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19 अप्रैल 2026

परिसीमन के जाल में उलझा महिला आरक्षण

लोकसभा में दो तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित न हो सका. केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन के उद्देश्य से इस विधेयक को लोकसभा में रखा गया था. इस विधेयक के द्वारा लोकसभा की सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करना था. देखा जाये तो इस विधेयक का उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को बदलना नहीं बल्कि लोकसभा की सीटों को अधिक करना था. ऐसा करने के पीछे का मंतव्य 2023 में पारित किये जा चुके नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने की अनिवार्य शर्त के रूप में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना था. 2023 में पारित इस अधिनियम के द्वारा महिलाओं को लोकसभा एवं राज्य की विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया जाना है लेकिन इसके लागू होने के सन्दर्भ में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना अनिवार्य शर्त के रूप में है. लोकसभा में परिसीमन विधेयक के पारित न होने ने भारतीय संघवाद, क्षेत्रीय संतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के आपसी संकटों को उजागर कर दिया है.

 

प्रथम दृष्टया देखा जाये तो इस विधेयक के पारित न हो पाने को लोकसभा सीटों के न बढ़ने के रूप में, देश पर आर्थिक बोझ न बढ़ने के रूप में देखा जा रहा है. इसके सापेक्ष यदि महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर विचार की दृष्टि से देखा जाये तो इस विधेयक का पारित न होना महिला आरक्षण के प्रति नकारात्मक भाव को उत्पन्न करता है. इस विधेयक के गिरने से 2029 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत भागीदारी मिलने की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गई है. इसे एक तरह के संवैधानिक धोखे के रूप में देखा जाना चाहिए जो महिलाओं को राजनैतिक प्रतिनिधित्व देने का सपना दिखाता है किन्तु उसके क्रियान्वयन को परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रिया से आबद्ध कर देता है.

 

लोकसभा सीटों का परिसीमन सदैव से एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील संवैधानिक मुद्दा रहा है. यही कारण है कि वर्तमान समय में भी लोकसभा की सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बना हुआ है. 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन को 2000 तक के लिए रोक दिया गया था. कालांतर में इस रोक को 2001 में 84वें संविधान संशोधन के द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया था. ऐसा करते समय तर्क दिया गया था कि 2026 तक देश में जनसंख्या वृद्धि की दर स्थिर हो जाएगी जिससे सीटों के बँटवारे में किसी राज्य को अन्याय महसूस नहीं होगा. ऐसे में यदि संविधान संशोधन के द्वारा परिसीमन पर लगी रोक को आगे न बढ़ाया गया तो 2026 के बाद संवैधानिक रूप से परिसीमन करवाना होगा. सीटों के बँटवारे को लेकर अन्याय जैसा भाव उत्तर और दक्षिण राज्यों के मध्य सदैव से बना रहा है. उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच जनसंख्या वृद्धि का असंतुलन है. दक्षिण भारतीय राज्यों ने दशकों तक प्रभावी ढंग से परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को लागू किया जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती रही. वर्तमान परिसीमन विधेयक के आने पर दक्षिण राज्यों का यही कहना था कि यदि आज की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन लागू किया गया जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों की संसद में हिस्सेदारी कम हो जाएगी.

 

विधेयक के पारित न होने ने जहाँ महिला आरक्षण की गति को अवरोधित किया है वहीं निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन रुकना भी एक प्रकार के नुकसान के रूप में सामने आया है. कई शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व का अधिक होना, ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटी सीटों का होना भी लोकतान्त्रिक प्रणाली में एक तरह की बाधा है. इससे एक वोट, एक मूल्य का लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर प्रतीत हो रहा है. वर्तमान में एक-एक सांसद बहुत बड़ी संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो कई बार सांसदों की संसदीय जवाबदेही को कम करता है. इस दृष्टि से लोकसभा में सीटों की संख्या न बढ़ना एक प्रकार की प्रशासनिक हानि है क्योंकि लोकसभा सीट न बढ़ने की स्थिति में मतदाताओं और उनके प्रतिनिधि के बीच की दूरी को कम करने का एक अवसर हाल-फ़िलहाल कम हुआ है.

 

परिसीमन विधेयक के लोकसभा में पारित न होने ने महिलाओं के राजनैतिक अधिकारों की प्राप्ति की राह में एक अवरोध उत्पन्न किया है. यहाँ इस विफलता के पीछे से एक सवाल उपजता है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पारित होने के समय लोकसभा सीट का परिसीमन होना अनिवार्य शर्त के रूप में परिलक्षित था तो अब परिसीमन विधेयक का विरोध क्यों? 2023 में महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक सभी संसद सदस्यों के पास पहुँचा होगा, उसी समय परिसीमन का विरोध न करके महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक को पारित करवा देना अलग ही कहानी कहता है. बहरहाल, महिला आरक्षण के भविष्य और लोकसभा सीटों के परिसीमन पर लगी रोक की समय-सीमा को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि परिसीमन केवल सीटों का गणित न बनकर भारतीय संघ के सभी घटकों के बीच विश्वास का आधार बने. वर्तमान स्थिति में परिसीमन विधेयक के गिरने को तात्कालिक राजनीतिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालिक संवैधानिक हितों के सन्दर्भ में देखने और सँवारने की आवश्यकता है.

11 फ़रवरी 2026

सरकार ने डीपफेक और एआई पर सख्त किए नियम

ऐसा लगता है जैसे कोई चीज मुफ्त में या फिर लगभग मुफ्त जैसी कीमत में मिलती है तो उसका दुरुपयोग पूरी ताकत से किया जाने लगता है. इस मामले में अनेकानेक उदाहरण हम सबके सामने हैं. ऐसे ही उदाहरणों में से एक ताजातरीन उदाहरण कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का लिया जा सकता है. हम भारतीयों ने जिस तरह से डीपफेक सहित एआई का दुरुपयोग किया है, वैसा हाल एआई को सामने लाने वालों ने भी नहीं सोचा होगा. न जाने कितनी कृत्रिम सामग्री, बनावटी फोटो, नकली वीडियो आदि के माध्यम से सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को इतनी बुरी तरह से भर दिया गया है कि कई बार असली और नकली का अंतर ही समझ नहीं आता है.

 



सवाल अकेले नकली सामग्री बनाये जाने का नहीं बल्कि इसके माध्यम से धोखाधड़ी, अश्लीलता आदि को बढ़ावा मिलने लगा था. लगातार आती शिकायतों को दृष्टिगत रखते हुए केन्द्र सरकार ने डीपफेक सहित एआई से तैयार सामग्री के सम्बन्ध में ऑनलाइन मंचों के लिए सख्त नियम बना दिए हैं. ये नियम इसी माह की बीस तारीख से लागू हो जाएँगे. इसके तहत सोशल मीडिया के विविध मंचों से डीपफेक वाली सामग्री को तीन घंटे के भीतर ही हटाना होगा. पहले इस सम्बन्ध में समय-सीमा 36 घंटे की थी. इसके अलावा एआई के माध्यम से निर्मित सामग्री, चाहे वो फोटो हो या फिर वीडियो, उसमें एआई कंटेंट होने का लेबल स्पष्ट रूप से लगाना होगा, जिससे दर्शकों को आसानी से असली और नकली का अंतर समझ आ सके.

 

सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 में संशोधन करके इसके माध्यम से एआई से निर्मित बनावटी कटेंट को परिभाषित किया गया है. इन संशोधनों में ‘ध्वनि, दृश्य या ध्वनि-दृश्य जानकारी' और ‘बनावटी रूप से तैयार की गई जानकारी' को परिभाषित किया गया है, जिसमें एआई द्वारा निर्मित या परिवर्तित ऐसी सामग्री शामिल है जो वास्तविक या प्रामाणिक प्रतीत होती है. इस तरह के संशोधनों से निश्चित रूप से एआई का दुरुपयोग रोकने में मदद मिल सकेगी.


24 जनवरी 2026

व्यावहारिक और दीर्घकालिक हो विदेश नीति

पिछले कुछ समय से देश की स्थिति को देखते हुए विपक्षियों द्वारा बार-बार विदेश नीति पर सवालिया निशान लगाये जा रहे थे. आलोचना के स्वरों में केन्द्र सरकार की विदेश नीति के असफल होने की बात उठाई जाने लगी. ऐसे विचारों को उस समय और बल मिला जबकि हमारे पड़ोसी देशों में हालात ख़राब रहे और उनके अंदरूनी हालातों का प्रभाव भारतीय परिप्रेक्ष्य में नजर आया. इसी तरह पहलगाम की घटना के बाद ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भी भारतीय पक्ष का अकेले खड़े दिखाई पड़ने से विरोधियों के आरोपों को बल मिला. विदेश नीति को लेकर लगातार आरोप लगाये जाते रहे कि वह अपने घोषित लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रही है. एक तरफ भले ही भारत की सक्रियता वैश्विक मंच पर बढ़ती जा रही मगर दूसरी तरफ पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते सम्बन्धों, चीन के साथ सीमा विवाद, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों तथा कुछ पश्चिमी देशों से उत्पन्न विवादों ने देश की वैश्विक छवि को धूमिल किया.

 

देखा जाये तो किसी भी देश की विदेश नीति का स्वरूप मूल रूप में दीर्घकालिक और बहुस्तरीय होता है, जिसे सफलता या असफलता के सम्बन्ध में एकाएक मापना न केवल कठिन होता है बल्कि उचित भी नहीं होता है. अनेक अवसर ऐसे होते हैं जबकि वैश्विक सम्बन्धों के चलते अनेकानेक नीतियों को, योजनाओं को रोकना पड़ता है. इसे भी ऑपरेशन सिन्दूर के रूप में देखा-समझा जा सकता है. पाकिस्तान पर कई गुना बेहतर स्थिति होने के बाद भी एकाएक देश को युद्ध विराम जैसी स्थिति को स्वीकारना पड़ा. इस निर्णय के बाद जहाँ केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने लगातार बयानबाजी करते हुए इसके लिए स्वयं को नेतृत्वकर्ता सिद्ध करना चाहा.

