14 April 2021

जीतने की कोशिश और हार जाने का डर

जीतने की कोशिश और हार जाने का डर. ऐसा कब होता है? जब प्रतिद्वंद्वी आपका अपना अभिन्न हो. यह भले अजूबा सा लगे मगर आजकल ऐसा बहुत होने लगा है जबकि प्रतिद्वंद्वी आपका अपना ख़ास, आपका अपना विशेष होता है. इन दिनों कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजरना हो रहा है. कहा जाये तो खुद से ही लड़ना हो रहा है, खुद को ही हराना है और खुद से ही जीतना है. अजीब सी असमंजस की स्थिति है, जहाँ न जीतने की ख़ुशी है और न हारने का ग़म. 

क्या कहें और क्या लिखें बस आज अचानक बैठे-बैठे मन कर गया कुछ कहने का तो यही लिख दिया. बाकी सब कुशल से है ही.


वंदेमातरम्

05 April 2021

प्यार उससे तब भी था, आज भी है

बहुत से लोगों के लिए यह मजाक का विषय बन जाता है कि मधुबाला आज भी हमारे मोबाइल में, लैपटॉप में वॉलपेपर के रूप में उपस्थित रहती हैं. मधुबाला आज भी हमारे आसपास किसी न किसी रूप में मौजूद रहती हैं. मधुबाला से कब प्रेम सा हो गया पता नहीं मगर जिस दिन से उनसे प्रेम जैसा कुछ हुआ, उस दिन से उनको अपने से अलग नहीं किया है. अपने छात्र जीवन में जबकि घर में फ़िल्मी कलाकारों के पोस्टर लगाना प्रतिबंधित जैसा था, उस समय स्कूल आने-जाने के समय एक दुकान से फ़िल्मी कलाकारों के प्रिंट वाले पोस्टकार्ड ले लिया करते थे या फिर घर में आई पत्रिकाओं में से मधुबाला के चित्र निकाल लिया करते थे.


स्कूल के दिनों में अपनी मधुबाला से चोरी-छिपे मिल लेते थे. हम दोनों के प्रेम के बारे में हमारे कुछ दोस्तों को भी जानकारी थी सो मिलवाने में वे भी मदद कर देते थे. स्कूल के बाद जब कॉलेज में पढ़ने के दौरान हॉस्टल में रहना हुआ तो उस समय मधुबाला से मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई. हमारे कमरे में उसका चौबीस घंटे रहना हुआ करता था. जिस तरफ नजर दौड़ते मधुबाला ही मधुबाला नजर आती थी. कमरे की तीन दीवारों पर छोटे-बड़े कई रूपों में मधुबाला उपस्थित रहती थीं और एक दीवाल माधुरी दीक्षित के लिए रख छोड़ी थी. मधुबाला की यह उपस्थिति कॉलेज से, हॉस्टल से आने के बाद भी बनी रही. कमरे में, पुस्तकों की दीवार में मधुबाला कभी खुलेआम, कभी छिपकर हमसे मिलने आने लगीं.


(वर्ष 2005 की हमारे स्टडी रूम की फोटो)

कॉलेज से, हॉस्टल से लौट कर आने के बाद हमने अपनी पढ़ाई के लिए एक कमरे का चयन घर में कर लिया. यद्यपि यह कमरा ड्राइंग रूम के रूप में जाना जाता था तथापि ऐसा उसी स्थिति में होता था जबकि कोई पिताजी से मिलने को आता. इसके बिना अन्य किसी भी स्थिति में यह हमारा स्टडी रूम हुआ करता था. इसमें सामने की दीवार पर मधुबाला का बड़ा सा पोस्टर लगा हुआ था. उसके अगल-बगल हमने अपनी कई फोटो लगा रखी थीं. उन्हीं दिनों का एक किस्सा बराबर याद आता है और उसे याद करके खूब हँसी आती है. उन दिनों भोपाल से मामा जी का किसी काम से आना हुआ. बाहर बने उस ड्राइंग रूम कम स्टडी रूम में उनका बैठना हुआ. स्वाभाविक है कि सामने लगे बड़े से पोस्टर में उनकी नजर भी पड़नी थी. तमाम सारी बातों, मामा-भांजे वाली हँसी-मजाक की बातों के बीच मामा जी ने कहा बच्चू, इसके चक्कर में न पड़ो. ये जिंदा भी होती तो तुमको बुड्ढी मिलती. चक्कर चलाना है तो किसी अपनी उम्र वाली से चलाओ.


उस दिन तो सबने खूब ठहाके लगाये, हमारा मजाक बनाया उसके बाद भी इस बात पर खूब हँसी-मजाक होता रहा. आज भी इस बात पर हमारे साथ छेड़छाड़ हो जाती है. कुछ भी हो मधुबाला आज भी हमारे प्रेम के रूप में हमारे साथ मौजूद है. किसी ने कितना सही लिखा है, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल दिल.


