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28 जुलाई 2024

निशानेबाजी में पदक और हमारी ख़ुशी

कई बार कुछ खुशियाँ ऐसी होती हैं जो व्यक्तिगत रूप से खुद अपने से सम्बन्धित नहीं होती हैं मगर इसके बावजूद वे खुशियाँ अपने से जोड़ती हैं, प्रभावित करती हैं. इस तरह की खुशियों में एक तरह का अनदेखा सा बंधन होता है जो किसी न किसी रूप में बंधा तो होता है मगर सामाजिक रूप में नजर नहीं आता है. इस तरह के बंधन बहुत ही आंतरिक, अत्यंत ही आत्मीय होते हैं. इनमें भले ही सामने वाले से कोई रिश्ता न हो, भले ही उससे कोई सम्बन्ध न हो मगर कुछ ऐसा होता है जो प्रभावित करता है और उसकी खुशियों से खुद को जोड़ता है.

 



कुछ इसी तरह की ख़ुशी आज मिली जबकि खबर मिली कि पेरिस ओलम्पिक 2024 में भारत को अपना पहला पदक निशानेबाजी में मिला. यह पदक कांस्य के रूप में आया जिसे मनु भाकर ने दस मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में प्राप्त किया. यहाँ विशेष बात ये है कि ओलम्पिक के इतिहास में निशानेबाजी में किसी महिला द्वारा हासिल किया गया यह पहला पदक है.

 

इस जीत से ख़ुशी मिलना स्वाभाविक ही है क्योंकि ओलम्पिक के दूसरे ही दिन देश के नाम पहला पदक आया. हम लोग उस पीढ़ी से आते हैं, जिसने ओलम्पिक में अपने देश के खिलाड़ियों को बस खेलते ही देखा है. पदकों का सूखा ख़त्म होने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा था. इस कारण से ख़ुशी मिलने के अलावा इसलिए भी इस पदक से ख़ुशी मिली क्योंकि पाँच वर्ष पूर्व 2019 में हमने भी निशानेबाजी में प्रदेश स्तर की प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त करते हुए राष्ट्रीय स्पर्धा के लिए जगह बनाई थी. संयोग से यह स्पर्धा भी दस मीटर एयर राइफल की थी.

 

बहरहाल, कतिपय पारिवारिक कारणों से, कोरोना के कारण उसके बाद आगे आना नहीं हो सका किन्तु भारतीय निशानेबाजों की छोटी से छोटी जीत भी हमें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती है, ख़ुशी देती है. मनु को बधाई, शुभकामनायें; साथ ही सभी भारतीय खिलाड़ियों को भी शुभकामनाएँ कि देश को रोज ही कई-कई पदक प्रदान करवाते रहें.


09 सितंबर 2023

जिम्मेवारियों संग काम करने की स्वतंत्रता की ख़ुशी

देश इस समय जी-20 की अध्यक्षता करते हुए दो दिवसीय शिखर सम्मलेन के आयोजन में व्यस्त है. विश्व भर की महाशक्तियाँ, शक्तियाँ, उनके प्रमुख व्यक्तित्व इस समय देश में हैं. आयोजन की तैयारियाँ, तमाम प्रबन्ध, साज-सज्जा, व्यवस्थाएँ आदि दिव्यता-भव्यता से भरपूर नजर आ रही हैं. इस आयोजन से जुड़े जितने भी लोग दिखाई दे रहे हैं, चाहे वे बहुत बड़ी जिम्मेवारी के साथ हो अथवा बहुत छोटे से काम का निर्वहन कर रहे हैं, सबके चेहरे पर एक अलग सी ख़ुशी देखने को मिल रही है. जी-20 शिखर सम्मलेन की तैयारियों, व्यवस्थाओं से जुड़े लोगों की ख़ुशी-मिश्रित सक्रियता को देखकर दिल-दिमाग बहुत पीछे चला गया या कहें कि खो गया. वर्ष 2004 में और वर्ष 2008 में हुए दो सेमीनार इस अवसर पर बहुत गहराई के साथ याद आये. वर्ष 2004 में आयोजन था नेशनल सेमीनार का, जिसे रक्षा अध्ययन विभाग, डी.वी. कॉलेज, उरई द्वारा आयोजित किया गया था. दूसरा सेमीनार जो वर्ष 2008 में आयोजित हुआ. यह पूरी तरह व्यक्तिगत संसाधनों पर आधारित था, जिसे हमारे द्वारा कुछ साथियों के सहयोग से गठित पी-एच.डी. होल्डर्स एसोशिएशन द्वारा आयोजित करवाया गया था. इन दोनों सेमीनार की चर्चा होगी मगर अभी वर्ष 2004 में आयोजित हुए सेमीनार के बारे में. 


एडमिरल राजा मेनन 


एक दिन हमारे मोबाइल पर अभय अंकल का फोन आया, तुरंत विभाग में आकर मिलो. अभय अंकल माने डॉ. अभय करन सक्सेना, जो रक्षा अध्ययन विभाग, डी.वी. कॉलेज, उरई के अध्यक्ष थे और हमें अपने बेटे समान मानते थे. महीना कायदे से याद नहीं, जून का अंतिम सप्ताह था या जुलाई का पहला, समझ नहीं आया कि ऐसा कौन सा काम आ गया जिसके लिए अभय अंकल ने हमें फोन किया? बिना किसी सवाल-जवाब के (इतनी तो हिम्मत ही नहीं होती थी) जी अंकल, के जवाब के बाद तुरंत विभाग में उपस्थित हुए. पहुँचते ही अंकल ने एक पत्र हमारे सामने रखते हुए कहा कि तुमको बधाई हो, विभाग को एक सेमीनार मिला है यूजीसी की तरफ से, इसमें तुम क्या सहयोग कर सकते हो? अंकल आप आदेश करें, जिस भी काम का, हो जायेगा. हमारे इतना कहते ही अंकल ने कहा कि सारा काम वैसे भी तुमको देखना है मगर प्राथमिकता में तुमको स्मारिका का सम्पादन करना है. एडिटर रहेंगे निगम साहब मगर पूरा काम तुमको ही करना है.


