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06 अप्रैल 2026

बदलते मौसम के खतरे

प्रकृति मिजाज कब बदल जाये, कहा नहीं जा सकता है. उसके इस बदलते रुख को इस समय बहुत ही नजदीक से महसूस किया जा रहा है. दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत अचानक से बदले मौसम की चपेट में है और बारिश, ओलावृष्टि, तूफानों का सामना कर रहा है. यह आश्चर्य का विषय है कि जिस समय में इस क्षेत्र में गरम हवाओं का परिचालन होता था, तीव्र गर्मी का एहसास किया जाता था उस समय यहाँ बारिश, ओलावृष्टि हो रही है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ में व्यापक बदलाव आने के कारण ऐसा हुआ है. इसके लिए उन्होंने पॉलर जेट स्ट्रीम में गड़बड़ी और पोलर वॉर्टेक्स के बदलते रूप को जिम्मेदार बताया है. पोलर वॉर्टेक्स आर्कटिक के चारों ओर घूमता ठंडा वायुमंडल है. इसके चलते ही ओलावृष्टि में तीव्रता देखने को मिल रही है. मौसम विज्ञानियों के अनुसार गत माह मार्च में पाँच-छह पश्चिमी विक्षोभ आने चाहिए थे लेकिन इनकी संख्या आठ हो गई. वर्तमान माह अप्रैल में अनुमान है कि इनकी संख्या कम से कम तीन हो सकती है.

 


इस बदलते मौसम का कारण कुछ भी क्यों न रहा हो मगर यह जलवायु संकट का एक अत्यंत चिंताजनक और प्रत्यक्ष उदाहरण है. पारम्परिक ऋतु चक्र में परिवर्तन होने से जीवनदायिनी बारिश विनाशकारी भी बन जाती है. इस बेमौसम बारिश का प्रभाव नकारात्मक रूप से सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक ढाँचे पर हुआ है. इस असमय वर्षा ने सबसे घातक प्रहार हमारे कृषि ढाँचे पर किया है. तकनीकी विकास के बाद भी भारतीय कृषि आज भी पूरी तरह से प्रकृति के तालमेल पर निर्भर करती है. ऐसे में प्रकृति का जरा सा भी नकारात्मक बदलाव किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर देती है. असमय होने वाली इस बारिश, ओलावृष्टि, तूफ़ान ने रबी की फसल को अपनी चपेट में ले लिया है. गेहूँ, सरसों, चने जैसी फसलें मौसम की मार के कारण मिट्टी में मिल चुकी हैं.

 

ऐसी स्थिति का प्रभाव अकेले किसानों पर नहीं पड़ता है बल्कि समग्र रूप में पूरी आर्थिकी इससे प्रभावित होती है, आम जनजीवन को भी इसका प्रभाव सहना पड़ता है. असमय मौसम के बदले इस मिजाज के कारण फसल तो चौपट होती ही है और यदि किसी तरह के प्रयासों से कुछ बचाव कर भी लिया जाये तो न केवल अनाज की मात्रा कम होती है बल्कि दानों की गुणवत्ता में भी कमी आती है. इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि किसान को  अपनी फसल का उचित दाम बाजार में नहीं मिल पाता है. ऐसी स्थिति में आपूर्ति की कमी हो जाती है, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था, एक गृहिणी की रसोई भी प्रभावित होती है. बाजार में आपूर्ति की कमी के चलते खाद्य मुद्रास्फीति अर्थात महँगाई का भी तेजी से बढ़ना शुरू हो जाता है. वर्तमान दौर में जबकि न केवल वैश्विक समुदाय बल्कि भारतीय समाज भी युद्ध की विभीषिका के कारण से आर्थिकी में हो रहे परिवर्तनों को महसूस कर रहा है, तब बेमौसम की मार से इस आर्थिक तंत्र के बिगड़ने से आम जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है.

 


इस असमय मौसम परिवर्तन ने केवल कृषि को बल्कि स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है. प्रकृति में तापमान के अचानक गिरने से, नमी के बढ़ने से सूक्ष्मजीवों
, वायरस, मच्छरों आदि के पनपने का खतरा बढ़ गया है. ऐसा होने के परिणामस्वरूप सर्दी-खाँसी, बुखार, श्वसन सम्बन्धी समस्याओं के साथ-साथ डेंगू, मलेरिया आदि बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है. मौसमी बदलाव के लिए शारीरिक रूप से तैयार न होने के कारण लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है. इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है. इनके अलावा इस बदलते मौसम से हमारा पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता भी प्रभावित होती है. प्रत्येक जीव और वनस्पति का अपना एक जैविक कैलेंडर होता है, जिसमें इस असमय बदलाव के कारण भी बदलाव देखने को मिलता है. असमय बारिश से उनका प्रजनन चक्र प्रभावित होता है, बहुत से पक्षियों के घोंसले नष्ट हो जाते हैं, अनेक दुर्लभ प्रजातियों का  अस्तित्व इस असमय बदलाव के कारण खतरे में पड़ जाता है.

 

मौसम विशेषज्ञ इस बदलाव का कारण भले ही कुछ भी बताएँ मगर यदि ऐसी स्थितियों के मूल में जाया जाये तो ग्लोबल वार्मिंग, मानव-जनित प्रदूषण ही इसके सबसे प्रमुख कारण नजर आते हैं. विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने जंगलों, नदियों, पहाड़ों, वायुमंडल को नष्ट कर दिया है. इससे पारिस्थितिक तंत्र की नकारात्मकता ने प्रकृति में उथल-पुथल मचा रखी है. कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा ने धरती का तापमान खराब कर दिया है. समुद्रों, नदियों के पहले से कहीं अधिक गर्म होने के कारण बादलों का निर्माण, उनकी दिशा अनियंत्रित हो गई है. पश्चिमी विक्षोभ और समुद्री चक्रवातों के बदलते पैटर्न ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है.

 

इस संकट का समाधान मुआवजा, तात्कालिक राहत में नहीं है. इसके लिए दीर्घकालिक नीतियों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना होगा. प्रकृति से खिलवाड़ करने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा. सिंचाई के लिए जल संचयन प्रणालियों को मजबूत करना होगा ताकि बारिश के पानी का सदुपयोग हो सके. तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदलते जा रहे शहरों के नियोजन में भी आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है ताकि वे जलवायु अनुकूलन क्षमता को धारण कर सकें. यह समझना होगा कि बेमौसम बारिश कोई मौसमी परिघटना नहीं है बल्कि यह प्रकृति की चेतावनी है, जो हमें अपनी जीवनशैली बदलने को सचेत कर रही है. यदि हम अब भी नहीं जागे, पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया तो ऐसी मौसमी अनिश्चितताएँ हमारी खाद्य सुरक्षा, सामाजिक ढाँचे को हिलाकर रख देंगी.


