24 जनवरी 2026

व्यावहारिक और दीर्घकालिक हो विदेश नीति

पिछले कुछ समय से देश की स्थिति को देखते हुए विपक्षियों द्वारा बार-बार विदेश नीति पर सवालिया निशान लगाये जा रहे थे. आलोचना के स्वरों में केन्द्र सरकार की विदेश नीति के असफल होने की बात उठाई जाने लगी. ऐसे विचारों को उस समय और बल मिला जबकि हमारे पड़ोसी देशों में हालात ख़राब रहे और उनके अंदरूनी हालातों का प्रभाव भारतीय परिप्रेक्ष्य में नजर आया. इसी तरह पहलगाम की घटना के बाद ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भी भारतीय पक्ष का अकेले खड़े दिखाई पड़ने से विरोधियों के आरोपों को बल मिला. विदेश नीति को लेकर लगातार आरोप लगाये जाते रहे कि वह अपने घोषित लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रही है. एक तरफ भले ही भारत की सक्रियता वैश्विक मंच पर बढ़ती जा रही मगर दूसरी तरफ पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते सम्बन्धों, चीन के साथ सीमा विवाद, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों तथा कुछ पश्चिमी देशों से उत्पन्न विवादों ने देश की वैश्विक छवि को धूमिल किया.

 

देखा जाये तो किसी भी देश की विदेश नीति का स्वरूप मूल रूप में दीर्घकालिक और बहुस्तरीय होता है, जिसे सफलता या असफलता के सम्बन्ध में एकाएक मापना न केवल कठिन होता है बल्कि उचित भी नहीं होता है. अनेक अवसर ऐसे होते हैं जबकि वैश्विक सम्बन्धों के चलते अनेकानेक नीतियों को, योजनाओं को रोकना पड़ता है. इसे भी ऑपरेशन सिन्दूर के रूप में देखा-समझा जा सकता है. पाकिस्तान पर कई गुना बेहतर स्थिति होने के बाद भी एकाएक देश को युद्ध विराम जैसी स्थिति को स्वीकारना पड़ा. इस निर्णय के बाद जहाँ केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने लगातार बयानबाजी करते हुए इसके लिए स्वयं को नेतृत्वकर्ता सिद्ध करना चाहा.

 



भारत की विदेश नीति के सन्दर्भ में एक तथ्य सदैव से प्रभावी रहा है कि देश ने स्वतंत्रता के बाद से ही स्वयं को गुटनिरपेक्ष नीति के समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया है. इसी कारण भारत वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलनकारी कूटनीतिज्ञ के रूप में दिखाई पड़ता है. रूस-यूक्रेन युद्ध को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जहाँ अमेरिका और यूरोपीय देशों के दबाव के बाद भी भारत ने रूस से तेल और रक्षा सहयोग जारी रखा. अपने चिर-परिचित, पुराने सम्बन्धों का निर्वहन करने के साथ-साथ भारत ने युद्ध के समाधान के लिए कूटनीति को भी प्रभावी बनाये रखा. युद्धकाल में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रूस और यूक्रेन की यात्राओं ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति भावनाओं नहीं हितों से संचालित होती है. यद्यपि देश की इस नीति का अनेक पश्चिमी देशों ने विरोध किया तथापि भारत ने अपनी नीति को नहीं त्यागा.

 

ऐसी मजबूत कूटनीतिज्ञ स्थिति के बाद भी भारत की विदेश नीति की सर्वाधिक आलोचना उसके पड़ोसी देशों के संदर्भ में होती है. पड़ोसी देशों के वर्तमान हालात और भारतीय हस्तक्षेप को लेकर दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति सहज नहीं रही है. नेपाल के साथ सीमा और नक्शे का विवाद, मालदीव में भारत-विरोधी राजनीतिक अभियान, श्रीलंका में चीन की सशक्त आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति, श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का चीन को दीर्घकालिक पट्टे पर दिया जाना, बांग्लादेश में भारतीय हितों, हिन्दुओं पर हमले, पाकिस्तान द्वारा भारतीय विरोध की नीति को खुलकर अपनाना आदि ने भारतीय विदेश नीति के पारम्परिक अस्तित्व को चुनौती दी है. इन घटनाओं को कहीं न कहीं भारत की असफल विदेश नीति के रूप में परिभाषित किया जाने लगा.  

