16 January 2022

तुमसे अब ऐसे ही मिलना हुआ करेगा

अभी तक तो हम तुमको देख पा रहे थे, भले ही पार्थिव रूप में. आज एक साल होने को आया जबकि हमने तुमको पञ्चतत्त्व में विलीन कर दिया. जिस किसी भी, भले ही वह तुम्हारा निर्जीव रूप था, तुमको देख रहे थे मगर आज के बाद तो तुमको देख भी नहीं सके, तुमको छू भी नहीं सके. हम तो उस दिन तुमको छूने में भी संकोच कर रहे थे. समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह के तुमको स्पर्श करें? उस दिन तो कोई आशीर्वाद भी तुम तक नहीं पहुँच रहा था. कोई आवाज़ भी तुम नहीं सुन रहे थे. दीपू ने कितनी बार कहा हमसे कि भाई जी मिंटू को बोलो कि उठे, मगर तुम किसी की सुन ही कहाँ रहे थे. तुम तक हमने बहुत बार हाथ बढ़ाया, बहुत बार तुमको छुआ मगर तुमने कोई जवाब नहीं दिया. तुमको उस दिन उठना ही नहीं था, तुम उठे भी नहीं.


कितनी बड़ी सजा है ये कि तुमको किसी दिन अपने कंधों पर उठाने वाले, तुमको खिलाने वाले उस दिन भी तुमको अपने कंधों पर लिए जा रहे थे मगर सबकी आँखों में आँसू थे. वे सब उस दिन खुश नहीं थे, हँस नहीं रहे थे. उस दिन गिरते-पड़ते हमने भी कुछ कदम तुमको अपने कंधे पर बिठाया था, ये सोच कर कि शायद तुम उठ बैठो मगर तुम न उठे. हम जानते थे कि तुमको अब नहीं उठाना है फिर भी खुद को धोखा देने का काम कर रहे थे. तुम उस धोखे में नहीं आये. तुम नहीं उठे.


बहरहाल, उस दिन को, उस बहुत बुरे दिन को आज एक साल हो गए हैं मगर ऐसा लगता है जैसे आज, अभी इसी समय की बात हो. एक पल भी तुम्हारे बिना नहीं गुजारा हमने. लोग पागल कह सकते हैं हमें, यदि उनको बताया जाये. कहने को कुछ भी कहा जाये मगर आज एक साल बाद भी एक सेकेण्ड तुम्हारे बिना नहीं गुजरा हमारा. आज पिंटू इंदौर में थे तो वो टिंकू, रश्मि और विक्रम सहित उज्जैन हो आये. तुम उज्जैन जाते रहते थे, रश्मि की भी ऐसी इच्छा थी. अब तुम हम सबके बीच या कहें कि तुम्हारे साथ हम सभी लोग इसी तरह बस संस्कारों के माध्यम से आते रहेंगे.







तुमको बार-बार आशीर्वाद, जहाँ रहो खुश रहो, सुखी रहो.

14 January 2022

एक पल जो वहीं ठहर गया


14 जनवरी को आना ही था, इसे न तो इस बार रोका जा सकता था और न ही पिछले साल रोका जा सका. समय को रोकना अपने हाथ में होता तो शायद समय आगे ही बढ़ पाता. कई बार समय का बढ़ना सुखद लगता है मगर बहुत बार समय का रुक जाने की कल्पना करना सुखद एहसास देता है. समय भले ही न रुकें मगर बहुत से पल होते हैं जो अपनी जगह रुके रह जाते हैं. समय के साथ सबकुछ आगे बढ़ता रहता है, बस वे पल ही आगे नहीं बढ़ते हैं. ऐसे ही बहुत सारे पलों में तुम भी शामिल हो गए हो. अब समय तो पिछले साल से यात्रा करते हुए आज की तारीख तक आ पहुँचा है मगर तुम अभी भी उसी पल के साथ रुके हुए हो. लाख कोशिशों के बाद भी तुमको उस पल से एक पल आगे न ला सके.


