06 May 2021

मौत की दहशत को अपने में भरते लोग

वर्ष २०२० में कोरोना वायरस के आने के बाद लोगों में सुरक्षा को लेकर सजगता भी दिखाई दी थी और एक तरह का डर भी. उस समय डर होने का एक कारण इस बीमारी का नया-नया होना तो था ही साथ ही जिस तरह से मीडिया में इसके वैश्विक स्वरूप को दिखाया गया वह डराने वाला था. इसके साथ-साथ आये दिन आने वाले आँकड़ों, वीडियो आदि ने भी जनमानस को भयभीत कर रखा था. भय के माहौल में लोगों ने राहत लेते हुए वर्ष २०२१ में प्रवेश किया. इसी अवधि में चाक-चौबंद व्यवस्था दिखाई दी, वैक्सीन के बन जाने के समाचार आये, साथ ही कोरोना के असर का कम होना भी दिखाई दिया. इसके बाद अचानक से कोरोना वायरस ने पुनः हमला कर दिया. लोग एकदम से संक्रमित होने लगे. अचानक से कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ने लगी. सामान्य से चलते जीवन में एकदम से उथल-पुथल सी मच गई.


एकदम से संक्रमितों की संख्या बढ़ी साथ ही उससे होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ने लगी. कोरोना से होने वाली मौतों की सत्यता-असत्यता के पीछे की सबकी अपनी कहानी है मगर इसके द्वारा लोगों में दहशत पैदा होने लगी. डर का माहौल बुरी तरह से लोगों को भयानक वातावरण का एहसास कराने लगा. इस तरह के वातावरण को बनाने में जहाँ मीडिया पीछे नहीं रही वहीं सोशल मीडिया से जुड़े लोगों ने भी कोई कसर बाकी नहीं रखी. मौत का तांडव, लाशों के ढेर, चिताओं के मेले, मौत का नंगा नाच आदि जैसे शब्दों से समाचारों को लिखा जाने लगा. ऐसा लगने लगा जैसे लोगों को डराने के लिए, उन्हें दहशत में लाने के लिए इस तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जा रहा हो. समाचार, वीडियो जानकारी से अधिक हॉरर मूवी समझ आने लगे.




इन मौतों की खबरों के कारण जिस तरह का भय समाज में दिखाई दे रहा था उससे ज्यादा डर इस कारण भी बना हुआ है क्योंकि लोग अपने आसपास ही नहीं किसी दूसरे शहर में होने वाली किसी भी मौत से स्वयं को जोड़ ले रहे हैं. लोग सोशल मीडिया के द्वारा अनावश्यक रूप से मौत की खबरों को प्रसारित करने में लगे हुए हैं. कुछ लोगों के लिए ऐसा करना जानकारी का संप्रेषण है तो कुछ लोग इसके पीछे सरकार की, शासन-प्रशासन की विफलता दिखाना चाहते हैं. लोगों की मंशा कुछ भी मगर इससे आमजनमानस में दहशत भरने लगी. लोग जान-परिचित वालों की मौत पर तो दुखी हो रहे हैं, ऐसा होना स्वाभाविक है किन्तु बहुतायत में अब लोग अपरिचितों की मौत से भी खुद को जोड़ने लगे हैं. दिन भर की ही नहीं, अपने पड़ोस, अपने शहर की ही नहीं वरन दसियों दिन पुरानी, दूसरे शहरों-राज्यों की मौतों को अब लोग अपने सिर पर लादे घूमने लगे हैं. मौतों के ये समाचार लोगों को जानकारी देने से ज्यादा मौत के करीब ले जाने लगे हैं.


लोग अपने आसपास की मौतों से खुद को जोड़ते हुए भयाक्रांत हो रहे हैं. पिछले हफ्ते हमारे एक मित्र का फोन आया. शाम का समय था, उसकी आवाज़ में एक तरह का डर, निराशा जैसा समझ आया. उसे टोका तो उसने बताया कि वह बहुत घबराया हुआ है, कोरोना से. उसने बताया कि उसकी कॉलोनी में उस दिन तीन लोगों की मौत हो गई. पूछने पर उसी ने बताया कि तीन लोगों में दो लोग पैंसठ वर्ष से अधिक के थे और एक पचपन वर्ष के थे. इसमें भी एक बात उसने बतायी कि इन तीन लोगों में कोरोना से एक का निधन हुआ, पैंसठ वर्ष वालों का.


