19 अक्टूबर 2026

यूरोपीय अराजकता और भारतीय सन्दर्भ

अक्टूबर माह जहाँ एक तरफ भारतीय राजनीतिक सन्दर्भों में चर्चा के केन्द्र में है वहीं विदेश की धरती पर लगी असंतोष की आग में सुलग रहा है. इधर भारत में वोट चोरी पर विपक्ष लगातार आन्दोलित है तो उधर फ्रांस, इटली सहित अनेक विकसित देशों की सड़कों पर अराजकता फैली है. विरोध प्रदर्शन की आड़ में अराजकता के शिकार यूरोप के आधा दर्जन से अधिक देशों ने एकसाथ सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल को देखा. इन देशों में फैले जनाक्रोश का कारण बढ़ती मँहगाई, शिक्षा की बदतर स्थिति, सार्वजनिक सुविधाओं में कमी आना आदि रहा है. इनके चलते यहाँ की युवा पीढ़ी सड़क पर उतर कर आन्दोलन करने को विवश हुई. यथोचित कारणों से उपजे जनाक्रोश को अराजकतावादी ताकतों ने हिंसक बनाकर मूल कारणों को नेपथ्य में धकेल दिया.

 

आन्दोलनकारी युवाओं के साथ अराजक ताकतों के शामिल हो जाने से फ्रांस में स्थिति सर्वाधिक रूप से विध्वंसक हुई. पेरिस सहित कई शहरों में आगजनी, तोड़फोड़, लूटपाट और हिंसक झड़पों ने उग्र रूप धारण कर लिया. यहाँ की हिंसक घटनाओं का असर इसके पड़ोसी देश इटली पर भी पड़ा और यहाँ मिलान सहित अनेक शहरों में नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा. जीवनयापन के बढ़ते खर्च के विरुद्ध शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गया. इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को यह स्पष्ट करना पड़ा कि विरोध जताना नागरिकों का अधिकार है लेकिन शहरों को बर्बाद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. फ्रांस और इटली के साथ-साथ स्पेन, पुर्तगाल, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम जैसे देश भी इस समय तीव्र असंतोष की चपेट में हैं. इन देशों में विरोध का मुख्य कारण मँहगाई, आवास की समस्या, शिक्षा व्यवस्था की बदहाल स्थिति ही बताया जा रहा है.  

 


यूरोप में फैली इस अराजकता को भारतीय सन्दर्भों में देखने की आवश्यकता है. यहाँ एक बड़ा राजनीतिक वर्ग ऐसा है जो लम्बे समय से केन्द्र की स्थिर सरकार को सड़क पर अराजकता फैलाकर अस्थिर करने के प्रयास में लगा हुआ है. इस वर्ग से सम्बंधित अगुआ व्यक्तित्व आये दिन भारत के पड़ोसी देशों नेपाल
, बांग्लादेश की हिंसक गतिविधियों का समर्थन करते देखे जाते हैं. जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग जेन-जी के उग्र आन्दोलन के द्वारा संसद को उखाड़ फेंकने की मानसिकता के साथ व्यवस्था को बाधित करने का काम करते हैं. अब उन्हीं के द्वारा रिजीम चेंज करने की, फ़्रांस जैसी आग लगने की बात कहना अराजकता के संकेतक हैं.

  

राजनीतिक सन्दर्भों से इतर भी यूरोप के देशों में सुलग रही असंतोष की इस आग के दूरगामी प्रभाव हमारे देश पर भी पड़ना स्वाभाविक है. यूरोपीय बाजारों की उथल-पुथल का असर भारत के निर्यात, आईटी सेक्टर, अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है. वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने से निवेश और पूँजी प्रवाह भी प्रभावित हो सकते हैं, जिससे हमारे लघु और मध्यम उद्योगों को झटका लग सकता है. वैश्विक बाजारों में यदि अनिश्चितता का दौर आता है तो इसका प्रभाव भारतीय शेयर बाजार और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ेगा. भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी वैश्विक शक्तियों के मध्य भारत को अपनी प्राथमिकताओं को नए सिरे से निर्धारित करना पड़ सकता है.