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वंदेमातरम्

03 April 2021

कोरोना : चुनाव तुझसे बैर नहीं, जनता तेरी खैर नहीं

देश में एक बार फिर कोरोना लहर दिखाई देने लगी है. इसे यदि थोड़ा सा संशोधित कर दिया जाये तो कहा जा सकता है कि देश के चुनिन्दा भागों, राज्यों को छोड़कर कर कोरोना ने दोबारा अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात आदि सहित अनेक राज्यों में कोरोना संक्रमितों की संख्या अचानक से बढ़नी शुरू हो गई है. इन प्रभावित राज्यों के कई-कई शहर बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं और इनमें रात्रि का लॉकडाउन लगा दिया गया  है. कई जगहों से लॉकडाउन के विरोध में भी उठते स्वरों का सुना जा सकता है. आखिर इसमें कोई आश्चर्य नहीं.


जनसाधारण ने वर्ष 2020 में लॉकडाउन के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं को बहुत करीब से देखा है. उस स्थिति में बहुतों ने अपने रोजगार को गँवाया है तो बहुत से परिवारों ने उसी स्थिति के कारण अपने परिजनों को भी खोया है. ऐसे में कैसे लॉकडाउन को स्वीकार कर लिया जाये? यह स्थिति उस समय और भी असमंजस वाली हो जाती है जबकि कोरोना का असर उन राज्यों में बिलकुल भी नहीं दिखाई दे रहा है जहाँ चुनाव हो रहे हैं. इन राज्यों में जिस तरह से भीड़ भरी रैलियाँ हो रही हैं, जिस तरह से शीर्ष नेता बिना मास्क के यात्रा करने में लगे हैं, बिना मास्क और सोशल डिस्टेंस के जिस तरह से भीड़ ग़दर काटे है वह कोरोना की भयावहता के उलट कहानी कहता है. ऐसे में लॉकडाउन के खिलाफ लोगों का आना स्वाभाविक है.




इधर अब 45+ आयु वालों को भी कोरोना से लड़ने वाली वैक्सीन लगने लगी है मगर इसे भी शत-प्रतिशत सुरक्षित नहीं माना जा सकता है. यदि चिकित्सकीय दृष्टि से देखा जाये तो वैस्कीन की दो खुराकों और निश्चित सावधानी के बाद ही कोरोना की भयावहता से बचा जा सकता है. ऐसे में स्पष्ट है कि वैक्सीन की एक खुराक कोरोना से बचाव के लिए पूरी तरह प्रभावी नहीं. इसके लेने के बाद सम्बंधित व्यक्ति को मास्क, सुरक्षित दूरी, सेनेटाइज आदि का प्रयोग करते रहना है. यदि ऐसा है तो फिर चुनावी राज्यों में भीड़ को अनदेखा क्यों किया जा रहा है? अभी तक चुनावी राज्यों से इतर जहाँ-जहाँ कोरोना संक्रमितों की संख्या मिल रही है वहाँ विवाहोत्सवों तक के लिए प्रशासनिक अनुमति लेने जैसे प्रतिबन्ध लगा दिए गए हैं. विद्यालय बंद करवा दिए गए हैं. मॉल, मंदिर आदि बंद हैं मगर चुनावी रैलियाँ प्रतिबंधित नहीं हैं. इसे क्या समझा जाये?


गंभीरता के साथ देखा जाये, विचार किया जाये तो ऐसा लगता है जैसे कोरोना की दूसरी लहर नितांत काल्पनिक स्थिति है. ऐसा इसलिए क्योंकि यदि कोरोना की दूसरी लहर भयावह होती तो चुनावी राज्यों में इतनी भीड़ के बाद भी कोरोना संक्रमितों की भयावह स्थिति नहीं दिख रही है. यह भी हो सकता है कि कोरोना की दूसरी लहर भयावह हो मगर चुनावी राज्यों में आँकड़ों को छिपाए रखने के आदेश दिए गए हों? अभी किसी भी स्थिति को पूरी प्रमाणिकता के साथ कह पाना कठिन है मगर यह तो कहना अत्यंत सहज है कि चुनावी राज्यों में या तो कोरोना का असर नहीं है या फिर यहाँ के लोग कोरोना संक्रमण-प्रूफ हो चुके हैं.


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वंदेमातरम्

29 March 2021

होली : तुम्हारे साथ, तुम्हारे बिना

इस बार की होली जितनी ख़ामोशी से बीत गई उतनी खामोश पहले कभी नहीं निकली थी. यद्यपि इससे पहले भी ऐसे हादसों से परिवार गुजरता रहा मगर होली पर एक तरह की औपचारिकता होती ही रही. अपने लोगों के जाने का दुःख बराबर बना रहा, एक बार अइया के जाने के बाद होली का आना हुआ था और दूसरी बार पिताजी के जाने के चंद दिनों बाद ही होली आई थी मगर उन दोनों ही अवसरों पर मन, दिल इतना भारी नहीं था जितना इस बार था. इस बार परिवार ने अपने युवा सदस्य को खो दिया था, ऐसे में पल-पल बस उसकी ही याद आँखों को नम करती रही.


