बड़े भाई सोमेन्द्र सिंह 'कुक्कू भैया' की पुण्यतिथि पर रक्तदान शिविर में....
28.02.2026
उरई (जालौन) उ०प्र०
कभी हसरत थी आसमां को छूने की, अब तमन्ना है आसमां के पार जाने की.
बड़े भाई सोमेन्द्र सिंह 'कुक्कू भैया' की पुण्यतिथि पर रक्तदान शिविर में....
28.02.2026
उरई (जालौन) उ०प्र०
ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिनसे अपना घर
न सँभलता है; घर की किसी योजना में उनकी कोई राय नहीं ली जाती है; जिनका काम न केवल घर में बल्कि आस-पड़ोस में भी
सिर्फ बकैती करना हो, वे लोग भी विदेश-नीति पर, वैश्विक सम्बन्धों पर, दक्षिण-एशिया के विविध बिन्दुओं पर अपनी राय दे रहे हैं.
कई लोग विदेश नीति को असफल बताने में लगे हैं. हास्यास्पद ये भी है कि जो व्यक्ति विगत
दो दशक से अधिक समय से संवैधानिक पद पर है, उसके निर्णयों पर, उसके कार्यों पर वे लोग सलाह दे रहे हैं, जिनके हिस्से में किसी तरह का सम्मान आज तक नहीं
आया है.
यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि जिस UGC का विनियम 2026 का सहारा लेकर अपने लोग ही अब पीठ में छुरा भोंकने की स्थिति में
आ गए हैं, आस्तीन का साँप बने बैठे
हैं, वे सहज भाव में UGC
के विनियम 2012 को पढ़ लें. ध्यान देने
की आवश्यकता है कि अमित शाह के द्वारा अर्बन नक्सलवाद का सफाया करने वाले कदम उठाये
जाने के बाद से ही क्यों इस तरह के मुद्दे उभर कर सामने आने लगे? इसका एक सीधा सा उत्तर है कि नक्सलवाद से,
वामपंथ से जुड़े लोगों को भली-भांति मालूम
है कि मोदी की टीम में ऐसे बकबकी करने वालों की संख्या ज्यादा ही है. वे एक बार में
ही बहकने वाली मुद्रा में आ जाते हैं, उनको बहकाया जाना आसान है.
बहरहाल, बहेलिया (वामपंथ,
अर्बन नक्सलवाद) ने जाल बिछाया और बकवास
करने वाले कबूतर उसमें फँस गए. अब उन फँसे कबूतरों को सरकार के, मोदी के और तो और और योगी के भी हर कदम,
हर निर्णय गलत लग रहे हैं. अब क्या ही
कहा जाये, जो इन लोगों के बापों
के समय में नहीं हुआ, वो सब हो
गया, इनको देखने को मिल गया तो
बकबकी निकल रही जुबान से, नहीं
तो छिलवा दिए गए थे किसी समय में.
वैसे तो हमारा बहुत
सारा समय यात्राओं में निकलता है किन्तु पिछले पाँच-छह महीने से यात्राएँ कुछ ज्यादा
ही हो रही हैं. इससे पहले भी और अभी भी रात की यात्रा में सबसे बड़ी जो समस्या देखने
को मिली वो इंडिकेटर वाली. देखने में आया कि रात के समय अधिकतर वाहन दूसरे वाहन को
पास देने के लिए उसी इंडिकेटर (पीली लाइट) का इस्तेमाल करते हैं, जिसके माध्यम से रास्ता माँगा जाता है. इसके
चक्कर में कई बार संशय की स्थिति उत्पन्न होने से दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है.
ऐसी स्थिति को लेकर
पिछले दो-तीन साल में मंत्रालय को कई बार पत्र लिखे गए किन्तु इस बारे में कोई सुधार
नहीं हुआ. हमारा सुझाव ये है कि गाड़ियों में एक हरे रंग की लाइट और लगनी चाहिए,
इसका उपयोग उस समय किया जाये जबकि पीछे
से आने वाले वाहन को रास्ता देना हो. पीले रंग के इंडिकेटर का उपयोग रास्ता माँगने
के लिए, मुड़ने के लिए ही किया जाये
तो सही रहेगा.
अपने रंग-स्वरूप में बसंती मदहोशी ओढ़े रहने वाले मौसम में एक भय भी लिपटा रहता
है. इस भय से समाज के सभी लोग प्रभावित नहीं होते बल्कि एक विशेष आयु-वर्ग के
बालक-बालिका ही प्रभावित होते हैं. मौसमी सुहानेपन में परीक्षाओं का आना बच्चों को
भयभीत ही करता है. इसका एक बहुत बड़ा कारण है कि अब परीक्षाओं को किसी बच्चे के
द्वारा सर्वाधिक अंक लाये जाने का पैमाना मान लिया गया है. ऐसी स्थिति के कारण परीक्षाओं
के नाम पर ही अभिभावकों द्वारा बालमन पर एक तरह का दबाव डाला जाने लगता है. बच्चों
के सामने अनेक तरह के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन पर सभी से अधिक अंक लाने के लिए
दबाव बनाया जाने लगता है.
