25 May 2020

प्रेम कहानियों पर इतना कौतूहल क्यों

लोगों की रुचि दूसरों की ज़िन्दगी में झाँकने की क्यों होती है? दूसरे की ज़िन्दगी में सुख है या दुःख इससे झाँकने वालों का कोई लेना-देना नहीं होता है, बस वे उसमें झाँकना चाहते हैं. इस ताका-झाँकी में यदि विषय प्रेम का, इश्क का हो तो फिर कहना ही क्या. इस विषय के आगे सभी विषयों को गौड़ कर दिया जाता है. किसी दूसरे के जीवन का कोई प्रेम-प्रसंग हाथ लग भर जाए फिर उसके आगे सारे प्रसंग बौने हो जाते हैं. किसी और के प्रेम-प्रसंगों के लिए, दूसरे की प्रेम-कहानियों को सुनने के लिए लोगों में बेताबी दिखाई देने लगती है. ऐसा किस मानसिकता के कारण होता है? ऐसा किस प्रवृत्ति के चलते लोग करते हैं? कई बार इस विषय पर अपने मित्रों से बातचीत करने की कोशिश की मगर कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया.


अपने जीवन की कुछ घटनाओं को कुछ सच्ची कुछ झूठी के द्वारा सबके बीच लाने का एक प्रयास विगत वर्ष किया था. उसके लेखन का जब आरम्भ किया था तब बहुत से दोस्तों, परिचितों के कई सवालों का सामना करना पड़ा था जो प्रेम-कहानियों से संदर्भित थे. इसके पहले भी बहुत बार लोगों के सवालों, निगाहों का शिकार हुए ऐसे सवालों को लेकर. कई बार हमारे कहीं आने-जाने को लेकर, किसी से दोस्ती को लेकर, किसी से बातचीत को लेकर ऐसे सवालों से सामना करना पड़ा. ऐसे प्रसंगों पर कई बार बात बदलने की कोशिश भी की मगर दूसरी तरफ से घूम-फिर कर बात को प्रेम-प्रसंगों पर लाकर टिका दिया जाता. ऐसा लगता जैसे उस समय किसी भी अन्य विषय से अधिक महत्त्वपूर्ण विषय लोगों के लिए हमारी प्रेम-कहानी को जानना रहता है. आजतक यह हमारी समझ से बाहर है कि ऐसा आखिर क्यों होता है? क्या उसके पीछे अगले के मन में, अचेतन में छिपी प्रेम करने की भावना रहती है? क्या उसके मन में उसके प्रेम की स्थिति इस बहाने संतुष्टि का एहसास करती है? क्या इसी तरह से वह अपने प्रेम सम्बन्धी समय को पुनः जीना चाहता है?


अब एकबार फिर इसी तरह के सवालों से सामना करना पड़ रहा है. अपनी कुछ सच्छी कुछ झूठी के प्रकाशन पश्चात् एक नई पुस्तक के लेखन में जुट गए थे. पुस्तक प्रेम कहानियों को लेकर है. इसमें कहानियों को शामिल किया गया है. ज्यादातर कहानियाँ हमसे जुड़ी हुई हैं और सत्य हैं. हाँ, इसमें कल्पना का कुछ तड़का लगाते हुए इनको पठनीय बनाने का प्रयास किया है. इसके साथ-साथ प्रयास किया है कि दूसरे व्यक्ति की छवि, उसकी सामाजिकता, पारिवारिकता पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े, न सकारात्मक और न ही नकारात्मक. इनमें से कुछ कहानियों को ब्लॉग पर प्रकाशित भी किया जा रहा है. इसके साथ-साथ उनको सोशल मीडिया पर भी शेयर किया जा रहा है. ऐसा किये जाने से इन कहानियों की पहुँच अधिकाधिक लोगों तक हो रही है. इसके चलते बहुत से परिचित लोगों के सवालों की बौछार होने लगी है. अभी तो बस इतना ही कहना है कि इनको बस कहानियाँ मानकर पढ़िए और यदि लगता है कि ये सच हैं तो उनको अपने दिल में बसाये रखिये.

प्रेम ही ऐसा विषय है जो कभी पुराना नहीं होता. कभी बासी नहीं होता. कभी विध्वंसक नहीं होता. प्रेम ही ऐसा विषय है जो व्यक्ति को व्यक्ति होना सिखाता है. इन्सान को इंसानियत सिखाता है. दुनिया को एक अलग दुनिया में ले जाता है. यदि अनुभव करना हो तो पहले-दूसरे प्रेम की बंधी-बँधाई सीमारेखा से बाहर निकल कर देखो. प्रेम की तरह उन्मुक्त हो उड़ कर देखो. निश्चित ही एक नई दुनिया का, सतरंगी दुनिया का अपने आसपास एहसास करोगे.

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24 May 2020

दिल और दिमाग के अंतर्संबंध

मानव शरीर में दिल और दिमाग, दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. दोनों के अपने निर्णय होते हैं और जीवन के फैसलों में दोनों के निर्णयों को एक-दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए. किसी भी व्यक्ति के जीवन में कठिन स्थितियों में, नकारात्मक स्थितियों में, विवाद की स्थितियों में, तनाव के समय में दिल की जगह दिमाग की बातों को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल के निर्णय मूल रूप से भावनात्मक एहसास पर आधारित होते हैं. जबकि दिमाग तर्क-क्षमता के द्वारा सही-गलत को परिभाषित करते हुए अपना निर्णय देता है.


दिल का सम्बन्ध सदैव से भावनात्मकता से रहा है. उसके द्वारा लिए गए निर्णय विवेकपूर्ण होने से ज्यादा संवेदनात्मक होते हैं. उसका विवेक संबंधों, रिश्तों एहसासों को प्राथमिकता देते हुए व्यक्ति को कार्य करने को प्रेरित करता है. ऐसा नहीं है कि दिल के द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में किसी तरह की त्रुटि होती है अथवा उसका व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. उसके द्वारा मन-मष्तिष्क को भी निर्णय लेने सम्बन्धी दिशा प्राप्त हो जाती है क्योंकि दिमाग भी कहीं न कहीं दिल के निर्णयों पर अपने विवेक का प्रयोग करते हुए सही-गलत को परिभाषित करता है.



किसी भी व्यक्ति द्वारा निर्णय लेने सम्बन्धी स्थिति में दिल और दिमाग दोनों ही सक्रिय हो जाते हैं. इस स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन, अपने भविष्य, अपने समय के अनुसार विवेकपूर्ण ढंग से विचार करता है कि उसके लिए अंतिम रूप से क्या सही है. उसी के अनुसार वह निर्णय लेता है. यही वह स्थिति होती है जबकि व्यक्ति के जीवन, भविष्य, कठिन स्थिति, नकारात्मकता, निराशा आदि दशाओं में दिमाग के निर्णयों की विजय हो जाती है. इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी व्यक्ति के बहुत ही करीबी व्यक्ति के विवाह का आयोजन है और वह व्यक्ति किसी प्राकृतिक आपदा के कारण जाने में असमर्थ है. ऐसी विषम स्थिति में उसका दिल उसे जाने को प्रेरित करता है मगर दिमाग विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए उसे सही, गलत स्थिति समझाते हुए जाने से रोकता है. निश्चित है कि ऐसे विषम समय में व्यक्ति अपने जीवन की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए विवाह आयोजन में न जाने का निर्णय करता है.

