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13 दिसंबर 2025

सुपर से हाइपर होती सैन्य शक्ति

वर्तमान सन्दर्भों में देश की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाये रखना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. वैश्विक स्तर पर व्यापक उथल-पुथल मची हुई है. ऐसे में भले ही चारों तरफ से शांति, अहिंसा, भाईचारे की बातें सुनाई देती हों मगर इसके सापेक्ष युद्ध की आवाजें, बमों के धमाके, मिसाइलों के हमले भी सुनाई पड़ते हैं. विज्ञान, तकनीकी विकास के साथ-साथ तमाम देशों ने अपनी सैन्य क्षमता को भी विकसित किया है, समय के साथ मजबूत किया है. हमारा देश भी लगातार अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करता जा रहा है, अपने हथियारों को उन्नत बना रहा है. ऐसा करने के पीछे की मानसिकता युद्ध करना नहीं बल्कि दक्षिण एशिया के साथ-साथ विश्व पटल पर खुद को सक्षम सिद्ध करना है.

 

विगत वर्षों में हमारे देश ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में अनेक युद्धों के साथ-साथ युद्ध जैसी अनेक स्थितियों का सामना किया है. इसके अलावा अपने पड़ोसी देशों की विस्तारवाद की नीति, वहाँ की अराजक स्थिति के चलते भी सैन्य क्षमता, हथियारों का सशक्त एवं उन्नत किया जाना हमारे लिए एक तरह की मजबूरी भी है. युद्ध के वर्तमान परिदृश्य में अब आमने-सामने की सैनिकों की लड़ाई से ज्यादा प्रचलन ड्रोन का है, मिसाइल का है. इसका जीता-जागता उदाहरण ऑपरेशन सिन्दूर के समय देखने को मिला. हमारी सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस की भूमिका और उसकी सटीक क्षमता को सम्पूर्ण विश्व ने इस दौरान देखा. ब्रह्मोस मिसाइल ने पाकिस्तान के एयरबेस, सैन्य ठिकानों और आतंकी अड्डों को सटीक निशाना बनाकर तबाह करने में अहम भूमिका निभाई. यह भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया, जिसने दुनिया को भारत की सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया.

 



ब्रह्मोस की चर्चा के बाद अब ध्वनि मिसाइल चर्चा में है. रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने हाइपरसोनिक श्रेणी की मिसाइल टेक्नोलोजी पर कार्य करते हुए ध्वनि मिसाइल को तैयार कर लिया है. ध्वनि के परीक्षण पश्चात् हमारा देश विश्व की उन सैन्य शक्तियों में सम्मिलित हो जायेगा जो हाइपरसोनिक तकनीक से सुसज्जित हैं. इस मिसाइल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी रफ़्तार है. सुपरसोनिक मिसाइलों की तुलना में यह मिसाइल अधिक तेजी से उड़ान भरने में सक्षम है. ऐसा अनुमान है कि ध्वनि हाइपरसोनिक मिसाइल मैक 5 या 6 से अधिक गति से उड़ान भर सकेगी, जो लगभग 7400 किमी प्रति घंटा के बराबर है. इस मिसाइल की एक और विशेषता इसका हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (एचजीवी) होना है जो बैलिस्टिक बूस्टर से ऊँचाई पर पहुँच कर हवा में ग्लाइड करती है. हवा में ग्लाइड करते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ने के कारण यह राडार और मिसाइल रक्षा प्रणालियों से लगभग अदृश्य रहती है. हाइपरसोनिक मिसाइलें अपनी गति और उड़ान पथ में गतिशीलता के कारण पारम्परिक मिसाइलों की तुलना में अधिक प्रभावकारी होती हैं. यह कदम केवल तकनीकी सफलता ही नहीं है बल्कि देश की बदलती हुई सशक्त रणनीतिक स्थिति का परिचायक भी है. अनुमान है कि इस माह के अंत तक ध्वनि हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण कर लिया जायेगा. यदि पूर्वनिर्धारित ढंग से कार्ययोजना सफल रही तो वर्ष 2030 तक यह मिसाइल भारतीय सेनाओं का हिस्सा बन जाएगी.

 

डीआरडीओ के हाइपरसोनिक डेमांसट्रेटर व्हीकल प्रोग्राम पर आधारित ध्वनि मिसाइल की क्षमता के बारे में रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी रफ़्तार और हवा में ग्लाइड करने के कारण दुनिया के बेहतर से बेहतर वायु रक्षा प्रणालियों द्वारा इसे रोक पाना सम्भव नहीं होगा. अभी तक चीन की डीएफ-26 हाइपरसोनिक मिसाइल को विश्व की अत्याधुनिक मिसाइलों में गिना जाता है मगर ध्वनि मिसाइल इसके मुकाबले कहीं ज्यादा उन्नत है. डीएफ-26 को जहाँ स्थिर मार्ग और सीमित फुर्ती के लिए जाना जाता है वहीं ध्वनि मिसाइल को जमीन, हवा और समुद्र से प्रक्षेपित किया जा सकता है साथ ही यह उड़ान के दौरान दिशा बदलने में सक्षम है. डीआरडीओ ने मिसाइल के एरोडायनमिक्स, थर्मल मैनेजमेंट, गाइडेंस सिस्टम, स्क्रैमजेट इंजन आदि को लेकर लगातार सफल परीक्षण किये हैं, जिससे ध्वनि मिसाइल के तकनीकी रूप से सफल होने की सम्भावना बहुत अधिक है. इस परीक्षण के सफल होने के बाद भारत रूस, अमेरिका और चीन के साथ उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जायेगा जिनके पास हाइपरसोनिक मिसाइल हैं.

 

हाइपरसोनिक मिसाइल ध्वनि की रेंज 6,000 से 10,000 किमी तक होगी, जो अग्नि, ब्रह्मोस से कहीं अधिक है. यह दक्षिण एशिया के सामरिक संतुलन को पूरी तरह बदल देगी. हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के चलते भी ध्वनि भारत की रणनीतिक भूमिका को निर्णायक स्तर पर प्रभावित करेगी. ब्रह्मोस के बाद अब ध्वनि का आना इस कारण और भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि देश के पास सामरिक महत्त्व वाली बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल प्रणालियाँ पहले से ही हैं. देश के एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम के द्वारा लगातार विकसित होती मिसाइल प्रणालियों ने देश को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन स्थापित करने योग्य तो बनाया ही है साथ ही सामरिक स्थिरता बनाये रखने के कारण महाशक्ति के रूप में भी पहचान बनाने में सहायता प्रदान की है. पृथ्वी, आकाश, नाग, अग्नि, त्रिशूल, ब्रह्मोस आदि अनेक मिसाइलों के द्वारा भारत ने अपनी भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया वहीं सम्भावित खतरों का मुकाबला करने के लिए स्वयं को सक्षम बनाया. इन मिसाइलों के द्वारा भारत का उद्देश्य किसी दूसरे देश पर आक्रमण करना नहीं बल्कि किसी भी तरह की युद्ध अथवा संघर्ष की स्थिति में अपने आपको आक्रामक और रक्षात्मक रूप से मजबूत बनाना रहा है. ध्वनि मिसाइल देश की रक्षा प्रौद्योगिकी में एक महत्वपूर्ण कदम है. इसके आने से न केवल भारतीय सेना की शक्ति में वृद्धि होगी, बल्कि यह देश की रक्षा नीति और सामरिक स्थिति को भी मजबूत करेगी.


25 अक्टूबर 2025

हिंसात्मक गतिविधियों से भरा समाज

ये किसी तरह के समाज का निर्माण कर लिया हम लोगों ने? सुबह आँख खुलने से लेकर रात सोने तक कहीं न कहीं से हिंसात्मक खबरों का आना लगा ही रहता है. इन खबरों का केन्द्र देश ही नहीं रहता है बल्कि विश्व स्तर पर चारों तरफ से इसी तरह की खबरें सुनाई पड़ती हैं. कहीं दो व्यक्ति आपस में लड़ने में लगे हैं, कहीं दो परिवारों के बीच कलह मची हुई है, कहीं दो राज्यों के बीच विवाद की स्थिति है तो कहीं दो देशों में युद्ध चल रहा है. ऐसा लगता है जैसे समाज में चारों तरफ अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि का समावेश बना हुआ है. सद्भाव, सहजता, शांति, धैर्य आदि को जैसे भुला ही दिया गया है. पारिवारिक सम्बन्धों में, रक्त-सम्बन्धियों में विभेद इस स्तर तक है कि एक-दूसरे की जान तक ले ली जा रही है. समाज की इकाई एक व्यक्ति के दायरे से बाहर निकल कर देखें तो एक देश के रूप में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. विस्तारवाद की नीति के चलते, अपने वर्चस्व को, प्रभुता को थोपने की नीयत के चलते जहाँ बड़े-बड़े देशों द्वारा छोटे-छोटे देशों को किसी न किसी रूप में अपने कब्जे में किये जाने की मानसिकता काम करती है, वहीं महाशक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे को नियंत्रित करने की नीतियाँ निर्धारित करती हैं.

