27 October 2020

वोट बनने की जगह अब नागरिक बनना होगा

समाज में एक नागरिक के रूप में यहाँ के मंत्री भी रहते हैं और एक साधारण सा काम करने वाला भी. इसी नागरिक के रूप में एक प्रशासनिक अधिकारी की पहचान होती है तो एक सामान्य से क्लर्क की. इसी में बहुत बड़ा व्यापारी भी शामिल होता है और इसी में एक अत्यंत गरीब व्यक्ति भी. पद, प्रतिष्ठा, धर्म, जाति के आधार पर किसी की नागरिकता का निर्धारण नहीं होता बल्कि सभी इसी समाज के नागरिक कहे जाते हैं. ये और बात है कि पद, प्रस्थिति, प्रतिष्ठा, धन आदि के द्वारा उसको अलग स्थान दिया जाने लगता है. इसी अलग स्थान दिए जाने की मानसिकता के कारण देश के सभी राजनैतिक दलों ने नागरिकों को अपने हाथों का खिलौना बना दिया है. ये नागरिक अब महज नागरिक न होकर जाति, धर्म, क्षेत्र, राजनैतिक विचारधारा के लोग बना दिए गए हैं.


समाज में किसी भी घटना के बाद हम सभी उसके पहले हुई घटना के सापेक्ष राजनैतिक दलों की प्रतिक्रिया की तुलना करने लगते हैं. एक पल रुक कर सोचिए कि क्या राजनैतिक दलों ने वाकई किसी भी घटना पर प्रभावित पक्ष के लिए संवेदनात्मक रूप से कार्य किया है? इसमें किसी एक दल को दोषी नहीं ठहराया जा रहा है बल्कि सभी दल एकसमान रूप से दोषी हैं. उनके लिए कोई भी घटना महज एक घटना ही नहीं होती वरन एक तरह का मंच होती है, जिसके माध्यम से वे अपने दल के लिए अधिक से अधिक सहानुभूति, अधिक से अधिक मतदाता, अधिक से अधिक वोट का जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं. उनके किसी भी घटना के सन्दर्भ में उठने वाले कदमों की हम आलोचना करते हैं और उसी कदम की किसी अन्य घटना के सापेक्ष समर्थन भी करने लगते हैं. असल में एक नागरिक के रूप में हम सभी लोग ही स्थिर नहीं हैं. हमें किसी भी घटना के सापेक्ष खुद भी ज्ञात नहीं होता है कि हम चाहते क्या है? हम चाह क्या रहे हैं?




किसी भी घटना के हो जाने पर एक नागरिक के रूप में हमारी प्रतिक्रिया होने से पहले ही हम सभी खुद को धर्म, जाति, क्षेत्र, राजनैतिक विचारधारा के खाँचे में फिट कर लेते हैं. अब खाँचे में फिट हो जाने के बाद हम सभी की दृष्टि, सोच का दायरा सीमित हो जाता है. इसी सीमित दृष्टि के कारण हम उस घटना के सन्दर्भ में राजनैतिक दलों से किसी तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करने लगते हैं. समाज के नागरिक बनने के बजाय आलोचक बनके राजनैतिक दलों की पिछली किसी भी घटना पर उपजी प्रतिक्रिया की तुलना में लग जाते हैं. यही वह बिंदु होता है जहाँ कोई भी अपराधी अपने आपको मजबूत स्थिति में पाता है. वह समझ लेता है कि उसके अपराध का विरोध, उसके कृत्य का विरोध हम एक नागरिक के रूप में कभी करने की स्थिति में नहीं हैं. हम किसी भी अपराधी के कृत्यों के विरोध के लिए भी राजनैतिक दलों का मुँह ताकने लगते हैं.


