21 September 2019

मौत से नहीं ज़िन्दगी से प्यार करना सीखो

"ज़िन्दगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ हैं जहाँपनाह" कुछ इसी तरह के संवाद हैं किसी फिल्म में. उसमें एक सीन में ही व्यक्ति को उसकी ज़िन्दगी और मौत के बारे में समझाने की कोशिश की गई है. ऐसे ही बहुत से सीन और गीत हैं जिनमें ज़िन्दगी और मौत को लेकर तमाम दार्शनिक बातें कही गईं हैं. ऐसा लगता है जैसे मौत कोई बहुत ही खूबसूरत चीज हो और जिसके लिए व्यक्ति जानबूझ कर ज़िन्दगी को छोड़ देता है. ऐसा वास्तविकता में नहीं होता और न ही ऐसा है. ज़िन्दगी हमेशा खूबसूरत रही है और रहेगी बस उसमें दार्शनिकता का पुट जोड़ते हुए उसे मौत के साथ संदर्भित करते हुए मौत को बेहतर बताया गया है, हसीन बताया गया है. 

17 September 2019

बाबा जी के आशीर्वाद से निखरता आत्मबल


अपने गाँव बचपन से ही जाना होता रहता था. गर्मियों की छुट्टियाँ कई बार गाँव में ही बिताई गईं. इसके अलावा चाचा लोगों के साथ भी अक्सर गाँव जाना होता रहता था. हमारे गाँव जाने के क्रम में कोई न कोई साथ रहता था मगर उस बार अकेले जाना हो रहा था. बिना किसी कार्यक्रम के, बिना किसी पूर्व-निर्धारित योजना के. स्नातक की पढ़ाई के लिए हमारा ग्वालियर जाना निर्धारित हो गया था. जाने का दिन भी लगभग तय हो गया था. अचानक बैठे-बैठे दिमाग में आया कि ग्वालियर जाने के पहले अईया-बाबा से मिल आया जाये. उस समय अईया-बाबा गाँव में ही हुआ करते थे. उनका उरई आना दशहरे-दीपावली के आसपास होता था. इसके बाद होली के बाद खेती वगैरह के काम से गाँव चले जाया करते थे.

बहुत छोटे से लगातार अईया-बाबा के संपर्क में रहने के कारण लगाव भी था. बहरहाल, उस दिन दोपहर बाद घर पहुँच नीचे से जैसे ही आवाज़ लगाई, अईया ख़ुशी से चहक उठीं. बाबा भी आश्चर्य में पड़ गए कि हम अचानक कैसे आ गए, वो भी अकेले. आश्चर्य होने का कारण ये और था कि हम अकेले आये थे बिना किसी सूचना के. उस समय आज की तरह मोबाइल तो थे नहीं, फोन भी नहीं थे कि खबर कर दी जाती हमारे आने की. उस समय खबरों के आदान-प्रदान का स्त्रोत पत्र हुआ करते थे या फिर गाँव से आने-जाने वाले लोग. इसके साथ-साथ आश्चर्य का एक कारण हमारा नितांत अकेले आना भी था. परिवार में किसी समय लम्बे समय तक चलने वाली जमींदारी और गाँव क्षेत्र की अपनी अलग ही स्थितियों के चलते बाबा इस तरह की स्थितियों से बचाया करते थे. आज भी हम लोगों की ये स्थिति है कि गाँव आने-जाने के दौरान निश्चित समय, रास्ता कभी न बताया जाता है. 

दो-तीन गाँव में रुकना हुआ. उन दो-तीन दिनों में बाबा से बहुत सी बातें हुईं. वैसे तो बाबा का साथ हम भाइयों को बहुत छोटे से मिला, जिसके कारण उनके द्वारा बहुत सी जानकारियाँ, शिक्षाएँ हमें मिलती रहीं. जीवन जीने के ढंग, समस्याओं से निकलने के रास्ते, परेशानियों से बचने के तरीके, खुद पर नियंत्रण रखने की स्थिति, अनुशासन में रहने का मन्त्र, सामाजिक रूप से खुद को स्थापित करने की कार्यशैली आदि पर उनके द्वारा बड़े ही रोचक ढंग से लगातार हम लोगों को बताया जाता रहता.

गाँव में अपने अल्प-प्रवास के दौरान बाबा जी ने कई बातें समझाईं, घर से बाहर अकेले रहने के दौरान आने वाली समस्याओं, उनसे निपटने के तरीके आदि भी समझाए, बिना घबराए, संयम से काम लेटे हुए आगे बढ़ने के रास्ते भी बताए. बाबा जी स्वयं बहुत कम आयु में ही पढ़ने के लिए घर से बाहर निकल आये थे. अपनी पढ़ाई के दौरा उन्होंने स्वयं बहुत संघर्ष किया था. इसका जिक्र वे कई बार हम लोगों के सामने किया करते थे और उदाहरण के लिए समझाया भी करते थे. उनके पढ़ाई के दौरान के संघर्ष को महज ऐसे समझा जा सकता है कि तत्कालीन स्थितियों में एक जमींदार परिवार के बेटे को पढ़ने के लिए बिठूर से उन्नाव ट्रक चलाना पड़ता था. बाबा जी अक्सर उस समय का बना हुआ ड्राइविंग लाइसेंस दिखाया करते थे. असल में बाबा जी के बड़े भाई नहीं चाहते थे कि बाबा जी आगे की पढ़ाई करें. उनका कहना था कि मैट्रिक तक की पढ़ाई ठीक है अब घर वापस आकर खेती और अन्य कामों में सहयोग करें. ऐसे में बाबा जी अपनी जिद से कानपुर में पढ़ाई कर रहे थे. बड़े बाबा जी घर से प्रतिमाह भेजी जाने वाली सामग्री में सबकुछ भेजते, बस रुपये नहीं भेजते थे. ऐसे में धन की कमी को बाबा जी अपने एक मित्र की ट्रांसपोर्ट कंपनी का ट्रक चलाकर पूरा किया करते मगर उन्होंने कभी घर में इसकी शिकायत न की.