किसी भी इन्सान को गंभीरता की स्थिति में जबकि उसे दिल और दिमाग में से किसी एक को चुनना पड़े तो उसे याद रखना चाहिए कि उसके निर्णय का क्या और कैसा असर होने वाला है. यदि उसके निर्णय का असर किसी व्यक्ति के कैरियर, उसके भविष्य, उसके जीवन पर पड़ने वाला है तब उसे अपने दिमाग की तार्किकता को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल विशुद्ध रूप से भावनात्मकता को वरीयता देता है जबकि दिमाग का ज्ञान मानसिक, शैक्षिक, तार्किक, बुद्धिमत्ता से समूची स्थितियों का आकलन कर निर्णय करता है.

इसका अर्थ कदापि यह नहीं कि दिल के निर्णयों का महत्त्व नहीं. किसी भी रूप में दिल के विवेक पर दिमाग को हावी करना नहीं है क्योंकि जीवन में दोनों का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है. बिना दिल-दिमाग के कोई भी इन्सान सकारात्मक रूप से किसी स्थिति पर, किसी विचार पर आगे नहीं बढ़ सकता है. मूल रूप से दिल और दिमाग एक-दूसरे से अंतर्सम्बंधित होते हैं. बहुत सी स्थितियों में दिमाग के निर्णयों पर दिल के निर्णयों का भी प्रभाव होता है. जब कोई व्यक्ति अपने परिवार के बारे में, अपने अभिभावकों के बारे में, अपने बच्चों के बारे में निर्णय लेने की स्थिति में होता है तब वह दिल के ज्ञान को दिमाग के विवेक पर वरीयता देता है. भले ही ये कहा जाये कि बात अपने दिल की सुननी चाहिए परन्तु तार्किक रूप से उसका आकलन दिमाग से करते हुए निर्णयों का सम्मान करना व्यक्ति का दायित्व होना चाहिए.

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(हालाँकि ये पोस्ट पुरानी है मगर आज खुद के दिल-दिमाग की स्थिति में तालमेल, समन्वय की जगह द्वंद्व दिख रहा था. ऐसे में ये पोस्ट याद आई तो इसे फिर प्रकाशित कर दिया.)
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23 May 2020

स्केच, कविता और सुलेख की त्रिवेणी

जनता कर्फ्यू के दिन से यदि जोड़ लिया जाये तो लॉकडाउन जैसी स्थिति के दो महीने हो चुके हैं. वैसे लॉकडाउन वास्तविक स्वरूप में 25 मार्च से आया था. हमने उसी दिन दे स्केचिंग करना फिर से शुरू कर दिया था. किसी समय स्केचिंग खूब की. स्कूल के समय में, कॉलेज में इसका भरपूर आनंद लिया. बाद में कुछ दूसरे कार्यों में फँस जाने के कारण ये शौक धीरे-धीरे डिब्बे में बंद हो गया. यद्यपि स्केचिंग जैसी कलाकारी लगातार चलती रही तथापि ऐसा किसी व्यवस्थित रूप में नहीं हो रहा था. किसी भी कागज़ पर, किसी लिफाफे पर, ट्रेन में यात्रा करने के दौरान वातानुकूलित यान में मिलते कागज़ के लिफाफे पर अथवा किसी और जगह. ऐसी स्केचिंग न हमारे पास रही और न उसे संग्रहित करने की मंशा बनाई.


अब जबकि लॉकडाउन के चलते घर पर ही रहना था. कब तक पढ़ा-लिखा जाता, कितना पढ़ा-लिखा जाता तो विचार किया कि अपने इसी शौक को व्यवस्थित रूप दिया जाये. बहुत पहले अपनी स्केचिंग की फाइल बनाई थी मगर उसे एक बिटिया को उसके शौक को देखते हुए गिफ्ट कर दिया था. इस बार लॉकडाउन शुरू होने वाले दिन से अद्यतन स्केचिंग की जा रही है. सभी को व्यवस्थित रूप से रखा भी जा रहा है. इन स्केच में से कुछ को सोशल मीडिया पर अपने मित्रों के बीच शेयर भी किया जा रहा है. इस बारे में कुछ सुझाव भी मिले हैं, जिन पर अमल किया जा रहा है. इसी के बीच एक विचार में आया. बस उसे सक्रियता से शक्ल देनी है.


चलिए, पहले अपने लोगों के कुछ विचारों से आपको भी अवगत करा दें. हमारे बचपन के मित्र हैं राहुल शर्मा, लॉकडाउन स्केचिंग को देखकर अगले ने ही सबसे पहले एक सुझाव दिया था कि हर एक स्केच के बारे में कुछ लिखा करे. क्यों बनाया उसे? उसे बनाते समय क्या विचार आये? उस स्केच में जो है उसका क्या भावार्थ है? आदि-आदि. इसके अलावा एक अभिन्न मित्र सुभाष के द्वारा कहा गया कि स्केच के साथ कोई न कोई कैप्शन दिया करिए. हालाँकि ऐसा आरंभिक स्केच में किया गया मगर बाद में इसको अमल में नहीं लाये. इसी तरह से लगभग एकसाथ मित्रवत स्थिति में आये अनुज और हेमलता ने एक जैसे विचार दिए. दोनों लोगों का कहना था कि इन सभी स्केच को एक फाइल का रूप दिया जाना चाहिए. संभवतः वे लोग हमारे स्वभाव से परिचित हैं, इसलिए ऐसा उनको सुरक्षित रखने के लिए कहा होगा. इसी के साथ-साथ वर्तमान में लन्दन में निवास कर रही बड़ी बहिन अनुजा दीदी ने उन सभी स्केच की तारीफ करते हुए अपनी अगली भारत यात्रा के बाद उसमें से कुछ अपने साथ लन्दन ले जाने की बात कही. और भी कुछ विचार आये जो स्केच की तारीफ में ही थे. स्थानीय महाविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक डॉ० रामशंकर द्विवेदी जी का कहना था कि अगर चित्रकला में ही कैरियर बनाते तो भी शायद बुरा न होता. अब भी मुख्य काम से इतर अगर इसे समय दिया जाय तो अतिरिक्त ऊर्जा का उपयोग अच्छा ही होगा. मयूरेश ने एक स्केच को देखकर Salvador Dali जैसी पेंटिंग कह डाला. साथ ही मूंछों को उनके जैसा रखने की सलाह भी दी.