इसी तरह की मानसिकता ने समाज में नागरिकों को कमजोर किया है और अपराधियों को बढ़ावा दिया है. हम सभी को एक नागरिक के रूप में स्वयं में सक्षम होना चाहिए. समाज में होने वाली किसी भी घटना के सन्दर्भ में हम सभी को एकजुट होकर अपराधियों का विरोध करना चाहिए. यदि समाज के सभी नागरिक एकसमान रूप से एकजुट होकर किसी भी अपराधी के कृत्य का विरोध करने उतर पड़ेंगे तो किसी भी बड़े से बड़े अपराधी की हिम्मत नहीं कि वह अगली बार किसी तरह का अपराध करे. घटना किसी भी प्रदेश में हो, किसी भी व्यक्ति के साथ हो, अपराधी का निशाना बेटी है या बेटा, युवा है या वृद्ध, गरीब है या अमीर इन सबका आकलन करने के बजाय अपराधी का विरोध होना चाहिए. यदि हम सभी एक नागरिक के रूप में एकजुट होकर ऐसा नहीं कर पाते हैं तो अपराधी खुलेआम सड़क पर अपराध करते रहेंगे, राजनैतिक दल हम नागरिकों को अपने वोट में बदलते रहेंगे.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

25 October 2020

रावण को आदर्श मानने वालों/वालियों के लिए

इधर देखने में आ रहा है कि विजयादशमी आते-आते बहुत से लोगों (विशेष रूप से महिलाओं) को रावण बहुत पसंद आने लगता है. बहुतेरी तो रावण जैसा भाई पाने की कामना जैसी बातें भी सार्वजनिक रूप से करने लगती हैं. इसी से सम्बंधित पोस्ट सोशल मीडिया पर लगाई, जिस पर बहुत सारी टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं. दो टिप्पणी खुद में विशेष समझ आईं, वही आज की पोस्ट के रूप में.

+++++


रावण को पति के रुप मे पाने की चाह रखने वाली फेमिनिस्ट सुंदरी से मेरे चंद सवाल......

हमारे पुराणों के अनूसार....

रावण की तीन पत्नियां थी

पहली का नाम मंदोदरी

दुसरी का नाम दम्यमालिनी

तीसरी का नाम अज्ञात है पर इसके रावण से तीन पुत्र थे

देवांतक , नरांतक और प्रहष्था जिसका रामानंद सागर जी

के बनाई रामायण धारावाहिक में भी उल्लेख है

और रावण ने अपनी तीसरी पत्नि की हत्या कर दी थी....

.

और भी रावण के कहानियां हैं....

.

एक रावण ने मंदोदरी की बड़ी बहन से बलात्कार करने की

कोशिश की थी जिसमे वो असफल रहा था...

.

एक रावण ने अपने सौतेले छोटे भाई कुबेर की पत्नी रंभा से

बलात्कार किया था जिसके फलस्वरूप उसे कुबेर ने श्राप

दिया था कि वो किसी भी महिला के मर्जी के विरूद्ध अगर

उससे संसर्ग करने की कोशिश करेगा तो उसके मस्तक के

सैकड़ो टुकड़े हो जायेंगे , तभी वो सीता मैया से जबरदस्ती

विवाह नही कर पाया...

.

एक रावण ने वेदवती नामक महिला से उस समय बलात्कार

करने की कोशिश की जब वो श्री हरी विष्णु को पति के रुप

में पाने के लिए तपस्या कर रही थी उसके उस कुकृत्य की

वजह से वेदवती ने तपस्या में ही प्राण त्याग दिये ....

.

एक रावण वो था जिसकी तीन पत्नियों के अलावा हजारों

दासियां थी जिस से वो समय समय पर संसर्ग करता रहता

था....

.

तो है रावण को पति रूप में पाने की चाह रखने वाली लंकनी

रुपी मंदोदरी....

तुम इन में से किस बलात्कारी रावण रूप से विवाह करना चाहोगी ???