उसके साथ दो-चार संवेदना भरे वाक्यों के बाद पूछने पर जानकारी हुई कि वह दस-बारह साल से उस कॉलोनी में रह रहा है. उससे यह पूछने पर कि इन दस-बारह सालों में क्या उसकी कॉलोनी में किसी का निधन नहीं हुआ? उसने बताया कि इस दौरान लगभग बीस-पच्चीस लोगों का निधन हो चुका है. उसी ने बताया कि पिछले साल ही तीन लोगों का निधन हुआ.


उसकी यही बातें पकड़ते हुए हमने उससे कहा कि क्या पिछले साल की अथवा पिछले दस-बारह सालों में हुई मौतों की खबर तुमने हमें दी? क्या उन मौतों पर कभी तुमने परेशान होकर, डर कर हमें फोन किया? उसके मना करते ही उसके साथ जरा तेज़ आवाज़ में बात करते हुए कहा कि यही वो स्थिति है जो अनजाने डर को अपने में समाहित करके दहशत पैदा करती है. इसी दहशत को तुम्हारे जैसे लोग फैलाने का काम करते हैं. तुम्हारे जैसे लोग ही ऐसी खबरों से डरते नहीं बल्कि उनका प्रसारण करते हो. तुम जिसे लोग अपने डर को दूसरों के चेहरे पर भी देखना चाहते हैं ताकि समाज में सभी लोग दहशत में जीते रहें.


इसके बाद उसे बहुत से उदाहरणों से समझाते रहे, उसकी हिम्मत बढ़ाते रहे. अब वह डर से कितना बाहर आया यह तो वही जाने पर वास्तविकता यही है कि लोग अपने आपको लेकर कम डर रहे हैं और अनजाने लोगों की मौतों को अपने सिर में लाद कर डर से आगे निकल दहशत को अपने अन्दर भरते जा रहे हैं. इस समय जो माहौल है उसमें हम सभी को अनावश्यक रूप से ऐसी खबरों के प्रसारण से बचना चाहिए जो डर का पैदा करती हों. ऐसी खबरों से न केवल स्वस्थ व्यक्ति घबराता है बल्कि उनको इनसे ज्यादा खतरा है जो कोरोना संक्रमित हैं. ऐसी खबरों से लगता है जैसे चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ मौतें हो रही हैं. यदि स्वस्थ होने वालों और मौतों का आँकड़ा देखें तो स्पष्ट अंतर दिखाई देता है. हमारे देश में कोरोना संक्रमण से स्वस्थ होने वालों की संख्या बहुत अधिक है और मौतों की संख्या दो प्रतिशत से अधिक नहीं है.


इस विपत्ति के समय में यदि किसी का सहयोग नहीं किया जा सकता है तो कम से कम किसी को डराने का काम तो न किया जाये. समझ से परे है कि आखिर इस भय का ऐसा माहौल क्यों बनाया जा रहा है? कहीं इसके पीछे भी आपदा में अवसर बनाने वाला बाज़ार तो नहीं?


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वंदेमातरम्

05 May 2021

मानसिक रूप से स्वस्थ रहने को स्वार्थी बन जाएँ

कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण लोगों में बुरी तरह से दहशत दिखाई दे रही है. यह डर कोरोना को लेकर कम है. उससे ज्यादा डर लोगों की होती मौतों का है. बहुत से लोग अपने आसपास से इतर न जाने कहाँ-कहाँ की खबरों को खुद में समेट कर अपने भीतर डर का एक वातावरण पैदा कर ले रहे हैं. कोरोना की पहली लहर के बाद से सबको भली-भांति समझाया गया था कि किस तरह से इसका सामना करना है, कैसे इसका बचाव करना है. इसके बाद भी लोगों की लापरवाही भयंकर तरीके से देखने को मिली.

खैर जो हुआ सो हुआ, अब उस पर चर्चा करने से कोई फायदा नहीं है. अब बात इसकी होनी चाहिए कि कैसे इस माहौल से निकला जाये? कैसे इस माहौल को सामान्य बनाया जाये? कैसे इधर-उधर से आ रही अनावश्यक खबरों से बचा जाये? यदि हम इस समय पर निगाह दौडाएं तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि बहुत से लोग घरों में बैठे हैं. जो नहीं बैठ पा रहे थे उनके लिए लॉकडाउन जैसे प्रावधान किये गए. कुल मिलाकर घर में सबके रहने का कारण शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना है. इस समय हम सभी शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए खुद तक सीमित हैं. अपने परिवार संग अपने घरों में बैठे हैं. न पारिवारिक आयोजनों में जा रहे न सामाजिक आयोजनों में. ऐसा करना भी एक तरह का स्वार्थ है.

