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16 जून 2025

भावनाओं से खिलवाड़

अहमदाबाद हवाई जहाज दुर्घटना के अंतिम कुछ सेकेण्ड के फोटो, वीडियो....

इस तरह की बहुत सी पोस्ट दिखाई देने लगी हैं. सोशल मीडिया में हवाई जहाज दुर्घटना के बाद से एकदम से फोटो और वीडियो की बाद सी आ गई. अपनी-अपनी पोस्ट पर लाइक, शेयर, कमेंट बटोरने के चक्कर में भावनात्मकता, संवेदना को दरकिनार करते हुए फोटो और वीडियो अपलोड करने में लगे हुए हैं. लाइक, शेयर, कमेंट करने वाले भी बिना सत्य जाने, बिना तथ्य जाने आँखें बंद किये उसी दिशा में बहे जा रहे हैं. अंतिम समय के फोटो में भी उन्हीं तीन मासूम बच्चों के फोटो सामने आ रहे हैं जो अपने माता-पिता के साथ लन्दन शिफ्ट होने के लिए जा रहे थे. निश्चित रूप से फोटो-वीडियो के द्वारा लोगों की भावनाओं से खेलने वाले जानते हैं कि किस फोटो से उनको ज्यादा से ज्यादा शेयर, लाइक मिलने वाले हैं.

 



यहाँ एक बात समझ नहीं आ रही कि ये सबकुछ ख़त्म होने के अंतिम कुछ सेकेण्ड पहले की फोटो, वीडियो किसने लिए? किसने सार्वजनिक किये?

 

क्या उन बच्चों के माता-पिता अपने पूरे परिवार की मौत को लेकर, हवाई जहाज की दुर्घटना को लेकर एक तरह से आश्वस्त हो चुके थे, तभी उन्होंने चिल्लाते-चीखते बच्चों को सँभालने की बजाय उनकी फोटो खींचकर अपने किसी परिचित को भेजे, अपने किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड किये?

 

क्या जहाज के अन्दर कोई सीसी टीवी कैमरा टाइप कुछ रहता है जो किसी नेटवर्क के माध्यम से लगातार फोटो, वीडियो बनाता हुआ कहीं धरती पर बने सेंटर को भेजता रहता है?

 

क्या इसी जहाज में कोई ऐसा व्यक्ति था जो बिना डर, भय, बचने की कोशिश के फोटो, वीडियो खींच कर अपने किसी परिचित को लगातार भेजता रहा?

 

क्या दुर्घटना स्थल से किसी व्यक्ति का अथवा कई व्यक्तियों के मोबाइल इस हालत में मिले हैं, जिनसे ये फोटो, वीडियो निकाल कर सार्वजनिक किये जा रहे हैं?

 

सोशल मीडिया में तैर रहे तमाम एविएशन एक्सपर्ट इस बारे में भी अपनी विशेषज्ञतापूर्ण राय दें.


16 मार्च 2023

पिताजी के साथ स्मृति यात्रा

कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जिनको लाख कोशिशों के बाद भी भुलाना संभव नहीं होता है. वे तारीखें अपने आप सम्बंधित घटनाओं को किसी चलचित्र की तरह आँखों के सामने रख देती हैं. हमारे अपने जीवन में ऐसी कोई एक-दो नहीं बल्कि बहुत सारी तारीखें हैं, जिनको चाह कर भुलाया नहीं जा सकता और यदि भूलने की कोशिश भी करते हैं तो उनको भूल नहीं पाते हैं. ऐसी ही अनेक तारीखों की तरह आज, 16 मार्च की तारीख है. आज के दिन हमारे सिर से पिताजी का साया हमेशा के लिए हट गया था. सामान्य परम्परा में यह मन को संतुष्टि देने वाली बात होती है कि पिताजी भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, पर वे आत्मिक रूप में हमारे साथ हैं. यह सोच, यह मानसिकता खुद को कमजोर होने से बचाती है.