 

समाज की वर्तमान स्थिति यह है कि यहाँ प्रेम, करुणा, शांति, अहिंसा से अधिक बैर, वैमनष्यता, हिंसा आदि दिखाई दे रही है. क्या कभी इस पर विचार किया गया कि आखिर ऐसा क्या है इंसानी स्वभाव के मूल में कि उसे सदियों से प्रेम, सौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है मगर वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है? आये दिन खबरें मिलती हैं मासूम बच्चियों के साथ दुराचार की, उनकी हत्या की. आये दिन देखने में आ रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले किये जा रहे हैं, उनकी जान ले ली जा रही है. लगभग नित्यप्रति की खबर बनी हुई है किसी की हत्या, कहीं लूट, कहीं अपहरण, कहीं मारपीट. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए. गम्भीरता से विचार किया जाये तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि हिंसा, अत्याचार, क्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. कोई व्यक्ति वह चाहे आम नागरिक हो या फिर अधिकार प्राप्त व्यक्ति, सभी के मन में कहीं न कहीं एक तरह का हिंसात्मक भाव-बोध छिपा होता है. आम नागरिक अपने इसी भाव-बोध के वशीभूत अपने आस-पड़ोस में हिंसात्मक गतिविधियाँ करता है तो वही किसी तानाशाही मानसिकता वाला राष्ट्राध्यक्ष विस्तारवादी मानसिकता के चलते अपने आसपास के देशों के प्रति नकारात्मक भाव रखता है.

 

यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि आदिमानव से महामानव बनने की होड़ में लगे इंसान को लगातार प्रेम, दया, करुणा आदि का पाठ पढ़ाया जाता रहा है. उसे समझाया जाता रहा है कि हिंसा गलत है, वह चाहे जीव पर हो, निर्जीव पर हो, पेड़-पौधों पर हो. इंसान को कदम-कदम पर सीख दी गई कि उसे आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. आपसी वैमनष्यता से उसे दूर रहना चाहिए. उसे कभी नहीं सिखाया गया कि कैसे हिंसा करनी है. उसे किसी ने नहीं सिखाया कि कैसे दूसरे से बैर भावना रखनी है. उसे किसी भी तरीके से नहीं बताया गया कि सामने वाले की हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो पाठ उसे सदियों से पढ़ाया जाता रहा, शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जा रहा, परिवार द्वारा पढ़ाया जाता रहा, समाज द्वारा पढ़ाया जाता रहा इंसान उसी पाठ को कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जिस पाठ को किसी ने नहीं सिखाया, जिसे सिखाने के सम्बन्ध में कोई संस्थान नहीं है वे कार्य उसने न केवल भली-भांति सीख रखे हैं वरन वह उन्हें तीव्रता के साथ करने भी लगा है. ऐसा लगता है जैसे उसने अपने आसपास तनावपूर्ण माहौल वाली दुनिया बनाने का ही संकल्प ले रखा है.

 

इस तरह की दुनिया में जहाँ सब कुछ स्वार्थ पर आधारित होने लगा है; जहाँ व्यक्तियों की, देशों की प्रतिष्ठा का आधार अधिकार, उसका आर्थिक स्तर, शक्ति प्रदर्शन आदि होने लगा हो वहाँ आपस में खाई बनना स्वाभाविक है. वैश्विक परिदृश्य में दो देशों के बीच विगत कई वर्षों से चल रहे युद्ध, संघर्ष इसके सशक्त उदाहरण हैं. यदा-कदा संघर्ष विराम के नाम पर चंद दिनों की शांति भले ही देखने को मिल जाए, भले ही कोई अपनी पीठ स्वयं ही थपथपा ले किन्तु तनाव, संघर्ष, हमला आदि पुनः अपनी तीव्रता के साथ आरम्भ हो जाते हैं. नागरिकों के हितार्थ लिए जाने वाले निर्णय अचानक से भुला दिए जाते हैं. ऐसी स्थिति न केवल चिंतनीय है बल्कि भयावह भी है.

 

सामाजिक रूप से कितने भी प्रयास किये जाएँ किन्तु इंसानों का मूल स्वभाव बदले बिना शांति सम्भावना की स्थिति अब संभव नहीं लगती है. वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैं, अपने आदर्श हैं, अपने विचार हैं, अपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारा, सबके आदर्श दूसरे की विचारधारा, आदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठता, हीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. समझने वाली बात है जब आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो रही हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. सरकार, प्रशासन, समाज, व्यक्ति सबके सब असहाय बने खुद पर हमला होते देख रहे हैं.

 


13 अगस्त 2025

बदलाव एवं उपलब्धियों भरी सुखद यात्रा

देश के गौरवशाली इतिहास की छत्रछाया में अमृतकाल जैसी अवधारणा संग स्वतंत्रता का उत्सव जोर-शोर से मनाया जा रहा है. यह समय गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे बढ़ रही है. बहुत से लोगों के लिए इसे भले राजनैतिक कदम, सरकारी एजेंडा कहा जाता हो मगर स्वतंत्रता के उत्सव को उमंग-उत्साह के साथ ही मनाये जाने की आवश्यकता है. यह एक तरफ जहाँ हमारी प्राचीन वैभवशाली संस्कृति, सभ्यता से परिचय कराता है वहीं वर्तमान युवा पीढ़ी को हमारे वीर-वीरांगनाओं का वह बलिदान याद करवाता है, जिसके चलते आज ऐसे उत्सव मना रहे हैं.

 

स्वतंत्रता के इन वर्षों में बहुत सी उपलब्धियाँ हैं जिनका सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने आज़ादी से अब तक कुछ पाया नहीं है? क्या अभी तक की यात्रा में किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है? विगत उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि पूर्वाग्रह मुक्त होकर समग्र रूप में देखें तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. यह सबसे बड़ी उपलब्धि कही जाएगी कि जब देश स्वतंत्र हुआ तब देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी. आज स्थिति यह है कि कृषिप्रधान कहे जाने के बाद भी देश का आर्थिक ढाँचा अकेले कृषि आधारित नहीं है, अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 54 प्रतिशत है.

 



शिक्षा के बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. नालंदा, तक्षशिला जैसे शैक्षणिक संस्थानों के नष्ट कर दिए जाने के बाद महसूस हो रहा था कि शायद देश का शैक्षणिक विकास बहुत देर में हो. इस आशंका को विगत वर्षों की यात्रा में गलत सिद्ध किया गया है. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. नेशनल मेडिकल काउंसिल के अनुसार 2024-25 में 766 मेडिकल कॉलेज हैं, इनमें से 423 सरकारी और 343 निजी मेडिकल कॉलेज हैं. क्या इसे विकास या उपलब्धियों के रूप में नहीं देखा जायेगा? इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. तकनीक के मामले में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले. किसी समय दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, अन्तरिक्ष स्टेशन पर किसी भारतीय का जाना, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं, उसमें अश्लीलता की, अपराध की दीमक लगा दी है.

 

ऐसे कुछ और पहलू भी हैं, जिनके आधार पर बहुत सारे लोग देश की वास्तविक उपलब्धियों को विस्मृत कर जाते हैं. वे भूल जाते हैं हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति को जहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. ये और बात है कि संवैधानिक नियमों की आड़ में यहाँ एक निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री बन जाता है मगर यही संवैधानिक खूबसूरती भी है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.


29 मई 2025

चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का उत्साह??

22 अप्रैल 2025 को प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया की सबसे बड़ी चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है. भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी इस बड़ी छलांग को लगाते हुए जापान को पीछे छोड़ दिया है. आईएमएफ की रिपोर्ट के बाद इसकी पुष्टि करते हुए नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम ने बताया कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वर्तमान में चार ट्रिलियन डॉलर से अधिक का हो गया है. इसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था अब विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो गई ही. आईएमएफ की रिपोर्ट की पुष्टि करने के साथ-साथ उन्होंने बताया कि यदि देश की नीतियाँ ऐसे ही काम करती रहीं तो आने वाले कुछ वर्षों में हमारा देश जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है.

 



जीडीपी के आधार पर वर्ष 2023 के आँकड़ों में विश्व की प्रथम दस अर्थव्यवस्थाओं में देश की अर्थव्यवस्था पाँचवें स्थान पर थी. तब हमारे देश की अर्थव्यवस्था 3.56 ट्रिलियन डॉलर थी. तत्कालीन आँकड़ों के अनुसार भारत से आगे विश्व अर्थव्यवस्थाओं में चार देश अमेरिका (27.72 ट्रिलियन डॉलर), चीन (17.79 ट्रिलियन डॉलर), जर्मनी (4.52 ट्रिलियन डॉलर) और जापान (4.20 ट्रिलियन डॉलर) ही थे. इस वर्ष जारी की गई रिपोर्ट में आईएमएफ का कहना यह भी है कि वर्ष 2025 में भारत की विकास दर 6.2 प्रतिशत और वर्ष 2026 में 6.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक है. इन आँकड़ों का आईएमएफ की तरफ से जारी होने के कारण भी देश के आर्थिक क्षेत्र में तथा सत्ता पक्ष में उत्साह दिखाई दे रहा है.

