16 January 2018

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक का अनावश्यक विरोध

तीन तलाक विधेयक मामला इस समय देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. एक तरफ इसे राजनैतिक कदम बताया जा रहा है वहीं दूसरी तरह इसे मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में उठाया गया सकारात्मक कदम बताया जा रहा है. सम्पूर्ण प्रकरण मार्च 2016 में उतराखंड की महिला शायरा बानो ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित करने की माँग के साथ शुरू हुआ. शायरा बानो की याचिका के बाद सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने बहुमत के निर्णय से एक साथ तीन बार तलाक देने की प्रथा को निरस्त करते हुए इसे असंवैधानिक, गैरकानूनी और शून्य करार दिया. अदालत ने कहा कि यह प्रथा कुरान के मूल सिद्धांत के खिलाफ है. प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने 365 पेज के फैसले में तीन तलाक यानि कि तलाक-ए-बिद्दत को निरस्त करते हुए इस प्रथा पर छह महीने की रोक लगाने की हिमायत के साथ-साथ सरकार से कहा कि वह इस संबंध में कानून बनाए. निर्णय में यह भी कहा गया कि यदि केन्द्र छह महीने के भीतर कानून नहीं बनाता है तो तीन तलाक पर यह अंतरिम रोक जारी रहेगी.


सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा द मुस्लिम वीमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स इन मैरिज एक्ट नाम से विधेयक लोकसभा में पेश किया गया. लोकसभा ने इस मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2017 को मंजूरी दे दी. इसके बाद इसे कानून बनाने की दृष्टि से उच्च सदन यानि कि राज्यसभा में भेजा गया. राज्यसभा में केंद्र सरकार का बहुमत न होने के कारण सभी को इस बात का अंदेशा था कि वहां विपक्ष इस विधेयक को पारित नहीं होने देगा, और ऐसा हुआ भी. इस विधेयक को प्रस्तुत करते समय कानून मंत्री ने सदन से चार अपील की थी कि इस बिल को सियासत की सलाखों से ना देखा जाए, इस बिल को दलों की दीवारों में ना बांटा जाएइस बिल को मजहब के तारजू पर ना तोला जाए और इस बिल को वोट बैंक के खाते से ना देखा जाए. उसके बाद भी तमाम राजनैतिक दलों द्वारा भी इस विधेयक के विरोध में उठाया गया कदम समझ से परे है. विधेयक में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि अगर कोई तीन तलाक देता है तो उसको तीन साल की सजा के साथ जुर्माना होगा. इसके अनुसार पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है. इस मुद्दे पर अंतिम फैसला न्यायाधीश ही करेंगे.

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और केंद्र सरकार की तत्परता को देखते हुए जहाँ मुस्लिम महिलाओं में प्रसन्नता का माहौल बना वहीं कट्टर इस्लामिक व्यक्तियों में इसे लेकर आक्रोश देखने को मिला. केंद्र सरकार के इस फैसले का विरोध ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा किया गया है. बोर्ड का कहना है कि यह उनका मजहबी मामला है और इसमें किसी बाहरी का हस्तक्षेप मंजूर नहीं. तलाक-ए-बिद्दत को बोर्ड शरीयत का कदम स्वीकारता है और इसे कुरान की सहमति बताता है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा जिस कुरान की दुहाई दी जा रही है, जिस शरीयत की बात की जा रही है उसमें भी इस तरह के कृत्य का प्रावधान नहीं है. इस्लाम में भी तलाक को बुरा माना गया है. इसके बाद भी ऐसी व्यवस्था की गई है कि यदि पति-पत्नी में किसी भी तरह से सामंजस्य नहीं हो पा रहा है तो वे अलग होकर अपनी ज़िन्दगी को अपनी मर्ज़ी से बिताएं. इसी कारण से विश्व भर में कानूनन तलाक़ की व्यवस्था को संवैधानिक स्थिति प्राप्त है. इस्लाम में भी पैगम्बरों के दीन (धर्म) में तलाक़ की गुंजाइश बनाये रखी गई है. कुरान में कहा गया है कि अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है. (सूरेह निसा-35). कुरान में इसके बाद इद्दत की व्यवस्था है और यदि पति, पत्नी में इस दौरान सुलह हो जाती है तो तलाक का फैसला वापस लिया जा सकता है. इस सम्बन्ध में सूरेह बक्राह-229 में व्यवस्था है कि फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं. इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही रुजू करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं.

मुस्लिम पर्सनल बोर्ड को शायद ये बातें दिखाई नहीं देती हैं या फिर वह किसी राजनैतिक लाभ के चलते मुस्लिम महिलाओं के हितार्थ बनने वाले इस कानून का विरोध कर रहे हैं. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि जब तीन तलाक को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जब तीन तलाक व्यवस्था को गैर-कानूनी अर्थात अपराध बताया गया है तो फिर ऐसे अपराध की सजा में क्या समस्या है. इस विधेयक के विरोधियों द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा रहा है कि आखिर तीन साल की सजा होने पर, यह मामला गैर-जमानती होने का क्या दुष्प्रभाव समाज पर पड़ेगा? दरअसल जिस तरह की मजहबी कट्टरता इस्लाम में अभी तक व्याप्त है उसके अनुसार इस्लामिक कट्टरपंथी किसी भी रूप में अपनी महिलाओं को स्वतंत्र देखना नहीं चाहते हैं.


अब जबकि केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालयय के निर्णय के बाद सक्रियता दिखा रही है तब सभी लोगों को मिलकर मुस्लिम महिलाओं के हितार्थ आगे आने की आवश्यकता है. एक बार में, एकसाथ तीन तलाक बोलकर, ई-मेल करके, लिखकर, मोबाइल से सन्देश भेजकर आदि तमाम तरह से मुस्लिम महिलाओं को बेघर कर दिया जाता रहा है. उस समय तमाम राजनैतिक दलों ने, मुस्लिम बोर्ड ने विचार नहीं किया कि उन महिलाओं का सहारा कौन बनेगा? उनके लिए गुजारा भत्ता कहाँ से आएगा? उनके बच्चों का भविष्य क्या होगा? अब जबकि ऐसा कृत्य गैर-जमानती अपराध बनने वाला है, तीन साल सजा का प्रावधान होने वाला है तब सभी को इसकी चिंता सताने लगी. देखा जाये तो यह पूरी तरह से वोट-बैंक का खेल है. भाजपा के बढ़ते जनाधार के चलते सभी तरफ से अपनी-अपनी जमीन खो चुके राजनैतिक दलों के पास और कुछ शेष नहीं है. वे अपने खोये हुए जनाधार को इस विधेयक के विरोध के बहाने वापस पाने का मंसूबा लगाये बैठे हैं. इससे पूर्व भी शाहबानो प्रकरण में राजनीति अपना खेल दिखाकर मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ काम कर चुकी है. अब इक्कीसवीं सदी में कम से कम देश में इस बदलाव के प्रति सकारात्मकता दिखाए जाने का अवसर है. केंद्र सरकार मुस्लिम महिलाओं के हितार्थ कार्य कर ही चुका है अब विपक्ष के पास अवसर है कि वह इस विधेयक के पक्ष में खड़े होकर अपनी स्थिति को कुछ हद तक सुधार ले. न सही मुस्लिम महिलाओं के हितार्थ, अपने मुस्लिम वोट-बैंक को वापस पा लेने के अपने राजनैतिक लाभ के लिए ही इस विपक्ष को विधेयक के पक्ष में खड़ा होना चाहिए.