अब समय चल रहा है, हम सब चल रहे हैं, सबकुछ बढ़ रहा है, सबके साथ गति है बस तुम नहीं हो. तुम उसी एक पल के साथ रुक गए हो. हम अपने साथ तुमको लेकर चल तो रहे हैं मगर तुम न चल रहे हो. अब तुम्हारी यादें साथ चलती हैं, तुम्हारी बातें साथ चलती हैं, तुम्हारी शरारतें साथ चलती हैं. कितना कठिन हो जाता है तुम्हारे बिना एक कदम आगे बढ़ाना. दिल-दिमाग में सनसनाहट होती रहती है यही विचार करके कि चारों तरफ सबकुछ है बस तुम नहीं हो.


खैर, ये कौन सी इस एक दिन अकेले की कहानी है, ये कौन सा इसी एक जनवरी का हाल है, ऐसा पिछले साल भर से रोज हो रहा है, हर पल में हो रहा है. लोग कहते हैं कि समय हर तरह के घावों को भर देता है मगर हमें लगता है कि कुछ घाव समय के साथ भी नहीं भरते. ये एक दर्द है, एक घाव है जो आजीवन साथ रहेगा, ताउम्र साथ चलेगा. हर पल में दर्द देगा, हर बात पर आँसू लाएगा. इसके बाद भी जीवन इसी के साथ चलेगा, तुम्हारे बिना तुमको साथ लेकर चलेगा.


ढेरों आशीर्वाद, जहाँ रहो सुखी रहो, खुश रहो.

11 January 2022

आखिर शास्त्री जी के साथ क्या हुआ था?

11 जनवरी, देश के दुर्भाग्य की तारीख. इस दिन देश के लाल ने विदेशी धरती पर अंतिम साँस ली थी. जी हाँ, आप सही समझ रहे हैं. देश के दूसरे और अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में ही ये बात कही गई. वर्ष 1966 को ताशकंद किस कारण से शास्त्री जी का जाना हुआ, वहाँ समझौते के बाद की उनकी गतिविधियाँ क्या रहीं, रात को कैसे भगदड़ मची इस बारे में बहुत बार वही सामान्य सी बात लिखी जा चुकी है, हम सभी के द्वारा बराबर पढ़ी भी जाती रही है. किसी भी सरकार की तरफ से शास्त्री जी की सामान्य और असामान्य मृत्यु के बीच की बारीक सी रेखा न मिटाई जा सकी, झीना सा पर्दा गिराया न जा सका. ऐसा क्यों होता रहा, क्यों हुआ ये बस सवाल बने हुए हैं मगर इनके जवाब मिलते न तब दिखे थे और न अब दिख रहे हैं.


शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़े तमाम सारे मुद्दों, पहलुओं को अत्यंत नजदीक से अध्ययन करने वाले अनुज धर कुछ समय पूर्व आई विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स से बहुत आशान्वित दिखाई दे रहे इसके पीछे वे अमेरिका की एक फिल्म का हवाला देते हैं, जिसके आने के बाद से अमेरिका में खलबली मच गई थी. यह फिल्म जॉन एफ. कैनेडी की हत्या से सम्बंधित तमाम दावों पर आधारित थी. बताया जाता है कि इस फिल्म के आने के बाद अमेरिका में कैनेडी की हत्या की सच्चाई जानने के लिए लोगों का दबा आक्रोश बाहर निकल आया था. ‘द ताशकंद फाइल्स फिल्म के आने के बाद ऐसा कुछ भारत देश में तो दिखाई नहीं दिया. क्या इसलिए कि यहाँ कि जनता वास्तविक जीवन पर बनी ऐसी फिल्मों को भी मनोरंजन की दृष्टि से देखती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यहाँ फिल्मों का सम्बन्ध नाचने-गाने से जोड़ दिया गया है? कहीं ऐसा भी तो नहीं कि फिल्मों का तात्पर्य कमाई करना, करोड़ों रुपयों के क्लब में शामिल होना बना हुआ है? या फिर देशवासी शास्त्री जी की मृत्यु का सच जानने के इच्छुक नहीं?




