19 मई 2026

श्रम की महत्ता समझाएगा श्रमदान

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा विद्यालयों में बच्चों से श्रमदान करवाने वाले शिक्षकों को सम्मानित करने का विचार रखना एक प्रशासनिक औपचारिकता भर अथवा कोई तात्कालिक सुर्खी का विषय नहीं है. व्यावहारिक रूप में देखा जाये तो उनका वक्तव्य हमारी समकालीन शिक्षा व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने के प्रति एक विमर्श का सूचक है. अंकों की मारामारी के अंधे दौर में हमारी शिक्षा प्रणाली और अभिभावक सूचनाओं के संकलन, तकनीकी के नियंत्रण और अंकों की अबूझ प्रतिस्पर्धा में उलझकर रह गए हैं. इस व्यवस्था ने विद्यालयों से पारम्परिक और बुनियादी अवधारणाओं को लगभग समाप्त सा कर दिया है. श्रमदान भी इसी तरह की व्यावहारिक व्यवस्थाओं से बाहर कर दी गई है. हमें सोचना चाहिए कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या उसके द्वारा किसी इंसान को कामगार के रूप में तैयार करना है या फिर एक संवेदनशील, सामाजिक नागरिक का निर्माण करना है?

 


आधुनिक दौर की कॉरपोरेट संस्कृति ने बच्चों के मस्तिष्क
को भले ही तीक्ष्ण किया हो लेकिन उनके ह्रदय को श्रम, सामाजिकता, समन्वय से दूर ही किया है. अब न केवल बच्चों में बल्कि अभिभावकों में शिक्षा के प्रति, शिक्षण संस्थानों के प्रति आत्मीयता का, परिवारिकता का नहीं बल्कि व्यापारिकता का भाव होता है. बच्चों को अब शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए, अधिकाधिक अंक लाने के लिए भेजा जाने लगा है. अब किसी बच्चे द्वारा अपनी कक्षा की मेज साफ करना, विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना अथवा पेड़-पौधों में, क्यारियों में पानी देना उसके आन्तरिक गुणों के विकसित होने के क्रम में नहीं बल्कि शारीरिक शोषण किये जाने के रूप में देखा जाता है. वास्तविकता तो यह है कि इस तरह के छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा वह किसी शोषण का, बाल-श्रम का शिकार नहीं हो रहा होता है बल्कि वह अपने आसपास के भौतिक परिवेश के साथ एक आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर रहा होता है. इस तरह की गतिविधियाँ बच्चों के भीतर पनपने वाले अभिजात्य अहंकार, वर्ग-विभेद आदि को तोड़ती हैं. ऐसे कार्यों के द्वारा बच्चों को सिखाया जाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता और यही सीख उनके भीतर समन्वय का, सामंजस्य का निर्माण करती है.

 

समकालीन दौर में बाल विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में शारीरिक निष्क्रियता, मानसिक अवसाद, एकाकीपन आदि प्रमुख हैं. आज बच्चे मोबाइल के जाल में उलझकर प्रकृति से, शारीरिक श्रम से लगभग दूर हो चुके हैं. ऐसे में विद्यालयों में श्रमदान केवल किसी कार्य तक सीमित न समझा जाये बल्कि इसे एक तरह की शारीरिक और मानसिक चिकित्सा माना जाना चाहिए. सामूहिक रूप से किया जाने वाला शारीरिक श्रम बच्चों में सकारात्मकता बढ़ाता है, उनके मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है. श्रमदान को बालश्रम से जोड़कर देखना उचित नहीं क्योंकि यह एक सामूहिक विधा है जो अलग-अलग पृष्ठभूमि, जातियों, आर्थिक स्तरों से आने वाले विद्यार्थियों में टीम वर्क, सहानुभूति, सहयोग आदि की भावना विकसित करती है. इस तथ्य को उस समय और भी सहज भाव से देखा जा सकता है जबकि यही बच्चे उच्च शिक्षा में आने के पश्चात् बिना किसी संकोच, भेदभाव के एनसीसी, एनएसएस आदि के माध्यम से अपने आसपास की बस्तियों में श्रमदान करते हैं, स्वच्छता हेतु मिलजुल कर कार्य करते हैं.

