20 June 2022

स्कूटी वाली लड़की - कहानी संग्रह

हमारा बहुप्रतीक्षित कहानी संग्रह स्कूटी वाली लड़की प्रकाशित होकर आ गया है. आप सभी से निवेदन है कि उसे पढ़कर अपनी राय से अवगत कराने का कष्ट करें. 
पुस्तक अमेज़न और श्वेतवर्णा की साईट पर उपलब्ध है... 
अमेज़न: 279/-
श्वेतवर्णा: 225/-

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https://shwetwarna.com/.../scooty-wali-ladaki-kumarendra/ 


18 June 2022

अग्निपथ योजना का अनावश्यक विरोध

भारतीय सेना में अग्निपथ योजना की घोषणा होते ही उसका विरोध देश में अनेक स्थानों पर दिखाई दिया. सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया साथ ही निजी संपत्ति को भी क्षति पहुँचाई गई. अग्निपथ योजना में भर्ती किये जाने वाले अग्निवीर युवाओं के सन्दर्भ में अनेक तरह की चर्चाएँ देखने को मिल रही हैं. ऐसा लगता है जैसे किसी अन्य शक्ति के हाथों से सारा उपद्रव संचालित हो रहा हो. जिस तरह से बयानबाजी होने लगी, जिस तरह से लोगों ने इस योजना को लेकर पूर्वाग्रह व्यक्त किये उसे देखकर तो यही लगता है कि विरोध करने वाले किसी व्यक्ति ने इस योजना के बारे में पढ़ नहीं रखा है. केंद्र सरकार द्वारा जैसे ही इस योजना की घोषणा की गई वैसे ही विरोधियों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया.


कुछ बिंदु ऐसे हैं जिन पर विचार किया जाता तो शायद बहुत बातें स्पष्ट हो जाती. यहाँ जिस तरह से विरोध शुरू किया गया उसके अनुसार ऐसा प्रतीत हुआ मानो सरकार युवाओं को जबरदस्ती उठा ले जा रही है. सत्रह वर्ष से बाईस वर्ष तक के युवाओं के लिए जैसे यह अनिवार्य योजना है, जिसमें उनको अपने ये चार साल सेना के लिए देना ही देना है. सरकार के ऐसे कदम के बाद उनका भविष्य चौपट हो जायेगा. चार साल के बाद वे किस नौकरी की तैयारी करेंगे. यहाँ समझना चाहिए था कि यहाँ किसी तरह की अनिवार्यता अथवा जबरदस्ती नहीं है. जिस युवा का मन हो सेना में सेवा करने का वह चार साल के लिए इसमें जा सकता है.


जिस तरह से कहा जा रहा कि सिविल सेवा में जाने के लिए, इंजीनियर, डॉक्टर आदि बनने के लिए यही उम्र महत्त्वूर्ण होती हा और यदि यही चार साल सेना में निकल गए तो फिर वे युवा क्या करेंगे. यहाँ सोचना होगा कि जिस युवा को सिविल सेवा, डॉक्टर, इंजीनियर क्षेत्र में जाना होगा वो उसी के लिए अपनी पढ़ाई कर रहा होगा. वो अनावश्यक रूप से अपना ध्यान क्यों भटकाएगा? इस योजना के द्वारा कम से कम वे युवा जो शारीरिक रूप से सक्षम हैं मगर किसी अन्य कारण से सिविल अथवा अन्य क्षेत्र में नहीं जा सकते. सेना में अग्निवीर के रूप में अपनी सेवा दे सकते हैं.




इस बात का भी विरोध किया जा रहा है कि इस तरह की भर्तियों से सेना का मूल ढाँचा प्रभावित होगा. यहाँ भी इस बात पर विचार नहीं किया गया कि इस अग्निपथ योजना के आने के कारण किसी दूसरी भर्ती योजना को बंद नहीं किया गया है. नियमित रूप से जो भर्तियाँ सेना में होती थीं, वे चलती रहेंगी. इस योजना का लाभ जो व्यक्तिगत रूप से हमें समझ आ रहा है वो ये होगा कि सेना के वे कुशल, नियमित जवान जो लम्बे परिश्रम, अनुशासित जीवन और अभ्यास के बाद प्रशिक्षित होते हैं और उनको अपना बहुत सा समय मंत्रों ट्रेन की सुरक्षा में, वीआईपी की सुरक्षा में, आपदा के समय राहत कार्यों में, किसी दुर्घटना के समय सहायता करने में निकालना पड़ता है, उन सैनिकों को इससे मुक्त रखा जा सकता है. यहाँ पर यही अग्निवीर तैनात किये जा सकते हैं. इससे देश के कुशल और प्रशिक्षित सैनिकों को अपना बेहतर सेना के लिए, देश की सुरक्षा के लिए देने को मिलेगा.


अभी कहीं भी खुलकर ये बात नहीं कही गई है कि अग्निवीरों को देश की सीमा पर तैनात किया जायेगा. किसी ने भी ये नहीं कहा है कि उनको हथियारों से समृद्ध करके संवेदित जगहों पर तैनात किया जायेगा. जिस तरह की चर्चाएँ निकल कर सामने आ रही हैं उनमें एक बात ध्यान देने योग्य है कि ये एक तरह का सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम है. जिसके चार साल तक नियमित प्रतिमाह वेतन तो मिलेगा ही, चार साल की अवधि पूरी होने के बाद एक बड़ी धनराशि भी प्रदान की जाएगी. दुर्घटना में अथवा इन्हीं चार साल की अवधि में किसी तरह से अग्निवीर की मृत्यु हो जाती है तो उसके लिए भी सरकार की तरह से धनराशि की व्यवस्था की गई है.


देखा जाये तो वर्तमान में जिस तरह का परिदृश्य राजनैतिक हलकों में बना हुआ है, उसे देखते हुए एक बात विरोधी भली-भांति समझ चुके हैं कि उनके द्वारा किसी भी रूप में केंद्र सरकार को हिलाया नहीं जा सकता है. इसलिए विरोधियों के द्वारा समय-समय पर उपद्रव रूप में विरोध किया जाने लगा है. उनका मकसद है कि समाज में लोगों में केंद्र सरकार के विरुद्ध एक मानसिकता का निर्माण हो, सरकार के खिलाफ माहौल बने जिससे आगामी चुनावों में शायद किसी हद तक सरकार को कमजोर कर सत्ता से दूर किया जा सके. अग्निवीर का विरोध इसी विपक्षी मानसिकता का परिणाम है.

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15 June 2022

भाषाई संवर्द्धन में सहायक राष्ट्रीय शिक्षा नीति

देश के लिए भाषाई स्तर पर हाल की दो घटनाएँ निश्चित ही आह्लादकारी रही हैं. इनमें पहली घटना हिन्दीभाषी उपन्यास को बुकर पुरस्कार मिलना तथा दूसरी घटना संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनी भाषाओं में हिन्दी भाषा को शामिल करना रहा है. यह संयोग ही नहीं है कि एक तरफ भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं, कला, संस्कृति के संवर्द्धन हेतु विशेष प्रावधान किये हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषा को एक अलग पहचान मिलनी भी दिखने लगी है. 


राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं, कला और संस्कृति के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि ‘भारत की इस सांस्कृतिक सम्पदा का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रसार देश की उच्चतम प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि यह देश की पहचान के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है. भारत में भ्रमण, भारतीय अतिथि सत्कार का अनुभव लेना, भारत के खूबसूरत हस्तशिल्प एवं हाथ से बने कपड़ों को खरीदना, भारत के प्राचीन साहित्य को पढ़ना, योग एवं ध्यान का अभ्यास करना, भारतीय दर्शनशस्त्र से प्रेरित होना, भारत के अनुपम त्योहारों में भाग लेना, भारत के वैविध्यपूर्ण संगीत एवं कला की सराहना करना और भारतीय फिल्मों को देखना आदि ऐसे कुछ आयाम हैं जिनके माध्यम से दुनिया भर के करोड़ों लोग प्रतिदिन इस सांस्कृतिक विरासत में सम्मिलित होते हैं, इसका आनंद उठाते हैं और लाभ प्राप्त करते हैं.’ कला, संस्कृति की यह विशालता निश्चित रूप से भाषा के साथ जुड़ती है. भाषा के माध्यम से ही किसी भी देश की संस्कृति, कला आदि से परिचय होता है, उसके साथ समन्वय बनता है. एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति के नागरिकों संग बातचीत करना, एक देश का दूसरे देश के साथ तालमेल बैठाना, अपने अनुभवों को दूसरों से साझा करना आदि भाषा से ही संचालित होता है. यदि कहा जाये कि संस्कृति हमारी भाषाओं में समाहित है तो यह अतिश्योक्ति न होगी.




राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के प्रति सजगता का एक बहुत बड़ा कारण है कि भारतीय भाषाओं के प्रति समुचित ध्यान नहीं दिया गया है. उनके संवर्द्धन, संरक्षण के प्रति भी सकारात्मक एवं ठोस कदम नहीं उठाये गए हैं. इस नकारात्मक वृत्ति का दुष्परिणाम यह रहा है कि विगत पचास वर्षों की कालावधि में देश ने अपनी दो सौ से अधिक भाषाओं को खो दिया है. यूनेस्को ने भी 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय की श्रेणी में शामिल किया है. यह स्थिति किसी भी देश की भाषाई संस्कृति के लिए सुखद तो कदापि नहीं कही जाएगी. भारतीय भाषाओं की इसी दशा को देखते हुए शिक्षा नीति में प्रावधान किया गया है कि स्कूली स्तर पर ही कला, संगीत, हस्तकौशल पर विशेष ध्यान देते हुए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा बनाया जाये. मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा को दिए जाने के पीछे भी सरकार की मंशा यही है कि कम से कम स्कूली शिक्षा, अध्ययन के माध्यम से ही मातृभाषा, स्थानीय भाषाओं का संरक्षण, संवर्द्धन हो सकेगा.


भाषा को लेकर यहाँ के नागरिकों में अनेक प्रकार के भ्रम फैले हुए हैं. शिक्षा क्षेत्र में ऐसे लोगों का विचार है कि विज्ञान विषयों का अध्ययन मातृभाषा में किया जाना सहज, संभव नहीं है. इसके लिए ऐसे राज्यों अथवा शिक्षण संस्थानों द्वारा अंग्रेजी को वरीयता दी जाती है. उनका मानना है कि उच्च माध्यमिक स्तर पर विज्ञान विषयों को अंग्रेजी माध्यम में ही पढ़ाना श्रेयस्कर है. इस बारे में देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम से सीख लेने की आवश्यकता है. यह सुनकर भाषाई विभेद करने वाले लोगों को आश्चर्य होगा कि डॉ. कलाम ने बारहवीं तक की सम्पूर्ण शिक्षा, जिसमें विज्ञान विषय भी शामिल हैं, अपनी मातृभाषा तमिल में ली थी. 


शिक्षा नीति में बहुभाषिक व्यवस्था को लागू करते हुए त्रिभाषा फार्मूला का यथाशीघ्र क्रियान्वयन किये जाने पर बल दिया गया है. त्रिभाषा फार्मूला के पीछे की भावना यही है कि हिन्दीभाषी राज्यों के विद्यार्थी दक्षिण अथवा अन्य राज्यों की एक भाषा सीखें, इसी तरह अहिन्दीभाषी राज्यों के विद्यार्थी हिन्दी सीखें. ऐसा करने से देश के विभिन्न राज्यों में फैली भाषाई कटुता को दूर करने में सहायता मिलेगी. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस प्रकार की व्यवस्था भी की गई है जिसके अंतर्गत भारतीय भाषाओं के शिक्षण को बढ़ावा देने हेतु राज्य परस्पर अनुबंध कर भाषा शिक्षकों का आदान-प्रदान कर सकते हैं.  त्रिभाषा फार्मूला में संस्कृत भाषा को भी मुख्य धारा में शामिल करने के लिए इसे उच्चतर शिक्षा तक अपनाये जाने की व्यवस्था की गई है. इसे एक पृथक विषय के पढ़ाने से ज्यादा रुचिपूर्ण एवं नवाचारी तरीकों से जोड़ने का सकारात्मक कदम उठाया गया है. गणित, खगोलशास्त्र, योग आदि सहित अन्य समकालीन विषयों को संस्कृत के साथ जोड़कर संस्कृत विश्वविद्यालयों और अन्य उच्चतर शिक्षण संस्थानों को बहु-विषयक संस्थानों के रूप में विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया गया है.


इन प्रावधानों के साथ ही शिक्षा नीति में अनुवाद को लेकर बहुत ही गंभीरता दिखाई गई है. अभी तक अनुवाद को मौलिक कार्य तो स्वीकारा ही नहीं जाता रहा है, इससे भी दुखद स्थिति यह रही है कि अनुवाद को दोयम दर्जे का माना जाता रहा है. इस दिशा में न तो बहुत ज्यादा कार्य हुआ हुआ है और न ही अनुवाद कार्य को प्रोत्साहित किया गया है. ऐसी स्थिति होने के कारण ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति, इतिहास आदि विषयों के प्रसार का क्षेत्र संकुचित रह जाता है. किसी भी विषय का यदि उसी क्षेत्र की स्थानीय भाषा में अनुवाद करा दिया जाये तो उस ज्ञान से, उस विषय से सभी क्षेत्रों के नागरिक परिचित हो सकते हैं. यदि वैश्विक स्तर पर कोई ज्ञानवर्द्धक पुस्तक किसी भी भाषा में छपती है और यदि भारतीय भाषाओं में उसका अनुवाद उपलब्ध हो जाये तो निश्चित ही देश के नागरिक, विद्यार्थी वैश्विक साहित्य का लाभ अपनी भाषा में ले सकेंगे. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में राष्ट्रीय अनुवाद संस्थान की स्थापना तथा अनुवाद के उच्च गुणवत्ता वाले पाठ्यक्रम चलाने का प्रावधन किया जाना दर्शाता है कि भाषा विकास हेतु सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है.


कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत के विभिन्न भाषाओं, बोलियों, कला एवं संस्कृति के संवर्धन हेतु पर्याप्त प्रावधान किये गये हैं. यदि इन सभी प्रावधानों का शतप्रतिशत क्रियान्वयन हो गया तो भारतीय सनातन संस्कृति अपने गौरवशाली अतीत को पुनः प्राप्त कर भारत को विश्व के अग्रिम पंक्ति के देशों में स्थापित करने में सफल होगी. यहाँ हम सभी को स्मरण रखना होगा कि यदि नागरिकों में अपनी ही भाषा के प्रति स्वाभिमान नहीं होगा तो उनको विश्व में कहीं सम्मान नहीं मिल सकेगा.


