समय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

22 अप्रैल 2026

बाईस को हुए इक्कीस

कभी अपने बड़े-बुजुर्गों को कहते सुना था कि समय पंख लगाकर उड़ता है. ऐसा होता हुआ अब समझ में भी आता है. पता नहीं आप लोगों को ऐसा महसूस होता है नहीं पर हमें तो लगता है कि जैसे समय वाकई उड़ता है. वर्तमान में खड़े होकर अतीत की किसी भी घटना को याद किया जाये तो लगता है जैसे कल की ही बात है मगर जब समय का आकलन किया जाता है तो समझ आता है कि बहुत-बहुत समय गुजर गया है. ऐसा न केवल सुखद घटनाओं के सन्दर्भ में होता है बल्कि दुखद घटनाओं के सन्दर्भ में भी होता है.

 

अपने जीवन की बहुत सी न भुलाये जाने वाली घटनाओं में एक घटना आज, 22 अप्रैल को घटित हुई थी. आज पलट कर उस दिन को याद किया तो समझ आया कि ये कल की घटना नहीं बल्कि 21 वर्ष पुरानी बात है. चूँकि इस पर हमें आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पहले दिन से लेकर आजतक एक पल को भी उस घटना को भुला नहीं सके हैं. भुलाना चाहते तो भी न भुला पाते, आखिर वो घटना महज एक घटना नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व से जुड़ गई घटना थी. सुबह उठने से लेकर देर रात सोने तक एक-एक पल, एक-एक कदम, एक-एक काम उस घटना से जुड़ा रहता है, उस घटना को जीवित बनाये रखता है. ऐसी स्थिति में उस दिन को, उस घटना को भुलाया जाना सम्भव ही नहीं.

 



बहरहाल, जीवन की साँस, धड़कन की तरह हमारी ज़िन्दगी से जुड़ चुकी वह घटना आज पूर्ण रूप से बालिग़ हो गई है. 21 वर्ष की समयावधि पलक झपकते नहीं गुजरी है बल्कि इन 21 वर्षों के गुजरने ने बहुत बड़ी कीमत वसूली है, बहुत सारा दर्द दिया है, बहुत सारा कष्ट दिखाया है. बावजूद इसके चलना जारी है, समय का पूरे उत्साह से गुजरना बना हुआ है. शौक जिंदा है, एहसास जिंदा है.


10 दिसंबर 2025

क्या समय सच में मौजूद नहीं है?

क्या समय सच में मौजूद नहीं है? विज्ञान इस रहस्य को समझने लगा है!

 

हम अपनी ज़िंदगी के हर पल को समय में नापते हैं सेकंड, मिनट, दिन, साल लेकिन आधुनिक विज्ञान और कई प्रमुख वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘समय’ शायद वैसा नहीं है जैसा हम सोचते हैं। BBC और कई प्रमुख विज्ञान लेखों में भी यह चर्चा तेज़ हो गई है कि समय एक illusion यानि एक मानसिक अनुभूति हो सकती है। यह विचार जितना हैरान करता है,उतना ही विज्ञान इसे गंभीरता से लेना शुरू कर चुका है।

 

समय क्या है? हमारी समझ बनाम विज्ञान

हम सभी समय को एक बहती हुई नदी की तरह मानते हैं,जहाँ अतीत बीत चुका है,वर्तमान अभी है और भविष्य आने वाला है लेकिन जब वैज्ञानिक समय को गणित और भौतिकी के नियमों में डालते हैं तो यह मॉडल टूटने लगता है।

 

आइन्स्टीन की Relativity कहती है- समय स्थिर नहीं है। यह गति और गुरुत्वाकर्षण के अनुसार धीमा या तेज़ हो सकता है।

 

Quantum Physics कहती है- सबसे छोटे स्तर पर कणों की दुनिया में समय का बहाव दिखाई ही नहीं देता यानि समय वह नहीं है जो हमें रोजमर्रा में महसूस होता है।

 

समय शायद है ही नहीं

कई वैज्ञानिक लेख बताते हैं कि दुनिया को समझने के लिए हमें समय की जरूरत नहीं भी पड़ सकती। विज्ञान का तर्क यह है:

=> Physics की equations बिना ‘समय’ के भी काम करती हैं:- कुछ fundamental equations में “time” का कोई स्पष्ट role नहीं होता।

=> अतीत, वर्तमान और भविष्य शायद साथ-साथ मौजूद हैं:- इस विचार को Block Universe Theory कहा जाता है। इस थ्योरी में समय एक direction नहीं बल्कि एक landscape की तरह है जहाँ सारे पल एक साथ मौजूद हैं।

=> समय शायद एक अलग entity नहीं बल्कि घटनाओं के बीच का संबंध है यानी हम परिवर्तन देखते हैं और उसको मापने के लिए ‘समय’ नाम की कल्पना बना ली।

 



क्या समय सिर्फ एक illusion है?

कई वैज्ञानिक कहते हैं कि:

=> समय खुद मौजूद नहीं बल्कि मस्तिष्क (consciousness) घटनाओं को क्रम में अनुभव करता है, इसी क्रम का नाम हम “time flow” रखते हैं. अगर ऐसा है तो ‘अभी’, ‘कल’, ‘भविष्य’ ये सब हमारी perception पर निर्भर हैं। यह उस घड़ी की तरह है जो दीवार पर टंगी है लेकिन असल में टिक-टिक सिर्फ हमारे मन में चल रही है।

 

क्या होगा अगर समय सच में अस्तित्व में नहीं है?

यह विचार हमारी पूरी समझ बदल देता है-

=> जीवन और मृत्यु की परिभाषा बदलेगी- अगर समय linear नहीं है, तो ‘पहले-जन्म, बाद-मृत्यु’ वाला क्रम भी एक perception हो सकता है।

=> कारण और परिणाम (Cause & Effect) की धारणा बदल सकती है- हम मानते हैं कि A हुआ इसलिए B हुआ। लेकिन अगर समय स्थिर नहीं तो यह relation भी अलग तरीके से काम कर सकता है।

=> यूनिवर्स की असली संरचना समझने का नया रास्ता खुलेगा- Universe शायद events का एक web हो जिसमें समय सिर्फ एक direction नहीं बल्कि एक coordinate (निर्देशांक) जैसा हो।

 

भावी विज्ञान कहाँ जा रहा है?

वैज्ञानिकों का ध्यान अब इस बात पर है कि-

=> क्या समय वास्तव में एक ‘fundamental’ चीज़ है?

=> फिर यह तापमान और दबाव की तरह एक ‘उभरती हुई property’ है जो कुछ conditions पर ही दिखती है? कई शोध यह संकेत दे रहे हैं कि समय शायद मूलभूत (fundamental) नहीं है और यदि ऐसा है तो हमारी पूरी physics बिग बैंग, ब्लैक होल, क्वांटम दुनिया सबकी व्याख्या नए तरीके से करनी पड़ सकती है।

 

निष्कर्ष: समय शायद है या शायद नहीं

हम जो समय कहते हैं,वह शायद सिर्फ हमारा अनुभव हो, एक illusion, एक perception या केवल परिवर्तन मापने का तरीका। विज्ञान अभी अंतिम जवाब नहीं दे पाया है लेकिन BBC समेत कई वैज्ञानिक संस्थाएँ इस दिशा में स्पष्ट कह रही हैं ‘समय को लेकर हमारी सोच अधूरी है और असली तस्वीर हम अब समझना शुरू कर रहे हैं।’

++++++++++++

यह पोस्ट फेसबुक पर Factwala01 प्रोफाइल से ली गई है. 

18 मार्च 2022

ख़ामोशी से आना और चले जाना होली का

होली का आना ख़ामोशी के साथ हुआ और उसी ख़ामोशी से उसका चले जाना भी हो गया. यदि कहें कि होली घर के भीतर आई नहीं बल्कि बाहर से ही मिलकर लौट गई तो यह भी गलत नहीं होगा. न हंगामा, न बच्चों का हुडदंग, न शोर-शराबा, न मस्ती-धमाल, बस जरा-जरा से होंठ फैलाते हुए होली की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान और बस चुटकी भर गुलाल से ही माथे पर टीका लगा दिया. यदि आपस में बहुत ज्यादा घनिष्टता दिखी तो माथे पर लगाये जाने के बाद शेष बचे उसी चुटकी भर गुलाल को गालों पर भी छू सा दिया. बस, हो गई होली. ये होली किसी बड़े-बुजुर्ग की नहीं, किसी उम्रदराज की नहीं बल्कि युवाओं की, बच्चों की भी होली कुछ इसी तरह से निकल रही है.


अब कुछ साल पहले तक होने वाली धमाल होली देखने को नहीं मिल रही है. घर में भी बच्चे ऐसे बच-बच के होली खेलते हैं कि कहीं वे पानी में गल न जाएँ, कहीं रंग न काट लें. घर में घुसे बैठे रहकर मोबाइल के द्वारा ही होली खेल लेने का, गुलाल उड़ा-उड़ा कर होली खेलने में वो मजा कतई नहीं है जो खूब रंग मल-मल कर खेलने में, एक-दूसरे को भिगोने में, शोर-शराबा करते हुए रंग लगाने में आता था. हम सब भाई-बहिन तो होते ही थे, दोस्त लोग भी आ जाते थे. सब मिलकर एक अच्छा-खासा ग्रुप बन जाया करता था. पहले आपस में ही होली की बमचक मचती थी उसके बाद पूरी पलटन मोहल्ले में, शहर में निकल पड़ती. मोहल्ले के लोग तो परिचित होते थे सो यहाँ भी खूब धमाल मचता था. कोई चाहता तो वह भी हमारी टोली का हिस्सा बनकर शहर की सड़कों पर निकल पड़ता.