 

श्रमदान बच्चों में भावनात्मकता का विकास करता है. हम सभी अपने घरों को, अपनी सम्पत्ति को साफ़-सुथरा रखते हैं, उनके प्रति आत्मीय भाव रखते हैं किन्तु सार्वजनिक सम्पत्ति को गंदा करने में संकोच नहीं करते हैं. यह प्रवृत्ति एक गम्भीर सामाजिक बीमारी बन चुकी है. इसके मूल में नागरिकों का सार्वजनिक संपत्तियों से भावनात्मक जुड़ाव न होना है. यदि एक बच्चा पसीना बहाकर अपने विद्यालय को सँवारता है तो उसके भीतर उस स्थान के प्रति भावनात्मकता का, अपनत्व का बोध जागृत होता है. ऐसा बच्चा भविष्य में सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उदारता, अपनत्व के भाव से जुड़ेगा. श्रम की गरिमा का अभाव हमारे देश का एक कड़वा सच है. हमने मानसिक श्रम को उच्च और शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता बना ली है. यही कारण है कि आज देश का शिक्षित युवा किसी भी स्तर की नौकरी के लिए भी कतारों में खड़ा मिल जायेगा किन्तु वह किसी शारीरिक श्रम कार्य को अपनाने से बचता है. श्रमदान के द्वारा बच्चों में श्रम की महत्ता को समझाया जा सकता है, उसके प्रति निम्नता की ग्रंथि समाप्त किया जा सकता है.

 

मुख्यमंत्री के विचार के बाद विद्यालयों में बच्चों के श्रमदान को एक दिशा देने की आवश्यकता है. इसके लिए उठाने वाले तमाम उपायों के बीच देखना होगा कि श्रमदान के नाम पर उनको बालश्रम के रूप में परिवर्तित न कर दिया जाये. बच्चों को, अभिभावकों को बालश्रम और श्रमदान के अंतर को समझाना होगा. बच्चों द्वारा विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना श्रमदान है मगर उन्हीं बच्चों से मिड-डे-मील बनवाया जाना बालश्रम होगा. विद्यालय परिसर में पौधारोपण करना, उनमें पानी देना श्रमदान है मगर किसी उच्चाधिकारी के आने पर उसकी आवभगत करवाना बालश्रम होगा. श्रमदान कोई सुधार कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह एक सामाजिकता, परिवारिकता का पाठ है. यदि श्रमदान को सामाजिक सहयोग के रूप में धरातल पर क्रियान्वित किया जाए तो यह आत्मनिर्भरता का, स्वावलम्बन का, श्रम के प्रति पूजनीयता का भाव जागृत करेगा.

 


15 मई 2026

प्रतियोगी परीक्षाएँ और सुरक्षा जाँच का झमेला

प्रतियोगी परीक्षाएँ और पहनावे को लेकर बहुत सी पोस्ट सामने आती हैं. प्रशासन के द्वारा परीक्षा शुचिता के नाम पर अपनाये जाने वाले बहुत से कदमों का विरोध हम भी करते हैं. परीक्षा केन्द्र पर कलावा कटवाना, विवाहित महिलाओं का मंगलसूत्र उतरवाना, चेन लगी पैंटों में से चेन काटना आदि-आदि ऐसे कृत्य हैं जिनका लगातार विरोध होता है. इसके बाद भी एक बात को सहज रूप में स्वीकारते भी हैं कि परीक्षा के समय के पहनावे, साथ में लायी जाने वाली सामग्री, प्रतियोगी द्वारा क्या-क्या करना है, क्या-क्या नहीं करना है आदि-आदि के बारे में दिशा-निर्देश प्रवेश-पत्र पर स्पष्ट रूप से दिए जाते हैं. शासन-प्रशासन की तरफ से जारी किये गए प्रवेश-पत्र पर स्पष्ट रूप से दिए गए निर्देशों को या तो पढ़ा नहीं जाता है अथवा पढ़कर भी अनदेखा कर दिया जाता है. स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए होने के बाद भी यदि प्रतियोगी विद्यार्थी गलती करता है तो भले ही ऐसा अनजाने में हुआ हो मगर इसके लिए स्वयं विद्यार्थी को और अभिभावक को ध्यान रखना चाहिए. उनको इस बात का स्मरण होना चाहिए कि वे किसी प्रतियोगी परीक्षा के लिए जा रहे हैं, जिसके लिए साल भर मेहनत की गई है. ऐसी स्थिति में भी यदि लापरवाही विद्यार्थी की तरफ से हो रही है तो इसका साफ़ सा अर्थ है कि विद्यार्थी परीक्षा के लिए न तो ईमानदार है और न ही सजग.  

