16 July 2018

नकारात्मकता को त्याग कर ही होगा विकास


गणितीय नियमों के अनुसार दो ऋण मिलकर भले ही धन बना देते हों मगर जीवन में एक भी ऋण परेशानी पैदा कर देता है। यहाँ ऋण का तात्पर्य किसी तरह के आर्थिक क़र्ज़ लेने से नहीं वरन सोच में, कार्य में, रहन-सहन में, बातचीत में आती जा रही नकारात्मकता से है। वर्तमान में समाज में बहुतायत में नकारात्मकता देखने को मिल रही है। परिवार के स्तर से लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नकारात्मकता विभिन्न चरणों में, विभिन्न स्तरों में देखने को मिल रही है। काम करने का ढंग, जीवन-शैली, सोचना-समझना, तर्क-वितर्क, सामाजिक सरोकार आदि-आदि में नकारात्मकता परिलक्षित हो रही है। लगातार विकासोन्मुख होता इन्सान उसी के सापेक्ष नकारात्मक होता जा रहा है। ऐसा लगने लगा है जैसे इन्सान नकारात्मकता में ही अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। इस नकारात्मक सोच के पीछे खुद इन्सान की ही बहुत बड़ी भूमिका है। किसी भी तरह की जरा सी परेशानी को, छोटे से कष्ट को, किसी छोटी सी घटना को वह अपने दिल-दिमाग में इस कदर बैठा लेता है कि उसके सापेक्ष सम्पूर्ण जीवन का निर्धारण करने लगता है, उन्हीं घटनाओं के सन्दर्भ में आने वाले समय की सफलताओं-असफलताओं को निर्धारित करने लगता है। अतीत की समस्याओं, परेशानियों, कष्टों को वर्तमान अथवा भविष्य के साथ जोड़कर कार्य करने से जहाँ एक तरफ कार्य-क्षमता प्रभावित होती है वहीं दूसरी तरफ अन्य विकासात्मक कार्यों में भी व्यवधान पड़ता है।


असल में किसी भी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, नकारात्मकता उसकी सोच पर निर्भर करती है। यह भी सच है कि परिस्थितियाँ भी किसी न किसी रूप में मनुष्य के सोचने-समझने को प्रभावित करती हैं किन्तु इसके बाद भी उससे बड़ा सच यह है कि यदि मनुष्य अपने आपको स्थिर रखे, संयमित रखे, नियंत्रित रखे तो निसंदेह वह अपनी सोच को भी नियंत्रित कर सकता है। इसी सोच के द्वारा वह अपने आपको परिस्थितियों से बाहर निकाल पाने में सक्षम होता है। देखा जाये तो किसी के भी जीवन में सकारात्मकता हो या फिर नकारात्मकता, वह कहीं बाहर से नहीं आती है। ये उसकी सोच और उसके बाद के क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि नकारात्मकता आने पर या फिर लगातार बढ़ते जाने पर व्यक्ति के स्वभाव-व्यवहार में निराशा, हताशा, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, उदासी, तनाव आदि साफ़-साफ़ परिलक्षित होने लगते हैं। इसके चलते उसका व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है। यदि उसके द्वारा बहुत जल्दी अपने इस स्वभाव पर, अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं किया जाता है, अपनी नकारात्मकता पर अंकुश नहीं लगाया जाता है तो उसके स्वभाव में दिखने वाले नकारात्मक लक्षणों की तीव्रता बढ़ती जाती है। इसके चलते वह अपने परिजनों, सहयोगियों, सामाजिक क्रियाकलापों में तन्हाई का, अकेलेपन का अनुभव करने लगता है। इसके साथ-साथ ऐसे व्यक्तियों में प्रत्येक कामों में, प्रत्येक गतिविधियों में नकारात्मकता ही नजर आने लगती है। उसकी आँखों के सामने से गुजरने वाली किसी भी गतिविधि में दोष ही नजर आने लगता है। उसके सामने वाले सफल व्यक्ति के व्यक्तित्व में भी खोट नजर आने लगती है।

ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति के जीवन में आई नकारात्मकता को दूर नहीं किया जा सकता है। चूँकि यह स्थिति विशुद्ध सोच पर, मानसिकता पर आधारित है, इस कारण इससे छुटकारा भी पाया जा सकता है। नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले तो किसी भी व्यक्ति को अपने विश्वास को, अपनी सोच को कमजोर नहीं मानना चाहिए। आत्मविश्वास को सर्वोच्च स्तर तक बनाये रखने वाले व्यक्ति किसी भी तरह की नकारात्मकता को अपने आसपास फटकने भी नहीं देते। ऐसे व्यक्ति जिनको छोटी-छोटी समस्याओं, परेशानियों के चलते नकारात्मक विचार आने शुरू हो जाते हैं उन्हें सदैव ऐसे लोगों से मिलने से बचना चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातों को प्रश्रय देते हैं, उन्हें बढ़ावा देते हैं। व्यक्ति को किसी भी स्थिति में अपना नियंत्रण न खोते हुए इस पर अमल करना चाहिए कि मैं ऐसा कर सकता हूँ। अक्सर देखने में आता है कि व्यक्ति आपसी वार्तालाप में नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करता है, अपने साथ होने वाले कष्ट को, दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करता है, उसे ऐसा करने से बचना चाहिए। सकारात्मक शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए। इसके साथ-साथ जीवन को निरुद्देश्य समझकर गुजारने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अपना महत्त्व है और वह उसी के अनुसार इस समाज में अपना योगदान दे रहा होता है। समाज में अपना योगदान से रहे ऐसे लोगों को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए साथ ही अपने किसी शौक को भी स्थापित करने की आवश्यकता है। बहुधा देखने में आता है कि व्यक्ति लगातार कार्य करने के बाद भी समाज में, परिवार में उस प्रस्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है जिसका हक़दार वह खुद को समझता है। इसके चलते भी उसमें नकारात्मक सोच का जन्म होने लगता है। ऐसे व्यक्तियों को अपने किसी न किसी शौक के द्वारा अपने व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास करना चाहिए।

गणितीय नियमों की तरह सामाजिक जीवन में भी नकारात्मक को सकारात्मक में बदला जा सकता है। इसके लिए मनुष्य को अपने कार्य से संतुष्टि, अपनी सोच में विश्वास, अपने रहन-सहन में नियंत्रण, अपने जीवन को उद्देश्यपरक बनाये रखना चाहिए। याद रखना होगा कि मनुष्य की सकारात्मकता ही मनुष्य को सफलता प्रदान करवाती है, उसे मंजिल तक ले जाती है, समाज को दिशा प्रदान करती है।


14 July 2018

प्यार से उनको मनाने हो रही है बारिश


बादलों का संग निभाने हो रही है बारिश,
जाने किस-किस को भिगोने हो रही है बारिश।

मन-मयूर नाचता है दिल कि कोयल कूकती,
प्रेम की सरगम सजाने हो रही है बारिश।

देख तेरे ही शहर में एक तन्हा हम ही हैं,
और सबका दिल बहलाने हो रही है बारिश।

लग के गले ख़ामोश दुनिया से बेख़बर बैठे रहे,
प्रेम का अंकुर खिलाने हो रही है बारिश।

रूठ कर बैठे हैं जो इक ज़रा सी बात पर,
प्यार से उनको मनाने हो रही है बारिश।

देख कर दर्द उसका आँख कोई नम न हो,
उसके अश्कों को छिपाने हो रही है बारिश।

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
13-07-2018

11 July 2018

ख़ामोश लबों के पीछे अफ़साना छिपाए हैं


मुद्दतों से जिन्हें सीने में दबाए हैं,
बदली ने बरस वो दर्द जगाए हैं।

देखने की, न दिखने की अदा उनकी,
और ख़ुद को चिलमन में छिपाए हैं।

ख़ामोश मुहब्बत जब भी उनके लबों पे सजी,
पूछने पर उसे वो ग़ज़ल बताए हैं।

बेधड़क लिख मेरा नाम मिटाते भी नहीं,
उँगली क़लम पानी को काग़ज़ बनाए हैं।

दिल मेरा तबसे दिल जैसा नहीं रहा,
जबसे उनके दिल से दिल लगाए हैं।

आँखों की शोख़ी, गालों की सुर्खी बताती है,
ख़ामोश लबों के पीछे अफ़साना छिपाए हैं।

09 July 2018

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आशीर्वाद के आँचल में बढ़ती पवित्र यात्रा


पेट भरो आन्दोलन की संकल्पना के साथ डॉ० राजीव श्रीवास्तव ने एक पुनीत कार्य आरम्भ किया अनाज बैंक का. जैसा सुनने में लगा ठीक वैसा ही एहसास देखने में भी होता है. बैंक जैसी प्रक्रिया, बैंक जैसा लेन-देन, बैंक जैसा प्रबंधन, बैंक जैसा दस्तावेजीकरण. आम बैंकों और इस बैंक में महज इतना अंतर है कि यहाँ समस्त लेनदेन अनाज के रूप में होता है न कि किसी तरह की मुद्रा के रूप में. इस बैंक में खाताधारक दो तरह के हैं. एक वे जो अनाज बैंक से मदद पाते हैं और एक वे जो अनाज बैंक में अपना खाता खुलवाकर उसमें किसी न किसी रूप में सहयोग दिया करते हैं. यहाँ किसी न किसी रूप से तात्पर्य आर्थिक नहीं वरन अनाज के रूप में ही है. कभी अनाज के रूप में, कभी आटा के रूप में, कभी दालों के रूप में तो कभी चीनी आदि के रूप में यहाँ सहयोगकर्ता अपना योगदान जमा करते हैं. पेट भरो आन्दोलन के द्वारा स्थापित अनाज बैंक ने संकल्प लिया कि कोई भी भूखा न सोये और यह बैंक इस संकल्प को पूरा करने के लिए दत्तचित्त है.