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11 June 2022

संयुक्त राष्ट्र की भाषाओं में हिन्दी सम्मिलित

न्यूयॉर्क. संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने बहुभाषावाद(multilingualism) पर एक उल्लेखनीय पहल की है। भारत के लिए यह गौरव की बात है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा(UNGA) के कामकाज में अब हिंदी भाषा को भी जगह मिलेगी। UNGA ने 10 जून को इस दिशा में एक उल्लेखनीय पहल करते हुए  बहुभाषावाद (multilingualism) पर भारत की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव को पारित कर दिया। यानी अब  UNGA के कामकाज में हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं को भी तवज्जो मिलेगी। बता दें कि अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश संयुक्त राष्ट्र की 6 आफिसियल लैंग्वेज हैं, जबकि अंग्रेजी और फ्रेंच UN सेक्रेट्रिएट की कामकाजी भाषाएं हैं।




हिंदी के अलावा बांग्ला और उर्दू को भी मिली जगह

UNGA में शुक्रवार को पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि हिंदी भाषा सहित ऑफिसियल और नन ऑफिसियल लैंग्वेजेज संयुक्त राष्ट्र के इम्पोर्टेंट कम्युनिकेशन और मैसेजेज के प्रसार को प्रोत्साहित करती हैं। इस साल पहली बार प्रस्ताव में हिंदी भाषा का उल्लेख है। इस प्रस्ताव में पहली बार बांग्ला और उर्दू का भी जिक्र है। यूनाइटेड नेशन में भारत के परमानेंट रिप्रेजेंटेटिव टीएस तिरुमूर्ति( TS Tirumurti) ने इस पहल का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि बहुभाषावाद को UN की कोर वैल्यु के रूप में मान्यता दी गई है। तिरुमूर्ति ने बहुभाषावाद व हिंदी को प्राथमिकता देने के लिए यूएन महासचिव के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि भारत 2018 से यूएन के ग्लोबल कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट (DGC) के साथ पार्टनरशिप कर रहा है। यूएन की न्यूज  और मल्टीमीडिया कंटेंट्स को हिंदी में प्रसारित करने व मुख्यधारा में लाने के लिए अलग से फंड दे रहा है।


हिंदी @ यूएन प्रोजेक्ट

बता दें कि हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत 'हिंदी @ यूएन' प्रोजेक्ट 2018 में शुरू किया गया था। इसका मकसद हिंदी भाषा के जरिये संयुक्त राष्ट्र की अप्रोच को और व्यापक बनाने के साथ दुनिया भर में लाखों हिंदी भाषी आबादी के बीच इंटरनेशनल मुद्दों के बारे में अधिक जागरुकता फैलाना रहा है। तिरुमूर्ति ने कहा-"इस संदर्भ में मैं 1 फरवरी, 1946 को पहले सेशन में अपनाए गए UNSC के प्रस्ताव 13(1) को याद करना चाहूंगा, जिसमें कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र अपने उद्देश्यों को तब तक प्राप्त नहीं कर सकता जब तक कि दुनिया के लोगों को इसके उद्देश्यों और एक्टिविटीज के बारे में पूरी जानकारी नहीं हो।" यानी तिरुमूर्ति का आशय भाषा की पहुंच से था।


क्या है संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी UNGA

संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) जिसे संक्षिप्त में UNGA भी कहते हैं, संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के मुख्य 6 अंगों में से एक है।  यह एक इंटरनेशनल पॉलिटिकल फोरम है। यहीं से अंतरराष्‍ट्रीय सियासत के एजेंडे तय होते हैं। UNGA को दुनिया की लघु संसद भी कहा जाता है। इसकी पहली सभा 10 जनवरी 1946 को लंदन के मेथोडिस्ट सेंट्रल हॉल में आयोजित हुई थी। उस समय इसके सिर्फ 51 देश मेंबर थे। आज यह संख्‍या 193 हो चुकी है।


(उक्त आलेख इस वेबसाइट से ज्यों का त्यों लिया गया है. इसका किसी भी रूप में व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा रहा है. इसे जनहित में जानकारी प्रसारित करने के उद्देश्य से लगाया गया है.)

उक्त समाचार के बारे में कुछ अन्य जानकारी यहाँ क्लिक करके भी प्राप्त की जा सकती है.


08 June 2022

सड़क दुर्घटनाएँ और नागरिक कर्तव्य

आजकल सड़क दुर्घटनाओं के समाचार सुनाई देना आम बात हो गई है. इन दुर्घटनाओं में मारे जाने वालों में अधिकतम संख्या बच्चों की दिख रही है. ये चिंताजनक है मगर इसके बाद भी ऐसा लगता है जैसे समाज के बहुतायत लोग इस तरफ से मुँह मोड़े बैठे हैं. यदि आसपास के माहौल पर गौर करें तो बच्चों, किशोरों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं के मूल में कारण तेज रफ़्तार वाहन का चलाया जाना है. बाइक के खुलेआम होते स्टंट, चार पहिया वाहन का अनियंत्रित रफ़्तार से दौड़ाया जाना, सुरक्षा मानकों का न मानना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण सड़क दुर्घटनाएँ आम हो चली हैं. ऐसी घटनाओं पर समाज क्षणिक प्रतिक्रिया देते हुए प्रशासन को दोषी बना देता है. 


किसी भी तरह की दुर्घटना पर शासन-प्रशासन को जिम्मेवार बताकर अपने आपको दोषमुक्त कर लेने की संकल्पना आज सहज रूप में दिखाई देने लगी है. क्या वाकई एक सामान्य नागरिक का दायित्व, उसका कर्तव्य इतना ही है? क्या वाकई समूची जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ प्रशासन की है? हम नागरिकों की, माता-पिता की, घर-परिवार की कोई जिम्मेवारी नहीं है? क्या शैक्षणिक संस्थानों का एकमात्र उद्देश्य पाठ्यक्रम को समाप्त करवाना भर रह गया है? क्या शिक्षकों का, शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व नहीं है कि वे अपने यहाँ पढ़ने वाले बच्चों को सजगता, सतर्कता, सुरक्षा के बारे में जागरूक करें?  क्या पारिवारिक स्तर पर बच्चों को संयमित रहने, अनुशासित रहने के बारे में नहीं बताया जा सकता है?




इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि उसके शहर में, उसके कस्बे में स्कूल यूनिफार्म पहने किशोर बाइक स्टंट करते किसी न किसी सड़क पर दिख जाते हैं. तेज गति से फर्राटा भरती बाइक, बिना हेलमेट के चलाई जाती बाइक, तीन-तीन लोगों का बाइक पर जमे होना किसी के लिए आपत्तिकारक नहीं रह गया है. यदि इस तरह की हरकतों को रोकने का काम किया जा रहा है तो सिर्फ प्रशासन द्वारा, आम नागरिक ऐसी टोकाटाकी से खुद को दूर ही रखे हैं. इसका कारण इन उद्दंड युवाओं, किशोरों द्वारा गाली-गलौज करना, हाथापाई करना है.


नियमानुसार स्कूल में पढ़ रहे बच्चों का ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बन सकता है. ऐसे में विडम्बना यह है कि ऐसे बच्चों को न तो घर-परिवार में रोका जाता है और न ही सड़क पर यातायात पुलिस के द्वारा उनको प्रतिबंधित किया जाता है. यहाँ समझने वाली बात ये है कि स्कूल के बच्चे को बाइक किसी घर से ही मिली होगी. चाहे वो उसका अपना घर रहा हो अथवा उसके किसी दोस्त का. क्या उनके माता-पिता का दायित्व नहीं बनता है वे बच्चों को बाइक चलाने से रोकें. यहाँ दुर्घटना होने की स्थिति में प्रशासनिक लापरवाही से अधिक पारिवारिक लापरवाही का मामला सामने आता है. ऐसी कई-कई दुर्घटनाएँ नदियों, बाँधों, रेलवे ट्रेक, सड़क, आदि पर आये दिन दिखाई देती हैं.


