18 फ़रवरी 2026

धार्मिक विरासत का विकास मॉडल - अयोध्या

जय श्रीराम और रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे नारों के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विरोधी श्रीराम मंदिर निर्माण को सवालों के घेरे में खड़ा करते थे. उनका मानना था कि मंदिर निर्माण से आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं होने वाला. विरोधियों द्वारा मंदिर के स्थान पर चिकित्सालय बनवाए जाने के, विद्यालय बनवाए जाने के सुझाव दिए जाते. न्यायिक प्रक्रिया पश्चात् श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला और मंदिर निर्माण होने के साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हुई. अब जबकि अयोध्या में श्रीराम मंदिर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, अयोध्या में बढ़ते पर्यटकों की संख्या अपनी ही अलग कहानी कह रही है तब भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ से श्रीराम मंदिर अर्थव्यवस्था मॉडल को अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई है. संस्थान की एक अध्ययन रिपोर्ट ने श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् अयोध्या में आई व्यापक आर्थिक सक्रियता, निवेश प्रवाह और रोजगार सृजन पर प्रकाश डाला है. अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल आया है.

 



आईआईएम लखनऊ ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में मंदिर निर्माण से पहले और उसके बाद की आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थान के रूप में ही बनी हुई थी. मंदिर निर्माण के पहले यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों की वार्षिक संख्या लगभग 1.7 लाख के आसपास थी. अयोध्या के स्थानीय बाजारों का सञ्चालन भी बहुत छोटे स्तर पर होता था, जिसके चलते यहाँ की आर्थिक गतिविधियाँ भी संकुचित थीं. मंदिर निर्माण के बाद यहाँ लगभग छह हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) स्थापित हुए. अयोध्या के स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की माँग में उछाल से कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है. छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये तक पहुँच गई. यहाँ की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने पिछले वर्ष लगभग 400 करोड़ रुपये का जीएसटी योगदान दिया है.

 

किसी भी स्थान के पर्यटन को लेकर वहाँ की यातायात व्यवस्था, रुकने के स्थानों आदि का गुणवत्तापूर्ण होना बहुत अधिक महत्त्व रखता है. मंदिर निर्माण से पूर्व राष्ट्रीय स्तर के होटलों से सम्बंधित व्यावसायियों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. यातायात की सुविधाएँ भी सीमित रूप में देखने को मिलती थीं. मंदिर निर्माण पश्चात् आधुनिक रेलवे स्टेशन, चौड़ी सड़कों, नदी तट सौंदर्यीकरण और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीन स्वरूप प्रदान किया है. इन परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीनतम स्वरूप प्रदान करने के साथ-साथ निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करके स्थानीय युवाओं को काम के अवसर भी प्रदान किये. श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में सेवा-भाव, आतिथ्य सत्कार, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है. इससे यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से पर्यटन आधारित राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है. अध्ययन के अनुसार अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन के परिणामस्वरूप 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे अस्तित्व में आये हैं. यहाँ पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित होटल व्यावसायियों ने अयोध्या में अपनी योजनाओं को विस्तारित किया है. अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगले चार-पाँच वर्षों में पर्यटन, परिवहन, होटल, खान-पान और आतिथ्य क्षेत्रों में लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन सम्भव है.

 

इसी के साथ महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा संचालन से देश के विभिन्न महानगरों से सीधी हवाई सम्पर्क स्थापित होने से भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई. आईआईएम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् पहले छह महीनों में 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन अयोध्या में हुआ. इस स्थिति के चलते अयोध्या के स्थानीय बाजार, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार देखने को मिला. ऐसी सम्भावना दर्शायी गई है कि अब अयोध्या में वार्षिक स्तर पर 5 से 6 करोड़ लोगों का आना हो सकता है. पर्यटकों, आगंतुकों की अनुमानित संख्या अयोध्या को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्रों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा करती है. वर्तमान में अयोध्या में लगभग 85000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं. इनका प्रभाव केवल आधारभूत ढाँचे तक ही नहीं बल्कि निवेश और सेवा क्षेत्र तक विस्तीर्ण है. सतत शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जा रहा है. अयोध्या को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं.

