23 January 2021

नामी का गुमनामी होना

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के निधन को एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि उनकी मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है. नेताजी की मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेताजी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार सेंट्रल डेली न्यूज़ से पता चलता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था.


इसी तथ्य पर मिशन नेताजी से जुड़े अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि 14 अगस्त से 25 अक्तूबर 1945 के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है. (तब ताईहोकू के इस हवाई अड्डे का नाम मात्सुयामा एयरपोर्ट था और अब इसका नाम ताईपेह डोमेस्टिक एयरपोर्ट है.) नेताजी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि जिस शव का अंतिम संस्कार किया गया वो शव नेताजी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुरा का था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. इसी कारण बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेताजी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया था, जिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का.




नेताजी की कार्यशैली, उनकी प्रतिभा, कार्यक्षमता को जानने के बाद उनके प्रशंसकों ने नेताजी की उपस्थिति को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वयं से स्वीकार किया है. इसका सशक्त उदाहरण गुमनामी बाबा के रूप में देखा जा सकता है. समय-समय पर गुमनामी बाबा के सामानों की जाँच के लिए भी आवाज़ उठी. अब फ़ैजाबाद के डबल लॉक में रखे गुमनामी बाबा के सामानों के खुलासे ने उम्मीद जगाई है कि शायद नेताजी का सच अब सामने आ सके. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं.


फ़ैजाबाद के रामभवन में प्रवास के दौरान किसी के भी सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले भगवन अथवा गुमनामी बाबा के देहांत की खबर वर्ष 1985 में आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. देश का सच्चा सपूत आज़ादी के बाद भी भले ही गुमनाम बना रहा किन्तु उनकी भतीजी ललिता बोस और देशवासी रामभवन में मिले सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा को ही नेताजी स्वीकारते रहे. ये महज संयोग नहीं कि इनके लम्बे संघर्ष पश्चात् सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के 2761 सामानों की एक सूची बनाई गई जो फैजाबाद के सरकारी कोषागार में रखे हुए हैं.


रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा 13 जनवरी 2013 को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के 24 बड़े लोहे के डिब्बों और 8 छोटे डिब्बों अर्थात कुल 32 डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को लगने लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया जाना है और ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही है किन्तु अंतिम विजय का पर्दा उठाना अभी शेष है.


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वंदेमातरम्

20 January 2021

ज़िन्दगी का सफर

ज़िन्दगी कब एकदम से रुख मोड़ दे, कहा नहीं जा सकता है। हँसती-खिलखिलाती हुई बगिया में कब आँसुओं की बरसात होने लगे, समझ नहीं आता है। खुशियों के बीच एकदम से दुखों का पहाड़ टूट पड़ना किस नियति के कारण है, आज भी समझ न आया। सबकुछ सही चलते-चलते सबकुछ गलत हो जाना प्रकृति का उचित कदम नहीं। 

अभी दिल, दिमाग सवाल-जवाब की हालत में ही नहीं है। मन को समझाने से ज्यादा भरमाने का काम किया जा रहा है। समझाने पर आँखें बरसती हैं और भरमाने पर खुद ही भ्रम की स्थिति में रहकर चलते रहा जाता है।


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वंदेमातरम्

19 January 2021

तुम झींगुर जैसो उटक गये

बचपन के वे दिन याद आ गए जबकि हम तीनों भाइयों में तुम ही सबसे चंचल, सबसे शैतान थे। शैतानी के साथ तुम्हारी मासूमियत सबको हँसा देती थी। घर के लोग तुम्हारी शैतानी भूल जाया करते थे। तुम्हारी चंचलता तुमसे शैतानियाँ करवाती रहती। किस-किस को याद करें, कितना याद करें। अब बचपन से लेकर अभी तक की तुम्हारी हरकतें चंचल ही रहीं। उम्र से बड़े होते रहने के बाद भी तुम स्वभाव से कभी बड़े न हो सके। वैसी ही शरारतें, वैसा ही व्यवहार तुममें बचपना बनाए रहा। 

बचपन में शैतानी कर पल भर में गायब हो जाना, कभी इधर, कभी उधर उछलकूद मचाए रखना, कभी यहाँ चढ़ना, कभी उधर कूदना तुम्हारे खेल हुआ करते। बाबाजी ने एक दिन तुम्हारी इन्हीं हरकतों पर हँसते हुए अइया से कहा भी था कि जो झींगुरा जैसो उटकत है। एक पल में इधर, दूसरे पल में उधर। उस दिन के बाद तो जैसे यह झींगुर जैसा उछलना तुम्हारे स्वभाव का अंग मान लिया गया। हम सब अभी तक इस पर हँसते हुए चर्चा कर लेते थे, तुमको भी चिढ़ा देते थे। अब भी तुम्हारे घर में आने और एकदम से गायब होकर दोस्तों संग घूमने निकल पड़ने को हम लोग झींगुर सा उटकने की बात कह कर हँस लेते थे। 



इस बार भी तुम झींगुर जैसे उटके पर अबकी घर में कोई हँस नहीं रहा तुम्हारे इस उटकने पर। इस बार भी तुमने अपनी चंचलता भरा स्वभाव दिखा कर शैतानी कर दी पर अबकी इसमें कोई मासूमियत नहीं दिखी। इस बार की शैतानी पर कोई भी हँस नहीं रहा है। अबकी तुम्हारा झींगुर जैसा उटकना ज़िन्दगी भर को रुला गया। अबकी झींगुर सा उटक कर तुम इस दुनिया से उस दुनिया में चले गये। 

