23 September 2018

सामाजिकता का असली चेहरा


आज आपके सामने एक ऐसे व्यक्ति की कहानी लाना चाहते हैं, जो सरकारी सेवा में है और जिम्मेवार पद पर है. इसके बाद भी सामाजिक कार्यों में जमकर रुचि लेते हैं, सक्रिय रहते हैं. यूँ तो उन्हें हमारे जनपद जालौन के लोग ट्री-मैन कहकर सम्मान देते हैं पर यह कहानी उससे कुछ अलग है. पहले आपको कुछ बता दें उनके ट्री-मैन संबोधन के लिए. असल में आप रेलवे में पदासीन हैं किन्तु पर्यावरण के लिए, पौधारोपण के लिए लगातार, नियमित रूप से सक्रिय रहते हैं. वे न केवल सक्रिय रहते हैं वरन पौधारोपण के लिए पौधे भी उपलब्ध करवाते हैं, उनकी सुरक्षा करवाते हैं, उनके पल्लवित-पुष्पित करवाते हैं. जगह का चयन करके वे पौधारोपण करवाने के बाद उनकी सुरक्षा का ख्याल रखते हैं.

इसके अलावा रेलवे में अपनी सेवाएँ देने के कारण वे लाखों-लाख लोगों के संपर्क में भी आते हैं. सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय होने के कारण वे यहाँ भी अपने सक्रिय मन-मष्तिष्क के चलते कार्यशील रहे. नौकरी को महज नौकरी न मानते हुए उसके अन्दर से भी सामाजिकता निकालते रहे. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व माननीय रविकांत शाक्या जी के इस कार्य को आप सब उन्हीं की जुबानी पढ़ें तो ज्यादा आनंद आएगा. 



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कभी कभी जिंदगी में कुछ अप्रत्याशित घटनाएं घट जाती हैं जिन के कारण जीवन मे काफी बदलाव आ जाता है। ऐसे ही लगभग 35 वर्ष पूर्व मेरे फुफेरे भाई का बेटा मनोज जो मुझसे लगभग 3 वर्ष बड़ा था और इंटर में पढ़ रहा था अचानक घर मे पड़ी डांट के कारण घर से चला गया। जिसे आज तक परिवारीजन ढूंढ रहे हैं उसके लौट आने का विश्वास अभी भी है उन्हें। भाई के परिवार का दुख देखकर मुझे भी एक लक्ष्य प्रदान कर दिया और इसकी शुरुआत मेरी रेलवे में जॉब लगने के वर्ष 1995 से हुई।

ट्रेन में टिकट जांच के दौरान घर से भागे, बिछुड़े बालक, बालिकाएं, युवक, युवतियां मिले, जिनमे मध्य-प्रदेश, उत्तर-प्रदेश, राजस्थान, बिहार, नेपाल, बंगाल , हरियाणा इत्यादि से भागे हुए थे। उन्हें येन-केन-प्रकारेण, साम, दाम, दंड, भेद से इमोशनली ब्लैकमेल कर उनके घर से सम्पर्क स्थापित कर उन्हें स्वयं के खर्च पर उनके परिवारीजनों का सौंपा। परिवारीजन के आने तक अपने घर मे रखा। आज भी बहुत से परिवार ऐसे हैं जो जुड़े हुए हैं। कई बार कुछ परिजनो ने पैसे देने का प्रयास किया पर उनकी आंखों की तरल दृष्टि ही मेरा परितोष होती है लगता है कि मेरा भतीजा वापस मिल गया।

इसी कड़ी में दिनांक 20 सितंबर को सिरौली (खागा) निवासी रामजी उर्फ पुष्पराज सिंह सेंगर को उसके घर पहुंचाया। अब तक कुल 79 बच्चे सकुशल घर पहुंच चुके हैं और उनके परिवार की अप्रतिम खुशी मेरे लिए भी मुस्कुराहट का कारण बनी।

21 September 2018

जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन


न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन किसी ग़ज़ल के ये चंद शब्द आज भी दिल को धड़का देते हैं. इन शब्दों में छिपी भावना को, प्यार को लगभग प्रत्येक व्यक्ति खुद के भीतर छिपी प्यार की भावना से एकाकार करके भावविभोर होता है. उम्र और जन्म का बंधन उसके लिए नकार चाहता है किन्तु जैसे ही यही भावना किसी और के प्यार के साथ जुड़ती दिखाई देती है वैसे ही सारी संवेदना हवा हो जाती है. अपने से इतर किसी दूसरे के लिए ऐसा होते ही समाज, संस्कार, मर्यादा, सामाजिकता आदि की सीमारेखा दिखाई देने लगती है. ऐसे एक-दो नहीं वरन हमारे आसपास अनेक उदाहरण हैं, जबकि दो व्यक्तियों की उम्र में जबरदस्त अंतर के चलते उनके संबंधों को मजाक बनाया गया, उनका मजाक बनाया गया. कुछ ऐसा ही हाल में ग़ज़ल-भजन गायक अनूप जलोटा और जसलीन के संबंधों के सामने आने के बाद हुआ. एक टीवी शो में उनके संबंधों का खुलासा होते ही उन पर चुटकुलों के, व्यंग्य के, परिहास के, उपहास के तीखे तीर चलाये जाने लगे. उम्र और जन्म के बंधन को न मानने वाले शब्द गुनगुनाने वाले भी उनके सम्बन्ध के पीछे पड़ गए. लिव-इन-रिलेशन, समलैंगिकता के समर्थक, किस ऑफ़ लव जैसे आयोजन का समर्थन करने वाले भी एकदम से अनूप जलोटा को चरित्रहीन साबित करने पर उतर आये. सोशल मीडिया पर जैसे एक आयोजन सा होने लगा. किसी एक पोस्ट पर, किसी एक चित्र पर अनेकानेक लाइक, टिप्पणी, शेयर मिलने लगे. बिना आगा-पीछा सोचे भेड़चाल शुरू हो गई. 