बहरहाल, पिताजी का जाना हमारे लिए गहरी चोट जैसा था. खुद को नवजीवन की राह पर उतारे अभी महज एक वर्ष ही बीता था, अभी खुद ही जिम्मेवार होने जैसा कोई एहसास अपने में जगा नहीं पाए थे कि बहुत बड़ी जिम्मेवारी हमारे कंधों पर आ गई थी. विगत 18 सालों में कोई दिन ऐसा नहीं बीता कि पिताजी की कमी को महसूस न किया हो, इसके साथ ही किसी न किसी रूप में उनको अपने साथ बने रहने का भाव भी बनाये रखा है. उनके न होने के भाव ने जहाँ बहुत बार भावनात्मक रूप से कमजोर किया तो उनके साथ रहने के भाव ने आत्मविश्वास बनाये रखा.


बहुत कुछ सोचा था पिताजी के बारे में लिखने को मगर आँखों के धुँधलेपन ने ऐसा करने नहीं दिया. बैठे-बैठे तमाम एल्बम, अनेक फोटो देखकर बीते दिनों को याद कर लिया गया. अब फोटो के रूप में बस यही यादें शेष हैं, बस यही यादें ही साथ हैं. 




























 

03 मार्च 2023

एक भ्रम, जो दिलासा देता है

मनुष्य खुद को किसी न किसी बहाने से, किसी न किसी भ्रम में रखना पसंद करता है. ऐसा व्यतिगत रूप से हमें लगता है, संभव है कि सभी के साथ ऐसा न हो. हम लोग खुद को कितने धोखे में, भ्रम में रखते हैं, ये हम लोग ही जानते हैं. कभी अपने किसी आत्मीय के नाम पर, कभी अपने किसी पालतू जीव-जानवर के नाम पर, कभी कहीं आने-जाने के नाम पर, कभी किसी उपहार आदि के नाम पर. ऐसा हम सभी सोशल मीडिया पर रोज ही होता देख रहे हैं. सोशल मीडिया पर रोज ही यदि जन्मदिन वाली पोस्ट देखने को मिलती हैं तो आत्मीयजनों के चले जाने की खबरें भी मिलती हैं. अपने किसी आत्मीय के, परिजन के चले जाने का दुःख हम सबने किसी न किसी रूप में सहा ही होगा. ये पोस्ट इसी सन्दर्भ में हैं. 




ऐसा हम सभी को अक्सर देखने में आता है कि हम लोग अपने उस परिजन के चित्र पर माला डाल देते हैं, जो अनंत यात्रा पर जा चुका होता है. निश्चित है कि अपने किसी भी परिजन को कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है. उसकी याद बने रहना, किसी अवसर विशेष पर उसका याद आना एक सामान्य सी घटना है. हम सभी में से से सभी ने ही अपने-पाने किसी न किसी परिजन को, कभी न कभी खोया ही है. उनके जाने के दर्द को महसूस किया है. उनके चले जाने का दुःख हम सभी किसी न किसी रूप में सहते ही हैं. जो परिजन हमसे बहुत दूर चले गए होते हैं, हम उनकी यादों को, उनकी स्मृतियों को चित्रों, फोटो के माध्यम से संजो कर रखते हैं. अक्सर हम उनके चित्रों पर माल्यार्पण भी करते हैं. ऐसा करने के पीछे उनको एक तरह से श्रद्धांजलि देने का काम किया जाता है.


विगत कुछ वर्षों में अपने परिजनों को हमने खोया है. उनकी फोटो पर हमने आजतक माला नहीं डाली है. अइया-बाबा का चित्र इस बारे में अपवाद है, वो भी शायद इस कारण कि पिताजी ने हमारे कहने के बाद भी उन पर माला डाले रखी. हमने पिताजी के, अपने छोटे भाई मिंटू के चित्र पर आज भी माला नहीं डाली है. सब कुछ जानते हुए भी मन में एक भ्रम रहता है उनकी फोटो देखकर कि वे हमारे साथ हैं. कितना बड़ा धोखा हम खुद को दे रहे हैं. ये जानते हुए भी कि अब देर रात घर आने पर, असमय घर आने पर पिताजी की डांट नहीं पड़ने वाली, कुछ करने के पहले पिताजी की राय नहीं मिल पानी; ये मालूम होते हुए भी कि अब पूरे अधिकार से पैसे माँगने, कुछ काम करवाने को मिंटू नहीं है, हमारी डांट सुनने के लिए वो घर पर नहीं है..... एक भ्रम पाले हैं कि ये लोग हमारे साथ हैं.