हम सब तुम्हारी स्थिरता पर, गम्भीरता पर भी हँस लेते, मुस्कुरा लेते बस तुम उम्र बढ़ने के साथ-साथ तुम थोड़ा सा गम्भीर होना सीख लेते, झींगुर सा उटकना छोड़ देते।



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वंदेमातरम्

12 January 2021

स्वामी विवेकानन्द का सकारात्मक वेदांत दर्शन

भारत में वेदान्त की कई प्रकार की व्याख्याएँ हुई हैं और सभी को प्रगतिशील माना गया है. वेदान्त का शाब्दिक अर्थ है वेद का अंत. वेद हिन्दुओं के आदि धर्मग्रन्थ हैं. विवेकानन्द जी के विचार धर्म के विषय में उल्लेखनीय हैं. वेदान्त दर्शन के सम्बन्ध में उनका नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है. उन्होंने देश में और देश के बाहर भी वेदान्त के सम्बन्ध में अपनी वाणी का जादू चलाया. वे वेदों को दो अंशों में विभक्त करते हैं, इनमें एक है कर्मकाण्ड और दूसरा है ज्ञानकाण्ड. किसी भी हिन्दू के सन्दर्भ में सहज रूप में स्वीकारा जाता है कि वेदान्त ही उसका जीवन है, वेदान्त ही उसकी साँस है. वेदान्त की अनेक व्याख्याएँ हुई हैं. वेदान्त के सन्दर्भ में सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ उत्तरमीमांसा स्वीकार्य है. कालांतर में वेदान्त के व्याख्याकार तीन प्रसिद्ध सम्प्रदायों - द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद तथा अद्वैतवाद में बँट गये. समय के साथ इनका पुनरुद्धार शंकराचार्य, रामनुजाचार्य तथा मध्वाचार्य के द्वारा किया गया. शंकराचार्य ने अद्वैतवाद को, रामनुजाचार्य ने विशिष्टताद्वैतवाद को तथा मध्वाचार्य ने द्वैतवाद को पुनः स्थापित किया.


स्वामी विवेकानन्द बचपन से ही बुद्धिमान थे और बचपन से दर्शन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाये हुए थे. वे किसी भी धर्म की उपेक्षा नहीं करते थे और लोगों को धर्म के मार्ग से विमुख होने से बचाने के लिए वेदान्त दर्शन के माध्यम से सही रास्ते में चलने के लिए प्रेरित करते थे. उनका कहना था कि हम लोग वेदान्त के बिना न तो साँस ले सकते हैं और न ही मृत्यु को प्राप्त कर सकते हैं. वेदान्त हमें यह बतलाता है कि समाज या कर्म के किसी क्षेत्र में शक्ति की जो विशाल राशि प्रदर्शित होती है, वह वस्तुतः भीतर से बाहर आती है, इसलिए जिसे अन्य सम्प्रदाय अंतःस्फुरण कहते हैं, उसे वेदान्त मनुष्य का बहिःस्फुरण कहने की स्वतंत्रता लेता है.


इसे स्वामी विवेकानन्द के विचारों की प्रगतिशीलता ही कही जाएगी कि इतने वर्षों बाद भी उनके मत का महत्व बना हुआ है. वेदान्त के व्यावहारिक पक्ष की आज भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी पहले पुराने समय में थी. वेदान्त दर्शन के माध्यम से स्वामी विवेकानन्द सभी सम्प्रदायों को आपस में जोड़ना चाहते थे. उन्होंने 01 फरवरी 1895 को न्यूयार्क से कुमारी मेरी हेल को लिखित एक पत्र में कहा था कि मेरे पास विश्व को देने के लिए एक संदेश है, जिसे मैं अपनी ही शैली में दूँगा. मैं अपने संदेश को न तो हिन्दू धर्म, न ईसाई धर्म, न संसार के किसी और धर्म के साँचे में ढालूँगा, बस. मैं केवल उसे अपने ही साँचे में ढालूँगा.


अपने उस संदेश के सार को उन्होंने 07 जून 1896 को सिस्टर निवेदिता लिखे पत्र में प्रस्तुत किया था. वे लिखते हैं कि मेरा आदर्श अवश्य ही थोड़े से शब्दों में कहा जा सकता है, और वह है, मनुष्य-जाति को उसके दिव्य स्वरुप का उपदेश देना तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना. इसके बाद 25 फरवरी 1900 को ऑकलैंड में दिये गये व्याख्यान में उन्होंने वेदान्त को परिभाषित करते हुए कहा था कि वेदों से आशय किन्हीं ग्रंथों का नहीं है बल्कि उनका अर्थ आध्यात्मिक नियमों के संचित कोष से है, जिनकी खोज विभिन्न व्यक्तियों ने विभिन्न कालों में की.