 

वैश्विक स्तर पर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का प्रभाव न केवल देश की आंतरिक स्थिति पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाई देगा. ऐसी स्थिति के चलते अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक मंचों जैसे जी-20, विश्व बैंक, आईएमएफ आदि में भारतीय छवि का सकारात्मक स्वरूप नजर आएगा. इसके चलते विदेशी निवेश बढ़ने की भी सम्भावना है. विश्व स्तर की बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ वैसे भी भारतीय बाजार में अपने उत्पादों के लिए ग्राहकों को लगातार तलाशती रही हैं. अब उनको भारत में एक आकर्षक बाजार नजर आ रहा होगा. देखा जाये तो भारत दक्षिण एशिया में लम्बे समय से नेतृत्वकर्ता की भूमिका में रहा है और विगत कुछ वर्षों में उसके क्षेत्र और विश्वास में भी वृद्धि हुई है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेकानेक मंचों पर, महाशक्ति समझे जाने वाले देशों में भारत की सकारात्मक एवं सशक्त छवि बनी है. देश की वर्तमान आर्थिक उपलब्धि के बाद उसके आर्थिक नेतृत्वकर्ता के रूप में भी आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता दिखता है. भारतीय अर्थव्यवस्था के चौथे स्थान पर आने के अपने-अपने सन्दर्भ तलाशे जा रहे हैं. इनको तलाशा भी जाना चाहिए, आखिर आम जनमानस को भी इसके सन्दर्भों से परिचित होने की आवश्यकता है. एक तरफ आर्थिक क्षेत्र में, सत्ता के गलियारों में उत्साह दिख रहा है, दूसरी तरफ आम नागरिक अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य, मँहगाई, बेरोजगारी, गरीबी आदि से जूझ रहा है.

 

देश के चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाने के बाद भी क्या भारतीय समाज की, सामान्य जन-जीवन की, भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविकता से मुँह मोड़ा जा सकता है? अर्थव्यवस्था सम्बन्धी आँकड़ों को सामने लाने का कार्य मुख्य रूप से जीडीपी को आधार बनाकर किया जाता है. जीवन-शैली और आर्थिकी के सन्दर्भ में जीडीपी और जन-जीवन दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं, दोनों के अलग-अलग स्वरूप हैं. जीडीपी से देश की अर्थव्यवस्था का आकार तो मापा जा सकता है किन्तु उसके द्वारा सामान्य जनजीवन के बारे में, आय और संपत्ति के वितरण के बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाने के बाद भी प्रति व्यक्ति आय के सन्दर्भ में देश वैश्विक स्तर पर 144वें स्थान पर आता है. यह विडम्बनापूर्ण ही है कि अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में भारत से आगे मात्र तीन देश हैं लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में 143 देश हमसे आगे हैं. यदि जापान के सन्दर्भ में ही आँकड़ों को देखें तो भारत में प्रति व्यक्ति आय तीन हजार डॉलर से कम है जबकि जापान की प्रति व्यक्ति आय 34 हजार डॉलर है. जीडीपी के सन्दर्भ में हम भले ही जापान से आगे निकल आये हों किन्तु प्रति व्यक्ति आय, जीवन प्रत्याशा, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, तकनीक आदि जैसे क्षेत्रों में जापान हमसे बहुत आगे है.

 

किसी भी देश के विकास में शिक्षा की गुणवता, नागरिकों का स्वास्थ्य, उनकी जीवन प्रत्याशा, जीवन-शैली, प्रति व्यक्ति आय आदि का बहुत बड़ा योगदान होता है. इनका सकारात्मक रूप और इसका स्तर किसी भी देश के सामाजिक जीवन में नवाचार को दर्शाता है. अपने देश की साक्षरता दर भले ही 75 प्रतिशत से अधिक की है लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास में कमी बनी हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति अत्यंत जटिल है. इसी तरह स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी सुखद नहीं कही जा सकती है. आय और सम्पत्ति के वितरण में भी व्यापक असमानता दिखाई देती है. देश के संसाधनों की बहुलता मुट्ठी भर लोगों के पास है और अधिसंख्यक नागरिकों के पास अत्यल्प संसाधन हैं. ऐसे में आँकड़ों के सन्दर्भ में, जीडीपी के आधार पर, वैश्विक स्थिति में वृद्धि होने को लेकर भले ही उत्साह दिखा लिया जाये मगर सामाजिक स्थिति के सन्दर्भ में, आम जनमानस के आधार पर आईएमएफ की इस रिपोर्ट पर अत्यधिक उत्साहित होने की, गर्वोन्नत होने की आवश्यकता नहीं है.

 

11 मार्च 2025

स्वतंत्र होने की राह पर बलूचिस्तान?

पाकिस्तान में ट्रेन अगवा करने की खबर से बलूचिस्तान चर्चा में है. यहाँ के अलगाववादी संगठन बलूचिस्तान लिब्रेशन आर्मी (बीएलए) के लड़ाकों ने 500 यात्रियों को क्वेटा से पेशावर ले जा रही जफर एक्सप्रेस को अगवा कर लिया. उन्होंने ट्रेन में सवार महिलाओं, बुज़ुर्गों, बच्चों और बलूच लोगों को सुरक्षित रिहा कर दिया किन्तु 20 सुरक्षाकर्मियों को मार दिया तथा सैकड़ों यात्रियों को बंधक बना लिया है. बीएलए ने ट्रेन के बंधकों को छोड़ने के बदले बलूच राजनीतिक कैदियों और गायब किए गए व्यक्तियों की बिना शर्त रिहाई की माँग की है. इस घटना के बाद भारत, पाकिस्तान सहित अन्य देशों में बलूच लड़ाकों, बलूचिस्तान का नाम फिर चर्चा में है. भारत में इससे पहले अगस्त 2016 में बलूचिस्तान का मुद्दा जबरदस्त तरीके से चर्चा में आया था जबकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से अपने भाषण में बलूच नागरिकों पर पाकिस्तान के अत्याचारों का जिक्र किया था. बलूच एक जातीय समूह है जो बलूचिस्तान के मूल निवासी हैं. यह क्षेत्र पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ है. इनका आरोप है कि पाकिस्तान उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है और बदले में उनके मौलिक अधिकारों का हनन कर रहा है. इस कारण बलूचिस्तान में लगातार विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं. ट्रेन को अगवा करने वाली घटना को इसी सन्दर्भ में देखा जा सकता है.

 



पाकिस्तान के विरोध में बलूचिस्तान के अनेक संगठन शांतिपूर्ण आंदोलन करते रहे हैं तो कई संगठनों ने हथियारबंद आंदोलन किये हैं. ऐसे हथियारबंद संगठन आए दिन पाकिस्तान के सैन्य और नागरिक ठिकानों पर हमला करते रहते हैं. विगत लम्बे समय से एक हथियारबंद संगठन बीएलए सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है, जिसने पाकिस्तान को लगातार नुक़सान भी पहुँचाया है, उसे परेशान भी किया है. बीएलए को बलूचिस्तान के मरी, बुगती, मेंगल और अन्य बलोच कबीलों का समर्थन मिला हुआ है. इसके छह हजार से अधिक लड़ाके बलूचिस्तान और अफगानिस्तान से लगे क्षेत्रों में सक्रिय हैं. यद्यपि पाकिस्तान ने 2006 में बीएलए पर पाबंदी लगा दी थी तथापि विगत कुछ वर्षों में बीएलए ने बलूचिस्तान के ग्रामीण क्षेत्रों में अपना अच्छा नेटवर्क बना लिया है.

 

बलूचिस्तान के गठन के बाद से ही वहाँ के लोग लगातार पाकिस्तान के विरुद्ध संघर्ष करते रहे हैं. दरअसल पाकिस्तान बनने पर उसमें कई रियासतों का विलय हुआ, कई का विलय दबाव से करवाया गया और कुछ पर कब्जा भी किया गया. पाकिस्तान ने अपने गठन के बाद मार्च 1948 को कलात रियासत का जबरन विलय कर लिया. इसके बाद तीन अन्य रियासतों को मिलाकर बलूचिस्तान प्रांत बना दिया. इससे नाराज होकर बलूच लोगों ने विद्रोह शुरू कर दिए, जिन्हें पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति से दबाता रहा. एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार 2011 से अब तक दस हजार से ज्यादा बलूच लापता हो चुके हैं. बलूच लोगों का मानना है कि वो या तो पाकिस्तान की कैद में हैं या उन्हें मार दिया गया है. बलूच राष्ट्रवादियों का कहना है कि वे लोग अपनी मर्जी से पाकिस्तान में नहीं मिले. उनका आरोप है कि पाकिस्तान ने कब्जा करने के बाद बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का भारी दोहन किया है, बदले में बलूच लोगों को कुछ नहीं मिल रहा. यहाँ क्रोमाइट, फ्लोराइट, संगमरमर, सोना, गैस, लोहा और पेट्रोलियम सहित प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं. इसके साथ ही 1100 किमी सीमा समुद्र से लगती है जो समुद्री संसाधनों और व्यापार की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. बलूचिस्तान के साथ पाकिस्तान के भेदभाव को इससे ही समझा जा सकता है कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत होने के बाद भी बलूचिस्तान सबसे कम जनसंख्या वाले और सबसे गरीब प्रांतों में से एक है. पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का 44 प्रतिशत हिस्सा होने के बाद भी कुल जनसंख्या का मात्र 6 प्रतिशत ही बलूचिस्तान में है.

