08 August 2020

दोस्त कुछ अपने से, कुछ पराए से

कभी अच्छा माना जाता होगा दोस्तों को गलत राह पर जाने से रोकना, अब इसे दगाबाजी समझा जाने लगा है. दोस्ती का तात्पर्य, दोस्त का अर्थ महज एक-दूसरे से मिलना, मौज-मस्ती करना, समय बिताना मात्र नहीं होता है. दोस्त का सन्दर्भ ही बहुत पावन है, दोस्ती का अर्थ ही बहुत व्यापक है. इसमें किसी तरह के स्वार्थ की, किसी तरह के धोखे की कोई गुंजाइश होती ही नहीं है. इसके बाद भी व्यक्तिगत अनुभव ऐसे रहे हैं जहाँ की दोस्तों को उनके गलत काम करने से रोकने पर, उनके द्वारा कोई गलत कदम उठाये जाने पर रोकने के कारण हमें दोस्तों से हाथ धोना पड़ा, दोस्ती को खोना पड़ा.


मित्रता के सन्दर्भ हमारे लिए बहुत ही अलग हैं. कभी किसी स्वार्थ के लिए हमने दोस्ती नहीं की. कभी किसी मतलब से किसी की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढाया. दोस्ती जिससे की उसके साथ कभी भी दगाबाजी नहीं की. जिसके साथ दोस्ती भरे सम्बन्ध रहे उसे अपने कोशिश भर पूरी ईमानदारी से निभाया है. मित्रों को महज उनके साथ समय बिताने के बाद अकेला नहीं छोड़ा है. अपनी तरफ से हमेशा यही प्रयास रहा है कि मित्रों के साथ गलत न हो, वे किसी भी तरह की भावनात्मक, संवेदनात्मक दबाव में आकर टूट न जाएँ, किसी तरह के अवसाद में आकर गलत कदम न उठा लें. बहुत बार ऐसे अवसर आये जबकि हमें साफ़-साफ़ लगा की हमारे मित्र किसी समस्या में हैं. ये समस्या उनकी पारिवारिक भी रही, सामाजिक भी रही, भावनात्मक भी रही, मानसिक भी रही. उनकी किसी भी समस्या के निदान का हरसंभव प्रयास अपनी तरफ से किया. उनके किसी भी गलत कार्य को, गलत कदम को उठने से रोका भी. इसके लिए बहुत बार समझाया भी, बहुत बार हम नाराज भी हुए, कई बार डाँटा-डपटा भी... हर बार अपना समझ कर.


ऐसा नहीं की हमारे प्रयास विफल रहे. बहुत से मित्रों को इसका भान हुआ कि वे गलत करने जा रहे थे अथवा उनके द्वारा उचित कदम नहीं उठाया जा रहा था. उनको इसका भी आभास हुआ कि यदि हमारे द्वारा कभी कठोर शब्द बोले भी गए, कुछ तेज स्वर में कहा भी गया तो उसके पीछे कोई स्वार्थ नहीं था, किसी तरह का कोई लालच नहीं था. इसके पीछे विशुद्ध दोस्ती की भावना समाहित थी. अपने मित्र के साथ गलत न होने देने की भावना छिपी हुई थी. यह सब होने के दौर में कुछ मित्र आज भी हमारे साथ हैं और अपनी भरपूर मित्रता के साथ हैं. इसके उलट कुछ मित्र तमाम उलाहना, आरोप, दोषारोपण के साथ छोड़ कर चले गए हैं.

जो साथ हैं उनके साथ दोस्ती अपने उच्चतम स्तर के साथ और भी गहराती जा रही है. जो छोड़कर चले गए, जिनके लिए हम दोस्त नहीं हैं उनके लिए बुरा सोच भी नहीं सकते क्योंकि वे कल तक तो हमारे मित्र रहे हैं. हमारे लिए तो वे आज भी मित्र हैं. ऐसे भटके हुए मित्रों के लिए हमारी कामना फिर भी यही है वे जहाँ रहें, खुश रहें भले हमसे दूर रहें. बस भटकें नहीं, गलत कदम न उठाएँ.


