31 मई 2026

आवश्यकता नीयत सुधारने की है

देश की सुरक्षा के लिए तत्पर रहने वाली वायु सेना को अब परीक्षार्थियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का जिम्मा भी सौंपा गया है. नीट परीक्षा प्रश्न-पत्र के लीक हो जाने के बाद पुनः आयोजित होने वाली नीट परीक्षा को पूर्णतः सुरक्षित बनाने के लिए सरकार भारतीय वायु सेना की मदद लेने पर विचार कर रही है. इस बार परीक्षा प्रश्नपत्रों को सामान्य परिवहन के स्थान पर वायु सेना के विमानों से केन्द्रों तक सुरक्षित ढंग से एयरलिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा गया है. इसे कुछ लोग भले ही परीक्षा के प्रति गम्भीरता के रूप में देखें किन्तु प्रथम दृष्टया यह हास्यास्पद प्रस्ताव ही कहा जाना चाहिए. समूची प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी तंत्र, नागरिकों के लिए यह एक तरह का शर्मनाक बिन्दु है जबकि देश की सुरक्षा करने वाली सेना अब परीक्षा प्रश्नपत्रों को इधर-उधर ले जाने का काम करेगी.

 

पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के, शिक्षा सम्बन्धी प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का सार्वजनिक हो जाना, उनकी गोपनीयता उजागर हो जाना एक आम चलन के रूप में उभर कर सामने आया है. किसी संक्रामक बीमारी की तरह यह एक परीक्षा से होते हुए दूसरी परीक्षा के लिए, एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए बढ़ती दिखने लगी है. परीक्षा प्रश्नपत्रों को सार्वजनिक करने का कार्य दो-चार व्यक्तियों द्वारा नहीं होता है बल्कि इसके पीछे एक तरह का सिंडिकेट काम करता है. भले ही किसी परीक्षा प्रश्नपत्र के सार्वजनिक होने की घटना को प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी कहा जाये मगर सोचने वाली बात ये है कि क्या इस तरह के काम बिना किसी संरक्षण के संभव हो सकते हैं? प्रश्नपत्रों के बनने से लेकर उनके प्रकाशन तक, उनको व्यवस्थित करने से लेकर परीक्षा केन्द्रों तक पहुँचाने तक का कार्य नितांत गोपनीयता के साथ पूरा किया जाता है. ऐसे में कैसे सम्भव है कि किसी बड़े रसूखदार के संरक्षण बिना प्रश्नपत्र बाजार में बिकते दिखाई देने लगें. प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा आयोजन तक की लम्बी प्रक्रिया में जरा सी चूक से परीक्षा आयोजित कराने वाली बड़ी-बड़ी एजेंसियों की गोपनीयता पर भले ही सवाल उठ रहे हों किन्तु ऐसा कार्य तंत्र के भीतर बैठे लोगों की सहायता के बिना हो ही नहीं सकता है. इस तरह के कृत्य करने वाले माफियाओं को विभिन्न प्रकार का राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण मिलता है.

 



इस पूरे संकट के उभरने के बाद कुछ निश्चित से कदम उठाये जाने लगते हैं. व्यवस्थागत सुधार के बजाय राजनीतिक खेल शुरू हो जाता है. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलने लगता है. विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार बताता है तो सत्तापक्ष इसे विरोधियों की साजिश कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है. सत्तापक्ष इसके साथ-साथ धरपकड़ करने की अपनी कार्यवाहियों को भी अंजाम देता रहता है. चार-छह छोटी मछली कहे जाने वाले व्यक्ति गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, पूछताछ का प्रक्रम शुरू हो जाता है और फिर सालों-साल चलने वाली कानूनी प्रक्रिया की आड़ में लोग असली मुद्दा ही भूल जाते हैं. इन सबके बीच राजनीतिक असंवेदनशीलता यह होती है कि ऐसे मामलों को चुनावी रैलियों में, भाषणों में अपने प्रचार का माध्यम बना लिया जाता है मगर इस समस्या के स्थायी समाधान पर कोई भी चर्चा नहीं करता है.