इस फिल्म की बात को एक तरफ कर भी दिया जाये तो ऐसा सच जान पड़ता है कि आम भारतीय नागरिक अब किसी भी रूप में देश की दो संदिग्ध मौतों के खुलासे के लिए लालायित नहीं है. उसे इसकी फ़िक्र नहीं कि देश के दो अत्यंत लोकप्रिय व्यक्तित्वों की मृत्यु का सच सामने आये. शास्त्री जी की तरह ही नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का सच अभी भी परदे के पीछे छिपा हुआ है. बहरहाल, आज चर्चा शास्त्री जी की. एक पल को सोचिये कि देश का प्रधानमंत्री देश से बाहर किसी समझौते के लिए जाए और वहाँ से उसका जीवित आना न हो. मृत्यु भी सामान्य सी स्थिति में न हुई हो. उस व्यक्ति का पार्थिव शव जब विदेश से अपनी धरती पर लाया जाये तो उसका पोस्टमोर्टेम न करवाया जाये. शव भी देखने में सामान्य न समझ आ रहा हो. ऐसी तमाम स्थितियों के बाद सबकुछ सामान्य तरीके से गुजर गया. इतने वर्षों के बाद भी शास्त्री जी के परिजन कैसे अपने दिल को समझाते होंगे? कैसे उस समय में देश की सरकार ने चुप्पी साध ली होगी? कैसे अभी तक तमाम सरकारें ख़ामोशी बनाये बैठी हैं?


और भी बहुत सारे सवाल हैं जो मन को व्यथित कर जाते हैं. दिल-दिमाग में उथल-पुथल उस समय और बढ़ जाती है जबकि अनुज धर की पुस्तक ‘शास्त्री के साथ क्या हुआ था? में दिए गए तथ्यों, विचारों, रिपोर्टों, बयानों आदि को गंभीरता से पढ़ा जाता है. पृष्ठ दर पृष्ठ बहुत कुछ सामने आता रहता है. चूँकि किसी भी पुस्तक के साथ वैधानिकता का सवाल जुड़ा होता है, ऐसे में उस पुस्तक के अंश यहाँ दे पाना हमारे लिए सहज नहीं. इसके बाद भी कह सकते हैं कि अनुज धर ने बहुत से तथ्यों के आलोक में बहुत सी स्थितियों को स्पष्ट किया है. बहुत से उपायों, कदमों की भी सम्भावना व्यक्त की है.


फिलहाल तो हम सभी शास्त्री जी को बस श्रद्धांजलि ही दे सकते हैं. सच कितना क्रूर हो सकता है, ये तो उसी समय पता चलेगा जबकि झीना सा पर्दा गिरे या फिर वो बारीक सी रेखा मिटे.

09 January 2022

सिर्फ ऐतिहासिक उपन्यासकार ही नहीं थे वृन्दावन लाल वर्मा जी

आज प्रसिद्द उपन्यासकार वृन्दावन लाल वर्मा जी का जन्मदिन है. उनका जन्म आज ही के दिन १८८९ उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के मऊरानीपुर को हुआ था. वृन्दावन जी को मुख्य रूप से ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में जाना जाता है. बहुत से कम लोगों को ये जानकारी है कि उन्होंने सामाजिक उपन्यास भी कम नहीं लिखे हैं. ऐसा होना निश्चित रूप से उनकी लेखकीय प्रतिभा का पूरा सम्मान नहीं है. उनको ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में स्वीकारने का मुख्य कारण उनके दो प्रमुख उपन्यास ‘गढ़ कुंडार और ‘मृगनयनी भी हैं. आम लोगों ने उनको इसी कारण से विशुद्ध ऐतिहासिक लेखक या कहें कि उपन्यासकार के रूप में जाना है.




इस पोस्ट का उद्देश्य वृन्दावन लाल वर्मा जी के बारे में यही जानकारी देनी है कि वे मात्र ऐतिहासिक लेखक नहीं हैं, न ही वे विशुद्ध उपन्यासकार हैं बल्कि उन्होंने उपन्यास के अलावा अन्य कृतियों की भी रचना की है, ऐतिहासिक कृतियों के अलावा सामाजिक कृतियाँ भी साहित्य जगत को दी हैं. जब ये उन्नीस साल के किशोर थे तो इन्होंने अपनी पहली रचना ‘महात्मा बुद्ध का जीवन चरित’(१९०८) लिख डाली थी। उनके लिखे नाटक ‘सेनापति ऊदल’(१९०९) में अभिव्यक्त विद्रोही तेवरों को देखते हुये तत्कालीन अंग्रजी सरकार ने इसी प्रतिबंधित कर दिया था. सन १९२० ई० तक छोटी-छोटी कहानियाँ लिखते रहे. इन्होंने मुख्य रूप से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास, नाटक, लेख आदि गद्य रचनायें लिखी हैं साथ ही कुछ निबंध एवं लधुकथायें भी लिखी हैं. उनकी रचनाओं को यहाँ सामान्य परिचय के रूप में यहाँ आप सबकी जानकारी के लिए दिया जा रहा है.


