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15 जनवरी 2026

जिन्दगी जिन्दाबाद: पीड़ा के विरुद्ध जिन्दगी की घोषणा - डॉ. लखन लाल पाल

जिन्दगी जिन्दाबाद’ डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की आत्मकथा है। आत्मकथा का यह दूसरा भाग उनके जीवन की एक ऐसी दुर्घटना पर केंद्रित है, जिसे पढ़ते हुए पाठक के भीतर लगातार एक टीस उठती रहती है। कई जगह पढ़ते-पढ़ते रुकना पड़ता है। यह रचना केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि उसके दर्द को जीवंत रूप में महसूस किया जाता है। घटना अत्यंत पीड़ादायक और मर्मस्पर्शी है, किंतु लेखक जिस सहजता से उसे अभिव्यक्त करता है, वह काबिले-तारीफ है। भाषा का प्रवाह इतना स्वाभाविक है कि पाठक बिना किसी अटकन या भटकन के उसके साथ बहता चला जाता है।

 

यह आत्मकथा पीड़ादायक होते हुए भी कहीं भी सहानुभूति अर्जित करने का प्रयास नहीं करती। लेखक बस कहता चला जाता है—अपने अपनों के साथ, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ। पीड़ा को पीते हुए, उसी पीड़ा के बीच वह अपने लिए हँसी-ठिठोली का एक छोटा-सा अंतराल निकाल लेता है। इस मर्माहत पीड़ा को वह अकेले ही सहने का प्रयास करता है, ताकि परिवारजन उसके दर्द को जान न सकें।

 



22 अप्रैल 2005 की शाम लेखक का ट्रेन से भीषण एक्सीडेंट हो जाता है। एक पैर जाँघ से कटकर दूर जा गिरता है, दूसरा पैर टखने से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है। कितना खून बहा होगा और वह दृश्य कितना भयावह रहा होगा—कल्पना मात्र से रूह काँप जाती है। लेखक की जीवटता का प्रमाण यह है कि इतनी भयावह स्थिति में भी वह स्वयं को बेहोश नहीं होने देता और पूरी चेतना के साथ अपने को सँभाले रखता है।     

 

हम प्रायः ऐसी घटनाएँ फिल्मों या टीवी धारावाहिकों में देखते हैं। वे क्षणिक रूप से हमें द्रवित कर देती हैं, किंतु ठीक होने की प्रक्रिया को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वास्तविक जीवन में यह प्रक्रिया हर क्षण करुण क्रंदन में बीतती है। हर पल दर्द के दरिया में डूबे रहना पड़ता है। यही दर्द का दरिया इस पूरी आत्मकथा में प्रवाहित होता रहता है।

 

इसी समय पिता का निधन, माँ की स्थिति, एक वर्ष पहले ब्याह कर आई नवयुवती पत्नी निशा और दोनों भाइयों की मानसिक अवस्था—इन सबको लेखक ने जिस संवेदनशीलता से जिया है, उसे पढ़ते हुए पाठक उन परिस्थितियों की गहराई को समझ पाता है। पर यह दर्द का दरिया उस क्षण हार मानने लगता है, जब लेखक साहस और धैर्य को अपनी नौका बना लेता है। उस नौका से वह अकेला नहीं, बल्कि पूरा परिवार, मित्र और रिश्तेदार धीरे-धीरे पार लगने लगते हैं।

 

ऑपरेशन का दृश्य, पैरों से लगातार बहता खून और तीन-चार महीनों तक चलने वाली मरहम-पट्टी—हर बार की पट्टी असहनीय पीड़ा से दिल-दिमाग को झकझोर देती है। इसके बावजूद लेखक के चेहरे पर बनी रहने वाली मीठी मुस्कान और बीच-बीच में फूट पड़ने वाले ठहाके यह एहसास ही नहीं होने देते कि वह अपने शरीर का एक आवश्यक अंग हमेशा के लिए खो चुका है और अब कृत्रिम पैर के सहारे जीवन जीना है।

 

मैं डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी से सन् 2006 से जुड़ा हूँ। दुर्घटना के बाद उन्होंने ‘स्पंदन’ पत्रिका का संपादन शुरू किया था, जिसमें मेरी एक बुंदेली कहानी प्रकाशित हुई। तभी से हम साहित्यिक मित्र बने। इन उन्नीस-बीस वर्षों में कभी यह अनुभव नहीं हुआ कि यह व्यक्ति इतनी गहरी पीड़ा से गुज़रा है—और आज भी गुज़र रहा है। यह रचना पढ़कर अब उस जीवटता का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। क्या इंसान है भाई!

