01 October 2022

पोस्टकार्ड का जन्मदिन

संभवतः वर्तमान पीढ़ी संचार के एक माध्यम पोस्टकार्ड के बारे में जो भी जानकारी रखती होगी, वो उसे इंटरनेट से मिली होगी. इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण ऐसे संचार माध्यमों का लगभग बंद हो जाना है. अब मोबाइल और ई-मेल के ज़माने के बहुत कम लोग ऐसे हैं जो पोस्टकार्ड का उपयोग करते होंगे. अभी कुछ साल पहले तक इसका उपयोग परीक्षा फॉर्म प्राप्ति के लिए अवश्य उपयोग करते देखा गया है मगर इसका उपयोग समाचार भेजने या फिर कोई जानकारी भेजने के रूप में देखना नहीं हुआ है. 


आज एक अक्टूबर को पोस्टकार्ड का जन्मदिन मनाया जाता है. ये और बात है कि इस जन्मदिन के बारे में न तो मीडिया में बहुत चर्चा होती है और न ही सोशल मीडिया इस बारे में बहुत बखान करता है. इसके पीछे भी एक कारण बाजार है. आज बाजार की निगाह में पोस्टकार्ड का कोई महत्त्व नहीं, ऐसे में उसके जन्मदिन की चर्चा करना किसी के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं. खैर, यदि पोस्टकार्ड की बात की जाये तो सबसे पहले पोस्टकार्ड का अविष्कार ऑस्ट्रिया में सन १८६९ को आज ही के दिन हुआ था. इस हिसाब से आज पोस्टकार्ड १५३ वर्ष का हो गया है. यहाँ के डॉक्टर इमानुएल हरमान ने पत्राचार के लिए एक सस्ते माध्यम की कल्पना करके पोस्टकार्ड का आविष्कार किया. पोस्टकार्ड ने अपने जन्म के साथ ही इतनी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर ली कि एक महीने में ही पंद्रह लाख पोस्टकार्ड की बिक्री हो गई. उसकी लोकप्रियता देखकर बाकी देशों ने भी इसे अपनाने में देरी नहीं की. ब्रिटेन ने सन १८७२ में पोस्टकार्ड जारी कर दिया. इसके सात वर्षों बाद ही सन १८७९ में भारत ने भी पोस्टकार्ड को जारी कर दिया. 


भारत में पहले पोस्टकार्ड की कीमत तीन पैसे थी. यहाँ भी इसकी लोकप्रियता में किसी तरह की कमी नहीं आई. पहले नौ महीने में ही भारत में ७.५ लाख रुपए के पोस्टकार्ड बिक गए.  भारत में पोस्टकार्ड की डिज़ाइन और छपाई का कार्य मेसर्स थॉमस डी०ला०रयू० एण्ड कंपनी लंदन के द्वारा किया था. उस समय पोस्टकार्ड को दो मूल्यवर्गों में बाँटा गया था. इसमें एक पोस्टकार्ड वे थे जिनका मूल्य एक पैसा था. यह कार्ड अन्तरदेशीय प्रयोग के लिए उपयोग में लाया जाता था. दूसरी तरह के कार्ड में डे‌ढ़ आना मूल्य वाला कार्ड था. इसका उपयोग उन देशों के लिए था जो अंतरराष्ट्रीय डाक संघ से संबद्ध थे.


पोस्टकार्ड भले ही किसी तरह के संदेश भेजने का सबसे सस्ता माध्यम हो किन्तु भारत सरकार के लिए यह एक महंगा सौदा है. प्रत्येक पोस्टकार्ड के लिए सरकार को उसके प्रिंट मूल्य से कहीं अधिक मूल्य चुकता करना पड़ता है. इस तरह से सरकार को पोस्टकार्ड छापने में घाटा उठाना पड़ता है. इस घाटे की पूर्ति के लिए सरकार ने पोस्टकार्ड में एक तरह का विज्ञापन देना शुरू किया. २१ जुलाई १९७५ में जारी किए गए पोस्टकार्ड में सरकार ने एक तरफ अपनी ओर से संदेश छापना शुरू किया. बाद में इस तरह के पोस्टकार्ड की बिक्री मेघदूत के नाम से की गई. आज भी सामान्य पोस्टकार्ड की कीमत ५० पैसे और मेघदूत पोस्टकार्ड की कीमत २५ पैसे बनी हुई है.


आप सबके आश्चर्य की बात ये है कि हम आज भी पोस्टकार्ड का उपयोग करते हैं. हमें भले ही कोई जवाब दे या न दे मगर हम आज भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के लेखकों को, सोशल मीडिया के मित्रों को अपने अन्य परिचितों को मेघदूत पोस्टकार्ड भेजा करते हैं.   

 










 

25 September 2022

पुस्तकों से दूर होता युवा

इंसानों ने अपने विकास के विभिन्न चरणों में खुद को और अधिक विकसित करने के लिए तकनीक का चयन किया, उसके द्वारा विभिन्न उपकरणों का निर्माण किया. निश्चित ही ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य जीवन-शैली को सहज ढंग से चलाना रहा होगा. इसी सहज जीवन की संकल्पना में मोबाइल भी बनाया गया होगा. मोबाइल ने इंसानों की ज़िन्दगी को कितना आसान किया या कितना कठिन किया, इस बारे में सबकी अलग-अलग राय है. इसके बाद भी एक बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि मोबाइल के आने ने, मोबाइल के अत्यधिक उपयोग ने प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से, समाज से जैसे अलग कर दिया है. प्रत्येक व्यक्ति अपने मोबाइल के साथ अपने ही बने-बनाए एक खाँचे में बंद नजर आ रहा है. कहीं भी निकल जाइए, किसी भी जगह नजर दौड़ाइए, हर कोई मोबाइल में तल्लीन दिखाई दे रहा है. बड़े हों या बच्चे, युवा हों या वृद्ध, स्त्री हो या पुरुष, अधिकारी हो या व्यापारी सभी के सभी मोबाइल में ऐसे मग्न समझ आते हैं जैसे बिना मोबाइल के उनका एक पल काटना मुश्किल है.


मोबाइल किसके लिए कितना उपयोगी है, कितना नहीं यह उसकी स्थिति और उसके कार्य पर निर्भर करता है. इधर देखने में आ रहा है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों के विद्यार्थी भी मोबाइल का बुरी तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें से शायद ही इक्का-दुक्का होंगे जो अपने पाठ्यक्रम से सम्बंधित जानकारियों को मोबाइल पर खोजते होंगे. महाविद्यालय में घुसते ही चारों तरफ हरियाली मन प्रसन्न कर देती है और उसी हरियाली के बीच जगह-जगह लड़के-लड़कियों के छोटे-छोटे झुण्ड सेल्फी लेने में तल्लीन दिखाई देते हैं. अध्ययन संस्थाओं के अलावा भी बाजार में, टैम्पो में, बस में, ट्रेन में, रिक्शे आदि में भी लड़के, लड़कियों का मोबाइल से चिपके रहना दिखाई देता है. अब सफ़र के दौरान या फिर कहीं फुर्सत के समय में युवाओं का किताबों से दोस्ती करते दिखाई पड़ना लगभग विलुप्त सा हो गया है.