15 January 2018

निष्प्रभावी है नोटा (NOTA)

हाल ही में संपन्न हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में नोटा को मिले मतों के चलते यह फिरसे चर्चा में आ गया है. गुजरात चुनाव में पाँच लाख से अधिक मतदाताओं द्वारा नोटा का प्रयोग करना इसके चर्चा का आधार नहीं बना बल्कि गुजरात में नोटा का इतना अधिक प्रयोग करना इसकी चर्चा का आधार बना. गुजरात विगत कई वर्षों से राष्ट्रीय राजनीति में, मीडिया में चर्चा का विषय बना रहा है. अब तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वहाँ से होना भी गुजरात को और भी अधिक चर्चा में बनाये रखता है. इसके साथ-साथ सौ से अधिक विधानसभाओं में नोटा भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर पर रहा. ये भी अपने आपमें चर्चा का विषय होना चाहिए था मगर उससे ज्यादा चर्चा का विषय यह रहा कि गुजरात में नोटा के द्वारा मतदाताओं ने भाजपा को नकारने का काम किया. फ़िलहाल इन राजनैतिक चर्चाओं से इतर यदि मतदाताओं द्वारा नोटा के प्रयोग किये जाने पर ही गौर करें तो गुजरात के अलावा अन्य विधानसभाओं के नोटा मतों की संख्या हैरान करने वाली है. हालिया विधानसभा चुनावों में बिहार में नोटा को 9 लाख 47 हज़ार 276 वोट मिले जो कुल पड़े वोट का 2.5% है. पश्चिम बंगाल में 8 लाख 31 हजार 835, तमिलनाडु में 5 लाख 57 हजार 888, गुजरात में 5 लाख 51 हजार 615 और केरल में 1 लाख 7 हज़ार लोगों ने नोटा दबाया. यदि लोकसभा चुनाव परिणामों को देखें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 60 लाख लोगों ने नोटा का विकल्प चुना. यह 21 पार्टियों को मिले वोटों से ज़्यादा है.


इस समय देश में शायद ही कोई ऐसा हो जो नोटा के बारे में न जानता हो. नोटा (NOTA) का अर्थ None of the Above यानि इनमें से कोई नहीं है. इसका अर्थ यह है कि अगर मतदाता को उनके क्षेत्र के विभिन उम्मीदवारों में से कोई भी सही नहीं लग रहा है तो वह NOTA का बटन दबा सकता है. ईवीम मशीन में None Of The Above (NOTA) का गुलाबी बटन होता है. नोटा को लेकर चुनाव आयोग ने 2009 में कोर्ट के सामने इच्छा जताई थी कि मतदाताओं को यह सुविधा उपलब्ध कराई जाए. सन 2004 में एक संस्था द्वारा दायर की गई याचिका पर लम्बी बहस के बाद सन 2013 में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के जरिये NOTA को चुनाव में जगह दिलवाई. 27 सितम्बर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नकारात्मक वोट भी (अनुच्छेद 19-1ए) के अन्तर्गत अभिव्यक्ति की आजादी का संवैधानिक अधिकार है, जिसके लिए मनाही नहीं की जा सकती. इसके बाद ही नोटा को चुनावों में शामिल होने का मौका मिला. भारत के अलावा कोलंबिया, यूक्रेन, ब्राजील, बांग्लादेश, फिनलैंड, स्पेन, स्वीडन, चिली, फ्रांस, बेल्जियम, यूनान आदि में नोटा लागू है. रूस में 2006 तक यह विकल्प मतदाताओं के लिए उपलब्ध था. माना जाता है कि मतपत्र में नोटा का पहली बार प्रयोग 1976 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में इस्ला विस्टा म्युनिसिपल एडवाइजरी काउंसिल के चुनाव में हुआ था. वैसे नोटा लागू होने के पहले भी मतदाता के पास किसी को भी अपना मत नहीं देने का अधिकार था मगर उसे अलग से एक फॉर्म भरना होता था और अपनी पहचान बतानी होती थी. ईवीएम में नोटा का विकल्प होने से अब पहचान जाहिर करने की जरूरत नहीं है. 2013 से वोटिंग मशीन में नोटा का प्रयोग हो रहा है. चुनावों के दौरान मत देने के लिए तो प्रोत्साहित किया जाता है मगर नोटा का बटन दबाने के लिए ऐसा नहीं किया जाता. इसके बाद भी नोटा लोकप्रिय होता जा रहा है.

नोटा लागू करने का फैसला राजनीति से भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए किया गया. माना जा रहा है कि इस कदम से राजनीतिक दल साफ-सुथरे प्रत्याशियों को टिकट देंगे. दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा. नोटा के लिए पीयूसीएल संस्था ने 2004 से इसकी लड़ाई लड़ी है. NOTA का कानून लाने के लिये पहले तो सरकार राजी नहीं थी. एक NGO-पीपुल्‍स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चलते केन्द्र मे बैठी कांग्रेस सरकार NOTA का विकल्प देने पर तो सहमत हो गयी लेकिन इसके नियमों के कारण  NOTA पूरी तरह बेअसर हो जाता है.

NOTA कैसे बेअसर है, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. माना किसी निर्वाचन क्षेत्र में तीन उम्मीदवार X, Y, Z हैं. मतदाता उन्हें वोट नहीं देना चाहते और NOTA का इस्तेमाल करते हैं. यदि कुल 100000 मतदाता हैं और यह मानते हुये कि शत-प्रतिशत मतदान होता है. 90000 मतदाता NOTA का बटन दबाते हैं. शेष 10000 मतदाता जो वोटिंग करते है, उसके परिणाम कुछ इस प्रकार से हैं-
X को 3333 मत, Y को 3333 मत, Z को 3334 मत.
इस तरह उम्मीदवार Z जिसे 3334 (सर्वाधिक) वोट मिले हैं, उसे विजयी घोषित कर दिया जायेगा. नोटा में मिले नब्बे हजार मतों का कोई लाभ नहीं हुआ.

दरअसल मतगणना के दौरान नोटा मतों की गिनती उसी प्रकार होती है जिस प्रकार उम्मीदवारों के मतों की गिनती होती है लेकिन किसी भी स्थिति में इन मतों की वजह से चुनाव निरस्त नहीं होगा. नोटा को लोगों ने राइट टु रिजेक्ट के तौर पर लिया लेकिन चुनाव आयोग यह स्पष्ट कर चुका है कि नोटा राइट टु रिजेक्ट नहीं है. यदि किसी चुनाव क्षेत्र में सभी उम्मीदवारों से अधिक मत नोटा को मिल जाते हैं तो भी सबसे अधिक मत पाने वाला उम्मीदवार ही विजयी होगा. कानूनन नोटा को मिले मत, अयोग्य मत हैं जिनका कोई मतलब नहीं है. चुनाव में हार-जीत का फैसला योग्य वोटों के आधार पर ही होता है, चाहे उम्मीदवार को सिर्फ एक वोट ही क्यों न मिला हो. यहां तक कि उम्मीदवारों की जमानत जब्त करने के लिए भी नोटा वोटों को नहीं माना जाता. जमानत जब्त करने के लिए कुल पड़े योग्य वोटों का 1/6 हिस्सा ही गिना जाता है.  


अब सवाल यह है कि जब चुनाव पर नोटा का कोई असर नहीं पड़ता तो फिर नोटा क्यों? एक जागरूक एवं जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमारा दायित्व है कि हम सरकार ने नोटा कानून में संशोधन की मांग करें. यदि किसी चुनाव में नोटा को सर्वाधिक मत मिलते हैं तो वहां का चुनाव रद्द करके फिर से चुनाव कराए जाएं. जिन नेताओं के खिलाफ लोगों ने नोटा इस्तेमाल किया है उनके आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगना चाहिये जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था को नए आयाम मिलें. नए प्रत्याशी आएं और हम उनमें से अच्छे प्रत्याशी का चुनाव कर सकें. अगर ऐसा नही होता तो नोटा का कोई मतलब नहीं है. पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी.एस. कृष्णमूर्ति ने उन निर्वाचन क्षेत्रों में फिर से चुनाव कराने की वकालत की है जहां जीत का अंतर नोटा की तुलना में कम रहे और विजयी उम्मीदवार एक तिहाई मत जुटाने में भी नाकाम रहे. उन्होंने पीटीआई को बताया कि इस उपाय को लागू करने के लिए कानून बनाने की जरूरत है. 

14 January 2018

विशेष के मायने तय करने होंगे अब

माननीय न्यायाधीशों का मीडिया के द्वारा देश के सामने आ जाना अपने आपमें आश्चर्यजनक है. इसको ऐसे किसी रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि चार न्यायाधीशों के मीडिया में दिए गए वक्तव्य से कोई तूफ़ान आ गया हो. इसे ऐसे भी नहीं समझना चाहिए कि ये किसी भी तरह से लोकतंत्र पर तमाचा है. किसी भी तरह के आकलन के पहले न्यायालयीन व्यवस्था को जानने-समझने की जरूरत है. और विडम्बना ये है कि बिना कुछ जाने-समझे हम सभी लोग किसी भी घटना के सन्दर्भ में अपने-अपने खाँचे में उसे फिट करने लगते हैं.