 

इस तरह के घटनाक्रमों में यदि सबसे ज्यादा नुकसान में कोई रहता है तो वह आम परीक्षार्थी होता है, उसका परिवार होता है. दिन-रात की तैयारी के बाद पेपर लीक होना, पुनः पेपर देने के दौरान आशंकित बने रहना परीक्षार्थियों के भविष्य को भी धुंधलके में रखता है. एक आम परिवार अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए अपना पेट काटकर उसे तैयारी करवाता है. कई परिवार तो अपनी जमीन गिरवी रख कर्ज लेते हैं. प्रश्नपत्र सार्वजनिक होने के कारण परीक्षा रद्द होने का अर्थ समय की बर्बादी मात्र नहीं बल्कि परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ का पड़ना होता है. अनेक परीक्षार्थी मानसिक तनाव में आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं. आज इक्कीसवीं सदी में पहुँच जाने के बाद भी, तकनीक के लगातार विकास करने के बाद भी, उपग्रहों के द्वारा पल-पल की खबर रखने के बाद भी आज के युवाओं को सुरक्षित और पारदर्शी माहौल देने में नाकामी हाथ लग रही है.

 

तकनीक के इस दौर में किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र सुरक्षित न रख पाना हमारी तकनीकी और प्रशासनिक तंत्र  की बड़ी विफलता तो है ही साथ ही नागरिक अनुशासन की भी असफलता है. सोचने वाली बात ये है कि प्रश्नपत्र सार्वजनिक करने वाला सिंडिकेट ऐसा काम किसके लिए करता है? क्या ऐसा काम किसी राजनेता को चुनाव जिताने के लिए किया जाता है? क्या प्रश्नपत्र लीक किये जाने के पश्चात् अर्थव्यवस्था में तेजी आ जाती है? क्या इससे विदेश-नीति में किसी तरह का लाभ हो जाता है? प्रश्नपत्र सार्वजनिक करके का कार्य उन्हीं परीक्षार्थियों के लिए किया जाता है जिनको परीक्षा देनी होती है. प्रश्नपत्र भी उन्हीं के हिस्से में आता है जिनके अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम धनराशि सम्बंधित सिंडिकेट तक पहुँचाई गई होती है. ऐसे में यदि राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था को दोषी माना जाता है तो नागरिकों को भी पूर्णतः दोष-मुक्त नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में बाहरी आवरण को मजबूत और तकनीकयुक्त बनाने से कहीं ज्यादा कारगर होगा तंत्र के भीतर की व्यवस्था को मजबूत करना, उस पर सशक्त-सजग निगाह रखना. देखा जाये तो जितनी बड़ी समस्या परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों के सार्वजनिक होने की है, परीक्षाओं की गोपनीयता भंग होने की है उससे बड़ी समस्या उस नीयत की कमी का होना है जो भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना चाहती है. राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक रूप से कहीं से भी अब जिम्मेदारी भरा ऐसा प्रयास नहीं दिखता जो भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना चाहता हो.

 

अब केवल कड़े बयानों, कुछ छोटी-छोटी गिरफ्तारियों से काम नहीं चलने वाला. अब राजनैतिक-प्रशासनिक-सामाजिक तंत्र में बैठे ऐसे लोगों को चिन्हित किये जाने की, कड़ी सजा देने की आवश्यकता है जो परीक्षाओं की गोपनीयता के साथ-साथ परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.


30 मई 2026

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना....

 

क्या कभी आपके घर कोई डॉक्टर आया, जिसने कहा हो कि आपके घर में कोई गर्भवती महिला है, जिसका अल्ट्रासाउंड करके वो बता देगा कि गर्भ में लड़का है या लड़की?

 

क्या कभी आपके घर में किसी परीक्षा से सबंधित कोई कर्मचारी आया है जिसने कहा हो कि सम्बंधित परीक्षा का पेपर इतने रुपये में मिल रहा है?

