07 सितंबर 2026

बच्चों के सपने और मौत के सौदागर

दिल्ली में इमारत का गिरना किसी ढाँचे का गिरना नहीं हुआ बल्कि उन अनगिनत सपनों का विध्वंस हुआ है जो उसमें रहने वाले बच्चों की आँखों में पल रहे थे. इमारत गिरने की इस त्रासद घटना के बाद हम सबके सामने एक गम्भीर और झकझोर देने वाला प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या इस हादसे के बाद भी हम कुछ सीखने की स्थिति में हैं या फिर एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हुए अपने बच्चों के लिए किसी अन्य बड़े शहर में रहने की व्यवस्था तलाशते रहेंगे? इमारत में रहने वाले बच्चे थे, पढ़ने के लिए आये थे. उनकी आँखों में सपने थे और एक पल में ही वे सब ध्वस्त हो गए. सोच कर देखिये एक पल को कि उसी इमारत में हमारा-आपका बच्चा रहने गया होता? अब ये भी सोचिये कि पिछले कुछ सालों ने अचानक से ये भेड़चाल क्यों दिखाई देने लगी कि सबको बड़े से और बड़े की तरफ दौड़ना है, वो भी अपने जीवन को दाँव पर लगाकर? क्या हमारी यह अंधी दौड़ इतनी कीमती है कि इसके बदले में हम अपने बच्चों की ज़िन्दगी को दाँव पर लगा दें?

 

पिछले कुछ वर्षों में हमारे सामाजिक ताने-बाने और सोच में एक अजीब सी भेड़चाल देखने को मिली है. हर कोई बड़े से बड़े शहर और बड़े से बड़े संस्थान की तरफ भागना चाहता है. यह अंधी दौड़ इस हद तक पहुँच चुकी है कि लोग अपने जीवन को ताक पर रखने से नहीं हिचकिचा रहे हैं. कभी बेहतर शिक्षा के नाम पर, कभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर, कभी नौकरी के लिए की जाने वाली तैयारी के नाम पर हम अपने बच्चों को मशीन बनाते जा रहे हैं. हम उन्हें एक साधारण और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देने के बजाय उनको बहुत-बहुत बड़ा आदमी बनने के लिए, सर्वाधिक सफल व्यक्ति बनने के लिए प्रोत्साहित करने से ज्यादा एक तरह की आग में झोंक रहे हैं. बड़े से बड़े संस्थान में पढ़ाने की सनक, बड़े से बड़े शहर में रहने की जिद ने बच्चों के जीवन को एकआयामी बना दिया है, परिवारों को असंवेदित कर दिया है. कम से कम खर्च में अधिक से अधिक पा लेने की जुगाड़ में वे भविष्य की तरफ नहीं देखते हैं. ऐसे में बच्चे भी, परिवार के द्वारा की जाने वाली अनथक कोशिशों के बीच कम से कम संसाधनों में रहने को, जीवन जीने को मजबूर होते हैं.

 

ऐसा नहीं है कि छोटी जगह के बच्चों को महानगरों में, उच्च स्तरीय संस्थानों में पढ़ने का अवसर नहीं मिलना चाहिए. इसका अर्थ यह भी नहीं कि उनके प्रतिष्ठित सेवाओं में जाने का अधिकार नहीं, उनके लिए तैयारी करने का विकल्प नहीं. यहाँ भाव यह है कि आखिर इसके लिए हमारे बच्चे ही क्यों असमय काल का शिकार बनें? बहुधा होता यही है कि अभिभावक कहीं पीजी के नाम पर, कहीं हॉस्टल के नाम पर अपने बच्चों को किन हाथों में, किस सुरक्षा व्यवस्था में, किस भोजन व्यवस्था के बीच छोड़ आते हैं, उन्हें खुद पता नहीं होता है. उनका बच्चा कितना सुरक्षित है, उसकी जान कितनी सुरक्षित है इसके प्रति बहुत ज्यादा खोजबीन से ज्यादा प्राथमिकता इस बात की रहती है कि कम से कम व्यय से अधिक से अधिक सुविधाओं को बटोर लिया जाये. यहीं आकर हम माता-पिता ही अपने बच्चों के जीवन का सौदा कर आते हैं. इस सौदे में हमें सिर्फ बच्चों का सफल परिणाम चाहिए होता है. हम उसकी तैयारी के बारे में जानकारी लेते हैं, कोचिंग की जानकारी लेते हैं, उसकी परीक्षा के बारे में पूछते हैं, उसके परिणामों की चर्चा कर लेते हैं मगर कभी उसके स्वास्थ्य के बारे में, उसकी जीवन-शैली के बारे में, उसकी सुरक्षा के बारे में चर्चा भी नहीं करते हैं. विगत वर्षों में कभी बिल्डिंग में आग लगने के कारण, कभी बेसमेंट में किसी आपदा के कारण बच्चों की जान चली गई तो कभी अत्यधिक मानसिक दबाव के चलते भी हमारे-आपके बच्चों ने मौत का रास्ता अपना लिया. सोचने वाली बात है कि आखिर जरा सी भेड़चाल में नुकसान किसका हुआ?

