22 मार्च 2026

पानी की बर्बादी को रोकना होगा

मनुष्य के लिए पानी हमेशा से एक महत्वपूर्ण और जीवन-दायक पेय रहा हैये बात हम सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है. इसके साथ ही इस बात से भी हम अनभिज्ञ नहीं हैं कि कि जल सभी के जीवित रहने के लिए अनिवार्य है. ऐसा माना जाता है कि मनुष्य बिना भोजन के लगभग दो माह तक जीवित रह सकता है किन्तु बिना पानी के एक सप्ताह भी जीवित रहना मुश्किल है. इधर मानवीय क्रियाकलापों के कारण धरती लगातार पेयजल-विहीन होती जा रही है. जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से विश्व भर में 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने की शुरुआत कीजिसकी घोषणा वर्ष 1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में की गई. इसके अंतर्गत सर्वप्रथम वर्ष 1993 में 22 मार्च के ही दिन सम्पूर्ण विश्व में जल संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता लाने का कार्य किया गया. 



पूरी धरती के 70 प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी इसका कुल एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. आज सभी को जल की उपलब्धता करवाना मुख्य मुद्दा है. आने वाले समय में बिना जल-संरक्षण के ऐसा कर पाना कठिन कार्य होगा. इस दृष्टि से जल संरक्षण भी एक बड़ा मुद्दा है. इसके अलावा शुद्ध पेयजल की आपूर्ति भी एक मुद्दा बना हुआ है क्योंकि धरती के हर नौवें इंसान को ताजा तथा स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. इसके चलते संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष 35 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है. विकासशील देशों में जल से उत्पन्न रोगों को कम करना स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्ष्य है. आज हमारा देश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व जल-संकट से जूझ रहा है. जल सहयोग के रूप में प्रमुख कार्य पानी के बारे में जागरूकता बढाने और उसकी अहमियत की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का होना चाहिए. जल उपयोग में मितव्ययता बरतनी होगी और पानी की बर्बादी को रोकना होगा. इसके अतिरिक्त वर्षा जल के संरक्षण के उपाय खोजने होंगे तथा घरेलू उपयोग में भी जल-संरक्षण के प्रति सचेत होना पड़ेगा. यदि हम आज इसका उपयोग सावधानी एवं किफायत से न करेंगे तो भविष्य में स्थिति अत्यंत ही गंभीर हो सकती है.

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल करअव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता हैशेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबोंजलाशयोंकुँओं आदि को गन्दगी सेकूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव होनए-नए तालाबोंकुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर परसीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैंउपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगेभविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.

17 मार्च 2026

बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया की ख़ामोशी

इस वर्ष का आरम्भ पश्चिम एशिया को एक ऐसे दोराहे पर ले आया है, जहाँ से वापसी का रास्ता हाल-फ़िलहाल युद्ध के मैदानों से गुजरता दिख रहा है. ईरान, इज़राइल-अमेरिका के बीच का छद्म युद्ध अब एक सीधे युद्ध में बदल चुका है. यह संघर्ष केवल तीन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और नई विश्व व्यवस्था के भविष्य को निर्धारित करने वाला है. इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल तीनों देशों- ईरान, इजरायल और अमेरिका के अपने-अपने निहितार्थ हैं. ईरान एक तरह से प्रतिरोधात्मक नेतृत्व का परिचायक बना हुआ है. वह इजरायल के खिलाफ कभी परदे के पीछे से लड़ता है तो कभी मिसाइलों के द्वारा सीधी चुनौती देता है. यह ईरान की बदलती सैन्य मानसिकता को दर्शाता है. यदि इस युद्ध को इजरायल के सन्दर्भ में देखा जाये तो उसके लिए यह युद्ध केवल सैन्य अभियान नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है. उसका रणनीतिक उद्देश्य अपनी सीमाओं की रक्षा करना मात्र नहीं है बल्कि ईरान के आतंकी ढाँचे- हमास, हिजबुल्लाह और हुथी को जड़ से मिटा देना है. यदि अमेरिका की बात करें तो वह इस त्रिकोण का सबसे जटिल सिरा है. अमेरिका एक तरफ इज़राइल को पूर्ण समर्थन देने की नीति अपनाना चाहता है साथ ही वह किसी भी तरह के पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध से बचना भी चाहता है. उसका उद्देश्य कतई यह नहीं कि वह ऐसे किसी युद्ध के द्वारा मध्य-पूर्व में लम्बे समय तक उलझा रहे.

