12 November 2018

स्टेच्यू ऑफ यूनिटी देखने आती संख्या सिद्ध कर रही सरदार पटेल का कद

गुजरात के नर्मदा जिले में विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा के रूप में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण पूरा हुआ. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका अनावरण 31 अक्टूबर को किया. इसके निर्माण में लगी लगभग तीन हजार करोड़ से बनी यह प्रतिमा अब विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा के रूप में स्थापित है. इसके निर्माण के लिए जब घोषणा हुई थी, उसके बाद से लोकार्पण तक किसी न किसी रूप में इसको आलोचना का शिकार होना पड़ा. मोदी विरोधियों ने लगातार इसके निर्माण को धन का अपव्यय बताया. इसके साथ-साथ इस प्रतिमा के पक्ष में समर्थन देने वाले भी बहुत से लोग थे. जो लोग तथ्यात्मक रूप से पर्यटन की संभावनाएं देखते रहे हैं वे लगातार अपेक्षा जता रहे थे कि ये प्रतिमा पर्यटन का व्यापक केंद्र बनेगी ही साथ ही आय का स्त्रोत भी बनेगी.


इसी को ध्यान में रखते हुए प्रतिमा देखने के लिए टिकट की व्यवस्था की गई. जैसी कि अपेक्षा थी कि सरदार पटेल के व्यक्तित्व के कारण यह प्रतिमा लोगों के आकर्षण का केंद्र बनेगी वैसा हुआ भी. प्रशासन की तरफ से इस विशालकाय प्रतिमा को सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक देखा जा सकता है. पर्यटकों को 350 रुपए और 30 रुपए अलग से बस राइड के चुकाने होंगे. स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नाम से जाने जाने वाले सरदार पटेल की प्रतिमा की टिकट की ऑनलाइन बुकिंग होगी. इसके लिए राज्य सरकार ने https://soutickets.in नाम से वेबसाइट शुरू की है. कुल 380 रुपए में पर्यटक वैली ऑफ फ्लॉवर, मेमोरियल, म्यूजियम, सरदार सरोवर बांध और ऑडियो-वीडियो गैलरी देख सकेंगे. 31 अक्टूबर को प्रतिमा के लोकार्पण के अगले दिन से ही इसे जनता के लिए खोल दिया गया. प्रशासन द्वारा दिए गए आँकड़ों के अनुसार 1 नवंबर को कुल 27 सौ 37 लोगों पटेल की प्रतिमा देखने पहुंचे, जिनमें 24 सौ 97 वयस्क और 240 बच्चे थे. इनसे 5 लाख 46 हजार 50 रुपये के राजस्व की आमदनी हुई.2 नवंबर को कुल 22 सौ 99 लोग इस प्रतिमा देखने पहुंचे. इनमें 2 हजार 83 वयस्क और 206 बच्चे थे. इस दिन आए पर्यटकों से 4 लाख 7 हजार 6 सौ पचास रुपये प्राप्त हुए.

स्टेच्यू ऑफ यूनिटी को देखने के लिए हर रोज हजारों लोग पहुंच रहे हैं. अभी तक करीब 1.8 लाख लोग पटेल की प्रतिमा देख चुके हैं. इससे कुल मिलाकर लगभग 2.1 करोड़ रुपए की कमाई हो चुकी है. शनिवार, 10 नवम्बर को मात्र एक दिन में ही 27,000 लोग मूर्ति देखने पहुंचे. मूर्ति देखने के लिए लोगों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि 10 किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम तक लग गया. दीपावली के दिन यहां 16 हजार पर्यटक आए थे, भाईदूज के दिन 20 हजार लोग पहुँचे. यह संख्या शनिवार को बढ़कर 27 हजार पहुंच गई. रविवार, 11 नवम्बर को 33,576 लोगों ने स्टेच्यू ऑफ यूनिटी को देखा. इसमें से सिर्फ 10,361 लोग ही गैलरी देख सके, क्योंकि गैलरी की क्षमता सिर्फ 5000 तक की है. इसी एक दिन में ही टिकट से 3362860 रुपए की कमाई हुई.