 

प्रवासी भारतीयों, देशी-विदेशी शोधकर्ताओं, वैश्विक श्रद्धालुओं का अयोध्या के प्रति आकर्षित होना सिद्ध करता है कि अयोध्या ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में नई पहचान प्राप्त की है. अध्ययन के अनुसार धार्मिक विरासत आधारित विकास मॉडल यदि सुव्यवस्थित निवेश, प्रशासनिक समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ लागू किया जाए तो वह स्थानीय अर्थव्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन कर सकता है. अयोध्या का अनुभव दर्शाता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के योजनाबद्ध क्रियान्वयन से पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश से बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार निर्मित किया जा सकता है. यहाँ की आधारभूत संरचना, पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक बदलाव देखने को मिला है जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में शामिल कर दिया है.

 

 


14 फ़रवरी 2026

देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?

देश के लोकतंत्र का एक दुर्भाग्य ये रहा कि इसे लोकतंत्र अचानक ही मिल गया, जिसके लिए वह कभी तैयार ही नहीं था. गौर करिए, देश अपनी आज़ादी के ठीक पहले अंग्रेजों का गुलाम था, उसके पहले मुगलों सहित अनेक आक्रमणकारियों, विदेशी आक्रान्ताओं की गुलामी को सहा है. इस स्थिति से पहले भी देश में रियासत, कबीलाई संस्कृति देखने को मिलती थी. लोकतान्त्रिक स्वरूप की अवधारणा आज़ादी से पहले देखने को नहीं मिलती है. (विभिन्न साम्राज्यों की जो भी स्थिति थी वो लोकतान्त्रिक नहीं थी) ऐसे में आज़ादी के बाद भी हम लोग दो मानसिकताओं में जीते रहे, एक मालिक वाली और दूसरी नौकर-दास वाली. ये स्थिति संसद से लेकर निम्न स्तर तक देखने को मिलती है.




संसद की तरफ देखें तो यहाँ भी यही स्थिति दिखाई देती है. किसी और की चर्चा न करते हुए नेता पक्ष नरेन्द्र मोदी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ही देखें तो सब साफ़ हो जाता है. राहुल गांधी की पारिवारिक पृष्ठभूमि जिस तरह की रही है वे उसका दृश्य लगभग रोज ही संसद में प्रस्तुत कर देते हैं. सदन को वे अपने घर का आँगन ही समझते हैं. सदन की कार्यवाही के बीच में खड़े होकर चाय पीने लगना, प्रधानमंत्री के गले लग जाना, आन मारना, नॉनसेन्स जैसा शब्द बोलने के बाद भी मुकर जाना, तथ्यात्मक रूप से गलती करना, सदन के नियमों की अवहेलना करना इसका उदाहरण है. पीठासीन अधिकारी को वे अपने घर-परिवार का कोई कर्मी ही समझते हैं तभी आसन को अपने दल का पूर्व सदस्य बताने लगना, बार-बार टोकने के बाद भी विषय पर न बोलना दर्शाता है कि राहुल गांधी सदन को, पीठ को आज भी खुद से नीचे समझते हैं. इसके पीछे वही कबीलाई सोच कि वे किसी रियासत जैसे परिवार से आते हैं, उनके परिवार ने देश को प्रधानमंत्री दिए हैं.


यहाँ देश के प्रधानमंत्री, पक्ष के नेता नरेन्द्र मोदी को भी कटघरे में खड़े करने से मुक्त नहीं किया जा सकता है. जैसा कि पहले बताया कि मलिक और नौकर वाली मानसिकता ही आज भी काम करती है. यदि नेता प्रतिपक्ष मालिक वाली मानसिकता से अपने कृत्य करते हैं तो नेता पक्ष खुद को नौकर वाली स्थिति में दर्शाने से नहीं चूकते हैं. गाहे-बगाहे वे खुद को चाय बेचने वाला, गरीब माँ का बेटा, पिछड़े वर्ग का घोषित कर ही देते हैं. यहाँ सिर्फ एक बड़ा अंतर उनको राहुल गांधी से अलग करता है कि वे सदन का, लोकतंत्र का सम्मान करते हैं; सदन की गरिमा का ध्यान रखते हैं; अपने कृत्य से सदन का-पीठ का अपमान नहीं करते हैं.