+++++


रावण को भाई के रूप में वही पसन्द कर सकती है जिसका चरित्र सूर्पनखा जैसा हो। जो वन-वन घूम कर दूसरी स्त्रियों का पति चुराती हो। या जो किसी सुन्दर स्त्री को देखे तो अपने भाई को उसका हरण करने के लिए प्रेरित करे। ऐसी स्त्रियाँ कभी आदर्श नहीं हो सकतीं।


रावण को भाई के रूप में वही पुरुष पसन्द करता है जिसका चरित्र कुंभकर्ण जैसा हो। जो सज्जन होने के बावजूद भाई के कुकर्मों के समय आंख बंद कर ले। ऐसे लोग कभी अनुकरणीय नहीं हो सकते।


रावण को पति के रूप में वही स्त्री पसन्द कर सकती है, जो अपने पति को हजार टुकड़ों में बंटते देख सकती हो। जो देख सकती हो कि उसका पति यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर, राक्षस, यवन सभी जाति की स्त्रियों का हरण करे और बलपूर्वक अपनी पत्नी बना कर रखे। जो सहन कर सकती हो कि उसका पति उसकी किसी भी बात को न माने... वह गिड़गिड़ाती रहे, पर उसका पति उसकी बात अनसुनी कर के पाप करता रहे।


रावण को मित्र के रूप में वही पसन्द कर सकते हैं जिनका चरित्र बाली के जैसा हो। जो अपने छोटे भाई की स्त्री को बलपूर्वक छीनने में लज्जा का अनुभव नहीं करता हो। जो तारा जैसी विदुषी पत्नी की भी कोई बात नहीं मानता हो। ऐसे लोग भी सम्मान के योग्य नहीं होते।


रावण को अपना नायक वही मान सकते हैं जिन्हें न धर्म का ज्ञान है, न वेद का। रावण उन राक्षसों का नायक था जो ऋषियों के हवन कुंड में हड्डियां डालते थे, जो ऋषियों को मार कर खा जाते थे, जो मनुष्यों को जीने नहीं देते थे। रावण ऐसे ही अमानुषों का नायक हो सकता है।


रावण को एक आदर्श पुत्र मानने वाले मूर्ख ही हैं, क्योंकि रावण के कुकर्मों के कारण स्वयं उसके पिता ने उसका त्याग कर दिया था। जिस व्यक्ति के कारण उसका लज्जित पिता नगर छोड़ दे, वह और कुछ भी हो आदर्श पुत्र नहीं हो सकता।


रावण ब्राह्मणों का नायक न था, न है, न होगा... ब्राह्मणों के आदर्श हैं वे गुरु वशिष्ठ जिन्होंने राजकुमार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाया। ब्राह्मणों के नायक हैं वे दधीचि, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपनी हड्डियां दान कर दी। आधुनिक काल मे भी ब्राह्मणों के नायक चाणक्य, वर्षकार, पतंजलि, शंकराचार्य, या करपात्री जी महाराज हैं, कोई रावण नहीं है। रावण उन ब्राह्मण वंशियो को ही प्रिय हो सकता है जिन्होंने धर्म का त्याग कर वामपंथ स्वीकार किया हो, वे इतने महत्वपूर्ण नहीं कि वे ब्राह्मणों को दिशा दें। मैं तो उन्हें ब्राह्मण ही नहीं मानता।


भारतीय लोक रावण को हर विजया के दिन बुराई के प्रतीक के रूप में जलाता रहा है, और जलाता रहेगा। आज भी, और हजार वर्ष बाद भी... लोक किताबी विचारकों की बात नहीं सुनता, उसकी गोद में रोज हजारों चार्वाक, मार्क्स, कन्फ्यूशियस जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। लोक अपने ही गति से मुस्कुराता हुआ चलता रहता है। यही भारत है...

 



.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

24 October 2020

नवदुर्गा पर शुभकामनाएँ

जो खुद गढ़ती है रूप हमारा,
उस माँ का रूप कौन गढ़े....


नवरात्रि पर्व की मंगलकामना 







#हिन्दी_ब्लॉगिंग

23 October 2020

लाल किला नहीं लाल कोट कहिए

लाल किला नहीं लाल कोट था जिसे शाहजहां ने नहीं राजपूत राजा अनंगपाल तोमर द्वितीय ने बनवाया था। वास्तव में 7360 में दिल्ली में तोमर राजवंश की स्थापना अनंगपाल सिंह तोमर प्रथम नाम के राजा द्वारा की गई थी। पांडवो के वंशज चंद्रवंशी क्षत्रिय इसी तोमर वंश में आगे चलकर 1051 ईस्वी से 10810 तक अनंगपाल सिंह तोमर द्वितीय नाम के प्रतापी शासक ने शासन किया। इसी शासक ने अपने शासनकाल में 1060 ईस्वी के लगभग लाल कोट नाम का किला बनवाया।


