29 अक्टूबर 2026

तकनीक के उपयोग से मना करवाचौथ

तकनीक के उपयोग से मन सका करवाचौथ व्रत.

जी हाँ, कल जिस तरह का मौसम उरई में बना हुआ था, उससे साफ़ था कि बादलों के साथ मिलकर चाँद महाशय नखरे दिखायेंगे. ऐसा हुआ भी, वे अपने नखरे दिखाने में मगन थे, ऐसे में कुछ देर तो घर की महिलाओं ने उनकी मनुहार की फिर उनकी तरफ़ ध्यान न दिया.

उसी समय छोटे भाई का वीडियो कॉल आया कि ऑनलाइन चंद्रमा के दर्शन कर लो. मोबाइल पर वीडियो कॉल, छोटा भाई लखनऊ में और उसका मित्र जोधपुर में, वहीं से धर दबोचे गए चंद्रमा जी.

घर-परिवार की उरई-लखनऊ निवासी व्रतधारी महिलाओं ने ऑनलाइन जोधपुर का चन्द्र-दर्शन कर करवाचौथ का व्रत मना लिया. यहाँ के चाँद महोदय बादलों के साथ ही खेलते रह गए.

 


28 अक्टूबर 2026

अब विश्लेषक मत बनिए, हार के कारण समझिए

अब चुनाव हारने के बाद राजनीतिक आलोचक, चुनाव विश्लेषक मत बनिए बल्कि खुद का आकलन करिए.

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टिकट निर्धारण के पहले अक्सर पोस्ट आ रही थीं कि भाजपा ने वादा किया है टिकट देने का तो टिकट दिया जाये. आखिर किस जिम्मेदार ने ऐसा वादा किया था, क्या आपको याद है या स्थानीय किसी व्यक्ति की बात को वादा मान लिया? क्या कभी ये पता किया था कि ऐसा ही वादा प्रयागराज क्षेत्र से भी किया गया था? इस चुनाव हेतु अपनी प्रत्याशिता को लेकर कई बार 'ऊपर के लोगों से' मुलाकात-बातचीत की गई. हर बार हमें एक निर्धारित जवाब मिलता कि झाँसी-प्रयागराज खण्ड में शिक्षक का टिकट बुन्देलखण्ड को दिया जा चुका है, स्नातक का टिकट प्रयागराज को दिया जायेगा.

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टिकट हो जाने के बाद आप लोग ही बैंड-बाजा-बारात के साथ प्रबल जीत के दावे करने वाला सोशल मीडिया खेल खेलने में लगे रहे किन्तु किसी ने एक बार भी किसी असंतुष्ट कार्यकर्त्ता, व्यक्ति के पास जाने का प्रयास किया?

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इस वर्ष के शुरू से ही स्पष्ट दिख रहा था कि यूजीसी विनियम, एससी/एसटी एक्ट आदि सहित अन्य कई मुद्दों पर लोगों में नाराजगी है. ऐसे में चुनाव प्रचार के दौरान एक पल को भी नहीं लगा कि किसी भी स्तर से इस तरफ कोई कदम उठाया गया है. क्यों?

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एक बार अपने लिए भी विचार करिए कि आखिर ऐसा क्या था कि टिकट मिलते ही सभी को जीत निश्चित दिखने लगी थी? यदि पार्टी सिम्बल ही जीत का आधार होता तो फिर कहीं से भी भाजपा की हार नहीं होनी चाहिए थी. जो पहले जीत के कारण बताते नहीं थक रहे थे वही अब हार के कारण पानी पी-पी कर बताने में लगे हैं. आखिर इतनी नीर-क्षीर विवेकिनी दृष्टि कहाँ से लाते हो?