ऐतिहासिक उपन्यास

  • गढ़ कुंडार (1930 ई.)
  • टूटे काँटे (1945 ई.)
  • झाँसी की रानी (1946 ई.)
  • महारानी दुर्गावती
  • मुसाहिबजू (1946 ई.)
  • कचनार (1947 ई.)
  • मृगनयनी (1950 ई.)
  • माधवजी सिंधिया (1950 ई.)
  • रामगढ़ की रानी (1950 ई.)
  • भुवनविक्रम (1957 ई.)
  • ललितादित्य
  • अहिल्याबाई
  • देवगढ़ की मुस्कान


सामाजिक उपन्यास

  • प्रत्यागत (1927 ई.)
  • संगम (1928 ई.)
  • प्रेम की भेट (1928 ई.)
  • कुंडलीचक्र (1932 ई.)
  • कभी न कभी (1945 ई.)
  • अचल मेरा कोई (1948 ई.)
  • सोना (1952 ई.)
  • अमरबेल (1953 ई.)
  • सोती आग
  • डूबता शंखनाद
  • लगन
  • उदय किरण
  • अमर-ज्योति
  • कीचड़ और कमल
  • आहत


नाटक

  • धीरे-धीरे
  • राखी की लाज
  • सगुन
  • जहाँदारशाह
  • फूलों की बोली
  • बाँस की फाँस
  • काश्मीर का काँटा
  • हंसमयूर
  • रानी लक्ष्मीबाई
  • बीरबल
  • खिलौने की खोज
  • पूर्व की ओर
  • कनेर
  • पीले हाथ
  • नीलकण्ठ
  • केवट
  • ललित विक्रम
  • निस्तार
  • मंगलसूत्र
  • लो भाई पंचों लो
  • देखादेखी


कहानी संग्रह

  • दबे पाँब
  • मेढ़क का ब्याह
  • अम्बपुर के अमर वीर
  • ऐतिहासिक कहानियाँ
  • अँगूठी का दान
  • शरणागत
  • कलाकार का दण्ड
  • तोषी


निबन्ध

  • हृदय की हिलोर 

 

06 January 2022

कुछ है जो असंतुलित किये है

कभी-कभी सब कुछ सही सा दिखने के बाद भी कुछ सही सा नहीं लगता है. अपने आपमें ही ऐसा महसूस होता रहता है जैसे बहुत कुछ छूट सा रहा है, बहुत कुछ अनचाहा सा हो रहा है. कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? वैसे देखा जाये तो कभी-कभी ही क्यों ऐसा हर बार होता है जबकि समझना कठिन होता है कि ये बहुत कुछ अनचाहा सा क्यों हो रहा है. मन की, तन की साम्यावस्था बनाये रखना बहुत कठिन हो जाता है. मन और तन का आपसी तालमेल न बैठ पाने के कारण किसी काम को करने की मनःस्थिति भी नहीं बन पाती है. मन कुछ करना चाहता है, दिल कुछ कहता है और देह कुछ और करने लगती है. इस असंतुलन को संतुलित कर पाना बहुत ही मुश्किल काम होता है.


हर बार ऐसी स्थिति के बाद कोई ठोस और कठोर निर्णय लेने का मन करता है मगर संभवतः असंतुलन की स्थिति किसी एक स्थायी निर्णय पर भी नहीं पहुँचने देती है. कई बार लगता है किसी मशीन की तरह, किसी कंप्यूटर की तरह दिल-दिमाग को अपडेट किया जा सकता. किसी तकनीक के द्वारा फॉर्मेट किया जा सकता अपनी मेमोरी को, अपनी स्मृति को. वाकई, यदि मन को, दिल को, दिमाग को किसी कंप्यूटर की तरह फॉर्मेट किया जा सकता, किसी सॉफ्टवेयर की तरह अपडेट किया जा सकता, उसको असामान्य स्थिति होने पर अनइनस्टॉल, इनस्टॉल किया जा सकता. अफ़सोस ऐसा कुछ इंसानी शरीर के साथ, उसके दिल-दिमाग के साथ नहीं किया जा सकता है.