उन्हीं बातों के दौरान बाबा जी की एक बात आज तक जैसे कंठस्थ है. उस बात ने या कहें कि जीवन की सबसे बड़ी सीख ने हमें व्यक्तिगत स्तर पर पारिवारिक तनाव, संघर्ष से बचाए रखा है. पिताजी के देहावसान और अपनी दुर्घटना के बाद की स्थितियों में भी यदि मनोबल कमजोर न हुआ तो बाबा जी की नसीहतों के चलते.

गाँव से वापस लौटने वाले दिन के ठीक पहले दोपहर में खाना खाने के बाद बाबा जी के पैर की उंगलियाँ चटका रहे थे. बाबा ने कहा कि स्नातक की पढ़ाई करने जा रहे हो, आगे भी खूब पढ़ना. शिक्षा ही एकमात्र ऐसी पूँजी है जिसके द्वारा संसार की किसी भी स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है. गाँव, खेती, जमीन, मकान आदि की चर्चा करते हुए उन्होंने समझाया कि हमेशा एक बात याद रखना कि गाँव की जमीन, मकान, खेत न हम लेकर आये थे, न तुम्हारे पिताजी. ये सब हमारे पुरखों के द्वारा कई पीढ़ियों से अगली पीढ़ी को स्वतः मिलता रहा है. ऐसे में इन्हें लेकर कभी लड़ाई नहीं करना. बाबा जी का कहना था कि गाँव की लड़ाई, मुक़दमेबाजी से दूर रखने के लिए तुम्हारे पिताजी-चाचा लोगों को बाहर निकाला है, तुम लोग इसके लिए लौटकर गाँव न आना. मुक़दमेबाजी, लड़ाई, पुलिस आदि झगड़ों से दूर ही रहना. दुर्भाग्य से कभी ऐसा हो भी जाये कि कोई गाँव की जमीन, घर, खेत आदि पर कब्ज़ा कर ले तो अपने अधिकारों का पूरा उपयोग करो. अपनी संपत्ति को वापस लेने के लिए संघर्ष करो मगर इसके लिए खून-खराबा करने की, फौजदारी करने की आवश्यकता नहीं है. वापस गाँव लौटने की जरूरत नहीं है. शिक्षा तुमको इससे ज्यादा सम्मान, इससे ज्यादा संपत्ति प्रदान करवाएगी. पुरखों की इस संपत्ति की रक्षा करना तुम सबका दायित्व है मगर इसके लिए अपने भविष्य को, अपने परिवार को, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बिगाड़ देना समझदारी नहीं होगी.   

और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा बहुत गंभीरता से कही गईं. असल में हमारे बाबा जी स्वयं इस स्थिति के भुक्तभोगी रहे थे. अपनी सरकारी नौकरी को वे छोड़कर गाँव के घर, जमीन, खेत के लिए वापस गाँव आये थे. मुकदमेबाजी, आपसी तनाव, झगड़ों के बीच उन्होंने समय की, पढ़ाई की महत्ता को समझा-जाना था. उस समय तो बाबा जी की उन बातों सा न तो हम सन्दर्भ पकड़ पा रहे थे और न ही उनका आकलन कर पा रहे थे कि ऐसा क्यों बताया-समझाया जा रहा. बाबा जी उसके बाद बस एक वर्ष और हमारे बीच रहे, शायद वे समय की सीख देना चाह रहे थे. और यह संयोग ही कहा जायेगा कि कभी गाँव अकेले न जाने वाले हम उस दिन अचानक बिना किसी कार्यक्रम के बाबा-अईया के पास पहुँच गए.

लगभग तीन दशक का समय हो गया बाबा जी को हम लोगों से दूर गए हुए. कम नहीं होता इतना समय, इसके बाद भी लगता है जैसे उनका जाना कल की ही बात हो. उस दिन का समूचा घटनाक्रम आज भी ज्यों का त्यों दिल-दिमाग में छाया हुआ है. उनकी बहुत सी बातें आज भी हम गाँठ बाँधे हैं. उनकी शिक्षाओं ने, उनकी नसीहतों ने कभी हमें परेशान न होने दिया, कभी हमें समस्या में न पड़ने दिया, कभी आत्मविश्वास न डिगने दिया. आज बाबा जी की पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन.