दर्शकों की यह संख्या उन लोगों के मुँह पर तमाचा ही है जो इस प्रतिमा पर हुए व्यय को अपव्यय बता रहे थे. प्रतिमा देखने आ रहे लोगों ने सरदार पटेल के व्यक्तित्व को सहज रूप में स्वीकार कर उनके कद के साथ न्याय ही किया है.

11 November 2018

वर्तमान और वास्तविक नामों की ओर


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कुछ नगरों के नामों में परिवर्तन करके उनको मूल रूप में किया गया. जैसे इलाहाबाद को प्रयागराज, फ़ैजाबाद को अयोध्या किया गया. इसी क्रम में कई और शहर अपने मूल नामों में लाये जाने की योजना है. इस पर राजनैतिक रूप से विवाद मचा हुआ है. ऐसे में कुछ शहरों के नाम जो मुगलों और अंग्रेजों द्वारा बदले गए. उनके वर्तमान और वास्तविक नाम निम्नवत मिले हैं. 


क्रम
वर्तमान नाम
वास्तविक नाम
1.
दिल्ली
इन्द्रप्रस्थ
2.
लखनऊ
लक्ष्मणपुरी
3.
कानपुर
कान्हापुर
4.
इलाहाबाद
प्रयाग
5.
फैजाबाद
अवध
6.
अलीगढ़
हरिगढ़
7.
देवरिया
देवपुरी 
8.
सुल्तानपुर
कुशभवनपुर
9.
लखीमपुर
लक्ष्मीपुर
10
 हैदराबाद
भाग्यनगर
11
 औरंगाबाद
संभाजी नगर
12
 भोपाल
भोजपाल
13
अहमदाबाद
कर्णावती
14
मुजफ्फरनगर
लक्ष्मी नगर
15
शामली
श्यामली
16
रोहतक
रोहितासपुर
17
पोरबंदर
सुदामापुरी
18
पटना
पाटलीपुत्र
19
नांदेड
नंदीग्राम
20
आजमगढ
आर्यगढ़
21
अजमेर
अजयमेरु
22
उज्जैन
अवंतिका
23
जमशेदपुर
काली माटी
24
विशाखापट्टनम
विजात्रापश्म
25
गुवाहटी
गौहाटी
26
सुल्तानगंज
चम्पानगरी
27
बुरहानपुर
ब्रह्मपुर
28
इंदौर
इंदुर
29
नशरुलागंज
भीरुंदा
30
सोनीपत
स्वर्णप्रस्थ
31
पानीपत
पर्णप्रस्थ
32
बागपत
बागप्रस्थ
33
मुरैना
मयूरवन

10 November 2018

कुछ अधूरा सा


सम्बन्ध-रिश्ते कैसे बनते हैं? इनके बनने के पीछे कौन से कारण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? संबंधों-रिश्तों की परिभाषा क्या होती है? ये परिभाषा क्या होनी चाहिए? सम्बन्ध-रिश्ते आखिर किस कारण से अनवरत चलते रहते हैं? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सभी के पास अलग-अलग होगा. सभी अपनी-अपनी दृष्टि से, अपने-अपने नजरिये से संबंधों की, रिश्तों की परिभाषा तय करते हैं और उसी के हिसाब से उंनका निर्वहन करते हैं. संबंधों-रिश्तों का बनना भी उनके नजरिये से सम्बंधित रहता है. किसी के लिए संबंधों-रिश्तों का बनना गर्व की बात होती है, उसके स्वभाव का हिस्सा होता है तो बहुतों के लिए इस तरह का कृत्य अवसर के अनुसार होता है. अवसर के अनुसार संबंधों-रिश्तों को बनाने वाले हो सकता है कि तात्कालिक लाभ ले लेते हों मगर ऐसे लोग दीर्घकालिक रूप में संबंधों-रिश्तों का निर्वहन भी नहीं कर पाते, उनको बचाकर भी नहीं रख पाते.


