23 सितंबर 2026

सेवा संकल्प अभियान को लेकर उत्साह नहीं

भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सेवा और समर्पण के 25 वर्षों को संदर्भित करते हुए 'सेवा संकल्प अभियान' का आयोजन किया जा रहा है. यह मोदी जी के जन्मदिन 17 सितम्बर से शुरू होकर पूरे एक माह अर्थात 17 अक्टूबर तक चलना है. इस अभियान के आयोजन हेतु उत्तर प्रदेश में सरकार के स्तर से निर्देश जारी किये गए हैं. इस आयोजन में शासन-प्रशासन पूरी तत्परता के साथ जुटा हुआ है. शिक्षा संस्थानों, गैर-सरकारी संस्थाओं आदि पर एक तरह से कार्यक्रम थोप दिया गया है. ठीक है, भाजपा द्वारा अपने एक वरिष्ठ व्यक्ति के सम्मान में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, इसे लेकर कोई तर्क-वितर्क नहीं करेंगे क्योंकि घर-परिवार की तरह पार्टियाँ भी अपने पदाधिकारियों को, अपने वरिष्ठजनों के सम्मान में कुछ न कुछ करती रहती हैं.

 



इस बात में दोराय नहीं कि मोदी जी बहुत ही गम्भीरता और गहराई से जनता के मनोभावों को समझे हुए हैं. राजनीति के जो भी कदमताल हैं, उनसे भी वे भली-भांति परिचित हैं. यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर हमें जो बात खटक रही है, वो यह कि ऐसी स्थिति के बाद भी मोदी जी की सहमति इस अभियान के लिए है. इधर विगत कुछ समय से जिस तरह से मोदी-विरोध का माहौल बना हुआ है, उसके चलते मोदी जी की छवि से लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है. ऐसे में मोदी जी को स्वयं ही अपने जन्मदिन पर सम्बंधित लोगों को ससम्मान इस अभियान को स्थगित करने के लिए निर्देशित करना चाहिए था. मोदी जी को यहाँ स्वतः संज्ञान लेते हुए इस कारण से इस अभियान को स्थगित करना चाहिए था क्योंकि इस महीने भर के कार्यक्रम में पूरा सरकारी तंत्र तो व्यस्त है ही, इसके साथ-साथ शिक्षण संस्थानों के भी व्यस्त बने रहने की सम्भावना है.

 

भाजपा द्वारा, उसके पदाधिकारियों द्वारा इस अभियान को लेकर भले ही कुछ भी कहा जाये मगर वास्तविकता यह है कि इस अभियान से न केवल पार्टी की बल्कि मोदी जी की, योगी जी की छवि को धक्का लगा है. भाजपा को, ऐसे अभियान को बनाने वालों को विचार करना था कि इस देश ने कोरोना काल में मोदी जी के कहने पर शंख-थाली बनाये थे; दिए जलाये थे; और भी अनेक अवसरों पर मोदी जी के विचारों का सम्मान किया गया. अब जबकि विपक्षियों द्वारा उनके विरोध में माहौल निर्मित किया जा रहा है, उसमें ऐसे कार्यक्रम सहयोगी ही बनते नजर आ रहे हैं. कुछ समय पहले वैश्विक संकट के समय में मोदी जी द्वारा पेट्रोल-डीजल की कम से कम खपत करने को कहा गया था और यहाँ ढाई सौ मोटरसाइकिल वाराणसी से बड़नगर तक की यात्रा पर निकली हैं.

 

जबरिया थोपे गए से कार्यक्रमों को लेकर भले ही कोई सामने कुछ न कहे, सार्वजनिक रूप से कुछ न बोले मगर अंदरूनी रूप में इससे लोग खुश नहीं हैं. हाँ, कुछ तानाशाह मानसिकता वाले उच्चाधिकारियों को, संस्था प्रमुखों को अपनी भड़ास निकालने का मौका अवश्य मिल गया है.

 


20 सितंबर 2026

विकास की ओर मुफ़्त में अग्रसर हैं हम सब

यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाये जाने की अधिसूचना के बाद से दोनों तरफ से तर्क-वितर्क मचा हुआ है. सरकार और उसके समर्थक अपना पक्ष रख रहे हैं, इस शुल्क के विरोधी अपनी बात कह रहे हैं. यद्यपि इसको 15 अक्टूबर से अमल में आना है तथापि इस पर अभी से कुछ दुकानदारों की नकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिलने लगी है. वैसे सरकार द्वारा लेनदेन पर लगने वाले शुल्क के बारे में अपनी ही कहानी कही जा रही है मगर उस कहानी के पीछे खुद के द्वारा मुफ्त वितरण के बोझ को नहीं देखा जा रहा है.

 

आइये, इसकी तुलना कीजिए जरा,

एक के लिए वार्षिक खर्च लगभग बीस हज़ार करोड़ रुपए. दूसरे के लिए मासिक खर्च लगभग सोलह हज़ार करोड़ रुपए. जी हाँ, सही से पढ़ा है आपने इस बहुत बड़े अंतर को.

 

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) पर केन्द्र सरकार हर महीने औसतन 16,000 करोड़ रुपए से 17,000 करोड़ रुपए खर्च करती है. इस योजना के लिए सालाना करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए से लेकर 2.13 लाख करोड़ रुपए का आवंटन किया जाता है. इसमें देश के पात्र राशन कार्डधारकों को प्रति व्यक्ति 5 किलो मुफ्त राशन दिया जाता है.