 

ये मान लिया जाये कि सारे दिशा-निर्देश दिए होने के बाद भी यदि विद्यार्थी उन पर ध्यान नहीं दे रहा है तो यहाँ एक बात प्रशासन को भी ध्यान रखनी चाहिए कि तमाम सारी कवायद के बाद भी पेपर लीक होने की घटनाएँ हो जाती हैं. ये घटनाएँ उस समय तो हो नहीं रही होती हैं जबकि विद्यार्थी परीक्षा केन्द्र के मुख्य द्वार पर खड़ा होता है. ऐसा भी नहीं है की वह कलावा में, मंगलसूत्र में, बड़े बालों में किसी तरह की अदृश्य तकनीक को छिपाकर ले जा रहा होगा. इसलिए ऐसे में उनके द्वारा सुरक्षा के नाम पर, जाँच के नाम पर अनावश्यक कदमों को उठाकर परीक्षार्थियों को परेशान नहीं करना चाहिए. उनको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पेपर लीक करवाने वाला न तो कलावा पहने होगा, न चेन वाली पेंट पहने होगा, न मंगलसूत्र पहने होगा, न फुल बाँह की शर्ट पहने होगा. जिसे पेपर लीक करने का खेल करना होता है, परीक्षार्थी को पास करवाने का ठेका लिया होता है वे शासन-प्रशासन के इंतजामों से कहीं आगे का इंतजाम किये होते हैं. ऐसे अपराधियों की धरपकड़ होती भी है, होनी ही चाहिए ताकि उन विद्यार्थियों के साथ गलत न हो सके जो मेहनत के साथ तैयारी करके अपना भविष्य बनाने के लिए परीक्षा में बैठते हैं. बावजूद इसके शासन-प्रशासन द्वारा अनावश्यक रूप से उठाये जाने वाले कदमों पर रोक लगनी चाहिए, उनको नियंत्रित होना चाहिए.

 

क्या चाहता है शासन-प्रशासन कि कल को परीक्षार्थी सिर्फ चड्डी-बनियान में परीक्षा-केन्द्र पर उपस्थित हो?


09 मई 2026

महापुरुषों का सम्मान या फोटो खिंचवाने की चाहत?

यदि महाराणा प्रताप के चरणों में पुष्प अर्पित कर दिए जाते तो क्या ये उनके प्रति सम्मान न होता?

 

आजकल सम्मान का अर्थ महापुरुषों के बराबर खड़े होने से है, उनको माल्यार्पण करने से है. इसी सनक ने मूर्तियों/प्रतिमाओं की भव्यता को समाप्त कर दिया है. उरई शहर की लगभग सभी प्रतिमाओं/मूर्तियों में इस तरह की सीढ़ियाँ लगवा दी गई हैं. इससे नेताओं के, जनप्रतिनिधियों के कथित अहं को संतुष्टि भी मिल जाती है. जिला प्रशासन को, जिला जनप्रतिनिधियों को लगातार लिखित, मौखिक निवेदन करने के बाद भी किसी पर कोई असर नहीं हो रहा है. दिखावे का सम्मान महापुरुषों की दिव्यता-भव्यता पर हावी है.