08 November 2018

पटाखों के साथ इन्सान के अनैतिक कृत्यों पर प्रतिबन्ध लगे


न्यायालय के आदेश के बाद पटाखों पर प्रतिबन्ध बना सा रहा. एकाधिक जगहों पर ही आदेश की अवमानना की खबरें आईं. ऐसे मामलों में लोगों को गिरफ्तार भी किया गया. मात्र एक दिन के महज दो घंटों की आतिशबाजी ने न केवल दिल्ली की वरन समूचे देश की स्थिति ख़राब कर दी, ऐसा बताया जा रहा है. देश के अनेक हिस्सों को गैस चैंबर बना दिया गया, ऐसा गलघोंटू माहौल लोगों को दिखाई देने लगा. ये सही हो सकता है कि अपनी ख़ुशी दिखाने का, पर्व त्यौहार मनाने का तरीका सिर्फ पटाखे फोड़ना नहीं हो सकता है. कुछ जानकारों के हिसाब से पटाखों का धुँआ सर्वाधिक नुकसानदेह है. यह सही भी हो सकता है क्योंकि आज इन्सान ने स्वार्थ में जब खाने-पीने के सामानों तक को नकली चीजों से बनाना शुरू कर दिया है, उसमें भी केमिकल मिलाना शुरू कर दिया है तो पटाखों में रंग, आवाज़ आदि के लिए वह कुछ भी कर सकता है. पटाखों पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए या नहीं, किसी ख़ुशी के अवसर पर पटाखे फोड़कर खुशियाँ मनाई जानी चाहिए या नहीं ये चर्चा का विषय हो सकता है. इस पर चर्चा भी होनी चाहिए क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति या एक परिवार की ख़ुशी से संदर्भित नहीं है वरन इसका दुष्प्रभाव सम्पूर्ण समाज पर देखने को मिल रहा है.


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या महज पटाखे फोड़ना ही समाज को परेशानी में खड़ा कर रहा है? सवाल यह भी है कि पटाखे फोड़ने के अलावा बाकी सारे कृत्य क्या पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं? क्या वे लोग जो पटाखों को हानिकारक धुंए का कारक बता रहे हैं वे अपने कार्यों पर ध्यान देंगे? आज न सही सौ प्रतिशत मगर लगभग सौ प्रतिशत के बराबर लोग अपनी कारों का इस्तेमाल बिना एयरकंडिशनर के नहीं कर रहे हैं. बिना एसी की न उनकी कारें चल पा रही हैं न उनके घर-कार्यालय इस्तेमाल योग्य रह पा रहे हैं. क्या ऐसे कार्यों से पर्यावरण संरक्षण हो रहा है? सोच कर देखिये घर, कार्यालय, मॉल, दुकानें आदि जो एसी के द्वारा ठंडक फेंक रहीं हैं वे पर्यावरण के लिए कितनी हितकर हैं? रोजमर्रा के कामों में ही एक बार आदमी खुद का निरीक्षण कर ले कि वह पर्यावरण को कितना नुकसान पहुँचा रहा है. कृषि योग्य भूमि का बिकना, उनकी जगह पर बहुमंजिली इमारत का बनना, मॉल का निर्माण उनमें जल की निर्बाध आपूर्ति के लिए धरती की गोद से सारा पानी सोखने को लगाई गईं मशीनें क्या पर्यावरण हित में हैं? भव्य, आलीशान मकानों, इमारतों को सजाने के लिए काटे जाते जंगल पर्यावरण हित की बात तो नहीं ही करते हैं. पॉलीथीन पर प्रतिबन्ध के बाद भी रोज सडकों पर, मैदानों पर मिलते बड़े-बड़े ढेर बताते हैं कि इन्सान पॉलीथीन का उपयोग न करने को लेकर कितना सजग हुआ है.

ये कृत्य दिखाई देने के बाद भी किसी को नहीं दिखाई दे रहे हैं. यदि प्रदूषण फ़ैलाने वाला कोई कृत्य दिखाई दिया तो वह है बस पटाखों का फोड़ना. इसके प्रतिबन्ध से सारी समस्या का हल निकल आएगा, ये सोचना और विचार करना शुतुरमुर्ग की तरह मुँह जमीन में घुसा लेना है. यदि वाकई पर्यावरण का संरक्षण करना है, समाज से प्रदूषण को दूर भगाना है तो सिर्फ पटाखों पर ही नहीं बल्कि इन्सान को अपने अनैतिक क्रियाकलापों पर प्रतिबन्ध लगाने की जरूरत है.