क्या इसी तरह का स्वार्थ हम मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए नहीं अपना सकते? जितना आवश्यक आज हमारा शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना है उतना ही महत्त्वपूर्ण है हमारा मानसिक रूप से स्वस्थ रहना. सो बस इसी तरह से मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए कुछ दिन खुद तक सीमित हो जाइए. न अपने शहर की बुरी खबरें सुनिए न दूसरों के शहर की. न किसी को बुरी खबरें सुनाइए न किसी से बुरी खबर सुनिए. जैसे पिछली बार घर में रहते हुए जलेबी बनाने, खाना बनाने, व्यंजन बनाने, ड्राइंग करने, बागवानी करने आदि की फोटो लगाते थे वैसे ही इस बार अच्छी-अच्छी खबरें फैलाइए, अच्छी-अच्छी बातें करिए, फोन करके एकदूसरे का विश्वास बनिए. ऐसा करके देखिए, ये दिन बहुत ही सहजता से निकल जाएँगे. आपके मन से, दिल से, दिमाग से सारे भय निकल जाएँगे. 

 
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वंदेमातरम्

03 May 2021

आत्मबल से मिली साँसों को ज़िन्दगी

कल, 02 मई को खबर मिली कि शिवम मिश्रा जी की तबियत ठीक नहीं है। ऑक्सीजन लेवल 80-84 पर घूम रहा है। इसके बाद कई मित्रों को फोन खटखटाए सहायता के लिए। पवन मिश्रा जी, अजय कुमार झा जी, कंचन सिंह चौहान जी, ललित कुमार जी, छोटे भाई सुनील चौहान ने पूरी तत्परता, सक्रियता दिखाई। राजनीतिक, प्रशासनिक स्तर पर अलग सक्रियता बनी हुई थी। उधर मैनपुरी में शिवम के परिजन अपने प्रयास कर रहे थे।

इस दौरान शिवम से लगातार फोन से बातचीत होती रही। बातचीत में हँसी, मजाक भी होता रहा। उनको लखनऊ ब्लॉगर सम्मेलन की उनकी एक बात याद दिलाई, जबकि भोजन के समय हाॅल में भीड़ थी तो शिवम बोले थे कि कहो तो कमर का एक ठुमका लगा कर भीड़ इधर-उधर कर दें?

कल उनसे यही कहा कि जल्दी एक ठुमका लगा कर ये बीमारी इधर-उधर कर दो।

शिवम जी की सक्रियता ब्लॉग पर, सोशल मीडिया पर लगातार बनी रहती है। उनकी ज़िन्दादिली और मित्रता निभाने का जज्बा बहुत सारे लोगों को उनका प्रशंसक बनाए है। इसी के चलते सोशल मीडिया पर भी लगातार उनके स्वास्थ्य को लेकर लोगों के मैसेज, फोन आ रहे थे। काफी देर से शिवम जी के हालचाल न लिए थे सो फोन करने के बजाय रात 12:15 पर मैसेज किया तो उन्होंने ये चित्र भेजा। ऑक्सीजन लेवल देख अपार खुशी हुई। ये स्थिति बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के बनी हुई थी।



उसी समय उनके मैसेज "आप के ठुमके वाली बात की लाज रखनी थी" के साथ उनकी वीडियो काॅल आई। आवाज़ में वही पुरानी खनक, होंठों पर वही हँसी। 

ब्लॉग संसार के ज़िन्दादिल, यारबाज व्यक्तित्व ने अपनी ज़िन्दादिली से खुद को सुरक्षित घेरे में पहुँचाया। 

जो लोग किसी भी तरह से परेशान हैं, वे प्रेरणा ले सकते हैं शिवम मिश्रा से।

रात साढ़े बारह बजे वीडियो काॅल का स्क्रीनशॉट 

❤😍



वंदेमातरम्

30 April 2021

कोरोनाकाल में बच्चों का मनोबल बनें अभिभावक

वर्तमान परिदृश्य में अभिभावकों के लिए बच्चों के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके लिए बच्चों का लालन-पालन, उनकी परवरिश समस्याजनक हो गया है. बच्चों का उद्दंड होते जाना, अत्यधिक उग्रता धारण करना एक समस्या है तो अभिभावकों का व्यवहार भी चिंताजनक है. बात-बात पर आदेशनुमा कदम, किसी भी कार्य का टोकाटाकी भी उचित नहीं है. इसे समझने की आवश्यकता है. इसके लिए बाल मनोविज्ञान को समझना-परखना अत्यंत आवश्यक है.


