05 मई 2026

जनादेश, व्यक्तिगत अहंकार और संविधान

भारतीय संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनादेश को मान्यता देती है तो जनप्रतिनिधियों से भी आदर्श स्थापन की अपेक्षा करती है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल विधानसभा चुनाव हार चुका है और भाजपा बड़े दल के रूप में सामने आई है. चुनाव परिणामों की इस स्थिति में सामान्य कदम सत्ताधारी दल के मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा देना होता है किन्तु पश्चिम बंगाल में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करना लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ संविधान से भी मजाक करने जैसा है. सामान्य रूप में इसे भले ही एक राजनीतिक संकट के रूप में देखा जा रहा हो किन्तु ऐसा नहीं है. भारतीय संविधान ऐसी स्थितियों में भी सशक्त प्रावधानों के साथ जनादेश के विरुद्ध सत्ता हथियाने के कुत्सित इरादों को रोकता है.

 

सबसे पहले यहाँ संविधान के अनुच्छेद 172(1) की उस शक्ति को समझना होगा, जिसके अनुसार राज्य की विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष के लिए होता है. इस पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् सम्बंधित विधानसभा का विघटन हो जाता है. यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त हो रहा है. ऐसे में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भले ही इस्तीफ़ा न देने की जिद पर अड़ी हों मगर उनको ये समझना होगा कि वर्तमान विधानसभा के संवैधानिक रूप से अस्तित्वहीन हो जाने पर उनका अस्तित्व क्या होगा? विधानसभा के अस्तित्व में न रहने की स्थिति में उसके आधार पर नियुक्त मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद का कानूनी एवं संवैधानिक आधार स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. सदन के अस्तित्व में न रहने पर किसी व्यक्ति का अपने पद का बने रहना संवैधानिक रूप से असंभव है.

 


इस संवैधानिक अनुच्छेद के होने के साथ-साथ विवाद की ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका प्रमुख हो जाती है. अनुच्छेद 164(1) के अन्तर्गत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री भी राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर कार्य करता है. सामान्य स्थितियों में मुख्यमंत्री का अपने पद पर बने रहना सदन में उसके प्रति बहुमत से निर्धारित होता है किन्तु चुनाव जैसी स्थितियों में इसका निर्धारण जनादेश के माध्यम से होता है. पश्चिम बंगाल में स्पष्ट है कि वर्तमान सत्ताधारी दल पराजित हो चुका है, ऐसे में वहाँ राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ सक्रिय हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने भी एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ तथा इसके बाद के अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर होना चाहिए लेकिन जब नई विधानसभा के चुनाव संपन्न हो चुके हों तो नया जनादेश पिछले किसी भी बहुमत पर भारी पड़ता है. सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 11 मार्च 1994 को यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था. यद्यपि इस मामले का मुख्य उद्देश्य अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग रोकना और सदन के पटल पर बहुमत परीक्षण को अनिवार्य बनाना था तथापि इसी निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनादेश ही सरकार की वैधता का अंतिम स्रोत है. जैसे ही नई विधानसभा के चुनाव होते हैं, पुरानी विधानसभा और उसके विश्वास का आधार समाप्त हो जाता है. स्पष्ट है कि ममता बनर्जी वर्तमान में अपने मुख्यमंत्रित्व के अस्तित्व में नहीं हैं. वैसे भी संवैधानिक रूप से चुनाव परिणामों के पश्चात निवर्तमान मुख्यमंत्री का इस्तीफा अनिवार्य कदम नहीं बल्कि यह एक लोकतांत्रिक शिष्टाचार और परम्परा है. इसके उल्लंघन होने पर राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री को पदमुक्त करने का, बर्खास्त करने का आदेश भी जारी कर सकते हैं. ऐसा कदम पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ममता बनर्जी के सन्दर्भ में भी उठा सकते हैं क्योंकि ममता बनर्जी के पास अब न तो जनादेश है और न ही सदन का अस्तित्व.