 

क्या आपके घर कभी यूनिवर्सिटी से कोई व्यक्ति आया है जिसने कहा हो कि वो आपकी संतानों के नंबर बढ़वा देगा?

 

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पिछले दो दशकों से अधिक के अध्यापन अनुभव में एक बात स्पष्ट रूप से देखने को मिली कि लगभग हर साल कुछ न कुछ अभिभावक आते हैं अपने बच्चों की सिफारिश लेकर. कुछ परीक्षा के दौरान ही 'कुछ देख लेने' का इरादा लेकर आते हैं; कुछ आते हैं जो परीक्षाओं बाद 'कुछ हो सकता है क्या?' के विचार के साथ आते हैं; कुछ वायवा-प्रैक्टिकल के समय अपने मंतव्य के साथ आते हैं.  ठीक ऐसी ही स्थिति प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान भी देखने को मिलती है. परीक्षा तिथि के पहले ही सब सेट कर लेने की मानसिकता में अभिभावक भटकने लगते हैं. लाखों रुपये में जो पेपर बेचे जा रहे हैं, उनके सन्दर्भ में विचार करिए कि कितने परीक्षार्थी सीधे तौर पर लाखों रुपये का सौदा करते हैं? बहुतायत के अभिभावक ही सामने आते हैं.

 

किसी भी सरकार को, किसी भी व्यवस्था को दोष देने के पहले हम सबको अपने ही गिरेबान में झाँकना चाहिए. कोई सीधे हमारे पास नहीं आता, हम भी भ्रष्ट बनने को आतुर रहते हैं और उस तरफ जाते हैं. सिस्टम में लगे लोगों को न इस व्यवस्था से मतलब होता है और न ही किसी परीक्षार्थी के भविष्य से. वे भौतिकतावाद के बाजार में उत्पाद लेकर खड़े हैं, जहाँ अभिभावक ग्राहक  के रूप में उपलब्ध हैं. कल को यही ग्राहक समाप्त हो जाएँ तो ये भ्रष्ट व्यवस्था किसे अपने पेपर बेचेगी? यहाँ वही बात सामने आती है कि हम सब चाहते हैं कि क्रांति हो, आन्दोलन हो, व्यवस्था बदले किन्तु इनके लिए कोई शहीद, कोई बलिदानी पैदा हो तो पड़ोस में हो. हमारी संतान कुछ बने, कहीं से उच्च शिक्षा ले मगर व्यवस्था बदलने के लिए, भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई संतान आगे बढे तो वो पड़ोस की हो.

 

अपनी सोच बदलिए साहब, बिना सोच बदले आप बस अपने मन की भड़ास निकालते रहेंगे और अगले ही पल अवसर मिलते ही अपने बच्चे के लिए गुहार लगायेंगे 'कुछ हो सकता है क्या?'


26 मई 2026

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर शोर मचाने वालो

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर अनावश्यक शोर मचाने वालो, क्या तुमको याद है कि इससे पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतें कब बढ़ाई गई थीं? नहीं पता होगा, क्योंकि तुम लोगों को शोर मचाने से मतलब है न कि कुछ तथ्यात्मक खोजबीन करने से.

 

6 अप्रैल 2022 को पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि हुई थी. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने की वजह से मार्च-अप्रैल 2022 में लगातार दाम बढ़ाए गए थे और 6 अप्रैल 2022 को इस वृद्धि का आखिरी दिन था. इसके बाद दैनिक कीमतों में बदलाव पर लंबी रोक लग गई थी.

 



मई 2022 में केन्द्र सरकार ने उत्पाद शुल्क को कम किया जिससे पेट्रोल आठ रुपये और डीजल छह रुपये प्रति लीटर सस्ता हुआ. (वैसे ये याद नहीं होगा चिल्ला-चोट मचाने वालों को.) मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले केन्द्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दामों में दो रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी. (ये याद है? नहीं न!) इसके बाद अब मई 2026 में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि हुई है. पिछले चार सालों में स्थिर कीमतों में तुम लोगों ने जरा भी साँस न ली. कुछ दिन अपनी साँस को उसी तरह स्थिर किये रहो, वैश्विक संकट दूर होते ही तुम लोग फिर से साँस लेने लगना.


