अनाज बैंक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अनाज बैंक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

12 जून 2020

बेटी की वैवाहिक ख़ुशी में शामिल है अनाज बैंक

जब आप किसी की ख़ुशी में शामिल होते हैं तो न केवल उस परिवार की ख़ुशी में वृद्धि होती है बल्कि खुद को भी प्रसन्नता महसूस होती है. ऐसी ख़ुशी उस समय भी मिलती है जबकि आप किसी की ख़ुशी में बिना किसी स्वार्थ के सम्मिलित होते हैं. ऐसी ही ख़ुशी में शामिल होने का अवसर अनाज बैंक टीम को आज मिला. इस टीम का एक हिस्सा होने के नाते उस ख़ुशी में एक भाग हमें भी मिला. उस आनंद का अतिरेक आंतरिक रूप से महसूस किया.


जनपद जालौन के ग्राम खजुरी का एक परिवार विगत कई वर्षों से वाराणसी अपने काम के सिलसिले में जाता रहता है. इस वर्ष भी उसका वहाँ जाना हुआ. उसके वहाँ पहुँचते ही कोरोना ने अपना रूप दिखाना शुरू  किया और उसके कारण सरकार को लॉकडाउन लगाना पड़ा. ऐसी स्थिति में इस परिवार के सामने न केवल रोजगार का संकट पैदा हुआ बल्कि खाने-पीने की भी समस्या उत्पन्न हुई. ऐसे में वाराणसी में संचालित अनाज बैंक मुख्यालय ने तमाम परिवारों की तरह इस परिवार का भी भरण-पोषण का जिम्मा लिया. बिना किसी क्षेत्र, वर्ग की परवाह किये अनाज बैंक सदैव सबकी सहायता करता है.

वह परिवार लॉकडाउन जैसे समय में भी वाराणसी में आराम के साथ निवास कर रहा था मगर उस परिवार के बुजुर्ग पारिवारिक सदस्य, जो गाँव में थे, उनके लिए लगातार चिंता करते रहते थे. उनके बराबर जोर डालने पर, दवाब बनाने पर खजुरी का यह परिवार साइकिल से, पैदल वाराणसी से अपने गाँव के लिए निकल पड़ा. अनाज बैंक संस्थापक डॉ० राजीव श्रीवास्तव सहित अनाज बैंक वाराणसी की टीम ने उस परिवार को रोकने का बड़ा प्रयास किया मगर अपने घर के बुजुर्गों के दवाब के कारण वह परिवार अपने गाँव आ ही गया. चालीस-पैंतालीस दिन तक अनाज बैंक के संपर्क में रहने के कारण यह परिवार लॉकडाउन, कोरोना, क्वारंटाइन आदि के बारे में जान-समझ चुका था. इस कारण गाँव आने के पहले पूरे परिवार ने अपनी जाँच मेडिकल कॉलेज, उरई में करवाई तथा सबकुछ सामान्य होने के बाद भी अपने आपको चौदह दिन के क्वारंटाइन में रखा.

बेटी के बाबा के साथ शाखा प्रबंधक धर्मेन्द्र कुमार 

इस परिवार का संपर्क लगातार अनाज बैंक वाराणसी से तथा बुन्देलखण्ड की क्षेत्रीय शाखा उरई से बना रहा. अनाज बैंक निदेशक डॉ० अमिता सिंह लगातार इस परिवार को राशन सामग्री की सहायता उपलब्ध करवाती रहीं. यह जानकारी होने पर कि इस परिवार की बेटी का विवाह इसी 19 जून को संपन्न होना है अनाज बैंक ने इसमें अपनी सहभागिता परिवार की तरह करने का विचार बनाया. अनाज बैंक द्वारा इस परिवार की ख़ुशी में स्वयं को सम्मिलित किया गया. परिवार को न केवल सहायता करने बल्कि वैवाहिक आयोजन को पारिवारिक आयोजन मानकर अनाज बैंक बुन्देलखण्ड की तरफ से प्रयास किया गया.


अनाज बैंक संरक्षक माननीय इन्द्रेश जी के निर्देशानुसार संस्थापक राजीव जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ. इसके साथ-साथ अनाज बैंक निदेशक डॉ० अमिता सिंह के निर्देशन में उरई शाखा टीम ने खजुरी गाँव पहुँचकर परिवार को यथासंभव खाद्य-सामग्री प्रदान की तथा बिटिया को वस्त्र-आभूषण तथा उसकी गृहस्थी से सम्बंधित आवश्यक सामान उपहारस्वरूप आशीर्वाद के साथ प्रदान किये. इस अवसर पर टीम ने वैवाहिक तैयारियों के बारे में भी जानकारी ली. परिजन अनाज बैंक के इस कदम से अत्यधिक उत्साहित और प्रसन्न दिखे. बिटिया को भावी जीवन के सुखमय होने का आशीर्वाद.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

17 अप्रैल 2020

मुश्किल वक्त का साथी है अनाज बैंक

लॉकडाउन के कारण दैनिक आजीविका वालों को संकट का सामना करना पड़ रहा है. इनके साथ-साथ वे लोग भी परेशानी में होंगे जिनके पास आजीविका के अल्प-साधन थे. छोटे दुकानदार, छोटे कामगार आदि भी इस समय आर्थिक समस्या से जूझ रहे होंगे. इस विकट समय में बहुत सी जगहों पर बहुत से समाजसेवी सामने निकल कर आये हैं. इनमें से बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता वाकई सामाजिक सद्भाव, संवेदना के साथ काम कर रहे हैं जबकि इन्हीं में से बहुत से ऐसे हैं जो अपनी फोटो खिंचाने में, उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने में ज्यादा विश्वास रखते हैं. सामाजिक क्षेत्र में कार्य का अनुभव रखने वाले, ईमानदारी और जिम्मेवारी के साथ संवेदनशीलता के साथ बहुत से लोग सूचीबद्ध तरीके से राशन का, भोजन का वितरण कर रहे हैं. ऐसे लोगों द्वारा वितरण होने के कारण खाद्य-सामग्री का उचित तरीके से वितरण हो पा रहा है, उसकी बर्बादी नहीं हो रही है. लॉकडाउन के चलते एकाएक समाजसेवा का भाव जागने वाले लोग बिना किसी योजना के काम करने में लगे हैं. जिसके कारण न केवल यथोचित जगह तक वितरण हो पा रहा है बल्कि खाद्य-सामग्री का भी बहुत नुकसान हो रहा है. सोशल मीडिया पर ही अनेकानेक वीडियो, फोटो देखने को मिल रहे हैं जहाँ अनावश्यक भोजन पैकेट एकत्र करके, जमाखोरी करके रखे गए हैं.


