21 अगस्त 2026

आरक्षण पर हो पुनर्विचार

इन दिनों आरक्षण एक ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा हुआ है. विगत कई दशकों से यह एक ऐसा विषय बना हुआ है जिस पर बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर लगातार बहस होती रही है. एक सवाल बार-बार उठता रहा है कि क्या आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करने में सफल हो सकी है? आरक्षण की विगत यात्रा पर नजर डालें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि इसके कारण अब समाज में असंतोष और विभेद पनपने लगा है. स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारतीय समाज एक तरह की विषमता और भेदभाव में जकड़ा हुआ था. हाशिये पर खड़े वर्गों को समानता दिलाने के लिए, उनको मुख्यधारा में जोड़ने के लिए संविधान निर्माताओं ने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर समावेशी प्रावधान की कल्पना की. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) और 16(4ए) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण की व्यवस्था लागू की. सामाजिक विभेद को दूर करने के साथ-साथ आर्थिक विषमता को दूर करने के उद्देश्य से 103वाँ संविधान संशोधन (2019) लागू करके आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का नया प्रावधान जोड़ा गया.

 



कालांतर में आरक्षण सम्बन्धी स्थिति में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग को भी शामिल किया गया. आरक्षण सम्बन्धी व्यवस्था को लेकर, इसके क्रियान्वयन को लेकर समाज में असंतोष भी उपजता रहा. ऐसे में न्यायालयों द्वारा भी समय-समय पर इसकी समीक्षा की गई. इंद्र साहनी बनाम भारत संघ (1992) के ऐतिहासिक निर्णय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक तय की तथा क्रीमीलेयर की अवधारणा को जन्म दिया. इसके अलावा एम. नागराज (2006)  मामले में स्पष्ट किया गया कि प्रमोशन में आरक्षण देते समय प्रशासनिक दक्षता को बनाए रखना आवश्यक है. इसके बावजूद अनेक विसंगतियों ने इस व्यवस्था को आलोचनाओं के घेरे में खड़ा कर दिया है. प्रवेश परीक्षाओं, नौकरियों में सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को अत्यधिक अंक लाने के बावजूद बाहर होना पड़ता है जबकि कम अथवा ऋणात्मक अंक पाने के बाद भी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी चयनित हो जाते हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रीमीलेयर सीमा निर्धारित किये जाने के बाद भी सम्पन्न परिवारों की कई पीढ़ियाँ ही लाभान्वित हो रही हैं. एससी/एसटी वर्ग में क्रीमीलेयर व्यवस्था लागू न होने के कारण इस वर्ग के उच्च पदस्थ परिवार ही आरक्षण का दोहन कर रहे हैं. ऐसी स्थिति के कारण यह व्यवस्था न्यायसंगत प्रतीत नहीं हो रही. आरक्षण का जो उद्देश्य निर्धारित किया गया था वह समस्त जरूरतमंदों तक पहुँचने के स्थान पर सीमित परिवारों तक सिमट गया है. ऐसी अनेकानेक विसंगतियों के कारण आरक्षण की व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा होने की माँग उठने लगी है. आलोचकों का सुझाव है कि जाति आधारित आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त करके उसके स्थान पर आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू किया जाये.

 

यदि सैद्धांतिक अथवा व्यावहारिक रूप से केन्द्र सरकार कभी आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह हटाने का विचार करती है तो यह राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी दृष्टि में एक अभूतपूर्व चुनौती होगी. इसके लिए सरकार को अनेक स्तरों पर चरणबद्ध कानूनी, विधायी कदम उठाने होंगे. सरकार को सबसे पहले संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन विधेयक पारित कराना अनिवार्य होगा. यहाँ ध्यान रखना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 368(2) के अनुसार यदि कोई ऐसा संशोधन किया जाता है जो देश के संघीय स्वरूप को प्रभावित करता है तो उसे देश की कम से कम आधी विधानसभाओं से साधारण बहुमत द्वारा अनुमोदित कराना पड़ता है. चूँकि राजनीतिक रूप से देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों, विभिन्न विचारधाराओं की सरकारें कार्य करती हैं इसलिए राज्य स्तर पर इस प्रकार की सहमति प्राप्त करना केन्द्र सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी.

