09 अप्रैल 2026

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों पर रॉयल्टी

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी



शारदा जी से पहली मुलाकात हुई थी हमारे ही जनपद के कोंच में एक साहित्यिक कार्यक्रम में. परिचय इस मुलाकात से भी पुराना था और ये दोनों बातें ही श्वेतवर्णा के जन्म लेने से भी बहुत पुरानी थीं.


बहरहाल, श्वेतवर्णा का अस्तित्व में आना हुआ और हम जैसे स्वान्तः सुखाय लेखकों को भी जीवन मिला. अपने छपास रोग के आरम्भिक दिनों में कुछ पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं ही करवाया. इसके बाद एक-दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ अपने मित्रों के सहयोग से. उसी समय शारदा जी ने श्वेतवर्णा की जानकारी दी. इसके बाद तपती दुपहरी की शाम के साथ पुराने परिचय-सम्बन्ध-विश्वास ने ऐसा रंग जमाया कि अपनी पुस्तकों का कहीं और से प्रकाशन का सोच भी नहीं सके. जिस विश्वास से हमने पुस्तकों का प्रकाशन जारी रखा, उसी अधिकार से एक बार शारदा जी ने धमकी भी दे डाली थी कि हमने कहीं और से पुस्तकें प्रकाशित करवाईं तो अच्छा नहीं होगा.


आज उसी विश्वास-अपनत्व ने सुखद एहसास करवाया. इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी भी प्राप्त हुई है. यह सुखद एहसास विगत कई वर्षों में पहली बार मिला है. इसमें हमारी एकल लेखन वाली पुस्तकें तो हैं ही, इसके साथ ही देवेन्द्र सिंह जी की पुस्तक और ऋचा सिंह राठौर के साथ लिखी गईं पुस्तकें भी शामिल हैं. (हालाँकि इन लोगों के साथ वाली पुस्तकों की रॉयल्टी हम ही डकार जायेंगे)


संलग्न चित्र में बाकी विवरण इसीलिए छिपा दिया है ताकि कुछ लोग जलन महसूस न करने लगें. विवरण के लिए ऐसे लोग आकुल-व्याकुल न हों. ये विवरण हमारी थाती है, हमारे-शारदा जी के-श्वेतवर्णा के आपसी विश्वास, अपनत्व-अधिकार का परिचायक है.




06 अप्रैल 2026

बदलते मौसम के खतरे

प्रकृति मिजाज कब बदल जाये, कहा नहीं जा सकता है. उसके इस बदलते रुख को इस समय बहुत ही नजदीक से महसूस किया जा रहा है. दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत अचानक से बदले मौसम की चपेट में है और बारिश, ओलावृष्टि, तूफानों का सामना कर रहा है. यह आश्चर्य का विषय है कि जिस समय में इस क्षेत्र में गरम हवाओं का परिचालन होता था, तीव्र गर्मी का एहसास किया जाता था उस समय यहाँ बारिश, ओलावृष्टि हो रही है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ में व्यापक बदलाव आने के कारण ऐसा हुआ है. इसके लिए उन्होंने पॉलर जेट स्ट्रीम में गड़बड़ी और पोलर वॉर्टेक्स के बदलते रूप को जिम्मेदार बताया है. पोलर वॉर्टेक्स आर्कटिक के चारों ओर घूमता ठंडा वायुमंडल है. इसके चलते ही ओलावृष्टि में तीव्रता देखने को मिल रही है. मौसम विज्ञानियों के अनुसार गत माह मार्च में पाँच-छह पश्चिमी विक्षोभ आने चाहिए थे लेकिन इनकी संख्या आठ हो गई. वर्तमान माह अप्रैल में अनुमान है कि इनकी संख्या कम से कम तीन हो सकती है.

 


इस बदलते मौसम का कारण कुछ भी क्यों न रहा हो मगर यह जलवायु संकट का एक अत्यंत चिंताजनक और प्रत्यक्ष उदाहरण है. पारम्परिक ऋतु चक्र में परिवर्तन होने से जीवनदायिनी बारिश विनाशकारी भी बन जाती है. इस बेमौसम बारिश का प्रभाव नकारात्मक रूप से सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक ढाँचे पर हुआ है. इस असमय वर्षा ने सबसे घातक प्रहार हमारे कृषि ढाँचे पर किया है. तकनीकी विकास के बाद भी भारतीय कृषि आज भी पूरी तरह से प्रकृति के तालमेल पर निर्भर करती है. ऐसे में प्रकृति का जरा सा भी नकारात्मक बदलाव किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर देती है. असमय होने वाली इस बारिश, ओलावृष्टि, तूफ़ान ने रबी की फसल को अपनी चपेट में ले लिया है. गेहूँ, सरसों, चने जैसी फसलें मौसम की मार के कारण मिट्टी में मिल चुकी हैं.