एक भ्रम है जो दिलासा देता है. एक धोखा है जो बस दिए जा रहे हैं. शायद ऐसा हममें से बहुत सारे लोगों के साथ होगा.






 

24 अगस्त 2022

डायरेक्ट रील वाले कैमरे से आज का फोटोशॉप



इन फोटो को देखकर आपको आश्चर्य नहीं हुआ होगा? होना भी नहीं चाहिए क्योंकि आज की कम्प्यूटर तकनीक वाले ज़माने में, फोटोशॉप वाले युग में ऐसी फोटो तो बहुत ही आम हैं. आये दिन इस तरह की फोटो सोशल मीडिया के द्वारा हम सबके सामने आती हैं. ऐसे में इन दोनों फोटो को देखकर आश्चर्य न होना आम बात है मगर यदि आपसे कहा जाये कि ये फोटो उस समय की हैं जबकि कैमरा रील वाला हुआ करता था, किसी भी तरह की एडिटिंग के लिए कम्प्यूटर का इस्तेमाल नहीं होता था, तो शायद आश्चर्य लगे. ये दोनों फोटो सन 1998 की हैं. उस समय कम्प्यूटर का चलन भले ही देश के बड़े-बड़े शहरों में होने लगा हो मगर उरई जैसे कस्बेनुमा शहर में कल्पना ही थी. डिजिटल कैमरे भी उस समय उरई के किसी स्टूडियो में दिखाई नहीं पड़ते थे.  ऐसे में इस तरह की फोटो का निकाला जाना किसी आश्चर्य से कम नहीं. 


इस तरह की फोटो को अक्सर पत्रिकाओं में देखा करते थे. मन बहुत होता था कि ऐसी फोटो हम भी खिंचवाएँ मगर समझ नहीं आता था कि ऐसी फोटो कैसे खिंचे? जो मित्र हमारे ब्लॉग से पूर्व परिचित हैं या फिर हमसे बहुत लम्बे समय से जुड़े हैं, वे सभी हमारे फोटोग्राफी के शौक के बारे में भली-भांति परिचित हैं. एक दिन पुराने एल्बम देखते समय कुछ ब्लैक एंड व्हाइट फोटो ऐसी दिखीं, जिनमें एक फोटो में दो दृश्य दिख रहे थे. ऐसी कुछ फोटो वे भी थीं जिनको हमने अपने क्लिक थर्ड कैमरे से निकाला था. उन फोटो को देखकर दिमाग में एक ख्याल आया कि यदि एक ही निगेटिव पर दो शॉट ले लिए जाएँ तो शायद फिल्म ओवरलैप कर जाने के कारण एक ही फोटो में दो अलग-अलग दृश्य दिखाई पड़ें?


चूँकि यह हमारे दिमाग की कल्पना भर थी, इसे साकार करने के लिए कैमरा चाहिए था. अपने एक मित्र के जिस कैमरे से हम उन दिनों फोटोग्राफी का शौक पूरा कर रहे थे, उस कैमरे में रील डलवा कर अपनी कल्पना को साकार करने का काम किया. अब आश्चर्य करने की बारी हमारी थी, जैसा सोचा था वैसा हुआ भी. एक निगेटिव की जगह पर दो शॉट लेने पर ओवरलैप जैसी स्थिति बनी और एक ही फोटो में दो दृश्य निगेटिव डेवलप करने के बाद सामने आ गए. अब जैसा सोचा था फोटो निकलवाने के बारे में, उसे साकार रूप देने का मौका आ गया था. ये समझ आ चुका था कि एक निगेटिव से ही एक फोटो में दो दृश्य आ सकते हैं. बस जो सेटिंग अपने कैमरे में करके ऐसा किया था, उसे दिमाग में लेकर एक दिन पहुँच गए अपने जीजा जी के स्टूडियो.


