10 April 2019

अभावग्रस्त बचपन की खिलंदड़ मस्ती

अपने कॉलेज आने-जाने के क्रम में, नियमित शहर टहलने के क्रम में अक्सर ऐसे बच्चों से मिलना हो जाता है. बहुत से लोग ऐसे बच्चों को देखकर उनसे बचते हुए निकल जाते हैं. बहुत से लोग हैं जो इनको डाँटते-फटकारते हुए भी आगे बढ़ते हैं. समझ नहीं आया कि आखिर इन बच्चों को डाँटने-फटकारने का कारण क्या रहता है? देखने में आता है कि ये बच्चे किसी से कुछ मांगते नहीं हैं, न किसी से भीख माँगें, न किसी से खाने-पीने की गुहार लगायें. इस तरह के कई बच्चे हैं जो उरई की सड़कों पर, गलियों में आम लड़कों की तरह टहलते दिख जाते हैं. ये बच्चे तीन-तीन, चार-चार की संख्या में एकसाथ रहते हैं और सड़कों से, गलियों से, कूड़े के ढेर से कूड़ा बीनने का काम करते हैं. इनसे कई बार बातचीत करके इनकी पारिवारिक स्थिति के बारे में जानकारी ली. इनके माता-पिता इनके द्वारा जमा किये गए पैसों को जुआ खेलने, शराब पीने में उड़ा दिया करते हैं. लगभग सभी परिवारों की एक जैसी स्थिति है. दो-चार बार इन बच्चों को पढ़ाई, शिक्षा आदि के बारे में समझाया, बताया मगर इनका मन उस तरफ जाता दिखाई न दिया. 


बहरहाल, बात ये नहीं कि ये पढ़ना चाहते हैं कि नहीं, यह भी नहीं कि प्रशासन इनकी तरफ ध्यान दे रहा है या नहीं बल्कि यह बताना है कि नितांत गरीबी के दौर में जी रहे ये बच्चे अपने इसी काम को करते समय पूर्णतः निर्दोष मस्ती के साथ मगन रहते हैं. इनकी आपसी मस्ती, आपसी नोंक-झोंक, आपस का हुल्लड़ देखकर लगता नहीं कि ये अपना पेट भरने की जद्दोजहद में इस काम को कर रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे अपने उसी काम को अपनी नियति समझने के बाद भी उसका आनंद ले रहे हैं, उसी में से आनंद निकाल रहे हैं. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जबकि कोई व्यक्ति अपने काम में पूरी तरह से आनंद की प्राप्ति करे. ऐसा न के बराबर देखने को मिलता है जबकि एक जैसा काम करने वालों के बीच हँसी-मजाक का निष्कलंक माहौल बना रहे. 

इन बच्चों को जब इस स्थिति में देखते हैं तो एकबारगी मन विचलित हो उठता है मगर ये देखकर सीखने की प्रेरणा मिलती है कि अपने काम को कैसे हँसते-खेलते किया जा सकता है.

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