अमेरिका और ईरान के बीच चले आ रहे तनाव का अंत दिखता नहीं है. वर्तमान
परिदृश्य में इनके युद्ध ने समूचे विश्व की नींद उड़ा रखी है. दोनों देश कभी युद्ध में
होते हैं तो कभी कूटनीतिक प्रयास में लगे होते हैं. कभी युद्धविराम जैसी स्थिति
सामने आती है लेकिन यह स्थायी रूप में नहीं रहती है. युद्धविराम के कुछ दिनों बाद
पुनः वही युद्ध का माहौल नजर आने लगता है. दोनों देश अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन
करने लग जाते हैं. युद्धविराम का होना और फिर अचानक से युद्ध; एक अस्थायी
युद्धविराम और फिर वही दुश्मनी; एक तरह का अनावश्यक युद्ध. आखिर इस युद्ध का मतलब क्या
है? यदि युद्ध ही करते रहना है तो थोड़े-थोड़े अन्तराल पर युद्धविराम जैसे कदम क्यों
उठाये जाते हैं?
अमेरिका और ईरान युद्ध के पीछे उनकी आंतरिक राजनीति, उनका लम्बा संघर्षमय
इतिहास समझ आता था. इसमें 1979 की इस्लामिक क्रांति के पश्चात् ईरान ने स्वयं को अमेरिकी विरोधी घोषित कर
दिया था. ऐसा करना उसकी शासन व्यवस्था की वैचारिक नींव था. इसी तरह अमेरिका अपने रणनीतिक
हितों के लिए महत्वपूर्ण तेल मार्गों पर अपना नियंत्रण रखना चाहता था. इन दोनों के
अपने-अपने निजी मकसद होने के कारण वर्तमान में चल रहे इस युद्ध का कोई स्पष्ट
सैन्य मकसद नहीं है. यही कारण है कि दोनों देश बजाय एक-दूसरे को जीतने के, एक-दूसरे को अपनी सैन्य क्षमता दिखा
रहे हैं. अब यह युद्ध स्वयं को सर्वोच्च सिद्ध करने की लड़ाई बन गया है. अमेरिका भले ही
दिखावे के लिए यह चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे
किन्तु उसका मूल मकसद तेल मार्ग पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना है. इसी तरह ईरान
स्वयं को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद को नकारता
रहता है.
दोनों देशों के अपने-अपने नितांत निजी, व्यक्तिगत मकसद होने के कारण यह युद्ध रुकता रहता है, चलता रहता है. दोनों देशों के मध्य युद्धविराम की घटनाओं को देखकर ऐसा
आभास होता है कि जैसे ही दोनों में से किसी को भी यह एहसास होता है कि हमले खुद के
लिए ही हानिकारक बने हुए हैं तो वे स्वतः ही युद्ध से अपने-अपने को पीछे खींच लेते
हैं. ये और बात है कि वैश्विक परिदृश्य में इसे युद्धविराम के रूप में देखा जाने
लगता है. तात्कालिक मुद्दों के आधार पर, अपनी-अपनी स्थिति के
आकलन के आधार पर बनी व्यवस्था के आधार पर युद्धविराम तो होता है किन्तु किसी तरह
की दीर्घकालिक व्यवस्था न होने के कारण युद्धविराम टिक नहीं पाता है. देखा जाये तो
दोनों देशों के बीच मतभेद की मूल समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं निकाला जाता है;
परमाणु कार्यक्रम, विस्तारवादी नीति आदि का बना रहना दोनों
के लिए ही समस्या बना रहता है. ऐसे में युद्धविराम अस्थायी रूप धारण कर लेता है.
किसी भी बिंदु पर टकराहट का, मतभेद का अवसर मिलते ही दोनों
देश अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन करने लगते हैं. कभी परमाणु कार्यक्रम के नाम पर, कभी तेल मार्ग होर्मुज़ के नाम पर, कभी तेलवाहक
जहाजों के नाम पर युद्ध का दुष्चक्र चलता ही रहता है. ऐसे में लगता है कि इन दोनों
देशों का उद्देश्य युद्ध जीतना नहीं है, दूसरे को हराना नहीं
है बल्कि सामने वाली शक्ति को कमजोर करते हुए खुद को वर्चस्ववादी साबित करना है.
अपने आपको अपने देश के नागरिकों के सामने एक हीरो के रूप में पूरी मजबूती के साथ
दिखाना है.
इन दोनों देशों के अहं के कारण, इस अनावश्यक संघर्ष के कारण से आज पूरा विश्व एक अभूतपूर्व संकट से घिरा
हुआ है. इनके बीच चलते युद्ध का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और इसके
केन्द्र में कच्चे तेल का बना होना है. दुनिया के कुल कच्चे तेल उत्पादन का बहुत
बड़ा भाग मध्य पूर्व द्वारा नियंत्रित किया जाता है. इन दोनों देशों के बीच तनाव
बढ़ने के कारण फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (जलडमरूमध्य) जैसे महत्वपूर्ण
समुद्री मार्गों पर खतरा मंडराने लगता है. इन रास्तों से दुनिया का लगभग एक-तिहाई
तेल गुजरता है. ऐसे में युद्ध के कारण यहाँ से कच्चे तेलवाहक जहाजों का आवागमन
बाधित होता है और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. तेल
का मँहगा होना अर्थात परिवहन, विनिर्माण, दैनिक उपयोग की वस्तुओं आदि की कीमतों में वृद्धि हो जाना. यह
स्थिति किसी भी विकासशील अथवा गरीब देश के लिए किसी आपदा से कम नहीं होती है. यह
युद्ध भले हो दो देशों के मध्य नजर आ रहा है किन्तु ऐसा है नहीं. इसमें कई वैश्विक
और क्षेत्रीय ताकतें भी किसी न किसी रूप में शामिल हैं. इस कारण से इस युद्ध के
द्वारा किसी तीसरे विश्व युद्ध की आहट लगातार गूँजती ही रहती है. इन दोनों
देशों के मध्य के हमले, मिसाइलों,
ड्रोनों का सञ्चालन पूरी मानवता के लिए खतरनाक नजर आते हैं. इसके चलते अनेक देशों
का खर्च अपने नागरिकों के जीवन-यापन पर व्यय होने के बजाय हथियारों की खरीद में
व्यय होने लगता है. हथियारों की इस अंधी दौड़ ने पूरे विश्व को असुरक्षित बना दिया
है.
आज जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, भुखमरी, आपदाएँ, बीमारियाँ,
आर्थिक असमानता आदि जैसी वास्तविक चुनौतियाँ हैं, जिनसे सबको
मिलकर लड़ना चाहिए, तब
पूरा विश्व किसी बड़े वैश्विक तनाव के साये से गुजर रहा है. यह युद्ध उदाहरण है
राजनीतिक हठधर्मिता का,
अनावश्यक अहं का, आपसी अविश्वास का,
साम्राज्यवादी मानसिकता का. इस तरह के अनावश्यक कदमों से किसी भी देश का भला नहीं
होने वाला है, किसी भी देश के नागरिकों का हित नहीं होने
वाला है. काश कि ये दोनों देश भी इस बात को समझ लें कि इस युद्ध का अंतिम परिणाम
जय-पराजय के रूप में नहीं निकलना है. इसलिए वैश्विक शांति के लिए एक स्थायी विकल्प
तलाशा जाये. जब तक शांति का स्थायी स्वरूप निर्मित नहीं होता है, तब तक यह अनावश्यक नाटक चलता रहेगा. वैश्विक
व्यवस्था, निर्दोष नागरिक, निरीह मानवता इसकी कीमत चुकाती रहेगी.