इसके बीच इन्हीं नवोन्मेषी समाजसेवियों द्वारा एक समस्या सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करने की भी आ रही है. एक जरूरतमंद को राशन सामग्री, भोजन सामग्री देते हुए हुए कई-कई लोग एकसाथ फोटो खिंचवाते नजर आ रहे हैं. अनेक जगहों से ऐसी भी खबरें समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई हैं जिसमें जरूरतमंद लोगों ने ऐसे लोगों से राहत सामग्री लेने से इंकार कर दिया जो फोटो खींचने, खिंचवाने के प्रति ज्यादा लालायित दिखे. स्थिति यहाँ तक असहनीय या अशोभनीय हुई कि सरकारी स्तर पर ऐसे कार्य को रोकने के लिए दिशा-निर्देश देने पड़े. इसी में यदाकदा चर्चा उठी अनाज बैंक द्वारा मदद करने, फोटो खींचने, सोशल मीडिया पर अपलोड करने की. असल में ऐसी चर्चाएँ उठना स्वाभाविक भी है क्योंकि बहुत से लोग उत्साह में, संवेदना के साथ सामाजिक कार्य करने निकल पड़ते हैं. उत्साह में किया जाने वाले सामाजिक कार्य बहुत लम्बे समय तक नहीं चल पाते, विशेष रूप से वे जिनमें बहुत बड़ा क्षेत्र शामिल हो जाये, बहुत ज्यादा जनसँख्या शामिल हो जाये. ऐसी स्थिति के सुचारू रूप से नियमित सञ्चालन के लिए एक कार्ययोजना, एक टीम की, ईमानदारी की, समर्पण की आवश्यकता होती है. ऐसी चर्चा करने वाले अनाज बैंक को गंभीरता से समझने का काम संभवतः कर नहीं सके हैं.



ऐसा इसलिए क्योंकि जैसे ही लॉकडाउन की घोषणा हुई उसके दो-तीन दिन बाद ही शहर के अनेक लोगों ने फोन से संपर्क करके अनाज बैंक के कदमों को जानना चाहा. उसके द्वारा भोजन, राशन वितरण के बारे में जानना चाहा. स्पष्ट है कि उन सभी लोगों की मंशा मदद करने की रही होगी मगर जिस तरह का माहौल उरई में, जनपद में दिखाई दे रहा था वैसे में उस भागदौड़ का हिस्सा अनाज बैंक नहीं बनना चाहता था. ख़ुशी की बात यह रही कि प्रशासन स्वतः ही बराबर अनाज बैंक के संपर्क में बना रहा. आखिर उसने न केवल उरई का बल्कि मुख्यालय वाराणसी का काम बहुत ही नजदीक से देखा-सुना था. ऐसे में अनाज बैंक ने शहर में चल रही भगदड़ का हिस्सा बनने के बजाय प्रशासन की सुविधा, निर्देशानुसार सहायता उपलब्ध करवाई.

बैंक की औपचारिक कार्यवाही सभी निकासी खाताधारक महिलाओं को करनी होती है 

बहरहाल, अनाज बैंक प्रतिमाह मजबूर, गरीब, विधवा, लाचार महिलाओं को पाँच किलो अनाज उपलब्ध कराता है. खाद्य-सामग्री में उपलब्धता के आधार पर परिवर्तन भी होता रहता है मगर मात्रा कम से कम पाँच किलो ही रहती है. प्रतिमाह होने वाले इस वितरण कार्यक्रम का बाकायदा रिकॉर्ड बनाया जाता है. इसी के अंतर्गत वितरण कार्य की फोटो, वीडियो बनाया जाता है, उन्हें जनमानस के संज्ञान में लाने के लिए इंटरनेट पर अपलोड भी किया जाता है. वर्तमान समय में चल रही मदद और उसकी फोटो लेने तथा अनाज बैंक द्वारा ली जाने वाली फोटो-वीडियो का एक मूलभूत अंतर है. वह यह कि अनाज बैंक से जुड़ी महिलाएँ किसी तरह का दान, मदद नहीं लेती वरन उनका बाकायदा अनाज बैंक में एक खाता खोला जाता है. वे यहाँ की नियमित निकासी खाताधारक होती हैं. उनको बैंक से जोड़ने के पहले भौतिक सत्यापन किया जाता है. उनके पास उपलब्ध किसी भी पहचान-पत्र, किसी भी दस्तावेज की फोटोप्रति अनाज बैंक में जमा करवाई जाती है. प्रतिमाह वितरण में शामिल होने वाली निकासी खाताधारक महिलाओं की संख्या, पहचान निश्चित है. कुछ इसी तरह की प्रक्रिया अनाज बैंक की सहायता करने वालों के साथ अपनाई जाती है. उनका जमा खाता खोला जाता है. वे बैंक के जमा खाताधारक कहलाते हैं. उनके द्वारा किया गया सहयोग किसी भी तरह की दान शब्दावली के अंतर्गत नहीं आता है बल्कि उनके खाते में उनकी जमाराशि होता है. इसे भी अनाज बैंक धनराशि के रूप में नहीं वरन खाद्य-सामग्री के रूप में स्वीकारता है.

प्रत्येक निकासी खाताधारक का होता है रिकॉर्ड

इसके बाद भी यदि आलोचनात्मक दृष्टि से भी इसका विश्लेषण करते हुए मान लें कि निकासी खाताधारक, जमा खाताधारक अनाज बैंक की अपनी शब्दावली है. लोगों के बीच अपनी तुष्टिकरण की नीति के लिए बनाये गए शब्द हैं तो भी एक बात स्पष्ट यह होती है कि अनाज बैंक द्वारा प्रतिमाह किये जाने वाला वितरण का यथोचित रिकॉर्ड होता है. उसके द्वारा महज मदद करने के नाम पर मदद करने का काम नहीं किया जाता है. वर्तमान परिदृश्य में यदि अनाज बैंक से जुड़ी महिलाओं को लाभार्थी माना भी जाये तो नियमानुसार लाभार्थियों की संख्या, पहचान निश्चित होती है. उनका एक रिकॉर्ड होता है. यह एक तरह की वैसी ही सरकारी प्रक्रिया है जो कि सरकार द्वारा अपनी विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों की फोटो वीडियो, रिकॉर्ड, पहचान आदि के सम्बन्ध में पूरी करनी होती है. यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि लॉकडाउन के समय में प्रशासन द्वारा अनाज बैंक की खाताधारक महिलाओं की मदद की गई. उनके लिए उपलब्ध राशन सामग्री को अनाज बैंक द्वारा ही वितरित करवाया गया. अप्रैल माह में हुए इस वितरण को किसी भी रूप में सार्वजनिक नहीं किया गया. अनाज बैंक द्वारा सदैव इसका ध्यान रखा जाता है कि किसी भी महिला के सम्मान को ठेस न पहुँचे. समस्त निकासी खाताधारक महिलाओं को अनाज बैंक पारिवारिक सदस्य के रूप में सम्मान भी देता है. किसी भी पावन पर्व पर उसके साथ परिजनों की भांति ही व्यवहार किया जाता है. फिलहाल, अनाज बैंक मुख्यालय वाराणसी में चौबीस घंटे रसोई का सञ्चालन कर रहा है. उरई स्थिति बुन्देलखण्ड अनाज बैंक लॉकडाउन में भी प्रशासन की मंशा के अनुसार काम कर रहा है. लॉकडाउन के बाद वह अपने मूल रूप में कार्य करता रहेगा. गरीब, मजबूर, बेबस, विधवा महिलाओं की सहायता करता रहेगा.