उरई में हमारे जीजा जी का स्टूडियो बहुत पुराना है और उनको खुद फोटोग्राफी की बहुत अच्छी जानकारी है. उनको अपनी कल्पना और उसे कैसे साकार किया है, इस बारे में बताया तो वे सहर्ष तैयार हो गए हमारी फोटो निकालने को. अब ये हमें जानकारी नहीं कि उनको उस तकनीक का ज्ञान पहले से था या उन्होंने हमारा मन रखने के लिए ऐसा दिखाया जैसे उनको पहली बार उस तकनीक की जानकारी हुई है. बहरहाल, जीजा जी ने स्टूडियो में आवश्यक लाइट इफेक्ट बनाए और फिर उसी तकनीक से फोटो खींची जैसी कि हमने अपनाई थी. उन दो खींची हुई फोटो का रिजल्ट आपके सामने है.


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असल में रील वाले कैमरे से एक क्लिक करने के बाद निगेटिव को आगे बढ़ाना पड़ता था. कैमरे की सेटिंग ऐसी हुआ करती थी कि यदि रील को आगे नहीं बढ़ाया जायेगा तो फिर अगली फोटो नहीं खिंच सकती थी. ऐसे में वापस उसी निगेटिव पर क्लिक करने के लिए आवश्यक था कि वही निगेटिव वापस शटर के सामने रहे. कैमरे के नीचे एक बटन लगा हुआ करता था, जिसे दबाकर पूरी रील को वापस उसके बॉक्स में बंद कर दिया जाता था, जबकि पूरी फोटो खिंच जाया करती थीं. एक शॉट में दो दृश्य निकालने के लिए इसी तकनीक का प्रयोग किया गया. कैमरे के उसी बटन को दबाकर रील को उतना ही वापस किया गया, जितना वह एक फोटो को क्लिक करके आगे बढ़ा था. वही निगेटिव वापस लेंस के सामने था. अब दोबारा हमारी जगह बदली गई, क्लिक किया गया. ऐसे एक फोटो में हम दो दिखाई देने लगे.


ये फोटो निश्चित ही आज की उस पीढ़ी के लिए आश्चर्य का विषय होगी जिन्होंने डिजिटल कैमरे ही देखे हैं, कम्प्यूटर में होती एडिटिंग देखी है, फोटोशॉप से बदलती फोटो देखी है. ये दोनों वे फोटो हैं जो कैमरे की तकनीक का लाभ उठाकर सीधे कैमरे में ही फोटोशॉप कर दी गईं. 






 

11 जुलाई 2022

फोटोग्राफी के प्रकार

फोटोग्राफी अपने आपमें एक कला है. यह अनेक प्रकार की विविधताओं के साथ हम सबके जीवन से जुड़ी हुई है. जैसे-जैसे तकनीक का विकास होता रहा, वैसे-वैसे फोटोग्राफी के प्रकार में भी विकास, परिवर्तन आते रहे. फोटोग्राफी के अनेकानेक प्रकार हैं. यहाँ कुछ मुख्य प्रकार के बारे में संक्षिप्त रूप से आपको बताया जा रहा है. 




पोर्ट्रेट फोटोग्राफी

पोर्ट्रेट फोटोग्राफी में हम किसी व्यक्ति या लोगो के समूह की तस्वीर खींचते है. यह फोटोग्राफी शैली सबसे पुरानी है और इसे पोट्रेचेर भी कहा जाता है.

लोगों के समूह, पालतू जानवर, बच्चों, पारिवारिक गतिविधियों की फोटो इसी श्रेणी में शामिल होती हैं

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फूड फोटोग्राफी

फ़ूड फोटोग्राफी हमारे भोजन को एक खूबसूरत तरीके से प्रस्तुत करने का एक माध्यम है. यह विभिन्न खाद्य पदार्थो की फोटो को कुछ इस ढंग से क्लिक करने की कला है जो दर्शकों को तुरंत अपनी ओर आकर्षित कर लेती है.