सफ़र के दौरान, ट्रेन या बस का इंतजार करने के समय, खाली समय में पहले की तरफ अब इक्का-दुक्का लड़के-लड़कियाँ दिखाई देते हैं जो किसी पुस्तक के साथ हैं. युवा वर्ग बहुतायत में अपने मोबाइल में ही मगन है. तकनीकी ने ही पुस्तकों का विकल्प किंडल संस्करण के रूप में उतारा था. इसके प्रति भी युवाओं का रुझान बहुत ज्यादा देखने को नहीं मिलता है. समझ नहीं आता है कि आखिर कोई युवा बिना पढ़े कैसे अपने आपको भविष्य के लिए तैयार कर रहा है? इस आश्चर्य से ज्यादा आश्चर्य की बात यह लगती है कि अध्यापन से जुड़े हुए बहुतेरे लोग भी किताबों से दूरी बनाये हुए हैं. अपने आसपास के लोगों में, अपनी मित्र-मंडली में बहुत कम ही मित्र ऐसे मिलते हैं जो पुस्तक पाठन के प्रति आकर्षण बनाये हुए हैं. आये दिन प्रकाशित होने वाली पुस्तकों के सम्बन्ध में चर्चा करने पर जानकारी मिलती है कि न तो युवा वर्ग के लोग पुस्तक पढ़ना चाहते हैं और न ही बच्चों को पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. 


असल में पठन-पाठन के प्रति रुचि को जागृत करना पड़ता है. समाज में जिस तरह से मोबाइल के अथवा अन्य आधुनिक उपकरणों के आने से व्यक्तियों ने अपने आपको उसी में व्यस्त रखना शुरू कर दिया है, उससे भी पुस्तकों के प्रति लोगों की अरुचि देखने को मिलती है. मोबाइल और इंटरनेट की सहज उपलब्धता में युवा वर्ग तेजी से सोशल मीडिया की तरफ मुड़ा है. उसका बहुतायत समय इसी पर गुजरने लगा है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर उसकी लेखकीय सक्रियता देखने को मिलती है किन्तु यह भी सीमित शब्दों में बनी हुई है. इन सीमित शब्दों की लेखकीय यात्रा में भी ज्यादातर युवा कॉपी-पेस्ट की तकनीक के सहारे अपना काम चला रहे हैं. यह सोचने वाली बात है कि जब पढ़ा ही नहीं जा रहा है तो लिखा कैसे जा सकता है? लिखने के पहले बहुत सारा पढ़ने की आवश्यकता होती है. सच तो यह है कि अब घरों से ही धीरे-धीरे पढ़ने की, पुस्तकें-पत्रिकाएं लाने की प्रक्रिया ही समाप्त होती जा रही है.


चूँकि एक धारणा लगभग सभी ने बना रखी है कि मोबाइल के, तकनीक के इस दौर में आज सबकुछ इंटरनेट पर उपलब्ध है. इसने भी पढ़ने के प्रति सक्रियता को कम किया है. किसी भी जानकारी के लिए, तथ्यात्मक खोज के लिए बजाय पुस्तकों के युवा वर्ग अब मोबाइल की तरफ जाना पसंद करने लगे हैं. यही कारण है किंडल संस्करण एकसाथ, एक जगह पर हजारों-हजार पुस्तकों को उपलब्ध करवाने के बाद भी युवा वर्ग में पुस्तक पाठन के प्रति शौक पैदा नहीं कर पा रहा है. इसका एक बहुत बड़ा कारण बचपन से ही बच्चों में किताबों को पढ़ने के लिए प्रेरित न कर पाना रहा है. आज बच्चे जिस शौक के साथ मोबाइल को अपना साथी बना रहे हैं, यदि उन्हें किताबों का महत्त्व समझाएं, उसकी उपयोगिता के बारे में बताते हुए किताबें पढ़ने को प्रोत्साहित करें तो संभव है कि वे इस ओर आगे बढ़ें. बच्चों को समझाना होगा कि अपने देश की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, महापुरुषों आदि के बारे में जानने-समझने के लिए किताबों से अच्छा कोई साथी नहीं. वास्तव में यदि समझ आ जाये तो पुस्तकों से बेहतर कोई मित्र नहीं. सफ़र हो, घर को, भीड़ हो, अकेलापन हो या कहीं, कैसी भी स्थिति सभी में किताबें मित्रवत साथ निभाती हैं.




 

19 September 2022

कुंठित यौनेच्छा या स्वतंत्रता

समाज में किसी भी व्यक्ति द्वारा जो भी कृत्य किया जाता है वह किसी न किसी रूप में उसके द्वारा सोचा-विचारी की स्थिति के बाद ही होता है. कभी यदि कोई कदम अचानक से उठ भी जाता है तो उसके पीछे भी अचेतन में बैठी भावना या फिर तात्कालिक घटनाक्रम प्रमुख होता है. यही कारण है कि प्रत्येक कार्य के पीछे का कारण ही उस कार्य की दिशा तय करता है. अभी हाल में ही स्नान करती छात्राओं के वीडियो शेयर करने का जो मामला सामने आया, उसके पीछे भी कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा, ये और बात है कि अभी तक इस मामले की तह तक नहीं पहुँचा जा सका है. उस घटना का अंतिम और मुख्य उद्देश्य क्या होगा, ये तो यथासंभव जाँच के बाद ही सामने आएगा किन्तु समाज में जिस तरह से नग्नता को, सेक्स को पोषित-पल्लवित किया जा रहा है, उससे एक उद्देश्य यौनिक कुंठा से सम्बंधित भी समझ आता है.  


ये अपने आपमें एक परम सत्य है कि सेक्स किसी भी जीव की नैसर्गिक आवश्यकता है. न केवल इंसानों में वरन जानवरों में भी इसको देखा गया है, यहाँ तक कि पेड़-पौधों में भी आपस में निषेचन क्रिया संपन्न होती है, जो एक तरह से सेक्स का ही स्वरूप है. बहरहाल, जिस तरह से मानव समाज के विकास की स्थितियाँ बन रही हैं, विकसित हो रही हैं, उनके साथ-साथ सेक्स सम्बन्धी समस्याओं में, दुराचार की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिली है. वर्तमान में हालात ये हैं कि किसी भी तरह का कार्यक्रम हो, किसी भी तरह का विज्ञापन हो, किसी भी तरह की फिल्म या धारावाहिक हो सभी में सेक्स को, शारीरिक संबंधों को प्रमुखता से दिखाया जाता है. किसी दौर में ऐसी बातों को फिल्माने में किसी न किसी संकेत का, रूपक का सहारा लिया जाता था मगर अब स्वाभाविकता का नाम लेकर ऐसे दृश्यों का खुलेआम फिल्मांकन होता है. बच्चों के टीवी कार्यक्रमों में बच्चों को भौंड़ी, कामुक मुद्राओं में थिरकते देखा जाता है. उनको द्विअर्थी संवादों में प्रदर्शन करते देखा जा सकता है. अनेकानेक उत्पाद ऐसे हैं जिनको देखकर ऐसा ही लगता है कि उस उत्पाद का निर्माण एकमात्र इसी उद्देश्य से किया गया है कि विपरीतलिंगियों में आकर्षण पैदा हो जाये, उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाये. अब तो इनसे भी एक कदम आगे बढ़कर सोशल मीडिया में शार्ट वीडियो, रील्स आदि के माध्यम से अश्लीलता, नग्नता, कामुक मुद्राओं को हर हाथ में देखा जा रहा है. किसी भी तरह की आपत्ति पर इनको स्वतंत्रता के नाम का आवरण ओढ़ाया जाने लगता है.