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आज, 17 सितम्बर बाबा जी की पुण्यतिथि पर 

15 September 2019

हिन्दी है तो हम हैं


हिन्दी दिवस के बाद हिन्दी की बात करना चर्चा करना कुछ लोगों को ऐसे महसूस होता है जैसे जन्मदिन गुजर जाने के बाद जन्मदिन की बधाई देना. जन्मदिन पर बधाई देना और लेना हमें व्यक्तिगत रूप से कभी पसंद नहीं आया. अब इसे एक तरह की सामाजिक परंपरा कहें या फिर अपने लोगों के बीच होने वाली एक तरह की औपचारिकता कि जन्मदिन की बधाई दे देते हैं. इसके बाद भी बधाई लेना आज भी पसंद न आया. ठीक इसी तरह से कभी भी हिन्दी दिवस पर शुभकामनायें देना, बधाई देना, कार्यक्रमों का आयोजन करना भी कभी रास न आया. आखिर हिन्दीभाषियों को इस एक दिन की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? क्या इस दिन को मनाने का कारण संवैधानिक दर्जा दिलाने जैसी स्थिति का होना रहा है? यदि यही एक कारण है तब तो ऐसे आयोजन करना और भी नहीं होना चाहिए. आखिर अभी हम ही हमारी हिन्दी को उसका असल स्थान उपलब्ध नहीं करवा सके हैं. अभी भी महज पंद्रह वर्ष की छूट बढ़ती ही चली आई है और कब तक बढ़ेगी कुछ कहा नहीं जा सकता.


यह सोचकर प्रसन्न होते रहना कि हिन्दी आज वैश्विक स्तर पर लगातार उन्नति कर रही है, विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा में चौथे स्थान पर है तो उसका एक कारण हमारे देश का वैश्विक जगत में बहुत बड़े बाजार की उपलब्धता करवाना है. बाजार की सहज उपलब्धता के कारण सम्पूर्ण विश्व हिन्दी सीखने को मजबूर है. ऐसा सुना है कि किसी कालखंड में चंद्रकांता संतति को पढ़ने के लिए अंग्रेजों ने भी हिन्दी सीखी थी. उस समय अंग्रेजों के हिन्दी सीखने का कारण हिन्दी के प्रति उंनका प्रेम, स्नेह नहीं था. कुछ ऐसा ही आज हो रहा है. यदि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, उनके कर्मचारी यदि हिन्दी सीख रहे हैं, अपने उत्पाद का प्रचार हिन्दी में कर रहे हैं तो उसके पीछे बाजार की शक्ति है, न कि हम हिन्दी भाषियों की शक्ति. सही अर्थों में देखा जाये तो हम हिन्दी-भाषी ही हिन्दी को कमजोर करने का काम करने में लगे हुए हैं. हिन्दी पट्टी के लोगों ने अपनी-अपनी बोलियों को भाषा के रूप में स्वीकार्यता देने-दिलाने की मुहीम छेड़ रखी है. इससे भले ही एक पल को गर्व महसूस हो कि हमारी बोली अब एक भाषा के रूप में मान्य हो रही है मगर उसका नुकसान यह हुआ कि हिन्दी भाषाई लोगों की संख्या में कमी आ गई. यही कमी वैश्विक स्तर पर हिन्दी के लोगों की कम संख्या का प्रदर्शन करती है. यह तो भला हो इंटरनेट का, मुफ्त में मिलते सोशल मीडिया मंचों का, जहाँ हिन्दी भाषी लोगों द्वारा लगातार कुछ न कुछ शेयर पोस्ट किया जा रहा है जो हिन्दी को सशक्त बना रहा है. 

हिन्दी-भाषियों को ध्यान रखना होगा कि उनकी भाषा उनके जन्म से उनको मिली है. उसे सीखने की कोशिश उनके द्वारा नहीं की गई है. यही वह भाषा है जिसके द्वारा वे सोचने का काम करते हैं. इसी भाषा में वे सपने देखने का काम करते हैं. इसी में वे कल्पना के सितारे जड़ते हैं. इसके के द्वारा वे कहानियों का निर्माण करते हैं. ऐसे में जबकि वैचारिक रूप से और काल्पनिक रूप से हिन्दी को उनके द्वारा उपयोग किया जाता रहता है तो फिर एक दिन की वैधानिकता क्यों? गर्व से चौबीस घंटे बोली जाने, महसूस की जाने वाली भाषा के प्रति विश्व रहे, सम्मान रहे, आदर रहे. यही भाव स्वतः ही हिन्दी भाषा को सशक्त, समृद्ध करेगा.

13 September 2019

ख़ुशी तो खुद को खुश रखने में है


ख़ुशी की चाह सबको है मगर उसे पाने का, तलाशने का तरीका बहुत से लोगों को पता ही नहीं. पहली बात तो ये कि अभी बहुत से लोगों को इसका ही पता नहीं कि ख़ुशी आखिर है क्या? उन्हें तो इसका भी भान नहीं कि उनके लिए ख़ुशी क्या है? ऐसे लोग बस दूसरे के चेहरे की प्रसन्नता को, उसकी भौतिक स्थिति को देखकर, उसके रहन-सहन को देखकर ही ख़ुशी का आकलन करने में लगे हैं. दूसरे की दिखाई देने वाली स्थिति को उसकी ख़ुशी समझ कर अपनी ख़ुशी की तलाश में लगे हुए हैं. ऐसे लोगों को पहले यह समझना होगा कि आखिर ख़ुशी होती क्या है. क्या बड़ा मकान होना ख़ुशी है? क्या बहुत बड़े वेतन वाली नौकरी मिल जाना ही ख़ुशी है? क्या बड़ी, लक्जरी कार में सैर करना ही ख़ुशी है? क्या अपने पसंद के व्यक्ति को जीवनसाथी के रूप में पा लेना ही ख़ुशी है? क्या खूब सारा धन जमा कर लेना ही ख़ुशी है? संभव है कि बहुत से लोगों के लिए यही ख़ुशी हो. ये भी संभव है कि बहुत से लोग एक पल को इन्हीं को ख़ुशी मानें मगर अगले ही क्षण उसे नकार दें. 