डॉ० राजीव श्रीवास्तव के अनाज बैंक, जो विश्व में अपनी तरह का पहला बैंक है, से प्रेरित होकर बुन्देलखण्ड का पहला अनाज बैंक जनपद जालौन के उरई में खोला गया. इस अनाज बैंक की उरई में स्थापना, सञ्चालन का विशेष रूप से श्रेय डॉ० अमिता सिंह जो एक महिला महाविद्यालय की प्राचार्य हैं, को जाता है. नवम्बर 2017 से आरम्भ बुन्देलखण्ड के अनाज बैंक ने नियमित रूप से अनाज बैंक की संकल्पना को आगे बढ़ाया है. प्रतिमाह दो बार लाभार्थी महिलाओं को अनाज वितरण करते अनाज बैंक से बहुत से लोग जुड़े और बहुत से लोगों ने जुड़ने की इच्छा व्यक्त की. वैसे भी समाज में भूखे को रोटी, प्यासे को पानी देने की अपनी पावन मान्यता है. इस पावन मान्यता में यदि सार्थकता जुड़ जाए, निस्वार्थ भावना जुड़ जाए तो सबकुछ और सहज-सरल लगने लगता है. इस सहज-सरल के बीच समर्पण, सेवाभावना, लगनशीलता उरई के अनाज बैंक से जुड़े लोगों में दिख रही थी मगर वाराणसी से आई केन्द्रीय टीम की कार्यशीलता को देखकर लगा कि यदि सम्पूर्ण देश में चंद लोग ही इस मानसिकता के हो जाएँ तो कोई भी कहीं भूखा न रह सकेगा.

अनाज बैंक, भारत की प्रबंध निदेशक अर्चना भारतवंशी के निर्देशन में केन्द्रीय टीम ने आकर न केवल बुन्देलखण्ड के अनाज बैंक का निरीक्षण किया वरन उसकी कार्यप्रणाली को और आधुनिक बनाया. इन सबके बीच अर्चना भारतवंशी के साथ आये सदस्यों - दीपाली भारतवंशी, इली भारतवंशी, तंजीन भारतवंशी की कार्यक्षमता, कार्यकौशल देखकर लगा कि यदि व्यक्ति का उद्देश्य पावन है, निस्वार्थ है तो वह स्वतः ही उसके कार्य से परिलक्षित होता है. अल्प आयु में सामाजिक सरोकारों से तादाम्य स्थापित करना, परोपकार को सर्वाधिक उच्च स्थान पर स्थापित करना, अनथक रूप से अपने-अपने कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ संपन्न करना अचानक ही नहीं आता. खुद में ईमानदारी का आयाम स्थापित करके, समाज के गरीब, मजबूर, असहाय लोगों को अपने परिवार का हिस्सा समझना, उनको की जाने वाली मदद को अहंकार नहीं वरन उनके प्रति अपना कर्तव्यबोध समझना ही वह चारित्रिक विशेषता है जो इन सदस्यों को सबसे अलग खड़ा करती है. यकीनन हम सब भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में सामाजिक कार्यों में अपना सहयोग देते हैं. समाज के गरीब, मजबूर वर्ग की सहायता करते हैं. यही मानसिकता उन सभी को एकसाथ जोड़ती है जो समाज में पुनीत कार्य करना चाहते हैं. बुन्देलखण्ड अनाज बैंक से जुड़े लोग भी कहीं न कहीं केन्द्रीय टीम के साथ तादाम्य स्थापित करते नजर आये. अपने आप ही एक साहचर्य स्थापित होता नजर आया. इस सम्बन्ध में, सुयोग में, आपसी मानसिक धरालत के एक होने के पीछे उस विराट व्यक्तित्व का असर अवश्य ही होगा जिसने किसी आपातकाल में देश से बाहर जाकर भारतवासियों को एकजुट करने का कार्य किया था. देश को अंग्रेजों से मुक्त करवाने के लिए मैराथन प्रयास किया था. परम पावन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आशीर्वाद के आँचल में अनाज बैंक की, विशाल भारत संस्थान की पवित्र यात्रा सतत आगे बढ़ती रहे, यही कामना है.