 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 73 के अन्तर्गत चुनाव आयोग नई विधानसभा के गठन के लिए विधिवत गठित अधिसूचना जारी करता है. अधिसूचना के जारी होते ही नई विधानसभा अस्तित्व में आ जाती है. अब चूँकि पश्चिम बंगाल में इसी 07 मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और अगले दिन राज्य में वैध सरकार न होने की स्थिति में राज्यपाल ऐसा कदम उठाने के लिए स्वतन्त्र हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद चुनाव आयोग ने नई विधानसभा के गठन हेतु आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. यह अधिसूचना राज्यपाल को सौंपी जा चुकी है जिसके पश्चात नई सरकार के गठन तथा शपथ ग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो गया है. ममता बनर्जी भले ही पद न छोड़ रही हों किन्तु अब राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार है कि वे चुनाव आयोग की अधिसूचना प्राप्त हो जाने के बाद भाजपा के विधायक दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. राज्यपाल अनुच्छेद 163 और 164 के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए विजयी दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं. नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण लेते ही पूर्व मुख्यमंत्री का दावा कानूनी रूप से शून्य हो जाएगा. प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी राज्यपाल द्वारा नई सरकार के गठन का आदेश देते ही राज्य की सम्पूर्ण नौकरशाही नए मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी हो जाती है. निवर्तमान मुख्यमंत्री का कोई भी आदेश अवैध माना जाएगा. स्पष्ट है कि राज्यपाल का आदेश स्वतः ही ममता बनर्जी की जिद को अस्तित्वहीन कर देगी.

 

भारतीय लोकतंत्र में जनादेश सर्वोच्च है. यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं तो भी वे केवल एक कब्जेधारी की स्थिति में होंगी न कि संवैधानिक शासक की. संविधान ने राज्यपाल को अनेक विवेकाधीन अधिकार दिए हैं जिनके द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी व्यक्तिगत अड़ियल रुख को दूर किया जा सके. विधानसभा का पाँच वर्ष पूरा होना ममता बनर्जी के अड़ियलपन के ताबूत में अंतिम संवैधानिक कील होगा. इसके बाद भाजपा का सरकार बनाना न केवल राजनीतिक वास्तविकता होगी बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक कदम भी.


26 अप्रैल 2026

अंत की ओर बढ़ता समाज?

पिता द्वारा अपने बच्चों की हत्या करने के बाद आत्महत्या करने की, माँ द्वारा अपनी संतान को कुँए में फेंकने की, पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे की हत्या करवाने-करने की, प्रेमी-प्रेमिका द्वारा सम्बन्धों में बाधक बनने पर परिजनों की हत्या कर देने की घटनाएँ अब लगभग रोज ही पढ़ने को मिलने लगी हैं. आपराधिक कृत्यों की ये घटनाएँ समाचार मात्र नहीं हैं बल्कि सामाजिक संवेदनाओं के क्षरण का, पारिवारिक मूल्यों के समाप्त होते जाने का संकेत हैं. इस तरह की घटनाएँ बताती हैं कि इंसान का तेजी के साथ मानसिक और सामाजिक क्षरण होता जा रहा है. रक्त-सम्बन्धियों के मध्य जब घृणित अपराधों का ताना-बाना बुना जाने लगता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी सामाजिकता में बड़ी गिरावट आ चुकी है. इन घटनाओं को किसी एक व्यक्ति की अथवा व्यक्तियों के समूह की विकृति कह कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. देखा जाये तो ऐसी घटनाएँ हमारी बदलती जीवनशैली, गिरते नैतिक मूल्यों और बढ़ते अलगाव के कारण उत्पन्न होती हैं.

 

दरअसल आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने व्यक्ति को मानसिक दबाव में जकड़ लिया है. इस दबाव ने उसे अकेलेपन का भी एहसास कराया है. ऐसी स्थिति में उसे अनुभव होने लगता है कि उसके प्रति लोगों का, परिवार का, समाज का समर्पण नहीं है. सामान्य रूप में कहा जाये तो वह व्यक्ति स्वयं को सामुदायिक समर्थन-विहीन समझने लगता है. वर्तमान नाभिकीय परिवारों और फ्लैट कल्चर ने व्यक्ति के अकेलेपन को और बढ़ा दिया है. इस एकाकीपन ने मनुष्य को भावनात्मक रूप से कमजोर तो बनाया ही है साथ ही मानसिक अवसाद जैसी स्थिति ने उसे हिंसक भी बना दिया है. इसी अवसाद, हिंसक व्यवहार, अकेलेपन ने परिवारवाद के स्थान पर व्यक्तिवाद को प्रमुखता दी है और इसके चलते नैतिक मूल्यों का पतन चारों ओर दिखाई देने लगा है. न केवल समाज में अपरिचित लोगों के मध्य बल्कि परिवार में भी स्वार्थ और कुत्सित वासनाओं से भरा व्यवहार चलन में आता जा रहा है. रिश्तों की पवित्रता पर व्यक्तिवाद और कामुकता हावी होती जा रही है. यह इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान में लोगों ने सही और गलत के बीच का अंतर समझना बंद कर दिया है.

