11 अगस्त 2026

हिन्दी के पंचम वर्ण का प्रयोग

हिन्दी की जितनी दुर्दशा, दुर्गति हम हिन्दी वालों ने की है, उतनी तो शायद लॉर्ड मैकाले की औलादों ने भी नहीं की होगी. इधर सोशल मीडिया के स्थानीय संस्करणों में उरई  का एक वीडियो तैरने में लगा है, जिसमें एक विद्यालय के नाम को लेकर पत्रकारिता आजमाई जा रही है. पत्रकारिता के नाम पर अब तो किसी डिग्री की, डिप्लोमा की, किसी संस्थान की, कैमरे की आवश्यकता ही नहीं, बस जेब में हाथ डाला, मोबाइल निकाला और बन गए पत्रकार. ऐसे ही किसी पत्रकार महोदय द्वारा एक द्वार का वीडियो बनाया गया और सोशल मीडिया पर उछाल दिया गया. इस उछाल के साथ एक सवाल भी चिपका दिया गया मगर बिना किसी ज्ञान के साथ,  बिना किसी व्याकरण की जानकारी के.

 

समस्या अकेले उन महाशय की नहीं, समस्या उनके साथ उछलते अनेक ज्ञानियों की है जिन्होंने हिन्दी व्याकरण तो छोड़िए, हिन्दी से भी उतना ही नाता रखा है, जितना घर-बाजार में बोलने के काम आता है. हिन्दी व्याकरण से, उसके सामान्य रूप से, वर्णों से, वर्णमाला के वर्गों से, पंचम वर्णों से, उनके प्रयोग से कोई लेना-देना नहीं है. लॉर्ड मैकाले की दुनिया में विचरण करते इन लोगों को हिन्दी की सामान्य जानकारी ही नहीं और ऐसे लोग ही इधर-उधर हिन्दी के प्रति सवाल उठाते हुए उसे बदनाम करने का काम करते रहते हैं.

 



यहाँ उस वीडियो से, उस नाम से, उस विद्यालय से सन्दर्भ भले हो  मगर उनकी चर्चा किये बिना सीधे-सीधे हिन्दी के वर्गों, पंचम वर्णों के बारे में कुछ सामान्य जानकारी दे दें. इसी से अंदाजा लगा लिया जायेगा कि उस वीडियो की, विद्यालय के लिखे नाम की वास्तविकता क्या है. हिन्दी वर्णमाला में स्वर, व्यंजन के बारे में तो आपको जानकारी होगी ही और संभवतः उनको भी जानकारी होगी जो उस वीडियो के आसपास भटक रहे हैं.

 

अब हिन्दी वर्णमाला के स्वर, व्यंजन पर चर्चा करने के बजाय चर्चा करते हैं वर्गों की. यहाँ सामान्य रूप से ये वर्ग स्वीकार्य हैं....

क वर्ग = इसमें आते हैं क,,,, 

च वर्ग = इसमें हैं च,,,,

ट वर्ग = इस वर्ग में हैं ट, ठ, ड,,

त वर्ग = इसमें हैं त, थ, द, ध, न

प वर्ग =  इसमें प, फ, ब, भ,

 

अब बात करते हैं लिखने में इनके प्रयोग की. जिस शब्द ‘गांधी’ की बात हो रही है, जो ‘गान्धी’ लिखा हुआ है. इसी से समझा जाये. जब किसी शब्द को लिखने में उस वर्ग के पंचम वर्ण का प्रयोग होता है तो वह उसी वर्ग के वर्ण के ठीक पहले अर्धरूप प्रयोग किया जाता है. जैसे ‘गांधी’ में ‘ध’ के पूर्व पंचम वर्ण का प्रयोग किया जाना है तो यहाँ देखना होगा कि ‘ध’ है त वर्ग का और त वर्ग का पंचम वर्ण है ‘न’ इसलिए हिन्दी व्याकरण के अनुसार ‘गांधी’ में ‘ध’ के पूर्व इस वर्ग का पंचम वर्ण ‘न’ अर्धरूप में आएगा अर्थात ‘आधे न’ के रूप में. इसलिए सही शब्द होगा ‘गान्धी’. लेखन में और टाइपिंग में सहजता बनाने के लिए पंचम वर्ण को आधा लिखने के स्थान पर अनुस्वार (अर्थात बिन्दु के रूप में) लगाया जाना मान्य किया गया है. इसलिए सर्वमान्य रूप में ‘गान्धी’ को ‘गांधी’ लिखा हुआ ही सही समझा जाने लगा है. (वैसे वीडियोधारी पत्रकार महोदय और उनके संगी-साथियों के लिए अनुस्वार, अनुनासिका शब्द भी अपरिचित होंगे. इस पर बाद में.)