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07 August 2020

नौजवानों को डिप्रेशन से बचाने को आइडल्स बदलने की ज़रुरत

क्रिस काइल की SEAL ट्रेनिंग कुछ ऐसी थी कि सुबह से शाम तक ठन्डे पानी में बिठा दिया जाता था। घंटो पानी के पाइप से तीखी धार मारी जाती थी। इस बीच इतनी झंड की जाती थी कि ट्रेनिंग लेते कई साथी बीच में छोड़ के भाग जाते थे। कीचड़ में कोहनियों के बल कई-कई किलोमीटर चलने के लिए कहा जाता था। इन सब ट्रेनिंग, जिसे आप यातना भी कह सकते हो, के बाद क्रिस को इराक में पोस्टिंग मिली। क्रिस क्योंकि स्नाइपर थे तो दूर बैठे ही अलगाववादियों के मत्थे भेद दिया करते थे। साठ से ज़्यादा सटीक निशाने लगाने के कारण पहले ही टूर में क्रिस को The Legend का ख़िताब मिल गया था।


काइल जब रमादी शहर में भेजे गए थे तब वो एक खंडहर में लेटे मरीन ऑफिसर्स के कॉनवॉय को प्रोटेक्ट कर रहे थे, तभी उनकी नज़र एक बुर्खा पहने औरत पर पड़ी जिसके हाथ में दो फिट लम्बा ग्रेनेड था। उस औरत ने वो ग्रेनेड अपने बच्चे को थमा दिया जो बामुश्किल 10 साल का होगा, वो बच्चा अमेरिकी कॉनवॉय की तरफ दौड़ने लगा, क्रिस अपने स्कोप से सब देख रहे थे, क्या करना है ये निर्णय सिर्फ क्रिस को लेना था जो उन्होंने अगले ही पल लिया। उस बच्चे की छाती में गोली मार दी। उसकी माँ रोती बिलखती आई और फिर उसने वो ग्रेनेड उठा लिया, क्रिस को मजबूरन उसे भी गोली मारनी पड़ी।

अपनी बायोग्राफी में क्रिस ने लिखा कि वो औरत शायद पहले ही मर चुकी थी, मैं बस उसकी मौत के साथ अपने मरीन साथियों को मरने से बचा रहा था।

इस घटना की वजह से क्रिस महीनों चैन से नहीं सो पाए। ये था डिप्रेशन। इसे कहते हैं अवसाद पर क्रिस ने ये अवसाद अपने किसी साथी या अपने परिवार के सामने ज़ाहिर नहीं किया। क्रिस को ड्यूटी के दौरान दो बार गोली लगी और छः बम धमाके वो झेल गए पर जब भी किसी से मिले, मुस्कुराते हुए मिले।

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एक मेजर माइक टैंगो हैं जो बचपन में विजेता फिल्म दस-दस बार देखा करते थे, तभी से उनका मन आर्मी में शामिल होने का बन चुका था। वो दो बार NDA एग्जाम में फेल हो गया पर उसने हार न मानी। जब पास हुआ तो ट्रेनिंग के वक़्त उसके सीनियर उसे कश्मीर में होते ऑपरेशन्स के किस्से सुनाया करते थे। माइक ने तभी तय कर लिया मैं और कुछ नहीं सिर्फ स्पेशल फ़ोर्स ऑफिसर बनूंगा। इसके बाद उसने IMA ज्वाइन की और 2004 में उसे स्पेशल फ़ोर्स की ट्रेनिंग के लिए चुना गया। स्पेशल फ़ोर्स में जो भी जाता है वो शरीर से लोहा तो बन ही चुका होता है पर पैरा ऑफिसर स्पेशल इसलिए होते हैं कि वो दिमाग से भी मजबूत बनाये जाते हैं।

छः महीने के प्रोबेशन ट्रेनिग पीरियड के दौरान माइक को रात-रात भर गटर में बैठा दिया जाता था। सड़ते हुए जानवर कटवाए जाते थे। एक दफा तो रात दो बजे उठा दिया गया, कहा बेनज़ीर भुट्टो पर 1000 शब्दों का निबंध लिखो कि कैसे उसकी माहवारी के कारण पश्चिम बंगाल में में मानसून आ गया, ये सिर्फ लिखना ही नहीं था, सारे ऑफिसर्स को इस निबंध से सहमत भी करवाना था। फिर हर ऑफिसर निकलते-बढ़ते बेइज्ज़ती करता रहता था। ज़लील करता चलता था। इसके बावजूद माइक ने 6 महीने की ट्रेनिंग 4 महीनों में पूरी कर ली। 