वे तमाम होली के दिन याद आते रहे जबकि खूब जमकर मस्ती, धमाल हुआ करता था. हम सभी भाई-बहिन, चाचा-चाची लोग इकट्ठे हुआ करते थे. ऐसा शायद ही किसी बार हुआ होगा कि होली उसी दिन से खेलना शुरू हुआ जिस दिन रंग की होली हो. ज्यादातर होली का हंगामा उसी रात से शुरू हो जाता था जबकि होलिका-दहन कार्यक्रम संपन्न होता था. हंगामा क्या जबरदस्त हुल्लड़ हुआ करता था. रात से शुरू हुल्लड़ दिन-रात चलता रहता. सोने के बाद भी किसी को न छोड़ना, किसी की मूँछ बना देना, किसी के बालों में सूखा रंग भर देना, ब्रश से रंगने की वो कला आदि न जाने क्या-क्या चलता रहता.


इस बार होली निपट खाली-खाली बीत गई. बच्चों ने ही अपनी-अपनी पिचकारियों से सबको रंग लगाने का काम किया. घर के बड़े सदस्य तो आने-जाने वालों से भेंट-मुलाकात में व्यस्त बने रहे. उनके साथ कभी हँसते रहे, कभी रोते रहे. एक यही होली तुम्हारे बिना नहीं गुजरी है बल्कि अब आने वाले हर त्यौहार तुम्हारे बिना ऐसे ही खाली-खाली गुजरने हैं.





(कुछ तस्वीरें बीते दिनों की)


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वंदेमातरम्

16 March 2021

आशीर्वाद दीजिए कि हम कभी कमजोर महसूस न करें

साल को आना ही था क्योंकि विधि का विधान भी यही है. इस तारीख को भी आना था क्योंकि यह भी निश्चित है. इस बार यह तारीख कुछ ज्यादा ही दर्दनाक होकर आई. आपके जाने के दुःख के साथ मिंटू के न रहने की असह्य पीड़ा ने कष्ट बहुत ज्यादा बढ़ा दिया. वर्ष 2005 में आपके जाने के तत्काल बाद ही परिवार हमारी दुर्घटना के साथ ही अत्यंत विपत्ति जैसी स्थिति में आ गया था. आपके जाने के दुःख के साथ एक और दर्द जुड़ गया था. आपके जाने के बाद एकदम से घर में खुद के बड़े होने के एहसास हमारे प्रति दिखाई देने लगा. खुद में भी बड़े होने की जिम्मेवारी का भाव समेट कर खुद को इसके लिए तैयार करने लगे कि आपके द्वारा छोड़े गए कामों को कुछ हद तक पूरा कर सकें.


खुद को खुद के कष्ट से उभारते हुए कोशिश यही बनी रही कि परिवार में आपके द्वारा बनाई स्थिति बराबर बनी रही. इसमें कितना सफल रहे, कितना नहीं ये तो आप ही बता सकते हैं. कोशिश बराबर बनी रही कि कोई भी हमारे किसी कदम से, हमारे व्यवहार से निराश न हो. परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्यों के साथ समन्वित रूप को बनाये रखते हुए, लगातार सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास होता रहा. इस प्रयास में सभी लोग अपनी-अपनी स्थिति, प्रस्थिति में समाहित होते रहे. समय-समय पर सब लोग एक-दूसरे के प्रति सहयोग, प्रेम, स्नेह की भावना के साथ परिवार की अवधारणा को और पुष्ट करते रहे.


इस बीच लगने लगा था जैसे सबकुछ सही से चल रहा है. सामान्य सी उथल-पुथल जो आमतौर पर सबके साथ होती रहती हैं, वे आ रही थीं, सहज रूप में उनका समाधान हो रहा था और ज़िन्दगी की गाड़ी अपनी ही सुखमय रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी. इसी में मिंटू के अचानक चले जाने की घटना ने भीतर तक तोड़ कर रख दिया. विपत्ति की, परेशानियों की स्थिति में दिल-दिमाग में बहुत कुछ नकारात्मक बातें आती हैं मगर ऐसी नकारात्मक स्थिति तो कभी सोची भी नहीं गई थी. संभवतः किसी ने भी ऐसी घटना की कल्पना, आशंका भी नहीं की होगी. जनवरी में मकर संक्रांति की शाम वह दिल तोड़ देने वाली खबर लेकर आई. उस खबर ने भीतर तक न केवल तोड़ डाला बल्कि बहुत अकेला सा कर दिया.