विंग कमांडर डॉ. एम.एल. बाला 

हमारी असहमति का सवाल ही नहीं उठता था. इसके बाद एक आदेश पारित हुआ अभय अंकल, निगम साहब, शर्मा जी और हमारे मित्र डी.के. सिंह की तरफ से कि हमें रोज विभाग में आना होगा. उस समय निपट सरकारी रोजगार से रहित व्यक्ति थे, सो रोज हाजिरी लगाना भी संभव था. खैर, बाकी बातें फिर कभी क्योंकि अभी करना शुरू की तो ये पोस्ट कई-कई खण्डों में लगानी पड़ेगी. और बातें करने के पहले बस इतना बताते चलें कि स्मारिका के अंतिम रूप तक आने तक किसी के द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया. हमारे काम की स्वतंत्रता की स्थिति ये थी कि हमने अभय अंकल के वैचारिक तक पर अपनी एडिटिंग कर दी थी. हमें साठ पेज की स्मारिका तैयार करने के लिए कहा गया था. उसका अंतिम प्रिंट निकालने के पहले एक कॉपी अभय अंकल को, निगम अंकल, शर्मा अंकल को दिखाई. उनका आशीर्वाद मिला और स्मारिका अपने मूल रूप में आ गई. (इस पर भी लिखेंगे किसी दिन. स्मारिका की कई-कई कहानी हैं और मजेदार भी. यहाँ सीखा कि स्वतंत्रता मिलने के बाद भी कैसे अनुशासन में रहकर काम किया जा सकता है, लिया जा सकता है.) 


बांये से - कैप्टन एस.के. जौहरी, डॉ. आर. एच. स्वरूप, लेफ्टिनेट जर्नल तेज पॉल 


होते-करते आखिरकार सेमीनार का दिन आ ही गया. 29-31 अक्टूबर 2004 में होने वाले इस सेमीनार की सारी तैयारियाँ, व्यवस्थाएँ बहुत से लोगों के द्वारा संपन्न होनी थीं मगर उनका निर्देशन कुछ हाथों में ही था. ये हमारा सौभाग्य था कि बहुत सी गम्भीर जिम्मेवारियाँ, व्यवस्थाएँ हमारे सिर पर थीं. भारतीय सेना से जुड़े वे सम्मानित व्यक्ति जो सेवानिवृत्त हो चुके थे या फिर उस समय सेवा में थे, उनके आवागमन का, रुकने का, खाने-पीने का, सेमीनार स्थल तक आने-जाने का जिम्मा हमारे कन्धों पर था. काम की गंभीरता अन्दर ही अन्दर डराती भी थी मगर अभय अंकल का विश्वास इस कदर था कि सारा डर गायब हो जाता. कुछ लोगों को लाने की जिम्मेवारी हमने स्वयं ली. अभय अंकल की कार बराबर हमारे पास रहती थी, सो आवागमन के काम में भी कोई अड़चन नहीं आई.


हमने भी पढ़ा अपना रिसर्च पेपर 


तीन दिवसीय उस सेमीनार की तमाम व्यवस्थाओं को पूरा करने में, अतिथियों की समस्याओं का समाधान करने में, भारतीय सेना के अधिकारियों संग कुछ समय बिता लेने में, अन्य प्रतिभाग करने वाले महानुभावों, शोधार्थियों के लिए अनुकूलन की स्थिति निर्मित करने में किसी भी तरह से परेशानी का अनुभव नहीं हो रहा था. छोटी से छोटी बात हो या कोई बड़ी बात सबमें अभय अंकल और बाकी लोगों द्वारा हमारी राय ली जाना हमें खुद में विशिष्ट बना रहा था. उस समय तो अपने आपमें गर्व महसूस हो रहा था, चेहरे पर ख़ुशी झलक जाती थी, आज उस समय को, उस आयोजन को याद कर रहे तो चेहरे पर अनायास ही मुस्कान उभर आई. समझ सकते हैं कि जो लोग जी-20 के महान, गर्वित करने वाले आयोजन में सहभागी हैं, साझीदार हैं, जिम्मेवार हैं वे किस कदर ख़ुशी का, गर्व का अनुभव कर रहे होंगे.

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(इस पोस्ट को लिखते समय उस सेमीनार के चार विशेष स्तंभों अभय अंकल, राजेंद्र कुमार निगम अंकल, अरविन्द कुमार शर्मा अंकल और दुर्गेश कुमार सिंह जी में से अभय अंकल और निगम अंकल अब हमारे बीच नहीं हैं. उनको इस पोस्ट के द्वारा पुनः स्मरण करते हुए सादर नमन.) 






 

22 अक्टूबर 2022

दीपमालिके के स्वागत में एक दीप प्रज्ज्वलित करें

असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतम् गमय यह वाक्य एक तरफ सत्य की तरफ जाने का सन्देश देता है वहीं साथ में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है. चारों ओर दीपों की कतारमोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाशरंग-बिरंगी आतिशबाजीविविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे, सभी अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चों कायुवाओं काबुजुर्गों कापुरुषों-महिलाओं का हर्षोल्लासित होना स्वाभाविक सा दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाईलोगों से मिलना-जुलनामिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.


भारतीय परम्परा मेंसंस्कृति में पर्वोंत्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहां जितनी अनुपम वैविध्यपूर्ण प्रकृति में मनमोहक ऋतुएं हैंठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह रही है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों कीसामाजिक संदर्भों कीसमरसता कीसौहार्द्र कीभाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते दिखाई देते हैं. होना भी यही चाहिए किसी भी पर्व काकिसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. हमारा उद्देश्य सदैव यही हो कि हमारे कदमों से सामाजिकता का विकास हो हीसामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करनाउत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.