23 मई 2026

पारिवारिकता, संस्कार और संस्कृति की शिक्षा देतीं अम्मा

अम्मा! बचपन से इस शब्द को एक जीव के रूप में नहीं बल्कि एक जीवन के रूप में देखा है. बिना किसी लाग-लपेट के कहा जाये तो हम लोग बौद्धिक होने के बाद शब्दों से खेलना सीख जाते हैं और एक समय के बाद अपने ही अम्मा-पिताजी को शिक्षा देना शुरू कर देते हैं, उनके बारे में ऐसा आदर्शवाद बिखेरना शुरू कर देते हैं जो बहुतायत में उनके वास्तविक जीवन से बहुत दूर होता है.


बहरहाल, बचपन के बहुत ही शुरूआती दिनों की याद आज भी है. न केवल हम ही बल्कि अम्मा भी कई बार आश्चर्य करती हैं कि एकदम शुरूआती दिनों की बातें कैसे याद हैं हमें. उन यादों के सहारे आज तक की यात्रा करते हैं तो समझ ही नहीं आता है कि अम्मा के बारे में क्या लिखा जाये, क्या छोड़ा जाए. सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में रहने के अस्सी-नब्बे के दशक के जो भी संस्कार थे उनके अनुपालन में पिताजी के साथ संवाद का माध्यम अम्मा ही बनती थीं. ये और लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है कि अम्मा की ये भूमिका न केवल हम तीनों भाइयों के लिए थी बल्कि पिताजी के तीनों छोटे भाइयों के लिए भी थी. हमारे तीनों चाचाओं का हम लोगों के साथ उनकी नौकरी, शादी होने तक रहना हुआ. चाचा लोगों का अपने बड़े भाई (हमारे पिताजी) के प्रति सम्मान के भाव ने सदैव अम्मा को ही हर बात के लिए आगे किया. होली-दीपावली पर तो निश्चित रूप से सभी चाचा लोगों का सपरिवार उरई आना होता था. पूरे परिवार के साथ समन्वित, संतुलन अम्मा की कार्य-प्रणाली में सहज भाव से देखने को मिलता.


हम तीनों भाइयों की अम्मा समय के साथ पूरे परिवार की अम्मा तो बनी हीं हमारे बाद की पीढ़ी के लिए भी अम्मा ही सम्बोधित हुईं. न केवल हम तीनों भाइयों की मित्र-मंडली में बल्कि मोहल्ले में भी वे अम्मा के रूप    में ही पहचान बनाये हुए हैं. उनके शब्दों से ज्यादा उनके कार्यों को देख-देखकर प्रेरणा मिली. वो समय आज भी याद  है जबकि हमारी अइया (दादी) गुल्ला टूट जाने के कारण कानपुर में एक हॉस्पिटल में भर्ती थीं. उनकी शारीरिक अवस्था के कारण ऑपरेशन सम्भव नहीं दिख रहा था. ऐसे में दस-बारह दिन की उनकी परेशानी देखकर एक दिन अम्मा ने वहाँ के डॉक्टर से स्पष्ट शब्दों में कहा कि कल हम लोगों को रिलीव करिए. हमने जैसे अपने बेटों की टट्टी-पेशाब साफ़ कर ली वैसे इनकी भी कर लेंगे. इस समय येहमारे लिए हमारी सास से ज्यादा एक छोटे बच्चे जैसी हैं.


उस समय की दृढ़ता के बाद अम्मा की जीवटता, उनका आत्मबल सामने लाने के लिए प्रकृति ने भी कम उत्पात न रखा. पिताजी का देहांत, अगले ही महीने हमारा ट्रेन दुर्घटना के चलते साल भर बिस्तर पर पड़े रहना, कालांतर में सबसे छोटे भाई की असमय मृत्यु ने परिवार में उथल-पुथल तो मचाई मगर ऐसे विषम समय में भी अम्मा के संयम, धैर्य, जीवटता के बारे में सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है. आज भी उन पलों में अम्मा की छवि का स्मरण हो जाता है तो आँखें नम हो जाती हैं.