 

पाकिस्तान ने बलूचिस्तान का गठन अवश्य किया मगर उसे सदैव हाशिये पर रखा गया. यहाँ के निवासियों को सेना सहित राजनीति में अपेक्षित प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण असंतोष बना रहा. पाकिस्तान सरकार द्वारा बलूचिस्तान की प्रांतीय परिषद को ज्यादातर बर्खास्त किये जाने के कारण यहाँ स्वायत्तता, स्वतंत्रता, जातीय संघर्ष को बल मिला. इसका परिणाम यह हुआ कि बलूचिस्तान में स्थानीय लोगों द्वारा बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए), बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ), बलूच रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए) जैसे संगठन बना लिए गए. ये संगठन स्वयं को स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं जबकि पाकिस्तान द्वारा इनको आतंकवादी संगठन बताया जाता है. इन स्थानीय संगठनों के अलावा अलकायदा, क्वेटा शूरा-ए-तालिबान, तहरीक तालिबान आदि जैसे कई कट्टरपंथी संगठन भी यहाँ सक्रिय हो गए हैं. इन समूहों की गतिविधियों ने संघर्ष की स्थिति को जटिल बना दिया है. यहाँ की अस्थिर रणनीतिक स्थिति और बिगड़ी अर्थव्यवस्था ने इन संगठनों को मजहबी कट्टरता के साथ संगठित अपराधों की तरफ बढ़ाया है.

 

पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान की लगातार अनदेखी करने के कारण बढ़ते असंतोष, संघर्ष और पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति देखकर लगता है कि जल्द ही बलूचिस्तान अपने स्वतंत्र होने की घोषणा कर सकता है. इस तरह का अंदेशा फरवरी 2025 में पाकिस्तानी सांसद मौलाना फजलुर्रहमान ने व्यक्त करते हुए कहा था कि उनका देश एक बार फिर से टूट सकता है. बलूचिस्तान प्रांत के एक हिस्से में पाकिस्तान से लोग खुश नहीं हैं. ये अलग होने का फैसला लेकर एक बार फिर 1971 जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जब पाकिस्तान टूट गया था और बांग्लादेश बना था. यद्यपि भारत द्वारा पाकिस्तान अथवा किसी दूसरे देश की आंतरिक स्थिति में दखल न देने की कूटनीति अपनाई जाती रही है तथापि वर्तमान सन्दर्भ में उसे निश्चित रूप रूप से ऐसे हालात पर सजग रहने की आवश्यकता है.  


02 अक्टूबर 2024

इजरायल-ईरान संघर्ष के भारतीय सन्दर्भ

हिजबुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत के बाद भी इजराइल ने लेबनान में चरमपंथी समूह के ठिकानों पर बमबारी जारी रखी. उसने साफ कहा था कि वह हमले बंद नहीं करेगा और इजराइल के हितों पर हमला करने वाले किसी भी देश को नष्ट कर देगा. इजरायल द्वारा हिजबुल्लाह पर ताबड़तोड़ हमलों के बाद आशंका व्यक्त की जा रही थी कि कहीं इसकी परिणति ईरान द्वारा इजरायल पर हमला करने के रूप में न हो. यह आशंका मंगलवार शाम को सच साबित भी हुई जबकि ईरानी सेना ने इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार कर दी. उसकी सेना द्वारा हमले में मुख्‍य रूप से सेना और सुरक्षा एजेंसी को निशाना बनाया गया. हमले के बाद इजरायली मीडिया ने बताया कि ईरान ने इजरायल पर 180 के आसपास बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं. इस हमले के तुरंत बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान ने उस पर हमला करके बहुत बड़ी गलती की है. उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. नेतन्याहू के इस बयान के बाद दोनों देशों के मध्य सीधे युद्ध की आशंका तीव्र हो गई है. माना जा रहा है कि इजरायल किसी भी वक्त ईरान पर सीधा हमला कर सकता है.  

 

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के साथ ही इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष का वर्तमान दौर के चलते सम्पूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय महत्वपूर्ण मोड़ पर है क्योंकि इस संघर्ष में अब ईरान के शामिल हो जाने से भू-राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ गई हैं. ईरान की यौद्धिक स्थिति पर विचार करते समय सावधानी बरतना जरूरी है. इजराइल के पास बड़ी सैन्य शक्ति है और उसे अमेरिका से समर्थन प्राप्त है. ईरान के साथ इजरायल की युद्ध स्थिति यदि बढ़ती है तो इसके परिणाम को और वर्तमान को भारतीय हितों के सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है. जहाँ तक भारत के हितों का सवाल है, पश्चिम एशिया, विशेष रूप में खाड़ी देशों में भारतीय नागरिकों के लिए यह संघर्ष एक तरह का जोखिम पैदा कर ही सकता है.

 



यदि भारतीय सन्दर्भों में इजरायल और ईरान को देखें तो किसी समय भारत की नीति फिलिस्तीन को समर्थन देने की रही है मगर पिछले दो दशकों से अधिक समय से भारत और इजरायल के बीच सम्बन्ध प्रगाढ़ हुए हैं. सैन्य सम्बन्धों, उपकरणों, तकनीकी, ख़ुफ़िया तंत्र आदि के विकसित स्वरूप के लिए इजरायल बराबर भारत का साथ दे रहा है. पिछले दशक में 2.9 अरब डॉलर मूल्य की मिसाइलें, रडार, निगरानी और लड़ाकू ड्रोन का निर्यात इजरायल से किया गया है. इजरायल के साथ-साथ भारत के सम्बन्ध ईरान के साथ भी महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं. देश का चाहबार पोर्ट उन्हीं के क्षेत्र में हैं, जिसके माध्यम से यूरोप को जोड़ने की कल्पना को साकार किया जा सका है. भारत ने 2016 में चाबहार को विकसित करने के लिए 8.5 करोड़ डॉलर का निवेश किया था और तेहरान को 15 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन भी दी थी. इसके साथ-साथ ईरानी तेल-गैस भी भारत के लिए हाइड्रोकार्बन के निकटतम स्रोत हैं. अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत ईरानी तेल का बड़ा खरीदार था. ऐसे में इजरायल और ईरान का संघर्ष बढ़ने पर भारत के सामने नई चुनौती आएगी.

 

ईरान युद्ध में शामिल होने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि वह तेल की आपूर्ति को बाधित कर सकता है या फिर यह बाधा युद्ध के कारण स्वतः बन सकती है. दोनों ही स्थितियों में तेल की कीमतों का बढ़ना तय है. भारत कच्चे तेल के क्षेत्र में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और उसे अपनी ऊर्जा-आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में तेल कीमतों की वृद्धि से भारतीय आर्थिक विकास दर के नकारात्मक स्थिति में जाने की आशंका भी बनती है. यह देश के आर्थिक विकास की दृष्टि से उचित नहीं. इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करते भारतीयों पर भी इस युद्ध का नकारात्मक असर पड़ने की सम्भावना है. एक अनुमान के अनुसार नब्बे लाख के आसपास भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं. ईरान के हमले के बाद यदि इजरायल सीधे-सीधे युद्ध की स्थिति में उतर आया तो ऐसी स्थिति में ये भारतीय खाड़ी देशों से वापस अपने देश को आने लगेंगे. इससे भी मध्य पूर्व क्षेत्र में भारत के लगभग 195 बिलियन डॉलर के बाईलेटरल व्यापार पर भी असर पड़ेगा.

 

यद्यपि भारत द्वारा इजरायल-हमास संघर्ष के आरंभिक दौर से ही इस संघर्ष को शांत करने के प्रयास किये जाते रहे तथापि उसे इसमें सफलता नहीं मिली. इजराइल पर हमास के आतंकवादी हमले के बाद से ही भारत ने मध्य-पूर्व क्षेत्र के सऊदी अरब, ईरान, मिस्र, फिलिस्तीन सहित अनेक यूरोपीय नेताओं से वार्ता की. लगातार चर्चाओं, वार्ताओं के बाद भी संघर्ष बढ़ता ही गया और अब वह एक युद्ध के रूप में नजर आ रहा है. भारत के ईरान के साथ लम्बे समय से रणनीतिक संबंध हैं, वहीं मोदी सरकार ने इजराइल के साथ भी गहरे सम्बन्ध विकसित किए हैं. ऐसे में भारत को आतंकी संगठनों, आतंकवादियों के समूल नाश किये जाने के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ रहते हुए भविष्य और तमाम आशंकाओं के सन्दर्भ में दोनों देशों के साथ कूटनीतिक स्तर पर कदम बढ़ाते हुए युद्ध जैसी स्थिति को न बनने देने के प्रयास करने चाहिए.