 



भारत की विदेश नीति के सन्दर्भ में एक तथ्य सदैव से प्रभावी रहा है कि देश ने स्वतंत्रता के बाद से ही स्वयं को गुटनिरपेक्ष नीति के समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया है. इसी कारण भारत वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलनकारी कूटनीतिज्ञ के रूप में दिखाई पड़ता है. रूस-यूक्रेन युद्ध को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जहाँ अमेरिका और यूरोपीय देशों के दबाव के बाद भी भारत ने रूस से तेल और रक्षा सहयोग जारी रखा. अपने चिर-परिचित, पुराने सम्बन्धों का निर्वहन करने के साथ-साथ भारत ने युद्ध के समाधान के लिए कूटनीति को भी प्रभावी बनाये रखा. युद्धकाल में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रूस और यूक्रेन की यात्राओं ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति भावनाओं नहीं हितों से संचालित होती है. यद्यपि देश की इस नीति का अनेक पश्चिमी देशों ने विरोध किया तथापि भारत ने अपनी नीति को नहीं त्यागा.

 

ऐसी मजबूत कूटनीतिज्ञ स्थिति के बाद भी भारत की विदेश नीति की सर्वाधिक आलोचना उसके पड़ोसी देशों के संदर्भ में होती है. पड़ोसी देशों के वर्तमान हालात और भारतीय हस्तक्षेप को लेकर दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति सहज नहीं रही है. नेपाल के साथ सीमा और नक्शे का विवाद, मालदीव में भारत-विरोधी राजनीतिक अभियान, श्रीलंका में चीन की सशक्त आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति, श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का चीन को दीर्घकालिक पट्टे पर दिया जाना, बांग्लादेश में भारतीय हितों, हिन्दुओं पर हमले, पाकिस्तान द्वारा भारतीय विरोध की नीति को खुलकर अपनाना आदि ने भारतीय विदेश नीति के पारम्परिक अस्तित्व को चुनौती दी है. इन घटनाओं को कहीं न कहीं भारत की असफल विदेश नीति के रूप में परिभाषित किया जाने लगा.  

 

यह सच है कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में वैसी मधुरता नहीं दिखाई पड़ती है, जैसी कि वर्तमान केन्द्र सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान देखने को मिली थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दक्षिण एशिया देशों के साथ मधुर, मजबूत सम्बन्धों की जैसी पहल की गई थी, उसके परिणाम वैसे नहीं निकले जैसी की कल्पना की गई थी. अपने पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में आई गिरावट के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ भी सम्बन्धों में चुनौतियाँ दिख रही हैं. अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापारिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है; क्वाड जैसे मंच पर भारत की सक्रिय भागीदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक सफलता को दर्शाती है वहीं मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि को लेकर पश्चिमी देशों के रुख ने स्थितियों को असहज भी किया है. कनाडा, अमेरिका, ईरान, तालिबान, इजराइल आदि के साथ वर्तमान राजनयिक सम्बन्धों को इसी रूप में देखा जा सकता है.

 

वैश्विक मंचों पर और स्थानीय मुद्दों पर कूटनीतिज्ञ रूप से देखा जाये तो कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति एक तरह के संक्रमणकाल से गुजर रही है. देश की अंदरूनी स्थिति, पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों के रूप में देश से एक तरफ अपेक्षाएँ भी हैं और दूसरी तरफ चुनौतियाँ भी हैं. उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में, दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को स्थापित करने के उद्देश्य से भारत को जिम्मेदारियों और चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित करना है. विगत वर्षों की भारतीय क्षमता, नेतृत्व, वैश्विक छवि को देखते हुए विदेश नीति पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी ही कही जाएगी. विदेश नीति से सम्बंधित तमाम पक्षों पर विचार करते हुए उसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखना उचित होगा. वर्तमान सन्दर्भों में आवश्यकता इसकी है कि भारत अपनी कूटनीति को अधिक व्यावहारिक, दीर्घकालिक दृष्टि से सुदृढ़ करे. सत्ता पक्ष और विपक्ष को भी भारतीय सन्दर्भों में एकजुट होकर इसके लिए कार्य करने की आवश्यकता है ताकि वैश्विक मंच पर देश की बढ़ती भूमिका को, विदेश नीति को सशक्त रूप में परिभाषित किया जा सके.


25 मई 2025

सरकार की प्रतिबद्धता से मिटेगा नक्सलवाद

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्टको अभी तक देश में चलाये गए नक्सल विरोधी अभियानों में सबसे बड़ा और सफल अभियान माना जा रहा है. 21 दिनों तक चले सबसे बड़े नक्सल विरोधी अभियान में सुरक्षा बलों ने छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता प्राप्त की. 21 अप्रैल से 11 मई 2025 तक संचालित ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट को नक्सली समूहों के गढ़ तथा रणनीतिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले कर्रेगुट्टालु पहाड़ी क्षेत्र में चलाया गया. इस अभियान में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), विशेष कार्य बल (एसटीएफ), जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) और राज्य पुलिस बलों का संयुक्त प्रयास सुखद परिणाम तक पहुँचा. इनके सकारात्मक-समन्वित सहयोग के परिणामस्वरूप 31 माओवादियों को मार गिराया. अभियान सञ्चालन के दौरान मिली कामयाबियों के साथ-साथ अभियान पूरा होने के बाद भी नक्सलवाद के मिटने के संकेत मिलते रहे. ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के पूरा होने के बाद छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 84 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया.

 



इसी तरह छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों ने बीजापुर-नारायणपुर सीमा पर एक मुठभेड़ में 27 खूँखार माओवादियों को मार गिराया. मारे जाने वालों में सीपीआई-माओवादी का महासचिव, शीर्ष नेता और नक्सल आंदोलन की रीढ़ नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू भी शामिल है. बसवराजू के मारे जाने को सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है क्योंकि विगत कई दशकों में यह पहला अवसर है जबकि नक्सलियों का महासचिव स्तर का कोई नेता मारा गया. बसवराजू देश में प्रमुख माओवादी हमलों का मास्टरमाइंड रहा. 2003 के अलीपीरी बम हमले में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. आतंकी हमलों का सबसे घातक हमला इसी के निर्देशन में हुआ था जबकि 2010 में दंतेवाड़ा में किये गए हमले में 76 सीआरपीएफ कर्मी मारे गए. इसके अलावा आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की हत्या का प्रयास भी इसके द्वारा किया गया था. बसवराजू की मौत सीपीआई (माओवादी) के लिए बहुत बड़ी क्षति है साथ ही नक्सली आन्दोलन के लिए सामरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत बड़ा झटका है.

 

दरअसल नक्सलवाद को एक तरह के वामपंथी उग्रवाद के रूप में भी देखा जाता है. यह हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी और गम्भीर चुनौतियों में से एक है. पश्चिम बंगाल में 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से उत्पन्न यह आंदोलन हिंसात्मक रूप लेकर सामानांतर शासन-सत्ता के रूप में फ़ैल गया. इसने केरल, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को अपनी हिंसात्मक गिरफ्त में ले लिया. नक्सलियों ने इन राज्यों के सुदूरवर्ती, अविकसित और जनजातीय-बहुल क्षेत्रों को अपने कब्जे में लेकर अपनी गतिविधियों को संचालित करने का काम किया. ये लोग भले ही हाशिए के लोगों, जनजातीय समुदायों के हितार्थ लड़ने का दावा करते हों किन्तु उनके द्वारा सशस्त्र हिंसा, जबरन वसूली, बुनियादी ढाँचे को नष्ट करना किया जाने लगा. इस तरह की गतिविधियों का उद्देश्य सशस्त्र विद्रोह करते हुए लोकतांत्रिक संस्थानों को निशाना बनाना तथा अपनी शासन-सत्ता को स्थापित करते हुए भारतीय राज्य व्यवस्था को कमजोर करना है.

 

विगत कुछ समय से केन्द्र सरकार की सुरक्षा, अखंडता, समावेशी विकास, सहभागिता, सामुदायिकता आदि की नीति के चलते अनेकानेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. इसी क्रम में केन्द्र सरकार द्वारा नक्सलवाद समाप्ति के लिए सतत प्रयास किये जा रहे हैं. सरकार ने स्पष्ट रूप से देखा और समझा कि नक्सलवाद के कारण सुदूरवर्ती और जनजातीय क्षेत्रों में विकास अवरोधित है. इसके चलते ये क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बैंकिंग, मूलभूत ढाँचा आदि से अछूते हैं. ऐसे में केन्द्र सरकार ने प्रतिबद्ध होकर 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह से समाप्त करने की रणनीति बनायी है. इसके लिए गृह मंत्रालय की समग्र रूपरेखा ‘समाधान – SAMADHAN’ को निम्न घटकों के अन्तर्गत क्रियान्वित किया जाना है.