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ध्यान रखिये, इस हार के कारण बहुत बड़े नहीं हैं और इतने छोटे भी नहीं कि देखने से दिखाई न दें मगर उसके लिए निरपेक्ष दृष्टि का होना आवश्यक है. इस बार भीड़ बनकर आप लोगों ने न केवल प्रत्याशी का बल्कि पार्टी का बुरा किया है. इसे कहने में कोई गुरेज नहीं कि अशोक राठौर ने पिछले दो शिक्षक निर्वाचनों में जिस क्षमता से अपनी ताकत दिखाई थी, इस बार उसकी आधी भी कहीं नजर नहीं आई. ऐसा चुनाव परिणामों में ही साफ़-साफ़ दिखता है जबकि अंतिम परिणाम पहले अंक की गणना में ही निकल आया.

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हाँ, एक बात और..... जनपद जालौन में ही हमारे जैसे सैकड़ों मतदाता होंगे जिनको अब भाजपा के द्वारा मतदाता भी नहीं माना जा रहा है. अन्यथा ऐसा क्या था कि तमाम घरों, स्थानों, मोहल्लों में अपने देवतुल्य कार्यकर्ताओं के साथ अपने दिव्य दर्शन देते आप लोग हमें अपने दर्शन देने नहीं आये? ऐसी हजारों मतदाताओं की संख्या अकेले प्रयागराज में है.... लेकिन आपको इसकी खबर नहीं होगी क्योंकि आपकी आँखों में आज 'सुबह तक जीत वाला चश्मा' लगा हुआ था.

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बाकी, यदि वास्तविकता में कारणों की जानकारी करनी हो, चुनाव का विश्लेषण जानना हो तो यहाँ नहीं..... व्यक्तिगत रूप से हमसे मिलना.... बताने में भी मजा आएगा.

#झाँसी-प्रयागराज खण्ड स्नातक निर्वाचन 2026

 


27 अक्टूबर 2026

रूस-यूक्रेन युद्ध से मिला क्या?

वैश्विक पटल से उभरकर आती खबरों के अनुसार रूस-यूक्रेन के मध्य युद्धविराम जैसी स्थिति बन रही है. दोनों देशों के मध्य अभी मानवीय सहायता पहुँचाने और नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए सीमित युद्धविराम लागू हुआ है. रूस द्वारा डोनबास क्षेत्र पर नियंत्रण की माँग और यूक्रेन की ओर से सुरक्षा सम्बन्धी शर्तों पर विवाद होने के कारण फ़िलहाल इस सीमित युद्धविराम को रूस-यूक्रेन युद्ध की समाप्ति अथवा वर्तमान नियंत्रण रेखा को स्थायी सीमा मान लेने पर सहमति नहीं समझना चाहिए.

 

जिस तरह से इन दोनों देशों के मध्य युद्ध की स्थिति बनी रही, उसे केवल फरवरी 2022 में शुरू हुए आक्रमण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. मूलरूप से सोवियत संघ के विघटन, यूक्रेन की स्वतंत्र विदेश नीति की आकांक्षा, रूस की क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं आदि ने युद्ध जैसे हालात पैदा किये थे. 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन का स्वतंत्र राष्ट्र बनना; काला सागर तक उसकी पहुँच होना, क्रीमिया में नौसैनिक उपस्थिति के चलते वह हमेशा से आर्थिक और सामरिक महत्त्व वाला भाग रहा है. पूर्वी यूरोप में प्रभाव बनाए रखने की रूस की रणनीतिक सोच ने तथा यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता प्राप्त करने की आकांक्षा ने युद्ध का आरम्भ करवा दिया. इस युद्ध से दोनों देशों की महत्त्वाकांक्षाओं को क्या प्रतिफल मिला, ये तो समय निर्धारित करेगा किन्तु युद्ध में दोनों देशों को व्यापक रूप से मानवीय और सैन्य क्षति उठानी पड़ी है.