न्यायालयीन प्रक्रिया में पारदर्शिता से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण निष्पक्षता को बनाये रखने के लिए एक तरफ की घोषित-अघोषित व्यवस्था की गई है कि न्यायाधीश किसी तरह से खुद को सार्वजनिक नहीं करेंगे. इसके अंतर्गत उनका समारोहों, कार्यक्रमों, प्रेस वार्ता आदि को लेकर किंचित नियम से बना दिए गए हैं. न्याय की, न्यायालय की, न्यायाधीशों की गरिमा बनी रहे इसके लिए उनके प्रति असम्मान दिखाए जाने को भी अत्यंत गंभीर अपराध सा माना गया है. न्याय प्रक्रिया के प्रति भले ही एक तरह का सम्मान-भाव समाज के सामने दिखाया जाता रहा हो किन्तु विगत कई वर्षों की न्यायिक प्रक्रिया के चलते आमजन का न्यायालयीन व्यवस्था से मोह भंग सा हुआ है. इसी मोह-भंग का परिणाम है कि बहुतेरे मामलों में जनता ने कानून को हाथ में लेकर खुद ही न्याय करना शुरू कर दिया है. न्यायालयों के प्रति, न्यायाधीशों के प्रति, अधिवक्ताओं के प्रति कतिपय कानूनी प्रक्रिया के दांव-पेंच में उलझने से बचने के लिए आमजन खुलेआम उसके प्रति अशिष्टता नहीं दिखा पा रहा है. ऐसा भले हो किन्तु सम्पूर्ण व्यवस्था के प्रति रोष तो है ही.

कहीं न कहीं ऐसा कुछ न्यायालयीन व्यवस्था में संलग्न लोगों में भी होता होगा. ऐसा संभव ही नहीं कि अपने भीतर की व्यवस्था, अव्यवस्था से परिचित न्यायाधीश नहीं होंगे. ऐसा भी संभव नहीं कि बरसों-बरस न्याय की आस में भटकती जनता के आक्रोश, रोष का भान माननीय न्यायाधीशों को नहीं होगा. जिस तरह से न्यायालय से बाहर अपने मनोनकूल वातावरण देखे जाने की व्यवस्था बना ली गई है, संभव है कि उसके भीतर कुछ इसी तरह की व्यवस्था बनने लगी हो. मनोनकूल व्यवस्था के चलते महत्त्वपूर्ण केस इधर से उधर हस्तांतरित किये जाने लगे हों, जैसा कि संकेत दिए गए. इस स्थिति के कारण उसी तरह की हताशा इन माननीयों में प्रकट होना ज़ाहिर है जैसी कि आमजन में अपने न्याय का रास्ता देखते-देखते पनपने लगती है. संभव है कि लगातार कई-कई मामलों में हस्तांतरण की गति देखने के बाद इनका मानसिक संतुलन उस संयम का परिचय न दे सका हो जैसा कि इनसे अपेक्षा की जाती है. इसके चलते वे माननीयजन कतिपय बयान देते नजर आये. समझने वाली बात है कि उनका किसी भी तरह का कोई सार्वजनिक जीवन नहीं दिखाई देता है. अपने कार्यकाल के दौरान वे माननीयजन सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कारागार सी स्थिति गुजार रहे होते हैं, जहाँ तमाम तरह की औपचारिकताओं की भरमार होती है. इनके मध्य संभव है कि अपने मन की अकुलाहट को अपने किसी बहुत ख़ास (विशेष) के सामने रखने की कोशिश में उसकी सलाह पर वे लोग मीडिया के सामने उतर आये.


आखिर 'देश में लोकतंत्र खतरे में है' के द्वारा किसी विशेष को नुकसान पहुँचाना और किसी विशेष को सहायता पहुँचाना अवश्य ही रहा होगा. कौन नुकसान में रहेगा, कौन फायदे में रहेगा इसका आकलन होना शेष है किन्तु मीडिया के सामने आकर न्यायाधीशों ने देशव्यापी एक नई बहस अवश्य ही आरम्भ करवा दी है. सामान्यजन जैसे उनके कदम से अब इस पर भी विचार किया जाना अपेक्षित है कि आखिर उनके विशेष स्थान, विशेष महत्त्व के क्या मायने हैं?

13 January 2018

प्रोत्साहन बिना कैशलेस व्यवस्था सफल नहीं

नोटबंदी के बाद सरकार कैशलेस अर्थव्यवस्था अपनाने की बात कर रही है. जनता को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वह अधिक से अधिक लेन-देन डिजिटल माध्यम से करे. इसके बाद भी सरकार की तरफ से ऐसे कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जो जनता को इसके लिए प्रोत्साहित करे. सरकार की तरफ से नकद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिए दो लाख रुपये से अधिक के नकद लेन-देन पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. इसका उद्देश्य जहाँ एक तरफ बैंकों में भीड़ को कम करना है वहीं दूसरी ओर इसके द्वारा काला धन, नकली मुद्रा, भ्रष्टाचार को कम करना या रोकना भी है. यह सच है कि यदि समाज में अधिक से अधिक लेन-देन नकदी के स्थान पर डिजिटल माध्यम से होने लगे, इंटरनेट बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, एटीएम आदि का उपयोग अधिक से अधिक होने लगे तो काले धन को, नकली मुद्रा को नियंत्रण में रख पाना सहज हो जायेगा. नोटबंदी के पहले तक जिस तरह से लोगों में नकद लेन-देन के प्रति एक प्रकार का मोह देखने को मिलता था, वो अभी भी दूर नहीं हुआ है. क्रेडिट कार्ड अथवा इंटरनेट बैंकिंग के प्रति अभी भी उतनी जागरूकता नहीं आई है, जितनी की अपेक्षित थी. इसके पीछे एक ओर तो समाज की बहुसंख्यक जनता का डिजिटल माध्यमों के साथ दोस्ताना सम्बन्ध विकसित न कर पाना है. इसके साथ ही साथ सरकारी स्तर पर डिजिटल विनिमय को बढ़ावा देने के लिए भी प्रोत्साहन योजनाओं की जबरदस्त कमी देखने को मिल रही है. इसके उलट सार्वजनिक क्षेत्र के अग्रणी बैंक भारतीय स्टेट बैंक द्वारा नकद जमा-निकासी पर, एटीएम के उपयोग पर अपना ही नया नियम लागू कर दिया गया है. इससे आमजन के नकारात्मक रूप से प्रभावित होने की आशंका बढ़ी है.


सरकार के साथ-साथ बैंक भी चाहती हैं कि उनके पास कम से कम भीड़ पहुँचे और इसके लिए उनके द्वारा समय-समय पर इस तरह की योजनायें लागू की जाती हैं जो जनता को घर बैठे सुविधाएँ मुहैया कराती हैं. इधर भारतीय स्टेट बैंक द्वारा तीन बार नकद जमा के बाद जमा पर शुल्क लगा दिया है. ये शुल्क नाममात्र को नहीं वरन इतना है कि आम खाताधारक की जेब पर असर डालेगा. यहाँ यदि सरकार का अथवा बैंक का ये विचार हो कि लोगों की नकद जमा-निकासी की सीमा बनाकर उनको डिजिटल विनिमय के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा तो ऐसा सोचना उसकी भूल है. ऐसा उनके लिए तो सहज हो सकता है जो वेतनभोगी हैं किन्तु उनके लिए कतई सहज नहीं है जिनको महीने भर फुटकर-फुटकर धन मिलता रहता है. ऐसे में ये लोग अपने धन को बैंक में जमा करने के स्थान पर अपने पास ही संग्रहित करके रखना शुरू कर देंगे. ये स्थिति जहाँ एक तरफ डिजिटल विनिमय माध्यम को हतोत्साहित करेगी वहीं दूसरी तरफ धन-संचय की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर मुद्रा को चलन से दूर करेगी. इसके अलावा खाते में न्यूनतम मासिक जमाराशि को लेकर भी भारतीय स्टेट बैंक द्वारा बनाया गया नियम गले से नीचे न उतरने वाला है. चाहे मेट्रो शहर हों अथवा ग्रामीण इलाके, सभी में आमजन की स्थिति ये है कि उसके लिए एक-एक रुपये का महत्त्व होता है. ये देखने में भले ही न्यूनतम राशि समझ आ रही हो किन्तु उनके लिए बहुत बड़ी धनराशि है जिनके पास धनोपार्जन के न्यूनतम अथवा सीमित साधन हैं. ऐसे में न्यूनतम मासिक जमाराशि रखना उनकी मजबूरी हो जाएगी. इस मजबूरी के चलते उनका पारिवारिक बजट गड़बड़ाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है. इसके अलावा अभी हाल ही में रिजर्व बैंक की तरफ से जारी नए नियमों के चलते तो नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग पर भी चार्ज बढ़ाये जाने के संकेत मिले हैं. ऐसी व्यवस्था जनता को हतोत्साहित ही करेगी.