माइक को एक ऐसे मिशन पर कश्मीर भेजा गया जो पहले से तय था कि फेल होना है। मिशन से लौटने के बाद माइक के कमांडर ने बहुत बुरी तरह लताड़ा और उसे SF के लिए मिसफिट करार दे दिया। उसे निकाल बाहर कर नॉर्मल इन्फेंट्री में भर्ती करने का ऑर्डर आया, वो सामान पैक करने लगा तो आँखें भर आई। इतनी मेहनत की और सब ज़ाया। उसी वक़्त एक वेटर आया और बताया कि CO साहब ने बुलाया है। माइक पहुँचा तो CO ने उसे 50 पुशप्स मारने के लिए कहा। माइक भला कैसे इनकार करता, माइक ने जब पुशअप पूरी की तो देखा उसके CO के हाथ में मेहरून कैप थी जो ख़ास स्पेशल फ़ोर्स ऑफिसर्स के लिए होती है। माइक की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। असल में माइक उन सारे ऑफिसर्स में बेस्ट था पर CO उसकी बर्दाश्त करने की शक्ति को तौलना चाह रहा था।

मेजर माइक टैंगो! ये वही ऑफिसर है जिसकी लीडिंग में सर्जिकल स्ट्राइक अंजाम दी गयी थी और 80 कमांडोज़ में से एक भी कमांडो हताहत नहीं हुआ।

अब सोचिए क्या डिप्रेशन लेवल रहा होगा उस शख्स का जिसे हर कोई लताड़ रहा है, जिसे गटर में रखा जाता है और उससे सड़ा माँस कटवाया जाता है। अब आप दिल पे हाथ रखकर बताइए कि हीरो कौन हैं? हृतिक रौशन या शाहरुख़ खान? जिन्हें देखकर हमारे बच्चे वैसा बनना चाहते हैं और न बन पाने की सूरत में नस काट लेते हैं या मेजर माइक टैंगो और क्रिस काइल जिनके नाम तक आम लोगों तक नहीं पहुँच पाते पर उनकी वजह से आज हम चैन से बैठे हैं?

मुझे लगता है, इस देश के नौजवानों को डिप्रेशन से निकलना है तो उन्हें अपने आइडल्स बदलने की ज़रुरत है पर आपको ये पोस्ट शेयर करने से पहले मुझसे पूछना ज़रूरी नहीं है।

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(माइक टैंगो की कोई फोटो या असली नाम सुरक्षा कारणों से सर्वजनिक नहीं किये गए हैं।)

पोस्ट अवनींद्र जादौन की फेसबुक वाल से साभार 
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06 August 2020

राम हमारे आराध्य हैं, वे हाथ पकड़ें या हम, क्या चिंता

इस पोस्ट से अपने आपको वे संदर्भित करें जो किसी न किसी तरह से खुद को राजनीति में या राजनैतिक विचारों से जुड़ा मानते हैं.



ये चित्र कल, शिला पूजन के बाद से लगातार चर्चा में है. रामभक्तों को इस चित्र से कोई समस्या नहीं. समस्या उन्हें है जिनके आराध्य राम नहीं बल्कि 'रासो' नामधारी हैं (ये रासो काव्य नहीं, प्राचीन हिन्दी काव्य का). इस चित्र के दो पहलू हैं. एक में माना जा सकता है कि मोदी जी श्रीराम का हाथ पकड़ मंदिर की तरफ ले जा रहे हैं. यदि यही है तो इसमें बुरा क्या है? हम सभी सनातनी मानते हैं कि बालरूप भगवान का रूप है फिर बालरूप भगवान का हाथ पकड़ने में क्या समस्या? हर माँ-बाप अपने बच्चे का हाथ पकड़ता है.

इसके साथ यह कि अयोध्या का यह मंदिर रामलला का मंदिर है, सियाराम का नहीं. गैर-रामभक्त इसका अर्थ क्या समझेंगे. उनके आराध्य बाई हैं, बाबा हैं. लला का मतलब बच्चा से ही लगाया जाता है. ऐसे में रामलला का मतलब राम के बालरूप से है. कोई अभिभावक अपने लला को अकेला कैसे छोड़ दे?

अब इसके उलट सत्य यह है कि रामलला मोदी जी का हाथ पकड़े हैं यह अंधे चाटुकारों को नहीं दिखेगा. उनको अपनी जीभ दिखती है और उनकी चाटने वाली जगह, सो चाटते रहते हैं आँखें बंद किये. रामलला मोदी जी का हाथ पकड़ें मंदिर की तरफ जा रहे हैं तो गलत क्या है? भगवान ही है जो हमारा हाथ पकड़ राह दिखाता है. चाटुकारों के बाप ने ताला खुलवाया तो था फिर क्या हुआ, रामलला टेंट में आ गए. अब उनको लगा कि मोदी जी को राह दिखाई जाये तो रामलला खुद आये और मोदी जी का हाथ पकड़ मंदिर तक ले जा रहे हैं.