महिला दिवस के अवसर पर सभी निकासी खाताधारक महिलाओं का सम्मान भी 

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

18 दिसंबर 2019

आतंकियों के नए हथियारों से सचेत रहने की आवश्यकता

ये  आवश्यक नहीं कि आप अथवा आपका शहर आतंकिओं के निशाने पर हो और वहाँ किसी तरह का बम धमाका हो, किसी तरह की गोलीबारी हो. बिना इसके भी आतंकी अथवा उनके स्लीपर सेल अपना काम करने के लिए नए-नए रास्ते तलाशने लगे हैं. इसे किसी तरह का आकलन अथवा अनुमान मान कर अनदेखा करने की आवश्यकता नहीं है. आतंकियों द्वारा अब ऐसा किया जा रहा है. अभी हाल ही में वाराणसी से संचालित विशाल भारत संस्थान प्रमुख और अनाज बैंक के संस्थापक डॉ० राजीव श्रीवास्तव इसी तरह के एक हमले में घायल हो गए हैं. राजीव श्रीवास्तव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के केन्द्रीय पदाधिकारी और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के प्रमुख इन्द्रेश कुमार जी के शिष्य होने के साथ-साथ अत्यंत नजदीकी हैं. ऐसे में ज़ाहिर सी बात है कि प्रशासन की तरफ से मुख्य रूप से समूचे घटनाक्रम का संज्ञान लिया गया. 


जांच के बाद स्पष्ट हुआ कि एक एक निजी कार्यक्रम से वापस आते समय राजीव श्रीवास्तव की बाइक में एक जीप द्वारा टक्कर मारी गई. अपने आपमें सजग और चैतन्य रहने वाले राजीव जी इस टक्कर पर संभल गए मगर उन्हें किसी आतंकी हमले का अंदेशा नहीं था. वे इसे महज एक सड़क की सामान्य घटना समझ अपने गंतव्य के लिए चलते रहे. इसी बीच उसी जीप ने एक बार फिर उनको टक्कर मार दी. इस बार टक्कर कुछ तेज रही और किसी अनहोनी से परे राजीव जी बजाय संभल पाने के दुर्घटना का शिकार हो गए. उन पर हुए इस हमले में उनकी जान तो बच गई मगर उनका दाहिना पैर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया.


राजीव जी पर हुए हमले के बाद जब प्रशासन सक्रिय हुआ तो कुछ पुरानी दुर्घटनाओं का तारतम्य बैठाने का प्रयास किया गया. कुछ दिनों पूर्व संघ के मोहन भागवत जी की कार भी एक ट्रक दुर्घटना का शिकार हुई थी. इसी तरह से कुछ संघ पदाधिकारी भी आये दिन सड़क दुर्घटनाओं का शिकार बन रहे हैं. प्रशासन की गुप्त सूचनाओं और जानकारियों से ऐसा मालूम हुआ है कि मजबूर मुस्लिम बच्चों की परवरिश करने के साथ-साथ तीन तलाक मुद्दे, धारा 370, राम जन्मभूमि मंदिर, नागरिकता संशोधन, जनसँख्या कानून आदि पर सक्रिय रूप से कार्य करने के कारण राजीव श्रीवास्तव विगत काफी समय से कट्टरपंथियों के निशाने पर थे. उनके पहले उनके संस्थान की एक मुस्लिम महिला सदस्य को भी काफी लम्बे समय से मुस्लिम कट्टरपंथियों की धमकियाँ मिलती रही हैं. इन सबसे बिना भयभीत हुए राजीव जी और उनके सभी सदस्य लगातार मुस्लिम हितों के लिए कार्य करते आ रहे हैं.

अब जबकि इस मामले में स्पष्ट हो चुका है कि आतंकियों द्वारा इस तरह की दुर्घटनाओं को अपना हथियार बना लिया गया है जहाँ न किसी तरह का धमाका होना है, न किसी तरह की गोलीबारी. ऐसी दुर्घटनाओं को शासन-प्रशासन द्वारा भी महज सड़क दुर्घटना मान कर लगभग भुला दिया जाता है. चूँकि राजीव श्रीवास्तव का मामला कहीं न कहीं हाई प्रोफाइल मामला बन गया और उसकी जांच के बाद से इस तरह के संकेत भी मिल गए. ऐसे में सभी नागरिकों को सजग, सचेत रहने की आवश्यकता है. किसी भी दुर्घटना अथवा अन्य तरीके की ऐसी घटनाओं को महज संयोग समझकर विस्मृत करने की आवश्यकता नहीं है. सभी जिम्मेवार नागरिकों को सजग रहने की जरूरत है और प्रशासन का सहयोग करने की आवश्यकता है. एक-एक व्यक्ति के जागने से ही आतंकियों के हौसलों को तोड़ा जा सकता है.


++
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
मीडिया प्रभारी/प्रवक्ता - विशाल भारत संस्थान

01 नवंबर 2019

अनाज बैंक खुद को समाज से जोड़ने की पहल है


ये विचार करना और लाना अपने आपमें ही बहुत मुश्किल होता है कि कोई व्यक्ति कैसे सैकड़ों व्यक्तियों के भोजन की व्यवस्था अपनी आय से करता होगा. ये अपने आपमें सोच पाना भी दुष्कर है कि कोई व्यक्ति अपनी पूरी मासिक आय को बच्चों के पालन-पोषण में व्यय कर देता है. ये शायद आपकी कल्पना के बाहर हो कि कोई व्यक्ति सात सौ से अधिक बच्चों का पिता हो, वो भी आधिकारिक रूप से दस्तावेजों में. पर ऐसा सब कुछ सत्य है और इसी दुनिया में सत्य है, आज के घनघोर कहे जाने वाले कलियुग में सत्य है. बीएचयू के नाम से वैश्विक ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालय के इतिहार विभाग के प्राध्यापक डॉ० राजीव श्रीवास्तव ऐसा ही काम कर रहे हैं. उनके द्वारा विगत लगभग तीस वर्षों से सामाजिक कार्यों का लेखा-जोखा यहाँ एक पोस्ट में नहीं दिया जा सकता मगर उनके बारे में इतना समझा जा सकता है कि उस एक व्यक्ति ने पिछले तीन दशकों में सामाजिक सेवा में अलग मानक स्थापित किये हैं. उन्हें समझने के लिए, जानने के लिए वाराणसी के इन्द्रेश नगर में जाना होगा, जहा सुभाष भवन आप सबकी वाट जोह रहा है.