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लैंडस्केप फोटोग्राफी

लैंडस्केप फोटोग्राफी द्वारा प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में तस्वीर खींची जाती है.  इसमें प्रकति के सौंदर्य की तस्वीर इस तरह से खींची जाती है ताकि वो दर्शक को अपनी और आकर्षित कर सके.

समुद्र, नदी, तूफ़ान, झरना, जंगल आदि की तस्वीर खींचना लैंडस्केप फोटोग्राफी के अंदर आती है.

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स्ट्रीट फोटोग्राफी

सड़क पर ली गई फोटो को स्ट्रीट फोटोग्राफी में गिना जाता है। यह सड़क पर दिख रहे इंसानों के कार्यों और मनोभावों को दर्शाती है।


05 जुलाई 2022

फोटोग्राफी एक शक्ति है सामाजिक सन्देश हेतु

मोबाइल फोन या कहें कि स्मार्ट फोन आने के बाद से लोगों के लिए फोटोग्राफी करना सामान्य सी बात हो गई है. कहीं भी, कभी भी व्यक्ति अपना स्मार्ट फोन निकाल फोटो खींचने में लग जाता है. कोई अपने सामने दिखाई दे रहे ऑब्जेक्ट की फोटो लेता है तो कोई खुद को ही ऑब्जेक्ट बना कर सेल्फी लेने में व्यस्त रहता है. इतनी सहज-सुलभ-सामान्य फोटोग्राफी होने के बाद भी यदि पूछा जाये कि फोटोग्राफी क्या है तो एक सामान्य सा जवाब आएगा कि कैमरे से फोटो खींचना फोटोग्राफी है. यह सही भी है. तो आज बस एक सामान्य सा परिचय इसी कैमरे से फोटो खींचने वाली फोटोग्राफी का.

 

असल में फोटोग्राफी कोई एक शब्द नहीं है. यह दो शब्दों से मिलकर बना है. ये दोनों शब्द ग्रीक भाषा के हैं. इन दो ग्रीक शब्दों में एक है फोटो (photo) और दूसरा शब्द है ग्राफ (graph). इन दो शब्दों से बने फोटोग्राफी का सामान्य रूप में अर्थ होता है फोटो अर्थात प्रकाश की सहायता से ग्राफ यानि कि चित्र बनाना. आपको बताते चलें कि यहाँ फोटो का अर्थ प्रकाश (light) से है. इस फोटो या लाइट का तात्पर्य ऐसे भी समझना होगा कि कैमरे के सामने वाली किसी भी वस्तु, जिसे फोटोग्राफी की भाषा में ऑब्जेक्ट कहते हैं, से प्रकाश टकरा कर कैमरे के लेंस से गुजरता हुआ भीतर लगी रील तक पहुँचकर सम्बंधित वस्तु का चित्र बनाता है. रील में एक विशेष प्रकार के केमिकल का लेप हुआ करता था. इसी रासायनिक लेप के कारण कैमरे के लेंस से गुजरने वाली प्रकाश किरण से पहले निगेटिव बनता था, उसको साफ़ करके, डेवलप करने पर चित्र का निर्माण किया जाता था.  आजकल तो डिजिटल कैमरे चलने लगे हैं, जिनमें किसी रील का कोई काम नहीं होता है. अब इन डिजिटल कैमरों में सेंसर लगा होता है, जो इलेक्ट्रॉनिक विधि से फोटो खींचता, बनाता है.

 



किसी के लिए भी यह एक सामान्य समस्या होती है कि अच्छी फोटो कैसे खींची जाए? फोटो में चमक, गहरे रंग, आकर्षक वस्तु का दिखाई देना ही एक अच्छी फोटो की पहचान नहीं है. असल में एक बेहतरीन फोटो वही कही जा सकती है जो देखने वाले को आकर्षित करे, उसके मन-मष्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाले. यहाँ इसी बिंदु के सन्दर्भ में समझना चाहिए कि किसी वस्तु की, इंसान की, प्राकृतिक दृश्य की फोटो खींच लेना मात्र ही फोटोग्राफी नहीं है. शौकिया फोटोग्राफी एक अलग बात है किन्तु मूल रूप में किसी फोटो के द्वारा कोई बात कही जाये, किसी तरह का सन्देश दिया जाये तो उसे अच्छी फोटोग्राफी कहा जा सकता है. फोटोग्राफी के द्वारा लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं. किसी घटना, आयोजन को संजोया जा सकता है. यदि कहा जाये कि फोटोग्राफी एक तरह की कला है, आर्ट है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