 

संविधान संशोधन सम्बन्धी कदम के साथ-साथ न्यायिक स्तर पर भी सरकार को जवाबदेह होना पड़ेगा. देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनिश्चित किया जाता है कि संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय का सिद्धांत आहत न हो. यदि कोई कानून अथवा संशोधन समानता के मूल अधिकार की अवधारणा को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास करता है तो उसे न्यायिक समीक्षा के द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है. ऐसे में केन्द्र सरकार को न्यायालय के समक्ष यह सिद्ध करना होगा कि यह कदम देश के हित में किस प्रकार आवश्यक है और इसके विकल्प के रूप में अन्य कौन सी नीतियाँ क्रियान्वित की जाएँगी. इन औपचारिक और विधायी कदमों के अलावा सरकार को देश की सामाजिक, राजनीतिक स्थिति पर भी विचार करना होगा. आरक्षण अब सामाजिक स्तर सुधारने, वंचित वर्गों को लाभान्वित करने की दृष्टि से कम, राजनीतिक लाभ के लिए ज्यादा प्रभावी माना जाने लगा है. ऐसे में आरक्षण हटाने मात्र के विचार से ही सामाजिक असंतोष, हिंसक प्रदर्शन, राजनीतिक अस्थिरता देश को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है, देश में गम्भीर आंतरिक अशांति फैल सकती है. जातिगत आरक्षण को हटाना, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करना केन्द्र सरकार और नीति निर्माताओं के लिए संवेदनशील संतुलन साधने जैसी चुनौती है.

 

विगत वर्षों की लगभग असफल आरक्षण व्यवस्था को देखने के बाद सामान्य वर्ग के, प्रतिभावान युवाओं की आकांक्षाओं, वैश्विक मानकों, योग्यता आधारित व्यवस्था की माँग को दरकिनार नहीं किया जा सकता वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय के संवैधानिक संकल्प को भी नहीं छोड़ा जा सकता है. ऐसे में आरक्षण व्यवस्था को गतिशील और पारदर्शी बनाया जाए, क्रीमीलेयर नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए ताकि वास्तविक जरूरतमंदों को इसका लाभ मिले. शिक्षा, नौकरी के लिए आरक्षण के साथ-साथ प्रतिभाओं को भी अवसर दिया जाये. नीति-नियंताओं को, राजनीतिज्ञों को ध्यान रखना होगा कि अब समय आ गया है कि राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर ऐसी राष्ट्रीय नीति पर विचार किया जाए जो योग्यता का सम्मान करे और वंचितों को संबल प्रदान करे.


11 अगस्त 2026

हिन्दी के पंचम वर्ण का प्रयोग

हिन्दी की जितनी दुर्दशा, दुर्गति हम हिन्दी वालों ने की है, उतनी तो शायद लॉर्ड मैकाले की औलादों ने भी नहीं की होगी. इधर सोशल मीडिया के स्थानीय संस्करणों में उरई  का एक वीडियो तैरने में लगा है, जिसमें एक विद्यालय के नाम को लेकर पत्रकारिता आजमाई जा रही है. पत्रकारिता के नाम पर अब तो किसी डिग्री की, डिप्लोमा की, किसी संस्थान की, कैमरे की आवश्यकता ही नहीं, बस जेब में हाथ डाला, मोबाइल निकाला और बन गए पत्रकार. ऐसे ही किसी पत्रकार महोदय द्वारा एक द्वार का वीडियो बनाया गया और सोशल मीडिया पर उछाल दिया गया. इस उछाल के साथ एक सवाल भी चिपका दिया गया मगर बिना किसी ज्ञान के साथ,  बिना किसी व्याकरण की जानकारी के.