 

इस विद्यालय के बोर्ड में आगे ‘इण्टर’ लिखा हुआ है. पता नहीं पत्रकार महाशय के कैमरे ने इसे गलत क्यों नहीं बताया? सम्भव है कि वे इसे ‘इंटर’ लिखे जाने का समर्थन करते हुए ‘इण्टर’ को गलत बता देते. यहाँ भी एक मिनट रुककर पंचम वर्ण और वर्ग के साथ समझ लें तो आने वाले समय में बहुत से इण्टर कॉलेज बचे रहेंगे कैमरे से. ‘इण्टर’ को देखिये और समझिये. यहाँ आधा वर्ण आना है ट वर्ग के पहले, ऐसे में इसी वर्ग का पंचम वर्ण आधा होकर लगेगा. अब गौर करिए ट वर्ग पर, इसका पंचम वर्ण है ‘ण’ और इसे ही आधा होना है. अब यह ‘ट’ के पहले आधा होगा तो सही शब्द होगा ‘इण्टर’. बाकी तो ये है कि टाइपिंग और लेखन की सहजता के लिए इसे ‘इंटर’ भी लिखा जाने लगा है. यह भी सही है. इस सही का तात्पर्य यह कतई नहीं कि ‘इण्टर’ गलत है.

 

हाँ, ये याद रखियेगा कि गांधी या गान्धी के स्थान पर गाँधी अवश्य ही गलत है. ऐसा इसलिए क्योंकि गांधी में स्वर अनुनासिका (चन्द्रबिन्दु) के स्थान पर अनुस्वार (बिन्दु) का है. नहीं हो रहा हो विश्वास तो चन्द्रबिन्दु (अनुनासिका) और बिन्दु (अनुस्वार) का उच्चारण करके देखना, सही शब्द पकड़ में आ जाएगा. हिन्दी का सम्मान न कर सकें, उसके प्रति आप ज्ञानवान न बन सकें तो कम से कम हिन्दी का अपमान तो न करें.


07 अगस्त 2026

वीडियो के द्वारा जानें समर्थ एकाउंट ट्रांसफर की प्रक्रिया


 

जिन प्राध्यापकों का स्थानांतरण हुआ है और उनको अपना समर्थ एकाउंट भी स्थानांतरित करवाना है, वे निम्न प्रपत्रों को, दस्तावेजों को क्रम से लगाकर उसकी पीडीएफ बना लें.

1. जिस महाविद्यालय से आपका स्थानांतरण हुआ है अर्थात जिस महाविद्यालय में आपकी नियुक्ति हुई थी, वहाँ के प्राचार्य द्वारा महाविद्यालय के लैटर हेड पर एक Covering letter बनाया जायेगा. इस कवरिंग लैटर में मुख्य रूप से ट्रांसफर हुए प्राध्यापक का eHRMS Code को दर्शाना होगा.

2. एकल स्थानांतरण की लिस्ट उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से घोषित की जाती है. इस सूची में उन प्राध्यापकों का नाम होता है जिनका ट्रांसफर किया गया है. इसके साथ ही नियुक्ति वाले महाविद्यालय का तथा उस महाविद्यालय का नाम होता है जहाँ ट्रांसफर किया गया है. इस पूरी लिस्ट को सम्बंधित प्राध्यापक को लगाना होता है.   

3. इसके बाद तीसरे स्थान पर लगेगा प्राध्यापक के नियुक्ति वाले महाविद्यालय से निर्गत किया गया रिलीविंग ऑर्डर. यदि सम्बंधित प्राध्यापक को उसके महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र और प्राचार्य द्वारा अलग-अलग ऑर्डर निर्गत किये गए हैं तो वे दोनों प्रपत्र संलग्न किये जायेंगे.