 

यह सच है कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में वैसी मधुरता नहीं दिखाई पड़ती है, जैसी कि वर्तमान केन्द्र सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान देखने को मिली थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दक्षिण एशिया देशों के साथ मधुर, मजबूत सम्बन्धों की जैसी पहल की गई थी, उसके परिणाम वैसे नहीं निकले जैसी की कल्पना की गई थी. अपने पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में आई गिरावट के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ भी सम्बन्धों में चुनौतियाँ दिख रही हैं. अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापारिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है; क्वाड जैसे मंच पर भारत की सक्रिय भागीदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक सफलता को दर्शाती है वहीं मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि को लेकर पश्चिमी देशों के रुख ने स्थितियों को असहज भी किया है. कनाडा, अमेरिका, ईरान, तालिबान, इजराइल आदि के साथ वर्तमान राजनयिक सम्बन्धों को इसी रूप में देखा जा सकता है.

 

वैश्विक मंचों पर और स्थानीय मुद्दों पर कूटनीतिज्ञ रूप से देखा जाये तो कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति एक तरह के संक्रमणकाल से गुजर रही है. देश की अंदरूनी स्थिति, पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों के रूप में देश से एक तरफ अपेक्षाएँ भी हैं और दूसरी तरफ चुनौतियाँ भी हैं. उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में, दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को स्थापित करने के उद्देश्य से भारत को जिम्मेदारियों और चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित करना है. विगत वर्षों की भारतीय क्षमता, नेतृत्व, वैश्विक छवि को देखते हुए विदेश नीति पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी ही कही जाएगी. विदेश नीति से सम्बंधित तमाम पक्षों पर विचार करते हुए उसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखना उचित होगा. वर्तमान सन्दर्भों में आवश्यकता इसकी है कि भारत अपनी कूटनीति को अधिक व्यावहारिक, दीर्घकालिक दृष्टि से सुदृढ़ करे. सत्ता पक्ष और विपक्ष को भी भारतीय सन्दर्भों में एकजुट होकर इसके लिए कार्य करने की आवश्यकता है ताकि वैश्विक मंच पर देश की बढ़ती भूमिका को, विदेश नीति को सशक्त रूप में परिभाषित किया जा सके.


18 जनवरी 2026

भेदभाव उन्मूलन में दूसरे संग भेदभाव न हो

उच्च शिक्षा के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय की भावना के प्रति सकारात्मकता पैदा करने का कार्य करने के साथ-साथ इंसानों में संवेदनशीलता, मानवीयता गुणों का विकास किया जाता है. इसी उद्देश्य को लेकर ही देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की स्थापना की गई थी. अपनी स्थापना से लेकर अद्यतन यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों लोकतांत्रिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक आधारशिला निर्मित करने का प्रयास किया जाता रहा है. आयोग द्वारा इसी 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए समता के संवर्द्धन हेतु विनिमय 2026 को अधिसूचित कर दिया गया. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया.

 



इस अधिनियम के लक्ष्य में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना. यदि इस उद्देश्य पर विचार किया जाये तो यह किसी एक वर्ग के प्रति भेदभाव जैसी स्थिति नहीं दिखाता है. इसके बाद भी इसे सामान्य वर्ग के विरुद्ध बताया जा रहा है, जिसके चलते देशभर में यह बिल चर्चा के केन्द्र में है. चर्चा के दौरान जो बात उभर कर सामने आई है वो दर्शाती है कि अधिनियम में जिस तरह के प्रावधान किये गए हैं उसके अनुसार इस विचार को मजबूती मिलती है कि सामान्य वर्ग के लोग भेदभाव के शिकार नहीं हो सकते बल्कि वे सिर्फ भेदभाव ही कर सकते हैं. इस सोच के पीछे वे तमाम अधिनियम हैं जिनका दुरूपयोग करके सामान्य वर्ग को परेशान किया जाता रहा है.