 



इन तीनों देशों की स्थितियाँ कुछ भी क्यों न रही हों, वर्तमान में कुछ भी क्यों न बनी हो किन्तु सत्य तो यही है कि ये तीनों देश आज प्रत्यक्ष युद्ध में उतर चुके हैं. इस तरह की स्थितियों से साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि किसी समय विश्व पटल पर बनी एकध्रुवीय व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है. अब विश्व जहाँ बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात तो करता है साथ ही शांति के बजाय शक्ति प्रदर्शन को तैयार रहता है. एक अकेले इसी युद्ध की बात नहीं है, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे अनेक युद्ध, संघर्ष इसी का परिचायक हैं. लम्बे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष ने साफ़ कर दिया है कि यूरोपीय सुरक्षा संरचना ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है. ऐसा ही कुछ मध्य-पूर्व क्षेत्र में नजर आ रहा है. देखा जाये तो अब मध्य-पूर्व का यह तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, इस युद्ध ने खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया है.

 

यहाँ सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि अब युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गए हैं. समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह युद्ध भी अब हाइब्रिड दौर में हैं. यहाँ सीधा हमला करने के बजाय साइबर हमला किया जा सकता है. साइबर हमला करके किसी भी देश की आंतरिक मूलभूत व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है, न केवल दैनिक जीवन वाले क्षेत्रों में सेंध लगाई जा सकती है बल्कि आर्थिक सञ्चालन को भी प्रभावित किया जा सकता है. युद्ध अब केवल दो देशों के मध्य ही नहीं लड़ा जाता है बल्कि सम्बंधित देशों से कहीं दूर जमीन पर भी यह युद्ध चलता दिखता है. यदि वर्तमान ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध की बात करें तो होर्मुज जलडमरूमध्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. ईरान के कब्जे में होने के कारण यहाँ से गुजरने वाले जहाजों को उसकी अनुमति की आवश्यकता है. ऐसा न होने की दशा में समूचे विश्व में तेल की, गैस की कमी दिख रही है. कहा जा सकता है कि अब युद्ध में केवल सैनिक नहीं मरते बल्कि आर्थिक मंदी और रसद की कमी के कारण दूर देशों के आम नागरिक भी इसकी कीमत चुकाते हैं. इसे ड्रोन, मिसाइल, बम आदि के साथ-साथ युद्ध में आर्थिक हथियार का प्रयोग करना कहा जा सकता है. होर्मुज से जहाजों का निकलना प्रतिबंधित करना, अन्य देशों पर अनेक तरह के प्रतिबंधों का लगाया जाना एक तरह का हथियार ही है, जिसमें उन देशों की आम जनता पिसती है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के चलते भारत सहित अनेक देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बाधित होने से परेशानी उत्पन्न हुई जबकि ऐसे देशों का इस युद्ध से कोई सीधे-सीधे सम्बन्ध नहीं है.

 

ऐसे समय में विश्व की महाशक्तियों को समझना होगा कि शेष विश्व के लिए क्या सही है? विश्व जनसमुदाय की अपेक्षाएँ क्या हैं? अपनी शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन के स्थान पर महाशक्तियों को समझना होगा कि उनकी श्रेष्ठता सैन्य शक्ति से ज्यादा शांति बनाए रखने की क्षमता से तय होगी. यदि समय रहते हथियारों की होड़ को न रोका गया, विकास की दौड़ में शामिल न हुआ गया तो आने वाली पीढ़ियाँ बारूद की राख के भीतर ही अपना अस्तित्व खोजती रहेगी. विश्व भर में चल रहे बड़े-छोटे युद्धों, संघर्षों के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा कि अब समय आ गया है कि विश्व समुदाय केवल सीमाओं की रक्षा न करे, केवल विस्तारवाद की नीति पर काम न करे बल्कि उस साझा मानवता की रक्षा करे जो युद्ध की भेंट चढ़ रही है. सत्यता यही है कि शांति कोई विकल्प नहीं बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है.