05 मई 2026

जनादेश, व्यक्तिगत अहंकार और संविधान

भारतीय संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनादेश को मान्यता देती है तो जनप्रतिनिधियों से भी आदर्श स्थापन की अपेक्षा करती है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल विधानसभा चुनाव हार चुका है और भाजपा बड़े दल के रूप में सामने आई है. चुनाव परिणामों की इस स्थिति में सामान्य कदम सत्ताधारी दल के मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा देना होता है किन्तु पश्चिम बंगाल में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करना लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ संविधान से भी मजाक करने जैसा है. सामान्य रूप में इसे भले ही एक राजनीतिक संकट के रूप में देखा जा रहा हो किन्तु ऐसा नहीं है. भारतीय संविधान ऐसी स्थितियों में भी सशक्त प्रावधानों के साथ जनादेश के विरुद्ध सत्ता हथियाने के कुत्सित इरादों को रोकता है.

 

सबसे पहले यहाँ संविधान के अनुच्छेद 172(1) की उस शक्ति को समझना होगा, जिसके अनुसार राज्य की विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष के लिए होता है. इस पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् सम्बंधित विधानसभा का विघटन हो जाता है. यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त हो रहा है. ऐसे में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भले ही इस्तीफ़ा न देने की जिद पर अड़ी हों मगर उनको ये समझना होगा कि वर्तमान विधानसभा के संवैधानिक रूप से अस्तित्वहीन हो जाने पर उनका अस्तित्व क्या होगा? विधानसभा के अस्तित्व में न रहने की स्थिति में उसके आधार पर नियुक्त मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद का कानूनी एवं संवैधानिक आधार स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. सदन के अस्तित्व में न रहने पर किसी व्यक्ति का अपने पद का बने रहना संवैधानिक रूप से असंभव है.

 


इस संवैधानिक अनुच्छेद के होने के साथ-साथ विवाद की ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका प्रमुख हो जाती है. अनुच्छेद 164(1) के अन्तर्गत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री भी राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर कार्य करता है. सामान्य स्थितियों में मुख्यमंत्री का अपने पद पर बने रहना सदन में उसके प्रति बहुमत से निर्धारित होता है किन्तु चुनाव जैसी स्थितियों में इसका निर्धारण जनादेश के माध्यम से होता है. पश्चिम बंगाल में स्पष्ट है कि वर्तमान सत्ताधारी दल पराजित हो चुका है, ऐसे में वहाँ राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ सक्रिय हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने भी एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ तथा इसके बाद के अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर होना चाहिए लेकिन जब नई विधानसभा के चुनाव संपन्न हो चुके हों तो नया जनादेश पिछले किसी भी बहुमत पर भारी पड़ता है. सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 11 मार्च 1994 को यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था. यद्यपि इस मामले का मुख्य उद्देश्य अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग रोकना और सदन के पटल पर बहुमत परीक्षण को अनिवार्य बनाना था तथापि इसी निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनादेश ही सरकार की वैधता का अंतिम स्रोत है. जैसे ही नई विधानसभा के चुनाव होते हैं, पुरानी विधानसभा और उसके विश्वास का आधार समाप्त हो जाता है. स्पष्ट है कि ममता बनर्जी वर्तमान में अपने मुख्यमंत्रित्व के अस्तित्व में नहीं हैं. वैसे भी संवैधानिक रूप से चुनाव परिणामों के पश्चात निवर्तमान मुख्यमंत्री का इस्तीफा अनिवार्य कदम नहीं बल्कि यह एक लोकतांत्रिक शिष्टाचार और परम्परा है. इसके उल्लंघन होने पर राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री को पदमुक्त करने का, बर्खास्त करने का आदेश भी जारी कर सकते हैं. ऐसा कदम पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ममता बनर्जी के सन्दर्भ में भी उठा सकते हैं क्योंकि ममता बनर्जी के पास अब न तो जनादेश है और न ही सदन का अस्तित्व.