 

विदेश में फैली इस अराजकता ने देश के आंतरिक परिप्रेक्ष्य में इसे समझने और तुलनात्मक अध्ययन करने का अवसर प्रदान किया है. यह विचारणीय है कि आखिर क्यों दुनिया के सबसे पुराने और समृद्ध कहे जाने वाले देश आज गम्भीर अस्थिरता की चपेट में हैं? आखिर भारत ने अपनी विशाल आबादी, विविधता और जटिल सामाजिक ताने-बाने के बावजूद स्वयं को किस तरह अराजकता से सुरक्षित बनाये रखा है? यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि विगत लम्बे समय से भारत को भीतर और बाहर से अस्थिर करने के प्रयास किये जा रहे हैं; यहाँ अराजकता फैलाने के मंसूबे लगातार बनाये जा रहे हैं. आज भले ही कुछ राजनीतिक अराजक तत्त्व देश के लोकतंत्र पर, यहाँ की लोकतांत्रिक प्रणाली पर सवाल उठाते हैं; यहाँ की संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध अविश्वास का वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं; अनावश्यक मुद्दों के द्वारा नागरिकों को भ्रमित करने का काम करते हैं मगर उनको समझना होगा कि भारत की सफलता का सबसे बड़ा आधार उसका मजबूत और समावेशी लोकतांत्रिक ढाँचा ही है. यही ढाँचा समय-समय पर चुनावों, बातचीत से, लोकतान्त्रिक ढंग से जनता के असंतोष को शांत करने की आन्तरिक क्षमता रखता है. देश में मजबूत पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक ताने-बाने और कल्याणकारी योजनाओं का एक ऐसा सुरक्षाचक्र उपस्थित है जो नागरिकों के जीवनयापन की बुनियादी आवश्यकताओं को सुरक्षित रखने का कार्य करता है.

 

देखा जाये तो यूरोप के नागरिकों विशेषकर युवाओं ने स्वयं को बेसहारा महसूस किया है. इसके उलट भारत की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था ने नागरिकों में एक विश्वास बनाये रखा है कि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के दायरे में कानून व्यवस्था से खिलवाड़ न हो सकेगा. वैश्वीकरण और सूचना क्रांति के इस दौर में भी भारत की वैचारिक और सांस्कृतिक सहनशीलता ने समाज को टूटने से बचाया है. यूरोपीय देशों की अस्थिरता, भारत के पड़ोस में व्यापक अस्थिरता बनी रहने और देश को भी अराजकता की आग में झोंकने के कथित प्रयासों के बाद भी यहाँ का लोकतान्त्रिक, सामाजिक ढाँचा सुरक्षित बना रहा. तमाम सारी विपरीत स्थितियों के बाद भी देश के नागरिक हितों पर आँच न आने देना इस बात का प्रमाण है कि विकास जैसे भौतिक पैमानों से किसी राष्ट्र की स्थिरता का निर्धारण नहीं होता है. किसी भी देश की स्थिरता उसके सामाजिक मूल्यों, मजबूत संस्थागत ढाँचे, स्पष्ट संवाद, लोकतान्त्रिक व्यवस्था और समावेशी शासन प्रणाली आदि के द्वारा निर्धारित होती है. इनके द्वारा ही किसी भी देश को अराजकता से बचाकर उसकी सम्प्रभुता, एकता, सुरक्षा आदि को अक्षुण्य रखा जा सकता है. अनेकानेक इंडेक्स के सहारे अपने नागरिकों का हित और खुशियाँ तलाशते पश्चिमी देशों को हमारे देश से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है.


13 अक्टूबर 2026

एसआईआर का भ्रामक विरोध

लोकतंत्र में विरोध करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार होता है किन्तु उस विरोध का उद्देश्य अराजकता फैलाना हो, समाज को गुमराह करना हो तो ऐसे विरोध को अवसरवाद कहा जाता है. बिना ठोस प्रमाण के ऐसे विरोधी स्वर देश का विपक्ष उठाने में लगा है. इस स्वर में वोट चोरी, निर्वाचन आयोग आयुक्त का इस्तीफा सुनाई दे रहा है. सड़कों पर कांग्रेस सहित अनेक दल एसआईआर को खारिज करने और इसके लागू होने के बाद सम्पन्न विधानसभा चुनावों को भंग करने की बात भले कर रहे हों मगर सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई याचिका में वे एसआईआर की वैधता को स्वीकार करते हैं. याचिका में कहा है कि इसका उद्देश्य एसआईआर की वैधता को चुनौती देना नहीं है. सोचने वाली बात है कि यदि इसे चुनौती देना, खारिज करवाना उद्देश्य नहीं है तो सड़कों पर अराजक रूप से उतर कर जनता को भ्रमित क्यों किया जा रहा है? ऐसे में आंदोलन की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है कि वह वास्तव में मतदाताओं के अधिकारों के लिए है या फिर दलों द्वारा अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए है.