बहरहाल, यदि राजीव जी के बारे में लिखने बैठे तो न तो समय शेष रहेगा न इस पोस्ट में जगह, सो जिस उद्देश्य के लिए आज की पोस्ट लेकर आये हैं, उसे साकार किया जाये. आज की पोस्ट का मंतव्य था राजीव जी के कार्यों से प्रेरित होकर किस तरह उरई में अनाज बैंक का शुभारम्भ किया गया और उसके द्वारा लगभग एक सैकड़ा महिलाओं को सहायता उपलब्ध करवाई गई. उरई के सनातन धर्म महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ० अमिता सिंह के परिवार में कुछ ऐसा घटित हुआ कि उन्होंने अपने सामाजिक कार्यों को, अपने पारिवारिक दायरे को और विस्तार देने का विचार किया. उनकी छोटी बहिन के असामयिक निधन के पश्चात् चंद दिनों तक वे संभवतः ऊहापोह की स्थिति में रही किन्तु कालांतर में अपने परिवार की सामाजिक प्रस्तिथि को देखते हुए वे अपने मूल स्वरूप में लौट आईं. डॉ० अमिता सिंह का परिवार लम्बे समय से किसी न किसी रूप में सामाजिक कार्यों के साथ जुड़ा हुआ था. पारिवारिक आधार पर उनके लिए अनाज बैंक की ईमारत को खड़ा करना सहज लगा. इसी सोच के साथ वे अनाज बैंक की एक शाखा उरई में संचालित करने में सफल रहीं. डॉ० अमिता सिंह के द्वारा उरई में अनाज बैंक की महज शाखा ही स्थापित न हुई वरन बुन्देलखण्ड जैसे क्षेत्र में भूख से लड़ने का एक आन्दोलन भी आरम्भ हुआ. इस आन्दोलन ने न केवल जालौन में बल्कि सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड में भूख के खिलाफ एक अभियान आरम्भ हुआ. इसी का परिणाम रहा कि बुन्देलखण्ड के पहले अनाज बैंक की स्थापना हुई उरई में, अनाज बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय के रूप में. 



अनाज बैंक, उरई की स्थापना के बाद से अद्यतन उसके उद्देश्य ‘कोई भी भूखा न सोये’ को वरीयता दी गई. समाज से जुड़े लोगों के किसी भी तरह के पारिवारिक आयोजनों में अनाज बैंक की लाभार्थी महिलाओं को जोड़ा गया, उन्हें एक परिवार की तरह मानते-स्वीकारते हुए धार्मिक आयोजनों में, पारिवारिक आयोजनों  में सहभागी बनाया गया. महिलाओं को सामान्य दिनों में अनाज वितरण के साथ-साथ धार्मिक आयोजनों में, विशेष पर्वों-त्योहारों में अतिरिक्त खाद्य-पदार्थों की व्यवस्था अनाज बैंक, उरई शाखा द्वारा की गई. महिलाओ की चिकित्सा, उनके आर्थिक सशक्तिकरण की व्यवस्था, बालिकाओं की शिक्षा आदि के सम्बन्ध में भी उरई शाखा द्वारा प्रयास किये जाते रहे. विगत दो वर्षों में एक सैकड़ा से अधिक महिलाएँ लाभान्वित रहीं, साथ ही उनमें से अधिसंख्यक महिलाओं को रोजगार की उपलब्धता भी करवाई गई. आज एक नवम्बर को अनाज बैंक, उरई के दो वर्ष पूरे होने पर तथा दीदी अनिला राणावत की पुण्यतिथि के तीन साल हो जाने पर लाभार्थी महिलाओं को अनाज वितरण के साथ-साथ भोजन भी करवाया गया. इसके पीछे महज यही सोच थी कि समूचा समाज एक परिवार है. ऐसे में किसी एक सदस्य के जाने के साथ-साथ अनेक सदस्यों का जुड़ना होता है. शायद अनिला दीदी के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि उन्होंने अपने स्वरूप में अनेक महिलाओं को हम सभो से जोड़ दिया.

आज उनकी पुण्यतिथि पर उनको सादर श्रद्धांजलि.





28 अप्रैल 2019

ऐसे जागरूक मतदाताओं के सहारे जिंदा है हमारा लोकतंत्र


इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव को देश का महापर्व घोषित कर दिया गया है. शासन-प्रशासन अपने-अपने स्तर पर पूरा दम लगाकर अधिक से अधिक मतदान करवाने की कोशिश में लगा हुआ है. ऐसे में मतदान कितना होगा ये बाद की बात है मगर जैसा कि पहले भी कहा था कि मतदाता जागरूकता किसी के कहने से नहीं होती वरन यह स्व-स्फूर्त प्रक्रिया है जो अंतःकरण से उपजती है. जिसे भी जरा सा भी भान है अपनी जिम्मेवारी का, अपने कर्तव्य का, देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली के प्रति विश्वास का, देश की सरकार के कार्यों के प्रति सकारात्मकता का वह अपने आपको मतदान के लिए प्रेरित कर ही लेता है. मतदान के लिए खुद को तैयार कर ही लेता है. उसे न तो प्रशासन की गोष्ठियों की आवश्यकता होती है, न रैलियों की, न नारे लिखी तख्तियों की, न आदर्श बूथ की. ऐसे लोग अपने आप मतदान के लिए सतर्क रहते हैं, जागरूक रहते हैं.


ऐसा उदाहरण आज विश्व के पहले अनाज बैंक के बुन्देलखण्ड स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की उरई शाखा में देखने को मिला जबकि वहाँ की लाभार्थी खाताधारक महिलाएँ जनपद जालौन में 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा लेने के प्रति उत्साहित दिखीं. अनाज बैंक उरई शाखा प्रतिमाह दो बार एक महिला को पांच किलो अनाज प्रदान करता है, इस उद्देश्य के साथ कि कोई भी भूखा न सोये. सभी महिलाएं ऐसी हैं जो अकेली हैं, वृद्ध हैं, अत्यंत गरीब हैं, मजबूर हैं, निराश्रित हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं जो शिक्षित नहीं हैं. सामान्य अक्षर-ज्ञान से भी वंचित हैं, अपने नाम को लिखना भी नहीं जानती हैं. बहुत सी महिलाएं अत्यंत वृद्ध हैं. इसके बाद भी ख़ुशी की बात यह है कि दो-चार महिलाओं को छोड़कर सभी महिलाएं अभी तक मतदान करती रही हैं. अबकी बार कुछ महिलाओं के वोट कट गए हैं; कैसे, क्यों इसकी जानकारी उनको भी नहीं है और अनाज बैंक शाखा को भी समय से नहीं हो सकी.  

अप्रैल माह के दूसरे वितरण के दौरान आज सभी महिलाओं से मतदान करने सम्बन्धी चर्चा हुई. सभी महिलाओं ने पूर्व में अपने मतदान करने की बात कही. कुछ महिलाओं ने अपने वोट के इस बार कट जाने की समस्या बताई. उनकी बातों से लग रहा था, जैसे कि उनका वोट कट जाना गलत हुआ. उन्हीं महिलाओं में से अत्यंत वृद्ध महिला ने यहाँ तक कहा कि वह कल मतदान दिवस पर अपना आधार कार्ड लेकर अपने बूथ जाएगी. वहां किसी अधिकारी से बात करके वोट डलवाने के लिए कहेगी क्योंकि वह पहले वोट डालती रही है. सोचिये, जिस देश के नागरिकों में इस तरह का ज़ज्बा होगा, वहां का लोकतंत्र खतरे में कैसे आ सकता है? ये ऐसी महिलाएं हैं जिनको सीधे-सीधे अपने किसी जनप्रतिनिधि से काम नहीं पड़ना है. इनको किसी सरकार में बालू, शराब के ठेके नहीं चाहिए हैं. ये ऐसी महिलाएं हैं जिनके किसी परिजन को कोई सिफारिश भी नहीं करवानी है. ये सभी महिलाएं बस इतना समझ सकी हैं कि देश में सरकार के बनाने-गिराने में वोट का महत्त्व है. इसी कारण वे अपना वोट देना चाहती हैं. उनके ये जानने का प्रयास नहीं किया कि वे किसे अपना वोट देना चाहती हैं और न ही उन्होंने ये बताने-पूछने की चेष्टा की. 