एक बहुत बड़ा अंतर आज और उस समय में दिखाई देता है और वह है आपसी भाईचारे का. उस समय सड़क चलते हुए व्यक्ति परिचित है या अपरिचित, इससे कोई मतलब नहीं होता था. मन किया तो उसे रोका, रंग लगाया, गुलाल लगाया और हँसते हुए गले मिल लिए या पैर छू लिए. न हम लोगों को कोई शर्म-संकोच-झिझक सी लगती थी और न ही सामने वाला किसी तरह की आपत्ति जताता था. कई बार तो ये भी होता कि दुकानदारों तक से होली खेल ली जाती. किसी दुकान में कुछ खाने-पीने के लिए रुके, किसी से गुलाल, रंग लेने के लिए रुके तो उसी के साथ होली खेल ली गई. रंगों का, गुलाल का यह सहज, स्नेहिल आदान-प्रदान देर तक चलता रहता.


अब ऐसा सोचना भी गलत समझ आता है. इस तरह से होली के मनाये जाने की अब कल्पना भी नहीं की जा सकती है. खैर, सब समय का चक्र है. कल वहाँ था, आज यहाँ है... हो सकता है कि आने वाले कल में फिर वहीं रुके जहाँ बीते कल में रुका था.



 


.

16 मार्च 2022

जो जगह चले गए हो खाली छोड़ कर

समय कितनी तेजी से भाग रहा है, इसका अंदाजा सामान्य रूप में नहीं होता है. जैसे ही कोई अवसर विशेष की बात हो, किसी यादगार दिन की बात हो, किसी पारिवारिक घटना की चर्चा हो, किसी स्मृति के सम्बन्ध में कोई दिन याद किया जाये (भले ही ऐसा सुखद अथवा दुखद घटना के रूप में हो) तो समझ आता है समय का भागना, बहुत ज्यादा गति से भागना.


आज 16 मार्च है. इस तारीख को भुला पाना संभव ही नहीं है. आज काल-गणना में समझ आई काल की गति. देखते-देखते सत्रह वर्ष गुजर गए, और आँखों के सामने सबकुछ वैसे ही ताजा है जैसे वर्ष 2005 में था. एक-एक फोन, एक-एक शब्द, एक-एक घटना, एक-एक व्यक्ति सबकुछ. कुछ भी आँखों से ओझल नहीं है, सिवाय पिताजी के.


बहरहाल, किया भी क्या जा सकता था, अब किया भी क्या जा सकता है? किसी समय पिताजी को याद करते हुए चंद लाइन लिख गईं थीं, वे ही आज की पोस्ट में पिताजी को समर्पित हैं.



.

30 दिसंबर 2021

वर्तमान को वर्तमान के साथ ही जीने का प्रयास हो

जाने वाले को कोई रोक नहीं सकता, ये सन्दर्भ सदैव से व्यक्ति के इस धरा से हमेशा के लिए चले जाने के सन्दर्भ में की जाती है. यह सच भी है क्योंकि इंसानी विकास यात्रा में उसके द्वारा तमाम तरह के नए-नए आविष्कार किये गए, नए-नए मानक स्थापित किये गए, अनेक असाध्य बीमारियों का निदान उसके द्वारा निकाला गया मगर एक मृत्यु ही ऐसी है जिस पर इंसानों की तमाम सारी कोशिशों के बाद भी विजय प्राप्त नहीं की जा सकी. जिस तरह से इंसान मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सका है, तमाम सारी कोशिशों के बाद भी, वैज्ञानिक, चिकित्सकीय उपकरणों के होने के बाद भी मृत्यु को रोका नहीं जा सका है, ठीक उसी तरह से समय को नहीं रोका जा सका है. गुजरे समय को वापस नहीं लाया जा सका है.




ये वर्तमान वर्ष 2021 का अत्यंत अंतिम दौर है. एक-दो दिन इसके गुजर जाने में शेष हैं, ऐसे में बहुतायत लोग इस वर्ष के जाने की और नए साल के आने की बात करते दिख रहे हैं. इस साल ने अपने पूर्ववर्ती वर्ष 2020 की तरह ही कोरोना की भयावहता को बनाये रखा. इधर ऐसा दिखाई दे रहा है, जैसे वर्ष 2020 को जल्दी से जल्दी जाने की बात लोग करते दिखाई दे रहे थे, कुछ ऐसा ही इस साल में दिखाई दे रहा है. समय के जल्द से जल्द जाने की इच्छा उसी समय की जाती है जबकि उस समय से प्रसन्नता न मिले, ख़ुशी न मिले. कुछ ऐसा ही इस जाते हुए वर्ष के साथ हुआ है. इस साल में कोरोना की दूसरी लहर ने जबरदस्त भयावहता फैलाई. यद्यपि इस लहर की समयावधि कम रही तथापि जितनी देर उसकी उपस्थिति रही लोगों को डराती ही रही, लोगों को मौत के आगोश में भेजती रही.


ये साल चला जायेगा, भले रूप में या बुरे रूप में ये और बात है. जाते हुए समय को कोई रोक नहीं पाया है, जाने वाले समय को कोई वापस भी नहीं ला सका है. ऐसे में बुरे समय के जल्दी गुजरने वाली बात हो या फिर अच्छे समय को रोके रखने की इच्छा, ये एक काल्पनिक स्थिति है. बुरे समय को न तो जल्दी भगाया जा सकता है और न ही अच्छे समय को आहूत अधिक रोका जा सकता है. समय का अपना ही एक निर्धारण है, जिसके अनुसार उसका आना और जाना लगा रहता है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यदि समय अच्छे से गुजारा जाए, उसमें खुशियों को समाहित किया जाये तो वह बिना किसी कष्ट के बीत जाता है. इसके उलट कई बार समय ही कष्ट दे जाता है, समय ही दुःख दे जाता है बस उसी समय से कैसे भी निपटा नहीं जा सकता है. समय के हाथों मिलने वाले दुःख या कष्ट का कोई निदान नहीं, सिवाय इसके कि आने वाले समय की महत्ता समझी जाये और वर्तमान को वर्तमान के साथ ही जीने का प्रयास किया जाये.


.

20 सितंबर 2021

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान)

 

■ काष्ठा = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग

■ 1 त्रुटि  = सैकन्ड का 300 वाँ भाग

■ 2 त्रुटि  = 1 लव 

■ 1 लव = 1 क्षण

■ 30 क्षण = 1 विपल 

■ 60 विपल = 1 पल

■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट) 

■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा)

■3 होरा=1प्रहर व 8 प्रहर 1 दिवस (वार)

■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) 

■ 7 दिवस = 1 सप्ताह

■ 4 सप्ताह = 1 माह 

■ 2 माह = 1 ऋतू

■ 6 ऋतू = 1 वर्ष 

■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी

■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी 

■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग

■ 2 युग = 1 द्वापर युग 

■ 3 युग = 1 त्रैता युग 

■ 4 युग = सतयुग

■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग

■ 72 महायुग = मनवन्तर 

■ 1000 महायुग = 1 कल्प

■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ)

■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प (देवों का अन्त और जन्म)

■ महाप्रलय  = 730 कल्प (ब्रह्मा का अन्त और जन्म)

 

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यहीं है जो हमारे देश भारत में बना हुआ है, जिस पर हमे गर्व होना चाहिये.


(सोशल मीडिया पर प्राप्त सन्देश के अनुसार)

08 जनवरी 2021

दिल से दिल के जुड़ाव में मनोभावों की पावनता

समय का गुजरना सिर्फ गुजरना ही नहीं होता है बल्कि उसके साथ बहुत कुछ भी गुजर जाता है. गुजरता हुआ समय अपने गुजरने का एहसास कराता हुआ बहुत खालीपन छोड़ जाता है. इस खालीपन के साथ बहुत सारी बातें याद रह जाती हैं और बहुत सी बातें हमेशा को जुड़ी रह जाती हैं. इस समय ने ही संबंधों, रिश्तों की परिभाषा को अलग-अलग स्वरूप, अलग-अलग आयाम दिए हैं. गुजरते समय में रिश्ते भी जुड़े होते हैं, सम्बन्ध भी जुड़े होते हैं, इन्सान भी जुड़े होते हैं. रिश्तों, संबंधों की भावात्मकता के चलते न जाने कितने लोग अपने बनते हैं और न जाने कितने लोगों से अपनापन बनता है. इस अपनेपन में दो दिलों के बीच, दो विचारों के बीच, दो भावनाओं के बीच की आपसी सामंजस्य क्षमता, आपसी समन्वय आदि का बहुत बड़ा योगदान रहता है. संबंधों का ये अपनापन समाज में स्नेह, प्रेम की आधारशिला होता है. आवश्यक नहीं कि इस स्नेह में, इन संबंधों में आपस में किसी तरह की स्वार्थी मानसिकता छिपी हो. दिल से दिल का तालमेल विशुद्ध रूप से मनोभावों की शुद्धता का परिणाम है. दो दिलों के बीच की आपसी ईमानदारी का प्रतिफल है.