यहाँ विचार करना चाहिए कि क्या वाकई अनूप जलोटा ने अपराध जैसा कुछ किया है? तथ्यों के आलोक में देखना चाहिए कि क्या वाकई अनूप जलोटा को चरित्रहीन माना जाना चाहिए? उम्र के बहुत बड़े अंतर के कारण, भजन गायकी के चलते वे अचानक से व्यंग्य-बाणों का शिकार भले हो रहे हों मगर उन पर ऐसा कटाक्ष, व्यंग्य करने वालों को कई बातों पर ध्यान देने की जरूरत है. भजन सम्राट के रूप में प्रसिद्द अनूप जलोटा का वैवाहिक जीवन अपने आपमें संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है. उन्होंने तीन शादियाँ की. उनकी पहली पत्नी गायिका सोनाली सेठ थीं हालांकि उनकी शादी बहुत समय तक नहीं टिक सकी और उनका तलाक हो गया. तलाक के बाद सोनाली ने गायक रूपकुमार राठौड़ से विवाह किया. अनूप जलोटा ने इस सम्बन्ध-विच्छेद के बाद अपने परिवार के कहने पर बीना भाटिया से शादी की. यह विवाह सम्बन्ध भी बहुत लम्बे समय तक न चल सका और इसकी परिणति भी सम्बन्ध-विच्छेद के रूप में हुई. इसके बाद अनूप जलोटा ने पूर्व प्रधानमंत्री गुजराल की भतीजी मेधा गुजराल से विवाह किया. उनके वैवाहिक को जैसे किसी की नजर लगी थी. सन 2014 में लीवर की बीमारी के चलते उनकी तीसरी पत्नी मेधा का देहांत हो गया. अकेले रह गए अनूप जलोटा के बारे में कहा जाता है कि वे जसलीन से संपर्क में आने के पहले दो लड़कियों के साथ लिव-इन-रिलेशन में भी रहे. क्या ये सब सामाजिक रूप से गलत माना जायेगा? क्या एक विवाह सफल न होने के बाद दो या तीन विवाह करना गलत है?

असल में हम सब लोकतांत्रिक देश में रहने का दम्भ भरते हैं और एक झटके में ही अलोकतांत्रिक हरकतें करने पर उतर आते हैं. आखिर हम आज भी किसी व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन और व्यक्तिगत जीवन को अलग-अलग करके क्यों नहीं देख पा रहे हैं? खुद को लोकतान्त्रिक, आधुनिक स्वतंत्र मानने, बताने वाले किसी भी व्यक्ति के निजी जीवन में हस्तक्षेप करने को तत्पर हो जाते हैं. अनूप जलोटा के सम्बन्ध को मजाक का, आलोचना का विषय बनाने वालों को खुद से सवाल करने होंगे कि क्या उसने अपनी बीवी रहते ऐसा किया? क्या उसने अगली महिला के साथ रेप किया? क्या वे उसे भगा कर लाये हैं? क्या उसने किसी दूसरे का घर उजाड़ा है? क्या उसने आलोचना करने वालों के जीवन में ख़लल डाला है? क्या उसने समाज के किसी व्यक्ति का वैवाहिक जीवन तोड़ा है? फिर लोग क्यों अनूप जलोटा के पीछे पड़े हुए हैं? ऐसा कहीं इसलिए तो नहीं कि समाज में आज भी बहुतायत मध्यमवर्गीय लोगों का जीवन इतना सहज नहीं है? उनके लिए आज भी सेक्स, लड़की, लिव इन रिलेशन उनकी समझ से बाहर हैं? सामाजिकता, धर्म, उम्र, कार्य, संस्कार का नाम देकर ऐसे किसी भी सम्बन्ध का मजाक उड़ाने के पीछे कहीं खुद की कुंठा को दूर करना तो नहीं होता है? ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग यौन-कुंठा के मारे दूसरों के जीवन में, वैवाहिक जीवन में तांक-झांक करता रहता है. ऐसे लोगों के अपने वैवाहिक जीवन से, अपनी यौन सम्बंधी इच्छा से, विपरीत सेक्स से उत्पन्न उनकी संकुचित मानसिकता, कुंठित मानसिकता ही दूसरों को आलोचना के केंद्र में खड़ा कर देती है. कुछ ऐसा ही आज अनूप जलोटा के साथ हो रहा है और ऐसा ही कुछ समय पूर्व कुछ राजनीतिज्ञों के साथ, फ़िल्मी कलाकारों के साथ भी हुआ है. अतीत के मुर्दों को उखाड़ने से बेहतर है कि वर्तमान को देखा जाये तो इस सम्बन्ध में ऐसा कुछ नहीं जिसे चरित्रहीन कहा जाये, अपराध कहा जाये, अमर्यादित कहा जाये, अश्लील कहा जाये. हाँ, अपने-अपने वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट लोग, यौन-कुंठा से भरे लोग अवश्य ही ये सब इस सम्बन्ध में खोज निकालेंगे.