इस नकार के पीछे खुद उन्हीं की मानसिक स्थिति है. उनकी खुद में संतुष्ट न हो पाने की स्थिति ही उन्हें ख़ुशी का असली स्वाद नहीं लेने देती है. ऐसे लोग आज कार खरीद कर खुश होते हैं मगर अगले ही क्षण कार के चलते ही दुखी हो जाते हैं. ऐसा कार के नए-नए स्वरूप के कारण, नए-नए मॉडल के कारण, उसकी कीमतों के कारण होने लगता है. कार तो महज एक उदाहरण है, ऐसा बहुत सी स्थिति में होता है. असल में लोगों के लिए ख़ुशी का असल अर्थ मालूम ही नहीं. ऐसे लोग सांसारिक स्थितियों में ख़ुशी की तलाश करते हैं. वे ऐसे-ऐसे कदमों में ख़ुशी की चाह रखते हैं जो असल में महज प्रसन्नता देने का माध्यम होते हैं. ऐसी स्थितियों से मिलने वाली ख़ुशी जीवन की तरह क्षणभंगुर होती है. एक पल को ख़ुशी देकर वह स्थिति गायब हो जाती है. ऐसी ख़ुशी मिलने के तुरंत बाद आगे आने वाली ख़ुशी की चाह पैदा हो जाती है. ख़ुशी का पूरा आनंद उठाने से पहले ही किसी दूसरी ख़ुशी की चाह करने लगना ही उस ख़ुशी को समाप्त करना होता है. किसी अपने के परीक्षा में अधिक अंक लाना ख़ुशी पैदा करता है, तत्क्षण उसके आगे की परीक्षा में उससे भी अधिक अंक लाने की आकांक्षा वर्तमान ख़ुशी को समाप्त कर देती है. वर्तमान ख़ुशी का आनंद उठाये बगैर भविष्य की ख़ुशी की प्रत्याशा करने लगना कई बार दुःख का कारण बनता है.

असलियत यह है कि समाज में बहुतायत लोग आन्तरिक ख़ुशी के स्थान पर बाहरी ख़ुशी पाने में लगे हुए हैं. अपने भीतर की ख़ुशी से प्रसन्न रहने के बजाय बाहरी तत्त्वों की दिखावटी स्थिति में अपनी प्रसन्नता पाने का काम करते हैं. सत्यता यह है कि कोई भी व्यक्ति खुश उसी स्थिति में रह सकता है जबकि उसका मन प्रसन्न हो, उसका दिल प्रसन्न हो. अपने भीतर दुःख की स्थिति लेकर कोई व्यक्ति समाज को दिखाने के लिए भले खुश रहे मगर असल में वह खुश होता नहीं है. एक पल को ख़ुशी झलका कर वह सामने वाले की ख़ुशी से ही निराश होने लगता है. ऐसे में किसी भी व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि यदि वह खुश रहना चाहता है तो संसाधनों की अनावश्यक अपेक्षा से बचने का काम करे. भौतिकतावादी वस्तुओं की अनावश्यक संग्रह करने की मानसिकता से बचे. ऐसी सोच केवल और केवल दुःख देने का कार्य करती है. ख़ुशी तो स्वयं को प्रसन्न रखने का माध्यम है. कोई व्यक्ति बिना किसी संसाधन के भी उस समय खुश कहा जा सकता है जबकि वह स्वयं से संतुष्ट है. आज व्यक्ति अपनी ही स्थिति, अपने ही कार्य से संतुष्ट नजर नहीं आता है. वह किसी न किसी रूप में असंतुष्टि ही दर्शाता नजर आता है. ऐसे में उसके पास भले ही अपार संसाधन मौजूद हों किन्तु खुद से पैदा असंतुष्टि ख़ुशी को जन्मने ही नहीं दे सकती. खुद को खुश रखने के लिए सबसे पहले खुद से संतुष्ट होना सीखना पड़ेगा. बिना इसके कोई भी संसाधन अधूरा है, कोई भी स्थिति ख़ुशी देने वाली नहीं है. असल ख़ुशी तो खुद को खुश रखने में ही है. 



10 September 2019

एक कदम बढ़ाकर रोक लो उसे


आत्महत्या एक ऐसा शब्द है जो सिवाय झकझोरने के और कोई भाव पैदा नहीं करता. यह महज एक शब्द नहीं बल्कि अनेकानेक उथल-पुथल भरी भावनाओं का, विचारों का समुच्चय है. यह शब्द मौत की सूचना देता है. किसी व्यक्ति के चले जाने की खबर देता है. सम्बंधित व्यक्ति के परिचितों के दुखी होने का बोध कराता है. इतना ही नहीं है इस एक शब्द में. इसके अलावा न जाने कितनी त्रासदी, न जाने कितना कष्ट, न जाने कितने आंसू, न जाने कितने सवाल भी इसमें छिपे होते हैं. ऐसा नहीं है कि जिसने आत्महत्या की है वह इन सबसे परिचित न था. ऐसा भी नहीं कि जिसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया तो उसे मालूम नहीं था कि उसके इस कदम के बाद क्या होगा. ऐसा भी नहीं कि वह इस शब्द की विभीषिका के बारे में जानता नहीं था. सब कुछ जानते-समझते हुए भी कोई व्यक्ति आत्महत्या जैसा जघन्य कदम उठा लेता है. आखिर क्यों? आखिर कैसे? आखिर किसलिए?