दो लोगों के बीच की आपसी भावात्मक ईमानदारी के चलते संबंधों में, रिश्तों में प्रगाड़ता बढ़ती है. रक्त-सम्बन्धी न होने के बाद भी अनेक रिश्ते रक्त-संबंधों से ज्यादा सशक्त और विश्वासपरक सिद्ध होते हैं. देखा जाये तो यह एक तरह की आपसी बॉन्डिंग होती है जो बिना कुछ कहे, बिना कुछ करे दो लोगों में स्वतः ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का भाव जगाती है. यही भाव दो लोगों को करीब लाता है, उनमें रिश्तों की, संबंधों की उष्णता का प्रवाह करता है. विशुद्ध ईमानदारी, विश्वास पर आधारित इस तरह के रिश्तों, संबंधों की पावन इमारत सदियों तक दिल को धड़काती है. गुजरते दिनों की स्मृतियों को जीवंत रखती है. समय गुजरता रहता है और अपनेपन की, अपनों की यही स्मृतियाँ, यही यादें उनको हमारे बीच सदैव जीवित रखती हैं. व्यक्ति सामने है या नहीं, इससे अधिक मायने रखता है कि व्यक्ति दिल में है या नहीं. दिल में किसी के बसे होने के कारण ही वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे भुलाया नहीं जाता है.


संबंधों, रिश्तों की प्रगाड़ता दो दिलों को जोड़ती है, दो लोगों के बीच कहे-अनकहे संसार का विस्तार करती है. यही प्रगाड़ता यदि संबंधों का, प्रेम का विस्तार करती है, चेहरे पर हँसी का प्रादुर्भाव करती है तो यही प्रगाड़ता आँखों में नीर भी भरती है. न जाने किस तरह की भावनात्मकता का संसार चारों तरफ रचा-बसा होता है जहाँ हँसी-ख़ुशी के साथ आँसुओं का प्रवाह होता है, अपनों के खोने का भय होता है, सबकुछ उजड़ जाने का डर होता है. किसी का एक पल में मिलकर जीवन भर के लिए जुड़ जाना और किसी का जीवन भर साथ रहकर भी एक पल में जुदा हो जाना, आश्चर्यबोध जैसा कुछ प्रतीत करवाता है. न कहने के बाद भी सबकुछ समझने का भाव, सबकुछ समझते हुए भी कुछ न कहने का बोध, जैसे अलौकिक दुनिया का निर्माण करता है. काश! संबंधों, भावनाओं, रिश्तों, संवेदना की मासूम सी आधारभूमि पर आँसुओं की, जुदा होने की, सबकुछ छूट जाने की कष्टप्रद खरोंच न बनने पाती.


.
वंदेमातरम्

31 दिसंबर 2020

वर्ष 2020 क्या हम लोगों को याद रहेगा?

वर्ष 2020 क्या हम लोगों को याद रहेगा? ये सवाल इसलिए क्योंकि विगत कुछ दिनों से सोशल मीडिया में, मीडिया में, आपसी बातचीत में इसी साल की चर्चा हो रही है. सभी लोग कामना कर रहे हैं कि ये बुरा साल (उनके हिसाब से) बीते और नया अच्छा साल आये. कुछ लोगों का कहना है कि यह वर्ष 2020 कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा. फिर वही सवाल क्या वाकई ऐसा हो सकेगा? ऐसा इसलिए क्योंकि अभी इसी वर्ष के माह मार्च में जनता कर्फ्यू लगने के तुरंत बाद ही लॉकडाउन लगा दिया गया था. उसके बाद मीडिया में, सोशल मीडिया में न केवल देशव्यापी बल्कि विश्वव्यापी आँकड़े दिखाए जाने लगे. हर तरफ से ऐसी खबरें सामने आने लगीं जैसे कि कोई भयावह राक्षस हर घर में घुसकर सभी को खा जाने पर आतुर है. लोगों में भय, आशंका इस कदर थी कि वे सुनसान गली में भी अपने घर के बाहर निकलने से परहेज कर रहे थे.


समय का चक्र कभी रुका नहीं रहता, सो कोरोना की भयावहता पर भी नहीं रुका. मौतों, बीमारों के आँकड़ों के बीच स्वस्थ होने की सुखद खबरें भी आती रहीं. लोगों के स्वस्थ होने का प्रतिशत लगातार बढ़ते रहने से भी लोगों में आशा का संचार होने लगा. इसी बीच वैक्सीन बनने-बनाने, उसके परीक्षण आदि की खबरों ने भी लोगों में संतोष का भाव जगाया. लॉकडाउन के दौरान जीवन को निरुद्देश्य बताते-मानते लोगों के बीच अनलॉक की प्रक्रिया आरम्भ होने से जीवन के प्रति सकारात्मकता जगी. इसी में धीरे-धीरे अनलॉक को क्रमिक रूप से लागू करते हुए बहुत सारे प्रतिबंधों को दूर कर दिया गया. बहुत सारे कामों को पहले की तरह किये जाने पर जोर दिया जाने लगा. इन सबके बीच सरकार ने सभी को सुरक्षित रहने का सन्देश देने का काम बराबर किया. लोगों को मास्क लगाने, हाथ धोते रहने, शारीरिक दूरी बनाने का सन्देश लगातार सबके बीच प्रत्येक मंच से पहुँचाते रहने का काम सरकारी, गैर-सरकारी मंचों से होता रहा. इसके बाद भी आज बहुतायत लोगों में कोरोना को लेकर, खुद को सुरक्षित रखने को लेकर लापरवाही देखने को मिल रही है.




बाजारों में भीड़, मॉल में भीड़, ऑफिस में शारीरिक दूरी का पालन यथोचित रूप में न दिखना आदि लोगों की लापरवाही को, भूलने की आदत को ही दर्शाता है. भूलने की आदत कोई इसी बीमारी के प्रति ही नहीं है बल्कि हम भारतीयों में यह आम बीमारी है. हम सभी लोग बहुत जल्दी अपने आसपास की घटनाओं को भूल जाते हैं. हमने अपने आसपास की छोटी-छोटी घटनाओं को ही नहीं भुलाया है बल्कि देशव्यापी घटित हुई बड़ी-बड़ी घटनाओं को, वीभत्स घटनाओं को, जघन्य हत्याओं को भी लगातार भुलाने का काम किया है. किसी एक घटना का जिक्र करना बाकी सभी घटनाओं के साथ अन्याय होगा, आप स्वयं अपने दिमाग पर जोर डालकर देखिये और विचार करिएगा कि आपको कौन-कौन सी घटनाएँ, कौन-कौन सा वर्ष भली-भांति याद है. अपनी भूलने की आदत के चलते जल्द ही हम सभी इस वर्ष 2020 को भी भुला देंगे. यह क्षणिक भावुकता है, क्षणिक संवेदना है अन्यथा की स्थिति में देश के बहुत से वर्ष ऐसे निकले हैं जबकि उनमें इस बीमारी से ज्यादा जघन्य घटनाएँ हुई हैं, इससे ज्यादा दिल दहलाने वाली वारदातें हुई हैं.


भूलने की यह बीमारी बहुत हद तक सही भी है. कम से कम इससे दुखों को बहुत लम्बे समय तक ढोते रहने से बचा रहा जाता है. बीते समय के दुःख को भुलाकर आने वाले समय को सुखद बनाने के लिए तत्पर रहने के स्वभाव से हम सभी जल्द ही इस वर्ष 2020 को भूलें और आने वाले अपने समय को सुखमय बनाएँ.


(वर्ष 2020 की अंतिम पोस्ट)


.
वंदेमातरम्

30 दिसंबर 2020

जाते की विदाई आते का स्वागत, बाकी तो समय के हाथ है

इस वर्ष, 2020 का आज अंतिम दूसरा दिन, सेकेण्ड लास्ट डे है. पिछले कई दिनों से बहुत से मित्रों, परिचितों के सन्देश मिल रहे हैं जिसमें इस साल के बारे में उनके विचार पढ़ने को मिल रहे हैं. ये इंसानी फितरत होती है कि इन्सान अपने मनोभावों को तत्कालीन सन्दर्भों से जोड़कर व्यक्त करता है. कुछ ऐसा ही लगभग सभी के विचारों में देखने को मिला. वर्तमान में कोरोना-कोरोना ही सबके दिल-दिमाग में छाया हुआ है. कहीं की भी बात की जाये वो लौट-फिर कर कोरोना पर आकर टिक जाती है. किसी से मुलाकात हो या फिर फोन से बातचीत हो सबकी बातों का केंद्र सिर्फ कोरोना ही रहता है. ऐसा ही संदेशों में आते विचारों में देखने को मिला.


ये सच है कि वर्ष 2020 को कोरना ने पूरी तरह से अपनी जकड़न में ले रखा है. इसके उलट यदि एक बार समूचे वर्ष को देखें तो ऐसी जकड़ उन दिनों में ज्यादा देखने को मिली जबकि लॉकडाउन लगा हुआ था. अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होने के बाद जैसे-जैसे आज़ादी मिलती रही, काम करने की अनुमति मिलती रही, बहुत सी छूटें मिलती रहीं उनके बाद जिस तरह से लोगों की भीड़ सड़क पर देखने को मिल रही है, जिस तरह से लोग बिना किसी भय के अपने-अपने काम पर लगे हुए हैं उसे देखकर लगता नहीं कि अब कोरोना का वह डर लोगों में है. यह भी मानसिकता का खेल है. पिछले दिनों अपने एक परिचित के सामान्य बीमार होने पर उनसे बात करने पर पता चला कि वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं. उनको शंका थी कि भले ही उनकी कोरोना टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई है मगर उनको कोरोना ही है. इसी कारण वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं. उनकी सोच से उलट उनकी मेडिकल रिपोर्ट में उनको टायफाइड बताया गया था. क्या कहेंगे आप, क्या इस कोरोना काल के पहले टायफायड होने की दशा में कमजोरी नहीं होती थी? क्या किसी बीमारी में कमजोरी आना इसी साल से हुआ है?




