07 December 2019

अमरत्व तो मिलना नहीं शायद नीलकंठ बनना ही लिखा हो


कई बार सामान्य सी बातचीत भी असामान्य चर्चा की तरफ मुड़ जाती है. ऐसी चर्चा किसी निर्धारित बिन्दुओं के आधार पर अथवा किसी निश्चित विषय निर्धारण के द्वारा रास्ता नहीं पकड़ती है. बस बात की बात निकलते-निकलते कहाँ चली जाती है, समझ नहीं आता है. पिछले दिनों अपने मित्र सुभाष के साथ मैसेज के द्वारा चैटिंग हो रही थी. बातचीत का रास्ता अचानक से दूसरों की समस्या की चर्चा करते-करते खुद पर केन्द्रित हो गया. अकारण, बिना बात बातचीत में एक तरह का गाम्भीर्य दिखाई देने लगा. लगा कि दिल-दिमाग की उथल-पुथल कई बार शब्दों के द्वारा ज़ाहिर होने के लिए कोई न कोई माध्यम खोजती है. सत्य क्या है? इसका अभीष्ट क्या है? बातचीत का आधार बने बिना इस तरह की चर्चा का सूत्र किसके हाथों में रहा? सवालों के बीच अनेक बार इसे पढ़ने के बाद भी निरुत्तर रहे. सो लगा कि बस अब समाधान मिले, जो किसी भी रूप में मिले. मन की, दिल-दिमाग की उलझन, उथल-पुथल को विश्राम मिले. पर फिर वही सवाल कि क्या वाकई मनोस्थिति को, उलझन को, उथल-पुथल को कभी विश्राम मिला है, किसी के जीवन में भी?



= ऐसे में अगले ने अपना विश्वास हम पर रखा है... कम से कम हम खुद की नज़रों में अपराधी नहीं होना चाहते हैं. बहुत जगहों पर हम दोषी हैं पर वे नितांत हमारी हैं, व्यक्तिगत.
+ जीवन दोषो से भरा हुआ है लेकिन दोषों को स्वीकार करना ही दोष का शमन है मनुष्य जीवन में. मनुष्य होने की सीमाएं हैं. 
= हमारे दोषों का शमन नहीं, कई जगह विश्वास तोड़ा है.
+ हमें उन सीमाओं का ज्ञान हो जाये उतना ही काफी है. जीवन इतना थोड़ा सा है भाईसाहब कि कुछ भी अभीष्ट प्राप्त नही होता.
= सही बात, मगर जो सुधारा न जा सके और ये भी जानकारी हो कि खुद के कारण बिगड़ा है तो....?
+ कम से कम सच को खुद को ईमानदारी से स्वीकार करने का साहस लाना चाहिए. बस खुद की नजरों में न गिरें. स्वीकारोक्ति भी निश्छलता का ही पर्याय है.
= कम से कम हम अपने बारे में जानते हैं, सो समझते हैं. कुछ गलतियाँ चाह कर भी सुधारी न जा सकती हैं.
+ निश्छलता हर दोष के कलंक को कम करती है. गलतियां नही सुधरती, गलतियां तो घटनाएं हैं. घटना की पुनरावृत्ति न हो यही सुधार है बस. गलतियां तो जीवन का अभिन्न चरण हैं.
= कोशिश यही है.....
+ मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी मनुर्भव का लक्ष्य शायद इसीलिए स्थापित किया गया हमारे ऋषियों द्वारा.
= जब खुद की गलती से किसी और को सजा भुगतते देखते हैं तो ये सारी फिलोसोफी गायब हो जाती है.
+ फिलोसोफी की काट केवल फिलोसोफी ही है वरना मनुष्य मन सिवा बेचैनी की खान के सिवा और क्या है? या तो खाओ पीओ सड़ते रहो, बस. जरा सा चैतन्य हुए तो गलतियां मुंह बाए खडी. फिर यही फिलोसोफी ही तिनके का सहारा है.
= कुछ स्थितियाँ समझ के बाहर हैं, खुद हमारे.
+ आप हर घटना का भौतिक समाधान करते हैं, एकदम जमीनी, प्रशासन की तरह जबकि कुछ घटनाएं राजनैतिक समाधान मांगती हैं.
= कई बार लगता है कि दुनिया जहां की स्थितियाँ सुधारने की कोशिश करते हैं और खुद गलतियों के पाताल में खड़े हैं.
+ यही आपकी जीत है कि आप अनुभव करने की योग्यता रखते हैं.
= या खुद को भ्रमित करने की?
+ कह सकते हैं.
= यही सत्य है.
+ सत्य भी कहाँ एक है? सबके अपने-अपने हैं
= ज़िन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ कि बहुत सी जगह खुद को आज तक माफ़ न कर सके. कोशिश करते हैं कि और किसी के साथ गलत न होने दें.
+ गलतियों से खुद को बांधे रखना भी तो एक बन्धन ही है. बन्धन सदा दुख आमन्त्रित करता है. गलितयों को स्वीकारोक्ति ही शमन है.
= खुद की गलतियों से  मुक्ति भी चाहिए.
+ यही जीवन भर का सन्धान शेष रह जाता है. ये तो अनवरत है, यात्रा जैसे. और कम से कम आप यात्रा में हैं.
= यही कष्ट भी है.
+ हमें यात्रा शुरू करनी है. सत्य, लेकिन कष्ट ही मुक्ति भी है शायद. सेल्फ हेल्प डिवाइस.
= कष्ट मुक्ति नहीं, प्रायश्चित है.
+ मुक्ति तो किसी ने देखी नहीं.
= गलती का दुःख कोई और भी सह रहा. उसे कहाँ मुक्ति मिली तो खुद को मुक्ति कैसे?
+ मृत्यु को मुक्ति कह नहीं सकते.
= बात मृत्यु की नहीं.
+ हम समझ रहे.
= अभी एक दिन हमने खुद के मरने का सपना देखा. हम मरे हैं, ठठरी बनी है और हम ही जिन्दा हैं, बता रहे अगले को कि कौन मर गया. समझ न सके कि है क्या ये? क्या चल रहा अचेतन में?
+ इस स्वप्न का कोई विशेष अर्थ होता होगा शायद?
= क्या जानें?
+ आप साक्षी भाव से जीवन की यात्रा में जा रहे शायद, जीवन से मोह भंग मतलब जीवन के उपक्रम से. आत्महत्या नहीं ये.
= ये कह सकते हैं. जीवन से किसी तरह का कोई मोह नहीं. खुद से मरना भी नहीं चाहते, आत्महत्या जैसा. पर कोई डर नहीं कि हमारे बाद सबका क्या होगा.
+ हम समझ रहे. जीवन का अभीष्ट शून्य ही है ये सच है. आपकी इच्छाओं की मृत्यु के सूचक हैं ये स्वप्न.
= ऐसा लग रहा, जैसे बस जी रहे. सच कहें तो इच्छाएं रही ही नहीं. बस किये जा रहे, जो मन में आया.
+ यही तो इच्छाओं की मृत्यु है. हम सब समझ पा रहे. इसी शून्य से जीवन जन्म लेता ही और इसी शून्य में.
= बस इस समय खुद से लड़ रहे, पिछले लगभग दस-बारह साल से.
+ यही तो आपके इच्छाओ की मृत्यु है क्रमशः. इसी लड़ाई से आपको अमृत मन्थना है. आप नितांत अकेले हैं इस यात्रा में. कोई आपको छू भी नहीं सकता. चाह कर भी कोई साथ नहीं चल सकता.
= पता नहीं अमृत मथेगा या हम खुद ही?
+ खुद तो सब ही मथते हैं। आप खुद के साथ साथ अमृत भी मथोगे यही आपका अभीष्ट है. अमृत तो आपको निकालना ही पड़ेगा क्योंकि आप मांग नहीं सकते भगवान से. जो भगवान से नहीं मांग सकता उसे अपना कुंआ खुद खोदना पड़ेगा. ये बात अलग है भगवान उसमें भी टेक्स लेंगे.
= बस अब समाधान चाहते हैं अपनी समस्याओं का, अपनी गलतियों का, अपने आपको मथने का. जो निकलना है, निकल आये अमृत या विष. अमरत्व तो मिलना नहीं शायद नीलकंठ ही बनना लिखा हो? 

