11 September 2021

स्वामी विवेकानंद जी द्वारा शिकागो में दिया गया भाषण

Speech delivered by Swami Vivekananda on September 11, 1893, at the first World’s Parliament of Religions on the site of the present-day Art Institute

Sisters and Brothers of America,

It fills my heart with joy unspeakable to rise in response to the warm and cordial welcome which you have given us. I thank you in the name of the most ancient order of monks in the world, I thank you in the name of the mother of religions, and I thank you in the name of millions and millions of Hindu people of all classes and sects.

My thanks, also, to some of the speakers on this platform who, referring to the delegates from the Orient, have told you that these men from far-off nations may well claim the honor of bearing to different lands the idea of toleration. I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance. We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true. I am proud to belong to a nation which has sheltered the persecuted and the refugees of all religions and all nations of the earth. I am proud to tell you that we have gathered in our bosom the purest remnant of the Israelites, who came to Southern India and took refuge with us in the very year in which their holy temple was shat­tered to pieces by Roman tyranny. I am proud to belong to the religion which has sheltered and is still fostering the remnant of the grand Zoroastrian nation. I will quote to you, brethren, a few lines from a hymn which I remember to have repeated from my earliest boyhood, which is every day repeated by millions of human beings: “As the different streams having their sources in different paths which men take through different tendencies, various though they appear, crooked or straight, all lead to Thee.”

The present convention, which is one of the most august assemblies ever held, is in itself a vindication, a declaration to the world of the wonderful doctrine preached in the Gita: “Whosoever comes to Me, through whatsoever form, I reach him; all men are struggling through paths which in the end lead to me.” Sectarianism, bigotry, and its horrible descen­dant, fanaticism, have long possessed this beautiful earth. They have filled the earth with vio­lence, drenched it often and often with human blood, destroyed civilization and sent whole nations to despair. Had it not been for these horrible demons, human society would be far more advanced than it is now. But their time is come; and I fervently hope that the bell that tolled this morning in honor of this convention may be the death-knell of all fanaticism, of all persecutions with the sword or with the pen, and of all uncharitable feelings between persons wending their way to the same goal.

(उक्त अंग्रेजी भाषण को यहाँ से लिया गया है.)

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उक्त अग्रेजी भाषण का हिन्दी अनुवाद 

अमेरिका के बहनो और भाइयो,

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है।

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था। और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी।

मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है। भाइयो, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है:

जिस तरह अलग-अलग स्त्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।”

वर्तमान सम्मेलन जोकि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है:

जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं।”

सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।

अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

 (हिन्दी अनुवाद यहाँ से लिया गया है.) 



08 September 2021

संवेदनहीन इंसान का विनाश निश्चित है

पिछले साल जब कोरोना की पहली दस्तक देश में हुई थी तो उसके बाद लगे लॉकडाउन के समय लोगों के विचार ऐसे बने जैसे अब वे बहुत कुछ सीख चुके हैं. इसके बाद जैसे ही अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई वैसे ही सब पुराने ढर्रे पर वापस आ गया था. इसके बाद जैसे ही दूसरी खतरनाक, जानलेवा लहर समाज में दिखाई दी तो लगा कि शायद अब इंसान कुछ सीखने की कोशिश करेगा. आपसी संबंधों को लेकर, एक-दूसरे की मदद करने को लेकर, संपत्ति के प्रति तृष्णा को लेकर, धन संग्रह की प्रवृत्ति को लेकर हो सकता है कि इंसान कुछ सीखे. बहुत से लोगों के विचारों को जानने-समझने का अवसर मिला. उससे लगा कि न सही सबके सब मगर कुछ हद तक इंसान अपने आपको बदलने की कोशिश करेगा.




इधर विगत कुछ महीनों से कोरोना से डर-भय जैसी स्थिति जैसे समाप्त ही है. इसी समाप्ति ने बहुत कुछ समाप्त कर दिया है. जिन दिनों आसपास मौत दिख रही थी, अपनों के दूर चले जाने की खबरें आ रही थीं, उस समय बहुतायत लोगों को दार्शनिक की मुद्रा में देखा था, माया-मोह के बंधनों से मुक्त होते देखा था. अब फिर वही कोरोना के पहले की स्थिति दिखाई देने लगी है. इससे एक बात तो समझ आती है कि इंसानी फितरत मूल रूप से अपनी भयावहता को भूल जाने की है. उसके मूल में किसी तरह से न सुधरने की स्थिति छिपी हुई है. देखा जाये तो यह स्थिति खतरनाक है. यदि इंसान सीखने की कोशिश में आगे नहीं बढ़ेगा तो फिर किस तरह से नए-नए मानकों को स्थापित किया जायेगा?