यद्यपि इस समय कोरोनाकाल के चलते बच्चों के स्कूल बंद हैं तथापि ऑनलाइन क्लास करवाने के लिए बच्चों को सुबह जगाने के नाम पर चीखना-चिल्लाना; उनको नाश्ता कराने-भोजन करवाने के नाम पर क्रोधित होना; उनको पढ़ाने के नाम पर, होमवर्क करवाने के नाम पर खीझना अभिभावकों के लिए सामान्य गतिविधि बन गई है. इस तरह के व्यवहार में वर्तमान लॉकडाउन जैसी स्थिति भी बहुत हद तक जिम्मेवार है. इससे पहले भी बच्चों का सड़क पर निकल कर, घर से बाहर जाकर खेलना-कूदना, शरारत करना जैसे फूहड़पन की बातें हो गई थीं, इसे इस लॉकडाउन जैसी स्थिति ने और भी भयावह बना दिया है.


बच्चों को बाहर खुले में खेलने की न तो जगह दिखती थी और न ही उनको बाहर खेलने की बहुत ज्यादा अनुमति मिलती थी. जितनी आज़ादी, जितनी अनुमति उनको अपनी कॉलोनी, अपनी सोसायटी अथवा अपनी गली-मोहल्ले की बहुत छोटी जगह में खेलने-कूदने के लिए मिलती थी वह भी इस आपदा में छीन ली गई है. ऐसी विषम परिस्थिति में उनके शारीरिक मनोरंजन के, अपने दोस्तों के साथ शरारत करने के जो नाममात्र के अवसर हुआ करते थे, वे तो समाप्त ही हो गए हैं किन्तु स्कूल का जो बोझ उनके दिमाग पर, उनके मन पर था वह ज्यों का त्यों बना हुआ है. स्कूल के काम, पढ़ाई के बोझ, ऑनलाइन क्लास की अनिवार्यता में वे खुद को दबा हुआ पा रहे हैं. इस समय बच्चों के पास खेलने के लिए भी कंप्यूटर या मोबाइल ही हैं, जिनके साथ वे ऑनलाइन क्लास के कई-कई घंटे बिताकर आये होते हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि उनका नैसर्गिक विकास नहीं हो पा रहा है. यदि इसी में उनको प्रतिदिन की सुबह से शाम तक की टोका-टाकी होने लगे तो ये बच्चे खुद को कमतर समझने लगते हैं. इससे न केवल बच्चे काम करने से दूर भागने लगते हैं बल्कि अपने ही अभिभावकों के प्रति नकारात्मकता पालने लगते हैं.




आज की स्थिति में माता-पिता को बच्चों के साथ न सही एक दोस्त की तरह पर दोस्ताना माहौल में काम करने की आवश्यकता है. यदि माता-पिता इस तरह का वातावरण अपने परिवार में, घर में बना पाते हैं तो बच्चों का स्वाभाविक विकास करने के प्रति एक कदम बढ़ा सकते हैं. इसके लिए अपने बच्चों से उनके दैनिक अनुभवों के बारे में बात करें. वे दिन के बहुत बड़े भाग को ऑनलाइन क्लास में बिताने के बाद अकेले जैसे ही हैं. ऐसे में उनकी पढ़ाई से ज्यादा आवश्यक है कि उनको उनकी रुचियों की तरफ ले जाया जाये. उनको अन्य गतिविधियों में संलिप्त करवाया जाये. घर के ऐसे छोटे-छोटे कामों में उनको शामिल किया जाना चाहिए जिससे उनके अन्दर सामूहिकता की भावना जगे, उनमे कार्य करने के प्रति रुचि बढ़े. बागवानी, ड्राइंग, संगीत, क्राफ्ट आदि ऐसे विषय हैं जिनके द्वारा बच्चों में उत्पन्न हो रही निराशा को दूर किया जा सकता है.


कोरोना का यह दौर बहुत कुछ सिखाने के लिए आया है. यहाँ एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर समय सिर्फ पढ़ाई की बातें बच्चे से नहीं करनी चाहिए. वर्तमान युग में कैरियर एक महत्त्वपूर्ण विषय हो सकता है मगर जिस भविष्य की इमारत की नींव को यदि आज कमजोर कर दिया जायेगा उस पर बुलंद इमारत बनाया जाना संभव नहीं होगा. ऐसे में उसके साथ किसी भी तरह से ऐसा व्यवहार न करें जो उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाये. किसी भी काम को करने के लिए तेज आवाज़ में बोलना, बच्चे की छोटी से छोटी गलती के लिए उसको डाँटना, चिल्लाते हुए किसी काम को करने का आदेश देना आदि ऐसे कदम हैं जिनके द्वारा बच्चे में एक तरह का भय बैठ जाता है. उसके अन्दर कमजोरी के भाव पनपने लगते हैं. ऐसे में वह हीनभावना, असुरक्षा, अवसाद जैसी स्थिति का शिकार होने लगता है. कोरोनाकाल में ऐसी अवस्था बच्चों को नकारात्मकता की तरफ धकेल सकता है. सभी अभिभावकों को ऐसे माहौल में अपने बच्चों के साथ सहयोगात्मक रूप में कार्य करने की आवश्यकता है.