07 July 2018

ख़ामोशी


एक निस्तब्धता
हम दोनों के बीच
सदियों से छाई है।
हम दोनों साथ चलते रहे
जाने कब से मगर
इस मौन को न तोड़ सके।
वह बात
जो मैं सुनना चाहता था
तुम्हारी आवाज़ में,
उसे नज़रों की भाषा में
पढ़ सके।
हमारी बात दिल की
दिल में ही रह गई,
एक खामोश मौन की
गहराइयों में बह गई।
तुम्हारे लबों पर,
तुम्हारे विचारों की लय पर
पहरा लगा था समाज का,
परदा पड़ा था
शर्म और लाज़ का,
पर मैं...मैं क्यों मौन रहा?
क्यों खामोशी का दामन थामे
यूँ चलता रहा?
हवा के हर झोंके ने,
बादलों की हर अँगड़ाई ने
छूकर पास से,
सिरहन मचाकर तन में
मौन को तोड़ना चाहा,
पर....
सफर यूँ ही खामोश कटता रहा।
आज फिर तुम्हारी नज़रों ने
संग ले इस सुहाने मौसम का
कुछ पूछना चाहा,
खामोश दर्प को तोड़ना चाहा।
नज़रों ने
नज़रों की निस्तब्धता को तोड़ा,
हम फिर भी
वैसे ही खामोश रहे,
नज़रों के सहारे ही
कुछ कहते रहे।
और चल पड़े अगले पल
वैसे ही खामोश, मौन,
निस्तब्धता लिए।
न पता कब तक
यूँ अनवरत,
शायद जनम-जनम तक,
इस जनम से उस जनम तक।

05 July 2018

अपराधियों के साथ हम सब भी दोषी हैं


हम सब नागरिक बहुत परेशान हैं. समाज में रोज ही बलात्कार की खबरें आ रही हैं. अब तो बच्चियों के साथ बलात्कार की खबरें आने लगी हैं. इन खबरों को पढ़कर, सोशल मीडिया पर देखकर खून खौल जाता है मगर बस उतनी देर ही खौलता रहता है जितनी देर तक हम सब अपना स्टेटस, कोई फोटो सोशल मीडिया पर शेयर नहीं कर लेते. जैसे ही ये सब किया, दो-चार-दस लाइक, कमेंट मिले बस खून का उबाल ठंडा पड़ जाता है. कुछ लोगों का खून ज्वालामुखी की तरह खौलता है, लावा फेंकता है पर तब तक ही ऐसा होता है जब तक कि वे मोमबत्ती न जला लें, किसी जुलूस में शामिल न हो लें, उसकी सेल्फी खींच कर सोशल मीडिया पर शेयर न कर लें. इतना करने के बाद खून खौलना बंद हो जाता है और खून की रवानी दूसरी दिशा में मुड़ जाती है. अब खून के खौलाव के बाद बने बादल दिमाग में चढ़ जाते हैं और फिर वे किस एक महिला, किसी एक बच्ची को नहीं देखते वरन सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं. दिमाग में चढ़े खून के बादल समग्रता में देखने लगते हैं. बस उनके बरसने की देर होती है. आखिर बरसने के लिए भी कोई जगह चाहिए, कोई अवसर चाहिए. इसी अवसर, इसी जगह के मिलते ही दिमाग में चढ़े बादल वैचारिकी के साथ बरस पड़ते हैं. सामाजिक दर्शन के साथ बरस पड़ते हैं.


इस समग्रता में समूचा समाज ख़राब लगने लगता है. समाज रहने लायक नहीं लगता. ये देश रहने लायक नहीं लगता. कुछ लोगों को देश में आपातकाल दिखाई देने लगता है. कुछ लोगों के लिए देश सांप्रदायिक हो जाता है. कुछ समाज में अराजकता का बोलबाला देखते हैं. कुछ हिंसात्मक समाज का स्वरूप देखने लगते हैं. इतना सब कुछ होने के बाद भी ऐसे लोग आराम से जीवन-यापन कर रहे होते हैं. इतनी भयानक स्थिति होने के बाद भी ऐसी सोच वालों का परिवार सुखद रूप में समाज के बीच रह रहा होता है. ऐसी सोच का प्रसार करने वाले ही खुलेआम मॉल में, बाजार में घूमते दिखाई देते हैं. न उनके साथ कोई छेड़छाड़ होती है, न उनका कोई मर्डर करता है, न उनके साथ कोई चोरी-चकारी होती है, न उनके साथ कोई हिंसा होती है, न उनके साथ कोई अराजकता होती है. इतने के बाद भी उनको समाज रहने लायक नहीं लगता है. खबरों में देखने-पढ़ने के बाद सोशल मीडिया पर सक्रियता दिखाने के बाद चैन की नींद सोने वालों के लिए ही ये समाज रहने लायक नहीं रहता है. ऐसे लोग ही इसका दुष्प्रचार करते नजर आते हैं. ऐसे विचारों का प्रसार करने वालों से पूछना चाहिए कि समाज में कितनी बार इनके परिवार को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा कि जिससे उन्हें लगा हो कि समाज अब रहने लायक नहीं? ऐसे लोगों से जानना चाहिए कि समाज में विपत्ति में फँसे कितने लोगों की इन्होंने मदद की है? इनकी राय इस पर भी प्राप्त करनी चाहिए कि जमीनी रूप से समाज को सुधारने के लिए इन्होंने कितना काम किया?