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(बातचीत में ‘=’ चिन्ह से हमारी बात और ‘+’ के द्वारा हमारे मित्र सुभाष की)

06 December 2019

समय, परिस्थिति के हिसाब से अपने-अपने सत्य-असत्य


आज के दौर में जबकि एक तरफ संवैधानिक रूप से चलने की बात की जाती है उस समय में संवैधानिक क्या है, इसे लेकर भी संशय बना हुआ है. हैदराबाद की जघन्य घटना के बाद आम जनमानस में आक्रोश बना हुआ था और आरोपियों को जनता के हवाले करके, जनता के द्वारा हिसाब बराबर किये जाने की आवाजें उठ रही थीं. देश के सर्वोच्च सदन से भी एक सदस्य ने अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए जनता के द्वारा ही ऐसे लोगों का न्याय किये जाने की बात कही थी. किसी भी लोकतान्त्रिक देश में जहाँ कि संविधान, कानून आदि के द्वारा समाज का, सत्ता का सञ्चालन होता हो वहाँ ऐसे किसी भी तानाशाही तरीके को सहज स्वीकार नहीं किया जा सकता है. यह जानते-समझते हुए भी जो भी अपराध हो रहा है, पकड़े जाने वाले व्यक्ति अपराधी हैं, वे अपना अपराध कबूल चुके हैं इसके बाद भी जनता को सीधे तौर पर कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है. सड़कों से चाहे आक्रोशित जनता की आवाज़ उठी हो या फिर सदन के भीतर से किसी सदस्य की, सभी में आरोपियों के खिलाफ मानसिकता, महिलाओं के साथ होती आ रही जघन्य वारदातों के कारण उपजा आक्रोश था मगर सिर्फ इसी से उनको किसी तरह का न्याय करने का, कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिल जाता. 


ऐसे आक्रोश भरे दौर में जबकि लोग आरोपियों द्वारा अपना अपराध कबूल लेने के बाद भी उनको न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने को महज समय की बर्बादी मान रहे थे, किसी बड़े रसूखदार का संरक्षण समझ रहे थे, उसी समय उन चारों आरोपियों के एनकाउन्टर की खबर ने जैसे अबको चौंका दिया. अचानक से बहुत से स्वर बदले दिखने लगे. जो कल तक सड़कों पर न्याय की मांग कर रहे थे, अचानक पुलिस एनकाउन्टर के बाद मानवाधिकार की बात करने लगे. इ चारों आरोपियों की आड़ में किसी बड़े आदमी को बचाने की चर्चा करने लगे. ऐसा कुछ भी संभव है मगर इस तरह की घटनाओं से दो तरह की बातें तो साफ़ होती हैं कि क्या कानून को जनभावना के कारण ऐसा कोई भी कदम उठा लेना चाहिए? दूसरे कि क्या ऐसे कदमों से प्रशासनिक निरंकुशता बढ़ने की सम्भावना है? पुलिस द्वारा एनकाउन्टर की जो कहानी बनाई-बताई जा रही उसमें कितनी सच्चाई है, कितनी नहीं ये तो पुलिस वाले ही जानें किन्तु असल सत्य यही है कि चार ऐसे व्यक्ति मारे गए जिन्होंने अपने अपराध कबूल लिया था. यहाँ सवाल उठाने वालों के अपने सत्य हैं और उन सवालों का विरोध करने वालों के अपने सत्य हैं.