 

समस्या अकेले उन महाशय की नहीं, समस्या उनके साथ उछलते अनेक ज्ञानियों की है जिन्होंने हिन्दी व्याकरण तो छोड़िए, हिन्दी से भी उतना ही नाता रखा है, जितना घर-बाजार में बोलने के काम आता है. हिन्दी व्याकरण से, उसके सामान्य रूप से, वर्णों से, वर्णमाला के वर्गों से, पंचम वर्णों से, उनके प्रयोग से कोई लेना-देना नहीं है. लॉर्ड मैकाले की दुनिया में विचरण करते इन लोगों को हिन्दी की सामान्य जानकारी ही नहीं और ऐसे लोग ही इधर-उधर हिन्दी के प्रति सवाल उठाते हुए उसे बदनाम करने का काम करते रहते हैं.

 



यहाँ उस वीडियो से, उस नाम से, उस विद्यालय से सन्दर्भ भले हो  मगर उनकी चर्चा किये बिना सीधे-सीधे हिन्दी के वर्गों, पंचम वर्णों के बारे में कुछ सामान्य जानकारी दे दें. इसी से अंदाजा लगा लिया जायेगा कि उस वीडियो की, विद्यालय के लिखे नाम की वास्तविकता क्या है. हिन्दी वर्णमाला में स्वर, व्यंजन के बारे में तो आपको जानकारी होगी ही और संभवतः उनको भी जानकारी होगी जो उस वीडियो के आसपास भटक रहे हैं.

 

अब हिन्दी वर्णमाला के स्वर, व्यंजन पर चर्चा करने के बजाय चर्चा करते हैं वर्गों की. यहाँ सामान्य रूप से ये वर्ग स्वीकार्य हैं....

क वर्ग = इसमें आते हैं क,,,, 

च वर्ग = इसमें हैं च,,,,

ट वर्ग = इस वर्ग में हैं ट, ठ, ड,,

त वर्ग = इसमें हैं त, थ, द, ध, न

प वर्ग =  इसमें प, फ, ब, भ,

 

अब बात करते हैं लिखने में इनके प्रयोग की. जिस शब्द ‘गांधी’ की बात हो रही है, जो ‘गान्धी’ लिखा हुआ है. इसी से समझा जाये. जब किसी शब्द को लिखने में उस वर्ग के पंचम वर्ण का प्रयोग होता है तो वह उसी वर्ग के वर्ण के ठीक पहले अर्धरूप प्रयोग किया जाता है. जैसे ‘गांधी’ में ‘ध’ के पूर्व पंचम वर्ण का प्रयोग किया जाना है तो यहाँ देखना होगा कि ‘ध’ है त वर्ग का और त वर्ग का पंचम वर्ण है ‘न’ इसलिए हिन्दी व्याकरण के अनुसार ‘गांधी’ में ‘ध’ के पूर्व इस वर्ग का पंचम वर्ण ‘न’ अर्धरूप में आएगा अर्थात ‘आधे न’ के रूप में. इसलिए सही शब्द होगा ‘गान्धी’. लेखन में और टाइपिंग में सहजता बनाने के लिए पंचम वर्ण को आधा लिखने के स्थान पर अनुस्वार (अर्थात बिन्दु के रूप में) लगाया जाना मान्य किया गया है. इसलिए सर्वमान्य रूप में ‘गान्धी’ को ‘गांधी’ लिखा हुआ ही सही समझा जाने लगा है. (वैसे वीडियोधारी पत्रकार महोदय और उनके संगी-साथियों के लिए अनुस्वार, अनुनासिका शब्द भी अपरिचित होंगे. इस पर बाद में.)