ये तमाम सारे सवाल हैं जो व्यक्ति के चले जाने के बाद गूंजते रहते हैं. आत्महत्या जैसा कदम उठा लेने वाले परिजनों को परेशान करते रहते हैं. किसी भी व्यक्ति के चले जाने के बाद उसके आसपास की तमाम कड़ियों को, घटनाओं को आपस में जोड़-घटाकर आत्महत्या के कारणों का, कारकों का पता लगाने की कोशिश की जाती है. संभव है कि कई बार असलियत के करीब पहुँच भी जाया जाता हो और ये भी होता हो कि ऐसा किये जाने के पीछे के कोई कारण सामने न आ पाते हों. संभव है कि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति क्षणिक भावावेश में इस तरह के कदम उठाता होगा या फिर यह कदम लम्बे समय से चली आ रही उसकी किसी भी स्थिति की सहनसीमा को पार करने के बाद उठा हो. किसी भी व्यक्ति के द्वारा आत्महत्या किये जाने के कारण, स्थिति, घटना कुछ भी रह सकता है किन्तु जहाँ तक समझ आता है कि सभी का मूल अकेलापन, अत्यधिक मानसिक तनाव, परेशानी आदि ही रहता होगा. इसमें भी मानसिक तनाव और अकेलापन सबसे अधिक प्रभावी होता होगा. इसके पीछे कारण यह है कि आत्महत्या जैसा भाव अचानक से नहीं आता होगा. ऐसा भाव सम्बंधित व्यक्ति के मष्तिष्क में कई बार उभरा होगा. ये और बात है कि परेशानी, तनाव या फिर किसी अन्य कष्ट की अधिकता के चलते वह किसी विशेष अवस्था में ऐसा कदम उठा लेता होगा. 

मूल रूप में आत्महत्या का सम्बन्ध दिमागी भावबोध से जुड़ा हुआ है. घर की स्थिति, सामाजिक स्थिति, खुद की शारीरिक-मानसिक स्थिति, काम का दवाब, किसी परीक्षा में पास होने का तनाव, पारिवारिक कलह या फिर अन्य कोई और स्थिति उस व्यक्ति को लगातार परेशान करती रहती होगी. ऐसे में उसके आसपास का अकेलापन, उसकी समस्या को किसी और के द्वारा न बांटने की स्थिति, उसकी परेशानी को न समझ पाने का कारण भी आत्महत्या की तरफ उसे ले जाता होगा. ऐसे में संभव है शत-प्रतिशत सफलता ऐसे कदमों को रोक पाने में न लगे मगर यदि हम सभी अपने परिजनों, अपने आसपास के लोगों, अपने परिचितों, अपने सहयोगियों के साथ परस्पर सम्बन्ध बनाये रखें, उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करते रहें तो ऐसे कदमों को रोकना संभव है. किसी भी समय में किसी भी व्यक्ति के लिए विचारों का आदान-प्रदान करने के रास्तों का समाप्त हो जाना, अपनी मानसिक समस्या के प्रकटीकरण की स्थिति का लोप हो जाना ही ऐसे कदमों का कारण बनता है. आज भीड़ के बाद भी व्यक्ति नितांत अकेला महसूस करता है. ऐसे में अपने आपको, अपने आसपास के वातावरण को अकेलेपन से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया जाना चाहिए. आज वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे पर ऐसा संकल्प लेकर आत्महत्या रोकने की दिशा में सकारात्मक कदम बढ़ाया जा सकता है.

09 September 2019

सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा


सोशल मीडिया ने नियंत्रण के सारे बिन्दुओं को किनारे लगा रखा है. इस मंच पर न रिश्तों की कोई कद्र है, न संबंधों की, न उम्र की. इसकी उन्मुक्तता ने सभी को आज़ादी दे रखी है और वह भी पूरी तरह से निरंकुशता वाली. इस निरंकुश आज़ादी की कीमत लोगों के अपमान से, लोगों की बेइज्जती से चुकाई जा रही है. कई साल पहले कहीं पढ़ रखा था कि देश की आज़ादी के समय बहुत से लोगों ने अपना विचार इस रूप में दिया था कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है कि आज़ादी का सही अर्थ समझ सके या फिर उसका सही उपयोग कर सके. उस समय बहुतेरे लोगों ने आज़ादी के बाद भी कुछ सालों तक एक तरह की तानाशाही की वकालत की थी. उन स्थितियों में ऐसा किया जाना सही होता या गलत ये तो अब विमर्श का विषय है मगर अब लगता है कि वाकई देश अभी भी ऐसी स्थिति में नहीं है कि यहाँ आज़ादी का सही उपयोग किया जा सके. इसके उदाहरण के रूप में सोशल मीडिया के तमाम मंचों को लिया जा सकता है.