 



सामाजिक अकेलेपन, व्यक्तिवाद, संकुचित सोच के साथ-साथ यदि विस्तीर्ण रूप में विचार करें तो वर्तमान में व्यक्ति के मन-मष्तिष्क को अपने नियंत्रण में करते जा रहे डिजिटल युग, सोशल मीडिया को भी नकारा नहीं जा सकता है. इसके चलते चरित्र निर्माण, नैतिकता, सहानुभूति आदि तो पूरी तरह से रसातल की ओर जा रहे हैं. इस दुनिया ने मनुष्य के भीतर एक तरह की होड़ पैदा करवा दी है. दूसरों की चमक-धमक, उसकी आभासी शानो-शौकत देखने से वह खुद को हीन महसूस करने लगता है. ऐसी कथित हीनभावना के कारण मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे ईर्ष्या, क्रोध पनपने लगता है. इस तरह की नकारात्मकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य इंटरनेट पर परोसी जा रही हिंसा और अश्लीलता के द्वारा किया जाने लगता है. लगातार आँखों के सामने से गुजरती हिंसा, वीभत्सता ने मानवीय मस्तिष्क को संज्ञा-शून्यता की स्थिति में ला खड़ा किया है. ये सहज रूप में देखने में आया है कि अब दुर्घटना की, अपराध की, मृत्यु की, हिंसा की खबरें विचलित करने के स्थान पर उनको शेयर करने के लिए उकसाती हैं. इस संवेदनहीनता ने मानसिक विकार को जन्म दिया है जो मनुष्य को अपराध के रास्ते पर ले जाता है.

 

नैतिकता, मूल्य, सामाजिकता, पारिवारिकता, हिंसा, अश्लीलता आदि को भले ही एकबारगी सामाजिक विघटन के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाये किन्तु यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि कानून व्यवस्था के कारण भी आपराधिक प्रवृत्ति वालों के हौसले बुलंद रहते हैं. इन घटनाओं के पार्श्व में न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी और कानून के भय का कम होना भी शामिल है. यद्यपि केवल कानून से समाज नहीं सुधर सकता है तथापि इसके लिए समाज को भी बदलना होगा. हमें फिर से उन मूल्यों की ओर लौटना होगा जहाँ इंसान, इंसानियत, रिश्तों, भावनाओं, संवेदनाओं आदि का सम्मान होता था. जहाँ परिवार का अस्तित्व था, रिश्तों में मर्यादा थी, आपस में संवादहीनता नहीं थी, पारिवारिक सदस्य एक दूसरे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे.

 

समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करनी होगी. शिक्षा क्षेत्र में जीवन कौशल, संवेगात्मक बुद्धि पर ध्यान देना होगा जिससे लोग संवेदनशील इंसान भी बन सकें. मन-मष्तिष्क को, ह्रदय को विचलित करने वाली ये घटनाएँ हमारे लिए एक चेतावनी है. यदि हमने अब भी अपने सामाजिक और नैतिक ढाँचे को सुधारने का प्रयास नहीं किया तो रिश्तों की गरिमा पूरी तरह समाप्त हो जाएगी. तकनीक और आधुनिकता के साथ-साथ अपने मूल्यों और संस्कारों को भी विकसित करना होगा. ध्यान रखना होगा कि इस तरह के आपराधिक कृत्यों से केवल एक परिवार का नहीं बल्कि यह एक सभ्यता का, एक समाज का अंत होता है. जीवन की आपाधापी में, कथित आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागते हुए हमें एक पल को रुक कर विचार करना होगा कि कहीं हम समाज को उसके अंत की तरफ तो नहीं ले जा रहे? 

 


22 अप्रैल 2026

बाईस को हुए इक्कीस

कभी अपने बड़े-बुजुर्गों को कहते सुना था कि समय पंख लगाकर उड़ता है. ऐसा होता हुआ अब समझ में भी आता है. पता नहीं आप लोगों को ऐसा महसूस होता है नहीं पर हमें तो लगता है कि जैसे समय वाकई उड़ता है. वर्तमान में खड़े होकर अतीत की किसी भी घटना को याद किया जाये तो लगता है जैसे कल की ही बात है मगर जब समय का आकलन किया जाता है तो समझ आता है कि बहुत-बहुत समय गुजर गया है. ऐसा न केवल सुखद घटनाओं के सन्दर्भ में होता है बल्कि दुखद घटनाओं के सन्दर्भ में भी होता है.