अभी तो ये स्थिति लॉकडाउन की है. आगे पुनः सामाजिक जीवन में सक्रिय होने के बाद इस पर कितना समय दिया जा सकेगा, यह भविष्य के गर्भ में है. लॉकडाउन में अभी तक 80 से अधिक स्केच बना ली हैं. किसी-किसी दिन दो, तीन भी बना डालीं. उक्त विचारों-सुझावों-टिप्पणियों के अलावा हमारा विचार ये आया कि इनमें से सबसे अच्छी लगने वाली 50-60 स्केच का चयन करके प्रत्येक पर एक छोटी सी कविता लिख दी जाये. कविता हस्तलिपि में होगी और दोनों (स्केच तथा कविता) को ब्लॉग के द्वारा प्रकाशित कर दिया जाये. यह पुस्तकाकार रूप में भी लाई जा सकेगी. हाल-फिलहाल तो पाठकों की माँग पर इसे PDF रूप में भी उपलब्ध करवाया जा सकता है. इससे और भी बहुत से लोगों को स्केच तथा कविता से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा.


इस बारे में जल्द ही ब्लॉग का नाम तय किया जायेगा. नाम ऐसा रखा जायेगा, जिसको पुस्तक के शीर्षक के रूप में भी समायोजित किया जा सके. इसके साथ-साथ कोशिश यह होगी कि नाम स्केच और कविता को भी परिभाषित करता हो. चलिए, अब इस काम पर भी लगा जाये, बस आप शुभेच्छुजन अपनी भी राय दे दीजिए कि कैसा विचार है हमारा?

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22 May 2020

हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर

फूल खिलने लगे गुलशन के मगर,
फूल गुमसुम हैं कितने घर के मगर.
कौन आया जहाँ में ये हलचल हुई.
आज डरने लगे लोग खुद से मगर.
























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21 May 2020

वेबिनार के रूप में बन्दर को मिला उस्तरा-आईना : व्यंग्य

लॉकडाउन में कहीं आना-जाना तो हो नहीं रहा है सो दिन-रात मोबाइल, लैपटॉप की आफत बनी हुई है. शुरू के कुछ दिन तो बड़े मजे से कटे उसके बाद इन यंत्रों के सहारे दूसरे लोग हमारी आफत करने पर उतारू हो गए. सुबह से लेकर देर रात तक मोबाइल की टुन्न-टुन्न होती ही रहती है मैसेज के आने की सूचना देने के लिए. समस्या इस मैसेज की टुन्न-टुन्न से नहीं बल्कि आने वाले मैसेज से है. मैसेज भी ऐसे कि बस अभी के अभी विद्वान बना देंगे. सोशल मीडिया के किसी भी मंच पर जाओ, इसी तरह का ट्रैफिक देखने को मिल रहा है. अरे लॉकडाउन में अपने घर बैठे हो तो काहे जबरिया ट्रैफिक बढ़ाने में लगे हो?


अभी भी नहीं समझे क्या? कहाँ से समझेंगे आप क्योंकि अभी बताया ही नहीं हमने कि मैसेज काहे के आते हैं. असल में दिन भर में करीब पंद्रह-बीस मैसेज आते हैं वेबिनार के. एक फॉर्म भरकर आप तैयार होकर अपने घर पर ही बैठे रहें. कहीं जाना नहीं, किसी जगह जाने की, रुकने की चिंता नहीं. समस्या तो अब पूरी तरह से तैयार होने की भी नहीं. ऊपर शर्ट अकेले डाल लो और बैठ जाओ कैमरे के सामने जाकर. शुरू में इसके बारे में जानकारी हुई तो लगा कि चलो कुछ लोगों को बैठे-बैठे समय बिताने का अवसर मिल जायेगा. इसके बाद तो जैसे-जैसे दिन गुजरने शुरू हुए तो लगा जैसे बन्दर के हाथ अकेले उस्तरा नहीं पकड़ाया गया है बल्कि उसके साथ में आईना भी थमा दिया गया है. अब आईना देख-देख कर उस्तरा घुमाया जा रहा है. ज़िन्दगी में पहली बार इस तकनीक से सामना, परिचय होने के कारण वे इसे पूरी तरह निचोड़ लेना चाहते हैं. इनका वश चले तो इसी तरह कोरोना को निचोड़ डालें. 


आज इसी वेबिनार (बेबी-नार नहीं) के मारे एक बेचारे मिले. वे पहले से ही अपनी नार के मारे तो थे ही अध्यापन के दौरान सेमी-नार से भी परेशान होने लगे. सेमी-नार में आनंद आने लगा और बजाय पढ़ाने के वे उसी के विशेषज्ञ बन गए. कालांतर में जब उनके बाल सफ़ेद होने लगे, घुटने कांपने लगे, चश्मे का नंबर लगातार बढ़ने लगा तो उन्हें अपने विषय का विशेषज्ञ भी मान लिया गया. अब वे सेमीनार करवाने के बजाय उसमें कुर्सी चपेट की भूमिका में आने लगे. उद्घाटन सत्र से लेकर समापन सत्र तक किसी न किसी रूप में वे मंच पर ही दिखते.

आज मिलते ही बातों-बातों में वेबिनार की चर्चा निकल आई. बस वे अपने लड़खड़ाते हत्थे से उखड़ गए. हाँफते-थूक निकालते उन्होंने वेबिनार संस्कृति को समूची सभ्यता के लिए, मान-मर्यादा के लिए, सम्मान के लिए खतरा बता दिया. उन्हें इसमें अपने जैसे बड़े-बूढ़े विशेषज्ञों की कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखा. कुर्सी के साथ-साथ जेब में आती सम्पदा पर भी संकट आते दिखा. समाचार-पत्रों में छपने, लोकल चैनल पर चेहरे के चमकने का टोटा दिखाई दिया. उन्होंने इसे सीधे-सीधे युवाओं के द्वारा बुजुर्गों के खिलाफ साजिश बता दिया. इस कदम को बुजुर्गों के अपमान से जोड़कर प्रचारित कर दिया. उनके अन्दर का सारा गुबार थूक, लार के रूप में उनके साथ-साथ आसपास वालों को भी अपने चक्रवाती तूफ़ान में लेने की कोशिश करने लगा.

उनकी हाँफी-खाँसी-थूक-लार से खुद को बचाते हुए कथित कोरोना को भी दूर किया. उनके हाँफने से प्रभावित अपने हाँफने को नियंत्रित करके हमने उनकी बातों पर विचार किया तो लगा कितनी व्यापक चिंता कर गए वे तो. अब ऊपर से मिलने वाली ग्रांट पर भी रोक लग सकती है. स्थानीय स्तर पर हनक की दम पर वसूले जाने वाले विज्ञापनों से होने वाली आय भी समाप्त हो सकती है. अनावश्यक छपाई कार्यक्रम से होने वाले अपव्यय को रोका जा सकता है. अंधा बांटे रेवड़ी, चीन-चीन के दे के आधार पर परिचितों की जेब में जाने वाले धन का रास्ता भी अवरुद्ध हो सकता है. फिर सिर झटका कि ये सब ठीक है मगर ये रोज-रोज के दर्जन भर लिंक से कौन जूझेगा? गली-गली विद्वता प्रदर्शित करने वालों से कौन, कैसे निपटेगा?