यहाँ किसी भी विषय पर एकतरफा कुतर्क (इसे बहस कतई नहीं कहा जा सकता है) चलते रहते हैं. उम्र, अनुभव, ज्ञान को दरकिनार करते हुए बड़े-बड़ों की इज्जत का कचरा यहाँ सहजता से किया जाने लगता है. किसी भी विषय पर किसी भी व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा की जा सकती है कि वह किसी विशेषज्ञ की तरह अपना ज्ञान उड़ेल सकता है. अपनी बात पर ही, अपने विचार पर ही जमे रहने की कला इसी मंच पर आसानी से देखने को मिलती है. यहाँ एक अपने अलावा बाकी सभी के विचार तुच्छ और क्षुद्र की श्रेणी में शामिल मान लिए जाते हैं. ऐसा व्यक्ति जिसने किसी विषय को पढ़ना तो दूर कभी देखा भी न हो, उस पर भी किसी बड़े विशेषज्ञ से ज्यादा गंभीरता से अपनी राय दे सकता है. ऐसा किये जाने से न केवल विषय से सम्बंधित जानकारी का, सामग्री का नुकसान हो रहा है वरन इंटरनेट पर ऐसी सामग्री का भी जमावड़ा होता जा रहा है जो विशुद्ध रूप से संशय, भ्रम फ़ैलाने का काम कर रही है. इसी अनावश्यक स्वतंत्रता के चलते सभी को अपनी बात रखने का, अपने विचार पोस्ट करने का अधिकार मिला हुआ है. बिना किसी सेंसर के, बिना किसी संपादन के ऐसी सामग्री इंटरनेट पर दिखाई दे रही है जो न केवल भ्रामक है वरन अराजक भी है. इसे रोकने का या फिर इस पर नियंत्रण लगाने जैसा कोई कदम कहीं से भी उठता हुआ नहीं दिख रहा है. 

इस तरह की अराजक और भ्रामक स्थिति में आने वाली उस पीढ़ी का भी नुकसान होने वाला है जो इंटरनेट की सामग्री को ही प्रमाणित मानती है. उसके लिए पुस्तकों का, बुजुर्गों के ज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं है. ऐसी स्थिति में अधकचरे ज्ञान से, अशिक्षित लोगों के विचारों से सोशल मीडिया हरा-भरा बना हुआ है. आने वाले समय में यही भ्रामक और तथ्यहीन सामग्री ही सामाजिक क्षति करवाएगी. आज भले ही इसके मायने समझ न आ रहे हों मगर आने वाले समय में इसी तरह की सामग्री के सहारे लोगों के दिमाग को, उनके ज्ञान को गुलाम बनाया जा सकेगा. आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कालखंड में सेना, हथियार से ही गुलामी लायी जाए. वर्तमान समय तकनीक का है और आने वाला इससे भी ज्यादा तकनीक का, विज्ञान का, जानकारियों का, तथ्यों का होगा. ऐसे में एक गलत अथवा भ्रामक सामग्री भी किसी हथियार से कम साबित नहीं होगी. आज के लिए न सही मगर आने वाले कल के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए आज तथ्यों की गलतियों को, भ्रम को, अराजकता को संभालना होगा. सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा.

05 September 2019

छोटी सी ज़िन्दगी ने बचाईं सैकड़ों ज़िंदगियाँ


नीरजा भनोत, ये नाम संभवतः अब लोगों के लिए अनजाना नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके साहसिक कार्य और बलिदान को याद रखने के लिये राम माधवानी के निर्देशन में नीरजा फ़िल्म का निर्माण किया जा चुका है. इस फ़िल्म में नीरजा का किरदार अभिनेत्री सोनम कपूर ने निभाया. इस फिल्म को 19 फ़रवरी 2016 को रिलीज किया गया था. इस फिल्म के आने के पहले कम लोग थे जो इनके बारे में जानकारी रखते थे. ऐसे लोगो संभवतः आज भी होंगे. आज जिस दिन पूरा देश शिक्षक दिवस मना रहा है उसी दिन इस साहसी महिला की पुण्यतिथि है. नीरजा ने बहुत कम उम्र में वह साहसिक कारनामा कर दिखाया था जिसके बारे में सोचा जाना भी कठिन समझ आता है. उसी कार्य के चलते भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया था. वे इस सम्मान को प्राप्त करने वाली पहली महिला हैं. इसके साथ-साथ पाकिस्तान सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया. भारत सरकार ने सन 2004 में नीरजा के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूर है. वर्ष 2005 में अमेरिका ने उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया. उनकी स्मृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया, जिसका उद्घाटन अमिताभ बच्चन ने किया.


जो लोग उनके बारे में नहीं जानते होंगे निश्चय ही उन्हें आश्चर्य हो रहा होगा और कौतूहल भी कि आखिर ये महिला है कौन और इसने ऐसा कौन सा साहसिक कार्य किया था. नीरजा ने आज ही के दिन पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को आतंकवादियों से बचाया था. अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए नीरजा 5 सितम्बर 1986 को मात्र 23 वर्ष की उम्र में शहीद हो गईं. 5 सितम्बर को पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को लिए पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर अपने पायलट के इंतजार में खड़ा था. तभी 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि विमान में पायलट को जल्दी भेजा जाये. पाकिस्तानी सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि वह किसी अमरीकी नागरिक को मारने की धमकी से पाकिस्तान पर दबाव बना सकें. नीरजा ने विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी पासपोर्ट आतंकियों को सौंप दिये. फिर आतंकियों ने एक ब्रिटिश को मारने की धमकी दी किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से सूझबूझ से बात करके ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया. धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये. अचानक नीरजा को ध्यान आया कि विमान में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा, तब यात्रियों को बचाना आसान होगा. ऐसा विचार आते ही उन्होंने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना और साथ में विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा.