 

अपने जीवन की बहुत सी न भुलाये जाने वाली घटनाओं में एक घटना आज, 22 अप्रैल को घटित हुई थी. आज पलट कर उस दिन को याद किया तो समझ आया कि ये कल की घटना नहीं बल्कि 21 वर्ष पुरानी बात है. चूँकि इस पर हमें आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पहले दिन से लेकर आजतक एक पल को भी उस घटना को भुला नहीं सके हैं. भुलाना चाहते तो भी न भुला पाते, आखिर वो घटना महज एक घटना नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व से जुड़ गई घटना थी. सुबह उठने से लेकर देर रात सोने तक एक-एक पल, एक-एक कदम, एक-एक काम उस घटना से जुड़ा रहता है, उस घटना को जीवित बनाये रखता है. ऐसी स्थिति में उस दिन को, उस घटना को भुलाया जाना सम्भव ही नहीं.

 



बहरहाल, जीवन की साँस, धड़कन की तरह हमारी ज़िन्दगी से जुड़ चुकी वह घटना आज पूर्ण रूप से बालिग़ हो गई है. 21 वर्ष की समयावधि पलक झपकते नहीं गुजरी है बल्कि इन 21 वर्षों के गुजरने ने बहुत बड़ी कीमत वसूली है, बहुत सारा दर्द दिया है, बहुत सारा कष्ट दिखाया है. बावजूद इसके चलना जारी है, समय का पूरे उत्साह से गुजरना बना हुआ है. शौक जिंदा है, एहसास जिंदा है.


19 अप्रैल 2026

परिसीमन के जाल में उलझा महिला आरक्षण

लोकसभा में दो तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित न हो सका. केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन के उद्देश्य से इस विधेयक को लोकसभा में रखा गया था. इस विधेयक के द्वारा लोकसभा की सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करना था. देखा जाये तो इस विधेयक का उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को बदलना नहीं बल्कि लोकसभा की सीटों को अधिक करना था. ऐसा करने के पीछे का मंतव्य 2023 में पारित किये जा चुके नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने की अनिवार्य शर्त के रूप में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना था. 2023 में पारित इस अधिनियम के द्वारा महिलाओं को लोकसभा एवं राज्य की विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया जाना है लेकिन इसके लागू होने के सन्दर्भ में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना अनिवार्य शर्त के रूप में है. लोकसभा में परिसीमन विधेयक के पारित न होने ने भारतीय संघवाद, क्षेत्रीय संतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के आपसी संकटों को उजागर कर दिया है.

 

प्रथम दृष्टया देखा जाये तो इस विधेयक के पारित न हो पाने को लोकसभा सीटों के न बढ़ने के रूप में, देश पर आर्थिक बोझ न बढ़ने के रूप में देखा जा रहा है. इसके सापेक्ष यदि महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर विचार की दृष्टि से देखा जाये तो इस विधेयक का पारित न होना महिला आरक्षण के प्रति नकारात्मक भाव को उत्पन्न करता है. इस विधेयक के गिरने से 2029 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत भागीदारी मिलने की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गई है. इसे एक तरह के संवैधानिक धोखे के रूप में देखा जाना चाहिए जो महिलाओं को राजनैतिक प्रतिनिधित्व देने का सपना दिखाता है किन्तु उसके क्रियान्वयन को परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रिया से आबद्ध कर देता है.

 