बावजूद इसके, कहा जा सकता है कि देश संक्रमणकाल से गुजरने के साथ-साथ दुर्भाग्य के दौर से भी गुजर रहा है जहाँ इसके नागरिकों में समझ विकसित नहीं हो सकी है. आज भी वे सही और गलत का अंतर कर पाने समर्थ नहीं हो सके हैं. आज भी वे एक फोटो, एक वीडियो, एक फाइल के सहारे किसी और के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं.


पता नहीं देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?


11 फ़रवरी 2026

सरकार ने डीपफेक और एआई पर सख्त किए नियम

ऐसा लगता है जैसे कोई चीज मुफ्त में या फिर लगभग मुफ्त जैसी कीमत में मिलती है तो उसका दुरुपयोग पूरी ताकत से किया जाने लगता है. इस मामले में अनेकानेक उदाहरण हम सबके सामने हैं. ऐसे ही उदाहरणों में से एक ताजातरीन उदाहरण कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का लिया जा सकता है. हम भारतीयों ने जिस तरह से डीपफेक सहित एआई का दुरुपयोग किया है, वैसा हाल एआई को सामने लाने वालों ने भी नहीं सोचा होगा. न जाने कितनी कृत्रिम सामग्री, बनावटी फोटो, नकली वीडियो आदि के माध्यम से सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को इतनी बुरी तरह से भर दिया गया है कि कई बार असली और नकली का अंतर ही समझ नहीं आता है.

 



सवाल अकेले नकली सामग्री बनाये जाने का नहीं बल्कि इसके माध्यम से धोखाधड़ी, अश्लीलता आदि को बढ़ावा मिलने लगा था. लगातार आती शिकायतों को दृष्टिगत रखते हुए केन्द्र सरकार ने डीपफेक सहित एआई से तैयार सामग्री के सम्बन्ध में ऑनलाइन मंचों के लिए सख्त नियम बना दिए हैं. ये नियम इसी माह की बीस तारीख से लागू हो जाएँगे. इसके तहत सोशल मीडिया के विविध मंचों से डीपफेक वाली सामग्री को तीन घंटे के भीतर ही हटाना होगा. पहले इस सम्बन्ध में समय-सीमा 36 घंटे की थी. इसके अलावा एआई के माध्यम से निर्मित सामग्री, चाहे वो फोटो हो या फिर वीडियो, उसमें एआई कंटेंट होने का लेबल स्पष्ट रूप से लगाना होगा, जिससे दर्शकों को आसानी से असली और नकली का अंतर समझ आ सके.

 

सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 में संशोधन करके इसके माध्यम से एआई से निर्मित बनावटी कटेंट को परिभाषित किया गया है. इन संशोधनों में ‘ध्वनि, दृश्य या ध्वनि-दृश्य जानकारी' और ‘बनावटी रूप से तैयार की गई जानकारी' को परिभाषित किया गया है, जिसमें एआई द्वारा निर्मित या परिवर्तित ऐसी सामग्री शामिल है जो वास्तविक या प्रामाणिक प्रतीत होती है. इस तरह के संशोधनों से निश्चित रूप से एआई का दुरुपयोग रोकने में मदद मिल सकेगी.


07 फ़रवरी 2026

जेन ज़ी की बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह

शिक्षक रह चुके न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वाथ ने अपनी रिसर्च के माध्यम से बताया कि जेन ज़ी के रूप में पहचानी जाने वाली पीढ़ी की बुद्धिमत्ता में अपनी पिछली पीढ़ी की तुलना में गिरावट आई है. ऐसा तब हुआ है जबकि ये पीढ़ी पिछली सदी के बच्चों की तुलना में अपना अधिक समय शिक्षण संस्थानों में व्यतीत कर रहे हैं. इस पीढ़ी के आईक्यू को कम बताने पर चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि सामान्य रूप में ऐसा माना जाता है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमता वाली होती है. सोशल मीडिया के माध्यम से हमेशा चर्चा में रहने वाली जेन ज़ी पीढ़ी का पिछली पीढ़ी से कम बुद्धिमत्ता वाला होना प्रथम दृष्टया आश्चर्य में डालता है किन्तु जब डॉ. होर्वाथ के द्वारा बताये गए कारणों पर गौर करते हैं तो ऐसा होना सच भी लगता है. उन्होंने ऐसा होने के पीछे इस पीढ़ी का तकनीक और मशीनों पर अधिक से अधिक निर्भर होना बताया है. जेन ज़ी के द्वारा बहुतायत में 'एजुकेशनल टेक्नोलॉजी' अर्थात पढ़ाई में तकनीक और स्क्रीन्स का उपयोग किया जाता है. इसके चलते एक तरफ उनकी एकाग्रता में कमी आई है वहीं समस्याओं को सुलझाने की क्षमता भी घटी है.