08 जनवरी 2025

सोशल मीडिया की कैद में बच्चे

इंटरनेट के युग में कुछ समय पहले तक सोशल मीडिया जैसे शब्द की अवधारणा नहीं थी. समय के साथ जैसे-जैसे इंटरनेट तकनीक ने विकास-गति को पकड़ा, अनेक नए-नए शब्द जुड़ते चले गए. सोशल मीडिया ऐसे ही शब्दों में से एक है. आज स्थिति यह है कि लोगों का अधिकतम समय सोशल मीडिया पर बीत रहा है. ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि किसी दिन एक ऐसा मंच उपलब्ध होगा जिसके माध्यम से अपने मित्रों से बातचीत की जा सकेगी, जहाँ से अपने मन की खरीददारी भी हो सकेगी. पढ़ने-लिखने का माध्यम भी यह मंच बनेगा. आज सोशल मीडिया दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है. इस महत्त्वपूर्ण मंच के सुखद पहलुओं के बीच एक दुखद पहलू यह भी सामने आया कि सोशल मीडिया की गिरफ्त में बच्चे बहुतायत में हैं. उनके द्वारा दिन का बहुत सारा समय सोशल मीडिया पर गुजारा जा रहा है.

 

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ पीडियाट्रिक रिसर्च की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 88 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं. इनमें से लगभग 81 प्रतिशत व्हाट्सएप का और लगभग 55 प्रतिशत फेसबुक का उपयोग कर रहे हैं. देश में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग आदि का उपयोग करने वाले बच्चे नौ से सत्रह वर्ष की उम्र के हैं, जो प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक समय यहाँ बिताते हैं. डिजिटल युग में तेजी से उभरते इन आँकड़ों को सुखद तो नहीं कहा जा सकता है. ऐसे में जबकि कोरोनाकाल की ऑनलाइन शैक्षिक व्यवस्था के बाद से लगभग प्रत्येक बच्चे के हाथ में स्मार्टफोन, इंटरनेट की सुविधा सहज रूप में उपलब्ध है तो उसका सोशल मीडिया पर आना भी सहज ही है. सोशल मीडिया पर आने की सहजता और सोशल मीडिया का नियंत्रण मुक्त होना निश्चित रूप में बाल-मन, किशोर-मन के लिए घातक है. ऑनलाइन शिक्षा की आड़ में वे क्या देख रहे हैं, किस वेबसाइट पर जा रहे हैं इसे देखना-समझना आवश्यक है. इंटरनेट की दुनिया में मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका नकारात्मक असर बच्चों परकिशोरों पर देखने को मिल रहा है. ओटीटी की वेबसीरीज की अश्लीलता को, गालियों को, अश्लील भाव-भंगिमा को सोशल मीडिया में तैरती बहुतायत रील्स में देखा जा सकता है. गालियों, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्मलिहाज बना हुआ थावह लगभग समाप्त हो गया है. इसके चलते इनके स्वभाव में, दैनिक-चर्या में फूहड़ता, अश्लीलता, हिंसा, क्रूरता आदि दिखने लगी है.

 



बच्चों के सोशल मीडिया पर बढ़ते चलन को देखते हुए पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिबंधित करने सम्बन्धी एक विधेयक पारित किया गया. इस विधेयक के आने के बाद ऑस्ट्रेलिया के सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चे फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक आदि जैसे सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. इस विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि सोशल मीडिया कम्पनियाँ बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक नहीं लगा पाती हैं तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जायेगा. ऐसा वैश्विक रूप में किसी देश द्वारा पहली बार किया गया है. इस विधेयक के पारित होने के बाद बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को प्रतिबंधित किये जाने सम्बन्धी बहस भी छिड़ी. सैद्धांतिक रूप में यह कदम भले ही सार्थक लगता हो मगर व्यावहारिक रूप में इसे अमल में लाना मुश्किल ही है. आखिर किसी सोशल मीडिया कम्पनी-एजेंसी द्वारा यह कैसे निर्धारित किया जायेगा कि सम्बंधित सोशल मीडिया मंच का इस्तेमाल सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चे द्वारा नहीं किया जा रहा है? तकनीकी ज्ञान में पूर्णतः सक्षम आज के सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए छद्म नाम, जन्मतिथि आदि के द्वारा सोलह वर्ष से अधिक का होने में कितना समय लगेगा.

 

ऐसे में यदि समाज, सरकार वाकई इसे लेकर गम्भीर है कि बच्चों का बहुतायत समय सोशल मीडिया पर गुजर रहा है तो उसे किसी विधेयक जैसी सैद्धांतिक स्थिति के साथ-साथ कुछ व्यावहारिक कदमों को भी उठाना होगा. स्मार्टफोन की पैरेंटल कंट्रोल सुविधा को और सशक्त करना होगा. इसके द्वारा अभिभावकों को भी अपने बच्चों के स्मार्टफोन में तमाम वेबसाइट को, सोशल मीडिया मंचों को प्रतिबंधित करना होगा. इसके साथ-साथ बच्चों को सोशल मीडिया से, इंटरनेट से होने वाले नुकसान के बारे में भी समझाया जाना होगा. आपराधिक दुनिया की जानकारी देते हुए उनके डिजिटल अरेस्ट, साइबर क्राइम, चाइल्ड पोर्नोग्राफी आदि जैसी नकारात्मकता से भी परिचित करवाना होगा. जरा-जरा सी बात को, घटना को सोशल मीडिया पर अपलोड करने, अपने दोस्तों, परिजनों के साथ शेयर करने की हानियों से परिचित करवाना होगा. उनकी इस प्रवृत्ति को रोकने का कार्य भी करना होगा. इसके साथ-साथ बच्चों को सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से इतर वास्तविक दुनिया की तरफ ले जाना होगा. उनको परिवार के साथ अधिक से अधिक समय बिताने को प्रोत्साहित करना होगा. मोबाइल, कम्प्यूटर, ऑनलाइन गेमिंग के स्थान पर मैदानों में खेलने को वरीयता देनी होगी. इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कम से कम उपयोग करने का कदम उठाना होगा. शिक्षा, संस्कारों को मोबाइल, कम्प्यूटर के स्थान पर परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा, शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से दिए जाने का कार्य पुनः करना होगा. पारिवारिक वातावरण को सकारात्मक, संस्कारित बनाते हुए बच्चों को सोशल मीडिया के चंगुल से मुक्त करवाया जा सकता है.

 


23 अप्रैल 2023

टैटू की हानिकारक दीवानगी

आजकल युवाओं की पहली पसंद टैटू है. किसी का नाम, कोई डिज़ाइन बनवाना युवाओं की पहली पसंद बनता जा रहा है. लड़कियों के बीच अत्यधिक प्रचलित रहा यह शौक अब लड़कों में भी बहुतायत में देखा जा रहा है. इसे अपनी गर्दन, कलाई, पेट, पीठ आदि सहित शरीर के विभिन्न अंगों पर टैटू बनवाना आम होता जा रहा है. टैटू बनाने में त्वचा के नीचे रंग डालकर उस डिजाइन को शरीर पर उभारा जाता है, इससे शरीर पर न मिटने वाली आकृति बन जाती है. शरीर पर बनाई जाने वाली खूबसूरत आकृतियाँ कई तरह से लोगों की सुन्दरता को बढ़ाती हैं. 


