07 अक्टूबर 2026

एआई पर नियन्त्रण आवश्यक

इंसान ने सदैव ही नवोन्मेषी बनकर समाज में अपने अस्तित्व को आगे बढ़ाया है. इसके चलते श्रम को सरल बनाने के लिए मशीनों का अविष्कार किया गया. अब ऐसा दौर सामने आया है जहाँ मशीन केवल काम ही नहीं कर रही है बल्कि इंसान के दिमाग की नकल भी कर रही है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-एआई) के द्वारा ऐसा ही हो रहा है. उसके द्वारा लिखना, कलाकारी करना, गीत-संगीत रचना, प्रश्नों के उत्तर देना, निर्माण करना, अनुसंधान में सहायक होना आदि सहजता से हो रहा है. पिछले कुछ समय से एआई पर जिस तरह से इंसान की निर्भरता बढ़ी है, उसके माध्यम से जिस तरह से कार्यों का सम्पादन करवाया जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे भविष्य एआई का ही है.  

 



एआई कपोल-कल्पना का विषय नहीं है बल्कि उसने लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी जगह बना ली है. इसी में अब एआई से एक कदम आगे निकल कर एआई एजेंट सक्रिय हो गया है. यह एक ऐसा स्वायत्त सॉफ्टवेयर प्रोग्राम है जो किसी कार्य को पूरा करने के लिए स्वयं निर्णय लेता है और कार्य करता है. यह मनुष्य के हस्तक्षेप बिना कार्य करता है. एआई दुनिया की इस तेजी ने जहाँ सम्भावनाओं के अनेक द्वार खोले हैं वहीं आशंकाओं को भी खड़ा किया है. क्या इंसान ने ऐसी तकनीक विकसित कर दी है जिस पर भविष्य में उसका नियंत्रण ही न रहेगा? यह सवाल आशंका भर नहीं है. इस पर दुनिया के अनेक प्रमुख एआई वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ सार्वजनिक रूप से चेतावनी भी दे चुके हैं. इनका कहना है कि अत्यंत उन्नत एआई भविष्य में मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए जोखिम बन सकता है. इस क्षेत्र में काम कर चुके जेफ्री हिंटन, जिन्हें एआई का गॉडफादर कहा जाता है, ने गूगल छोड़ने के बाद एआई के संभावित खतरों को लेकर सार्वजनिक चेतावनी देते हुए कहा था कि जिस गति से एआई प्रणालियाँ विकसित हो रही हैं उससे उनके दीर्घकालीन परिणामों को लेकर पर्याप्त सावधानी बरतना जरूरी है. ओपनएआई कम्पनी के डेविड रॉबिन्सन ने अक्टूबर 2026 में इस्तीफा देकर कहा था कि एआई बेहद तेजी से ताकतवर हो रहा है लेकिन सुरक्षा और नियन्त्रण के सिस्टम उस रफ्तार से विकसित नहीं हो रहे हैं. इसी तरह से एन्थ्रोपिक के जैकोब कॉक्सन ने सितम्बर 2026 में एआई उद्योग छोड़ दिया. उनका कहना था कि एआई क्षेत्र में खतरनाक और अनियंत्रित सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं. बिल गेट्स ने सितम्बर 2026 में चेतावनी दी थी कि बिना नियमन के एआई गलत हाथों में पड़कर एक अरब मौतों का कारण बन सकता है. एलन मस्क भी लगातार कहते आ रहे हैं कि अत्यधिक उन्नत एआई मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है और इसे परमाणु हथियारों से भी अधिक खतरनाक माना जा सकता है. इन सम्भावनाओं के बीच एक बात बिलकुल सही है कि एआई के रूप में ऐसी तकनीक विकसित हुई है जिसकी क्षमताएँ तेजी से बढ़ रही हैं जबकि उसके प्रभावों को समझने, नियन्त्रित करने की क्षमता उतनी तेजी से विकसित नहीं हुई है.

