोष का भाव जागृत करने के लिए मान लिया है कि ऐसा करना ज़िन्दगी का लक्षण है. ऐसा होता है से ज्यादा वह इस पर विश्वास करता है कि ज़िन्दगी ऐसा करती है. इस विचारधारा से वे व्यक्ति सहज रूप में बाहर निकल आते हैं जो विश्वास के साथ किसी भी परिवर्तन का सामना करते हैं. इसके ठीक उलट वे लोग परेशान हो जाते हैं जो ज़िन्दगी के ऐसे परिवर्तनों के वशीभूत होकर अपना संतुलन खो देते हैं, अपने विश्वास को डगमगा देते हैं. 

ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को अगले पल की जानकारी नहीं, सभी व्यक्तियों को चौबीस घंटे ही मिले हैं, हाँ बस संसाधनों का, माध्यमों का अंतर अवश्य हो सकता है. इस अंतर को कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास के द्वारा भले न मिटा सके मगर कम तो कर ही सकता है. जैसे-जैसे कोई व्यक्ति अपने कार्यों से अपने सामने आने वाली विसंगतियों को दूर करता जाता है, अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान करता जाता है वैसे-वैसे उस व्यक्ति के अन्दर विश्वास का लेवल बढ़ता चला जाता है. किसी भी व्यक्ति को यही विश्वास विजयी बनाता है, यही विश्वास आगे बढ़ाता है. ऐसे में ज़िन्दगी में मिलने वाली चुनौतियों को, ज़िन्दगी से मिलने वाली चुनौतियों को वह सिर्फ और सिर्फ अपने विश्वास से ही जीत सकता है. ऐसे में कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास को बनाये रखे और ज़िन्दगी की चुनौतियों से जीतते हुए उसे ही चुनौती देता रहे.


++
इस ब्लॉग की 1550वीं पोस्ट 

25 मई 2016

चहकते बच्चों का खामोश हो जाना

देश भर में संचालित अनेक परीक्षा-संगठनों के परीक्षा परिणाम घोषित किये गए. अनेकानेक बच्चों ने सफलता प्राप्त की. खबरों में बच्चों के चहकने के, परिजनों संग, शिक्षकों संग उनके  चित्र लगातार सुर्ख़ियों में रहे. कोई इंजीनियर, कोई चिकित्सक, कोई प्रशासनिक अधिकारी, कोई वैज्ञानिक बनना चाहता है. हँसते-मुस्कुराते बच्चों के उत्साह को देखकर मन झूम जाता है. देश के उन्नत भविष्य का चित्र आँखों के सामने उभरता है. भावी पीढ़ी के विकासपरक राह पर बढ़ते रहने की आशा जागती है. इसी आशा और उन्नत भविष्य के साए में कुछ काली परछाइयाँ भीतर ही भीतर डरा जाती हैं. सुनहरे भविष्य की तस्वीर में कुछ धुंधलका सा लाती दिख जाती हैं. खुशियों के बीच ये काली परछाइयाँ बच्चों के आत्महत्या कर लेने की हैं. अपने परीक्षा परिणामों के प्रति सशंकित अनेक विद्यार्थियों द्वारा अपने जीवन को समाप्त कर लिया जाता है. किसी ने गले में फंदा डाल लिया तो किसी ने जहर खाकर जान दे दी. हँसते-खेलते बच्चों का यूँ सशंकित होकर असमय चले जाना मन को व्यथित करता है. परीक्षाओं में प्राप्तांकों के कम आने की शंका, कम अंक आने से भविष्य की राह के न मिलने के भय से, प्रवीणता सूची में न आ पाने के कारण अभिभावकों के सपने पूरे न कर पाने की निराशा का बोध बच्चों को मृत्यु की तरफ ले जाता है.