 

एक स्वतंत्र शोध पर आधारित अनुमान के आधार पर सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के जुलाई 2026 में प्रकाशित खबर के अनुसार फरवरी 2022 से जून 2026 तक रूसी सेना के लगभग 14 लाख सैनिक हताहत हुए, जिनमें मृत, घायल और लापता शामिल हैं. इसी अवधि में यूक्रेन के लगभग 5.25 लाख से 6.25 लाख सैनिक हताहत हुए. सैनिकों के अतिरिक्त नागरिकों के हताहत होने; विस्थापन और बुनियादी सुविधाओं के विनाश होने की अपनी अलग स्थिति है. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निगरानी मिशन के अनुसार फरवरी 2022 से दिसम्बर 2025 तक यूक्रेन में लगभग 15000 नागरिकों की मृत्यु और 40000 से अधिक लोगों के घायल होने की पुष्टि हुई है.

 

आर्थिक दृष्टि से भी यूक्रेन को बुरी तरह नुकसान हुआ है. उसके आवास, परिवहन, ऊर्जा और औद्योगिक ढाँचे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ के संयुक्त आकलन के अनुसार दिसम्बर 2025 तक यूक्रेन में प्रत्यक्ष भौतिक क्षति लगभग 195.1 अरब डॉलर थी. आर्थिक गतिविधियों और आजीविका में उत्पन्न व्यवधान से होने वाला नुकसान लगभग 666.7 अरब डॉलर आँका गया है. इस स्थिति के अनुसार अगले दस वर्षों में पुनर्निर्माण और सुधार के लिए लगभग 587.7 अरब डॉलर की आवश्यकता बताई जा रही है. ऐसा नहीं है कि आर्थिक क्षति सिर्फ यूक्रेन को ही उठानी पड़ी है, रूस को भी सैन्य खर्च, सैनिकों की क्षति, पश्चिमी प्रतिबंधों, तकनीकी आयात पर पाबंदियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बदलाव की भारी कीमत चुकानी पड़ी है. पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के कारण रूसी अर्थव्यवस्था और उसके वैश्विक व्यापार को नकारात्मक रूप से क्षति उठानी पड़ी. यद्यपि रूस ने एशिया के अन्य देशों के साथ अपने व्यापारिक सम्बन्ध मजबूत करके बिगड़ी आर्थिक स्थिति को सँभालने का प्रयास किया तथापि उसके आधुनिक सैन्य संसाधन, आर्थिक मोर्चे भी नष्ट हुए. इसके साथ-साथ वैश्विक मंच पर रूस की रणनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक प्रतिष्ठा प्रभावित हुई. रूस की अर्थव्यवस्था ने भी आर्थिक दबावों का सामना किया किन्तु यूक्रेन जैसे छोटे देश के मुकाबले रूस के पास स्वयं को स्थिर बनाये रखने के अन्यान्य साधन भी उपलब्ध थे. देखा जाये तो रूस के लिए परिणाम मिश्रित रहे हैं. उसने कुछ यूक्रेनी क्षेत्रों पर वास्तविक सैन्य नियंत्रण बनाए रखा है और क्रीमिया पर अपना कब्जा कायम रखा है. इसके बाद भी वह पूरे यूक्रेन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल नहीं हुआ.

 

इस संघर्ष का प्रभाव केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहा. अमेरिका सहित अनेक यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को सैन्य सहायता प्रदान करने के साथ-साथ आर्थिक और मानवीय सहायता भी प्रदान की. उधर रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने के लिए अन्य देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध बनाए रखे. इसके चलते यूरोप में ऊर्जा सुरक्षा की प्राथमिकताएँ बदलीं; वैश्विक खाद्य तथा उर्वरक बाजारों पर भी दबाव पड़ा. भारत सहित अनेक विकासशील देशों के सामने ऊर्जा की कीमतों, खाद्य सुरक्षा, रक्षा सम्बन्धों, भू-राजनीतिक संतुलन की चुनौतियाँ उभरीं. भू-राजनीतिक विश्लेषक निश्चित ही इस पर अपना पक्ष रखेंगे कि यूक्रेन को इस युद्ध से क्या मिला किन्तु जिस तरह से यूक्रेन ने पश्चिमी देशों के समर्थन से अभूतपूर्व दृढ़ता दिखाई उससे वैश्विक स्तर पर उसकी छवि एक संघर्षशील राष्ट्र के रूप में उभरी. ये और बात है कि इस दृढ़ता के बदले में यूक्रेन को व्यापक विनाश के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ी है.