आखिरकार यहाँ समझना ही होगा कि स्वतंत्रता है क्या? जीवनशैली आखिर किस तरह से संचालित की जाये? इसे भी समझने की जरूरत है कि कहीं जीवनशैली की स्वतंत्रता के नाम पर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर व्यक्ति सेक्स संबंधों में स्वतंत्रता तो नहीं चाह रहा है? कहीं स्वतंत्रता के नाम पर सेक्स को समाज में कथित तौर पर स्थापित करने की साजिश तो नहीं? सेक्स को लेकर, शारीरिक संबंधों को लेकर, विपरीतलिंग को लेकर समाज में जिस तरह से अवधारणा निर्मित की जा रही है, उसे देखते हुए लगता है जैसे इंसान के जीवन का मूलमंत्र सिर्फ और सिर्फ सेक्स रह गया है. दृश्य-श्रव्य माध्यमों में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों, विज्ञापनों में भी सेक्स का प्रस्तुतीकरण इस तरह से किया जाता है जैसे बिना इसके इंसान का जीवन अधूरा है. समस्या यहीं आकर आरम्भ होती है क्योंकि प्रस्तुतीकरण के नाम पर फूहड़ता का प्रदर्शन ज्यादा किया जाता है; दैहिक संतुष्टि के नाम पर जबरन सम्बन्ध बनाये जाने की कोशिश की जाती है; प्यार के नाम पर एकतरफा अतिक्रमण किया जाता है; स्वतंत्रता के नाम पर रिश्तों का, मर्यादा का दोहन किया जाता है. सोचना होगा कि कल को वे मानसिक विकृत लोग, जो दैहिक पूर्ति के लिए जानवरों तक को नहीं बख्शते हैं, अपने अप्राकृतिक यौन-संबंधों को जायज ठहराने के लिए सडकों पर उतर आयें, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर, जीवनशैली चुनने की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी जानवर के साथ को कानूनी स्वरूप दिए जाने की माँग करने लगें तो क्या ऐसे लोगों की मांगों को स्वीकारना होगा?


जिस तरह से इक्कीसवीं शताब्दी के नाम पर उत्पादों, विचारों, खबरों, कार्यक्रमों, भावनाओं का प्रचार-प्रसार किया गया है उसमें इंसान की वैयक्तिक भावनाओं को ज्यादा महत्त्व प्रदान किया गया है. उसके लिए सामूहिकता, सामाजिकता, सहयोगात्मकता आदि को दोयम दर्जे का सिद्ध करके बताया गया है, व्यक्ति की नितांत निजी स्वतंत्रता को प्रमुखता प्रदान की गई है, ये कहीं न कहीं सामाजिक विखंडन जैसी स्थिति है. पाश्चात्य जीवनशैली को आधार बनाकर जिस तरह से भारतीय जीवनशैली में दरार पैदा की गई है वह भविष्य के लिए घातक है. इसके दुष्परिणाम हमें आज, अभी देखने को मिल रहे हैं. जिस उम्र में बच्चों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए वे रोमांस में घिरे हुए हैं; जिस क्षण का उपयोग उन्हें अपना कैरियर बनाने के लिए करना चाहिए उन क्षणों को वे शारीरिक सुख प्राप्त करने में व्यतीत कर रहे हैं; जो समय उनको ज्ञानार्जन के लिए मिला है उस समय में वे अविवाहित मातृत्व से निपटने के उपाय खोज रहे हैं. जिस मोबाइल को संचार का, जानकारी का केन्द्र होना चाहिए था उसके द्वारा अश्लीलता का, कामुकता का प्रदर्शन किया जा रहा है.


हमारे देश की पीढ़ी सेक्स, समलैंगिकता, अविवाहित मातृत्व, विवाहपूर्व शारीरिक सम्बन्ध, सुरक्षित सेक्स आदि की मीमांसा, चिंतन करने में लगा हुआ है. संभव है कि ऐसे लोगों के सामने भारतीय संस्कृति का कोई व्यापक अथवा सकारात्मक अर्थ ही न हो क्योंकि इस पीढ़ी ने मुख्य रूप से दैहिक सम्बन्धों की चर्चा अपने आसपास होते देखी है. यहाँ आकर समझना होगा कि सेक्स, शारीरिक सम्बन्धों के मामले में नितांत खुला जीवन जीने वाले पाश्चात्य देशवासी भी कहीं न कहीं संयमित भारतीय जीवनशैली के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. सेक्स को, दैहिक तृष्णा को एकमात्र उद्देश्य मानकर आगे बढ़ती पीढ़ी न केवल सामाजिकता का ध्वंस कर रही है बल्कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ भुलाकर समाज में एक दूसरे तरह की गुलामी को जन्म दे रही है. काश! स्वतंत्रता के नाम पर अधिकारों को समझा जाए न कि अनाधिकार चेष्टा को; काश! वैयक्तिक जीवनशैली के नाम पर रिश्तों की मर्यादा को जाना जाए न कि उनके अमर्यादित किये जाने को; काश! निजी जिंदगी के गुजारने के नाम पर पारिवारिक सौहार्द्र को समझा जाए न कि जीवन-मूल्यों के ध्वंस को; काश! जीवन को जीवन की सार्थकता के नाम पर समझा जाये न कि कुंठित सेक्स भावना के नाम पर. काश....!!!

 





 

17 September 2022

तारीखों का एहसास

तारीखों का भी अपना एक अलग एहसास होता है. किसी भी महीने की किसी भी तारीख को किसी ऐसी घटना के घटित होने पर, जो व्यक्ति के दिल-दिमाग पर अपना प्रभाव छोड़ जाती है, वह तारीख प्रत्येक महीने अपने उसी एहसास के साथ सामने आती है. किसी ख़ुशी की घटना के होने के कारण वह तारीख सुखद एहसास दिलाती है और यदि इसके उलट यदि उस तारीख में कुछ सुखद न हुआ हो तो वह तारीख ग़म का एहसास कराती है. कभी-कभी लगता है कि क्या उन तारीखों में किसी तरह की तासीर होती है या फिर उन घटनाओं में, जो सम्बंधित तारीख आने पर उस घटना का एहसास कराती हैं. ऐसा इसलिए दिमाग में आता है कि यदि एक पल को मान लिया जाये कि किसी वैश्विक योजना का अनुपालन करते हुए यदि कैलेण्डर ही बदल दिया जाये, उनकी तारीखों का क्रम बदल दिया जाये अथवा उनको किसी और नाम से परिभाषित कर दिया जाये तो किसी तारीख विशेष में उस दिन घटित घटना का एहसास किस तरह का होगा?