 

देखा जाये तो एआई का सबसे बड़ा खतरा उसका गलत इस्तेमाल है. डीपफेक के माध्यम से नकली तस्वीर या वीडियो तैयार करना अब कठिन नहीं रह गया. झूठी सूचनाओं को बड़े पैमाने पर फैलाना, लोगों की मानसिकता को प्रभावित करना, साइबर हमले करना, धोखाधड़ी करना, तकनीक को हैक करना आसान हो गया है. सम्भव है कि भविष्य में एआई द्वारा इन कामों को और अधिक प्रभावी बना देने से व्यक्तिगत निजता, राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने चुनौतियाँ खड़ी हो जाएँ. यदि एआई प्रणालियाँ, एआई एजेंट भविष्य में स्वायत्त हो गए, अपने लक्ष्य तय करने, रणनीति बनाने, संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम हो गए तो यह कहना कठिन होगा कि वे मानव हितों के अनुरूप ही कार्य करेंगे. इसी बिन्दु पर आकर विशेषज्ञ सजग होने की बात करते हैं, चेतावनी देते हैं. ऐसी स्थिति में सरकारों, तकनीकी कम्पनियों, विशेषज्ञों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. एआई को बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. एआई प्रणालियों के लिए पारदर्शिता, परीक्षण, जवाबदेही, सुरक्षा आदि के स्पष्ट नियम होने चाहिए ताकि भविष्य में न केवल इंसानों के लिए बल्कि तकनीक, उद्योग, राष्ट्रीय सुरक्षा, चिकित्सा, अन्तरिक्ष, विमानन, बैंकिंग आदि-आदि क्षेत्रों में खतरनाक स्थितियाँ उत्पन्न न हो सकें. 

 

इन सबके बाद भी एआई को लेकर भय का वातावरण नहीं बनाया जाना चाहिए. इसकी सहायता से असाध्य-गम्भीर रोगों की पहचान हुई है; नई दवाओं का विकास हुआ है; कृषि, जलवायु, पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी बेहतर हुई है; विज्ञान-प्रौद्योगिकी-चिकित्सा-रक्षा-शिक्षा-उद्योग आदि क्षेत्रों में नए रास्ते खुले हैं. सवाल यह होना चाहिए कि एआई का विकास किस रूप में हो? इंसान ने आग, बिजली, परमाणु ऊर्जा, इंटरनेट आदि शक्तिशाली तकनीकें विकसित की हैं और इनके अनियंत्रण ने समाज में विध्वंस फैलाया है. एआई को इससे आगे निकल कर समझने की आवश्यकता है क्योंकि इसके द्वारा ऐसी प्रणालियाँ विकसित हो रही हैं जो इंसानी बौद्धिक क्षमताओं से आगे निकल रही हैं. भविष्य में एआई इंसानों को खत्म करेगी या मानव जीवन को बेहतर बनाएगी, इसका उत्तर आज किसी के पास निश्चित रूप से नहीं है. लेकिन एक बात तय है कि इसका भविष्य प्रयोगशालाओं में निर्धारित नहीं होगा. यदि इसका उपयोग स्वार्थ, राजनीतिक नियंत्रण, युद्ध, दुष्प्रचार, अपराध आदि के लिए होगा तो निश्चित रूप से इसका भविष्य भयावह होगा किन्तु यदि इसको मानवीय विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, जनहित में लगाया गया तो यह तकनीक क्रांतिकारी उपलब्धि बन सकती है.

 

आज हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि जिस बुद्धिमत्ता को हम कृत्रिम रूप दे रहे हैं उसके लिए हम अपनी प्राकृतिक बुद्धिमत्ता को न खो दें. एआई से डरने का समय नहीं, उसके प्रति निश्चिन्त होने का भी समय भी नहीं बल्कि उससे सावधान रहने का समय है. उसके पूर्णतः विकसित होने, पूर्णतः स्वतंत्र होने से पहले उसके नैतिक परिणामों पर गम्भीरता से विचार करने का समय है. वर्तमान में वास्तविक समय और मूल प्रश्न तकनीक का नहीं बल्कि उसके नियंत्रण का है.


27 सितंबर 2026

ताई बाई का जालौन स्थित महल गिरा

खबर सुनने को मिली है कि ताई बाई के जालौन स्थित महल का एक बड़ा हिस्सा गिर गया है.
बहुत से लोग ताई बाई को ही नहीं जानते होंगे. बहुतों ने उनके बारे में सुना ही नहीं होगा. वे 1857 की क्रांति की एक महान वीरांगना और प्रथम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं.

सोचने वाली बात ये है कि हम लोग अपने पूर्वजों के प्रति, अपने बलिदानियों के प्रति सम्मान का भाव क्यों नहीं रख पा रहे हैं? क्यों उनके प्रति उदासीन बने रहते हैं? अब कुछ दिन मीडिया में आने के लिए उनके क्षतिग्रस्त महल को लेकर स्यापा होगा और फिर सबकुछ वैसे ही शांत हो जाएगा, जैसे उनकी प्रतिमा स्थापित करने वाले मुद्दे पर हुआ.