07 November 2018

समरसता का एक दीपक प्रज्ज्वलित करें


असतो मा सदगमय॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय॥ मृत्योर्मामृतम् गमय॥ यह वाक्य एक तरफ सत्य की तरफ जाने का सन्देश देता है वहीं साथ में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है। इसी तरह दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो भी सुन्दर, सार्थक, सशक्त और मनोहारी प्रतीत होता है। चारों ओर दीपों की कतार, मोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी आतिशबाजी, विविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे, सभी अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं। बच्चों का, युवाओं का, बुजुर्गों का, पुरुषों-महिलाओं का हर्षोल्लासित होना स्वाभाविक सा दिखाई देता है। सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं। नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं। दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है। घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है।


भारतीय परम्परा में, संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है। यहां जितनी अनुपम वैविध्यपूर्ण प्रकृति में मनमोहक ऋतुएं हैं, ठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं। देश में लगभग प्रत्येक दिन किसी न किसी रूप में पर्वों का, त्यौहारों का अनुष्ठान होता रहता है। इन त्यौहारों की विशेष बात यह रही है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है। ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक संदर्भों की, समरसता की, सौहार्द्र की, भाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते दिखाई देते हैं। होना भी यही चाहिए किसी भी पर्व का, किसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए। हमारा उद्देश्य सदैव यही हो कि हमारे कदमों से सामाजिकता का विकास हो ही, सामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे। किसी समय में व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़े रखने का माध्यम यही पर्व-त्यौहार हुआ करते हैं। दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है।

इधर सामाजिक स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है। सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है। यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है। भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजता, सरलता को विखण्डित सा कर दिया है। इसी आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियां, खिलखिलाती हंसी नहीं वरन् उनकी फटी-फटी सी आंखें, अचम्भित से हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं। कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं। गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है।  

त्यौहार अब नितांत औपचारिकताओं में सिमटाए जाने लगे हैं। संबंधों में, रिश्तों में पहले की तरह गर्माहट नहीं दिखाई देती है, बाज़ारों में अपनत्व कम कटुता ज्यादा देखने को मिलने लगी है, सामान की खरीददारी करने वाली निगाहों से ज्यादा देहयष्टि को घूरने वाली नजरें ज्यादा हो गईं हैं। विदेशी सामानों के बीच आज भी कई-कई छोटे बच्चे-बच्चियाँ साँचे में ढले गणेश-लक्ष्मी, मिट्टी के दिए, रुई, मोमबत्तियाँ आदि बेचते दिखते हैं। मशीनों से निर्मित चमकते-दमकते गणेश-लक्ष्मी की भव्य मूर्तियों के आगे स्टाइलिश दीयों के आगे, डिजाइनर मोमबत्तियों के सामने, अजब-गजब रूप से चमक बिखेरती झालरों के सामने इनका अंधकार ज्यों का त्यों रहता है। हर एक पटाखे के फूटने के साथ, हर एक दिया रौशनी बिखेरने के साथ, हर बार और अकेले त्यौहार मनाने के साथ एहसास होता है कि मंहगाई सामानों में ही नहीं आई है संबंधों में, रिश्तों में भी आई है। अंधकार सिर्फ अमावस की रात को ही घना नहीं हुआ है बल्कि अपनत्व में, स्नेह में भी घनीभूत होकर छा गया है। काले आसमान में रौशनी बिखेरती आतिशबाजी, घर की छत पर चमक बिखेर कर शांत हो जाते दिए, मकान की दीवारों से लिपटी विदेशी झालरें अपनी क्षणभंगुर चमक से एक पल को तो अंधकार दूर कर देती हैं किन्तु समाज में लगातार बढ़ते जाते अंधकार को दूर नहीं कर पा रही हैं।