 



यह पूर्णतः सत्य है कि किसी भी समाज में, संस्था में किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान नहीं होना चाहिए और इससे भी किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि समाज से भेदभाव कम करने के प्रयास ज्यादा से ज्यादा होने चाहिए. इस सन्दर्भ में आयोग द्वारा जारी अधिसूचना को भी समझना आवश्यक हो जाता है. अधिनियम के बिन्दु 3 के अन्तर्गत विभिन्न सन्दर्भों को परिभाषित किया गया है, जिसमें 3ख में पीड़ित का सन्दर्भ ऐसे व्यक्ति से लगाया गया है जिसके पास इन विनियमों के अंतर्गत शिकायतों से सम्बंधित या जुड़े मामलों में कोई शिकायत है. इसमें भी जातिगत उल्लेख नहीं है अर्थात पीड़ित व्यक्ति किसी भी वर्ग का हो सकता है. इसके अतिरिक्त 3थ में हितधारक का अर्थ स्पष्ट किया गया है कि इसमें छात्र, संकाय सदस्यों, कर्मचारी और प्रबंध समिति के सदस्य, जिनमें उच्च शिक्षा संस्थान का प्रमुख भी शामिल है. एक बिन्दु 3ग अवश्य ऐसा है जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव को परिभाषित करता है. इस सम्बन्ध में शिकायत मिलने पर 24 घंटे में प्राथमिक कार्रवाई करनी होगी और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी. आरोपी विद्यार्थी पर संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में पहले उसे चेतावनी दी जाएगी, इसके पश्चात् जुर्माना भी लगाया जा सकता है. गम्भीर मामलों में विद्यार्थी को शिक्षण संस्थान से निष्कासित भी किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त सामान्य भेदभाव में नस्ल, लिंग, धर्म, दिव्यांगता, जन्म-स्थान आदि को शामिल किया गया है. सामान्य वर्ग का व्यक्ति इस आधार पर अपने साथ होने वाले भेदभाव की शिकायत कर सकता है.

 



अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने की दृष्टि से प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समान अवसर केन्द्र की स्थापना करनी होगी. इसका कार्य वंचित समूहों के लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रखना; शैक्षणिक, वित्तीय, सामाजिक एवं अन्य मामलों में मार्गदर्शन एवं परामर्श प्रदान करना; तथा परिसर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करना होगा. प्रत्येक समान अवसर केन्द्र एक समता समिति के माध्यम से कार्य करेगा. यदि इस अधिनियम में बिन्दु 3ग के अलावा बिन्दु 7 खटकता है, जो कहता है कि समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यह बिन्दु भी इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता है. इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण बिन्दु यह माना जाना चाहिए कि झूठी शिकायत मिलने पर सम्बंधित व्यक्ति के लिए किसी भी तरह की सजा, जुर्माना अथवा कार्यवाही का प्रावधान नहीं किया गया है. यद्यपि मसौदा नियमों में इसका प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हतोत्साहित किया जाए और इसके लिए जुर्माने का भी प्रावधान रखा गया था तथापि अंतिम अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने इस प्रावधान को हटा दिया और अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर लिया. इस कारण यूजीसी का वर्तमान अधिनियम न केवल बेहद सख्त हो जाता है बल्कि अन्यायपूर्ण भी समझ आने लगता है.