यहाँ यह कहने का अर्थ कतई नहीं है कि समाज में स्थितियाँ बेहतर हैं, सुखद हैं. यदि ऐसा होता तो हम सब रोज ही बलात्कार जैसी घटनाओं से दो-चार नहीं हो रहे होते. यदि समाज में सबकुछ सुखद ही होता तो बच्चियाँ दुर्दांत अपराधियों की हवस का शिकार नहीं बन रही होती. जिस तरह की आपराधिक घटनाएँ दिख रही हैं, उसके पीछे इसी तरह की मानसिकता के लोग भी जिम्मेवार हैं. अपराधी की मनोवृत्ति अपराध करने की होती है मगर उन व्यक्तियों की मनोवृत्ति कैसी होनी चाहिए जो अपने आपको समाज का जिम्मेवार नागरिक मानते हैं? क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि समाज में लगातार आ रही विसंगतियों के खिलाफ खड़े हों? क्या उनका फ़र्ज़ नहीं बनता कि आये दिन आँखों के सामने होने वाली आपराधिक घटनाओं का विरोध उनके द्वारा भी हो? ऐसे लोगों की स्थिति यह है कि विरोध तो दूर मौका पड़ने पर वे यह तक स्वीकारने को तैयार नहीं होते कि वारदात के समय वे वहां मौजूद थे. ऐसे में अपराधियों का हौसला तो बढ़ना ही है. यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो आप खुद महसूस करेंगे कि सड़क चलते हर इन्सान हत्या नहीं कर रहा है. सड़क चलता हर व्यक्ति बलात्कार नहीं कर रहा है. सड़क चलता हर इन्सान किसी का सामान नहीं चुरा रहा है. असल में ऐसा करने वाले अवसर की, जगह की, स्थिति की प्रतीक्षा में रहते हैं.

अपराधियों को ऐसी स्थिति, ऐसा अवसर वही लोग उपलब्ध कराते हैं जो इस समाज को अब हिंसात्मक, आपराधिक मान रहे हैं. जमीनी रूप में सजगता दिखाने के बजाय आलोचना करना सबसे ज्यादा आसान होता है. इस कारण से समाज का कथित बुद्धिजीवी वर्ग खुद को कमरे में बंद करके बैठा रहता है और अपराधियों को अवसर उपलब्ध करवाता रहता है. सत्य यह है कि अपराधी जबरदस्त तरीके से डरपोक किस्म का होता है और यही कारण है कि वे एक समूह में चलते हैं. रात के अंधियारे में चलते हैं. कानून से बचते फिरते हैं. इसके साथ-साथ यह और भी बड़ा सत्य है कि खुद को जिम्मेवार मानने वाला, बुद्धिजीवी मानने वाला नागरिक इनसे भी बड़ा डरपोक होता है. उसके एक इसी डरपोकपने के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और इसी कारण समाज में रोज ही आपराधिक घटनाएँ हो रही हैं.

04 July 2018

साइक्लॉनिक हिन्दू को समझना शेष है अभी


आज, 4 जुलाई, स्वामी विवेकानन्द की पुण्यतिथि. वे अपने ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों के लिए समूचे विश्व में प्रसिद्द हैं. उन्होंने अपने अल्प जीवन में जिस तरह का विराट स्वरूप प्राप्त कर लिया था, वैसा विरले ही कर पाते हैं. उनका आत्मविश्वास, उनकी संयमित जीवनशैली के कारण ही यह सब संभव हो सका था. यही कारण है कि उन्होंने अंतिम दिन भी अपनी दिनचर्या को बदला नहीं. उनके शिष्यों के अनुसार उन्होंने अन्तिम दिन (4 जुलाई 1902) को भी प्रात: ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली. बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनको मुखाग्नि दी गई. इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का भी अन्तिम संस्कार किया गया था. स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 को कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था. नरेंद्र पर अपने माता-पिता के धार्मिक, प्रगतिशील तथा तर्कसंगत व्यक्तित्व का प्रभाव रहा, जिसने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार प्रदान किया.