लोकसभा सीटों का परिसीमन सदैव से एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील संवैधानिक मुद्दा रहा है. यही कारण है कि वर्तमान समय में भी लोकसभा की सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बना हुआ है. 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन को 2000 तक के लिए रोक दिया गया था. कालांतर में इस रोक को 2001 में 84वें संविधान संशोधन के द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया था. ऐसा करते समय तर्क दिया गया था कि 2026 तक देश में जनसंख्या वृद्धि की दर स्थिर हो जाएगी जिससे सीटों के बँटवारे में किसी राज्य को अन्याय महसूस नहीं होगा. ऐसे में यदि संविधान संशोधन के द्वारा परिसीमन पर लगी रोक को आगे न बढ़ाया गया तो 2026 के बाद संवैधानिक रूप से परिसीमन करवाना होगा. सीटों के बँटवारे को लेकर अन्याय जैसा भाव उत्तर और दक्षिण राज्यों के मध्य सदैव से बना रहा है. उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच जनसंख्या वृद्धि का असंतुलन है. दक्षिण भारतीय राज्यों ने दशकों तक प्रभावी ढंग से परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को लागू किया जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती रही. वर्तमान परिसीमन विधेयक के आने पर दक्षिण राज्यों का यही कहना था कि यदि आज की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन लागू किया गया जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों की संसद में हिस्सेदारी कम हो जाएगी.

 

विधेयक के पारित न होने ने जहाँ महिला आरक्षण की गति को अवरोधित किया है वहीं निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन रुकना भी एक प्रकार के नुकसान के रूप में सामने आया है. कई शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व का अधिक होना, ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटी सीटों का होना भी लोकतान्त्रिक प्रणाली में एक तरह की बाधा है. इससे एक वोट, एक मूल्य का लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर प्रतीत हो रहा है. वर्तमान में एक-एक सांसद बहुत बड़ी संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो कई बार सांसदों की संसदीय जवाबदेही को कम करता है. इस दृष्टि से लोकसभा में सीटों की संख्या न बढ़ना एक प्रकार की प्रशासनिक हानि है क्योंकि लोकसभा सीट न बढ़ने की स्थिति में मतदाताओं और उनके प्रतिनिधि के बीच की दूरी को कम करने का एक अवसर हाल-फ़िलहाल कम हुआ है.

 

परिसीमन विधेयक के लोकसभा में पारित न होने ने महिलाओं के राजनैतिक अधिकारों की प्राप्ति की राह में एक अवरोध उत्पन्न किया है. यहाँ इस विफलता के पीछे से एक सवाल उपजता है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पारित होने के समय लोकसभा सीट का परिसीमन होना अनिवार्य शर्त के रूप में परिलक्षित था तो अब परिसीमन विधेयक का विरोध क्यों? 2023 में महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक सभी संसद सदस्यों के पास पहुँचा होगा, उसी समय परिसीमन का विरोध न करके महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक को पारित करवा देना अलग ही कहानी कहता है. बहरहाल, महिला आरक्षण के भविष्य और लोकसभा सीटों के परिसीमन पर लगी रोक की समय-सीमा को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि परिसीमन केवल सीटों का गणित न बनकर भारतीय संघ के सभी घटकों के बीच विश्वास का आधार बने. वर्तमान स्थिति में परिसीमन विधेयक के गिरने को तात्कालिक राजनीतिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालिक संवैधानिक हितों के सन्दर्भ में देखने और सँवारने की आवश्यकता है.

15 अप्रैल 2026

सोशल मीडिया उपयोग का दबाव क्यों?

सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों को विभिन्न कार्यक्रम संपन्न करवाए जाने सम्बन्धी प्रस्ताव भेजा जाना समझ आता है. इन कार्यक्रमों की रिपोर्ट बनाना, उसको जियो-टैगिंग फोटो-वीडियो के साथ सम्बंधित कार्यालय को भेजना भी समझ आता है. इस समझ आने वाली स्थिति के बीच समझ ना आने वाली स्थिति ये है कि इन कार्यक्रमों की फोटो, वीडियो को सोशल साइट्स (फेसबुक,  इन्स्टाग्राम, यूट्यूब आदि) पर अपलोड करके उसकी लिंक भी उपलब्ध करवाना होता है. आखिर ऐसा क्यों? ये सोशल साइट्स न तो आधिकारिक रूप से सरकार के अंग हैं, न ही इनको किसी भी प्राध्यापक, संस्थान द्वारा उपयोग में लाना जाना अनिवार्य बनाया गया है.

 

सरकार की इस तरह की अनावश्यक गतिविधि ही किसी भी संस्थान के तानाशाह प्रवृत्ति की मानसिकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती है. यही कारण है कि विश्वविद्यालय स्तर पर, महाविद्यालय स्तर पर, विभागीय स्तर पर व्हाट्सएप ग्रुप की भरमार है. इस तरह के जी के जंजाल से कभी मुक्ति मिलेगी या फिर ये जंजाल किसी दिन सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था की जान लेकर ही मानेगा?