4. सम्बंधित प्रपत्रों के चौथे क्रम में प्राध्यापक को उस महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र द्वारा जारी किया गया नियुक्ति पत्र  (Appointment Letter) लगाना होगा, जहाँ कि उसका ट्रांसफर हुआ है.   

5. अंतिम प्रपत्र के रूप में स्थानांतरित किये गए महाविद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी प्रपत्र को लगाना होगा. इसमें कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी पत्र, कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी आख्या वाले प्रपत्र को लगाना होगा.


सम्बंधित प्राध्यापक इसका ध्यान अवश्य ही रखें कि उक्त सभी प्रपत्रों की पीडीएफ फॉर्मेट में एक फाइल बनानी होगी.

 

इन प्रपत्रों की एक फाइल (पीडीएफ फॉर्मेट में) बनाकर महाविद्यालय (जहाँ से प्राध्यापक का ट्रांसफर हुआ है) से मेल करवा देना है. मेल यहाँ भेजनी है- uphed.samarth@gmail.com


04 अगस्त 2026

समर्थ एकाउंट के ट्रांसफर की प्रक्रिया

ये पोस्ट विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के अशासकीय महाविद्यालयों के उन प्राध्यापकों के सन्दर्भ में है, जिनका एकल स्थानांतरण हुआ है. ये स्थानांतरण एक अशासकीय महाविद्यालय से दूसरे अशासकीय महाविद्यालय के लिए उत्तर प्रदेश शासन की नीतियों के अंतर्गत किया जाता है. अशासकीय महाविद्यालय के प्राध्यापकों के एकल स्थानांतरण की प्रक्रिया के बारे में आगे किसी अन्य पोस्ट में विस्तार से बताने का प्रयास किया जायेगा. आइये अभी इस पोस्ट के माध्यम से समझते हैं कि स्थानांतरण के पश्चात् अपने समर्थ एकाउंट को कैसे स्थानांतरित करवाया जा सकता है.

 

स्थानांतरण के पूर्व जिस प्राध्यापक की नियुक्ति जिस महाविद्यालय में हुई थी, उसका समर्थ एकाउंट भी उसी महाविद्यालय में बना होता है. समर्थ पोर्टल पर अपने एकाउंट में लॉग इन करने के लिए किसी भी प्राध्यापक द्वारा एक यूजरनेम का उपयोग किया जाता है. सामान्य रूप में यह यूजरनेम eHRMS Code होता है, इसे मानव सम्पदा कोड भी कहते हैं. समर्थ एकाउंट के ट्रांसफर के लिए इस कोड को भी सम्बंधित प्राधिकारी तक भेजना होता है. इसके साथ-साथ कुछ प्रपत्रों को, दस्तावेजों को भी भेजना होता है. ये प्रपत्र संख्या में चार-पाँच ही हैं मगर इनको बनाते समय कुछ ध्यान देने योग्य बातें हैं-

एक तो इन प्रपत्रों को उसी क्रम से लगाना है, जैसा कि यहाँ बताया गया है.

दूसरे, इन सभी प्रपत्रों को पीडीएफ फॉर्मेट में एक फाइल के रूप में बनाना होता है.

इस एक पीडीएफ को फिर पुराने महाविद्यालय के द्वारा मेल किया जाता है.

 



जिन प्राध्यापकों का स्थानांतरण हुआ है और उनको अपना समर्थ एकाउंट भी स्थानांतरित करवाना है, वे निम्न प्रपत्रों को, दस्तावेजों को क्रम से लगाकर उसकी पीडीएफ बना लें.

1. जिस महाविद्यालय से आपका स्थानांतरण हुआ है अर्थात जिस महाविद्यालय में आपकी नियुक्ति हुई थी, वहाँ के प्राचार्य द्वारा महाविद्यालय के लैटर हेड पर एक Covering letter बनाया जायेगा. इस कवरिंग लैटर में मुख्य रूप से ट्रांसफर हुए प्राध्यापक का eHRMS Code को दर्शाना होगा.