16 मार्च 2026

पिताजी के बाद का समय

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 

आज बहुत सी घटनाओं के समय लगता है कि समय ने बहुत कुछ दिया मगर उससे ज्यादा कष्ट दिया है. बावजूद इसके कोशिश यही रहती है कि कहीं से कमजोर न पड़ें. आपकी उपस्थिति को अपने आसपास महसूस करते हुए जीवन में आई दिक्कतों, उलझनों से निपटने, निकलने का रास्ता बनाते रहते हैं. 

आपके श्रीचरणों में सादर नमन.

14 मार्च 2026

सहयोग, प्रेम-भाव में कमी भी एक समस्या है

इसे वही समझ सकते हैं जो संयुक्त परिवार में रहते हैं या रहे हैं... या फिर जिनके घर में पर्व-त्यौहार-किसी आयोजन में समूचे नाते-रिश्तेदार जुटते हैं... एकसाथ एक ही घर में रहते हैं....

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सोचिए एक पल को कि घर-परिवार के सब लोग, नाते-रिश्तेदार एकसाथ किसी आयोजन में मिले. पंद्रह-बीस लोगों से घर में चहल-पहल मची है, हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है. ऐसे में भोजन के समय चार-चार, पाँच-पाँच लोग सहजता से खाना खाते जा रहे हैं. रसोई में घर की महिलाएँ हँसी-मजाक के साथ सभी को सहजता के साथ भोजन उपलब्ध कराती जा रहीं हैं.

 

किसी दिन इस हँसी-मजाक में, हल्ला-गुल्ला में परिवार में जुटे सभी लोग एकसाथ भोजन करने बैठ जाते हैं, एक-दूसरे के साथ भोजन करने की ललक में. ऐसा होता है बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना किसी पूर्व जानकारी के... अचानक से ही. चार-छह लगी थालियों में ही परिवार के कई लोग एकसाथ बैठकर मिलजुल कर भोजन करने लगते हैं. किसी की थाली से सब्जी, किसी की थाली से दाल, किसी की थाली से अचार, किसी की थाली से रोटी, किसी की थाली से रायता.... अब फिर सोचिए कि क्या स्थिति उत्पन्न होगी? भोजन करने वाले तो हँसी-मजाक करते हुए बिना कुछ परवाह किये खाना खाने में लगे हैं तभी अचानक से रसोई से रोटियाँ आने की गति रुक जाती है या कहें कि रोटियों का आना रुक सा जाता है. 

 

ऐसा नहीं है कि रसोई में घर की महिलाएँ रोटियाँ नहीं बना रहीं. ऐसा भी नहीं कि आटा समाप्त हो गया हो. ऐसा भी नहीं कि किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न हो गई हो. इसके बाद भी रोटियों के आने की गति थम गई, रोटियाँ एक-दो, एक-दो करके आने लगीं, बाहर खाने के लिए जुटे सभी लोगों को रोटियों की उपलब्धता सहजता से नहीं हो पा रही. किसी को आधी रोटी मिल रही, किसी को उसी में से एक कौर मिल  रहा, कोई किसी की थाली में आने के पहले ही रोटी का कौर उसके हाथ से खींच ले रहा. इन सबके बीच कोई रोष नहीं, कोई गुस्सा नहीं, कोई गाली-गलौज नहीं बल्कि हँसी-मजाक और बढ़ने लगता है, आपसी प्रेम और नजर आने लगता है.

