03 सितंबर 2026
बेटी के जन्म पर खुशियों भरा पल
28 जुलाई 2024
निशानेबाजी में पदक और हमारी ख़ुशी
कई बार कुछ
खुशियाँ ऐसी होती हैं जो व्यक्तिगत रूप से खुद अपने से सम्बन्धित नहीं होती हैं
मगर इसके बावजूद वे खुशियाँ अपने से जोड़ती हैं, प्रभावित करती हैं. इस तरह की खुशियों में एक तरह का अनदेखा
सा बंधन होता है जो किसी न किसी रूप में बंधा तो होता है मगर सामाजिक रूप में नजर
नहीं आता है. इस तरह के बंधन बहुत ही आंतरिक, अत्यंत ही
आत्मीय होते हैं. इनमें भले ही सामने वाले से कोई रिश्ता न हो, भले ही उससे कोई सम्बन्ध न हो मगर कुछ ऐसा होता है जो प्रभावित करता है
और उसकी खुशियों से खुद को जोड़ता है.
कुछ इसी तरह की
ख़ुशी आज मिली जबकि खबर मिली कि पेरिस ओलम्पिक 2024 में भारत को अपना पहला पदक
निशानेबाजी में मिला. यह पदक कांस्य के रूप में आया जिसे मनु भाकर ने दस मीटर एयर
पिस्टल स्पर्धा में प्राप्त किया. यहाँ विशेष बात ये है कि ओलम्पिक के इतिहास में निशानेबाजी
में किसी महिला द्वारा हासिल किया गया यह पहला पदक है.
इस जीत से ख़ुशी
मिलना स्वाभाविक ही है क्योंकि ओलम्पिक के दूसरे ही दिन देश के नाम पहला पदक आया.
हम लोग उस पीढ़ी से आते हैं, जिसने ओलम्पिक में अपने देश के खिलाड़ियों को बस खेलते ही देखा है. पदकों
का सूखा ख़त्म होने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा था. इस कारण से ख़ुशी मिलने के
अलावा इसलिए भी इस पदक से ख़ुशी मिली क्योंकि पाँच वर्ष पूर्व 2019 में हमने भी
निशानेबाजी में प्रदेश स्तर की प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त करते हुए राष्ट्रीय
स्पर्धा के लिए जगह बनाई थी. संयोग से यह स्पर्धा भी दस मीटर एयर राइफल की थी.
बहरहाल, कतिपय पारिवारिक कारणों से, कोरोना के कारण उसके बाद आगे आना नहीं हो सका किन्तु भारतीय निशानेबाजों
की छोटी से छोटी जीत भी हमें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती है, ख़ुशी देती है. मनु को बधाई, शुभकामनायें; साथ ही सभी भारतीय खिलाड़ियों को भी शुभकामनाएँ कि देश को रोज ही कई-कई
पदक प्रदान करवाते रहें.
09 सितंबर 2023
जिम्मेवारियों संग काम करने की स्वतंत्रता की ख़ुशी
देश इस समय
जी-20 की अध्यक्षता करते हुए दो दिवसीय शिखर सम्मलेन के आयोजन में व्यस्त है. विश्व
भर की महाशक्तियाँ, शक्तियाँ, उनके प्रमुख व्यक्तित्व इस समय देश में हैं. आयोजन
की तैयारियाँ, तमाम प्रबन्ध, साज-सज्जा, व्यवस्थाएँ आदि दिव्यता-भव्यता से भरपूर
नजर आ रही हैं. इस आयोजन से जुड़े जितने भी लोग दिखाई दे रहे हैं, चाहे वे बहुत बड़ी
जिम्मेवारी के साथ हो अथवा बहुत छोटे से काम का निर्वहन कर रहे हैं, सबके चेहरे पर
एक अलग सी ख़ुशी देखने को मिल रही है. जी-20 शिखर सम्मलेन की तैयारियों, व्यवस्थाओं
से जुड़े लोगों की ख़ुशी-मिश्रित सक्रियता को देखकर दिल-दिमाग बहुत पीछे चला गया या
कहें कि खो गया. वर्ष 2004 में और वर्ष 2008 में हुए दो सेमीनार इस अवसर पर बहुत
गहराई के साथ याद आये. वर्ष 2004 में आयोजन था नेशनल सेमीनार का, जिसे रक्षा
अध्ययन विभाग, डी.वी. कॉलेज, उरई द्वारा आयोजित किया गया था. दूसरा सेमीनार जो
वर्ष 2008 में आयोजित हुआ. यह पूरी तरह व्यक्तिगत संसाधनों पर आधारित था, जिसे
हमारे द्वारा कुछ साथियों के सहयोग से गठित पी-एच.डी. होल्डर्स एसोशिएशन द्वारा
आयोजित करवाया गया था. इन दोनों सेमीनार की चर्चा होगी मगर अभी वर्ष 2004 में
आयोजित हुए सेमीनार के बारे में.