मिंटू की घटना के बाद से लगातार आपको याद करते हुए विचार करते हैं कि ऐसी कौन सी परीक्षा ली जा रही है हमारी, हमारे अलावा अम्मा की, पिंटू की शेष परिजनों की यह समझ नहीं आ रहा है. शायद आपके न रहने पर आपकी अनुपस्थिति से उपजी तमाम जिम्मेवारियों को हम उस रूप में नहीं निभा पाए जिस तरह से उनको निभाया जाना था. आपके जाने के बाद परिवार की एक कड़ी के रूप में सबको जोड़े तो रहे मगर उस रूप में नहीं जोड़ सके जिससे कि सभी एक-दूसरे की ताकत बने रहते.


आज आपकी पुण्यतिथि पर आपको सादर चरण स्पर्श करते हुए अपने लिए आशीर्वाद की कामना है कि आगे परिवार ऐसी किसी आपत्ति में, मुश्किल में न आये. आगे कभी किसी परेशानी में, किसी दुःख में हमें अकेला न रहने दे, कमजोर ने बनाये.


पिताजी, अम्माजी के साथ हम तीनों भाई 


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वंदेमातरम्

12 March 2021

सामाजिक क्षेत्र के पिस्सू

किसी भी व्यक्ति का जीवन विविध क्षेत्रों से गुजरता हुआ पल्लवित, पुष्पित होता रहता है. इन क्षेत्रों में जहाँ प्राथमिक वरीयता में उसका पारिवारिक क्षेत्र आता है इसके बाद सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, साहित्यिक, राजनैतिक आदि क्षेत्रों में उसके जीवन का गुजरना होता है. जीवन के इन क्षेत्रों से गुजरते हुए व्यक्ति बहुत कुछ सीखता भी है और बहुत कुछ सिखाता भी है. पारिवारिक क्षेत्र का सम्बन्ध नितांत व्यक्तिगत होता है और इसमें अत्यंत निकटवर्ती लोगों को ही प्रवेश मिलता है. इसके उलट शेष क्षेत्रों की गतिविधियाँ सार्वजनिक ही कही जा सकती हैं. राजनीति हो, समाजसेवा हो, साहित्य गतिविधि हो सभी में व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन उभर कर सामने आता है.


ऐसी स्थिति में भी बहुतायत रूप में सामाजिक क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति की सक्रियता उसके व्यक्तित्व का वास्तविक स्वरूप का परिचायक बनती है. कहा जा सकता है कि सामाजिक क्षेत्र की गतिविधियाँ व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप, चरित्र को उद्घाटित करती हैं. सामाजिक क्षेत्र के अनुभवों से सहज रूप में देखने में आया है कि पारिवारिक क्षेत्र को जिम्मेवारी के भाव से सँवार दिया गया है और इस क्षेत्र को जीवन के किसी भी अन्य दूसरे क्षेत्रों में सबसे ज्यादा पावन माना-समझा गया है. सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों को अत्यंत सम्मान के भाव से देखा जाता है. उनके बारे में ऐसी धारणा बनी होती है कि वे लोग अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा निस्वार्थ भाव से दूसरे के लिए व्यतीत कर रहे हैं. समाज में आने वाली अनेक आपदाओं के समय में ऐसे सामाजिक लोगों कि सक्रियता ने अनेक बार उनको देवतुल्य भी माना है.


मानव के विकास के क्रम में जहाँ उसका शैक्षिक विकास हुआ, आर्थिक विकास हुआ, तकनीकी विकास हुआ वहीं कुछ क्षेत्रों में विकास का उलटा स्वरूप देखने को मिला. सामाजिक क्षेत्र में इसका बहुत ज्यादा असर देखने को मिला. अब इस क्षेत्र में ऐसे लोग बहुतायत में सक्रिय होते जा रहे हैं जिनका समाजसेवा से अथवा सामाजिक क्रियाकलापों से कोई लेना-देना नहीं. ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के उन लोगों से एकदम अलग होते हैं जो निस्वार्थ भाव से काम करने में विश्वास करते हैं. ऐसे नए उभरते सामाजिक लोगों का एकमात्र उद्देश्य, सामाजिकता का अर्थ किसी भी तरह से मंच, माइक और सम्मान प्राप्त कर लेना है. सामाजिक क्षेत्र में समय के गुजरते रहने के साथ-साथ ऐसे लोगों का कारवां बढ़ता ही रहा है. ऐसे नए उभरते सामाजिक लोगों द्वाराजोड़-तोड़ करके मंच हासिल करना, सम्मान प्राप्त करना और ऐसा न हो पाने की दशा में कलह मचा देना, आयोजकों के चरित्र तक पर उँगली उठा देना ऐसे लोगों का सामान्य स्वभाव बनता जा रहा है. यही कारण है कि सामाजिक क्षेत्र में अब वास्तविक सामाजिक लोगों की मानसिकता में व्यापक परिवर्तन होता जा रहा है.