 

रूस-यूक्रेन युद्ध के सीमित युद्धविराम के स्थायी समाधान हेतु यूक्रेन पर कब्जे वाले क्षेत्रों की कानूनी स्थिति, भविष्य की सुरक्षा, विस्थापितों की वापसी, पुनर्निर्माण आदि मुद्दों पर भी दोनों देशों की सहमति आवश्यक होगी. वर्तमान नियंत्रण रेखा पर लड़ाई रोकने का समझौता निश्चित रूप से तत्काल ही जनहानि को कम कर सकता है. सीमित युद्धविराम और प्रस्तावित वार्ताओं को सम्भावित कूटनीतिक कदमों के रूप में देखना उचित है न कि युद्ध की समाप्ति के रूप में. यह युद्ध इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण समझा जाना चाहिए कि वर्तमान में युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. युद्ध के साए में समाधान नहीं बल्कि विनाश, विस्थापन, आर्थिक अस्थिरता, वैश्विक असंतुलन आदि का ही जन्म होता है. किसी समाधान की चाह में शुरू हुए युद्ध की कीमत वर्तमान समय तो चुकाता ही है, भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को भी इसका भुगतान करना पड़ता है.


23 अक्टूबर 2026

राजनीति में हिट होने का फार्मूला

हाल ही में भाजपा में शामिल हुए एक युवा, जो अब यहाँ के वरिष्ठ नेता हैं, ने आज अकस्मात हुई मुलाकात में तमाम सारी चर्चाओं के बीच सलाह ली कि कोई जुगाड़ बताइये भाजपा में हिट होने के लिए, यहाँ फेमस होने के लिए?

इस पर हमने ठहाका मारा और कहा कि यदि ये जुगाड़ हमें पता होती तो हम ही न हिट हो गए होते.


बहरहाल, बहुत सी बातों के बीच हमने अपने अनुभव को ही उसे बताया कि यदि भाजपा में स्थानीय स्तर से लेकर ऊपर तक अपनी पहुँच बनाना है, पहचान बनाना है तो किसी और दल को ज्वाइन कर लो. वहाँ पहुँचकर मीडिया के द्वारा, सोशल मीडिया के द्वारा भाजपा को, इनके नेताओं को, खासतौर से मोदी-योगी को खूब गरियाओ; इनके कामो की खूब बुराई करो; बीच-बीच में मन कर जाए तो हिंदुत्व को, हिन्दुओं को भी गाली दे डालो...... ऐसा खूब दम से करो, जी-भर के करो. जब लगने लगे कि तुम्हारी एक पोस्ट पर, एक बयान पर खूब प्रतिक्रियाएँ आने लगें; लोग तुमको गालियाँ देने लगे तो मौका ताड़कर भाजपा में शामिल हो जाओ.


अब यही सब लोग तुम्हारी जय-जयकार करेंगे; तुमको माला पहनाएँगे; तुम्हारा स्वागत करेंगे. सम्भव है कि किसी निगम-आयोग का अध्यक्ष-सदस्य भी बनवा दें. बहुत ही ज्यादा पसंद आ गए यदि तुम उनको तो कहो किसी चुनाव का टिकट देकर जितवा भी दें.


उसने मुस्कुराते हुए पैर छुए और अपना भविष्य निर्धारित करने की दिशा में बढ़ गया. हाँ, जाते-जाते कुछ नाम हवा में छोड़ गया.