 

इस विद्यालय के बोर्ड में आगे ‘इण्टर’ लिखा हुआ है. पता नहीं पत्रकार महाशय के कैमरे ने इसे गलत क्यों नहीं बताया? सम्भव है कि वे इसे ‘इंटर’ लिखे जाने का समर्थन करते हुए ‘इण्टर’ को गलत बता देते. यहाँ भी एक मिनट रुककर पंचम वर्ण और वर्ग के साथ समझ लें तो आने वाले समय में बहुत से इण्टर कॉलेज बचे रहेंगे कैमरे से. ‘इण्टर’ को देखिये और समझिये. यहाँ आधा वर्ण आना है ट वर्ग के पहले, ऐसे में इसी वर्ग का पंचम वर्ण आधा होकर लगेगा. अब गौर करिए ट वर्ग पर, इसका पंचम वर्ण है ‘ण’ और इसे ही आधा होना है. अब यह ‘ट’ के पहले आधा होगा तो सही शब्द होगा ‘इण्टर’. बाकी तो ये है कि टाइपिंग और लेखन की सहजता के लिए इसे ‘इंटर’ भी लिखा जाने लगा है. यह भी सही है. इस सही का तात्पर्य यह कतई नहीं कि ‘इण्टर’ गलत है.

 

हाँ, ये याद रखियेगा कि गांधी या गान्धी के स्थान पर गाँधी अवश्य ही गलत है. ऐसा इसलिए क्योंकि गांधी में स्वर अनुनासिका (चन्द्रबिन्दु) के स्थान पर अनुस्वार (बिन्दु) का है. नहीं हो रहा हो विश्वास तो चन्द्रबिन्दु (अनुनासिका) और बिन्दु (अनुस्वार) का उच्चारण करके देखना, सही शब्द पकड़ में आ जाएगा. हिन्दी का सम्मान न कर सकें, उसके प्रति आप ज्ञानवान न बन सकें तो कम से कम हिन्दी का अपमान तो न करें.


09 अगस्त 2026

लौट न आये नकदी अर्थव्यवस्था

वर्तमान में भुगतान के सम्बन्ध में या कहें कि लेनदेन के लिए यूपीआई का उपयोग क्रांतिकारी स्तर पर होने लगा है. यूपीआई अर्थात यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस के चलते होने वाले डिजिटल भुगतान ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी है. फुटपाथ पर लगने वाली छोटी-छोटी दुकानें हों, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल हों या फिर व्यक्तिगत लेनदेन हो, सभी जगहों पर कुल पलों में भुगतान करने की इस सुविधा ने देश को डिजिटल लेनदेन में वैश्विक स्तर पर अग्रणी सिद्ध किया है. समाज के प्रत्येक वर्ग के बीच लोकप्रिय इस प्लेटफ़ॉर्म को लेकर उस समय बहस की स्थिति दिखाई दी जबकि यूपीई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट सम्बन्धी बदलावों की बात सरकारी स्तर से की जाने लगी. यद्यपि सरकारी स्तर से इसे आम नागरिकों के लिए निशुल्क रहने की बात कही गई तथापि डिजिटल भुगतान में किसी भी प्रकार का शुल्क लगाया जाना भारतीय अर्थव्यवस्था कई दूरगामी प्रभाव अवश्य ही छोड़ेगा.

 

यूपीआई पर शुल्क लगाए जाने को यदि सरकारी दृष्टि से देखें तो यह उनके बुनियादी ढाँचे को दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता, मजबूती प्रदान कर सकता है. इसका कारण यह है कि वर्तमान में इस नेटवर्क के भुगतान में बैंकों, फिनटेक कंपनियों और नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया का योगदान रहता है. प्रतिदिन करोड़ों रुपये के लेनदेन को पूर्ण पारदर्शिता के साथ संचालित करने के लिए उच्च स्तरीय नेटवर्किंग व्यवस्था की, साइबर सुरक्षा सहित अन्य प्रणालियों की आवश्यकता होती है. ऐसे में शुल्क रहित व्यवस्था के कारण इन कंपनियों और बैंकों को सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहना पड़ रहा है. यदि शुल्क व्यवस्था लागू होती है तो इन कंपनियों और बैंकों का सशक्त राजस्व मॉडल विकसित हो सकेगा जिसका उपयोग सर्वर क्षमता बढ़ाने, तकनीकी विफलताओं को रोकने, साइबर सुरक्षा को बढ़ाने में किया जा सकता है. ऐसा होने से यूपीआई के उपयोगकर्ताओं को सुरक्षित रखा जा सकता है.