ये सवाल अपने आपमें काल्पनिक ही हैं मगर व्यक्तिगत रूप से हमें लगता है कि किसी भी घटना का घटित होना एक एहसास तो जगाता ही है मगर उसमें सबसे बड़ी भूमिका उस दिन की, उस तारीख की होती है. हम सबने महसूस किया होगा कि कोई भी घटना हमें पूरे माह याद नहीं आती मगर जैसे-जैसे उस तारीख का नजदीक आना होता है, तो वह घटना बहुत तेजी से अपना एहसास जगाती रहती है. इसके पीछे संभवतः उस तारीख के रूप में उस घटना का केन्द्रित किया जाना प्रमुख हो. देखा जाये तो कैलेण्डर, तिथियाँ आदि का निर्माण ही किसी भी घटना को याद रखने के लिए किया गया होगा. इन्हीं के आधार पर हम सभी अच्छी-बुरी घटनाओं को याद रखते हैं.


तारीखों का होना हम सबके जीवन में एक अलग तरह का एहसास जगाना है. इसमें भी यदि किसी एक ही तारीख को किसी एक ही व्यक्ति के साथ अच्छी और बुरी घटना का जुड़ना एकसाथ हो जाये तो उसके एहसासों में अलग तरह की लहरों का उठना-गिरना होता है. इसमें भी उस तारीख की ही भूमिका प्रमुख होती है. 




 

14 September 2022

मोक्ष की अवधारणा और कुछ सवाल

सनातन संस्कृति में मोक्ष की अवधारणा को लेकर बहुत सी बातें कही गईं हैं. जीव के जीवन-मरण से मुक्ति का मार्ग मोक्ष को स्वीकारा गया है. इसी की प्राप्ति के लिए ऐसा माना जाता है कि तमाम सारी प्रजातियों में मनुष्य जन्म मिलना सौभाग्य की बात होती है और इसी जन्म में ऐसे कर्म कर लेने चाहिए कि व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो जाये. मोक्ष प्राप्ति की अवधारणा की सहज स्वीकार्यता के कारण ही मनुष्यों को सत्कर्म करने के प्रति प्रेरित किया जाता है. उनको सभी प्रकार की बुराइयों से दूर रहने का प्रवचन दिया जाता है. इसी के साथ-साथ उनको भगवान की भक्ति करने, परोपकार करने, ईश्वर का नाम लेने की सलाह दी जाती है.


यहाँ एक बात समझने वाली ये है कि क्या मोक्ष की लालसा में किये जाने वाले सद्कार्य लालच की श्रेणी में नहीं आते हैं. जिस सनातन संस्कृति में मोक्ष की अवधारणा है, उसी में कहा गया है कि किसी फल की आशा में कार्य नहीं करना चाहिए. यहाँ तो ईश्वर का नाम, भगवान-भक्ति, परोपकार आदि मोक्ष की कामना के साथ किये जा रहे हैं. देखा जाये तो यह विशुद्ध लालच ही है. ऐसे में एक लालच के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति कैसे संभव है? यहीं एक सवाल और मन में उभरता है कि आखिर मोक्ष की प्राप्ति किसके लिए, किसलिए? क्या किसी को अपने जन्म के पहले के जन्मों या जन्म का भान है कि उसे कष्ट मिले थे या सुख? यदि ये मान लिया जाये कि बहुत से लोग अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर गए होंगे तो क्या उनको इसका एहसास होगा कि वे जन्म-मरण से मुक्ति पा गए हैं? वे अब मोक्ष प्राप्त कर गए हैं?




एक पल को सारी बातों को दरकिनार करते हुए मान लिया जाये कि सभी जीवों द्वारा किसी भी तरह का बुरा काम, गलत कर्म करना बंद कर दिए गए. सभी अपनी-अपनी तरह से ईश्वर की भक्ति में लीन रहने लगे, परोपकार करने लगे. ये भी मान लिया जाये कि सभी को अपने इन्हीं सद्कर्मों से मोक्ष मिल गया तो क्या ये प्रकृति के विरुद्ध कार्य नहीं है? क्या इससे सृष्टि सञ्चालन की व्यवस्था अवरुद्ध नहीं हो जाएगी? ऐसा इसलिए कि यदि सभी जीवों को मोक्ष मिल जायेगा, सभी को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी तो फिर इस सृष्टि में जन्म किसका होगा? इस प्रकृति का सञ्चालन कैसे होगा?


संभव है कि हम अल्पज्ञानी की समझ से बाहर हों उक्त बातें किन्तु मन की जिज्ञासा को शांत करना चाहते हैं.  

 





 

10 September 2022

शैक्षिक नवाचार की आवश्यकता

भारत जैसे सांस्कृतिक और ज्ञानदायी देश में अनुसन्धान और नवाचार की चर्चा हो रही है. शून्य का अविष्कार करने वाले देश में अब यदि नवाचार, अनुसन्धान की चर्चा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के द्वारा शुरू हुई है तो उसका स्वागत होना चाहिए. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक अनुसंधान को गति प्रदान करने के उद्देश्य से अनुसंधान परिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता पर बल दिया गया है. इसके अंतर्गत नेशनल रिसर्च फाउन्डेशन (एनआरएफ) के गठन का उल्लेख किया गया है. अनुसंधान और नवाचार पर दृष्टिपात किया जाये तो हमारे देश के कुल जीडीपी का 0.64 प्रतिशत ही इस क्षेत्र में निवेश किया जाता है. इसके उलट अन्य पश्चिमी देशों में फ्रांस में 2.25 प्रतिशत, अमेरिका में 2.74 प्रतिशत, चीन में 2.11 प्रतिशत और इजराइल में 4.3 प्रतिशत तक निवेश किया जा रहा है. कुछ इसी तरह की स्थिति वैज्ञानिकों के क्षेत्र में है. देश में 10 लाख जनसंख्या पर केवल 216 वैज्ञानिक हैं जबकि फ्रांस और अमेरिका में प्रति दस लाख पर 4300 एवं चीन में प्रति दस लाख पर 1200 वैज्ञानिक हैं.


आज जब तकनीकी बहुत तेजी से परिवर्तित हो रही है, शिक्षा व्यवस्था में भी लगातार आमूल-चूल परिवर्तन हो रहे, ऐसे में शैक्षिक नवाचार पर बहुत गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है. शिक्षा की विकासोन्मुख प्रक्रिया को प्रदर्शित करने वाली अवधारणा का नाम ही शैक्षिक नवाचार है. नवाचार शब्द का प्रयोग वैज्ञानिक युग में शैक्षिक तकनीकी के प्रावधानों के चलते और अधिक बढ़ गया है. नवाचार दो शब्दों नव और आचार से मिल कर बना है. यहाँ नव का अर्थ नए और आचार का अर्थ व्यवहार से लगाया गया है. शिक्षा के प्रचलित व्यवहारों के अन्तर्गत सम्मिलित सभी तरह के चिंतन, प्रक्रिया के साथ-साथ नवाचार के द्वारा शैक्षिक तकनीकी के रूप में शिक्षा दर्शन, मनोविज्ञान और विज्ञान आदि के समस्त बिन्दुओं को सम्मिलित करना है.