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(ये काल्पनिक नहीं है, सत्य घटना पर आधारित है. ये और बात है कि इसमें बीप-बीप करने वाले शब्दों को नहीं लिखा गया है.)

 


19 अक्टूबर 2026

यूरोपीय अराजकता और भारतीय सन्दर्भ

अक्टूबर माह जहाँ एक तरफ भारतीय राजनीतिक सन्दर्भों में चर्चा के केन्द्र में है वहीं विदेश की धरती पर लगी असंतोष की आग में सुलग रहा है. इधर भारत में वोट चोरी पर विपक्ष लगातार आन्दोलित है तो उधर फ्रांस, इटली सहित अनेक विकसित देशों की सड़कों पर अराजकता फैली है. विरोध प्रदर्शन की आड़ में अराजकता के शिकार यूरोप के आधा दर्जन से अधिक देशों ने एकसाथ सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल को देखा. इन देशों में फैले जनाक्रोश का कारण बढ़ती मँहगाई, शिक्षा की बदतर स्थिति, सार्वजनिक सुविधाओं में कमी आना आदि रहा है. इनके चलते यहाँ की युवा पीढ़ी सड़क पर उतर कर आन्दोलन करने को विवश हुई. यथोचित कारणों से उपजे जनाक्रोश को अराजकतावादी ताकतों ने हिंसक बनाकर मूल कारणों को नेपथ्य में धकेल दिया.

 

आन्दोलनकारी युवाओं के साथ अराजक ताकतों के शामिल हो जाने से फ्रांस में स्थिति सर्वाधिक रूप से विध्वंसक हुई. पेरिस सहित कई शहरों में आगजनी, तोड़फोड़, लूटपाट और हिंसक झड़पों ने उग्र रूप धारण कर लिया. यहाँ की हिंसक घटनाओं का असर इसके पड़ोसी देश इटली पर भी पड़ा और यहाँ मिलान सहित अनेक शहरों में नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा. जीवनयापन के बढ़ते खर्च के विरुद्ध शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गया. इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को यह स्पष्ट करना पड़ा कि विरोध जताना नागरिकों का अधिकार है लेकिन शहरों को बर्बाद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. फ्रांस और इटली के साथ-साथ स्पेन, पुर्तगाल, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम जैसे देश भी इस समय तीव्र असंतोष की चपेट में हैं. इन देशों में विरोध का मुख्य कारण मँहगाई, आवास की समस्या, शिक्षा व्यवस्था की बदहाल स्थिति ही बताया जा रहा है.  

 


यूरोप में फैली इस अराजकता को भारतीय सन्दर्भों में देखने की आवश्यकता है. यहाँ एक बड़ा राजनीतिक वर्ग ऐसा है जो लम्बे समय से केन्द्र की स्थिर सरकार को सड़क पर अराजकता फैलाकर अस्थिर करने के प्रयास में लगा हुआ है. इस वर्ग से सम्बंधित अगुआ व्यक्तित्व आये दिन भारत के पड़ोसी देशों नेपाल
, बांग्लादेश की हिंसक गतिविधियों का समर्थन करते देखे जाते हैं. जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग जेन-जी के उग्र आन्दोलन के द्वारा संसद को उखाड़ फेंकने की मानसिकता के साथ व्यवस्था को बाधित करने का काम करते हैं. अब उन्हीं के द्वारा रिजीम चेंज करने की, फ़्रांस जैसी आग लगने की बात कहना अराजकता के संकेतक हैं.

  

राजनीतिक सन्दर्भों से इतर भी यूरोप के देशों में सुलग रही असंतोष की इस आग के दूरगामी प्रभाव हमारे देश पर भी पड़ना स्वाभाविक है. यूरोपीय बाजारों की उथल-पुथल का असर भारत के निर्यात, आईटी सेक्टर, अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है. वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने से निवेश और पूँजी प्रवाह भी प्रभावित हो सकते हैं, जिससे हमारे लघु और मध्यम उद्योगों को झटका लग सकता है. वैश्विक बाजारों में यदि अनिश्चितता का दौर आता है तो इसका प्रभाव भारतीय शेयर बाजार और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ेगा. भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी वैश्विक शक्तियों के मध्य भारत को अपनी प्राथमिकताओं को नए सिरे से निर्धारित करना पड़ सकता है.