09 सितंबर 2024

मणिपुर में अंतरराष्ट्रीय साजिश की आशंका

मणिपुर में पिछले साल शुरू हुई हिंसा की स्थिति यह है कि राज्य में हालात अब भी सामान्य नहीं हुए हैं. हिंसा ने अब और भी भयानक रूप ले लिया है. विगत एक साल से अधिक समय से चल रही हिंसा में विद्रोहियों द्वारा पहली बार ड्रोन का, रॉकेट का इस्तेमाल किया गया. अब स्थिति को और ज्यादा ख़राब इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि स्थानीय पुलिस ने दावा किया है कि राज्य में ताज़ा हिंसा में अत्याधुनिक ड्रोन और आरपीजी (रॉकेट प्रोपैल्ड गन अर्थात कंधे पर रखकर रॉकेट दागने वाली बन्दूक) का उपयोग किया गया है. यह खतरनाक है स्थिति क्योंकि ऐसे हथियारों का प्रयोग आमतौर पर युद्ध में किया जाता है. सुरक्षाबलों और आम नागरिकों के विरुद्ध इसका इस्तेमाल खतरनाक संकेत देता है. कुकी समुदाय के खतरनाक इरादों को इसी से समझा जा सकता है कि उनके द्वारा 6 सितंबर को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मैरेम्बम कोइरेंग के घर पर रॉकेट बम फेंका गया. इस हमले में एक बुजुर्ग की मौत हो गई और पाँच लोग घायल हो गए. दरअसल मणिपुर के जिरीबाम में कुकी उग्रवादियों द्वारा असम की सीमा से सटे मोंगबुंग गाँव में घुसकर मैतेई समुदाय के एक बुजुर्ग की हत्या किये जाने के बाद वहाँ हिंसा भड़क गई.

 



मणिपुर भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्य है. जिसमें बहुसंख्यक रूप में मैतेई समुदाय के लोग निवास करते हैं, जबकि लगभग 43 प्रतिशत जनसंख्या कुकी और नगा समुदाय के लोगों की है. यहाँ तीन मई 2023 को मैतेई (घाटी बहुल समुदाय) और कुकी (पहाड़ी बहुल समुदाय) के बीच हिंसा शुरू हुई थी. मैतेई समाज की माँग थी कि उनको भी कुकी की तरह राज्य में अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिया जाए. इस माँग के सापेक्ष मणिपुर उच्च न्यायालय ने 27 मार्च 2023 को राज्य सरकार से मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने पर विचार करने को कहा. इस आदेश के कुछ दिन बाद ही राज्य में जातीय हिंसा भड़क गई और कई लोगों की जान भी गई. मैतेई समुदाय की इस माँग को हिंसा के पीछे का मुख्य कारण बताया जा रहा है. उनकी इस माँग का विरोध मणिपुर के पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले कुकी जनजाति के लोग कर रहे हैं.

 

मणिपुर हिंसा को लेकर कुकी समुदाय के साथ-साथ भाजपा विरोधी राजनैतिक दलों ने वहाँ की भाजपा सरकार पर आरोप लगाये हैं. असल में मणिपुर में भाजपा का शासन है और मुख्यमंत्री बीरेन सिंह मैतेई समुदाय से आते हैं, इस कारण से कुकी समुदाय का आरोप है कि नशीले पदार्थों के व्यापार को ख़त्म करने की आड़ में उनको निशाना बनाया जा रहा है. इसके उलट वहाँ कुकी समुदाय के लोग राज्य के विद्रोही समूहों को सरकार, मैतेई समुदाय के विरुद्ध भड़काने, धर्मान्तरण करवाने, नशीले पदार्थों का व्यापार आदि जैसे कार्यों में संलिप्त बताये जा रहे हैं. मैतेई जनजाति का मानना है कि वर्षों पहले उनके राजाओं ने म्यांमार से कुकी समुदाय के लोगों को युद्ध लड़ने के लिए बुलाया था. उसके बाद ये लोग स्थायी रूप से यहीं बस गए. स्थायी नागरिक के रूप में रहते हुए कुकी समुदाय के लोगों ने राज्य को नुकसान ही पहुँचाया है. इन लोगों ने रोजगार के लिए जंगल काटे और अफीम की खेती करनी आरम्भ की. इससे मणिपुर नशीले पदार्थों की तस्करी का अड्डा बन गया है.

 

मणिपुर हिंसा भले ही मैतेई और कुकी समुदाय के बीच का संघर्ष लगे मगर इसके मूल में एक तरह का षड्यंत्र ही है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे संकेत मिलते रहे हैं कि बांग्लादेश, म्यांमार और भारतीय पूर्वोत्तर के अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय और मणिपुर को मिलाकर ईसाई देश बनाने की साजिश रची जा रही है. इस साजिश से इंकार भी नहीं किया जा सकता है क्योंकि नागालैंड, मिजोरम, मेघालय ईसाई बहुल हो चुके हैं और जिस तरह से धर्मान्तरण का खेल पूर्वोत्तर में चल रहा है, उसे देखते हुए निकट भविष्य में मणिपुर भी ईसाई बहुल हो जायेगा. मणिपुर का मैतेई समुदाय जहाँ एक तरफ नशे कारोबार का विरोध कर रहा है दूसरी तरफ ईसाइयत की राह में रोड़ा बना हुआ है.

 

इस हिंसा को पूर्वोत्तर में अंतरराष्ट्रीय साजिश के तौर पर देखा जाना चाहिए. मैतई और सेना निरन्तर कुकी विद्रोहियों के निशाने पर है. अंतरराष्ट्रीय ड्रग रैकेट और पूर्वोत्तर राज्यों को भारत से अलग करने की मंशा रखने वाली विदेशी शक्तियाँ भी इसमें सक्रिय हैं. अत्याधुनिक हथियारों की आपूर्ति इसका संकेत है. अभी बांग्लादेश में जो कुछ हुआ उसे मणिपुर की पूर्वपीठिका कहा जा सकता है. ऐसे में न केवल राज्य सरकार को बल्कि केन्द्र सरकार को मणिपुर जनता की मदद से कुकी समुदाय के अवैध अप्रवासियों की चुनौतियों का एकजुट होकर सामना करना चाहिए. यह राज्य के साथ-साथ वहाँ के मूल नागरिकों के हित में है. यहाँ पर एनआरसी की अनिवार्यता महसूस हो रही है. सरकार इसे लागू करके सभी वास्तविक मणिपुर निवासियों को उनके अधिकार प्रदान करे. मतदाता सूची, दस्तावेजों का प्रमाणीकरण करके घुसपैठियों को चिन्हित करने का कार्य किया जाये. अवैध लोगों को बाहर करने का अभियान चलाया जाये. उग्रवादियों के रूप में चिन्हित कुकी सशस्त्र समूहों और संगठनों पर प्रतिबंध लगाया जाये. जिस तरह से पिछले कुछ समय से चीन और अमेरिका भारत के पड़ोसी देशों में सक्रिय हुए हैं; श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश के आंतरिक हालात जिस तरह के हुए उसे देखते हुए मणिपुर में चल रही हिंसा को महज दो समुदायों का संघर्ष समझना भारी भूल हो सकती है.  


15 अगस्त 2024

स्वतंत्रता का सिर्फ जश्न न मनाएँ अपनी जिम्मेवारी भी निभाएँ

आज़ादी का जश्न मनाने वाला एक और दिन हम सबके बीच उपस्थित है. देश में स्वाधीनता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस, इन दोनों दिनों में नागरिकों में, बच्चों-बड़ों में जबरदस्त उत्साह रहता है. आखिर इन दोनों दिनों में स्वतः ही गौरव की भावना की अनुभूति होती है. ऐसी अनुभूति के चलते सारा दिन उमंग में, उल्लास में गुजर जाता है. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाते हुए अक्सर मन में सवाल उठता है कि हम सब जितना प्रसन्न, जितने उल्लासित इन दो दिनों में रहते हैं उतना शेष दिनों में क्यों नहीं रहते हैं?

 

यह सवाल कतई आश्चर्यचकित करने वाला नहीं लगेगा क्योंकि ऐसा सवाल एक अकेले हमारे मन में नहीं उठता है बल्कि उन सभी नागरिकों के मन में उठता है जो किसी न किसी रूप में देश के विकास में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं. यदि पूरी निष्पक्षता से, बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करें, इन दो दिनों पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि इन दो दिनों के उल्लास के समाप्त होने के बाद अगले दिन से दिल-दिमाग तिकड़म में व्यस्त हो जाता है. भ्रष्टाचार करने के उपाय किये जाने लगते हैं, काम निकालने को रिश्वत देने-लेने की चर्चा की जाने लगती है, स्वार्थ-लिप्सा में लिप्त कदम उठाये जाने लगते हैं.