इधर सामाजिक स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरणवैश्वीकरणऔद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजतासरलता को विखण्डित सा कर दिया है. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नातेहमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है.  


त्यौहार अब नितांत औपचारिकताओं में सिमटाए जाने लगे हैं. संबंधों मेंरिश्तों में पहले की तरह गर्माहट नहीं दिखाई देती हैबाज़ारों में अपनत्व कम कटुता ज्यादा देखने को मिलने लगी है विदेशी सामानों के बीच आज भी कई-कई छोटे बच्चे-बच्चियाँ साँचे में ढले गणेश-लक्ष्मीमिट्टी के दिएरुईमोमबत्तियाँ आदि बेचते दिखते हैं. मशीनों से निर्मित चमकते-दमकते गणेश-लक्ष्मी की भव्य मूर्तियों के आगे स्टाइलिश दीयों के आगेडिजाइनर मोमबत्तियों के सामनेअजब-गजब रूप से चमक बिखेरती झालरों के सामने इनका अंधकार ज्यों का त्यों रहता है. हर एक पटाखे के फूटने के साथहर एक दिया रौशनी बिखेरने के साथहर बार और अकेले त्यौहार मनाने के साथ एहसास होता है कि मंहगाई सामानों में ही नहीं आई है संबंधों मेंरिश्तों में भी आई है. अंधकार सिर्फ अमावस की रात को ही घना नहीं हुआ है बल्कि अपनत्व मेंस्नेह में भी घनीभूत होकर छा गया है. काले आसमान में रौशनी बिखेरती आतिशबाजीघर की छत पर चमक बिखेर कर शांत हो जाते दिएमकान की दीवारों से लिपटी विदेशी झालरें अपनी क्षणभंगुर चमक से एक पल को तो अंधकार दूर कर देती हैं किन्तु समाज में लगातार बढ़ते जाते अंधकार को दूर नहीं कर पा रही हैं.


नैराश्य के ऐसे वातावरण के बाद भीकृत्रिम चकाचौंध के बीच भीदीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भीसामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने कोएक प्रकार के आवरण को गिराने कोअसामाजिकता को मिटाने कोसामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीचमंहगी से मंहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियां देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह कोअपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त मेंतन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़ेहमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहेअपनी खुशी से दूसरे बच्चों मेंऔर लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आंगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती हैबस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह सेउमंग से परिवर्तन कासमरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.

 





 

04 मई 2022

पारिवारिक एकजुटता की खुशियाँ

परिवार में कोई आयोजन हो और यदि सभी परिजन शामिल हों तो उस आयोजन में और भी अधिक मजा आता है. ऐसी सुखद अनुभूति का अवसर आया गृह प्रवेश के दौरान जबकि सभी लोग वहाँ उपस्थित हुए. ये पारिवारिक एकजुटता का प्रतीक ही कहा जायेगा कि सुख-दुःख में सभी सदस्य एकसाथ दिखाई देते हैं. आज जब समाज में तमाम सारी विसंगतियों को देखते हैं वैसे समय में अपनी पारिवारिक एकजुटता पर गर्व होता है. मन कामना करता है कि इसे कभी किसी की नजर न लगे.


वर्तमान दौर इस तरह का बनता जा रहा है जबकि व्यक्ति आपस में तालमेल बनाकर नहीं रहना चाहता है. परिवार के चार सदस्यों के बीच जरा-जरा सी बात पर मनमुटाव हो जाता है, उनके बीच वैमनष्यता आ जाती है. आवश्यकता होती है आपस में समन्वय बनाने की, एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करने की, उनको आदर देने की. हम में से बहुत से लोग ऐसा करने में चूक जाते हैं. हम में से बहुतायत लोग चाहते हैं कि उनको सम्मान मिले, उनकी बातों को अहमियत दी जाये मगर जब दूसरों के लिए ऐसा करने की बारी आती है तो वही लोग पीछे हट जाते हैं. यही वह स्थिति होती है जबकि मनमुटाव आने लगता है.


बहरहाल, समाज की अपनी गति, अपनी दिशा है. यहाँ सबकुछ नियंत्रित होते हुए भी लगता है कि अनियंत्रित है. सबके साथ माहौल एक जैसा नहीं रहता. एक जैसा माहौल सभी को नहीं मिलता. पारिवारिक एकजुटता के इस हँसी-ख़ुशी के अवसर पर छोटे भाई मिंटू की कमी भी महसूस हुई. आँखों में ख़ुशी की झलक के साथ इस दर्द की नमी भी बराबर तैरती रही. ज़िन्दगी का शायद यही ढंग है और इसे स्वीकारना ही पड़ता है, चाहे वो अनमने रूप में ही क्यों न हो.










26 दिसंबर 2020

समय का स्वागत कर उसे सुखद बनाने का प्रयास हो

बाजार में रोज की तरह सैर-सपाटा करने के दौरान आज एक परिचित से मुलाकात हुई. इधर-उधर की बातों, हालचाल के बाद उनके सामने एक सवाल उछाल दिया. वैसे जो सवाल हमने उनकी तरफ उछाला वो सवाल वैसे प्रतिवर्ष उनकी तरफ से उछाला जाता था. जी हाँ, यह सच है. चूँकि बाजार में उनसे लगभग रोज ही मुलाकात हो जाया करती है. इसी में दिसम्बर माह के अंतिम दिनों में उनकी तरफ से एक सवाल हर बार सामने आता है कि नए साल के लिए क्या संकल्प लिया है? नए वर्ष में क्या नया करने का विचार है? आज बहुत देर तक बातचीत करने के बाद भी उनकी तरफ से ऐसा कोई सवाल नहीं आया तो जरा आश्चर्य हुआ. आश्चर्य इस कारण हुआ कि दिसम्बर समाप्ति में अब चार-पाँच दिन शेष रह गए हैं फिर भी उनकी तरफ से शून्यता क्यों?