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| एडमिरल राजा मेनन |
एक दिन हमारे
मोबाइल पर अभय अंकल का फोन आया, तुरंत विभाग में आकर मिलो. अभय अंकल माने डॉ. अभय
करन सक्सेना, जो रक्षा अध्ययन विभाग, डी.वी. कॉलेज, उरई के अध्यक्ष थे और हमें
अपने बेटे समान मानते थे. महीना कायदे से याद नहीं, जून का अंतिम सप्ताह था या
जुलाई का पहला, समझ नहीं आया कि ऐसा कौन सा काम आ गया जिसके लिए अभय अंकल ने हमें
फोन किया? बिना किसी सवाल-जवाब के (इतनी तो हिम्मत ही नहीं होती थी) जी अंकल, के
जवाब के बाद तुरंत विभाग में उपस्थित हुए. पहुँचते ही अंकल ने एक पत्र हमारे सामने
रखते हुए कहा कि तुमको बधाई हो, विभाग को एक सेमीनार मिला है यूजीसी की तरफ से,
इसमें तुम क्या सहयोग कर सकते हो? अंकल आप आदेश करें, जिस भी काम का, हो जायेगा.
हमारे इतना कहते ही अंकल ने कहा कि सारा काम वैसे भी तुमको देखना है मगर
प्राथमिकता में तुमको स्मारिका का सम्पादन करना है. एडिटर रहेंगे निगम साहब मगर
पूरा काम तुमको ही करना है.
हमारी असहमति का
सवाल ही नहीं उठता था. इसके बाद एक आदेश पारित हुआ अभय अंकल, निगम साहब, शर्मा जी
और हमारे मित्र डी.के. सिंह की तरफ से कि हमें रोज विभाग में आना होगा. उस समय
निपट सरकारी रोजगार से रहित व्यक्ति थे, सो रोज हाजिरी लगाना भी संभव था. खैर,
बाकी बातें फिर कभी क्योंकि अभी करना शुरू की तो ये पोस्ट कई-कई खण्डों में लगानी
पड़ेगी. और बातें करने के पहले बस इतना बताते चलें कि स्मारिका के अंतिम रूप तक आने
तक किसी के द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया. हमारे काम की स्वतंत्रता की
स्थिति ये थी कि हमने अभय अंकल के वैचारिक तक पर अपनी एडिटिंग कर दी थी. हमें साठ
पेज की स्मारिका तैयार करने के लिए कहा गया था. उसका अंतिम प्रिंट निकालने के पहले
एक कॉपी अभय अंकल को, निगम अंकल, शर्मा अंकल को दिखाई. उनका आशीर्वाद मिला और
स्मारिका अपने मूल रूप में आ गई. (इस पर भी लिखेंगे किसी दिन. स्मारिका की कई-कई
कहानी हैं और मजेदार भी. यहाँ सीखा कि स्वतंत्रता मिलने के बाद भी कैसे अनुशासन
में रहकर काम किया जा सकता है, लिया जा सकता है.)
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| बांये से - कैप्टन एस.के. जौहरी, डॉ. आर. एच. स्वरूप, लेफ्टिनेट जर्नल तेज पॉल |
होते-करते
आखिरकार सेमीनार का दिन आ ही गया. 29-31 अक्टूबर 2004 में होने वाले इस सेमीनार की
सारी तैयारियाँ, व्यवस्थाएँ बहुत से लोगों के द्वारा संपन्न होनी थीं मगर उनका
निर्देशन कुछ हाथों में ही था. ये हमारा सौभाग्य था कि बहुत सी गम्भीर
जिम्मेवारियाँ, व्यवस्थाएँ हमारे सिर पर थीं. भारतीय सेना से जुड़े वे सम्मानित
व्यक्ति जो सेवानिवृत्त हो चुके थे या फिर उस समय सेवा में थे, उनके आवागमन का,
रुकने का, खाने-पीने का, सेमीनार स्थल तक आने-जाने का जिम्मा हमारे कन्धों पर था.