 



किसी रिसर्च के आधार पर जेन ज़ी की क्षमताओं को आँकने के साथ-साथ यदि इनकी जीवन-चर्या, कार्य-शैली आदि का अध्ययन किया जाये तो इनकी क्षमताओं में कमी का अकेला कारण तकनीक अथवा स्क्रीन पर अधिकाधिक समय बिताना ही नहीं है. बचपन से लेकर इनकी युवावस्था तक की समयावधि पर गौर किया जाये तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि इस पीढ़ी की सामाजिकता, समन्वय, सहयोग आदि को आरंभिक दौर से ही कम से कमतर किया जाता रहता है. इनके खेलने-कूदने, मैदानों में जाने, पारम्परिक खेलों में भाग लेने, शारीरिक श्रम करने में लगातार कमी आते-आते एक तरह की शून्यता आ गई है. शिक्षा के नाम पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव, ज्ञान के बजाय तकनीकी रोजगार पाने की आकांक्षा ने बच्चों को मशीन में परिवर्तित कर दिया है. किसी समय गर्मियों की छुट्टियाँ खेलकूद, यात्राओं, रिश्तेदारों से मेलजोल, कार्य-निपुणता आदि के द्वारा बच्चों का न केवल मनोरंजन करती थीं बल्कि उनको सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सहयोग का पाठ भी सिखाती थीं. इसके उलट आज इन छुट्टियों में ये पीढ़ी अपने संस्थानों के प्रोजेक्ट को पूरा करने में, किसी प्रतियोगी परीक्षा को पास करने में, किसी तकनीक को सीखने में ही उलझे रहते हैं.

 

अध्ययन की समयावधि के साथ-साथ अपने फुर्सत के कुछ पलों को भी लैपटॉप, मोबाइल आदि के साथ गुजारने के कारण ये पीढ़ी खुद को सामाजिक रूप से लगभग अलग कर चुकी होती है. ऐसे में इनकी पारंपरिक बुद्धिमत्ता जैसे तार्किकता, एकाग्रता, याददाश्त, कल्पनाशीलता आदि में कमी आना स्वाभाविक है. गैजेट्स के सहारे छोटे-छोटे से काम करने, पुस्तकों से खुद को दूर कर लेने, रील्स जैसी अत्यधिक तीव्र दुनिया के रोमांच में खोने, खुद को डिजिटल डिवाइस में कैद कर देने के कारण इस पीढ़ी में निर्णय लेने की त्वरित क्षमता में कमी आना, संकटकालीन स्थिति में अवसाद में चले जाना, जरा सी असफलता पर घनघोर नैराश्य को अपना लेना आदि भी सहज रूप में नजर आता है.

 

सामान्य रूप में ऐसा वैज्ञानिक तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के लिए बातचीत के, पुस्तकों को पढ़ने के माध्यम से सीखना सहज होता है. यही कारण है कि आज भी तकनीक के बदलते दौर में भी शिक्षण संस्थानों का महत्त्व बना हुआ है, शिक्षकों को वरीयता प्रदान की जा रही है. ऐसा माना भी जाता है कि इस तरह की कार्यविधि के माध्यम से किसी सामग्री को, किसी ज्ञान को मष्तिष्क जल्द से जल्द स्वीकारता है. आज की पीढ़ी में आमने-सामने बात करने, पुस्तकों को पढ़ते हुए कल्पनाशीलता का विकास करने के स्थान पर स्क्रीन को जल्दी-जल्दी स्क्रॉल करने, मुख्य-मुख्य बिन्दुओं को पढ़कर सीखने में विश्वास करने लगी है. यही कारण है कि उसकी सीखने की क्षमता कम हुई है. यह स्थिति किसी एक देश की नहीं बल्कि लगभग सभी देशों की इस पीढ़ी की है.