तारीखे फिरोजशाही के पृष्ठ संख्या 160 (ग्रन्थ 3) में लेखक लिखता है कि सन 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकर दिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल ( लाल प्रासाद/ महल ) की ओर बढ़ा और वहाँ उसने आराम किया।


अकबरनामा और अग्निपुराण दोनों ही जगह इस बात का वर्णन है कि महाराज अनंगपाल ने ही एक भव्य और गौरवशाली दिल्ली का निर्माण करवाया था।




दिल्ली के लालकिले को देखते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वहाँ पर एक विशेष महल में सुअर अर्थात वराह के मुंह वाले चार नल अभी भी लगे हुए हैं। इससे भी पता चलता है कि यह किसी हिंदू शासक द्वारा बनवाया गया ही लगता है क्योंकि सुअर को कोई भी मुस्लिम शासक अपने यहाँ पर इस प्रकार सम्मानपूर्ण स्थान नहीं देता।


शाहजहाँ से 250 वर्ष पहले ही 1398 ईस्वी में एक विदेशी तुर्क आक्रमणकारी जेहादी तैमूरलंग ने भी पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया है। उसने अपने विवरण में जामा मस्जिद को काली मस्जिद के नाम से पुकारा है जबकि आज के इतिहासकार इस जामा मस्जिद को भी शाहजहां द्वारा निर्मित बताते हैं। वास्तव में इसे काली मस्जिद कहे जाने का अर्थ यह था कि यहां पर हिन्दू देवी (काली) का मंदिर था। तैमूरलंग के विवरण से पता चलता है कि पुरानी दिल्ली को भी शाहजहां के द्वारा बसाया जाना कपोल कल्पना मात्र है। यद्यपि शाहजहां ने अपने शासनकाल में दिल्ली को शाहजहानाबाद का नाम देकर पुरानी दिल्ली को कब्जाने का प्रयास अवश्य किया था।



.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

22 October 2020

समोसे के स्वाद के लिए होती शैतानियाँ

शैतानियाँ, शरारतें कहीं से भी सीखनी नहीं पड़ती हैं. कोई सिखाता भी नहीं है. यह तो बालपन की स्वाभाविक प्रकृति होती है जो किसी भी बच्चे की नैसर्गिक सक्रियता के बीच उभरती रहती है. स्कूल में हम कुछ मित्रों की बड़ी पक्की, जिसे दांतकाटी रोटी कह सकते हैं, दोस्ती थी. कक्षा में एकसाथ बैठना. भोजनावकाश के समय एकसाथ बैठकर भोजन करना. आपस में मिल-बाँटकर भोजन करना. इस मंडली में एक मित्र मनोज के पिताजी घरेलू सामानों की एक दुकान थी. लगभग रोज शाम को मनोज का दुकान पर जाना होता था. जैसा कि बालसुलभ स्थितियों में होता है, उसके पिता लाड़-प्यार में यह कहते हुए कि शाम को दुकान के मालिक तुम हो, कुछ पैसे उसे दे दिया करते थे. हम मित्र भी दस-पाँच पैसे लेकर आया करते थे. आज की पीढ़ी को ये आश्चर्य लगेगा जिसको हजारों रुपये में जेबखर्च मिलता हो कि उस समय हम लोगों को पांच-दस पैसे कभी-कभी मिलते थे. ये आज आश्चर्य भले हो मगर उस समय किसी अमीर से कम स्थिति नहीं होती थी हम दोस्तों की. ऐसा रोज तो नहीं होता था पर जिस दिन ऐसा संयोग बनता था कि ठीक-ठाक मुद्रा जेब में आ गई तो सुबह की प्रार्थना के समय ही योजना बनाकर कक्षा में सबसे पीछे बैठा जाता था.