20 September 2018

युगदृष्टा श्रीराम शर्मा आचार्य


आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो श्रीराम शर्मा आचार्य नाम से अपरिचित हो. उन्हें देश के युगदृष्टा मनीषी के रूप में स्वीकार किया जाता है. उन्होने आधुनिक एवं प्राचीन विज्ञान तथा धर्म को समन्वित करके उसके द्वारा आध्यात्मिक नवचेतना को जगाने का कार्य किया. इसी उद्देश्य के लिए उनके द्वारा अखिल भारतीय गायत्री परिवार की स्थापना की गई. उनका सम्पूर्ण  व्यक्तित्व एक साधु पुरुष, आध्यात्म विज्ञानी, योगी, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, लेखक, सुधारक का समन्वित रूप कहा जा सकता है. आज इसी विभूति का जन्मदिन है. उनका जन्म 20 सितम्बर 1911 को उत्तर प्रदेश के आगरा के आँवलखेड़ा ग्राम में हुआ था. साधना के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही दिखने लगा था. वे अपने सहपाठियों, छोटे बच्चों को सुसंस्कारिता अपनाने वाली विद्या का ज्ञान देने लगे थे. किशोरावस्था में ही समाज सुधार की रचनात्मक प्रवृत्तियाँ उनमें विकसित हो चुकी थीं. वे चाहते थे कि लोग स्वावलम्बी बनें, राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान उसका जागे.


सन् 1926 में महामना मदनमोहन मालवीय जी से काशी में गायत्री मंत्र की दीक्षा लेने के बाद आराधना उनके जीवन का अंग बन गई. आध्यात्मिक रुचि होने के साथ-साथ उनमें राष्ट्रवाद की भावना भी चरम पर थी. सन 1927 से 1933 तक वे एक स्वयंसेवक, स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सक्रिय रहे. अनेकानेक मित्रों के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये. वे जेल में भी निरक्षर साथियों को शिक्षण देकर व स्वयं अंग्रेजी सीखकर लौटै. उन्होंने मालवीय जी से एक मूलमंत्र सीखा कि जन-जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी भर फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियाँ संचालित की जा सकती हैं. इसी मन्त्र के सहारे उन्होंने गायत्री परिवार का आधार निर्मित किया. सन 1935 के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया. आगरा में सैनिक समाचार पत्र के कार्यवाहक संपादक के रूप में कार्य किया. बाद में सन 1938 की बसंत पंचमी को अखण्ड ज्योति पत्रिका का पहला अंक प्रकाशित किया. इसके बाद पुनः सारी तैयारी के साथ विधिवत सन 1940 की जनवरी से अखण्ड ज्योति पत्रिका का शुभारंभ किया गया. यह पत्रिका आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होती है तथा करोड़ों व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है. आचार्य जी द्वारा अनेक पुस्तकें लिखी गईं जो आध्यात्म, परिवार, धर्म, वेद, स्वास्थ्य आदि विषय पर ज्ञान देती हैं.

श्रीराम मत्त, गुरुदेव, वेदमूर्ति, युग ॠषि, गुरुजी आदि अन्य नामों से प्रसिद्ध आचार्य जी का देहांत 02 जून 1990 को हरिद्वार में हुआ. आज उनके जन्मदिन पर उनको सादर नमन.

18 September 2018

सेल्फी का पागलपन और जानलेवा हादसे


दूरसंचार तकनीक में आई क्रांति ने घर के किसी कोने में रखे फोन को मोबाइल में बदला और उसी तकनीकी बदलाव ने मोबाइल को बहुतेरे कामों की मशीन बना दिया. विकासशील देश होने के कारण अपने देश में स्मार्टफोन का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है. यहाँ मोबाइल को आजकल बातचीत के लिए कम और सेल्फी फोन के रूप में ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है. कम्पनियाँ भी मोबाइल को  सेल्फी के विभिन्न लाभों के साथ बाजार में उतार रही हैं. इस कारण नई पीढ़ी तेजी से इस तरफ आकर्षित हुई है.  इसकी सशक्तता यहाँ तक तो ठीक थी मगर सोशल मीडिया के बुखार ने सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. खुद को अधिक से अधिक प्रचारित, प्रसारित करने के चक्कर में मोबाइल कैमरे का उपयोग सामने वाले की, प्राकृतिक दृश्यों के चित्र खींचने से अधिक सेल्फी लेने के लिए होने लगा है. जगह कोई भी हो, स्थिति कोई भी हो, अवसर कोई भी हो व्यक्ति सेल्फी लेने से चूकता नहीं है. 


ये शौक अब जानलेवा साबित हो रहा है. देश की गंभीर समस्याओं में से एक प्रमुख है मोबाइल कैमरे के द्वारा सेल्फी लेने में दुर्घटना होना. नई पीढ़ी इस जाल में बुरी तरह फँस चुकी है. आज हर कोई रोमांचक, हैरानी में डालने वाली एवं विस्मयकारी सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान की भी परवाह नहीं कर रहा है. कभी ऊंची पहाड़ी की चोटी पर, कभी बीच नदी की धार में, कभी बाइक पर स्टंट करते हुए, कभी ट्रेन से होड़ करते हुए. वे अपनी मनचाही तस्वीरें खींचते हैं और सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर अपने दोस्तों से शेयर करते हैं. इसमें उनमें फैशन और आधुनिक होने के भाव झलकते हैं. यह हरकत इसलिए भी चिंतनीय है क्योंकि ये काम पढ़े-लिखे युवाओं द्वारा किया जा रहा है.
देश में पर्यटन केन्द्रों पर इस तरह के सूचना बोर्ड लगाने का काम तेजी से चल रहा है, जिसमें पर्यटकों से अनुरोध किया गया है कि वे सेल्फी लेते वक्त सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें. इसके बाद भी रोज ही दुर्घटनाएं हो रही हैं. यह समझ से पर है कि खुद को किसलिए, किसके लिए सबसे अलग दिखाने की कोशिश की जाती है? क्यों खतरनाक जगहों पर जाकर स्टंट करते हुए सेल्फी लेने की कोशिश की जाती है? क्यों तेज रफ़्तार बाइक पर, तेज गति से भागती ट्रेन पर सेल्फी लेकर खुद को क्या सिद्ध किया जाता है? इस तरह की जानलेवा हरकतों को सिवाय पागलपन के कुछ नहीं कहा जा सकता है. इस पागलपन को नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता है. मोबाइल जिस काम के लिए बना है उसके लिए ही अधिकाधिक उपयोग किये जाने की आवश्यकता है. अन्यथा की स्थिति में यह पागलपन लगातार घरों के चिरागों को बुझाता रहेगा.