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वंदेमातरम्

28 April 2021

डराने का ट्रेंड चल पड़ा है सोशल मीडिया पर

कोरोनाकाल फिर एक बार सबको डराने में लगा है. इस डर के पीछे एक कारण लोगों का अनावश्यक रूप से दहशत फैलाना भी है. बहुतेरे लोग ऐसा जानबूझ कर करने में लगे हैं और बहुत से लोग ऐसे हैं जो ऐसा अनजाने में करने में लगे हुए हैं. कोरोना संक्रमित लोगों में से बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो पूरी तरह से स्वस्थ होकर वापस आये हैं. सरकारी आँकड़ों पर ध्यान न देकर यदि अपने आसपास ही नजर दौड़ाएं तो हमें बहुत से लोग ऐसे मिल जायेंगे जो स्वस्थ हो गए हैं. इसके बाद भी हम सभी को सोशल मीडिया पर लोगों के निधन की खबरें ही बहुतायत में देखने-सुनने को मिल रही हैं. इससे एक दहशत भरा माहौल सोशल मीडिया पर बना हुआ है.






दरअसल इसे भी एक ट्रेंड की तरह से देखा जा सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वर्तमान समय में सबकुछ बाजार की तरह से हमारे सामने आता है. यही बाजार अब हर एक काम के लिए एक तरह का ट्रेंड बना देता है. यही ट्रेंड आजकल चल पड़ा है कि यदि किसी की मृत्यु की सूचना दी जाती है तो तमाम ऐसे लोगों में शोक संवेदना व्यक्त करने की होड़ मच जाती है जो उस दिवंगत व्यक्ति की बीमारी की खबर पाकर उसका फोन भी नहीं उठाते थे. दिवंगत के अपरिचित होने के बाद भी ये भेड़चाल मची रहती है. ठीक है, हमारी संस्कृति, परम्परा में दिवंगत के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना है मगर बहुत से काम देशकाल, परिस्थिति के अनुसार भी करने चाहिए.


समस्त संवेदनशील लोगों से अनुरोध है कि विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त शोक संदेश को सूचना के तौर पर पढ लें और मन ही मन ईश्वर से आत्मा की मोक्षप्राप्ति की प्रार्थना करें. लगातार ॐ शान्ति, दुखद, RIP इत्यादि लिखकर अस्वस्थ लोगों का मनोबल न गिराएं. बेहतर हो कि दिवंगत के परिजनों से मिलकर या उन्हें फोन कर उनके समक्ष अपनी भावनाएँ व्यक्त करें.


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वंदेमातरम्

26 April 2021

आत्मविश्वास और जिजीविषा से ज़िन्दगी को जीवन देना

ज़िन्दगी उतनी भी हसीन नहीं जितनी हम समझते हैं और मौत उतनी भी भयानक नहीं जितनी हमने मान रखा है. ऐसा अपने अनुभव के आधार पर ही कहा जा सकता है. ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे, ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसने जिन्दगी को करीब से जिया है, महसूस किया है वह समझ सकता है. असल में हममें से बहुत से लोग ज़िन्दगी जीना भूल चुके हैं या कहें कि ज़िदगी जीना ही नहीं जानते. आज भी बहुतायत लोग खाने-कमाने को ही ज़िन्दगी माने बैठे हैं. यही कारण है कि ऐसे लोगों की सोच के कारण न केवल इनकी ज़िन्दगी वरन सम्पूर्ण समाज का ढाँचा विकृत स्थिति में पहुँच गया है. इन लोगों के लिए सुबह उठने से लेकर रात सोने तक सिर्फ अपने परिवार के चंद लोगों की चिंता करना ही ज़िन्दगी है. ऐसे लोगों के लिए स्वार्थ में संकुचित रहना ही ज़िन्दगी है. यही लोग वे हैं जो ज़िन्दगी को एक निश्चित दायरे से बाहर जाने देना नहीं चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए ही ज़िन्दगी दिव्य और भव्य होती है. देखा जाये तो ज़िन्दगी इससे कहीं अधिक बड़ी है, विस्तृत है. ज़िन्दगी का तात्पर्य सिर्फ अपना परिवार नहीं. ज़िन्दगी का मतलब अपने परिजन नहीं. ज़िन्दगी का मतलब चंद लोग नहीं हैं.