2. एकल स्थानांतरण की लिस्ट उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से घोषित की जाती है. इस सूची में उन प्राध्यापकों का नाम होता है जिनका ट्रांसफर किया गया है. इसके साथ ही नियुक्ति वाले महाविद्यालय का तथा उस महाविद्यालय का नाम होता है जहाँ ट्रांसफर किया गया है. इस पूरी लिस्ट को सम्बंधित प्राध्यापक को लगाना होता है.   

3. इसके बाद तीसरे स्थान पर लगेगा प्राध्यापक के नियुक्ति वाले महाविद्यालय से निर्गत किया गया रिलीविंग ऑर्डर. यदि सम्बंधित प्राध्यापक को उसके महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र और प्राचार्य द्वारा अलग-अलग ऑर्डर निर्गत किये गए हैं तो वे दोनों प्रपत्र संलग्न किये जायेंगे.

4. सम्बंधित प्रपत्रों के चौथे क्रम में प्राध्यापक को उस महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र द्वारा जारी किया गया नियुक्ति पत्र  (Appointment Letter) लगाना होगा, जहाँ कि उसका ट्रांसफर हुआ है.   

5. अंतिम प्रपत्र के रूप में स्थानांतरित किये गए महाविद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी प्रपत्र को लगाना होगा. इसमें कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी पत्र, कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी आख्या वाले प्रपत्र को लगाना होगा.

 

सम्बंधित प्राध्यापक इसका ध्यान अवश्य ही रखें कि उक्त सभी प्रपत्रों की पीडीएफ फॉर्मेट में एक फाइल बनानी होगी.

 

पहले स्थान पर लगाये जाने वाले कवरिंग लैटर का प्रारूप कुछ इस तरह से बना सकते हैं.


 

To Whom It May Concern

(यहाँ स्थानांतरित हुए प्राध्यापक का नाम, महाविद्यालय का नाम, विभाग का नाम) में (पदनाम) के रूप में कार्यरत थे. उत्तर प्रदेश शासन के पत्र संख्या-(यहाँ ट्रांसफर वाली लिस्ट का पत्रांक) (यहाँ दिनांक) के द्वारा उत्तर प्रदेश सहायता प्राप्त महाविद्यालय अध्यापक स्थानांतरण नियमावली 2024 में विहित प्रावधानों के अंतर्गत इनका एकल स्थानांतरण (यहाँ उस महाविद्यालय का नाम, जहाँ के लिए ट्रांसफर हुआ है) में किया गया है. इसका उल्लेख उक्त पत्र में प्रदर्शित सूची के क्रम संख्या (यहाँ वह क्रम संख्या लिखनी है, लिस्ट में जहाँ प्राध्यापक का नाम है) पर है.

उक्त पत्र एवं शिक्षा निदेशक (उच्च शिक्षा), उत्तर प्रदेश, प्रयागराज के (यहाँ ट्रांसफर लिस्ट के अंतिम पृष्ठ पर अंकित पत्रांक और दिनांक) एवं (यहाँ उस महाविद्यालय के प्रबन्ध तंत्र के नियुक्ति पत्र का सन्दर्भ, जहाँ आपका ट्रांसफर किया गया है) के आलोक में (यहाँ प्राध्यापक का नाम) को (यहाँ उस महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र के रिलीविंग पत्र का सन्दर्भ, जहाँ से प्राध्यापक का ट्रांसफर हुआ है) को अपराह्न में कार्यमुक्त कर दिया गया. अपनी कार्यमुक्ति के पश्चात् (यहाँ प्राध्यापक का नाम और उस महाविद्यालय का नाम जहाँ ट्रांसफर हुआ है) को कार्यभार ग्रहण कर लिया था.

इस सम्बन्ध में आपको अवगत कराना है कि उनका eHRMS Code (यहाँ कोड लिखना है) है. आपसे अनुरोध है कि यथोचित कार्यवाही करने का कष्ट करें जिससे (यहाँ प्राध्यापक का नाम) का समर्थ एकाउंट स्थानांतरित हो सके. इस सम्बन्ध में अपेक्षित प्रपत्र संलग्न हैं.

