भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सेवा और समर्पण के 25 वर्षों को संदर्भित करते हुए 'सेवा संकल्प अभियान' का आयोजन किया जा रहा है. यह
मोदी जी के जन्मदिन 17 सितम्बर से शुरू होकर पूरे एक माह
अर्थात 17 अक्टूबर तक चलना है. इस अभियान के आयोजन हेतु
उत्तर प्रदेश में सरकार के स्तर से निर्देश जारी किये गए हैं. इस आयोजन में
शासन-प्रशासन पूरी तत्परता के साथ जुटा हुआ है. शिक्षा संस्थानों, गैर-सरकारी संस्थाओं आदि पर एक तरह से कार्यक्रम थोप दिया गया है. ठीक है,
भाजपा द्वारा अपने एक वरिष्ठ व्यक्ति के सम्मान में इस कार्यक्रम का
आयोजन किया जा रहा है, इसे लेकर कोई तर्क-वितर्क नहीं करेंगे
क्योंकि घर-परिवार की तरह पार्टियाँ भी अपने पदाधिकारियों को, अपने वरिष्ठजनों के सम्मान में कुछ न कुछ करती रहती हैं.
इस बात में दोराय नहीं कि मोदी जी बहुत ही गम्भीरता और गहराई से जनता के
मनोभावों को समझे हुए हैं. राजनीति के जो भी कदमताल हैं, उनसे भी वे भली-भांति परिचित हैं.
यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर हमें जो बात खटक रही है, वो यह कि
ऐसी स्थिति के बाद भी मोदी जी की सहमति इस अभियान के लिए है. इधर विगत कुछ समय से
जिस तरह से मोदी-विरोध का माहौल बना हुआ है, उसके चलते मोदी
जी की छवि से लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है. ऐसे में मोदी जी को स्वयं ही अपने
जन्मदिन पर सम्बंधित लोगों को ससम्मान इस अभियान को स्थगित करने के लिए निर्देशित
करना चाहिए था. मोदी जी को यहाँ स्वतः संज्ञान लेते हुए इस कारण से इस अभियान को
स्थगित करना चाहिए था क्योंकि इस महीने भर के कार्यक्रम में पूरा सरकारी तंत्र तो
व्यस्त है ही, इसके साथ-साथ शिक्षण संस्थानों के भी व्यस्त
बने रहने की सम्भावना है.
भाजपा द्वारा, उसके
पदाधिकारियों द्वारा इस अभियान को लेकर भले ही कुछ भी कहा जाये मगर वास्तविकता यह
है कि इस अभियान से न केवल पार्टी की बल्कि मोदी जी की, योगी
जी की छवि को धक्का लगा है. भाजपा को, ऐसे अभियान को बनाने
वालों को विचार करना था कि इस देश ने कोरोना काल में मोदी जी के कहने पर शंख-थाली
बनाये थे; दिए जलाये थे; और भी अनेक
अवसरों पर मोदी जी के विचारों का सम्मान किया गया. अब जबकि विपक्षियों द्वारा उनके
विरोध में माहौल निर्मित किया जा रहा है, उसमें ऐसे
कार्यक्रम सहयोगी ही बनते नजर आ रहे हैं. कुछ समय पहले वैश्विक संकट के समय में
मोदी जी द्वारा पेट्रोल-डीजल की कम से कम खपत करने को कहा गया था और यहाँ ढाई सौ
मोटरसाइकिल वाराणसी से बड़नगर तक की यात्रा पर निकली हैं.
जबरिया थोपे गए से कार्यक्रमों को लेकर भले ही कोई सामने कुछ न कहे, सार्वजनिक रूप से कुछ न बोले मगर
अंदरूनी रूप में इससे लोग खुश नहीं हैं. हाँ, कुछ तानाशाह
मानसिकता वाले उच्चाधिकारियों को, संस्था प्रमुखों को अपनी
भड़ास निकालने का मौका अवश्य मिल गया है.