 

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर को लेकर जो राजनीतिक उत्पात सा काटा जा रहा है, उसमें पूछा जाना चाहिए कि यदि लाखों मतदाताओं के नाम गलत ढंग से काट दिए गए हैं तो वे असली मतदाता हैं कहाँ? उन प्रभावित मतदाताओं द्वारा किसी भी रूप में अपनी शिकायतों को किसी सम्बंधित अधिकारी के समक्ष रखा गया है? मान लिया जाये कि वे सभी मतदाता इसके लिए सक्षम नहीं हैं तो शोर मचाने वाले विपक्षी दलों को ऐसे मतदाताओं के दस्तावेजों, विवरणों को प्रस्तुत करते हुए निर्वाचन अधिकारियों से स्पष्टीकरण माँगें. मंचों से लाखों वोट कटने की बात करना, इसकी आड़ में सड़कों पर अराजकता फैलाना किसी भी रूप में उचित नहीं है. जो लोग इस अनावश्यक विरोध में अपना भी स्वर मिला रहे हैं क्यों उन्होंने विचार किया है कि क्या यह एसआईआर पहली बार हो रहा है? क्या मतदाता सूची में से पहली बार मतदाताओं के नाम हटाये गए हैं? क्या बिना पुनरीक्षण के पुरानी मतदाता सूची को ही बनाए रखना औचित्यपूर्ण है? आखिर नए नागरिक वयस्क होंगे, मतदाता बनेंगे, उनको सूची में शामिल किया जायेगा; मृत व्यक्तियों के नाम हटेंगे. इसी तरह से दोहरी प्रविष्टियों, स्थान परिवर्तन के कारण भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण होता है. ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या इन बिन्दुओं के आधार पर नाम हटाने को वोट चोरी कहा जाएगा? हाँ, ये सत्य है कि पुनरीक्षण के नाम पर मनमाने ढंग से नाम काटने का अधिकार किसी को नहीं. यदि किसी पात्र मतदाता का नाम कटता है तो उसकी अपील पर सुनवाई अवश्य होनी चाहिए.

 

ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा माँगने वाले विपक्षियों का आरोप है कि मतदाताओं के नाम हटने का लाभ भाजपा को मिला है; उसको वोट न देने वालों के नाम काटे गए हैं. इस हास्यास्पद आरोप पर विपक्षी दल स्वयं ही बता पा रहे कि वे किस आधार पर दावा कर रहे कि भाजपा को वोट न देने वालों के ही नाम काटे गए हैं. क्या विपक्ष के पास ऐसे आँकड़े हैं? इस बात को विपक्षी दलों द्वारा उठाये जाने का आधार वे अवैध नागरिक हैं जिनका नाम मतदाता सूची से हटाया गया है. देश का संविधान भारतीय नागरिकों को ही मतदान का अधिकार प्रदान करता है. विदेशी नागरिक, वे चाहे किसी भी देश के क्यों न हों, भारत में निवास करने के कारण भारतीय मतदाता नहीं हो सकते. यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि विगत वर्षों में रोहिंग्या, बांग्लादेशी शरणार्थियों के नाम पर अवैध नागरिकों की संख्या देश में बढ़ी है. यदि ऐसे लोगों का किसी भी तरीके से मतदाता सूची में नाम अंकित हो गया था और जाँच के बाद यह सत्यापित होने पर उनके नाम को हटाया जाना वोट चोरी कैसे हो गया?

 

ज्ञानेश कुमार को दोषी ठहराते हुए उनकी आलोचना करने, इस्तीफ़ा माँगने वाले विपक्ष को स्मरण होना चाहिए कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल फरवरी 2025 से शुरू हुआ और विपक्षी दल इससे पहले के विधानसभा, लोकसभा चुनावों में पराजित होते रहे हैं. अपने आरोपों की सत्यता के लिए विपक्ष को प्रमाण देना चाहिए न कि सड़क पर हंगामा मचाना चाहिए. केवल यह कह देना उचित नहीं कि निर्वाचन आयोग निष्पक्ष नहीं. यह बताना होगा किस प्रकार किसी दल विशेष को अनुचित लाभ दिया गया. यदि किसी मामले में संस्थागत प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच अवश्य होनी चाहिए किन्तु बिना पर्याप्त आधार के सड़क पर अराजकता फैलाते हुए इस्तीफे की माँग करना कोई समाधान नहीं है.