सुखद ये लगा जानकर कि जहाँ आज के दौर में जनप्रतिनिधियों के क्रियाकलापों से रुष्ट होकर पढ़ा-लिखा मतदाता वोट डालने से विरक्त होने लगा है वहीं ऐसी महिलाएं अपने मतदान को लेकर सजग हैं. मतदान को छुट्टी का दिन मानकर पढ़ा-लिखा मतदाता कहीं सपरिवार पिकनिक पर निकल जाता है वहीं ये महिलाएं सबह-सुबह मतदान करने के प्रति जागरूक दिखीं. शिक्षित मतदाताओं के लिए शासन-प्रशासन द्वारा आये दिन तमाम तरह की नौटंकी करते हुए उनको जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं ये महिलाएं स्व-प्रेरण से मतदान के लिए जागरूक हैं. ऐसी महिलाओं, ऐसे मतदाताओं के कारण ही इस देश का लोकतंत्र जिन्दा है, इस देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली सक्रिय है. नमन है ऐसी महिलाओं को, ऐसे जागरूक मतदाताओं को.  

16 दिसंबर 2018

आम जनमानस समझता है अपनों का दर्द

विगत एक वर्ष से अधिक होने को आया जबकि हम व्यक्तिगत रूप से उरई में संचालित बुन्देलखण्ड के पहले अनाज बैंक से सक्रिय तौर पर जुड़े हुए हैं. वर्ष 2017 में एक नवम्बर को इसका शुभारम्भ डॉ० अमिता सिंह के निर्देशन में हुआ. उनको इसकी प्रेरणा वाराणसी में डॉ० राजीव श्रीवास्तव के निर्देशन में संचालित विश्व के पहले अनाज बैंक से मिली. इसके बाद उन्होंने अपनी छोटी बहिन अनिला राणावत की स्मृति में उनकी पहली पुण्यतिथि पर अनाज बैंक का सञ्चालन उरई में आरम्भ किया. कोई भी भूखा न सोये के उद्देश्य के साथ अनाज बैंक वाराणसी ने अपना पुनीत कार्य आरम्भ किया था. अपनी ईमानदारी, पारदर्शिता, निष्पक्षता के चलते जल्द ही उसने गरीब, मजबूर महिलाओं के बीच अपनी पहचान स्थापित की. अनाज बैंक द्वारा प्रतिमाह पांच किलो अनाज गरीब, मजबूर, असहाय महिलाओं को प्रदान किया जाता है. वाराणसी, प्रधान कार्यालय के अनुसार ही उरई अनाज बैंक संचालित है. प्रतिमाह कुछ गरीब महिलाओं को मदद करके मन में एक सुकून यही मिलता है कि इस बैंक के माध्यम से किसी की सहायता करने का सौभाग्य मिल रहा है. इसके बाद भी बहुत बार ऐसी स्थिति होती है कि मन में उथल-पुथल मच जाती है.


अनाज बैंक द्वारा गरीब, मजबूर महिलाओं को ही अनाज के द्वारा मदद की जाती है. इसमें भी बहुत स्पष्ट कदम उठाकर उनके बारे में जानकारी एकत्र करने के बाद यह मदद उपलब्ध करवाई जाती है. ऐसा करने के पीछे मकसद महज इतना होता है कि जनता से प्राप्त सहयोग का कहीं गलत इस्तेमाल न हो जाये. प्रतिमाह होने वाले वितरण में अनेक बार ऐसी स्थिति आती है जबकि समझ आता है आज़ादी के सत्तर से अधिक वर्षों के बाद भी समाज में ऐसी स्थिति है कि लोगों को दो समय का भोजन नहीं मिल पा रहा है. सम्मानित नागरिकों की सहायता से उपलब्ध अनाज के वितरण द्वारा कुछ महिलाओं की मदद कर पाने के बाद भी दुःख बना रहता है कि सबकी मदद नहीं कर पा रहे हैं. विगत एक वर्ष से अधिक के समय ने उरई अनाज बैंक को अलग ही पहचान दी है. इससे कम से कम उरई की अनेक गरीब महिलाओं में एक तरह का आशा का संचार हुआ है. उनकी आशा कहीं न कहीं हमारे लिए दुःख का कारण बन जाती है. एकाधिक स्थितियाँ ऐसी बनती हैं जबकि अनाज बैंक की टीम चाहकर भी उनकी मदद नहीं कर पाती है. उनकी पारिवारिक स्थिति, उनकी सामाजिक स्थिति, उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी होने के बाद एक स्थिति तक मदद कर दी जाती है मगर लगता है कि समाज में कितना बड़ा विभेद है.

इस विभेद को जातिगत विभेद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में आज महज जातिगत विभेद ही नहीं दिखाई दे रहा है बल्कि उसके ऊपर आर्थिक विभेद दिखाई देने लगा है. देखा जाये तो आज समाज में दो तरह के वर्ग बने हुए हैं. एक अमीर और दूसरा गरीब. इन्हों दो वर्गों के हिसाब से ही समाज में बहुतायत स्थितियाँ नियंत्रित हैं, उनका सञ्चालन है. अनाज बैंक के शुभारम्भ होने से लेकर आज के दिन तक हर वितरण में ऐसी स्थिति सामने आती है जबकि आँखें नम होती हैं. समझ नहीं आता है कि आखिर इतने सालों से सरकारें का कर रही हैं, जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं, प्रशासन क्या कर रहा है जो कि एक व्यक्ति की एक समय की भूख भी नहीं मिटाई जा सकी है? आखिर ऐसे कौन से हालात बने जबकि जो काम सरकार को, शासन को, प्रशासन को करने चाहिए वे काम स्वयंसेवी लोग संचालित कर रहे हैं. आये दिन ऐसी महिलाओं की स्थिति से सामना होता है जिनके परिवार के नाम पर या तो बस वही हैं या फिर कोई नाबालिग संतति. काम करने का, कमाई का, रोजगार का कोई माध्यम नहीं. सरकार अपने आपमें व्यस्त है, जनप्रतिनिधि अपनी कमाई में व्यस्त हैं, प्रशासन प्रमुख लोगों की व्यवस्था में, सुरक्षा में व्यस्त है तब इन गरीब लोगों की तरफ कौन ध्यान दे?

अनाज बैंक आम जनमानस की सहायता से लगातार आगे बढ़ रहा है. आमजनमानस समझता है कि जनता को वास्तविक दर्द किस बात का है. ऐसे में उसके द्वारा उपलब्ध सहायता को जनता के लिए ही उपयोग करने का ध्येय अनाज बैंक द्वारा बनाया गया है. व्यक्तिगत रूप से अपने अनुभव से कह सकते हैं कि जब तक इस देश में आम जनमानस है, तब तक कोई आम जनमानस भूखा नहीं सो सकता, अनाथ नहीं रह सकता.