ऐसा न हो पाने के कारण तमाम उलझनों का बोझ उठाये बस चलायमान रखा जा रहा है. खुद को कर्तव्य पथ पर सक्रिय बनाये रखा जा रहा है. ये भी समझ से परे है कि खुद को काम में लगाए हुए हैं अथवा काम में उलझे होने का बहाना बनाये हुए हैं?




04 January 2022

साहित्यिक सामग्री की खुलेआम चोरी

Faculty Induction Programme का एक सप्ताह निकल चुका है। इस दौरान बहुत से विद्वानों ने आकर विभिन्न विषयों पर अपना व्याख्यान दिया। उनके अनुभवों, उनके कार्यों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। कुछ ऐसे विषयों से भी परिचय हो रहा है जो कि जानकारी मे तो थे किन्तु उसने प्रति बहुत ज्यादा सजगता नहीं थी। विषयों में साहित्यिक चोरी (Plegarism) और उद्धरण (Citation) को लिया जा सकता है। विगत कुछ वर्षों से इन दोनों विषयों पर जोर-शोर से बात हो रही है, इसके बारे में शोध-कार्यों मे बताया, समझाया जा रहा है मगर स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही थी। वर्तमान में चल रहे Faculty Induction Programme में आए वक्ता द्वारा इस पर विस्तार से प्रकाश डाला  गया। उनके द्वारा समझाया गया कि किस तरह शब्दों की चोरी भी व्यक्ति के कैरियर को नुकसान पहुँचा  सकती है।


यहाँ देखने में आ रहा है कि जबसे यू जी सी द्वारा शोध और शिक्षण को एकसाथ जोड़कर किसी भी प्राध्यापक के लिए अनिवार्य सा कर दिया है, उसी समय से प्राध्यापकों पर एक तरह का दवाब बढ़ गया है। अब उनके द्वारा शिक्षण कार्य के साथ-साथ शोध-कार्य करवाए जाने का, रिसर्च पेपर लिखने का भी दवाब है। ऐसी स्थिति में बहुत से लोग ऐसे हैं जो इधर-उधर की जुगाड़ से रिसर्च पेपर लिखने मे लग गए हैं। ऐसे लोग ही सामग्री की चोरी करने मे सबसे आगे होते हैं। सामग्री की चोरी के साथ-साथ उद्धरण का लगाया जाना या कहें कि उसकी चोरी रोकने के भी अनेकानेक नियम बने हुए हैं मगर शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग इन नियमों को एक किनारे लगाकर खुलेआम चोरी करने मे लगे हुए हैं। 

02 January 2022

साइबर क्राइम से बचा जा सकता है

साइबर अपराध या साइबर क्राइम आज एक प्रचलित शब्द है. आखिर ये साइबर अपराध क्या है? सहज शब्दों में कहें तो इंटरनेट का उपयोग करके कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के द्वारा किया गया कोई भी गैर-कानूनी कार्य साइबर अपराध है. इसके द्वारा एक व्यक्ति मोबाइल, कंप्यूटर आदि के द्वारा इंटरनेट का उपयोग करके किसी दूसरे व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी करके गैर कानूनी तरीके से किसी भी कार्य को करता है तो उस व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य साइबर अपराध कहलाता है. ऐसे कार्य करने वाले व्यक्ति को साइबर अपराधी कहते हैं.


इस तरह के अपराध में साइबर अपराधी कोई ना कोई गैर कानूनी तरीके से ऑनलाइन मोड में किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी जैसे उसके लेनदेन करने के खाते का, व्यापारिक गतिविधि के खाते का, सोशल मीडिया खाते का लॉग इन आईडी, उसका पासवर्ड, उसकी निजी जानकारी, उसके बैंक से सम्बंधित जानकारी, केडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, आदि की जानकारी लेने अथवा चुराने का प्रयास किया जाता है या फिर चुरा लिया जाता है. ऐसा करने के बाद साइबर अपराधी आर्थिक नुकसान पहुँचाता है.




आर्थिक अपराध के अलावा इंटरनेट पर अब बिना सम्बंधित व्यक्ति की जानकारी के, बिना उसकी अनुमति के उसकी सामग्री का चोरी किया जाना भी आम बात होती जा रही है. ऐसे में यह भी एक तरह का अपराध है.