S Smart leadership (कुशल नेतृत्व)

A Aggressive strategy (आक्रामक रणनीति)

M Motivation & Training (अभिप्रेरणा एवं प्रशिक्षण)

A Actionable Intelligence (अभियोज्य गुप्तचर व्यवस्था)

D Dashboard based Key performance indicators and key result area (कार्ययोजना आधारित प्रदर्शन सूचकांक एवं परिणामोन्मुखी क्षेत्र)

H Harnessing Technology (कारगर प्रौद्योगिकी)  

A - Action Plan for each threat (प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना)

N No access to financing (नक्सलियों के वित्त-पोषण को विफल करने की रणनीति)

 



सरकार की ठोस एवं स्पष्ट नीतियों के कारण नक्सलवाद को पर्याप्त क्षति पहुँची है. इससे नक्सल प्रभावित अनेक जिले राष्ट्र की मुख्यधारा में फिर शामिल हो सके हैं. नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या अप्रैल 2024 में 38 रह गई. ऐसे जिले जो पूर्णतः नक्सलवाद की चपेट में थे, उनकी संख्या 12 से घटकर 6 रह गई. इनमें छत्तीसगढ़ के चार जिले-बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा; झारखंड का एक-पश्चिमी सिंहभूमि और महाराष्ट्र का एक जिला-गढ़चिरौली शामिल है. वर्ष 2016 में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए आरम्भ की गई ‘सड़क आवश्यकता योजना’ अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रही है. 2024 तक नक्सल प्रभावित इलाकों में लगभग बारह हजार किमी हाईवे का निर्माण और बीस हजार किमी के आसपास ग्रामीण सड़कें बनाई गईं. सड़क व्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ सरकार द्वारा पुलिस को मजबूत करने की दृष्टि से ‘विशेष अवसंरचना योजना’ द्वारा नक्सल प्रभावित राज्य के संवेदनशील जिलों में किलेबंद पुलिस स्टेशनों का निर्माण किया गया. इससे नक्सलवाद से जुड़ी हिंसा की घटनाओं में बीते वर्षों की तुलना में लगभग 80 प्रतिशत तक की कमी आई है. 2024 में इस तरह की कुल घटनाओं की संख्या 374 रह गई. इसी एक वर्ष में 290 नक्सलियों को निष्प्रभावित किया गया; 1090 गिरफ्तार किये गए और 881 ने आत्मसमर्पण किया. सुरक्षा बलों की सक्रियता के कारण नक्सली या तो मारे जा रहे हैं अथवा वे आत्मसमर्पण कर रहे हैं. इसका परिणाम यह हुआ है कि नक्सलवाद अब धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है.

 

इसमें कोई दोराय नहीं कि नक्सलवाद देश के लिए एक गम्भीर समस्या बनी हुई है. इस आन्दोलन के आरम्भ होने से लेकर आज तक नक्सलवाद आन्दोलनकारियों का प्रयोजन पूरा नहीं हुआ है. किसी समय भूमिहीन किसानों के द्वारा सामंती व्यवस्था के विरोध में शुरू हुआ आन्दोलन आज सरकार के, सुरक्षा बलों के विरुद्ध संचालित किया जाने लगा है. अपने आन्दोलन के मूल उद्देश्य से भटककर नक्सली नेताओं द्वारा सरकारी व्यवस्था के समानांतर अपनी शासन-सत्ता स्थापित की जाने लगी. वर्तमान केन्द्र सरकार देश की सुरक्षा, अखंडता के लिए खतरा बनती किसी भी स्थिति का सफाया करने के लिए दत्तचित्त होकर पूरी गम्भीरता से कार्य कर रही है. सरकार के समन्वित सैन्य और विकासात्मक दृष्टिकोण ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को निर्णायक रूप से बदल दिया है. नक्सलवाद जैसी कई दशकों पुरानी अत्यंत गम्भीर समस्या को एक निश्चित समयावधि में पूर्णतः समाप्त करना भले असम्भव प्रतीत हो रहा हो किन्तु जिस तरह निरन्तर सतर्कता, सामुदायिक सहभागिता और राजनीतिक संकल्प के साथ ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट को अंजाम तक पहुँचाया गया उससे नक्सलवाद-मुक्त भारत का लक्ष्य सम्भव भी लगता है, पहुँच के भीतर भी लगता है.

 


10 मई 2025

क्रोध-रोष, जोश-प्रतिशोध

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. दिन बीतते जा रहे थे, सरकार की चुप्पी बयानों के सन्दर्भ में ही टूट रही थी, मीडिया की तरफ से लगातार कुछ न कुछ बड़ा होने जैसा संकेत दिया जाता मगर प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. पहलगाम हत्याकांड के बाद आतंकवादियों, पाकिस्तान के विरुद्ध उपजा क्रोध अब सरकार की ख़ामोशी, कदमों को देखते हुए रोष में बदलने लगा था. जनसामान्य की एकराय सिर्फ और सिर्फ युद्ध जैसा कठोर कदम उठाने की थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक भी पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

केन्द्र सरकार ने पहलगाम घटना के बाद से ही अपनी सक्रियता शुरू कर दी थी. गृह मंत्रालय के आदेश पर एनआईए ने हमले की जाँच आरम्भ की. सिन्धु जल समझौता अनिश्चितकाल के लिए निलम्बित कर दिया गया. पाकिस्तान से युद्ध होने, तनाव की स्थितियों के बाद भी इस समझौते को कभी निलम्बित नहीं किया गया था. यह पहली बार है जबकि भारत ने इसको निलम्बित किया. पाकिस्तान ने भारत के इस कदम को ‘युद्ध की कार्यवाई बताया. पाकिस्तानी नागरिकों के सभी प्रकार के वीजा रद्द करते हुए उन्हें तत्काल वापसी के आदेश दिए गए. इसी के साथ इस्लामाबाद में भारतीय मिशन और नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या को कम कर दिया गया. पाकिस्तानी उच्चायोग के रक्षा, नौसेना और वायुसेना सलाहकारों को एक सप्ताह में भारत छोड़ने का आदेश भी दिया गया. सेना के सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिए गए. केन्द्र सरकार के ऐसे क़दमों, निर्णयों से स्पष्ट संकेत मिला कि इस बार वह शांत बैठने के मूड में नहीं है.

 



केन्द्र सरकार स्वयं तो कूटनीतिक, राजनैतिक निर्णय लेते हुए काम कर रही थी साथ ही सैन्य गतिविधियों को भी सक्रियता प्रदान कर रही थी. सरकार की तरफ से लगातार बैठकों के द्वारा सेना को उनकी सैन्य गतिविधियों के लिए खुली छूट देने जैसा आक्रामक एवं विश्वासपरक कदम उठाकर दर्शाया गया कि सरकार सुस्त अथवा खामोश नहीं है. भारतीय वायुसेना द्वारा सेंट्रल सेक्टर में एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया गया, जिसमें पहाड़ी और जमीनी लक्ष्यों पर हवाई हमलों का अभ्यास किया गया. इसे 'आक्रमण' नाम दिया गया जिससे इसका उद्देश्‍य स्पष्ट हो जाता है. वायु सेना के अलावा नौसेना ने अरब सागर में अपनी गतिविधियों को बढ़ा दिया था. युद्धपोतों को हाई अलर्ट पर रख कर कई एंटी-शिप और एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण भी किया गया.  

 

इसके बाद भी जनाक्रोश कम नहीं हो रहा था. जनमानस पाकिस्तान के विरुद्ध खुले रूप में सैन्य गतिविधि को देखना चाहता था. दरअसल जनता का मनोविज्ञान तत्काल कार्यवाही करने का, तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति, राजनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट किसी भी सरकार के लिए युद्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं स्वीकारा जाता है. युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष वाली स्थिति में ले जाना होता है. हम सभी वर्तमान में वैश्विक स्तर पर कई युद्ध देख रहे हैं, जो लम्बे समय के बाद भी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं. भारत सरकार की मंशा भी कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है. सम्भव है कि ऐसा कुछ विचार करके केन्द्र सरकार किसी सटीक कदम को उठाने की तैयारियों में सक्रिय हो.

 

ऐसा कुछ उस समय समझ में भी आया जबकि केन्द्र की तरफ से युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए नागरिकों को आगाह किया गया. एक निश्चित तिथि पर देश में मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट के द्वारा युद्ध से निपटने के लिए जन-जागरूकता को बढ़ाने वाले दिशा-निर्देश जारी किये गए. इधर जनमानस में ब्लैक आउट को लेकर, मॉक ड्रिल को लेकर सक्रियता, सजगता देखने को मिल रही थी उधर सरकार कुछ बड़ा करने के मूड में थी. केन्द्र सरकार द्वारा अप्रत्याशित कदम उठाते हुए मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट वाले दिन से पहले ही पाकिस्तान और पीओके में मिसाइल स्ट्राइक करके पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की कमर तोड़ दी.

 

भारत की तीनों सेनाओं ने अपनी संयुक्त शक्ति के साथ आधी रात के बाद ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के द्वारा पाकिस्तान और पीओके स्थित आतंकवादी ठिकानों पर सटीक सैन्य हमले किये. ख़ुफ़िया जानकारियों के आधार पर चिन्हित 21 आतंकी ठिकानों में से अभी 09 ठिकानों को सेना ने अपना निशाना बनाया है. इनमें पाँच केन्द्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में और चार पाकिस्तान में स्थित थे. इन हमलों में विशेष बात यह रही कि पाकिस्तान के किसी भी सैन्य ठिकाने को और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया गया. सेना का निशाना पूरी तरह आतंकी केन्द्रित रहा, इसमें लश्कर-ए-तैयबा, टीआरएफ सहित कई आतंकी ठिकाने शामिल रहे. बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद), मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय), टेहड़ा कलां (जैश-ए-मोहम्मद), सियालकोट (हिजबुल मुजाहिदीन), बरनाला (लश्कर-ए-तैयबा), कोटली (जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन का प्रशिक्षण शिविर), मुजफ्फराबाद (लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी शिविर और जैश-ए-मोहम्मद का संचालन केन्द्र) इन हमलों में पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए.

 

केन्द्र सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट रूप से कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर अभी ख़त्म नहीं हुआ है. यह स्पष्ट सन्देश है कि आतंकी संगठनों का, उनके ठिकानों का सफाया किये बिना भारतीय सेना रुकने वाली नहीं है. अचम्भित करने वाली भारत की सैन्य कार्रवाई में दर्जनों आतंकियों और उनके करीबियों के मारे जाने की पुष्टि खुद पाकिस्तान ने की है. केन्द्र सरकार द्वारा उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक तथा पुलवामा अटैक के बाद की एयर स्ट्राइक के बाद वर्तमान मिसाइल स्ट्राइक के द्वारा पाकिस्तान को स्पष्ट सन्देश दिया गया है कि भारत अब पाकिस्तानी आतंकवाद का घिनौना खेल बर्दाश्त नहीं करने वाला. निश्चित ही ऐसा दृढ़ विश्वास और आक्रामक रणनीति जनाक्रोश को समाप्त करेगी साथ ही आतंकियों का भी सर्वनाश करेगी.  