 

इस आत्मकथा का एक अत्यंत प्रभावशाली जीवित पात्र डॉक्टर रवि है—लेखक का बचपन का मित्र और आर्थोपेडिक सर्जन। लेखक ने पूरे विश्वास के साथ स्वयं को उसके हवाले कर दिया था—यह सोचकर कि अब यह मुझे मरने नहीं देगा।

 

पढ़ते समय मेरा ध्यान बार-बार डॉक्टर रवि पर ठहर जाता है। उस समय उसकी मानसिक स्थिति क्या रही होगी? लेखक ने तो स्वयं को उसे सौंप दिया था, पर उसके लिए हर क्षण अनदेखी अनहोनी से जूझना था। एक डॉक्टर के लिए सभी मरीज समान होते हैं, किंतु यहाँ तो लंगोटिया यार का रिश्ता था। एक छोटी-सी चूक भी जीवन भर का बोझ बन सकती थी। ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले परिवार के हस्ताक्षर लेने का दृश्य अत्यंत हृदयविदारक है। यहाँ पेशेगत नियम और व्यक्तिगत संबंधों का द्वंद्व गहराई से उभरता है। इस रचना को पढ़ते हुए डॉक्टर रवि का पात्र लंबे समय तक मन से ओझल नहीं हो पाता।

 

आत्मकथा की भाषा-शैली, उसका प्रवाह और स्वयं तथा दूसरों की मानसिकता को अभिव्यक्त करने का कौशल इसे विशिष्ट बनाता है। यही कारण है कि यह रचना पाठक को एक ही बैठक में पढ़ने को विवश कर देती है।   

 

इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद मैं बस इतना ही कह सकता हूँ—

डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, वाकई ‘जिन्दगी जिन्दाबाद’।

-- डॉ. लखन लाल पाल की प्रतिक्रिया 

07 जनवरी 2026

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का प्रकाशन

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का प्रकाशन हो गया है...

हमारे बारे में, हमारे एक्सीडेंट के बारे में, उसके बाद की स्थिति के बारे में बहुत से लोग सवाल करते हैं, प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हैं. ऐसे अनगिनत सवालों का एक ही जवाब.... 'ज़िन्दगी जिन्दाबाद'

इसे चाहने वालों के लिए श्वेतवर्णा की वेबसाइट चौबीस घंटे खुली हुई है..... यहाँ क्लिक करें





20 दिसंबर 2025

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष जल्द ही आपके साथ होगा

वर्ष 2025 भी जाने की तैयारी कर रहा है. जितने दिन इस अंतिम महीने में निकल गए हैं, अब उतने दिन भी शेष नहीं बचे हैं. समय की गति के अनुसार आना और जाना लगा ही रहना है. कल को इसी वर्ष का स्वागत किया था, अब इसी को विदा करने का समय आ गया है. कुछ ऐसा ही आने वाले वर्ष 2026 के साथ भी होगा. इन आते-जाते वर्षों के स्वागत और विदाई के बीच याद बस यही रह जाता है कि उस एक वर्ष में हम सबने क्या किया? क्या पाया, क्या खोया? क्या सुखद रहा, क्या दुखद रहा?