अंतिम बात, रामभक्तों के अलावा बाकी लोगों के आराध्य श्रीराम नहीं हैं तो फिर उनको काहे चिनचिनी मची है कि कौन किसका हाथ पकड़ें है. तुम लोग अपने आराध्यों का पकड़ें रहो, हाथ. हम अपने आराध्य का पकड़ें हैं, हाथ या उनको अपना हाथ पकड़ाए हैं.

तुम गैर-रामभक्तो अपनी चिनचिनी वहीं मिटाओ, यहाँ कोशिश करोगे तो मुँह पर खाओगे... एक लड्डू कल के शिलापूजन का.... खाते जाओ बे....!!

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05 August 2020

वर्षों की तपस्या का सुफल प्राप्त हुआ

आज, 05 अगस्त 2020, एक ऐतिहासिक तिथि. एक ऐसी तिथि जिस दिन वर्षों पुराना सपना सच हुआ. यह सपना एक हमारी आँखों ने नहीं बल्कि करोड़ों-करोड़ों आँखों ने देखा था. अनेक जाने-अनजाने लोगों ने अपनी ज़िन्दगी खपा दी, अपने प्राण गँवा दिए. जी हाँ, श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ऐसा ही सपना रहा है. आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शिला पूजन किया गया. अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया का शुभारम्भ हुआ. 






हर्षोल्लास, गर्व के इस क्षण को दीपोत्सव के साथ मनाया गया, अनुभूत किया गया. आज बस इतना ही. 












जय श्री राम

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04 August 2020

शौर्य और वीरता का प्रतीक बुन्देलखण्ड का कजली महोत्सव

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पावन पर्व कजली उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता का प्रतीक माने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयोंआल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहूजौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता थाइसके पीछे उन्नत कृषिउन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है. 

कजली विसर्जन में बिटिया रानी - उरई, माहिल तालाब  (गत वर्ष का चित्र)

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान के साथ एक साजिश रचकर कुछ विरोधियों ने महोबा के अतुलित वीर भाइयों आल्हा-ऊदल को राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को जानकारी थी कि आल्हा और ऊदल के न होने के कारण महोबा को जीतना संभव है. पृथ्वीराज चौहान ने महोबा की राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे. 

राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थेऐसे में सभी लोग जानते थे कि आल्हा-ऊदल के बिना पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. इस विषम परिस्थिति में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रमवीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.

इस ऐतिहासिक विजय के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना नेमहोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. इसके बाद ही इस क्षेत्र में बहिनें रक्षाबंधन पर्व के एक दिन बाद भाइयों की कलाई में राखी बाँधती हैं. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.


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03 August 2020

संबंधों के साथ खेल, सही सही है, गलत गलत है

सम्बन्ध का निर्वहन सबसे कठिन होता है, इसे सुना था मगर ज़िन्दगी में जान भी गए. कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जबकि समय से पहले कुछ अनुभव मिल जाया करते हैं. जनपद मुख्यालय में निवास स्थान होने के कारण गाँव से, ननिहाल से किसी भी समस्या से सम्बंधित लोगों के आने का एकमात्र माध्यम पिताजी हुआ करते थे. ऐसा इसलिए भी होता था क्योंकि वे वकालत से सम्बद्ध थे. पता नहीं आज वकीलों के बारे में आम राय क्या है मगर किसी समय वकीलों को बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था. उस दौर में जबकि सरकारी नौकरियाँ बहुत ही सहज थीं, पिताजी को कई-कई अच्छी सरकारी नौकरियों से बाबा जी ने महज इसीलिए रोक रखा था कि वे पारिवारिक मुकदमों को देख सकें, उनका निस्तारण कर सकें. कई बार बाबा जी से इस सन्दर्भ में बात होती तो बाबा गर्व के साथ बताते कि हमारे पिताजी का किस-किस नौकरी के लिए चयन हुआ मगर घर की स्थिति के कारण नहीं भेजा. उसके आगे वे कहते कि वकील साहब कहने में जिस साहब का भाव उभरता है वह डीएम के लिए साहब कहने में भी नहीं उभरता है. आज इस वाक्य का सत्य क्या है, ये तो आज के लोग जानें मगर हमने बाबा जी के इस वाक्य की सत्यता अपनी आँखों देखी है.