वर्तमान शैक्षिक वातावरण जिस तरह से बन गया है उसमें बच्चों की बुद्धिमत्ता से
अधिक चर्चे उसके द्वारा प्राप्त अंकों के होते हैं. यहाँ वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा
के माहौल में ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि बच्चों के अंकों के कारण से उनमें
हीनभावना न पनपने पाए. इसके उलट हो ये रहा है कि स्वयं अभिभावकों द्वारा न केवल
परिवार के बच्चों से बल्कि मोहल्ले के, सोसायटी के, विद्यालय के अन्य बच्चों के साथ अपने
बच्चे की तुलना करते हुए कम अंकों के कारण उसे कमतर महसूस कराया जाता है. सोचने
वाली बात ये है कि अंकों का अधिक या कम आना एक परीक्षा की प्रक्रिया, उसकी पद्धति, मूल्यांकन के वातावरण पर आना निर्भर
करता है. इसके स्थान पर बच्चों की बुद्धिमत्ता, उनके कौशल, उनकी बौद्धिकता का आकलन करते हुए उनको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. अपने
बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास प्रत्येक अभिभावक द्वारा किया जाता है किन्तु
बेहतर शिक्षा के नाम पर बच्चों पर दबाव बनाया जाना कदापि उचित नहीं.
अभिभावकों को ये समझना चाहिए कि बेहतर शिक्षा का सम्बन्ध किसी भी रूप में
अंकों से नहीं है. उस पर भी परीक्षा जैसे मानसिक दबाव भरे माहौल में यदि परिवार का
वातावरण भी बोझिल रहेगा,
अभिभावकों द्वारा भी अधिकाधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाया जायेगा तो यह स्थिति
बच्चों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा.
यह एक सामान्य सा मनोविज्ञान है कि कक्षा के, परिवारके वातावरण
में और परीक्षा कक्ष के वातावरण में अंतर होता है. वातावरण का अंतर बच्चों को अलग
तरह से प्रभावित करता है. कक्षा में, परिवार में अपनी पढ़ाई,
अपनी याददाश्त पर शत-प्रतिशत विश्वास करने वाले बहुत से बच्चे परीक्षा कक्ष में
चिन्तित, व्यग्र दिखाई देते हैं. निश्चित समय-सीमा में प्रश्नपत्र को हल करने की
उनकी उलझन में यदि अधिकाधिक अंक लाने का बोझ डाल दिया जाये तो निश्चित ही बच्चे
अपनी ही प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे.
संभव है कि वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण
के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों
से सज्जित करना अभिभावकों की मजबूरी हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का
दबाव बनाया जाने लगा हो किन्तु यह बच्चों के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर
रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि परीक्षा के दिनों में वे अपने व्यस्ततम समय में से कुछ
समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताएँ. आज बच्चों के लिए खेलने को पार्कों,
मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है
तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों
के साथ घुलना-मिलना चाहिए.
इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा
तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त,
विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना
भी नहीं की जा सकती है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन
हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय
समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है.
अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, सहयोग की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. उनको समझाना चाहिए कि अंकों का
महत्त्व उस उत्तर पुस्तिका के सन्दर्भ में है, जिस पर उनके द्वारा प्रश्नों को हल किया जाता है. जीवन की
प्रतियोगिता में उनके अंकों से कहीं अधिक महत्त्व उनके कौशल का, उनकी बुद्धिमत्ता का, उनकी बौद्धिकता का है. अभिभावकों
को अपने बच्चों को ये विश्वास जगाना चाहिए कि ज़िन्दगी निर्वहन के लिए, पारिवारिक सञ्चालन के लिए सिर्फ नौकरी ही अथवा बड़े-बड़े पैकेज ही एकमात्र
संसाधन नहीं हैं. व्यक्तिगत अवधारणा में भले ही इनको महत्त्व दिया जा रहा हो मगर
समाज की कसौटी पर आज भी ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो अपने कौशल से, अपने श्रम से, अपनी प्रतिभा से खुद को विकसित, सफलतम रूप में स्थापित कर चुके हैं.
घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों
से लेकर शिक्षकों तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लादना
बंद करना होगा. अपने अतृप्त सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर देना बंद करना
होगा. बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक
‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने से बचना होगा. परीक्षा के दिनों में ही
नहीं सामान्य दिवसों में भी बच्चों के लिए सकारात्मक वातावरण बनाया जाना चाहिए. संख्यात्मकता
के स्थान पर गुणात्मकता का निर्माण करने पर जोर दिया जाना चाहिए. अपने बच्चों को
मशीन बनाने के स्थान पर इंसान बनाने का प्रयास आज से ही करना होगा.