इसके साथ-साथ किसी व्यक्ति की निजी जानकारी के लिए किसी भी अवैध तरीके से उसके लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल आदि में प्रवेश करके सामग्री, जानकारी का चोरी करना भी साइबर अपराध है.


साइबर अपराध में किसी भी अपराधी को कंप्यूटर, मोबाइल के साथ-साथ एक इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता होती है. उसी के द्वारा वह किसी व्यक्तिगत या सरकार की आर्थिक संपत्ति अथवा अन्य तरह के अपराध करता है.


साइबर अपराध में केवल किसी दूसरे की जानकारी को चोरी करना, आर्थिक चोरी करना ही अपराध नहीं है बल्कि किसी दूसरे की किसी भी तरह की डिवाइस में किसी ऐसे वायरस को पहुँचाना भी अपराध है जिससे उस सम्बंधित कंप्यूटर, मोबाइल आदि को नुकसान पहुँचाया जा सके. इसी तरह किसी भी व्यक्ति की निजी अथवा किसी सार्वजनिक जानकारी का उपयोग बिना उसकी जानकारी, अनुमति के करना भी साइबर अपराध है. किसी दूसरे व्यक्ति की मेल आईडी का गैर-कानूनी इस्तेमाल करना अथवा उसकी क्लोनिंग करके किसी दूसरे से ठगी, धोखाधड़ी करना आदि भी साइबर अपराध की श्रेणी में आता है.


इधर सोशल मीडिया का उपयोग भी बहुतायत हो रहा है. इंटरनेट की मदद से सोशल साइट्स पर गैर कानूनी फोटो, वीडियो, सामग्री, जानकारी को फैलाना से भी साइबर अपराध माना गया है. इसमें इस तरह की जानकारी, सामग्री भी अपराध की श्रेणी में शामिल है जिसके द्वारा सांप्रदायिक तनाव बढे, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो, देश हित से सम्बंधित किसी भी जानकारी का गैर-कानूनी इस्तेमाल हो.


इसके अलावा तमाम सोशल साइट्स एप्स जैसे Watsaap, Facebook, Twitter, Teligram, Instagram आदि पर फर्जी नाम या फर्जी आईडी बना कर गैर कानूनी तरीके से किया गया कोई भी कार्य साइबर अपराध कहलाता है.


साइबर अपराधियों से खुद को बचाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम सभी अपने सुरक्षा कदमों को मजबूत रखें. अपने खातों से सम्बंधित जानकारियों को सार्वजनिक न करें.


किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि में उपयोग होने वाले प्लेटफोर्म में उपयोग किये जाने वाले किसी भी गुप्त कोड को किसी के साथ भी शेयर न करें.


समय-समय पर अपनी आईडी का पासवर्ड बदलते रहें. अनजान मैसेज लिंक या मोबाइल पर आए नोटिफिकेशन पर तब तक क्लिक न करें जब तक कि उसके बारे में पुख्ता जानकारी हासिल न हो.


यदि मनी ट्रांसफर करने वाले तमाम एप्प्स, जैसे SBI नेटबैंकिंग, Phone Pay, Google Pay आदि का यदि उपयोग करते हों तो उनकी टू स्टेप सुरक्षा व्यवस्था करें. साथ ही उसमें काम करने के बाद तुरंत Logout कर दें.


ऐसे अनेक छोटे-छोटे कदम हैं, जिनके उठाये जाने के बाद साइबर अपराधियों के क़दमों को रोका जा सकता है. यह हम सबकी सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है.


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01 January 2022

बीते साल का दर्द

क्या नया साल, क्या पुराना साल सब एक जैसे दिखाई देते हैं जब सुबह उठते समय या फिर रात को सोते समय। यदि बदलाव कुछ दिखाई देता है तो वो उनसे जुड़े अनुभवों का, उन सालों से जुड़ी यादों का। बहुत कुछ ऐसा गुजर जाता है कि मन करता है कि ऐसा बार-बार गुजरे और कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि मन बार-बार कामना करता है कि ऐसा जीवन मे कभी न हो। बहुत कुछ अच्छा हो जाता है तो बहुत कुछ बुरा हो जाता है। कुछ ऐसा बुरा होता है जो स्मृतियों से अलग होता ही नहीं है। उसी समय वर्षों के बदलाव का अंतर समझ में आता है।