13 अक्टूबर 2018

विश्व के पहले अनाज बैंक ने पूरे किये निस्वार्थ सेवा के तीन वर्ष

आज 13 अक्तूबर को विश्व के पहला अनाज बैंक ने अपनी सर्वश्रेष्ठ सेवा के तीन वर्ष पूरे किये. इस बैंक का उद्देश्य है कि कोई भूखा न सोये. इसकी पूर्ति के लिए अनाज बैंक टीम का एक-एक सदस्य लगातार सक्रिय है. वाराणसी से आरम्भ हुए अनाज बैंक ने धीरे-धीरे अपना विस्तार किया. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में भूख की समस्या को देखते हुए केन्द्रीय टीम ने उरई नगर में इसी एक शाखा का आरम्भ किया. बुन्देलखण्ड के पहले अनाज बैंक के रूप में उरई शाखा ने पारदर्शी, ईमानदार कार्य की सतत प्रक्रिया बनाये रखी. इसका परिणाम ये हुआ कि अनाज बैंक के कार्यों से प्रेरित होकर इस अवसर पर नगर के कुछ गणमान्य लोग खाताधारक के रूप में जुड़े. एक भूखे परिवार और उनके बच्चों का पेट भरने में आप भी अनाज बैंक टीम का हिस्सा बने हैं, उनको साधुवाद, उनका आभार. 
+
डॉ० ए०के० सक्सेना, प्राचार्य, गाँधी महाविद्यालय, उरई 
श्री गौरव चौहान द्वारा डॉ० ऋचा सिंह राठौड़, सहायक प्राध्यापक, रक्षा अध्ययन विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई
डॉ० विनीत चतुर्वेदी, सहायक प्राध्यापक, समाजशास्त्र, कालपी कॉलेज, कालपी
डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी, मनोविज्ञान विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई
डॉ० कंचन, सहायक प्राध्यापक, मनोविज्ञान विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई
डॉ० ममता, संस्कृत विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई


सदस्यता फॉर्म भरते डॉ० विनीत चतुर्वेदी 

डॉ० विनीत चतुर्वेदी के साथ डॉ० अमिता सिंह, धर्मेन्द्र कुमार 

जमाकर्ता फॉर्म देते डॉ० ए० के० सक्सेना, प्राचार्य गाँधी महाविद्यालय, उरई 

डॉ० ऋचा सिंह राठौड़, सहायक प्राध्यापक, गाँधी महाविद्यालय, उरई 

बांये से - डॉ० सुनीता गुप्ता, डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी, डॉ० कंचन, डॉ० ममता
गाँधी महाविद्यालय, उरई 


07 सितंबर 2018

उनकी ख़ुशी में अनाज बैंक टीम की संतुष्टि

अनाज बैंक, उरई के लिए हर्ष का विषय था कि उसके सफल सञ्चालन को देखते हुए अनाज बैंक के संरक्षक इन्द्रेश जी ने इसका औपचारिक शुभारम्भ करने का प्रस्ताव स्वीकार किया.


ये भी सुअवसर था कि अनाज बैंक के उदघाटन के तुरंत बाद ईद-उल-जुहा का पर्व था साथ ही रक्षाबंधन और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व था. अनाज बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय उरई द्वारा निश्चय किया गया कि इस धार्मिक अवसर पर पांच किलो अनाज/आटा के साथ-साथ एक किलो चीनी, चावल और एक वस्त्र भी प्रदान क्या जाये, ताकि सभी महिलाएं अपना पर्व हँसी-ख़ुशी के साथ-साथ मिष्ठान के साथ संपन्न कर सकें. सभी महिलाओं को पाँच किलो आटा के साथ चीनी, चावल और एक साड़ी प्रदान की गई.


दोनों धर्मों के त्यौहार संपन्न होने के बाद अनाज बैंक, क्षेत्रीय कार्यालय, उरई की टीम ने अपने-अपने स्तर पर कुछ लाभार्थी महिलाओं से संपर्क किया. उनकी ख़ुशी को शब्दों में बयान करना मुश्किल है. विगत कई वर्षों के बाद उनके जीवन में पहली बार ये अवसर आया कि उनको मुँह मीठा करने-करवाने के लिए किसी और का मुँह नहीं ताकना पड़ा. खुद के लिए नए वस्त्र के लिए किसी और के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ा. यही वह ख़ुशी थी जिसके चलते अनाज बैंक टीम को लगा कि उनका प्रयास सार्थक रहा. इस मौके पर बनारस की केन्द्रीय टीम भले ही साथ न थी मगर उनके प्रयासों, उनकी ख़ुशी को समझा जा सकता है.


इस अवसर पर जिसने लाभार्थी महिलाओं को ख़ुशी प्रदान की, अनाज बैंक की समूची टीम को प्रसन्नता दी उन दानदाताओं का आभार जो नियमित रूप से अनाज बैंक को सहायता कर रहे हैं.


20 अगस्त 2018

अनाज बैंक का उद्देश्य - कोई भी भूखा न सोये

उत्तर प्रदेश का बुन्देलखण्ड क्षेत्र अनेकानेक प्राकृतिक संपदाओं से संपन्न होने के बाद भी भोजन, पानी की समस्या से परेशान बना रहता है. हालत इस तरह की हो चुकी है कि ग्रामीण अंचलों के बहुतायत गाँवों से युवाओं को पलायन करके शहरी क्षेत्रों की तरफ जाना पड़ रहा है. बारिश की स्थिति विगत कई वर्षों से ऐसी है जिससे सूखे के हालात उत्पन्न होते रहे हैं. खेत के खेत सूखे की चपेट में आ रहे हैं. फसलें खड़े-खड़े बारिश के इंतजार में सूखने लगती हैं. खाद्यान्न की जबरदस्त कमी के चलते बुन्देलखण्ड क्षेत्र के अनेक गाँवों में भुखमरी जैसे हालात पैदा होने लगते हैं. विगत वर्ष कुछ गाँवों से भूख से मौत की खबरें आने के बाद प्रशासनिक लीपापोती शुरू कर दी गई थी. स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फसलों के अभाव में जानवरों के लिए चारे की भी समस्या उत्पन्न हो जाती है. इसके चलते यहाँ के निवासी अपने पालतू जानवरों को खुला छोड़ देते हैं. जिसके चलते अन्ना समस्या भी बुन्देलखण्ड में विकराल रूप धारण करने लगी है. भूख की स्थिति के कारण ही अनेकानेक अपराधों को प्रश्रय मिलता है. कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थिति में बना रह सकता है मगर अपनी भूख के चलते, अपने परिजनों की भूख के चलते, अपने बच्चों की भूख के चलते वह किसी भी तरह के अपराध को करने को प्रवृत्त हो जाता है. भूख ही मनुष्य को अपराध की तरफ ले जाती है, भूख ही उसे मौत की तरफ ले जाती है, भूख ही व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने लगती है.