उनकी तरफ से किसी तरह की पहल न होते देख हमने ही इस बार उनकी जिम्मेवारी का निर्वहन करने का मन बनाया. उनकी तरफ सवाल उछाला कि आने वाले साल के लिए क्या संकल्प कर रहे हो? जवाब में बहुत बुरा सा मुँह बनाते हुए, लगभग नजरंदाज करने जैसा अंदाज दिखाते हुए बोले कुछ नहीं. अब संकल्प-बंकल्प लेना बंद. हमारा प्रश्नवाचक स्वरूप देख कर वे आगे बोले कि इस साल भी कुछ सोचा था, कुछ संकल्प लिए थे मगर इस साल की तो पूरी तरह से रगड़ लग गई. सारे के सारे संकल्प धराशाही हो गए. इसलिए अब आगे से कोई संकल्प नहीं. समय का कोई भरोसा नहीं कि कब क्या हो जाये. हमें समझ आ गया कि कोरोना के चलते वे इस वर्ष को कोसने में लगे हैं और उसी के चलते आने वाले वर्षों के लिए किसी तरह के संकल्प की नीति पर नहीं चल रहे.


हमने हँसते हुए उनको दिलासा दिलाई कि एक साल ऐसा निकल गया, इसका ये मतलब तो नहीं है कि आने वाले सभी वर्ष ऐसे ही निकलेंगे. हो सकता है कि आने वाला साल या फिर उसके बाद के आने वाले साल बहुत बेहतरीन निकलें. संभव है कि जो-जो सोचा जाये, जो भी संकल्प लिया जाये वो सब आने वाले वर्षों में पूरे हो जाएँ. उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव न दिखने पर उनके सामने फिर सवाल उछाला कि अच्छा चलो, यह साल ख़राब निकल गया. पिछले सालों में तुमने अपने कितने संकल्प पूरे कर लिए? पिछले वर्षों में तुम्हारे सोचे हुए कितने काम पूरे हुए? वे साल तो इस साल जैसे बुरे नहीं थे. उनमें तो इस वर्ष जैसी कोई बीमारी नहीं फैली थी. उनकी तरफ से कोई जवाब न आता देख समझाया कि समय के हाथों में बहुत कुछ है जो हमारे हाथ में नहीं मगर हमारे हाथ में इसके बाद भी इतना कुछ है जो समय को बदल सकता है. संकल्प लेना न लेना तुम्हारा अपना निजी मसला हो सकता है मगर किसी एक वर्ष के बुरे निकल जाने के कारण से आने वाले समूचे समय को बुरा समझने लगना नितांत नकारात्मक सोच है. इस नकारात्मकता से बाहर निकलने की जरूरत है.


उनके चेहरे की मुस्कराहट से लगा कि बात सही जगह पहुँच सकी है. ये हम सभी को ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जो समय निकल गया जरूरी नहीं कि आने वाला समय भी वैसा ही निकले. निश्चित ही यह साल बहुत ही ख़राब रहा मगर इसके बाद भी इसमें बहुत कुछ अच्छी खबरें सुनने को मिलीं. देखा जाये तो प्रत्येक वर्ष अच्छे और बुरे का संयोग लेकर आता है. हम अपने ऊपर घटित होने वाली घटनाओं के अनुसार उस वर्ष का आकलन करने लगते हैं. वास्तविक रूप में तो हमें समय का स्वागत करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि हम सभी अपने कदमों से, अपने कार्यों से, अपने प्रयासों से उस समय को सुखद, खुशनुमा, बेहतर बना सकें.


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वंदेमातरम्

19 जुलाई 2020

यादों का हटाया जाना सहज होता तो....

यादें समय-असमय चली आती हैं, कभी परेशान करने तो कभी प्रसन्न करने. इनको आने के लिए न तो किसी से अनुमति की आवश्यकता होती है और न ही इनके आने का कोई समय निर्धारित होता है. क्या घटना है, क्या स्थिति है, कैसी परिस्थिति है इससे भी कोई लेना-देना नहीं, बस इन यादों का मन हुआ और आकर सामने खड़ी हो जाती हैं. अब जबकि ये समय अनलॉक की स्थिति के बाद भी नितांत अपने आपमें ही व्यतीत हो रहा है तब इन यादों ने जैसे दिल-दिमाग पर अपना ही कब्ज़ा कर रखा है. इस समय जीवनशैली नियमित होने के बाद भी, अनुशासित होने के बाद भी कहीं न कहीं थोड़ी सी अनियमित है, थोड़ी सी अनुशासनहीन है. ऐसे में कोई काम पूर्ण मनोयोग से संपन्न नहीं हो पा रहा है. किसी भी काम को करते समय उससे सम्बंधित किसी न किसी तरह की यादें अपना स्वरूप निर्मित कर लेती हैं.



आज की आईएस तकनीकी भरी दुनिया में बहुत सारे इंस्ट्रूमेंट बाजार में उपलब्ध हैं. इनमें से बहुतों के साथ मेमोरी का चक्कर जुड़ा होता है. कई बार उनको कार्यशील बनाये रखने के लिए पुरानी संग्रहित फाइल्स को हटाना होता है, उसमें जमा पुरानी, अनुपयोगी सामग्री को भी हटाना होता है. कई बार मन में आता है कि ऐसा कुछ दिमाग के साथ, दिल के साथ क्यों नहीं है? क्यों इनके साथ ऐसी कोई प्रक्रिया जुड़ी नहीं है जो दिल-दिमाग को भी फोर्मेट कर दे, उसके भीतर जमा अनुपयोगी, बेकार सामग्री को, यादों को हमेशा के लिए डिलीट कर दे.