नीरजा ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ. विमान का ईंधन समाप्त होते ही चारों ओर अंधेरा छा गया. नीरजा ने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये. सभी यात्री भी आपातकालीन द्वार पहचान चुके थे. योजना के अनुसार सारे यात्री उन द्वारों से नीचे कूदने लगे. यह देख आतंकियों ने अंधेरे में ही फायरिंग शुरू कर दी. नीरजा के सावधानी भरे कदम से कोई यात्री मारा नहीं गया. हां, कुछ घायल अवश्य हो गये थे. इस बीच पाकिस्तानी सेना के कमांडो विमान में आ गए थे. उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया. सबसे अंत में नीरजा निकलने को हुई तभी उन्हें बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी. वे उन बच्चों को खोज कर आपातकालीन द्वार की ओर बढीं तभी बचे हुए चौथे आतंकवादी ने गोलीबारी शुरू कर दी. नीरजा बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल कर उस आतंकी से भिड़ गईं. यद्यपि उस चौथे आतंकी को पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया तथापि वे नीरजा को न बचा सके. अपने कर्तव्य निर्वहन में नीरजा शहीद हो गईं. 

इस साहसी महिला, नीरजा भनोत का जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ पंजाब में हुआ था. इनके पिता हरीश भनोत मुंबई में पत्रकारिता क्षेत्र में थे. नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ में हुई, इसके बाद की शिक्षा मुम्बई में हुई. वर्ष 1985 में उनका विवाह संपन्न हुआ किन्तु रिश्ते में स्नेह-प्रेम न होने के चलते वे विवाह के दो महीने बाद ही मुंबई आ गयीं. इसके बाद उन्होंने पैन एम एयरलाइंस में नौकरी के लिये आवेदन किया और ट्रेनिंग पश्चात् एयर होस्टेज के रूप में काम करने लगीं थीं. महज 23 वर्ष की उम्र में अपनी जान की परवाह किये बिना यात्रियों की जान बचाने जैसा अदम्य साहस का कार्य करने वाली नीरजा को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.



01 September 2019

खुद से लड़ने की कोशिश - 1600वीं पोस्ट


अपने ब्लॉग के सहारे आप सभी से जुड़ने का प्रयास हमेशा से रहा है. ब्लॉग के दिन ऐसा लगता है जैसे किसी अन्य माध्यम ने छीन लिए. हमें याद है जब हम ब्लॉग जगत में एकदम से नए-नए आये थे तब किसी भी तरह की सहायता मांगने पर वरिष्ठ ब्लॉगर द्वारा तत्कालीन सहायता उपलब्ध कराई जाती थी. इधर शायद सुनकर बुरा लगे मगर ऐसे प्रबुद्ध वरिष्ठ ब्लॉगर भी किसी न किसी विचारधारा की चपेट में आ गए. उनके लिए नए-पुराने का मतलब ही तिरोहित हो गया. ऐसे लोग जिन्होंने हमारे घर आकर कई-कई दिन की सेवाएँ प्राप्त कीं वे महज एक विचार पर किनारा कर गए. 

बहरहाल, आज ये हमारे ब्लॉग की 1600वीं पोस्ट है जिसे ऐसे लोगों पर कतई खर्च नहीं करना है जिनको संबंधों का, रिश्तों का कोई भान नहीं. आज की पोस्ट हम विशुद्ध अपने पर केन्द्रित करना चाहते थे मगर कतिपय कारणों से ऐसा नहीं हो सका. इस सोलहवीं सौ पोस्ट का आरम्भ ही ऐसे बिंदु से हुआ जिसे हम चर्चा में नहीं लाना चाहते थे. असल में किसी भी व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई घटना अपना पूर्ण प्रभाव छोड़ती है, इसी प्रभाव के चलते अच्छे-बुरे का ज्ञान उसे होता है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ. जीवन के महज तीस साल देखते-देखते ही पारिवारिक जिम्मेवारियों का बोझ हमारे कन्धों पर आ गया. इससे पहले कि हम इस बोझ को, इस जिम्मेवारी को पूरी तरह से उठा पाने में सक्षम होते हम खुद ही अपने परिवार पर बोझ बन गए. अचानक हुई एक दुर्घटना से सारे परिवार के सोचने का, कार्य करने का अर्थ ही बदल दिया. इस अर्थ का भान उस समय भी हुआ था, आज फिर हुआ. अपने बच्चा चाचा के लिए न तब शब्द थे, न आज शब्द हैं. यद्यपि आज उस दुर्घटना से संदर्भित कोई भी समय नहीं है मगर हमारी पुस्तक कुछ सच्ची कुछ झूठी के सन्दर्भ में चाचा जी द्वारा मिली संक्षिप्त प्रतिक्रिया ने उन्हीं दिनों की सैर करवा दी. ये पुस्तक तो महज एक सामान्य सा आवरण है जिसे हमने अपने आपको बचाने के लिए प्रस्तुत किया है. ऐसे लोगों के सामने अपने जीवन का बखान क्या करना जिन्हों जीवन को ज़िन्दगी बनाया है. ऐसे लोगों में हमारे बच्चा चाचा भी हैं.

असल में ज़िन्दगी वह नहीं जो आप जीते हैं या जीने की कोशिश करते हैं बल्कि ज़िन्दगी वह है जिसे जीते हुए आपके साथ आपके लोग भी साथ दिखें. आज के लिए महज इतना ही. इस पर विस्तार से आगे कभी और किसी दिन.