प्रथम दृष्टया ऐसे मामलों में प्रशासन को दोषी ठहराया जा सकता है. किसी भी नागरिक की सुरक्षा का दायित्व प्रशासन का है. महज इतने भर से आम नागरिक अथवा परिवार भी अपने दायित्व से मुँह नहीं मोड़ सकता है. बच्चों को घर में, स्कूल में जागरूक किया जाना चाहिए. न केवल अपनी सुरक्षा वरन अन्य दूसरे नागरिकों की सुरक्षा के बारे में बताया जाना चाहिए. हमें समझना होगा कि प्रशासनिक तंत्र के पास नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक-विकास के, समाज-विकास के अनेकानेक कार्य होते हैं. एक सामान्य अवधारणा में नागरिकों की संख्या की तुलना में सरकारी मशीनरी, प्रशासनिक तंत्र बहुत-बहुत छोटा और अत्यंत सीमित है. उसकी पहुँच प्रत्येक क्षेत्र में बना पाना न तो व्यावहारिक है और न ही सरल है. ऐसे में आम नागरिक की भी जिम्मेवारी बनती है कि वो समाज में प्रशासनिक भूमिका निर्वहन के लिए खुद को तैयार करे. जीवन कितना अनमोल है इसकी अहमियत बच्चों को, नौजवानों को बताये जाने की आवश्यकता है.


ध्यान रखना चाहिए कि जिन बच्चों को देश की, समाज की आधारशिला रखनी है, उसका भविष्य बनना है उनका यूँ चले जाना किसी के हित में नहीं है. किसी भी बच्चे का, नौजवान का चले जाना जितना हानिकारक और दुखद एक परिवार के लिए है, उतना ही किसी समाज और देश के लिए भी है. यदि समाज का एक-एक नागरिक, माता-पिता, शिक्षक स्वयं को प्रशासन का अंग मानकर बच्चों को सचेत करने का कार्य करें, बच्चों को अनुशासित करने का दायित्व निभाएं, बच्चों को जीवन की महत्ता के बारे में समझाएँ तो आये दिन बच्चों की लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है. बच्चों को असमय मौत के आगोश में जाने से रोका जा सकता है. परिवार, समाज, देश की अमूल्य क्षति को रोका जा सकता है.  


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04 June 2022

पर्यावरण के लिए घातक है ई-कचरा

पर्यावरण के प्रति सामाजिक रूप से सभी चिंतित दिखाई देते हैं. बचपन से पर्यावरण की एक रटी-रटाई परिभाषा ‘परि+आवरण’ के साथ आगे बढ़ते रहने के कारण जल, वायु, ध्वनि, मृदा प्रदूषणों पर सबकी चिंता देखने को मिलती है मगर अपना विकराल रूप धारण कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे की तरफ अभी समाज बहुत गम्भीर नहीं दिखता है. आज भी बहुत बड़े जनमानस की तरफ से समझने की कोशिश न हो रही कि इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट भी भयानक तरीके से पर्यावरण के लिए, मानव के लिए खतरा बन गया है.


इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट को सामान्य बोलचाल में ई-कचरा के रूप में जाना जाता है. इस शब्द का प्रयोग चलन से बाहर हो चुके पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिये किया जाता है. ई-कचरा सूचना प्रौद्योगिकी और संचार उपकरण तथा उपभोक्ता इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स के रूप में निकलता है. इसमें मूलतः सेलफोन, स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, कम्प्यूटर से सम्बंधित उपकरण, माइक्रोवेव, रिमोट कंट्रोल, बिजली के तार, स्मार्ट लाइट, स्मार्टवॉच आदि शामिल हैं.


सामाजिक रूप से यह बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि समाज का जिस तेजी से डिजिटाइजेशन हो रहा है, उसी तेजी से ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. आधुनिक तकनीक और मानव जीवन शैली में आने वाले बदलाव के कारण ऐसे उपकरणों का उपयोग दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है जो विषैले, हानिकारक पदार्थों के जनक बनते हैं. ट्यूबलाइट, सीएफएल जैसी रोज़मर्रा वाली वस्तुओं में पारे जैसे कई प्रकार के विषैले पदार्थ पाए जाते हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं.




ऐसा अनुमान है कि पूरी दुनिया में लगभग 488 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2020 के अनुसार दुनिया भर में वर्ष 2019 53.6 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ. संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में एशिया में ई-कचरे की सर्वाधिक मात्रा लगभग 24.9 मीट्रिक टन उत्पन्न हुई. रिपोर्ट के अनुसार कुल ई-कचरे में स्क्रीन और मॉनिटर 6.7 मीट्रिक टन, लैंप 4.7 मीट्रिक टन, आईटी और दूरसंचार उपकरण 0.9 मीट्रिक टन शामिल हैं. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत ने 2019-20 में 10 लाख टन से अधिक ई-कचरा उत्पन्न किया जो 2017-18 के 7 लाख टन से काफी अधिक है. इसके विपरीत 2017-18 से ई-कचरा निपटान क्षमता 7.82 लाख टन से नहीं बढ़ाई गई है. एक रिपोर्ट कहती है कि ई-कचरा उत्पादक देशों अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद भारत का स्थान है.


ई-कचरे में मरकरी, कैडमियम और क्रोमियम जैसे कई विषैले तत्त्व शामिल होते हैं. इनके निस्तारण के असुरक्षित तौर-तरीकों से मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. इससे अनेक तरह की बीमारियाँ होने की आशंका रहती है. भूमि में दबाने से ई-कचरा मिट्टी और भूजल को दूषित करता है. जब मिट्टी भारी धातुओं से दूषित हो जाती है तो उस क्षेत्र की फसलें विषाक्त हो जाती हैं, जो अनेक बीमारियों का कारण बन सकती हैं. भविष्य में कृषियोग्य भूमि को भी अनुपजाऊ हो सकती है. मिट्टी के दूषित होने के बाद ई-कचरे में शामिल पारा, लिथियम, लेड, बेरियम आदि भूजल तक पहुँचती हैं. धीरे-धीरे तालाबों, नालों, नदियों, झीलों आदि का पानी अम्लीय और विषाक्त हो जाता है. यह स्थिति मानवों, जानवरों, पौधों आदि के लिए घातक हो सकती है. ई-कचरा में शामिल विषाक्त पदार्थों का नकारात्मक प्रभाव मस्तिष्क, हृदय, यकृत, गुर्दे आदि पर बहुत तेजी से दिखाई देता है. इसके साथ-साथ मनुष्य के तंत्रिका तंत्र और प्रजनन प्रणाली को भी यह प्रभावित कर सकता है.


ई-कचरा के निपटान की अपनी स्थितियाँ, अपनी चुनौतियाँ हैं. इस कारण सबसे ज्यादा जोर इसके पुनर्नवीनीकरण पर दिया जा रहा है. पुनर्नवीनीकरण के द्वारा प्लास्टिक, धातु, काँच आदि को अलग-अलग करके उसको पुनरुपयोग योग्य बनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2020 रिपोर्ट में कहा गया है कि अब वैश्विक स्तर पर उन देशों की संख्या 61 से बढ़कर 78 हो गई है जिन्होंने ई-कचरे से संबंधित कोई नीति, कानून या विनियमन अपनाया है. इसमें भारत भी शामिल है किन्तु इसके बाद भी भारत में ई-अपशिष्ट के प्रबंधन से सम्बंधित अनेक चुनौतियाँ हैं. सबसे बड़ी चुनौती जन भागीदारी का बहुत कम होना है. इसके पीछे उपभोक्ताओं की एक तरह की अनिच्छा है जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रीसाइक्लिंग के लिये बनी रहती है. इसके अलावा हाल के वर्षों में एक और चुनौती इस रूप में सामने आई है कि देश में बहुत से घरों में ई-कचरे का निस्तारण बड़े पैमाने पर होने लगा है. यह स्थिति तब है जबकि भारत में ई-कचरे के प्रबंधन के लिये वर्ष 2011 से कानून लागू है जो यह अनिवार्य करता है कि अधिकृत विघटनकर्त्ता और पुनर्चक्रणकर्त्ता द्वारा ही ई-कचरा एकत्र किया जाए. इसके लिये वर्ष 2017 में ई-कचरा (प्रबंधन) नियम 2016 अधिनियमित किया गया है.


उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार भारत में ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण करने वाली कुल 312 अधिकृत कंपनियाँ हैं जो प्रतिवर्ष लगभग 800 किलो टन ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण कर सकती हैं. हालाँकि अभी भी भारत में औपचारिक क्षेत्र की पुनर्चक्रण क्षमता का सही उपयोग संभव नहीं हो पाया है क्योंकि ई-कचरे का बहुत बड़ा भाग अभी भी अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा नियंत्रित किया जाता है. ऐसा माना जाता है कि देश का लगभग नब्बे प्रतिशत ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण अनौपचारिक क्षेत्र में किया जाता है.


तकनीक, आधुनिक जीवनशैली, आवश्यकता आदि की आड़ लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग भले ही अंधाधुंध तरीके से किया जाने लगा हो मगर यह स्वीकारना होगा ई-कचरा भविष्य के लिए खतरा बनता जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, गैजेट्स का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता है और बहुतायत समाज का इन्हीं पर निर्भर होते जाना खतरे का सूचक है. आज की युवा पीढ़ी के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुविधा के लिए कम, पैशन के लिए ज्यादा उपयोग किया जा रहा है. ऐसे में उनके द्वारा उपकरणों को जल्दी-जल्दी बदल दिया जाता है. नवीन तकनीक के कारण भी बहुतेरे उपकरण आउटडेटेड हो जाते हैं. यह भी ई-कचरा की मात्रा को बढ़ाने का काम कर रहा है.


पर्यावरण की, मानव, जीवों की सुरक्षा की खातिर लोगों को केवल हवा, पानी, भूमि, पेड़-पौधों को बचाने के बारे में ही सजग नहीं होना है बल्कि ई-कचरा के प्रति भी सावधान होने की आवश्यकता है. बेहतर हो कि जीवनशैली को संयमित, नियंत्रित किया जाये. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अत्यावश्यक होने पर ही उपयोग किया जाये. उनके निस्तारण के लिए औपचारिक क्षेत्र की सहायता ली जाये. संभव है कि मानव समाज कुछ हद तक आने वाले खतरे को टाल सके.  

 

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31 May 2022

मुस्लिम समाज को सकारात्मक पहल करने का अवसर

काशी को केन्द्र और उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार होने के बाद से भगवान शिव की नगरी नहीं स्वीकारा गया है बल्कि महादेव की इस नगरी का जिक्र सनातन संस्कृति में अनादि काल से देखने को मिलता है. विगत कई वर्षों से जिस तरह से रामलला की जन्मभूमि को लेकर इस देश में विवाद मचा रहा, वैसा ही कुछ मसला काशी में ज्ञानवापी को लेकर बना रहा. अब जबकि विगत दिनों अदालत के आदेश के बाद हुए सर्वे से मस्जिद में यह स्पष्ट रूप से देखने में आया कि वुजू करने की जगह पर शिवलिंग स्थापित है. शिवलिंग जैसे पावन स्थल को, श्रद्धा के केन्द्र को किसने वुजू करने के स्थान में परिवर्तित किया होगा, ये अलग चर्चा का विषय है मगर इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सके कि ऐसा करने के पीछे तात्कालिक आतातायियों में मन में, दिल में हिन्दुओं और उनके आराध्यों के विरुद्ध नफरत का होना रहा होगा. 


ऐसा समझने के लिए किसी राकेट साइंस की आवश्यकता नहीं है. देश भर में सैकड़ों की संख्या में हिन्दुओं के, सनातनधर्मियों के आस्था के केन्द्रों को, उनके आराध्यों को क्षत-विक्षत किया गया. बहुतेरे मंदिरों, श्रद्धा केन्द्रों का ध्वंस करके उन आतातायियों ने अपने मजहबी स्थलों का निर्माण किया. कालांतर में सनातनधर्मियों के सहिष्णु व्यवहार और सरकारों के तुष्टिकरण नीति के कारण ऐसे स्थलों पर विवाद भले ही बना रहा हो मगर कब्ज़ा मुस्लिम समाज ने बनाये रखा.


कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराने का काम करता है. पूर्व में सरकारों के सामने, इतिहास लेखन करने वालों के सामने, इतिहास पढ़ाने वालों के सामने, पुरातत्त्व विभाग वालों के सामने, धार्मिक-मजहबी व्यक्तित्वों के सामने क्या स्थिति रही होगी कि उनके द्वारा भी सत्य को सामने लाकर विवादों को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया गया. बहरहाल, अब जबकि अदालत के आदेश पर हुए सर्वे में ज्ञानवापी में शिवलिंग मिला है. यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि ऐसा होने के चिन्ह मात्र नहीं मिले हैं, कोई ध्वंस अवशेष नहीं मिले हैं बल्कि स्पष्ट दृष्टिगोचर शिवलिंग मिला है. ऐसी स्थिति के बाद किसी तरह के विवाद की कोई गुंजाइश नहीं बचती थी मगर इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष की तरफ से ऐसा किया गया.




एक पल को ये स्वीकार लिया जाये कि मुस्लिम समाज बहुत लम्बे समय से उस स्थान पर अपने मजहबी कृत्य को अंजाम देता आ रहा था, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वर्तमान में जो प्रमाण मिला है उसे सिरे से नकार दिया जाये. इस स्थान पर सन 1993 तक नियमित रूप से श्रृंगार गौरी की पूजा होती थी, बाद में सन 1996-97 में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मों के त्योहार एक ही दिन पड़ गए थे. रामजन्मभूमि मामले के चलते पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से यहाँ केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की एक टुकड़ी की तैनाती कर दी. बाद में यही टुकड़ी यहाँ स्थायी हो गई. समय के गुजरने के साथ श्रृंगार गौरी जाने वाले रास्ते को भी पुलिस-प्रशासन ने बंद कर दिया. ऐसा होने के बाद मामला अदालत पहुँचा तो अदालत ने वासंतिक नवरात्रि के चौथे दिन दर्शन-पूजन करने का आदेश दिया. अदालत के आदेश के बाद श्रृंगार गौरी की साल में एक दिन वासंतिक नवरात्रि की चतुर्थी को दर्शन-पूजन की अनुमति प्रशासन ने दी. इसके बाद गत वर्ष 2021 में पाँच महिलाओं ने श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा-अर्चना की माँग को लेकर वाराणसी के सिविल जज सीनियर डिवीजन रवि कुमार दिवाकर की अदालत में याचिका दायर की. इन महिलाओं ने अदालत से ये माँग भी की थी कि नंदी, गणेश के साथ अन्य देवताओं की स्थिति जानने के लिए एक कमीशन बनाया जाए. सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत ने इसी के बाद एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया और कमीशन की कार्यवाही, वीडियोग्राफी की कार्यवाही पूरी कर रिपोर्ट देने के लिए कहा.