 



सोचिए एक पल को कि क्या देश का वास्तविक विकास इसी तरह से हो सकेगा? क्या दो दिनों में अपनी राष्ट्रभक्ति दिखाने से ही देश की वास्तविक आज़ादी का मंतव्य पूरा होता है? सच्चाई तो ये है कि अब हम सभी आज़ाद हैं और अपनी स्वतंत्रता का जश्न किसी एक दिन नहीं, किसी विशेष दिन नहीं बल्कि प्रत्येक दिन मनाया जाना चाहिए. आखिर हम सभी अपनी ही आज़ादी का, अपनी ही स्वतंत्रता का एहसास स्वयं नहीं करेंगे तो कैसे अपेक्षा करेंगे कि विदेशी हमारी स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे? इसके लिए सबसे पहले हम सभी को अपने-अपने दायित्वों, कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करने की आवश्यकता है. देश के विकास के लिए किसी दूसरे की तरफ ताकने के स्थान पर हम सबका प्रयास यही होना चाहिए कि स्वतः ही अपना सकारात्मक योगदान दे सकें. जब तक इस तरफ की भावना एक-एक नागरिक में नहीं होती है तो अपनी आज़ादी का हम सब सिर्फ जश्न ही मनाते रहेंगे, उसकी वास्तविकता का लाभ नहीं उठा सकेंगे.

 

04 अगस्त 2024

बांग्लादेश की हिंसा से भारतीय नागरिकों को सतर्क रहने की आवश्यकता

एक अपील या एक निवेदन सभी से.

 

सोशल मीडिया पर आप सब जितना समय देते हैं, बिलकुल दें, उसे कम न करें मगर अब अपने आसपास भी ध्यान देने की आवश्यकता है. बांग्लादेश के घटनाक्रम के बाद और भी सजग होने की आवश्यकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ के हालात के केन्द्र में आरक्षण या कहें कि कोटा सिस्टम है. एक ऐसा कोटा सिस्टम जो कतिपय राजनैतिक सोच के चलते, राष्ट्रवादी सोच को स्थापित करने की दृष्टि से उन परिवारों को प्रदान किया जा रहा था जो बांग्लादेश मुक्ति वाहिनीं से सम्बंधित थे.

 

वहाँ जिस कोटा सिस्टम के विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही की गई, यदि एक नजरिये से देखें तो वह कोटा वहाँ की राष्ट्रवादी सोच से सम्बंधित है, उस मुक्ति वाहिनी के परिजनों के लिए है जिन्होंने बांग्लादेश निर्माण में अपना साथ दिया. स्पष्ट है कि वे लोग ही उस कोटा के खिलाफ होंगे जो बांग्लादेश राष्ट्रवाद सोच के विरुद्ध होंगे. निश्चित ही इसके पीछे पाकिस्तानी समर्थकों का बहुत बड़ा हाथ होगा क्योंकि बांग्लादेश बनने का सबसे बड़ा कष्ट तो उसी को है. इस पूरे आन्दोलन को छात्र आन्दोलन का नाम लेकर न केवल उकसाया गया बल्कि उसे आक्रामक, हिंसात्मक रूप भी प्रदान किया गया. इसके पीछे स्पष्ट रूप से वे ताकतें दिखाई दे रही हैं जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भारत-विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहती हैं.

 



आपके इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर व्यस्त बने रहने के साथ-साथ सजग, सतर्क रहने की आवश्यकता इस कारण से है क्योंकि बांग्लादेश की तरह की भूमिका अपने देश में भी बनती नजर आ रही है. राष्ट्रवादी सोच का लगातार विरोध किया जा रहा है. पाकिस्तान, फिलिस्तीन के पक्ष में खुलेआम नारेबाजी करने वाले इसी देश में हैं. पाकिस्तान समर्थक यहाँ अपना काम स्लीपर सेल के रूप में पिछले कई वर्षों से करते आ रहे हैं, ऐसी खबरें हम सभी आये दिन पढ़ते-सुनते हैं. अब बस आप सब सजग रहिये. अपने आसपास के ऐसे तत्त्वों को पहचानिए.


28 जुलाई 2024

निशानेबाजी में पदक और हमारी ख़ुशी

कई बार कुछ खुशियाँ ऐसी होती हैं जो व्यक्तिगत रूप से खुद अपने से सम्बन्धित नहीं होती हैं मगर इसके बावजूद वे खुशियाँ अपने से जोड़ती हैं, प्रभावित करती हैं. इस तरह की खुशियों में एक तरह का अनदेखा सा बंधन होता है जो किसी न किसी रूप में बंधा तो होता है मगर सामाजिक रूप में नजर नहीं आता है. इस तरह के बंधन बहुत ही आंतरिक, अत्यंत ही आत्मीय होते हैं. इनमें भले ही सामने वाले से कोई रिश्ता न हो, भले ही उससे कोई सम्बन्ध न हो मगर कुछ ऐसा होता है जो प्रभावित करता है और उसकी खुशियों से खुद को जोड़ता है.

 



कुछ इसी तरह की ख़ुशी आज मिली जबकि खबर मिली कि पेरिस ओलम्पिक 2024 में भारत को अपना पहला पदक निशानेबाजी में मिला. यह पदक कांस्य के रूप में आया जिसे मनु भाकर ने दस मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में प्राप्त किया. यहाँ विशेष बात ये है कि ओलम्पिक के इतिहास में निशानेबाजी में किसी महिला द्वारा हासिल किया गया यह पहला पदक है.

 

इस जीत से ख़ुशी मिलना स्वाभाविक ही है क्योंकि ओलम्पिक के दूसरे ही दिन देश के नाम पहला पदक आया. हम लोग उस पीढ़ी से आते हैं, जिसने ओलम्पिक में अपने देश के खिलाड़ियों को बस खेलते ही देखा है. पदकों का सूखा ख़त्म होने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा था. इस कारण से ख़ुशी मिलने के अलावा इसलिए भी इस पदक से ख़ुशी मिली क्योंकि पाँच वर्ष पूर्व 2019 में हमने भी निशानेबाजी में प्रदेश स्तर की प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त करते हुए राष्ट्रीय स्पर्धा के लिए जगह बनाई थी. संयोग से यह स्पर्धा भी दस मीटर एयर राइफल की थी.

 

बहरहाल, कतिपय पारिवारिक कारणों से, कोरोना के कारण उसके बाद आगे आना नहीं हो सका किन्तु भारतीय निशानेबाजों की छोटी से छोटी जीत भी हमें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती है, ख़ुशी देती है. मनु को बधाई, शुभकामनायें; साथ ही सभी भारतीय खिलाड़ियों को भी शुभकामनाएँ कि देश को रोज ही कई-कई पदक प्रदान करवाते रहें.


07 अप्रैल 2024

सबसे छोटा देश सीलैंड

विश्व में एक तरफ भारत, रूस, चीन, अमेरिका आदि जैसे बड़े क्षेत्रफल वाले देश हैं, दूसरी तरफ कुछ देश ऐसे हैं जिनका क्षेत्रफल नाममात्र का है. अरबों नागरिकों की आबादी वाले देशों के सापेक्ष सुनने में ही कितना आश्चर्यजनक लगता है जबकि किसी देश की जनसंख्या मात्र 27 हो. ऐसा कोई कल्पना नहीं बल्कि नितांत सत्य है. इंग्लैंड के पास एक ऐसा ही देश है, जिसका नाम सीलैंड है. इसे माइक्रो नेशन के रूप में जाना जाता है. माइक्रो नेशन उन देशों को कहा जाता है जिनको अंतर्राष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली होती है. इसका अर्थ ये भी होता है कि इनको किसी देश का हिस्सा माना जाता है. इंग्लैंड के सफोल्क बीच से लगभग 10 किलामीटर की दूरी पर यही माइक्रो नेशन सीलैंड मौजूद है. इसकी जनसंख्या जैसा कि ऊपर बताया मात्र 27 है वहीं इसका क्षेत्रफल मात्र 250 मीटर है. 



द्वितीय विश्व युद्ध के समय इंग्लैंड द्वारा बनाये गए समुद्री किले पर इस देश को बनाया गया. वर्तमान में यह समुद्री किला खण्डहर हो चुका है और इसको ब्रिटेन द्वारा खाली किया जा चुका है. सीलैंड (माइक्रो नेशन) पर अलग-अलग लोगों का कब्जा रहा है. अक्टूबर 2012 को रॉय बेट्स नामक व्यक्ति ने खुद को सीलैंड का प्रिंस घोषित कर दिया. इसकी मृत्यु के बाद उनके बेटे माइकल का सीलैंड पर शासन है. इसका क्षेत्रफल मात्र 250 मीटर होने और जिस किले पर यह बसा हुआ है उसके लगभग खंडहर होने की हालत में पहुँचने के कारण यहाँ के लोगों के पास जीने के लिए कोई संसाधन नहीं है. दूसरे देशों को इसके बारे में जानकारी होने पर यहाँ के लोगों को अनुदान और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होने लगी. 