जय श्रीराम और रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे नारों के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विरोधी
श्रीराम मंदिर निर्माण को सवालों के घेरे में खड़ा करते थे. उनका मानना था कि मंदिर
निर्माण से आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं होने वाला. विरोधियों द्वारा मंदिर के
स्थान पर चिकित्सालय बनवाए जाने के, विद्यालय बनवाए जाने के
सुझाव दिए जाते. न्यायिक प्रक्रिया पश्चात् श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला
और मंदिर निर्माण होने के साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हुई. अब जबकि
अयोध्या में श्रीराम मंदिर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि
देखने को मिल रही है, अयोध्या में बढ़ते पर्यटकों की संख्या
अपनी ही अलग कहानी कह रही है तब भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ से श्रीराम
मंदिर अर्थव्यवस्था मॉडल को अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई है. संस्थान की एक अध्ययन
रिपोर्ट ने श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् अयोध्या में आई व्यापक
आर्थिक सक्रियता, निवेश प्रवाह और रोजगार सृजन पर प्रकाश डाला
है. अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया
गया कि अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल आया है.
आईआईएम लखनऊ ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में मंदिर निर्माण से पहले और उसके बाद की
आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. रिपोर्ट में बताया
गया है कि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थान
के रूप में ही बनी हुई थी. मंदिर निर्माण के पहले यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों की वार्षिक संख्या लगभग 1.7 लाख के आसपास थी. अयोध्या के स्थानीय बाजारों
का सञ्चालन भी बहुत छोटे स्तर पर होता था, जिसके चलते यहाँ की आर्थिक गतिविधियाँ
भी संकुचित थीं. मंदिर निर्माण के बाद यहाँ लगभग छह हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) स्थापित हुए.
अयोध्या के स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की माँग में उछाल से कारीगरों और स्थानीय
उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है. छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों
की दैनिक आय 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये तक पहुँच गई. यहाँ की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने पिछले वर्ष लगभग 400
करोड़ रुपये का जीएसटी योगदान दिया है.
किसी भी स्थान के पर्यटन को लेकर वहाँ की यातायात व्यवस्था, रुकने के स्थानों आदि का
गुणवत्तापूर्ण होना बहुत अधिक महत्त्व रखता है. मंदिर निर्माण से पूर्व राष्ट्रीय स्तर
के होटलों से सम्बंधित व्यावसायियों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. यातायात की
सुविधाएँ भी सीमित रूप में देखने को मिलती थीं. मंदिर निर्माण पश्चात् आधुनिक
रेलवे स्टेशन, चौड़ी सड़कों, नदी तट
सौंदर्यीकरण और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीन स्वरूप प्रदान किया है.
इन परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीनतम स्वरूप प्रदान करने के साथ-साथ निर्माण,
परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करके स्थानीय युवाओं को
काम के अवसर भी प्रदान किये. श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में
सेवा-भाव, आतिथ्य सत्कार, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है.
इससे यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से पर्यटन आधारित राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है. अध्ययन के
अनुसार अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन के परिणामस्वरूप 150
से अधिक नए होटल और होमस्टे अस्तित्व में आये हैं. यहाँ पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं
को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित होटल व्यावसायियों ने अयोध्या में अपनी योजनाओं को
विस्तारित किया है. अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगले चार-पाँच वर्षों में पर्यटन,
परिवहन, होटल, खान-पान और आतिथ्य क्षेत्रों में
लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष
एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन सम्भव है.
इसी के साथ महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा संचालन से देश के
विभिन्न महानगरों से सीधी हवाई सम्पर्क स्थापित होने से भी श्रद्धालुओं और
पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई. आईआईएम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् पहले
छह महीनों में 11 करोड़ से अधिक
श्रद्धालुओं का आगमन अयोध्या में हुआ. इस स्थिति के चलते अयोध्या के स्थानीय बाजार,
परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में नई ऊर्जा
का संचार देखने को मिला. ऐसी सम्भावना दर्शायी गई है कि अब अयोध्या में वार्षिक स्तर
पर 5 से 6 करोड़ लोगों का आना हो सकता है. पर्यटकों, आगंतुकों की अनुमानित संख्या अयोध्या
को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्रों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा करती है. वर्तमान
में अयोध्या में लगभग 85000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं. इनका
प्रभाव केवल आधारभूत ढाँचे तक ही नहीं बल्कि निवेश और सेवा क्षेत्र तक विस्तीर्ण है. सतत शहरी
विकास को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जा
रहा है. अयोध्या को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा
रहे हैं.
प्रवासी भारतीयों,
देशी-विदेशी शोधकर्ताओं, वैश्विक श्रद्धालुओं का अयोध्या के प्रति आकर्षित होना सिद्ध करता
है कि अयोध्या ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में नई पहचान
प्राप्त की है. अध्ययन के
अनुसार धार्मिक विरासत आधारित विकास मॉडल यदि सुव्यवस्थित निवेश, प्रशासनिक समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ
लागू किया जाए तो वह स्थानीय अर्थव्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन कर सकता है. अयोध्या
का अनुभव दर्शाता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के योजनाबद्ध क्रियान्वयन
से पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश
से बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार निर्मित किया जा सकता है. यहाँ की आधारभूत संरचना,
पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक
बदलाव देखने को मिला है जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में शामिल
कर दिया है.