03 जुलाई 2026

आस्था और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर

श्रीराम मंदिर की चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से जिसकी भी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में आस्था में कमी आई है वे सब हमारी नजर में व्यक्तिगत विचार में चोर ही हैं, संकुचित मानसिकता के हैं. असल में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से वे दिल से कभी जुड़े ही नहीं थे. यदि एक चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से मंदिर में आस्था कम अथवा न रखने वालों के खुद के घर में ही कोई भाई-बेटा-बहिन-बेटी चोर-नशेड़ी निकल जाये तो ऐसे लोग क्या करेंगे?

 

पाँच-दस व्यक्तियों (जो अपने ही अम्मा-पिताजी की औलाद होते हैं) में से किसी एक के चोर निकल आने पर क्या ऐसे लोग उस घर को छोड़ देंगे? क्या परिवार के शेष व्यक्तियों पर भी संदेह कर लेंगे? घर के मालिक (दादा-दादी, बाप-अम्मा) को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे? असल में यहाँ (श्रीराम मंदिर में) बात घर की नहीं है न, इसलिए सबको ज्ञान आ रहा है. अपने घर के नशेबाज, जुआरी, हत्यारे व्यक्ति में भी ऐसे लोगों को निर्दोष व्यक्ति ही नजर आता है. ऐसे दोगले लोगों के कारण ही अब वे लोग उछल रहे हैं जिन्होंने कभी भी श्रीराम के अस्तित्व को नहीं स्वीकारा, कभी मंदिर के पक्ष में कोई बात नहीं की.


30 जून 2026

व्यक्तिगत स्वतंत्रता या नैतिक पतन

वर्तमान में भारतीय समाज एक तरह के वैचारिक और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि इस पर विचार करने की आवश्यकता है. आधुनिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्रगतिशीलता आदि का नाम लेकर वर्तमान समाज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहाँ नैतिक मूल्यों का पतन ही दिखता है. हास्य के नाम पर, मनोरंजन के रूप में अमर्यादित आचरण को दर्शाया जा रहा है. किसी कॉमेडी शो में एक युवक द्वारा अपनी महिला मित्र को बिरयानी खिलाने के बदले कीमत वसूलने की बात करना, किसी अन्य मंच से एक डॉक्टर युवती द्वारा शवों के साथ संवेदनहीन मजाक करने की स्वीकारोक्ति, किसी और कार्यक्रम में हास्य के नाम पर अपने माता-पिता के अंतरंग पलों में शामिल होने की बात कहना विवेकशून्यता को दर्शाता है. यह स्थिति इसलिए और भी भयावह लगती है क्योंकि इस प्रकार की फूहड़ता, अश्लीलता सार्वजनिक रूप से परोसी जा रही है और समाज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग खुलकर तालियाँ बजाते हुए खुद को कूल, प्रगतिशील साबित कर रहा है.

 

देखा जाये तो इस तरह की नैतिक गिरावट केवल मनोरंजन के मंचों तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी प्रवेश कर चुकी है. हाल ही में किशोरों और युवाओं के उजागर हुए चैट इसकी अलग ही कहानी कहते हैं. इनमें सहपाठी लड़कियों और महिलाओं के बारे में जिस स्तर की अश्लील, अमर्यादित बातें की गई हैं, उन्हें कोई भी सभ्य व्यक्ति अकेले में पढ़ते हुए भी शर्म से पानी-पानी हो जाए. यहाँ चिंताजनक यह है कि इस विकृत संवाद में केवल लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियाँ भी समान रूप से शामिल हैं. यह इस बात का संकेत है कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं से आत्मनियंत्रण, मर्यादा, शालीनता को पूरी तरह से छीन लिया है. इसी का दुष्परिणाम है कि इंटरनेट पर आए दिन निजी पलों के, अन्तरंग सम्बन्धों के वीडियो लीक तो होते ही हैं, उनको देखने की चाह रखने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी होती है. यह समाज में बढ़ती वासना, अश्लीलता का परिचायक है.