किसी भी परिवार के लिए उसके किसी भी सदस्य का चले जाना कष्टकारी होता है. ये कष्ट उस समय और भी विभीषक हो जाता है जबकि ऐसा किसी बच्चे के साथ हुआ हो. बच्चों द्वारा सिर्फ असफलता के भय से अथवा कुछ प्रतिशत अंक कम आने के चलते मौत की राह चले जाना समूची व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है. इक्कीसवीं सदी में जहाँ एक तरफ अधिकारों की, स्वतंत्रता की, फ्री सेक्स की, हैप्पी टू ब्लीड की, लिव-इन-रिलेशन आदि जैसी अतार्किक चर्चाओं में बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक निमग्न रहती है वहाँ बच्चों पर लादे जाने वाले अनावश्यक, अप्रत्यक्ष बोझ को दूर करने के लिए किसी तरह की चर्चा नहीं की जाती है. ये सम्पूर्ण समाज के लिए क्षोभ का विषय होना चाहिए कि एक बच्चा जो महज कुछ प्रतिशत कम अंक आने के भय से अथवा कम अंक आने के  कारण मृत्यु का वरण कर लेता है. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न विषयों में अपनी सक्रियता दिखा रहे समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इस दिशा में संज्ञाशून्य से बने नजर आ रहे हैं. घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों में मन-मष्तिष्क पर लाद दे रहे हैं. अपने अतृप्त सपनों को, अपने उस कैरियर को, जो वे नहीं बना सके, बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर लगाये हैं. अपने बच्चों को साक्षर, शिक्षित, संस्कारित बनाये जाने से ज्यादा ध्यान इस तरफ है कि वे कैसे अधिक से अधिक अंकों से सफलता प्राप्त करें. वे बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक ‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने में लगे हैं. इस लालच के वशीभूत, अभिभावकों, शिक्षकों के असफल अतीत को अपने भविष्य के द्वारा पूरा करने के चक्कर में बच्चों द्वारा अपना वर्तमान दोषपूर्ण बना लिया जाता है.

समय के साथ जैसे-जैसे तकनीक उन्नत हुई है, जैसे-जैसे विकास की राह प्रशस्त हुई है वैसे-वैसे अभिभावकों की, शिक्षकों की महत्त्वाकांक्षाओं ने भी अनियमित विकास किया है. इस अंधाधुंध विकास की दौड़ में उनके द्वारा बच्चों से न सिर्फ अच्छे अंक लाने की जबरदस्ती की जा रही है वरन दूसरे बाकी बच्चों से गलाकाट प्रतियोगिता सी करवाई जा रही है. बच्चों को आपस में सहयोग की, समन्वय की भावना विकसित करने के स्थान पर आपस में चिर-प्रतिद्वंद्विता पैदा की जा रही है. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के स्थान पर कटुता पैदा की जा रही है. ज्ञान को आपस में बाँटने की जगह उसे अपने आपमें ही कैद करके रखने की धारणा का विकास किया जा रहा है. बच्चों को किसी अन्य विद्यार्थी की असफलता के समय, उसकी आवश्यकता के समय उसकी मदद करने के बजाय उससे दूर रहने, उससे बचने की सलाह दी जा रही है. समझने की बात है कि सिर्फ और सिर्फ सफलता प्राप्त करने की शर्त के साथ-साथ बच्चों को किस तरह एकाकीपन के चंगुल में बाँधा जा रहा है. अपने चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ सफलता प्राप्त करने का शोर, दूसरे से आगे ही आगे बने रहने की होड़, किसी भी कीमत पर सबसे आगे आने और फिर सदैव आगे ही बने रहने का दबाव बच्चों को भीतर से खोखला बना रहा है. उनका यही खोखलापन उनकी असफलता में या फिर असफलता की आशंका में उन्हें सबसे दूर कर देता है. एक पल को इस स्थिति पर विचार करिए कि महज चंद अंकों के कारण एक हँसता-खेलता बच्चा सदैव के लिए खामोश हो जाये. विचार करिए उस बच्चे के अन्दर भय का, अविश्वास का वातावरण किस कदर भर गया होगा जो कम अंक आने के भय से दुनिया छोड़ देता है मगर परीक्षा परिणाम आने पर सर्वाधिक अंकों से सफलता प्राप्त करता है.


आज तकनीकी विकास के दौर में, ज्ञान की बहुलता के दौर में, उत्कृष्टता दिखाने के दौर में यदि कठिन श्रम, उच्च शिक्षा, अधिकतम अंक मजबूरी बन गए हों तो इस मजबूरी को और मजबूत करने के बजाय उसे दूर करने की आवश्यकता है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है. अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, संगठन की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. यदि हम आने वाले समय में ऐसा कर पाए तो अवश्य ही विकास की राह प्रशस्त कर पायेंगे, अन्यथा कष्ट तो दिनों-दिन बढ़ते ही जाना है. 