कुछ इसी तरह की मानसिकता ने सबके भीतर एक अज्ञात भय पैदा कर रखा है. किसी भी तरह की शारीरिक समस्या आने पर, कोई भी बीमारी आने पर वे उसे कोरोना से जोड़ दे रहे हैं. इस तरह की सोच, ऐसा मानसिकता अब अपने आपमें एक बीमारी है. अकारण किसी बात के लिए परेशान रहना, सबको परेशान करना कहीं से भी उचित नहीं. हाँ, किसी भी हमले के लिए, किसी भी रोग से बचने के लिए सतर्क रहना, सुरक्षित रहना एक आवश्यक कदम है मगर सिर्फ और सिर्फ किसी एक बीमारी से डर कर किसी भी कदम को उसी से जोड़ देना बुद्धिमानी नहीं.


यह साल सबके लिए अपने-अपने हिसाब से अच्छा गुजरा. किसी के लिए बुरा, किसी के लिए अच्छा. क्या आपने इससे पहले इतना लम्बा समय अपने परिजनों के साथ बिताया था? क्या इससे पहले आपको अपने शौक, जो कहीं दबे हुए थे, पूरे करने का अवसर कभी मिला है? नुकसान बहुत से लोगों को हुआ है, बहुत से लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा, बहुत से लोगों के परिजन सदा-सदा को उनसे दूर हो गए, बहुत से लोगों ने कोरोना बीमारी का हमला झेला है मगर इसके साथ-साथ बहुत से लोगों ने अपने दूर हो चुके परिजनों को भी पाया है, बहुत से लोगों को इसी काल में नौकरी भी मिली है, बहुत से लोगों को इसी कालखंड में अपना नया रोजगार ज़माने का अवसर मिला है. इसी एक साल का नहीं, बीते प्रत्येक साल का हिसाब-किताब करिए और उसमें अच्छे-बुरे का, लाभ-हानि का, सुख-दुःख का आकलन करिए. इसके बाद तय करिए कि क्या ये साल सिर्फ और सिर्फ बुरा ही गुजरा? उसके बाद ही विचार करिए कि इस जाते साल ने सिर्फ और सिर्फ कष्ट ही दिए हैं?


जाने वाले को विदा करिए और आने वाले का स्वागत करिए. बाकी सब तो समय के हाथ में है, भविष्य के गर्भ में है.


.
वंदेमातरम्

26 दिसंबर 2020

समय का स्वागत कर उसे सुखद बनाने का प्रयास हो

बाजार में रोज की तरह सैर-सपाटा करने के दौरान आज एक परिचित से मुलाकात हुई. इधर-उधर की बातों, हालचाल के बाद उनके सामने एक सवाल उछाल दिया. वैसे जो सवाल हमने उनकी तरफ उछाला वो सवाल वैसे प्रतिवर्ष उनकी तरफ से उछाला जाता था. जी हाँ, यह सच है. चूँकि बाजार में उनसे लगभग रोज ही मुलाकात हो जाया करती है. इसी में दिसम्बर माह के अंतिम दिनों में उनकी तरफ से एक सवाल हर बार सामने आता है कि नए साल के लिए क्या संकल्प लिया है? नए वर्ष में क्या नया करने का विचार है? आज बहुत देर तक बातचीत करने के बाद भी उनकी तरफ से ऐसा कोई सवाल नहीं आया तो जरा आश्चर्य हुआ. आश्चर्य इस कारण हुआ कि दिसम्बर समाप्ति में अब चार-पाँच दिन शेष रह गए हैं फिर भी उनकी तरफ से शून्यता क्यों?




उनकी तरफ से किसी तरह की पहल न होते देख हमने ही इस बार उनकी जिम्मेवारी का निर्वहन करने का मन बनाया. उनकी तरफ सवाल उछाला कि आने वाले साल के लिए क्या संकल्प कर रहे हो? जवाब में बहुत बुरा सा मुँह बनाते हुए, लगभग नजरंदाज करने जैसा अंदाज दिखाते हुए बोले कुछ नहीं. अब संकल्प-बंकल्प लेना बंद. हमारा प्रश्नवाचक स्वरूप देख कर वे आगे बोले कि इस साल भी कुछ सोचा था, कुछ संकल्प लिए थे मगर इस साल की तो पूरी तरह से रगड़ लग गई. सारे के सारे संकल्प धराशाही हो गए. इसलिए अब आगे से कोई संकल्प नहीं. समय का कोई भरोसा नहीं कि कब क्या हो जाये. हमें समझ आ गया कि कोरोना के चलते वे इस वर्ष को कोसने में लगे हैं और उसी के चलते आने वाले वर्षों के लिए किसी तरह के संकल्प की नीति पर नहीं चल रहे.


हमने हँसते हुए उनको दिलासा दिलाई कि एक साल ऐसा निकल गया, इसका ये मतलब तो नहीं है कि आने वाले सभी वर्ष ऐसे ही निकलेंगे. हो सकता है कि आने वाला साल या फिर उसके बाद के आने वाले साल बहुत बेहतरीन निकलें. संभव है कि जो-जो सोचा जाये, जो भी संकल्प लिया जाये वो सब आने वाले वर्षों में पूरे हो जाएँ. उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव न दिखने पर उनके सामने फिर सवाल उछाला कि अच्छा चलो, यह साल ख़राब निकल गया. पिछले सालों में तुमने अपने कितने संकल्प पूरे कर लिए? पिछले वर्षों में तुम्हारे सोचे हुए कितने काम पूरे हुए? वे साल तो इस साल जैसे बुरे नहीं थे. उनमें तो इस वर्ष जैसी कोई बीमारी नहीं फैली थी. उनकी तरफ से कोई जवाब न आता देख समझाया कि समय के हाथों में बहुत कुछ है जो हमारे हाथ में नहीं मगर हमारे हाथ में इसके बाद भी इतना कुछ है जो समय को बदल सकता है. संकल्प लेना न लेना तुम्हारा अपना निजी मसला हो सकता है मगर किसी एक वर्ष के बुरे निकल जाने के कारण से आने वाले समूचे समय को बुरा समझने लगना नितांत नकारात्मक सोच है. इस नकारात्मकता से बाहर निकलने की जरूरत है.


उनके चेहरे की मुस्कराहट से लगा कि बात सही जगह पहुँच सकी है. ये हम सभी को ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जो समय निकल गया जरूरी नहीं कि आने वाला समय भी वैसा ही निकले. निश्चित ही यह साल बहुत ही ख़राब रहा मगर इसके बाद भी इसमें बहुत कुछ अच्छी खबरें सुनने को मिलीं. देखा जाये तो प्रत्येक वर्ष अच्छे और बुरे का संयोग लेकर आता है. हम अपने ऊपर घटित होने वाली घटनाओं के अनुसार उस वर्ष का आकलन करने लगते हैं. वास्तविक रूप में तो हमें समय का स्वागत करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि हम सभी अपने कदमों से, अपने कार्यों से, अपने प्रयासों से उस समय को सुखद, खुशनुमा, बेहतर बना सकें.


.
वंदेमातरम्

18 दिसंबर 2020

वर्तमान सुसज्जित करें भविष्य स्वतः ही बेहतर बनेगा

समय जिस तेजी से निकल रहा है उसे देखकर भविष्य की योजनायें बनाने से बेहतर है कि वर्तमान को इस तरह से सुसज्जित किया जाये कि भविष्य स्वतः ही बेहतर बन जाए. इस वर्ष के पहले तक लोगों में आपाधापी देखने को मिलती थी, भौतिक वस्तुओं के प्रति एक तरह की तृष्णा दिखाई पड़ती थी, संसाधनों के प्रति अजीब सा मोह देखने को मिलता था. इसी सबके बीच अचानक से कोरोना बीमारी ने आकर कुछ महीनों के लिए सबकुछ रोक सा दिया. न केवल नागरिक, न केवल बाजार बल्कि वे सार्वजनिक प्रतिष्ठान, वे संस्थाएँ, वे सेवाएँ जो किसी भी व्यक्ति ने कभी बंद नहीं देखीं थीं वे भी महीनों के हिसाब से बंद रहीं. इस बंदी के बीच जब लोगों को अपने परिजनों के बीच रहने का अवसर मिला और उनको भी जिन्हें परिजनों से दूर रहने का कष्ट समझ आया, सभी ने परिवार की, रिश्तों की, संबंधों की अहमियत को समझा. यहाँ एक बात, वे सभी लोग भले ही इसे गंभीरता से न ले रहे हों मगर उन्होंने इसकी गंभीरता को समझने की कोशिश अवश्य की.