 

ऐसी स्थिति का प्रभाव अकेले किसानों पर नहीं पड़ता है बल्कि समग्र रूप में पूरी आर्थिकी इससे प्रभावित होती है, आम जनजीवन को भी इसका प्रभाव सहना पड़ता है. असमय मौसम के बदले इस मिजाज के कारण फसल तो चौपट होती ही है और यदि किसी तरह के प्रयासों से कुछ बचाव कर भी लिया जाये तो न केवल अनाज की मात्रा कम होती है बल्कि दानों की गुणवत्ता में भी कमी आती है. इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि किसान को  अपनी फसल का उचित दाम बाजार में नहीं मिल पाता है. ऐसी स्थिति में आपूर्ति की कमी हो जाती है, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था, एक गृहिणी की रसोई भी प्रभावित होती है. बाजार में आपूर्ति की कमी के चलते खाद्य मुद्रास्फीति अर्थात महँगाई का भी तेजी से बढ़ना शुरू हो जाता है. वर्तमान दौर में जबकि न केवल वैश्विक समुदाय बल्कि भारतीय समाज भी युद्ध की विभीषिका के कारण से आर्थिकी में हो रहे परिवर्तनों को महसूस कर रहा है, तब बेमौसम की मार से इस आर्थिक तंत्र के बिगड़ने से आम जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है.

 


इस असमय मौसम परिवर्तन ने केवल कृषि को बल्कि स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है. प्रकृति में तापमान के अचानक गिरने से, नमी के बढ़ने से सूक्ष्मजीवों
, वायरस, मच्छरों आदि के पनपने का खतरा बढ़ गया है. ऐसा होने के परिणामस्वरूप सर्दी-खाँसी, बुखार, श्वसन सम्बन्धी समस्याओं के साथ-साथ डेंगू, मलेरिया आदि बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है. मौसमी बदलाव के लिए शारीरिक रूप से तैयार न होने के कारण लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है. इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है. इनके अलावा इस बदलते मौसम से हमारा पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता भी प्रभावित होती है. प्रत्येक जीव और वनस्पति का अपना एक जैविक कैलेंडर होता है, जिसमें इस असमय बदलाव के कारण भी बदलाव देखने को मिलता है. असमय बारिश से उनका प्रजनन चक्र प्रभावित होता है, बहुत से पक्षियों के घोंसले नष्ट हो जाते हैं, अनेक दुर्लभ प्रजातियों का  अस्तित्व इस असमय बदलाव के कारण खतरे में पड़ जाता है.

 

मौसम विशेषज्ञ इस बदलाव का कारण भले ही कुछ भी बताएँ मगर यदि ऐसी स्थितियों के मूल में जाया जाये तो ग्लोबल वार्मिंग, मानव-जनित प्रदूषण ही इसके सबसे प्रमुख कारण नजर आते हैं. विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने जंगलों, नदियों, पहाड़ों, वायुमंडल को नष्ट कर दिया है. इससे पारिस्थितिक तंत्र की नकारात्मकता ने प्रकृति में उथल-पुथल मचा रखी है. कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा ने धरती का तापमान खराब कर दिया है. समुद्रों, नदियों के पहले से कहीं अधिक गर्म होने के कारण बादलों का निर्माण, उनकी दिशा अनियंत्रित हो गई है. पश्चिमी विक्षोभ और समुद्री चक्रवातों के बदलते पैटर्न ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है.

 

इस संकट का समाधान मुआवजा, तात्कालिक राहत में नहीं है. इसके लिए दीर्घकालिक नीतियों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना होगा. प्रकृति से खिलवाड़ करने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा. सिंचाई के लिए जल संचयन प्रणालियों को मजबूत करना होगा ताकि बारिश के पानी का सदुपयोग हो सके. तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदलते जा रहे शहरों के नियोजन में भी आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है ताकि वे जलवायु अनुकूलन क्षमता को धारण कर सकें. यह समझना होगा कि बेमौसम बारिश कोई मौसमी परिघटना नहीं है बल्कि यह प्रकृति की चेतावनी है, जो हमें अपनी जीवनशैली बदलने को सचेत कर रही है. यदि हम अब भी नहीं जागे, पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया तो ऐसी मौसमी अनिश्चितताएँ हमारी खाद्य सुरक्षा, सामाजिक ढाँचे को हिलाकर रख देंगी.