देश में शिक्षा व्यवस्था के जितने भी क्षेत्र हैं, चाहे वो प्राथमिक क्षेत्र हो या फिर उच्च शिक्षा का, उन सभी के शिक्षकों में नवाचार की अपार संभावनाएँ मौजूद होती हैं. एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों की क्षमता और उनके कौशल के बारे में बहुत नजदीक से परिचित होता है, ऐसे में वह शैक्षिक नवाचार के द्वारा उनके भीतर अनेकानेक संभावनाओं को विकसित कर सकता है. इसके बाद भी एक सामान्य शिक्षक पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना, उसमें समाहित जानकारी को प्रेषित कर देना, विद्यार्थियों की परीक्षा करवा देना आदि को ही अपना मुख्य कार्य समझता है. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जबकि एक शिक्षक द्वारा अपने विद्यार्थियों के भीतर जिज्ञासा को उत्पन्न करे, अपने आसपास के वातावरण को जानने-समझने की अभिलाषा जगाये, उनमें सवाल करने की क्षमता का विकास करे. एक परम्परागत तरीके से संचालित शिक्षा व्यवस्था में नवाचार जैसी स्थिति उसी समय जन्म ले सकती है, विकसित हो सकती है जबकि उसके प्रति स्वतंत्र ढंग से विचार किया जाये. किताबी ज्ञान देना, नोट्स बनवाना, सूत्रबद्ध परीक्षा प्रणाली के उसी बंधे-बंधाये ढर्रे पर चलते रहने से नवाचार के लिए बहुत कम स्थान मिल पाता है.


शिक्षा क्षेत्र में नवाचार को अनिवार्य रूप से थोपने के स्थान पर स्वेच्छिक रूप से विद्यार्थियों द्वारा इसे सीखने के क्रम में अपने अध्ययन का विषय बनाया जाना चाहिए. रोजमर्रा के जीवन में अनेकानेक घटनाएँ ऐसी उत्पन्न होती हैं, जिनके माध्यम से सहज ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है. जिस तरह ज्ञान को, जानकारी को, शिक्षा को सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता है उसी तरह से शैक्षिक नवाचार को भी नियंत्रण में नहीं रखा जा सकता है. सीखने की अभिलाषा कहीं से भी उत्पन्न हो सकती है, ज्ञान किसी भी तरह से प्राप्त किया जा सकता है. इस बारे में महज इसका ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जिस शैक्षिक नवाचार के द्वारा जानकारी, शिक्षा देने का कार्य किया जा रहा है वह विद्यार्थी के लिए, समाज के लिए उपयोगी है या नहीं.


यहाँ यह समझना अत्यावश्यक है कि एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के साथ-साथ आर्थिक विकास के लिए शैक्षिक नवाचार का होना बहुत आवश्यक है. सामाजिक कल्याण की दृष्टि से वर्तमान शिक्षा नीति के साथ-साथ पुरानी शिक्षा नीतियों में निःशुल्क शिक्षा, अनिवार्य शिक्षा, कमजोर वर्ग के लिए शिक्षा आदि को लागू किया गया. यह भी सच है कि जब तक देश का कोई भी वर्ग शिक्षा से वंचित रहता है तो उस देश का आर्थिक विकास भी प्रभावित होता है. आर्थिक विकास को दृष्टिगत रखते हुए सभी के लिए शिक्षा व्यवस्था में दूरस्थ शिक्षा, ऑनलाइन शिक्षा आदि जैसे कदम उठाये गए. चरवाहा विद्यालय को इसका सशक्त उदहारण माना जा सकता है. विद्यार्थियों में किस तरह वैज्ञानिक अभिरुचि जागृत हो, कैसे वे तकनीकी का उपयोगकर्ता बनकर न रहें बल्कि उसके अविष्कार में भी सहभागी बनें यह नवाचार के द्वारा भली-भांति समझाया जा सकता है. शैक्षिक नवाचार जहाँ एक तरफ शिक्षा, ज्ञान के प्रसार में सहायक बनेंगे वहीं दूसरी तरफ उनके माध्यम से रोजगार के अवसरों को भी बढ़ाया जा सकता है. विगत दिनों कोरोना महामारी के दौरान अनेक नवाचारी लोगों ने आपदा को अवसर में बदलते हुए स्व-विकास किया.  


तकनीकी और सामाजिक परिवर्तनों की दृष्टि से नवाचार की आवश्यकता है. शैक्षिक नवाचारों के प्रयोग से सामाजिक उन्नति संभव है. हम सभी को समझना होगा कि वर्तमान में शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य एक डिग्री प्राप्त करना और उस डिग्री के सहारे एक नौकरी, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का मोटा सा पैकेज प्राप्त करना रह गया है. किसी नई खोज को, नए अनुसन्धान को करने के प्रति लालसा समाप्त सी दिख रही है. इस कारण से सीखने की मानसिकता में तेजी से क्षरण होता दिख रहा है. अब जबकि इस तरफ ध्यान दिया जा रहा है तो देश का नागरिक होने के कारण सभी की जिम्मेवारी बनती है कि वे अपने-अपने स्तर से शैक्षिक नवाचार का हिस्सा बनें.  




 

07 September 2022

दोस्ती, विश्वास, अधिकार का सह-सम्बन्ध

दोस्ती को किसी भी रिश्ते से अलग और सबसे ऊपर माना जाता है. हमारा भी व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि दोस्ती का रिश्ता सबसे अलग होता है. विगत कुछ वर्षों के जो अनुभव रहे हैं, उनके आधार पर इसके साथ कुछ बातों का और भी अनुभव किया है. दोस्ती के साथ-साथ अन्य आयाम भी जुड़कर चलते हैं, जिनके बारे में अक्सर विचार किया नहीं जाता है. संभव है ऐसा करने के पीछे का कारण यही रहता हो कि दोस्ती को सबसे ऊपर माना जाता है. यदि बारीकी से देखा जाये तो दोस्ती के साथ-साथ अधिकार और विश्वास भी उतनी ही महती भूमिका में रहते हैं. इन दोनों को उसी नजरिये से एकसाथ नहीं देखा जा सकता है, जैसा कि दोस्ती को देखा जाता है. 


किसी भी व्यक्ति के साथ दोस्ती में गहराई या मजबूती उसी स्थिति में आती है जबकि उसके साथ विश्वास की मजबूती हो. जहाँ विश्वास में लेशमात्र भी संदेह, संशय रहेगा वहाँ दोस्ती जैसा कुछ भले हो मगर दोस्ती नहीं हो सकती. इसे जान-पहचान, परिचय, सम्बन्ध आदि कुछ भी कहा जा सकता है. असल में दो लोगों के बीच की मेल-मुलाकात, उनके बीच का परिचय, उनके मध्य की बातचीत को दोस्ती के दायरे में नहीं लाया जा सकता है. दोस्ती का अर्थ ही विस्तार लिए है, गहराई लिए है. दोस्ती महसूस करने की, स्वयं में जीने की स्थिति है न कि किसी रिश्ते का नामकरण. इसलिए दोस्ती में विश्वास का होना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.  




इसके अलावा दोस्ती के साथ जिस अन्य आयाम को हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है वह है अधिकार. अधिकार एक तरह की वह स्थिति है जो दो व्यक्तित्वों को एक-दूसरे में आपस में परिवर्तित कर देती है. ऐसा दोस्ती के सन्दर्भ में ही हमने महसूस किया है, अनुभव किया है. संभव है कि अन्य किसी स्थिति में अधिकार का मंतव्य कुछ और निकलता हो. दोस्ती और अधिकार के बीच के साहचर्य को, सह-सम्बन्ध को जब देखते हैं तो लगता है कि दोस्ती भले ही कितनी प्रगाढ़ हो, दोस्ती में कितनी ही गहराई क्यों न हो मगर अधिकार का दायरा अलग-अलग होता है. जिस व्यक्ति से दोस्ती अपने परम-पावन रूप में पूरी ईमानदारी के साथ हो, आवश्यक नहीं कि उसके ऊपर अधिकार भी उसी शिद्दत से हो. उसी एक व्यक्ति के विभिन्न स्वरूपों, कार्यों आदि में अधिकार की स्थिति बदलती रहती है.  