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है। हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है। बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को। इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा। भारीभरकम खर्चों के बीच, मंहगी से मंहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियां देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे। उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे। यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे। हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आंगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है। उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें। आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा।


04 November 2018

त्योहारों पर पक्षपाती निर्णय


समय के साथ किस तरह स्थितियाँ बदल जाती हैं या कहें कि बदल दी जाती हैं, इसका एहसास किसी को नहीं होता. एक समय था जबकि हमारा बचपन था तब मैदान बच्चों से भरे रहते थे. शाम को घर बैठे रहना डांट का कारण बनता था. हरहाल में शाम को थोड़ी देर मैदान में जाकर कुछ न कुछ खेलना अनिवार्य हुआ करता था. अब स्थिति इसके ठीक उलट है. अब मैदान एकदम खाली हैं. शाम को घर से बाहर निकलना बच्चों के लिए अनिवार्य नहीं है. अब वे बाहर हाथ-फिर चलाने के बजाय या तो मोबाइल पर उंगलियाँ चलाते हैं या फिर टीवी पर आँखें. इसी तरह हमें अच्छे से याद है कि पहले नियमित रूप से मिलना-जुलना हुआ करता था. सम्बन्ध कभी भी दो पर दो के नहीं रहे वरन पारिवारिक रहे. बिना किसी औपचारिकता के बेधड़क एक-दूसरे के घर आना-जाना हुआ करता था. न केवल आना-जाना वरन खाना-पीना भी. ऐसा एक-दो दिन का हाल नहीं हुआ करता था बल्कि बहुतायत में यही हुआ करता था. अब स्थिति इसके ठीक उलट हो गई है. अब बाहर जाना होता है तो किसी के घर नहीं वरन किसी होटल में, रेस्टोरेंट में. अब यदि किसी के घर जाना होता भी है तो अकेले, पारिवारिक आना-जाना न के बराबर दिखाई देता है. इसमें भी किसी के घर जाने के पहले उसकी अनुमति सी चाहिए होती है. ऐसा इसलिए नहीं कि उसके घर जाने पर उसके न मिलने पर समय की बर्बादी होगी वरन इसलिए कि जिस समय मिलने जाना है उस समय वह अपने किसी टीवी कार्यक्रम को देखे में तो व्यस्त नहीं. किसी लाइव शो को देखने में, किसी मैच में चिल्लाने में, किसी रोने-ढोने वाले सीरियल देखने में तो मगन नहीं.


कुछ ऐसे ही हालात त्योहारों को लेकर सामने आ रहे हैं. उसमें भी विशेष रूप से हिन्दुओं के त्यौहार को लेकर. इस्लाम में ताजिया कितना भी बड़ा बनाया जाने, सड़क पर निकाला जाये कोई दिक्कत नहीं. हाँ, दही-हांडी की ऊँचाई निर्धारित होगी. बकरीद में कितने भी बकरे काट दिए जाएँ कोई प्रदूषण नहीं फैलना उसके खून, खाल, मांस से न पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होना है, ऐसा बस उतनी देर में ही होगा जबकि दीपावली के पटाखे फोड़े जायेंगे. हाईवे का निर्माण होना है तो मंदिरों के हटाये जाने पर विकास-कार्य का हवाला दिया जायेगा मगर यदि मामला किसी मस्जिद के, मजार के हटाने का आता है तो वहां मजहबी भावनाएं घायल होने लगती हैं. मंदिर में प्रवेश की बात आती है तो यह सभी का अधिकार होता है मगर यदि बात मस्जिद में प्रवेश की आ जाये तो वहां मजहबी भावनाओं में अदालत हस्तक्षेप नहीं करती. इन विकट स्थितियों के बीच यदि बचपन याद करते हैं तो याद आता है दीपावली का निबंध. जिसमें कि हम पढ़ा करते थे कि दीपावली दीपों, आतिशबाजी, रौशनी का पर्व है. इसके पटाखों के धुंए से कीड़े-मकोड़े-मच्छर आदि मर जाते हैं. अब देख रहे है कि पटाखों के चलाये जाने पर भी कानूनी पकड़ बनाई जाने लगी है.