ख़ुशियाँ अपने ही मन-दिल की ख़ुशी में हैं

कई बार ज़िन्दगी स्वप्न जैसी महसूस होती है तो कई बार ज़िन्दगी अपने आप में ऐसी वास्तविकता समझ आती है जिसे समझ पाना सम्भव नहीं लगता. समय के हाथों में संचालित ज़िन्दगी तमाम सारे उच्चावचनों के साथ हँसाते-रुलाते आगे ले जाती है. उठते-गिरते रास्तों में ज़िन्दगी भटकते हुए कब किस मंज़िल पर खड़ा कर दें, ये समझना मुश्किल होता है. ये भटकन उन तमाम पक्षों से जुड़ी होती है जो किसी भी व्यक्ति का जीवन कहा जा सकता है. खिली धूप के बीच अचानक से काले बादलों का घिर आना, बारिश के बीच कहीं से झाँकती धूप की तरह सुखद और दुखद पल किसी भी व्यक्ति के जीवन में आते-जाते रहते हैं. यहाँ समझना यह होता है कि उस आए हुए पल को कैसे गुज़ारा जाए?

सत्य यह है कि व्यक्ति अपने जीवन में ही अपने जीवन का मालिक नहीं. उसकी ज़िन्दगी अपनी होने के बाद भी उसकी अपनी नहीं. हाँ, जीवन को बिताने का ढंग, ज़िन्दगी को गुज़ारने का तरीक़ा उसका अपना हो सकता है. यही रास्ता, यही तरीक़ा ही व्यक्ति के जीवन में सुख-दुःख की स्थिति के लिए उत्तरदायी माना जा सकता है. संसार भर के सभी व्यक्तियों के पास एकसमान समय है, दिन-रात की अवधि एकसमान है. ऐसे में संसाधनों में भिन्नता हो सकती है पर संसाधनों की उपलब्धता कुछ समय को भौतिक सुखों की पूर्ति करवा सकती है किंतु व्यक्ति के ख़ुश होने, दुखी होने का निर्धारण नहीं करवा सकती. कई बार व्यक्ति सब कुछ होने के बाद भी किसी बहुत सी छोटी बात के लिए दुखी रहता है, कभी कोई कुछ भी न होने के बाद भी एक पल की ख़ुशी में तमाम अवधि तक प्रसन्न बना रहता है.

समझना होगा कि मन की अवस्था हमारे सुख-दुःख का आधार बनती है. बाहरी तत्त्वों की उपलब्धता के बजाय मन की, दिल की उपलब्धता के आधार पर ख़ुशियों को जोड़ने का काम किया जाना चाहिए. हो सकता है कि कुछ कारक इसमें बाधक बनें किंतु उनसे भी मन, दिल की अवस्था से ही निपटा जा सकता है. बिना इस सोच के ख़ुशियों को दीर्घकाल तक अपने पास रोक पाना सम्भव नहीं. 

31 August 2019

ज़िन्दगी का आनंद शौक़ के प्लेटफ़ॉर्म पर

ज़िन्दगी को आनंद, मस्ती, ज़िंदादिली के साथ जीने की चाह ने कभी निराश न होने दिया. कई क्षण ऐसे भी आए जबकि लगा कि सबकुछ शून्य होने वाला है किंतु ज़िन्दगी को अपनी तरह से जिए जाने की सोच ने ऐसा न होने दिया. इसी सोच ने हमेशा कुछ न कुछ नया करते रहने का जज़्बा जगाए रखा, कुछ न कुछ अलग हटकर करने का मन बनाए रखा. इसी के चलते वर्षों पुराने शौक़ को मित्र सुभाष द्वारा हवा दी गई. उस हवा में और तेज़ी तब आई जबकि उरई में शूटिंग रेंज का खुलना हुआ. निशानेबाज़ी या कहें कि बंदूक़बाज़ी के शौक़ को पूरा करने का मंच दिखाई दिया. इस शौक़-शौक़ के खेल को जल्द ही नई उड़ान मिलने वाली थी, ये पता न था.

मई 2019 से रेंज की शुरुआत का सुखद पड़ाव उस समय आया जबकि ज्ञात हुआ कि देहरादून में राज्य स्तरीय रायफल शूटिंग प्रतियोगिता में सम्मिलित होना है. क़तई अंदेशा न था कि देहरादून आना अत्यंत सुखद रहेगा. दो इवेंट में अपनी इंट्री दर्ज करवाई और शौक़ को खेल में बदलने देहरादून पहुँच गए. विगत कई वर्षों में देहरादून जाने के कार्यक्रमों, अवसरों को हक़ीक़त में न बदला जा सका था. इस बार स्थितियाँ अलग थीं, माहौल अलग था शायद इसी कारण देहरादून जाना हो गया. ज़िन्दगी के खेल के साथ शौक़ के खेल का तारतम्य मिलाते हुए जसपाल राणा शूटिंग रेंज पहुँच ही गए. खेल चल ही रहा था. नियंत्रण आवश्यक होता है, हर जगह चाहे खेल हो या ज़िन्दगी. उसी नियंत्रण को बनाते हुए ख़ुद को संयमित किया और शौक़ का आनंद एक रजत पदक के साथ और नेशनल के लिए क्वालीफ़ाई होने के रूप में उठाया. हाँ, कुछ ख़ाली-ख़ाली सा अवश्य रहा, रहना भी था. ख़ैर... यही ज़िन्दगी है, यही खेल है.

रेंज से वापसी करते समय एक बात याद आ रही थी कि कॉलेज में खेल-खेल में एथलीट बने थे, इस बार शौक़-शौक़ में शूटर भी बन गए. एक ख़ालीपन के साथ ख़ुशी, आनंद समेटे फिर अपनी ज़िन्दगी को शौक़ में बदलने निकल पड़े.