अक्सर देखने में आता है कि अधिकार को एकआयामी बिंदु मानकर उसे स्वीकार किया जाता है और ऐसी स्थिति में दोस्ती के सन्दर्भ में अक्सर ग़लतफ़हमी पैदा होने लगती है. यहाँ विश्वास और अधिकार की स्थिति में अंतर को भी समझना होगा. विश्वास का अर्थ सीधे-सीधे विश्वास से है. यहाँ कम या ज्यादा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता है. विश्वास है तो है, नहीं है तो नहीं है. ऐसा किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता है कि किसी एक कार्य के सन्दर्भ में अथवा किसी परिस्थिति के सम्बन्ध में विश्वास का स्वरूप बदल जाए. इसके उलट अधिकार के अनेकानेक पक्ष सामने आते हैं. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि भले ही आपकी किसी व्यक्ति के साथ अत्यंत गहरी दोस्ती है मगर संभव है कि उसके परिवार के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार आपको नहीं हो. परिवार से इतर उसी व्यक्ति के सन्दर्भ में देखें तो भले ही उस दोस्त के क्रियाकलापों पर, उसके कार्यों पर आपका अधिकारपूर्ण हस्तक्षेप रहता हो मगर ऐसा भी संभव है कि उसके कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में किसी अन्य तरह का अधिकार आपको न हो. अधिकार के आयाम विभिन्न स्वरूपों में दोस्ती के साथ चलते रहते हैं. यहाँ अधिकार के अलग-अलग स्वरूपों के कारण दो व्यक्तियों की दोस्ती में अंतर के बाद भी दोस्ती का चरम स्वरूप, पावन रूप देखा जा सकता है.  


दोस्ती अत्यंत पवित्र रिश्ता है जो किसी भी रिश्ते के नामकरण का मोहताज नहीं. उसके लिए किसी तरह की कोई परिधि नहीं. उसके लिए कोई दायरा नहीं. इसके बाद भी व्यक्तिगत संबंधों, अनुभवों, एहसासों के आधार पर महसूस किया है कि दोस्ती के साथ अधिकार का सम्बन्ध वह नहीं है जो दोस्ती के सन्दर्भ में है. दोस्ती, विश्वास, अधिकार की आपसी संरचना को समझने की आवश्यकता है, उनके बीच के सह-सम्बन्ध को भी समझने की आवश्यकता है. अक्सर इन्हीं को समझने की चूक में दोस्ती जैसा रिश्ता पल भर में अपने अस्तित्व को खो देता है. अधिकारों के नाम पर व्यक्ति कई बार अपने दायरे से बाहर भी निकल जाता है. ऐसा करना एक तरह का अतिक्रमण ही होता है. अधिकारों के आयामों को न समझने के कारण, उनको उनकी परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार न करने के कारण दोस्ती के स्वरूप को विकृत होते भी देखा गया है.  





 

04 September 2022

मोना अंकल की यादें

कुछ रिश्ते किसी तरह के नामकरण से मुक्त दिल के करीब होते हैं, दिल से बने होते हैं. ऐसे ही रिश्ते की डोर से हम सबको बाँधे हुए थे हमारे मोना अंकल. जी हाँ, सामाजिक रूप में ‘मोना भाईसाहब के रूप में ख्याति प्राप्त श्री सुरेन्द्र सिंह जी को हम तीनों भाई मोना अंकल ही पुकारते रहे हैं. पिताजी से उनकी बहुत ज्यादा घनिष्टता रही और हमारे मामा लोगों को वे भाई की तरह मानते रहे. पिताजी से उम्र में बड़े होने के कारण मोना अंकल उनका नाम लेते थे और मामा जी से रिश्ता होने के कारण अम्मा जी को छोटी बहिन जैसा मानते हुए पैर छूते थे. ऐसे में बचपन में हम भाइयों के सामने बड़ी समस्या थी मोना अंकल को किस रिश्ते से पुकारा जाये. इसका भी समाधान करते हुए उन्होंने अंकल संबोधन को पास कर दिया, जिसमें ताऊजी और मामाजी दोनों शामिल थे. उनको अंकल भले पुकारते रहे मगर मोना अंकल की धर्मपत्नी ने मामी के अलावा कोई और संबोधन स्वीकार नहीं किया. मोना अंकल राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के छोटे भाई थे. हमारे परिवार का अत्यंत निकट का सम्बन्ध होने के कारण बचपन से ही घर आना-जाना हुआ करता था. जब कभी राजमाता का आना होता तो पिताजी के साथ हमारा भी यदाकदा जाना होता. वे बुआ कहलवाना पसंद करती थीं.




उनकी इंटरनेशनल ट्रैक्टर की एजेंसी हुआ करती. उसके और कभी-कभी अपनी जमीन आदि की कानूनी सलाह के लिए मोना अंकल का अक्सर घर आना हुआ करता था. उन दिनों वे विल्ली की जीप खुद चलाकर आया करते थे. वापस जाने पर हम भाइयों को जीप में बिठाकर दो-चार किमी का चक्कर लगवाना जैसे उनका नियम था. सिर पर गोल कैप, चेहरे पर मोहक मुस्कान उनकी पहचान हुआ करती थी. राजकीय इंटर कॉलेज में अपनी पढ़ाई के दौरान अपने मित्रों पर रोब गाँठने के चक्कर में हम उनको लेकर आये दिन कॉलेज के सामने बनी अंकल की ट्रैक्टर एजेंसी चले जाया करते थे.


जो स्नेह, दुलार, प्यार अंकल से, मामी से मिलता रहा वही स्नेह उस घर में भाइयों और भाभियों से मिलता है. ये किसी के लिए भी बहुत सौभाग्य की बात होती है कि तीन पीढ़ियों से किसी परिवार से स्नेह-सूत्र जुड़ा हुआ है. आज मोना अंकल के अनंत-यात्रा को प्रस्थान कर जाने की खबर मिली तो भीतर से बहुत कुछ समाप्त होता सा लगा. बहुत सारी बातें, उनकी सादगी, पिताजी पर उनका विश्वास, हम भाइयों पर उनका स्नेह आदि जाने कितना कुछ याद आया. कहा जाये तो अपने आपमें एक युग का अवसान हो गया आज. अब बस उनकी यादें शेष हैं, उन सुहाने दिनों की बातें शेष हैं.


अंकल को सादर नमन. 