1. स्थानांतरण आदेश (सूची)

2. (जहाँ से ट्रांसफर हुआ, उस महाविद्यालय का नाम) से कार्यमुक्त सम्बन्धी आदेश

3. (जहाँ ट्रांसफर हुआ, उस महाविद्यालय का नाम) के प्रबन्ध समिति का पत्र

4. (जहाँ ट्रांसफर हुआ, उस महाविद्यालय का नाम) में कार्यभार ग्रहण संबंधी प्रपत्र

                                                                                                           

हस्ताक्षर एवं मुहर

(प्राचार्य)

 

इन प्रपत्रों की एक फाइल (पीडीएफ फॉर्मेट में) बनाकर महाविद्यालय (जहाँ से प्राध्यापक का ट्रांसफर हुआ है) से मेल करवा देना है. मेल यहाँ भेजनी है- uphed.samarth@gmail.com

 

01 अगस्त 2026

जंतर-मंतर की गालियाँ

इधर जंतर-मंतर की गालियों की खूब चर्चा हो रही है. गालियों को लेकर अलग-अलग विचार, बयानबाजी देखने को मिल रही है. सबके सब एक तरह का आदर्श पेलने में लगे हैं. (अब कहो हमसे खार खाए बैठे और गालियाँ बकते कथित मासूम बच्चों के पैरोकार हमारे पहले ही वाक्य के 'पेलने' शब्द पर आपत्ति जताने लगें कि यह अश्लील शब्द है). फिलहाल, जिस तरह की गालियाँ जंतर-मंतर पर हमारे, हम सबके इन बच्चों ने दी क्या वाकई आप उनको सही ठहराते हैं? उचित मानते हैं? यदि हाँ, तो अपने घर में अपने बच्चों को, बड़ों को खुली छूट दीजिये वे सभी शब्द बोलने की. कोई एक राष्ट्राध्यक्ष को किसी दूसरे राष्ट्राध्यक्ष के जननांग में घुसा बता रहा है; कोई प्रधानमंत्री की माँ के साथ ही शारीरिक सम्बन्ध बनाने वाली क्रिया वाले शब्द उच्चारित कर रहा है; कोई उनके लिंग का आकार बता रहा है; कहीं लिंगधारी बच्चियाँ भी हैं जो जोश में कह रही हैं कि मोदी मेरे %%## पे.

 



इस पोस्ट का मंतव्य ये नहीं कि किसने क्या कहा, क्यों कहा इस पोस्ट का सन्दर्भ विशुद्ध गालियाँ देने से है. हमारे समाज में गालियों को बखूबी अलंकृत किया जा चुका है. आदर्श बनाये जाने वाले दो फ़िल्मी कलाकार खुलेआम कैमरे के सामने बताते हैं कि किस माँ की गाली देने में काव्यात्मकता, लयात्मकता है. सोचिये, जब गालियों में लय और काव्य होगा तो फिर उनको कोई भी गाएगा.

 

रही बात हमारे, व्यक्तिगत हमारे गाली देने की तो हमने भी खूब गालियाँ दी हैं, आज भी देते हैं. आज की इस कथित विश्लेषित पीढ़ी ने एक प्रदर्शन देखा और बह गए, हमने अपने विद्यार्थी जीवन का आरम्भ ही किया था दो-दो आन्दोलन से. एक था आरक्षण विरोधी आन्दोलन और दूसरा श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से सम्बंधित आन्दोलन. आरक्षण वाले आन्दोलन के दौरान लगभग रोज ही कोई न कोई प्रदर्शन होता, किसी न किसी सीनियर के नेतृत्व में इसे अंजाम दिया जाता. इस प्रदर्शन में एक नारा खुलकर और अनिवार्य रूप से लगाया जाता "चौड़ी छाती वीरों की और माँ की %%$$## फलाने की." इस नारे के बार-बार लगाए जाने के दौरान यह याद रखा जाता कि कहीं से कोई पत्रकार कैमरे से वीडिओ न बना रहा हो. कॉलेज में या कॉलेज के आसपास ऐसा होने पर ध्यान रखा जाता कि कहीं कोई अध्यापक न देख रहे हों.