23 अप्रैल 2025

हिन्दुओं के विरुद्ध सुनियोजित साजिश

पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा उठाये गए नृशंस कदम को प्रथम दृष्टया भले ही आतंकी हमला कहा जाये, भले ही इसे पर्यटकों पर हमला कहा जाये मगर आतंकियों द्वारा जिस तरह से कलमा पढ़वा कर, खतना देख कर, मजहबी पहचान करने के बाद हत्याएँ की हैं वो अलग कहानी कह रहा है. हमले से स्पष्ट है कि आतंकियों का उद्देश्य पर्यटकों को मारना नहीं था, पहलगाम में दहशत फैलाना नहीं था बल्कि उनका उद्देश्य सिर्फ हिन्दुओं की हत्या करना था. इस हमले को पुलवामा आतंकी हमले के बाद बड़ा हमला बताकर पहलगाम की घटना के सन्दर्भों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है.

 

पहलगाम की इस घटना के सन्दर्भ तलाशने के लिए कुछ वर्ष पूर्व की स्थितियों का आकलन किया जाना भी आवश्यक है. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार के ठोस और दृढ़ निर्णयों के बाद से भारतीय सेना ने, यहाँ के वीर जवानों ने अपने पूरे पराक्रम, पूरे साहस के साथ पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की, आतंकवादियों की कमर तोड़ी है, वह अपने आपमें बेमिसाल है. इसके साथ ही अगस्त 2019 में केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था. इसको समाप्त करने के साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करके दोनों को केन्द्रशासित राज्य घोषित कर दिया था. अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में आतंकी घटनाओं में कमी देखने को मिली. यहाँ के सामान्य नागरिकों, विशेष रूप से हिन्दुओं ने सहजता का अनुभव किया. विगत के कुछ वर्षों में हिन्दू जनसंख्या द्वारा हर्षोल्लास के साथ अपने पर्व-त्योहारों का मनाया जाना आरम्भ हो गया. किसी समय मौत की कहानी कहते, सन्नाटों में रहने वाले लाल चौक ने भी शान से भारतीय तिरंगे को लहराते हुए देखा. यदि ऐसी अनेकानेक घटनाओं का सार निकाला जाये, उनका आकलन करके निष्कर्ष निकाला जाये तो कहीं न कहीं एहसास होगा कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जहाँ जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल होने लगी थी, वहीं हिन्दुओं में भी सुरक्षा का भाव आने लगा था.

 



जम्मू-कश्मीर की ऐसी स्थिति कम से कम उनके लिए असुविधाजनक तो है ही जो यहाँ पर आतंकवाद को फलते-फूलते देखना चाहते हैं. जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं की सहजता उन कट्टर ताकतों के लिए असहज हो गई होगी जिनके हाथ कश्मीरी हिन्दुओं के खून से रँगे हैं. यहाँ की शांति पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के पैरोकारों के लिए, उनके कट्टरपंथी आकाओं के लिए भी चुभने वाली रही होगी. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार की रणनीति जम्मू-कश्मीर क्षेत्र को लेकर स्पष्ट रही है, जिस तरह से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर, बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को लेकर भारतीय कूटनीतिज्ञ कदम सामने आते रहते हैं, उससे भी इस क्षेत्र के और सीमा-पार के आतंकवादियों में निश्चित रूप से बेचैनी रही होगी. ऐसी स्थितियों के बीच में जहाँ जम्मू-कश्मीर लगातार शांति, सुरक्षा की राह पर बढ़ता दिख रहा है वहीं पाकिस्तान की हालत लगातार अस्थिर होती जा रही है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि पाकिस्तान की, वहाँ की सरकार की अस्थिरता को रोकने का एकमात्र कदम भारत-विरोध, हिन्दू-विरोध रहा है. यह आज से नहीं बल्कि पाकिस्तान के निर्माण से ही उनका प्रमुख हथियार बना हुआ है. इस हथियार का प्रयोग पिछले सप्ताह इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने किया था. पाकिस्तानी सेना प्रमुख द्वारा उस कार्यक्रम में बयान अनायास ही नहीं दिए गए हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की उपस्थिति में पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कश्मीर को पाकिस्तान की गर्दन की नस बताया. इसके साथ-साथ उन्होंने परम्पराओं, रीति-रिवाजों, धर्म आदि को अलग-अलग मानते हुए हिन्दू-मुसलमानों को भी अलग बताया. सीमा-पार से आये इस तरह के अलगाववादी बयानों के बाद धार्मिक पहचान के आधार पर किये जाने वाला हमला न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि चिंताजनक है.

 

इधर जाँच में सामने आया है कि आतंकियों ने इस हमले की पूरी रणनीति पहले से तैयार कर रखी थी. पहलगाम पर्यटन स्थल को चुनने के पीछे उनका उद्देश्य गैर-कश्मीरियों को निशाना बनाना था. इसमें भी उनके निशाने पर हिन्दू नागरिक ही थे. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में अशांति, आतंकवाद चाहने वालों का उद्देश्य यह दिखाना है कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद भी स्थितियाँ सुधरी नहीं हैं. यहाँ पर हिन्दू अभी भी असुरक्षित है. अब जबकि इस जघन्य और सुनियोजित इस्लामिक आतंकी हत्याकांड के बाद सेना सर्च ऑपरेशन चला रही है तो निश्चित रूप से इस घटना के साजिशकर्ता भी बेनकाब होंगे किन्तु केन्द्र सरकार को और अधिक कठोरता से, दृढ़ता से सैन्य कार्यवाही के लिए भारतीय सेना को अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने होंगे. कठोर सैन्य कार्यवाई के द्वारा आतंकवादियों के, कट्टरपंथियों के आकाओं को, सीमा-पार पाकिस्तानी आतंकवाद को नेस्तनाबूद करना चाहिए. जम्मू-कश्मीर से विस्थापित हो चुके हिन्दुओं के मन में यह विश्वास जगाना होगा कि वे अब पूरी सुरक्षा, सहजता के साथ वापस लौट सकते हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह सन्देश देना होगा कि जम्मू-कश्मीर यहाँ के नागरिकों के लिए, पर्यटकों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है.


09 अक्टूबर 2024

चुनाव परिणाम भाजपा के लिए संजीवनी

अबकी बार चार सौ पार जैसा जबरदस्त नारा उछलने के बाद भी लोकसभा चुनावों में आशातीत सफलता न मिल पाने के बाद गैर-भाजपाई दलों द्वारा नए तरह के दुष्प्रचार राजनैतिक गलियारों में उछालने शुरू कर दिए थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली, भाजपा की डबल इंजन सरकार की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उठाते हुए विपक्षी दलों के उभरते गठबंधन और मुहब्बत की दुकान ने आने वाला समय अपना बताया. इस तरह की वैचारिकी को, विपक्षी दलों द्वारा फैलाये जा रहे दुष्प्रचार को उस समय और बल मिला जबकि चुनाव सर्वेक्षणों ने हरियाणा में गठबंधन को जबरदस्त सफल होते दिखाया. इसके उलट चुनाव परिणामों ने अलग कहानी लिख दी. 

 

हरियाणा विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने लगभग 40 प्रतिशत मतों के साथ 48 सीटों को भाजपा के पक्ष में देकर विपक्षी दलों द्वारा चलाये जा रहे अनेकानेक दावों, बयानों को गलत साबित कर दिया. पिछले विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने लगभग 37 प्रतिशत मतदान भाजपा के पक्ष में करते हुए 40 सीटों पर विजय दिलवाई थी. अबकी सीटों की संख्या और मतदान प्रतिशत दोनों में वृद्धि करते हुए हरियाणा के मतदाताओं ने भाजपा के विरुद्ध चलाये जा रहे तमाम दुष्प्रचार खारिज कर दिए. भाजपा की इस विजय से निश्चित ही विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस को जबरदस्त निराशा हुई होगी क्योंकि जिस तरह से हरियाणा में भाजपा विरोधी माहौल बनाया गया था, चुनाव सर्वेक्षणों में उसे एक पायदान नीचे दिखाया गया था उसके बाद कांग्रेस खुद को सत्तासीन समझ चुकी थी. यहाँ की जनता ने किसान विरोधी, पहलवान विरोधी, सेना विरोधी, सरकार विरोधी तमाम स्थितियों को आइना दिखा दिया. भाजपा की जीत ने अग्निवीर योजना पर मतदाताओं की मुहर लगाई, साथ ही यह भी साबित कर दिया कि महिला पहलवानों और किसानों का मुद्दा विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था.

 



भाजपा ने हरियाणा में आरम्भ से ही अपना ध्यान राज्य के ओबीसी मतदाताओं पर लगाया जो हरियाणा की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हैं. यहाँ की राजनीति में मुख्य रूप से जाट समुदाय का प्रभुत्व बना हुआ है जो राज्य की कुल जनसंख्या का 25 प्रतिशत हैं. कांग्रेस सहित अन्य दलों का ध्यान जहाँ जाट मतदाताओं पर रहा वहीं भाजपा ने गैर-जाट मतदाताओं को आकर्षित कर अपनी जीत सुनिश्चित की. इसके अलावा भाजपा ने गाँवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दलित परिवारों तक पहुँच बनाई, जिसमें लखपति ड्रोन दीदी अभियान ने मुख्य भूमिका निभाई.