वे 25 वर्ष की अवस्था में ही संन्यास धारण करके पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा पर निकल गए. सन 1893 में शिकागो (अमरीका) में हो रही विश्व धर्म परिषद् में वे भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे. यूरोप-अमेरिका के लोग पराधीन भारतवासियों को हेय दृष्टि से देखते थे. उन लोगों ने प्रयास किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का अवसर न मिले. बाद में एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें बहुत कम समय दिया गया और इसी अल्प समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने वहाँ उपस्थित सभी विद्वानों को चकित कर दिया. इसके बाद तो पूरा अमेरिका उनका जबरदस्त प्रशंसक बन गया और वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया. उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया था. स्वामी विवेकानन्द का भारतीय दर्शन की शक्ति पर दृढ़ विश्वास था. उनका मानना था कि आध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा. स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं को गरीबों का सेवक माना और देश के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का सदा प्रयत्न किया.

महज 39 वर्ष के अल्प जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे. उनके दर्शन, कार्यों, व्याख्यानों को देखते हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं. 

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था कि उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे. हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था. वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा था - शिव!यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.

उनका दर्शन नितांत व्यावहारिक था. यही कारण था कि उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें. हिन्दू धर्म, दर्शन, आध्यात्म को मानने वाले विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे. इसी के चलते उन्होंने विद्रोही बयान कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये, भी दिया था. आज ऐसे विचार देना तो दूर, ऐसा सोच पाना खुद सरकार के लिए आसान नहीं है. देखा जाये तो यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था वरन यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी.


आज उनकी पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए उनके जीवन के अन्तिम दिन शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या करते समय उनके द्वारा उच्चारित कथन स्मरण हो आता है कि एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है. यह कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं है क्योंकि उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था. उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ. अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये, में इसकी प्रतिध्वनि स्पष्ट रूप से सुनाई भी देती है.

02 July 2018

समय से पहले बच्चों का वयस्क होना


आज खबर पढ़ने को मिली कि कानपुर में चार नाबालिगों ने चार साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक दुराचार किया. इन चारों नाबालिगों में से एक की उम्र बारह वर्ष बताई गई है जबकि अन्य तीन की उम्र छह वर्ष से दस वर्ष के बीच है. बच्ची के पिता द्वारा की गई रिपोर्ट के बाद उन चारों बच्चों को गिरफ्तार किया गया तो उन्होंने बताया कि एक पोर्न फिल्म देखने के बाद उन्होंने उसी का कृत्य उस बच्ची पर आजमाया. बच्चे सुधार गृह में भेज दिए गए हैं, ऐसी खबर है.


वैसे देखा जाये तो ये कोई पहली घटना नहीं है, इतने छोटी उम्र के बच्चों का सेक्स जैसे मामले में शामिल होना. इससे पहले भी सहमति वाली और रेप वाली कई घटनाएँ सामने आईं हैं. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर आये दिन इस तरह की फोटो, वीडियो सामने आते रहे हैं जिनमें छोटी कक्षाओं के बच्चे अपने गुप्तांग एक-दूसरे को दिखाते पकड़े गए हैं. ऐसी भी खबरें आपस में इधर से उधर होती रही हैं जिनमें लड़के-लड़कियाँ आपस में मम्मी-पापा का खेल खेलते पाए गए. इस खेल में उनके द्वारा सेक्स क्रियाएं भी संचालित करते हुए देखी गईं हैं. देखा जाये तो ये अकस्मात् नहीं होता है. इसके पीछे पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तंत्र काम करता है. संभव है कि संस्कृति के ठेकेदार इसे नकारने का काम करें मगर यदि गौर से देखा जाये तो सेक्स सम्बन्धी हरकतें बच्चों द्वारा बहुत छोटी वय से करते देखी जाती हैं. हमारे समाज में सेक्स का सन्दर्भ आज भी दो वयस्कों द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से लगाया जाता है. आज, इक्कीसवीं सदी के देश दशक से अधिक समय निकल जाने के बाद भी यौन शिक्षा का अर्थ दो विषमलिंगियों द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से लगाया जाता है. इसी तरह की संकुचित मानसिकता के चलते ही सेक्स को लेकर बहुत गलत, भ्रामक धारणाएँ समाज में फैली हुई हैं. बच्चों की कम उम्र की गतिविधियों को यदि गौर किया जाये तो विषमलिंगी बच्चे आपस में एक-दूसरे के गुप्तांगों को लेकर अचंभित होते हैं. लड़के-लड़कियों के गुप्तांगों में बचपन से ही जबरदस्त अंतर दिखाई देता है और बच्चों के लिए यह कौतूहल की स्थिति होती है. उस कम उम्र में उनके लिए यह अंतर सेक्स का पर्याय नहीं होता वरन आश्चर्य का विषय होता है. उनके द्वारा इस अंतर का कारण पूछे जाने पर अभिभावकों द्वारा सही उत्तर न दिया जाना भी आगे चलकर हानिकारक होता है.