 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 73 के अन्तर्गत चुनाव आयोग नई विधानसभा के गठन के लिए विधिवत गठित अधिसूचना जारी करता है. अधिसूचना के जारी होते ही नई विधानसभा अस्तित्व में आ जाती है. अब चूँकि पश्चिम बंगाल में इसी 07 मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और अगले दिन राज्य में वैध सरकार न होने की स्थिति में राज्यपाल ऐसा कदम उठाने के लिए स्वतन्त्र हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद चुनाव आयोग ने नई विधानसभा के गठन हेतु आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. यह अधिसूचना राज्यपाल को सौंपी जा चुकी है जिसके पश्चात नई सरकार के गठन तथा शपथ ग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो गया है. ममता बनर्जी भले ही पद न छोड़ रही हों किन्तु अब राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार है कि वे चुनाव आयोग की अधिसूचना प्राप्त हो जाने के बाद भाजपा के विधायक दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. राज्यपाल अनुच्छेद 163 और 164 के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए विजयी दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं. नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण लेते ही पूर्व मुख्यमंत्री का दावा कानूनी रूप से शून्य हो जाएगा. प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी राज्यपाल द्वारा नई सरकार के गठन का आदेश देते ही राज्य की सम्पूर्ण नौकरशाही नए मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी हो जाती है. निवर्तमान मुख्यमंत्री का कोई भी आदेश अवैध माना जाएगा. स्पष्ट है कि राज्यपाल का आदेश स्वतः ही ममता बनर्जी की जिद को अस्तित्वहीन कर देगी.

 

भारतीय लोकतंत्र में जनादेश सर्वोच्च है. यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं तो भी वे केवल एक कब्जेधारी की स्थिति में होंगी न कि संवैधानिक शासक की. संविधान ने राज्यपाल को अनेक विवेकाधीन अधिकार दिए हैं जिनके द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी व्यक्तिगत अड़ियल रुख को दूर किया जा सके. विधानसभा का पाँच वर्ष पूरा होना ममता बनर्जी के अड़ियलपन के ताबूत में अंतिम संवैधानिक कील होगा. इसके बाद भाजपा का सरकार बनाना न केवल राजनीतिक वास्तविकता होगी बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक कदम भी.


26 अप्रैल 2026

अंत की ओर बढ़ता समाज?

पिता द्वारा अपने बच्चों की हत्या करने के बाद आत्महत्या करने की, माँ द्वारा अपनी संतान को कुँए में फेंकने की, पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे की हत्या करवाने-करने की, प्रेमी-प्रेमिका द्वारा सम्बन्धों में बाधक बनने पर परिजनों की हत्या कर देने की घटनाएँ अब लगभग रोज ही पढ़ने को मिलने लगी हैं. आपराधिक कृत्यों की ये घटनाएँ समाचार मात्र नहीं हैं बल्कि सामाजिक संवेदनाओं के क्षरण का, पारिवारिक मूल्यों के समाप्त होते जाने का संकेत हैं. इस तरह की घटनाएँ बताती हैं कि इंसान का तेजी के साथ मानसिक और सामाजिक क्षरण होता जा रहा है. रक्त-सम्बन्धियों के मध्य जब घृणित अपराधों का ताना-बाना बुना जाने लगता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी सामाजिकता में बड़ी गिरावट आ चुकी है. इन घटनाओं को किसी एक व्यक्ति की अथवा व्यक्तियों के समूह की विकृति कह कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. देखा जाये तो ऐसी घटनाएँ हमारी बदलती जीवनशैली, गिरते नैतिक मूल्यों और बढ़ते अलगाव के कारण उत्पन्न होती हैं.

 

दरअसल आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने व्यक्ति को मानसिक दबाव में जकड़ लिया है. इस दबाव ने उसे अकेलेपन का भी एहसास कराया है. ऐसी स्थिति में उसे अनुभव होने लगता है कि उसके प्रति लोगों का, परिवार का, समाज का समर्पण नहीं है. सामान्य रूप में कहा जाये तो वह व्यक्ति स्वयं को सामुदायिक समर्थन-विहीन समझने लगता है. वर्तमान नाभिकीय परिवारों और फ्लैट कल्चर ने व्यक्ति के अकेलेपन को और बढ़ा दिया है. इस एकाकीपन ने मनुष्य को भावनात्मक रूप से कमजोर तो बनाया ही है साथ ही मानसिक अवसाद जैसी स्थिति ने उसे हिंसक भी बना दिया है. इसी अवसाद, हिंसक व्यवहार, अकेलेपन ने परिवारवाद के स्थान पर व्यक्तिवाद को प्रमुखता दी है और इसके चलते नैतिक मूल्यों का पतन चारों ओर दिखाई देने लगा है. न केवल समाज में अपरिचित लोगों के मध्य बल्कि परिवार में भी स्वार्थ और कुत्सित वासनाओं से भरा व्यवहार चलन में आता जा रहा है. रिश्तों की पवित्रता पर व्यक्तिवाद और कामुकता हावी होती जा रही है. यह इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान में लोगों ने सही और गलत के बीच का अंतर समझना बंद कर दिया है.