 

कक्षा में पीछे बैठने के अपने ही विशेष कारण हुआ करते थे. असल में स्कूल परिसर में या उसके आसपास किसी बाहरी व्यक्ति को किसी तरह का खाने-पीने का सामान बेचे जाने की अनुमति नहीं थी. स्कूल समय में किसी बच्चे को बाहर जाने की अनुमति नहीं थी ताकि स्कूल का कोई विद्यार्थी बाहर का कोई सामान न खा लें. इसको सख्ती से पालन करवाने के लिए भोजनावकाश के समय किसी न किसी शिक्षक की मुस्तैदी स्कूल के मुख्य गेट पर दिखाई देने लगती थी. ऐसे में हम दोस्त अपने खुरापाती दिमाग की मदद से कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग भागने के लिए किया करते थे. यह खुराफात भी स्कूल चलने के समय हुआ करती थी. उस समय कक्षाएँ चलने के कारण मुख्य गेट पर शिक्षकों की चौकस निगाहों में कुछ न कुछ ढील सी बनी रहती थी. इसके पीछे उनकी सोच ये हुआ करती थी कि बच्चे कक्षाएँ चलने के दौरान बाहर नहीं निकलेंगे और हम लोग किसी दिन इसी ढील का लाभ उठा लिया करते थे.

 

स्कूल के एकदम पास में एक छोटा सा होटल हुआ करता था, जिसे सभी अन्नू का होटल के नाम से जानते थे. उसके समोसे बहुत ही स्वादिष्ट होते थे. चूँकि भोजनावकाश में अध्यापकों की मुस्तैदी के कारण उन समोसों का स्वाद लिया जा संभव नहीं हो सकता था. ऐसे में कक्षा में सबसे पीछे बैठना समोसों तक पहुँच बनाने में सहायक हो जाता था. हम दोस्त आपस में पैसे इकट्ठे करके एक दोस्त को जिम्मेवारी देते समोसे लाने की. ज्यादातर इसके लिए रॉबिन्स को ही चुना जाता. वह कभी पानी पीने की, कभी बाथरूम जाने की अनुमति लेकर अन्नू के होटल तक अपनी पहुँच बनाता. और कभी-कभी बिना अनुमति के कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग किया जाता था. स्कूल का मुख्य द्वार लोहे की अनेक रॉड से मिलकर बना हुआ था, जिसमें से थोड़े से प्रयास के बाद हम बच्चे लोग आसानी से निकल जाया करते थे.

 

अन्नू के होटल तक झटपट जाने और फटाफट वापस आने की कला में माहिर रॉबिन्स अपनी नेकर की दोनों जेबों में कुछ समोसे भर कर कक्षा में दिखाई देने लगता. कक्षा में सबसे पीछे बैठी पूरी मित्र-मंडली अगले ही पल स्वादिष्ट समोसों का स्वाद ले रही होती थी. कक्षा में सबसे पीछे बैठने का मूल कारण स्कूल के मुख्य द्वार पर नजर रखना और फिर अपनी रणनीति में कामयाब होने के तत्काल बाद कक्षा में ही समोसे का स्वाद लेना रहता था. आज जब कभी रॉबिन्स के मिलने पर स्कूल की घटनाएँ, स्कूल के दोस्तों की चर्चा होती है तो वह बिना कहे नहीं चूकता है कि तुम लोगों ने हमें खूब दौड़ाया, हमारी जेबों में खूब तेल लगवाया. रॉबिन्स को इस कारण भी ये घटना और भी अच्छे से याद है क्योंकि आये दिन घर में उसकी इसी बात पर कुटाई हो जाया करती थी कि नेकर की जेबें तेल से गन्दी कैसे हो जाती हैं.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