 

समाज में फैलती जा रही इस विभीषिका ने केवल युवा-वर्ग को ही अपनी गिरफ्त्त में नहीं लिया है बल्कि इसने  पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. पारिवारिक रिश्ते इसी विकृत मानसिकता की भेंट चढ़ रहे हैं. रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करने वाली घटनाएँ अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं. एक युवक का अपनी ही सास से विवाह करना, किसी युवक द्वारा अपनी भाभी को पाने की हवस में अपने ही मासूम भतीजे की बेरहमी से हत्या कर देना, विवाहेतर सम्बन्धों की खुलेआम स्वीकार्यता और अपने जीवन-साथी की हत्या करवा देना दिखाता है कि वासना ने इंसान को पथभ्रष्ट कर दिया है. रिश्तों की इस संवेदनहीनता का वीभत्स रूप तब दिखता है जब एक माँ अपने शारीरिक सम्बन्धों में बाधक बनते अपने ही बच्चे के हाथ-पैर तोड़े जाने और उसकी जान लिए जाने को मूकदर्शक बनकर देखती रहती है.

 

सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि आखिर समाज इस स्थिति पर पहुँचा कैसे? यह मानसिक पतन, सामाजिक विकृति एकाएक हो नहीं ही आई होगी. आधुनिकता के झूठे मुखौटे, सूडो-फेमिनिज्म, अत्यधिक व्यक्तिवाद, पारम्परिक परिवार व्यवस्था का अंधविरोध, विवाह संस्था के ऊपर दैहिक सम्बन्धों को वरीयता, खुलेपन की आड़ में यौन-सम्बन्धों को अपनाने आदि ने इस पतन की नींव रखी है. व्यक्ति की असीमित, अनियंत्रित स्वतंत्रता ने सामाजिक ढाँचे को ही खोखला कर दिया है. रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, लिव-इन, फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स आदि ने मूलतः व्याभिचार, अनैतिकता, अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दे दी है. इससे धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था बिखरने लगी और नई पीढ़ी संस्कार, नैतिकता, मर्यादा आदि से मुक्त होने लगी. इस भटकाव का असर यह हुआ है कि आज के युवाओं को यह अहसास ही नहीं कि वे कुछ गलत कर रहे हैं. एक साथ कई जगह सम्बन्ध बनाना, बार-बार साथी बदलना, किसी भी एक व्यक्ति या संस्था के प्रति वफादार न रहना, मर्यादा, शालीनता की सीमाओं को पार करना अब उनकी नजर में कोई गलती नहीं है. इसके उलट उन्होंने संस्कार, मर्यादा, शालीनता आदि को ही मज़ाक बना दिया है; इनका पालन करने वाले को पिछड़ा, दकियानूसी बताया है. समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने इस नकारात्मकता का विरोध करने के बजाय चुप्पी साधे रखी है परिणामतः सार्वजनिक मंचों से फूहड़ता, अश्लीलता का सहज स्वरूप हमारे घर-परिवारों तक आ चुका है.

 

हम सभी को यह समझना होगा कि उच्छ्रंखल, अनुशासनहीन, अमर्यादित आचरण का परिणाम सुखद नहीं होने वाला है. हमारे देश की सामाजिक संरचना पश्चिमी देशों जैसी नहीं है बल्कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बिना आत्म-अनुशासन के, बिना पारिवारिक सहयोग के, बिना सुदृढ़ नैतिक मूल्यों के समाज को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण रख पाना पूरी तरह संभव नहीं है. पश्चिमी सभ्यताओं की नक़ल के नाम पर हमारे समाज में फूहड़ता ही फैलती जा रही है, उन देशों जैसा अनुशासन, उनके जैसी जीवन-शैली, उनके जैसा सिविक सेंस हमारे समाज में कदाचित देखने को नहीं मिलता है. सोचने वाली बात है कि जब समाज से शर्म, मर्यादा, शालीनता, संस्कार, सम्मान आदि पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे तो समाज में अपराध, मानसिक अवसाद, अविश्वास, अश्लीलता, फूहड़ता का ही साम्राज्य दिखाई देगा. यदि हम आज भी बिना सँभले आधुनिकता के नाम पर ऐसे ही आत्मघाती मार्ग पर चलते रहे तो आने वाले समय में हमें सामाजिक और मानवीय विनाश का सामना करना पड़ेगा, यह समय जागने का, अपनी जड़ों की ओर लौटने का, मर्यादाओं को पुनः स्थापित करने का है.