 

31 August 2022

मँहगाई को भी पचा लेंगे

आजकल सुबह आँख खुलने से लेकर देर आँख बंद होने तक चारों तरफ हाय-हाय सुनाई देती है. आपको भी सुनाई देती होगी ये हाय-हाय? अब आपको लगेगा कि आखिर ये हाय-हाय है क्या, किसकी? ये जो है हाय! ये एक तरह की आह है, जो एकमात्र हमारी नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो बाजार के कुअवसरों से दो-चार हो रहा है. बाजार के कुअवसर ऐसे हैं कि न कहते बनता है और न ही सुनते. बताने का तो कोई अर्थ ही नहीं. इधर कोरोना के कारण ध्वस्त जैसी हो चुकी अर्थव्यवस्था का नाम ले-लेकर आये दिन बाजार का नजारा ही बदल दिया जाता है. आपको नहीं लगता कि बाजार का नजारा बदलता रहता है.

 

बाजार का नजारा अलग है और इस नजारे के बीच सामानों के दामों का आसमान पर चढ़े होना सबको दिखाई दे रहा है. सबको दिखाई देने वाला ये नजारा बस उनको नहीं दिखाई दे रहा, जिनको असल में दिखना चाहिए था. इधर सामानों के मूल्य दो-चार दिन ही स्थिर जैसे दिखाई देते हैं, वैसे ही कोई न कोई टैक्स उसके ऊपर लादकर उसके मूल्य में गति भर दी जाती है. यदि कोई टैक्स दिखाई नहीं पड़ता है तो जीएसटी है न. अब तो इसे एक-एक सामान पर छाँट-छाँट कर लगाया जा रहा है. ऐसा करने के पीछे मंशा मँहगाई लाना नहीं बल्कि वस्तुओं के मूल्यों को गति प्रदान करनी है. अरे! जब मूल्य में गति होगी तो अर्थव्यवस्था को स्वतः ही गति मिल सकेगी.

 



ऐसा नहीं है कि ऊपरी स्तर से मँहगाई कम करने के प्रयास नहीं किये गए. प्रयास किये गए मगर कहाँ और कैसे किये गए ये दिखाई नहीं दिए. आपने फिर वही बात कर दी. अरे आपको जीएसटी दिखती है, नहीं ना? बस ऐसे ही प्रयास हैं जो दिख नहीं रहे हैं. और हाँ, कोरोना के कारण देश भर में बाँटी जा रही रेवड़ियों की व्यवस्था भी उन्हीं के द्वारा की जानी है जो इन रेवड़ियों का स्वाद नहीं चख रहे हैं. अब तो आपको गर्व होना चाहिए मँहगे होते जा रहे सामानों को, वस्तुओं को खरीदने का. आखिर आप ही तो हैं जिन्होंने लॉकडाउन के बाद बहती धार से अर्थव्यवस्था को धार दी थी, अब आसमान की तरफ उड़ान भरती कीमतों के सहयोगी बनकर अर्थव्यवस्था को तो गति दे ही रहे हैं, रेवड़ियों को भी स्वाद-युक्त बना रहे हैं.

 

बढ़ते जा रहे दामों के कारण स्थिति ये बनी है कि बेचारे सामान दुकान में ग्राहकों के इंतजार में सजे-सजे सूख रहे हैं. वस्तुओं ने जीएसटी का आभूषण पहन कर खुद की कीमत बढ़ा ली है, अब वे अपनी बढ़ी कीमत से कोई समझौता करने को तैयार नहीं. इस मंहगाई के दौर में सामानों से पटे बाजार और दामों के ऊपर आसमान में जा बसने पर ऐसा लग रहा है जैसे किसी गठबन्धन सरकार के घटक तत्वों में कहा-सुनी हो गई हो. सामान बेचारे अपने आपको बिकवाना चाहते हैं पर कीमत है कि उनका साथ न देकर उन्हें अनबिका कर दे रही है. उस पर भी उन कीमतों ने विपक्षी जीएसटी से हाथ मिला लिया है. अब ऐसी हालत में सबसे ज्यादा मुश्किल में बेचारा उपभोक्ता है, ग्राहक है. इसमें भी वो ग्राहक ज्यादा कष्ट का अनुभव कर रहा है जो मँहगी, लक्जरी ज़िन्दगी को बस फिल्मों में देखता आया है.

 

ऐसे ही लक्जरी उपभोक्ताओं की तरह के हमारे सरकारी महानुभाव हैं. अब वे बाजार तो घूमते नहीं हैं कि उनको कीमतों का अंदाजा हो. अब चूँकि वे बाजार घूमने-टहलने से रूबरू तो होते नहीं हैं, इस कारण उनके पास किसी तरह की तथ्यात्मक जानकारी तो होती नहीं है. अब बताइये आप, जब जानकारी नहीं तो बेचारे कीमतों को कम करने का कैसे सोच पाते? इस महानुभावों का तो हाल ये है कि एक आदेश दिया तो इनको भोजन उपलब्ध. गाड़ी में तेल डलवाने का पैसा तो देना नहीं है, रसोई के लिए गैस का इंतजाम भी नहीं करना है और न ही लाइन में खड़े होकर किसी वस्तु के लिए मारा-मारी करनी है. अब इतने कुअवसर खोने के बाद वे बेचारे कैसे जान सकते हैं कि कीमतों में वृद्धि हो रही है.


ये दोष तो उस बेचारे आम आदमी का है जो दिन-रात खटते हुए बाजार को निहारा करता है. वही बाजार के कुअवसरों से दो-चार होता है. वही लगातार मँहगाई की मार खा-खाकर पिलपिला हो जाता है. इस पिलपिलेपन का कोई इलाज भी नहीं है. यह किसी जमाने में चुटकुले की तरह प्रयोग होता था किन्तु आज सत्य है कि अब आदमी झोले में रुपये लेकर जाता है और जेब में सामान लेकर लौटता है.


ऊपर बैठे महानुभाव भी भली-भांति समझते हैं कि आम आदमी की ऐसी ग्राह्य क्षमता है कि वह मँहगाई को भी आसानी से ग्राह्य कर जायेगा. ऐसे में परेशानी कैसी? देश की जनता तो पिसती ही रही है, चाहे वह नेताओं के आपसी गठबन्धन को लेकर पिसे अथवा सामानों और दामों के आपसी समन्वय को लेकर. सत्ता के लिए किसी का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, टूट सकता है ठीक उसी तरह मंहगाई का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, दामों और सामानों का गठबन्धन टूट भी सकता है. इस छोटी सी और भारतीय राजनीति की सार्वभौम सत्यता को ध्यान में रखते हुए सरकार की नादान कोशिशों को क्षमा किया जा सकता है. 




 

28 August 2022

बाजार द्वारा संचालित समाज

क्या इंसान बाजार के हाथों की कठपुतली बनता जा रहा है या कठपुतली बन चुका है? ये ऐसा सवाल है जो आये दिन हर उस व्यक्ति के मन में कौंधता होगा जो संवेदनशील होगा. व्यक्ति के जीवन की आज यह स्थिति बनी हुई है कि रोजमर्रा की आवश्यकता की छोटी से छोटी वस्तु से लेकर जीवन का बड़े से बड़ा पल बाज़ार के द्वारा संचालित होने लगा है. सुबह जागने के लिए व्यक्ति को किस घड़ी के अलार्म की आवश्यकता है, जागने के बाद उसे किन-किन पोषक तत्त्वों से भरे टूथपेस्ट की जरूरत है, यदि वह व्यक्ति सुबह की सैर पर जाता है तो कौन से जूते उसके लिए लाभदायक हैं, किस तरह के कपड़े उसके स्वास्थ्य का बेहतर ख्याल रख सकते हैं आदि-आदि बाज़ार ही तय कर रहा है. सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन, कार्यक्षेत्र की स्थिति, बच्चों का स्कूल, गृहणियों का काम-काज आदि सबकुछ अब बिना बाज़ार के पूरा होता नहीं दिखाई देता है. 