21 October 2020

मुँह में चाँदी की चम्मच का सवाल

इधर बहुत लम्बे समय से विचार बन रहा था कि अपने ब्लॉग पर राजनीतिक, सामाजिक विवादों वाली पोस्ट नहीं लिखेंगे. इस ब्लॉग पर अब अपने जीवन की घटनाओं को, संस्मरणों को लिखेंगे. सामाजिक, राजनैतिक विषयों से सम्बंधित विवादित पोस्टों को लिखने का, उन पर विमर्श करने का कोई अर्थ समझ नहीं आ रहा है. इधर लोग अपने बनाये खाँचों में रहने के आदी होते जा रहे हैं. वे जो कह-कर रहे हैं, वही सही है, शेष गलत है. इस मानसिकता के चलते आपसी विद्वेष बढ़ने के और कुछ नहीं हो रहा है. दो-तीन दिन से अपने संस्मरण लिखने का विचार कर रहे थे मगर कुछ समझ नहीं आ रहा था. आज अचानक अपनी ही एक पुरानी पोस्ट नजर आ गई. उसी को फिर से आप सबके बीच कुछ संशोधनों के साथ लगा रहे हैं.


चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना बचपन में इस वाक्य को जब भी पढ़ते, सुनते थे तो सोचा करते थे कि एक बच्चा कैसे इतनी बड़ी चम्मच लेकर पैदा होता होगा? हालांकि उस समय तो बच्चों के पैदा होने की प्रक्रिया ही हम लोगों की समझ से परे थी, कोई आज के बच्चे तो थे नहीं कि सब कुछ टी0वी0 पर, इंटरनेट पर दिखता हो। धीरे-धीरे अक्ल आई और उक्त वाक्य का सही अर्थ समझा। उस छुटपन में भी पिताजी के साथ, कभी अपने बाबाजी के साथ साइकिल पर बैठ कर स्कूल जाते हुए शहर में शान बघारतीं एक दो मोटरगाड़ियों को देखकर, कुछेक स्कूटरों को फरफराते देखकर लालच सा आता।




उन्हीं दिनों एक बड़ी ही रोचक घटना हुई जिसको लेकर आज तक परिवार में सभी हँसी-मजाक कर लेते हैं। हमारे मकान मालिक बहुत बुजुर्ग थे और उनके कोई सन्तान भी नहीं थी। सम्पन्नता के साथ-साथ उनको कंजूसी भी काफी सम्पन्नता में प्राप्त हुई थी। उनके पास उस समय एम्बेसडर कार थी, पूरे मुहल्ले में इकलौती कार। वह कार हम बच्चों के लिए बड़ी ही कौतूहल की वस्तु थी। अपने दोस्तों के साथ स्कूल में इसी बात पर रोब झाड़ लिया करते थे कि हमारे वकील बाबा के पास कार है। (उन मकान मालिक को जो कि एडवोकेट थे, बुजुर्ग होने के कारण हम बच्चे बाबा कहते थे) पता नहीं अपनी वृद्धावस्था के कारण, कंजूसी के कारण या फिर किसी पर भी विश्वास न करने के कारण जब उनको लगने लगा कि अब कार चलाना उनकी अवस्था के अनुरूप नहीं रहा तो उन्होंने उस कार को बेच दिया। बाबा अपनी कार स्वयं ही चलाते थे कभी कोई ड्राइवर नहीं रखा। कार बेच कर एक साइकिल खरीद ली।


इस घटना की घर में, मुहल्ले में बड़ी ही चर्चा हुई कि चचा को कंजूसी बहुत चढ़ी है, वृद्ध हो रहे हैं ऐसे में साइकिल चलायेंगे। अरे! एक ड्राइवर ही रख लेते, पैसे की कौन सी कमी है आदि-आदि बातें हम बच्चों के कानों में पड़ती ही रहतीं। हम छोटी बुद्धि के बालक कुछ समझ में तो आता नहीं था कि आखिर ये चक्कर क्या है? समझ कुछ आता नहीं बस ये ख़राब लगता कि अब कार में घूमने को नहीं मिलेगा।


धन, सपत्ति, पद, प्रतिष्ठा से इतर एक दिन हमने अपनी अम्मा से कहा जैसे वकील बाबा ने अपनी कार बेचकर साइकिल खरीद ली है क्या वैसे पिताजी अपनी साइकिल बेचकर कार नहीं खरीद सकते? अम्मा हँस दीं और प्यार से सिर पर हाथ फेरकर बोलीं अब तुम ही कार खरीदना और हम दोनों को घुमाना।