इसी निपटने में याद आयी एक और समस्या. वेबिनार के साथ-साथ उस्तरा थामे महानुभाव आपसे एक लिंक के द्वारा बस एक फॉर्म भरने का निवेदन करेंगे. इसके भरते ही और उसमें दिए गए कुछ विशेष, रटे-रटाये सवालों के जवाब देकर आप विशेषज्ञ हो जायेंगे कोविड-19 के, कोरोना के. इसके लिए आप अपने को कोरोना योद्धा भी कह सकते हैं. जिन खबरों से बचने के लिए टीवी बंद करवा दिया, समाचार-पत्र बंद करवा दिया, इंटरनेट पर भी समाचार चैनलों को, लिंक को खोलना-देखना बंद कर दिया वही विषय सिर खाने के लिए मोबाइल से झाँकने लगा है.

समझ नहीं आ रहा कि सरकार ने लॉकडाउन कोरोना संक्रमण से बचने के लिए किया है या कोरोना विशेषज्ञ बनाये जाने वालों की पैदाइश के लिए? सरकार को इस अनावश्यक टॉर्चर किये जाने को भी लॉकडाउन का उल्लंघन माना जाना चाहिए. वैसे भी उच्चीकृत मास्टर इस समय या तो मूल्यांकन कार्य में छपाई कर रहा होता या फिर घूमने में गँवाई. ऐसे में उन नवोन्मेषी वेबिनार वालों पर संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए जो न केवल लिंक भेजने का कार्य करते हैं बल्कि असमय फोन करके लॉकडाउन की शांति भंग करने का प्रयास भी करते हैं.


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20 May 2020

छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे

चीनी उत्पादों के जैसे इसकी तासीर न निकली. जैसे सारे चीनी उत्पाद सुबह से लेकर शाम तक वाली स्थिति में रहते हैं ठीक उसी तरह से इस कोरोना वायरस को समझा गया था. हर बार की तरह इस बार भी चीन को समझने में ग़लती हुई और कोरोना हम सबके गले पड़ गया. कोरोना का इधर गले पड़ना हुआ उधर सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया. कहा जा रहा था कि इस आपदा में भी अवसर तलाशने चाहिए. आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश करनी चाहिए. बस, इसे गाँठ बांधते हुए बहुत से अति-उत्साही अवसर बनाने निकल आये. कुछ खाना बनाने में जुट गए तो कुछ ने जलेबी बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली.


इसके साथ ही बहुतेरे लोग ऐसे थे जो स्वयंभू रूप में कोरोना योद्धा बने युद्ध करने में लगे थे. इनका युद्ध किसी को नहीं दिख रहा था. जैसे युद्धनीति में एक कौशल छद्म युद्ध की मानी जाती है, गुरिल्ला युद्ध तकनीक मानी जाती है, कुछ ऐसा ही ये योद्धा कर रहे थे. बिना किसी की नजर में आये, बिना किसी को हवा लगने के ये युद्ध किये जा रहे थे. अब चाहे जितना छद्म युद्ध लड़ लो, चाहे जितना गुरिल्ला युद्ध लड़ लो, चाहे जितना छिपकर काम करो मगर तकनीक के आगे किसी की नहीं चलती. तकनीक से सारी गोपनीयता उजागर हो जाती है. तो इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत से तकनीकबाजों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन कथित योद्धा है. बस, इस खोज को उनके द्वारा उजागर भी कर दिया गया.

इन तकनीकबाजों ने सभी को अपने-अपने स्तर से सम्मानित करना शुरू कर दिया. सम्मान भी वैसा जैसे कि योद्धा थे. न योद्धा दिखाई दिए, न सम्मान करने वाले. लॉकडाउन में योद्धा अपना काम करते रहे, सम्मान देने वाले अपना काम करते रहे. उन्होंने हवा में कलाबाजियाँ दिखाईं तो इन्होंने भी कलाकारी दिखाई. इसी कलाकारी में कई कलाकार रह गए. अब जो रह गए उनके प्रति भी समाज का कुछ कर्तव्य बनता है. उनके लिए भी कुछ कलाकारी दिखाने की आवश्यकता तो है ही. यही विचार जैसे आया तो लगा कि ऐसे लोगों के हौसले को टूटने नहीं देना है. आखिर बिना किसी को भनक लगे, बिना किसी काम के योद्धा बन जाना सहज नहीं होता. तो ऐसी सहजता वालों को भी सामने लाने का दायित्व समाज का है.  


इस तरह की बात मन में आई और एक योजना बना दी गई. रह गए अदृश्य योद्धाओं को सम्मानित करने की पुनीत योजना का शुभारम्भ जल्द ही किया जाना है. इसमें योद्धाओं जैसे लोगों को प्रमाण-पत्र, सम्मान-पत्र, सम्मानोपधियाँ देने का अति-पुनीत कार्य किया जायेगा. अब समस्या यही कि ऐसे छिपे लोगों को खोजा कैसे जाए क्योंकि तकनीकबाजों जैसी तकनीक यहाँ उपलब्ध नहीं. इसके लिए एक उपाय खोजा गया. इस योजना को सोशल मीडिया पर डाला गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सभी तरह के योद्धा सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं. सुस्त रूप में भी, सक्रिय रूप में भी. ऐसे में जो स्वयंभू योद्धा किसी अन्य तकनीकबाज से सम्मानित न हो सके हैं, और यदि वे सम्मानित होने के इच्छुक हैं तो ऐसे सुसुप्त जागरूक लोग अपना नाम, माता-पिता का नाम, जन्मतिथि (इसे वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया है), पता हमें भेजें. 

यहाँ विवरण भेजते समय विशेष रूप से ध्यान रखें कि अपनी कार्य सम्बन्धी जानकारी का कोई विवरण नहीं भेजना है. ऐसा करने पर आवेदन निरस्त माना जायेगा. कार्य विवरण की अपेक्षा इसलिए नहीं क्योंकि इसे किसी गुप्त तकनीक की सहायता से खोद कर निकाल कर सामने लाया जायेगा. अभी इच्छुक बस अपना सम्मान, प्रमाण, उपाधि प्राप्त करें. हाँ, किसी को यदि कोई विशेष उपाधि, सम्मान की मनोकामना है तो उसे अवश्य बताएँ.  सभी की मनोकामना पूर्ण की जाएगी. ऐसा किये जाने के पूर्व छीछालेदर रस में सराबोर सम्मान आपको ससम्मान प्रदान करने की शपथ ली जाती है. जिनको सम्मान, उपाधि प्रदान की जाएगी, उनसे भी अपेक्षा रहेगी कि वे इस कोरोना काल में लॉकडाउन समय जैसा छीछालेदर रस सदैव बहते रहेंगे.