 



सामाजिक अकेलेपन, व्यक्तिवाद, संकुचित सोच के साथ-साथ यदि विस्तीर्ण रूप में विचार करें तो वर्तमान में व्यक्ति के मन-मष्तिष्क को अपने नियंत्रण में करते जा रहे डिजिटल युग, सोशल मीडिया को भी नकारा नहीं जा सकता है. इसके चलते चरित्र निर्माण, नैतिकता, सहानुभूति आदि तो पूरी तरह से रसातल की ओर जा रहे हैं. इस दुनिया ने मनुष्य के भीतर एक तरह की होड़ पैदा करवा दी है. दूसरों की चमक-धमक, उसकी आभासी शानो-शौकत देखने से वह खुद को हीन महसूस करने लगता है. ऐसी कथित हीनभावना के कारण मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे ईर्ष्या, क्रोध पनपने लगता है. इस तरह की नकारात्मकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य इंटरनेट पर परोसी जा रही हिंसा और अश्लीलता के द्वारा किया जाने लगता है. लगातार आँखों के सामने से गुजरती हिंसा, वीभत्सता ने मानवीय मस्तिष्क को संज्ञा-शून्यता की स्थिति में ला खड़ा किया है. ये सहज रूप में देखने में आया है कि अब दुर्घटना की, अपराध की, मृत्यु की, हिंसा की खबरें विचलित करने के स्थान पर उनको शेयर करने के लिए उकसाती हैं. इस संवेदनहीनता ने मानसिक विकार को जन्म दिया है जो मनुष्य को अपराध के रास्ते पर ले जाता है.

 

नैतिकता, मूल्य, सामाजिकता, पारिवारिकता, हिंसा, अश्लीलता आदि को भले ही एकबारगी सामाजिक विघटन के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाये किन्तु यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि कानून व्यवस्था के कारण भी आपराधिक प्रवृत्ति वालों के हौसले बुलंद रहते हैं. इन घटनाओं के पार्श्व में न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी और कानून के भय का कम होना भी शामिल है. यद्यपि केवल कानून से समाज नहीं सुधर सकता है तथापि इसके लिए समाज को भी बदलना होगा. हमें फिर से उन मूल्यों की ओर लौटना होगा जहाँ इंसान, इंसानियत, रिश्तों, भावनाओं, संवेदनाओं आदि का सम्मान होता था. जहाँ परिवार का अस्तित्व था, रिश्तों में मर्यादा थी, आपस में संवादहीनता नहीं थी, पारिवारिक सदस्य एक दूसरे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे.

 

समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करनी होगी. शिक्षा क्षेत्र में जीवन कौशल, संवेगात्मक बुद्धि पर ध्यान देना होगा जिससे लोग संवेदनशील इंसान भी बन सकें. मन-मष्तिष्क को, ह्रदय को विचलित करने वाली ये घटनाएँ हमारे लिए एक चेतावनी है. यदि हमने अब भी अपने सामाजिक और नैतिक ढाँचे को सुधारने का प्रयास नहीं किया तो रिश्तों की गरिमा पूरी तरह समाप्त हो जाएगी. तकनीक और आधुनिकता के साथ-साथ अपने मूल्यों और संस्कारों को भी विकसित करना होगा. ध्यान रखना होगा कि इस तरह के आपराधिक कृत्यों से केवल एक परिवार का नहीं बल्कि यह एक सभ्यता का, एक समाज का अंत होता है. जीवन की आपाधापी में, कथित आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागते हुए हमें एक पल को रुक कर विचार करना होगा कि कहीं हम समाज को उसके अंत की तरफ तो नहीं ले जा रहे?