ऐसा विचार इसलिए आता है क्योंकि हर एक याद ख़ुशी देती हो ऐसा नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि हर एक याद का अपना कोई महत्त्व हो. बहुत बार लगता है कि दिमाग, दिल बहुत सी ऐसी यादों को अपने में समेटे है जिनका होना सिर्फ दुःख ही देता है. ऐसी बहुत सी यादें हैं जिनका होना सिर्फ दुःख का कारण होता है. लगता है कि यदि उनका हटाया जाना सहज होता तो शायद बहुत से लोगों का जीवन सुखमय हो सकता था.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

13 सितंबर 2019

ख़ुशी तो खुद को खुश रखने में है


ख़ुशी की चाह सबको है मगर उसे पाने का, तलाशने का तरीका बहुत से लोगों को पता ही नहीं. पहली बात तो ये कि अभी बहुत से लोगों को इसका ही पता नहीं कि ख़ुशी आखिर है क्या? उन्हें तो इसका भी भान नहीं कि उनके लिए ख़ुशी क्या है? ऐसे लोग बस दूसरे के चेहरे की प्रसन्नता को, उसकी भौतिक स्थिति को देखकर, उसके रहन-सहन को देखकर ही ख़ुशी का आकलन करने में लगे हैं. दूसरे की दिखाई देने वाली स्थिति को उसकी ख़ुशी समझ कर अपनी ख़ुशी की तलाश में लगे हुए हैं. ऐसे लोगों को पहले यह समझना होगा कि आखिर ख़ुशी होती क्या है. क्या बड़ा मकान होना ख़ुशी है? क्या बहुत बड़े वेतन वाली नौकरी मिल जाना ही ख़ुशी है? क्या बड़ी, लक्जरी कार में सैर करना ही ख़ुशी है? क्या अपने पसंद के व्यक्ति को जीवनसाथी के रूप में पा लेना ही ख़ुशी है? क्या खूब सारा धन जमा कर लेना ही ख़ुशी है? संभव है कि बहुत से लोगों के लिए यही ख़ुशी हो. ये भी संभव है कि बहुत से लोग एक पल को इन्हीं को ख़ुशी मानें मगर अगले ही क्षण उसे नकार दें. 


इस नकार के पीछे खुद उन्हीं की मानसिक स्थिति है. उनकी खुद में संतुष्ट न हो पाने की स्थिति ही उन्हें ख़ुशी का असली स्वाद नहीं लेने देती है. ऐसे लोग आज कार खरीद कर खुश होते हैं मगर अगले ही क्षण कार के चलते ही दुखी हो जाते हैं. ऐसा कार के नए-नए स्वरूप के कारण, नए-नए मॉडल के कारण, उसकी कीमतों के कारण होने लगता है. कार तो महज एक उदाहरण है, ऐसा बहुत सी स्थिति में होता है. असल में लोगों के लिए ख़ुशी का असल अर्थ मालूम ही नहीं. ऐसे लोग सांसारिक स्थितियों में ख़ुशी की तलाश करते हैं. वे ऐसे-ऐसे कदमों में ख़ुशी की चाह रखते हैं जो असल में महज प्रसन्नता देने का माध्यम होते हैं. ऐसी स्थितियों से मिलने वाली ख़ुशी जीवन की तरह क्षणभंगुर होती है. एक पल को ख़ुशी देकर वह स्थिति गायब हो जाती है. ऐसी ख़ुशी मिलने के तुरंत बाद आगे आने वाली ख़ुशी की चाह पैदा हो जाती है. ख़ुशी का पूरा आनंद उठाने से पहले ही किसी दूसरी ख़ुशी की चाह करने लगना ही उस ख़ुशी को समाप्त करना होता है. किसी अपने के परीक्षा में अधिक अंक लाना ख़ुशी पैदा करता है, तत्क्षण उसके आगे की परीक्षा में उससे भी अधिक अंक लाने की आकांक्षा वर्तमान ख़ुशी को समाप्त कर देती है. वर्तमान ख़ुशी का आनंद उठाये बगैर भविष्य की ख़ुशी की प्रत्याशा करने लगना कई बार दुःख का कारण बनता है.

असलियत यह है कि समाज में बहुतायत लोग आन्तरिक ख़ुशी के स्थान पर बाहरी ख़ुशी पाने में लगे हुए हैं. अपने भीतर की ख़ुशी से प्रसन्न रहने के बजाय बाहरी तत्त्वों की दिखावटी स्थिति में अपनी प्रसन्नता पाने का काम करते हैं. सत्यता यह है कि कोई भी व्यक्ति खुश उसी स्थिति में रह सकता है जबकि उसका मन प्रसन्न हो, उसका दिल प्रसन्न हो. अपने भीतर दुःख की स्थिति लेकर कोई व्यक्ति समाज को दिखाने के लिए भले खुश रहे मगर असल में वह खुश होता नहीं है. एक पल को ख़ुशी झलका कर वह सामने वाले की ख़ुशी से ही निराश होने लगता है. ऐसे में किसी भी व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि यदि वह खुश रहना चाहता है तो संसाधनों की अनावश्यक अपेक्षा से बचने का काम करे. भौतिकतावादी वस्तुओं की अनावश्यक संग्रह करने की मानसिकता से बचे. ऐसी सोच केवल और केवल दुःख देने का कार्य करती है. ख़ुशी तो स्वयं को प्रसन्न रखने का माध्यम है. कोई व्यक्ति बिना किसी संसाधन के भी उस समय खुश कहा जा सकता है जबकि वह स्वयं से संतुष्ट है. आज व्यक्ति अपनी ही स्थिति, अपने ही कार्य से संतुष्ट नजर नहीं आता है. वह किसी न किसी रूप में असंतुष्टि ही दर्शाता नजर आता है. ऐसे में उसके पास भले ही अपार संसाधन मौजूद हों किन्तु खुद से पैदा असंतुष्टि ख़ुशी को जन्मने ही नहीं दे सकती. खुद को खुश रखने के लिए सबसे पहले खुद से संतुष्ट होना सीखना पड़ेगा. बिना इसके कोई भी संसाधन अधूरा है, कोई भी स्थिति ख़ुशी देने वाली नहीं है. असल ख़ुशी तो खुद को खुश रखने में ही है. 