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19 May 2020

हताशा, निराशा, कुंठा तो आपने ओढ़ ही ली है

अचानक से परिवार के सामने ऐसी स्थिति आ जाये जो कभी सोची न हो, जैसी स्थिति कभी सामने आई न हो तो क्या स्थिति होती है दिमाग की? किसी पारिवारिक आपदा के समय अचानक से ऐसा निर्णय लेना पड़ जाये जो किसी एक-दो व्यक्तियों के लिए नहीं वरन सम्पूर्ण परिजनों पर प्रभाव डालेगा तो उस समय आपकी क्या हालत होती है? कभी विचार किया है कि अपने परिवार के किसी ख़ुशी के समारोह की तैयारी भी हम सभी सूचीबद्ध तरीके से करते हैं उसके बाद भी अंतिम समय में कोई न कोई चूक हो जाती है. कभी कोई सामान कम पड़ जाता है, कभी कोई सामान लाना भूल जाया जाता है. ऐसा तब होता है जबकि आप ख़ुशी का कार्यक्रम संपन्न कर रहे हों. याद करिए, आपके साथ भी हुआ होगा जबकि किसी कार्यक्रम से सम्बंधित निमंत्रण/आमंत्रण पत्र बाँटने पड़े हों. कई-कई बार की सूची बनाने के बाद, कई-कई लोगों से जानकारी लेने के बाद भी आपका कोई नजदीकी अवश्य ही छूट गया होगा. चलिए नजदीकी न सही कोई न कोई ऐसा रह गया होगा उस आमन्त्रण पत्र पाने से जिसे आप न्यौता देना चाहते थे. ऐसा तब हो जाता है जबकि आप सबकुछ एक प्लानिंग के द्वारा करते हैं.


अब इसी सन्दर्भ में एक  बार केन्द्र सरकार के बारे में अथवा किसी भी राज्य सरकार के बारे में विचार करिए. क्या आपने कभी सोचा था कि लॉकडाउन जैसी स्थिति इस देश में आएगी? क्या आपने कभी विचार किया था कि एक दिन ऐसा आएगा जबकि आपको बाहर से आने के बाद अपने ही परिजनों से दूर रहना पड़ेगा? इससे पहले बहुत से लोगों ने देश में युद्ध की स्थिति के समय को देखा होगा, झेला होगा मगर वह वक्त भी इतना भयावह नहीं था. उस समय आपके घर के बगल में दुश्मन की गोली चलने का, बम फूटने का भय नही हुआ करता था. आपके किसी के छू लेने से आपको गोली लगने का डर नहीं हुआ करता था. आज इसके ठीक उलट है. आपको किसी व्यक्ति से ही नहीं बल्कि किसी सामान से भी संक्रमित होने का खतरा है. किसी के छींकने, थूकने से भी आपको खतरा है. ऐसे में विचार करिए कि जिस आपने पहली बार कोरोना के संक्रमण की खबर सुनी थी, क्या आपने उस समय भी लॉकडाउन के बारे में विचार किया था?


अब आपके सामने दो महीने के आसपास की स्थिति है. आप घर पर बैठे टीवी, मोबाइल पर अपनी विद्वता पेलने में लगे हैं. इसी सबको देखते हुए अब आप सरकारों को सलाह देने के काबिल हो गए हैं. सरकारों के कदमों की आलोचना करने लायक हो गए हैं. ये ठीक वैसा ही है जैसे आप अपने सोफे में धँसे, कुछ न कुछ अपने हलक में उतारते हुए किसी बल्लेबाज को गेंद खेलने का तरीका बताने लगते हैं, किसी गेंदबाज को गेंद फेंकने का तरीका समझाने लगते हैं. कभी विचार किया है कि मैदान पर पिच के ऊपर खड़े बल्लेबाज को किस गति की गेंद का सामना करना पड़ता है? नहीं न, क्योंकि आपको महज अपना मुँह चलाने की विशेषज्ञता हासिल है.

आपके परिवार में एक व्यक्ति गंभीर बीमारी का शिकार हो जाता है तब आपके होश उड़ जाते हैं. बहत्तर लोगों से विचार करते हैं मगर समझ नहीं पाते हैं कि कौन से डॉक्टर को दिखाया जाये? कौन सा इलाज करवाया जाये? कहाँ ले जाया जाये? हर एक बार निर्णय लेने के बाद उससे उपजे परिणामों को देखने के बाद आप अगला कदम उठाते हैं. कभी विचार किया है कि आप महज एक व्यक्ति के इलाज को लेकर किस स्थिति तक परेशान होते हैं? इस समय आप सरकारों के निर्णयों को लेकर हमलावर हो सकते हैं क्योंकि आप अपने घर में सुरक्षित हैं. ऐसा इसलिए भी कर सकते हैं क्योंकि आप किसी रूप में खुद को सरकारी क़दमों में सहयोगी नहीं मान रहे हैं.

ये इस देश की सबसे बुरी स्थिति है, यहाँ चाहे ख़ुशी का अवसर हो या फिर दुःख का, कोई सामान्य सी स्थिति है या फिर आपदा की आपको सरकारों के निर्णयों में बस कमी ही दिखाई देती है. ऐसा इसलिए क्योंकि आपके लिए घटनाओं को देखने के बाद उनका विश्लेषण करने की कला आती है. कभी विचार किया है कि इसी देश की सरकारों ने सुनामी जैसी विभीषिका से आपको सुरक्षित बनाये रखा. कभी सोचा है कि केदारनाथ की भयंकर आपदा में भी सरकारों ने आपके लोगों को सुरक्षित रखा. कभी ध्यान दिया कि ऐसी अनेक आपदाओं से आपको या फिर आपके नजदीकी लोगों को बचाए रखा. ऐसी-ऐसी जगह सरकारों द्वारा बचाव कार्य सफलतापूर्वक पूरे किये गए जहाँ आप सामान्य दिनों में जाने की सोचकर भी काँप जाएँ.

फिर विचार करिए अपनी मानसिकता पर कि कहीं आप बौद्धिक रूप से हताश तो नहीं? सोचिये कि कहीं आप विरोध करते रहने की मानसिकता के चलते अवसाद में तो नहीं जा चुके हैं? अपनी स्थिति को देखिये और विचार करिए कि कहीं आप पर कुंठित पागलपन तो हावी नहीं हो चुका है? देखिये और सोचिये, ये सब सही है क्योंकि इस पोस्ट के बाद अभी और न जाने क्या-क्या बकने वाले हैं. फिर विचार करिए कि सरकारें जो कर रही हैं वो अलग, आप ऐसा क्या कर रहे हैं जिससे ये देश आपका ऋणी रहे, ये देशवासी आपका एहसान मानें? सोचियेगा, अन्यथा हताशा, निराशा, कुंठा तो आपने ओढ़ ही ली है.

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18 May 2020

गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा

संभव हो आप सभी ने ये चुटकुला सुन रखा हो. अरे, सुन भी रखा हो तो एक बार सुनकर हँसने में क्या समस्या है. आखिर हम किसी एक दुःख पर को जितनी बार देखते-सुनते हैं, उदास हो जाते हैं तो एक चुटकुला कई-कई बार सुन कर हँस नहीं सकते. इधर कुछ दिनों से लोगों ने माहौल को बद से बदतर बनाने की कोशिश करनी शुरू कर दी है. बेवजह की समस्याओं का अम्बार लोगों के घरों में ठूँसना आरम्भ कर दिया है. इससे लोगों में निराशा, हताशा देखने को मिलने लगी है. बहरहाल, सबकी अपनी-अपनी कहानी है. हम सबकी कोशिश इस समय छोटी-छोटी बातों से भी बड़ी-बड़ी खुशियाँ निकालने की होनी चाहिए मगर कुछ लोग हैं जो सिर्फ समस्याओं का, दुखों का, निराशा का, हताशा का ही रोना रोते रहते हैं. खैर, आगे बढ़ते हैं.