 

क्यों नहीं कोई व्यक्ति बाहर सड़क पर जाकर कूड़े के ढेर में रोटी तलाशने लगता है? क्यों नहीं रोटी का एक कौर भी न हासिल कर पाने वाला व्यक्ति घर की महिलाओं की बुराई करने लगता है? क्यों नहीं घर का कोई सदस्य नाली से गंदगी निकाल कर रोटी की जगह खाने लगता है? और भी बहुत कुछ क्यों नहीं होता है? फिर सोचिए, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों में आपस में प्रेम-भाव है, एक-दूसरे के प्रति सम्मान है, एक-दूसरे की स्थिति का भान है. यही नहीं है हम सबमें. समाज में व्यक्तिगत रूप से जो है वो पहले हमारे लिए है. समाज में जो है वो पहले हमें मिले. इस तरह की मानसिकता से न समाज का भला होता है और न ही देश का. कुछ ऐसा ही इस समय दिख रहा है. घर में एक सिलेंडर भरा रखा है मगर एक और मिल जाए. बाकी का क्या ही लिखें. जो युद्ध की माँग करते हैं, सीमा पर जान देने का दम भरते हैं, वे दो-चार रोज की स्थिति में अपनी ही गैस निकाल बैठे.


10 मार्च 2026

अमेरिका का बड़बोलापन

पिछले दिनों अमेरिका की वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के एक बयान के बाद भारतीय समाज में हलचल सी मच गई. इसमें न केवल राजनीति बल्कि बौद्धिक वर्ग, मीडिया, सोशल मीडिया, आमजनमानस चर्चा में शामिल हुआ. इस चर्चा में केन्द्र सरकार को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जाने लगा. ईरान के साथ चल रहे अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच अमेरिकी वित्त मंत्री ने बयान जारी करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को तीस दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की अनुमति दी है. इस बयान के आते ही देश में केन्द्र सरकार को कमजोर बताया जाने लगा. विपक्षी दलों द्वारा पहले से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सरेंडर नरेंदर का नारा उछाला जा रहा था, इस बयान से इस नारे को और हवा मिली.

 

यहाँ एक बात समझने वाली है कि राजनीतिज्ञों का कार्य हमेशा से किसी भी तरह के बयानों को, कार्यों को, आँकड़ों को, जानकारियों को अपने मनमुताबिक तोड़-मरोड़ करके उसे जनता के बीच अपने लाभ के सन्दर्भ में उछालना रहा है. इस स्थिति से परिचित होने के बाद भी बौद्धिक वर्ग से जुड़े हुए लोगों द्वारा, मीडिया से जुड़े संस्थानों, व्यक्तियों ने, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने बिना जाने-समझे, बिना जाँचे-परखे अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान पर सरकार को दोषी ठहराना शुरू कर दिया. अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान को परमसत्य मानने से पहले उसके मूल में छिपे सन्दर्भ को भी समझ लिया होता तो शायद सच्चाई समझ आती. उनके इस बयान के पीछे कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर टैरिफ का लगाया जाना मुख्य बिन्दु रहा. दरअसल ट्रम्प ने भारत पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था, जो समूचे देशों पर लगाये गए टैरिफ से कहीं ज्यादा था. इसके लगाये जाने की जो वजह अमेरिका द्वारा बताई गई थी, उसने अमेरिकी वित्त मंत्री के हालिया बयान को मजबूती प्रदान की. गत वर्ष अगस्त माह में अमेरिका द्वारा भारत पर ज्यादा टैरिफ लगाए जाने का कारण रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से तेल लेना बताया गया. अमेरिका का मानना है कि ऐसा करके भारत रूस की आर्थिक मदद कर रहा है.