16 September 2018

तुमको न भूल पाएंगे


सितम्बर माह ख़ुशी और दुःख का मिश्रित भाव लेकर आता है. एक तरफ जहाँ जन्मदिन की खुशियाँ होती हैं वहीं पुण्यतिथियों के आँसू भी होते हैं. खुशियों के पल हमेशा हँसाते हैं मगर उनके ऊपर दुःख के पल हावी हो जाते हैं और आँसू आ ही जाते हैं. ऐसे पल उस समय और भी कष्टकारी होते हैं जबकि आँसू देने वाला व्यक्ति युवा हो. जिस उम्र में उसे दुनिया भर के सपने सजाना हों, खुद अपनी दुनिया बसानी हो वह दूसरी दुनिया को चला जाये.


परिवार के उस युवा, ऊर्जावान, सक्रिय सदस्य से बहुत लम्बा साथ न हुआ. परिचय था मगर नाम के रूप में, परिवार में सुनाई जाती बातों के रूप में. उस हमउम्र युवा से पहली बार तब मिलना हुआ जबकि हम दोनों की आँखों में भविष्य के सपने थे. अपने-अपने कैरियर के प्रति एक सोच थी. चंद दिनों का साथ हुआ. ये तो नहीं कहा जा सकता कि बहुत गहरी दोस्ती हो गई मगर ये था कि कुछ ऐसा अवश्य था कि आपसी सोच, विचाराभिव्यक्ति एकसमान समझ आई. कैरियर के जिस रास्ते को हम दोनों ने चुना उसमें हमारे उस मित्र को सफलता मिली और हम मंजिल की चाह में आगे ही चलते रहे. आगे बढ़ने की स्थिति यह रही कि हम तो जमीन पर ही अपनी मंजिल तलाशते रहे और उसने आसमान को अपनी गिरफ्त में ले लिया. अपनी मंजिल की चाह के बीच हम सड़कों पर वाहन दौड़कर रफ़्तार पर अपनी बादशाहत कायम करने का सपना संजो रहे होते, वह ध्वनि की रफ़्तार को पीछे छोड़ता हुआ आसमान को भेदने में लगा होता. 


इस बीच अत्यंत संक्षिप्त सा पत्राचार आपस में हुआ. कोई औपचारिकता नहीं, कोई दिखावा नहीं. बस शब्दों ने शब्दों के द्वारा दिल के तारों को और मजबूत करना चाहा. हँसी-ख़ुशी वाले मिलते समाचारों के बीच ऐसा समाचार भी सुनाई दिया, जिस पर किसी ने पहली बार में विश्वास नहीं किया. बादलों को, आसमानों को चीरता युवा आसमानों के पार निकलने की आकुलता लिए सबको अकेला छोड़ गया. कभी उसके जिस मिग को आसमानों को हरा देने की खबर सुनकर प्रसन्नता होती थी, आज उसी मिग पर आक्रोश आ रहा था. आक्रोश आँसुओं में बदल गया. मिग किसी दुखद खबर देने के लिए उड़कर आया. चंद दिनों की मुलाकात में साथ दौड़ता साथी अब ख़ामोशी से चिरनिद्रा में था. सबकी आँखों में आँसू, सबके शब्दों में दिलासा, सबके हाथ एक-दूसरे को सहारा देने के लिए उठते. अपनी-अपनी आँखों के आँसुओं को अपने में पीते हुए दूसरे की आँखों की नमी को पोंछने की कोशिश करते. सबकुछ देखते-जानते-समझते हुए अंततः बस यादें लेकर हम सब वापस लौट आये.

राजी आज भी यादों का हिस्सा है. राजी आज भी अपने लिए एक पत्र में दिखाई देता है. राजी आज भी आसमान में उड़ते मिग के रूप में परिलक्षित होता है. सभी जगह होने के बाद भी वह सामने नहीं है. ये महज एक एहसास है, जो दिल में है, दिमाग में है, मन में है, यादों में है. सच यही है कि राजी! तुमको न भूल पाएंगे.

15 September 2018

झाँसी रानी का विवाह-स्थल


बुन्देलखण्ड क्षेत्र के कण-कण में ऐतिहासिकता, सांस्कृतिकता, पौराणिकता, दिव्यता, भव्यता समाहित है. झाँसी के गणेश बाजार स्थित महाराष्ट्र गणेश मंदिर में भी इनका समावेश देखने को मिलता है. भगवान गणेश को समर्पित इस मंदिर का अपना ही ऐतिहासिक महत्त्व है. इसी मंदिर में सन 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव का विवाह रानी लक्ष्मीबाई के साथ संपन्न हुआ था. उस समय रानी लक्ष्मीबाई को मणिकर्णिका के नाम से जाना जाता था. विवाह पश्चात् औपचारिक रूप से उन्हें लक्ष्मीबाई नाम दिया गया. यह मंदिर झाँसी किले के प्रवेश द्वार पर स्थित है. इस कारण इसे किले का, निवासियों का, शहर का रक्षक माना जाता है.