स्वामी विवेकानन्द ने वेदांत को सिर्फ वैचारिकता के प्रचार-प्रसार के लिए ही नहीं चुना बल्कि वे इनके द्वारा देश के नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं को आध्यात्मिकता की तरफ बढ़ने पर जोर देते हैं. वे वेदान्त के माध्यम से समझाते हैं कि हे बन्धुगण, तुम्हारी और मेरी नसों में एक ही रक्त का प्रवाह हो रहा है. तुम्हारा जीवन-मरण मेरा भी जीवन-मरण है. मैं तुमसे पूर्वोक्त कारणों से कहता हूँ कि हमको शक्ति, केवल शक्ति ही चाहिए और उपनिषद शक्ति की विशाल खान हैं. उपनिषदों में ऐसी प्रचुर शक्ति विद्यमान है कि वे समस्त संसार को तेजस्वी बना सकते हैं. उनके द्वारा समस्त संसार पुनरुज्जीवित, सशक्त और वीर्य-सम्पन्न हो सकता है. समस्त जातियों को, सकल मतों को, भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के दुर्बल, दुखी, पददलित लोगों को स्वयं अपने पैरों पर खड़े होकर मुक्त होने के लिये वे उच्च स्वर में उद्घोष कर रहे हैं. मुक्ति अथवा स्वाधीनता, दैहिक स्वाधीनता, मानसिक स्वाधीनता, आध्यात्मिक स्वाधीनता यही उपनिषदों का मूल मन्त्र है.




महज 39 वर्ष के अल्प जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे. उनके दर्शन, कार्यों, व्याख्यानों को देखते हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं.


रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था कि उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे. हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था. वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा था - शिव!यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.


उनका दर्शन नितांत व्यावहारिक था. यही कारण था कि उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें. हिन्दू धर्म, दर्शन, आध्यात्म को मानने वाले विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे. इसी के चलते उन्होंने विद्रोही बयान कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये, भी दिया था. आज ऐसे विचार देना तो दूर, ऐसा सोच पाना खुद सरकार के लिए आसान नहीं है. देखा जाये तो यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था वरन यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी.


आज उनकी जन्मजयन्ती पर सादर नमन.


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वंदेमातरम्

11 January 2021

शास्त्री के साथ क्या हुआ था?

जब साल 1966 के अप्रैल में ताशकंद में आए एक विनाशकारी भूकंप में सैकड़ों जानें चली गयी, तब सलामत बचे लोगों में कुछ को ऐसा लगा कि जैसे ईश्वर भारतीय प्रधानमंत्री की उनके यहाँ उसी साल हुई मौत से नाराज थे. कुछ महीनों बाद आँखों में आँसू लिए ललिता शास्त्री उस विला को देखने को पहुँचीं, जहाँ उनके पति को ठहराया गया था. एक महिला कर्मचारी उन्हें उस बेडरूम तक ले गई, जहाँ शास्त्री ने अपनी आखिरी साँस ली थी. शास्त्री का कमरा दिखाते वक्त वो उज्बेकी महिला अपनी भवों में सिलवटें डालकर गंभीरता से फुसफुसाई... “कोई टेलीफोन नहीं”- यानी अपने आखिरी वक्त में भारतीय प्रधानमंत्री एक तरह से बाकी दुनिया से कटे हुए थे.


लोगों को संदेह था कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बारे में आधिकारिक तौर पर जो जानकारी दी गई थी, उसमें कुछ न कुछ जरूर छिपाया गया था. शास्त्री की मौत से जुड़ी शंकाओं के बारे में जहाँ ताशकंद में दबी जुबान में बातें होती थीं, तो वहीं उन दिनों भारत में यही चर्चा सबसे बड़ा विषय था. आज भी ताशकंद में शास्त्री जी की मृत्यु और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का रहस्यमई हालत में लापता होना देश के सबसे विवादित सियासी मसले हैं.


शास्त्री की मौत हमारे दिलो-दिमाग में आज भी कुछ ऐसे बसी है कि जब भी उनका जिक्र होता है, चर्चा खुद-ब-खुद जनवरी 1966 के उस घटनाक्रम तक पहुँच जाती है. आखिर उस दिन ताशकंद में क्या हुआ था? शास्त्री जी जैसे महान व्यक्तित्व को किसी किस्म के प्रचार की जरूरत नहीं है. उनकी सादगी और ईमानदारी हमारे जेहन में हमेशा के लिए दर्ज है. लेकिन ये सवाल आज भी चुभता है कि आखिर हमारे प्रधानमंत्री की किसी विदेशी जमीन में संदिग्ध मौत पर कभी कोई जाँच क्यों नहीं की गई? जबकि यह हमारे अब तक के इतिहास का इकलौता ऐसा मामला है.


ऐसा भी नहीं है कि ये मामला कभी देश के सामने नहीं लाया गया हो. संसद में शास्त्री के लिए शोक सन्देश पढ़े जाने के फ़ौरन बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने पूछा था: “ताशकंद में क्या हुआ? क्या उनकी मृत्यु को टाला नहीं जा सकता था? क्या यह संभव नहीं था कि बिस्तर से बिना उठे ही वह अपने डॉक्टर को और नौकर को बुला सकते? क्या यह संभव नहीं था कि वहाँ ऑक्सीजन की व्यवस्था होती? जो पाँच या सात मिनट मिले थे, उसमें अगर उचित प्रबंध होता, तो शायद हम उन्हें बचा पाते?”


लेकिन भला कौन था-जो शास्त्री जी को मृत देखना चाहता था? उनके बचपन के दोस्त टीएन सिंह के मुताबिक वो ‘अजातशत्रु’ (जिसका कोई शत्रु न हो) थे. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए भी मानती थी कि 40 साल के सियासी सफ़र में शास्त्री के न के बराबर ही दुश्मन थे. ऐसे में कौन था जिसको शास्त्री की मौत से फायदा होता? आखिर भारत के खिलाफ ऐसे खतरनाक अपराध की सोच के पीछे भी भला क्या मकसद हो सकता था?