 

हरियाणा का चुनाव वहाँ की राजनैतिक स्थितियों के कारण चर्चा में रहा तो जम्मू-कश्मीर का चुनाव इसलिए राष्ट्रव्यापी विमर्श का हिस्सा बना क्योंकि धारा 370 हटाये जाने, केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद वहाँ यह पहला चुनाव था. इस चुनाव को लोकतान्त्रिक प्रणाली की परीक्षा भी माना जा रहा था. राज्य का इतिहास रहा है कि जहाँ पर आतंकवादियों और अलगाववादियों के भय के साए में चुनाव सपन्न हुआ करते थे, वहाँ भाजपानीत केन्द्र सरकार द्वारा लोकतंत्र की बहाली का रास्ता बनाते हुए 2019, 2020 एवं 2021 में क्रमशः ब्लॉक विकास परिषद् (बीडीसी), जिला विकास परिषद्  (डीडीसी) एवं पंचों-सरपंचों के चुनाव सहजता, शांतिपूर्वक करवा दिए. केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद हुए परिसीमन में जम्मू संभाग में 43 और कश्मीर संभाग में 47 सीटों का आवंटन किया गया. जम्मू-कश्मीर के चुनावों में देखा जाये तो यहाँ राष्ट्रीयता के स्थान पर क्षेत्रीयता और जनजातीय अस्मिता को महत्त्व दिया गया. राज्य में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन का पूरा जोर धारा 370 की वापसी, राज्य का दर्ज़ा बहाल करने, भू-स्वामित्व को सीमित करना आदि पर रहा. इसके माध्यम से गठबंधन राज्य के नागरिकों को लुभाने में सफल भी रहा. परिणामस्वरूप नेशनल कांफ्रेंस को 45 सीटों पर विजय प्राप्त हुई जबकि कांग्रेस को मात्र 06 सीटों से संतोष करना पड़ा.

 

भाजपा की दृष्टि से यह चुनाव कुछ लाभकारी कहा जा सकता है. पिछले चुनाव की 25 सीटों के मुकाबले इस बार उसे 29 सीटों पर विजय प्राप्त हुई. राज्य में कश्मीर मुस्लिम बहुल है जहाँ भाजपा की पैठ न के बराबर है. जम्मू में जहाँ हिन्दू जनसंख्या अपना प्रभाव रखती है वहाँ भाजपा के प्रदर्शन को संतोषजनक कहा जा सकता है. मतदाताओं के बीच भाजपा ने लोकतंत्र की स्थापना, क्षेत्रीय विकास, आतंकवाद-अलगाववाद को समाप्त करने आदि मुद्दों को पहुँचाने की कोशिश की लेकिन राज्य में उसके लिए बहुत अधिक राजनैतिक संभावनाओं के न होने के बाद भी 2014 की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन निश्चित ही भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं के लिए संजीवनी का काम करेगा. राज्य के चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि यहाँ नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनेगी किन्तु अबकी शासन, सरकार का स्वरूप पहले वाले जम्मू-कश्मीर जैसा नहीं होगा. केन्द्रशासित राज्य होने के कारण वर्तमान में उपराज्यपाल की शक्तियाँ अपना कार्य करेंगी, इस कारण अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए मुख्यमंत्री को उपराज्यपाल की अनुमति, सहमति की आवश्यकता होगी.

 

बहरहाल हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को उस क्षेत्र विशेष के सन्दर्भ में, वहाँ की राजनैतिक, नागरिक स्थितियों के सन्दर्भ में देखने की आवश्यकता है. केन्द्र की भाजपानीत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा-मुक्त, शांतिपूर्वक चुनाव करवाकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना का आधार निर्मित किया है वहीं हरियाणा में भाजपा द्वारा लगातार तीसरी जीत ने बहुत सारे दुष्प्रचारों को खारिज किया है. इस जीत से निश्चित ही चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा, उसके सहयोगी दलों और कार्यकर्ताओं में उत्साह, ऊर्जा का संचार होगा.

25 जून 2024

आपातकाल का सच और वर्तमान दौर

भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है. रेडियो पर लगभग आधी सदी पूर्व गूँजी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस आवाज़ ने देश में हलचल मचा दी थी. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत देश में आपातकाल घोषणा किया था. 25 और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने के साथ ही यह लागू हो गया था. 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक देश में 21 महीने तक आपातकाल लागू रहा. इस कदम को आज भी लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जाता है.

 

आपातकाल की व्यवस्था किसी तरह की असंवैधानिक व्यवस्था नहीं है. देश के संविधान में ही आपातकाल लागू किये जाने की व्यवस्था है. संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है. आपातकाल में नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं. ऐसी स्थिति उस समय व्यवहार में लाई जाती है जबकि सम्पूर्ण देश अथवा किसी राज्य पर अकाल, बाहरी देशों के आक्रमण, आंतरिक प्रशासनिक अव्यवस्था अथवा अस्थिरता आदि जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए. इस तरह की विषम स्थिति में समस्त राजनैतिक और प्रशासनिक  शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में चली जाती हैं. 1975 के पूर्व वर्ष 1962 तथा वर्ष 1971 में राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था.

 



देश में पहली बार आपातकाल 26 अक्टूबर 1962 से 10 जनवरी 1968 के बीच लगा जबकि उस समय भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था. दूसरी बार 3 से 17 दिसंबर 1971 के बीच आपातकाल लगाये जाने का कारण भारत-पाकिस्तान युद्ध था. दोनों स्थितियों में देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए ऐसी घोषणा की गई थी. इन दो वास्तविक विषम परिस्थितियों के सापेक्ष वर्ष 1975 की स्थितियों को देखा जाये तो आपातकाल लागू किये जाने का तार्किक आधार नजर नहीं आता है. बावजूद इसके आपातकाल लागू किया गया. अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ-साथ नागरिकों के जीवन का अधिकार भी छीन लिया गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई. प्रत्येक मीडिया सेंटर पर सेंसर अधिकारी नियुक्त कर दिया गया. उसकी अनुमति के बाद ही समाचार का प्रकाशन हो रहा था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो रही थी.

 

दरअसल आपातकाल लगाये जाने के पीछे किसी बाहरी शक्ति से खतरा होने से ज्यादा इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता जाने का खतरा दिखाई देने लगा था. 1971 में तत्कालीन भारत-पाकिस्तान युद्ध में जबरदस्त विजय और बांग्लादेश निर्माण के बाद से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. इसी के चलते उन्होंने 1971 का लोकसभा चुनाव भी प्रचंड बहुमत से जीतकर विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया था. दरअसल 1971 में बांग्लादेश बन जाने से भले ही इंदिरा गांधी को लोकप्रियता मिली मगर उसके साथ बांगलादेशी शरणार्थियों के आने से देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा. गुजरात और बिहार में इस नकारात्मकता ने आन्दोलन का रूप ले लिया. इन दोनों राज्यों से विद्यार्थियों की जबरदस्त एकजुटता को आन्दोलन की शक्ल में बदलने का काम किया बिहार के जयप्रकाश नारायण ने. उनके नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का नारा देते हुए आन्दोलन तेज होने लगा. इसके साथ ही इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत में अपनी याचिका में आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर 12 जून 1975 को फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द करते हुए अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. जगह-जगह उनके इस्तीफे की माँग उठने लगी. इसी से आक्रोशित होकर आपातकाल जैसा कदम उठाया गया.  

 

विगत कुछ वर्षों से विपक्ष द्वारा लगातार प्रचार किया जा रहा है कि वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा आपातकाल जैसी स्थितियाँ पैदा कर दी गई हैं. अभी हाल में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों में संविधान बदल देने, आरक्षण समाप्त कर देने, भविष्य में चुनाव न होने देने जैसा दुष्प्रचार किया गया. यहाँ विशेष बात यह है कि 1975 में आपातकाल की नींव रखने वाला दल आज विपक्ष में है और आपातकाल के ज़ुल्मों को सहने वाले सरकार में हैं. ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया के पर्याप्त स्वतंत्र होने की स्थिति में किसी भी प्रचार-दुष्प्रचार का आकलन राष्ट्रीय हितों को देखते हुए किया जाना चाहिए. वर्तमान पीढ़ी के बहुसंख्यक नागरिकों ने आपातकाल में प्रशासन, पुलिस की ज्यादतियों को पढ़ ही रखा है, इसके उलट बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक भी हैं जिन्होंने आपातकाल की क्रूरता को न केवल देखा है बल्कि सहा भी है. ऐसे में उन लोगों, भले ही वे राजनीति में नहीं हैं, का भी दायित्व बनता है कि वर्तमान पीढ़ी को सत्य से परिचित करवाते रहें. आपातकाल के दौर में भुक्तभोगी रही मीडिया को भी यथोचित स्थितियों के सच के साथ सामने आने की आवश्यकता है. यदि लगता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार के कार्य, नीतियाँ इस तरह की हैं जो घोषित अथवा अघोषित आपातकाल की पीठिका निर्मित करती हैं, तो उनका मुखर विरोध किया जाना चाहिए. जिस तरह से विगत वर्षों में संसद में पक्ष और विपक्ष की भूमिकाएँ देखने को मिली हैं वे प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती हैं. देश के धन और समय के अपव्यय के बीच समाप्त होते निष्फल संसद सत्रों के बीच घोषित अथवा अघोषित आपातकाल देश को नुकसान ही पहुँचायेगा.   


14 मार्च 2024

आर्थिक सम्पन्नता से होगी वैतरणी पार

लोकसभा चुनावों की सुगंध चारों तरफ फैलने लगी है. इस बार का लोकसभा चुनाव जहाँ एक तरफ विपक्षी गठबंधन के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है वहीं भाजपा के लिए खुद को निखारने जैसा है. विगत दस वर्षों के कार्यों को देखने के बाद शायद ही किसी राजनैतिक विश्लेषक को केन्द्र में भाजपानीत सरकार के प्रति संशय हो. इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए प्रतिद्वंद्विता स्वयं से ही है, निखारना भी स्वयं को है, साबित भी स्वयं को करना है. विगत दस वर्षों के कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी द्वारा किये गए कार्यों, उनके द्वारा लिए गए अनेक साहसिक निर्णयों के द्वारा यह निर्धारित हो चुका है कि वे देशहित में किसी भी तरह का साहसिक निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते हैं.