ये नए उभरते हुए सामाजिक या कहें कि असामाजिक प्राणी न केवल मंच को अपने कब्जे में करने की कोशिश करते हैं बल्कि कार्यक्रम आरम्भ होने के पहले ही ये तथाकथित सामाजिक लोग आयोजकों को निर्देशित करते हैं कि उनको फलां के पहले बोलने को बुलाया जाये. उनको सम्मान दिया जाये तो फलां के पहले. ऐसे लोगों की कोशिश यह भी रहती कि दूसरे को सम्मान मिलने ही न पाए.


समय व्यतीत करते जाने के साथ-साथ ऐसे लोग खुद को ताकतवर भी बनाते जाते हैं. स्थानीय होने के कारण ऐसे लोग ऐसे लोग मंच के लिए, मंच की कुर्सियों पर बैठने के लिए, सम्मान, पुरस्कार जबरिया माँग कर हड़पने की कोशिश में लगे रहते हैं. स्थानीय स्तर पर नाम होने के बाद भी ऐसे लोग अपने उपद्रवी स्वभाव, जबरन कब्ज़ा करने की मानसिकता के चलते एकाधिक बार बिना बुलाये, बिना आमंत्रित किये मंचासीन होते देखे गए हैं. बहुत बार सम्मान, पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ करते, डराते-धमकाते भी देखे गए हैं. यह समझ से परे है कि आखिर मंच की तृष्णा क्यों? आखिर हर मंच से सम्मान पाने की लालसा क्यों? आखिर बिना काम किये खुद को प्रतिस्थापित करने की कुंठित मनोभावना क्यों? आखिर सम्मान न मिलने पर, मंचासीन न किये जाने पर आयोजक के चरित्र को कटघरे में खड़ा कर देने की कुत्सित सोच क्यों?


जहाँ तक अनुभव की, सामाजिकता की बात है तो सामाजिक क्षेत्र भी किसी वृक्ष की तरह से होता है, जहाँ पुराने पत्तों को डाली से स्थान छोड़ना होगा और नए पत्तों के खिलने को जगह देनी होगी. सामाजिक क्षेत्र किसी परिपक्वता की माँग करता है जहाँ आपको अपनी जगह स्वयं बनानी पड़ती है. अतीत के अपने कुछ कामों, अपने नाम, मीडिया में अपने परिचय, परिवार के रसूख के बल पर आखिर कब तक नए लोगों से प्रतिस्पर्द्धा की जाती रहेगी? मंच पर जगह, लोगों के दिलों में सम्मान स्वतः पैदा होता है. किसी हनक के चलते, अपने उपद्रवी स्वभाव के चलते, कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करने की मानसिकता रखने के चलते सिर्फ बदनामी ही पायी जा सकती है. संभव है कि ऐसे लोगों के स्वभाव के चलते आयोजक ऐसे लोगों को मंच प्रदान कर दे, माइक दे दे, सम्मान भी प्रदान कर दे मगर ऐसे लोग समाज में, नागरिकों में, प्रशासन में, मीडिया में स्थायी रूप से जगह नहीं बना पाते हैं. क्षणिक प्रतिष्ठा की चाह में, क्षणिक प्रचार की चाह में ऐसे लोग सिर्फ बदनामी ही पाते हैं. बिना किसी श्रम के, बिना किसी उल्लेखनीय कार्य के मंच, माइक, मंचासीन होने, सम्मान पाने की लालसा ऐसे लोगों के कमजोर व्यक्तित्व का ही परिचायक होता है. देखा जाये तो ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के व्यक्तित्व नहीं बल्कि पिस्सू होते हैं जो सामाजिक क्षेत्र में उभरते हुए वास्तविक सामाजिक व्यक्तित्वों का लहू पी रहे होते हैं.

 


उक्त लेख बीपीएन टाइम्स, दिनांक - 12.03.2021 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

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वंदेमातरम्

08 March 2021

सामाजिक क्षेत्र में भी पाए जाते हैं पिस्सू

अपने जीवन का बहुत लम्बा समय सामाजिक क्षेत्र में व्यतीत करने के कारण बहुत से व्यावहारिक अनुभवों को करीब से देखने का अवसर मिला है. इन अनुभवों में कुछ अनुभव बहुत सुखद रहे तो कुछ अनुभव तो अत्यंत दुखद रहे. सामाजिक क्षेत्र में बहुत से ऐसे लोगों से परिचय हुआ जो निस्वार्थ भाव से काम करने में विश्वास करते हैं. इसके उलट बहुत से ऐसे लोगों से भी सामना हुआ जिनके लिए सामाजिकता का अर्थ महज मंच, माइक और सम्मान प्राप्त कर लेना रहा है. सामाजिक क्षेत्र में समय के गुजरते रहने के साथ-साथ ऐसे अनुभवों का खजाना हमारे पास बढ़ता ही रहा है. यही कारण है कि बहुत बार सामाजिक क्षेत्र में खुद को सामने लाने की मानसिकता में व्यापक परिवर्तन होता जा रहा है. जोड़-तोड़ करके मंच हासिल करना, सम्मान प्राप्त करना और ऐसा न हो पाने की दशा में कलह मचा देना, आयोजकों के चरित्र तक पर उँगली उठा देना ऐसे लोगों का सामान्य स्वभाव रहा है.