उनकी मौत पर कभी कोई जाँच नहीं हुई, क्योंकि सरकार हमेशा यही कहती रही कि शास्त्री की मृत्यु हार्ट अटैक से ही हुई है. उनके अनुसार शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. कुछ लोगों ने ‘दाल में कुछ काला’ होने के आरोप भी लगाये, लेकिन सरकार ने इस मामले में अपने आधिकारिक स्टैंड को बदलना दूर उस पर दोबारा गौर करना भी मुनासिब नहीं समझा. जाँच को लेकर उठी आवाजें धीरे-धीरे खामोश हो गईं. बीच-बीच में सुभाष चन्द्र बोस के लापता होने के विवाद के साथ ये मामला भी उठाया जाता रहा. कुछ वक्त बाद दोनों ही मसले एक ही चश्मे से देखे जाने लगे. 1970 में जब समर्थकों के दवाब में सरकार बोस के मामले की न्यायिक जाँच कराने को तैयार हो गई, तब शास्त्री के समर्थकों ने भी (इनमें से ज्यादातर लोगों ने बोस के मामले में भी आवाज़ उठाई थी) उनके केस की जाँच के लिए भरसक कोशिशें की, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं हुआ. उसी साल से यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया.


तो फिर हम आज साल 2019 में इस मामले को लेकर इतना गंभीर क्यों हैं? शास्त्री के निधन के 54 सालों बाद उस घटना को कुरेदने से भला क्या हासिल होगा? दरअसल मेरा मकसद है कि इस मुद्दे पर पूर्णतः विराम लगना चाहिए, जो कि आज तक नहीं हो पाया है. ऐसा तभी संभव होगा जब इस घटना की तह तक पहुँचने की कोशिश की जाये, ताकि उस रात की एक मुकम्मल तस्वीर सामने आ सके. आज भी कई लोग हैं जो उस घटना की पूरी सच्चाई जानना चाहते हैं. खासकर शास्त्री जी के परिजन, जो आज भी उस हादसे से उबर नहीं सके हैं. उस भयावह रात के बारे में सोचकर अभी भी उनके दोनों बेटों की आँखें डबडबा आती हैं. उस रात फोन पर शास्त्री जी की हालत नाजुक होने का संदेशा मिलने के बाद उनके परिवार के लोग अगले आधे घंटे तक भगवान के आगे प्रार्थना करते रहे, लेकिन...


सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से जुड़े विवाद पर एक मशहूर किताब लिखने के बाद मुझे ‘शास्त्री’ की संदिग्ध मौत पर लिखने के लिए भी कई सुझाव दिए गए. मैं उन सुझावों को टालता रहा. दरअसल मेरे पास ऐसा न करने की दो वजहें थीं. एक तो यह कि ‘बोस’ के मामले के उलट शास्त्री की मौत के केस में आधिकारिक तौर पर कुछ जानकारियाँ नहीं थीं. इसको लेकर दाखिल की गई मेरी आरटीआई (शास्त्री की मौत से जुड़े मामले में दाखिल की गई ये पहली RTI थी) से भी बस कुछ खबरों और लेखों के लायक जानकरी ही हासिल हो सकी थी. भले ही दोनों मामलों में चर्चा एक साथ की जाती हो लेकिन नेता जी और शास्त्री जी के मृत्यु के मामले एक लिहाज में बिलकुल अलग हैं – एक तबके का मानना रहा है कि नेताजी अपनी मृत्यु की अधिकारिक तारीख के बहुत बाद भी जिन्दा थे, जबकि शास्त्री जी की मृत्यु यकीनन ताशकंद में ही हो गई थी. लिहाजा नेताजी के मामले में खोजबीन के लिए भी काफी कुछ था. जबकि शास्त्री के केस में सिर्फ यही तय करना था, कि क्या उनकी मौत प्राकृतिक थी या नहीं? बिना पर्याप्त जानकारी और तथ्यों के इस घटना को लेकर एक ठोस, सटीक और संवेदनशील कहानी बुनना किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम मुश्किल नहीं था.


इस किताब को न लिखने के पीछे मेरा दूसरा तर्क था कि कहीं मेरी पहचान राष्ट्रीय नेताओं की मौत पर लिखते रहने वाले लेखक के तौर पर न बन जाए! हालाँकि मेरा मकसद ऐसी गुत्थियों को सुलझाने का है. इसलिए शास्त्री केस पर कई बेहद चर्चित और सराहे गए लेखों को लिखने के बाद भी मैं इस मुद्दे पर किताब लिखने को लेकर इच्छुक नहीं था.


लेकिन कुछ महीनों पहले मैं दिल्ली में फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री के साथ खाने की मेज पर बैठा था. इसी दौरान पहली बार मेरे दिमाग में इस किताब को लिखने का ख्याल आया. अग्निहोत्री इसी मामले को लेकर ‘द ताशकंद फाइल्स’ के नाम से एक फिल्म ला रहे हैं. उनकी इस फिल्म के लिए जरूरी तथ्य जुटाने के बाद कुछ सार्थक और बेहतर करने की चाह में मैंने अपनी हिचकिचाहट को दरकिनार कर इस किताब पर काम शुरू किया, ताकि फिल्म के साथ बने माहौल के बीच राष्ट्रीय महत्त्व के मसले को एक अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचाया जा सके.