 

इसके उलट MDR (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) को पूरी तरह मुफ्त रखने या इसे चलाने पर सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपए से लेकर 20,700 करोड़ रुपए का कुल परिचालन खर्च आता है. इसके बाद भी शुल्क पहले वाले पर लगा दिया गया अर्थात यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाया गया है.

 

एक और आँकड़े पर यदि निगाह डाली जाये तो पता चलेगा कि अनुमानित रूप में देश की जनसंख्या लगभग 147 करोड़ है और PMGKAY के अन्तर्गत मुफ्त राशन पाने वालों की संख्या लगभग 81 करोड़ है. सोचिए, आधे से ज़्यादा जनसंख्या (लगभग 55%) मुफ़्त का राशन ले रही है. विकास की ओर मुफ़्त में अग्रसर हैं हम सब.

 


16 सितंबर 2026

शुल्क का बोझ आएगा ग्राहकों के ऊपर

कराघात (Impact of Tax) और करापात (Tax Incidence) के बारे में क्या आपने पढ़-सुन रखा है? जिसने पढ़-सुन रखा है वह सहजता से यूपीआई लेनदेन सम्बन्धी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के सच को समझ सकता है. सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी करके यूपीआई लेनदेन पर कुछ शुल्क लगाये जाने के बारे में जनता को बताया है. इसमें बताया गया है कि इसमें दो हजार रुपये तक के लेनदेन को किसी भी तरह के शुल्क से मुक्त रखा गया है, साथ ही इसके ऊपर के लेनदेन पर लगने वाले शुल्क को भी दुकानदारों से लिया जायेगा, न कि ग्राहकों से.

 

दो हजार रुपये से अधिक के लेनदेन पर तो शुल्क लगाया ही गया है, भले ही वह देखने में बहुत कम समझ आ रहा हो; जारी अधिसूचना की भाषा में भले ही यह शुल्क उपभोक्ता को नहीं देना है किन्तु सोचिए एक पल को कि क्या यह शुल्क दुकानदार देने को तैयार होगा? आज भी क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने की स्थिति में दुकानदार लगने वाले टैक्स को ग्राहक की तरफ मोड़ देता है. कुछ इसी तरह की स्थिति यहाँ भी बनेगी. शुल्क चाहे दस रुपये आये या अधिकतम तीन सौ रुपये, उसे दुकानदार के द्वारा ग्राहक पर ही आरोपित कर दिया जायेगा. उदाहरण के लिए आप कोई सामान लेते हैं जो पच्चीस-पचास हजार रुपये का है. इस पर लगने वाला शुल्क सौ-दो सौ रुपये होगा और यह अधिकतम तीन सौ रुपये निर्धारित कर दिया गया है. निश्चित समझिये कि यह अतिरिक्त रुपये भी आपको ही चुकाने होंगे.

 

यूपीआई के कारण बैंकों पर, सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की कहानी कहने से पहले देश में मुफ्त में बँटने वाली रेवड़ियों की भी गिनती कर लेना, उससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ का भी वजन कर लेना. जनहित के नाम पर मुफ्त के राशन से लेकर लाड़ली-लाड़ला किया जा सकता है; स्कूटी, मोबाइल, टेबलेट किया जा सकता है, बैंक खातों को समय-समय पर भरा जा सकता है, उसी तरह प्रत्येक यूपीआई लेनदेन को भी जनहित में स्वीकारा जा सकता है.

 


10 सितंबर 2026

अस्सी के दशक में पहुँचने की भेड़चाल

'अस्सी' को काशीनाथ सिंह ने 'काशी का अस्सी' लिख कर प्रसिद्ध कर दिया था, अब फेसबुक की भसड़ में अस्सी के दशक का पुनर्पाठ किया जा रहा है. जिसे देखो वो अपनी अस्सी के दशक की फोटो बनाये-चिपकाये पड़ा है. इसमें हास्यास्पद स्थिति ये है कि ऐसे लोग जिनका जन्म भी अस्सी के दशक में नहीं हुआ था, वे भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहयोग से बाकियों की बुद्धि ख़राब करने में लगे हैं.

 

ठीक है, तकनीक का आनंद उठाना चाहिए, जीवन में इस तरह से हलके-फुल्के पलों को भी जीना चाहिए मगर क्या ही अच्छा और सुखद महसूस होता यदि जिन्होंने अस्सी के दशक का खुशनुमा जीवन जिया है, जीवंत ज़िन्दगी का आनन्द उठाया है, वे लोग बजाय AI से बनी अथवा अपनी असली फोटो लगाने के स्थान पर उन दिनों की स्मृतियों को लिखते. गर्मी की छुट्टियों की तफरी, आम का स्वाद, तरबूज-खरबूज का रस, छतों पर बैठकर एकसाथ भोजन का मजा, लालटेन की रौशनी में पढ़ाई, रामलीला में जगह घेरने की कवायद, मैदान पर खेलने को जगह बनाने की कुश्ती, दोस्तों के संग शैतानियों का साम्राज्य खड़ा करना, कॉमिक्स की दुनिया में खो जाना, राजन-इकबाल सीरीज के साथ जासूस बन जाना, किराये की साईकिल लेकर धुरंधर हवावाजी करना आदि-आदि कितना कुछ था बताने को, लिखने को.

 

इन सबके बजाय उन दिनों के लोगों ने भी चित्र चिपकाना, झूठे चित्र बनाना पसंद किया. शायद लिखने से ज्यादा आसान लगा होगा AI से फोटो बनवा कर चिपका देना या फिर एल्बम से फोटो निकाल उसकी कॉपी लगा देना.