अपनी सामान्य शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यापक असफलता (आखिर जहाँ चाहते थे, वहाँ चयनित न हो सके) के बाद जब सामाजिक क्षेत्र में कदम रखा तो दिमाग में यही ख्याल था कि इस क्षेत्र में लोग सेवा की भावना से आते होंगे. इस क्षेत्र में जो लोग भी सक्रिय हैं वे निस्वार्थ भाव से अपना समय देते होंगे. आरंभिक अनुभव ही इतने कड़वे निकले कि उन्हीं दिनों में सामाजिक सेवा से दूर होने का मन बना लिया था. कार्यक्रम आरम्भ होने के पहले ही हमें तथाकथित सामाजिक लोगों द्वारा निर्देशित किया जाता कि उनको फलां के पहले बोलने को बुलाया जाये. उनको सम्मान दिया जाये तो फलां के पहले. ऐसे लोगों की कोशिश यह भी रहती कि दूसरे को सम्मान मिलने ही न पाए.




बहरहाल समय ने बहुत कुछ सिखाया और बहुत जल्दी अच्छे-बुरे की पहचान करके खुद को ऐसे जंजालों से दूर कर लेते हैं. सामाजिक क्षेत्र में बीस वर्ष से अधिक समय गुजर गया है, इसके बाद भी स्थिति अभी भी वहीं की वहीं दिखाई दे रही है. ऐसे लोग आज भी मंच के लिए, मंच की कुर्सियों पर बैठने के लिए, सम्मान, पुरस्कार जबरिया माँग कर हड़पने की कोशिश में लगे रहते हैं. स्थानीय स्तर पर नाम होने के बाद भी ऐसे लोग अपने उपद्रवी स्वभाव, जबरन कब्ज़ा करने की मानसिकता के चलते एकाधिक बार बिना बुलाये, बिना आमंत्रित किये मंचासीन होते देखे गए हैं. बहुत बार सम्मान, पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ करते, डराते-धमकाते भी देखे गए हैं. यह कोई सुनी-सुनाई बात नहीं बल्कि स्वयं अनुभव की हुई, स्वयं देखी गई स्थिति है. यह समझ से परे है कि आखिर मंच की तृष्णा क्यों? आखिर हर मंच से सम्मान पाने की लालसा क्यों? आखिर बिना काम किये खुद को प्रतिस्थापित करने की कुंठित मनोभावना क्यों? आखिर सम्मान न मिलने पर, मंचासीन न किये जाने पर आयोजक के चरित्र को कटघरे में खड़ा कर देने की कुत्सित सोच क्यों?


जहाँ तक हमारा अनुभव है कि सामाजिक क्षेत्र भी किसी वृक्ष की तरह है, जहाँ पुराने पत्तों को डाली से स्थान छोड़ना होगा और नए पत्तों के खिलने को जगह देनी होगी. हमारा अपना अनुभव है कि सामाजिक क्षेत्र किसी परिपक्वता की माँग करता है जहाँ आपको अपनी जगह स्वयं बनानी पड़ती है. अतीत के अपने कुछ कामों, अपने नाम, मीडिया में अपने परिचय, परिवार के रसूख के बल पर आखिर कब तक नए लोगों से प्रतिस्पर्द्धा की जाती रहेगी? मंच पर जगह, लोगों के दिलों में सम्मान स्वतः पैदा होता है. किसी हनक के चलते, अपने उपद्रवी स्वभाव के चलते, कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करने की मानसिकता रखने के चलते सिर्फ बदनामी ही पायी जा सकती है. 


संभव है कि ऐसे लोगों के स्वभाव के चलते आयोजक ऐसे लोगों को मंच प्रदान कर दे, माइक दे दे, सम्मान भी प्रदान कर दे मगर ऐसे लोग समाज में, नागरिकों में, प्रशासन में, मीडिया में स्थायी रूप से जगह नहीं बना पाते हैं. क्षणिक प्रतिष्ठा की चाह में, क्षणिक प्रचार की चाह में ऐसे लोग सिर्फ बदनामी ही पाते हैं. बिना किसी श्रम के, बिना किसी उल्लेखनीय कार्य के मंच, माइक, मंचासीन होने, सम्मान पाने की लालसा ऐसे लोगों के कमजोर व्यक्तित्व का ही परिचायक होता है. देखा जाये तो ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के व्यक्तित्व नहीं बल्कि पिस्सू होते हैं जो सामाजिक क्षेत्र में उभरते हुए वास्तविक सामाजिक व्यक्तित्वों का लहू पी रहे होते हैं.