(अनुज धर जी की प्रसिद्द पुस्तक शास्त्री के साथ क्या हुआ था? का प्राक्थन, साभार, लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर)
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वंदेमातरम्

09 January 2021

कर लीजिये प्रेम-उपवन की सैर हमारे साथ - दो हजारवीं पोस्ट

यह इस ब्लॉग की दो हजारवीं पोस्ट है. मई 2008 में ब्लॉग बनाने के बाद से लगातार लिखना हो रहा है. कभी रोज लिखा गया, एक दिन में दो-तीन पोस्ट लिखी गईं तो कभी दो-तीन दिन का अन्तराल होता रहा मगर ब्लॉग पर लिखना बंद नहीं हुआ. पिछले दो-तीन दिनों से इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय के बारे में विचार चल रहा था. कुछ अलग सा लिखना चाह रहे थे मगर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या लिखा जाए. इस बारे में मित्रों से भी चर्चा हुई, सोशल मीडिया पर भी शुभेच्छुओं के बीच बात रखी. बहुत से सुझाव मिले और आश्चर्य की बात देखिए कि बहुतायत में लोगों ने प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने की राय दी.


वैसे हमने सोचा तो ये था कि इस पोस्ट में अपनी जीवन-यात्रा को संक्षिप्त रूप में लिखा जाये मगर इस बारे में खुद में ही निश्चितता नहीं बन पा रही थी. जैसे-जैसे मित्रों के सुझाव मिलते रहे वैसे-वैसे लगा कि प्रेम ही एक ऐसा विषय है जो कभी भी पुराना नहीं होता, कभी भी किसी को बोर नहीं करता, तो इसी पर लिखा जाये. वैसे भी हम सभी की आदत होती है दूसरों की प्रेमकथा के बारे में जानने की, दूसरों की प्रेम-कहानियाँ सुनने-सुनाने की, प्रेमी-प्रेमिकाओं के बारे में चर्चा करने की. इस बारे में हमने आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी में लिखा भी है. आज की इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय से सम्बंधित मित्रों की राय के बाद प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने का मन बना लिया. इसमें भी आधार हमने खुद को बनाया है. ऐसा करने के पीछे कारण हमारी कुछ सच्ची कुछ झूठी ही है. बहुत से मित्र, पाठक उसमें हमारी प्रेम-कहानी न पाकर उदास हो गए थे.  उन्होंने इस पर अपना दुःख व्यक्त किया था, हमसे अपनी नाराजी प्रकट की थी, इस दो हजारवीं पोस्ट में अपनी ही प्रेमकथा लिख देने या कहें कि उसका आरम्भ कर देने से उन सभी मित्रों, पाठकों की नाराजगी भी दूर होगी और हमें भी किसी न किसी रूप में कुछ सच्ची कुछ झूठी में रह गई कमी को कुछ हद तक पूरा करने का अवसर मिलेगा.



चलिए फिर, आपको सैर करवाते हैं अपनी प्रेम-कहानियों के उपवन में. आश्चर्य न करिए. प्रकृति ने, इंसान की रचना करने वाले सृष्टि निर्माता ने हमारी प्रकृति ही ऐसी बनाई कि मन-दिल हमेशा युवा बना रहा, उसमें प्रेम की लहरें हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहीं. ईश्वर की इस कृति की प्रेमपरक प्रकृति को माता-पिता द्वारा दिए गए नाम ने भी चिरयुवा बनाये रखा. कुमारेन्द्र का सामान्य सा अर्थ भी इसी सन्दर्भ में लगाया जा सकता है. 


हमारे इस प्रेम-उपवन में सैर करते समय प्रेम की ये बगिया आप सभी को हमारी नजर से देखनी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रेम इतना व्यापक फलक वाला गुलशन है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी निगाह से देखता है. व्यापक परिदृश्य को अनेकानेक निगाहों से देखने के कारण प्रेम के सन्दर्भ बदल सकते हैं, उसके मानक परिवर्तित हो सकते हैं. ऐसे में हमारे प्रेम-उपवन के भी अनेकानेक निहितार्थ निकाले जा सकते हैं, अनेकानेक सन्दर्भ स्थापित किये जा सकते हैं. ऐसा होने से आप हमारी प्रेम-कहानियों की उस भावबोध को महसूस नहीं कर सकेंगे जिस भावभूमि पर खड़े होकर हमने अपने प्रेम को जिया है, उसको ज़िन्दगी भर के लिए अंतस की गहराइयों में आत्मसात किया है.


आप सभी लोग प्रेम शब्द की पावनता से खुद को जोड़कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहिए. प्रेम की भावनाओं के नामकरण से बचिए क्योंकि प्रेम बहुत संवेदनशील विषय होता है और यहाँ किसी भी तरह का नामकरण करने पर वह अति-संवेदनशील की श्रेणी में शामिल हो जाता है. इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में है के परम वाक्य से बाहर की हो जाती है.


इसे पढ़कर शायद उन सभी लोगों को बुरा लगे जो प्रेम को अत्यंत संकुचित रूप में देखते-समझते हैं. ऐसे लोगों के लिए प्रेम का मतलब सिर्फ और सिर्फ एक से प्रेम करने से होता है. ऐसा लगता है जैसे प्रेम कोई कोटा सिस्टम हो, एक व्यक्ति से प्रेम हो गया, उसके बाद कोटा ख़तम. प्रेम दिल की पवित्र भावना है जो पल-पल पल्लवित, पुष्पित होती है, सुरभित होती है. हमें तो आज तक प्रेम होता है. आज भी प्रेम होता है. बचपन में भी हुआ, किशोरावस्था में भी हुआ, युवावस्था में भी हुआ. क्या आपको नहीं हुआ? क्या आपको आज प्रेम नहीं होता?