 

यूपीआई लेनदेन के सम्बन्ध में शुल्क लगाये जाने का एक कारण अति-लघु लेनदेन के चलते सर्वर पर, बैंकिंग व्यवस्था पर पड़ने वाले अत्यधिक दबाव का नियंत्रित होना भी बताया जा रहा है. यह प्रथम दृष्टया उचित भी प्रतीत होता है क्योंकि हम सभी लोग बहुधा बहुत छोटी-छोटी राशियों के लिए भी बार-बार यूपीआई का प्रयोग करते हैं. इस प्रकार का लेनदेन, भुगतान भले ही डिजिटल रूप में हो रहा होता है किन्तु इसका बोझ बैंकिंग नेटवर्क पर पड़ता है. सम्भव है कि उचित शुल्क के लगाये जाने के बाद उपयोगकर्ता स्वयं को नियंत्रित करते हुए आवश्यकता के अनुसार ही अपने लेनदेन को निर्धारित करेंगे. इससे जहाँ एक तरफ नेटवर्क और बैंकिंग व्यवस्था पर अनावश्यक भार में कमी आ सकती है साथ ही डिजिटल नेटवर्क दक्षता में सुधार होने की सम्भावना है.

 

ऐसा नहीं है कि यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाया जाना सिर्फ लाभकारी ही होगा. इसके कुछ हानियाँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जिननके चलते सरकार को इसके लागू किये जाने पर विचार करने की आवश्यकता है. देश में जिस तरह से लोगों ने डिजिटल भुगतान व्यवस्था को अपनाया है यह नागरिकों के विश्वास को दर्शाता है. ऐसे में यदि शुल्क लगाया जाता है तो सम्भव है कि इसका सबसे बड़ा नुकसान देश के डिजिटल समावेशी अभियान को हो. देश की बहुत बड़ी जनसंख्या डिजिटल माध्यम को इसके पूरी तरह निशुल्क, आसान और सुरक्षित रहने के कारण अपनाया है. ऐसे में यदि शुल्क लगता है तो सम्भव है कि बहुत बड़ी संख्या में लोग वापस नकदी आधारित अर्थव्यवस्था को अपना लें. ऐसा विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में होने की आशंका अधिक है क्योंकि वहाँ डिजिटल साक्षरता अभी विकास के क्रम में है. डिजिटल भुगतान व्यवस्था में शुल्क का लगाया जाना इन लोगों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से दूर कर सकता है.

 

यूपीआई भुगतान के दौर में देखने में आया है कि व्यापारिक स्तर पर अनेक जगहों पर टैक्स चोरी पर एक तरह का नियंत्रण लगा है. शुल्क का लगाया इसे पुनः प्रभावित कर सकता है. सरकार की ओर से भले ही इस शुल्क को बड़े व्यापारियों का बड़े-बड़े भुगतान के सम्बन्ध में लगाने की बात कही जा रही हो किन्तु आर्थिक क्षेत्र में यह सहजता से देखा जाता है कि व्यापारी अपने ऊपर पड़ने वाले अतिरिक्त भार को ग्राहकों पर डाल देते हैं. शुल्क लगाये जाने की स्थिति में भी ऐसा हो सकता है. इससे यूपीआई के स्थान पर नकद भुगतान की माँग बढ़ेगी, जिससे कर चोरी को बढ़ावा मिलने की आशंका है. इसके अलावा देश को कैशलेस बनाने का जो सपना केन्द्रीय स्तर पर देखा गया है उस पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. नोटों की छपाई, उनका परिवहन, प्रबंधन आदि में सरकार को भारी लागत उठानी पड़ती है. इस लागत को डिजिटल भुगतान ने बहुत हद तक कम कर दिया था. अब जबकि यदि डिजिटल भुगतान पर शुल्क आरोपित किये जाने से डिजिटल भुगतान में गिरावट का आना सरकार की उस लागत बढ़ा सकती है जो नोटों के सन्दर्भ में आती है.