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वंदेमातरम्

23 February 2021

अइया को याद करते हुए

कहते हैं कि समय घावों को भर देता है. इसके बाद भी कुछ बातें, कुछ यादें ऐसी होती हैं जिनको समय भी धुंधला नहीं कर पाता है. वे मन-मष्तिष्क पर ज्यों की त्यों अंकित रहती हैं. वे यादें, वे बातें अक्सर, समय-असमय सामने आकर खड़ी हो जाती हैं. गुजरता समय लगातार गुजरता रहता है. इस समय-यात्रा में बहुत कुछ बदलता रहता है. कुछ नया जुड़ता है, कुछ छूट जाता है. इस जुड़ने-छूटने में, मिलने-बिछड़ने में सजीव, निर्जीव समान रूप से अपना असर दिखाते हैं. इस क्रम में बहुत सी बातें स्मृति-पटल का हिस्सा बन जाती हैं. कुछ अपने दिल के करीब होकर, दिल में बसे होकर भी आसपास नहीं दिखते. उनकी स्मृतियाँ, उनके संस्मरण उनकी उपस्थिति का एहसास कराते रहते हैं. यही एहसास उनके प्रति हमारी संवेदनशीलता का परिचायक है. बरस के बरस गुजरते जाते हैं, दशक के दशक गुजरते जाते हैं मगर इन्हीं स्मृतियों के सहारे लगता है जैसे सब कुछ कल की ही बात हो. ऐसा उस समय और भी तीव्रता से सामने आता है जबकि वह तिथि विशेष आँखों के सामने से गुजर जाए.


23 फरवरी एक ऐसी ही तारीख है कि जब पीछे पलट कर देखते हैं तो दो दशक की यात्रा दिखाई देती है. इस तारीख से जुड़ी बातें स्वतः याद आने लगती हैं. बहुत कुछ स्मरण हो आता है. याद आता है बहुत से अपने लोगों का साथ चलना, बहुत से अपने लोगों का ही साथ होना. साथ होकर भी साथ न दिखना. साथ न दिखते हुए भी साथ रहना. ऐसे ही लोगों में एक हमारी अइया भी हैं. जी हाँ, अइया यानि कि हमारी दादी. इस तारीख को ही अइया हम सबको छोड़कर बहुत दूर चली गईं, जहाँ से न उनका आना संभव है और न हम लोगों का जाना. ये विधि का विधान है कि किसी को इस संसार में आना होता है और उस आने वाले को किसी न किसी दिन जाना होता है. अवस्था कैसी भी हो अपने सदस्य के जाने का दुःख होता ही है. अइया के जाने का दुःख तो था ही. संतोष इसका था कि उनके अंतिम समय में पूरा परिवार उनके सामने था, उनके साथ था, जैसा कि बाबा के साथ न हो सका था. अइया के चले जाने के दो दशक बाद भी एक-एक घटना, एक-एक बात जीवंत है. उनके कमरे के साथ, उनके सामान के साथ, उनकी यादों के साथ. जिस दिन उनको पेंशन मिलती, हम तीनों भाइयों को वे कुछ न कुछ देतीं मगर उस नाती को कुछ ज्यादा धनराशि मिलती जो उनको लेकर जाता था. (इस वर्ष यह दुर्भाग्य रहा हमारे परिवार का कि अइया के इन तीन नातियों में से एक नाती उनके पास चला गया. मिंटू ही उनको खूब परेशान करता रहता था. वह अक्सर अइया को यह कहते हुए परेशान करता कि पेंशन के पैसों से हमें ज्यादा पैसे दिया करो नहीं तो किसी दिन हम रात में पूरे रुपये निकाल लेंगे आपकी डोलची से.)




खाने-पीने को लेकर होती चुहल, उनके पुराने दिनों को लेकर होती बातें, उनकी कुछ बनी-बनाई धारणाओं पर हँसी-मजाक बराबर होता रहता, जो उनके बाद बस याद का जरिया है. अपने अंतिम समय तक वे इसे मानने को तैयार न हुईं कि सीलिंग फैन कमरे की हवा को ही चारों तरफ फेंकता है, उसमें किसी तरह का बिजली का करेंट नहीं होता है. वे अपनी त्वचा दिखाकर बराबर कहती कि ये पंखा बिजली से चलता है और बिजली फेंकता है. तभी हमारी खाल जल गई है. इसी तरह की धारणा रसोई गैस को लेकर बनी हुई थी. गैस की शिकायत होने पर वे कहती कि गैस की रोटी, सब्जी, दाल खाई जाएगी तो पेट में गैस ही बनेगी. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अइया की याद में आये आँसुओं को मुस्कान में बदल देतीं हैं.


