इसे वही समझ सकते हैं जो संयुक्त परिवार में रहते हैं या रहे हैं... या फिर जिनके
घर में पर्व-त्यौहार-किसी आयोजन में समूचे नाते-रिश्तेदार जुटते हैं... एकसाथ एक ही
घर में रहते हैं....
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सोचिए एक पल को कि घर-परिवार के सब लोग, नाते-रिश्तेदार एकसाथ किसी आयोजन में मिले. पंद्रह-बीस
लोगों से घर में चहल-पहल मची है, हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है. ऐसे में भोजन के समय चार-चार, पाँच-पाँच लोग सहजता से खाना खाते जा रहे हैं. रसोई में
घर की महिलाएँ हँसी-मजाक के साथ सभी को सहजता के साथ भोजन उपलब्ध कराती जा रहीं हैं.
किसी दिन इस हँसी-मजाक में, हल्ला-गुल्ला में परिवार में जुटे सभी लोग एकसाथ भोजन करने बैठ जाते हैं,
एक-दूसरे के साथ भोजन करने की ललक में.
ऐसा होता है बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना किसी पूर्व जानकारी के... अचानक से ही. चार-छह लगी थालियों में ही परिवार
के कई लोग एकसाथ बैठकर मिलजुल कर भोजन करने लगते हैं. किसी की थाली से सब्जी,
किसी की थाली से दाल, किसी की थाली से अचार, किसी की थाली से रोटी, किसी की थाली से रायता.... अब फिर सोचिए कि क्या
स्थिति उत्पन्न होगी? भोजन करने
वाले तो हँसी-मजाक करते हुए बिना कुछ परवाह किये खाना खाने में लगे हैं तभी अचानक से
रसोई से रोटियाँ आने की गति रुक जाती है या कहें कि रोटियों का आना रुक सा जाता है.
ऐसा नहीं है कि रसोई में घर की महिलाएँ रोटियाँ नहीं बना रहीं. ऐसा भी नहीं कि
आटा समाप्त हो गया हो. ऐसा भी नहीं कि किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न हो गई हो. इसके
बाद भी रोटियों के आने की गति थम गई, रोटियाँ एक-दो, एक-दो करके
आने लगीं, बाहर खाने के लिए जुटे
सभी लोगों को रोटियों की उपलब्धता सहजता से नहीं हो पा रही. किसी को आधी रोटी मिल रही,
किसी को उसी में से एक कौर मिल रहा, कोई किसी की थाली में आने के पहले ही रोटी का कौर उसके हाथ से खींच ले रहा. इन
सबके बीच कोई रोष नहीं, कोई गुस्सा
नहीं, कोई गाली-गलौज नहीं बल्कि
हँसी-मजाक और बढ़ने लगता है, आपसी
प्रेम और नजर आने लगता है.
क्यों नहीं कोई व्यक्ति बाहर सड़क पर जाकर कूड़े के ढेर में रोटी तलाशने लगता है?
क्यों नहीं रोटी का एक कौर भी न हासिल
कर पाने वाला व्यक्ति घर की महिलाओं की बुराई करने लगता है? क्यों नहीं घर का कोई सदस्य नाली से गंदगी निकाल कर रोटी
की जगह खाने लगता है? और भी बहुत
कुछ क्यों नहीं होता है? फिर सोचिए,
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिवार के सभी
सदस्यों में आपस में प्रेम-भाव है, एक-दूसरे के प्रति सम्मान है, एक-दूसरे की स्थिति का भान है. यही नहीं है हम सबमें. समाज में व्यक्तिगत रूप से
जो है वो पहले हमारे लिए है. समाज में जो है वो पहले हमें मिले. इस तरह की मानसिकता
से न समाज का भला होता है और न ही देश का. कुछ ऐसा ही इस समय दिख रहा है. घर में एक
सिलेंडर भरा रखा है मगर एक और मिल जाए. बाकी का क्या ही लिखें. जो युद्ध की माँग करते
हैं, सीमा पर जान देने का दम भरते
हैं, वे दो-चार रोज की स्थिति में
अपनी ही गैस निकाल बैठे.