29 मार्च 2026

समावेशी राष्ट्र हेतु समान नागरिक संहिता

गत माह गुजरात समान नागरिक संहिता को लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया. इससे पूर्व फरवरी 2024 में उत्तराखण्ड ने इसे लागू किया था. यह संहिता मुख्य रूप से विवाह, तलाक और विरासत जैसे व्यक्तिगत मामलों को सभी नागरिकों के लिए एकसमान रूप से प्रभावी करती है. यह किसी राजनैतिक दल विशेष की मानसिकता की उपज नहीं बल्कि देश की आज़ादी के तुरंत बाद ही व्यापक दृष्टिकोण से जन्मी अवधारणा है. नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड.एच. लारी, हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने अम्बेडकर का विरोध किया था. तब अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, सम्पत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. बहस के दौरान जबरदस्त विरोध के बीच मतदान करवाया गया, जिसमें अम्बेडकर के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया. समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले मुस्लिम सदस्यों के पराजित होने के पश्चात् संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इस प्रस्ताव के लाये जाने के बाद भी समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए इसलिए टाल दिया गया ताकि बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाया जा सके. संविधान सभा द्वारा सौहार्द्र दर्शाने के बावजूद मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताता-मानता है.

 



चूँकि समान नागरिक संहिता लागू किये जाने का बिन्दु भाजपा द्वारा उठाया जाता रहा है ऐसे में गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों द्वारा इसे राजनैतिक रंग देकर विवादित बना दिया गया है. इन राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा द्वारा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाया जाता है. ऐसे आरोपों के बीच यह समझना होगा कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थीउस समय हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय संविधान सभा द्वारा समान नागरिक संहिता को लागू करने का विधान क्यों बनाया गया? तब भी मुस्लिम सदस्यों द्वारा इस संहिता का विरोध क्यों किया गयाआखिर सभी नागरिकों के एकसमान अधिकार होने का विरोध क्योंशरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता हैकिसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारनाहाथ काटनापत्थर मारनाफाँसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैंकुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के सम्भव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में आखिर शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध क्यों किया जाता है

 

देखा जाये तो भारतीय लोकतंत्र के विकसित और सशक्त राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में समान नागरिक संहिता केवल राजनैतिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की अनिवार्यता है. भारतीय संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से जिस स्वप्न को नीति निदेशक तत्वों में संजोया था, उसे वर्तमान की कसौटी पर परखने का समय आ गया है. एक देश में नागरिक कानूनों की विविधता न केवल प्रशासनिक जटिलताएँ पैदा करती है, बल्कि यह उस संवैधानिक संकल्प के भी आड़े आती है जो हर नागरिक को कानून के समक्ष बराबरी का अधिकार देता है.

यहाँ समझना होगा की कानूनी समानता के लिए अस्तित्व में आने वाली समान नागरिक संहिता किसी धार्मिक आस्था पर चोट नहीं है, किसी भी व्यक्ति को उसके मजहबी आचरण से विलग करने की नीति नहीं है बल्कि इसके द्वारा मानवाधिकारों की सुरक्षा का, व्यक्तिगत पहचान को पुख्ता करने का कदम है. एक ऐसे देश में जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता है, वैचारिक स्वतंत्रता है वहाँ एक संहिता के द्वारा किसी को कैसे प्रतिबंधित किया जा सकता है? समान नागरिक संहिता एक नागरिक के प्रति उसके अधिकार और उसे मिलने वाले न्याय की प्रक्रिया को सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान करती है.

 

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के दृष्टिकोण से भी कानूनों का यह सरलीकरण आवश्यक है. इससे न केवल नागरिकों के बीच एकसमान अवधारणा कार्य करेगी बल्कि न्यायपालिका के लिए भी वर्षों से लंबित पड़े पारिवारिक विवादों का निपटारा करने में सहजता होगी. बेशक, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सर्वसम्मति बनाना एक चुनौती है किन्तु यह समझना भी होगा कि सुधार कभी भी यथास्थितिवाद से नहीं आते. समान नागरिक संहिता वास्तव में आधुनिक और समतामूलक समाज की अवधारणा पुष्ट करती है. इसके लिए हमें संकीर्णता से ऊपर उठकर एक विधान के विचार को धरातल पर उतारना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियाँ संगठित और न्यायप्रिय भारत का निर्माण कर सकें.

