हाइकु लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हाइकु लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

20 दिसंबर 2018

तुम याद आती हो बहुत

तुम्हें बताएँ
तुम याद आती हो
बहुत हमें.

भोर सुहानी
जब महकती है
ओस के साथ.

चाँद के लिए
सजती जब जब
सिंदूरी शाम.

सिसकते हैं
ख़्वाब अधूरे जब
सूनी रात में.

एहसासों को
हौले से छूती जब
तन्हाई मेरी.

नज़र आती
खुली बंद आँखों में
तुम ही तुम.

++
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
19-12-2018

12 दिसंबर 2018

ये उन दिनों की बात है जबकि दिल था नादाँ


ये उन दिनों
की बात है जबकि
दिल था नादाँ.

तितली बन
उड़ता रहता था
दिन औ रात.

परियों संग
सैर आसमान की
मज़ेदार सी.

नहीं थी चिंता
कल की और न था
डर आज का.

छोटी मगर
दुनिया थी हसीन
यार-दोस्तों की.

ये उन दिनों
की बात है जबकि
तुम मिले थे.

एहसास था
वो अपनेपन का
कुछ मीठा सा.

ख़ामोश लफ़्ज़
दिल से दिल तक
राह बनाते.

बस गए थे
मुझ में तुम ऐसे
ज्यों धड़कन.

नहीं था पता
बदलेगा ख़्वाब में
ये अफ़साना.

++
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
03-12-2018

26 अप्रैल 2010

आई पी एल, खेल पैसे का खेले, मोदी थरूर --- चन्द हाइकु


आई0 पी0 एल0 के गोरखधंधे का परिणाम क्या होगा ये तो सिर्फ जाँच करने वालों को ही मालूम होगा। सत्यता कुछ भी हो किन्तु यह तो सत्य ही है कि सिवाय हटने-हटाने के कुछ और नहीं होगा।

देश के अंधे दीवाने दर्शकों के लिए यही सबक होना चाहिए किन्तु जिस निर्लज्जता से दर्शकों ने फाइनल को देखने का जुनून दिखाया उससे लगता है कि अब आई0 पी0 एल0 के गोरखधंधेबाज इसको देश से बाहर चलाकर ही अपना उल्लू सीधा करेंगे। हाँ, यदि देश में भी करवाया तो सब कुछ इतना पर्दे के पीछे होगा कि किसी को भी भनक नहीं होगी। मोदी-थरूर की घटना ने इनको एक सबक तो दे ही दिया है।

बेचारे दर्शक, अब बेचारे बिलकुल भी नहीं हैं। वे तो बेशर्म, निर्लज्ज, चिकने घड़े हो गये हैं जिनके लिए सिर्फ और सिर्फ हुल्लड़ मचाना प्राथमिकता में है। खेल, देश, अपने धन की कोई फिक्र नहीं।

इसी आई0 पी0 एल0 के हुड़दंग में हमने भी कलम की हुड़दंग मचा ली, हाइकु के रूप में। वहीं आपके सामने है----

------------------------

आई पी एल,
खेल पैसे का खेले,
मोदी थरूर।

दीवानगी में,
होश नहीं कुछ भी,
दर्शक लुटे।

खेल गर्त में,
खिलाड़ी भागते हैं,
पीछे धन के।

खेल भावना,
हुई छूतंमर है,
धन के पीछे।

गोरखधंधा,
खेल से फैला हुआ,
चारों तरफ।

आहत मन,
है सांसत में जान ,
कि बुरे फँसे।

कुछ होगा,
पकड़ेंगे किसको,
सबूत कहाँ।

चोर चोर हैं
बने मौसेरे भाई,
यही खेल है।

रहेगा चालू,
मिलीभगत का खेल,
पैसा है पैसा।

मरने वालो,
आई पी एल पर,
अब तो जागो।




(चित्र गूगल छवियों से साभार)