खैर जाने दीजिये, आइये प्रेम-उपवन के उस हिस्से में चलते हैं जो हमारे बचपन से जुड़ा हुआ है. उम्र का वो पड़ाव जब प्रेम के सन्दर्भ, प्रसंग भी ज्ञात नहीं थे मगर उससे प्यार हुआ था. तमाम सारे दोस्तों के बीच वही एक लड़की सबसे ख़ास लगती. उसका ख़ास लगना ही प्रेम है, यह तो तब पता चला जबकि प्रेम का एहसास कर पाने की समझ विकसित हुई. आज जब पीछे पलट कर उस प्रेम की अनुभूति करते हैं तो आज भी वह वैसा ही मासूम दिखाई देता है, तितलियों सा रंगीन, पंछियों सा चंचल. उन दिनों में अख़बारों, पत्रिकाओं से काटे गए चित्रों के आदान-प्रदान करने की स्मृतियाँ आज भी दिल को गुदगुदा देती हैं. बचपन का दौर जिस तरह से मासूमियत के साथ कभी लौटकर न आने को विदा हो जाता है, वह ख़ास लगने वाली शख्सियत भी कभी न मिलने को दूर हो गई. बचपन की वो मासूम कहानी बिना कुछ कहे चलती रही थी, बिना कुछ कहे ही समाप्त हो गई.




समय भागता रहता है, उम्र बढ़ती रहती है, ज़िन्दगी के अनुभव परिपक्वता बढ़ाते रहते हैं. जीवन वास्तविकता के धरातल पर आ चुका था. प्रेम-कहानी को या कहानियों को रचने, गढ़ने से ज्यादा ध्यान खुद को गढ़ने पर, कैरियर बनाने पर दिया जाने का भाव आ गया था. यह भाव हम तो समझ रहे थे मगर दिल नहीं समझ रहा था. वह तो बस प्रेम करते रहना चाह रहा था, सो दिल ने प्रेम किया. पूरी गरिमा के साथ, पूरी पावनता के साथ, पूरी ईमानदारी के साथ किया.


इस अवधि में कहने-बताने लायक बहुत कुछ है. उन दिनों बहुत कुछ घटित हुआ, अच्छा भी, बुरा भी. हँसी भी साथ रही तो आँसुओं ने भी साथ न छोड़ा. बहुत कुछ ऐसा रहा जो साथ-साथ चलता रहा, साथी जैसा लगा इसके बाद भी किसी को अपना न कह सके. दिल, दिमाग, मन आदि सब किसी न किसी द्वंद्व में फँसे समझ आते. आगे बढ़ते कदम बढ़ते-बढ़ते रुक जाते. हाथों को थामने की कोशिश में खुद अपनी ही हथेलियों को बाँध लिया जाता. जो अपना न था, वो अपना न बना. बात जहाँ थी, वहाँ से आगे का सफ़र पूरा करते हुए वापस उसी जगह आकर रुक गई, जहाँ से शुरू हुई थी.  


भावनाओं के धरातल पर खड़े होकर अपने प्रेम का एहसास करते हैं तो सफल-असफल की संकुचित सोच से बहुत आगे का महसूस करते हैं. प्रेम को उथलेपन से ऊपर उठकर महसूस करने का भाव जागृत करके ही प्रेम को चिरस्थायी बनाया जा सकता है. यह कोई ओस की बूँद नहीं जो पल भर बाद मिट जाये. इस भाव को समझने के बाद ही प्रेम का वास्तविक अनुभव प्राप्त किया जा सकता है. इस भाव ने उन दिनों के प्रेम की छवि को धूमिल न होने दिया, उस प्रेम को तन्हा न होने दिया.


उम्र के इस दौर में जबकि जीवन का अर्धशतक अगले किसी मोड़ पर आपका इंतजार कर रहा हो तब प्रेम गंभीरता के भावबोध से भरा होता है. उसमें लड़कपन जैसी उड़ान नहीं होती, लहरों की तरह उछलना-कूदना नहीं होता वरन धीर-गंभीर रूप में वह पावनता का स्वरूप निर्मित करता है. आज इस पड़ाव पर यह कहना कि हमें किसी से प्रेम नहीं है या किसी से प्रेम नहीं होता और किसी से नहीं बल्कि खुद से झूठ बोलना होगा. ऐसा हर वो व्यक्ति कर रहा है जो ऐसे दौर से गुजरता है. उम्र के किसी भी पड़ाव पर प्रेम समाप्त नहीं होता. यदि ऐसा किसी के भी साथ होता है तो वह पाषण हृदय व्यक्ति ही होगा.


फिलहाल, आप लोग प्रेम-उपवन की इतनी सी संक्षिप्त सैर से संतुष्टि प्राप्त करिए क्योंकि विस्तार से सैर करवाने पर वह मात्र एक पोस्ट में समाहित न होने वाली. जैसा कि कुछ सच्ची कुछ झूठी में कहा था, यहाँ भी कह रहे हैं कि अपने प्रेम पर विस्तार से लिखा जायेगा, बहुत कुछ लिखा जायेगा, जो एहसास आज तक दिल के किसी कोने में कैद हैं उन सबको खुले आकाश में उन्मुक्त उड़ान के लिए स्वतंत्र किया जायेगा.