 

उनके इन्हीं कार्यों, निर्णयों के आधार पर सहज स्वीकार्यता बनी हुई है कि इस लोकसभा चुनाव में जनादेश प्राप्त करने के बाद वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे. देश में अभी तक हुए सत्रह लोकसभा चुनावों में जवाहर लाल नेहरू के अतिरिक्त किसी को भी लगातार तीन बार जनादेश नहीं मिला है. नेहरू जी के नेतृत्व में 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस विजयी हुई थी. भाजपा द्वारा ‘अबकी बार, चार सौ पार’ का नारा ऐसे ही नहीं दिया जा रहा है. ऐसा अनुमान है कि नरेन्द्र मोदी अपने तमाम कार्यों, निर्णयों के आधार पर कांग्रेस के एक और कीर्तिमान पर अपनी नजर बनाये हुए हैं. अभी तक के लोकसभा चुनावों में वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उसी वर्ष संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने कीर्तिमान रचते हुए ऐतिहासिक 415 सीटों के साथ केन्द्र में सरकार बनायी थी. नरेन्द्र मोदी और भाजपा का पूरा प्रयास रहेगा कि अपने कार्यों के चलते वे इस ऐतिहासिक संख्या को छू सकें.

 



जिस तरह की राजनैतिक हलचल मची हुई है, जिस तरह से विपक्ष के क्रियाकलाप हैं, जिस तरह से उनके द्वारा बयानबाजी की जा रही है, जिस तरह से मतदाताओं का रुख है उसे देखकर इस लोकसभा में भाजपा को जनादेश मिलना मुश्किल नहीं लग रहा है. इसके पीछे नरेन्द्र मोदी के वे तमाम कार्य और निर्णय हैं जो उन्होंने पूरे साहस के साथ पूरे किये हैं. इन कार्यों में चाहे नोटबंदी हो, 370 की समाप्ति हो, तीन तलाक का मामला हो, राममंदिर निर्माण हो, नारी शक्ति वंदन अधिनियम हो, नागरिकता संशोधन अधिनियम हो या फिर समान नागरिक संहिता जैसा मुद्दा हो. असल में इन कार्यों को भाजपा के थिंक टैंक द्वारा, उनके सहयोगियों द्वारा तो खूब प्रचारित-प्रसारित किया गया मगर उन अनेकानेक कार्यों पर विषद चर्चा कभी नहीं की गई जो जनहित से जुड़े रहे, जो आर्थिक नीतियों से जुड़े रहे. उक्त तमाम विषयों को विरोधियों द्वारा बार-बार आलोचनात्मक रूप में उठाते हुए सरकार की आलोचना की गई कि उसके द्वारा गरीबी, स्वास्थ्य, मंहगाई, रोजगार आदि के लिए किसी भी तरह का कार्य नहीं किया गया. इन बिदुओं पर भाजपा के रणनीतिकारों द्वारा भी जनमानस के बीच जाने का प्रयास नहीं किया गया. आम जनता को यह समझाने का प्रयास ही नहीं किया गया कि मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार द्वारा महज जम्मू-कश्मीर, अयोध्या, वाराणसी आदि पर ही कार्य नहीं किया गया बल्कि आयुष्मान योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, बालिका समृद्धि योजना, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया आदि के द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने का कार्य किया है.

 

2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अद्यतन भारतीय राजनीति को दो-दो दशकों के तुलनात्मक रूप में देखा जाने लगा है. इसमें पहला मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाला 2004-2014 का संप्रग कार्यकाल और दूसरा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाला 2014-2024 का राजग कार्यकाल है. यहाँ इन दो-दो दशकों के एक-एक पक्ष को विश्लेषित कर पाना संभव नहीं है मगर कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को अवश्य ही दर्शाया जा सकता है. जब भी किसी सरकार के कार्यों का आकलन किया जाता है तो मंहगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना आदि पर विशेष नजर रखी जाती है. तुलनात्मक रूप में देखें तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने प्रति व्यक्ति वार्षिक आय, रसोई गैस कनेक्शन, आवास, शौचालय, शिक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार, आधारभूत संरचना, मातृत्व सेवाओं आदि में जबरदस्त उपलब्धि प्राप्त की है. उज्ज्वला योजना, सस्ते आवास योजना, शौचालय निर्माण के द्वारा मोदी सरकार ने जन-जन में, गरीब तबके में अपनी पैठ बनाई है. 2004 में रसोई गैस कनेक्शन की संख्या 14.5 करोड़ थी जो 2023 में 31.4 करोड़ हो गई. स्वच्छता के प्रति गम्भीर मोदी सरकार ने शौचालय के निर्माण में सकारात्मकता दिखाई. अपने दोनों कार्यकाल में 11.5 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके मोदी सरकार ने महिलाओं, बहू-बेटियों को खुले में शौच जाने की शर्मिंदगी, मुसीबत से छुटकारा दिलवाया. आश्चर्य की बात है कि संप्रग सरकार के दो दशकों में महज 1.8 करोड़ शौचालयों का ही निर्माण करवाया जा सका था. महिलाओं के प्रति संवेदनशील मोदी सरकार ने मातृत्व लाभार्थियों के प्रति विशेष जागरूकता दिखाई है. उनके कार्यकाल में ऐसे लाभार्थियों की संख्या 9.9 लाख के मुकाबले 559 लाख तक पहुँची.

 

भाजपा, मोदी विरोधियों द्वारा आये दिन मँहगाई, आर्थिक स्तर आदि को लेकर हमलावर रुख अपनाया जाता है. बयानबाजियों के लिए किसी भी स्तर तक जाकर जनमानस को बरगलाया जा सकता है किन्तु यदि तथ्यों की, आँकड़ों की बात की जाये तो कुछ अलग ही परिदृश्य नजर आता है. संप्रग सरकार के अंतिम दिनों में विदेशी मुद्रा कोष की स्थिति अत्यंत ही दयनीय बनी हुई थी. मँहगाई की औसत दर भी अपने चरम पर थी. मोदी सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में विशेष प्रयास किये गए. दूसरे देशों से लगातार संपर्क, खाड़ी देशों से दोस्ताना सम्बन्ध आदि के चलते समय के साथ आर्थिक स्थिति में सुधार आया. विदेशी मुद्रा इस जनवरी में 617 अरब डॉलर था और मंहगाई की औसत दर वर्ष 2023 में 5.1 प्रतिशत रही. इस तरह के आर्थिक माहौल के चलते ही अनेक विदेशी कम्पनियों ने भारत का रुख किया. निवेश की जबरदस्त स्थिति के चलते ही देश ने पहली बार भारतीय वस्तुओं के निर्यात को 400 अरब डॉलर के पार किया. इस तरह की आर्थिक स्थिति के कारण ही आज भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. 2023 में देश की जीडीपी 3.7 लाख करोड़ हो गई है और इसके 2024 में 4.1 लाख करोड़ रहने का अनुमान है.

 

वर्तमान में नरेन्द्र मोदी के कार्यों-निर्णयों ने उनके कद को अत्यंत विराट स्वरूप दे दिया है. मुद्दा चाहे राष्ट्रीय महत्त्व का हो या फिर क्षेत्रीय महत्त्व का प्रत्येक स्तर पर मोदी सरकार की सहभागिता दिखाई देती है. जहाँ उनके द्वारा सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, पोषण, आवास आदि की समस्या को दूर करते हुए 24.8 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का कार्य किया गया वहीं विदेशी मुद्रा भंडार, टैक्स संरचना, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, बिजनेस रैंकिंग आदि में बहुआयामी परिवर्तन  करके देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलवाई है. आज जिस तरह से देश का आर्थिक, सामाजिक ढाँचा सुधारात्मक मोड में है, लोगों की क्रय-क्षमता बढ़ी है, ग्रामीण अंचलों तक बिजली ने अपनी पहुँच बनाई है, मूलभूत सुविधाओं ने महिलाओं की जीवन-शैली को सहज बनाया है उससे जनमानस में नरेन्द्र मोदी के प्रति, सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है. निश्चित ही यही विश्वास भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को इस लोकसभा चुनावी वैतरणी सफलतापूर्वक, सहजतापूर्वक पार करवा देगा. 





 

12 मार्च 2024

अपने ही नागरिकों को नागरिकता देने वाला कानून

चार वर्ष से अधिक की प्रतीक्षा के पश्चात् अंततः नागरिक संशोधन अधिनियम को भारत के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया. दिसम्बर 2019 में यह अधिनियम संसद के दोनों सदनों में पारित हुआ था. अब इसे अधिसूचित किये जाने के बाद इस अधिनियम के क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त हो गया है. इस कानून के लागू हो जाने से भारत के तीन पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिल सकेगी. संसद के दोनों सदनों से पारित इस अधिनियम के द्वारा अफगानिस्तान , बांग्लादेश और पाकिस्तान से प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता का त्वरित मार्ग प्रदान करके के लिए नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता सम्बन्धी नियमों में परिवर्तन किये गए.

 



देश की स्वतंत्रता के बाद जब 26 जनवरी 1950 को यहाँ का संविधान लागू हुआ तो भारत में जन्म लेने वाले नागरिकों को यहाँ की नागरिकता स्वतः ही मिल गई थी. इसके पश्चात् 1955 में नागरिकता कानून बनाकर उन सभी नागरिकों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई जो पूर्व-रियासतों के नागरिक रहे थे. इस कानून में समय-समय पर परिवर्तन भी किये जाते रहे. ऐसा करने के पीछे कारण गोवा, दमन-दीव, पुडुचेरी की भौगौलिक स्थितियों में आये परिवर्तन रहे थे. दरअसल पाकिस्तान और बांग्लादेश से भूमि विवाद सुलझाने के कारण से इन क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों को भारत की नागरिकता देने के लिए ये संशोधन किये गए थे. भूमि विवाद के साथ-साथ इन पड़ोसी देशों में धार्मिक विवाद भी लगातार देखने को मिल रहे थे. इससे शायद ही कोई इंकार करे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में वहाँ के अल्पसंख्यक नागरिकों-हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी आदि को लगातार अमानवीय व्यवहार, उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा, संरक्षण के लिए नेहरू-लियाकत समझौता भी इसी कारण से धरातल पर लाया गया था. कालांतर में उसका अनुपालन असल हो गया.