आप सभी सुधिजनों को याद होगा कि वर्ष 2019 में आत्मकथा ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी आपके बीच हमारी बातों को लेकर उपस्थित हुई थी. उसी समय हमारे शुभेच्छुजनों ने प्रेरित किया था कि वर्ष 2005 में हुई दुर्घटना के बाद की अपनी जीवन-यात्रा को भी एकसूत्र में पिरोकर प्रकाशित करवाया जाये. विचार तो था कि वर्ष 2020 में इसे भी ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में प्रकाशित करवाया जायेगा. अक्सर ऐसा होता है कि सोचा कुछ जाता है और हो कुछ जाता है, हमारे साथ भी यही हुआ. ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष करने बैठे तो हाथों ने काँपना शुरू कर दिया, आँखों ने नम होना शुरू कर दिया, दर्द ने अपना अलग रूप दिखाना शुरू कर दिया. इन सबके बीच कुछ दुखद घटनाओं ने हिला दिया और ज़िन्दगी जिन्दाबाद को बीच में रोक देना पड़ा. यद्यपि समय के दिए गए आघातों से उबरते हुए ज़िन्दगी जिन्दाबाद को ब्लॉग पर कहानी के रूप में लिखते रहे.

 



इसी लेखन को एडिट करके, पुस्तक के रूप में संयोजित करके इस जाते हुए वर्ष 2025 में आप सबके बीच लाने का मन बना लिया है. जल्दी ही ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को आप सब अपने बीच पाएँगे. ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी की तरह आप सबका स्नेह ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को भी मिलेगा, ऐसा विश्वास है.


03 नवंबर 2020

संघर्ष से मिलती ख़ुशी का नाम ज़िन्दगी

ऐसा कहा जाता है कि हमारे कार्यों के अनुसार ही हमें फल प्राप्त होता है. ऐसा भी कहा जाता है कि इस जन्म में व्यक्ति के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसमें बहुत कुछ पूर्व जन्म में किये गए कार्यों का प्रतिफल होता है. ऐसी बातों पर कभी विश्वास नहीं किया और न ही महत्त्व दिया. हमारा मानना है कि व्यक्ति को पूरी ईमानदारी के साथ कार्य करते रहना चाहिए. समाज के प्रति, परिवार के प्रति जो दायित्व हैं उनका निर्वहन करते रहना चाहिए. इस जन्म के कार्यों का प्रतिफल इसी जन्म में मिल जाता है और उसी को हम लोग सफलता या असफलता से जोड़कर देख सकते हैं. किसी जन्म में किये गए कार्यों का परिणाम भुगतने के लिए फिर जन्म लेना पड़े या कई जन्मों तक जीवन-मरण जैसी स्थिति से गुजरना पड़े तो फिर कार्यों का हिसाब समझ से परे है.


बहरहाल, आज किसी तरह की दार्शनिक स्थिति को सामने लाने का मन नहीं है और न ही विचार है. आए दिन हमारी दुर्घटना को लेकर जो बातें सामने आती रहतीं हैं उनके कारण उक्त विचार इसलिए मन में आते रहते हैं. इतनी बड़ी दुर्घटना, जबकि हम ट्रेन के नीचे ही चले गए थे, पटरियों पर गिर पड़े थे, ट्रेन ऊपर से गुजर रही थी, एक पैर स्टेशन पर ही कट कर अलग हो गया था, लगभग तीन घंटे के अन्तराल के बाद मेडिकल सुविधा मिल पाने के बाद, बहुत सारा खून बह जाने के बाद भी आज हम आप सभी के बीच हैं तो लगभग हर मिलने वाला कहता है कि ये पूर्वजन्म में, इस जन्म में किये गए अच्छे कार्यों का सुफल है. बहुत से लोगों का कहना है कि यह बड़ों के आशीर्वाद का प्रतिफल है, किसी का कहना होता है कि बेटी के भाग्य से, पत्नी के भाग्य से हमें फिर से जीवन मिला है.