काम की गंभीरता अन्दर ही अन्दर डराती भी थी मगर अभय अंकल का विश्वास इस कदर था कि
सारा डर गायब हो जाता. कुछ लोगों को लाने की जिम्मेवारी हमने स्वयं ली. अभय अंकल
की कार बराबर हमारे पास रहती थी, सो आवागमन के काम में भी कोई अड़चन नहीं आई.
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| हमने भी पढ़ा अपना रिसर्च पेपर |
तीन दिवसीय उस
सेमीनार की तमाम व्यवस्थाओं को पूरा करने में, अतिथियों की समस्याओं का समाधान
करने में, भारतीय सेना के अधिकारियों संग कुछ समय बिता लेने में, अन्य प्रतिभाग
करने वाले महानुभावों, शोधार्थियों के लिए अनुकूलन की स्थिति निर्मित करने में
किसी भी तरह से परेशानी का अनुभव नहीं हो रहा था. छोटी से छोटी बात हो या कोई बड़ी
बात सबमें अभय अंकल और बाकी लोगों द्वारा हमारी राय ली जाना हमें खुद में विशिष्ट
बना रहा था. उस समय तो अपने आपमें गर्व महसूस हो रहा था, चेहरे पर ख़ुशी झलक जाती
थी, आज उस समय को, उस आयोजन को याद कर रहे तो चेहरे पर अनायास ही मुस्कान उभर आई.
समझ सकते हैं कि जो लोग जी-20 के महान, गर्वित करने वाले आयोजन में सहभागी हैं,
साझीदार हैं, जिम्मेवार हैं वे किस कदर ख़ुशी का, गर्व का अनुभव कर रहे होंगे.
+
(इस पोस्ट को
लिखते समय उस सेमीनार के चार विशेष स्तंभों अभय अंकल, राजेंद्र कुमार निगम अंकल, अरविन्द
कुमार शर्मा अंकल और दुर्गेश कुमार सिंह जी में से अभय अंकल और निगम अंकल अब हमारे
बीच नहीं हैं. उनको इस पोस्ट के द्वारा पुनः स्मरण करते हुए सादर नमन.)
22 अक्टूबर 2022
दीपमालिके के स्वागत में एक दीप प्रज्ज्वलित करें
असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतम् गमय यह वाक्य एक तरफ सत्य की तरफ जाने का सन्देश देता है
वहीं साथ में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है. चारों ओर दीपों की
कतार, मोमबत्तियों-झालरों
का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी
आतिशबाजी, विविध
आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे, सभी अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चों का, युवाओं का, बुजुर्गों का, पुरुषों-महिलाओं का हर्षोल्लासित होना स्वाभाविक सा
दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते
हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का
वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत
चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी
सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.
भारतीय परम्परा
में, संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहां
जितनी अनुपम वैविध्यपूर्ण प्रकृति में मनमोहक ऋतुएं हैं, ठीक उसी तरह से विविधता धारण किये
पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह रही है कि इन्हें धार्मिकता से
जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों
के मध्य से सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक संदर्भों की, समरसता की, सौहार्द्र
की, भाईचारे की भी
प्रतिस्थापना करते दिखाई देते हैं. होना भी यही चाहिए किसी भी पर्व का, किसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं
को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. हमारा उद्देश्य सदैव यही हो कि
हमारे कदमों से सामाजिकता का विकास हो ही, सामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली
के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को
आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का
संदेश देता नहीं दिखता है.
इधर सामाजिक
स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब
बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम
अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के
साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने
पर्वों-त्यौहारों की सहजता, सरलता को विखण्डित सा कर दिया है. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे
पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. गरिमामयी
रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है.