इस कला का भी अपना इतिहास है. यद्यपि किसी तरह के प्रमाणिक तथ्य ऐसे नहीं मिलते हैं जिनसे इसकी उचित समयावधि ज्ञात हो सके तथापि ऐसा माना जाता है कि टैटू कला का सबसे पहला सबूत 5000 ईसा पूर्व से है. ऐसी मान्यता है कि टैटू कला वास्तव में एक प्राचीन कला है जो 3370 ईसा पूर्व से 3100 ईसा पूर्व के बीच विकसित हुई होगी. भारत में टैटू का इतिहास बहुत पुराना है. देश में यह कला गोदना या गुदना के रूप में प्रचलित रही. आदिवासी समुदायों ने अपने शरीर पर गोदना रूप में आभूषण इस सोच के साथ बनवाए कि इस तरह के आभूषण को उनसे दूर नहीं किया जा सकता. टैटू का सर्वाधिक प्रचलन जनजातियों के माध्यम से हुआ, इसमें अपतानी टैटू सबसे ज्यादा प्रचलित था. इसे बनवाने के लिए काँटों का उपयोग किया जाता था और गहरे नीले रंग में भरने के लिए जानवरों की चर्बी में मिश्रित कालिख का उपयोग किया जाता था. कालांतर में भारत सरकार ने सत्तर के दशक में इस प्रक्रिया को प्रतिबंधित कर दिया.




अस्सी के दशक से पहले टैटू तमिलनाडु में बहुत आम थे और ये विभिन्न जनजातियों से सम्बंधित लोगों की निशानी होते थे. छत्तीसगढ़ में भगवान राम के प्रति भक्ति भावना दर्शाने के उद्देश्य से लगभग एक सदी पहले चेहरे और शरीर को राम शब्द के साथ गोद लिया था जो अत्याचार के खिलाफ एक ताबीज के रूप में भक्ति का प्रदर्शन भी बना. दक्षिण भारत में गोदना को पचकुठारथु कहा जाता है. घुमंतू जाति कोरथी व कोल्लम जाति खुद को दुष्ट प्राणियों से सुरक्षित रखने के लिए स्याही से शरीर पर भूलभुलैया डिजाइन बनवाया करते थे, वहीं टोडा जाति में व्यक्ति के शरीर को लुभावना बनाने के लिए ज्यामिट्रिक आकृतियों को गोदा जाता था. बिहार के धनुको जाति का मानना है कि गोदना से महिलाएँ सुरक्षित रहती हैं. वहीं दूसरी ओर झारखंड में मुंडा जाति के लिए गोदना साहस और मुगलों पर विजय का प्रतीक है. गोंड जनजाति शरीर के खुले हिस्सों को गोदना से ढंक कर स्वयं को सभ्य बनाती है. झारखंड की संथाल जाति में पुरुष अपनी बाँह और कलाई पर सिक्कों नामक आकृति को अंकित करते थे. संथाल महिलाओं के शरीर पर पुष्प पैटर्न बेहद खूबसूरती से अंकित किया जाता था. 


वर्तमान दौर में बदलाव के शौक़ीन युवाओं ने दशकों पुरानी परम्परा को नए स्वरूप में अपनाकर एक नये ट्रेंड का आविष्कार कर लिया. दशकों पहले जिसे आम बोलचाल में गोदना कहा जाता था, वो आज टैटू के रूप में फैशन और स्टेटस सिम्बल बना हुआ है. आज की युवा पीढ़ी अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों पर अनोखे प्रकार के टैटू बनवाने में दिलचस्पी लेने लगी है. अनेक तरह की डिजाइन, नाम, कलाकृति, जीव-जन्तु, फूलों आदि के टैटू बनवाना आज फैशन बन गया है. टैटू बनवाने की दीवानगी में इसके शौक़ीन इससे होने वाले नुकसान की ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं. टैटू बनवाने के शौक में लोगों की त्वचा माँसपेशियों को नुकसान पहुँच सकता है. टैटू बनवाने की प्रक्रिया में काम आने वाली सुई शरीर में त्वचा में चुभोई जाती है. बहुत सी डिजाइन ऐसी होती हैं जिसे बनाने में सुई को शरीर में गहराई तक चुभोना पड़ता है. इससे माँसपेशियों को नुकसान पहुँचने की आशंका रहती है. इस बारे में विशेषज्ञों की राय है कि शरीर के उस स्थान पर टैटू नहीं बनवाने चाहिए जहाँ पर तिल हों. 




टैटू को रंगीन और आकर्षक बनाने के लिए अनेक प्रकार की स्याही का प्रयोग किया जाता है. कुछ स्याही और उसके रंग त्वचा के लिए हानिकारक होते हैं क्योंकि उनको बनाने में विषैले तत्त्वों का उपयोग किया गया होता है. नीले रंग की स्याही में कोबाल्ट और ऐल्युमिनियम मिला होता है जबकि लाल रंग की स्याही में मरक्यूरियल सल्फाइड की उपस्थिति रहती है. इसी तरह से बहुत से दूसरे रंगों की स्याही में शीशा, कैडियम, क्रोमियम, निकिल, टाइटेनियम, कार्सिनोजेनिक आदि सहित अनेक रासायनिक तत्त्वों और दूसरी धातुओं के होने के प्रमाण मिले हैं. ये सारे रासायनिक तत्त्व और धातु त्वचा में एलर्जी का कारण बनते हैं. इससे चर्म रोग होने की आशंका होती है. चिकित्सकों का कहना है कि टैटू की स्याही के कारण होने वाली एलर्जी से सोराइसिस जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है. इसी तरह टैटू बनवाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल की जाने वाली सुई से असावधानी होने पर चर्म रोग के साथ-साथ त्वचा कैंसर, हेपेटाइटिस, एचआईवी आदि जैसी संक्रमित बीमारियाँ होने का खतरा रहता है.


त्वचा रोग चिकित्सकों का कहना है कि टैटू बनवाने के बाद शरीर पर होने वाली समस्याओं में टैटू रिऐक्शन सबसे आम है. जब तक शरीर में टैटू की स्याही रहेगी तब तक शरीर में एलर्जी जैसी समस्या होती रहेगी. इससे त्वचा के कैंसर का खतरा बहुत कम है मगर संक्रामक बीमरियाँ होने की संभावना बहुत अधिक है. ऐसे में टैटू बनवाने में सावधानी रखनी चाहिए. इसे बनवाने से पहले हेपेटाइटिस बी का टीका लगवा लें तो इस संक्रामक बीमारी से बहुत हद तक बचा जा सकता है. इसके अलावा टैटू बनवाने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि बनाने वाला इसका अच्छा जानकार हो. उसके पास आधुनिक उपकरण और साफ-सफाई का पूरा ध्यान दिया जाता हो. टैटू बनाने वाली जगह पर नियमित रूप से ऐंटीबायॉटिक क्रीम लगाते रहें. वर्तमान दौर में टैटू के प्रति दीवानगी चरम पर है. यदि कुछ सावधानियों को अपना लिया जाये तो संभव है कि ये शौक कम समस्याओं वाला रहे.

 






 

07 अक्टूबर 2022

क्या मोबाइल वाकई समस्या बन गया है?

क्या मोबाइल वाकई हम सबके जीवन में एक समस्या बनता जा रहा है? यह एक ऐसा सवाल है जो हम लगभग रोज ही अपने से करते हैं और इसका जवाब स्वयं देने के बाद फिर इसी समस्या से घिर जाते हैं. यह सबके लिए किस हद तक सच है, ये उसके उपयोग की स्थिति पर निर्भर करता है किन्तु सत्य यही है कि आज जिस तरह से लोगों को मोबाइल की लत लग गई है, वह एक समस्या ही बन गया है. संचार के एक साधन के रूप में, आपसी संपर्क, बातचीत का माध्यम बना मोबाइल अब संचार के साथ-साथ मनोरंजन का साधन भी बन गया है. इंटरनेट और स्मार्टफोन के आने के बाद से मोबाइल ने जैसे अपने स्वरूप को विकराल कर लिया है. अब इसका उपयोग जानकारियों के आदान-प्रदान से अधिक मनोरंजन के लिए किया जाता है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों, रील्स, शॉर्ट वीडियो आदि की अधिकता जिस तरह से बाढ़ आई हुई है, उसके चलते मोबाइल अब एक समस्या ही बनता जा रहा है. 


यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मोबाइल एक नशे की तरह लोगों के जीवन में प्रवेश कर चुका है. अब मोबाइल का उपयोग उसकी सुविधा के चलते कम व्यक्ति की अपनी लत के कारण ज्यादा हो रहा है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि व्यक्ति चाहे अकेले बैठा हो या किसी भीड़ का हिस्सा हो, उसके लिए जैसे वरीयता वाला काम मोबाइल देखना है. मिनट-दो-मिनट में बार-बार मोबाइल को देखना, उसकी स्क्रीन को निहारना, बार-बार सोशल मीडिया के मंचों को खोलकर उनकी पोस्ट, फोटो, वीडियो आदि को देखना एक तरह का रोग बनता जा रहा है. अपने अनेक कामों के बीच में भी मोबाइल को खोलकर देखना, दिन का उजियारा हो या फिर रात का अंधकार, लोगों के लिए जैसे मोबाइल ही एकमात्र सहारा बना होता है. यह भी एक तरह की बीमारी कही जा सकती है कि जब लगने लगे कि इंटरनेट के माध्यम से उसके मोबाइल में कुछ नया सन्देश, फोटो, वीडियो आदि आने वाला है. सोशल मीडिया पर उसके द्वारा पोस्ट की गई सामग्री पर बार-बार लाइक, कमेंट आदि को देखने की आदत भी किसी नशे से कम नहीं.




विडम्बना यह है कि इस रोग का शिकार, इस नशे का आदी हर उम्र का व्यक्ति बना हुआ है. बच्चों में यह समस्या और तीव्रता से देखने को मिल रही है. एकल परिवार होने के कारण, माता-पिता के नौकरीपेशा होने की स्थिति में बच्चों का सबसे अच्छा साथी मोबाइल बना हुआ है. उनको कुछ खिलाना-पिलाना हो, उनकी किसी जिद को पूरा करना हो, खेलने में व्यस्त रखना हो तो बस मोबाइल पकड़ा कर माता-पिता खुद को जिम्मेवारी से मुक्त कर लेते हैं. अब बच्चों को घरों में परियों की कहानियाँ नहीं सुनाई जातीं बल्कि उनको मोबाइल पकड़ा कर रंगीन स्क्रीन में व्यस्त कर दिया जाता है. यह बच्चों के कोमल मन-मष्तिष्क पर नकारात्मक रूप से अपना प्रभाव छोड़ रहा है. देखने में आ रहा है कि अब बच्चे चिड़चिड़े होते जा रहे हैं. उनकी माँग के अनुसार यदि उनको मोबाइल न दिया जाये तो वे चिल्लाने का, सामान फेंकने का, खुद को हानि पहुँचाने का काम करने लगते हैं.   


कुछ ऐसा ही हाल युवाओं का है. वे किसी भी कार्य में व्यस्त हों किन्तु उनके हाथों से मोबाइल नहीं छूटता है. कभी किसी ऑनलाइन गेम में व्यस्त होने के कारण, कभी रील्स बनाने या फिर उनको देखने के क्रम में उनकी उंगलियाँ लगातार मोबाइल स्क्रीन पर टहलती ही रहती हैं. इसके चलते ऐसे बहुत से केस देखने को मिल रहे हैं जहाँ लोगों में आँखों की बीमारी, गर्दन का दर्द, रीढ़ की हड्डी में दिक्कत, उँगलियों की अपनी बीमारी की समस्या उत्पन्न हो रही है. इन बीमारियों के साथ-साथ लोगों की याददाश्त भी कमजोर हो रही है. छोटे से छोटे काम के लिए बच्चों, युवाओं की मोबाइल पर निर्भरता ने उनके मष्तिष्क की कार्यक्षमता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. अब वे किसी जानकारी के लिए कहीं खोजबीन करने का, अपना अनुभव जुटाने का, खुद का विश्लेषण करने का जोखिम नहीं उठाते हैं. उनके लिए एकमात्र समाधान अब उनके हाथ में दिखता मोबाइल है.


इस सुविधाजनक समस्या से बाहर निकलने के प्रयास उन्हीं लोगों को करने होंगे, जो इसके आदी बने हुए हैं. उनको समझना होगा कि मोबाइल की ऐसी लत किसी भी नशे की तरह बुरी है. देखने में भले यह किसी तरह की बाहरी बीमारी को नहीं दिखा रहा है किन्तु शरीर को, मन को, दिमाग को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है. अनिद्रा, तनाव, अवसाद, निराशा, गुस्सा, चिड़चिड़ापन आदि की समस्याएँ इसी मोबाइल की अधिकता के कारण उत्पन्न होने लगी हैं. आइए, इस समस्या को दूर हुए मोबाइल को अपनी सुविधा का ही साधन बना दिया जाये.

 




 

05 फ़रवरी 2022

एक बीमारी ने बचाया तो दूसरी ने घेरा बच्चों को

असमंजस का दौर अभी भी समाप्त नहीं हुआ है. भयग्रस्त वातावरण अभी भी बना हुआ है. विविध प्रकार के नुकसान रोज ही सामने आ रहे हैं. विगत दो वर्षों से कोरोना वायरस से लड़ते हुए देश ने बहुत सारे मोर्चों पर सफलता भी पाई है तो बहुत सारे क्षेत्रों में नुकसान भी उठाना पड़ा है. विविध क्षेत्रों के नुकसान का आकलन लगाकर उसकी भरपाई के तरीके भी खोजे जाने लगे हैं. आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में अपनी-अपनी तरह से संसाधनों को एकत्र करके, उपलब्ध संसाधनों को पुनर्जीवन प्रदान करके नुकसान को बहुत हद तक पाटने की कोशिश जारी है. इसी में एक क्षेत्र ऐसा है जिसके नुकसान की तरफ बहुत अधिक न तो ध्यान जा रहा है और न ही उसकी भरपाई के लिए विचार किया जा रहा है.


ऐसा एक क्षेत्र शिक्षा जगत है, जहाँ विगत दो वर्षों से व्यापक असमंजस बना हुआ है. जैसे ही लगता है कि स्थिति कुछ सामान्य होने जा रही है वैसे ही कोरोना का कोई नया वेरिएंट आकर सबको भयग्रस्त कर देता है. ऐसे में सबसे ज्यादा डर बच्चों की सुरक्षा को लेकर ही उत्पन्न होता है. इस भय के चलते ही जहाँ एक तरफ अभिभावक बच्चों को शैक्षिक संस्थानों में भेजने से बचने लगते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार भी एक तरह का अभिभावकत्व भाव अपनाते हुए शैक्षिक संस्थानों को सबसे पहले बंद करवा देती है.