प्रेम की चर्चा होने पर हमारे मित्र विमल किसी विद्वान के वक्तव्य का जिक्र करना कभी नहीं भूलते कि प्रेम अग्नि के समान है उसका सदुपयोग हो तो वह पावक अग्नि के समान शुद्ध करता है, नहीं तो वह सामान्य अग्नि के समान जलाता है.


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वंदेमातरम्

ऐतिहासिकता को जीवंत स्वरूप प्रदान करने वाले साहित्यकार

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 131वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे.  उनकी प्रतिज्ञा अपने आपसे थी, इसी कारण वे इतिहास की सत्यता सामने लाने के लिए लगातार प्रयत्नशील बने रहे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली. गढ़कुंडार जैसे विस्तृत उपन्यास की कथा-वस्तु के बारे में उनका स्वयं का कहना है कि एक शिकार कार्यक्रम के दौरान रात भर उस किले की छवि देखते-देखते ही उन्होंने उसकी एतिहासिकता की कथा को स्वरूप प्रदान कर दिया था. 


उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. ऐसे दौर में इतिहास जैसे विषय पर लेखन करना और उसे जनसामान्य के बीच सहज मान्यता प्रदान करवाना सरल नहीं था. वृन्दावन लाल वर्मा जी की सरल और रोचक लेखन-शैली का ही कमाल कहा जायेगा कि उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास ने उन्हें पर्याप्त ख्याति प्रदान करवा दी. उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.




भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.

आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...


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वंदेमातरम्



08 January 2021

अभिभावक जाग जाये तो विद्यार्थी स्वतः ही जाग जायेगा

इन दिनों बिटिया रानी के टेस्ट चल रहे हैं. पढ़ाई की तरह टेस्ट भी ऑनलाइन हो रहे हैं. इससे पहले छमाही परीक्षा भी ऑनलाइन ही हुई थी. वैसे यदि ऑनलाइन न कह कर उस परीक्षा और इस टेस्ट को वर्क फ्रॉम होम जैसी स्थिति कहें तो ज्यादा अच्छा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि इन दोनों परीक्षाओं के लिए स्कूल से कॉपी मिल गईं थीं. सम्बंधित विषय के पेपर वाले दिन ऑनलाइन पेपर आ जाता स्कूल की वेबसाइट पर या फिर व्हाट्सएप्प ग्रुप पर. पेपर आता ठीक उसी समय जो समय पेपर शुरू होने का होता. विद्यार्थी समय के भीतर पेपर करे, इसका ध्यान अभिभावक को तो रखना ही होता, साथ ही स्कूल से एक व्यवस्था की गई थी, जिसके कारण निर्धारित समय के बाद कोई विद्यार्थी पेपर नहीं कर सकता था.


निश्चित समयावधि में अपना पेपर करने के बाद अगले दस-पंद्रह मिनट में सभी विद्यार्थियों को अपनी उत्तर-पुस्तिका की फोटो खींच उसकी पीडीएफ बनाकर सम्बंधित विषय के अध्यापक को भेजनी होती है. इसके लिए भी एक समय निर्धारित किया गया है. इसके बाद आने वाली उत्तर-पुस्तिकाओं को स्वीकार नहीं किया जाता है. इससे जब विद्यार्थियों द्वारा स्कूल में अपनी सभी विषयों की उत्तर-पुस्तिकाएँ जमा की जायेंगीं तो उनके द्वारा भेजी गई पीडीएफ से उसका मिलान करके आसानी से पता लगा लिया जायेगा कि बच्चों ने समय के बाद तो पेपर नहीं किया है. ऐसी परीक्षा में नक़ल किये जाने की पूरी सम्भावना होती है क्योंकि स्कूल द्वारा किसी भी तरह से कैमरे वाली व्यवस्था न करते हुए अभिभावकों को ही निरीक्षक की भूमिका में बनाया हुआ था. ऐसे में अभिभावकों पर निर्भर करता था कि वे बच्चों से किस तरह की अपेक्षा रखते हैं.  




हम भी निश्चित समय पर पेपर निकाल कर बिटिया रानी को देकर अपनी भूमिका में आ जाते. शिक्षा विभाग से जुड़े होने के कारण हमें स्वयं में ही एक तरह की पारदर्शिता, ईमानदारी बरतनी थी, अपनी बेटी के सामने एक आदर्श उपस्थित करना था. इसे संयोग कहा जाये या फिर पारिवारिक माहौल, न तो बिटिया ने किसी दिन कुछ पूछा और न ही परिवार में किसी ने किसी भी तरह से मदद करने की सोची. छमाही परीक्षाओं की कॉपी की पीडीएफ बनाते समय एक दिन देखा कि एक कॉपी में कुछ सवालों के जवाब छूटे हुए हैं. हमने उसी समय बिटिया से पूछा कि ये सवाल क्यों नहीं किये? उसने सहज भाव से जवाब दिया कि आये नहीं. उसके इस जवाब के मिलते ही अगले पल विचार किया कि हम सभी परिजन तो अपनी ईमानदारी भरी भूमिका निभा रहे हैं, एक बार बिटिया रानी के मन की थाह भी ले ली जाये. उससे कहा कि अरे, अपनी किताब से या नोट-बुक से देख लेती इनके जवाब. बिना एक पल की देरी किये उसने जवाब दिया कि पापा, ये तो चीटिंग हो जाती और चीटिंग करना बुरी बात है. उसके जवाब को सुनकर लगा कि अभी तक संस्कार, शिक्षा गलत दिशा में नहीं ले जा रहे उसे.