ऐसी स्थिति देखने के बाद लगा कि शायद जब देश, यहाँ के नागरिक कोरोना के संकट से वापस आयेंगे तो शायद उस ज़िन्दगी को ज्यादा पसंद करेंगे जहाँ भौतिक संसाधन से ज्यादा मानवीयता पर जोर दिया जाये. शायद ऐसे लोग दिखावे की दुनिया से बाहर निकल कर अपनत्व की दुनिया को बसाने-सजाने का प्रयास करेंगे. यह लग रहा था कि लोग आपसी विद्वेष को भुलाते हुए आपसी समन्वय बनाये रखने की कोशिश करेंगे. अब जबकि अनलॉक हुए भी कई माह बीत गए हैं, लगता है कि कोरोनाकाल के समय हुए लॉकडाउन में इस तरह की समझ को विकसित करना या फिर ऐसी समझ विकसित होने का दिखावा करना इन्सान की मजबूरी थी. वह अभी भी इस समय से कुछ सीख नहीं सका है. आज जैसे ही उसे घर से बाहर आने का अवसर मिला, जैसे ही उसे लॉकडाउन के प्रतिबंधों से मुक्त होने का अवसर मिला उसने वही रंग दिखाने शुरू कर दिए जो कोरोनाकाल के पूर्व थे.


इससे तो यही लगता है कि इन्सान वर्तमान को देखते हुए भी सुधरने के, सुधार करने के मूड में नहीं है. वह आने वाले कल के लिए इस कदर परेशान है कि अपने आज को खराब कर रहा है. देखा जाये तो कोरोनाकाल का लॉकडाउन का समय ऐसा था जबकि इन्सान बहुत कुछ सीख सकता था. उसे समझ जाना चाहिए था कि भौतिक संसाधनों का उतना महत्त्व नहीं है जितना कि भावनात्मक संबंधों का. लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद कोई टीवी, कार, लैपटॉप, मोबाइल, एसी, फ्रिज आदि लेने के लिए नहीं दौड़ा था बल्कि खाद्य-सामग्री जुटाने में निकल पड़ा था. उसने प्रशासन से पास बनवाने के लिए जद्दोजहद की तो अपने लोगों को घर वापस लाने के लिए न कि भौतिक संसाधन जुटाने के लिए. यदि इसके बाद भी इन्सान समझना नहीं चाहता है तो वह नितांत मूर्ख है और स्वयं ही उस रास्ते की तरफ बढ़ रहा है जहाँ का अंत विनाश है, एकाकीपन है.


.
वंदेमातरम्

21 नवंबर 2020

आज ही अपना है, कल तो सपना है

ज़िन्दगी बहुत कुछ दिखाती है, बहुत कुछ सिखाती है. हमारा अपना ये मानना है कि हमें अपनी ज़िन्दगी के साथ-साथ बाकी लोगों की ज़िन्दगी से भी कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि बहुत कुछ ऐसा होता है जो हमारी ज़िन्दगी में गुजरता ही नहीं और उसे हम दूसरों की ज़िन्दगी से ही सीख सकते हैं. सीखने का यह क्रम इतना विशाल होता है जो लगता है कि एक ज़िन्दगी में समाप्त ही नहीं होगा, यदि कोई व्यक्ति वाकई कुछ सीखना चाहता है. सीखना एक प्रक्रिया है जो सतत चलती है उसी तरह ज़िन्दगी भी एक प्रक्रिया है जो सतत चलती है. अब समझने की बात ये है कि सीखने के साथ-साथ ज़िन्दगी को समझना है या ज़िन्दगी के साथ-साथ सीखना है.




लोगों को इसी जगह आकर संशय होता है. वे समझ नहीं पाते हैं कि ज़िन्दगी और सीखने में क्या साम्य है और क्या अंतर है. लोगों का तो पता नहीं पर हमने हर पल ज़िन्दगी से कुछ न कुछ सीखा है और यही कारण है कि ज़िन्दगी के अपने हर पल को मौज में बिताने की कोशिश की है. बीते पल को खींच कर वर्तमान पर थोपने की कोशिश नहीं की और भविष्य की चिंता में वर्तमान को ख़राब नहीं किया. बहुत से लोगों के लिए यह आलोचना का विषय हो सकता है कि कैसे एक व्यक्ति अपने भविष्य की चिंता न करता होगा. सही है, भविष्य के बारे में सभी लोग सोचते हैं, हम भी विचार करते हैं मगर इसके लिए अपना वर्तमान ख़राब नहीं करते हैं. लोग भविष्य के बारे में क्या विचार करते हैं, कभी इस पर उन्हीं लोगों ने विचार किया? बच्चों का जीवन, उनकी पढ़ाई, उनका कैरियर, उनके लिए संपत्ति, अपने लिए बुढ़ापे का इंतजाम, अपनी वृद्धावस्था के लिए आर्थिक सशक्तता आदि-आदि लोगों के वर्तमान का अंग होता है.


समझना चाहिए इस बात को कि आखिर जिस ज़िन्दगी में ठीक अगले पल का भरोसा नहीं वहाँ हम इंसान कई-कई साल का प्रबंध करने में जुट जाते हैं. इस चक्कर में बहुत से लोग अपना वर्तमान ख़राब कर लेते हैं. एक पल को रुक कर सोचिये कि क्या ये सही है? क्या आने वाले अनिश्चित कल के लिए निश्चितता से भरे आज को ख़राब करना उचित है? आज को पूरी शक्ति, पूरे आनंद के साथ जीने का प्रयास करना चाहिए. इसका मतलब ये नहीं कि हम आने वाले कल के लिए लापरवाह हो जाएँ मगर हमें ध्यान ये रखना है कि आने वाले कल के लिए हम आज का समय बर्बाद न करें. यही ज़िन्दगी की सत्यता है कि जो आज है वही हमारा अपना है, शेष तो सपना है, वो चाहे बीता हुआ कल हो या आने वाला कल.


.

07 जुलाई 2020

कीबोर्ड वाले मोबाइल का अपना आकर्षण

समय के बदलाव के साथ विगत कुछ वर्षों में जिस तेजी से परिवर्तन आये हैं वे अकल्पनीय हैं. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक रूप से परिवर्तन देखने को मिले हैं. तकनीक के विकास ने बहुत सी वस्तुओं में क्रांतिकारी बदलाव किये हैं. बदलाव के बहुत सारे क्षेत्रों में मोबाइल और ऑटो-मोबाइल में जबरदस्त परिवर्तन देखने को मिल रहा है. पिछले कई सालों के सामाजिक, तकनीकी परिवर्तन पर नजर दौड़ाई जाये तो जिस तेजी से इन दो क्षेत्रों में बदलाव आया है, उतना किसी और क्षेत्र में नहीं आया है.


मोबाइल को हाथ में लेकर टहलते, दौड़ते, भागते या फिर किसी भी काम को करते-करते बतियाते समय एक पल को याद आता है एक डोर से बंधा, सीमित दूरी तय करने वाला बेसिक फोन. बेसिक फोन के साथ याद आता है घंटों नंबर डायल करने के लिए पुराने समय के फोन में लगी रिंग का घुमाया जाना. इसमें भी बदलाव उस समय हुआ जबकि रिंग की जगह बटनों ने ले ली. फोन में बदलाव आया मगर नंबर लगने की जटिलता में कमी नहीं आ सकी. इक्का-दुक्का घरों की शान बने फोन को ललचा कर देखने वालों की संख्या में कमी उस समय आनी शुरू हुई जबकि गली-गली, कोने-कोने में पीसीओ का खुलना शुरू हो गया.



वह दौर भी अपने आपमें अलग अनुभव देने वाला रहा है. एक दौर वो था जबकि फोन कॉल की दो दरें ही काम किया करती थीं. दिन भर फुल चार्ज वाला हिसाब और रात आठ बजे से आधी दरों पर एसटीडी कॉल की सुविधा. इसी में आगे जाकर अलग-अलग तीन-चार तरह की दरें निर्धारित की गईं. यही वो दौर था जबकि पीसीओ सुविधा के कारण लोगों से बातचीत करना सहज होता जा रहा था. पीसीओ में लगी लाइन और लोगों की आँखें कॉल मीटर पर लगी रहतीं. यदि एक बार में किसी व्यक्ति का नंबर नहीं मिलता और पीसीओ पर भीड़ है तो फिर उस व्यक्ति को तीन-चार बार ही रीडायल करने की सुविधा भीड़ की सहमति से मिल पाती थी.

तकनीक में परिवर्तन का दौर आ चुका था. बेसिक टेलीफोन में भी परिवर्तन आना ही आना था. मोबाइल आने के पहले बेसिक टेलीफोन ने अपने बदलाव की आहट को सुन-समझ लिया था. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हमें लगता है कि उसी बदलाव ने मोबाइल को जन्म दिया होगा. संभव है कि आप लोग अंदाजा लगा चुके हों, उस बदलाव के बारे में. बेसिक टेलीफोन और मोबाइल के बीच की कड़ी में बेसिक का ही अवतार बनकर उभरा कॉर्डलेस फोन. वैसे यह एक तरह से बेसिक टेलीफोन के उस उपकरण का विकास था किन्तु जिस तरह से उसे लेकर दस-बीस मीटर तक की पहुँच बना ली गई, तारों की बंधी-बंधाई सीमा-रेखा से मुक्ति मिली, उसने निश्चित ही एक बड़ा बदलाव किया होगा. इसी के चलते मोबाइल का जन्म हुआ. 