यह सच है कि बच्चों के स्वास्थ्य, उनकी शारीरिकता को लेकर किसी तरह की लापरवाही नहीं की जा सकती है. सरकार का आरम्भ से ही प्रयास रहा है कि बच्चों को इस बीमारी के प्रकोप से बचाए रखा जाये. वैक्सीन की अनुपलब्धता होने की स्थिति में तमाम सारे सुरक्षात्मक उपाय समय-समय पर सरकार की तरफ से, समाज की तरफ से बताये जाते रहे, अपनाये जाते रहे. शैक्षिक संस्थानों का बंद किया जाना भले ही बच्चों को इस बीमारी से बचाए रखने का एक कारगर उपाय बनकर सामने आया हो मगर इसके भी अपनी तरह के नुकसान बच्चों को उठाने पड़े हैं. ऐसे नुकसान ये बच्चे आज भी उठा रहे हैं.


संस्थानों को बंद करवा कर, बच्चों को विद्यालयों में न भेजकर उनकी स्वास्थ्य समस्या के प्रति एक तरह की जागरूकता दिखाई गई, उनको स्वास्थ्य मामलों में भले ही सुरक्षित कर लिया हो मगर इसी के दूसरे पहलू में बच्चों को असुरक्षित भी कर दिया गया है. इस सन्दर्भ में यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो ऑनलाइन कक्षाओं ने बच्चों को कई तरह से नकारात्मक रूप में प्रभावित किया है. कई-कई घंटे मोबाइल, कम्प्यूटर की स्क्रीन में आँखें लगाये बैठे बच्चों को आँखों की समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है. किसी समय मोबाइल और कम्प्यूटर की रौशनी को बच्चों की आँखों, उनके रेटिना के लिए घातक बताया जाता था. अब कोरोना के चलते हुई बंदी ने इसी खतरे के साथ बच्चों को बड़ा होने को विवश किया.


यहाँ एक बिंदु आँखों की समस्या का होना ही नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ एक और शारीरिक समस्या उभरी गर्दन में दर्द की, रीढ़ की हड्डी में विकार की. सामान्य रूप में किसी भी विद्यालय द्वारा कम से कम पाँच घंटे तक ऑनलाइन कक्षाओं का सञ्चालन किया गया. इतनी लम्बी अवधि तक एक अवस्था में बैठ कर, गर्दन को झुकाकर मोबाइल, कम्प्यूटर स्क्रीन में काम करने से बहुतायत बच्चों में रीढ़ की हड्डी की, गर्दन की समस्या उभरी है. इन शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ बहुत से बच्चों में आपसी समन्वय, सहयोग, सामंजस्य आदि जैसी स्थितियों में भी ह्रास देखने को मिला है. इस अवधि में बहुत से बच्चे मानसिक रूप से कमजोर भी हुए हैं. ये और बात है कि उनके द्वारा अपनी पाठ्य-सामग्री को, अपने पाठ्यक्रम को बखूबी पूरा किया गया, अपने शैक्षणिक अंकों के मामले में भी उनमें बहुत ज्यादा नकारात्मकता देखने को नहीं मिली है मगर जिस उद्देश्य के साथ बच्चों को किसी संस्थान में जाना होता है, उस उद्देश्य की पूर्ति न होने के कारण बच्चों के मानसिक विकास में भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.


लॉकडाउन जैसी स्थिति के कारण से बच्चों का बाहर निकलना भी बंद रहा, पार्क, मैदान में खेलना-कूदना भी बंद रहा. अपने मित्रों, विद्यालय के सहयोगियों के साथ मिलना-जुलना न होने के कारण भी उनमें अकेलेपन जैसी मानसिकता ने जन्म लिया है. समूह के साथ मिलकर काम करने की भावना में भी कमी आई है. न केवल खेलने के सन्दर्भ में बल्कि सामूहिक रूप से अध्ययन करने, परीक्षाओं की तैयारी करने के सन्दर्भ में भी इसे देखा जा सकता है. इस तरह की कमी होने से बच्चों के मानसिक विकास का एक पक्ष कहीं न कहीं कमजोर हुआ ही है. बहुत से नौनिहाल तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी आरंभिक अवस्था में विद्यालय के दर्शन ही नहीं किये हैं. उम्र की दृष्टि से उनको आगे की कक्षाओं में भले ही प्रवेश दे दिया जाये, उनके ज्ञान को, शब्द-भंडार को भले ही घर-परिवार के द्वारा समृद्ध कर दिया गया हो मगर विद्यालय की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा से वे निश्चित ही हमेशा के लिए वंचित रह गए हैं. निश्चय ही इससे उनके कोमल मन पर जिस भावना का प्रस्फुटन होना था, वह नहीं हो सका है.


शैक्षिक संस्थानों को आये दिन बंद करके सरकार ने, समाज ने, परिवार ने बच्चों को बीमारी से तो बचा लिया. उनको स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या में जाने से रोक लिया मगर उसके बदले दूसरी तरह की शारीरिक समस्या में अजनाने ही धकेल दिया है. उनके शैक्षणिक विकास के लिए तकनीक का सहारा दिलवाया तो उसके बदले मानसिक समस्या का उपहार भी दे दिया. कोरोना संक्रमण से बच्चों को बचाया गया मगर वे अकेलेपन, अवसाद, गुस्सा, तनाव आदि से संक्रमित होने लगे. बीमारी से बचाव के लिए उठाये गए कदमों ने बच्चों को, नौनिहालों को अजनाने दूसरी तरह की बीमारियों, समस्याओं से ग्रसित करवा दिया. असमंजस के वर्तमान दौर से उबरते हुए बच्चों को उनकी इस नवीन समस्या से, उनकी मानसिक परेशानी से मुक्त करवाना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए. यदि सरकार, समाज, शैक्षिक संस्थान, परिवार ऐसा करने में असफल रहते हैं तो देश की बहुत बड़ी भावी पीढ़ी एक अनचाही, अनजानी बीमारी के साथ आगे बढ़ेगी.




(उक्त आलेख दिनांक 05.02.2022 के बीपीएन टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)

01 अक्टूबर 2021

भयावह माहौल का इंतजार

सितम्बर माह का भी समापन होने को है। इस साल के नौ महीने बीत जायेंगे कुछ घंटों बाद। वर्ष 2020 खतरनाक आहट के साथ आया था और वर्ष 2021 ने खतरनाक रूप दिखाया भी। इस खतरनाक रूप को गुजरे अभी कुछ महीने ही बीते हैं मगर ऐसा लगता है कि जैसे लोग सबकुछ भूल चुके हैं। याद करिए पिछले वर्ष 2020 को अगस्त सितम्बर से सबकुछ सामान्य होने लगा था। इस सामान्य होती दिनचर्या को तगड़ा झटका इस साल लगा। अचानक से भयावहता दिखने लगी। एकदम से ऑक्सीजन की कमी होने लगी। भयावह तरीके से मौतों की संख्या बढ़ने लगी।


रुकिए, रुक कर सोचिए, विचार करिए कि क्या ये सब महज एक बीमारी के कारण हुआ? फिर सोचिए कि इस साल के आरम्भ में वैक्सीनेशन भी शुरू हो गया था। सबकुछ सामान्य था फिर एकदम से ये भयावह रूप? मानवजनित बीमारी के बाद क्या ये सम्भव नहीं कि मानवजनित माहौल बना दिया गया हो, लोगों के मरने के लिए? क्या ये सम्भव नहीं कि जानबूझकर ऑक्सीजन की कमी कर दी गई हो? चिकित्सकों की लापरवाही तो हमने व्यक्तिगत स्तर पर देखी, अनुभव की थी। बहरहाल, जो हुआ सो हुआ पर अब क्या करना है? क्या अब तीसरी लहर के रूप में एक और साजिश का, एक और मानवजनित माहौल का सामना करना है?