परिवार को साथ लेकर चलने की कला, सबकी बातों को सुनकर भी एकजुटता के साथ आगे बढ़ने का संयम, तीन-चार पीढ़ियों के साथ सामंजस्य बनाकर चलने की कुशलता, सबकी सहायता के लिए आगे रहने की मानसिकता को अम्मा से सीखने को मिला. आज वे उम्र के 75 वर्ष पूरे करने के बाद भी पूरी सक्रियता, चैतन्यता के साथ हम लोगों को अपना आशीर्वाद दे रही हैं. यद्यपि उनकी अति-सक्रियता के चलते उत्पन्न होने वाली उम्र सम्बन्धी शारीरिक समस्याओं के चलते कई बार उनको रोका-टोका जाता है तथापि यह अवश्य ही सीखने को मिलता है कि जब तक साँस है तक तक जीवन में सक्रियता, सजीवता बनी रहनी चाहिए. ये बात आज भी अम्मा को सक्रिय देखकर सीखने को मिल रही है. 


19 मई 2026

श्रम की महत्ता समझाएगा श्रमदान

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा विद्यालयों में बच्चों से श्रमदान करवाने वाले शिक्षकों को सम्मानित करने का विचार रखना एक प्रशासनिक औपचारिकता भर अथवा कोई तात्कालिक सुर्खी का विषय नहीं है. व्यावहारिक रूप में देखा जाये तो उनका वक्तव्य हमारी समकालीन शिक्षा व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने के प्रति एक विमर्श का सूचक है. अंकों की मारामारी के अंधे दौर में हमारी शिक्षा प्रणाली और अभिभावक सूचनाओं के संकलन, तकनीकी के नियंत्रण और अंकों की अबूझ प्रतिस्पर्धा में उलझकर रह गए हैं. इस व्यवस्था ने विद्यालयों से पारम्परिक और बुनियादी अवधारणाओं को लगभग समाप्त सा कर दिया है. श्रमदान भी इसी तरह की व्यावहारिक व्यवस्थाओं से बाहर कर दी गई है. हमें सोचना चाहिए कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या उसके द्वारा किसी इंसान को कामगार के रूप में तैयार करना है या फिर एक संवेदनशील, सामाजिक नागरिक का निर्माण करना है?

 


आधुनिक दौर की कॉरपोरेट संस्कृति ने बच्चों के मस्तिष्क
को भले ही तीक्ष्ण किया हो लेकिन उनके ह्रदय को श्रम, सामाजिकता, समन्वय से दूर ही किया है. अब न केवल बच्चों में बल्कि अभिभावकों में शिक्षा के प्रति, शिक्षण संस्थानों के प्रति आत्मीयता का, परिवारिकता का नहीं बल्कि व्यापारिकता का भाव होता है. बच्चों को अब शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए, अधिकाधिक अंक लाने के लिए भेजा जाने लगा है. अब किसी बच्चे द्वारा अपनी कक्षा की मेज साफ करना, विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना अथवा पेड़-पौधों में, क्यारियों में पानी देना उसके आन्तरिक गुणों के विकसित होने के क्रम में नहीं बल्कि शारीरिक शोषण किये जाने के रूप में देखा जाता है. वास्तविकता तो यह है कि इस तरह के छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा वह किसी शोषण का, बाल-श्रम का शिकार नहीं हो रहा होता है बल्कि वह अपने आसपास के भौतिक परिवेश के साथ एक आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर रहा होता है. इस तरह की गतिविधियाँ बच्चों के भीतर पनपने वाले अभिजात्य अहंकार, वर्ग-विभेद आदि को तोड़ती हैं. ऐसे कार्यों के द्वारा बच्चों को सिखाया जाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता और यही सीख उनके भीतर समन्वय का, सामंजस्य का निर्माण करती है.