बेसिक फोन में भी परिवर्तन देखने को मिला और वह मोबाइल के रूप में बिना किसी तार के लोगों की जेब तक पहुँच गया. आज के स्मार्ट फोन को अपनी ज़िन्दगी बना चुकी इस पीढ़ी के लिए यह समझना ही कठिन होगा कि कैसे मैसेज टाइप करने के दौरान कुछ अक्षरों को टाइप करने के लिए एक बटन को तीन-तीन, चार-चार बार दबाना होता था. आज लगभग मुफ्त कॉलिंग वाली स्थिति का अनुभव कर रही पीढ़ी के लिए यह सोच पाना भी मुश्किल है कि उस समय जब मोबाइल का जन्म हुआ तो न केवल आउटगोइंग कॉल के लिए पैसे देने पड़ते थे बल्कि इनकमिंग कॉल का भी भुगतान करना पड़ता था. मोबाइल का होना उस समय एक स्टेटस सिम्बल तक बन गया था.

तकनीक के इस तीव्र विकास में एक गैजेट ऐसा भी आया था जो अपना विकास देख पाने के पहले ही एकदम से गायब हो गया था. याद आया आपको वह गैजेट? पेजर को भूले नहीं होंगे वे लोग जिन्होंने उसे देखा, उपयोग किया होगा. स्मार्ट फोन के साथ कुश्ती लड़ती आज की पीढ़ी ने शायद पेजर नाम सुना भी नहीं होगा. बहरहाल, उस समय जबकि मोबाइल का किसी व्यक्ति के पास स्टेटस सिम्बल हुआ करता था, तब हमारे एक परिचित अपने परिचितों पर रोब दिखाने के लिए मोबाइल की जगह पर टीवी का रिमोट कसे रहते थे. याद आ गया होगा, बेल्ट में बंधा एक कवर और उस कवर में बड़ी हिफाजत से रखा गया मोबाइल. चूँकि इनकमिंग कॉल भी खर्चीली होती थी, इस कारण न सबको नंबर दिया जाता था, न सबकी बात करवाई जाती थी. सो किसी को क्या खबर कि कमर में कवर में मोबाइल सुरक्षित रखा हुआ है या फिर टीवी का रिमोट मगर हमारे उन परिचित ने इसी तरह महीनों अपने परिचितों पर कथित मोबाइल की हनक बनाये रहे.


आज के स्मार्ट फोन के साथ एप्प का होना उसकी सजावट बना हुआ है. बहुत हुआ तो कोई अच्छा सा डिजायनर कवर उसकी शोभा बढ़ाने लगा. इसके उलट कीबोर्ड वाले मोबाइल के दौर में तमाम सारे साजो-सामान उनको सजाने के लिए आया करते थे. मोबाइल में बाँधने वाली रंग-बिरंगी डोरी, पारदर्शी कवर, कॉल-मैसेज आने के पहले उनके सिग्नल पाकर चमकने वाले स्टीकर, गुच्छे आदि मोबाइल को शोभायमान बनाया करते थे. बाद में मोबाइल की कई तरह की रंग-बिरंगी बॉडी बाजार में आ जाने के बाद मोबाइल का बाहरी आवरण भी बदलने लगा था. उपभोक्ताओं की मानसिकता, उनकी रुचि के अनुसार मोबाइल कंपनियों ने भी कई तरह के बदलाव अपने मोबाइल में करना शुरू कर दिए थे. कॉल आने के साथ लाइट का चमकना, कीबोर्ड का रंगीन बनाया जाना, रंगीन बॉडी का आना, मोबाइल में अलग-अलग तरह की लाइट का लगातार चमकते रहना आदि उस दौर के मोबाइल को खूबसूरत बनाने में लगे थे.

उन सादा मोबाइल के साथ-साथ स्लाइडिंग मोबाइल, फोल्ड होने वाले मोबाइल, दो सिम के मोबाइल का आना भी लोगों को सम्मोहित कर रहे थे. आज बहुतेरे व्यक्ति हजारों-लाखों रुपये के मोबाइल अपने हाथों में लिए घूमते हैं, स्लिम मोबाइल, घड़ी वाले मोबाइल सहित तमाम तरह के कीमती मोबाइल बाजार में उपलब्ध हैं मगर वे उस तरह का आकर्षण पैदा नहीं कर पा रहे हैं, जैसा कि बटन वाले मोबाइल पैदा करते थे.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

13 जून 2020

समय और यादों की साजिश है गलतियों का एहसास करवाना

आजकल निपट खाली बैठे हैं. जब लॉकडाउन लगा था तो सोचा था कि तमाम अधूरे काम निपटा लिए जायेंगे मगर आज तक सिर्फ सोचना ही हो रहा है. इस सिर्फ सोचने भर ने जीवन में बहुत नुकसान किया है हमारा. बहुत से बनते काम इसी सोचने के चक्कर में बिगड़ गए हैं. सोचने का काम इतनी तल्लीनता से होता है कि सम्बंधित विषय के ऐसे-ऐसे बिन्दुओं तक पर सोच लिया जाता है जिनका दूर-दूर तक कोई भविष्य, वर्तमान नहीं. बहरहाल, इसी खाली बैठे रहने में बहुत सी बातें याद आती हैं. बहुत सी यादें दिल-दिमाग में फिर से अंकुरित होकर खुद के आसपास उनका एहसास करवाने लगती हैं.


ये यादें भी बड़ी अजब सी स्थिति है. समझ नहीं आता कि ये दिल की स्थिति है या फिर दिमाग की? भूतकाल से जुड़े होने के बाद भी यादें वर्तमान को प्रभावित करती हैं साथ ही भविष्य की राह पर भी अपने निशान बनाने का दम रखती हैं. इन दिनों तमाम ऐसी यादों से दो-चार हो रहे हैं जो सुखद एहसास नहीं दे रहीं. बार-बार कोशिश होती है कि उन यादों को अपने आसपास फटकने न दें मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है. हमारे अपने जीवन में बहुत कम ऐसा हुआ है जबकि हम परेशान रहे हों या फिर किसी स्थिति-परिस्थिति से हम खुद को बाहर न निकाल पाए हों. इस बार समझ नहीं आ रहा है कि हम कहाँ कमजोर पड़ रहे हैं? यह भी समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर इन यादों को हम अपने सामने खड़ा होने से क्यों नहीं रोक पा रहे हैं? कई बार लगता है कि ऐसा तो नहीं कि इनको हम खुद ही छूट दिए हों हमारे सामने खड़े होने की? कहीं ऐसा तो नहीं कि इन यादों के सहारे हम उन दिनों में फिर जाना चाहते हों जो हमारे हाथ से निकल गया है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इन्हीं यादों के रूप में हम अपनी तमाम गलतियों का पश्चाताप करना चाह रहे हों?


बार-बार सोचने, विचार करने के बाद भी निर्धारित नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर असल सत्य क्या है? ये नहीं कहते कि जो समय बीत चुका उसमें हमने कोई गलती नहीं की थी. ये भी नहीं कहते कि वे गलतियाँ हमने जानबूझ कर कीं या फिर किसी को परेशान करने के लिए कीं. इसके बाद भी यदि वही समय सामने खड़ा होकर सवाल-जवाब करे तो कष्ट होना स्वाभाविक है. यह जानते-समझते हुए कि हमारा कोई भी कदम किसी भी तरह से नियोजित नहीं था किसी को भी परेशान करने के लिए, उसके बाद भी आरोपी बनाया जाना, दोषी सिद्ध किया जाना उन्हीं यादों का खेल है. वे यादें अक्सर सामने आकर एहसास करवाती हैं कि हमने कहीं न कहीं गलती की हैं. वे इसका आभास करवाती हैं कि हम कहीं न कहीं दोषी हैं. वे यादें ये भी साबित करती हैं कि अब हमारे हाथ में कुछ नहीं, अब हमें सिर्फ उन्हीं यादों के हाथों परेशान होना है. अब हमें उन्हीं यादों के द्वारा निर्धारित दंड भुगतना है.

ऐसा लगता है कि ये समय की और यादों की मिलीभगत है जो हमें हमारी गलतियों का बार-बार आभास करवाते हुए हमें दण्डित करना चाहते हैं. हम मानते हैं, स्वीकारते हैं कि हम दोषी हैं, हमने गलती की है मगर हम ये भी जानते हैं, ये समय भी जानता है, यादें भी जानती हैं कि अब उन गलतियों का कोई पश्चाताप नहीं. या कहें कि पश्चाताप करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि यदि फायदा होना होता तो उसी समय मिल गया होता जबकि पूर्व में कई-कई बार पश्चाताप किया, अपना दोष स्वीकारा.

आज फिर स्वीकारते हैं कि हम दोषी हैं, हमसे गलतियाँ हुईं हैं मगर इसका समाधान क्या है? क्या समय, यादें हमें ऐसे ही परेशान करती रहेंगी? क्या ये ऐसे ही हमें आभास करवाती रहेंगी हमारी गलतियों की? यदि ऐसा है तो क्या वाकई इतनी बड़ी गलतियाँ हुई हैं हमसे? क्या वाकई इतने बड़े दोषी हैं हम?