27 जून 2026

भाजपा का कमजोर पक्ष

भाजपा के संदर्भ में हम एक बात बहुत शुरुआती दौर से कहते आए हैं कि इनके पास ऐसी टीम का घनघोर अभाव है जो भाजपा के ख़िलाफ़ फैलाई जाने वाली अफ़वाहों, इसके विरुद्ध सेट किए जाने वाले नैरेटिव आदि को समाप्त कर सकें. उनके बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकें. ऐसा एक-बार नहीं कई बार हुआ और हर बार भाजपा को बैकफुट पर आते देखा गया. ऐसा ही एक षड्यंत्र विरोधियों द्वारा फिर रचा गया, फिर एक अफवाह फैलाई गई श्रीराम मंदिर में चढ़ावा-दान की चोरी को लेकर. दान की चोरी को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई और चढ़ावा चोरी के सम्बन्ध में आरोपितों को जेल. बावजूद इसके विरोधियों द्वारा अपना षड्यंत्र चालू है.

 

ये ध्यान रखना होगा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ने इसके विरोधियों की प्रतिष्ठा पर चोट की है; मुस्लिम आक्रांताओं के उस अहं को धूल चटाई है जिसके दम पर वे हिन्दू आस्थाओं पर कब्जा किए रहे. इन लोगों को फूटी आँख नहीं सुहा रहा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर वैश्विक स्तर पर न केवल आस्था का बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का केन्द्र बन गया. चढ़ावा की चोरी निश्चित रूप से मानवीय स्वभाव-जनित सोच के रूप में सामने आई है साथ ही इसमें विरोधी साजिश की भी आशंका है. जाँच चले, पूरी गम्भीरता से चले और बड़े से बड़ा दोषी भी न छूटे. इसके साथ ही विरोधियों की अफवाहों से, षड्यंत्र से बचने की आवश्यकता है.

 

मंदिर को गिराकर बने ढाँचे को मिटाकर मंदिर तो पुनः बना लिया गया है किंतु आस्था-प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने पर उसे बनाया जाना मुश्किल है.


25 जून 2026

श्रीराम मंदिर के प्रति आस्था का सवाल

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान और चढ़ावे की चोरी सम्बन्धी जो मामला सामने आया है, उसे लेकर उन श्रद्धालुओं को, उन हिन्दुओं को नैराश्य भाव के रसातल में जाने से ख़ुद को बचाना होगा, जो श्रीराम के प्रति, जन्मभूमि मंदिर के प्रति गहरी आस्था रखते हैं. गम्भीरता से विचार करियेगा, कालखण्ड, परिस्थिति के बदलते ही मौकापरस्त लोग, स्वार्थी लोग तत्काल बदल जाते हैं. ऐसे में उनका बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जिनके हाथों में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था सौंपी गई. निश्चित ही उन सभी लोगों के लिए ये मामला कष्टप्रद है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष किया था, कष्ट सहे थे, अपना सर्वस्व न्योछावर किया था लेकिन उनको धैर्य नहीं छोड़ना है, संयम नहीं खोना है, आस्था से विलग नहीं होना है.