पिछले साल का जाना हुआ मगर बहुत ही दुखद घटना के साथ। दिल-दिमाग उसी घटना के इर्द-गिर्द घूमता राहत है। ऐसी घटना जिसे आजीवन न तो भुलाया जा सकता है और न ही उसके दर्द को कम किया जा सकता है। ये कहने वाली बात होती है कि समय के साथ बहुत से घाव कम हो जाते हैं अथवा मिट जाते हैं। गुजरे हुए वर्ष ने जो घाव दिया है वह समय के साथ भरेगा तो नहीं हाँ, हरा हमेशा बना रहेगा।


क्या कहा जाए, क्या लिखा जाए क्योंकि जैसे ही लिखने की शुरुआत करो तो हाथ काँपने लगते हैं और आँखें बहने लगती हैं। अपने छोटे का जाना अंदर तक हिलाकर रख गया है। न ये गया हुआ साल भुलाया जा सकेगा और न ही इसके द्वारा दिए गए घाव को। जनवरी आ गई है और वो दिन, वो घटना पूरे उफान के साथ दिल-दिमाग पर हावी  होने लगी है।


बस, कामना यही कि ये साल और आने वाले साल किसी को भी ऐसा दुख, ऐसा कष्ट न दे।

30 December 2021

वर्तमान को वर्तमान के साथ ही जीने का प्रयास हो

जाने वाले को कोई रोक नहीं सकता, ये सन्दर्भ सदैव से व्यक्ति के इस धरा से हमेशा के लिए चले जाने के सन्दर्भ में की जाती है. यह सच भी है क्योंकि इंसानी विकास यात्रा में उसके द्वारा तमाम तरह के नए-नए आविष्कार किये गए, नए-नए मानक स्थापित किये गए, अनेक असाध्य बीमारियों का निदान उसके द्वारा निकाला गया मगर एक मृत्यु ही ऐसी है जिस पर इंसानों की तमाम सारी कोशिशों के बाद भी विजय प्राप्त नहीं की जा सकी. जिस तरह से इंसान मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सका है, तमाम सारी कोशिशों के बाद भी, वैज्ञानिक, चिकित्सकीय उपकरणों के होने के बाद भी मृत्यु को रोका नहीं जा सका है, ठीक उसी तरह से समय को नहीं रोका जा सका है. गुजरे समय को वापस नहीं लाया जा सका है.




ये वर्तमान वर्ष 2021 का अत्यंत अंतिम दौर है. एक-दो दिन इसके गुजर जाने में शेष हैं, ऐसे में बहुतायत लोग इस वर्ष के जाने की और नए साल के आने की बात करते दिख रहे हैं. इस साल ने अपने पूर्ववर्ती वर्ष 2020 की तरह ही कोरोना की भयावहता को बनाये रखा. इधर ऐसा दिखाई दे रहा है, जैसे वर्ष 2020 को जल्दी से जल्दी जाने की बात लोग करते दिखाई दे रहे थे, कुछ ऐसा ही इस साल में दिखाई दे रहा है. समय के जल्द से जल्द जाने की इच्छा उसी समय की जाती है जबकि उस समय से प्रसन्नता न मिले, ख़ुशी न मिले. कुछ ऐसा ही इस जाते हुए वर्ष के साथ हुआ है. इस साल में कोरोना की दूसरी लहर ने जबरदस्त भयावहता फैलाई. यद्यपि इस लहर की समयावधि कम रही तथापि जितनी देर उसकी उपस्थिति रही लोगों को डराती ही रही, लोगों को मौत के आगोश में भेजती रही.


ये साल चला जायेगा, भले रूप में या बुरे रूप में ये और बात है. जाते हुए समय को कोई रोक नहीं पाया है, जाने वाले समय को कोई वापस भी नहीं ला सका है. ऐसे में बुरे समय के जल्दी गुजरने वाली बात हो या फिर अच्छे समय को रोके रखने की इच्छा, ये एक काल्पनिक स्थिति है. बुरे समय को न तो जल्दी भगाया जा सकता है और न ही अच्छे समय को आहूत अधिक रोका जा सकता है. समय का अपना ही एक निर्धारण है, जिसके अनुसार उसका आना और जाना लगा रहता है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यदि समय अच्छे से गुजारा जाए, उसमें खुशियों को समाहित किया जाये तो वह बिना किसी कष्ट के बीत जाता है. इसके उलट कई बार समय ही कष्ट दे जाता है, समय ही दुःख दे जाता है बस उसी समय से कैसे भी निपटा नहीं जा सकता है. समय के हाथों मिलने वाले दुःख या कष्ट का कोई निदान नहीं, सिवाय इसके कि आने वाले समय की महत्ता समझी जाये और वर्तमान को वर्तमान के साथ ही जीने का प्रयास किया जाये.