बच्चों की बढ़ती उम्र और घर में उनका अकेलापन उन्हें विषमलिंगियों के शरीर के प्रति आकर्षित करता है. उस अंतर का भेद जानने को प्रेरित करता है, जिसे वे बचपन में नहीं जान सके थे. ऐसी स्थिति में उनको मदद पोर्न फिल्मों, उनके अभिभावकों द्वारा या परिवार के बड़े युगलों द्वारा असावधानीपूर्ण बनाये जा रहे शारीरिक संबंधों द्वारा मिलती है. देह के अंतर को वे ऐसे में देख-समझ लेते हैं और किसी दिन इसे खुद आजमाने के प्रयास में रहते हैं. इसके अलावा हम लोग अपने परिवारों में तीन-चार साल के बच्चों को उनके क्लास में पढ़ने वाले लड़के/लड़कियों के नाम पर चिढ़ाते हैं. उनके बॉयफ्रेंड का, गर्ल फ्रेंड का नाम पूछते हैं. और तो और उनकी शादी तक की बात भी करके उन्हें चिढ़ाते हैं. माता-पिता अपने छोटे बच्चों के सामने रोमांटिक मूड में बने रहते हैं. अक्सर बेपरवाह होकर बेपर्दा भी हो जाते हैं. बच्चे मासूमियत में भले होते हैं मगर ऐसे कृत्य के बारे में जानना चाहते हैं. ऐसा उनके लिए इसलिए भी गलत नहीं होता क्योंकि उनके मम्मी-पापा ऐसा कर रहे होते हैं. ऐसे में बच्चों द्वारा इस तरह का कृत्य मनोरंजन के स्थान पर अपनी जिज्ञासा का शमन करने जैसा होता है.

इसके अलावा एक बात और, आज जिस पोर्न साइट्स का, इंटरनेट के दुरुपयोग का हम सब रोना रो रहे हैं, यदि याद हो तो मोदी सरकार ने आने के कुछ समय बाद पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का निर्णय लिया था. उस समय समाज के कथित आधुनिकतावादी इस निर्णय के विरोध में उतर आये थे. उनका कुतर्क था कि अब सरकार निर्णय करेगी कि लोग क्या देखें क्या नहीं. सोचिये, आप क्या देख रहे और आपके बच्चे क्या देख रहे. आज हर हाथ में मोबाइल है, हर हाथ में इंटरनेट है तो हर हाथ में पोर्न है. बच्चों के माता-पिता जिस गोपन को पलंग के एक छोर पर संचालित करते हैं, बच्चे उसी गोपन का ज्ञान अपने हाथों में सहेजे मोबाइल के माध्यम से करने में लगे हैं. बस वे इसके प्रयोग के इंतजार में रहते हैं. जैसे ही वे इसे पाते हैं किसी न किसी रूप में उसका निदान कर लेते हैं. ऐसी एक-दो नहीं अनेक घटनाएँ हैं जहाँ नाबालिगों ने नाबालिग लड़की से सम्बन्ध बनाये हैं, रेप किया है. ये और बात है कि कानपुर की ये घटना पकड़ में आ गई और समाज के लिए आश्चर्यजनक बन गई है. हाथ में पकड़े मोबाइल से लेकर बेडरूम में सजे टीवी तक किसी न किसी रूप में आज के बच्चे सिर्फ और सिर्फ सेक्स देख रहे हैं, अश्लीलता देख रहे हैं. ऐसे में उन्हें समझाना कठिन है कि यह उनकी उम्र के लिए नहीं है. आइये, बस आधुनिकता का यह तमाशा देखिये क्योंकि हम सब भौतिकतावादी दौड़ में सबकुछ भुलाकर लगे हुए हैं.

01 July 2018

बलात्कारियों में डर-भय नहीं कानून का


दिल्ली गैंगरेप के बाद दिल्ली समेत देश के कई भागों में इन बलात्कारियों को फाँसी की सजा देने की माँग जोर पकड़ने लगी थी, ऐसा ही कुछ अब हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा के निर्धारण से देश में बलात्कारियों में डर व्याप्त हो जायेगा अथवा बलात्कार होने बन्द हो जायेंगे। याद होगा शायद सभी को कि धनञ्जय चटर्जी को बलात्कार के आरोप में ही फाँसी दी गई थी। क्या हुआ उसके बाद? क्या बदला उसके बाद? विगत कुछ माह से लगातार होती आ रही या कहें कि रोज ही होती आ रही बलात्कार की घटनाएँ चिंतित करने वाली हैं, विचलित करने वाली हैं। चिंता इसकी कि अब ऐसा लग रहा है कि समाज में महिलाएं सुरक्षित ही नहीं हैं और विचलित करने वाली घटनाएँ इसलिए क्योंकि बलात्कार की, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में अब बच्चियों को शिकार बनाया जाने लगा है। कभी लगता है कि जनता जाग रही है तो कभी लगता है कि वह एकदम भावशून्य पड़ी हुई है। प्रशासन-शासन की विफलता के बाद उसको चेताने के लिए, जगाने के लिए जनता का जागरूक होना आवश्यक है। इस जागरण में सिर्फ और सिर्फ फाँसी की माँग करना अकेले ही इस समस्या का समाधान नहीं।