ऐसी बहुत सी बातों को सुनने के बाद समझ नहीं आता है कि इस दुर्घटना के बाद अपने बच जाने को अपने अच्छे कार्यों का सुफल कहा जाए या फिर इसी दुर्घटना में एक पैर के कट जाने और दूसरे पैर के बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने को अपने बुरे कार्यों का प्रतिफल कहा जाए? बहुत कोशिश के बाद भी दिमाग से दुर्घटना जाती नहीं और जा भी नहीं सकती क्योंकि चौबीस घंटे ही, सोते-जागते अपनी शारीरिक स्थिति को देखते हैं. दुर्घटना के पहले के पल याद आते हैं, अब दुर्घटना के बाद की कष्टप्रद स्थिति दिखाई देती है. न भुला सकने वाली स्थिति के बाद भी खुद को इस मकड़जाल में फँसने नहीं देते हैं. कोशिश यही रहती है कि इस शारीरिक स्थिति को दरकिनार करते हुए अपने कार्यों को नियमित रूप से संचालित करते रहें.




एक पल को यदि मान लिया जाये कि अच्छे कार्यों के प्रतिफल में नया जीवन मिल गया है. लोगों के भाग्य और आशीर्वाद से ज़िन्दगी फिर हमारे साथ है मगर इसी के साथ लगता है कि इन अच्छे कार्यों के सापेक्ष बुरे काम भी बहुत सारे रहे होंगे? ऐसा विचार इसलिए भी आता है क्योंकि सुखद प्रतिफल में जीवन मिला तो दुखद प्रतिफल में बहुत सारा कष्ट मिला वो भी ज़िन्दगी भर के लिए. लगता कि यदि शारीरिक कष्ट के द्वारा ही प्रतिफल मिलना था तो इतना बुरा क्यों? पैर कटना ही नियति थी तो फिर वह घुटने के नीचे क्यों नहीं कटा? यदि घुटने के ऊपर कटना कार्यों का प्रतिफल है तो फिर दूसरे पैर को क्षतिग्रस्त क्यों? यदि ऐसा होना भी कार्यों का प्रतिफल है तो फिर उसमें बराबर दर्द का बने रहना क्यों? यदि यह भी बुरे कामों का परिणाम है तो फिर ये जीवन क्यों?


यही सवाल हैं जो हमें खुद में लड़ने की प्रेरणा देते हैं, खुद से लड़ने की शक्ति देते हैं. ऐसे ही बहुत सारे सवालों ने हमें बचपन से ही भाग्य, जन्मों के चक्र आदि पर विश्वास न करने की ताकत दी है. हो सकता है कि ऐसा कुछ होता हो मगर उसके ऊपर भी कर्म अधिक महत्त्वपूर्ण है. हमारा अपना मानना है कि ज़िन्दगी मिली है तो उसके साथ मिली अनिश्चितता के कारण अपेक्षित-अनपेक्षित परिणाम भी साथ में मिलेंगे. देखा जाये तो ज़िन्दगी किसी आयु का नाम नहीं बल्कि हर एक पल को जीने का अंदाज़ ही ज़िन्दगी है. यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह वर्तमान पल को गुजारते हैं, जाने वाले पल को किस तरह याद रखते हैं और आने वाले पल का किस तरह से स्वागत करते हैं.


ज़िन्दगी संघर्ष का नाम है तो उस संघर्ष के पलों से निकली ख़ुशी को, सफलता को स्वीकारने का, उसका आनंद लेने का नाम है. ज़िन्दगी यदि कष्टों को लेकर आती है तो अपने साथ खुशियों का खजाना भी छिपाए रहती है. जिस तरह प्रकृति में दिन और रात का समन्वय, संतुलन स्थापित है ठीक उसी तरह ज़िन्दगी में भी सुखों का, दुखों का क्रम है, उनका संतुलन है, समन्वय है. जो इस साम्य के साथ अपना संतुलन बिठा ले जाता है, उसके लिए ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद ही होती है.


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09 अप्रैल 2020

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का ऑनलाइन प्रकाशन ब्लॉग पर

उस दिन हमारी ज़िन्दगी का वो यू-टर्न तो नहीं था; हाँ एक अवरोध जैसा अवश्य था; एक डायवर्जन जैसा अवश्य था. उस एक पल ने जीवन के बहुत से रंग दिखा दिए. हर पल में सैकड़ों कहानियाँ सुनाने वाली ज़िन्दगी ने उस एक पल में सैकड़ों कहानियाँ दिखा दीं. अनिश्चितता भरी ज़िन्दगी में अनिश्चितता ही अनिश्चितता भर दी. एक पल में ज़िन्दगी ने अनेक रंग भले ही दिखाए हों पर उस समय हमारे पल में सिर्फ लाल रंग भरा था जो काले रंग के आवरण में हमें ढाँकने को लगातार फैलता जा रहा था. कहानियों भरे पल के साए में वो पल किसी कहानी का हिस्सा नहीं बल्कि खुद कहानी जैसा हो गया था.