अपने आपमें व्यापक अवधारणा और विस्तृत सन्दर्भ को अपने में संजोये रखती है ज़िन्दगी. उसके लिए किसी एक व्यक्ति, किसी एक परिवार का कोई मोल नहीं. असल में ज़िन्दगी एक व्यक्ति से आरम्भ होकर अपने में सम्पूर्ण का प्रसार करती है. वह आरम्भ तो होती है किसी एक व्यक्ति के द्वारा और फिर अपना विस्तार करते हुए उसे सन्दर्भ प्रदान करती है. ज़िन्दगी का विस्तार और संकुचन भले ही संदर्भित व्यक्ति को अलग-अलग रूपों में सुखद दिखाई देता हो मगर मूल रूप में वह अत्यंत कष्टप्रद होता है. जिसने ज़िन्दगी का सन्दर्भ व्यापकता में देखा हो उसे ज़िन्दगी कष्टप्रद ही नहीं भयावह नजर आती है. विगत कुछ दिनों में न केवल हमने बल्कि हम जैसे अनेक भाइयों ने ज़िन्दगी की भयावहता को बहुत नजदीक से देखा-महसूस किया है. ज़िन्दगी के आनंद के क्षणों को कहीं गायब होते देखा है. पल-पल ज़िन्दगी के रूप में मौत को पास आते देखा है. ऐसा हमने हर उस स्थिति में महसूस किया है जबकि हमने ज़िन्दगी को आपस में एक-दूसरे से जोड़ कर देखा है.


आज किसी भी फोन की घंटी पर सहम जाना, किसी भी मैसेज की आवाज़ पर सिहर जाना, बातचीत का सिरा पकड़ते हुए आवाज़ में कम्पन आना सब कुछ ऐसा होता जा रहा है जो बता रहा था कि हम सब एक हैं मगर कहीं न कहीं भीतर से डरे हुए हैं. इस एक होने के बाद भी हम सब ज़िन्दगी का संगठित रूप प्रस्तुत नहीं कर पा रहे थे. बहुत से लोग अपनी-अपनी ज़िन्दगी के अनमोल पलों में से बहुत सारा जीवन जरूरतमंद लोगों को देने को तैयार बैठे हैं मगर ज़िन्दगी के द्वारा ज़िन्दगी नहीं दी जा सकती है. यही कारण है कि सुखद होने के बाद भी ज़िन्दगी अत्यंत भयानक है. जहाँ एक व्यक्ति अपनी ज़िन्दगी का सुखद पल अपने साथ लिए बैठा होता है और उसी का अभिन्न भाई ज़िन्दगी में से ज़िन्दगी का एक-एक पल अपने लिए तलाश रहा होता है. ये तो विश्वास, संयम, हिम्मत रखने वाली बात है, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से अलग नहीं होने देने का जज्बा है कि बहुतेरे लोग आज भी अपने आत्मविश्वास, अपनी जिजीविषा के चलते ज़िन्दगी को सुरक्षित रख ले जा रहे हैं. विश्वास, स्नेह, आशीर्वाद की दम पर ज़िन्दगी को अपने बगल में बैठा लेने पर मजबूर कर देने वाले अपने सभी परिचितों, अपरिचितों, मित्रों, परिजनों, सहयोगियों के दीर्घायु होने की कामना.


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वंदेमातरम्

23 April 2021

एक निवेदन मददगार साथियों से

इधर कोरोना वायरस की दूसरी लहर, जैसा कि ऐसा कहा जा रहा, के आने के बाद से लोगों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है. ऐसे में बहुत से लोगों को आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाएँ नहीं मिल पा रही हैं. लोग मदद के लिए परेशान हैं. कोई दवाओं के लिए परेशान है तो कोई ऑक्सीजन के लिए. ऐसी स्थिति में हमारे बहुत से मित्र सोशल मीडिया की सहायता से जरूरतमंद लोगों की भरपूर सहायता, सहयोग कर रहे हैं. सभी साधुवाद के पात्र हैं.  