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एक लड़का था जो ऐसी ही किसी घनघोर बंदी का शिकार हो गया और उसके बाद एक ही बात की रट लगाए रहता, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा. उसकी इस रट को दूर करने का बहुत प्रयास किया गया. कई-कई बार सेनेटाइज किया गया, कई-कई दिन के लॉकडाउन में रखा गया, क्वारंटाइन किया गया मगर नहीं उसकी यही एक रट लगातार बनी रही, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

घर वालों ने बहुत इलाज करवाया. तमाम जगह उसके सैम्पल भेजे गए मगर हर बार रिपोर्ट पॉजिटिव ही आ जाती. हर बार लगता कुछ सही हो रहा है मगर दिमागी संक्रमण फिर बढ़ जाता और वही एक बात, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

कहते हैं न कि करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, सो एक दिन घरवालों को एक बेहतरीन डॉक्टर का पता चल गया. मालूम चला कि उसके पास कोई इलाज है जो इस संक्रमण को ख़त्म कर सकता है. मरता क्या न करता वाली स्थिति में घरवाले उस लड़के को लेकर उस डॉक्टर के पास पहुँचे. डॉक्टर ने लड़के का पूरा मौका-मुआयना किया और फिर चौदह दिन के इलाज के बाद एकदम ठीक हो जाने का दावा किया. घर वालों को विश्वास तो न हुआ मगर यही सोचकर कि शायद लाभ हो जाये, लड़के को डॉक्टर के नर्सिंग होम में भर्ती करवा दिया.

चौदह दिन बाद घरवाले आये. डॉक्टर ने कहा कि अब आपका लड़का एकदम सही है. इसका दिमागी संक्रमण ठीक हो गया है. अब कोई समस्या नहीं.

घर वालों ने अपनी तसल्ली के लिए डॉक्टर के सामने ही इसका परीक्षण करना चाहा. उन्होंने लड़के से पूछा, अब कैसा लग रहा है?

लड़के ने जवाब दिया, अब अच्छा महसूस हो रहा है.

बहुत दिनों बाद लड़के के मुँह से किसी बात का सही जवाब मिले पर घरवाले ख़ुशी से झूम उठे न तो अभी तक वह हर बात का एक ही जवाब देता था, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

लड़का बोला, मुझे घर ले चलो.

घरवालों ने उसके ठीक होने को और जाँचने के लिए पूछा, घर जाकर क्या करोगे?

लड़का बोला, अब अपनी छूटी पढ़ाई करूँगा.

लड़के के मुँह से ऐसी बातें देख घरवालों का हौसला बढ़ा. वे बड़े खुश हुए. वे लड़के की बात को आगे पूछते जाते और लड़का जवाब देता जाता. (अब घरवालों के सवालों के बजाय सीधे लड़के की कही बातें लिखते हैं. क्योंकि जिनको ये चुटकुला मालूम है, वे बोर होने लगेंगे और जिनको नहीं मालूम वे भी बोर होंगे)


घरवालों की बातों का जवाब देते हुए लड़का बोलता रहा, खूब पढ़ाई करूँगा. उसके बाद विदेश जाऊँगा. वहाँ कोई नौकरी करूँगा या फिर अपना बिजनेस करूँगा. उससे खूब पैसा कमाऊँगा. फिर खूब बड़ा घर खरीदूँगा. बड़ी सी कार खरीदूँगा. जब सब चीजें हो जाएँगी तो फिर एक विदेशी मेम से शादी करूँगा.

घरवाले झूम-झूम जा रहे थे कि लड़का अब इतनी बातें करने लगा. पढ़ाई से लेकर शादी तक आ गया. उधर डॉक्टर भी अपने इलाज पर इतरा रहा था.

लड़के से घरवालों ने पूछा, शादी के बाद?

लड़का चुप रहा फिर बहुत धीरे से बोला, शादी के बाद पार्टी होगी. सब लोग आयेंगे. गिफ्ट लायेंगे, पार्टी करेंगे. फिर हम लोग रात को घर आ जायेंगे. उसके बाद हम दोनों सुहागरात मनाएंगे.
इसके बाद लड़का शरमाते हुए बोला, फिर कमरे की लाइट बंद कर दूंगा. उसके बाद मैं उस गोरी मेम के एक-एक करके कपड़े उतारूँगा. फिर... फिर...

घरवालों ने सोचा कि आगे की बात बताने में शरमा रहा है. उन्होंने डॉक्टर का बहुत-बहुत आभार व्यक्त किया और लड़के से घर चलने को कहा.

लड़के ने जोश में कहा, पूरी बात तो सुन लो. गोरी मेम के कपडे उतारने के बाद उसके अंडरगारमेंट्स में से इलास्टिक निकालूँगा. उससे गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

अब घरवाले भौचक्के से कभी लड़के को देखते, कभी डॉक्टर को. डॉक्टर भी अब इलाज को अगले चौदह-इक्कीस दिन बढ़ाने पर विचार करने लगा.

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कहिये, कुछ लोगों का हाल ऐसा ही है न? चाहे कितना भी इलाज करो, करवाओ मगर रट एक बात की ही मचाए हैं.

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17 May 2020

मौत स्वयं ही प्राणी को अपनी तरफ आकर्षित करने लगती है

आज की पोस्ट में एक कथा, इसे बोध-कथा कह सकते हैं. इसे बहुत साल पहले अपने मित्र के घर पर एक पंडित जी से सुना था. मित्र अपनी माता जी के निधन के कारण बहुत परेशान रहता था. पंडित जी रोज शाम को धार्मिक अनुष्ठान सम्बन्धी कार्यों के लिए आया करते थे. उस दिन बातचीत के दौरान उन्होंने इस कथा को सुनाया. इस पोस्ट के द्वारा हम किसी भी रूप में इसकी सत्यता अथवा असत्यता सम्बन्धी बात नहीं कर रहे वरन इसके यहाँ रखने का उद्देश्य कुछ अलग ही है. संभवतः इसे पूरा पढ़ने के बाद आप लोग समझ सकें. चलिए बिना किसी और बातचीत के सीधे उसी कथा पर, जो पंडित जी ने उस शाम सुनाई.


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किसी पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि वेद व्यास के मामा अत्यंत वृद्ध हो गए. अपनी वृद्धावस्था देख कर उन्हें अपनी मृत्यु का भय सताने लगा. कई दिनों तक इस सम्बन्ध में परेशान रहने के बाद उन्हें उपाय नहीं सूझ रहा था कि मृत्यु से कैसे बचा जाये. विचार करते-करते एक दिन उनके मन में वेद व्यास का ख्याल आया. उनको लगा कि अमर होने का रास्ता मिल गया. वे तत्काल ही महर्षि वेद व्यास से मिलने चल दिए.

व्यास जी से मुलाक़ात करने पर उन्होंने अपनी समस्या बताई और कहा कि तुम्हारे तो सभी देवताओं से मधुर सम्बन्ध हैं. तुम उनसे मिलकर ऐसा कुछ कर दो जिससे मेरी मृत्यु न हो.