बहरहाल, संबंधों की सत्यता आज जैसी दिखती है, उस दौर में नहीं दिखती है. हमने कभी भी पिताजी के मुँह से इस सम्बन्ध में नकारात्मक टिप्पणी नहीं सुनी. पिताजी तो चलो अपने परिवार के लिए यह त्याग कर रहे थे, हमने आज तक अम्मा के मुँह से ऐसी स्थिति के लिए कभी नाराजगी नहीं देखी, नकारात्मक टिप्पणी नहीं देखी. पारिवारिक माहौल का प्रभाव ही कहा जायेगा कि हम संबंधों का ख्याल रखने की भरसक कोशिश करते हैं. हमारी कोशिश होती है कि किसी को भी हमारी तरफ से परेशानी का अनुभव न हो. हमसे जितनी संभव हो मदद उसे मिल जाये. ऐसा हम न केवल अपने परिचितों के साथ करते हैं बल्कि अपरिचितों के साथ भी ऐसा व्यवहार रहता है.

हमारे इसी व्यवहार के कारण कई बार हमें अपने घर में डांट भी पड़ी. स्वाभाविक है, कोई माता-पिता अपने पुत्र के लिए किसी स्थायित्व की बात पर विचार कर रहे हों, उनके मन में किसी बड़ी योजना की रूपरेखा बनी हुई हो और उनका वह पुत्र अनर्गल कार्य करते फिर रहा हो, तो नाराजगी स्वाभाविक है. हम अपनी योजनाओं के साथ आगे बढ़ते रहे, परिवार की अपनी योजनायें बनी रहीं. इन्हीं तमाम सारी योजनाओं में मित्रों की, परिचितों की योजनाओं ने भी अपना पाला संभाल लिया. कुछ को हम पूरा कर सके, कुछ में हम असफल रहे. बस यही हमारी ज़िन्दगी का सबसे ख़राब पहलू बनकर सामने आया. जहाँ हम सफल रहे वहाँ तो किसी ने क्रेडिट न दिया मगर जहाँ हम असफल रह गए वहाँ सभी ने हम पर दोषारोपण करना शुरू कर दिया. पता नहीं असल सत्य क्या है?

हमारे कुछ ख़ास मित्र, हमारे परिजन भी हमारी इस कार्यशैली से नाराज हैं. उनके वक्तव्य, उनके विचार हमारे प्रति इस तरह नकारात्मक बन चुके हैं कि कई बार तो हमें खुद में ऐसा आभास होता है कि कहीं हम वाकई नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति तो नहीं बनते जा रहे? बहरहाल, वे लोग बताते नहीं कि हम कहाँ गलत हैं और हमें समझ आता नहीं कि हम कहाँ गलत हैं. फ़िलहाल तो दोनों तरफ से गलत-गलत खेला जा रहा है, कौन सही है ये तो समय बताएगा.

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02 August 2020

ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है

एक पुरानी फिल्म का गीत है, ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, इस गीत का नहीं बस इतने शब्दों का सार वास्तविक समझ आता है। गीतों में, कविताओं में गहराई छिपी होती है, एक संदेश छिपा होता है। कुछ इसी तरह की स्थिति इन शब्दों में है। ज़िन्दगी का एक-एक पल व्यक्ति की परीक्षा तो लेता ही रहता है। बचपन से लेकर ज़िन्दगी के अंतिम क्षणों तक इंसान परीक्षाओं से दो-चार होते-होते आगे बढ़ता रहता है। शैक्षणिक संस्थानों की परीक्षाओं से इतर ये परीक्षाएँ इंसान को मजबूत भी बनाती हैं, कमजोर भी बनाती हैं। 


सोचने का विषय ये है कि क्या सभी इंसान परीक्षाओं से दो-चार होते हैं? क्या ज़िन्दगी सभी की परीक्षा लेती है? या फिर ज़िन्दगी उनका इम्तिहान लेती है जो कुछ अलग करना चाहते हैं? हम अपने आसपास देखें तो स्पष्ट समझ आता है कि समाज में व्यक्तियों की अपनी स्थिति, प्रस्थिति के अनुसार परीक्षा तो होती ही है पर उसका स्वरूप बदला हुआ होता है। एक वरिष्ठ की परीक्षा का स्तर अलग होता है, बच्चे की परीक्षा का स्तर अलग होगा। एक अमीर के लिए उसके इम्तिहान का स्तर अलग होगा, एक गरीब के लिए यही स्थिति अलग होगी। 