25 सितंबर 2026

वोट चोरी का अनर्गल आरोप

देश में कोई पहली बार तो SIR हो नहीं रहा है. पहला विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) सन 1952 के आम चुनाव के दौरान किया गया था.


अबकी बार इतने विरोध का कारण क्या है?


यदि ज्ञानेश कुमार ने अपने दम पर भाजपा के विरोधी मतदाताओं के नाम कटवा दिए तो ऐसे व्यक्ति को विशेष सुरक्षा देकर किसी बड़े काम में लगाना चाहिए क्योंकि यह तो त्रिकालदर्शी हुआ. यह तो मतदाता सूची पढ़कर ही बता देता है कि कौन भाजपा को वोट करेगा, कौन नहीं करेगा. अरे, दिमाग से पैदल लोगो, एक बात पर गौर करो कि SIR के लिए सम्बंधित लोगों की जानकारी को क्या ज्ञानेश कुमार ने अपने घर पर भर दिया? जानकारी देते समय सभी से, तुम विरोधियों से भी, तुम्हारे बाप-अम्मा, दादा-दादी, नाना-नानी आदि-आदि की जानकारी लेकर क्या गलत किया जा रहा?


रही बात वोट चोरी की तो ज्ञानेश कुमार तो आये फरवरी 2025 में और तुम लोग चुनाव हार रहे 2014 से. अब SIR तुमको इसलिए बेकार लग रही, काहे कि अवैध वोटर कट गए, वे बाहर हो गए, जिनको अपने बाप-दादा का पता नहीं. जिन अवैध घुसपैठियों को तुम सबने अपना बाप बना रखा था, उनके भागने की स्थिति बनते देख तुमको देश का सिस्टम बेकार लगने लगा.


दिमाग लगाना सीखो, न कि आरोप.

 


24 सितंबर 2026

सेवा संकल्प अभियान को लेकर उत्साह नहीं

भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सेवा और समर्पण के 25 वर्षों को संदर्भित करते हुए 'सेवा संकल्प अभियान' का आयोजन किया जा रहा है. यह मोदी जी के जन्मदिन 17 सितम्बर से शुरू होकर पूरे एक माह अर्थात 17 अक्टूबर तक चलना है. इस अभियान के आयोजन हेतु उत्तर प्रदेश में सरकार के स्तर से निर्देश जारी किये गए हैं. इस आयोजन में शासन-प्रशासन पूरी तत्परता के साथ जुटा हुआ है. शिक्षा संस्थानों, गैर-सरकारी संस्थाओं आदि पर एक तरह से कार्यक्रम थोप दिया गया है. ठीक है, भाजपा द्वारा अपने एक वरिष्ठ व्यक्ति के सम्मान में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, इसे लेकर कोई तर्क-वितर्क नहीं करेंगे क्योंकि घर-परिवार की तरह पार्टियाँ भी अपने पदाधिकारियों को, अपने वरिष्ठजनों के सम्मान में कुछ न कुछ करती रहती हैं.

 



इस बात में दोराय नहीं कि मोदी जी बहुत ही गम्भीरता और गहराई से जनता के मनोभावों को समझे हुए हैं. राजनीति के जो भी कदमताल हैं, उनसे भी वे भली-भांति परिचित हैं. यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर हमें जो बात खटक रही है, वो यह कि ऐसी स्थिति के बाद भी मोदी जी की सहमति इस अभियान के लिए है. इधर विगत कुछ समय से जिस तरह से मोदी-विरोध का माहौल बना हुआ है, उसके चलते मोदी जी की छवि से लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है. ऐसे में मोदी जी को स्वयं ही अपने जन्मदिन पर सम्बंधित लोगों को ससम्मान इस अभियान को स्थगित करने के लिए निर्देशित करना चाहिए था. मोदी जी को यहाँ स्वतः संज्ञान लेते हुए इस कारण से इस अभियान को स्थगित करना चाहिए था क्योंकि इस महीने भर के कार्यक्रम में पूरा सरकारी तंत्र तो व्यस्त है ही, इसके साथ-साथ शिक्षण संस्थानों के भी व्यस्त बने रहने की सम्भावना है.

 

भाजपा द्वारा, उसके पदाधिकारियों द्वारा इस अभियान को लेकर भले ही कुछ भी कहा जाये मगर वास्तविकता यह है कि इस अभियान से न केवल पार्टी की बल्कि मोदी जी की, योगी जी की छवि को धक्का लगा है. भाजपा को, ऐसे अभियान को बनाने वालों को विचार करना था कि इस देश ने कोरोना काल में मोदी जी के कहने पर शंख-थाली बनाये थे; दिए जलाये थे; और भी अनेक अवसरों पर मोदी जी के विचारों का सम्मान किया गया. अब जबकि विपक्षियों द्वारा उनके विरोध में माहौल निर्मित किया जा रहा है, उसमें ऐसे कार्यक्रम सहयोगी ही बनते नजर आ रहे हैं. कुछ समय पहले वैश्विक संकट के समय में मोदी जी द्वारा पेट्रोल-डीजल की कम से कम खपत करने को कहा गया था और यहाँ ढाई सौ मोटरसाइकिल वाराणसी से बड़नगर तक की यात्रा पर निकली हैं.

 

जबरिया थोपे गए से कार्यक्रमों को लेकर भले ही कोई सामने कुछ न कहे, सार्वजनिक रूप से कुछ न बोले मगर अंदरूनी रूप में इससे लोग खुश नहीं हैं. हाँ, कुछ तानाशाह मानसिकता वाले उच्चाधिकारियों को, संस्था प्रमुखों को अपनी भड़ास निकालने का मौका अवश्य मिल गया है.

 


21 सितंबर 2026

मंचीय राहुल की अशालीनता

विगत कुछ समय से महसूस हो रहा है जैसे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी राजनीतिक विमर्श से अधिक मंचीय विमर्श में विश्वास करने लगे हैं. उनके कार्यक्रम में खुला मंच, किसी कलाकार की तरह से उनकी उपस्थिति और फिर उसके बाद राजनीतिक मुद्दों को छोड़ बाकी सब. उनके द्वारा जनहित चर्चा की जाती सी नजर आती है मगर उसके पीछे हाव-भाव, भाषा-शैली आदि अमर्यादित, अशालीन रूप में होती है. ऐसा वे अनजाने में नहीं करते, अचानक से ऐसा नहीं होता, एक-दो बार भी ऐसा नहीं होता बल्कि पूरी योजना के साथ लगभग प्रत्येक कार्यक्रम में ऐसा किया जाने लगा है.

 

अभी इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम में एक हास्य कलाकार को बुलाकर मोदी जी की मिमिक्री करवाना, राहुल गांधी का पूरी सक्रियता से सहयोग करना विवाद उत्पन्न करने वाला कृत्य नहीं होता यदि वह मिमिक्री फूहड़ता के स्तर तक न पहुँचती. यह बात अपने आपमें अजीब ही है कि छात्रों के मुद्दों के नाम पर नेता प्रतिपक्ष के मंच पर एक हास्य कलाकार न केवल प्रधानमंत्री की मिमिक्री करे बल्कि प्रधानमंत्री की ओर से किसी कार्यक्रम में एक बुजुर्ग महिला को कुर्सी देने के आग्रह को भी निहायत भोंड़ेपन से प्रदर्शित करे. यह समझा जा सकता है कि राजनीति में अपने विरोधियों के बयानों का, उनकी नीतियों का, उनकी कार्यशैली का विरोध किया जाये, उन पर कटाक्ष किया जाये मगर यह समझ से परे है कि किसी बुजुर्ग महिला को कुर्सी दिलवाने वाली बात का फूहड़ता से मजाक बनाया जाये; उसे सेटिंग जैसी शब्दावली के साथ प्रस्तुत किया जाये.

 



राजनीतिक क्षेत्र में इन दिनों भाषाई, चारित्रिक, नैतिक गिरावट लगातार देखने को मिल रही है लेकिन नेता प्रतिपक्ष के मंच से ऐसा होना राजनीति के तेजी से गिरते जा रहे स्तर को प्रदर्शित करता है. यह स्तरहीनता न केवल राजनीति को फूहड़ बना रही है बल्कि समाज से संवेदनशीलता को समाप्त कर रही है. देखा जाये तो राहुल गांधी के मंच से ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. उनकी तरफ से प्रधानमंत्री सहित अनेक उच्च पदस्थ लोगों पर अमर्यादित भाषाई हमला करना, सरकार की नीतियों का अशालीन रूप से मजाक बनाना आम बात है. जनमानस को भली-भांति याद होगा, कुछ समय पहले इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी का अमर्यादित ढंग से उल्लेख उनके मंच से ही किया गया था.