 

22 मार्च 2026

पानी की बर्बादी को रोकना होगा

मनुष्य के लिए पानी हमेशा से एक महत्वपूर्ण और जीवन-दायक पेय रहा हैये बात हम सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है. इसके साथ ही इस बात से भी हम अनभिज्ञ नहीं हैं कि कि जल सभी के जीवित रहने के लिए अनिवार्य है. ऐसा माना जाता है कि मनुष्य बिना भोजन के लगभग दो माह तक जीवित रह सकता है किन्तु बिना पानी के एक सप्ताह भी जीवित रहना मुश्किल है. इधर मानवीय क्रियाकलापों के कारण धरती लगातार पेयजल-विहीन होती जा रही है. जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से विश्व भर में 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने की शुरुआत कीजिसकी घोषणा वर्ष 1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में की गई. इसके अंतर्गत सर्वप्रथम वर्ष 1993 में 22 मार्च के ही दिन सम्पूर्ण विश्व में जल संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता लाने का कार्य किया गया. 



पूरी धरती के 70 प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी इसका कुल एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. आज सभी को जल की उपलब्धता करवाना मुख्य मुद्दा है. आने वाले समय में बिना जल-संरक्षण के ऐसा कर पाना कठिन कार्य होगा. इस दृष्टि से जल संरक्षण भी एक बड़ा मुद्दा है. इसके अलावा शुद्ध पेयजल की आपूर्ति भी एक मुद्दा बना हुआ है क्योंकि धरती के हर नौवें इंसान को ताजा तथा स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. इसके चलते संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष 35 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है. विकासशील देशों में जल से उत्पन्न रोगों को कम करना स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्ष्य है. आज हमारा देश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व जल-संकट से जूझ रहा है. जल सहयोग के रूप में प्रमुख कार्य पानी के बारे में जागरूकता बढाने और उसकी अहमियत की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का होना चाहिए. जल उपयोग में मितव्ययता बरतनी होगी और पानी की बर्बादी को रोकना होगा. इसके अतिरिक्त वर्षा जल के संरक्षण के उपाय खोजने होंगे तथा घरेलू उपयोग में भी जल-संरक्षण के प्रति सचेत होना पड़ेगा. यदि हम आज इसका उपयोग सावधानी एवं किफायत से न करेंगे तो भविष्य में स्थिति अत्यंत ही गंभीर हो सकती है.

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल करअव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता हैशेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबोंजलाशयोंकुँओं आदि को गन्दगी सेकूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव होनए-नए तालाबोंकुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर परसीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैंउपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगेभविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.

17 मार्च 2026

बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया की ख़ामोशी

इस वर्ष का आरम्भ पश्चिम एशिया को एक ऐसे दोराहे पर ले आया है, जहाँ से वापसी का रास्ता हाल-फ़िलहाल युद्ध के मैदानों से गुजरता दिख रहा है. ईरान, इज़राइल-अमेरिका के बीच का छद्म युद्ध अब एक सीधे युद्ध में बदल चुका है. यह संघर्ष केवल तीन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और नई विश्व व्यवस्था के भविष्य को निर्धारित करने वाला है. इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल तीनों देशों- ईरान, इजरायल और अमेरिका के अपने-अपने निहितार्थ हैं. ईरान एक तरह से प्रतिरोधात्मक नेतृत्व का परिचायक बना हुआ है. वह इजरायल के खिलाफ कभी परदे के पीछे से लड़ता है तो कभी मिसाइलों के द्वारा सीधी चुनौती देता है. यह ईरान की बदलती सैन्य मानसिकता को दर्शाता है. यदि इस युद्ध को इजरायल के सन्दर्भ में देखा जाये तो उसके लिए यह युद्ध केवल सैन्य अभियान नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है. उसका रणनीतिक उद्देश्य अपनी सीमाओं की रक्षा करना मात्र नहीं है बल्कि ईरान के आतंकी ढाँचे- हमास, हिजबुल्लाह और हुथी को जड़ से मिटा देना है. यदि अमेरिका की बात करें तो वह इस त्रिकोण का सबसे जटिल सिरा है. अमेरिका एक तरफ इज़राइल को पूर्ण समर्थन देने की नीति अपनाना चाहता है साथ ही वह किसी भी तरह के पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध से बचना भी चाहता है. उसका उद्देश्य कतई यह नहीं कि वह ऐसे किसी युद्ध के द्वारा मध्य-पूर्व में लम्बे समय तक उलझा रहे.