 

ये समय, ये मामला भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन जैसा प्रतीत हो रहा है. लाखों नौजवानों ने निस्वार्थ भाव से आज़ादी के लिए संघर्ष किया; हजारों परिवारों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया; जान की परवाह किए बिना असंख्य लोग मौत को गले लगा गए और हमें आज़ादी दे गए. इसके बाद हुआ क्या? कुछ विशेष लोग सत्ता पर बैठे; कुछ ख़ास लोगों के हाथ में अधिकार आए; कुछ लोगों को ताक़त मिली और फिर शुरू हुआ भ्रष्टाचार का खेल. आज़ादी के बाद मिली सत्ता ऐसे लोगों के लिए राजशाही का माध्यम बनी; धन-वैभव संकलित करने का साधन बनी; पीढ़ियों के लिए लाभ की विषय-वस्तु बनी. इन लोगों ने युवाओं के संघर्ष को भुला दिया; अंग्रेजों से लड़ने वालों को विस्मृत कर दिया. ऐसा ही कुछ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मामले में हो रहा है.

 

ध्यान रखो, भले लोगों ने राजनीति से दूरी बनाई तो अपराधी, बाहुबली इसमें घुसकर सरकार चलाने लगे. ऐसे ही यदि निस्वार्थ आस्थवान लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से दूर हुए तो यहाँ भी भ्रष्टाचारी, म्लेच्छ सोच के लोग स्थापित हो जाएँगे. जैसे आज देश की हालत के लिए रोना रोया जाता है, कल को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए रोया जाएगा.


22 जून 2026

बच्चों के जीवन से खिलवाड़ बंद हो

लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर की आगजनी की घटना में एक दर्जन से अधिक बच्चों की असमय मृत्यु हो गई. इस घटना से भले ही एकबारगी व्यवस्था का लचर होना सामने आया हो मगर हम अभिभावकों का भी असंवेदित होना सामने आया है. ये सच है और ऐसा सच है जो बहुत ही कड़वा है. असल में अब ऐसा माहौल बनता  जा रहा है या कहें कि हम सबकी आदत हो गई है कि किसी भी दुर्घटना के लिए सीधे-सीधे शासन-प्रशासन को जिम्मेदार बताकर हम स्वयं दोषी होने के पाप से मुक्त होने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसी हर दुर्घटना के बाद दोषियों को चिन्हित किया जाने लगता है; सम्बंधित को गैर-कानूनी बताया जाने लगता है; अधिकारियों की अक्षमता की पहचान की जाने लगती है मगर आगे के लिए हम कोई सबक नहीं लेते हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सभी ने यह मान लिया है कि समाज में होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ और सिर्फ तंत्र ही दोषी है, व्यवस्था ही जिम्मेदार है. बच्चों से सम्बंधित किसी भी दुर्घटना के बाद भी अभिभावकों में किसी भी तरह की सजगता उपजती नहीं दिखती है, ऐसा क्यों?   

 

यदि इसी आगजनी की बात करें तो अभिभावकों ने अपने ही बच्चों को वहाँ प्रवेश दिलाया था. वे किसी दूसरे ग्रह से आये बच्चों को लेकर वहाँ नहीं गए थे, ऐसे में क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि सम्बंधित संस्थान की स्थिति का आकलन कर लेते? महत्त्वाकांक्षा की आड़ में हमने अपनी ही बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है. उनके उज्जवल भविष्य बनाने के लिए कोचिंग सेंटर्स को एकमात्र उपाय मानते हुए हम सभी एक तरह की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं. अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम रकम चुकाना ही उनका कर्तव्य बन गया है. कोचिंग में प्रवेश के नाम पर बच्चों को वहाँ भेजना भी एकमात्र उद्देश्य रह गया है. एकबारगी भी संभवतः किसी अभिभावक द्वारा कोचिंग संचालकों से वहाँ के सुरक्षा मानकों को लेकर कोई सवाल नहीं किया जाता है. कोचिंग में सुरक्षा सम्बन्धी क्या उपाय किये गए हैं, इस बारे में भी कोई पूछताछ नहीं करने की मानसिकता बनी हुई है. दिमाग में एक विचार गहराई से बिठा लिया गया है कि कोचिंग संचालक से ज्यादा सवाल-जवाब उनके बच्चे को वहाँ से बाहर का रास्ता दिखा देगा. ऐसी सोच के चलते लोग अकारण ही बच्चों को असुरक्षित माहौल में धकेल देते हैं.