 

निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो डिजिटल भुगतान को पूरी तरह न तो सब्सिडी पर बनाये रखा जा सकता है और न ही इसे किसी तरह के भारी-भरकम शुल्क के साथ बनाये रखा जा सकता है. भारत जैसी विशाल और विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था में सरकार को मध्यम मार्ग अपनाने का व्यावहारिक समाधान सोचना चाहिए. प्रयास यह किया जाये कि आम नागरिकों के व्यक्ति से व्यक्ति सम्बन्धी लेनदेन को तथा छोटे, मध्यम स्तर के व्यापारियों को शुल्क से मुक्त रखा जाए. बहुत बड़े व्यावसायिक लेनदेन पर, कॉर्पोरेट भुगतानों पर शुल्क का आरोपण किया जाना चाहिए. यहाँ ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि पारदर्शिता और जन-सहभागिता डिजिटल भुगतान का आधार है. ऐसे में यदि देश में डिजिटल क्रांति को बनाये रखना है तो प्रयास यही होना चाहिए कि एक तो जनता में किसी तरह का भ्रम न फैले, दूसरे उनके विश्वास पर शुल्क का बोझ किसी तरह की चोट न करे.


07 अगस्त 2026

वीडियो के द्वारा जानें समर्थ एकाउंट ट्रांसफर की प्रक्रिया


 

जिन प्राध्यापकों का स्थानांतरण हुआ है और उनको अपना समर्थ एकाउंट भी स्थानांतरित करवाना है, वे निम्न प्रपत्रों को, दस्तावेजों को क्रम से लगाकर उसकी पीडीएफ बना लें.

1. जिस महाविद्यालय से आपका स्थानांतरण हुआ है अर्थात जिस महाविद्यालय में आपकी नियुक्ति हुई थी, वहाँ के प्राचार्य द्वारा महाविद्यालय के लैटर हेड पर एक Covering letter बनाया जायेगा. इस कवरिंग लैटर में मुख्य रूप से ट्रांसफर हुए प्राध्यापक का eHRMS Code को दर्शाना होगा.

2. एकल स्थानांतरण की लिस्ट उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से घोषित की जाती है. इस सूची में उन प्राध्यापकों का नाम होता है जिनका ट्रांसफर किया गया है. इसके साथ ही नियुक्ति वाले महाविद्यालय का तथा उस महाविद्यालय का नाम होता है जहाँ ट्रांसफर किया गया है. इस पूरी लिस्ट को सम्बंधित प्राध्यापक को लगाना होता है.   

3. इसके बाद तीसरे स्थान पर लगेगा प्राध्यापक के नियुक्ति वाले महाविद्यालय से निर्गत किया गया रिलीविंग ऑर्डर. यदि सम्बंधित प्राध्यापक को उसके महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र और प्राचार्य द्वारा अलग-अलग ऑर्डर निर्गत किये गए हैं तो वे दोनों प्रपत्र संलग्न किये जायेंगे.

4. सम्बंधित प्रपत्रों के चौथे क्रम में प्राध्यापक को उस महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र द्वारा जारी किया गया नियुक्ति पत्र  (Appointment Letter) लगाना होगा, जहाँ कि उसका ट्रांसफर हुआ है.   

5. अंतिम प्रपत्र के रूप में स्थानांतरित किये गए महाविद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी प्रपत्र को लगाना होगा. इसमें कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी पत्र, कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी आख्या वाले प्रपत्र को लगाना होगा.


सम्बंधित प्राध्यापक इसका ध्यान अवश्य ही रखें कि उक्त सभी प्रपत्रों की पीडीएफ फॉर्मेट में एक फाइल बनानी होगी.

