09 July 2018

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आशीर्वाद के आँचल में बढ़ती पवित्र यात्रा


पेट भरो आन्दोलन की संकल्पना के साथ डॉ० राजीव श्रीवास्तव ने एक पुनीत कार्य आरम्भ किया अनाज बैंक का. जैसा सुनने में लगा ठीक वैसा ही एहसास देखने में भी होता है. बैंक जैसी प्रक्रिया, बैंक जैसा लेन-देन, बैंक जैसा प्रबंधन, बैंक जैसा दस्तावेजीकरण. आम बैंकों और इस बैंक में महज इतना अंतर है कि यहाँ समस्त लेनदेन अनाज के रूप में होता है न कि किसी तरह की मुद्रा के रूप में. इस बैंक में खाताधारक दो तरह के हैं. एक वे जो अनाज बैंक से मदद पाते हैं और एक वे जो अनाज बैंक में अपना खाता खुलवाकर उसमें किसी न किसी रूप में सहयोग दिया करते हैं. यहाँ किसी न किसी रूप से तात्पर्य आर्थिक नहीं वरन अनाज के रूप में ही है. कभी अनाज के रूप में, कभी आटा के रूप में, कभी दालों के रूप में तो कभी चीनी आदि के रूप में यहाँ सहयोगकर्ता अपना योगदान जमा करते हैं. पेट भरो आन्दोलन के द्वारा स्थापित अनाज बैंक ने संकल्प लिया कि कोई भी भूखा न सोये और यह बैंक इस संकल्प को पूरा करने के लिए दत्तचित्त है.


डॉ० राजीव श्रीवास्तव के अनाज बैंक, जो विश्व में अपनी तरह का पहला बैंक है, से प्रेरित होकर बुन्देलखण्ड का पहला अनाज बैंक जनपद जालौन के उरई में खोला गया. इस अनाज बैंक की उरई में स्थापना, सञ्चालन का विशेष रूप से श्रेय डॉ० अमिता सिंह जो एक महिला महाविद्यालय की प्राचार्य हैं, को जाता है. नवम्बर 2017 से आरम्भ बुन्देलखण्ड के अनाज बैंक ने नियमित रूप से अनाज बैंक की संकल्पना को आगे बढ़ाया है. प्रतिमाह दो बार लाभार्थी महिलाओं को अनाज वितरण करते अनाज बैंक से बहुत से लोग जुड़े और बहुत से लोगों ने जुड़ने की इच्छा व्यक्त की. वैसे भी समाज में भूखे को रोटी, प्यासे को पानी देने की अपनी पावन मान्यता है. इस पावन मान्यता में यदि सार्थकता जुड़ जाए, निस्वार्थ भावना जुड़ जाए तो सबकुछ और सहज-सरल लगने लगता है. इस सहज-सरल के बीच समर्पण, सेवाभावना, लगनशीलता उरई के अनाज बैंक से जुड़े लोगों में दिख रही थी मगर वाराणसी से आई केन्द्रीय टीम की कार्यशीलता को देखकर लगा कि यदि सम्पूर्ण देश में चंद लोग ही इस मानसिकता के हो जाएँ तो कोई भी कहीं भूखा न रह सकेगा.

अनाज बैंक, भारत की प्रबंध निदेशक अर्चना भारतवंशी के निर्देशन में केन्द्रीय टीम ने आकर न केवल बुन्देलखण्ड के अनाज बैंक का निरीक्षण किया वरन उसकी कार्यप्रणाली को और आधुनिक बनाया. इन सबके बीच अर्चना भारतवंशी के साथ आये सदस्यों - दीपाली भारतवंशी, इली भारतवंशी, तंजीन भारतवंशी की कार्यक्षमता, कार्यकौशल देखकर लगा कि यदि व्यक्ति का उद्देश्य पावन है, निस्वार्थ है तो वह स्वतः ही उसके कार्य से परिलक्षित होता है. अल्प आयु में सामाजिक सरोकारों से तादाम्य स्थापित करना, परोपकार को सर्वाधिक उच्च स्थान पर स्थापित करना, अनथक रूप से अपने-अपने कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ संपन्न करना अचानक ही नहीं आता. खुद में ईमानदारी का आयाम स्थापित करके, समाज के गरीब, मजबूर, असहाय लोगों को अपने परिवार का हिस्सा समझना, उनको की जाने वाली मदद को अहंकार नहीं वरन उनके प्रति अपना कर्तव्यबोध समझना ही वह चारित्रिक विशेषता है जो इन सदस्यों को सबसे अलग खड़ा करती है. यकीनन हम सब भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में सामाजिक कार्यों में अपना सहयोग देते हैं. समाज के गरीब, मजबूर वर्ग की सहायता करते हैं. यही मानसिकता उन सभी को एकसाथ जोड़ती है जो समाज में पुनीत कार्य करना चाहते हैं. बुन्देलखण्ड अनाज बैंक से जुड़े लोग भी कहीं न कहीं केन्द्रीय टीम के साथ तादाम्य स्थापित करते नजर आये. अपने आप ही एक साहचर्य स्थापित होता नजर आया. इस सम्बन्ध में, सुयोग में, आपसी मानसिक धरालत के एक होने के पीछे उस विराट व्यक्तित्व का असर अवश्य ही होगा जिसने किसी आपातकाल में देश से बाहर जाकर भारतवासियों को एकजुट करने का कार्य किया था. देश को अंग्रेजों से मुक्त करवाने के लिए मैराथन प्रयास किया था. परम पावन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आशीर्वाद के आँचल में अनाज बैंक की, विशाल भारत संस्थान की पवित्र यात्रा सतत आगे बढ़ती रहे, यही कामना है.

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