 

विदेश में फैली इस अराजकता ने देश के आंतरिक परिप्रेक्ष्य में इसे समझने और तुलनात्मक अध्ययन करने का अवसर प्रदान किया है. यह विचारणीय है कि आखिर क्यों दुनिया के सबसे पुराने और समृद्ध कहे जाने वाले देश आज गम्भीर अस्थिरता की चपेट में हैं? आखिर भारत ने अपनी विशाल आबादी, विविधता और जटिल सामाजिक ताने-बाने के बावजूद स्वयं को किस तरह अराजकता से सुरक्षित बनाये रखा है? यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि विगत लम्बे समय से भारत को भीतर और बाहर से अस्थिर करने के प्रयास किये जा रहे हैं; यहाँ अराजकता फैलाने के मंसूबे लगातार बनाये जा रहे हैं. आज भले ही कुछ राजनीतिक अराजक तत्त्व देश के लोकतंत्र पर, यहाँ की लोकतांत्रिक प्रणाली पर सवाल उठाते हैं; यहाँ की संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध अविश्वास का वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं; अनावश्यक मुद्दों के द्वारा नागरिकों को भ्रमित करने का काम करते हैं मगर उनको समझना होगा कि भारत की सफलता का सबसे बड़ा आधार उसका मजबूत और समावेशी लोकतांत्रिक ढाँचा ही है. यही ढाँचा समय-समय पर चुनावों, बातचीत से, लोकतान्त्रिक ढंग से जनता के असंतोष को शांत करने की आन्तरिक क्षमता रखता है. देश में मजबूत पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक ताने-बाने और कल्याणकारी योजनाओं का एक ऐसा सुरक्षाचक्र उपस्थित है जो नागरिकों के जीवनयापन की बुनियादी आवश्यकताओं को सुरक्षित रखने का कार्य करता है.

 

देखा जाये तो यूरोप के नागरिकों विशेषकर युवाओं ने स्वयं को बेसहारा महसूस किया है. इसके उलट भारत की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था ने नागरिकों में एक विश्वास बनाये रखा है कि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के दायरे में कानून व्यवस्था से खिलवाड़ न हो सकेगा. वैश्वीकरण और सूचना क्रांति के इस दौर में भी भारत की वैचारिक और सांस्कृतिक सहनशीलता ने समाज को टूटने से बचाया है. यूरोपीय देशों की अस्थिरता, भारत के पड़ोस में व्यापक अस्थिरता बनी रहने और देश को भी अराजकता की आग में झोंकने के कथित प्रयासों के बाद भी यहाँ का लोकतान्त्रिक, सामाजिक ढाँचा सुरक्षित बना रहा. तमाम सारी विपरीत स्थितियों के बाद भी देश के नागरिक हितों पर आँच न आने देना इस बात का प्रमाण है कि विकास जैसे भौतिक पैमानों से किसी राष्ट्र की स्थिरता का निर्धारण नहीं होता है. किसी भी देश की स्थिरता उसके सामाजिक मूल्यों, मजबूत संस्थागत ढाँचे, स्पष्ट संवाद, लोकतान्त्रिक व्यवस्था और समावेशी शासन प्रणाली आदि के द्वारा निर्धारित होती है. इनके द्वारा ही किसी भी देश को अराजकता से बचाकर उसकी सम्प्रभुता, एकता, सुरक्षा आदि को अक्षुण्य रखा जा सकता है. अनेकानेक इंडेक्स के सहारे अपने नागरिकों का हित और खुशियाँ तलाशते पश्चिमी देशों को हमारे देश से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है.