पिछले वर्ष से लेकर अभी तक की जो स्थिति निकली है, जो समय गुजरा है उसमें इंसान ने बहुत कुछ अनुभव किया है. पाया कम है और खोया ज्यादा है. इसके बाद भी ज्यादा से ज्यादा लाभ लेने का लालच, आपदा से गुजर रहे लोगों से भी मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति इस समय देखने को मिली. चिकित्सा से सम्बंधित सामग्री की, दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कालाबाजारी देखने को इसी समय मिली. ये सब यह बताने को काफी है कि इंसान दर्द का अनुभव तभी करता है जबकि वह स्वयं उससे गुजरता है. उसके पहले उसके लिए दूसरे का कष्ट अनुभव करने वाला मामला नहीं बल्कि उससे लाभ लेने वाला मसला होता है. समझने वाली बात है कि यदि व्यक्ति इस कष्टकारी दौर में भी नहीं सुधरा है, इस आपत्तिकाल में भी उसके अन्दर का मानव नहीं जाग सका है, आपदा के इस दौर में भी वह संवेदित नहीं हो सका है तो ऐसे इंसान का पल-पल विनाश की तरफ बढ़ना स्वाभाविक है. ऐसी स्थिति के लगातार बने रहने से समाज का भी विनाश निश्चित है, समाज का ध्वंस भी निश्चित है.


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04 September 2021

घर की मुर्गी को मुर्गी ही समझा गया


 

कल शिक्षक दिवस है. इस अवसर पर सरकारी, गैर-सरकारी आयोजन होते हैं, शिक्षकों को सम्मानित करने के. इस वर्ष स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. ऐसे में जानकारी हुई थी कि उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में 75 शिक्षकों का (महाविद्यालय स्तर पर) सम्मान किया जाना है. 


इस बारे में रात को आधिकारिक सूचना भी प्राप्त हो गई. अपने महाविद्यालय से सम्मानित होते कई शिक्षकों के बीच हमारा भी नाम चमक रहा है. अच्छा लगा अपने लोगों के बीच सम्मानित होने में. यद्यपि सम्मान समारोह कल होना है मगर ख़ुशी अभी से है. ख़ुशी इसलिए भी हो रही है कि भले ही ये शासन-प्रशासन का कार्यक्रम हो मगर 'घर की मुर्गी दाल बराबर' वाली बात को थोड़ा किनारे कर दिया गया है. सरकारी नीति के तहत ही सही, सभी जनपदों में ही सही 'घर की मुर्गी को मुर्गी ही' समझा गया है.


सभी को बधाई, शुभकामना. सभी शिक्षकों को, गुरुजनों को शिक्षक दिवस की शुभकामनायें.

01 September 2021

सकारात्मक, सार्थक कार्यों का आकलन समाज करता ही है


 

कभी-कभी अपने बारे में लिखा हुआ पढ़ना सुखद लगता है. वैसे तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे अपनी तारीफ सुनना पसंद नहीं होगा मगर जब खुद के सकारात्मक कामों के बारे में, वास्तविक कार्यों के बारे में, धरातल पर किये गए कामों के बारे में चर्चा की जाये, उनकी तारीफ की जाये तो ख़ुशी वाकई बहुत ज्यादा होती है. 


अक्सर हम सभी लोग अपने किये जा रहे कामों की प्रशंसा न मिलने पर, उसका कोई तत्काल प्रतिफल निकलता न देखकर निराशा जैसी स्थिति में पहुँच जाते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. संभवतः ऐसा मानव स्वभाव होने के कारण होता होगा किन्तु हमें ध्यान रखना चाहिए कि यदि हम लोग ईमानदारी के साथ काम कर रहे हैं, निस्वार्थ रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं तो समाज हम सबके कामों का प्रतिफल सकारात्मक रूप से देता ही देता है. ऐसा इसलिए क्योंकि हम सभी कोई भी काम करें, समाज की निगाह उस पर रहती है. समाज अपनी तरह से उन कामों का आकलन करता रहता है. ये और बात है कि हमें लगता रहे कि समाज हमारे कामों को देख-समझ नहीं रहा है. 