 

आज के समय में हमारे खुद के गाली देने की बात करें तो हाँ, खूब देते हैं, खुलकर देते हैं मगर किसी बड़े के सामने नहीं. उन शिक्षकों के सामने भी नहीं जिन्होंने प्राथमिक शिक्षा दी. किसी महिला के सामने भी नहीं. आज की इस पीढ़ी की गालियों की जो भी वकालत कर रहे हैं उनके वीडियो को अपने बच्चों को दिखाते हुए उन अंगों के बारे में भी समझा दो, जिनकी चर्चा ये मासूम बच्चे अपनी गालियों में कर रहे हैं.


29 जुलाई 2026

तकनीकी दौर में भी गुरु की प्रासंगिकता

 

भारतीय संस्कृति में आदिगुरु के रूप में पूजनीय महर्षि वेद व्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाने वाला पर्व गुरु पूर्णिमा हमारी महान ज्ञान परम्परा के स्मरण का पवित्र अवसर है. भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से गुरु-शिष्य परम्परा का गौरवशाली स्थान रहा है. इसी कारण से अज्ञानता के अंधकार को चीरकर मानवता को विवेक-मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरुओं के सम्मान में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को श्रद्धा और उल्लास के साथ गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है.

 

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को एक तरह की ऊर्जा के रूप में परिभाषित किया गया है. भारतीय मनीषियों ने इसे जीवन की समग्रता को जानने-समझने की एक प्रक्रिया माना है. इसे ऐसी चेतना बताया है जो गुरु मुख से शिष्य के हृदय की ओर संचरित होती है. गुरु-शिष्य की इस परम्परा में ज्ञान और आचरण में किसी तरह का विभेद स्वीकारा नहीं गया है. कथनी और करनी में विभेद न होने को ही शिक्षा माना गया है. गुरु-शिष्य परम्परा के कारण भारतीय संस्कृति में गुरु का सम्मान सामाजिक शिष्टाचार के रूप में स्वीकार्य नहीं रहा है बल्कि इसे आध्यात्मिक साधना के रूप में स्वीकारा गया है. गुरुब्रह्मा गुरुविष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः के रूप में यह बताया गया है कि समस्त शक्तियों का ज्ञान और उनका बोध कराने वाला माध्यम गुरु ही है और ऐसा माध्यम ईश्वर से भी उच्च पद पर है. गुरु ही है जो इंसान के भीतर की कुंठा, अहंकार, अज्ञानता, लालच, विद्वेष आदि को समाप्त करता है. उसके ऐसे परिष्करण से ही किसी भी शिष्य की आंतरिक प्रतिभा पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने लगती है.

 

समय के साथ गुरु-शिष्य परम्परा में भी परिवर्तन देखने को मिले हैं. इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में देखें तो सम्पूर्ण विश्व तकनीकी विकास, उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण आदि के दौर से गुजर रहा है. आज का युग सूचनाओं का युग बन गया है. इंटरनेट, गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि के इस दौर में ज्ञान किसी एक व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है. हर हाथ में डिवाइस ने एक क्लिक पर व्यक्ति के सामने वैश्विक जानकारी का भंडार लगा दिया है. यहाँ यह समझना बहुत आवश्यक है कि हमारे सामने एक क्लिक पर जानकारी आ रही है अथवा ज्ञान? हमें इस तकनीकी रफ़्तार वाले युग में यह भी समझना होगा कि उँगलियों के सहारे स्क्रॉल करती जानकारी हमारे लिए वाकई लाभकारी है अथवा हम अनावश्यक जानकारियों का भंडार-गृह बनते जा रहे हैं? तकनीकी के बदलते दौर में, शिक्षा के बदलते आयामों के युग में लोगों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तकनीकी युग में गुरु की प्रासंगिकता शेष है?