 




अतः आवश्यकता इस बात की है कि इस अधिनियम पर जल्दबाजी अथवा उतावलेपन में विरोध के बजाय व्यापक विमर्श, पारदर्शिता और हितधारकों से संवाद के साथ इसका स्वरूप निर्धारित किया जाए. शिक्षा सुधार का लक्ष्य जाति-आधारित भेदभाव नहीं बल्कि स्वतंत्र, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. यूजीसी को भी जनमानस के विचारों का सम्मान करते हुए इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. यह न केवल वर्तमान समय की माँग है बल्कि देश के शैक्षणिक भविष्य के लिए आवश्यक भी है. ध्यान रखना चाहिए कि एक वर्ग के साथ सम्भावित भेदभाव को दूर करने के प्रयास में दूसरा वर्ग भेदभाव का शिकार न हो जाये.

 


15 जनवरी 2026

जिन्दगी जिन्दाबाद: पीड़ा के विरुद्ध जिन्दगी की घोषणा - डॉ. लखन लाल पाल

जिन्दगी जिन्दाबाद’ डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की आत्मकथा है। आत्मकथा का यह दूसरा भाग उनके जीवन की एक ऐसी दुर्घटना पर केंद्रित है, जिसे पढ़ते हुए पाठक के भीतर लगातार एक टीस उठती रहती है। कई जगह पढ़ते-पढ़ते रुकना पड़ता है। यह रचना केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि उसके दर्द को जीवंत रूप में महसूस किया जाता है। घटना अत्यंत पीड़ादायक और मर्मस्पर्शी है, किंतु लेखक जिस सहजता से उसे अभिव्यक्त करता है, वह काबिले-तारीफ है। भाषा का प्रवाह इतना स्वाभाविक है कि पाठक बिना किसी अटकन या भटकन के उसके साथ बहता चला जाता है।

 

यह आत्मकथा पीड़ादायक होते हुए भी कहीं भी सहानुभूति अर्जित करने का प्रयास नहीं करती। लेखक बस कहता चला जाता है—अपने अपनों के साथ, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ। पीड़ा को पीते हुए, उसी पीड़ा के बीच वह अपने लिए हँसी-ठिठोली का एक छोटा-सा अंतराल निकाल लेता है। इस मर्माहत पीड़ा को वह अकेले ही सहने का प्रयास करता है, ताकि परिवारजन उसके दर्द को जान न सकें।

 



22 अप्रैल 2005 की शाम लेखक का ट्रेन से भीषण एक्सीडेंट हो जाता है। एक पैर जाँघ से कटकर दूर जा गिरता है, दूसरा पैर टखने से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है। कितना खून बहा होगा और वह दृश्य कितना भयावह रहा होगा—कल्पना मात्र से रूह काँप जाती है। लेखक की जीवटता का प्रमाण यह है कि इतनी भयावह स्थिति में भी वह स्वयं को बेहोश नहीं होने देता और पूरी चेतना के साथ अपने को सँभाले रखता है।     

 

हम प्रायः ऐसी घटनाएँ फिल्मों या टीवी धारावाहिकों में देखते हैं। वे क्षणिक रूप से हमें द्रवित कर देती हैं, किंतु ठीक होने की प्रक्रिया को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वास्तविक जीवन में यह प्रक्रिया हर क्षण करुण क्रंदन में बीतती है। हर पल दर्द के दरिया में डूबे रहना पड़ता है। यही दर्द का दरिया इस पूरी आत्मकथा में प्रवाहित होता रहता है।

 

इसी समय पिता का निधन, माँ की स्थिति, एक वर्ष पहले ब्याह कर आई नवयुवती पत्नी निशा और दोनों भाइयों की मानसिक अवस्था—इन सबको लेखक ने जिस संवेदनशीलता से जिया है, उसे पढ़ते हुए पाठक उन परिस्थितियों की गहराई को समझ पाता है। पर यह दर्द का दरिया उस क्षण हार मानने लगता है, जब लेखक साहस और धैर्य को अपनी नौका बना लेता है। उस नौका से वह अकेला नहीं, बल्कि पूरा परिवार, मित्र और रिश्तेदार धीरे-धीरे पार लगने लगते हैं।

 

