इन दिनों आरक्षण एक ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा हुआ है. विगत कई दशकों से यह एक
ऐसा विषय बना हुआ है जिस पर बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर लगातार बहस होती रही है. एक सवाल बार-बार उठता
रहा है कि क्या आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करने में
सफल हो सकी है? आरक्षण की विगत यात्रा पर नजर डालें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि
इसके कारण अब समाज में असंतोष और विभेद पनपने लगा है. स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारतीय
समाज एक तरह की विषमता और भेदभाव में जकड़ा हुआ था. हाशिये पर खड़े वर्गों को समानता
दिलाने के लिए, उनको
मुख्यधारा में जोड़ने के लिए संविधान निर्माताओं ने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर
समावेशी प्रावधान की कल्पना की. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4),
15(5), 16(4) और 16(4ए) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े
वर्गों, अनुसूचित जातियों और
अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण की व्यवस्था
लागू की. सामाजिक विभेद को दूर करने के साथ-साथ आर्थिक विषमता को दूर करने के
उद्देश्य से 103वाँ संविधान संशोधन
(2019) लागू करके आर्थिक रूप से
कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का नया प्रावधान जोड़ा गया.
कालांतर में आरक्षण सम्बन्धी स्थिति में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग
को भी शामिल किया गया. आरक्षण सम्बन्धी व्यवस्था को लेकर, इसके क्रियान्वयन को
लेकर समाज में असंतोष भी उपजता रहा. ऐसे में न्यायालयों द्वारा भी समय-समय पर इसकी
समीक्षा की गई. इंद्र साहनी बनाम भारत संघ (1992) के ऐतिहासिक निर्णय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत
तक तय की तथा क्रीमीलेयर की अवधारणा को जन्म दिया. इसके अलावा एम. नागराज (2006) मामले में स्पष्ट किया गया कि प्रमोशन में आरक्षण
देते समय प्रशासनिक दक्षता को बनाए रखना आवश्यक है. इसके बावजूद अनेक विसंगतियों
ने इस व्यवस्था को आलोचनाओं के घेरे में खड़ा कर दिया है. प्रवेश परीक्षाओं,
नौकरियों में सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को अत्यधिक अंक लाने के बावजूद बाहर
होना पड़ता है जबकि कम अथवा ऋणात्मक अंक पाने के बाद भी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी चयनित हो
जाते हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रीमीलेयर सीमा निर्धारित किये जाने के बाद भी
सम्पन्न परिवारों की कई पीढ़ियाँ ही लाभान्वित हो रही हैं. एससी/एसटी वर्ग में
क्रीमीलेयर व्यवस्था लागू न होने के कारण इस वर्ग के उच्च पदस्थ परिवार ही आरक्षण का
दोहन कर रहे हैं. ऐसी स्थिति के कारण यह व्यवस्था न्यायसंगत प्रतीत नहीं हो रही. आरक्षण का जो
उद्देश्य निर्धारित किया गया था वह समस्त जरूरतमंदों तक पहुँचने के स्थान पर सीमित
परिवारों तक सिमट गया है. ऐसी अनेकानेक विसंगतियों के कारण आरक्षण की व्यापक
और निष्पक्ष समीक्षा होने की माँग उठने लगी है. आलोचकों का सुझाव है कि जाति
आधारित आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त करके उसके स्थान पर आर्थिक आधार पर आरक्षण को
लागू किया जाये.
यदि सैद्धांतिक अथवा व्यावहारिक रूप से केन्द्र सरकार कभी आरक्षण व्यवस्था को
पूरी तरह हटाने का विचार करती है तो यह राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी दृष्टि में एक अभूतपूर्व चुनौती
होगी. इसके लिए सरकार को अनेक स्तरों पर चरणबद्ध कानूनी, विधायी कदम उठाने होंगे. सरकार को सबसे पहले संसद के दोनों सदनों में
दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन विधेयक पारित कराना अनिवार्य होगा. यहाँ ध्यान रखना होगा
कि संविधान के अनुच्छेद 368(2) के अनुसार यदि कोई ऐसा संशोधन किया जाता है जो देश के संघीय स्वरूप को
प्रभावित करता है तो उसे देश की कम से कम आधी विधानसभाओं से साधारण बहुमत द्वारा
अनुमोदित कराना पड़ता है. चूँकि राजनीतिक रूप से देश के विभिन्न राज्यों में
क्षेत्रीय दलों, विभिन्न विचारधाराओं की सरकारें कार्य करती हैं इसलिए राज्य स्तर पर
इस प्रकार की सहमति प्राप्त करना केन्द्र सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी.
संविधान संशोधन सम्बन्धी कदम के साथ-साथ न्यायिक स्तर पर भी सरकार को जवाबदेह
होना पड़ेगा. देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनिश्चित किया जाता है कि संविधान की
मूल भावना और सामाजिक न्याय का सिद्धांत आहत न हो. यदि कोई कानून अथवा संशोधन
समानता के मूल अधिकार की अवधारणा को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास करता है तो उसे न्यायिक
समीक्षा के द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है. ऐसे में केन्द्र सरकार को
न्यायालय के समक्ष यह सिद्ध करना होगा कि यह कदम देश के हित में किस प्रकार आवश्यक
है और इसके विकल्प के रूप में अन्य कौन सी नीतियाँ क्रियान्वित की जाएँगी. इन
औपचारिक और विधायी कदमों के अलावा सरकार को देश की सामाजिक, राजनीतिक स्थिति पर भी
विचार करना होगा. आरक्षण अब सामाजिक स्तर सुधारने, वंचित वर्गों को लाभान्वित करने
की दृष्टि से कम, राजनीतिक
लाभ के लिए ज्यादा प्रभावी माना जाने लगा है. ऐसे में आरक्षण हटाने मात्र के विचार
से ही सामाजिक असंतोष, हिंसक प्रदर्शन, राजनीतिक अस्थिरता देश को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती
है, देश में गम्भीर आंतरिक अशांति फैल सकती है. जातिगत आरक्षण को हटाना, आर्थिक
आधार पर आरक्षण लागू करना केन्द्र सरकार और नीति निर्माताओं के लिए संवेदनशील
संतुलन साधने जैसी चुनौती है.
विगत वर्षों की लगभग असफल आरक्षण व्यवस्था को देखने के बाद सामान्य वर्ग के, प्रतिभावान युवाओं की आकांक्षाओं,
वैश्विक मानकों, योग्यता आधारित
व्यवस्था की माँग को दरकिनार नहीं किया जा सकता वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय के संवैधानिक
संकल्प को भी नहीं छोड़ा जा सकता है. ऐसे में आरक्षण व्यवस्था को गतिशील और
पारदर्शी बनाया जाए, क्रीमीलेयर नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए ताकि वास्तविक
जरूरतमंदों को इसका लाभ मिले. शिक्षा, नौकरी के लिए आरक्षण के साथ-साथ प्रतिभाओं
को भी अवसर दिया जाये. नीति-नियंताओं को, राजनीतिज्ञों को ध्यान रखना होगा कि अब समय आ गया है कि
राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर ऐसी राष्ट्रीय नीति पर विचार किया जाए जो योग्यता
का सम्मान करे और वंचितों को संबल प्रदान करे.