यदि सरकार को अथवा बैंकों को डिजिटल माध्यम को प्रोत्साहित करना है तो उन्हें आमजन को कुछ लाभ देने होंगे. डिजिटल लेन-देन को विकसित करने के लिए सरकार को चाहिए कि क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड आदि से भुगतान करने पर न्यूनतम टैक्स लेने की व्यवस्था समाप्त की जाये. इससे सामान्य उपभोक्ता बड़ी रकम को कार्ड के माध्यम से भुगतान करने से बचता है. इसी तरह इंटरनेट बैंकिंग में भी भुगतान करने पर टैक्स लगाया जाता है. इससे भी उपभोक्ता के अन्दर हिचकिचाहट पैदा होती है. इसके अलावा तकनीकी रूप से अभी इंटरनेट सेवाएँ अभी इतनी उन्नत और सशक्त नहीं हो सकी हैं कि आमजन आर्थिक लेन-देन के लिए इस प्रणाली पर पूर्णरूप से विश्वास करने लगे. आये दिन होती धोखाधड़ी के चलते, एटीएम में धन के फँसने, भुगतान के समय इंटरनेट सेवा बाधित होने के चलते भी उपभोक्ता में भय का माहौल बना रहता है. इससे भी वह डिजिटल माध्यमों से भुगतान के लिए खुद को प्रेरित नहीं कर पाता है. सरकार को, उसके सहयोगी अंगों को चाहिए कि वे पहले मूलभूत सुविधाओं को उन्नत और विकसित करें. कार्ड के लेन-देन के साथ-साथ इंटरनेट बैंकिंग में लगने वाले शुल्क को समाप्त करें. डिजिटल माध्यम से भुगतान करने वालों को किसी तरह से लाभान्वित करें. भारतीय स्टेट बैंक द्वारा लागू किये गए हालिया नियमों को जनहित में, कैशलेस व्यवस्था के हित में तत्काल प्रभाव से रद्द करें. यदि सरकार इस तरह के कदम नहीं उठाती है, जिससे आम उपभोक्ता स्वयं को लाभान्वित महसूस करे, सुरक्षित महसूस करे तब तक डिजिटल माध्यमों को, कैशलेस व्यवस्था को पूर्णरूप से लागू कर पाना दूर की कौड़ी समझ आती है. 

12 January 2018

फिर याद आया विवेकानन्द मेमोरियल रॉक


पहले दिन समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक के दर्शन करने के बाद उसको एकदम करीब से देखने की चाहत और बढ़ गई थी. सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य देखने के बाद सूर्योदय देखने की उत्कंठा बढ़ गई. बहरहाल दो दिन की यात्रापहले दिन का समुद्र तट का जबरदस्त भ्रमण तन-मन को बाहरी रूप में भले ही न थका सका हो मगर अंदरूनी रूप से ये दोनों आराम चाह रहे थे. ये तो नहीं कहेंगे कि पलंग पर हमारे बिछते ही नींद ने हमें घेर लिया क्योंकि तन-मन भले शांति चाह रहे थे मगर दिमाग अगले दिन की तैयारियों में भागदौड़ करने में लगा हुआ था. सुबह उठना हैसूर्योदय देखना हैफिर रॉक जाना हैबहुत-बहुत सी फोटो निकालना हैकैमरे की बैटरी को फुल्ली चार्ज रखना हैपैर में दिक्कत न हो इसका बंदोवस्त करना है आदि-आदि सोचा-विचारी में दिमाग लगा रहा. दिमाग को शांत न होता देखकर तन-मन ने उसको अकेला छोड़ दिया और नींद की गोद में जा छिपे. 

भोर में उठाने के लिए मोबाइल से ज्यादा दिमाग सक्रिय था. इससे पहले कि मोबाइल घनघनातादिमाग ने अपनी बत्ती जला दी. आश्चर्य कि हम तो उठे ही बिटिया रानी हमसे ज्यादा चैतन्य रूप में बैठी हुई थी. स्कूल जाने की आनाकानी यहाँ नहीं दिख रही थी. फटाफट हम सब तैयार होकर विवेकानन्द केंद्र परिसर के आखिरी छोर पर चल दिए. पक्की सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे पेड़इधर-उधर नाचते मोर मन को मोह रहे थे. कई-कई सहयात्रियों के साथ चलते-चलते हम लोग भी सूर्योदय स्थल पर पहुँचे. कैमरामोबाइल कैमरासेल्फी स्टिक सब अपने-अपने काम को अंजाम देने के लिए तैयार थे. ओह गज़ब! मुँह खुला का खुला रह गया. कल दोपहर से शाम तक देखे गए समुद्र से एकदम अलग रूप दिख रहा था समुद्र का. बाँयी तरफ से सूर्य निकलने का संकेत मिल रहा था और दाँयी तरफ विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पूरी गरिमा-भव्यता से खड़ा हुआ था. सामने से दूधिया लहरें काली रेत पर बिखर-बिखर जा रही थी. धीरे-धीरे सूर्योदय होने लगा. रजत रश्मियाँ बिखर-बिखर कर समूचे समुद्र को रजतमय बनाने लगीं. 


विवेकानन्द केंद्र से रॉक मेमोरियल
हम सब सम्मोहित से किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में खड़े हुए थे. बिटिया रानी रेत पर कभी नाम लिखतीकभी घरौंदे बनाती. लहरें आ-आकर इन सबको अपने साथ ले जाती. बिटिया रानी उछल-उछल कर लहरों के साथ अपना तारतम्य जोड़ती दिखती. हम भी मंत्रमुग्ध से कैमरे में सबकुछ कैद कर लेना चाहते थे. सो दाँए-बाँएइधर-उधर होकरसारी स्थितियों में समूचे दृश्यों को पकड़ते जा रहे थे. (यहाँ के आनंद के बारे में आगे फिर कभी) यद्यपि समुद्री लहरेंबहुत-बहुत दूर दिखती छोटी-छोटी नौकाएँजमीन से आसमान की राह पर चढ़ता सूरज का सौन्दर्य हम सबको रोकने की भरपूर कोशिश कर रहा था मगर विवेकानन्द रॉक मेमोरियल देखने की अभिलाषा के चलते इन सारे दृश्यों से विदा ली. 


रेत पर बिटिया की कलाकारी


रेत पर बिटिया की कलाकारी
जल्दी-जल्दी समूचे काम निपटाकर विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के द्वार पहुँच गए. बड़े से जालीदार फाटक को पार करके अन्दर परिसर में प्रवेश किया. कोई छुट्टी नहीं थी फिर भी लगभग 100 लोगों की भीड़ लाइन में लगी दिख रही थी. चैतन्य सेवाव्रतियों (सेवाभाव से विवेकानन्द केंद्र में अपनी सेवाएं देने वाले व्यक्ति)स्वयंसेवकोंवर्दीधारी सहज व्यक्तियों ने मुस्कुराकर स्वागत किया. हमारी शारीरिक स्थिति को देखकर लाइन में लगने की बाध्यता को हमारे ऊपर लागू न करते हुए उस स्थान पर पहुँचने का संकेत किया जहाँ से फैरी पर चढ़ने का इंतजार किया जाता है. हमारी धर्मपत्नी निशा और उनके साथ बितिया रानी भी टिकट लेने के लिए लाइन में लग गई. हम और मित्र सुभाष सुरक्षाकर्मी द्वारा बताये गए स्थान की तरफ चल दिए. जिस बरामदे में लगभग 200 से अधिक लोग बैठे हुए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. हम लोगों ने परिसर में बड़े से पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर लोगों को पढ़ने काआसपास की स्थितियों को जानने-परखने का शौक अंजाम देना शुरू किया. दिमागी और जुबानी क्रियाविधि के साथ-साथ उंगलियाँ कैमरे पर थिरकती रहीं और आसपास के दृश्यों को कैद करती रहीं. 