 

हमें यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि शिक्षा के इस दौर में हमसे, आपसे और हमारे बच्चों से एक बड़ा व्यापार किया जा रहा है. कोचिंग माफिया, हॉस्टल संचालक और महानगरों के भू-माफिया इस व्यवस्था से अकूत धन कमा रहे हैं, भारी-भरकम मुनाफा ले रहे हैं. उन्हें हमारे बच्चों की जान की कोई परवाह नहीं है. ऐसी किसी भी आपातकालीन या त्रासद स्थिति में जब हादसे होते हैं तो ये तथाकथित बड़े संस्थान और व्यवस्था के व्यापारी रिश्वत और रसूख के सहारे आसानी से बच निकल जाते हैं. अंततः सब कुछ खोने वालों में सिर्फ और सिर्फ हम और आप होते हैं. जो बच्चे हमने खो दिए या जो युवा इस अंधी व्यवस्था की भेंट चढ़ गए उनकी अमूल्य जान की भरपाई दुनिया की कोई ताकत नहीं कर सकती.

 

यह समय केवल आँसू बहाने का नहीं, दोषारोपण करने का भी नहीं बल्कि गहरे आत्मसंज्ञान का है. क्या हम अपने बच्चों को इसलिए महानगरों की इन खौफनाक गलियों में भेजते हैं कि वे किसी लापरवाही की भेंट चढ़ जाएँ? क्या सफलता का पैमाना सिर्फ बहुमंजिला इमारतों में दम तोड़ते सपने होने चाहिए? यदि हमने अब भी बच्चों की जान और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी तो ऐसे हादसों पर लगाम लगने वाली नहीं है. सपनों के व्यापारी अपना व्यापार करते रहेंगे और हम-आप उनके स्वप्न-जाल में फँसकर उनका शिकार बनते रहेंगे.  

 

03 सितंबर 2026

बेटी के जन्म पर खुशियों भरा पल

समाज में फ़ैल रही नकारात्मकता के बीच ऐसी खबरें निश्चित रूप से सकारात्मकता भरा वातावरण उत्पन्न करती हैं. आवश्यकता इस तरह की खबरों को अधिक से अधिक प्रसारित करने की है, इनसे सीख लेने की है.
++




साभार : दैनिक जागरण
03.09.2026
कानपुर संस्करण

31 अगस्त 2026

लेखन को लेकर चलती उथल-पुथल

बहुत वर्षों से लेखन कार्य किया जा रहा है. सैकड़ों की संख्या में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक लेख प्रकाशित भी हुए. छोटे-बड़े समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं ने स्थान दिया. इसके साथ-साथ अनेक पुस्तकों का भी प्रकाशन हुआ. इनके द्वारा अपने जनपद में और जनपद से बाहर भी एक पहचान भी बनी. इन सबके बाद भी कई बार मन में उथल-पुथल सी मची रहती है. इसके चलते कई बार लेखन में नियमितता नहीं रह पाती है. कई मित्र समय से उनको लेख न भेज पाने के कारण टोकते भी हैं. यह हमारे लेखन के प्रति उत्प्रेरक का काम करता है. अनेक सुधिपाठक भी समय-समय पर लेखन में आये अवरोध के सम्बन्ध में जानकारी लेते रहते हैं, लिखने को प्रोत्साहित करते रहते हैं.

 

बावजूद इसके बहुत बार लगता है कि इस लेखन का अर्थ क्या है? इतने विषयों पर लिखे-प्रकाशित हो चुके लेखों का, पुस्तकों का अभीष्ट क्या है? हम अपने लेखन से लोगों को, समाज को क्या दे रहे हैं ये तो एक बात है ही, लोग, समाज हमारे लेखन से ले क्या रहा है, यह भी एक बात है. कई बार लगता है कि हमने लिखा, किसी ने प्रकाशित किया, कुछ लोगों ने पढ़ा और फिर वह लेख हमारे संग्रह का हिस्सा बन गया. खुद को अल्पकालिक ख़ुशी हुई और फिर आसपास ज्यों की त्यों स्थिति. किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं. किसी भी तरह का कोई प्रभाव नहीं. (हाँ, इक्का-दुक्का लोग ऐसे हैं जिन पर प्रभाव हुआ मगर वे कुल लेखन के अनुपात में नगण्य ही कहे जायेंगे.)