 

डॉ. होर्वाथ की खोज से निकले निष्कर्ष को किसी प्रयोग का अंतिम निष्कर्ष भले न माना जाये किन्तु यह तो अवश्य ही माना जा सकता है कि जेन ज़ी पीढ़ी ने खुद को तकनीकी के हाथों की कठपुतली बना दिया है. ऐसे में अब जबकि खोज बता रही है कि उनकी पिछली पीढ़ी उनसे अधिक बुद्धिमत्ता वाली है तो पिछली पीढ़ी का दायित्व बनता है कि इस पीढ़ी को मशीनी खिलौना बनने से बचाया जाये. तकनीकी विकास और भौतिकतावादी युग में आज भले ही धनोपार्जन मुख्य मुद्दा बनता जा रहा हो किन्तु कुछ शारीरिक श्रम, खेलकूद, मेल-जोल, सामाजिकता, पारिवारिकता आदि के लिए समय निकालना ही होगा. परिवारों को एक निश्चित समय गैजेट्स, मशीनों, मोबाइल आदि के बिना रहते हुए सदस्यों के बीच बातचीत करते हुए, आपसी चुहल करते हुए बिताना शुरू करना होगा. अपने बच्चों को मशीनी खेल से बाहर निकाल कर मैदानों में भेजना होगा. हार-जीत के रूप में सफलता-असफलता का स्वाद चखने के लिए उनको तैयार करना होगा. हमें ही ध्यान रखना होगा कि जेन ज़ी भी अपनी पिछली पीढ़ी की तरह एक इन्सान है न कि कोई मशीन या रोबोट. इस पीढ़ी को भी संवेदनात्मक रूप से, भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाने की आवश्यकता है. ऐसा नहीं कि जेन ज़ी सक्षम अथवा समर्थ नहीं है, बस उसने खुद को तकनीक में, मशीनों में उलझा दिया है और हम सबको उसे इसी उलझन से बाहर निकालना है.

 


24 जनवरी 2026

व्यावहारिक और दीर्घकालिक हो विदेश नीति

पिछले कुछ समय से देश की स्थिति को देखते हुए विपक्षियों द्वारा बार-बार विदेश नीति पर सवालिया निशान लगाये जा रहे थे. आलोचना के स्वरों में केन्द्र सरकार की विदेश नीति के असफल होने की बात उठाई जाने लगी. ऐसे विचारों को उस समय और बल मिला जबकि हमारे पड़ोसी देशों में हालात ख़राब रहे और उनके अंदरूनी हालातों का प्रभाव भारतीय परिप्रेक्ष्य में नजर आया. इसी तरह पहलगाम की घटना के बाद ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भी भारतीय पक्ष का अकेले खड़े दिखाई पड़ने से विरोधियों के आरोपों को बल मिला. विदेश नीति को लेकर लगातार आरोप लगाये जाते रहे कि वह अपने घोषित लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रही है. एक तरफ भले ही भारत की सक्रियता वैश्विक मंच पर बढ़ती जा रही मगर दूसरी तरफ पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते सम्बन्धों, चीन के साथ सीमा विवाद, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों तथा कुछ पश्चिमी देशों से उत्पन्न विवादों ने देश की वैश्विक छवि को धूमिल किया.

 

देखा जाये तो किसी भी देश की विदेश नीति का स्वरूप मूल रूप में दीर्घकालिक और बहुस्तरीय होता है, जिसे सफलता या असफलता के सम्बन्ध में एकाएक मापना न केवल कठिन होता है बल्कि उचित भी नहीं होता है. अनेक अवसर ऐसे होते हैं जबकि वैश्विक सम्बन्धों के चलते अनेकानेक नीतियों को, योजनाओं को रोकना पड़ता है. इसे भी ऑपरेशन सिन्दूर के रूप में देखा-समझा जा सकता है. पाकिस्तान पर कई गुना बेहतर स्थिति होने के बाद भी एकाएक देश को युद्ध विराम जैसी स्थिति को स्वीकारना पड़ा. इस निर्णय के बाद जहाँ केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने लगातार बयानबाजी करते हुए इसके लिए स्वयं को नेतृत्वकर्ता सिद्ध करना चाहा.