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28 December 2021

अनेक रिसर्च के बाद भी नए शोध की गुंजाइश रह ही जाती है

शिक्षकों को भी समय-समय पर खुद को अपडेट करने के लिए पढ़ना पड़ता है। कहा जाए कि  बस पढ़ना ही पड़ता है, तो ये सही न रहेगा बल्कि उनको भी इसके लिए किसी विद्यार्थी की तरह कक्षा मे बैठना पड़ता है, शिक्षकों से पढ़ना होता है। वर्तमान मे कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी हो रहा है। Faculty Induction Programme के नाम पर अनिवार्य रूप से किया जाने वाला एक कोर्स किया जा रहा है। देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्था माने जाने वाले जवाहर लाल नेहरू (JNU) से आयोजित होने वाले इस प्रोग्राम मे हमारी भी सहभागिता हो रही है। 27 दिसम्बर 2021 से 22 जनवरी  2022 तक चलने वाले इस प्रोग्राम मे प्रतिदिन चार सेशन चलने हैं, जिसमें देश के प्रतिष्ठित बौद्धिक लोगों का लेक्चर होना है।


आज दूसरा दिन है, इस प्रोग्राम का। हमारा अपना विचार तो यही है कि आपके बीच प्रतिदिन के सेशन के बारे मे कुछ न कुछ जानकारी शेयर की जाए मगर देखिए कि कितना कर पाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सुबह 09:30 से शुरू होने वाला सत्र शाम 05:15 तक लगभग निर्बाध रूप से चलता राहत है। आज दूसरे दिन के तीसरे सत्र मे प्रोफेसर आर. के. शर्मा जी का व्याख्यान हुआ। उनके द्वारा रिसर्च के बारे मे जानकारी दी गई। उनके द्वारा स्पष्ट रूप से बताया गया कि किसी भी विषय मे, किसी भी बिन्दु पर चाहे कितनी भी रिसर्च क्यों न हो जाएं, उसमें कोई न कोई बिन्दु ऐसा रह जाता है जहां कि शोध की जगह रह जाती है। यह जगह किसी भी शोधार्थी को देखनी चाहिए, खोजनी चाहिए।


हमारे द्वारा अपनी जिज्ञासा समाधान के रूप मे उनसे पूछा गया कि आज हिन्दी साहित्य मे स्त्री-विमर्श अथवा दलित विमर्श को लेकर पर्याप्त शोध हो चुका है, ऐसे मे नए शोध की गुंजाइश कहाँ रह जाती है? शोध जाँचने वालों द्वारा भी किसी नए प्रोजेक्ट को यह कहकर अस्वीकार कर दिया जाता है कि संबंधित विषय पर पर्याप्त काम हो चुका है, ऐसे मे शोधार्थी क्या करे? शर्मा जी का स्पष्ट रूप से कहना था कि किसी विषय पर शोध करने के लिए उसको ऊपर-ऊपर से देखना उचित नहीं। उस विषय की गहराई मे जाकर देखने की आवश्यकता है। यदि शोधार्थी गंभीरता से अध्ययन करे तो कोई न कोई बिन्दु अवश्य ही निकल आएगा, जहां कि इन्हीं विषयों पर शोध किया जा सकता है।


इसी बात को गाँठ बाँधते  हुए संबंधित प्रोग्राम मे अपना रिसर्च पेपर ‘हिन्दी महिला उपन्यासकारों का स्त्री-विमर्श और सामाजिक सरोकार’ प्रस्तुत कर दिया है। अब देखना ये है कि यह स्वीकार होता है या अस्वीकार? बाकी, कल से कोशिश रहेगी रोज की रिपोर्ट यहाँ प्रस्तुत करने की।


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