वेद व्यास अपने मामा जी कि बेचैनी को देख-समझ रहे थे सो उन्होंने इसे गंभीरता से लिया. अपने मामा को सांत्वना देते हुए उन्होंने कहा कि ये छोटा काम है, इसके लिए देवताओं के पास तक जाने की आवश्यकता नहीं. मैं काल से ही कहे देता हूँ, वो आपके प्राण लेने नहीं आएगा.

व्यास जी के मामा को चैन कहाँ था. उनको इस बात से बड़ी प्रसन्नता हुई और बल भी मिला. उन्होंने उसी समय वेद व्यास से काल के पास चलने को कहा. वेद व्यास भी मामा की आकुलता देखकर काल के पास तत्काल चलने को तैयार हो गए.

काल के पास दोनों लोग पहुँचे. उन्हें देखकर काल ने प्रणाम किया और आने का कारण जानना चाहा. वेद व्यास ने उसे पूरी बात बताई. मामा की इच्छा जानकर उसने अपने हाथ जोड़े और कहा कि मैं तो इस कड़ी की सबसे छोटी इकाई हूँ. आप यमदूत से कह दें कि मामा जी की मृत्यु का आदेश न दे. मैं कभी मामा जी के प्राण लेने न आऊँगा.

मामा की आतुरता देखकर व्यास जी काल को लेकर यमदूत के पास चल दिए. यमदूत के सामने पहुँच कर उसे भी पूरी बात बताई. प्रकरण सुनने के बाद उसने कहा कि मुझे किसी के प्राण लेने के आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है. हमारे ऊपर के यमराज जी की तरफ से पृथ्वी लोक के प्राणियों की एक सूची समयबद्ध होकर आ जाती है. हम उसी में से नित्य के नाम काल को भेज देते हैं. कृपा करके आप यमराज जी से कह दें कि वे मामा जी का नाम सूची में न भेजें. मैं आपके प्राण लेने के लिए काल को आदेशित न करूँगा.

ऐसा सुनकर सभी लोग यमराज से मिलने को चल दिए. यमराज अपने सामने वेद व्यास, उनके मामा, काल, यमदूत को देखकर चौंक उठे. उन्होंने अपने सिंहासन से उठकर अभिवादन सहित यहाँ आने का कारण पूछा. वेद व्यास ने पूरा प्रकरण विस्तार से समझाया. यमराज ने शांतिपूर्वक बताया कि वे किसी प्राणी के प्राण लेने के लिए स्वतः किसी को आदेशित नहीं करते हैं. भगवान शंकर की तरफ से ऐसा आदेश आने के पश्चात् ही प्राणियों के साथ ऐसा व्यवहार काल के द्वारा किया जाता है. आप भगवान शंकर से निवेदन कर लें तो मुझे भी सहजता हो जाएगी.

वेद व्यास के मामा जी उत्साहित होते जा रहे थे. उनको अपने अमर होने का रास्ता दिख रहा था. वे वेद व्यास के साथ-साथ काल, यमदूत यमराज को लेकर भगवान शंकर से निवेदन करने चल दिए. भगवान शंकर के सामने पहुँचने पर उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया गया तो उन्होंने कहा कि महर्षि आपके मामा मेरे मामा समान हैं. और वैसे भी मुझे किसी प्राणी को मारने में, उसके प्राण लेने में कतई प्रसन्नता नहीं होती. मैं तो विधि का विधान बनाये रखने के लिए ऐसा करता हूँ. आपने कहा तो भविष्य में मामा का नाम यमराज के पास नहीं जायेगा मगर एक समस्या है.

वेद व्यास ने समस्या जाननी चाही तो भगवान शंकर ने बताया कि इस जगत के समस्त प्राणियों के भरण-पोषण, उनके जीवन का दायित्व भगवान विष्णु का है. एक बार आप उनसे सलाह लेते हुए ये निर्धारित कर लें कि मामा जी का जीवन बनाये रखने में भगवान विष्णु के भरण-पोषण सम्बन्धी कार्य में कोई व्यवधान तो नहीं पड़ेगा? यदि वे आज्ञा देते हैं तो मामा जी की मृत्यु टालनी सुनिश्चित कर दी जाए.

वेद व्यास ने भगवान शंकर से अनुरोध किया तो वे भी उनके साथ चल दिए.

अचानक से, अकारण, बिना किसी पूर्व सूचना के अपने सामने भगवान शंकर के साथ वेद व्यास, उनके मामा, काल, यमदूत, यमराज को आया देखकर भगवान विष्णु के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. उन्होंने जब भगवान शंकर से पूरी स्थिति समझी तो वे बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने कहा कि महर्षि के मामा जी का जीवन समाज के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है. मुझे आजीवन इनके भरण-पोषण करने में कोई समस्या नहीं बस आप एक बाद भगवान ब्रह्मा से इसकी चर्चा कर लें. जीवन देने वाले वही हैं. इस तरह से जीवन-मरण के चक्र में व्यतिक्रम आने से कहीं कोई समस्या उत्पन्न न हो. उनकी सहमति मिलते ही मामा जी मृत्यु सम्बन्धी भय से मुक्त हो जायेंगे.

भगवान शंकर के निवेदन पर भगवान विष्णु भी उन सबके साथ हो लिए. सभी लोग इस कारण एक-दूसरे के पास तक पहुँचते जा रहे थे ताकि किसी भी तरह की प्रक्रिया सम्बन्धी समस्या आने पर उसका समाधान तुरंत हो सके. आखिर महर्षि वेद व्यास के मामा के जीवन-मृत्यु से सम्बंधित प्रकरण था.

भगवान ब्रह्मा के सामने पहुँचने पर वेद व्यास के मामा पूरी तरह निश्चिन्त हो गए. किसी से भी उनको नकारात्मक जवाब नहीं मिला था. इससे उनमें आशा का संचार हो रहा था. ब्रह्मा जी ने धैर्य से पूरी बात सुनने के बाद आदरपूर्वक मामा को निश्चिन्त रहने का आश्वासन दिया. उन्होंने कहा कि इसमें कोई समस्या नहीं मगर सभी प्राणियों के जीवन का लेखा-जोखा चित्रगुप्त के पास रहता है. उनसे ही इस बारे में जानकारी की जा सकती है.

अगले ही क्षण चित्रगुप्त अपनी लेखा-पंजिका सहित उपस्थित हुए. ब्रह्मा जी के सामने भगवान विष्णु, भगवान शंकर, यमराज, यमदूत, काल के साथ-साथ वेद व्यास और उनके मामा को देखकर उन्हें स्थिति गंभीर समझ आई. वे ब्रह्मा जी के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगे.

ब्रह्मा जी ने मामा की तरफ इशारा कर चित्रगुप्त को सम्बोधित करते हुए कहा कि आप महर्षि के मामा जी हैं. इनकी कुंडली निकालिए और इनकी आयु सम्बन्धी गणना करके कुछ ऐसी व्यवस्था कीजिये जिससे इनकी मृत्यु न हो.