04 मार्च 2016

सुखमय बनायें बचपन



बच्चों की परीक्षाएँ आरम्भ हो चुकी हैं और उनके अभिभावकों द्वारा बालमन पर अतिरिक्त दबाव भी डाला जाने लगा होगा. सार्वजनिक रूप से भले ही अभिभावकों द्वारा इसे स्वीकार न किया जाये किन्तु आज का सत्य ये है कि अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष दबाव बहुत बुरी तरह से डाला जा रहा है. बचपन में ही अध्ययन को लेकर अतिरिक्त सजगता दिखाना, ज्यादा से ज्यादा अंक लाने की चाह, कक्षा में-विद्यालय में सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने की कामना करना, अन्य दूसरे बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा की भावना का नकारात्मक रूप विकसित करना आदि एक तरह से बच्चों के कोमल मन-मष्तिष्क पर असर डाल रहा है. ये सारा दबाव समूचे वर्ष भर तो काम करता ही है किन्तु इस दबाव का विकृत और भयावह रूप बच्चों की परीक्षाओं के समय देखने को मिलता है. दिन-दिन भर, गई रात तक, अलस्सुबह जगाकर किताबों में लगभग ठूंस देने की मानसिकता बहुतायत अभिभावकों में देखी जा रही है. ये अपने आपमें एक सत्य है कि आजकल शिक्षा को लेकर जिस तरह से कॉन्वेंट पद्धति का विकास हुआ, जिस तरह से अत्यधिक किताबों का बोझ बच्चों पर लादा जा रहा है, जिस तरह से कठिन से कठिन पाठ्यक्रम को मंजूरी दी जा रही है, जिस तरह से कमीशन के लालच में निजी प्रकाशकों की बहुतायत किताबों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है वो चिंता का विषय होना चाहिए. ये सब कुछ अकेले विद्यालय प्रबंधन की मंशा से नहीं हो रहा है, ऐसा अकेले निजी प्रकाशकों की मंशा से नहीं हो रहा है, ऐसा शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले दलालों-माफियाओं की मंशा से नहीं हो रहा है वरन इसमें कहीं न कहीं अभिभावकों की मंशा भी अन्तर्निहित है. ये बात और है कि अभिभावकों की ऐसी सहमति विद्यालय प्रबंधन की मंशा के साथ अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाती है.

एक पल को ऐसा करना अभिभावकों की मजबूरी मान ली जाये, एकबारगी ऐसा करने को अभिभावकों द्वारा अपने नौनिहालों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास मान लिया जाये किन्तु घर में जबरिया का माहौल बना देने को कतई सही नहीं कहा जा सकता है. बहुतायत में ये बच्चे अपने-अपने विद्यालयों में एक तरह का अनुशासनात्मक माहौल का बिगड़ा हुआ स्वरूप देखते हैं. क्लासरूम का माहौल, शिक्षा पद्धति का मानकीकरण स्वरूप न होना, अत्यधिक पाठ्यक्रम, एकाधिक रूप में रटने की मानसिकता को विकसित करने से बच्चों में स्कूलों के वातावरण के प्रति एक तरह का भय दिखता है. ऐसे में वो लगभग उसी तरह के माहौल को अपने घर में देखता है, अपने अभिभावकों में भी शिक्षक का अनुशासन देखता है, अधिकाधिक अंक लाने का दबाव देखता है तो बच्चा अनजाने ही अवसाद की स्थिति में चला जाता है. ऐसी स्थिति के आने पर ऐसे बच्चे गुमसुम, शांत, बिना किसी अतिरिक्त क्रिया-प्रतिक्रिया के देखे जा सकते हैं. डरे-सहमे से ये बच्चे किसी अनजान व्यक्ति के सामने सहजता से व्यवहार नहीं कर पाते हैं. न केवल उनके साथ बल्कि हमउम्र बच्चों के साथ भी उनको समन्वय करने में, सहयोग करने में समस्या होती है. ये स्थितियाँ आगे चलकर बच्चों में एकाकीपन की, अकेलपन की भावना विकसित करती हैं. जिसकी भयावहता उनके द्वारा गलत कदम उठाये जाने पर ज्ञात होती है. घर-बाहर-स्कूल आदि का दबाव ही कहा जायेगा जबकि नौनिहाल भी आत्महत्या जैसे जघन्य कदम उठाने लगे हैं, घरों से भागने लगे हैं.

संभव है कि आज के वैश्वीकरण के, भूमंडलीकरण के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों से संपन्न करना अभिभावकों की मजबूरी हो गई हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का दबाव बनाया जाने लगा है  किन्तु ये सब बच्चों के भविष्य को कहीं न कहीं नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि अपने व्यस्ततम समय में से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताने का काम करें. आज के दूषित वातावरण में बच्चों के लिए खेलने को पार्कों, मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे ही छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें सहयोग की भावना विकसित करने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों के साथ घुलना-मिलना चाहिए. इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त, विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.