हम तो भौचक्के से रह गये थे कि जो सवाल हमने पूछा अम्मा ने उसका उत्तर तो दिया नहीं हमारे सिर पर एक काम और बता दिया। अम्मा की बात हमारे दिमाग में घूमती रही, आज भी घूमती है। पिताजी तो हमें छोड़कर चले गए, उनको कार से घुमाने का सपना हमारे लिए एक सपना ही रह गया। हालाँकि हम आज भी कार न ले सके। ऐसी स्थिति जो हमने बचपन में देखी थी और आज समाज में देखते हैं तो बचपन में सुने-पढ़े उस वाक्य का अर्थ समझ आता है। आज कुछ लोगों को देखने पर पता चलता है कि चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना किसे कहा जाता है। एक तरफ युवा वर्ग है जो अपनी बेकारी से, घर-परिवार के भरण-पोषण की समस्या से जूझ रहा है और एक तरफ वो युवा वर्ग है जो अपने मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर घूम रहा है, अपने बाप-दादा की, अपनी पुश्तैनी संपत्ति पर सिर्फ ऐश कर रहा है। एक तरफ ऐसे युवा हैं जो अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए किसी का वरदहस्त चाहते हैं और दूसरी ओर ऐसा युवा वर्ग है जिसकी चाटुकारिता में बड़े-बड़े अपने को धन्य समझ रहा है। देश के सर्वोच्च पद के लिए एक युवा का नाम उसकी काबिलियत के कारण नहीं मुँह में दबी चाँदी की चम्मच के कारण ही तो आ रहा है।


ऐसे में खुद से ही एक सवाल करते हैं और खामोश रह जाते हैं कि क्या देश का हर बच्चा चाँदी की चम्मच मुँह में दबाकर पैदा नहीं हो सकता है?


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

18 October 2020

भ्रमों का टूटना आवश्यक है

व्यक्तित्व विकास के लिए भ्रमों का टूटना आवश्यक होता है. यदि ऐसा नहीं हो रहा तो व्यक्ति लगातार भ्रम में जीते हुए अपना विकास-पथ नहीं चुन पाता है. भ्रमों का टूटना उसे जीवन की, समाज की सत्यता से परिचित करवाता है.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

16 October 2020

निजी महाविद्यालयों की प्रवेश घपलेबाजी

बीए प्रथम वर्ष के प्रवेश को लेकर जनपद जालौन के कई निजी महाविद्यालयों द्वारा किये जा रहे घोटाले आज हमारे संज्ञान में आये। प्रवेश सम्बन्धी सूची जो विश्वविद्यालय द्वारा जारी की जाती है, के बच्चों को उनके मोबाइल पर फोन करके उनका आधार नम्बर ले लिया जा रहा है। इसके लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। आधार नम्बर प्राप्त करने के बाद सम्बन्धित विद्यार्थी की सीट इन निजी महाविद्यालयों द्वारा कंफर्म करके लॉक कर दी जा रही है। इससे विद्यार्थी कहीं दूसरे महाविद्यालय में प्रवेश न ले सकेगा।

आज ऐसे कुछ विद्यार्थियों ने सम्पर्क किया जो प्रवेश फॉर्म, फीस आदि गांधी महाविद्यालय में जमा कर चुके हैं पर उनकी सीट इंटरनेट की समस्या से कंफर्म न की जा सकी। ऐसे कुछ विद्यार्थियों की सीट निजी महाविद्यालयों द्वारा कंफर्म करके लॉक की जा चुकी है। ऐसा होने पर ये विद्यार्थी गांधी महाविद्यालय में अपनी सीट कंफर्म नहीं करवा पा रहे। सम्बंधित महाविद्यालयों के प्रबंध तंत्र को इस तरह के घपले से परिचित करवा कर उन विद्यार्थियों की सीट खुलवाने के लिए कहा जा चुका है। विद्यार्थियों और छात्र नेताओं ने दो दिन में इस मामले का निस्तारण न होने पर निजी महाविद्यालयों के खिलाफ कानूनी कदम उठाने की बात कही है।

++

(निजी महाविद्यालयों का नाम अभी इसलिए सार्वजनिक नहीं किया जा रहा क्योंकि उनके प्रबंध तंत्र की ओर से इस मामले को हल करने का आश्वासन दिया गया है।)

 

.