अमेरिकी फोटोग्राफर बेरेनिस अबोट का कहना है कि फोटोग्राफी लोगों को देखने में मदद करती है अर्थात वह देखना सिखाती है. यह बहुत बड़ी और गम्भीर टिप्पणी कही जाती है, फोटोग्राफी क्षेत्र में. ऐसा माना जाता है कि मँहगे कैमरों से खींची जाने वाली फोटो ही बेहतरीन फोटोग्राफी का उदाहरण है. असल में किसी भी फोटो में विषय का, उसके द्वारा दिए जा रहे सन्देश का बहुत महत्व है. इसलिए कई बार सामान्य से कैमरे यहाँ तक कि स्मार्ट फोन के द्वारा भी बेहतरीन फोटो निकाली जा सकती है, जो समाज को एक सन्देश दे.


फोटोग्राफी सीखने वालों के लिए, शौकिया फोटो खींचने वालों के लिए ये समझने की बात है कि कैमरा या स्मार्ट फोन में कैमरे का होना महज क्लिक करने के लिए नहीं है. कैमरे को, अपनी फोटोग्राफी के द्वारा बहुत कुछ ऐसा किया जा सकता है, जिसे याद रखा जाये. समाज, शिक्षा, युवाओं, पर्यटन, पर्यावरण, चिकित्सा, स्वास्थ्य आदि-आदि ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जिनमें फोटोग्राफी के द्वारा न केवल रोजगार प्राप्त किया जा सकता है बल्कि लोगों को सकारात्मक सन्देश भी दिया जा सकता है. यह बात सभी लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए कि फोटोग्राफी बहुत बड़ी शक्ति है जो समाज को एक सार्थक संदेश दे सकती है.


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16 जनवरी 2022

तुमसे अब ऐसे ही मिलना हुआ करेगा

अभी तक तो हम तुमको देख पा रहे थे, भले ही पार्थिव रूप में. आज एक साल होने को आया जबकि हमने तुमको पञ्चतत्त्व में विलीन कर दिया. जिस किसी भी, भले ही वह तुम्हारा निर्जीव रूप था, तुमको देख रहे थे मगर आज के बाद तो तुमको देख भी नहीं सके, तुमको छू भी नहीं सके. हम तो उस दिन तुमको छूने में भी संकोच कर रहे थे. समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह के तुमको स्पर्श करें? उस दिन तो कोई आशीर्वाद भी तुम तक नहीं पहुँच रहा था. कोई आवाज़ भी तुम नहीं सुन रहे थे. दीपू ने कितनी बार कहा हमसे कि भाई जी मिंटू को बोलो कि उठे, मगर तुम किसी की सुन ही कहाँ रहे थे. तुम तक हमने बहुत बार हाथ बढ़ाया, बहुत बार तुमको छुआ मगर तुमने कोई जवाब नहीं दिया. तुमको उस दिन उठना ही नहीं था, तुम उठे भी नहीं.


कितनी बड़ी सजा है ये कि तुमको किसी दिन अपने कंधों पर उठाने वाले, तुमको खिलाने वाले उस दिन भी तुमको अपने कंधों पर लिए जा रहे थे मगर सबकी आँखों में आँसू थे. वे सब उस दिन खुश नहीं थे, हँस नहीं रहे थे. उस दिन गिरते-पड़ते हमने भी कुछ कदम तुमको अपने कंधे पर बिठाया था, ये सोच कर कि शायद तुम उठ बैठो मगर तुम न उठे. हम जानते थे कि तुमको अब नहीं उठाना है फिर भी खुद को धोखा देने का काम कर रहे थे. तुम उस धोखे में नहीं आये. तुम नहीं उठे.