अभी हाल में दिल्ली में भूख से तीन बच्चियों की मृत्यु के मामले ने सबको झकझोर कर रख दिया. इस एक घटना से ऐसा लगा जैसे समाज से संवेदना एकदम समाप्त हो चुकी है. दिल्ली जैसी जगह में भूख से तीन-तीन बच्चियों की मृत्यु का होना अपने आपमें शर्मनाक स्थिति है. आखिर समाज को क्या होता जा रहा है? सरकारी कदमों, योजनाओं की खिल्ली हम समाज के लोग आये दिन उड़ाते रहते हैं. इसके उलटे कभी एक कदम बढ़कर हम ही आगे क्यों नहीं आते हैं? यह एक ऐसा सवाल है जो उन तमाम लोगों के मुँह बंद करता है जो सिर्फ और सिर्फ तमाशबीन बने समाज को देखते रहते हैं. समाज के अनेकानेक असंवेदित लोगों के मध्य कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भूख के खिलाफ पूरी ईमानदारी से लड़ाई लड़ने में लगे हैं. ऐसे ही लोगों में काशी के डॉ० राजीव श्रीवास्तव हैं जो अनाज बैंक के माध्यम से भूख के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं. उनके अनाज बैंक से प्रेरित होकर बुन्देलखण्ड में भी पहला अनाज बैंक उरई शहर में स्थापित किया गया. इसके द्वारा प्रतिमाह दो बार गरीब, असहाय महिलाओं को अनाज की व्यवस्था की जाती है. अनाज बैंक का उद्देश्य है कि कोई भी भूखा न सोने पाए. इसके लिए सामाजिक स्तर से प्राप्त होने वाली मदद के द्वारा गरीब महिलाओं की मदद की जाती है.


अनाज बैंक के द्वारा सिर्फ गरीब महिलाओं की ही नहीं वरन उनकी भी मदद की जाती है जो परिस्थिजन्य भूख से भी पीड़ित हैं. प्राकृतिक आपदाओं के चलते अपने घरों से विस्थापित लोगों को भोजन की व्यवस्था अनाज बैंक द्वारा की जाती है. अभी हाल ही में उरई के कुछ क्षेत्रों में बारिश का पानी भर जाने के कारण बेघर हुए लगभग तीन सौ लोगों को अनाज बैंक, उरई द्वारा दोनों समय भोजन की व्यवस्था की गई. ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे भूख से लोगों की मौत हो जाती है? क्या आज भी समाज किसी संस्था, किसी एक व्यक्ति के भरोसे ही बैठा है? क्या एक-एक परिवार इतना भी सक्षम नहीं कि वह अपने बगल के गरीब, मजबूर परिवार को एक समय का भोजन करवा सके? क्या किसी मोहल्ले में इतनी भी संवेदना शेष नहीं कि वह अपने बीच के एक परिवार को सप्ताह में दो-चार दिन भोजन उपलब्ध करवा सके? काशी से विश्व के पहले अनाज बैंक के रूप में शुरू हुआ अभियान अब बुन्देलखण्ड में भी सफलतापूर्वक संचालित है. अनाज बैंक का उद्देश्य यही है कि समाज में कोई भी भूखा न रहे. समाज के लोगों को, समाज के लोगों द्वारा ही जगाने का, भूख से बचाने का काम अनाज बैंक के द्वारा किया जा रहा है. अपेक्षा यही की जा सकती है कि आने वाले दिनों में कोई मृत्यु भूख के कारण न होने पाए.  

09 जुलाई 2018

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आशीर्वाद के आँचल में बढ़ती पवित्र यात्रा


पेट भरो आन्दोलन की संकल्पना के साथ डॉ० राजीव श्रीवास्तव ने एक पुनीत कार्य आरम्भ किया अनाज बैंक का. जैसा सुनने में लगा ठीक वैसा ही एहसास देखने में भी होता है. बैंक जैसी प्रक्रिया, बैंक जैसा लेन-देन, बैंक जैसा प्रबंधन, बैंक जैसा दस्तावेजीकरण. आम बैंकों और इस बैंक में महज इतना अंतर है कि यहाँ समस्त लेनदेन अनाज के रूप में होता है न कि किसी तरह की मुद्रा के रूप में. इस बैंक में खाताधारक दो तरह के हैं. एक वे जो अनाज बैंक से मदद पाते हैं और एक वे जो अनाज बैंक में अपना खाता खुलवाकर उसमें किसी न किसी रूप में सहयोग दिया करते हैं. यहाँ किसी न किसी रूप से तात्पर्य आर्थिक नहीं वरन अनाज के रूप में ही है. कभी अनाज के रूप में, कभी आटा के रूप में, कभी दालों के रूप में तो कभी चीनी आदि के रूप में यहाँ सहयोगकर्ता अपना योगदान जमा करते हैं. पेट भरो आन्दोलन के द्वारा स्थापित अनाज बैंक ने संकल्प लिया कि कोई भी भूखा न सोये और यह बैंक इस संकल्प को पूरा करने के लिए दत्तचित्त है.


डॉ० राजीव श्रीवास्तव के अनाज बैंक, जो विश्व में अपनी तरह का पहला बैंक है, से प्रेरित होकर बुन्देलखण्ड का पहला अनाज बैंक जनपद जालौन के उरई में खोला गया. इस अनाज बैंक की उरई में स्थापना, सञ्चालन का विशेष रूप से श्रेय डॉ० अमिता सिंह जो एक महिला महाविद्यालय की प्राचार्य हैं, को जाता है. नवम्बर 2017 से आरम्भ बुन्देलखण्ड के अनाज बैंक ने नियमित रूप से अनाज बैंक की संकल्पना को आगे बढ़ाया है. प्रतिमाह दो बार लाभार्थी महिलाओं को अनाज वितरण करते अनाज बैंक से बहुत से लोग जुड़े और बहुत से लोगों ने जुड़ने की इच्छा व्यक्त की. वैसे भी समाज में भूखे को रोटी, प्यासे को पानी देने की अपनी पावन मान्यता है. इस पावन मान्यता में यदि सार्थकता जुड़ जाए, निस्वार्थ भावना जुड़ जाए तो सबकुछ और सहज-सरल लगने लगता है. इस सहज-सरल के बीच समर्पण, सेवाभावना, लगनशीलता उरई के अनाज बैंक से जुड़े लोगों में दिख रही थी मगर वाराणसी से आई केन्द्रीय टीम की कार्यशीलता को देखकर लगा कि यदि सम्पूर्ण देश में चंद लोग ही इस मानसिकता के हो जाएँ तो कोई भी कहीं भूखा न रह सकेगा.