 

इन प्रपत्रों की एक फाइल (पीडीएफ फॉर्मेट में) बनाकर महाविद्यालय (जहाँ से प्राध्यापक का ट्रांसफर हुआ है) से मेल करवा देना है. मेल यहाँ भेजनी है- uphed.samarth@gmail.com


04 अगस्त 2026

समर्थ एकाउंट के ट्रांसफर की प्रक्रिया

ये पोस्ट विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के अशासकीय महाविद्यालयों के उन प्राध्यापकों के सन्दर्भ में है, जिनका एकल स्थानांतरण हुआ है. ये स्थानांतरण एक अशासकीय महाविद्यालय से दूसरे अशासकीय महाविद्यालय के लिए उत्तर प्रदेश शासन की नीतियों के अंतर्गत किया जाता है. अशासकीय महाविद्यालय के प्राध्यापकों के एकल स्थानांतरण की प्रक्रिया के बारे में आगे किसी अन्य पोस्ट में विस्तार से बताने का प्रयास किया जायेगा. आइये अभी इस पोस्ट के माध्यम से समझते हैं कि स्थानांतरण के पश्चात् अपने समर्थ एकाउंट को कैसे स्थानांतरित करवाया जा सकता है.

 

स्थानांतरण के पूर्व जिस प्राध्यापक की नियुक्ति जिस महाविद्यालय में हुई थी, उसका समर्थ एकाउंट भी उसी महाविद्यालय में बना होता है. समर्थ पोर्टल पर अपने एकाउंट में लॉग इन करने के लिए किसी भी प्राध्यापक द्वारा एक यूजरनेम का उपयोग किया जाता है. सामान्य रूप में यह यूजरनेम eHRMS Code होता है, इसे मानव सम्पदा कोड भी कहते हैं. समर्थ एकाउंट के ट्रांसफर के लिए इस कोड को भी सम्बंधित प्राधिकारी तक भेजना होता है. इसके साथ-साथ कुछ प्रपत्रों को, दस्तावेजों को भी भेजना होता है. ये प्रपत्र संख्या में चार-पाँच ही हैं मगर इनको बनाते समय कुछ ध्यान देने योग्य बातें हैं-

एक तो इन प्रपत्रों को उसी क्रम से लगाना है, जैसा कि यहाँ बताया गया है.

दूसरे, इन सभी प्रपत्रों को पीडीएफ फॉर्मेट में एक फाइल के रूप में बनाना होता है.

इस एक पीडीएफ को फिर पुराने महाविद्यालय के द्वारा मेल किया जाता है.

 



जिन प्राध्यापकों का स्थानांतरण हुआ है और उनको अपना समर्थ एकाउंट भी स्थानांतरित करवाना है, वे निम्न प्रपत्रों को, दस्तावेजों को क्रम से लगाकर उसकी पीडीएफ बना लें.

1. जिस महाविद्यालय से आपका स्थानांतरण हुआ है अर्थात जिस महाविद्यालय में आपकी नियुक्ति हुई थी, वहाँ के प्राचार्य द्वारा महाविद्यालय के लैटर हेड पर एक Covering letter बनाया जायेगा. इस कवरिंग लैटर में मुख्य रूप से ट्रांसफर हुए प्राध्यापक का eHRMS Code को दर्शाना होगा.

2. एकल स्थानांतरण की लिस्ट उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से घोषित की जाती है. इस सूची में उन प्राध्यापकों का नाम होता है जिनका ट्रांसफर किया गया है. इसके साथ ही नियुक्ति वाले महाविद्यालय का तथा उस महाविद्यालय का नाम होता है जहाँ ट्रांसफर किया गया है. इस पूरी लिस्ट को सम्बंधित प्राध्यापक को लगाना होता है.   

3. इसके बाद तीसरे स्थान पर लगेगा प्राध्यापक के नियुक्ति वाले महाविद्यालय से निर्गत किया गया रिलीविंग ऑर्डर. यदि सम्बंधित प्राध्यापक को उसके महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र और प्राचार्य द्वारा अलग-अलग ऑर्डर निर्गत किये गए हैं तो वे दोनों प्रपत्र संलग्न किये जायेंगे.

4. सम्बंधित प्रपत्रों के चौथे क्रम में प्राध्यापक को उस महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र द्वारा जारी किया गया नियुक्ति पत्र  (Appointment Letter) लगाना होगा, जहाँ कि उसका ट्रांसफर हुआ है.   