 

ऐसे में एकबारगी अमेरिका के बयानों पर ध्यान देने के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में उनके द्वारा दिए जा रहे बयानों, उनके कार्यों का आकलन ही कर लिया जाता तो भी भारत को रूस से तेल लेने के लिए तीस दिनों की अनुमति दिए जाने के सन्दर्भ में स्थिति स्पष्ट हो जाती. ऑपरेशन सिन्दूर के समय में भी ट्रम्प के बयानों में बार-बार जोर दिया जाता रहा कि उनकी कोशिशों से ही युद्ध रुका. इस तरह की बयानबाजी के बाद देश की केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया. किसी आधिकारिक साईट पर जाकर सच देखने का प्रयास नहीं किया गया. ट्रम्प के ऐसे बयानों के बाद भी हमारे देश के अनेक सैन्य अधिकारियों, विशेषज्ञों के लगातार बयान आते रहे कि परमाणु हथियारों से सम्बंधित सुरक्षा को देखते हुए भारत द्वारा युद्ध-विराम जैसा कदम उठाया गया, न कि अमेरिका के दबाव में.

 

इन बयानों की सत्यता उस समय और पुख्ता होती है जबकि स्टेट ऑफ द यूनियन के सम्बोधन में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को रोककर तीन करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई थी. उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा था कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 3.5 करोड़ लोग मारे जाते. ट्रम्प ने अकेले ऑपरेशन सिन्दूर को रुकवाने की बात नहीं की बल्कि उनके द्वारा आठ युद्ध रुकवाने का भी दावा किया गया. देश के तमाम बयानवीर अभी ट्रम्प द्वारा तेल लेने की अनुमति सम्बन्धी कथित बयान पर अटके हुए हैं, उधर ट्रम्प ने अपने बड़बोलेपन में एक और विवादित बयान मीडिया के सामने सरका दिया. उन्होंने कहा कि उनके सैन्य अधिकारियों को ईरान के जहाजों को डुबोने में मजा आ रहा है. सोचा जा सकता है कि ट्रम्प किस हद तक अमानवीय होकर अपने बयानों को, अपने क़दमों को उठा रहे हैं.

 

ट्रम्प के ऐसे बयान उनको शांति का नोबेल पुरस्कार न मिल पाने की हताशा है. युद्ध उनके द्वारा महज अपनी हताशा को छिपाने और खुद को सर्वशक्तिशाली दिखाने के लिए किये जा रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन का भले ही साथ देना रहा हो मगर कूटनीतिज्ञ रूप से जेलेंस्की के साथ अमेरिका में किया गया बर्ताव उनकी अगम्भीरता को दर्शाता है. अब जबकि रूस से तेल लेने को अमेरिका द्वारा कथित अनुमति की चर्चा चरम पर है, उसी समय अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट बयान देते हैं कि पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव को देखते हुए वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने हेतु अमेरिका ने भारत से रूस से तेल खरीदने का आग्रह किया था. सीएनएन को दिए गए साक्षात्कार में ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ मिलकर भारतीय अधिकारियों से बातचीत कर समुद्र में पहले से उपस्थित रूसी कार्गो को भारतीय रिफाइनरियों में उतार लेने का आग्रह किया.

 

सोचने वाली बात है कि जो अमेरिका दो-चार दिन पहले भारत को अनुमति देने जैसी शब्दावली का प्रयोग कर रहा था, वही अब आग्रह जैसी भाषा बोल रहा है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने दूसरे कार्यकाल में बड़बोलेपन का ही उदाहरण पेश किया है, वो चाहे वैश्विक युद्ध रुकवाने की बात हो, नोबेल शांति पुरस्कार हो, टैरिफ हो या कि अब तेल खरीदने वाली बात हो. ऐसा लगता है कि ट्रम्प भली-भांति समझ चुके हैं कि भारत का विपक्ष इस स्थिति में है कि वह किसी भी छोटी से छोटी बात, झूठी बात के लिए केन्द्र सरकार का विरोध व्यापक स्तर पर करना शुरू कर देता है. इस मानसिकता को समझते हुए भारत को तेल खरीदे जाने की अनुमति देने जैसा बयान दिया. ये और बात है कि मुँह की खाने के बाद अमेरिका को अपने बयान से उलटना पड़ा. काश! ये बात भारतीय विपक्षी दल समझ पाता.