इन स्थितियों से दो-चार होने के लिए व्यक्ति को बाज़ार जाने की आवश्यकता नहीं है. अब बाज़ार स्वयं चलकर आपके घर के भीतर आ चुका है. टीवी पर विज्ञापन के सहारे, समाचार-पत्र, पत्रिकाओं के सहारे, हाथ में बराबर चलते मोबाइल के सहारे बाज़ार ने न केवल घर में जगह बना ली है बल्कि उसने इंसान के दिल-दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया है. घर से बाहर निकलते ही सड़क किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, गली-मोहल्ले के कोने में झाँकते छोटे-छोटे से बैनर, खम्बों, दीवारों पर चिपके पोस्टर, जगह-जगह बँटते पैम्पलेट हर समय इंसान को बाज़ार की कैद में होने का आभास करवाते हैं. अब खाने-पीने के सामान को खरीदने की बात हो या फिर पहनने-ओढ़ने के लिए वस्त्रों का चुनाव करना हो, घर को सजाने के लिए किसी वस्तु की चाहना हो या फिर कोई मंगलकारी आयोजन हो, सभी में व्यक्ति की सोच से अधिक तेज चलते हुए बाज़ार अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है. हर एक पल के लिए बाज़ार ने कुछ न कुछ व्यवस्था कर रखी है. इंसान ख़ुशी के क्षणों में जी रहा है या ग़म साझा कर रहा है, बाज़ार ने इसके लिए भी इंतजाम कर रखे हैं.




जन्मदिन हो, शादी हो, वैवाहिक वर्षगाँठ हो, पर्व-त्यौहार हों या फिर कोई भी आयोजन विज्ञापनों के द्वारा इंसान को इतना सम्मोहित कर लिया जाता है कि वह बिना बाज़ार के आगोश में आये कुछ कर ही नहीं सकता है. कुछ करते हुए दाग लग जाएँ तो दाग अच्छे हैं, कुछ अच्छा होने पर कुछ मीठा हो जाये. भले ही टेढ़ा लगे पर मेरा सा लगे, कितना भी बड़ा डर हो पर उसके आगे जीत का एहसास दिखे, त्यौहार में पारंपरिक मिष्ठान बने या न बने पर कुछ मीठा हो जाये का विकल्प बाज़ार ने इंसान के सामने परोस रखा है. एकबारगी यदि देखें तो हँसी-ख़ुशी के माहौल को, अपने उल्लास को ऐसे किसी भी उत्पाद के सहारे मिल-बाँट कर मना लेना बुरा नहीं है. बुरे का एहसास उस समय होता है जबकि व्यक्ति बजाय इन उत्पादों का उपयोग करने के, इनका उपभोग करने के स्वयं ही उत्पाद बनने लगता है.


यह इस बाजारीकरण की सबसे ख़राब स्थिति है कि इंसान कब बाज़ार में उपलब्ध उत्पादों का उपयोग करते-करते खुद ही उत्पाद बन गया उसे खबर ही नहीं हुई. कभी गौर किया है इस बात पर कि शादी-विवाह जैसा विशुद्ध पारिवारिक और पवित्र संस्कार कब बाज़ार के हवाले हो गया? अब विवाह संस्कार परिजनों के हाथों से नहीं, उनकी मनमर्जी से नहीं बल्कि बाजार के हाथों से संचालित होने लगा है. अब बाजार बताने लगा है कि दूल्हा-दुल्हन को कैसे तैयार होना है. अब बाज़ार ने निर्धारित कर दिया है कि सजावट कैसी होनी है. अब बाज़ार बता रहा है कि पूरे आयोजन में कैसे और किस तरह से फोटोशूट किया जाना है. बाज़ार की इन हरकतों ने जहाँ एक तरफ पाश्चात्य स्थिति को भारतीय संस्कृति पर थोपने जैसा काम किया है वहीं अनावश्यक रूप से व्यक्तियों की जेब पर भी डाका डाला है.


इन सबमें भारी-भरकम विज्ञापन, टीवी के रंगीन लकदक करते सीरियल भी सहायक भूमिका में नजर आने लगे हैं. विवाह अब संस्कार नहीं, पारिवारिक आयोजन नहीं बल्कि बाजारीकरण का सशक्त मॉडल बनकर सामने आया है. अकेले विवाह ही नहीं वरन व्यक्ति से सम्बंधित वे तमाम सारे आयोजन जिनमें किसी न किसी रूप में व्यक्ति का भावनात्मक सम्बन्ध जुड़ा है, सबको बाज़ार ने अपने कब्जे में ले रखा है. विवाह के पहले का फोटोशूट कब कैसे जनसामान्य के बीच जा घुसा किसी को खबर न हुई. शालीनता के महीन से परदे को गिराते हुए बाज़ार ने प्री-वेडिंग शूट के नाम पर अशालीनता फैलानी शुरू कर दी गई. विवाह का एकमात्र यही आयोजन नहीं बल्कि उससे जुड़े तमाम सारे छोटे-बड़े आयोजन भी बाज़ार ने हड़प लिए हैं. हल्दी, मेंहदी, द्वारचार, जयमाल, फेरे, विदाई आदि को अब बाज़ार संचालित कर रहा है. कैसे कपडे पहने जाने हैं, किस कंपनी के पहने जाने हैं, किसे क्या भूमिका निभानी है, कैसे नृत्य करते हुए कन्या आएगी, किस तरह से जयमाल होगी, वर-वधु कैसे आधुनिकता के वशीभूत होकर फेरे लेंगे, विदाई के समय कन्या कैसे और कितना रोएगी आदि बाज़ार ने सिखा-पढ़ा दिया है. मातृत्व जैसे भावनात्मक एहसास को भी विज्ञापनों, फोटोशूट के हाथों में थमा दिया गया. इन कृत्यों में आधुनिकता, वर्तमान चलन के नाम पर फूहड़ता, नग्नता, अशालीनता के अलावा और कुछ देखने को नहीं मिला.


बाज़ार ने न केवल शालीनता के दायरे को पार किया बल्कि अनावश्यक रूप से घर-परिवारों में आर्थिक बोझ को भी बढ़ाया है. महँगे होते जाते आयोजन, अत्यंत भव्यता बिखेरती साज-सज्जा, सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अनाप-शनाप ढंग से बर्बाद किया जाता धन आदि किसी भी रूप में किसी एक व्यक्ति की सकारात्मक सोच नहीं है. इसके पीछे पूरी तरह से नियोजित ढंग से बाज़ार अपना काम कर रहा है. उसका काम अपने उत्पाद को बेचना मात्र है. इस प्रक्रिया में स्वयं इंसान ही उत्पाद बनकर उभरने लगा है. वह बिना सोचे-विचारे बस इन कृत्यों को मशीनी ढंग से करने में लगा है. वह स्वयं ही नहीं समझ पा रहा है कि इन कृत्यों को करने में उसे ख़ुशी मिल रही है या फिर वह बाज़ार के हाथों में नाच रहा है?