ऑपरेशन का दृश्य, पैरों से लगातार बहता खून और तीन-चार महीनों तक चलने वाली मरहम-पट्टी—हर बार की पट्टी असहनीय पीड़ा से दिल-दिमाग को झकझोर देती है। इसके बावजूद लेखक के चेहरे पर बनी रहने वाली मीठी मुस्कान और बीच-बीच में फूट पड़ने वाले ठहाके यह एहसास ही नहीं होने देते कि वह अपने शरीर का एक आवश्यक अंग हमेशा के लिए खो चुका है और अब कृत्रिम पैर के सहारे जीवन जीना है।

 

मैं डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी से सन् 2006 से जुड़ा हूँ। दुर्घटना के बाद उन्होंने ‘स्पंदन’ पत्रिका का संपादन शुरू किया था, जिसमें मेरी एक बुंदेली कहानी प्रकाशित हुई। तभी से हम साहित्यिक मित्र बने। इन उन्नीस-बीस वर्षों में कभी यह अनुभव नहीं हुआ कि यह व्यक्ति इतनी गहरी पीड़ा से गुज़रा है—और आज भी गुज़र रहा है। यह रचना पढ़कर अब उस जीवटता का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। क्या इंसान है भाई!

 

इस आत्मकथा का एक अत्यंत प्रभावशाली जीवित पात्र डॉक्टर रवि है—लेखक का बचपन का मित्र और आर्थोपेडिक सर्जन। लेखक ने पूरे विश्वास के साथ स्वयं को उसके हवाले कर दिया था—यह सोचकर कि अब यह मुझे मरने नहीं देगा।

 

पढ़ते समय मेरा ध्यान बार-बार डॉक्टर रवि पर ठहर जाता है। उस समय उसकी मानसिक स्थिति क्या रही होगी? लेखक ने तो स्वयं को उसे सौंप दिया था, पर उसके लिए हर क्षण अनदेखी अनहोनी से जूझना था। एक डॉक्टर के लिए सभी मरीज समान होते हैं, किंतु यहाँ तो लंगोटिया यार का रिश्ता था। एक छोटी-सी चूक भी जीवन भर का बोझ बन सकती थी। ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले परिवार के हस्ताक्षर लेने का दृश्य अत्यंत हृदयविदारक है। यहाँ पेशेगत नियम और व्यक्तिगत संबंधों का द्वंद्व गहराई से उभरता है। इस रचना को पढ़ते हुए डॉक्टर रवि का पात्र लंबे समय तक मन से ओझल नहीं हो पाता।

 

आत्मकथा की भाषा-शैली, उसका प्रवाह और स्वयं तथा दूसरों की मानसिकता को अभिव्यक्त करने का कौशल इसे विशिष्ट बनाता है। यही कारण है कि यह रचना पाठक को एक ही बैठक में पढ़ने को विवश कर देती है।   

 

इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद मैं बस इतना ही कह सकता हूँ—

डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, वाकई ‘जिन्दगी जिन्दाबाद’।

-- डॉ. लखन लाल पाल की प्रतिक्रिया 

10 जनवरी 2026

भारत के लिए भावी बांग्लादेश : मित्र या शत्रु?

उथल-पुथल वाली खतरनाक स्थिति के बाद से बांग्लादेश अराजक ही बना हुआ है. वहाँ के हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों, हमलों, उनकी हत्याओं के चलते ऐसा लग रहा है कि वहाँ की प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाये जाने के बाद बनी अंतरिम सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. आन्दोलन, हिंसा, अराजकता के लम्बे दौर के बाद अब बांग्लादेश में राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं. वहाँ के चुनाव आयोग ने घोषणा करते हुए बताया कि देश में 12 फ़रवरी को राष्ट्रीय चुनाव होंगे. यहाँ विशेष बात यह भी है कि इसी दिन देश में जनमत संग्रह भी होगा. यह चुनाव बांग्लादेश में हुए छात्र नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद पहली बार होने जा रहे हैं.