त्यौहार अब नितांत
औपचारिकताओं में सिमटाए जाने लगे हैं. संबंधों में, रिश्तों में पहले की तरह गर्माहट नहीं दिखाई देती है, बाज़ारों में अपनत्व कम कटुता ज्यादा देखने
को मिलने लगी है. विदेशी
सामानों के बीच आज भी कई-कई छोटे बच्चे-बच्चियाँ साँचे में ढले गणेश-लक्ष्मी, मिट्टी के दिए, रुई, मोमबत्तियाँ आदि बेचते दिखते हैं. मशीनों से निर्मित चमकते-दमकते गणेश-लक्ष्मी
की भव्य मूर्तियों के आगे स्टाइलिश दीयों के आगे, डिजाइनर मोमबत्तियों के सामने, अजब-गजब रूप से चमक बिखेरती झालरों के सामने
इनका अंधकार ज्यों का त्यों रहता है. हर एक पटाखे के फूटने के साथ, हर एक दिया रौशनी बिखेरने के साथ, हर बार और अकेले त्यौहार मनाने के साथ एहसास
होता है कि मंहगाई सामानों में ही नहीं आई है संबंधों में, रिश्तों में भी आई है. अंधकार सिर्फ अमावस
की रात को ही घना नहीं हुआ है बल्कि अपनत्व में, स्नेह में भी घनीभूत होकर छा गया है. काले आसमान में
रौशनी बिखेरती आतिशबाजी, घर की छत पर चमक बिखेर कर शांत हो जाते दिए, मकान की दीवारों से लिपटी विदेशी झालरें अपनी
क्षणभंगुर चमक से एक पल को तो अंधकार दूर कर देती हैं किन्तु समाज में लगातार बढ़ते
जाते अंधकार को दूर नहीं कर पा रही हैं.
नैराश्य के ऐसे
वातावरण के बाद भी; कृत्रिम
चकाचौंध के बीच भी; दीपावली
का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह
से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी
दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम हो चुकी भारतीयता में भी
प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए
हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मंहगी से मंहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय
एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी
रोशनियां देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को
सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने
पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने
उत्साह को, अपनी उमंग को
व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से
शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें
अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत
होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को
ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आंगन तक नहीं अपितु
समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना
कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की
शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने
में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके
का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.
04 मई 2022
पारिवारिक एकजुटता की खुशियाँ
परिवार में कोई
आयोजन हो और यदि सभी परिजन शामिल हों तो उस आयोजन में और भी अधिक मजा आता है. ऐसी
सुखद अनुभूति का अवसर आया गृह प्रवेश के दौरान जबकि सभी लोग वहाँ उपस्थित हुए. ये
पारिवारिक एकजुटता का प्रतीक ही कहा जायेगा कि सुख-दुःख में सभी सदस्य एकसाथ दिखाई
देते हैं. आज जब समाज में तमाम सारी विसंगतियों को देखते हैं वैसे समय में अपनी
पारिवारिक एकजुटता पर गर्व होता है. मन कामना करता है कि इसे कभी किसी की नजर न
लगे.
वर्तमान दौर इस
तरह का बनता जा रहा है जबकि व्यक्ति आपस में तालमेल बनाकर नहीं रहना चाहता है.
परिवार के चार सदस्यों के बीच जरा-जरा सी बात पर मनमुटाव हो जाता है, उनके बीच वैमनष्यता आ जाती है. आवश्यकता होती है
आपस में समन्वय बनाने की, एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करने की, उनको आदर देने की. हम में से बहुत से लोग ऐसा
करने में चूक जाते हैं. हम में से बहुतायत लोग चाहते हैं कि उनको सम्मान मिले, उनकी बातों को अहमियत दी जाये मगर जब दूसरों के
लिए ऐसा करने की बारी आती है तो वही लोग पीछे हट जाते हैं. यही वह स्थिति होती है
जबकि मनमुटाव आने लगता है.
बहरहाल, समाज की अपनी गति, अपनी दिशा है. यहाँ सबकुछ नियंत्रित होते हुए भी लगता है कि अनियंत्रित
है. सबके साथ माहौल एक जैसा नहीं रहता. एक जैसा माहौल सभी को नहीं मिलता.
पारिवारिक एकजुटता के इस हँसी-ख़ुशी के अवसर पर छोटे भाई मिंटू की कमी भी महसूस
हुई. आँखों में ख़ुशी की झलक के साथ इस दर्द की नमी भी बराबर तैरती रही. ज़िन्दगी का
शायद यही ढंग है और इसे स्वीकारना ही पड़ता है, चाहे वो अनमने रूप में ही क्यों न हो.
