उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा विद्यालयों में बच्चों से श्रमदान
करवाने वाले शिक्षकों को सम्मानित करने का विचार रखना एक प्रशासनिक औपचारिकता भर
अथवा कोई तात्कालिक सुर्खी का विषय नहीं है. व्यावहारिक रूप में देखा जाये तो उनका
वक्तव्य हमारी समकालीन शिक्षा व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने के प्रति एक विमर्श का
सूचक है. अंकों की मारामारी के अंधे दौर में हमारी शिक्षा प्रणाली और अभिभावक सूचनाओं
के संकलन, तकनीकी के नियंत्रण और
अंकों की अबूझ प्रतिस्पर्धा में उलझकर रह गए हैं. इस व्यवस्था ने विद्यालयों से
पारम्परिक और बुनियादी अवधारणाओं को लगभग समाप्त सा कर दिया है. श्रमदान भी इसी तरह
की व्यावहारिक व्यवस्थाओं से बाहर कर दी गई है. हमें सोचना चाहिए कि शिक्षा का वास्तविक
उद्देश्य क्या है? क्या
उसके द्वारा किसी इंसान को कामगार के रूप में तैयार करना है या फिर एक संवेदनशील,
सामाजिक नागरिक का निर्माण करना है?
समकालीन दौर में बाल विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में शारीरिक निष्क्रियता,
मानसिक अवसाद, एकाकीपन आदि प्रमुख हैं.
आज बच्चे मोबाइल के जाल में उलझकर प्रकृति से, शारीरिक श्रम से लगभग दूर हो चुके हैं. ऐसे में विद्यालयों में
श्रमदान केवल किसी कार्य तक सीमित न समझा जाये बल्कि इसे एक तरह की शारीरिक और मानसिक
चिकित्सा माना जाना चाहिए. सामूहिक रूप से किया जाने वाला शारीरिक श्रम बच्चों में
सकारात्मकता बढ़ाता है, उनके मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है. श्रमदान को बालश्रम से जोड़कर देखना
उचित नहीं क्योंकि यह एक सामूहिक विधा है जो अलग-अलग पृष्ठभूमि, जातियों, आर्थिक स्तरों से आने वाले विद्यार्थियों
में टीम वर्क, सहानुभूति, सहयोग आदि की भावना
विकसित करती है. इस तथ्य को उस समय और भी सहज भाव से देखा जा सकता है जबकि यही
बच्चे उच्च शिक्षा में आने के पश्चात् बिना किसी संकोच, भेदभाव के एनसीसी, एनएसएस आदि के माध्यम से अपने आसपास की बस्तियों में श्रमदान करते हैं, स्वच्छता हेतु मिलजुल कर कार्य करते हैं.
श्रमदान बच्चों में भावनात्मकता का विकास करता है. हम सभी अपने घरों को, अपनी
सम्पत्ति को साफ़-सुथरा रखते हैं, उनके प्रति आत्मीय भाव रखते हैं किन्तु सार्वजनिक सम्पत्ति को गंदा करने में
संकोच नहीं करते हैं. यह प्रवृत्ति एक गम्भीर सामाजिक बीमारी बन चुकी है. इसके मूल
में नागरिकों का सार्वजनिक संपत्तियों से भावनात्मक जुड़ाव न होना है. यदि एक बच्चा
पसीना बहाकर अपने विद्यालय को सँवारता है तो उसके भीतर उस स्थान के प्रति भावनात्मकता
का, अपनत्व का बोध जागृत होता है. ऐसा बच्चा भविष्य में सार्वजनिक सम्पत्ति के
प्रति उदारता, अपनत्व के
भाव से जुड़ेगा. श्रम की गरिमा का अभाव हमारे देश का एक कड़वा सच है. हमने मानसिक श्रम
को उच्च और शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता बना ली है. यही कारण है
कि आज देश का शिक्षित युवा किसी भी स्तर की नौकरी के लिए भी कतारों में खड़ा मिल
जायेगा किन्तु वह किसी शारीरिक श्रम कार्य को अपनाने से बचता है. श्रमदान के द्वारा बच्चों
में श्रम की महत्ता को समझाया जा सकता है, उसके प्रति निम्नता की ग्रंथि समाप्त किया जा सकता है.
मुख्यमंत्री के विचार के बाद विद्यालयों में बच्चों के श्रमदान को एक दिशा देने
की आवश्यकता है. इसके लिए उठाने वाले तमाम उपायों के बीच देखना होगा कि श्रमदान के
नाम पर उनको बालश्रम के रूप में परिवर्तित न कर दिया जाये. बच्चों को, अभिभावकों को बालश्रम और श्रमदान के
अंतर को समझाना होगा. बच्चों द्वारा विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना श्रमदान
है मगर उन्हीं बच्चों से मिड-डे-मील बनवाया जाना बालश्रम होगा. विद्यालय परिसर में
पौधारोपण करना, उनमें पानी देना श्रमदान है मगर किसी
उच्चाधिकारी के आने पर उसकी आवभगत करवाना बालश्रम होगा. श्रमदान कोई सुधार कार्यक्रम
नहीं है बल्कि यह एक सामाजिकता, परिवारिकता का पाठ है. यदि श्रमदान को सामाजिक सहयोग के रूप में धरातल पर
क्रियान्वित किया जाए तो यह आत्मनिर्भरता का, स्वावलम्बन का, श्रम के प्रति पूजनीयता का भाव जागृत करेगा.