 

समकालीन दौर में बाल विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में शारीरिक निष्क्रियता, मानसिक अवसाद, एकाकीपन आदि प्रमुख हैं. आज बच्चे मोबाइल के जाल में उलझकर प्रकृति से, शारीरिक श्रम से लगभग दूर हो चुके हैं. ऐसे में विद्यालयों में श्रमदान केवल किसी कार्य तक सीमित न समझा जाये बल्कि इसे एक तरह की शारीरिक और मानसिक चिकित्सा माना जाना चाहिए. सामूहिक रूप से किया जाने वाला शारीरिक श्रम बच्चों में सकारात्मकता बढ़ाता है, उनके मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है. श्रमदान को बालश्रम से जोड़कर देखना उचित नहीं क्योंकि यह एक सामूहिक विधा है जो अलग-अलग पृष्ठभूमि, जातियों, आर्थिक स्तरों से आने वाले विद्यार्थियों में टीम वर्क, सहानुभूति, सहयोग आदि की भावना विकसित करती है. इस तथ्य को उस समय और भी सहज भाव से देखा जा सकता है जबकि यही बच्चे उच्च शिक्षा में आने के पश्चात् बिना किसी संकोच, भेदभाव के एनसीसी, एनएसएस आदि के माध्यम से अपने आसपास की बस्तियों में श्रमदान करते हैं, स्वच्छता हेतु मिलजुल कर कार्य करते हैं.

 

श्रमदान बच्चों में भावनात्मकता का विकास करता है. हम सभी अपने घरों को, अपनी सम्पत्ति को साफ़-सुथरा रखते हैं, उनके प्रति आत्मीय भाव रखते हैं किन्तु सार्वजनिक सम्पत्ति को गंदा करने में संकोच नहीं करते हैं. यह प्रवृत्ति एक गम्भीर सामाजिक बीमारी बन चुकी है. इसके मूल में नागरिकों का सार्वजनिक संपत्तियों से भावनात्मक जुड़ाव न होना है. यदि एक बच्चा पसीना बहाकर अपने विद्यालय को सँवारता है तो उसके भीतर उस स्थान के प्रति भावनात्मकता का, अपनत्व का बोध जागृत होता है. ऐसा बच्चा भविष्य में सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उदारता, अपनत्व के भाव से जुड़ेगा. श्रम की गरिमा का अभाव हमारे देश का एक कड़वा सच है. हमने मानसिक श्रम को उच्च और शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता बना ली है. यही कारण है कि आज देश का शिक्षित युवा किसी भी स्तर की नौकरी के लिए भी कतारों में खड़ा मिल जायेगा किन्तु वह किसी शारीरिक श्रम कार्य को अपनाने से बचता है. श्रमदान के द्वारा बच्चों में श्रम की महत्ता को समझाया जा सकता है, उसके प्रति निम्नता की ग्रंथि समाप्त किया जा सकता है.

 

मुख्यमंत्री के विचार के बाद विद्यालयों में बच्चों के श्रमदान को एक दिशा देने की आवश्यकता है. इसके लिए उठाने वाले तमाम उपायों के बीच देखना होगा कि श्रमदान के नाम पर उनको बालश्रम के रूप में परिवर्तित न कर दिया जाये. बच्चों को, अभिभावकों को बालश्रम और श्रमदान के अंतर को समझाना होगा. बच्चों द्वारा विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना श्रमदान है मगर उन्हीं बच्चों से मिड-डे-मील बनवाया जाना बालश्रम होगा. विद्यालय परिसर में पौधारोपण करना, उनमें पानी देना श्रमदान है मगर किसी उच्चाधिकारी के आने पर उसकी आवभगत करवाना बालश्रम होगा. श्रमदान कोई सुधार कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह एक सामाजिकता, परिवारिकता का पाठ है. यदि श्रमदान को सामाजिक सहयोग के रूप में धरातल पर क्रियान्वित किया जाए तो यह आत्मनिर्भरता का, स्वावलम्बन का, श्रम के प्रति पूजनीयता का भाव जागृत करेगा.