 

एसआईआर पर यदि किसी भी तरह की विसंगति है तो उसका समाधान नारे लगाकर नहीं, इस्तीफ़ा माँग कर नहीं, देश में अराजकता फैलाकर नहीं, झूठे दावों के साथ नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर निकल सकता है. यदि वाकई में पात्र मतदाताओं के नाम गलत ढंग से हटाए गए हैं तो उनको तत्काल शामिल किया जाए. यदि नाम नियमानुसार हटे हैं तो उनको वोट चोरी कहकर संवैधानिक संस्था पर आरोप न लगाया जाए.

 

लोकतंत्र में मतदाता सूची देश के नागरिकों के मताधिकार का आधार है. इसलिए उसका निष्पक्ष और पारदर्शी होना अत्यावश्यक है. इसके लिए निर्वाचन आयोग, सरकार के साथ-साथ विपक्षी दलों को भी सजग रहने की आवश्यकता है. इसलिए एसआईआर का विरोध विपक्ष को करना है तो प्रमाणों के साथ करे न कि किसी की फीलिंग के आधार पर. यहाँ सरकार को एक बात ध्यान रखनी होगी कि देश को ऐसा लोकतंत्र चाहिए जहाँ फर्जी मतदाताओं के लिए कोई स्थान न हो किन्तु वास्तविक नागरिक भी अपने मताधिकार से वंचित न रहे. इसी तरह विपक्षी दलों को भी इसका स्मरण रहे कि चुनावी राजनीति में बिना प्रमाण किया गया विरोध, अराजक रूप से पैदा किया गया शोर क्षणिक लाभ तो दे सकता है किन्तु विश्वसनीयता, स्थायित्व पैदा नहीं कर सकता है.

 


07 अक्टूबर 2026

एआई पर नियन्त्रण आवश्यक

इंसान ने सदैव ही नवोन्मेषी बनकर समाज में अपने अस्तित्व को आगे बढ़ाया है. इसके चलते श्रम को सरल बनाने के लिए मशीनों का अविष्कार किया गया. अब ऐसा दौर सामने आया है जहाँ मशीन केवल काम ही नहीं कर रही है बल्कि इंसान के दिमाग की नकल भी कर रही है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-एआई) के द्वारा ऐसा ही हो रहा है. उसके द्वारा लिखना, कलाकारी करना, गीत-संगीत रचना, प्रश्नों के उत्तर देना, निर्माण करना, अनुसंधान में सहायक होना आदि सहजता से हो रहा है. पिछले कुछ समय से एआई पर जिस तरह से इंसान की निर्भरता बढ़ी है, उसके माध्यम से जिस तरह से कार्यों का सम्पादन करवाया जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे भविष्य एआई का ही है.  

 