संभव है कि आज की स्थितियों में इन्सान ने अपने लाभ के लिए पटाखों को पहले के मुकाबले अधिक हानिकारक बना दिया हो मगर क्या पूरे साल में बस एक रात में कुछ घंटे पटाखे चलाना ही प्रदूषण को बढ़ाता है? यदि निष्पक्ष ढंग से देखा जाये तो चौबीस घंटे मकानों, कार्यालयों, बाजारों, दुकानों आदि में चलते एसी, सड़कों पर लाखों की संख्या में दौड़ती एसी कारें, कारखानों से निकलना धुआँ आदि क्या पर्यावरण को संरक्षित कर रहा है? क्या इन सबसे प्रदूषण नहीं फैलता है? ऐसे में महज एक रात में कुछ घंटों को कानूनी शिकंजे में कसने की जो नीति अपनाई जा रही है वह एक दृष्टि से भले ही तार्किक समझ आ रही हो मगर जबकि एक-एक आदमी, निर्णय देने वाले लोग भी उसी सिस्टम का हिस्सा बने हुए हैं जो प्रदूषण फैला रहा है तब आतिशबाजी नियंत्रण सम्बन्धी निर्णय पक्षपातपूर्ण समझ आते हैं. एक तरह की शिगूफेबाजी ही नजर आती है.

कोई भी पर्व, त्यौहार हो सभी के लिए सुखदायी हो, ऐसी कामना है मगर यदि धर्म-मजहब देखकर उनके कृत्यों पर निर्णय दिए जायेंगे तो यह सामाजिक विभेद की स्थिति पैदा करेगा. ऐसे में सुखदायी स्थिति, सौहार्द्र बनना कहीं से भी सहज नहीं समझ आता.

03 November 2018

प्रेम में धड़कते दो दिल

प्रेम में धड़कते दो दिल कब एक-दूजे के लिए धड़कने लगे पता न चला. छोड़ अपने-अपने घर कब एक-दूजे से बदल गए पता न चला. वो महज़ आकर्षण नहीं एक विश्वास था परस्पर संवेदनाओं का एक एहसास था, नहीं कहा जा सकता पहली नज़र का वो एहसास था उम्र भर का, धड़कन को धड़कन से मिला कर धड़कना हर साँस में एक जीवन महकना, वे दिल ही थे जो दिल सज़ा रहे थे दर्द को भूल ख़ुशियाँ खिला रहे थे, ख़ामोशियों के साथ सजते अनगिन ख़्वाब धरातल पर उतार लाने को आतुर चाँद सितारों का संसार, पर ख़्वाब तो ख़्वाब होता है चमकता है फिर ग़ायब होता है, धूप वास्तविकता की हक़ीक़त दिखाती है ओस की बूँदों का मखमली एहसास मिटाती है, हक़ीक़त की ठोस ज़मीं पर ख़्वाबों की दुनिया भले न बसी चाँद सितारों की महफ़िल भले न सजी, पर विश्वास ने हाथ न छोड़ा संवेदना ने मुँह न मोड़ा एहसास ने साथ न छोड़ा दो दिल तब भी एक-दूजे के लिए धड़कते थे अब भी धड़कते रहे, दो दिल तब भी एक-दूजे में बसते थे अब भी बसते रहे, हाँ... प्रेम में धड़कते दो दिल कब एक-दूजे के दर्द में धड़कने लगे पता न चला, प्रेम में खिलते-खिलते कब एक-दूजे के दर्द में पलने लगे पता न चला...