 

यहाँ विचारणीय ये होना चाहिए कि आखिर राजनीति में अब अशालीन भाषा, अमर्यादित आचरण, फूहड़ हाव-भाव, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप को स्थान क्यों मिलने लगा है? क्या संविधान के अनुच्छेद 19 में मौलिक अधिकार के रूप में अभिव्यक्ति की आज़ादी को रखने का ये दुष्परिणाम है? संविधान के अनुच्छेद 19(1)(A) में सभी भारतीय नागरिकों को वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है. यहाँ वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ एक भारतीय नागरिक द्वारा लिखकर, बोलकर, छापकर, इशारे से या किसी अन्य तरीके से अपने विचारों को व्यक्त करने से है. यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) में उन सीमाओं का भी उल्लेख है जिनके द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कुछ हद तक प्रतिबन्ध लगाया गया है तथापि आये दिन नेताओं द्वारा इसका अतिक्रमण किया जाता है. वे भूल जाते हैं कि संविधान ने उनको अभिव्यक्ति की आज़ादी इसके लिए दी है कि वे सरकार की निरंकुशता पर सवाल उठा सकें, जनता के विरुद्ध होने वाले कार्यों का विरोध कर सकें, लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हनन करने वालों के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर सकें. इन मूल बातों को भुलाकर उनके द्वारा व्यतिगत आक्षेप लगाये जाने लगते हैं, एक-दूसरे के निजी जीवन को सार्वजनिक रूप से कलंकित किया जाने लगता है.

 

हाल के दिनों में आरोप-प्रत्यारोप का, बयानबाजी करने का, सार्वजनिक सभाओं के साथ-साथ सदन में बोलने का स्तर गिरता ही नजर आया है. पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले धरना प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री को न केवल सार्वजनिक रूप से अश्लील गालियाँ दी गईं बल्कि उसके पोस्टर तक भी प्रदर्शित किये गए. इन भद्दी और अश्लील गालियाँ देने वालों में लड़के-लड़कियाँ, दोनों ही शामिल रहे. उनके इस अशालीन और फूहड़ कृत्य को हल्का-फुल्का मजाक कहा गया, कुछ लोगों द्वारा तो इसे जेन-जी की ताकत बताते हुए उनकी सहज अभिव्यक्ति बताया गया. कहने का तात्पर्य यह कि सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज को भी इसके चलते स्वीकार्यता प्रदान कर दी गई क्योंकि ऐसा राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री के खिलाफ, किसी नेता के खिलाफ, किसी दल विशेष के खिलाफ ऐसा किया जा रहा था. इस तरह की सोच, ऐसे कृत्य राजनीति के बिगड़ते स्वरूप को और विषाक्त बना रहे हैं. इसमें सभी दलों का योगदान है, किसी का कम तो किसी का ज्यादा. राजनीतिक दल अब विरोधी दल को प्रतिस्पर्धी के बजाय शत्रु के रूप में देखने लगे हैं. उनके बीच का यह शत्रुभाव अब समाज में भी प्रवेश करने लगा है.

 

राहुल गांधी के मामले में ऐसा लग रहा है जैसे लम्बे समय से सत्ता की परिधि से दूर होने के कारण, तमाम तरह के चुनावों में लगातार मिलती पराजय से वे सही और गलत का निर्णय करना भूल गए हैं. उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि वे देश के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार के सदस्य हैं; एक बहुत पुराने दल के नेता हैं इसके साथ ही नेता प्रतिपक्ष हैं. उनके द्वारा उपयोग की जाने वाले अशालीन भाषा, घटिया शब्दावली तात्कालिक तालियाँ बजवा दे, सस्ती लोकप्रियता हासिल करवा दे किन्तु इससे न केवल लोकतान्त्रिक मर्यादा का हनन होता है बल्कि देश की छवि को भी धक्का लगता है. ऐसे में हाल-फिलहाल भले ही राहुल गांधी खुले मंच से भाषाई, व्यावहारिक, सामाजिक मर्यादा को तिलांजलि देते नजर आ रहे हों किन्तु व्यापक रूप में यहाँ सभी राजनैतिक दलों को, सभी जिम्मेवार राजनैतिक व्यक्तियों को आपसी सामंजस्य बनाकर विचार करना होगा कि कैसे राजनीति में भाषा की, व्यवहार की शालीनता बनी रहे.