इसलिए निस्वार्थ भाव से, ईमानदारी के साथ सकारात्मक, सार्थक कार्य किये जाते रहने चाहिए. समाज किसी न किसी दिन, किसी न किसी रूप में उसका सकारात्मक प्रतिफल देता ही देता है. 


दैनिक जागरण, कानपुर के जालौन संस्करण में प्रकाशित 


31 August 2021

टोक्यो पैरालम्पिक खेलों के वर्गीकरण की जानकारी

टोक्यो पैरालम्पिक में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लाजवाब रहा है. अभी पैरालम्पिक खेल चल रहे हैं. ये खेल अभी पाँच सितम्बर 2021 तक चलने हैं, तब तक और भी ढेर सारे पदक भारतीय खिलाड़ियों द्वारा जीते जाने हैं. ये विश्वास है क्योंकि हमारे खिलाड़ी अत्यंत ऊर्जा, विश्वास के साथ लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं. 


ऐसे बहुत से खेल प्रेमी जो खेलों में बहुत ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, खिलाड़ियों के जीतने पर प्रसन्न भी होते हैं मगर उनमें से बहुत से लोग पैरालम्पिक में किये गए वर्गीकरण को समझ नहीं पाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पैरालम्पिक के बारे में अथवा पैरा खेलों के बारे में जनसामान्य को बहुत अधिक न तो बताया गया है और न ही उनको भी इस बारे में बहुत ज्यादा रुचि है. लोगों के लिए विभिन्न स्पर्धाओं में किये गए वर्गीकरण, खिलाड़ियों की शारीरिक स्थिति के चलते उनकी स्पर्धा को समझ पाना बहुत जायद क्लिष्ट नहीं है. एक बार गंभीरता से इसे जान लिया जाये तो फिर पैरालम्पिक खेलों की विभिन्न स्पर्धाओं के बारे में सहजता से समझा जा सकता है. 




इस बारे में अपने पूर्व आलेख में कुछ समझाने का प्रयास किया था. इसे यहाँ क्लिक करके (पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी) पढ़ा जा सकता है. 


टोक्यो पैरालम्पिक में किस तरह का वर्गीकरण किया गया है, इसे यहाँ क्लिक करके (Paralympic Games Classification) समझा जा सकता है. 


इस बारे में इस आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध पीडीएफ का भी अध्ययन यहाँ क्लिक करके किया जा सकता है. 


जो भी सामग्री लिंक पर उपलब्ध है, वह टोक्यो पैरालम्पिक 2020 की निम्न वेबसाइट से ली गई है. 

https://olympics.com/tokyo-2020/en/paralympics

29 August 2021

पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी

टोक्यो ओलम्पिक के बाद इस समय टोक्यो पैरालम्पिक चर्चा में है. ये और बात है कि ओलम्पिक की तरह मीडिया में इनको बहुत ज्यादा स्थान नहीं मिल पा रहा है मगर हमारे देश के खिलाड़ी लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करके पैरालम्पिक खेलों की तरफ जनसामान्य का ध्यान खींच रहे हैं. पैरालम्पिक खेल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली खेल प्रतियोगिता है. इस प्रतियोगिता में मुख्य रूप से वे खिलाडी सहभागिता करते हैं जो शारीरिक अथवा मानसिक रूप से दिव्यांग (विकलांग) की श्रेणी में आते हैं.  


यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो जानकारी मिलती है कि पैरालंपिक खेलों को दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से आरम्भ किया गया था. सन 1948 में दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों की स्पाइनल चोट को ठीक करने के लिए न्यूरोलोजिस्ट गुडविंग गुट्टमान ने रिहेबिलेशन कार्यक्रम के लिए खेलों का चयन किया. उस समय इन खेलों को अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर गेम्स के नाम से पहचान मिली थी. कालांतर में सन 1960 में रोम में पहले पैरालम्पिक खेल हुए. इसमें सैनिकों के साथ-साथ आम नागरिक भी भाग ले सकते थे. इन खेलों में उस समय 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. ब्रिटेन के मार्गेट माघन पैरालंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले एथलीट बने. उन्होंने तीरंदाज़ी में स्वर्ण पदक जीता. इस पहले पैरालम्पिक खेलों में तैराकी को छोड़कर खिलाड़ी सिर्फ व्हीलचेयर के साथ ही भाग ले सकते थे. समय के साथ पैरालम्पिक खेलों में बदलाव होते गए और सन 1976 में अन्य पैरा खिलाड़ियों को भी इन खेलों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया.