एआई कपोल-कल्पना का विषय नहीं है बल्कि उसने लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी जगह बना ली है. इसी में अब एआई से एक कदम आगे निकल कर एआई एजेंट सक्रिय हो गया है. यह एक ऐसा स्वायत्त सॉफ्टवेयर प्रोग्राम है जो किसी कार्य को पूरा करने के लिए स्वयं निर्णय लेता है और कार्य करता है. यह मनुष्य के हस्तक्षेप बिना कार्य करता है. एआई दुनिया की इस तेजी ने जहाँ सम्भावनाओं के अनेक द्वार खोले हैं वहीं आशंकाओं को भी खड़ा किया है. क्या इंसान ने ऐसी तकनीक विकसित कर दी है जिस पर भविष्य में उसका नियंत्रण ही न रहेगा? यह सवाल आशंका भर नहीं है. इस पर दुनिया के अनेक प्रमुख एआई वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ सार्वजनिक रूप से चेतावनी भी दे चुके हैं. इनका कहना है कि अत्यंत उन्नत एआई भविष्य में मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए जोखिम बन सकता है. इस क्षेत्र में काम कर चुके जेफ्री हिंटन, जिन्हें एआई का गॉडफादर कहा जाता है, ने गूगल छोड़ने के बाद एआई के संभावित खतरों को लेकर सार्वजनिक चेतावनी देते हुए कहा था कि जिस गति से एआई प्रणालियाँ विकसित हो रही हैं उससे उनके दीर्घकालीन परिणामों को लेकर पर्याप्त सावधानी बरतना जरूरी है. ओपनएआई कम्पनी के डेविड रॉबिन्सन ने अक्टूबर 2026 में इस्तीफा देकर कहा था कि एआई बेहद तेजी से ताकतवर हो रहा है लेकिन सुरक्षा और नियन्त्रण के सिस्टम उस रफ्तार से विकसित नहीं हो रहे हैं. इसी तरह से एन्थ्रोपिक के जैकोब कॉक्सन ने सितम्बर 2026 में एआई उद्योग छोड़ दिया. उनका कहना था कि एआई क्षेत्र में खतरनाक और अनियंत्रित सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं. बिल गेट्स ने सितम्बर 2026 में चेतावनी दी थी कि बिना नियमन के एआई गलत हाथों में पड़कर एक अरब मौतों का कारण बन सकता है. एलन मस्क भी लगातार कहते आ रहे हैं कि अत्यधिक उन्नत एआई मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है और इसे परमाणु हथियारों से भी अधिक खतरनाक माना जा सकता है. इन सम्भावनाओं के बीच एक बात बिलकुल सही है कि एआई के रूप में ऐसी तकनीक विकसित हुई है जिसकी क्षमताएँ तेजी से बढ़ रही हैं जबकि उसके प्रभावों को समझने, नियन्त्रित करने की क्षमता उतनी तेजी से विकसित नहीं हुई है.

 

देखा जाये तो एआई का सबसे बड़ा खतरा उसका गलत इस्तेमाल है. डीपफेक के माध्यम से नकली तस्वीर या वीडियो तैयार करना अब कठिन नहीं रह गया. झूठी सूचनाओं को बड़े पैमाने पर फैलाना, लोगों की मानसिकता को प्रभावित करना, साइबर हमले करना, धोखाधड़ी करना, तकनीक को हैक करना आसान हो गया है. सम्भव है कि भविष्य में एआई द्वारा इन कामों को और अधिक प्रभावी बना देने से व्यक्तिगत निजता, राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने चुनौतियाँ खड़ी हो जाएँ. यदि एआई प्रणालियाँ, एआई एजेंट भविष्य में स्वायत्त हो गए, अपने लक्ष्य तय करने, रणनीति बनाने, संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम हो गए तो यह कहना कठिन होगा कि वे मानव हितों के अनुरूप ही कार्य करेंगे. इसी बिन्दु पर आकर विशेषज्ञ सजग होने की बात करते हैं, चेतावनी देते हैं. ऐसी स्थिति में सरकारों, तकनीकी कम्पनियों, विशेषज्ञों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. एआई को बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. एआई प्रणालियों के लिए पारदर्शिता, परीक्षण, जवाबदेही, सुरक्षा आदि के स्पष्ट नियम होने चाहिए ताकि भविष्य में न केवल इंसानों के लिए बल्कि तकनीक, उद्योग, राष्ट्रीय सुरक्षा, चिकित्सा, अन्तरिक्ष, विमानन, बैंकिंग आदि-आदि क्षेत्रों में खतरनाक स्थितियाँ उत्पन्न न हो सकें. 

 