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

30 अप्रैल 2019

समय के साथ झूलती ज़िन्दगी


अपनों तक अपनी बात कहने और ग़ैरों तक अपनी बात कहने के बीच के अंतर को समझना आवश्यक होता है. कई बार समय ऐसे हालात पैदा कर देता है कि व्यक्ति चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता है. दो व्यक्तियों के बीच के तालमेल को या फिर उनमें पैदा हुए अविश्वास को कोई और नहीं समय पैदा करता है. क्या वाकई ऐसा होता है? क्या वाकई ऐसा ही होता है? क्या सिर्फ समय ही ऐसा होता है जिसके चलते व्यक्ति कुछ कर नहीं पाता है या फिर करने में असमर्थ रहता है? सबसे पहले समझना होगा कि समय आखिर है क्या? क्या समय वही है जो किसी घड़ी के माध्यम से गुजर रहा है? क्या ये समय वही है जिसके चलते किसी व्यक्ति की उम्र बढ़ रही है? या फिर समय एक परिस्थिति है, एक स्थिति है, एक सोच है जिसके द्वारा कोई भी इन्सान कुछ करने के लिए तत्पर रहता है. असल सच यही है. समय तो किसी भी इन्सान के द्वारा अपनी स्थिति से सामंजस्य बनाए रखने का माध्यम है जबकि असल में स्थिति ही किसी इन्सान के कार्यों के सञ्चालन की जिम्मेवार होती है. 


हालातों का पैदा होना, चाहे वे सही हों या फिर गलत हों उनका होना किसी समय के अंतर्गत नहीं बल्कि उसी हालात के पार्श्व में पैदा की गई परिस्थिति से होता है. परिस्थितियाँ ही किसी व्यक्ति को सही गलत के लिए उकसाती हैं. स्थितियाँ ही किसी व्यक्ति के कुछ करने या न करने के लिए प्रेरित करती हैं. ऐसे में जबकि किसी स्थिति के चलते सबकुछ सामान्य सा हो जाये, सबकुछ खुशनुमा हो जाये, सबकुछ सुखद हो जाये तो समय उसी व्यक्ति के पक्ष में खड़ा दिखाई देने लगता है. और इसके उलट यदि सबकुछ नकारात्मक हो जाये तो वही समय उस व्यक्ति के विरोध में खड़ा दिखाई पड़ता है. सोचिये इसी बिंदु पर आकर कि व्यक्ति एक है, समय भी वही एक है तो फिर स्थितियों के नकारात्मक, सकारात्मक होने पर वही समय जिम्मेवार कैसे? स्पष्ट है कि अपने आपको संतुष्टि का भाव देने के लिए, खुद के द्वारा पैदा किये गए हालातों का दोष अपने सिर आने से बचने के लिए इन्सान समय को कटघरे में खड़ा कर देता है.

28 दिसंबर 2018

समय एक व्यक्ति का नहीं पूरे देश का है

जब समय आपके अनुसार काम करता है तो वह सबसे बड़ा मित्र होता है मगर जब वही सही समय आपके अनुसार काम नहीं करता है तो सबसे बड़ा दुश्मन वही होता है. यह सार्वभौमिक सत्य है कि समय कभी किसी के अनुसार नहीं चला है बल्कि इंसानों को उसी के अनुसार चलना पड़ा है. इसके बाद भी व्यक्ति समय को अपने अनुसार संचालित करने का दंभ भरता है. समझ से परे है कि आखिर वह ऐसा करता क्यों है? प्रत्येक व्यक्ति इसको जानता है कि समय उसका इंतजार नहीं करता है और अपने हिसाब से प्रत्येक व्यक्ति का हिसाब-किताब करते हुए आगे बढ़ता जाता है. आज के दौर में जबकि एक-एक पल का महत्त्व है, एक-एक सेकेण्ड कीमती है तब मनुष्य को अपने समय का विशेष रूप से ख्याल रखना चाहिए. एक सेकेण्ड की अव्यवस्था किसी को भी कई-कई पल पीछे भेज सकती है. इसका एहसास भले ही किसी व्यक्ति को तुरंत न हो मगर जब उसके द्वारा अपने समय का आकलन किया जाता है तब उसे एहसास होता है कि उसके द्वारा समय का सदुपयोग नहीं किया गया. ऐसे एक-दो नहीं वरन अनेकानेक उदाहरण हैं जबकि किसी भी व्यक्ति को समय का सदुपयोग न करने पर खामियाजा भुगतना पड़ा है. 

समय के महत्त्व को आज की पीढ़ी को समझना बहुत आवश्यक है. वह भौतिकतावादी शक्तियों के हाथों में खेलती हुई समय को पूरी तरह से तिरोहित कर चुकी है. उनको इसका ख्याल रखना चाहिए कि वे महज एक वर्तमान को नहीं जी रहे हैं बल्कि उनके कंधों पर देश का भविष्य है. उनके द्वारा बर्बाद किया गया एक-एक सेकेण्ड उनका ही नहीं वरन देश का समय बर्बाद कर रहा है. देखने में भले ही यह बहुत छोटी सी बात लगे मगर एक युवा शक्ति का मात्र एक सेकेण्ड बर्बाद करना पूरे देश की कीमत पर लाखों-लाख सेकेण्ड की बर्बादी करने जैसा है. समझना होगा कि देश हमसे नहीं वरन हम सभी देश से हैं. अपने एक सेकेण्ड के लिए हम देश के लाखों सेकेण्ड को बर्बाद नहीं कर सकते. इसका खामियाजा सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि इस देश को, हमारे देश को ही भुगतना होगा.



08 दिसंबर 2018

कल के वृद्ध आज के युवा


समय कितनी तेजी से बदलता है यह व्यक्तियों की आदतों, उसके रहन-सहन से समझ आता है. समय की यही चाल समाज की दिशा और चाल का निर्धारण करती है. किसी के लिए समय बहुत धीमी गति से चल रहा होता है तो किसी के लिए समय भागता सा समझ आता है. समय की गति का आकलन किसी एक व्यक्ति के अनुसार न करके समग्र रूप में करना चाहिए. समाज समग्रता में ही बसता है और व्यक्तिगत रूप में समाज का आकलन उस रूप में नहीं हो पाता है जैसा कि होना चाहिए. व्यक्तिगत नजरिया समग्र नजरिये से बहुत अलग होता है और इसी के चलते समय का प्रभाव सापेक्षतः स्पष्ट नहीं हो पाता है. इस सम्बन्ध में वर्षों पहले का एक विज्ञापन याद आता है, आपको भी याद आएगा. उस विज्ञापन में जितेन्द्र आकर तीस साल की उम्र के बारे में कुछ कहते-बताते हुए एक कैप्सूल खाने की सलाह देते थे. सोचिये उस समय को और आज को.


उस समय तीस साल की उम्र के बाद शक्तिवर्द्धक कैप्सूल लेने की आवश्यकता महसूस की जाती थी जबकि आज तीस साल की उम्र में एक व्यक्ति शादी करके पत्नी को खुश करने वाले कैप्सूल की तलाश करता है. उस विज्ञापन को याद करते हुए बस एक ही बात याद आती है कि कैसे उस दौर में एक व्यक्ति तीस साल की उम्र में ही खुद को वृद्ध समझने लगता होगा? कई बार उस विज्ञापन को याद करते हुए याद करते हैं अपने परिवार और अपने आसपास के परिवारों का हाल, जहाँ बीस-बाईस साल में परिवारों में दो-दो, चार-चार बच्चे पैदा हो जाया करते थे. आज हाल ये है कि तीस-पैंतीस की उम्र में विवाह हो रहे हैं. स्पष्ट है कि जब किसी व्यक्ति का परिवार बीस-बाईस साल में बस जायेगा, वे दो-चार बच्चों के माता-पिता बन जायेंगे तो उनमें अपने आप ही तीस साल की उम्र में बुढ़ापे का भाव आ जायेगा. किसी समय पढ़ा था ओशो के द्वारा कहा हुआ कि हमारे देश में जवानी आती ही नहीं. जिस समय इसे पढ़ा था, उस समय लगा था कि कुछ अतिशय कहा है उन्होंने मगर उनके तर्कों और उदाहरणों के सापेक्ष इसे मानना पड़ा था. आखिर एक व्यक्ति का जन्म होता है और पढ़ने-लिखने से फुर्सत पाने से उसके गले जिम्मेवारी डाल दी जाती है, विवाह की, एक लड़की की. अभी वह उस जिम्मेवारी को समझ ही नहीं पाता है कि उस पर रोज एक दबाव काम करने लगता है, अगली संतति को धरती पर लाने का. उफान मारती युवावस्था, भरपूर यौवन अपना रंग दिखाता ही है, उसके साथ उत्प्रेरक का काम करता है पारिवारिक दबाव. किसी को स्वर्ग की सीढ़ी की चाह होती है, किसी को मोक्ष प्राप्त करने की लालसा होती है. कोई बिना नाती देखे धरती छोड़ने को तैयार नहीं होता है. किसी को वंशावली बढ़ाने वाला उत्तराधिकारी चाहिए होता है. ऐसे में सबकी मनोकामना पूरी करते-करते, अपनी देह की माँग पूरी करते-करते अगला व्यक्ति कब दो-चार बच्चों के अभिभावक में बदल जाता है उसे पता ही नहीं चलता है.