 



इन तीनों देशों की स्थितियाँ कुछ भी क्यों न रही हों, वर्तमान में कुछ भी क्यों न बनी हो किन्तु सत्य तो यही है कि ये तीनों देश आज प्रत्यक्ष युद्ध में उतर चुके हैं. इस तरह की स्थितियों से साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि किसी समय विश्व पटल पर बनी एकध्रुवीय व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है. अब विश्व जहाँ बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात तो करता है साथ ही शांति के बजाय शक्ति प्रदर्शन को तैयार रहता है. एक अकेले इसी युद्ध की बात नहीं है, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे अनेक युद्ध, संघर्ष इसी का परिचायक हैं. लम्बे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष ने साफ़ कर दिया है कि यूरोपीय सुरक्षा संरचना ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है. ऐसा ही कुछ मध्य-पूर्व क्षेत्र में नजर आ रहा है. देखा जाये तो अब मध्य-पूर्व का यह तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, इस युद्ध ने खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया है.

 

यहाँ सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि अब युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गए हैं. समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह युद्ध भी अब हाइब्रिड दौर में हैं. यहाँ सीधा हमला करने के बजाय साइबर हमला किया जा सकता है. साइबर हमला करके किसी भी देश की आंतरिक मूलभूत व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है, न केवल दैनिक जीवन वाले क्षेत्रों में सेंध लगाई जा सकती है बल्कि आर्थिक सञ्चालन को भी प्रभावित किया जा सकता है. युद्ध अब केवल दो देशों के मध्य ही नहीं लड़ा जाता है बल्कि सम्बंधित देशों से कहीं दूर जमीन पर भी यह युद्ध चलता दिखता है. यदि वर्तमान ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध की बात करें तो होर्मुज जलडमरूमध्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. ईरान के कब्जे में होने के कारण यहाँ से गुजरने वाले जहाजों को उसकी अनुमति की आवश्यकता है. ऐसा न होने की दशा में समूचे विश्व में तेल की, गैस की कमी दिख रही है. कहा जा सकता है कि अब युद्ध में केवल सैनिक नहीं मरते बल्कि आर्थिक मंदी और रसद की कमी के कारण दूर देशों के आम नागरिक भी इसकी कीमत चुकाते हैं. इसे ड्रोन, मिसाइल, बम आदि के साथ-साथ युद्ध में आर्थिक हथियार का प्रयोग करना कहा जा सकता है. होर्मुज से जहाजों का निकलना प्रतिबंधित करना, अन्य देशों पर अनेक तरह के प्रतिबंधों का लगाया जाना एक तरह का हथियार ही है, जिसमें उन देशों की आम जनता पिसती है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के चलते भारत सहित अनेक देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बाधित होने से परेशानी उत्पन्न हुई जबकि ऐसे देशों का इस युद्ध से कोई सीधे-सीधे सम्बन्ध नहीं है.

 

ऐसे समय में विश्व की महाशक्तियों को समझना होगा कि शेष विश्व के लिए क्या सही है? विश्व जनसमुदाय की अपेक्षाएँ क्या हैं? अपनी शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन के स्थान पर महाशक्तियों को समझना होगा कि उनकी श्रेष्ठता सैन्य शक्ति से ज्यादा शांति बनाए रखने की क्षमता से तय होगी. यदि समय रहते हथियारों की होड़ को न रोका गया, विकास की दौड़ में शामिल न हुआ गया तो आने वाली पीढ़ियाँ बारूद की राख के भीतर ही अपना अस्तित्व खोजती रहेगी. विश्व भर में चल रहे बड़े-छोटे युद्धों, संघर्षों के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा कि अब समय आ गया है कि विश्व समुदाय केवल सीमाओं की रक्षा न करे, केवल विस्तारवाद की नीति पर काम न करे बल्कि उस साझा मानवता की रक्षा करे जो युद्ध की भेंट चढ़ रही है. सत्यता यही है कि शांति कोई विकल्प नहीं बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है.