इस मंदिर की वास्तुकला के आधार पर लगाया जाता है कि इसका निर्माण सन 1764 के आसपास हुआ होगा. सन 1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई से बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने इस मंदिर को भी ध्वस्त करने का प्रयास किया किन्तु वे इसमें पूरी तरह से सफल न हो सके. इसके बाद भी उन्होंने मंदिर के एक बहुत बड़े भाग को नष्ट कर दिया था. ऐसा बताया जाता है कि कतिपय आर्थिक कारणों से मंदिर को गिरवी रखना पड़ा था. बाद में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर गोविन्द आत्माराव ढवले के प्रयासों से सन 1917 में इस मंदिर को मुक्त करवाया गया. उसी के बाद इसकी देखरेख के लिए महाराष्ट्र गणेश मंदिर समिति की स्थापना 22 नवम्बर 1917 को की गई. सार्वजनिक प्रयासों और सहायता से मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया और इसकी अनाधिकृत रूप से कब्जाई संपत्ति को वापस लिए गया. दस साल बाद 05 अगस्त 1927 को महाराष्ट्र गणेश समिति को नियमानुसार पंजीकृत करवाया गया. इस सम्बन्ध में एक शिलालेख वहाँ स्थित है.


इस मंदिर के प्रांगण में भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा के साथ-साथ रिद्धि एवं सिद्धि की भी प्रतिमाएँ स्थापित हैं. मराठी समुदाय के अलावा आमजनमानस में भी इस मंदिर के प्रति आस्था है. राजा और रानी दोनों के मराठी होने के कारण इस मंदिर को महाराष्ट्र गणेश मंदिर के नाम से जाना गया, आज भी यह मंदिर इसी नाम से आम नागरिकों में जाना जाता है.


मंदिर का अंदरूनी हिस्सा 



रिद्धि, सिद्धि संग विराजे श्रीगणेश 

मंदिर प्रांगण 

प्रवेश द्वार 
एक प्रवेश द्वार ये भी 


13 September 2018

अमर शहीद जतीन्द्रनाथ की पुण्यतिथि


आज, 13 सितम्बर अमर शहीद जतीन्द्रनाथ दास की पुण्यतिथि है. उनका जन्म 27 अक्टूबर, 1904 को कोलकाता में एक बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था. जब उनकी उम्र नौ वर्ष की थी तभी उनकी माता का निधन हो गया. सन 1920 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और वे महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से जुड़ गए. इस आन्दोलन में वे गिरफ़्तार किये गए और उन्हें छह माह की सज़ा सुनाई गई. इसके बाद जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन वापस लिया तो निराश जतीन्द्रनाथ आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में भर्ती हो गए. यहाँ उनकी मुलाकात प्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई और वे क्रान्तिकारी संस्था हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गये.


सन 1925 में जतीन्द्रनाथ को दक्षिणेश्वर बम कांड और काकोरी कांड के आरोप में गिरफ़्तार कर नज़रबन्द कर दिया गया. जेल में दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने 21 दिन तक भूख हड़ताल की तो उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को देखकर सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया. जेल से बाहर आकर उन्होंने अपने अध्ययन और राजनीति को जारी रखा. बाद में कांग्रेस सेवादल में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक बनने के दौरान उनकी भेंट सरदार भगत सिंह से हुई. 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके वे इन्हीं के द्वारा बनाये गए थे. 14 जून 1929 को जतीन्द्र गिरफ़्तार कर लिये गए और उन पर लाहौर षड़यंत्र केस में मुकदमा चला. जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से अनशन शुरू कर दिया. जतीन्द्रनाथ भी इसमें शामिल हो गए. जेल अधिकारियों द्वारा इनका अनशन तुड़वाने के लिए जबरदस्ती इनकी नाक में नली डालकर पेट में दूध डालना शुरू किया. इसी जबरदस्ती में नली उनके फेफड़ों में चली गई. उनकी घुटती सांस की परवाह किए बिना एक डॉक्टर ने दूध उनके फेफड़ों में भर दिया. इससे उन्हें निमोनिया हो गया.

इस अनशन के 63वें दिन 13 सितम्बर 1929 को जतीन्द्रनाथ दास का देहान्त हो गया. कोलकाता में उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग उपस्थित हुए. 

उनको हार्दिक नमन.