11 दिसंबर 2023

देश का अभिन्न अंग है जम्मू-कश्मीर

अनुच्छेद 370 को हटाने के सम्बन्ध में पाँच अगस्त 2019 की तरह ही 11 दिसम्बर 2023 का दिन ऐतिहासिक माना जायेगा. चार वर्ष पूर्व पाँच अगस्त को केन्द्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 और 35-ए को हटाने का साहसिक निर्णय लिया गया था. देश में एक विभाजक रेखा खींचने वाले अनुच्छेद के हटाये जाने के बाद भी उसकी बहाली को लेकर दिवास्वप्न देख रहे तमाम नेताओं द्वारा जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को लगातार बरगलाया जा रहा था. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णय के द्वारा ऐसी विभाजनकारी मानसिकता रखने वालों को आइना दिखाया गया है. इस निर्णय से सम्पूर्ण घाटी में और वहाँ के लोगों को झूठी तसल्ली देने वाले नेताओं तक स्पष्ट सन्देश पहुँच गया है कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था, जिसे हटाने का निर्णय विधिसम्मत था. पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की. सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. इसकी कोई आंतरिक सम्प्रभुता नहीं है. 




सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से देश की अखंडता, सम्प्रभुता को वास्तविक आयाम मिला है. इससे विरोधियों द्वारा समाज में फैलाया जा रहा यह दुष्प्रचार गलत साबित हुआ कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने का निर्णय विघटनकारी है. इस निर्णय ने विगत सत्तर वर्षों के एक ऐसे काँटे को सदा के लिए देश की देह से अलग कर दिया है जो सम्पूर्ण देश के लिए नासूर बना हुआ था. देश की आज़ादी के समय काल-परिस्थितियों के वशीभूत कुछ इस तरह का घटनाक्रम सामने आया कि राष्ट्रीय हितों को दरकिनार करके तुष्टिकरण को प्राथमिकता दी गई. तत्कालीन परिस्थितियों के हाथों में यदि मजबूरीवश अनुच्छेद 370 को लागू करना भी पड़ा था तो भी यदि उस अस्थायी प्रावधान को समय रहते समाप्त कर दिया जाता तो अपने स्वर्गिक सौन्दर्य के लिए विख्यात जम्म-कश्मीर को नारकीय यातनाओं को न सहना पड़ता.


अनुच्छेद 370 के द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार प्रदान किये गए थे. यह भारतीय संविधान का एक अस्थायी प्रावधान है. इस अस्थायी प्रावधान के द्वारा ऐसी व्यवस्था की गई थी कि जम्मू-कश्मीर में केन्द्र सरकार को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के क्षेत्र में कानून बनाने का अधिकार होगा. इसके अलावा किसी अन्य क्षेत्र, किसी अन्य विषय के बारे में कानून बनाने के बाद वह जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण देश पर लागू होता था. उस कानून को जम्मू–कश्मीर में लागू करने के लिए केन्द्र सरकार को जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार से अनुमोदन लेना पड़ता था. इसी तरह यहाँ के निवासियों को दोहरी नागरिकता (भारतीय एवं कश्मीरी) भी प्राप्त थी. यहाँ की महिला से विवाह करने वाला पाकिस्तानी नागरिक यदि कश्मीर में आकर रहने लगता है तो उसको स्वतः ही भारत की नागरिकता मिल जाती है. जम्मू-कश्मीर का अपना राष्ट्रीय ध्वज होता था और तो और यहाँ का मुख्यमंत्री वही नागरिक बन सकता था जो यहाँ का मूल निवासी होता था. ये स्थितियाँ एक देश में ही दो देश होने जैसी स्थिति का आभास कराती रही हैं. अनुच्छेद 370 की तरह 35ए के द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त था. इसके द्वारा यहाँ के नागरिकों को कुछ विशेष अधिकार प्रदान किये गए थे. इसे 1954 में पारित किया गया था.


जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान होने के कारण अभी तक एक देश में दो संविधान चलते आये हैं. अनुच्छेद 370 और 35ए के समाप्त किये जाने के बाद जम्मू-कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग बना. इसके बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग राज्यों के रूप में मान्यता प्रदान की गई. निश्चित ही इससे यहाँ निवेश के रास्ते खुले और यहाँ के युवकों को भी रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए. केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार अभी तक जम्मू-कश्मीर के बाहर के 34 लोगों ने केन्द्रशासित प्रदेश में सम्पत्ति खरीदी है. वहीं जम्मू-कश्मीर में सऊदी अरब की तीन कम्पनियाँ भारी निवेश कर रही हैं. इसके अलावा वहाँ 890 केन्द्रीय कानूनों को लागू किया गया है. इससे वहाँ की कानून व्यवस्था और कई नियम देश के अन्य राज्यों की तरह हो गए हैं. केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को केन्द्रशासित राज्य का दर्जा दिए जाने के बाद यहाँ पर विकास के लिए अनेक योजनाओं को लागू किया. सरकार की ओर से बजट आवंटन में यहाँ का विशेष ध्यान रखा गया है. लगभग 28400 करोड़ रुपये औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए बजट में उपलब्ध कराये गये. इसके साथ ही 2020-21 में उद्योगों के लिए 29030 हजार कैनाल लैंड बैंक बनाए गए हैं. अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद सरकार के द्वारा जम्मू-कश्मीर में ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट भी करवाई गई थी. इसमें 13,732 करोड़ रुपये के एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे.


ये स्थितियाँ निश्चित ही अब और तेजी से विकास की राह पकड़ेंगी जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए वर्ष 2024 में जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाने और जल्द से जल्द इसे स्वतंत्र राज्य घोषित करने का निर्देश दिया है. निश्चित ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने एक भारत, श्रेष्ठ भारत की अवधारणा को मजबूत ही किया है. देखा जाए तो सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने एक पुराने और जटिल विवाद को सुलझाने का मार्ग प्रशस्त किया है. अब जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को समग्र देश के साथ आगे बढ़ने को एक मजबूत रास्ता मिला है. उम्मीद यही की जा सकती है कि अब पूर्वाग्रह, विवाद को त्यागते हुए सभी पक्ष राज्य को शांतिपरक, सर्वश्रेष्ठ बनाने की दिशा में अपना पूरा योगदान देंगे. 



 

16 अगस्त 2022

आज़ादी का बदलाव भरा सफ़र

जिस देश का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है, उसी देश की महज 75 वर्ष की यात्रा का जश्न बड़े जोर-शोर से मनाया जाना अपने आपमें अजब लगता है. इसके बाद भी इस अजब से लगने वाली यात्रा की कहानी को याद रखना भी आवश्यक है. ऐसा इसलिए क्योंकि गौरवशाली परम्परा, संस्कृति, सभ्यता होने के बाद भी देश सैकड़ों वर्षों तक गुलामी में रहने का कलंक आज तक ढो रहा है. वर्तमान समय वाकई गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम सारी चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे ही बढ़ रही है.

 

वर्तमान में हम सभी आज़ादी के अमृत महोत्सव आयोजन के द्वारा अपनी आज़ादी के 75 वर्षों की यात्रा का स्मरण कर रहे हैं. वर्तमान के सापेक्ष जब इसी कालखंड पर दृष्टि डालते हैं तो बहुत सारा सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे तमाम लोगों के विचारों को जानने-सुनने के बाद सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने पिछले 75 वर्षों में कुछ पाया नहीं है? क्या देश ने इस यात्रा के किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं की है? क्या इन 75 वर्षों में हमने जो पाया है वह अंग्रेजी शासन की अपेक्षा कमतर है?



 

विगत 75 वर्षों की उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि समग्र रूप में देखा जाये तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. जिस समय देश आज़ाद हुआ, उस समय देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी और इसकी हिस्सेदारी 53.7 प्रतिशत थी. आज यह महज 18.8 प्रतिशत रह गई हो मगर इसके सापेक्ष अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी 26.9 प्रतिशत, सर्विस सेक्टर का भाग 54.3 प्रतिशत है.

 

शिक्षा किसी भी समाज के विकास हेतु अत्यावश्यक अंग है. इसके बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. आज यदि मेडिकल कॉलेज की संख्या निकाली जाये तो पूरे देश में 612 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 322 सरकारी और 290 निजी हैं. इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. अनेक नए-नए क्षेत्रों का उदय हुआ. तकनीक के मामले में जबरदस्त बदलाव देखने को मिले. किसी एक समय में दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं. हमारे समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं.

 

कतिपय राजनैतिक मूल्यों की गिरावट के कारण उनको अंग्रेजी शासन ज्यादा सुखद लगता है मगर वे भूल जाते हैं कि ये हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति है कि यहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. संवैधानिक खूबसूरती ये है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत 75 वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.