कहने का तात्पर्य महज इतना है कि हम सभी देखा-देखी दूसरे के सापेक्ष कार्य करने की प्रवृत्ति को पाल बैठे हैं। हम अपनी क्षमताओं को जाँचे-परखे बिना ही कार्य करने उतर पड़ते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि इंसान को कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ता है। इससे उसके अंदर निराशा का भाव पैदा हो जाता है। ऐसे में इस बात को स्वीकार करते हुए कि ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है और सबकी स्थिति के अनुसार अलग-अलग रूप में लेती है। बस हम सबको अपनी क्षमताओं की जानकारी रखते हुए कार्य करना चाहिए, ज़िन्दगी के इम्तिहान को पार करना चाहिए। 

01 August 2020

शरारत भरी हेराफेरी के साथ पत्र लेखन का शौक

31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस मनाये जाने पर हमने विचार किया था कि उस दिन अपने मित्रों को पत्र लिखेंगे. इसी सम्बन्ध में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लगाकर उन मित्रों के पते चाहे जो हमारा पत्र पाना चाहते हों. लगभग आधा सैकड़ा मित्रों ने अपने पते हमें भेज कर पत्र भेजने की इच्छा व्यक्त की. इतने सारे मित्रों की सकारात्मक प्रतिक्रिया देखकर उत्साह बढ़ गया. कल और आज तमाम कामों के बीच से समय निकाल कर बहुत से मित्रों को पत्र लिख भी डाले. पत्र लिखने में बड़ा ही मजा आ रहा था. यद्यपि पत्रों के आने-जाने के लगभग न के बराबर माहौल में भी हम नियमित रूप से पत्र लिखते रहते हैं तथापि इतनी बड़ी संख्या में पत्र बहुत दिन बाद लिखना हो रहा है.


इनको लिखने के दौरान वे दिन भी सामने आकर खड़े हो जा रहे हैं जबकि पत्रों के द्वारा मित्रों, परिचितों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान होता था. पढ़ने के उन दिनों में पत्र लिखने का चाव बहुत बुरी तरह से हम मित्रों के बीच बना हुआ था. हम दोस्तों की बातें किसी और को पता न चलें इसके लिए लिफाफे का इस्तेमाल किया जाता था. मंहगा होने के बाद भी इसका इस्तेमाल करना मजबूरी थी. एक तरफ अपनी बातों को सबसे छिपाना होता था दूसरे बातें इतनी अधिक होती थीं कि उनका अंतर्देशीय पत्र में सिमट पाना संभव ही नहीं होता था. ऐसे में न तो अंतर्देशीय पत्र काम करता था और पोस्टकार्ड की तरफ तो देखा भी न जाता था. कई-कई पन्नों में हम दोस्तों की अपनी गाथा सिमटी होती थी. अलग-अलग शहरों में पढ़ रहे हम मित्र अपने कॉलेज की, दोस्तों की, पढ़ाई की चर्चा करते रहते.



जेबखर्च की सीमित स्थिति के चलते डाक टिकटों के साथ कुछ शरारत कर ली जाया करती थी. साधारण डाक लिफाफा एक रुपये का हुआ करता था. किसी कागज़ का लिफाफा बनाकर उस पर दस-दस पैसे के दस टिकट अलग-अलग जगहों पर लगाये जाते थे. ऐसा करने से कई बार कुछ डाक टिकट मुहर लग जाने से बच जाया करते थे. उनका दोबारा उपयोग कर लिया जाता था. एक-दो बार प्रयोग किये गए लिफाफों को भी चला दिया गया. प्राप्ति वाले पते को काट कर लिख दिया कि ये व्यक्ति यहाँ नहीं रहता है और वापसी वाला पता डाल दिया जाता था. हालाँकि ऐसा एक-दो बार ही किया गया मगर काम बन गया था.