 


आज जिस तरह का माहौल चारों तरफ दिखता है
, उसमें बच्चों के घर से बाहर निकलते ही हम अभिभावकों के मन में तमाम तरह की अनिश्चिन्ताओं, आशंकाओं का बनना शुरू हो जाता है. आये दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दुर्घटनाओं का होना देख भी रहे हैं. ऐसे में क्या अभिभावकों की कोई जिम्मेदारी नहीं? कोचिंग सेंटर में, किसी संस्था में प्रवेश करवा देना, मोटी फीस जमा कर देना, बच्चों के आवागमन के लिए स्कूटी, गाड़ी आदि खरीदवा देना आदि से कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती है. यह समझना चाहिए कि बच्चे आपके ही हैं, कहीं किसी पेड़ से तोड़कर नहीं लाये हैं, कहीं किसी दूसरे ग्रह से नहीं उतरे हैं, तब उनके प्रति, उनकी सुरक्षा के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों? कुछ ऐसा ही बच्चों की किसी भी परीक्षा के लिए देरी को लेकर भी है. यदि अभिभावकों को लगता है कि सम्बंधित परीक्षा उनके बच्चे के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, उसके कैरियर के लिए महत्त्वपूर्ण है तो समय का ध्यान करके निकलना चाहिए.

 

शासन-प्रशासन को, व्यवस्था को, तंत्र को सुधरना नहीं है; हम-आपके हाथ में नहीं है कि उसे सुधार सकें तो कम से कम खुद ही सुधर जाएँ. अपनी हठधर्मिता में, शासन-व्यवस्था को दोषी ठहराने की मानसिकता में कम से कम अपने बच्चों की ज़िन्दगी से, उनके भविष्य से आप लोग ही, अभिभावक लोग ही खिलवाड़ करना बंद कर दीजिये. लखनऊ कोचिंग की आज की दुर्घटना और इससे पहले भी हुई अनेकानेक दुर्घटनाओं से हम सबको ही सबक सीखने की आवश्यकता है. इन दुर्घटनाओं के बाद कम से कम हम लोग ही जागें क्योंकि तंत्र तो फिर सो जायेगा. अपने बच्चों को न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से मजबूत बनायें. विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखने की, संयम से उससे निपटने की राह बनाने की तरकीब सिखाएँ. असामान्य स्थिति में न केवल स्वयं को बचाने की बल्कि अपने साथियों को भी निकालने की कला सिखानी होगी. समय बहुत ही निरंकुश है और उसकी आपदाओं से बचने का रास्ता हमें ही बनाना होगा, अपने बच्चों को सिखाना होगा.

 

ऐसी किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ व्यवस्था को दोषी बता देना कहीं न कहीं हम लोगों का अपने आपको दोष-मुक्त करने जैसा है. यह घटना कोई पहली घटना नहीं है, इससे पूर्व भी अनेक घटनाएँ हो चुकी हैं, जिनमें हमारे नौनिहालों ने असमय मौत को गले लगा लिया. कम से कम अब तो हम लोगों को जागना होगा. प्रशासन के बजाय, व्यवस्था के बजाय हम लोगों को ही सजग-सचेत होना पड़ेगा. तंत्र तो अपनी खाना-पूरी करके फिर से अपनी उसी चाल में, उसी ढर्रे पर लग जायेगा मगर हम लोगों को अपने बच्चों के जीवन को, उन्के भविष्य को बचाने के लिए जागना ही होगा.