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29 सितंबर 2021

हृदय को स्वस्थ और मजबूत रखें

आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए लोगों ने अपने शरीर की परवाह किये बिना धनोपार्जन की परवाह करना शुरू कर दिया. वैश्वीकरण के दौर ने इस काम में उत्प्रेरक का काम किया है. अब लोगों को अपने स्वास्थ्य, घर-परिवार से ज्यादा चिंता अपने धन की रहती है, अपनी आर्थिक स्थिति की रहती है. इस कारण से लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है. अव्यवस्थ‍ित दिनचर्या, अनावश्यक तनाव, अशुद्ध खाना-पीना, प्रदूषण आदि के कारण इंसानों में अत्यधिक बीमारियाँ देखने को मिल रही हैं. इनमें भी सर्वाधिक मरीज हृदय रोग के मिल रहे हैं. इसमें भी सबसे बुरी बात ये है कि युवा वर्ग के लोग बहुतायत में ह्रदय रोग के बीमार हो रहे हैं.  


पूरे विश्व में हृदय के प्रति जागरूकता लाने और रोग की समस्याओं से बचने के लिए प्रतिवर्ष 29 सितम्बर को विश्व हृदय दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने की शुरूआत सन 2000 में की गई थी. आरम्भ में इसे प्रतिवर्ष सितम्बर माह के अंतिम रविवार को मनाया गया किन्तु सन 2014 में इसके लिए 29 सितम्बर की तिथि को निर्धारित कर दिया गया.




हृदय को स्वस्थ रखने के लिए निम्नलिखित उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं - 


प्रतिदिन व्यायाम के लिए समय निकालें. इसमें भी सुबह, शाम पैदल चलना अथवा सैर करना बेहतर है.

भोजन के द्वारा भी हृदय रोग की समस्या पर बहुत हद तक नियंत्रण लगाया जा सकता है. इसके लिए भोजन में नमक और वसा की मात्रा कम कर की जा सकती है. इसके साथ-साथ ताजे, मौसमी फल और सब्जियों को भोजन में नियमित रूप से लेना चाहिए.

धूम्रपान नहीं करना चाहिए. यह हृदय के साथ ही कई बीमारियों का कारक है.

इसके अलावा हृदय को तंदुरुस्त रखने के लिए नींद का भरपूर लिया जाना सर्वोत्तम उपाय है.

  

27 जून 2020

कोरोना संक्रमण से सम्बंधित कुछ प्रश्नों के उत्तरों की अपेक्षा

कोरोना संक्रमण को लेकर बहुत सी बातें लगातार सामने आ रही हैं. सामाजिक, शारीरिक दूरी बनाये जाने की बातें की जा रही हैं. हाथ धोने के तरीके बताये जा रहे हैं. इन सबके बीच कुछ शंकाएँ हैं, मन में. शंकाएँ इसलिए क्योंकि जो प्रश्न मन में उठते हैं उनके बारे में समाधान खुद से ही खोज लेते हैं मगर उनके बारे में स्पष्ट उत्तर मिलते नहीं.



सवाल ये हैं कि कोरोना संक्रमण फैलने का मूल कारण क्या है?
+
यदि दो व्यक्ति एकसाथ सटे हुए बैठे/खड़े हैं. उनमें एक व्यक्ति पॉजिटिव है और दूसरा स्वस्थ. वे आपस में किसी तरह की बातें न करें (ड्रॉपलेट सम्बन्धी कोई कारण न हो) तो भी क्या दूसरा व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
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किसी स्वस्थ व्यक्ति ने किसी संक्रमित व्यक्ति से हाथ मिला लिया या फिर किसी संक्रमित वस्तु को छू लिया तो क्या वो पॉजिटिव हो जायेगा?
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यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी संक्रमित व्यक्ति/वस्तु को छूने के बाद अपने हाथ को आँख, नाक, मुँह में नहीं लगाता तो भी क्या वह संक्रमित हो जायेगा?
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ऐसी स्थिति में कितने देर रहने के बाद उसकी हथेली संक्रमण मुक्त हो जाएगी, यदि उसे साबुन न मिले, सेनेटाइजर न मिले? या वह संक्रमित ही बनी रहेगी?
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यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी ऐसी जगह बैठ जाए जिसे किसी संक्रमित व्यक्ति ने छू लिया हो या वहाँ कोई संक्रमित व्यक्ति बैठा रहा हो तो क्या वो स्वस्थ व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
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कोरोना संक्रमित व्यक्ति के शरीर के किस हिस्से से छूने से संक्रमण फैलेगा? क्या पॉजिटिव व्यक्ति का पूरा शरीर संक्रमित हो जाता है?
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कहा जा रहा है कि संक्रमण मुँह, आँख, नाक के सहारे फेफड़ों तक ही हो रहा है, ऐसे में किसी संक्रमित व्यक्ति का पूरा शरीर किस तरह/किस कारण संक्रमित हो जाता है?
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संक्रमित व्यक्ति जो कपड़े पहने होता है क्या उसका ऊपरी हिस्सा भी संक्रमित रहता है, जिसे उसने अपनी हथेलियों से न छुआ हो?

सवाल तो बहुत सारे हैं मगर सब इन्हीं के आसपास घूमते-टहलते हैं. इनका जवाब इसलिए भी आवश्यक है, ये जरूरी नहीं कि हमें मिलें बल्कि सबको पता होने चाहिए क्योंकि कोरोना के नाम से जिस भय का व्यापार अब हो रहा है वह खतरनाक है. आज ज्यादातर डॉक्टर्स किसी मरीज को देखने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं. वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे बीमार व्यक्ति अपनी आँखों से कोरोना फेंक रहा है.

इन सवालों के जवाब इसलिए भी मालूम होने चाहिए क्योंकि जिस तरह से लोगों का बाहर निकलना हो रहा है, जिस तरह से सभी कार्यालय, संस्थान अपनी सामान्य स्थिति में आ रहे हैं उससे कोरोना संक्रमण बढ़ने की ज्यादा सम्भावना है. मास्क को लेकर, हाथ धोने को लेकर, ड्रॉपलेट को लेकर, मौसम को लेकर, वायरस के जीवित रहने को लेकर जिस तरह से अलग-अलग बातें निकल कर सामने आ रही हैं, वे चिंताजनक हैं. ऐसे में इस तरह के और दूसरे सवालों को उठाया जाना चाहिए, उनका समाधान खोजना चाहिए. सुरक्षा तो अपनी जगह है, संभव है कि ऐसे सवालों से प्राप्त जानकारी से भी सावधानी बढ़ाई जा सके.

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02 जून 2020

ध्यान रखना, लॉकडाउन और अनलॉक तुम्हारे लिए नहीं

लॉकडाउन के बाद अब नई शब्दावली चलन में आ गई है, अनलॉक. वैसे इन दोनों शब्दों से लोग पहले से परिचित रहे हैं मगर इस सन्दर्भ में पहली बार प्रयोग कर रहे हैं. इस लॉकडाउन लगने, खुलने को लेकर लोगों में अजब सी उथल-पुथल है. जब इसे लगाया गया था तो इनके पेट में मरोड़ उठी थी. उसके बाद जब इसका दूसरा भाग शुरू हुआ तो फिर ज्यादा मरोड़ हुई. पहले मरोड़ उठी थी लगने को लेकर फिर मरोड़ उठी एकाएक लगने को लेकर. श्रमिकों, मजदूरों के परेशान होने को लेकर. इन मरोड़धारियों को जानकारी नहीं थी कि ये क्या होने लगा है. इसी कारण से उस समय बमचक नहीं मचाई जबकि लॉकडाउन शुरू हुआ था. जब कुछ दिन बाद दिमाग ने इसका विश्लेषण, आकलन करना शुरू कर दिया तो सरकार के कदमों की समीक्षा होने लगी.