02 November 2018

दिल के बजाय दिमाग के नियंत्रण में इंसान

हालात किस तरह इन्सान के साथ होने के बाद भी उसके नियंत्रण में नहीं होते हैं. वह चाहता कुछ और है और होता कुछ है. इसी तरह वह करता कुछ और है और हो कुछ और जाता है. ऐसी स्थिति में उसकी स्थिति तो जो होना है, वैसी होती है मगर उसके दिल की हालत बड़ी अजीब हो जाती है. आज भी देखने में आता है कि इन्सान किसी भी स्थिति में अपने बहुतेरे निर्णय दिमाग की बजाय दिल से लेता है. दिल के निर्णय लेने में हो सकता है उसे आर्थिक लाभ न हो, हो सकता है कि अन्य सामाजिक लाभ जो उसे मिलने हों वे न मिलें मगर वह संवेदनात्मक रूप से लाभान्वित रहता है. यही संवेदनात्मक लाभ कई बार उस व्यक्ति के लिए दुःख का कारक भी होता है. दिमाग की जगह पर दिल से काम करने वाला इन्सान किसी भी रूप में कुटिल नहीं हो सकता, ऐसा लेखक नहीं कहता वरन तमाम सामाजिक विज्ञान के शोधों से स्पष्ट हुआ है. ऐसे व्यक्ति को अनेकानेक बार संकटों का सामना करना पड़ता है. दिमाग से काम करने वाले उसके दिल का दुरुपयोग करके उसका अनुचित लाभ लेते हैं.


ये सामाजिक शोध विज्ञानियों को समझना होगा कि आखिर दिमाग की जगह पर दिल से काम करने वालों को कष्ट की अनुभूति क्यों होती है? शारीरिक संरचना के आधार पर देखा जाये तो दिल हो या दिमाग, दोनों कि शरीर के अंग मात्र हैं, इसके बाद भी दोनों कार्य संरचना और अनुभूति में अंतर क्यों? आज भी दिल से काम करने वालों को तरजीह नहीं मिलती वरन समाज के बहुसंख्यक लोगों की निगाह में उसे नाकारा समझा जाता है. क्या महज इसलिए कि दिल का सम्बन्ध विशुद्ध प्यार से जोड़ा गया है? क्या इसलिए कि दिल का मामला कहकर किसी भी इन्सान की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने की छूट सभी को मिल जाती है? क्या इसलिए कि दिल शब्द आने मात्र से किसी भी स्थिति को महज एक स्त्री एक पुरुष के बीच की बना दी जाती है? आखिर दिल को दिमाग के मुकाबले इतना हल्का क्यों माना जाता है? आखिर क्या कारण है कि दिल से लिए गए निर्णयों को सिर्फ हँसी का पात्र बनना पड़ता है? इस पर विचार करने की आवश्यकता है. सोचने वाली बात महज इतनी है कि दिल है तभी दिमाग संचालित है, तभी इन्सान संचालित है, तभी अन्य सामाजिक संक्रियाएं संचालित हैं. यदि दिल न हो सभी जगह सिर्फ और सिर्फ पाशविकता नजर आये. ऐसे में विचार सिर्फ और सिर्फ इसी का करना है कि हम समाज कैसा चाहते हैं, दिमाग-संचालित या फिर दिल-संचालित?

01 November 2018

देश के गौरव की प्रतिमा पर भी विवाद


कल रात सपने में कथित और व्यथित गांधी with नेहरू आए. उन्होंने एक नया ख़ुलासा किया, मूर्ति स्थापना को लेकर. तब स्थिति स्पष्ट हुई कि उनकी मूर्तियाँ स्थापित नहीं की गईं बल्कि प्रकट हुईं हैं.

कुछ आसमानी किताब की तरह से.
कुछ इनकी पसीने की बूँद से.
कुछ उस पेय पदार्थ से भी, जिसे पीने के लिए लोग लाइन लगाए खड़े रहते थे. इसलिए इन पर धन ख़र्च हुआ ही नहीं. धन इस प्रतिमा पर पहली बार ख़र्च हुआ है.

पूरा देश भौचक्का है... खास तौर से कांग्रेसी और बसपाई...
इसलिए क्योंकि देश की पहली मूर्ति आज लोकार्पित की गई. ये दोनों चापलूस समझ ही नहीं पाए कि ये है क्या? कांग्रेसियों ने कभी अपने अम्मा-बाप के चित्र न लगाये. बसपाइयों ने कभी बहिन जी के न लगाये और मोदी को देखो मूर्ति बनवा दी. सब आश्चर्य में कि ये क्या बनवा दिया विशालकाय. एक गलत परम्परा का सूत्रपात करवा दिया. अब हर गली-चराहे-पार्क में नेहरु-गाँधी की मूर्ति लगेगी. पार्क के नाम पर हाथी लगेंगे. जिंदा रहते खुद की मूर्ति लगेगी.