इस स्थिति को उस समय बहुत नजदीक से देखा और समझा भी है. ऐसे में तब तीस साल की उम्र वृद्धावस्था वाली उम्र मानी जा सकती है. अब जबकि कैरियर के चक्कर में युवा शादी करने से भाग रहे हैं तब तीस साल की उम्र भरी युवावस्था समझा जाने लगा है. कैरियर के चलते, आधुनिकता के चलते आज के युवा शादी जैसी संस्था के बंधन में बंधना नहीं चाहते हैं. शारीरिक संतुष्टि, माँग उनके लिए आज महत्त्वपूर्ण नहीं रह गई है. विवाहपूर्व सम्बन्ध उनके लिए आज अनैतिक नहीं रह गए हैं, ऐसे में वे स्फूर्त रूप से अपने विकास पर ध्यान लगाये हुए हैं. अपने कैरियर को आगे बढ़ाने पर दिमाग लगाये हैं. विवाह आज उनकी अनिवार्यता नहीं वरन सामाजिक परम्पराओं का निर्वहन मात्र रह गया है. ऐसे में थर्टी प्लस जैसे विज्ञापन देखने वालों को आज का समाज कुछ ज्यादा ही आधुनिक समझ आये. इसके बाद भी आज का सत्य यही है कि कल का युवा भले ही तीस साल की उम्र में वृद्ध माना जाने लगता हो मगर आज का युवा तीस के बाद ही अपनी जवानी से परिचय कर रहा है. यही समय की गति है, जो खुद अपनी बनायी गति को बदलता रहता है.

02 दिसंबर 2018

समय की परीक्षा और व्यक्ति का हौसला


समय कितनी-कितनी बार, किस-किस तरह से व्यक्ति की परीक्षा लेता है कहा नहीं जा सकता है. इसे शायद सम्बंधित व्यक्ति का हौसला बढ़ाना ही कहा जायेगा जबकि उसे समझाया, बताया जाता है कि समय उसी की परीक्षा लेता है जो इसके लायक होता है. ऐसा भी कहा जाता है कि समय या फिर कोई ईश्वरीय सत्ता जिसे इस लायक समझती है उसी का इम्तिहान लेती है. व्यावहारिक रूप से देखा जाये तो ऐसा महज दूसरे व्यक्ति का हौसला बढ़ाने के लिए ही कहा जाता है. ऐसा किसी भी रूप से अंतिम सत्य नहीं है कि जो व्यक्ति हिम्मती होता है, विश्वास से भरा होता है उसी को तमाम कष्टों से दो-चार होना पड़ता है. ऐसा भी नहीं है कि जिनके सामने कष्ट अथवा संकट नहीं आ रहे वे लोग आत्मविश्वास से भरे नहीं हैं. ऐसा भी नहीं है कि जो लोग कष्टों का कम या न के बराबर सामना कर रहे हैं, समय उनकी परीक्षा नहीं लेता है. वास्तविकता में लगभग सभी व्यक्तियों को कष्टों का, संकटों का सामना करना पड़ता है, यह और बात है कि उसका सामना करने की, उनसे निपटने की शक्ति सभी में अलग-अलग होती है.


इसी बिंदु पर आकर, जहाँ कि किसी भी तरह की परेशानी से जूझ रहे व्यक्ति अपने आपको उस संकट से बाहर निकालने में सफल हो जाते हैं या फिर किसी और को अपने कष्ट का आभास भी नहीं होने देते हैं, ऐसे लोगों के प्रति अन्य लोगों में एक अलग तरह की धारणा बनने लगती है. यहाँ समझना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में ऐसा नहीं है कि कष्ट आये ही नहीं और ऐसा भी नहीं कि एक बार कोई कष्ट आने के बाद भविष्य में कभी कोई दूसरी समस्या या कष्ट नहीं आएगा. भविष्य किसी ने नहीं जाना है और न ही किसी ने अपना समय जाना है. कब किसके साथ क्या हो उसे पता नहीं होता है. इसी कारण से जो व्यक्ति स्वयं को सशक्त, विश्वास से भरे रखते हैं वे सहज ही किसी भी कष्ट से पार पा लेते हैं. एकबारगी वे भले ही उनकी समस्या को निपटने में समय लग रहा हो मगर ऐसे लोग अपनी स्थिति को किसी और पर सहज ही प्रकट नहीं होने देते हैं. समय के साथ ऐसे लोग अपनी स्थितियों के निपटारे का प्रयास भी करते रहते हैं. ऐसे ही लोग जीवट के धनी माने जाते हैं. 

असल में कोई किसी दूसरे के दुःख में लगातार सहभागी तभी तक बना रहता है जबकि पीड़ित व्यक्ति अपने दुःख का रोना लगातार उसके सामने नहीं रोता है. यह अपने आपमें परम सत्य है कि सभी को अपने कष्टों से, अपनी समस्याओं से स्वयं ही जूझना होता है. दूसरा कोई भी व्यक्ति हौसला बढ़ाने के लिए, उसकी मदद करने के लिए साथ अवश्य आता है मगर ऐसा बहुत ही कम होता है जबकि कोई और आकर कष्टों का निवारण कर दे. ऐसे में पीड़ित व्यक्ति को ही अपनी समस्याओं से पार पाना होता है. साथ के लोग उसकी हिम्मत बनते हैं, उसका हौसला बढ़ाते हैं, वह व्यक्ति हार न मान बैठे इसी कारण तमाम तरह से उसके प्रति विश्वास प्रकट करते हैं. इसी विश्वास की दम पर व्यक्ति अपने कष्टों से मुक्ति पा लेता है. यहीं आकर कुछ लोग टूट जाते हैं और कुछ लोग सब कुछ पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ जाते हैं. ऐसे ही आगे बढ़ने वालों के प्रति समाज सकारात्मक धारणा बना लेता है. ऐसे लोगों के लिए उसके द्वारा कहना शुरू हो जाता है कि समय उसी की परीक्षा लेता है जो उसके काबिल होता है. अंततः यह भी समझने की आवश्यकता है कि एक व्यक्ति आखिर कब तक ऐसी परीक्षा से दो-चार होता हुआ अपने आपको साबित करता रहे?

28 मार्च 2018

जीवन की महत्ता उसके निर्वहन में है


कभी कहीं पढ़-सुन रखा था कि एक उम्र भी कम है हाल-ए-दिल सुनाने को, एक याद काफी है उम्र भर रुलाने को, और मुद्दतों बाद भी ये पंक्तियाँ मन-मष्तिष्क को, दिल-दिमाग को झंकृत कर जाती हैं. अकाट्य सत्य कहा जा सकता है इसे कि किसी भी व्यक्ति की एक याद उम्र भर उसके प्रति संवेदनाओं से, भावनाओं से सराबोर करती रहती है. हम सभी के जीवन में बहुत से लोग ऐसे आते हैं जिन्हें चाह कर भी हम भुला नहीं पाते हैं. या कहें कि ऐसे लोगों को भुलाया जाना सहज नहीं होता है. हमारे दैनिक कार्यों में, जीवन के किसी न किसी मोड़ पर ऐसे लोग बराबर साथ खड़े दिखाई देते हैं. उनका कुछ पल का साथ ही अपने आपमें ज़िन्दगी बन जाता है. इस ज़िन्दगी को जब भी खुद की ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ पाया जाता है तो अपनी ज़िन्दगी कमतर समझ आने लगती है. इसके पीछे मुख्य कारण उस साथ देने वाले के चंद पलों का महत्त्वपूर्ण होना रहता है. जीवन की अवधि इससे तय नहीं होती कि किसी व्यक्ति ने कितने वर्ष इस संसार में व्यतीत किये वरन इससे निर्धारित होती है कि उसके साथ कितने लोगों ने अपनी ज़िन्दगी के पल बिताये. यही वो स्थिति होती है जबकि किसी भी व्यक्ति को अपनी ज़िन्दगी बहुत बड़ी या बहुत छोटी समझ आ सकती है.


यदि किसी व्यक्ति की ज़िन्दगी का आधार उसके स्वयं के लोग, उसकी स्वयं की ज़िन्दगी है तो स्पष्ट है कि उसके लिए किसी और का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है. इसके उलट यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए जीवन का तात्पर्य न केवल खुद से है वरन सबके जीवन से है तो उसके जीवन का आधार सबके जीवन से निर्धारित होता है. ऐसे लोगों के लिए बहुधा जीवन बहुत छोटा महसूस होता है. वे बाकी लोगों के लिए जितना कुछ करना चाहते हैं, उतना अपने इस अल्प जीवन में कर नहीं पाते हैं. ऐसे लोगों के लिए जीवन का सन्दर्भ महज साँस लेने से नहीं, महज पारिवारिक दायित्व निर्वहन से नहीं, अपनी जिम्मेवारियों को पूरा करने से नहीं वरन सम्पूर्ण परिदृश्य में सम्मिलित रहता है. ऐसे लोग अपने जीवन का एक-एक पल न केवल समाज के लिए वरन सामाजिक उत्थान के लिए बिता देना चाहते हैं. ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो अपने ऐसे चंद पलों के द्वारा न केवल उतने दिनों के लिए वरन आजीवन रूप से हमारे साथ जुड़ जाते हैं. ऐसे लोगों के साथ बिताया गया एक छोटा सा पल भी अपने आपमें एक जीवन होता है, एक ज़िन्दगी होती है. आज जिस स्थिति में समाज का सञ्चालन दिख रहा है, उसमें ऐसे लोगों को भी मानक रूप में समाज के सामने लाने की आवश्यकता है जो अपने जीवन को दूसरों के लिए समर्पित किये हुए हैं. यदि हम सब ऐसा कर पाते हैं तो न केवल ऐसे लोगों का सम्मान कर सकेंगे वरन समाज को भी एक दिशा दे सकते हैं.