इन्हीं सवालों के साये में देखना होगा कि पिछले सात सालों से दिल्ली की सड़कों पर बर्बरता का शिकार हुई उस बेटी को कहाँ इंसाफ मिल सका है? उसके अलावा बहुत सी बेटियाँ ऐसी हैं जो अभी भी इंसाफ की तलाश में भटक रही हैं, कुछ जीवित अवस्था में और कुछ की आत्मा. क्या उनके परिजनों को यह भटकाव सही लगता होगा? आज की एनकाउन्टर की घटना एकबारगी कानूनी रूप में, संवैधानिक रूप में गलत भले लगे किन्तु उस डॉक्टर बेटी के परिजनों को किसी भी रूप में यह कदम गलत नहीं लग रहा होगा. उस परिवार से जुड़े लोगों को या फिर ऐसी किसी भी जघन्य घटना के दर्द को सह रहे लोगों को भी पुलिस का यह कदम किसी भी रूप में गलत नहीं लग रहा होगा. किसी भी घटना को दीर्घकालिक रूप में देखने की मानसिकता से बचना चाहिए. पुलिस का यह कदम जनभावना का सम्मान था या फिर किसी रसूखदार को बचाने वाला, यह तो आने वाले समय में स्पष्ट होगा. इस कदम से किसी और दूसरे राज्य सबक के तौर पर लेंगे या फिर संवैधानिक, कानूनी सुधार के रूप में, यह भी अभी नहीं कहा जा सकता है. इस तरह से आरोपियों के मारे जाने के बाद ऐसे अपराधों में किसी तरह की कमी आएगी ही, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है. कुल मिलाकर पुलिस के इस कदम ने जनाक्रोश को ठंडा करने का काम किया है. पीड़ित परिजनों के आँसू पोंछने का काम किया है. शेष तो बहुत कुछ ऐसा है समाज में जो गलत होने के बाद भी चल रहा है, जो सही होने के बाद भी समाज को स्वीकार नहीं है.

01 December 2019

मन की, देह की जकड़न तोड़नी होगी


हैदराबाद में चिकित्सक महिला के साथ हुई वीभत्स वारदात के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. इस बहस के केन्द्र में जहाँ महिलाओं की सुरक्षा है, शासन-प्रशासन की कानून व्यवस्था है वहीं इसके साथ-साथ मजहब विशेष के पुरुषों द्वारा ऐसे जघन्य घटनाक्रम को अंजाम दिए जाने पर भी चर्चाएँ आम हैं. इस्लामिक आतंकवाद की तरह से लव जिहाद समाज में पर्याप्त रूप से चलन में आ चुका है, लगभग उसी तरह से अब देखने में आ रहा है कि सामूहिक बलात्कार और उसके बाद बर्बरता के साथ महिलाओं, बच्चियों की हत्या के पीछे इस्लामिक व्यक्तियों के नाम सामने आ रहे हैं. इसे समझना होगा कि आखिर ये है क्या? क्यों इस तरह की बर्बर घटनाओं के पीछे मजहब विशेष के लोगों के नाम ही दिखाई देते हैं? आतंकवादी घटनाओं के सन्दर्भ में सदैव कहा जाता रहा है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है. यह सत्य है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होना चाहिए. कुछ लोगों के कारण सम्पूर्ण मजहब को कलंकित नहीं किया जाना चाहिए. इसके बाद भी एक बात सामने निकल कर आती है कि सभी इस्लामिक व्यक्ति आतंकवादी नहीं हैं मगर पकड़े-मारे जाने वाले सभी आतंकी इस्लामिक निकलते हैं. ये क्या है? इसे क्या कहा जाये? कुछ इसी तरह से अब बलात्कार सम्बन्धी मामलों में हो रहा है. इसमें भी बहुतायत में इस्लाम से जुड़े लोग ही अपराधी के रूप में सामने आ रहे हैं. 


बहरहाल, वर्तमान में चर्चा का विषय मजहबी आधार पर ऐसे अपराध को परिभाषित करने से ज्यादा इस पर होना चाहिए कि ऐसे अपराधों को कैसे रोका जाये. जब भी समाज में बलात्कार की चर्चा होती है तो उसके साथ ही महिलाओं के पहनावे की चर्चा की जाने लगती है. उनके समय-असमय बाहर निकलने को लेकर चर्चा की जाने लगती है. उनकी स्वतंत्रता, उनके क्रिया-कलाप पर बहस छिड़ जाती है. ऐसे में चर्चा बलात्कार के कारणों, उसके निवारणों से अलग हट कर पक्ष-विपक्ष में बंट जाती है. एक पक्ष महिलाओं के पहनावे, उसके क्रियाकलापों पर बहस करता है तो दूसरा पक्ष उम्र का सन्दर्भ देते हुए बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करने लगता है. यह सही है कि विगत कुछ समय से बलात्कार के, सामूहिक बलात्कार के मामलों में उम्र का सन्दर्भ रह ही नहीं गया है. चंद महीनों की बच्चियाँ भी दुराचार का शिकार हुईं हैं तो वयोवृद्ध महिलायें भी ऐसे व्यक्तियों का शिकार बनी हैं.

यदि समाज वाकई बलात्कार के कारण-निवारण पर चर्चा करने के मूड में हो तो उसे पहनावे, क्रिया-कलाप आदि से बाहर निकल कर उन घटनाओं की तरफ जाना होगा जो किसी भी व्यक्ति के भीतर यौनेच्छा को बढ़ावा देती हैं. क्या कभी इस बात पर गौर किया गया है कि आज किसी उत्पाद की बात हो, किसी गाने की चर्चा हो, किसी म्यूजिक एल्बम का चित्रण हो, किसी कहानी का आना हो, किसी सीरियल का दृश्य हो, किसी फिल्म का सीन हो, कोई विज्ञापन हो सभी में महिलाओं की ऐसी छवि का चित्रण किया जा रहा है जो अश्लील के समकक्ष है. ऐसा महसूस होता है जैसे किसी व्यक्ति के किसी विपरीतलिंगी के साथ यौन सम्बन्ध नहीं हैं तो उसका जीवन अधूरा है. इन दृश्यों को देखकर ऐसा लगता है जैसे जीवन का एकमात्र ध्येय महिला की नग्न देह और उसके साथ यौन खिलवाड़ करना रह गया है. ऐसे में विचार कीजिये कि यौनेच्छा के जागने के बाद उस व्यक्ति का क्या हाल होता होगा जिसके पास अपनी यौनेच्छा को शांत करने का कोई साधन नहीं? क्या कभी इस पर विचार किया गया है कि विगत कुछ समय से सामूहिक बलात्कार के मामले बढ़े हैं, बच्चियों के साथ दुराचार के मामले बढ़े हैं, बलात्कार के बाद हत्या के केस बढ़े हैं. आखिर ऐसा क्यों हुआ? सेक्स सम्बन्धी चित्रण के कारण अपने दिमाग में यौनेच्छा को जन्म देने के बाद व्यक्ति किसी सहज शिकार की तलाश में निकलता है. ऐसे में वे या तो एक समूह के रूप में अपनी वासना को शांत करने का काम करते हैं अथवा वह किसी कमजोर महिला, बच्ची को अपना शिकार बनाता है.