उस दिन सामान्य से हँसी-मजाक के बीच उन्होंने अपनी मनपसंद गुझिया खायी और फिर अचानक ही दूसरे लोक की यात्रा के लिए जैसे चलने को तत्पर हो गईं. हम लोग बस देखते ही रह गए. ऐसा लगा जैसे वे अपनी विगत दस-बारह दिन की शारीरिक समस्या को जैसे एक झटके में दूर कर चुकी हैं. ऐसा लगा जैसे उन्हें सारे परिवार के एकसाथ होने का इंतजार था. फ़िलहाल तो अइया को गए काफी लम्बा समय हो गया मगर उनकी बहुत सी बातें आज भी ज्यों की त्यों दिल-दिमाग में बसी है.


आज उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धासुमन अर्पित हैं.


16 February 2021

हर घाव को समय नहीं भर सकता

कहते हैं कि समय घावों को भर देता है. ऐसा सही होता भी होगा किन्तु कई बार लगता है कि समय सभी घावों को भरने में सक्षम नहीं होता है. बहुत सारे घाव ऐसे होते हैं जिनको समय कभी भी नहीं भर पाता बल्कि समय के साथ-साथ इन घावों की टीस और बढ़ती रहती है. अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ऐसा महसूस किया है कि कष्ट का, दुःख का, दर्द का, किसी घाव का किसी न किसी रूप में व्यक्ति से सम्बन्ध होता है. उस सम्बन्ध के आधार पर ही उसकी टीस का निर्धारण होता है और उसी के अनुसार उसके कम, ज्यादा होने की बात भी सिद्ध होती है.

आज पूरा एक माह होने को आया जबकि अपने छोटे भाई का अंतिम संस्कार किया. उसके निधन की खबर महज एक खबर नहीं थी, एक ऐसा ज़ख्म थी जिसे समय का कोई हिस्सा कभी भर नहीं सकता है. कैसे समय इस ज़ख्म को मिटा सकेगा? कैसे समय के साथ इस घाव का भरना हो सकेगा? ये प्रश्न रोज ही सामने खड़े होते हैं और रोज ही अनुत्तरित होकर अगले दिन के लिए सामने आने को तैयार होने लगते हैं. समझ से परे है ये बात कि समय के साथ ये घाव भर जायेगा. क्या कोई भी छोटा-बड़ा आयोजन घर में होगा तो उस छोटे भाई को याद न किया जायेगा? क्या जब हम सभी भाई-बहिन एकसाथ कहीं मिलेंगे तो उस छोटे भाई की कमी महसूस नहीं होगी? क्या उसकी बेटी जब कभी उसके बारे में सवाल करेगी तो क्या इस कमी का दर्द महसूस नहीं होगा? बहुत सी स्थितियाँ हैं जो इस वाक्य को झुठलाती हैं कि समय घावों को भर देता है.

हाँ, संभव है कि ऐसा होता हो, उनके साथ जिनका अपने परिवार से कोई मतलब नहीं. संभव है कि ऐसे लोगों के दर्द समय के साथ भर जाते हैं जो स्वार्थ में लिप्त रहते हैं. जिनके लिए परिवार की कोई अहमियत नहीं होती है, संभव है कि उनके लिए न कोई दुःख हो, न कोई घाव हो. इसके उलट जिन परिवारों में आपसी सामंजस्य है, आपस ए स्नेह-विश्वास है वहाँ छोटे से छोटा दुःख भी अत्यंत कष्टकारी होता है. इस समय हमारा पूरा परिवार जिस असीम कष्ट को सहन कर रहा है, देखना है अब समय की ताकत कि वह कब इस घाव को भर पाता है, कब इस दुःख को समाप्त कर पाता है. वैसे समस्त परिजनों की स्थिति देखकर लगता नहीं कि समय के लिए ऐसा कर पाना आसान होगा. समय क्या, हम परिजनों के लिए भी इस दुःख को भुला पाना संभव नहीं. 

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वंदेमातरम्

10 February 2021

सामान्य होना और दिखना

सामान्य होने और सामान्य दिखने में बहुत बड़ा अंतर होता है। बहुत से लोग विभिन्न परिस्थितियों में सामान्य देखते रहते हैं परंतु वह अंदर से इतने सामान्य हो नहीं पाते हैं। जीवन की यह स्थिति लगभग प्रत्येक व्यक्ति के साथ होती है अनेक मौके आते हैं जबकि व्यक्ति को अपनी वास्तविक स्थिति से अलग सामाजिक स्थिति का निर्वहन करना पड़ता है।




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वंदेमातरम्