 



भारत की विदेश नीति के सन्दर्भ में एक तथ्य सदैव से प्रभावी रहा है कि देश ने स्वतंत्रता के बाद से ही स्वयं को गुटनिरपेक्ष नीति के समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया है. इसी कारण भारत वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलनकारी कूटनीतिज्ञ के रूप में दिखाई पड़ता है. रूस-यूक्रेन युद्ध को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जहाँ अमेरिका और यूरोपीय देशों के दबाव के बाद भी भारत ने रूस से तेल और रक्षा सहयोग जारी रखा. अपने चिर-परिचित, पुराने सम्बन्धों का निर्वहन करने के साथ-साथ भारत ने युद्ध के समाधान के लिए कूटनीति को भी प्रभावी बनाये रखा. युद्धकाल में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रूस और यूक्रेन की यात्राओं ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति भावनाओं नहीं हितों से संचालित होती है. यद्यपि देश की इस नीति का अनेक पश्चिमी देशों ने विरोध किया तथापि भारत ने अपनी नीति को नहीं त्यागा.

 

ऐसी मजबूत कूटनीतिज्ञ स्थिति के बाद भी भारत की विदेश नीति की सर्वाधिक आलोचना उसके पड़ोसी देशों के संदर्भ में होती है. पड़ोसी देशों के वर्तमान हालात और भारतीय हस्तक्षेप को लेकर दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति सहज नहीं रही है. नेपाल के साथ सीमा और नक्शे का विवाद, मालदीव में भारत-विरोधी राजनीतिक अभियान, श्रीलंका में चीन की सशक्त आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति, श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का चीन को दीर्घकालिक पट्टे पर दिया जाना, बांग्लादेश में भारतीय हितों, हिन्दुओं पर हमले, पाकिस्तान द्वारा भारतीय विरोध की नीति को खुलकर अपनाना आदि ने भारतीय विदेश नीति के पारम्परिक अस्तित्व को चुनौती दी है. इन घटनाओं को कहीं न कहीं भारत की असफल विदेश नीति के रूप में परिभाषित किया जाने लगा.  

 

यह सच है कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में वैसी मधुरता नहीं दिखाई पड़ती है, जैसी कि वर्तमान केन्द्र सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान देखने को मिली थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दक्षिण एशिया देशों के साथ मधुर, मजबूत सम्बन्धों की जैसी पहल की गई थी, उसके परिणाम वैसे नहीं निकले जैसी की कल्पना की गई थी. अपने पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में आई गिरावट के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ भी सम्बन्धों में चुनौतियाँ दिख रही हैं. अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापारिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है; क्वाड जैसे मंच पर भारत की सक्रिय भागीदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक सफलता को दर्शाती है वहीं मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि को लेकर पश्चिमी देशों के रुख ने स्थितियों को असहज भी किया है. कनाडा, अमेरिका, ईरान, तालिबान, इजराइल आदि के साथ वर्तमान राजनयिक सम्बन्धों को इसी रूप में देखा जा सकता है.

 

वैश्विक मंचों पर और स्थानीय मुद्दों पर कूटनीतिज्ञ रूप से देखा जाये तो कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति एक तरह के संक्रमणकाल से गुजर रही है. देश की अंदरूनी स्थिति, पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों के रूप में देश से एक तरफ अपेक्षाएँ भी हैं और दूसरी तरफ चुनौतियाँ भी हैं. उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में, दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को स्थापित करने के उद्देश्य से भारत को जिम्मेदारियों और चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित करना है. विगत वर्षों की भारतीय क्षमता, नेतृत्व, वैश्विक छवि को देखते हुए विदेश नीति पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी ही कही जाएगी. विदेश नीति से सम्बंधित तमाम पक्षों पर विचार करते हुए उसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखना उचित होगा. वर्तमान सन्दर्भों में आवश्यकता इसकी है कि भारत अपनी कूटनीति को अधिक व्यावहारिक, दीर्घकालिक दृष्टि से सुदृढ़ करे. सत्ता पक्ष और विपक्ष को भी भारतीय सन्दर्भों में एकजुट होकर इसके लिए कार्य करने की आवश्यकता है ताकि वैश्विक मंच पर देश की बढ़ती भूमिका को, विदेश नीति को सशक्त रूप में परिभाषित किया जा सके.