10 अप्रैल 2019

अभावग्रस्त बचपन की खिलंदड़ मस्ती

अपने कॉलेज आने-जाने के क्रम में, नियमित शहर टहलने के क्रम में अक्सर ऐसे बच्चों से मिलना हो जाता है. बहुत से लोग ऐसे बच्चों को देखकर उनसे बचते हुए निकल जाते हैं. बहुत से लोग हैं जो इनको डाँटते-फटकारते हुए भी आगे बढ़ते हैं. समझ नहीं आया कि आखिर इन बच्चों को डाँटने-फटकारने का कारण क्या रहता है? देखने में आता है कि ये बच्चे किसी से कुछ मांगते नहीं हैं, न किसी से भीख माँगें, न किसी से खाने-पीने की गुहार लगायें. इस तरह के कई बच्चे हैं जो उरई की सड़कों पर, गलियों में आम लड़कों की तरह टहलते दिख जाते हैं. ये बच्चे तीन-तीन, चार-चार की संख्या में एकसाथ रहते हैं और सड़कों से, गलियों से, कूड़े के ढेर से कूड़ा बीनने का काम करते हैं. इनसे कई बार बातचीत करके इनकी पारिवारिक स्थिति के बारे में जानकारी ली. इनके माता-पिता इनके द्वारा जमा किये गए पैसों को जुआ खेलने, शराब पीने में उड़ा दिया करते हैं. लगभग सभी परिवारों की एक जैसी स्थिति है. दो-चार बार इन बच्चों को पढ़ाई, शिक्षा आदि के बारे में समझाया, बताया मगर इनका मन उस तरफ जाता दिखाई न दिया. 


बहरहाल, बात ये नहीं कि ये पढ़ना चाहते हैं कि नहीं, यह भी नहीं कि प्रशासन इनकी तरफ ध्यान दे रहा है या नहीं बल्कि यह बताना है कि नितांत गरीबी के दौर में जी रहे ये बच्चे अपने इसी काम को करते समय पूर्णतः निर्दोष मस्ती के साथ मगन रहते हैं. इनकी आपसी मस्ती, आपसी नोंक-झोंक, आपस का हुल्लड़ देखकर लगता नहीं कि ये अपना पेट भरने की जद्दोजहद में इस काम को कर रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे अपने उसी काम को अपनी नियति समझने के बाद भी उसका आनंद ले रहे हैं, उसी में से आनंद निकाल रहे हैं. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जबकि कोई व्यक्ति अपने काम में पूरी तरह से आनंद की प्राप्ति करे. ऐसा न के बराबर देखने को मिलता है जबकि एक जैसा काम करने वालों के बीच हँसी-मजाक का निष्कलंक माहौल बना रहे. 

इन बच्चों को जब इस स्थिति में देखते हैं तो एकबारगी मन विचलित हो उठता है मगर ये देखकर सीखने की प्रेरणा मिलती है कि अपने काम को कैसे हँसते-खेलते किया जा सकता है.

13 फ़रवरी 2019

सकारात्मक सोच से मिलती है ख़ुशी

ख़ुशी शब्द देखने में जितना छोटा है, उसकी उतनी ही व्यापकता हैं. सभी के लिए ख़ुशी के अलग-अलग मायने हैं, अलग-अलग सन्दर्भ हैं. किसी के लिए बहुत ही छोटी समझी जाने वाली स्थिति से बहुत बड़ी सी ख़ुशी उत्पन्न हो सकती है तो किसी के लिए बड़े से बड़ी स्थिति भी ख़ुशी पैदा नहीं कर पाती है. ख़ुशी के अपने अलग-अलग मानक हैं. ख़ुशी किसी चीज को प्राप्त कर लेने का नाम नहीं है. ख़ुशी किसी से मिल लेने भर का नाम नहीं है. ख़ुशी किसी सफलता के प्रत्युत्तर में जन्मने वाली स्थिति नहीं. ख़ुशी खुद को तनावरहित बनाये रखने की अवस्था भी नहीं. ख़ुशी संतुष्टि की भावना नहीं. ख़ुशी शारीरिक अवस्था भी नहीं है. ख़ुशी को विशुद्ध मानसिक अवस्था भी नहीं कहा जा सकता है. हो सकता है कोई आर्थिक सशक्तता को प्राप्त कर लेता हो मगर उसे फिर भी ख़ुशी न मिलती हो. हो सकता है कोई आर्थिक स्तर पर बहुत ही कमजोर हो मगर वह खुश रहता हो. ख़ुशी एक स्थिति कही जा सकती है जो व्यक्ति को खुश रहने का अवसर उपलब्ध करवाती है. इस अवसर का स्वरूप कुछ भी हो सकता है, कैसा भी हो सकता है.

कई बार लगता है कि मानव स्वभाव इस तरह का है ही कि वह ख़ुशी को बहुत लम्बे समय तक अपने साथ रख नहीं पाता है. उसके ऊपर किसी न किसी दुःख को, कष्ट को, नाखुशी को बैठा देता है. उसके सामने एक पल में एकसाथ आने वाली ख़ुशी और ग़म में वह उस ग़म को ज़िन्दगी भर ढोता रहता है जबकि उसी समय साथ आई ख़ुशी को तत्काल भुला बैठता है. एक बहुत बड़ी ख़ुशी के अवसर पर भी वह छोटे से छोटे दुःख को अपने साथ घसीट कर लाने से नहीं चूकता है जबकि ऐसा उसके द्वारा दुःख के अवसर कर नहीं किया जाता है. देखा जाये यदि ख़ुशी परिस्थितिजन्य है तो दुःख भी इससे इतर नहीं है. यदि ख़ुशी को मानसिक अवस्था माना जाये तो दुःख भी उसी श्रेणी में शामिल होता है. यदि नकारात्मकता दूर करने के परिणामस्वरूप ख़ुशी का जन्म होता है तो फिर ध्यान रखना होगा कि सकारात्मकता समाप्त होने से ही दुःख का उदय हुआ है. ऐसे में उसी सकारात्मकता को पुनः क्यों नहीं प्राप्त किया जाता है? क्यों नहीं दुःख के मूल में छिपे नकारात्मक भाव को दूर करके ख़ुशी को गले लगाया जाता है? भारतीय समाज में बहुधा देखने में आता है कि एक दुःख के साये में व्यक्ति पूरी जिंदगी बिता देता है. उसका रहन-सहन, उसकी जीवन-शैली, उसकी कार्यशैली, उसकी दिनचर्या आदि सबकुछ उसी एक दुःख के द्वारा संचालित होने लगती है. ऐसे में उसी नकारात्मकता को दूर करने की आवश्यकता है जिसके दूर होने से ख़ुशी मिली थी. उसी सकारात्मकता को बनाये रखने की जरूरत है जिसके न होने से दुःख दिखाई देने लगा है.