कहानी ढलते दिन में खुद को समेटने की. कहानी उखड़ती साँसों को एकत्र कर एक और साँस भरने की. कहानी असहनीय दर्द के बीच हँसने-मुस्कुराने की. कहानी काँपते हाथों को कांपती हथेलियों के बीच थामकर सांत्वना देने की. कहानी पल-पल अपनी तरफ बढ़ती मौत को हर पल दूर भगाने की. कहानी गिर कर फिर सँभलने की. कहानी लड़खड़ाते क़दमों को मंजिल तक पहुँचाने की. कहानी खुद को एक बार फिर साबित कर पाने की. कहानी अनेक आँखों में उभरे सवालों का जवाब बन जाने की. कहानी ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाने की. कहानी अनिश्चय की धुंध के बीच ज़िन्दादिली की रौशनी भरने की. कहानी ज़िन्दगी को ज़िन्दाबाद कहे जाने की. कहानी न होकर भी खुद एक कहानी बन जाने की.



अंततः उस वास्तविकता को, उस विभीषिका को, उस दुर्घटना को स्वीकारते हुए जीवन-यात्रा नए सिरे से फिर आरम्भ कर दी गई. नए सिरे से इसलिए क्योंकि उस एक पल ने बहुत पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया था. बैठना, खड़े होना, चलना, काम करना, लिखना आदि-आदि नए सिरे से सीखा जाने लगा. इस अभ्यास में कई-कई बार बिखरना होता फिर अगले पल आत्मविश्वास, आत्मबल के मिले-जुले मिश्रण के साथ खुद को जोड़ने का काम भी आरम्भ होता. उस दिन से शुरू हुआ बिखरना-सहेजना, टूटना-जुड़ना, रोना-हँसना, गिरना-उठना, बिगड़ना-बनना, हारना-जीतना आज भी बना हुआ है.

ये सब ज़िन्दगी के रंग हैं. ये सब ज़िन्दगी की कहानियाँ हैं. इनके साथ उल्लासित रहना है. इनके साथ रंगीन रहना है. हतोत्साहित नहीं होना है. विश्वास को कमजोर नहीं पड़ने देना है. आखिर ज़िन्दगी अपनी है मगर सिर्फ अपने लिए नहीं है. ज़िन्दगी सिर्फ डराती नहीं वरन सिखाती भी है. वह सिर्फ कष्ट ही नहीं देती वरन मंजिल तक पहुँचाती भी है. बस... ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का जयघोष करते हुए आगे बढ़ना है. एक और नई मंजिल की खोज करना है. उस मंजिल के आगे भी बढ़ना है.
कभी हसरत थी आसमां छूने की,
अब तमन्ना है आसमां पार जाने की.

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यह ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का आरम्भ है. आप सबके बीच इसकी जानकारी प्रेषित करने के उद्देश्य से यह पोस्ट लिखी गई है. ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद को आप इसके ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं. आशा है कि आप सबका स्नेह, आशीर्वाद अवश्य मिलेगा. अभी ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद को लिखने की योजना साप्ताहिक है. भविष्य में जिस तरह से आप सभी का स्नेह, दुलार, आशीर्वाद प्राप्त होगा, उसी के अनुरूप इसकी आवृत्ति पर भी विचार किया जायेगा.

इस लिंक पर क्लिक करके ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद से जुड़ा जा सकता है.
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19 मार्च 2020

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का ऑनलाइन प्रकाशन आरम्भ

जैसा कि आप सबसे आज, 19 मार्च के लिए कहा था, ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का ऑनलाइन प्रकाशन आज से आरम्भ कर दिया है. 