 

ये एक विचारणीय स्थिति है कि देश के विभाजन के पूर्व इन तीनों पड़ोसी देशों के ये अल्पसंख्यक नागरिक इसी भारत देश के नागरिक थे, यही इनकी भी मातृभूमि थी. ऐसी स्थिति जबकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए किये गए समझौते का अनुपालन करना संभव नहीं हो रहा था तो भारत की संवैधानिक जिम्मेवारी बनती थी कि वह इन प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करे. लगातार मिलते उत्पीड़न, शोषण के कारण इन देशों के अल्पसंख्यक नागरिक लगातार अपनी मातृभूमि-भारत की तरफ एक आशा की दृष्टि के साथ दौड़ पड़ते हैं. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के ऐसे हजारों नागरिक अवैध प्रवासी के रूप में भारत में रह रहे हैं. मानवीयता के आधार पर भले ही उनकी सहायता की जा सके मगर देश की कोई भी सरकार, राज्यों की सरकारें चाह कर भी संवैधानिक रूप से उनकी सहायता नहीं कर पा रही थीं. ये तीनों देश भी अपने देश में अपने अल्पसंख्यक नागरिकों की सहायता करने में असमर्थ ही नजर आ रहे थे. ऐसे में भारत सरकार ने अपना दायित्व समझते हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम को दोनों सदनों में पारित करवाया और उसकी विस्तीर्ण नियमावली को अधिसूचित कर दिया. यह अधिनियम इन तीनों देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों को देश की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान करता है किन्तु वह इन्हीं तीनों पडोसी देशों के मुस्लिम नागरिकों को भारत की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान नहीं करता है.

 

देखा जाये तो भारत सरकार की तरफ से यह एक महत्त्वपूर्ण कदम का उठाया जाना है. इस अधिनियम से देश के किसी भी अल्पसंख्यक और मुस्लिम की नागरिकता पर किसी तरह का संकट नहीं खड़ा होता है, जैसा कि पूर्व में अनेक विपक्षी राजनैतिक दलों द्वारा कहा जाता रहा है. अनेक राजनैतिक दलों के साथ-साथ अनेक मुस्लिम संगठनों ने इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात् इसका जबरदस्त विरोध किया था. शाहीन बाग़ में एक लम्बी अवधि तक चला विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण है. यहाँ स्पष्ट रूप से समझने वाली बात है कि यह अधिनियम देश के किसी भी व्यक्ति, वह चाहे किसी भी धर्म का हो, की नागरिकता को खतरे में नहीं डालता है न ही उसका हनन करता है. यह अधिनियम उन वंचितों को, धार्मिक अल्पसंख्यकों को कानूनी अधिकार देता है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में प्रताड़ित होकर भारत में शरणार्थी की स्थिति में हैं. नागरिकता अधिनियम में नागरिकता के प्रावधान के सन्दर्भ में आवेदक को पिछले 12 महीनों के दौरान और पिछले 14 वर्षों में से आखिरी वर्ष में 11 महीने भारत में रहना चाहिए. कानून में हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई जो तीन देशों-अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से सम्बंधित हैं, उनके लिए 11 वर्ष की जगह 6 वर्ष तक का समय निर्धारित किया गया है. कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी नियम का उल्लंघन किया जाता है तो ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया कार्डधारकों का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है. 


भारत सरकार द्वारा कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में अपने ही उन नागरिकों को संरक्षण, सुरक्षा प्रदान किये जाने का प्रावधान किया है जो आज़ादी के समय तत्कालीन स्थितियों के चलते अनचाहे ही किसी दूसरे देश के नागरिक बन गए थे और उन देशों में वे धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक भी थे, प्रताड़ित भी थे. इस तरह के कदम के लिए देशव्यापी समर्थन, सहयोग मिलना चाहिए था मगर कतिपय राजनैतिक स्वार्थ के चलते इस अधिनियम का अतार्किक विरोध किया गया. अब जबकि इस अधिनियम को अधिसूचित कर दिया गया है, राज्यों का अनापेक्षित हस्तक्षेप न रहे इसके लिए केन्द्रीय पोर्टल की व्यवस्था की गई है, तब सभी को अपने ही पूर्व-नागरिकों का स्वागत, सम्मान करना चाहिए जो अभी तक अपने ही देश में शरणार्थी की तरह रहने को विवश थे. 





 

13 फ़रवरी 2024

बदलते भारत की कूटनीतिक विजय

भारतीय नौसेना के सात पूर्व अधिकारियों ने दिल्ली हवाई अड्डे को जब भारत माता की जय के नारों से गुंजायमान कर दिया, तब वह क्षण भारत के लिए वैश्विक कूटनीति और विदेश नीति में विजय का क्षण था. ये वही पूर्व सैनिक थे जिनको क़तर की अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाई गई थी. इन पूर्व नौसैनिक अधिकारियों की मौत की सजा को भारत के कूटनीतिक हस्तक्षेप के बाद कतर ने माफ कर दिया था. मौत की सजा माफ़ होने के बाद भी भारत ने प्रयासों में कमी न रखी. आखिरकार इन पूर्व नौसैनिकों को कतर ने रिहा कर दिया. इस मामले में भारत सरकार की कूटनीति की सराहना करनी होगी क्योंकि कुछ दिन पहले लोकसभा में एक सदस्य ने सरकार को कतर में बंद सैनिकों को वापस लाने की चुनौती दी थी. भारत सरकार द्वारा बिना किसी शोर-शराबे और प्रतिक्रिया के सकारात्मक रणनीति पर कार्य करते हुए अपने नागरिकों को रिहा करवा लिया गया.

 



जेल से रिहा हुए ये पूर्व नौसैनिक दहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज एंड कंसल्टिंग सर्विसेज में काम करते थे. दोहा स्थित यह निजी फर्म कतर के सशस्त्र बलों और सुरक्षा एजेंसियों को प्रशिक्षण और अन्य सेवाएँ प्रदान करती है. यद्यपि क़तर सरकार द्वारा आरोपों का स्पष्ट रूप से खुलासा नहीं किया गया तथापि ऐसा समझा जा रहा कि इनको कतर के पनडुब्बी प्रोग्राम के सम्बन्ध में इजरायल के लिए जासूसी करने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था. भारत सरकार ने आरोपों को लेकर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने अपने नागरिकों के साथ उचित व्यवहार की करने पर जोर दिया था. इस रिहाई को मोदी सरकार की बदलती और प्रभावी विदेश-नीति का प्रतीक भी कहा जा रहा है. इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों के साथ सम्बन्ध सुधारने पर विशेष बल दिया गया. पहले की सरकारों में इस तरफ कम ध्यान दिया जाता रहा. प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने अपना स्पष्ट रुख रखा था कि पश्चिम एशिया और अरब देशों से संबंधों के मामले में नया अध्याय जोड़ा जा रहा है. भारत सरकार के द्वारा नए भारत सम्बोधन को लगातार सच भी किया जा रहा है. इसके लिए बिना किसी पूर्वाग्रह के केन्द्र सरकार द्वारा अपनाई जा रही कूटनीति और विदेशनीति को देखना होगा. इन क्षेत्रों में भारत को लगातार सफलता मिल रही है. अफगानिस्तान, यूक्रेन से भारतीय नागरिकों को भारत ने निकाला. यूक्रेन-संकट के दौरान पुतिन ने भारतीय विद्यार्थियों को सेफ पैसेज देते हुए उनको निकलने में मदद की.

 

पूर्व नौसैनिकों की सजा का मामला सिर्फ विदेश नीति तक ही सीमित नहीं रहा. दिसम्बर में दुबई में हुए पर्यावरण सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कतर के राष्ट्रप्रमुख शेख तमीम बिन हमाद की मुलाकात को सकारात्मक संदेश के रूप में देखा गया. इस मुलाकात के बाद भारतीय नागरिकों की रिहाई का समाचार आना अपने आपमें एक सुखद सन्देश है. यह एक प्रकार से क़तर के स्वभाव का भी परिचायक है. विदेशी मामलों के जानकार मानते हैं कि कतर एक ऐसा देश है जो हमेशा मध्यस्थता करके दो देशों के विवादों को सुलझाने में सहायक की भूमिका हेतु जाना जाता है. अभी हाल में इजराइल और हमास के बीच भी कतर ने सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करते हुए मध्यस्थता निभाई. भारत की बढती वैश्विक छवि से क़तर अनजान नहीं है. ऐसे में भारतीय कूटनीति, विदेश नीति और दोनों देशों के मध्य के राजनयिक, व्यापारिक सम्बन्धों के चलते कतर को भारतीय कैदियों को राहत देनी पड़ी.

 

इस पूरे घटनाक्रम में वर्ष 2014 की संधि और अभी हाल ही में भारत और क़तर के मध्य हुए गैस सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण समझौते को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. 2014 की संधि में दोनों देशों के मध्य यह स्वीकार किया गया था कि अगर किसी कारण से दोनों देशों के नागरिकों को सजा मिलती है तो वे अपने देश में सजा काट सकते हैं. ऐसे में एक सम्भावना इन पूर्व सैनिकों के भारत में सजा काटने की भी बन रही थी मगर भारत सरकार ने इस मामले को कूटनीतिक नजरिए से उठाते हुए अमेरिका और तुर्किए से भी चर्चा की थी. इन दोनों देशों के रिश्ते कतर और उसके राष्ट्राध्यक्ष से बेहतर हैं. जिसके चलते इन नागरिकों की रिहाई सम्बन्धी निर्णय आना सहज हुआ. भारतीय कूटनीति के साथ-साथ क़तर के साथ हुए गैस सम्बन्धी समझौते को भी इस मामले में प्रभावकारी माना जा रहा है. इसी फरवरी में हुए इस समझौते के अनुसार भारत अगले बीस वर्षों  तक क़तर से लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) खरीदेगा. एलएनजी आयात करने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड ने कतर की सरकारी कंपनी कतर एनर्जी के साथ ये समझौता किया है. इसके अनुसार कतर प्रतिवर्ष 7.5 मिलियन टन गैस भारत को निर्यात करेगा.