ख़ुशी या दुःख पूरी तरह से व्यक्ति की अपनी मानसिक अवस्था है. उसे अपने वर्तमान के साथ जीवन जीने की कला सीखने की आवश्यकता है. जो व्यक्ति अपने वर्तमान में अतीत की परेशानियों को खींच ले आते हैं और उसी वर्तमान को बोझ बनाकर भविष्य तक ले जाना चाहते हैं वही ख़ुशी का आनंद नहीं ले पाते हैं. ख़ुशी को दीर्घजीवी भी बनाया जा सकता है बशर्ते उसका स्वरूप स्वतंत्र छोड़ना होगा. उसे किसी भी तरह के दुःख के साये में पलने को नहीं छोड़ना होगा. हमें हमारी ख़ुशी हमारी भावनाओं में खोजनी होगी. हमें हमारी ख़ुशी के लिए अपने जीवन की कठिनता को छोड़ना होगा.

खुशियों को लम्बे समय तक साथ बनाये रखने के लिए व्यक्ति को दिखावे की संस्कृति से दूर होना पड़ेगा. यह भी ध्यान देना होगा कि जो बातें व्यक्ति के दिल-दिमाग को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं उनसे न केवल निपटना होगा बल्कि उन्हें हमेशा के लिए दूर करना होगा. व्यक्ति को उन्हीं कामों की तरफ खुद को एकाग्र करने की आवश्यकता है जो उसके दिल-दिमाग को पसंद आते हों. आवश्यक नहीं कि सिर्फ धनोपार्जन के लिए ही काम किया जाये. ऐसे काम करने के साथ-साथ अपनी ख़ुशी को लम्बा बनाने के लिए वे काम भी करने चाहिए जिन्हें शौक कहा जा सकता है, पसंद कहा जा सकता है, पैशन कहा जा सकता है. इस तरह के क्रियाकलापों से, व्यवहार से, प्रक्रिया से ख़ुशी प्राप्त की जा सकती है. किसी भी व्यक्ति को इसका आभास होना ही होना चाहिए कि ख़ुशी उसके भीतर ही है, बस उसे देखने-समझने की आवश्यकता है.


उक्त आलेख दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण) दिनांक 13-02-2019 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ.. 
https://epaper.jagran.com/epaper/13-feb-2019-262-national-edition-national-page-8.html


03 फ़रवरी 2019

ख़ुशी अपने भीतर है, पहचानो तो


ख़ुशी शब्द देखने में जितना छोटा है, उसकी उतनी ही व्यापकता हैं. सभी के लिए ख़ुशी के अलग-अलग मायने हैं, अलग-अलग सन्दर्भ हैं. किसी के लिए बहुत ही छोटी समझी जाने वाली स्थिति से बहुत बड़ी सी ख़ुशी उत्पन्न हो सकती है तो किसी के लिए बड़े से बड़ी स्थिति भी ख़ुशी पैदा नहीं कर पाती है. ख़ुशी के अपने अलग-अलग मानक हैं. ख़ुशी किसी चीज को प्राप्त कर लेने का नाम नहीं है. ख़ुशी किसी से मिल लेने भर का नाम नहीं है. ख़ुशी किसी सफलता के प्रत्युत्तर में जन्मने वाली स्थिति नहीं. ख़ुशी खुद को तनावरहित बनाये रखने की अवस्था भी नहीं. ख़ुशी संतुष्टि की भावना नहीं. ख़ुशी शारीरिक अवस्था भी नहीं है. ख़ुशी को विशुद्ध मानसिक अवस्था भी नहीं कहा जा सकता है. हो सकता है कोई आर्थिक सशक्तता को प्राप्त कर लेता हो मगर उसे फिर भी ख़ुशी न मिलती हो. हो सकता है कोई आर्थिक स्तर पर बहुत ही कमजोर हो मगर वह खुश रहता हो. ख़ुशी एक स्थिति कही जा सकती है जो व्यक्ति को खुश रहने का अवसर उपलब्ध करवाती है. इस अवसर का स्वरूप कुछ भी हो सकता है, कैसा भी हो सकता है.

बहुत सारे मनोविज्ञानियों के अपने-अपने अनुभवों, प्रयोगों के आधार पर ख़ुशी के, खुश रहने के अलग-अलग मानक निकाले गए. कुछ के लिए नकारात्मक स्थितियों की समाप्ति ख़ुशी है तो कुछ के लिए अपनी सोचने की क्षमता ख़ुशी का आधार है. आधार या स्थिति कुछ भी हो मगर लगता है कि ख़ुशी का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता है. या ऐसा भी हो सकता है कि किसी भी व्यक्ति के लिए ख़ुशी प्राप्ति का साधन एक से अधिक हो और इसी कारण से ख़ुशी का जीवन लम्बा न हो पाता हो. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति को एक सफलता से अपार ख़ुशी मिलती है और अगले ही पल किसी दूसरी जगह से मिली असफलता उसे निराश कर देती है. जबकि इन दोनों सफलता, असफलता से उसे किसी मंजिल तक नहीं पहुँचना होता है. ऐसे में यदि ख़ुशी दीर्घजीवी है तो उसे असफलता से मिली निराशा पर हावी रहना चाहिए, मगर ऐसा नहीं होता है. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जबकि ख़ुशी पर नाखुशी ज्यादा प्रभावी रही है.