पैरालम्पिक में सहभागिता करने वाले खिलाड़ियों को उनकी शारीरिक स्थिति के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है. उनको अलग-अलग श्रेणियों में रखे जाने के पीछे उद्देश्य यह होता है कि मुकाबला बराबरी का रहे. जैसे हाथ से विकलांग खिलाड़ियों को एक वर्ग में, पैरों से विकलांग खिलाड़ियों को एक अलग वर्ग में रखा जाता है. इसके अलावा पैरालम्पिक खिलाड़ियों के वर्गीकरण में उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनकी श्रेणी का निर्धारण किया जाता है.


किसी खिलाड़ी को पैरा खिलाड़ी मानने के दस मानदंड हैं-

1. माँसपेशियों की दुर्बलता

2. जोड़ों की गति की निष्क्रियता

3. किसी अंग में कोई कमी

4. टाँगों की लम्बाई में अंतर

5. छोटा क़द

6. हाइपरटोनिया यानी माँसपेशियों में जकड़न

7. शरीर के मूवमेंट पर नियंत्रण की कमी

8. एथेटोसिस यानी हाथ-पैरों की उँगलियों की धीमी गति

9. नज़र में ख़राबी

10. सीखने की अवरुद्ध क्षमता.


श्रेणीकरण के साथ-साथ खेलों का भी वर्गीकरण किया जाता है. फील्ड की प्रतियोगिताएं एफ कोड के साथ जानी जातीं हैं. इसमें शॉटपुट, जेवलिन थ्रो, डिसकस थ्रो आदि शामिल हैं. विकलांगता के हिसाब से इन खेलों में लगभग 31 श्रेणियाँ होती हैं. ट्रैक की प्रतियोगिताओं को टी से परिभाषित किया जाता है. इसमें दौड़ और कूदने जैसी प्रतियोगिताएँ शामिल हैं. इन खेलों में 19 श्रेणियाँ होती हैं. सभी खेल स्पर्धाओं को विकलांगता के अनुसार अलग-अलग नंबरों में बाँटा जाता है. जैसे फील्ड की स्पर्धाओं में एफ़-32, एफ़-33, एफ़-34 आदि नंबर देखने को मिलते हैं. यहाँ इन्हीं नंबरों के अनुसार विकलांगता की स्थिति को पहचाना जाता है. जिस स्पर्धा में जितना कम नंबर होता है, उसकी उतनी ही अधिक विकलांगता होती है.


फील्ड और ट्रैक की प्रतियोगिताओं के अलावा, तीरंदाज़ी, बैडमिंटन, साइकिलिंग, निशानेबाज़ी, ताइक्वांडो, जूडो तथा चार व्हीलचेयर वाले खेल (बास्केटबॉल, रग्बी, टेनिस और तलवारबाजी) भी पैरालम्पिक में खेले जाते हैं. व्हीलचेयर पर खेले जाने वाले खेलों की पहचान डब्ल्यूएच-1 या डब्ल्यूएच-2 के नाम से की जाती है. इन खेलों में भी जो खेल खड़े होकर खेले जाते हैं उनको एस से पहचाना जाता है. इसको भी दो अलग-अलग विकलांगता श्रेणियों में बाँटा गया है. यदि शरीर के ऊपरी हिस्से में विकलांगता होती है तो एस के साथ यू लिखा होगा, जिसका अर्थ है अपर लिंब. इसी तरह यदि एस के आगे एल लिखा है तो इसका अर्थ हुआ कि शरीर के निचले हिस्से (लोअर लिंब) में विकलांगता है.