बलात्कार के लिए फांसी की सजा की मांग करने के पूर्व हमें उन तमाम सारे कानूनों की ओर भी ध्यान देना होगा जिनके द्वारा किसी अपराध के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है। क्या उन तमाम अपराधों में कमी आई है अथवा वे अपराध होना बन्द हो गये है? पूर्वाग्रह दृष्टि न रखने वालों का एक ही जवाब इसके लिए होगा और वो भी न में। तमाम सारे वे अपराध आज भी तेजी से समाज में होते दिख रहे हैं, जिनके लिए सजा के रूप में फांसी की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा एक और तथ्य महत्वपूर्ण है कि यदि बलात्कार की सजा के रूप में फांसी को मुख्य रूप से स्वीकार कर लिया गया तो इसके कई दुष्परिणाम महिलाओं के प्रति ही खड़े होने की आशंका है। यह सर्वविदित है कि यदि किसी भी महिला से बलात्कार हुआ तो जाहिर है कि वह महिला किसी न किसी रूप में शारीरिक दृष्टि में उस बलात्कारी पुरुष से कमजोर साबित हुई है। इसके अलावा गैंग रेप के केस में तो जाहिर है कि उस महिला के साथ दुराचार करने वालों की संख्या एक से अधिक रही होगी। ऐसे में यदि बलात्कार की सजा फांसी हो जाती है तो बहुत हद तक सम्भावना है कि सम्बन्धित महिला को दुराचारी लोग जीवित ही न छोड़ें। आखिर उन बलात्कारियों को पहचानने वाला, उनकी शिकायत करने वाला, उनके विरुद्ध गवाही देने वाला यदि कोई होगा तो सिर्फ और सिर्फ वह महिला ही। ऐसे में उन दुराचारियों के द्वारा उसको जीवित छोड़ देने की सम्भावना न्यूनतम होने की आशंका है।

जनता जागरूक होकर सरकार को, प्रशासन को घेरने का काम करे। वह इसके लिए शासन-प्रशासन को विवश कर दे कि वह चुस्त-दुरुस्त होकर काम करे। यदि शासन-प्रशासन अपनी तरफ से चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था रखने के लिए तत्पर हो जाये तो परिणाम कुछ हद तक सुखद मिलने की सम्भावना है। यदि जागरूकता लोगों को सजग रहने के लिए दिखाई जाये तो महिलाओं को इस तरह से आये दिन दुराचारियों का शिकार न होना पड़े। यदि एकजुटता की स्थिति को अपराधियों में मन में खौफ पैदा करने के लिए दिखाई जाये तो पल प्रति पल ऐसी वीभत्स घटनाओं से हमें दो-चार नहीं होना पड़ेगा। दिल्ली कांड के बाद कानून बनाया गया मगर क्या हुआ उसका? इसी काण्ड के अपराधियों को अभी तक सजा नहीं दी जा सकी है। और तो और विपक्षी दल, वे चाहे कोई भी हों सब किसी न किसी बहाने सरकार पर हमला बोलने की मंशा बनाये रहते हैं। उनके कदमों से ऐसा लगता है जैसे उन्हें न महिलाओं से मतलब है, न बच्चियों से मतलब है, न ही अपराधियों से। वे सब महज अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आग तलाशते रहते हैं। यदि वाकई कानून का, किसी तरह की सजा का कोई डर-भय होता तो दिल्ली कांड के बाद भी देश के कई भागों में गैंगरेप के और मामले सामने नहीं आये होते।



30 June 2018

बंद आँखों ने मगर अफ़साना सारा कह दिया

जिंदगी का कारवाँ बनता रहा न पूरा हुआ,
साथ आये लोग बस एक तू न साथ था.

प्यार भी तूने दिया तुझसे ही नफरत मिली,
जो दिया तूने मुझे मेरे लिए अनमोल था.

आस तेरे आने की हम राह में बैठे रहे,
तू न आया था कभी और आज भी आना न था.

मौसमों ने रोज बदलीं रंगतें मेरे लिए,
और मैं अपनी ही बारिश में सदा भीगा रहा.

लब मेरे खामोश तूने अपने लब से कर दिए,
बंद आँखों ने मगर अफ़साना सारा कह दिया.

ले गया मुझको उड़ाकर फिर वो न जाने कहाँ,
तेरा रूप ले के आया झोंका इक यादों भरा.



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यह पोस्ट इस ब्लॉग की 1250वीं पोस्ट है.