रिपोर्ट के बाद जब सच्चाई सामने आ ही गई थी तो मुस्लिम पक्ष को एक कदम आगे आकर उस स्थल पर पूर्व की भांति हिन्दुओं को पूजा-दर्शन करने की पहल की जानी चाहिए थी. ऐसा तो हुआ नहीं बल्कि इसके उलट जाकर शिवलिंग को फव्वारा बताये जाने की, औरंगजेब को दयालु बताये जाने की, तमाम मंदिरों के नीचे मस्जिद होने की अनर्गल बयानबाजियाँ होने लगीं. देश में एक तरफ सरकारें, अनेक बुद्धिजीवी, संस्थाएँ हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए जी-जान से लगी रहती हैं. बात-बात पर गंगा-जमुनी संस्कृति का उदाहरण दिया जाता है. बहुत से मुस्लिम व्यक्तित्वों को देश में भय लगने लगता है. असहिष्णुता बढ़ती दिखाई देने लगती है मगर जब भी मुस्लिम समाज के सामने इस तरह का कोई भी अवसर आता है जबकि वे सौहार्द्र, समन्वय का उदाहरण दे सकते हैं, उसी समय उनकी तरफ से अनर्गल बयान दिए जाने शुरू कर दिए जाते हैं.


इसे लोग भले ही सार्वजनिक रूप से न स्वीकारें मगर सत्य यही है कि विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने देश में हिन्दू धार्मिक स्थलों, सनातनधर्मी आस्था केन्द्रों को नष्ट करके उन पर अपने मजहब की इमारतों का निर्माण किया है. अब जबकि ज्ञानवापी में स्पष्ट रूप से शिवलिंग मिला है, कुतुबमीनार और ताजमहल की चर्चा जनमानस के बीच टहलने लगी है, तब मुस्लिम समुदाय को अपने सहिष्णु होने का उदाहरण देना चाहिए. अभी तक किसी भी मुस्लिम संगठन ने खुलकर ज्ञानवापी में स्थापित शिवलिंग पर कोई सकारात्मक बयान नहीं दिया है. किसी मुस्लिम बुद्धिजीवी, किसी मुस्लिम साहित्यकार ने, किसी मुस्लिम फ़िल्मी कलाकार ने अथवा किसी मुस्लिम राजनीतिज्ञ ने हिन्दुओं के पक्ष में कोई बयान या कोई अपील नहीं की है. एक मुस्लिम राजनीतिक व्यक्ति शिवलिंग के मिलने के दिन से बयान देने में लगे हैं, तो वे भी भड़काऊ हैं, मुस्लिम समाज को बरगलाने वाले हैं.


ज्ञानवापी पर जिस तरह से गैर-मुस्लिम नागरिकों द्वारा समर्थन आ रहा है, उसी तरह से देश के समस्त मुस्लिम नागरिकों को भी संगठित होकर इसका समर्थन करना चाहिए. यदि इसके बाद भी मुस्लिम नेताओं, मुस्लिम मजहबी संगठनों, मुस्लिम बुद्धिजीवियों द्वारा समर्थन नहीं किया गया तो न केवल आपसी समन्वय, सौहार्द्र कमजोर होने की आशंका है बल्कि अन्य स्थलों पर विवाद बढ़ना भी स्वाभाविक है.


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28 May 2022

वीर सावरकर और सेलुलर जेल की कोठरी

घूमने का शौक बचपन से रहा है. भले ही देश में भी बहुत सारी जगहों पर घूमना न हो पाया हो मगर अपने आसपास घूम कर अपने शौक को पूरा कर लिया करते हैं. ये तो घूमने वाली एक बात हुई मगर दूसरी बात ये कि देश के बहुत सारे स्थानों को देखने की इच्छा रही है, अभी भी है. ऐसी ही जगहों में एक जगह सेलुलर जेल हुआ करती थी. बचपन से पढ़ाई के दौरान, परिवार से मिलती जानकारी के कारण से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को काला पानी के नाम से ही पहचानते थे. उसमें भी उस काला पानी में सेलुलर जेल का नाम सुन रखा था. बचपन में तो नहीं मगर जैसे-जैसे समझ आती रही, बचपन की पकड़ से बाहर आते रहे, सेलुलर जेल को देखने की, वहाँ की मिट्टी को माथे लगाने की इच्छा बलबती होती रही. कालांतर में वीर सावरकर जी के बारे में पढ़ने को मिला तो न केवल सेलुलर जेल को बल्कि उस कोठरी को भी नमन करने का मन होने लगा जहाँ वीर सावरकर को कैद किया गया था. 


समय गुजरता रहा, मन में अंडमान निकोबार जाने की, सेलुलर जेल दर्शन की अभिलाषा और विकट रूप धारण करती रही. आखिरकार एक दिन ऐसा आ ही गया कि अंडमान निकोबार जाने का, पोर्ट ब्लेयर की धरती छूने का, सेलुलर जेल की मिट्टी को माथे लगाने का सुअवसर आ ही गया. दिल्ली से उड़े हवाई जहाज ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एयरपोर्ट के दर्शन करवाते हुए वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतार दिया. हवाई जहाज से बाहर आने पर वीर सावरकर जी का नाम देखकर सिर स्वतः ही उनके प्रति श्रद्धा से झुक गया.


अपने छोटे भाई के घर पहुँचने के बाद सबसे पहले सेलुलर जेल के दर्शन किये गए. जेल की सभी जगहों को अपने हिसाब से देखा, उनका एहसास किया गया. सेलुलर जेल अपनी जिस मूल स्थिति में थी, अब वैसी नहीं है. मूल रूप में यह जेल सात शाखाओं में बनाई गई थी. बाद में इसकी चार शाखाएँ स्थानीय लोगों द्वारा ही नष्ट कर दी गईं. अब इस जेल की कुल सात शाखाओं में से केवल तीन शाखाएँ शेष बची हुई हैं.


सेलुलर जेल का मॉडल 

तीन मंजिल की इस जेल का नाम सेलुलर जेल रखने के पीछे का कारण इसका रूप-विन्यास भी है. इसमें प्रत्येक शाखा में कई-कई कोठरियाँ हैं. सभी कोठरी इस तरह से बनी हैं कि किसी कोठरी में कैद व्यक्ति दूसरी कोठरी को नहीं देख सकता था. एक सेल की तरह से बने होने के कारण इसे सेलुलर जेल कहा गया. इसी में एक मंजिल पर सीढ़ी के पास ही वीर सावरकर सेल की पट्टिका लगी हुई है. जब हम लोग यहाँ घूम रहे थे तो इस जेल में शेष बची इमारत की कोठरियों के एक जैसे दिखने के कारण वीर सावरकर सेल वाली पट्टिका देखने के बाद उस तरफ जाना हुआ. ये सुन-पढ़ रखा था कि वीर सावरकर को इसी जेल की किसी कोठरी में कैद किया गया था. 


एक सेल के किनारे पर लगी इस पट्टिका के बारे में जानकारी करने के बाद मालूम हुआ कि इसी मंजिल पर वीर सावरकर को एक कोठरी में कैद करके रखा गया था. ऐसा मालूम पड़ते ही एक सिरहन सी पूरे शरीर में दौड़ गई. पैर ऐसा महसूस होने लगे जैसे उनमें शक्ति बची न हो. जैसा पढ़ते आये थे, उसका ध्यान अचानक से आते ही आँखों के सामने अँधेरा जैसा समझ आने लगा. अपने आपको एक पल में संयत करके उस कोठरी के दर्शन करने को कदम बढ़ाये जहाँ वीर सावरकर ने अपना लम्बा जीवन व्यतीत किया था. हम लोग पूरी श्रद्धाभाव से, तन-मन में सिरहन लिए, आँखों में पानी लिए सेलुलर जेल के कोने-कोने को जैसे आत्मसात करने के लिए घूम रहे थे. ऐसी स्थिति में जब उस कोठरी के सामने पहुँचे जहाँ वीर सावरकर को कैद में रखा गया था तो आँखों से आँसू स्वतः ही बह निकले. सभी कोठरियों में सामान्य एक गेट था मगर वीर सावरकर की कोठरी को दो फाटकों से बंद किया गया था. तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को इतने से भी संतोष नहीं था, उन्होंने वीर सावरकर को डराने, भयभीत करने के लिए ऐसी कोठरी में रखा था जो फाँसीघर के सबसे नजदीक थी. उन अंग्रेजों का मानना था कि फाँसी लगाए जाने के दौरान आती चीखों से घबराकर किसी दिन वीर सावरकर भी टूट जायेंगे.