26 दिसंबर 2020
समय का स्वागत कर उसे सुखद बनाने का प्रयास हो
बाजार में रोज की तरह सैर-सपाटा करने के दौरान आज एक परिचित से मुलाकात हुई. इधर-उधर की बातों, हालचाल के बाद उनके सामने एक सवाल उछाल दिया. वैसे जो सवाल हमने उनकी तरफ उछाला वो सवाल वैसे प्रतिवर्ष उनकी तरफ से उछाला जाता था. जी हाँ, यह सच है. चूँकि बाजार में उनसे लगभग रोज ही मुलाकात हो जाया करती है. इसी में दिसम्बर माह के अंतिम दिनों में उनकी तरफ से एक सवाल हर बार सामने आता है कि नए साल के लिए क्या संकल्प लिया है? नए वर्ष में क्या नया करने का विचार है? आज बहुत देर तक बातचीत करने के बाद भी उनकी तरफ से ऐसा कोई सवाल नहीं आया तो जरा आश्चर्य हुआ. आश्चर्य इस कारण हुआ कि दिसम्बर समाप्ति में अब चार-पाँच दिन शेष रह गए हैं फिर भी उनकी तरफ से शून्यता क्यों?
उनकी तरफ से किसी तरह की पहल न होते देख हमने ही इस बार उनकी जिम्मेवारी का निर्वहन करने का मन बनाया. उनकी तरफ सवाल उछाला कि आने वाले साल के लिए क्या संकल्प कर रहे हो? जवाब में बहुत बुरा सा मुँह बनाते हुए, लगभग नजरंदाज करने जैसा अंदाज दिखाते हुए बोले कुछ नहीं. अब संकल्प-बंकल्प लेना बंद. हमारा प्रश्नवाचक स्वरूप देख कर वे आगे बोले कि इस साल भी कुछ सोचा था, कुछ संकल्प लिए थे मगर इस साल की तो पूरी तरह से रगड़ लग गई. सारे के सारे संकल्प धराशाही हो गए. इसलिए अब आगे से कोई संकल्प नहीं. समय का कोई भरोसा नहीं कि कब क्या हो जाये. हमें समझ आ गया कि कोरोना के चलते वे इस वर्ष को कोसने में लगे हैं और उसी के चलते आने वाले वर्षों के लिए किसी तरह के संकल्प की नीति पर नहीं चल रहे.
हमने हँसते हुए उनको दिलासा दिलाई कि एक साल ऐसा निकल गया, इसका ये मतलब तो नहीं है कि आने वाले सभी वर्ष ऐसे ही निकलेंगे. हो सकता है कि आने वाला साल या फिर उसके बाद के आने वाले साल बहुत बेहतरीन निकलें. संभव है कि जो-जो सोचा जाये, जो भी संकल्प लिया जाये वो सब आने वाले वर्षों में पूरे हो जाएँ. उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव न दिखने पर उनके सामने फिर सवाल उछाला कि अच्छा चलो, यह साल ख़राब निकल गया. पिछले सालों में तुमने अपने कितने संकल्प पूरे कर लिए? पिछले वर्षों में तुम्हारे सोचे हुए कितने काम पूरे हुए? वे साल तो इस साल जैसे बुरे नहीं थे. उनमें तो इस वर्ष जैसी कोई बीमारी नहीं फैली थी. उनकी तरफ से कोई जवाब न आता देख समझाया कि समय के हाथों में बहुत कुछ है जो हमारे हाथ में नहीं मगर हमारे हाथ में इसके बाद भी इतना कुछ है जो समय को बदल सकता है. संकल्प लेना न लेना तुम्हारा अपना निजी मसला हो सकता है मगर किसी एक वर्ष के बुरे निकल जाने के कारण से आने वाले समूचे समय को बुरा समझने लगना नितांत नकारात्मक सोच है. इस नकारात्मकता से बाहर निकलने की जरूरत है.
उनके चेहरे की मुस्कराहट से लगा कि बात सही जगह पहुँच सकी है. ये हम सभी को ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जो समय निकल गया जरूरी नहीं कि आने वाला समय भी वैसा ही निकले. निश्चित ही यह साल बहुत ही ख़राब रहा मगर इसके बाद भी इसमें बहुत कुछ अच्छी खबरें सुनने को मिलीं. देखा जाये तो प्रत्येक वर्ष अच्छे और बुरे का संयोग लेकर आता है. हम अपने ऊपर घटित होने वाली घटनाओं के अनुसार उस वर्ष का आकलन करने लगते हैं. वास्तविक रूप में तो हमें समय का स्वागत करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि हम सभी अपने कदमों से, अपने कार्यों से, अपने प्रयासों से उस समय को सुखद, खुशनुमा, बेहतर बना सकें.
19 जुलाई 2020
यादों का हटाया जाना सहज होता तो....
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