पैरालम्पिक खेलों में खिलाड़ियों के चयन के लिए इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी (आईपीसी) द्वारा मानक का निर्धारण किया गया है. इसमें भी ये आवश्यक नहीं कि किसी खिलाड़ीद्वारा इस मानक इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के बाद भी उसे चयनित नहीं माना जा सकता. ऐसा इसलिए क्योंकि आईपीसी द्वारा प्रत्येक देश एक निश्चित कोटा है, इस निर्धारित कोटे से ज्यादा ख़िलाड़ी भाग नहीं ले सकते. ऐसे में यदि निर्धारित कोटे से अधिक ख़िलाड़ी निर्धारित मानक लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं उन खिलाड़ियों के बीच फ़ाइनल सेलेक्शन ट्रायल करवाया जाता है. इसमें चयनित खिलाड़ी ही अंतिम रूप से पैरालम्पिक के लिए चयनित होते हैं. इसके अलावा विश्व रैंकिंग के आधार पर भी खिलाड़ियों का चयन होता है.


वर्तमान में देश की तरफ से अनेक खिलाड़ी टोक्यो में अपना प्रदर्शन करने के लिए गए हैं. उन सभी को शुभकामनाएँ.

26 August 2021

सेल्फी का जानलेवा पागलपन

अभी हमारे एक मित्र का फोन आया कि सेल्फी को लेकर युवाओं में छाये पागलपन पर कुछ लिखो. इधर बहुत लम्बे समय से कुछ मनःस्थिति ऐसी है कि कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा. ऐसी स्थिति में कुछ नया न लिख पा रहे थे. कई बार कोशिश की कि मित्र के लिए ही कुछ लिख दिया जाये मगर दिल-दिमाग ने साथ न दिया. ऐसे में एक पुरानी पोस्ट याद आई. उसी को भेज दिया उसके उपयोग के लिए. बाद में विचार किया कि उस पोस्ट को आज फिर लगाया जाये, आखिर आज भी सेल्फी का जूनून सिर चढ़ कर बोल रहा है. 


दूरसंचार तकनीक में आई क्रांति ने घर के किसी कोने में रखे फोन को मोबाइल में बदला और उसी तकनीकी बदलाव ने मोबाइल को बहुतेरे कामों की मशीन बना दिया. विकासशील देश होने के कारण अपने देश में स्मार्टफोन का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है. यहाँ मोबाइल को आजकल बातचीत के लिए कम और सेल्फी फोन के रूप में ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है. कम्पनियाँ भी मोबाइल को  सेल्फी के विभिन्न लाभों के साथ बाजार में उतार रही हैं. इस कारण नई पीढ़ी तेजी से इस तरफ आकर्षित हुई है.  इसकी सशक्तता यहाँ तक तो ठीक थी मगर सोशल मीडिया के बुखार ने सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. खुद को अधिक से अधिक प्रचारित, प्रसारित करने के चक्कर में मोबाइल कैमरे का उपयोग सामने वाले की, प्राकृतिक दृश्यों के चित्र खींचने से अधिक सेल्फी लेने के लिए होने लगा है. जगह कोई भी हो, स्थिति कोई भी हो, अवसर कोई भी हो व्यक्ति सेल्फी लेने से चूकता नहीं है. 



ये शौक अब जानलेवा साबित हो रहा है. देश की गंभीर समस्याओं में से एक प्रमुख है मोबाइल कैमरे के द्वारा सेल्फी लेने में दुर्घटना होना. नई पीढ़ी इस जाल में बुरी तरह फँस चुकी है. आज हर कोई रोमांचकहैरानी में डालने वाली एवं विस्मयकारी सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान की भी परवाह नहीं कर रहा है. कभी ऊंची पहाड़ी की चोटी परकभी बीच नदी की धार मेंकभी बाइक पर स्टंट करते हुएकभी ट्रेन से होड़ करते हुए. वे अपनी मनचाही तस्वीरें खींचते हैं और सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर अपने दोस्तों से शेयर करते हैं. इसमें उनमें फैशन और आधुनिक होने के भाव झलकते हैं. यह हरकत इसलिए भी चिंतनीय है क्योंकि ये काम पढ़े-लिखे युवाओं द्वारा किया जा रहा है.