10 September 2018

समाज की आधुनिक अवधारणा है समलैंगिकता


समलैंगिकता पर अदालत का आदेश आया तो देश में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली. समझ नहीं आया कि यह वाकई मानव की विजय है जिससे उसको समानता का अवसर मिला या फिर यह मानसिकता के बीमार होने का परिचायक है? सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 377 को अवैधानिक बताते हुए समलैंगिकता को अपराध से मुक्त होने का निर्णय दिया. वैश्विक स्तर पर अमेरिका में समलैंगिक विवाह की अनुमति सहित सात देशों -नीदरलैंडनार्वेबेल्जियमस्पेनदक्षिण अफ्रीकाकनाडा और ब्रिटेन- ने समलैंगिक विवाह को मान्यता दे रखी है. भारत में समलैंगिक विवाह को भले ही स्वीकृति न मिली हो किन्तु उच्चतम न्यायालय ने धारा 377 को संविधान के अनुच्छेद 1415 एवं 21 का उल्लंघन बताते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने का आदेश दिया है. समलैंगिकता का सीधा अर्थ समान लिंग के प्रति यौन अथवा रोमांसपूर्वक आकर्षित होने से लगाया जाता है. इसमें पुरुष समलैंगिक अथवा गे (Gay); महिला समलिंगी अथवा लेस्बियन (Lesbian); महिला और पुरुष दोनों के प्रति समान रूप से आकर्षित होने वाला उभयलिंगी (Bisexual); लिंग परिवर्तन (Transsexual) करवाकर खुद को स्त्री या पुरुष की परिभाषा में शामिल करते हैं. आम बोलचाल की भाषा में इन सबको एलजीबीटी (LGBT) समूह के नाम से जाना जाता है. बचपन से किसी विषमलिंगी का पर्याप्त सहयोग न मिलना समलैंगिकता का वातावरण निर्मित करता है. माता-पिता का व्यवहारपति-पत्नी की आपसी सेक्स लाइफलम्बे समय तक घर से बाहर रहने की स्थितिसमागम की अनुकूलता न होना आदि बहुत हद तक समलैंगिकता को जन्म देती है. जेल के कैदीट्रक के ड्राइवरसुरूर क्षेत्रों में तैनात जवानलम्बी आयु के अविवाहित स्त्री-पुरुष में इस तरह की स्थिति को देखा जा सकता है. ये कई अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ है कि समलैंगिकता आनुवांशिक नहींसीखी हुई आदत है और इसे चाहने पर छोड़ा भी जा सकता है. 

ये अपने आपमें एक परम सत्य है कि सेक्स किसी भी जीव की नैसर्गिक आवश्यकता है. न केवल इंसानों में वरन जानवरों में भी इसको देखा गया है. कहा तो ये भी जाता है कि पेड़-पौधों में भी आपस में निषेचन क्रिया संपन्न होती हैजो एक तरह से सेक्स का ही स्वरूप है. बहरहालजिस तरह से मानव समाज के विकास की स्थितियाँ बन रही हैंविकसित हो रही हैंउनके साथ-साथ सेक्स सम्बन्धी समस्याओं मेंदुराचार की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिली है. प्राकृतिक सेक्स संबंधों के साथ-साथ समाज में अप्राकृतिक सेक्स संबंधों के बनाये जाने की खबरें भी सामने आ रही हैं. देखा जाये तो कहीं न कहीं समलैंगिकता भी अप्राकृतिक शारीरिक सम्बन्ध ही है मगर जैसे-जैसे इसके विरोध की बात सामने आती है वैसे-वैसे ही इसके समर्थन में भी प्रदर्शन किये जाने लगते हैं. अदालतों ने भी इन संबंधों के प्रति उदार रवैया अपनाते हुए कानूनी तौर पर समलिंगियों को पर्याप्त राहत प्रदान की है. समलैंगिकता के विरोधी जहाँ भारतीय संस्कृति में इस तरह के सम्बन्ध न बनाये जाने की वकालत करते हैं वहीं इसके समर्थक इसे अपना अधिकारअपनी जीवनशैली की स्वतंत्रता मानते हैं.

आखिरकार यहाँ समझना ही होगा कि स्वतंत्रता है क्याजीवनशैली आखिर किस तरह से संचालित की जायेइसे भी समझने की जरूरत है कि कहीं जीवनशैली की स्वतंत्रता के नाम परव्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर व्यक्ति सेक्स संबंधों में स्वतंत्रता तो नहीं चाह रहा हैकहीं स्वतंत्रता के नाम पर सेक्स को समाज में कथित तौर पर स्थापित करने की साजिश तो नहींसेक्स को लेकरशारीरिक संबंधों को लेकरविपरीतलिंग को लेकर समाज में जिस तरह से अवधारणा निर्मित की जा रही हैउसे देखते हुए लगता है जैसे इंसान के जीवन का मूलमंत्र सिर्फ और सिर्फ सेक्स रह गया है. आपसी वार्तालाप मेंमित्रों-सहयोगियों के हास-परिहास में बहुधा सेक्सविपरीतलिंगी चर्चा के केंद्रबिंदु बने होते हैं. दृश्य-श्रव्य माध्यमों में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमोंविज्ञापनों में भी सेक्स का प्रस्तुतीकरण इस तरह से किया जाता है जैसे बिना इसके इंसान का जीवन अधूरा है. समस्या यहीं आकर आरम्भ होती है क्योंकि प्रस्तुतीकरण के नाम पर फूहड़ता का प्रदर्शन ज्यादा किया जाता हैदैहिक संतुष्टि के नाम पर जबरन सम्बन्ध बनाये जाने की कोशिश की जाती हैप्यार के नाम पर एकतरफा अतिक्रमण किया जाता हैस्वतंत्रता के नाम पर रिश्तों कामर्यादा का दोहन किया जाता है. सोचना होगा कि कल को वे मानसिक विकृत लोगजो दैहिक पूर्ति के लिए जानवरों तक को नहीं बख्शते हैंअपने अप्राकृतिक यौन-संबंधों को जायज ठहराने के लिए सडकों पर उतर आयेंव्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम परजीवनशैली चुनने की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी जानवर के साथ को कानूनी स्वरूप दिए जाने की माँग करने लगें तो क्या ऐसे लोगों की मांगों को स्वीकारना होगा? ऐसा इसलिए भी संभव है क्योंकि धारा 377 पशुओं के साथ बनाये गए यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में शामिल करती है. अब जबकि इस धारा की संवैधानिकता पर ही सवाल उठा दिए गए हों तो पशुओं के साथ यू सम्बन्ध बनाने वालों का सड़क पर उतर आना कोई बड़ी बात नहीं.