आज तकनीकी इस कदर तेज है कि पलक झपकने के साथ लोगों तक अपनी बात पहुँच जा रही है. इसके बाद भी हम खुद महसूस करते हैं कि उन दिनों जैसी भावनाएं मशीनी पत्र में देखने को नहीं मिल रही हैं. आज के मशीनी संदेशों का संकलन आसान हो गया है मगर उनको पढ़ने में, उनको दोबारा खोलकर देखने में किसी एहसास की अनुभूति नहीं होती है. शब्दों का टाइप होना, कागज छूने का एहसास न होना, अनजाने ही उस व्यक्ति का चेहरा उन लिखे शब्दों में बनना अब महसूस ही नहीं होता. बहरहाल, ये तकनीक है जो बदल कर इस दौर में ले आई है मगर हमें हमारे मित्रों ने उन्हीं पुराने दिनों की याद ताजा करवा दी है. सभी का हृदय से आभार.

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31 July 2020

पत्रों का सुखद एहसास अब गायब हो गया

आज, 31 जुलाई को लोग कई-कई कारणों से याद रखते हैं. कोई पार्श्व गायक मुहम्मद रफ़ी के कारण याद रखता है तो कोई साहित्यकार प्रेमचंद के कारण. इनके अलावा और भी बहुत से कारण होंगे आज की तारीख को याद करने के. इन्हीं बहुत से कारणों में एक कारण याद रखने का है, इस तिथि को विश्व पत्र दिवस मनाया जाना. हो सकता है कि आपको आश्चर्य हुआ हो कि ऐसा भी कोई दिवस मनाया जाता है. जी हाँ, 31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस भी मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि आज ही की तारीख में सबसे पहला पत्र इंग्लैण्ड में लिखा गया. उसके बाद से तकनीक के विकास करने तक पत्र ही वैचारिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम बना हुआ था.


विश्व पत्र दिवस का मनाया जाना जितना आश्चर्य का विषय हो सकता है, उतना ही बहुत से युवा साथियों के लिए आश्चर्य का विषय पत्र का लिखा जाना भी हो सकता है. वर्तमान दौर में यदि एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की होगी जिन्होंने पत्रों का लेखन किया है, पत्रों का इंतजार किया है तो एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी होगी जिन्होंने पत्र का इस्तेमाल ही नहीं किया होगा. आज के दौर में तीव्रगति से इधर से उधर अपनी बात पहुँचाने के तमाम माध्यम विकसित हो चुके हैं मगर इसके बाद भी लगता है कि जो एहसास, जो संवेदनाएँ पत्र में छिपी होती हैं वे आज के किसी तकनीकी माध्यम में नहीं हैं.


आज भी याद आता है वो समय जबकि पत्रों का आना, उनको बार-बार पढ़ा जाना, पत्रों का सहेज कर रखा जाना अपने आपमें एक बहुत विशेष बात हुआ करती थी. हम आज भी सैकड़ों की संख्या में पत्रों को अपने पास सुरक्षित रखे हुए हैं. कई बार फुर्सत के समय में, अकेलापन महसूस होने पर इनके साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता है. परिजनों के पत्र आने पर सबसे पहले कौन पढ़ेगा को लेकर अक्सर युद्ध जैसी बन जाया करती थी. पत्र में किस-किसको नाम लेकर संबोधित किया गया है, इसको भी बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता था. किसी विशेष आयोजन पर आने वाले पत्र के समय एक लिफाफे में कई-कई छोटे-छोटे कागजों में पत्रों का आना मनोहारी मौसम जैसा लगता था. बचपन के उस दौर से बाहर आकर युवावस्था में मित्रों के पत्रों का इंतजार, पत्रों में कई बार कोड वर्ड में अपनी बात को कहने की काबिलियत भी दिखा दी जाती थी ताकि यदि धोखे से घरवालों के हाथ पत्र पड़ जाए तो उस कोड वर्ड को समझ न सकें.

ऐसे समय में याद आता है हॉस्टल टाइम में अपने एक मित्र द्वारा पत्रिका में भेजा गया सन्देश और उसके बाद उसके नाम पर रोज ही चालीस-पचास पत्र आने शुरू हो गए. यह कॉलेज के लिए और हॉस्टल के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ था कि आखिर उसके पास इतने पत्र कहाँ-कहाँ से आते हैं. यह सब करामात उसके द्वारा अनु नाम रखकर एक लड़की के रूप में पत्रिका में सन्देश छपवाने के बाद हुई थी. इसी तरह एक बार अपने शहर के मुख्य डाकघर में हमें प्रधान द्वारा बुलवाकर इसकी जानकारी ली गई थी कि हमारे पास इतने पत्र रोज कहाँ से और क्यों आते हैं. ये बात सन 1996-97 के आसपास की होगी, उस समय हमारे पास रोज ही दस-बारह पत्र आया करते थे.