अनाज बैंक, भारत की प्रबंध निदेशक अर्चना भारतवंशी के निर्देशन में केन्द्रीय टीम ने आकर न केवल बुन्देलखण्ड के अनाज बैंक का निरीक्षण किया वरन उसकी कार्यप्रणाली को और आधुनिक बनाया. इन सबके बीच अर्चना भारतवंशी के साथ आये सदस्यों - दीपाली भारतवंशी, इली भारतवंशी, तंजीन भारतवंशी की कार्यक्षमता, कार्यकौशल देखकर लगा कि यदि व्यक्ति का उद्देश्य पावन है, निस्वार्थ है तो वह स्वतः ही उसके कार्य से परिलक्षित होता है. अल्प आयु में सामाजिक सरोकारों से तादाम्य स्थापित करना, परोपकार को सर्वाधिक उच्च स्थान पर स्थापित करना, अनथक रूप से अपने-अपने कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ संपन्न करना अचानक ही नहीं आता. खुद में ईमानदारी का आयाम स्थापित करके, समाज के गरीब, मजबूर, असहाय लोगों को अपने परिवार का हिस्सा समझना, उनको की जाने वाली मदद को अहंकार नहीं वरन उनके प्रति अपना कर्तव्यबोध समझना ही वह चारित्रिक विशेषता है जो इन सदस्यों को सबसे अलग खड़ा करती है. यकीनन हम सब भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में सामाजिक कार्यों में अपना सहयोग देते हैं. समाज के गरीब, मजबूर वर्ग की सहायता करते हैं. यही मानसिकता उन सभी को एकसाथ जोड़ती है जो समाज में पुनीत कार्य करना चाहते हैं. बुन्देलखण्ड अनाज बैंक से जुड़े लोग भी कहीं न कहीं केन्द्रीय टीम के साथ तादाम्य स्थापित करते नजर आये. अपने आप ही एक साहचर्य स्थापित होता नजर आया. इस सम्बन्ध में, सुयोग में, आपसी मानसिक धरालत के एक होने के पीछे उस विराट व्यक्तित्व का असर अवश्य ही होगा जिसने किसी आपातकाल में देश से बाहर जाकर भारतवासियों को एकजुट करने का कार्य किया था. देश को अंग्रेजों से मुक्त करवाने के लिए मैराथन प्रयास किया था. परम पावन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आशीर्वाद के आँचल में अनाज बैंक की, विशाल भारत संस्थान की पवित्र यात्रा सतत आगे बढ़ती रहे, यही कामना है.

01 नवंबर 2017

बुन्देलखण्ड का पहला अनाज बैंक स्थापित

जनपद के ख्यातिलब्ध अधिवक्ता स्व० कीरत सिंह सेंगर की कनिष्ठ पुत्री श्रीमती अनिला राणावत की प्रथम पुण्यतिथि पर आज, 01 नवम्बर 2017 को जनपद जालौन के उरई नगर में अनाज बैंक के शुभारम्भ किया गया. अनाज बैंक का सञ्चालन राष्ट्रीय स्तर पर विशाल भारत संस्थान, वाराणसी द्वारा किया जा रहा है. जनपद जालौन में अनाज बैंक का सञ्चालन स्व० कीरत सिंह सेंगर की वरिष्ठ पुत्री डॉ० अमिता सिंह द्वारा किया जा रहा है. इस अनाज बैंक के द्वारा विधवा, परित्यक्ता, तलाकशुदा, निर्धन महिलाओं को अनाज वितरित किया जायेगा. कोई भूखा न सोये का पवित्र सन्देश के साथ अनाज बैंक का आरम्भ 2015 में वाराणसी में किया गया था. इसके बाद अनाज बैंक की स्थापना दिल्ली, गोरखपुर में भी की गई. बुन्देलखण्ड में यह अपनी तरह का पहला अनाज बैंक है.



उरई में अनाज बैंक के शुभारम्भ के अवसर पर अनाज बैंक की निदेशक प्रियंका गांगुली ने बताया कि इस बैंक का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को भोजन उपलब्ध करवाना है. अनाज बैंक के द्वारा किसी भी तरह का दान अथवा सहानुभूति के रूप में अनाज का वितरण नहीं किया जा रहा है. इसके लिए अनाज देने वालों का और अनाज लेने वालों का खाता यहाँ बनाया गया है. जिसके सहारे पारदर्शिता बनाते हुए सभी को अनाज उपलब्ध करवाना है. अनाज बैंक की व्यवस्था निदेशक प्रीति पाण्डेय ने उपस्थित महिलाओं को बताया कि अनाज बैंक के लिए कोई भी व्यक्ति हिन्दू-मुस्लमान अथवा किसी भी धर्म से जुड़ा न होकर सिर्फ इन्सान है और हम सभी मिलकर इंसानियत को जीवित बनाये रखने का कार्य कर रहे हैं. आज यहाँ अनाज बैंक के शुभारम्भ का उद्देश्य बहुत पवित्र है और आशा की जा सकती है कि आज बीस महिलाओं को इससे लाभान्वित किया गया है, कल को यह संख्या बढ़कर सौ भी होगी, पांच सौ भी होगी. विशाल भारत संस्थान के संस्थापक डॉ० राजीव श्रीवास्तव का कहना था कि संस्था सिर्फ अनाज बैंक के द्वारा अनाज वितरण का कार्य ही नहीं करती है वरन समाज में विभिन मुद्दों पर जागरूकता लाने का कार्य भी करती है. इसके द्वारा गरीब बच्चों की शिक्षा व्यवस्था करना, गरीब, मजबूर महिलाओं को स्वावलंबी बनाये जाने का कार्य भी संस्था की तरफ से किया जाता है. संस्था से सम्बद्ध रितुश्री का कहना था कि संस्था के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लिए किसी भी सरकारी संस्था से, एजेंसी से अनुदान नहीं लिया जाता है न ही किसी तरह की सहायता ली जाती है. संस्था के द्वारा संचालित अनाज बैंक के लिए पूरा सहयोग समाज के नागरिकों की तरफ से मिलता है. इसके लिए भी हम किसी तरह की धनराशि स्वीकार नहीं करते हैं बल्कि सभ्रांत नागरिकों से अनाज के रूप में ही सहायता प्राप्त करते हैं.




अनाज बैंक के शुभारम्भ के अवसर पर संस्था से सम्बंधित लोगों डॉ० अमिता सिंह के निर्देशन में बनी टीम के साथ जनपद के वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ० आदित्य कुमार, विडो क्लब की अध्यक्ष श्रीमती कौशल्या राज एवं श्रीमती अनिला राणावत के पुत्र दुष्यंत सिंह राणावत और पुत्री पौरवी राणावत के कर-कमलों से बीस से अधिक निर्धन महिलाओं को अनाज वितरित किया. इससे पूर्व संस्था के पदाधिकारियों ने शहर की विभिन्न बस्तियों में सुभाष चंद्रा के साथ मिलकर भौतिक सत्यापन के द्वारा लगभग 250 आवेदनों में से प्राथमिकता के आधार पर 25 महिलाओं का आरम्भिक चयन किया. इन महिलाओं की पृष्ठभूमि, पारिवारिक संरचना, मासिक आय, स्वास्थ्य परीक्षण के आधार पर उनके कागजातों का सत्यापन करके अनाज बैंक में उनका खाता खोला गया. इस अवसर पर डॉ० अलका रानी पुरवार, डॉ० मंजू जौहरी, डॉ० शैलजा गुप्ता, डॉ० नीति चौहान, श्रीमती शशि सिंह, निशा सिंह, साधना, हर्षिता ठाकुर, राघवेन्द्र द्विवेदी, गणेश शंकर द्विवेदी, भूपेन्द्र पिंडारी, धर्मेन्द्र, डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर आदि उपस्थित रहे.