देश में पर्यटन केन्द्रों पर इस तरह के सूचना बोर्ड लगाने का काम तेजी से चल रहा हैजिसमें पर्यटकों से अनुरोध किया गया है कि वे सेल्फी लेते वक्त सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें. इसके बाद भी रोज ही दुर्घटनाएं हो रही हैं. यह समझ से पर है कि खुद को किसलिएकिसके लिए सबसे अलग दिखाने की कोशिश की जाती हैक्यों खतरनाक जगहों पर जाकर स्टंट करते हुए सेल्फी लेने की कोशिश की जाती हैक्यों तेज रफ़्तार बाइक परतेज गति से भागती ट्रेन पर सेल्फी लेकर खुद को क्या सिद्ध किया जाता हैइस तरह की जानलेवा हरकतों को सिवाय पागलपन के कुछ नहीं कहा जा सकता है. इस पागलपन को नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता है. मोबाइल जिस काम के लिए बना है उसके लिए ही अधिकाधिक उपयोग किये जाने की आवश्यकता है. अन्यथा की स्थिति में यह पागलपन लगातार घरों के चिरागों को बुझाता रहेगा.

22 August 2021

बारिश के आते ही बचपन का आ जाना

यूँ तो सभी मौसमों का अपना मजा है. हर मौसम में लोग अपनी तरह से उसका आनंद लिया करते हैं. किसी को गर्मी इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि इस मौसम में वे देश-विदेश के बर्फीले स्थानों के भ्रमण का बहाना निकाल लेते हैं. कुछ लोगों को सर्दी इसलिए पसंद आती है क्योंकि उस मौसम का गुलाबीपन मनभावन होता है. कुछ लोगों को बरसात का मौसम उसकी रिमझिम के कारण, भीगते हुए मस्ती करने के कारण पसंद आता है. मौसमों की बदलती रंगत के चलते, अपनी विशेष प्रकृति के चलते ये नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ यही मौसम सुहाना है या फलां मौसम ख़राब है. सबका अपना आनंद है, सबका अपना महत्त्व है. सामान्य रूप से सर्दी, गर्मी, बरसात के तीन मौसमों में से हमें भी बरसात का मौसम विशेष रूप से पसंद है. पसंद तो सर्दी भी है, गर्मी भी है मगर बरसात का आना खुद को बचपन में लौटा ले जाने जैसा अनुभव कराता है. बरसात का आना हमारे लिए आज भी भीगने का सन्देश लाने जैसा होता है. बचपन में तो भीगना, कागज की नाव बनाकर तैराना, एक साथ कई नावों को धागे से बाँधकर तेरा देना, भरे पानी में कूद कर खुद को भिगाते हुए बगल वाले को भिगो देना, मेंढकों की टर्र-टर्र को पकड़ना, बारिश बंद हो जाने के बाद भीगे पौधों को हिलाकर उनकी पत्तियों पर बैठी बूंदों के नीचे आकर भीगना आदि सहज भाव से होता रहता था.



समय गुजरता रहा. हम बचपन से युवावस्था की तरफ बढ़ते रहे. उम्र बढ़ती रही. समय के साथ कार्यशैली बदलती रही. कार्य बदलते रहे. जीवनशैली बदलती रही. प्रस्थिति बदलती रही. जिम्मेवारियाँ बढ़ती रहीं. इन सबके बदलते रहने के बीच बरसात हर साल अपनी रंगत में आती रही. ये और बात है कि पर्यावरणीय समस्याओं के चलते अब बरसात अपने उस रूप में नहीं आती जैसी कि हमारे बचपने में आती थी. क्या कुछ न बदला. समय बदला, बरसात की रंगत बदली, बारिश की समयसीमा भी बदली मगर यदि न बदला तो बरसात में मौज-मस्ती करने का हमारा अंदाज. उम्र अपनी जगह, जिम्मेवारी अपनी जगह, प्रस्थिति अपनी जगह, कार्य अपनी जगह और बरसात की मस्ती अपनी जगह. कई बार तेज बारिश में सड़क पर खुद को भिगाते घूमते समय लोगों को दुकानों में, किसी आड़ में, कहीं किसी स्थान पर दुबके खड़े लोगों को देखकर विचार आता है कि क्या इनके अन्दर बारिश में भीगने की इच्छा नहीं होती? बारिश में भीगने के डर से दुबके खड़े लोगों में युवाओं को देखकर तो उनके ऊपर तरस आता है. यदि वे इस अवस्था में खुलकर जीने का आनंद नहीं उठा पा रहे हैं तो उस समय क्या उठाएंगे जबकि उनके ऊपर परिवार की, अपने कार्य की, पद की जिम्मेवारी होगी.