सामान्य टिकट के साथ-साथ विशेष टिकट की भी वहाँ व्यवस्था थी. जिसमें निर्धारित से कहीं अधिक मूल्य चुकाकर लाइन में लगने से बचा जा सकता था. हालाँकि बहुतायत में ऐसे लोग ही थे जो सामान्य टिकट ले रहे थे. विशेष टिकट लेने वालों में विदेशी सैलानीकुछ अधिकारी जैसे लोग समझ आये. उस बड़े से जालीदार फाटक से अन्दर प्रवेश करने वाले सभी लोगों को उसी पंक्ति में लगना पड़ता. विशेष टिकट लेने के इच्छुक सीधे परिसर में आ पाते थे. इस बीच देखा कि एक स्वयंसेवक लगातार भागदौड़ करने में लगा था. दो-तीन सुरक्षाकर्मियों से मिलकर उसने हर बार हमारी तरफ इशारा किया. कुछ संशय सा लगा तो उसके पास जाकर पूछा कि कोई समस्या है क्याउसने बताया कि ऐसा कुछ नहींबस उन सभी सुरक्षाकर्मियों को ये बताना था कि आप लोगों को अन्दर जाने दें. हम लोगों को समझ आया कि वो अपनी जिम्मेवारी को पूरी तरफ से सम्पादित करने में लगा हुआ है. उधर टिकट की लाइन पीछे से बढ़ती जा रही थी और आगे से घटती जा रही थी. इसी बीच एक सुरक्षाकर्मी सेजो उसी इंतजार करने वाले हॉल की व्यवस्था में संलग्न थाबातचीत से ज्ञात हुआ कि वो सेना से सेवानिवृत व्यक्ति है. झाँसी में सेवारत रहने के कारण उसे भी हम लोगों से विशेष लगाव महसूस हुआ. काफी देर तक बातचीत के बाद आखिरकार हम लोगों की बारी आ गई. 


आत्मीय सुरक्षाकर्मी के साथ सुभाष और हम
आवश्यक सुरक्षा जाँच के बादटिकट जाँच के बाद हम लोग तट पर खड़ी फैरी की तरफ बढ़ चले. इससे पहले एक विशेष बात जो वहाँ की व्यवस्था के बारे में पता की वो बड़ी मजेदार लगी. जो व्यक्ति हमारे लिए बड़ी मुस्तैदी से भागदौड़ कर रहा थाउसी से पूछा कि आखिर आप लोग सभी को टिकट लेने की लाइन में क्यों लगा रहे हैंक्या सभी को अपना-अपना टिकट लेना पड़ता हैतब उसने बताया कि ऐसा कुछ नहीं है. एक व्यक्ति कितने भी टिकट ले सकता है मगर परिसर के अन्दर भीड़ न फैलेइधर-उधर किसी और काम में न लग जाये इसलिए ऐसा नियम बना दिया है कि सभी को टिकट लेने वाली लाइन में लग्न पड़ेगा. समझ आया कि वाकई एक-एक व्यक्ति का टिकट लेना और उसके साथ आये कई-कई लोगों का परिसर में नाहक टहलना इन स्वयंसेवकों के लिएसुरक्षाकर्मियों के लिए सिरदर्दी तो हो ही सकता था. अब ऐसे में उन सबका ध्यान सिर्फ लाइन पर ही था.  


चल पड़े फैरी में बैठ
किनारे खड़ी फैरी ने हम सबको आदर सहित अपने अन्दर स्थान दिया. एकबार में 150 लोगों को लेकर फैरी हिलते-डुलते विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की तरफ चल पड़ी. चन्द मिनट में फैरी जब रॉक किनारे लगी तो विशालकाय इमारत सामने खड़ी हाथ फैलाये हमारा इंतजार कर रही थी. सबसे ऊपर फहराता भगवा ध्वज पूरी गरिमा से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल को भव्यता प्रदान कर रहा था. सन 1970 में नीलेलालकालेहरे रंग के ग्रेनाइट पत्थरों से बना मेमोरियलजिसका गुंबद 70 फुट ऊंचा हैसमुद्रतल से लगभग 20 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. पता चला कि यह स्थान 6 एकड़ के क्षेत्र में फैला है. यह विवेकानन्द जी के 24, 25 और 26 दिसम्बर 1892 को श्रीपद पराई आने तथा गहरे ध्यान-आध्यात्मिक ज्ञान का स्मारक है. 


शान से लहराता भगवा ध्वज
चट्टान पर बने निश्चित रास्ते पर चलते समय चारों तरफ समुद्र की विशालता अद्भुत लग रही थी. हमारे बाँयी तरफ वे लोग कतारबद्ध रूप से खड़े थे जो रॉक से वापस जा रहे थे. हम लोग प्रसन्नताउत्साहउमंग में बढ़ते हुए आगे चले जा रहे थे. सामने से आती बहुत तेज हवा जैसे पीछे गिराने के मूड में हो और हम लोग उसी दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने के मूड में. रॉक पर चढ़ने के क्रम में बाँयी तरफ वापस जाने वालों की कतार तथा दाँयी तरफ इमारतेंमेमोरियल का प्रशासनिक भवनटिकट वितरण केंद्र बना हुआ था. सामान्य से शुल्क वाले टिकट को लेकर हम लोग आगे बढ़तेवहाँ व्यवस्था देख रहे एक सेवाव्रती श्री राजकुमार जी को अपने आने की सूचना दी. उनसे विवेकानन्द केंद्र पर ही मुलाकात हुई थी और वे बड़े ही प्रभावित हुए थे. 


टिकट वितरण केंद्र
उनसे चन्द मिनट की औपचारिक मुलाकात के बाद आगे बढ़े तो देखा कि मेमोरियल के दर्शन के लिए बनी सीढ़ियों के सहारे ऊपर जाना होगा. इन सीढ़ियों पर चढ़ने से पहले जूते-चप्पल वहाँ बने नियत स्थान पर जमा करने थे. ऊपर बिना जूते-चप्पल के ही जाने की अनुमति थी. ये स्थिति व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए सहज नहीं थी. उस लड़के सेवहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी से जूते न उतार पाने की अपनी समस्या बताई तो उसने इसे आवश्यक बताया. भाषाई दिक्कत का सामना यहाँ करना ही पड़ रहा था. किसी तरह उसको अपने परेशानी बताई तो उसने जूतों की तरफ इशारा करते हुए कहानो लेदरहमने उसको बताया कि जूते लेदर के नहीं हैं तो उसने मुस्कुराते हुए इशारों में समझाया कि जूतों पर कपड़ा लपेट लीजिये. अब जूते-चप्पलें एकत्र करता बालक और वो सुरक्षाकर्मी कपड़ा खोजने में लग गए. अंततः एक कपड़ा मिल ही गया और उसे दो हिस्सों में बाँटकर जूतों पर चढ़ा सीढ़ियों की तरफ बढ़ चले. उन लोगों की सहायतासहजता को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा. 


प्रशासनिक भवन


समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल
ऊपर उस स्थान पर पहुँचने परजहाँ कि एक तरफ श्रीपद मंडपम और विवेकानन्द मंडपम बना हुआ हैखुद को चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ पाया. बहुत तीव्रगति से चलती हवा एक जगह स्थिर नहीं रहने दे रही थी. समुद्र की लहरें पूरी ताकत से आकर शिला से टकराती और बिखर जाती. चारों तरफ से उठता समुद्र का शोर उसकी विशालता के साथ-साथ उसकी भयावहता का परिचय करवा रहा था. ये सोचकर ही समूचे बदन में सिरहन दौड़ गई कि लगभग सवा सौ वर्ष पहले नितांत निर्जन में निपट अकेले ही स्वामी विवेकानन्द ने इसी भयंकर शोर को जीता था. आसमान पर सूर्य पूरे तेज के साथ चमक रहा थाहवा पूरे जोश से बह रही थीसमुद्र चारों तरफ तो नहीं मगर तीन तरफ से अपनी लहरों के द्वारा टकराने में लगा था मगर ये सब भयावहता के बजाय अद्भुत पावनता का एहसास करा रहे थे. 