 

इधर सोशल मीडिया में, विशेष रूप से फेसबुक में लोगों की अतिशय निर्बाध सक्रियता ने सोच-समझ वाला बिन्दु ही मिटा दिया है. अब पूर्वाग्रहयुक्त मानसिकता से काम हो रहा है, उसी के अनुसार विचार बन रहे हैं, लोग प्रभावित हो रहे हैं. ऐसे समय में खुद को खुद में ही समेट लेने का मन करता है. सिर्फ स्वयं के लिए लिखना, जब मन करे तब लिखना, जो मन करे वो लिखना. न प्रकाशन का मोह, न लोगों तक पहुँचने की उत्कंठा. वैराग्य जैसा भाव समझ आता है कई बार हमें अपने भीतर.


26 अगस्त 2026

कालखण्ड परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाये

"शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम,

समय बिताने के लिए करना है कुछ काम."

इन दो पंक्तियों को बहुत से लोगों ने अपना स्वर दिया होगा बचपन में. इसकी दूसरी पंक्ति को लोग आज भी दोहराते रहते हैं कि समय बिताने के लिए करना है कुछ काम. इस काम में कभी आ जाता है सनातन धर्म, कभी आ जाते हैं हिन्दू रीति-रिवाज, कभी आ जाती हैं महिलाएँ, कभी आ जाते हैं हिन्दू धार्मिक ग्रंथ, कभी आ जाती है मनुस्मृति.

 


यहाँ एक साधारण सा प्रश्न है जो आए दिन दिमाग़ को दही करता रहता है कि आज से हज़ार
, दो हज़ार साल बाद के समाज में आज की आरक्षण व्यवस्था को लेकर संदेह जताना कितना सही होगा? उस समय ये कहना कितना सही होगा कि हज़ार, दो हज़ार साल पहले के समाज में संविधान नामक ग्रंथ में कितनी अराजक व्यवस्था थी कि एक वर्ग के लोग उच्च अंक पाने के बाद भी बाहर रहते थे और एक दूसरे वर्ग के लोग निगेटिव अंकों के बाद भी प्रवेशित हो जाते थे?

 

जिस कालखण्ड को देखा नहीं गया, जिस समय के मानव-धर्म को समझा नहीं गया, उस दौर के संवैधानिक नियमों का अध्ययन नहीं किया गया तक उस कालखण्ड को, उसके नियमन को, उसके मनीषियों को दोष देना समझ से परे है. प्रत्येक कालखण्ड की अपनी व्यवस्थाएँ रहीं हैं और उनके अनुपालन के लिए ही नियम बनाये जाते रहे हैं. याद करिए कोरोना का दौर जब एक परिवार के सदस्य आपस में एक-दूसरे को छूने से बच रहे थे. क्या ये छुआछूत वाला समाज कहा जाएगा?

 

कालखण्ड, परिस्थितियों, समाज का अध्ययन किए बिना पक्ष या विपक्ष में कुछ भी कहना एक प्रकार का पूर्वाग्रह है. ध्यान रखिए, समय बिताने के लिए भले ही कुछ काम करना पड़ा हो मगर फिर अगला काम पहले वाले के अंतिम अक्षर से ही शुरू हुआ है. याद करो उस अंताक्षरी को.

 


24 अगस्त 2026

लोलक की तरह सक्रिय न रहें

लोलक वाली घड़ी हम सबने देखी होगी. अभी भी बहुत से लोगों के घरों में होगी भी. एक बात पर गौर किया है, इस घड़ी का लोलक बराबर चलता है, क्रियाशील रहता है मगर पहुँचता किसी मंजिल पर नहीं. एक और बात पर गौर करिए कि जिस घड़ी से यह लगा होता है, उस घड़ी का समय निर्धारण करने में इसका कोई योगदान नहीं होता है. ये बस इधर से उधर डोलता रहता है. कुछ ऐसी स्थिति आरक्षण हटाओ की माँग करने वाले हमारे सक्रिय, जीवंत, ऊर्जावान, शक्तिशाली, तेजस्वी, प्रतिभावान युवा साथियों ने बना ली है. इतनी मेहनत करने का, इधर से उधर भागदौड़ करने का, लगातार सक्रिय रहने का भी तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक कि आप समय निर्धारण के योग्य नहीं हो जाते.

 



समझिये तो कि आरक्षण हटेगा कैसे? क्या-क्या संवैधानिक कदम उठाने होंगे? किस तरह की प्रक्रिया को अपनाना पड़ेगा? और भी तमाम प्रश्न हैं जो बहुत जटिल हैं, कठिन हैं. उनका समाधान किये बिना आप सबकी, हम सबकी ऊर्जा, सक्रियता इसी लोलक की तरह ही रहेगी.

 

बाकी आप सभी समझदार हैं, विचार करियेगा हमारी बात पर.