सावरकर कोठरी, इसे दो फाटकों से बंद किया गया था 

इसी शाखा में सबसे अंत में है कोठरी सावरकर जी जहाँ कैद रखे गए 

वीर तो वीर ही होता है और सावरकार तो वास्तविक में वीर थे, जिन्होंने सेलुलर जेल से भाग निकलने का दुस्साहस किया. भारतीय इतिहास में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिनको दो बार काला पानी की, सेलुलर जेल की सजा दी गई. ये भी तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि इतिहास में वे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनके साथ उनके भाई को भी सेलुलर जेल में सजा काटने भेजा गया था. आश्चर्य देखिये कि एक ही जेल में बंद दो भाइयों को महीनों तक इसकी जानकारी ही नहीं हुई कि दो सगे भाई एकसाथ एक ही जेल में सजा काट रहे हैं.


वीर सावरकर जी की कोठरी में कुछ समय बिताने के बाद, उनकी फोटो के सामने अपनी मनोभावनाओं को प्रकट करने के बाद भी वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था. दिल में, मन में अत्यंत श्रद्धाभाव लेकर, सावरकर जी के प्रति, तमाम वीर सेनानियों के प्रति कृतज्ञता भाव लेकर, उनका आशीष लेकर हम लोग वास्तविक धाम के, क्रांतिधाम के दर्शन करके घर लौट आये. हमारा अपना व्यक्तिगत विचार ये है कि देश भर के किसी व्यक्ति को अपने जीवन में भले ही अपने धार्मिक स्थल के दर्शन का अवसर न मिले मगर एक बार सेलुलर जेल के, इस क्रांतिधाम के दर्शन अवश्य करने चाहिए.


वीर सावरकर जी को उनकी जन्मतिथि पर सादर नमन. 


सावरकर कोठरी में 

सेलुलर जेल के सामने बने पार्क में 




27 May 2022

हिन्दी साहित्यकार गीतांजलि श्री को बुकर पुरस्कार

आज सुबह-सुबह ही खबर सुनाई दी कि हिन्दी लेखिका गीतांजलि श्री को अन्तर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार (साहित्य के क्षेत्र में सबसे प्रतिष्ठित) से सम्मानित किया गया है. गीतांजलि श्री हिन्दी की पहली लेखिका हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है. यह पुरस्कार उनके उपन्यास रेत समाधि के अंग्रेज़ी अनुवाद टोम्ब ऑफ़ सैंड के लिए दिया गया. इसका अनुवाद प्रसिद्ध अनुवादक डेज़ी रॉकवाल ने किया है. यह पहला मौक़ा है जब कोई हिन्दी कृति बुकर के लिए पहले लॉन्गलिस्टेड फिर शॉर्टलिस्टेड होकर बुकर से सम्मानित हुई हो. वास्तव में यह पल हिन्दी भाषी पाठकों, लेखकों के लिए ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतीय भाषाओं के लिए गौरवशाली है. साहित्य के क्षेत्र का सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार माने जाने के कारण एक सर्वमान्य धारणा यही बनी हुई थी कि यह पुरस्कार सिर्फ विदेशी भाषाओं को ही प्रदान किया जाता है. गीतांजलि के रूप में हिन्दी कृति को यह सम्मान मिलने से यह धारणा भी दूर हुई है. संभव है कि इस पल से प्रभावित होकर हिन्दी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक, साहित्यकार उत्कृष्ट लेखन की तरफ अग्रसर हों.




इस सुखद समाचार के साथ-साथ सोशल मीडिया पर बहुत सी ऐसी बातें भी सुनाई-दिखाई दीं, जिनको देखकर दुःख हुआ. हिन्दी भाषा के उपन्यास के लिए मिले इस सम्मान को बहुत से लोग पचा नहीं पा रहे हैं. ऐसे में उनके लिए बजाय गर्व करने के वे रचनाकार की, कृति की, अनुवाद की कमियाँ निकालने-बनाने में लगे हैं. यह सच हो सकता है कि बहुधा देखने में आता है कि एक साहित्यकार दूसरे साहित्यकार की आलोचना करता है, आलोचना भी बुराई करने के स्तर तक, दोषारोपण करने की हद तक मगर आज का दिन ख़ुशी मनाने का दिन होना चाहिए था. साहित्यकार को लेकर, कृति को लेकर, उसके अनुवाद को लेकर आलोचना, समीक्षा होनी चाहिए और ऐसा आगे भी किया जा सकता है. आज इस एक पल के लिए सोचना चाहिए था कि ख़ुशी गीतांजलि के लिए न मनाई जाये, ख़ुशी उनके उपन्यास रेत समाधि के लिए न हो, उनके अनुवाद टोम्ब ऑफ सैंड के लिए भले ही प्रसन्नता व्यक्त न की जाये, भले ही अनुवादक डेज़ी रॉकवाल को इसका श्रेय न दिया जाये मगर कम से साहित्य के लिए, हिन्दी भाषा के लिए, भारतीय भाषाओं के लिए तो ख़ुशी प्रदर्शित की ही जा सकती थी.


खैर, जिसका जैसा स्वभाव, वो वैसा ही करेगा. गीतांजलि श्री को बधाई के साथ-साथ सभी हिन्दी भाषी पाठकों, साहित्यकारों, समस्त भारतीय भाषाओं के पाठकों, साहित्यकारों को भी बधाई-शुभकामना.




24 May 2022

राष्ट्रपति चुनाव 2022 के संभावित समीकरण

देश के प्रथम नागरिक के रूप में परिभाषित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल जुलाई 2022 को खत्म हो रहा है. जल्द ही देश में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू होगी. चूँकि राष्ट्रपति के चुनाव में आम जनमानस की सहभागिता सीधे-सीधे नहीं होती है, इस कारण भले ही इस तरफ बहुत ज्यादा रुचि न रहती हो मगर जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग राष्ट्रपति चुनावों पर अपनी नजर अवश्य ही लगाये रखता है. भारतीय संसद के दोनों सदनों में जिस तरह की स्थिति भाजपा और उनके सहयोगी दलों की, उसे देखते हुए यह स्थिति तो एकदम साफ़ है कि राष्ट्रपति पद के लिए जो भी निर्वाचित होगा वह भाजपा आर उसके सहयोगी दलों से ही होगा. यह स्थिति उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद और भी स्पष्ट हुई है.

 

अब जबकि राष्ट्रपति चुनाव के लिए बहुत लम्बा समय नहीं है, तब राजनीतिक विश्लेषक, राजनीति विषय में रुचि रखने वाले, देश की राजनैतिक दशा-दिशा का आकलन करने वाले आदि लोग इस बार के राष्ट्रपति चुनाव को विशेष दृष्टिकोण से देख रहे हैं. इसके पीछे का कारण यह नहीं कि भाजपा या उसके सहयोगी दलों के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनना है, ऐसा तो वर्तमान राष्ट्रपति पद हेतु सदस्य का नाम घोषित होने के समय भी था. देखा जाये तो इस बार विशेष दृष्टि रखने के पीछे का कारण भी वर्तमान राष्ट्रपति ही हैं. वर्ष 2017 में भाजपा ने या कहें कि नरेन्द्र मोदी ने सबको चौंकाते हुए देश के शीर्ष पद हेतु रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा की थी. ऐसा उस समय हुआ था जबकि रामनाथ कोविंद किसी भी रूप में राष्ट्रपति पद की दौड़ में नहीं थे. उनके नाम की घोषणा होने पर सबको आश्चर्य इसलिए भी और हुआ था कि उनको वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए उनके मनचाहे लोकसभा क्षेत्र जालौन-गरौठा-भोगनीपुर से टिकट नहीं दिया गया था.

 

राजनीति की गणित पढ़ने-समझने वालों ने उस समय रामनाथ कोविंद के राजनैतिक जीवन की समाप्ति की घोषणा सी कर दी थी. इस कारण लोगों को आश्चर्य होना स्वाभाविक था. ये और बात है कि अपने सरल स्वभाव के चलते लोकसभा चुनावों के कुछ महीने बाद रामनाथ कोविंद को बिहार का राज्यपाल बनाया गया. नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2017 में बिहार के उन्हीं तत्कालीन राज्यपाल को चुना, जो तब एक लो-प्रोफाइल दलित नेता माने-समझे जाते थे. उन्होंने 1998-2002 के बीच भाजपा के दलित मोर्चे का नेतृत्व किया था. नरेन्द्र मोदी ने दलित नेता के रूप में उनको राष्ट्रपति पद का सदस्य बनाकर तत्कालीन राजनैतिक समीकरण को अपने पक्ष में किया था.

 



अब राष्ट्रपति पद हेतु सभी की निगाहें भाजपा की तरफ ही लगी हैं. राजनैतिक समीकरण उनके पक्ष में होने के कारण भाजपा और उनके सहयोगी दलों के सदस्य का राष्ट्रपति बनना निश्चित है. अब लोगों में यह जानने की उत्कंठा है कि इस बार किसका नाम सदस्य के रूप में सामने आएगा? क्या रामनाथ कोविंद को दोबारा राष्ट्रपति पद के लिए सदस्य बनाया जायेगा? क्या उपराष्ट्रपति पद पर आसीन वैंकया नायडू को भाजपा सदस्य घोषित कर सकती है? यदि राष्ट्रपति पद का इतिहास देखा जाये तो अभी तक देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अकेले व्यक्ति रहे हैं जिनको दो बार कार्यकाल मिला. ऐसे में इसकी सम्भावना कम ही समझ आती है कि भाजपा वर्तमान राष्ट्रपति को ही अपना सदस्य घोषित करे. इसके साथ-साथ रामनाथ कोविंद के दोबारा सदस्य न बनने के पीछे उनकी उम्र भी एक कारक हो सकता है. रामनाथ कोविंद वर्तमान में 76 वर्ष पूर्ण कर चुके हैं. भाजपा में नरेन्द्र मोदी के अघोषित निर्देशों के बाद से 75 वर्ष से अधिक उम्र वाले व्यक्ति को पद से दूर रखा जा रहा है. ऐसे में बहुत कम सम्भावना है कि वर्तमान राष्ट्रपति को दोबारा कार्यकाल मिले.

 

राजनैतिक शतरंज की बिसात पर वैसे तो सभी के अपने-अपने आकलन हैं. उत्तर प्रदेश के वर्तमान विधानसभा चुनावों में जिस तरह से बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा घोषित-अघोषित एकतरफा समर्थन भाजपा प्रत्याशियों को दिया था, उसके बाद से मायावती के राष्ट्रपति पद हेतु सदस्य के रूप में नाम सामने आने की चर्चाएँ विभिन्न मंचों से सुनाई देने लगी थीं. हालाँकि इस बारे में मायावती ने मीडिया के द्वारा अपने नाम को लेकर अपनी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट कर दी है. बहरहाल, यह राजनीति की डगर है, यहाँ आज क्या है, कल क्या होगा कोई नहीं कह सकता है, इसके बावजूद राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, आनंदी बेन पटेल, आरिफ मोहम्मद खान, थावरचंद गहलोत, बी.एस. येदुरप्पा, डॉ. तमिलिसाई सुंदरराजन आदि नामों पर सम्भावना जताई जा रही है. नाम भले ही राजनैतिक शतरंज पर कितने भी देखने को मिलें मगर यदि गहनता से देखा जाये तो उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को शीर्ष वरीयता में रखा जा सकता है.

 

उपराष्ट्रपति वेकैंया नायडू के नाम पर सहज सहमति भी बन सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि पिछली बार जब उपराष्ट्रपति पद हेतु उनका नाम सामने आया तो बहुत से लोगों का विचार था कि उनके राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए था. इस विचार को तब न सही, अब बल मिल सकता है, समर्थन भी मिल सकता है. उपराष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कर्तव्यों का निर्वहन भली-भांति किया है. उनकी निष्पक्ष छवि सभी दलों के बीच मान्य है. इसके साथ-साथ उनका आंध्र प्रदेश से होना भी भाजपा को लाभान्वित कर सकता है. उनको राष्ट्रपति बनाकर भाजपा दक्षिण भारत में अपनी स्थिति को मजबूत कर सकती है. उपराष्ट्रपति नायडू वर्ष 2002 से वर्ष 2004 तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने के साथ-साथ वे अटल बिहारी सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहे हैं. नरेन्द्र मोदी सरकार में उनके पास शहरी विकास, आवास, शहरी गरीबी उन्मूलन, सूचना प्रसारण तथा संसदीय कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों का अनुभव रहा है.

 

उपराष्ट्रपति वेकैंया नायडू के नाम के साथ-साथ केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का नाम भी संभावी फलक पर दिखाई देता है. उत्तर प्रदेश के निवासी आरिफ मोहम्मद खान शाहबानो केस के विरोध में राजीव गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद सुर्खियों में आए थे. वर्तमान में वे तीन तलाक, सीएए जैसे बिन्दुओं पर भाजपा के लिए तारणहार बनते रहे हैं. भाजपा भी उनको प्रगतिशील विचारधारा का मानती है. वैसे तो भाजपा द्वारा अब्दुल कलाम के रूप में मुस्लिम चेहरा राष्ट्रपति पद पर पहुँचा चुकी है मगर वर्तमान सन्दर्भों में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पुनः एक मुस्लिम चेहरे को राष्ट्रपति बनाकर सम्पूर्ण विश्व को अपने मुस्लिम विरोधी न होने का सन्देश दिया जा सकता है.

 

उक्त दो नामों के साथ-साथ एक अन्य नाम उत्तर प्रदेश की राजपाल आनंदी बेन पटेल का भी चर्चा में है. वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बेहद करीबी मानी जाती हैं. नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनको ही गुजरात मुख्यमंत्री पद सौंपा गया था. यद्यपि आनंदी बेन पटेल के साथ उनकी उम्र उनके नाम की घोषणा में बाधक बन सकती है. 80 वर्षीय आनंदी बेन पटेल की उम्र को एक पल को नजरंदाज कर दिया जाये तो भाजपा द्वारा मुस्लिम और दलित के बाद अब एक महिला को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों से पूर्व महिलाओं को एक सकारात्मक राजनैतिक संदेश दिया जा सकता है.

 

हालाँकि ये संभावित नाम अभी सियासी फलकों पर तमाम राजनैतिक विश्लेषकों की, मीडिया से जुड़े अनेक बुद्धिजीवियों के आकलन का परिणाम है. राजनीति के पटल पर अंतिम-अंतिम क्षण तक किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस बारे में कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्रपति पद के लिए जो नाम भी घोषित होगा उस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नरेन्द्र मोदी की सहमति होगी. रामनाथ कोविंद भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपने करीबी रिश्तों के कारण और नरेन्द्र मोदी की चौंकाने वाली कार्यशैली के चलते देश के प्रथम नागरिक के रूप में हम सबके बीच उपस्थित हैं. ऐसा ही कुछ अप्रत्याशित जुलाई 2022 में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव हेतु देखने को मिले तो कोई बड़ी बात नहीं.