आज हमारे पास पत्र आने की संख्या भले बहुत ही सीमित हो गई हो, हमारे द्वारा भी पत्र लिखने की गति भी कम हो गई हो मगर बंद नहीं हुई है. ई-मेल और सोशल मीडिया के इस दौर में लोगों ने अपनी बात इधर से उधर पहुँचाने का अलग माध्यम भले ही अपना लिया हो मगर हम आज भी बहुत से परिचितों, अपरिचितों, पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाकारों आदि को पत्र भेजते हैं. उनको पत्र लिखना हम आज भी हस्तलिपि में ही करते हैं. आप भी कोशिश करिए पुनः, अच्छा लगेगा. जो लोग पत्र लिखते रहे हैं, पत्रों का इंतजार करते रहे हैं, वे भली-भांति इसके सुखद एहसास को समझ सकते हैं. जिन लोगों ने कभी पत्र नहीं लिखा, पत्रों के इंतजार करने की अनुभूति नहीं की वे इसका आनंद उठा सकते हैं.

वर्तमान दौर में जबकि सभी लोग खुद में अकेलापन महसूस कर रहे हैं, उस समय आपके हाथ से लिखे दो शब्द आपके अपनो के लिए बहुत बड़ा सुख का माध्यम बन सकते हैं. लिख कर देखिये, हम भी लिख रहे हैं, आप भी लिखिए.

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30 July 2020

नई शिक्षा नीति के साथ-साथ कड़े कदम उठाने होंगे

एक और शिक्षा नीति देश के सामने आ गई है. इस बारे में अभी कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि इसके बारे में अभी पढ़ना नहीं हो सका है. बिना पढ़े ऐसी किसी भी नीति के बारे में, नियमों के बारे में कुछ भी कहना सही नहीं. राजनीति के नजरिये से प्रत्येक कदम को देखना उचित नहीं. संभव है कि इस नीति में अच्छे बिंदु उठाये गए हों, ये भी संभव है कि इसमें कुछ बिन्दुओं पर अभी भी विमर्श की, बदलाव की आवश्यकता हो मगर इनके बारे में जानकारी के बाद ही कुछ कहना सही रहेगा.



अभी बात महज इतनी कि शिक्षा नीति लागू करने के साथ-साथ कुछ कठोर कदमों को भी उठाया जाना अपेक्षित है. उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े होने के कारण इस क्षेत्र की बहुत सी कमियाँ आये दिन सामने आती हैं. इसके अलावा बहुत से मित्रों का, परिजनों का प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण इस क्षेत्र की कमियों से भी सामना होता रहता है. अभी हाल ही में प्राथमिक क्षेत्र में एक बड़ा घोटाला सामने आया जबकि एक महिला लगभग दो दर्जन जगहों पर नियुक्त पकड़ में आई. इसके बाद पूरे प्रदेश में शिक्षकों की जाँच का कदम उठाया गया. ये तो महज एक स्थिति है. उच्च शिक्षा क्षेत्र में आये दिन निजी क्षेत्रों के महाविद्यालयों द्वारा किसी न किसी रूप में नियमों की अवहेलना करने की घटनाएँ सामने आती हैं. प्रवेश से लेकर परीक्षा करवाने तक के कई कदमों में उनके द्वारा नियमों-कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपना उल्लू सीधा किया जाता है.


ये स्थिति अकेले महाविद्यालयों की नहीं है वरन निजी क्षेत्र के तमाम शिक्षण संस्थान इसी तरह की गतिविधियों में लिप्त हैं. यहाँ जब भी बदलाव की, परिवर्तन की बात की जाती है तो प्रबंध-तंत्र प्रशासन पर दोष लगाता है और प्रशासन निजी संस्थानों के प्रबंध-तंत्र को कटघरे में खड़ा कर देता है. ऐसे में अपेक्षित सुधार की सम्भावना शून्य ही हो जाती है. इन शिक्षण संस्थानों द्वारा पुस्तकों को लेकर, फीस को लेकर आये दिन के फसाद किसी से छिपे नहीं हैं. ऐसे में जबकि देशव्यापी तंत्र में खराबी समझ आती है तब महज एक नई नीति का निर्माण किसी बड़े परिवर्तन का सूचक नहीं हो सकता है. निजी संस्थानों पर लगाम लगायी जानी चाहिए, जिनके द्वारा शिक्षा का, पुस्तकों का, फीस का घनघोर बाजारीकरण किया जा चुका है.

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