एक निवेदन है सभी से, जो पोस्ट किसी की सहायता के लिए लगाई गई है, यदि उसके द्वारा मदद हो चुकी है अथवा बहुत दिन हो चुके हों तो उस पोस्ट को डिलीट कर दिया करें. पोस्ट बने रहने से वह किसी नये सदस्य के सामने से गुजरती है तो वह संवेदना के साथ सम्बन्धित पोस्ट पर मदद, सहयोग की अपील/प्रयास करने लगता है, जबकि उस पोस्ट के द्वारा मदद पहले ही हो चुकी है. ऐसी स्थिति में कई लोगों को अनावश्यक परेशानी होती है साथ ही ऐसी स्थिति किसी के साथ दो-तीन बार होने पर वह सहायता के लिए आगे आना बंद कर देता है.


मदद के लिए लिखी ऐसी पोस्ट का कोई दीर्घकालिक लाभ भी नहीं. ऐसी स्थिति में वे भविष्य में अन्य लोगों के लिए संशय तो पैदा कर ही सकतीं हैं साथ ही अनावश्यक रूप से इंटरनेट स्पेक्ट्रम की जगह को घेरे रहेंगीं.


एक निवेदन और कि जिस पोस्ट के द्वारा मदद मिल जाए तो उस पोस्ट के स्क्रीनशॉट के साथ इस बारे में अवश्य सूचित कर दिया जाए ताकि सहयोग में लगे सुधिजन उस ओर से निश्चिंत हो सकें.


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वंदेमातरम्

22 April 2021

वो घटना भी हो गई बाली उमर की

­­ज़िन्दगी है तो उसके साथ बहुत सी यादें भी जुड़ जाती हैं. इन जुड़ती यादों में बहुत सी अच्छी यादें होती हैं और बहुत सी बुरी भी. इन यादों के अच्छे-बुरे स्वभाव के चलते मन उदास भी रहता है तो मन में उल्लास भी बना रहता है. फ़िलहाल जीवन है तो जीवन से जुड़े अच्छे-बुरे पलों से सामना करते ही रहना होगा. इनसे चाहकर भी कोई इन्सान बचा नहीं रह सकता है.


अपने जीवन की तमाम सारी अच्छी बुरी यादों के बीच आज का दिन पिछले सोलह सालों में भुला नहीं सके हैं, चाह कर भी भुला नहीं सके हैं. सामान्य गति से दौड़ते-चलते जीवन में अचानक से एक स्पीड ब्रेकर लग गया था. अब उस दिन के बारे में, उस दिन की घटना के बारे में कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं क्योंकि हमारे साथ के सभी लोगों को उस दिन के बारे में, उस घटना के बारे में सब मालूम है. जिन मित्रों को नहीं मालूम है उनको धीरे-धीरे सब जानकारी होती रहेगी.


फिलहाल तो इतना ही कि उस दिन की घटना सोलह बरस की बाली उमर को छू चुकी है. दिनों दिन वो याद जवान होती रहती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि उस दिन मिला दर्द आज तक एक पल को न ही कम हुआ है और न ही गायब हुआ है. बस सब चल रहा है, अपनी गति से पल रहा है. उस दिन की यादें, उस दिन का दर्द, उस शाम का मंजर, सड़क पर दौड़ती कार, सबको तसल्ली देते-देते टूटती-जुड़ती साँसें, अपनों का साथ, गैरों का अपनापन.... बहुत-बहुत कुछ है जो आज बाली उमर के बिंदु को छू गया.


हमारा दिल तो पहले ही बाली उमर का शिकार था, अब वे घटनाएँ, वो दिन भी इसकी गिरफ्त में आ गया.




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वंदेमातरम्

21 April 2021

व्यस्त रहो, खुश रहो

==>> घर में अकेले मत रहो। सबके साथ समय बिताओ।

==>> टीवी, मोबाइल, कम्प्यूटर पर समाचार देखना एकदम बंद कर दो।

==>> अपने मन का कोई भी काम करो। कुछ बनाओ, कुछ लिखो।

==>> मोबाइल पर अनर्गल खबरें देखने के बजाय घर के तमाम सामानों की फोटो खींचो। वीडियो बनाओ।

==>> मनपसंद गाने सुनो, फिल्में देखो।

==>> जिनसे बात करके सुकून मिलता है, उनसे फोन से बात करो।

==>> जिनको देखे कई दिन हो गये या जिनको देखने का मन है उनको वीडियो काॅल करो।

==>> ये सब करते हुए थकोगे नहीं बल्कि प्रफुल्लित रहोगे, खुश रहोगे।

==>> करके तो देखो।



वंदेमातरम्

17 April 2021

आम नागरिकों का लापरवाही भरा व्यवहार

पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ी है वह निश्चित ही चिंताजनक है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि इस बार इसके कारण बहुत से लोगों को मौत ने छीन लिया है. जिस तरह से मीडिया में आ रहा है उससे लग रहा है जैसे चारों तरफ अव्यवस्था ही अव्यवस्था है. कहीं ऑक्सीजन की कमी दिखाई जा रही है, कहीं श्मशान घाटों पर भीड़ बताई जा रही है, कहीं से बेड न होने की समस्या है तो कहीं से दवाओं का न होना दिक्कत बढ़ा रहा है. जिस तरह से आम आदमी और सरकारी स्तर पर लापरवाही देखने को मिली है उसके बाद ऐसे हालात बन जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं.