इन सबके बाद भी एआई को लेकर भय का वातावरण नहीं बनाया जाना चाहिए. इसकी सहायता से असाध्य-गम्भीर रोगों की पहचान हुई है; नई दवाओं का विकास हुआ है; कृषि, जलवायु, पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी बेहतर हुई है; विज्ञान-प्रौद्योगिकी-चिकित्सा-रक्षा-शिक्षा-उद्योग आदि क्षेत्रों में नए रास्ते खुले हैं. सवाल यह होना चाहिए कि एआई का विकास किस रूप में हो? इंसान ने आग, बिजली, परमाणु ऊर्जा, इंटरनेट आदि शक्तिशाली तकनीकें विकसित की हैं और इनके अनियंत्रण ने समाज में विध्वंस फैलाया है. एआई को इससे आगे निकल कर समझने की आवश्यकता है क्योंकि इसके द्वारा ऐसी प्रणालियाँ विकसित हो रही हैं जो इंसानी बौद्धिक क्षमताओं से आगे निकल रही हैं. भविष्य में एआई इंसानों को खत्म करेगी या मानव जीवन को बेहतर बनाएगी, इसका उत्तर आज किसी के पास निश्चित रूप से नहीं है. लेकिन एक बात तय है कि इसका भविष्य प्रयोगशालाओं में निर्धारित नहीं होगा. यदि इसका उपयोग स्वार्थ, राजनीतिक नियंत्रण, युद्ध, दुष्प्रचार, अपराध आदि के लिए होगा तो निश्चित रूप से इसका भविष्य भयावह होगा किन्तु यदि इसको मानवीय विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, जनहित में लगाया गया तो यह तकनीक क्रांतिकारी उपलब्धि बन सकती है.

 

आज हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि जिस बुद्धिमत्ता को हम कृत्रिम रूप दे रहे हैं उसके लिए हम अपनी प्राकृतिक बुद्धिमत्ता को न खो दें. एआई से डरने का समय नहीं, उसके प्रति निश्चिन्त होने का भी समय भी नहीं बल्कि उससे सावधान रहने का समय है. उसके पूर्णतः विकसित होने, पूर्णतः स्वतंत्र होने से पहले उसके नैतिक परिणामों पर गम्भीरता से विचार करने का समय है. वर्तमान में वास्तविक समय और मूल प्रश्न तकनीक का नहीं बल्कि उसके नियंत्रण का है.


27 सितंबर 2026

ताई बाई का जालौन स्थित महल गिरा

खबर सुनने को मिली है कि ताई बाई के जालौन स्थित महल का एक बड़ा हिस्सा गिर गया है.
बहुत से लोग ताई बाई को ही नहीं जानते होंगे. बहुतों ने उनके बारे में सुना ही नहीं होगा. वे 1857 की क्रांति की एक महान वीरांगना और प्रथम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं.

सोचने वाली बात ये है कि हम लोग अपने पूर्वजों के प्रति, अपने बलिदानियों के प्रति सम्मान का भाव क्यों नहीं रख पा रहे हैं? क्यों उनके प्रति उदासीन बने रहते हैं? अब कुछ दिन मीडिया में आने के लिए उनके क्षतिग्रस्त महल को लेकर स्यापा होगा और फिर सबकुछ वैसे ही शांत हो जाएगा, जैसे उनकी प्रतिमा स्थापित करने वाले मुद्दे पर हुआ.



25 सितंबर 2026

वोट चोरी का अनर्गल आरोप

देश में कोई पहली बार तो SIR हो नहीं रहा है. पहला विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) सन 1952 के आम चुनाव के दौरान किया गया था.


अबकी बार इतने विरोध का कारण क्या है?


यदि ज्ञानेश कुमार ने अपने दम पर भाजपा के विरोधी मतदाताओं के नाम कटवा दिए तो ऐसे व्यक्ति को विशेष सुरक्षा देकर किसी बड़े काम में लगाना चाहिए क्योंकि यह तो त्रिकालदर्शी हुआ. यह तो मतदाता सूची पढ़कर ही बता देता है कि कौन भाजपा को वोट करेगा, कौन नहीं करेगा. अरे, दिमाग से पैदल लोगो, एक बात पर गौर करो कि SIR के लिए सम्बंधित लोगों की जानकारी को क्या ज्ञानेश कुमार ने अपने घर पर भर दिया? जानकारी देते समय सभी से, तुम विरोधियों से भी, तुम्हारे बाप-अम्मा, दादा-दादी, नाना-नानी आदि-आदि की जानकारी लेकर क्या गलत किया जा रहा?


रही बात वोट चोरी की तो ज्ञानेश कुमार तो आये फरवरी 2025 में और तुम लोग चुनाव हार रहे 2014 से. अब SIR तुमको इसलिए बेकार लग रही, काहे कि अवैध वोटर कट गए, वे बाहर हो गए, जिनको अपने बाप-दादा का पता नहीं. जिन अवैध घुसपैठियों को तुम सबने अपना बाप बना रखा था, उनके भागने की स्थिति बनते देख तुमको देश का सिस्टम बेकार लगने लगा.


दिमाग लगाना सीखो, न कि आरोप.