बहरहाल, उस दिन को, उस बहुत बुरे दिन को आज एक साल हो गए हैं मगर ऐसा लगता है जैसे आज, अभी इसी समय की बात हो. एक पल भी तुम्हारे बिना नहीं गुजारा हमने. लोग पागल कह सकते हैं हमें, यदि उनको बताया जाये. कहने को कुछ भी कहा जाये मगर आज एक साल बाद भी एक सेकेण्ड तुम्हारे बिना नहीं गुजरा हमारा. आज पिंटू इंदौर में थे तो वो टिंकू, रश्मि और विक्रम सहित उज्जैन हो आये. तुम उज्जैन जाते रहते थे, रश्मि की भी ऐसी इच्छा थी. अब तुम हम सबके बीच या कहें कि तुम्हारे साथ हम सभी लोग इसी तरह बस संस्कारों के माध्यम से आते रहेंगे.







तुमको बार-बार आशीर्वाद, जहाँ रहो खुश रहो, सुखी रहो.

12 नवंबर 2021

राष्ट्रीय पक्षी दिवस पर कुछ चित्र

भारत के मशहूर पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी डॉ. सलीम अली के जन्मदिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष देश भर में राष्ट्रीय पक्षी दिवस मनाया जाता है. डॉ. सलीम का जन्मदिवस 12 नवम्बर को मनाया जाता है. भारत सरकार द्वारा उनको सम्मानित करते हुए उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय पक्षी दिवस घोषित किया है.


डॉ. सलीम अली का जन्म 12 नवम्बर 1896 में बॉम्बे के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में हुआ था. वे विश्वविख्यात भारतीय पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी के रूप में प्रसिद्द हैं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई में हुई. बाद में उन्होंने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के सचिव डबल्यू. एस. मिलार्ड की देख-रेख में पक्षियों पर गंभीर अध्ययन करना शुरू किया. अपने इसी अध्ययन के दौरान उन्होंने असामान्य रंग की गौरैया की पहचान की थी.


उनका निधन 27 जून 1987 को 91 साल की उम्र में हुआ. इनके नाम पर बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा कोयम्बटूर के निकट अनाइकट्टी नामक स्थान पर सलीम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र स्थापित किया गया.


डॉ. सलीम के बारे में कुछ विशेष बिन्दु.

डॉ. सलीम अली को भारत में पक्षी मानव के नाम से भी जाना जाता है.

उन्होंने पक्षियों से सम्बंधित अनेक पुस्तकें लिखी हैं. बर्ड्स ऑफ़ इंडिया इनमें सबसे लोकप्रिय पुस्तक है.

डाक विभाग ने इनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया है.

वर्ष 1958 में सलिम अली को पद्मभूषण तथा 1976 में पद्मविभूषण से अलंकृत किया गया था.


आज भारतीय पक्षी दिवस के अवसर पर हमारे द्वारा क्लिक किये गए कुछ चित्र. इन चित्रों को अपनी घुमक्कड़ी के दौरान लिया गया है.

















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19 अगस्त 2021

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर कुछ हमारी क्लिक्स

विश्व फोटोग्राफी दिवस को मनाने के पीछे भी एक कहानी है. दरअसल फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेक्स और मेंडे डाग्युरे ने सबसे पहले सन 1839 में फोटो तत्व की खोज की थी. ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम हेनरी फॉक्सटेल बोट ने निगेटिव-पॉजीटिव प्रोसेस का आविष्कार किया और सन 1834 में टेल बॉट ने लाइट सेंसेटिव पेपर की खोज करके खींची गई फोटो को स्थायी रूप में रखने में मदद की.  

फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो की फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट को तत्कालीन फ्रांस सरकार ने खरीदकर 19 अगस्त 1939 को आम लोगों के लिए फ्री घोषित कर दिया था. इसी उपलब्धि की याद में 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. आपके लिए खुद की क्लिक की गई कुछ फोटो लाये हैं. उनके साथ आज का आनंद लीजिये.