5. अंतिम प्रपत्र के रूप में स्थानांतरित किये गए महाविद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी प्रपत्र को लगाना होगा. इसमें कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी पत्र, कार्यभार ग्रहण करने सम्बन्धी आख्या वाले प्रपत्र को लगाना होगा.

 

सम्बंधित प्राध्यापक इसका ध्यान अवश्य ही रखें कि उक्त सभी प्रपत्रों की पीडीएफ फॉर्मेट में एक फाइल बनानी होगी.

 

पहले स्थान पर लगाये जाने वाले कवरिंग लैटर का प्रारूप कुछ इस तरह से बना सकते हैं.


 

To Whom It May Concern

(यहाँ स्थानांतरित हुए प्राध्यापक का नाम, महाविद्यालय का नाम, विभाग का नाम) में (पदनाम) के रूप में कार्यरत थे. उत्तर प्रदेश शासन के पत्र संख्या-(यहाँ ट्रांसफर वाली लिस्ट का पत्रांक) (यहाँ दिनांक) के द्वारा उत्तर प्रदेश सहायता प्राप्त महाविद्यालय अध्यापक स्थानांतरण नियमावली 2024 में विहित प्रावधानों के अंतर्गत इनका एकल स्थानांतरण (यहाँ उस महाविद्यालय का नाम, जहाँ के लिए ट्रांसफर हुआ है) में किया गया है. इसका उल्लेख उक्त पत्र में प्रदर्शित सूची के क्रम संख्या (यहाँ वह क्रम संख्या लिखनी है, लिस्ट में जहाँ प्राध्यापक का नाम है) पर है.

उक्त पत्र एवं शिक्षा निदेशक (उच्च शिक्षा), उत्तर प्रदेश, प्रयागराज के (यहाँ ट्रांसफर लिस्ट के अंतिम पृष्ठ पर अंकित पत्रांक और दिनांक) एवं (यहाँ उस महाविद्यालय के प्रबन्ध तंत्र के नियुक्ति पत्र का सन्दर्भ, जहाँ आपका ट्रांसफर किया गया है) के आलोक में (यहाँ प्राध्यापक का नाम) को (यहाँ उस महाविद्यालय के प्रबन्ध-तंत्र के रिलीविंग पत्र का सन्दर्भ, जहाँ से प्राध्यापक का ट्रांसफर हुआ है) को अपराह्न में कार्यमुक्त कर दिया गया. अपनी कार्यमुक्ति के पश्चात् (यहाँ प्राध्यापक का नाम और उस महाविद्यालय का नाम जहाँ ट्रांसफर हुआ है) को कार्यभार ग्रहण कर लिया था.

इस सम्बन्ध में आपको अवगत कराना है कि उनका eHRMS Code (यहाँ कोड लिखना है) है. आपसे अनुरोध है कि यथोचित कार्यवाही करने का कष्ट करें जिससे (यहाँ प्राध्यापक का नाम) का समर्थ एकाउंट स्थानांतरित हो सके. इस सम्बन्ध में अपेक्षित प्रपत्र संलग्न हैं.

1. स्थानांतरण आदेश (सूची)

2. (जहाँ से ट्रांसफर हुआ, उस महाविद्यालय का नाम) से कार्यमुक्त सम्बन्धी आदेश

3. (जहाँ ट्रांसफर हुआ, उस महाविद्यालय का नाम) के प्रबन्ध समिति का पत्र

4. (जहाँ ट्रांसफर हुआ, उस महाविद्यालय का नाम) में कार्यभार ग्रहण संबंधी प्रपत्र

                                                                                                           

हस्ताक्षर एवं मुहर

(प्राचार्य)

 

इन प्रपत्रों की एक फाइल (पीडीएफ फॉर्मेट में) बनाकर महाविद्यालय (जहाँ से प्राध्यापक का ट्रांसफर हुआ है) से मेल करवा देना है. मेल यहाँ भेजनी है- uphed.samarth@gmail.com