श्रीपद मंडपम
विचारों का प्रभाव किस तरह समूचे वातावरण को परिवर्तित कर देता हैइसे यहाँ आकर महसूस किया जा सकता है. सैकड़ों लोगों की भीड़तीन-तीन सागरों का गर्जनलहरों और हवा का रौद्र रूप का समाहित स्वरूप भी स्वर्गिक शांति का आभास करा रहे थे. अब हम ठीक उस स्थान पर खड़े हुए थे जहाँ सामने समुद्रपीछे समुद्र दाँए हाथ श्रीपद मण्डपम और बाँए हाथ विवेकानन्द मंडपम बना हुआ है. श्रीपद मण्डपम श्रीपद पराई पर स्थित है जिसे पवित्र स्थल माना जाता है. कहा जाता है कि यहीं देवी कन्याकुमारी (देवी पार्वती का रूप) ने अपना पहला कदम रखा था. यहाँ बने मंडपम में एक शिला पर प्रथम पाद के रूप में चरण का चिन्ह आज भी बना हुआ है. 


विवेकानन्द मंडपम प्रवेश द्वार
विवेकानन्द मंडपम में प्रवेश के लिए सीढियाँ चढ़कर पहुँचना होता है. इस भवन में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार के ठीक सामने स्वामी विवेकानन्द की प्रभावशाली प्रतिमा के दर्शन होते हैं. लगभग चार फुट ऊंचे आधारतल पर कांसे की बनी इस मूर्ति की ऊंचाई साढ़े आठ फुट है. यह इतनी प्रभावशाली है कि इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव प्रतीत होता है. किसी तरह से आदेशित हुए बिना लोग गहन शांति में उस प्रभावशाली व्यक्तित्व के दर्शन कर कृतार्थ महसूस करते दिखे. प्रवेश द्वार के ठीक अगल-बगल स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस और गुरुमाता के चित्र स्थापित है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे विवेकानन्द उन दोनों को निहार रहे हैं और वे दोनों वात्सल्यभाव से उनको आशीष दे रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि विवेकानन्द जी तैरकर इस शिलाखंड पर आये और इसी स्थान पर तीन दिनतीन रात गहरी ध्यान साधना में लीन रहकर खुद को देश सेवा के प्रति समर्पित करने तथा वेन्दान्त दर्शन को समूचे विश्व में प्रसारित करने को तैयार किया. इस भवन में ही मूर्ति के पार्श्व में बने द्वार से नीचे उतर कर ध्यान मंडपम में पहुँचा जा सकता है. ध्यान मंडपम में जाकर ध्यान करने की कोई अनिवार्यता नहीं है. यह स्वेच्छा पर आधारित है. छोटे से अत्यधिक कम रौशनी से ढंके हॉल में द्वार से प्रवेश करते ही सामने दीवार पर चमकता ॐ दिखाई देता है. इसके साथ-साथ अत्यधिक धीमे स्वर में इसका उच्चारण वहाँ आध्यात्मिक उपस्थिति का एहसास करवाता है. हम चारों लोगों ने भी चमकते ॐ के सामने कुछ देर ध्यान की मुद्रा में बैठकर मानसिक शांति का अनुभव किया. 


विवेकानन्द मंडपम भवन  
कुछ देर बाद बाहर आकर शांत भाव से चारों तरफ घूम-टहलकर समुद्र के भयावह सौन्दर्य को निहारते रहे. यदि वहाँ से नियत समय पर वापसी का कोई नियम न होता तो संभवतः रात को वहीं रुककर उस भयावह कोलाहल का एहसास किया जाताजिसे विराट व्यक्तित्व के स्वामी ने अपने में समाहित कर लिया था. मन ही मन विवेकानन्द जी को नमन करते हुए वापस फैरी की राह चल दिए. फैरी समुद्र की लहरों पर मंथर गति से दौड़ने लगी. रॉक मेमोरियल पीछे छूटने लगा. हृदय में फिर एक बार उसे छूने कीदर्शन करने की उत्कंठा जन्मने लगी. 
समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल और तमिल कवि की प्रतिमा

तमिल कवि तिरुवल्लुवर
जहाँ से फैरी पर बैठे थे वहाँ वापस उतरकर भी बाहर जाने का मन नहीं हुआ. बहुत देर तक वहीं किनारे बैठे-बैठे रॉक को निहारते रहे. इसी रॉक के बगल में प्रसिद्द तमिल कवि तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊँची विशालकाय प्रतिमा स्थापित है. अरब सागरबंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के संगम पर स्थापित इस मूर्ति की ऊँचाई तमिल मुक्तक काव्य तिरुक्कुरल के 133 अध्यायों या अथियाकरम का प्रतिनिधित्व करती है. इसी तरह उनकी तीन उंगलियाँ अरमपोरूल और इनबम नामक तीन विषयों अर्थात नैतिकताधन और प्रेम के अर्थ को इंगित करती हैं.  अंततः वहाँ परिसर से बाहर आकर थोड़ी दी पेटपूजा करने के बाद समुद्रतट पर किनारे आकर फिर बैठ गए. जहाँ से दाँयी तरफ सूर्यास्त का और बाँयी तरफ विवेकानन्द रॉक मेमोरियल का दर्शन किया जा सकता था. सब कुछ अपने हृदय में भर लेने के लिए एकटक देखकर अपनी आँखें बंद कर लीं.

10 January 2018

ओल्ड मोंक में रम गया सारा जहाँ

सर्दी का मौसम आते ही जाम टकराने वालों की जुबान पर एक ही नाम प्रमुखता से रहता है, और वो नाम है ओल्ड मोंक रम का. बहुत से जाम के शौकीनों को शायद इसका भान ही न होगा कि ओल्ड मोंक रम विदेशी नहीं बल्कि अपने देश का ही ब्रांड है. ओल्ड मोंक रम को 19 दिसंबर 1954 में कपिल मोहन द्वारा लॉन्च किया गया था. यह लंबे समय तक दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली डार्क रम रही. सन 1929 में जन्मे कपिल मोहन ने आर्मी में ब्रिगेडियर पद से रिटायर होने के बाद मोहन मिकिन फैक्ट्री के चेयरपर्सन और मैनेंजिंग डायरेक्टर बने.


मोहन मिकिन की भी अपनी एक अलग कहानी है. यह कंपनी सन 1855 में अंग्रेज अधिकारी एडवर्ड अब्राहम डायर ने बनाई थी. (इसी अधिकारी के बेटे जनरल एडवर्ड हैरी डायर ने ही जलियांवाला बाग में निहत्थे भारतीयों पर गोलियां चलवाई थीं). ये एशिया की पहली ब्रिवरी कंपनी थी. इसकी शुरुआत कसौली जो आजकल हिमाचल प्रदेश का बड़ा टूरिस्ट प्वाइंट है, वहाँ की वादियों में हुई. इस स्थान का पानी ड्रिंक्स बनाने के लिए एकदम उपयुक्त था. इस कंपनी की पहली ड्रिंक लॉयन बियर थी. इसके बाद सन 1949 में कपिल मोहन के पिता एन. एन. मोहन ने डायर की इस कंपनी को खरीद लिया. एन. एन. मोहन भारत के एक बड़े बिजनेसमैन थे. सन 1966 में इस कंपनी का नाम बदलकर मोहन मिकिन ब्रिवरीज कर दिया गया. कपिल मोहन ने ओल्ड मोंक को लोंच करने के बाद उसको चाहे सेवन ईयर ओल्ड और टेन ईयर ओल्ड नाम देना हो या फिर रेग्युलर यूज मेडिसन (रम) कहलवाना हो, उन्होंने ब्रांड की अपने ही तरीके से मार्केटिंग की. ओल्‍ड मोंक की सफलता के बाद उन्होंने ग्लास फैक्ट्री, नाश्ते का खाना, फल-जूस प्रॉडक्ट्स, कोल्ड स्टोरेज जैसे बिजनेस में भी हाथ आजमाया, लेकिन उनको सबसे ज्यादा ड्रिंक्स में ही मिली. ओल्ड मोंक की सफलता को ऐसे समझा जा सकता है कि इसके शौकीन सिर्फ भारत में ही हैं. रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, यूएई, इस्टोनिया, फिनलैंड, न्यूजीलैंड, कनाडा, केन्या, जाम्बिया, कैमरून, सिंगापुर, मलेशिया आदि देशों में ओल्ड मोंक के शौकीन हैं.