अब जबकि लॉकडाउन को खोल दिया गया है या कहें कि अनलॉक जैसी स्थिति का आरम्भ हो गया है तो इन्हीं लोगों को फिर समस्या होने लगी है. अब समस्या यह है कि आखिर लॉकडाउन हटाया क्यों जा रहा? इनकी समस्या ये भी है कि जब संख्या कम थी तो लॉकडाउन लगाया गया था, अब जबकि संख्या बढ़ने लगी है तो लॉकडाउन हटाया जाने लगा है. ऐसे लोगों की समस्या ठीक पहले दिन वाली है. तब भी अपना दिमाग न लगाते हुए बस विरोध करना था, आज भी दिमाग न लगाते हुए बस विरोध करना है. कभी सोचा है कि इतने लॉकडाउन के बाद भी संख्या बढ़ रही है तो यदि लॉकडाउन न किया होता तो यही संख्या मार्च के अंत में होती. फिर यही अतिबौद्धिक लोग सरकार के कार्यों की आलोचना करते. सरकार की तैयारियों की बुराई करते.


किसी ने कभी सोचा होगा कि देश को कभी इतनी बड़ी संख्या में पीपीई किट की आवश्यकता पड़ेगी? किसी ने कभी इसका आकलन किया होगा कि देश में कभी भी सामान्यजन को भी एन-95 मास्क की आवश्यकता होगी? किसी भी लैब ने या किसी भी चिकित्सकीय संस्थान सहित किसी भी बुद्धिजीवी ने विचार किया था कि देश को कभी कोरोना टेस्टिंग किट की आवश्कता पड़ेगी? क्या कभी किसी ने विचार किया था कि महज इसी एक बीमारी के लिए देश में प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोगों के सैंपल इकठ्ठा किये जायेंगे, उनकी जाँच की जाएगी? क्या किसी ने कभी अस्पताल जाने के दौरान सोचा होगा कि कोई दिन ऐसा भी आएगा जबकि किसी बीमार के लिए आइसोलेशन वार्ड जैसी जगह भी बनानी पड़ेगी? किसी ने भी ऐसा नहीं सोचा था. संभवतः ऐसा किसी भी देश की सरकार ने नहीं सोचा होगा.

ऐसे में जबकि आपके सामने, परिवार के सामने, देश के सामने, सरकार के सामने ऐसी कोई स्थिति आ जाये जो एकदम से नई हो तो क्या किया जाये? क्या उससे बिना तैयारी के लड़ना शुरू कर दिया जाये? क्या उससे निपटने के साधनों को उपलब्ध नहीं करवाया जाये? बस ध्यान रखें कि सरकार ने आरम्भिक दिनों में लॉकडाउन करके यही सब किया. इतने दिनों में लॉकडाउन के कारण मरीजों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ी. लोगों की आवाजाही कम रही, देश भर की सारी गतिविधियाँ ठप्प रहीं जिससे सरकार और उसके सहयोगीजनों को अपनी तैयारी करने का समय मिला. जो देश दे महीने पहले पीपीई किट बनाता न हो वह अब निर्यात करने की स्थिति में है. जिस देश में टेस्टिंग किट बनती न हो वह अब एक दिन में एक लाख से अधिक जाँच कर रहा है. जिस देश की चिकित्सा व्यवस्था को दोयम दर्जे का माना जाता रहा हो उसने रेलवे की बोगियों को महीने भर से कम समय में आइसोलेशन वार्ड में बदल दिया. अब लाखों की संख्या में बेड तैयार हैं, किसी भी असामान्य स्थिति से निपटने को. क्या ये आपके लिए संतोष की बात नहीं है?

संभव है कि बहुतों के लिए इसमें भी सरकारी हेरफेर दिखाई दे तो फिर स्पष्ट शब्दों में इसे ऐसे समझिये. सरकार ने लॉकडाउन आपके लिए नहीं लगाया था बल्कि अपनी तैयारियों के लिए लगाया था. सरकार ने अब अनलॉक किया है तो वो भी आपके लिए नहीं किया है बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को सँभालने के लिए किया है. दो महीने के लॉकडाउन में सरकार ने आपको खूब समझा दिया, तोते की तरह रटवा दिया कि कैसे बचना है कोरोना से. क्या-क्या सावधानियाँ अपनानी हैं. उसने आपको हर तरह से प्रशिक्षित कर दिया है. अब ये आपकी मनमर्जी पर है कि आप असावधानी में कोरोना को चपेटते हैं ये फिर कोरोना आपको अपने लपेटे में लेता है. अब ये आपके कदम बताएँगे कि आप अपने कार्य के लिए बढ़ रहे हैं या फिर कोरोना की तरफ जा रहे हैं. मर्जी आपकी क्योंकि स्वास्थ्य है आपका, परिवार है आपका, जान है आपकी.

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10 मई 2020

कोरोना योद्धा की काल्पनिकता से बाहर निकले मीडिया

संभव है कि हमारे मीडिया के कई साथी इस पोस्ट पर नाराजगी जताएँ. हमारे कई दोस्त, उम्र में हमसे बड़े-छोटे लोग, हमारे कई विद्यार्थी मीडिया से जुड़े हुए हैं. उनकी नाराजगी की चिंता से अधिक आवश्यक हमें उनकी चिंता करना लगा. वे सभी लोग कुछ बिन्दुओं पर गंभीरता से विचार करते हुए अपने कदम बढ़ाएंगे, ऐसी अपेक्षा ही कर सकते हैं.


पहली बात, आप ऐसी कौन सी जानकारी सरकार तक, प्रशासन तक पहुँचाना चाहते हैं, जो उनके पास अपने स्त्रोतों से उनको उपलब्ध नहीं हो सकती?

दूसरी बात, आपके द्वारा कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या, इससे होने वाली मौतों की संख्या आदि का आम नागरिकों के लिए क्या लाभ है?

तीसरी बात, विचार करिए कि लॉकडाउन के कारण उत्पन्न अनेक तरह की समस्याओं का उल्लेख करके आप जनता को सुकून दिलवा रहे हैं अथवा परेशान कर रहे हैं?

चौथी बात, इस समय किसी शहर में किसी भी तरह की राजनैतिक, सांस्कृतिक, खेलकूद आदि से सम्बंधित कार्यक्रम संचालित नहीं हो रहे हैं, जिनका प्रकाशन/प्रसारण आपके लिए आवश्यक है.

पाँचवीं बात, सामान्य दिनों में भी बहुत सी खबरों का कवरेज आपके द्वारा ही नहीं किया जाता था बल्कि सूत्रों के द्वारा आपको उनकी प्राप्ति होती थी.

छठवीं बात, प्रत्येक जिले में सूचना कार्यालय होता है, उसका काम सूचनाएँ उपलब्ध करवाना ही होता है.