नंबर रेस में शामिल होने के लिए कभी भी उस पर दवाब नहीं बनाया. पढ़ने का अनावश्यक बोझ भी कभी नहीं डाला गया. नैसर्गिक रूप से उसके विकास के प्रति हमेशा सजगता दिखाई. ऐसे में नक़ल के प्रति उसकी मनोभावना देखकर ख़ुशी के साथ गर्व भी महसूस हुआ. उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े होने के कारण प्रतिवर्ष अभिभावकों को ही अपने बच्चों को अधिक से अधिक अंक दिलवाने के लिए परेशान होते देखते हैं. कभी प्रैक्टिकल के नाम पर, कभी कॉपी जाँचने के समय सिफारिश के साथ लगातार भटकने की स्थिति देखकर लगता है कि हम अभिभावक ही अपनी आने वाली पीढ़ी को बर्बाद करने में लगे हुए हैं. एक बार अभिभावक ही जाग जाये तो विद्यार्थी स्वतः ही जाग जायेगा, सजग, सतर्क हो जायेगा.


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वंदेमातरम्

ऐतिहासिक निकली हरे रंग की स्याही

कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कोई न कोई प्रतिभा होती है, उसे कोई न कोई शौक भी होता है। ये बात और है कि बहुत से लोगों को प्रतिभा निखारने का, उसे दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता, इसी तरह बहुत से लोग किसी न किसी कारण से अपने शौक भी पूरे नहीं कर पाते। ऐसी स्थितियों के लिए आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक आदि पक्ष भी जिम्मेवार होते हैं। इसके साथ-साथ व्यक्ति किस स्थान, किस शहर, किस परिस्थिति में रह रहा है, यह भी शौक एवं प्रतिभा के संदर्भ में महती भूमिका निभाते हैं। 

बचपन से ही फाउण्टेन पेन से लिखने की आदत बनी और कालांतर में यही आदत शौक के रूप में भी विकसित हो गई। आज भी मोबाइल, कम्प्यूटर के दौर में प्रतिदिन फाउण्टेन पेन से लिखना होता है। लिखने के शौक के साथ-साथ अलग-अलग रंग की स्याही का इस्तेमाल करना भी शौक जैसा ही है। लिखने के साथ-साथ फाउण्टेन पेन का प्रयोग स्केचिंग के काम में, कैलीग्राफ़ी में भी कर लिया जाता है। ऐसे में भी अलग-अलग रंग की स्याही की आवश्यकता होती है। 

ऐसे दौर में जबकि पेन का, विशेष रूप से फाउण्टेन पेन का इस्तेमाल कम से कम किया जा रहा हो, उरई जैसी छोटी जगह पर तो यह कमी और भी महसूस की जाती है। इस कमी के बीच फाउण्टेन पेन की स्याही की माँग करना एक तरह की ज्यादती ही कही जाएगी। काली, नीली स्याही की उपलब्धता तो फिर भी हो जाती है पर लाल, हरी स्याही की माँग करना आसमान के तारे माँगने जैसा हो जाता है। इसमें भी हरे रंग की स्याही तो उरई में नामुमकिन स्थिति को प्राप्त कर जाती है। कोरोनाकाल और लाॅकडाउन जैसी परिस्थिति के पहले तो उरई से बाहर कहीं बड़े शहर जाने पर स्याही ले आया करते थे। इस बार न हमारा जाना हो सका और अन्य किसी की सुलभता, सहजता न होने के कारण भी हरे रंग की स्याही उपलब्ध न हो सकी।



इधर हरे रंग की स्याही लगभग समाप्ति पर थी। पिछले दो महीने से उरई की दुकानों के चक्कर लगाए जा रहे थे पर हरी स्याही की उपलब्धता नहीं हो पा रही थी। बिक्री न होने के कारण दुकानदारों की अपनी मजबूरी थी। काफी भागदौड़ और लगभग रोज की पूछताछ के बाद आज अंततः एक दुकान से दो शीशियाँ प्राप्त हो ही गईं। यद्यपि दोनों शीशियों से कुछ स्याही बह भी चुकी है तथापि हाल-फिलहाल लिखने का, स्केचिंग का, कैलीग्राफ़ी का काम बाधित न होगा। समाप्ति की ओर बढ़ती जा रही हरी स्याही के कारण इन कामों को हरे रंग से करना रोकना, कम करना पड़ा था। 

आज हरी स्याही का मिलना खुशी दे गया तो उनकी पैकिंग तिथि ने आश्चर्यचकित कर दिया। मई 1997 की पैक ही हुई स्याही को सही ठिकाना मिला जनवरी 2021 में। इस स्याही को धैर्य के साथ इस्तेमाल किया जाएगा और सुरक्षित रख लिया जाएगा क्योंकि एक तरह से ये ऐतिहासिक हरी स्याही हो गई। हरी स्याही मिलने के बाद भी हरी स्याही की खोज जारी रहेगी। वैसे जल्द ही कहीं न कहीं सैर को निकला जाएगा और बोरा भरकर हरी स्याही खरीद ली जाएगी। 



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वंदेमातरम्