समलैंगिकों के आपसी यौनाचार को लेकर वैज्ञानिक अनुसंधान रिपोर्ट्स पर उपलब्ध हैं जिनके आधार पर स्पष्ट है कि पुरुष-पुरुष यौनाचार में एड्स की सम्भावना तो रहती ही है साथ ही इनमें प्रोसाइटिस नामक रोग व्यापक रूप से फैलता है. इस बीमारी की भयावहता के कारण इसे समलैंगिक महामारी के नाम से भी जाना जाता है. स्त्री समलैंगिकों में इसी तरह से ह्युमन पेपिलोमा वायरसहर्पिस आदि बीमारियाँ अतितीव्रता से फैलती हैं. इन बीमारियों के अलावा समलिंगियों में सिफलिसगोमोनियाअमिसियोसिसहेपेटाइटिस बीगले के वायरलयौन-जनित बीमारियों के वाहक वायरस आदि भी किसी महामारी की तरह फैलते हैं. इसके उलट समलैंगिक समर्थक दावा करते हैं कि समलैंगिक गतिविधियों को कानूनी मान्यता न मिलने के कारण ही समाज में एड्स/एचआईवी का फैलाव हो रहा हैइसकी रोकथाम में बाधा आ रही है. आखिर जब विभिन्न अनुसंधानों से स्पष्ट हो चुका है कि समलैंगिकता आनुवांशिक नहीं हैमानसिक बीमारी भी नहीं है वरन व्यावहारिक समस्या है तो उसके सुधारात्मक उपाय किये जाने चाहिए. इसके समाधानस्वरूप सर्वप्रथम बच्चों की परवरिश पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है. समय-समय पर उनकी लैंगिक समस्या पर भी विचार किया जाना चाहिए और उनका सहज समाधान प्रस्तुत करना चाहिए. बच्चों में पनप रहे विषमलिंगी संकोच को दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए और इसके लिए उनको आरम्भ से ही सह-शिक्षा प्रदान करवाई जाए. इसी तरह से पारिवारिक वातावरण को समृद्ध करने की आवश्यकता है. इसके अलावा समलैंगिकों का बहिष्कार करनेउनको प्रताड़ित करनेउनका मजाक बनाये जाने की बजाय उनको समझाए जाने की आवश्यकता है कि यह मानसिक बीमारी नहीं है और इससे आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है. उनको बताया जाना चाहिए कि समलैंगिकता एक स्थिति है जो अतृप्तता के कारण उपजती है और कहीं-कहीं ये बेलगाम मौज-मस्ती के लिए विकृत वृत्तिस्वच्छंद शारीरिक भोग-विलास की लालसा के रूप में जन्म लेती है. ऐसे लोगों को सहानुभूतिइलाज की आवश्यकता होती है और इस समस्या को सद्भावसहयोग प्रदर्शित करके दूर किया जा सकता है. समझना होगा कि समलैंगिक सम्बन्ध मात्र भावनात्मकता के स्तर पर ही कायम नहीं हो रहे हैं वरन शारीरिकता पर आकर समाप्त हो रहे हैं. दैहिक सुख की भोगवादी लालसा में समलिंगी अपने जीवन को खोखला ही बना रहे हैंजिसका निदान समलिंगी विवाहों की मान्यता प्रदान करने में नहीं वरन इस आदत के इलाज और समाधान में है. 

असल में जिस तरह से इक्कीसवीं शताब्दी के नाम पर उत्पादोंविचारोंखबरोंकार्यक्रमोंभावनाओं का प्रचार-प्रसार किया गया है उसमें इंसान की वैयक्तिक भावनाओं को ज्यादा महत्त्व प्रदान किया गया है. उसके लिए सामूहिकतासामाजिकतासहयोगात्मकता आदि को दोयम दर्जे का सिद्ध करके बताया गया हैव्यक्ति की नितांत निजी स्वतंत्रता को प्रमुखता प्रदान की गई हैये कहीं न कहीं सामाजिक विखंडन जैसी स्थिति है. पाश्चात्य जीवनशैली को आधार बनाकर जिस तरह से भारतीय जीवनशैली में दरार पैदा की गई है वह भविष्य के लिए घातक है. इसके दुष्परिणाम हमें आजअभी देखने को मिल रहे हैं. जिस उम्र में बच्चों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए वे रोमांस में घिरे हुए हैंजिस क्षण का उपयोग उन्हें अपना कैरियर बनाने के लिए करना चाहिए उन क्षणों को वे शारीरिक सुख प्राप्त करने में व्यतीत कर रहे हैंजो समय उनको ज्ञानार्जन के लिए मिला है उस समय में वे अविवाहित मातृत्व से निपटने के उपाय खोज रहे हैं. हमारे देश की यह भावी पीढ़ी सेक्ससमलैंगिकताअविवाहित मातृत्वविवाहपूर्व शारीरिक सम्बन्धसुरक्षित सेक्स आदि की मीमांसाचिंतन करने में लगा हुआ है. सेक्स कोदैहिक तृष्णा को एकमात्र उद्देश्य मानकर आगे बढ़ती पीढ़ी न केवल सामाजिकता का ध्वंस कर रही है बल्कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ भुलाकर समाज में एक दूसरे तरह की गुलामी को जन्म दे रही है. काश! स्वतंत्रता के नाम पर अधिकारों को समझा जाए न कि अनाधिकार चेष्टा कोकाश! वैयक्तिक जीवनशैली के नाम पर रिश्तों की मर्यादा को जाना जाए न कि उनके अमर्यादित किये जाने कोकाश! निजी जिंदगी के गुजारने के नाम पर पारिवारिक सौहार्द्र को समझा जाए न कि जीवन-मूल्यों के ध्वंस कोकाश! जीवन को जीवन की सार्थकता के नाम पर समझा जाये न कि कुंठित सेक्स भावना के नाम पर. काश....!!!



उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, दिनांक 10-09-2018 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया.

08 September 2018

ज़िन्दगी की भयावहता ज़िन्दगी जीने वाले जानते हैं


ज़िन्दगी उतनी भी हसीन नहीं जितनी हम समझते हैं और मौत उतनी भी भयानक नहीं जितनी हमने मान रखा है. ऐसा अपने अनुभव के आधार पर ही कहा जा सकता है. ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे, ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसने जिन्दगी को करीब से जिया है, महसूस किया है वह समझ सकता है. असल में हममें से बहुत से लोग ज़िन्दगी जीना भूल चुके हैं या कहें कि ज़िदगी जीना ही नहीं जानते. आज भी बहुतायत लोग खाने-कमाने को ही ज़िन्दगी माने बैठे हैं. यही कारण है कि ऐसे लोगों की सोच के कारण न केवल इनकी ज़िन्दगी वरन सम्पूर्ण समाज का ढाँचा विकृत स्थिति में पहुँच गया है. इन लोगों के लिए सुबह उठने से लेकर रात सोने तक सिर्फ अपने परिवार के चंद लोगों की चिंता करना ही ज़िन्दगी है. ऐसे लोगों के लिए स्वार्थ में संकुचित रहना ही ज़िन्दगी है. यही लोग वे हैं जो ज़िन्दगी को एक निश्चित दायरे से बाहर जाने देना नहीं चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए ही ज़िन्दगी दिव्य और भव्य होती है. देखा जाये तो ज़िन्दगी इससे कहीं अधिक बड़ी है, विस्तृत है. ज़िन्दगी का तात्पर्य सिर्फ अपना परिवार नहीं. ज़िन्दगी का मतलब अपने परिजन नहीं. ज़िन्दगी का मतलब चंद लोग नहीं हैं.


ज़िन्दगी अपने आपमें व्यापक अवधारणा, विस्तृत सन्दर्भ रखती है. उसके लिए किसी एक व्यक्ति, किसी एक परिवार का कोई मोल नहीं. असल में ज़िन्दगी एक व्यक्ति से आरम्भ होकर अपने में सम्पूर्ण का प्रसार करती है. वह आरम्भ तो होती है किसी एक व्यक्ति के द्वारा और फिर अपना विस्तार करते हुए उसे सन्दर्भ प्रदान करती है. ज़िन्दगी का विस्तार और संकुचन भले ही संदर्भित व्यक्ति को अलग-अलग रूपों में सुखद दिखाई देता हो मगर मूल रूप में वह अत्यंत कष्टप्रद होता है. जिसने ज़िन्दगी का सन्दर्भ व्यापकता में देखा हो उसे ज़िन्दगी कष्टप्रद ही नहीं भयावह नजर आती है. विगत कुछ दिनों में न केवल हमने बल्कि हम जैसे अनेक भाइयों ने ज़िन्दगी की भयावहता को बहुत नजदीक से देखा-महसूस किया है. ज़िन्दगी के आनंद के क्षणों को कहीं गायब होते देखा है. पल-पल ज़िन्दगी के रूप में मौत को पास आते देखा है. ऐसा हम सभी भाइयों ने तभी महसूस किया है जबकि हम सभी ने ज़िन्दगी को आपस में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ देखा है. दिन-रात का एक-एक पल हम भाइयों के लिए न केवल कष्टप्रद रहा वरन डरावना भी रहा. जो भाई अपने उस हिम्मती भाई के पास थे वे स्थिति को देख-समझ रहे थे मगर उनकी हालत बहुत ख़राब थी जो उस भाई से दूर थे.


किसी भी फोन की घंटी पर सहम जाना, किसी भी मैसेज की आवाज़ पर सिहर जाना, बातचीत का सिरा पकड़ते हुए आवाज़ में कम्पन आना सबकुछ ऐसा था जो बता रहा था कि हम सब एक हैं. इस एक होने के बाद भी हम सब ज़िन्दगी का संगठित रूप प्रस्तुत नहीं कर पा रहे थे. सबके सब अपनी-अपनी ज़िन्दगी के अनमोल पलों में से बहुत सारा जीवन उस भाई को देने को तैयार बैठे थे मगर ज़िन्दगी के द्वारा ज़िन्दगी नहीं दी जा सकती है. यही कारण है कि सुखद होने के बाद भी ज़िन्दगी अत्यंत भयानक है. जहाँ एक व्यक्ति अपनी ज़िन्दगी का सुखद पल अपने साथ लिए बैठा होता है और उसी का अभिन्न भाई ज़िन्दगी में से ज़िन्दगी का एक-एक पल अपने लिए तलाश रहा होता है. ये तो विश्वास, संयम, हिम्मत ही कही जाएगी उस भाई की, जिसने ज़िन्दगी के बाद भी ज़िन्दगी को अपने से अलग नहीं होने दिया. उसके आत्मविश्वास ने, उसकी जिजीविषा ने, उसके स्नेह ने, उसकी भावुकता ने ज़िन्दगी को उससे अलग नहीं होने दिया. विश्वास, स्नेह, आशीर्वाद की दम पर ज़िन्दगी को अपने बगल में बैठा लेने पर मजबूर कर देने वाले अपने उस छोटे भाई के दीर्घायु होने की कामना.