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद से जुड़ने के लिए आपको इसके ब्लॉग पर जाना होगा या फिर इसके पेज पर. इसका प्रकाशन वहीं पर किया जायेगा. 

ब्लॉग और फेसबुक पेज की लिंक नीचे हैं. आप सभी के सहयोग की अपेक्षा है. आगे जैसी आपकी इच्छा.
आभार 

ब्लॉग लिंक 
https://zindagi-zindabad.blogspot.com/ 
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फेसबुक पेज लिंक 

https://www.facebook.com/zindagiizindabad
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12 मार्च 2020

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का ऑनलाइन प्रकाशन

आगामी पुस्तक ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद जल्द ही ऑनलाइन आएगी. यदि सबकुछ यथावत रहा तो इसी महीने की 19 तारीख से. इसे ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद ब्लॉग पर और ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद फेसबुक पेज पर प्रकाशित किया जायेगा. आरंभिक दो-चार पोस्ट हम अपनी फेसबुक वॉल पर और इस ब्लॉग पर शेयर करेंगे. जो मित्र ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद से जुड़े रहना चाहते हैं वे पेज को लाइक करके उससे जुड़ जाएँ अथवा ब्लॉग से जुड़े रहें.
https://www.facebook.com/zindagiizindabad
(ये फेसबुक पेज की लिंक है)
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https://www.zindagiizindabad.blogspot.com
(ये ब्लॉग लिंक है)

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ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद को पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित करवाने का विचार है मगर कुछ समय बाद. अभी हाल-फिलहाल ऑनलाइन ही. 19 मार्च 2020 से. 
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03 मार्च 2020

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद

प्रकृति ने जितने रंग अपने में समाहित कर रखे हैं, वे सभी इस ज़िन्दगी में देखने को मिल जाते हैं. इन रंगों में हँसी के, ख़ुशी के, रोने के, ग़म के, याद रखने के, भूलने के, अपनों के, गैरों के, जीत के, हार के आदि-आदि समाहित रहते हैं. इन रंगों के साथ सह-सम्बन्ध बनाकर खुद को रंगीन बनाये रखने का नाम ही ज़िन्दगी है. ज़िन्दगी के इन तमाम रंगों को हमने बहुत करीब से देखा है, महसूस किया है, उनमें खुद को रंगे पाया है. 

जैसे व्यक्ति अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में किसी न किसी तरह के रंगों से आनंदित होता रहता है, उसी तरह उसे ज़िन्दगी के रंगों का भी स्वागत करना चाहिए. जैसे व्यक्ति अपने मनोनुकूल रंगों का चुनाव करता है, वैसे ही ज़िन्दगी भी व्यक्ति के मन को जांचने-परखने के लिए रंगों का चुनाव करके उसके पास भेजती है या कहें ज़िन्दगी खुद को उन्हीं रंगों में रंगने का प्रयास करती है.


ज़िन्दगी के इन्हीं तमाम अच्छे-बुरे रंगों को अपने बहुत निकट पाया है. इनके द्वारा ज़िन्दगी को रंगीन होते ही देखा है. न प्रकृति के रंगों को बेनूर माना है ठीक वैसे ही ज़िन्दगी से मिलते रंगों में भी जीवंतता भरने की कोशिश की है. ज़िन्दगी को पूरी जिंदादिली से जीने की कोशिश की है. सोचने वाली बात है कि यदि चार दिन की ज़िन्दगी मिली है तो उसे रोकर क्यों बिताया जाए. हँसते हुए ज़िन्दगी के साथ जिंदादिली से यात्रा की जानी चाहिए. आखिर ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद है, रहनी चाहिए.


ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में अपने जीवन के कुछ मिले-जुले रंगों से आपको रंगने जल्द ही आ रहे हैं. इस यात्रा में आप ऑनलाइन हमारे साथ रह सकते हैं. इस यात्रा के रंग अभी हाल-फिलहाल सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर बिखेरे जायेंगे. आप भी इस फुहार में, इस रिमझिम में शामिल होकर हमारे साथ बोलिए, ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद

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