मोदी तुम बहुत बुरे हो. अच्छा-खासा देश उन्नति कर रहा था. मूर्तियों की राजनीति से बाहर था. अभी तक ऐसे धन का उपयोग चिकित्सालय बनवाने में, शिक्षण संस्था बनवाने में, गरीबों की मदद करने में किया जाता रहा है, सो इसी कारण से कोई बीमार नहीं था. सभी पैदा होते ही इंजीनियर-डॉक्टर-वैज्ञानिक आदि बन जाते थे. अब आज के बाद से विशुद्ध गरीब पैदा होंगे. नंगे-भुखमरी के शिकार पैदा होंगे. अशिक्षित पैदा होंगे. तुमने देश को सदियों पीछे धकेल दिया एक मूर्ति लगा कर. सरदार पटेल के समर्थक भले तुम्हें माफ़ कर दें मगर देश में मूर्ति स्थापना की नवीन परम्परा डालने के कारण कांग्रेसी तुमको माफ़ न करेंगे.

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विश्व के सात अजूबों में एक ताजमहल शामिल है (जो एक कब्र के रूप में प्रचारित है... भले ही उसमें शंकर जी का मंदिर माना जाता हो, तेजोमहालय माना जाता हो) उस ताजमहल के लिए कूद-कूद मरे जाते हो मगर जब विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति की बात आई, स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी की तो सबको पेचिश लगने लगी, वो भी बौद्धिक और खूनी. अपने-अपने दिमाग गुलामी से बाहर निकालो. पैसा तुम्हारे बाप का ही खर्च हुआ था ताजमहल में, यहाँ भी तुम्हारे बाप का, तुम्हारा खर्च हुआ है पर ये गुलामी का नहीं बल्कि गौरव का पर्याय है.

31 October 2018

असरदार हमारे सरदार साहब


31 अक्टूबर न केवल देश के लिए बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए ऐतिहासिक दिन रहा है. इस दिन विश्व की सबके ऊंची प्रतिमा का लोकार्पण किया गया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गुजरात के नर्मदा जिले में स्थापित सरदार बल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊँची प्रतिमा का लोकार्पण किया गया. ये गर्व की बात है कि जिन सरदार पटेल के प्रयासों से देश की आज़ादी के तुरंत बाद पाँच सौ से अधिक रियासतें देश में शामिल होने को तैयार हुईं, उनको आज तक पर्याप्त सम्मान न मिल सका. वर्तमान केंद्र सरकार ने सरदार साहब की प्रतिमा के बारे में न केवल विचार किया वरन रिकॉर्ड समय में उसका निर्माण करवाकर देश की जनता को लोकार्पित भी करवा दिया. ये अपने आपमें इसलिए गौरव का विषय है कि इससे पहले सभी सरकारें सरदार पटेल के योगदान को याद करती रहीं मगर किसी ने आगे बढ़कर उनको सम्मानित करने का मन नहीं बनाया. वर्तमान केंद्र सरकार ने न केवल इस बारे में विचार किया बल्कि आमजन को इससे जोड़ा. यही कारण है कि इस प्रतिमा के निर्माण के लिए देश भर से लोहा एकत्र हुआ. स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी दीवार के लिए सभी राज्यों की मिट्टी एकत्र की गई. सरदार पटेल की प्रतिमा पर अर्पण करने के लिए देश भर की नदियों से जल एकत्र किया गया.


आज़ादी के इतने लम्बे समय बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल को सम्मान मिला है वह गौरव का विषय है. ये इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अब जब भी वैश्विक स्तर पर सबसे ऊंची प्रतिमा की चर्चा होगी तो उसके लिए देश का नाम लिया जायेगा. इसके साथ-साथ सरदार बल्लभ भाई पटेल का नाम लिया जायेगा. ये अपने आपमें गौरवान्वित करने वाला विषय है.