कई बार लगता है कि मानव स्वभाव इस तरह का है ही कि वह ख़ुशी को बहुत लम्बे समय तक अपने साथ रख नहीं पाता है. उसके ऊपर किसी न किसी दुःख को, कष्ट को, नाखुशी को बैठा देता है. उसके सामने एक पल में एकसाथ आने वाली ख़ुशी और ग़म में वह उस ग़म को ज़िन्दगी भर ढोता रहता है जबकि उसी समय साथ आई ख़ुशी को तत्काल भुला बैठता है. एक बहुत बड़ी ख़ुशी के अवसर पर भी वह छोटे से छोटे दुःख को अपने साथ घसीट कर लाने से नहीं चूकता है जबकि ऐसा उसके द्वारा दुःख के अवसर कर नहीं किया जाता है. देखा जाये यदि ख़ुशी परिस्थितिजन्य है तो दुःख भी इससे इतर नहीं है. यदि ख़ुशी को मानसिक अवस्था माना जाये तो दुःख भी उसी श्रेणी में शामिल होता है. यदि नकारात्मकता दूर करने के परिणामस्वरूप ख़ुशी का जन्म होता है तो फिर ध्यान रखना होगा कि सकारात्मकता समाप्त होने से ही दुःख का उदय हुआ है. ऐसे में उसी सकारात्मकता को पुनः क्यों नहीं प्राप्त किया जाता है? क्यों नहीं दुःख के मूल में छिपे नकारात्मक भाव को दूर करके ख़ुशी को गले लगाया जाता है?

यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति ख़ुशी को हर एक पल में अलग-अलग चाहता है. वह एक ही ख़ुशी को सभी पलों के साथ स्थापित करते हुए उसका अनुभव नहीं करना चाहता है. इसके उलट वह किसी भी एक कष्ट को सभी पलों पर स्थापित कर देता है. संभव है कि कोई कष्ट इतना बड़ा हो, कोई दुःख इतना गहरा हो कि उसका प्रभाव दीर्घकालिक हो मगर यह कहना कतई सुखद एहसास नहीं कराता कि वह दुःख सभी खुशियों पर सदा-सदा के लिए भारी हो जायेगा. यह कहना उपयुक्त भी नहीं कि एक ग़म, एक दुःख सभी खुशियों को मिटा देता है. भारतीय समाज में बहुधा देखने में आता है कि एक दुःख के साये में व्यक्ति पूरी जिंदगी बिता देता है. उसका रहन-सहन, उसकी जीवन-शैली, उसकी कार्यशैली, उसकी दिनचर्या आदि सबकुछ उसी एक दुःख के द्वारा संचालित होने लगती है. ऐसे में उसी नकारात्मकता को दूर करने की आवश्यकता है जिसके दूर होने से ख़ुशी मिली थी. उसी सकारात्मकता को बनाये रखने की जरूरत है जिसके न होने से दुःख दिखाई देने लगा है. 

सामाजिक विज्ञानी, मनोविज्ञानी और उनके प्रयोग क्या कहते हैं ये और बात है मगर ख़ुशी या दुःख पूरी तरह से व्यक्ति की अपनी मानसिक अवस्था है. उसे अपने वर्तमान के साथ जीवन जीने की कला सीखने की आवश्यकता है. जो व्यक्ति अपने वर्तमान में अतीत की परेशानियों को खींच ले आते हैं और उसी वर्तमान को बोझ बनाकर भविष्य तक ले जाना चाहते हैं वही ख़ुशी का आनंद नहीं ले पाते हैं. ख़ुशी को दीर्घजीवी भी बनाया जा सकता है बशर्ते उसका स्वरूप स्वतंत्र छोड़ना होगा. उसे किसी भी तरह के दुःख के साये में पलने को नहीं छोड़ना होगा. हमें हमारी ख़ुशी हमारी भावनाओं में खोजनी होगी. हमें हमारी ख़ुशी के लिए अपने जीवन की कठिनता को छोड़ना होगा. खुशियों को लम्बे समय तक साथ बनाये रखने के लिए व्यक्ति को दिखावे की संस्कृति से दूर होना पड़ेगा. यह भी ध्यान देना होगा कि जो बातें व्यक्ति के दिल-दिमाग को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं उनसे न केवल निपटना होगा बल्कि उन्हें हमेशा के लिए दूर करना होगा. व्यक्ति को उन्हीं कामों की तरफ खुद को एकाग्र करने की आवश्यकता है जो उसके दिल-दिमाग को पसंद आते हों. आवश्यक नहीं कि सिर्फ धनोपार्जन के लिए ही काम किया जाये. ऐसे काम करने के साथ-साथ अपनी ख़ुशी को लम्बा बनाने के लिए वे काम भी करने चाहिए जिन्हें शौक कहा जा सकता है, पसंद कहा जा सकता है, पैशन कहा जा सकता है. इस तरह के क्रियाकलापों से, व्यवहार से, प्रक्रिया से ख़ुशी प्राप्त की जा सकती है. किसी भी व्यक्ति को इसका आभास होना ही होना चाहिए कि ख़ुशी उसके भीतर ही है, बस उसे देखने-समझने की आवश्यकता है. लगातार सिर्फ और सिर्फ परेशानियों के बारे में सोचना, उनकी चर्चा करना, दुःख में बने रहना, खुद को निराश दिखाना व्यक्ति की शारीरिक सेहत और दिमाग़ी सेहत दोनों के लिए कष्टकारी है, नुकसानदायक है.