 

इस प्रश्न के उत्तर के पूर्व हम सभी को वर्तमान सन्दर्भों में सूचनाओं का, आँकड़ों का सुलभता से मिलना और उसके उपयोग के बारे में सोचना, विचार करना पड़ेगा. भले ही तकनीकी माध्यमों से सूचनाएँ, आँकड़े, जानकारियाँ कितनी भी सुलभता से क्यों न उपलब्ध हो जाएँ किन्तु वे कभी भी ज्ञान का, बोध का का स्थान नहीं ले सकती हैं. अब जबकि मशीनी तकनीकी से जानकारियाँ तो उपलब्ध हो जा रही हैं मगर उनके उपयोग पर, उनके समायोजन पर, व्यक्ति के समन्वय पर, इंसानी चरित्र पर सवालिया निशान तो लग ही रहे हैं. तीव्र तकनीकी विकास के चलते जिस तरह से आज का युवा उन्मादित होकर भटकता; सोशल मीडिया के भ्रामक मायाजाल में फँसा हुआ; एकाकीपन से भरा हुआ; मानसिक अवसाद से गुजरता हुआ; तनाव से जूझता दिख रहा है तब वास्तविक गुरु की आवश्यकता और अधिक महसूस होने लगी है.

 

आज शिक्षा व्यवस्था को एक व्यावसायिक उत्पाद बना दिया गया है; शिक्षण संस्थानों को पाठ्यक्रम पूरा करवाने और डिग्री बाँटने का केन्द्र बना दिया गया है; चरित्र निर्माण, मूल्य-शिक्षा, नैतिकता, समन्वय, भावनात्मकता आदि का लोप होता दिखने लगा है तब समझ आ रहा है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने केवल सफल व्यक्ति बनाने का प्रयास किया है न कि संवेदनशील मनुष्य बनाने का. ऐसे व्यावसायिक दौर में गुरु-शिष्य का पवित्र रिश्ता विक्रेता और क्रेता के रूप में बदलता जा रहा है. कोचिंग संस्थानों, शिक्षा के बाजार ने सम्बन्धों की, रिश्तों की मर्यादा को, गरिमा को नष्ट कर दिया है. इस विकृति के बीच गुरु पूर्णिमा का पर्व मूल जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है. यह पर्व हमें इस बात का भी एहसास कराता है कि भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य को ही गुरु के रूप में नहीं स्वीकारा गया है बल्कि प्रकृति, जीव-जन्तु, घटनाओं आदि को भी गुरु रूप में स्वीकारा गया है.

 

आज के डिजिटल युग में गुरु को वेदों, शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों के ज्ञाता  के रूप में नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक, परामर्शदाता, जीवन-प्रशिक्षक की भूमिका में देखने की आवश्यकता है. समय बदलने के साथ-साथ गुरु का स्वरूप, उसकी भूमिका में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है. आज भले ही ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षण कार्य सम्पन्न होने लगा हो किन्तु यह समझना होगा कि तकनीकी प्रगति के बीच भी गुरु-शिष्य के बीच का मानवीय रिश्ता, संवेदना, नैतिक ऊर्जा का संस्कार विलुप्त न हो पाए. एक वास्तविक गुरु केवल विषयों को पढ़ाने का काम नहीं करता है बल्कि वह विद्यार्थियों के मन में उठने वाले संशयों का शमन करता है. अपने शिष्यों को सही और गलत के बीच का भेद समझा कर संकटकाल में नैतिक संबल प्रदान करता है. वर्तमान सन्दर्भों में ऐसे गुरुओं की आवश्यकता है जो तकनीकी कौशल के साथ-साथ करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व आदि जैसे मानवीय मूल्य भी सिखाएँ.

 

कह सकते हैं कि गुरु पूर्णिमा का पर्व अतीत की वंदना करने का ही नहीं बल्कि भविष्य के प्रति संकल्पित होने का दिन भी है. यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भले ही युग बदल जाए, तकनीक विकसित हो जाए, जीवन की प्राथमिकताएँ बदल जाएँ परंतु मानव जीवन में गुरु की आवश्यकता सदैव रहेगी. व्यक्ति को सही दिशा देने के लिए एक प्रकाशपुंज, मार्गदर्शक, गुरु का होना अनिवार्य है. जब तक समाज में अज्ञान, द्वेष, अहंकार, भटकाव आदि रहेगा तब तक गुरु की प्रासंगिकता भी रहेगी.