ब्रह्मा जी के आदेश पर चित्रगुप्त ने व्यास जी के मामा की कुंडली खोली तो उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं. चेहरे पर घबराहट के संकेत नजर आने लगे. ब्रह्मा जी ने इसका कारण जानना चाहा तो चित्रगुप्त ने दोनों हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन किया कि महाराज, महर्षि वेद व्यास जी के मामा जी स्वयं अपनी कुंडली का अवलोकन कर लें.

ब्रह्मा जी का इशारा होते ही वेद व्यास के मामा ने जैसे ही अपनी कुंडली पर दृष्टि दौड़ाई. उनके चेहरे से सारी प्रसन्नता गायब हो गई. चेहरा एकदम मलिन पड़ गया. देह ठंडी पड़ने लगी. वे वहीं गिर गए.

उनकी कुंडली में लिखा हुआ था, जिस क्षण उनके साथ वेद व्यास, काल, यमदूत, यमराज, भगवान शंकर, भगवान विष्णु, भगवान ब्रह्मा और चित्रगुप्त का मिलना होगा, वो क्षण उनकी मृत्यु का क्षण होगा.


इस कथा का सार यही है कि जिस प्राणी ने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है. मृत्यु किसी न किसी बहाने से प्राणी को अपने नजदीक बुला लेती है. कुछ ऐसा ही यह कथा कहती है. देखा जाये तो वेद व्यास के मामा की कुंडली के अनुसार उनकी मृत्यु सम्बन्धी पल आना ही नहीं था मगर जिस क्षण को, जिस परिस्थिति को उनकी मृत्यु के लिए निर्धारित किया गया था, वे स्वयं उसी परिस्थिति में, उस क्षण में सबको लेकर पहुँच गए.   

वर्तमान दौर में सभी को आशान्वित रहने की आवश्यकता है. आत्मबल बनाये रखने की आवश्यकता है. आत्मविश्वास बनाये रखने की आवश्यकता है. जीवन मिला है तो उसके साथ मृत्यु भी मिली है. कब, कैसे, कहाँ इससे मिलना होगा, वह स्वतः ही निर्धारित कर देगी. स्वतः ही प्राणी को अपनी तरफ आकर्षित करने लगेगी.

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(लेखक इस कथा की सत्यता, असत्यता को प्रमाणित नहीं करता है)

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16 May 2020

जिसका दिमाग तुम्हारी तरह पैदल हो, उसे चाटो

रोज-रोज वही लॉकडाउन, वही कोरोना, वही मजदूर, वही सरकार, वही संक्रमण, वही संख्या, वही दुकानदार, वही पैकेज की बात कहाँ तक की जाये? दिमाग पंचर कर डाला कुछ लोगों ने. सुबह से शाम तक बस एक ही रोना. जागने से लेकर सोने तक बस एक ही काम कोरोना-कोरोना. ऐसा लग रहा है कि जैसे कोरोना जाप करके ये लोग उसे आमंत्रित कर रहे हैं. व्यवस्था, सुविधा, राशन, भोजन, कैम्प, क्वारंटाइन, आइसोलेशन, आँकड़े आदि के कारण ऐसा लगने लगा जैसे हम लॉकडाउन में घर में नहीं बल्कि किसी ऐसे सर्वर की चपेट में आ गए हैं, जहाँ बस इन्हीं सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा रहा है.


दिमाग का दही कर देने वाले ऐसे लोगों को पिछले दो-तीन दिन से एक विषय मजदूरों का मिल गया. कोई पैदल आ रहा कोई हजारों रुपये देकर. सरकार ट्रेन चलवा रही तो आफत, न चलवाए तो आफत और उस आफत का शिकार हम. दिन में किसी भी समय सोशल मीडिया के दर्शन करने जाओ ऐसा लगता है जैसे एकमात्र हम ही बेवक़ूफ़ हैं, एकमात्र हम ही सूचना-विहीन हैं. दे दनादन हजारों मैसेज एक बार में मोबाइल के बहाने हमारे सिर पर पटक दिए जाते हैं. इन्हीं में से कुछ तो ऐसे होते हैं जो हमें सरकार समझते हैं या फिर सरकार का ऐसा एजेंट, जिसके इशारे पर सरकारें निर्णय लेती हैं. सरकार ने क्या गलत किया, उसे कैसा करना चाहिए था, उसे क्या नहीं करना चाहिए था ये सब हमें बताया-सुनाया जाता है.

अरे, हम तो कहते हैं कि ये महामारी है, आपदा है जिसे किसी ने भी पहली बार देखा है. ऐसी स्थिति में सरकार निर्णयों के बाद का परिणाम सोच भी नहीं पा रही, आकलन भी नहीं कर पा रही. निर्णय लेने के बाद जो होता है, उसी आधार पर आगे की रणनीति बनाई जाती है. एक पल को यहाँ रुक कर यही धुरंधर, जो सरकार को सुझाव दे रहे हैं, अपने घर की किसी ख़ुशी वाली स्थिति पर ही निगाह डाल लें. लड़की-लड़के की शादी की बात ही ले लें. यदि ऐसा कोई कार्यक्रम पहली बार हो रहा होता है तो घर में होने वाले कार्यक्रमों में, विवाह घर में, वैवाहिक कार्यक्रम के दौरान तक अनेक अवसर ऐसे आते हैं जबकि चूक समझ आती है. कई बार सामान की कमी दिखाई देती है, कभी सामान का भूल जाना याद आता है, कभी किसी निर्णय के दुष्फल सामने आते हैं तो ऐसे में आप क्या करते हैं? मीडिया को बुलाकर चिल्ला-चिल्लाकर उस सम्बंधित व्यक्ति की बुराई करना शुरू कर देते हैं? क्या उस कमी की चर्चा तुरंत सोशल मीडिया पर डालकर सम्बंधित व्यक्ति को दोष देने लगते हैं? ऐसा कुछ नहीं करते आप क्योंकि वो आपके घर का कार्यक्रम होता है.

असल में आप देश को, सरकार को अपना मानते ही नहीं हैं. यही कारण है कि सुबह से लेकर रात तक सिवाय बकवास करने के आप कुछ नहीं करते हैं. देखा जाये तो आप सिर्फ बकवास ही नहीं करते बल्कि लोगों में डर भरते हैं, लोगों में हताशा पैदा करते हैं. सत्य यही है कि आप ऐसे लोगों की मजबूरी का तमाशा बनाते हैं, ऐसे लोगों की मजबूरी का तमाशा बेचते हैं. बेचिए आप इनकी मजबूरी, इनका तमाशा पर हम जैसे लोगों को क्षमा करिए. आप अपना ज्ञान अपने तक रखिए. अपनी जानकारी से खुद को समृद्ध करिए अथवा उसे मोहरा बनाइये जो आपकी तरह नौटंकी करता हुआ दिमाग से पैदल हो चुका है.


आप जैसे लोगों के लिए ही कहा है हमने....

दर्द उनका देख हम भी रोते हैं,
लगा कर दो पैग चैन से सोते हैं.

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नौटंकी संवेदनात्मक #दुनाली

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