व्यवसाय के साथ-साथ कपिल मोहन का योगदान विश्व महिला क्रिकेट को उभारने में भी रहा है. क्रिकेट का शौक उनको अपने आरम्भिक दिनों से ही था. इसी के चलते उन्होंने मोहन मिकिन फैक्ट्री के परिसर में ही स्पोर्ट्स स्टेडियम बनवाकर गाजियाबाद को एक सौगात दी. सन 1997 में महिला विश्व कप के दो मुकाबले उनके द्वारा स्थापित इसी स्टेडियम में ही खेले गए थे. वे स्वयं इसमें उपस्थित रहकर इसके गवाह बने. मोहन मिकिन कंपनी का दायित्व संभालने वाले कपिल मोहन ने सम्पूर्ण विश्व को यदि ओल्ड मोंक जैसा ब्रांड दिया है तो गाजियाबाद को भी कई सौगातें दीं. उन्होंने इस स्टेडियम के अलावा गाजियाबाद में मोहननगर कालोनी, मोहननगर मंदिर भी स्थापित किये.


कपिल मोहन के बारे में कहा जाता है कि वे बहुत ज़िदादिल इंसान थे. कपिल मोहन के भतीजे और वर्तमान में मोहन मिकिन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हेमंत मोहन के अनुसार उम्र अधिक होने के कारण कपिल मोहन विगत तीन साल से अस्वस्थ चल रहे थे. इसके बावजूद वे लगातार मोहननगर और सोलन स्थित प्लांट पर जाते रहते थे. उनकी ज़िंदादिली का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लंबे समय से बीमार होने के बावजूद वे लगातार अपने विभिन्न प्लांट की गुणवत्ता और कर्मचारियों के हित के लिए सजग रहते थे. यही कारण था कि कर्मचारी प्यार से उन्हें ही ओल्ड मोंक (बूढ़े भिक्षु) कहने लगे थे. अपनी सक्रियता के चलते कपिल मोहन हिमाचल प्रदेश के सोलन की नगरपालिका समिति के अध्यक्ष भी बने. वे अंतिम समय तक समाजसेवा के कार्यों में भी सक्रिय रहे. उनके कार्यों को देखते हुए सन 2010 में उनको पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया था. विश्वप्रसिद्ध रम को बनाकर पूरे विश्व में भारत और गाजियाबाद को नई पहचान दिलाने वाले पद्मश्री कपिल मोहन का निधन 06 जनवरी 2018 को गाजियाबाद स्थित अपने निवास स्थान में हो गया. कपिल मोहन 88 वर्ष के और लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे थे. 

09 January 2018

ऐतिहासिकता और जीवंतता का सम्मिश्रण

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 129 वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली.

उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. इसके बाद भी उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.

भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.



आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...

08 January 2018

संवेदना की भावभूमि पर आँसुओं की खरोंच

समय बीतता जाता है और इसके साथ-साथ बहुत कुछ रीत जाता है. बहुत कुछ याद रहता है बहुत कुछ भूल जाता है. न जाने क्या-क्या साथ रहता है और न जाने कितना छूट जाता है. इस छूटने, भूलने में रिश्ते भी होते हैं, सम्बन्ध भी होते हैं, इन्सान भी होते हैं. रिश्तों, संबंधों की भावात्मकता के चलते न जाने कितने लोग अपने बनते हैं और न जाने कितने लोगों से अपनापन बनता है. इस अपनेपन में दो दिलों के बीच, दो विचारों के बीच, दो भावनाओं के बीच की आपसी सामंजस्य क्षमता, आपसी समन्वय आदि का बहुत बड़ा योगदान रहता है. संबंधों का ये अपनापन समाज में स्नेह, प्रेम की आधारशिला होता है. आवश्यक नहीं कि इस स्नेह में, इन संबंधों में आपस में किसी तरह की स्वार्थी मानसिकता छिपी हो. दिल से दिल का तालमेल विशुद्ध रूप से मनोभावों की शुद्धता का परिणाम है. दो दिलों के बीच की आपसी ईमानदारी का प्रतिफल है.


दो लोगों के बीच की आपसी भावात्मक ईमानदारी के चलते संबंधों में, रिश्तों में प्रगाड़ता बढ़ती है. रक्त-सम्बन्धी न होने के बाद भी अनेक रिश्ते रक्त-संबंधों से ज्यादा सशक्त और विश्वासपरक सिद्ध होते हैं. देखा जाये तो यह एक तरह की आपसी बॉन्डिंग होती है जो बिना कुछ कहे, बिना कुछ करे दो लोगों में स्वतः ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का भाव जगाती है. यही भाव दो लोगों को करीब लाता है, उनमें रिश्तों की, संबंधों की उष्णता का प्रवाह करता है. विशुद्ध ईमानदारी, विश्वास पर आधारित इस तरह के रिश्तों, संबंधों की पावन इमारत सदियों तक दिल को धड़काती है. गुजरते दिनों की स्मृतियों को जीवंत रखती है. समय गुजरता रहता है और अपनेपन की, अपनों की यही स्मृतियाँ, यही यादें उनको हमारे बीच सदैव जीवित रखती हैं. व्यक्ति सामने है या नहीं, इससे अधिक मायने रखता है कि व्यक्ति दिल में है या नहीं. दिल में किसी के बसे होने के कारण ही वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे भुलाया नहीं जाता है.


संबंधों, रिश्तों की प्रगाड़ता दो दिलों को जोड़ती है, दो लोगों के बीच कहे-अनकहे संसार का विस्तार करती है. यही प्रगाड़ता यदि संबंधों का, प्रेम का विस्तार करती है, चेहरे पर हँसी का प्रादुर्भाव करती है तो यही प्रगाड़ता आँखों में नीर भी भरती है. न जाने किस तरह की भावनात्मकता का संसार चारों तरफ रचा-बसा होता है जहाँ हँसी-ख़ुशी के साथ आँसुओं का प्रवाह होता है, अपनों के खोने का भय होता है, सबकुछ उजड़ जाने का डर होता है. किसी का एक पल में मिलकर जीवन भर के लिए जुड़ जाना और किसी का जीवन भर साथ रहकर भी एक पल में जुदा हो जाना, आश्चर्यबोध जैसा कुछ प्रतीत करवाता है. न कहने के बाद भी सबकुछ समझने का भाव, सबकुछ समझते हुए भी कुछ न कहने का बोध, जैसे अलौकिक दुनिया का निर्माण करता है. काश! संबंधों, भावनाओं, रिश्तों, संवेदना की मासूम सी आधारभूमि पर आँसुओं की, जुदा होने की, सबकुछ छूट जाने की कष्टप्रद खरोंच न बनने पाती. 

07 January 2018

विमर्शों की बहस में

समाज और साहित्य सदैव से एक-दूसरे के लिए आईने का काम करते रहे हैं. कभी समाज ने साहित्य से कुछ लिया, कभी साहित्य ने समाज से कुछ लिया. इधर कुछ वर्षों से साहित्य और समाज में स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श का चलन व्यापक रूप से देखने को मिला है। इन दोनों विमर्शों को अधिकतर एकसाथ सम्बद्ध करके देखने की प्रवृत्ति समाज में बनती जा रही है। इसके पीछे दोनों-स्त्री और दलित- को शोषित, दबा-कुचला माना जाना एक प्रमुख कारण रहा है। यह सही है कि देश में स्त्रियों की, दलितों की स्थिति दयनीय दशा में रही है और इनके उत्थान के लिए, इनके विकास के लिए समाज में लगातार प्रयास किये जाते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं। इन्हीं तमाम सारे कामों के, प्रयासों के बीच विमर्श भी अपनी भूमिका निभाता रहता है। दोनों विमर्शों के पक्षधर लोग अपने-अपने हिसाब से स्थितियों को दर्शाकर अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वाह करते रहते हैं और इसके परिणामस्वरूप साहित्य-समाज एकदूसरे पर अपना-अपना प्रभाव छोड़ते रहते हैं। साहित्य से समाज और समाज से साहित्य कुछ न कुछ अंगीकार करते हुए स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श को प्रतिस्थापित करते रहते हैं।