 




 

14 अगस्त 2022

तिरंगे को सच्ची सलामी कब?

स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था. सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी. पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी. स्वभाव में अभिमान था. स्वर में प्रसन्नता थी. सिर गर्व से ऊँचा उठा था. समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा. सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा. गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा. आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही. यह एहसास साल दर साल कम होता रहा. सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा. आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई.


आज समूचा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. हर देशवासी आज हर घर तिरंगा के माध्यम से अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान और आदर से देख रहा है. इसके बाद भी कई बार लगता है कि कुछ न कुछ कमी सी हम सबके आसपास है. पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे. अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है. पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं. सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है. हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है.


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे. इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की आजादी. हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर. राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है. ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक है. ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं.




इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है. कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है. हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं. हमारी गुरुकुल परम्परा एकदम से विलुप्त ही हो गई है. गुरु-शिष्य के संबंधों में भी लगातार गिरावट देखने को मिलने लगी. ये किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए.


अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं. हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है. अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं की, दुष्कर्म की खबरें आ रही हैं. हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये. बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं. मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं. हाथों में औजार थामे नजर आते . अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये.


देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं. मॉल, जगमगाते शहर, मैट्रो, मल्टीस्टोरीज, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं. जब तक एक भी बच्चा भूखा है, एक भी बच्चा अशिक्षित है, एक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं. हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है. जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगा, जब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगे, जब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगा, जब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगे, जब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगा, जब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगी, जब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगा, जब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं.


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या का? इन सबका हल है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा. आपसी विभेद को समाप्त करना होगा. वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है. याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं. यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा.

 




 

08 अगस्त 2022

बांग्लादेश के संकट पर भारत का रुख

वर्तमान दौर भारत के पड़ोसी देशों के लिए सुखद नहीं है. श्रीलंका का आर्थिक और राजनैतिक संकट कुछ दिनों पहले ही वैश्विक पटल पर उभर कर सामने आया था. पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है. अब बांग्लादेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति सबके सामने आ रही है. इन तीनों पड़ोसी देशों में जनसामान्य को रोजमर्रा की वस्तुओं का मिलना दुष्कर होता जा रहा है. मँहगाई का स्तर बढ़ता जा रहा है. विदेशी मुद्रा कोष में लगातार गिरावट आती जा रही है. इन सभी देशों की मुद्रा की कीमत भी डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रही है. बांग्लादेश सरकार ने अपने निर्माण के बाद पहली बार तेल कीमतों में अतिशय वृद्धि करके डाँवाडोल होती अपनी आर्थिक स्थिति से निपटने को एक अजब सा कदम उठाया है.   


बांग्लादेश की सरकार भले कहे कि उसके देश में हालात सामान्य हैं किन्तु यह अंतिम सत्य नहीं है. तेल कीमतों के बढाए जाने के बाद जिस तरह से नागरिकों ने सड़क पर उतर कर विरोध, विद्रोह किया है वह वहाँ के हालात बताने को पर्याप्त है. बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति के खराब होने की एक बड़ी वजह वहाँ आयात के बढ़ना और निर्यात का घटना रहा है. आयात बढ़ने के का सीधा असर वहाँ के खजाने पर हुआ. एक रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2021 से लेकर मई 2022 के बीच 81.5 अरब डॉलर का आयात किया गया. पिछले साल की तुलना में यह 39 प्रतिशत अधिक है. जाहिर सी बात है कि ऐसा होने के कारण वहाँ के मुद्रा कोष पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना ही था. बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 2021 जुलाई तक 45 अरब डॉलर था, जो जुलाई 2022 को यह घटकर 39 अरब डॉलर रह गया. अनुमान है कि इस स्थिति में बांग्लादेश के पास पाँच महीने आयात करने की क्षमता बची है. इन स्थितियों से निपटने के लिए बांग्लादेश के वित्त मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 4.5 अरब डॉलर का कर्ज माँगा है. इसका उद्देश्य एक प्रकार से देश के विदेशी मुद्रा भंडार को कुछ ताकत प्रदान करना है.




बांग्लादेश के ऐसे आर्थिक हालातों पर प्रश्न अवश्य ही उठता है कि भारत का नजरिया क्या होना चाहिए? भारत उसकी सहायता के लिए क्या कदम उठाता है यह एक राजनयिक बिंदु है मगर भारत को वहाँ की बिगड़ती स्थिति से मुँह फेर कर नहीं बैठना चाहिए. बांग्लादेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति भारत के लिए भी चिंता का कारण होनी चाहिए. इसके पीछे का कारण बांग्लादेश का पड़ोसी होना मात्र नहीं है वरन अन्य दूसरी स्थितियाँ भी हैं. बांग्लादेश वर्ष 1971 में बनने के साथ ही भारत का पड़ोसी देश कहलाया अन्यथा की स्थिति में वह पहले अविभाज्य भारत का ही हिस्सा था. वहाँ की संस्कृति, वातावरण आदि में बहुत हद तक समानता देखने को मिलती है. अविभाजित भारत का भाग होने के कारण दोनों तरफ के बहुतेरे नागरिकों में दो देशों जैसा भाव का एहसास नहीं जन्मा है. रोजगार की तलाश में आज भी बांग्लादेश से हजारों की संख्या में नागरिक भारत में घुसपैठ करते हैं. अवैध तरीके से होने वाली घुसपैठ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में कटुता का कारण भी बनी है.


बांग्लादेश की तरफ से होने वाली अवैध घुसपैठ के चलते भारत में तनाव बना रहता है. इस घुसपैठ ने न केवल भारतीय संसाधनों, आर्थिक स्थितियों पर बोझ डाला है बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी ध्वस्त किया है. बांग्लादेशी घुसपैठियों के यहाँ अनेक तरह के अपराधों में लिप्त होने के प्रमाण मिले हैं. ऐसे में यदि बांग्लादेश का आर्थिक संकट लम्बा चलता है, वहाँ के नागरिकों में इसी तरह विरोध की मानसिकता बनी रही, रोजगार के अवसरों में कमी आती रही तो निश्चित ही वहाँ से घुसपैठ करने वालों की संख्या बढ़ेगी. रोजगार की तलाश में हजारों की संख्या में नागरिकों का भारत में आना होगा. यह स्थिति कतई सुखद नहीं होगी. इससे न केवल दोनों देशों के राजनयिक, कूटनीतिक संबंधों पर नकारात्मक असर होगा, भारत के सामाजिक ढाँचे और आर्थिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा.


इसके अलावा दोनों देशों की सीमा अत्यंत विस्तीर्ण है, जहाँ की भौगौलिक स्थिति के कारण पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था कर पाना दुष्कर होता है. इसका लाभ उठाते हुए नकली नोटों, हथियारों, नशीले पदार्थों आदि की तस्करी की घटनाएँ नियमित रूप से अंजाम दी जाती हैं. बांग्लादेश का आर्थिक संकट इस तरह की अवैध गतिविधियों को और बढ़ावा देगा. जाहिर सी बात है कि बांग्लादेश में वस्तुओं की कमी को पूरा करने के लिए भारत से तस्करी करके, अवैध रूप से वस्तुओं को बांग्लादेश पहुँचाया जायेगा. निश्चित ही यह भारत के लिए आर्थिक समस्या ही उत्पन्न करेगा. बांग्लादेश आर्थिक संकट के दौरान भारत की तरफ से उसे खाद्यान्न सहायता प्रदान की गई है. अन्य आवश्यक संसाधनों की सहायता प्रदान करने की दृष्टि से उच्चस्तरीय कदम उठाये जा रहे हैं.


चूँकि बांग्लादेश कपड़ा निर्यातकों में अपना एक विशेष स्थान रखता है. वैश्विक बाजार में यहाँ के कपड़े की जबरदस्त माँग रहती है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यहाँ के कपड़ा निर्यात की माँग पर नकारात्मक असर पड़ा. बिगड़ते आर्थिक हालातों में खाने-पीने की चीजों और ईंधन के बढ़े दाम से नागरिकों को परेशानी पैदा हुई. नागरिकों के सड़कों पर उतरने से वहाँ भी श्रीलंका जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में बांग्लादेश चीन के कर्ज जाल में फँस जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. चीन पहले भी चटगाँव को लेकर बहुत ज्यादा रुचि दिखाता रहा है, ऐसे में उसके द्वारा आर्थिक सहायता की बड़ी पहल करना कोई नई बात नहीं होगी. यदि बांग्लादेश चीन के आर्थिक चंगुल में फँसता है तो यह भारत के दृष्टिकोण से भी उचित नहीं होगा. इसलिए भारत को बांग्लादेश के आर्थिक संकट को जल्द से जल्द दूर करने हेतु यथासंभव कदम उठाने की आवश्यकता है.


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