सामान्य रूप से देखने में आता है कि ऐसी किसी भी घटना के बाद उत्तेजना, आक्रोश, गुस्सा अपने चरम पर होता है. सरकार की तरफ से, शासन-प्रशासन की तरफ से अपनी खानापूरी कर ली जाती है और फिर जनाक्रोश शांत हो जाता है. सोशल मीडिया के कारण लोगों को अपनी अभिव्यक्ति का सहज मौका मिल जाता है. बस ऐसे में तमाम सुझाव, तमाम तरीके, तमाम कदम पेश किये जाने लगते हैं. बेटियों को सशक्त बनाये जाने, उनको आत्मरक्षा के गुण सुखाये जाने के, बेटों को संस्कारी बनाये जाने के बड़े-बड़े भाषण दिए जाने लगते हैं. ऐसे विचारों के आने के पीछे सामाजिक ढांचे को एकदम से विस्मृत कर दिया जाता है. जिस समाज में, परिवार में बेटियों को जरा-जरा सी बात पर लगभग भयभीत सा करके रखा गया होता है वहां अपेक्षा की जाती है कि वे चाकू चलायें, अपराधियों के शरीर पर घातक वार करें. जिस समय में लड़कियों में अपनी देह के प्रति एक असुरक्षा भाव होने के साथ-साथ उसका सौन्दर्य-बोध भी छिपा होता है वहां माना जाता है कि वे कोई कठोर निर्णय लेने में सक्षम हैं. जहाँ लड़कियों में जीरो फिगर के प्रति, अपनी त्वचा, देह के सौन्दर्य के प्रति आसक्ति भाव है वहां उनसे दैहिक कठोरता की अपेक्षा की जा रही है. जहाँ लड़कियाँ घर में छिपकलियों, कोक्रोचों, चूहों, अँधेरों से घनघोर तरीके से घबराती हैं वहां विचार किया जा रहा है कि वे दुर्दांत अपराधियों के छक्के छुड़ा देंगी.

असल में ये सब महज काल्पनिकता से भरी बातें हैं. जिस समाज में बेटियों के साथ घर की महिलायें ही उनकी देह से सम्बंधित बातें करने में हिचकती हैं वहां उन बच्चियों को सही-गलत कौन समझाएगा? जहाँ माना जाता है कि बेटियां दैहिक रूप से कोमल, कमजोर हैं वहां उनको दौड़ने, भागने, कूदने, चिल्लाने, वार करने, लड़ने आदि की शिक्षा कौन देगा? समाज से पहले हम सभी को अपने-अपने परिवार में ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहाँ बेटे-बेटियों में सिर्फ खान-पान, शिक्षा, पहनावे को लेकर ही विभेद समाप्त न किया जाये बल्कि उनके कार्यों, उनकी जमीनी भागदौड़, उनकी शारीरिक कसावट को लेकर भी विभेद समाप्त किया जाये. बेटों को संस्कारी बनाया जाये या न बनाया जाये मगर अपनी बेटी को इतना सशक्त अवश्य बनाया जाये कि वह लात, घूंसे, हाथों का भरपूर वार सामने वाले अपराधी पर कर सकने में सक्षम हो. बेटियों को सिलाई, संगीत, पाककला की जानकारी हो या न हो मगर उनको आत्मरक्षा के गुण आने चाहिए, उनमें आत्मविश्वास की सशक्तता हो, आत्मबल की तीव्रता हो. यह ध्यान रखना होगा कि समाज में सभी व्यक्ति न ही भले हैं और न ही सभी व्यक्ति बुरे हैं. हर भला व्यक्ति सड़क चलते सबका भला नहीं कर रहा है, उसी तरह अपराधी व्यक्ति सड़क चलते हर व्यक्ति के साथ अपराध नहीं कर रहा है. यहाँ भी अपनी तरह की मनोवैज्ञानिकता है, एक तरह की कुंठा है. इसके सन्दर्भ में समझना होगा कि ऐसे आपराधिक व्यक्तियों की कुंठा का, उसके मौके का शिकार हमारी-आपकी बेटी न बने.


30 November 2019

डरते हैं हम बवंडर आने के पहले की अपनी ही ख़ामोशी से


वर्षों पुराने दो परिचित. सामाजिक ताने-बाने के चक्कर में, शिक्षा-कैरियर के कारण चकरघिन्नी बन दोनों कई वर्षों तक परिचित होने के बाद भी अपरिचित से रहे. समय, स्थान की अपनी सीमाओं के चलते अनजान बने रहे. तकनीकी विकास ने सभी दूरियों को पाट दिया तो उन दोनों के बीच की दूरियाँ भी मिट गईं. वर्षों पुरानी दोस्ती फिर अपने पुराने स्वरूप में लौटने लगी. इस क्रम में समय, परिस्थितियों ने भी अपना असर दिखाया. कुछ ख्वाहिशों ने सिर उठाया, कुछ मजबूरियों ने कदम रोके, कुछ ज्यादा पाने की लालसा, कुछ गलतफहमियों का सामना और फिर जैसा कि होता है कुछ अबोल जैसी स्थिति बनी. दोनों के बीच कॉमन परिचित हम भी रहे. जैसा कि स्वभाव है कि दो दोस्तों के बीच, संबंधों, रिश्तों के बीच आने वाली किसी भी खटास को दूर किया जाये. कोशिश कुछ अच्छा करने की हुई मगर वह गलत साबित हो गई. उन दोनों की अबोल की स्थिति बद से बदतर स्थिति में जाती लगी. प्रयास बराबर किये मगर हमारे हाथ असफलता ही हाथ लगी.

समय ने करवट बदली. उसे शायद उतने बुरे भर से संतोष नहीं था. अभी हमारी झोली में कुछ और ज्यादा बुरा सा उसके द्वारा भेजा जाना था. फिर एक बार वही दोनों दोस्तों का घटनाक्रम आँखों के सामने से गुजरा. फिर उन दोनों के बीच की स्थिति को अपने स्तर से संवारने की, सुधारने की कोशिश की. सोचा किसी अनावश्यक विवाद को कोई और हवा न दे, सोचा किसी और के दिमाग का संदेह किसी मित्र के जीवन में जहर न घोले मगर सोचना बस सोचना ही रहा. बात सँभालने के चक्कर में और ज्यादा उलझ गई. अबकी हम गलत के साथ-साथ बुरे भी साबित किये गए. हमें खुद समझ नहीं आया कि हम बात को सही से समझा न सके या फिर दोनों दोस्तों के बीच के मतभेद को, मनभेद को हम ही सही ढंग से समझ न सके?


वैसे ये कोई नई बात नहीं कि हम कुछ अच्छा करने निकलें और उसका परिणाम बुरे के रूप में हमारे पास न लौटे. हमारे साथ ऐसा अक्सर होता है कि अच्छा करने के प्रयास में बुरा हो जाता है, न केवल बुरा बल्कि बहुत बुरा हो जाता है. किसी के साथ अच्छा करने के पीछे किसी तरह की स्वार्थी भावना भी नहीं रहती है कि एकबारगी ये लगे कि इसी सोच का परिणाम मिला. याद करते हैं अपने बीते दिनों को तो सामाजिक कार्यों के प्रति, लोगों की सहायता के लिए खुद को हरदम तत्पर देखा. उस दौर में जबकि किसी भी युवा के सामने उसका कैरियर महत्त्वपूर्ण होता है, उस दौर में भी लोगों की सहायता के लिए खुद को पीछे नहीं रखा. अपना शहर रहा हो या किसी अनजाने शहर में रहे हों, लोगों की सहायता करने के स्वभाव को न बदला. शहर का कोई भी हिस्सा रहा हो, बाजार हो, कार्यालय को, कॉलेज हो, सफ़र हो, बस हो, ट्रेन हो या फिर कहीं भी हरदम मन में यही भावना रही कि खुद के द्वारा किसी भी जरूरतमंद की जितनी मदद हो सके, कर दी जाये. कभी भी इसके बदले किसी तरह की चाह न रखी. अनेक बार तो सहायता करने के दौरान मुसीबतों से भी पाला पड़ा. लड़ाई-झगड़े की स्थिति तक बनी, कई बार कानूनी पचड़ों में पड़ने तक की नौबत आ गई मगर कहीं न कहीं लोगों की सद्भावना काम आती रही और बिना किसी बड़ी मुसीबत के सहजता से सभी मुश्किलों से निकल लोगों के काम आते रहे.

सहयोग की, अच्छा करने की भावना का कई लोगों द्वारा नाजायज फायदा भी उठाया गया. काम निकल जाने पर ऐसे बहुत से लोगों ने पहचानना भी बंद कर दिया. ऐसे-ऐसे लोगों को जो अपने एक-एक दिन के बहुतायत घंटे हमारे साथ, हमारे घर पर बिताया करते थे, वे भी अनजानों की तरह से व्यवहार करते देखे गए. अच्छा करने की भावना लिए काम करने के बदले में जब आलोचना, धोखा अथवा गलत बातें सुनने को मिलती तो कष्ट होता था. शुरूआती दौर में ऐसी बातें अन्दर तक हिलाकर रख देती थीं मगर समय ने बड़े-बड़े घाव दिए और बड़े-बड़े घावों पर मरहम भी लगाया. कुछ ऐसा यहाँ भी होता रहा. हम अपने स्वभाव के अनुसार लोगों की सहायता करते रहे, क्या अपना क्या पराया, कौन परिचित का, कौन अपरिचित यह बिना जाने-समझे सबके काम आने का प्रयास करते रहे. इस प्रयास के सुफल भी मिले. लोगों की सहायता करने के साथ-साथ सदैव से एक विचार मन में रहा कि किसी के रिश्तों में हमारे कारण खटास न आये. किसी ने यदि हमसे सम्बन्ध बनाये हैं तो वे हमारी तरफ से न बिगड़ें. विगत के अनेक वर्षों में अनेक अवसर ऐसे आये जबकि संबंधों ने, रिश्तों ने जैसे हमारी परीक्षा लेनी चाही. हमारे सबसे करीब बताने से न चूकने वाले भी मौका पड़ने पर मुंह फेरने से न चूके. बिना हमारे एक कदम आगे न बढ़ाने वाले भी हमें पीछे छोड़कर किसी और के साथ आगे निकल लिए. दोस्ती का दंभ भरने वाले लोगों के रिश्तों को बचाने के चक्कर में हम खुद चक्कर खा गए.

जब-जब प्रयास किया कि हमारे कारण लोगों के संबंधों में एकजुटता बनी रहे, हमारे साथ वालों के संबंधों में मजबूती बनी रहे, सभी के बीच आपसी विश्वास-प्रेम-स्नेह बना रहे तब-तब ही हम गलत साबित किये गए. ऐसा कुछ यदि किसी अनजान के साथ हो, अनजान के द्वारा हो तो कष्ट नहीं होता है मगर यदि ऐसा कुछ अपने लोगों के द्वारा किया जाये तो कष्ट होना स्वाभाविक है. हाल की कुछ घटनाओं ने इस बार अन्दर से हिलाकर रख दिया. सोचा न था कि इस बार किसी अपने के द्वारा हमें गलत साबित किया जायेगा. वर्षों के संबंधों को एक झटके में अपरिचित सा साबित कर दिया जायेगा. संबंधों, रिश्तों में समन्वय, विश्वास बनाए रखने की कीमत संबंधों, रिश्तों की समाप्ति जैसी स्थिति से चुकानी पड़ेगी. दो दोस्तों के बीच संबंधों में कटुता न आये उसके लिए उठाया गया कदम हमारे लिए ही घातक साबित होगा समझ नहीं आया था. इसी तरह किसी गलत बात को, अफवाह को रोकने की कोशिश में एक बार फिर अपने आपको ही गलत महसूस किया. 


जीवन में घटित होने वाला कोई भी हादसा, कोई भी घटनाक्रम सीख देता है, ये और बात है कि हम उससे कितना और क्या सीखना चाहते हैं. ऐसी घटनाएँ हमें सदैव एक तरह का पाठ पढ़ाती हैं और हम भी ऐसी किसी भी तरह की घटना से सीखने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं. किसी भी बात पर अटके रहना हमारी आदत कभी न रही है, जिसके चलते कोई बात बहुत लम्बे समय तक परेशान नहीं कर पाती है. किसी भी बुरी से बुरी घटना भी आत्मविश्वास को, आत्मबल को हिला नहीं पाती है, यही वो शक्ति है जो हमें हर गलत बात से लड़ने के लिए प्रेरित करती है, हमारी ऊर्जा बनती है. ये और बात है कि कुछ समय को अन्दर उथल-पुथल तो मचा ही जाती है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ. भीतर उठा बवंडर अब शांत है, खामोश है. उठे बवंडर के बाद की ख़ामोशी हमें नहीं डराती, डर लगता है हमें बवंडर आने के पहले अपनी ही ख़ामोशी से. खुद की शक्ति से खुद के बवंडर को खामोश करके पुनः अपने रास्ते चल पड़े हैं क्योंकि हमारी राह में बहुत से लोग ऐसे हैं जो हमारा इंतजार कर रहे हैं. बहुत से मजबूर लोग ऐसे बैठे हुए हैं जिन्हें हमारी आवश्यकता है. सहायता, सहयोग, मदद का कार्य चलता रहे, सतत चलता रहे, आत्मविश्वास, आत्मबल कमजोर न पड़े, यही कामना करते हैं खुद के लिए.

29 November 2019

बेटियों को सशक्त बनाएँ

बेटियों के साथ होने वाली किसी भी घटना के बाद एक आम पोस्ट आती है कि बेटियों के बजाय बेटों को शिक्षा दें कि वे स्त्री को एक इन्सान समझें.

हम बराबर और बार-बार कहते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष का, लड़के-लड़की का, बेटे-बेटी का भेद करने से कभी कोई सुधार नहीं आने वाला. बेटों को किसी तरह की शिक्षा दें या न दें मगर सभी माता-पिता अपनी बेटियों को ये शिक्षा अवश्य दें कि

=>> वे जीरो फिगर की फालतू अवधारणा से बाहर निकलें.

=>> वे खुद को सभी काम करने में सक्षम समझें न कि अपने भाई, पिता आदि के भरोसे रहें.

=>> शारीरिक सौष्ठव किसी भी रूप में अपमानजनक नहीं है. खुद की देह को क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक, परफ्यूम आदि की जकड़न से बाहर निकाल कसरती बनायें.

=>> घर की चाहरदीवारी में घुसे रहने की प्रवृत्ति त्याग कर खुद को मैदानी इन्सान बनाने के लिए आगे आयें. दौड़ने, भागने, कूदने आदि क्रियाओं में दक्षता हासिल करें.

=>> दिन भर मोबाइल के ऊटपटांग एप्प पर अपनी ऊर्जा को खर्च करने के बजाय अपनी ताकत को, दिमागी ऊर्जा को किसी न किसी आत्मरक्षा वाले गुण के विकास में खर्च करें.

=>> अपने घर की अन्य बुढ़िया टाइप औरतों के साथ बैठकर सास-बहू जैसे सीरियल्स में अपने दिमाग को खपाने के बजाय समाज में आसपास छिपे कुत्सित विचारों वाले जानवरों को समझने की क्षमता का विकास करें.

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ध्यान रखें, बेटों को शिक्षा देने के विचार के बहाने आप अपनी बेटियों को घरों में कैद रखने की मानसिकता का त्याग करें. जानवर किसी के बेटे नहीं होते मगर इन्हीं जानवरों का शिकार होने वाली लड़कियाँ, स्त्रियाँ आपकी नहीं तो किसी न किसी की बेटी अवश्य ही होती है.

28 November 2019

महाराष्ट्र की तिकड़ी सरकार : किसका लाभ, किसकी हानि


महाराष्ट्र में राजनीति के ऊँट ने कई बार इधर-उधर करवटें बदलते हुए अंततः उस तरह करवट ले ली, जिस तरफ किसी ने सोचा न था. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही एक ऐसा अध्याय जुड़ गया जो राजनीति की कल्पना में ही संभव कहा जायेगा. जैसा कि कहा जाता है कि राजनीति में न कोई स्थायी शत्रु है और न ही कोई स्थायी मित्र है, इसका वास्तविक उदाहरण महाराष्ट्र में हाल ही में देखने को भी मिला. पहले भाजपा द्वारा एनसीपी के अजित पवार के साथ मिलकर दो-चार दिनों की सरकार बनाई गई और फिर अचानक आये बदलाव में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी की तिकड़ी ने सरकार बना डाली. राजनीति में कब किसके साथ किसका गठबंधन हो जाये कहा नहीं जा सकता और इसके बारे में आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए क्योंकि अब राजनीति सामाजिक विकास का नहीं वरन स्व-विकास का रास्ता बन गया है. 


समझने वाली बात है बाला साहब बाल ठाकरे के समय में महाराष्ट्र की जो राजनीति मातोश्री से संचालित होती थी, वह अब वहाँ से बाहर निकल सड़कों पर तैरती दिख रही है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बाला साहब ने कभी भी अपने लिए किसी पद की चाह नहीं की बल्कि वे लगातार सत्ता का रिमोट अपने हाथ में लिए रहे. अब जबकि शिवसेना की कमान उद्धव ठाकरे के हाथ में है तब उनके द्वारा हिंदुत्व या फिर अन्य मुद्दों की राजनीति के बजाय स्वार्थ-पूर्ति की राजनीति की जाने लगी. ऐसा विगत कई वर्षों में लगातार देखने को मिला जबकि केंद्र सरकार में भाजपा की सहयोगी होने के बाद भी शिवसेना द्वारा प्रेशर ग्रुप की तरह से काम किया गया. वर्तमान राजनीति में किसी तरह के सिद्धांत, आदर्श देखने को नहीं मिल रहे हैं मगर अब देखना यह है कि महाराष्ट्र में इस तरह के बने नए तरह से गठबंधन से किसे-किसे क्या लाभ होने वाले हैं और कौन-कौन कितने घाटे में रहेगा. ऐसा विशेष रूप से भाजपा और शिवसेना के सम्बन्ध में कहा जा सकता है. देखना होगा कि क्या शिवसेना बिना भाजपा के अपने चिर प्रतिद्वद्वियों के साथ समन्वय बना पायेगी? इसके साथ ही यह देखना भी महत्त्वपूर्ण होगा कि क्या भाजपा अब बिना शिवसेना के दवाब के अपने आपमें एक बड़ा स्थान महाराष्ट्र में बना सकेगी? किसके हिस्से लाभ आया, किसके हिस्से हानि यह आने वाले कुछ दिनों में अपने आप सामने आ जायेगा.

17 November 2019

यादों के सहारे बीते दिनों की सैर


बीते दिनों से छुटकारा पाना आसान नहीं होता है. उन दिनों की बातें, उनकी यादें किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाती हैं. ये यादें कभी हँसाती हैं तो कभी रुलाती हैं. दिल-दिमाग खूब कोशिश करें कि पुरानी बातों को याद न किया जाये मगर कोई न कोई घटना ऐसी हो ही जाती है कि इन यादों से छुटकारा मिलना मुश्किल दिखाई देता है. जब अपनी विगत चालीस वर्ष की ज़िन्दगी के कुछ पलों को कुछ सच्ची कुछ झूठी में माध्यम से आप सबके सामने रखने बैठे थे तो उसके लेखन में सबसे बड़ी समस्या यही आ रही थी कि बीते दिनों में से क्या छोड़ दिया जाये, क्या लिख दिया जाये. किसी एक घटना के सन्दर्भ में लिखना शुरू करते तो उससे संदर्भित न जाने कितनी घटनाएँ सामने आ जातीं. कई बार इन यादों की आती-जाती लहरों में डूबते-उतराते हुए भी मुस्कुराते रहते और कई बार आंसुओं के सागर में डूब जाते. मुश्किल से किसी एक याद से पीछा छुड़ाकर आगे बढ़ने की कोशिश करते तो आगे किसी मोड़ पर कोई दूसरी याद रास्ता रोके खड़ी होती दिखती. बहरहाल, तमाम यादों को दरकिनार करते हुए, कई यादों के साथ हँसते-रोते अंततः कुछ सच्ची कुछ झूठी को अंतिम रूप प्रदान करवा दिया. 

यादें यहीं तक सीमित नहीं रहीं. दिन यहीं तक आकर नहीं समाप्त हुए. इनको आगे बढ़ना था, आगे बढ़कर आज भी हैरान-परेशान करने चले आते हैं. कभी अपने मित्रों से मुलाकात के दौरान, कभी घर-परिवार में सबके साथ गपशप के दौरान, कभी किसी सामान के खोजने के दौरान किसी पुरानी चीज के हाथ लग जाने पर, कभी पुराने खतों के हाथ में आ जाने के दौरान ऐसी स्थिति सामने आ ही जाती है. यादों का ये सिलसिला न कभी थमता है और कभी थमेगा भी नहीं. यादें ही वे क्षण हैं जो बिना किसी सूचना के जब चाहें चले आते हैं. इन यादों के साये में व्यक्ति भटकने का काम भी करता है, आगे बढ़ने का भी काम करता है. एकबार फिर इन्हीं यादों के साथ आगे बढ़ते हुए पुराने दिनों की सैर करने का मन है.

15 November 2019

लड़ना खुद से, जीतना-हारना भी खुद से


आज कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा था किन्तु कल से ही दिमाग में, दिल में ऐसी उथल-पुथल मची हुई थी, जिसका निदान सिर्फ लिखने से ही हो सकता है. असल में अब डायरी लिखना बहुत लम्बे समय से बंद कर दिया है. बचपन में बाबा जी द्वारा ये आदत डाली गई थी, जो समय के साथ परिपक्व होती रही. डायरी लिखने का महत्त्व भी समझ आता रहा सो डायरी लेखन लगातार बना रहा. बीच-बीच में ऐसे पल भी आये जबकि डायरी लेखन ने जीवन में काफी उठापटक मचा दी. भावनाओं का, संबंधों का अतिक्रमण करते हुए कुछ लोगों द्वारा डायरी का पढ़ना हो गया और उसका अनावश्यक दुष्प्रचार करके हमारी अपनी भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई. बहरहाल, समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता रहा, डायरी लेखन की आदत छूट न सकी और समयांतराल के साथ-साथ यह आदत बार-बार उभरती रही. हर बार कोई न कोई कारण ऐसा बनता रहा कि इसे बीच-बीच में बंद करते रहना पड़ा. इसी बीच तकनीक से परिचय हुआ, ब्लॉग का आना हुआ और डायरी लेखन की आदत कागज से हटकर डिजिटल मंच पर आने लगी. ब्लॉग कहीं न कहीं डायरी के रूप में हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया.


इधर बहुत लम्बे समय से ऐसा महसूस हो रहा है जैसे हम जीवन के विविध मंचों पर, तमाम आयामों पर असफल से होते जा रहे हैं. ऐसा नहीं कि जीवन के किसी मोड़ पर सफलता नहीं मिली हो मगर जिस तरह से असफलताओं का आना होता रहा, उसके हिसाब से सफलताएँ कम ही साथ आईं हैं. यदि एक सामान्य रूप से अपने जीवन का आकलन, विश्लेषण करने बैठ जाएँ तो असफलताओं का कैनवास बहुत बड़ा दिखाई देता है. विगत कुछ समय से अचानक ऐसी स्थितियों ने दिल-दिमाग पर जैसे कब्ज़ा सा कर लिया है. अपने आपका अपनी ही दृष्टि से मूल्यांकन किया जाता रहता है. कहाँ-कहाँ, किस-किस तरह की गलतियाँ हमारे द्वारा होती रहीं इनका विश्लेषण किया जाता रहता है. किस-किस गलती को सुधारा जा सकता है, कैसे सुधारा जा सकता है इसका भी आकलन किया जाता रहता है. भरसक प्रयास किया जाता है कि लगभग सभी गलतियों को सुधार दिया जाए. इसके बाद भी बहुत से कदम ऐसे हैं जिनको अब टाइम मशीन के द्वारा ही दोबारा पाया जा सकता है. उन कदमों के साथ हुई गलतियों को अब किसी भी रूप में सुधारा नहीं जा सकता है. ऐसे में लगता है कि उनका प्रायश्चित ही कर लिया जाए. यहाँ आकर भी सिर्फ खाली हाथ नजर आते हैं क्योंकि यह भी समय के चक्र में कहीं दूर हो चुकी स्थिति है.

फिलहाल तो आजकल अपने आपसे लड़ना हो रहा है. खुद से लड़ना, खुद से जीतना, खुद से हारना और फिर सबकुछ शून्य में विलीन होकर ज्यों का त्यों उसी अवस्था में दिखाई देने लगता है, जहाँ से लड़ना शुरू किया था. दिल-दिमाग लगाने के बाद भी हर एक स्थिति समझ से बाहर लगती नजर आती है. सबकुछ साथ होने के बाद भी साथ छूटता सा दिखाई देता है. हर गलती स्वीकारने के बाद भी, हर गलत कदम का प्रायश्चित करने के बाद भी गलतियाँ कम होने का नाम नहीं लेती हैं. तमाम सारी आदतों के बीच एक और आदत जो बाबा जी के द्वारा विकसित करवाई गई थी, रात को सोने के पहले दिन भर की गतिविधियों में से अच्छी और बुरी गतिविधियों का आकलन करना. अच्छी बातों को आगे करते रहने का संकल्प करना और बुरी बातों के लिए माफ़ी मांगते हुए आगे से न करने का वादा करना. हर रात उसी एक दिन की गतिविधियों के आकलन से शुरू होती है जो चलते-चलते अतीत तक पहुँच जाती है. अच्छी बातों के ऊपर गलत बातों का साया फैलता दिखाई देने लगता है. कब तक, कितनी बार, किस-किस से प्रायश्चित किया जाये? प्रत्यक्ष से, अप्रत्यक्ष से, चेतन से, अचेतन से, जीवित से, मृतक से न जाने किस-किस से ऐसा करना होता है, किया जा रहा है. इसके बाद भी खुद में हार जैसा, खुद में असफल होने जैसाएहसास बराबर बना रहता है. पता नहीं अन्दर से ऐसी कौन सी शक्ति विश्वास को बढाए रहती है, आत्मविश्वास को कमजोर नहीं होने देती है अन्यथा खुद के हार कर, टूट कर बिखरने में कोई कमी समझ नहीं आती है. पता नहीं कब तक ऐसा होता रहेगा?

14 November 2019

हाँ, हम दोषी हैं पर आगे बढ़ना ही होगा

हाँ, हम तुम्हारे दोषी हैं, मानते हैं. क्या करें अब? जब जो कहना चाहा था, तब तुमने सुनना न चाहा था? या फिर सुन कर भी तुमने अनसुना कर दिया था. समझ नहीं आया रहा कि हम गलत कहाँ थे, तब या अब? तब जब कि तुमसे सबकुछ कहना था तब कुछ भी कह न पाए, अब जबकि कुछ कहना न था तो सबकुछ कह दिया. हो सकता है कि हम दोषी हों, तब भी और आज भी मगर क्या सिर्फ हम ही? तब भी जब तुमको सबकुछ कहना था तब तुमने कुछ न कहा, अब जबकि तुमको कुछ न कहना था तब तुमने सबकुछ कहा. इस कहे-सुने के बीच कुछ पल ऐसे हैं जो अनुसने आज भी हैं. उन्हीं पलों को सहेजना होगा. उन्हीं पलों से साथ आगे बढ़ना होगा. 

12 November 2019

सम्बन्ध निर्वहन का आधार है आपसी जूनून

अक्सर मन में सवाल उठा करते हैं कि व्यक्ति आपस में सम्बन्ध क्यों बनाता है? आपस में दोस्ती जैसी स्थितियों की सम्भावना वह क्यों तलाशता है? क्यों दो विपरीतलिंगी आपस में प्रेम करने लग जाते हैं? क्या ऐसा होना प्राकृतिक है? क्या ऐसा मानवीय स्वभाव की आवश्यकता के चलते किया जाता है? यदि ऐसी स्थितियाँ प्राकृतिक हैं, यदि ऐसा होना मानवीय स्वभाव है तो फिर संबंधों में, रिश्तों में, प्रेम में अलगाव क्यों आ जाता है? क्यों आपसी ताने-बाने में कटुता आ जाती है? क्यों दो प्रेम करने वाले, मधुर सम्बन्ध रखने वाले लोग आपस में एक-दूसरे से मिलना-जुलना तक पसंद नहीं करते? यदि दो लोगों का आपसी मेल प्राकृतिक है तो संभव है की उनमें होने वाला अलगाव भी प्राकृतिक हो? संभव है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन की अनिश्चितता की तरह ही संबंधों में, रिश्तों में भी अनिश्चितता रहती हो? जीवन की अनिश्चितता को जानते-समझते हुए भी व्यक्ति अपने भविष्य के लिए, अपने परिजनों के भविष्य के लिए जैसे उस अनिश्चितता को जीत लेना चाहता है. ठीक इसी तरह से व्यक्ति के क्रिया-कलाप देखकर उसकी मानसिकता, उसके हाव-भाव देखकर लगता है जैसे वह संबंधों को, रिश्तों को भी सदा-सदा के लिए अपने नियंत्रण में ले लेना चाहता है. 


कतिपय व्यक्तिगत संबंधों के निर्वहन के पश्चात्, अपने आसपास के अनेक संबंधों के आगे बढ़ने, उनमें व्यवधान आने के अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर ऐसा महसूस होता है जैसे संबंधों, रिश्तों का भी अपना एक जीवन होता है. इस जीवन में उसी समय तक स्फूर्ति, तरलता बनी रहती है जब तक कि उनको आगे बढ़ते रहने का कोई आधार मिलता रहे. जैसे किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए किसी तरह के लक्ष्य की आवश्यकता होती है, उसके लिए किसी तरह के जूनून की आवश्यकता होती है. कुछ इसी तरह का सन्दर्भ रिश्तों, संबंधों के निर्वहन से लिया जा सकता है. जब तक दो संबंधों के बीच आपस में जूनून जैसा कुछ नहीं है, तब तक उनके आगे बढ़ते रहने की सम्भावना पर संशय बना रहता है. इसी तरह संबंधों, रिश्तों में भविष्य के प्रति किसी तरह का लक्ष्य होना भी आवश्यक है, बिना इसके सम्बन्ध निर्वहन की तरलता में कमी आती है. ऐसा नहीं कि लक्ष्य के लिए किसी स्वार्थ का होना ही हो, ऐसा नहीं कि लक्ष्य के लिए किसी तरह के आर्थिक आधार का होना आवश्यक हो. लक्ष्य का आधार, उसका स्वरूप किसी भी तरह का हो सकता है. लगातार मिलते रहने की ललक, मिलकर कुछ नया करने की भावना भी इसी तरह का लक्ष्य कहा जा सकता है. इस तरह के लक्ष्य का निर्माण आपसी जूनून से ही संभव होता है. यही जूनून सम्बन्ध निर्वहन की आधारशिला होता है.