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

15 October 2020

गंगा-जमुनी संस्कृति का संकुचित ताला खोलो अब

इधर तनिष्क का एक विज्ञापन देखने को मिला और उसका विरोध भी साथ-साथ दिखाई देता रहा. विज्ञापन की अच्छाई-बुराई को एक किनारे लगा दिया जाये तो एक बात आज तक समझ नहीं आई कि समाज में कुछ लोगों को ये कीड़ा कहाँ से काट लेता है कि वे गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों की वकालत शुरू कर देते हैं? क्या हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र के लिए आवश्यक है कि दोनों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता रखा जाये? यदि ऐसा करना आवश्यक है तो फिर रोटी-बेटी का रिश्ता बनाने में बेटी सदैव हिन्दू की ही क्यों नजर आती है? ये तनिष्क का विज्ञापन हो या फिर होली का कोई विज्ञापन, सभी जगह हिन्दू बेटी ही निशाने पर रखी जाती है. आखिर तनिष्क का ये विज्ञापन मुस्लिम को लेकर बनाया-दिखाया जाना अनिवार्य था तो उन्हीं के रीति-रिवाजों, चाल-चलन के साथ भी तो बनाया जा सकता था. उनकी मजहबी मान्यताएँ भी विज्ञापन में दिखाकर सोने का, ज्वेलरी का प्रचार किया जा सकता था, मगर ऐसा नहीं किया गया.



ये आज से नहीं, अचानक से नहीं बल्कि बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत होता आ रहा है. इसे भी विवाद का विषय बना दिया जाता है मगर आये दिन अब घटनाएँ सबूत के साथ सामने आ रही हैं जहाँ कि हिन्दू बेटी पहले किसी मुस्लिम लड़के के प्यार में पागल हो जाती है फिर वो धर्म परिवर्तन करके निकाह करती है. कालांतर में उसके शोषण के वीडियो सोशल मीडिया में दिखाई देने लगते हैं. किसी-किसी खबर में, घटना में बेटी की लाश भी मिलती है. आखिर ये क्या है, क्यों है? यह बात किसी समय में आतंकियों के सन्दर्भ में कही जाती थी कि मुसमलानों को आतंकी के रूप में ही क्यों देखा जाता है? इसके जवाब के रूप में यह आम धारणा बनी हुई थी कि भले ही हर मुसलमान आतंकी नहीं मगर पकड़े जाने वाला हर आतंकी मुस्लमान ही निकलता है. इधर आतंक का ये नया चेहरा लव जिहाद के रूप में सामने आया है.


समझ नहीं आता कि शासन-प्रशासन कहाँ तक, किस बात की निगरानी करे, किस-किसके पीछे पहरेदारों की तरह भागती रहे. ऐसी किसी भी मानसिकता के लिए, किसी भी घटना के लिए परिवार वाले, समाज के लोग भी जिम्मेवार हैं. आखिर क्यों एक परिवार अपने बच्चों के चाल-चलन, उनकी मानसिकता पर नजर नहीं रख पा रहा है? आखिर क्यों किसी हिन्दू परिवार में उनके बच्चों में उनके धर्म, संस्कृति, सभ्यता के प्रति सकारात्मक वातावरण देखने को नहीं मिल रहा है? क्यों हिन्दू परिवारों के बच्चे लगातार अपनी धार्मिक मान्यताओं से विमुख होते जा रहे हैं? इन सवालों को समाज में, अपने परिवार में परखने की आवश्यकता है. ये विज्ञापन हो अथवा फ़िल्में, कोई कहानी हो या फिर किसी भी तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण सभी के पीछे कोई कुत्सित मानसिकता काम कर रही है. इस मानसिकता का एकमात्र उद्देश्य हिन्दू धर्म का मखौल बनाना, उसकी जड़ों को खोखला करना ही है.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग