03 सितंबर 2026

बेटी के जन्म पर खुशियों भरा पल

समाज में फ़ैल रही नकारात्मकता के बीच ऐसी खबरें निश्चित रूप से सकारात्मकता भरा वातावरण उत्पन्न करती हैं. आवश्यकता इस तरह की खबरों को अधिक से अधिक प्रसारित करने की है, इनसे सीख लेने की है.
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साभार : दैनिक जागरण
03.09.2026
कानपुर संस्करण

26 अगस्त 2026

कालखण्ड परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाये

"शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम,

समय बिताने के लिए करना है कुछ काम."

इन दो पंक्तियों को बहुत से लोगों ने अपना स्वर दिया होगा बचपन में. इसकी दूसरी पंक्ति को लोग आज भी दोहराते रहते हैं कि समय बिताने के लिए करना है कुछ काम. इस काम में कभी आ जाता है सनातन धर्म, कभी आ जाते हैं हिन्दू रीति-रिवाज, कभी आ जाती हैं महिलाएँ, कभी आ जाते हैं हिन्दू धार्मिक ग्रंथ, कभी आ जाती है मनुस्मृति.

 


यहाँ एक साधारण सा प्रश्न है जो आए दिन दिमाग़ को दही करता रहता है कि आज से हज़ार
, दो हज़ार साल बाद के समाज में आज की आरक्षण व्यवस्था को लेकर संदेह जताना कितना सही होगा? उस समय ये कहना कितना सही होगा कि हज़ार, दो हज़ार साल पहले के समाज में संविधान नामक ग्रंथ में कितनी अराजक व्यवस्था थी कि एक वर्ग के लोग उच्च अंक पाने के बाद भी बाहर रहते थे और एक दूसरे वर्ग के लोग निगेटिव अंकों के बाद भी प्रवेशित हो जाते थे?

 

जिस कालखण्ड को देखा नहीं गया, जिस समय के मानव-धर्म को समझा नहीं गया, उस दौर के संवैधानिक नियमों का अध्ययन नहीं किया गया तक उस कालखण्ड को, उसके नियमन को, उसके मनीषियों को दोष देना समझ से परे है. प्रत्येक कालखण्ड की अपनी व्यवस्थाएँ रहीं हैं और उनके अनुपालन के लिए ही नियम बनाये जाते रहे हैं. याद करिए कोरोना का दौर जब एक परिवार के सदस्य आपस में एक-दूसरे को छूने से बच रहे थे. क्या ये छुआछूत वाला समाज कहा जाएगा?

 

कालखण्ड, परिस्थितियों, समाज का अध्ययन किए बिना पक्ष या विपक्ष में कुछ भी कहना एक प्रकार का पूर्वाग्रह है. ध्यान रखिए, समय बिताने के लिए भले ही कुछ काम करना पड़ा हो मगर फिर अगला काम पहले वाले के अंतिम अक्षर से ही शुरू हुआ है. याद करो उस अंताक्षरी को.

 


24 अगस्त 2026

लोलक की तरह सक्रिय न रहें

लोलक वाली घड़ी हम सबने देखी होगी. अभी भी बहुत से लोगों के घरों में होगी भी. एक बात पर गौर किया है, इस घड़ी का लोलक बराबर चलता है, क्रियाशील रहता है मगर पहुँचता किसी मंजिल पर नहीं. एक और बात पर गौर करिए कि जिस घड़ी से यह लगा होता है, उस घड़ी का समय निर्धारण करने में इसका कोई योगदान नहीं होता है. ये बस इधर से उधर डोलता रहता है. कुछ ऐसी स्थिति आरक्षण हटाओ की माँग करने वाले हमारे सक्रिय, जीवंत, ऊर्जावान, शक्तिशाली, तेजस्वी, प्रतिभावान युवा साथियों ने बना ली है. इतनी मेहनत करने का, इधर से उधर भागदौड़ करने का, लगातार सक्रिय रहने का भी तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक कि आप समय निर्धारण के योग्य नहीं हो जाते.

 



समझिये तो कि आरक्षण हटेगा कैसे? क्या-क्या संवैधानिक कदम उठाने होंगे? किस तरह की प्रक्रिया को अपनाना पड़ेगा? और भी तमाम प्रश्न हैं जो बहुत जटिल हैं, कठिन हैं. उनका समाधान किये बिना आप सबकी, हम सबकी ऊर्जा, सक्रियता इसी लोलक की तरह ही रहेगी.

 

बाकी आप सभी समझदार हैं, विचार करियेगा हमारी बात पर.

 


21 अगस्त 2026

आरक्षण पर हो पुनर्विचार

इन दिनों आरक्षण एक ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा हुआ है. विगत कई दशकों से यह एक ऐसा विषय बना हुआ है जिस पर बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर लगातार बहस होती रही है. एक सवाल बार-बार उठता रहा है कि क्या आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करने में सफल हो सकी है? आरक्षण की विगत यात्रा पर नजर डालें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि इसके कारण अब समाज में असंतोष और विभेद पनपने लगा है. स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारतीय समाज एक तरह की विषमता और भेदभाव में जकड़ा हुआ था. हाशिये पर खड़े वर्गों को समानता दिलाने के लिए, उनको मुख्यधारा में जोड़ने के लिए संविधान निर्माताओं ने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर समावेशी प्रावधान की कल्पना की. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) और 16(4ए) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण की व्यवस्था लागू की. सामाजिक विभेद को दूर करने के साथ-साथ आर्थिक विषमता को दूर करने के उद्देश्य से 103वाँ संविधान संशोधन (2019) लागू करके आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का नया प्रावधान जोड़ा गया.

 



कालांतर में आरक्षण सम्बन्धी स्थिति में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग को भी शामिल किया गया. आरक्षण सम्बन्धी व्यवस्था को लेकर, इसके क्रियान्वयन को लेकर समाज में असंतोष भी उपजता रहा. ऐसे में न्यायालयों द्वारा भी समय-समय पर इसकी समीक्षा की गई. इंद्र साहनी बनाम भारत संघ (1992) के ऐतिहासिक निर्णय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक तय की तथा क्रीमीलेयर की अवधारणा को जन्म दिया. इसके अलावा एम. नागराज (2006)  मामले में स्पष्ट किया गया कि प्रमोशन में आरक्षण देते समय प्रशासनिक दक्षता को बनाए रखना आवश्यक है. इसके बावजूद अनेक विसंगतियों ने इस व्यवस्था को आलोचनाओं के घेरे में खड़ा कर दिया है. प्रवेश परीक्षाओं, नौकरियों में सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को अत्यधिक अंक लाने के बावजूद बाहर होना पड़ता है जबकि कम अथवा ऋणात्मक अंक पाने के बाद भी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी चयनित हो जाते हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रीमीलेयर सीमा निर्धारित किये जाने के बाद भी सम्पन्न परिवारों की कई पीढ़ियाँ ही लाभान्वित हो रही हैं. एससी/एसटी वर्ग में क्रीमीलेयर व्यवस्था लागू न होने के कारण इस वर्ग के उच्च पदस्थ परिवार ही आरक्षण का दोहन कर रहे हैं. ऐसी स्थिति के कारण यह व्यवस्था न्यायसंगत प्रतीत नहीं हो रही. आरक्षण का जो उद्देश्य निर्धारित किया गया था वह समस्त जरूरतमंदों तक पहुँचने के स्थान पर सीमित परिवारों तक सिमट गया है. ऐसी अनेकानेक विसंगतियों के कारण आरक्षण की व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा होने की माँग उठने लगी है. आलोचकों का सुझाव है कि जाति आधारित आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त करके उसके स्थान पर आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू किया जाये.

 

यदि सैद्धांतिक अथवा व्यावहारिक रूप से केन्द्र सरकार कभी आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह हटाने का विचार करती है तो यह राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी दृष्टि में एक अभूतपूर्व चुनौती होगी. इसके लिए सरकार को अनेक स्तरों पर चरणबद्ध कानूनी, विधायी कदम उठाने होंगे. सरकार को सबसे पहले संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन विधेयक पारित कराना अनिवार्य होगा. यहाँ ध्यान रखना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 368(2) के अनुसार यदि कोई ऐसा संशोधन किया जाता है जो देश के संघीय स्वरूप को प्रभावित करता है तो उसे देश की कम से कम आधी विधानसभाओं से साधारण बहुमत द्वारा अनुमोदित कराना पड़ता है. चूँकि राजनीतिक रूप से देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों, विभिन्न विचारधाराओं की सरकारें कार्य करती हैं इसलिए राज्य स्तर पर इस प्रकार की सहमति प्राप्त करना केन्द्र सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी.

 

संविधान संशोधन सम्बन्धी कदम के साथ-साथ न्यायिक स्तर पर भी सरकार को जवाबदेह होना पड़ेगा. देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनिश्चित किया जाता है कि संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय का सिद्धांत आहत न हो. यदि कोई कानून अथवा संशोधन समानता के मूल अधिकार की अवधारणा को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास करता है तो उसे न्यायिक समीक्षा के द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है. ऐसे में केन्द्र सरकार को न्यायालय के समक्ष यह सिद्ध करना होगा कि यह कदम देश के हित में किस प्रकार आवश्यक है और इसके विकल्प के रूप में अन्य कौन सी नीतियाँ क्रियान्वित की जाएँगी. इन औपचारिक और विधायी कदमों के अलावा सरकार को देश की सामाजिक, राजनीतिक स्थिति पर भी विचार करना होगा. आरक्षण अब सामाजिक स्तर सुधारने, वंचित वर्गों को लाभान्वित करने की दृष्टि से कम, राजनीतिक लाभ के लिए ज्यादा प्रभावी माना जाने लगा है. ऐसे में आरक्षण हटाने मात्र के विचार से ही सामाजिक असंतोष, हिंसक प्रदर्शन, राजनीतिक अस्थिरता देश को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है, देश में गम्भीर आंतरिक अशांति फैल सकती है. जातिगत आरक्षण को हटाना, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करना केन्द्र सरकार और नीति निर्माताओं के लिए संवेदनशील संतुलन साधने जैसी चुनौती है.

 

विगत वर्षों की लगभग असफल आरक्षण व्यवस्था को देखने के बाद सामान्य वर्ग के, प्रतिभावान युवाओं की आकांक्षाओं, वैश्विक मानकों, योग्यता आधारित व्यवस्था की माँग को दरकिनार नहीं किया जा सकता वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय के संवैधानिक संकल्प को भी नहीं छोड़ा जा सकता है. ऐसे में आरक्षण व्यवस्था को गतिशील और पारदर्शी बनाया जाए, क्रीमीलेयर नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए ताकि वास्तविक जरूरतमंदों को इसका लाभ मिले. शिक्षा, नौकरी के लिए आरक्षण के साथ-साथ प्रतिभाओं को भी अवसर दिया जाये. नीति-नियंताओं को, राजनीतिज्ञों को ध्यान रखना होगा कि अब समय आ गया है कि राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर ऐसी राष्ट्रीय नीति पर विचार किया जाए जो योग्यता का सम्मान करे और वंचितों को संबल प्रदान करे.


11 अगस्त 2026

हिन्दी के पंचम वर्ण का प्रयोग

हिन्दी की जितनी दुर्दशा, दुर्गति हम हिन्दी वालों ने की है, उतनी तो शायद लॉर्ड मैकाले की औलादों ने भी नहीं की होगी. इधर सोशल मीडिया के स्थानीय संस्करणों में उरई  का एक वीडियो तैरने में लगा है, जिसमें एक विद्यालय के नाम को लेकर पत्रकारिता आजमाई जा रही है. पत्रकारिता के नाम पर अब तो किसी डिग्री की, डिप्लोमा की, किसी संस्थान की, कैमरे की आवश्यकता ही नहीं, बस जेब में हाथ डाला, मोबाइल निकाला और बन गए पत्रकार. ऐसे ही किसी पत्रकार महोदय द्वारा एक द्वार का वीडियो बनाया गया और सोशल मीडिया पर उछाल दिया गया. इस उछाल के साथ एक सवाल भी चिपका दिया गया मगर बिना किसी ज्ञान के साथ,  बिना किसी व्याकरण की जानकारी के.


समस्या अकेले उन महाशय की नहीं, समस्या उनके साथ उछलते अनेक ज्ञानियों की है जिन्होंने हिन्दी व्याकरण तो छोड़िए, हिन्दी से भी उतना ही नाता रखा है, जितना घर-बाजार में बोलने के काम आता है. हिन्दी व्याकरण से, उसके सामान्य रूप से, वर्णों से, वर्णमाला के वर्गों से, पंचम वर्णों से, उनके प्रयोग से कोई लेना-देना नहीं है. लॉर्ड मैकाले की दुनिया में विचरण करते इन लोगों को हिन्दी की सामान्य जानकारी ही नहीं और ऐसे लोग ही इधर-उधर हिन्दी के प्रति सवाल उठाते हुए उसे बदनाम करने का काम करते रहते हैं.

 



यहाँ उस वीडियो से, उस नाम से, उस विद्यालय से सन्दर्भ भले हो  मगर उनकी चर्चा किये बिना सीधे-सीधे हिन्दी के वर्गों, पंचम वर्णों के बारे में कुछ सामान्य जानकारी दे दें. इसी से अंदाजा लगा लिया जायेगा कि उस वीडियो की, विद्यालय के लिखे नाम की वास्तविकता क्या है. हिन्दी वर्णमाला में स्वर, व्यंजन के बारे में तो आपको जानकारी होगी ही और संभवतः उनको भी जानकारी होगी जो उस वीडियो के आसपास भटक रहे हैं.

 

अब हिन्दी वर्णमाला के स्वर, व्यंजन पर चर्चा करने के बजाय चर्चा करते हैं वर्गों की. यहाँ सामान्य रूप से ये वर्ग स्वीकार्य हैं....

क वर्ग = इसमें आते हैं क,,,, 

च वर्ग = इसमें हैं च,,,,

ट वर्ग = इस वर्ग में हैं ट, ठ, ड,,

त वर्ग = इसमें हैं त, थ, द, ध, न

प वर्ग =  इसमें प, फ, ब, भ,

 

अब बात करते हैं लिखने में इनके प्रयोग की. जिस शब्द ‘गांधी’ की बात हो रही है, जो ‘गान्धी’ लिखा हुआ है. इसी से समझा जाये. जब किसी शब्द को लिखने में उस वर्ग के पंचम वर्ण का प्रयोग होता है तो वह उसी वर्ग के वर्ण के ठीक पहले अर्धरूप प्रयोग किया जाता है. जैसे ‘गांधी’ में ‘ध’ के पूर्व पंचम वर्ण का प्रयोग किया जाना है तो यहाँ देखना होगा कि ‘ध’ है त वर्ग का और त वर्ग का पंचम वर्ण है ‘न’ इसलिए हिन्दी व्याकरण के अनुसार ‘गांधी’ में ‘ध’ के पूर्व इस वर्ग का पंचम वर्ण ‘न’ अर्धरूप में आएगा अर्थात ‘आधे न’ के रूप में. इसलिए सही शब्द होगा ‘गान्धी’. लेखन में और टाइपिंग में सहजता बनाने के लिए पंचम वर्ण को आधा लिखने के स्थान पर अनुस्वार (अर्थात बिन्दु के रूप में) लगाया जाना मान्य किया गया है. इसलिए सर्वमान्य रूप में ‘गान्धी’ को ‘गांधी’ लिखा हुआ ही सही समझा जाने लगा है. (वैसे वीडियोधारी पत्रकार महोदय और उनके संगी-साथियों के लिए अनुस्वार, अनुनासिका शब्द भी अपरिचित होंगे. इस पर बाद में.)

 

इस विद्यालय के बोर्ड में आगे ‘इण्टर’ लिखा हुआ है. पता नहीं पत्रकार महाशय के कैमरे ने इसे गलत क्यों नहीं बताया? सम्भव है कि वे इसे ‘इंटर’ लिखे जाने का समर्थन करते हुए ‘इण्टर’ को गलत बता देते. यहाँ भी एक मिनट रुककर पंचम वर्ण और वर्ग के साथ समझ लें तो आने वाले समय में बहुत से इण्टर कॉलेज बचे रहेंगे कैमरे से. ‘इण्टर’ को देखिये और समझिये. यहाँ आधा वर्ण आना है ट वर्ग के पहले, ऐसे में इसी वर्ग का पंचम वर्ण आधा होकर लगेगा. अब गौर करिए ट वर्ग पर, इसका पंचम वर्ण है ‘ण’ और इसे ही आधा होना है. अब यह ‘ट’ के पहले आधा होगा तो सही शब्द होगा ‘इण्टर’. बाकी तो ये है कि टाइपिंग और लेखन की सहजता के लिए इसे ‘इंटर’ भी लिखा जाने लगा है. यह भी सही है. इस सही का तात्पर्य यह कतई नहीं कि ‘इण्टर’ गलत है.

 

हाँ, ये याद रखियेगा कि गांधी या गान्धी के स्थान पर गाँधी अवश्य ही गलत है. ऐसा इसलिए क्योंकि गांधी में स्वर अनुनासिका (चन्द्रबिन्दु) के स्थान पर अनुस्वार (बिन्दु) का है. नहीं हो रहा हो विश्वास तो चन्द्रबिन्दु (अनुनासिका) और बिन्दु (अनुस्वार) का उच्चारण करके देखना, सही शब्द पकड़ में आ जाएगा. हिन्दी का सम्मान न कर सकें, उसके प्रति आप ज्ञानवान न बन सकें तो कम से कम हिन्दी का अपमान तो न करें.