 

यद्यपि बांग्लादेश में चुनावों की घोषणा से लोकतंत्र बहाली की उम्मीद जगी है तथापि वर्तमान हालातों को देखते हुए उम्मीद की किरण पर संकट के बादल भी मँडराते नजर आ रहे हैं. ऐसा इसलिए भी लग रहा है क्योंकि बांग्लादेश की राजनीति लम्बे समय से टकराव वाली रही है. वहाँ हमेशा से ही सत्ता और विपक्ष के बीच संघर्ष चलता रहा है. मुख्य दलों में से एक का कट्टरपंथ की तरफ झुकाव होने, भारत के प्रति नकारात्मक भाव रखने और दूसरे का लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास होने, भारत के प्रति सद्भाव रखने के कारण वहाँ वैचारिक विभेद भी खुलकर सामने आता रहा है. इसी के चलते वहाँ के चुनावों की निष्पक्षता पर आये दिन सवाल उठते रहे हैं. वैचारिक विभेद सिर्फ विरोध के स्तर पर ही नहीं रहा बल्कि इसका स्वरूप हिंसात्मक भी रहा, जिसके चलते बांग्लादेश में अकसर राजनीतिक तनाव, हिंसात्मक गतिविधियाँ, नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश आदि देखने को मिलता रहा  है. ऐसे वातावरण से समाज में, जनसामान्य में भय और असुरक्षा का माहौल दिखाई पड़ता रहा है.

 



विगत समय के राजनीतिक संक्रमण, सामाजिक तनाव और आर्थिक दबावों के बीच देश आगामी चुनावों की ओर बढ़ रहा है. तनाव, हिंसा, अराजकता के बीच के जो भी हालात बने उसने केवल सत्ता परिवर्तन ही किया और उसके पश्चात् बांग्लादेश को अराजक बना दिया. ऐसे घटनाक्रमों ने बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य, सामाजिक ताने-बाने और क्षेत्रीय स्थिरता को भी गहराई से प्रभावित किया है. अतीत की उपजी राजनीतिक अनिश्चितता का प्रभाव समाज पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. राजधानी ढाका के साथ-साथ अन्य शहर सुरक्षा व्यवस्था के घेरे में हैं, इसके बाद भी हिंसात्मक गतिविधियों में कमी नहीं आई है. जनसामान्य में, हिन्दुओं में, अल्पसंख्यकों में भय का वातावरण बना हुआ है. अब जबकि चुनावों की घोषणा हो चुकी है तब वहाँ के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र की बहाली जैसे विषय चर्चा के केन्द्र-बिन्दु बने हुए हैं. आन्दोलन के बाद उपजी हिंसा की आग और अब चुनावी लहर के माहौल में वहाँ की अंतरिम सरकार को, चुनाव आयोग को, सुरक्षा एजेंसियों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरफ की लापरवाह स्थिति अब वहाँ पनपने न पाए. इस तरह के संवेदनशील माहौल में किसी भी तरह की लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है.

 

बांग्लादेश के खतरनाक हालातों के स्थायी समाधान के लिए समावेशी राजनीति, पारदर्शी शासन और मानवाधिकारों के सम्मान आदि की आवश्यकता है. यदि समय रहते संतुलित और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए तो ये हालात देश की स्थिरता और विकास के लिए और भी गम्भीर खतरा बन सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय और पड़ोसी देशों की नजरें भी बांग्लादेश पर टिकी हैं. शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव न केवल देश के भीतर विश्वास बहाल करेंगे बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को भी मजबूत करेंगे. आगामी माह में सम्भावित चुनावों के पश्चात् बांग्लादेश की स्थिति का असर भारत पर भी सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप में पड़ेगा, इसे भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है. अंतरिम सरकार बनने के बाद भी जिस तरह से अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं, वह चिंता का विषय है. पिछले दिनों बांग्लादेश की अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद युनुस द्वारा पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारी जनरल साहिर शमशाद मिर्ज़ा को एक पुस्तक (आर्ट ऑफ़ ट्रायंफ: बांग्लादेश द न्यू डॉन) और विवादित मानचित्र का उपहार में दिया जाना भारत के प्रति उनकी मानसिकता को ही दर्शाता है. उस मानचित्र में बिहार, झारखंड, ओड़िशा, असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों को ग्रेटर बांग्लादेश के रूप में दिखाया गया है. इस तरह का कृत्य निश्चित रूप से भारत के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने के कारण ही अंजाम दिया गया है. ऐसे में भारत को अत्यंत सजग, सचेत रहने की आवश्यकता है.