 

कूटनीति हो, विदेश नीति हो या फिर क़तर के साथ हमारे दोस्ताना सम्बन्ध कुल मिलाकर भारतीय नागरिक रिहा होकर स्वदेश लौट आये हैं. विश्व राजनीति बहुत ही जटिल और संवेदनशील हो चुकी है. भारत ने दक्षिण एशिया से ऊपर उठकर वैश्विक राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. विदेश के संकटग्रस्त देशों से भारतीय नागरिकों की वापसी रही हो, कोरोनाकल में भारत द्वारा मदद देना रहा हो, तालिबान और पश्चिमी देशों के मध्य बातचीत होना रहा हो, सभी में भारतीय कूटनीति, विदेश नीति महत्त्वपूर्ण भूमिका में नजर आई है. विगत वर्षों में भारतीय विदेश नीति नित नए आयाम गढ़ती नजर आ रही है. यह वैश्विक परिदृश्य में भारतीय छवि की बढ़ती स्वीकार्यता का सूचक है. 






 

09 अगस्त 2023

संसद बना विपक्ष का प्रचार मंच

लोकसभा में मंगलवार को विपक्ष द्वारा मणिपुर हिंसा के सन्दर्भ में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई. यह चर्चा आठ अगस्त से शुरू होकर दस अगस्त तक चलेगी. इसी दिन प्रधानमंत्री अपना जबाव देंगे. कांग्रेस के गौरव गोगोई द्वारा लाये गए इस अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की शुरुआत उन्होंने करते हुए मणिपुर हिंसा पर डबल इंजन सरकार को पूरी तरह विफल बताया. उनके द्वारा सवाल किए कि प्रधानमंत्री मणिपुर क्यों नहीं गए? मणिपुर के मुख्यमंत्री को क्यों नहीं हटाया गया? इस अविश्वास प्रस्ताव से मोदी सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. लोकसभा में बहुमत के लिए 272 सांसदों की ज़रूरत है. यहाँ एनडीए के पास 331 सांसद हैं, जिसमें अकेले भाजपा के पास 303 सांसद हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि भले ही सभी ग़ैर-एनडीए दल एक साथ आ जाएँ फिर भी केंद्र सरकार के पास अविश्वास प्रस्ताव से बचने के लिए पर्याप्त संख्या है. हालांकि कांग्रेस के इस प्रस्ताव का समर्थन करने वाले नवगठित गठबंधन का संख्याबल से कोई लेना देना नहीं है उनका एकमात्र उद्देश्य मणिपुर हिंसा पर प्रधानमंत्री मोदी को सदन में बोलने के लिए मजबूर करना है. मणिपुर में इसी तीन मई से हिंसा हो रही है, जिसमें डेढ़ सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. 




लोकसभा में पक्ष और विपक्ष की संख्या स्पष्ट रूप से दिखने के बाद भी विपक्ष के द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने पर भाजपा सांसद द्वारा सोनिया गांधी पर तंज कसते हुए कहा गया कि उनके लिए अविश्वास प्रस्ताव का एकमात्र मूलमंत्र है, बेटे को सेट करना और दामाद को भेंट करना. ऐसा तंज कसने के सन्दर्भ में यह भी समीचीन है कि 136 दिन बाद राहुल गांधी की लोकसभा में वापसी इसी सात अगस्त को हुई है. मोदी सरनेम मामले में सजा के बाद चली गई उनकी संसद सदस्यता को लोकसभा अध्यक्ष ने फिर से बहाल कर दिया है. ऐसे में संसद में राहुल गांधी का दोबारा आने को कांग्रेस तथा उनके सहयोगी दलों द्वारा जनता के बीच इस तरह से प्रस्तुत किया जाने का विचार हो सकता है, जिससे लगे कि वे सड़क से लेकर संसद तक लगातार संघर्ष कर रहे हैं.  विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव राहुल गांधी के संसद में दोबारा आने से संदर्भित इसलिए भी लगता है क्योंकि उनके आने और अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने की तिथियों में समानता दिख रही है.  


यद्यपि राहुल गांधी की सदस्यता बहाल होने के बाद विपक्षी खेमा जोश में है तथापि इसी मानसून सत्र में अन्य कई विधेयकों के पारित होने के बीच दिल्ली सेवा बिल के पारित होने ने लोकसभा में विपक्ष के संख्याबल की वास्तविकता से परिचय करवा दिया है. चूँकि ना तो केंद्र सरकार को कोई खतरा है और ना ही विपक्ष संख्याबल के हिसाब से इस हैसियत में है कि सरकार को किसी भी तरह की परेशानी में डाल सके ऐसे में विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाने की अपनी मजबूरी को बताना पड़ा कि इसके द्वारा मणिपुर मामले पर प्रधानमंत्री का मौनव्रत तोड़ा जा सके. सोचने वाली बात ये है कि क्या मात्र प्रधानमंत्री का जबाव सुनने भर के लिए विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया होगा? यदि गंभीरता से आकलन किया जाये तो प्रस्ताव लाने की यह रणनीति अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए की जाने वाली कवायद है. इसके द्वारा एक तरफ राहुल गांधी को स्थापित करने वाला कदम भी उठाया जा रहा है, साथ ही नवगठित विपक्षी गठबंधन की मजबूती को भी जाँचा-परखा जा रहा है.


जिसे भी राजनीति की, संसद में संख्याबल की जरा सी भी जानकारी होगी उसे स्पष्ट रूप से समझ आएगा कि ये सारी कवायद विशुद्ध रूप से दिखावटी संघर्ष को दिखाने वाली है. देखा जाये तो कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल बजाय किसी तरह के सार्थक संघर्ष करने के संसद को खेल का मैदान बनाने के साथ-साथ राहुल गांधी को, अपने आपको प्रचारित-प्रसारित करने का माध्यम बनाने में लगे हैं. यदि विपक्षी दलों को वाकई संघर्ष करना है, जनता को दिखाना है तो उन्हें आपातकाल का दौर याद करना होगा. तब सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास संख्याबल आज के सत्ताधारी गठबंधन से भी बहुत ज्यादा था. पाँचवीं लोकसभा के चुनाव वर्ष 1971 में संपन्न हुए. यह स्वतंत्र आजाद भारत का पाँचवाँ आम चुनाव होने के साथ-साथ देश का पहला मध्यावधि चुनाव भी था. इसमें कुल 520 लोकसभा सीटों पर चुनाव हुए जिसमें से 352 पर कांग्रेस ने जीत हासिल की थी. यहाँ ध्यान देने योग्य एक तथ्य यह भी है कि इस चुनाव में कुल 54 पार्टियों ने अपना भाग्य आजमाया था. इसमें सीपीआई (एम) 29 सांसदों के साथ दूसरे नंबर पर रही जबकि मोरारजी देसाई की कांग्रेस (ओ) 16 सांसदों के साथ तीसरे नंबर का दल था.


उस दौर में सरकार ने न केवल संवैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग किया बल्कि प्रशासनिक बल का भी दुरुपयोग किया. विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करने जबरन जेलों में डाला गया. अनावश्यक मुकदमेबाजी शुरू हुई. ऐसे तानाशाही भरे, क्रूरता भरे दौर में भी विपक्ष ने हार नहीं मानी. उसके नेताओं द्वारा बातों के बताशे नहीं फोड़े गए. जनता के सामने अपना संघर्ष दिखाने को संसद में शाब्दिक दुर्व्यवहार नहीं किया गया, टीवी, मीडिया का सहारा नहीं लिया गया, न आँख मारी गई, न फ़्लाइंग किस उछाली गई. उस समय के विपक्ष ने संख्याबल में कम होने के बाद भी सम्पूर्ण देश की जनता को सत्ताधारी दल के विरुद्ध अपनी ताकत बना लिया था. व्यावहारिक और वास्तविक संघर्ष उसी दौर में देखने को मिला था. उसी का परिणाम था कि जबकि समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण विपक्ष ने चुनाव लड़ा और 298 सीटें जीतीं. वर्ष 1977 की जनवरी को इंदिरा गांधी ने अचानक से आकाशवाणी के जरिए देश में आम चुनाव की घोषणा की. मात्र तीन दिन, 16 मार्च से 19 मार्च के बीच चुनाव संपन्न हुए. इस लोकसभा चुनाव में जनता ने विपक्ष के संघर्ष का साथ देते हुए कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया. कांग्रेस गठबंधन को मात्र 153 सीटें ही मिलीं.


यहाँ संसद को अपने नेताओं का, अपने प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाये बैठे विपक्षी दलों को यह तथ्य भी स्मरण रखना होगा कि संसद जनता के धन से संचालित हो रही है, जिस पर एक दिन का खर्च कई करोड़ रुपये आता है. संसद की कार्यवाही सामान्यतया एक सप्ताह में पाँच दिन चलती है. प्रतिदिन की कार्यवाही सात घंटे चलाने की परम्परा बनी हुई है. एक रिपोर्ट के अनुसार संसद में एक घंटे का खर्च डेढ़ से दो करोड़ रुपए बैठता है. ऐसे में यदि एक दिन का आकलन किया जाये तो यह खर्च बढ़कर बारह-तेरह करोड़ रुपए से अधिक होता है. सोचा जा सकता है कि कैसे देश के धन का अपव्यय उसी स्थान से किया जा रहा है जहाँ देश के नीति-नियंता विराजमान हैं. विपक्षी दलों को अपने व्यवहार में, अपने चाल-चलन में सकारात्मकता लानी होगी. वातानुकूलित सदन में बैठकर महज प्रधानमंत्री के मौनव्रत को तुड़वाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव को लाने, राहुल गांधी को संघर्षशील नेता के रूप में स्थापित करने जैसे संकुचित कदमों को छोड़ना होगा. उनको अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी जनता के बीच जाकर करनी चाहिए. यदि विपक्षी दल वाकई मणिपुर मामले में संवेदित है तो वह उस हिंसा को लेकर वास्तविकता में जनता के बीच उतरे. सरकार की गैर-जिम्मेवारी को बुलंद आवाज़ में उठाये. सड़कों से लेकर जेलों तक आंदोलित रूप में नजर आये.