            इन दोनों विमर्शों को एकसाथ इनके परिणामों के रूप में देखने की आज आवश्यकता प्रतीत होती है। समाज में इन दोनों वर्गों के आज अपने-अपने आलम्बरदार बन गये हैं, अपने-अपने मोर्चे खोल लिये गये हैं, अपने-अपने झंडे फहराने शुरू कर दिये गये हैं। इस कारण से कई बार समाज में, साहित्य में स्थिति सुधरने के स्थान पर विकृत होने की सम्भावना पनपने लगती है। आज दोनों ही विमर्शों के परिणामस्वरूप जो नया तबका उभरकर सामने आया है उसने न तो समाज का ध्यान रखा है और न ही साहित्य की सम्भावनाओं का ध्यान रखा है। ऐसे तबके का ध्यान पूरी तरह से किसी न किसी रूप में सिर्फ और सिर्फ स्वयं को प्रतिस्थापन करने में लगा हुआ है। ऐसा होने से स्त्री-विमर्श तथा दलित-विमर्श के द्वारा जो सकारात्मक परिणाम सामने आने चाहिए थे, वे कदापि नहीं आये। स्त्री-विमर्श की आड़ लेकर स्त्रियों के एक बहुत बड़े तबके ने अपनी स्वतन्त्रा का दुरुपयोग करना शुरू किया और इसका परिणाम यह हुआ कि महिलायें पुरुषों के चंगुल से बाहर आकर महिलाओं के हाथों की कठपुतली बन गईं। इसी तरह से दलित-विमर्श के नाम पर दलित साहित्यकारों ने अपनी कलम के द्वारा, अपने साहित्य के द्वारा समाज में एक प्रकार का विभेद पैदा करना शुरू कर दिया। इससे न केवल सामाजिक वैमनष्य बढ़ा है और अगड़े-पिछड़े के बीच की खाई पटने के स्थान पर बढ़ी ही है। आज दोनों विमर्शों के सिपहसालार बजाय स्थितियों को सुधारने के स्थितियों को बिगाड़ने में लगे हुए हैं।


            विमर्श के नाम पर आज साहित्य में, समाज में जिस तरह से शिगूफा चलाया जा रहा है, उससे न तो समाज का भला होने वाला है और न ही साहित्य का। कम से कम इन दोनों विमर्शों के वे महारथी, जो ये समझते-मानते हैं कि आपसी वैमनष्यता से, आपसी भेदभाव से यदि दोनों तबकों का भला हो जायेगा, उनकी स्थिति सुधर जायेगी तो वे कहीं न कहीं गलत कर रहे हैं। यदि सामाजिक सक्रियता बनाये रखने वाले, साहित्यिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाने वाले वाकई इन दोनों वर्गों का सकारात्मक भला करना चाहते हैं तो उन्हें विभेद को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यह भी ध्यान रखना होगा कि कटुता दर्शाकर, विभेद दिखाकर समाज का, साहित्य का भला कदापि नहीं होगा बल्कि रिश्तों में कड़वाहट ही बढ़ती रहेगी। हाल-फ़िलहाल स्त्री-विमर्श में विगत कुछ दिनों से मेरिटल रेप जैसी शब्दावली का निर्माण करके उसके इर्द-गिर्द छद्म क्रांतिकारी बयान देखने को मिलने लगे हैं। कुछ लेखन भी देखने को मिल रहा है। इस नवोन्मेषी विषय पर जल्द ही।  

06 January 2018

अगला कदम मानसिक, वैचारिक, सांस्कृतिक स्वच्छता के लिए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान को उनके स्वयं झाड़ू लगाने से आरम्भ होना था और हुआ भी. उसके बाद उनका अनुगमन करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही रही. आरम्भिक आलोचनाओं के बाद भी लोग स्वच्छता अभियान के साथ जुड़े रहे. लोग पूरी तन्मयता से सफाईकार्य में जुटे दिखाई देने लगे. स्वच्छता अभियान के लोगो, चश्मे को भी बहुत से मोदी-विरोधियों ने, भाजपा-विरोधियों ने आलोचना का शिकार बनाया, इसके बाद भी आम जनमानस में स्वच्छता अभियान को नकारात्मकता नहीं दी गई. ये एक तरह का शुभ और सकारात्मक सन्देश ही माना जायेगा कि वातानुकूलित कमरों-गाड़ियों में ऐशोआराम की जिंदगी भोग रहे लोग खुले आसमान के नीचे गंदगी के ढेर को साफ़ करते दिखने लगे हैं. स्वच्छता अभियान की असली सफलता इस बात पर है कि हम व्यक्तिगत रूप से इसे कितना आत्मसात कर पाते हैं.


नामधारियों के द्वारा, मंत्रियों-नेताओं के द्वारा लगातार फोटो के साथ सफाई करते हुए सामने आने ने आम आदमी को भी फोटो सहित सफाई के लिए प्रेरित कर दिया है. अब वो भी हाथों में झाड़ू लिए, लकदक, साफ़-सुथरे कपड़े पहन, चश्मा चढ़ाये सड़कों पर महज फोटो खिंचवाने की नियत से उतरता है और वापस हो लेता है. ऐसे में हमें स्वयं विचार करना होगा आखिर हम सफाई किसके लिए करना चाहते हैं? आखिर हम सफाई का नाटक किसके लिए कर रहे हैं? ऐसा भी नहीं है नरेन्द्र मोदी के इस अभियान के पूर्व सफाई का कार्य देश में नहीं होता था किन्तु जिस तरह से एक चेतना सी लोगों में दिखी है, वो पहले कभी नहीं दिखी थी. इस अभियान ने हमें न केवल अपने लिए, अपने परिवार के लिए वरन अपने आसपास के लिए, अपने मोहल्ले के लिए, अपने शहर के लिए स्वच्छता अभियान चलाने को प्रेरित किया है. ये चेतना शून्य में न बदल पाए अब प्रयास इस बात का होना चाहिए.

जरूरी नहीं कि किसी नदी के गहरे जल में उतर कर सफाई की जाए, कोई आवश्यक नहीं कि गंदगी के अम्बार को साफ़ करना ही स्वच्छता लाने का सन्देश है, झाड़ू लेकर सड़कों को साफ़ करने लगना ही सफाई-पसंद होने का प्रमाण नहीं. यदि हम लोगों को जगह-जगह थूकने, यत्र-तत्र मूत्र-विसर्जन करने, अपने घर की गंदगी को खुलेआम सड़क पर फेंकने, सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल कूड़ेदान की तरह करने आदि से ही रोक सकें तो ये भी अपने आपमें व्यापक अभियान कहलायेगा. रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों में ही यदि हम सफाई का ध्यान रखें, खाने-पीने की वस्तुओं को ढँक कर रखने का ध्यान रखें, बच्चों को सफाई से रहने की आदत डालें, उनको नियमित स्वच्छता अपनाने की सीख दें तो ये भी स्वच्छता अभियान का एक पहलू है. आइये अपने घर से ही छोटी-छोटी पहल करके देखें, बिना सेल्फी के, फोटो के चक्कर में सफाई का एक कदम उठाकर तो देखें. हमें ये हमेशा याद रखना होगा कि इस तरह के अभियान हम जनमानस के ऐसे ही छोटे-छोटे क़दमों से सफलता की मंजिल तक पहुँचते हैं, न कि नामचीन लोगों के चंद पलों की सांकेतिकता से.


स्वच्छ रहना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार भी है तो उसका कर्तव्य भी है. आखिर किसी को भी गन्दगी में रहना पसंद नहीं होगा. स्वच्छता की इसी श्रंखला में स्वच्छता सर्वेक्षण आरम्भ करके स्वच्छ नगरों का श्रेणीकरण किया जा रहा है. इससे भी आमजनमानस में अपने नगर को स्वच्छ रखने के प्रति जागरूकता दिखाई दे रही है. आशा की जा सकती है कि जल्द ही समाज से ये दिखाई देने वाली गन्दगी हम सब मिलकर दूर कर सकेंगे. इस स्वच्छता अभियान के साथ एक कदम मानसिक, वैचारिक, सांस्कृतिक गन्दगी को भी दूर करने के लिए बढ़ाना होगा.