कॉलेज में फुर्सत के पलों में बारिश का आनंद 

कई बार महसूस किया है हमने कि लोग अनावश्यक रूप से गंभीर बनने की कोशिश में जीवन जीना भूल चुके हैं. बढ़ती उम्र के लोग ये सोचकर बारिश में नहीं भीगते कि लोग क्या कहेंगे. वे बच्चों के साथ कागज की नाव इसलिए तैराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि लोग उन्हें पागल न समझ लें. युवाओं में भी भीगने को लेकर, पानी में कूदने, नाव तैराने को लेकर संकोच का भाव है. आजकल के बच्चे, युवा अचानक ही अपनी उम्र से कई गुना अधिक बड़े-बुजुर्ग बन चुके हैं. जिम्मेवारियों से पहले ही उनके कंधों पर अनावश्यक जिम्मेवारियाँ डाल दी गई हैं. ऐसा नहीं हैं कि हमारे कंधों पर जिम्मेवारी नहीं, ऐसा भी नहीं है कि हमारे आसपास के वातावरण में, समाज में हमारी प्रस्थिति-स्थिति दोयम दर्जे की है मगर अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीने के लिए किसी की क्या परवाह करना. हाँ, हमारी उन्मुक्तता से, हमारी स्वच्छंदता से, हमारी मौज-मस्ती से किसी अन्य के जीवन पर, उसकी जीवनशैली पर, उसके आनंद पर, उसके रहन-सहन पर किसी तरह का नकारात्मक असर न पड़े, इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए. हम तो आज भी बारिश का इंतजार उसी बेसब्री से करते हैं जैसे कि बचपन में किया करते थे. आज भी बारिश होते ही शहर की सड़कों पर विचरना शुरू हो जाता है. भरे पानी में, बहते पानी में नाव का तैराना शुरू हो जाता है. 

तैर गईं कई नावें 

एक बार, एक पल को अपने आसपास सबकुछ भुलाकर खुद को बस बच्चा समझकर देखिये. अपने आसपास के लोगों की तरफ से आँखें हटाकर बस खुद को देखना शुरू कीजिये. महसूस कीजिये उस एक क्षण को जब सिर्फ और सिर्फ आप हैं और रूमानी अंदाज में हो रही बारिश. उस एक पल में सारी जिम्मेवारियों को कहीं किनारे लगा कर बस बारिश को अपने ऊपर हावी होने दीजिये. फिर देखिये, कैसे आपके दिल-दिमाग में जबरन घुसी बैठी समस्याएँ, परेशानियाँ कहीं दूर भागती नजर आती हैं. झमाझम होती बारिश के साथ एकाकार होने की कोशिश करिए फिर देखिये कैसे आपका बचपना आपके साथ खेलने-कूदने सामने आ जाता है. सबको नजरअंदाज करते हुए एक बार बहते पानी में कागज की नाव तैराकर देखिये आपको लगेगा कि आपके बचपन के साथी आपके साथ खिलखिला रहे हैं. जिंदगी की आपाधापी में से कुछ पल विशुद्ध अपने लिए निकालने के लिए आपको सबकुछ भूल-भुलाकर बच्चा बनना पड़ेगा, बचपन को आज में वापस लाना पड़ेगा.


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बारिश होने पर आज फिर याद आ गई कुछ साल पहले की ये पोस्ट 

19 August 2021

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर कुछ हमारी क्लिक्स

विश्व फोटोग्राफी दिवस को मनाने के पीछे भी एक कहानी है. दरअसल फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेक्स और मेंडे डाग्युरे ने सबसे पहले सन 1839 में फोटो तत्व की खोज की थी. ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम हेनरी फॉक्सटेल बोट ने निगेटिव-पॉजीटिव प्रोसेस का आविष्कार किया और सन 1834 में टेल बॉट ने लाइट सेंसेटिव पेपर की खोज करके खींची गई फोटो को स्थायी रूप में रखने में मदद की.  

फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो की फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट को तत्कालीन फ्रांस सरकार ने खरीदकर 19 अगस्त 1939 को आम लोगों के लिए फ्री घोषित कर दिया था. इसी उपलब्धि की याद में 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. आपके लिए खुद की क्लिक की गई कुछ फोटो लाये हैं. उनके साथ आज का आनंद लीजिये.