इधर लोग सरकार को कोसने में लगे हुए हैं. ये वही लोग हैं जो पिछली बार सरकार द्वारा लॉकडाउन लगाये जाने के बाद से हाहाकार मचाने लगे थे. इन लोगों ने उस समय सरकार के इस कदम का घनघोर विरोध किया था और लॉकडाउन को मजदूरों, कमजोरों आदि के लिए घातक बताया था. सरकार को, प्रधानमन्त्री को तानाशाह तक सिद्ध कर दिया था. आज यही लोग लॉकडाउन की माँग करने में लगे हैं. अब वे सरकार को, प्रधानमंत्री को लॉकडाउन न लगाने के कारण कोसने में लगे हैं. बहरहाल, इसके इतर बहुत सी जगहों पर किसी तरह की चिकित्सकीय सुविधा के अभाव के लिए सरकार को दोषी ठहराने वाले खुद को दोषमुक्त मान रहे हैं. क्या वाकई सिर्फ सरकार ही दोषी है? माना कि प्राथमिक व्यवस्था करना सरकार का काम होता है मगर क्या आम नागरिक की जिम्मेवारी नहीं कि वह सरकार के साथ ऐसे आपातकाल में खड़ा रहे?


चलिए एक पल को मान लिया जाये कि सरकार ने एक साल बाद भी किसी तरह के इंतजाम नहीं किये. उसे मालूम था कि कोरोना गया नहीं है, ऐसे में वैक्सीन की व्यवस्था किसने की? सरकार ने आम आदमी के किसी रिश्तेदार ने? जितनी भी ऑक्सीजन हॉस्पिटल में उपलब्ध है वह किसने करवाई किसी आम आदमी ने या सरकार ने? आम आदमी ने क्या किया, आपदा बढ़ती दिखी तो उसने दवाओं की कालाबाजारी शुरू कर दी. मुश्किल घड़ी सामने आई तो इंजेक्शन दस-दस गुने दामों पर बेचा जाने लगा. ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ने लगी तो उसकी जमाखोरी शुरू हो गई. कम से कम कीमत वाले मास्क तक के अच्छे-खासे दाम वसूले गए.


ये तो मानिए कि व्यापारी वर्ग की हालत थी. और लोगों को तो मालूम था कि कोरोना अभी गया नहीं है मगर उन्होंने क्या किया? अनलॉक होने के बाद से बहुतेरे घर में रहने को तैयार नहीं थे. सब बाहर सडकों पर निकल कर ऐसे जमा होने लगे जैसे अब सभी संकटों से पार पा गए हैं. एक बारगी यह भी मान लिया जाये कि घरों में बंद लोग अकुलाहट में ऐसा कर बैठे तो भी आम नागरिक ने आने वाले समय के लिए किसी तरह के चिकित्सकीय इंतजाम किये? ये सभी तरफ से बताया जा रहा था कि कोरोना अभी गया नहीं है ऐसे में क्या आम नागरिकों ने एक या दो लोगों के लिए आपातकाल के लिए अपने घर में दवाओं को रखा था? क्या किसी परिवार ने अपने बुजुर्गजनों का मेडिकल चेकअप करवाया ताकि उनको किसी खतरे की आशंका से बचाया जा सके? क्या किसी ने अपने बच्चों को सुरक्षित रहने के टिप्स दिए? नहीं न. जिसने दिए उनकी संख्या लगभग न के बराबर है.


एक ऐसे समय में जबकि सभी नागरिकों ने पिछले साल कोरोना की दहशत को देखा और झेला भी है इसके बाद भी वह सजग नहीं हो सका है. इसी लापरवाही का परिणाम है कि व्यवस्था अचानक से बोझ पड़ने पर चरमरा उठी है. हमें एक जिम्मेवार नागरिक की हैसियत से सरकार का साथ देना चाहिए न कि अपनी लापरवाहियों से उसके लिए परेशानी उत्पन्न करें.


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वंदेमातरम्