 

कुल मिलाकर बांग्लादेश आज जिस स्थिति में है उसके अनुसार वहाँ शांति बहाली का रास्ता आसान नजर नहीं आ रहा है. ऐसी स्थिति में वहाँ के संवेदनशील जनप्रतिनिधियों को आगे आकर राजनीतिक समझदारी, संस्थागत पारदर्शिता और जनहित को प्राथमिकता देनी होगी. आम जनमानस में सरकार के, लोकतंत्र के प्रति विश्वास जगाना होगा और उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाना होगा. देश के युवाओं को समझाना होगा कि लोकतान्त्रिक मूल्यों और शांति बहाली से ही उनके लिए नए अवसरों के द्वार खोले जा सकते हैं. आने वाला समय यह तो तय करेगा ही कि बांग्लादेश अस्थिरता की ओर बढ़ेगा या लोकतांत्रिक मजबूती की ओर, इसके साथ ही यह भी निर्धारित हो सकेगा कि वह भारत के लिए किस रूप में सामने आ रहा है, मित्र रूप में अथवा शत्रु रूप में.


04 जनवरी 2026

उँगलियाँ बनी आँखें, बिन्दु बने अक्षर

04 जनवरी को ब्रेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2018 में आधिकारिक रूप से 04 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस घोषित किया. इसके बाद ही पहला अंतरराष्ट्रीय ब्रेल दिवस 04 जनवरी 2019 को मनाया गया. यह दिवस लुईस ब्रेल के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने दृष्टिहीनों के लिए एक लिपि का निर्माण किया. उनके नाम पर ही इस लिपि को ब्रेल लिपि कहते हैं. इस लिपि में बिन्दु का प्रयोग किया जाता है और इनको उँगलियों के पोरों के सहारे छू कर महसूस किया जाता है. एक-एक बिन्दु के स्पर्श से शब्द का निर्माण होता है और दृष्टिहीन व्यक्ति अपनी पढ़ाई को पूरा करता है.

 


लुईस ब्रेल का जन्म फ्रांस के कुप्रे गाँव में 04 जनवरी 1809 को हुआ था. मात्र तीन वर्ष की उम्र में खेलते समय चाकू जैसे एक औजार की चोट से उनकी एक आँख में चोट लग गई. आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण बच्चे लुईस को सही से इलाज न मिल सका. इस कारण से चोटिल आँख का इन्फेक्शन दूसरी आँख में भी फैल गया. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आठ वर्ष की उम्र तक आते-आते लुईस पूरी तरह नेत्रहीन हो गए. लुईस जब बारह वर्ष के हुए उसी समय उनको जानकारी मिली कि फ्रांसीसी सेना के लिए ‘नाइट राइटिंग’ नामक एक खास कूटलिपि बनाई गई है, इस लिपि के द्वारा सैनिक अंधेरे में गुप्त संदेश पढ़ सकते हैं. लुईस ने अपने स्कूल के पादरी के माध्यम से इस कूटलिपि को विकसित करने वाले कैप्टन चार्ल्स बार्बर से मुलाकात की. इनसे मुलाकात के बाद ही उनके मन में नेत्रहीनों के लिए एक लिपि बनाने का विचार आया. इसके बाद सन 1829 तक छह बिन्दुओं पर आधारित ‘ब्रेल लिपि’ तैयार कर ली.

 

वर्तमान में इस लिपि की तकनीक को इतना उन्नत कर लिया गया है कि अब इसका उपयोग कम्प्यूटर कीबोर्ड और स्मार्टफोन के सॉफ्टवेयर में भी व्यापक रूप से किया जा रहा है.