चलिए मान लेते हैं कि आपका ही कवरेज करना अत्यंत आवश्यक है तो लॉकडाउन के दौरान खुद के द्वारा प्रकाशित/प्रसारित की गई खबरों पर ही निगाह डाल लीजिये. उनमें से कितनी ऐसी हैं जो अत्यावश्यक अथवा अनिवार्य हैं?

एक बात स्वीकारिये कि कोरोना से सम्बंधित किसी भी खबर का प्रसारण सरकारी गाइडलाइन के आधार पर ही हो रहा है. आप लोगों द्वारा भी प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी ही प्रकाशित/प्रसारित की जा रही है.

प्रशासन द्वारा जगह-जगह लॉकडाउन के पालन की स्थिति का अवलोकन, नगरीय सीमाओं पर आने वालों की भीड़, पुलिस की मुस्तैदी-जांच आदि की खबरों के लिए क्या सम्बंधित स्थान पर आपका ही रहना आवश्यक है?

अपने-अपने क्षेत्र में अपना whatsapp नंबर सबके बीच सार्वजनिक कीजिये. प्रशासन से अथवा अन्य लोगों से उसी पर खबरें, फोटो, वीडियो प्राप्त करिए.

एक विशेष बात, विगत कुछ दिनों से पत्रकारों के लिए मुआवजे की बात की जा रही है. इसका अर्थ यह निकला कि आप भी आशंकित हैं. ऐसे में एक बार अपने परिजनों से उनकी मंशा जान लीजिये कि वे आपके स्थान पर सरकारी मुआवजा स्वीकारने को तैयार हैं?

इसके अलावा एकबारगी मुआवजे की बात को सरकार मान भी ले तो क्या आप मीडिया से जुड़े होने के बाद भी मीडिया की अंदरूनी वास्तविकता से परिचित नहीं? किसी संस्थान द्वारा एक जिले में कितने लोग वास्तविक रूप में उसके कर्मियों के रूप में मान्यता प्राप्त हैं, ये आपको भी ज्ञात होगा. ऐसे में मुआवजे की स्थिति में सरकारी नीति में कितने लोग आयेंगे, ये भी आपको पता होगा.

इन सब बातों से बड़ी बात, मीडिया के लोग खुद को कोरोना योद्धा, चौथा खम्बा आदि की काल्पनिकता से भी बाहर निकलने का प्रयास करें. संवैधानिक रूप से तीन ही खम्बे हैं. कोरोना योद्धा के रूप में वे लोग ही तत्पर हैं जो सरकारी दायित्वों से बंधे हैं, अन्यथा की स्थिति में बहुतायत निजी चिकित्सक घर में ही रह रहे हैं.

एक बात पूरी तरह से दिमाग से निकाल दीजिए कि आप लोग खबरें नहीं देंगें तो लोगों को खबर न होगी. वर्षों पहले गिने-चुने समाचार-पत्र होते थे, एक ही चैनल हुआ करता था तब भी खबरें लोगों तक पहुँचती हैं. आज तो हर व्यक्ति समाचार-पत्र है, हर व्यक्ति चैनल है. आप अपने शहर की बात कर रहे, व्यक्तियों के पास अन्तरिक्ष की खबरें तक हैं.

अच्छी बात है, आप सभी बधाई के पात्र हैं कि रोज की खबरें जनता तक पहुँचाना आप अपना दायित्व समझते हैं मगर विचार करिए कि इस कोरोना के दौर में, लॉकडाउन में कितने लोग समाचारों के लिए अखबारों और न्यूज़ चैनल्स का सहारा ले रहे हैं?

खबरों के प्रसारण के लिए सरकारी तंत्र पर्याप्त सक्रिय है. कुछ महीनों के लिए खोजी पत्रकारिता टाइप कदम रुके रहेंगे तो कोई प्रलय नहीं आ रही मगर आप लोगों को कुछ होता है तो आपके घर अवश्य प्रलय आ जाएगी. यहाँ फिर वही बात कि इस लॉकडाउन में किस तरह की खोजी खबर, गुप्त जानकरी आप लाना चाहते जो नागरिकों के लिए लाभकारी होगी, ये बताएं और बन जाएँ कोरोना योद्धा.

कहना हमारा फ़र्ज़ था क्योंकि आप हमारे हैं. अब मानना या न मानना आपके ऊपर क्योंकि ये तय आपको करना है कि आपके परिजन आपके हैं या नहीं? ध्यान रखियेगा, कोरोना का संक्रमण पद, प्रतिष्ठा, प्रस्थिति, कार्य, वर्ग, धर्म, जाति, क्षेत्र आदि देखकर नहीं हो रहा.

घर में रहिये, स्वस्थ रहिये, सुरक्षित रहिये.

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09 मई 2020

तेरे संग जीने को, बदलना होगा आदतों को

जब चीनी वायरस कोरोना ने हंगामा काटना शुरू किया था तो लोगों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया था. अपने देश में तो इसे गंभीरता से लेना तो अभी भी शुरू नहीं किया गया है. पता नहीं इस देश के लोग किस मिट्टी के बने हैं जो गंभीर मसलों पर गंभीरता नहीं दिखाते और अनावश्यक मामलों में बहुत ज्यादा गंभीर हो जाते हैं. गंभीर न रहने की इसी मानसिकता ने संकट खड़ा कर दिया है. जिस तरह से इस वायरस के बारे में कहा जा रहा है यदि सभी लोग पूरी तरह से लॉकडाउन का पालन करते तो स्थिति इतनी भयावह न होती.


वैश्विक भयावहता देखने के बाद बहुत सारे लोग कहने लगे हैं कि अब सभी को इस वायरस के साथ जीवन जीने की आदत डाल लेनी चाहिए. सही भी है. अभी जिस तरह से इसकी वैक्सीन बनाये जाने का काम चल रहा है, दवा, टीका आदि के बारे में जिस तरह के प्रयोगों की स्थिति है उसे देखते हुए लग रहा है कि इसके अंतिम रूप से आने में समय लगेगा. तब तक क्या व्यक्ति को भय के साथ जीना पड़ेगा? क्या तब तक समाज में भेदभाव जैसा माहौल दिखेगा? क्या समन्वय बनाने वाली बात की जगह एक-दूसरे को शक की निगाह से देखना पड़ेगा?


आने वाला समय कैसा होगा, इस बारे में अभी से कुछ कहना जल्दबाजी होगी. आने वाले समय में लोग किस तरह की जीवनशैली अपनाएँगे, इसे भी ठीक-ठीक कहना मुश्किल है. लॉकडाउन के पहले दो दौर के बाद जब तीसरे दौर में सरकार की तरफ से शराब की दुकानों को खोलने के आदेश आये तो लोग ऐसे टूट पड़े जैसे कोरोना वायरस की दवा बाजार में आ गई हो. इस शराब की दुकानों के अलावा लोगों को सामान्य खरीददारी के लिए, सब्जी के लिए इस तरह भीड़ लगाते देखा है जैसे अपने देश में कोरोना जैसा कोई संकट ही नहीं है. ये स्थिति इतना बताने के लिए पर्याप्त है कि जो लोग घर में रह रहे हैं उनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जो बस पुलिस की मार से बचने के लिए. अनेक राज्यों में बाजारों के तमाम दृश्य देखने के बाद लगता नहीं कि आने वाले समय में इन्सान सहनशीलता दिखायेगा, संयम रखेगा.

ऐसे में, संभव है कि हमारे कुछ सुझाव हास्यास्पद लगें (लगें तो हँस लेना क्योंकि इस लॉकडाउन में लोग हँसना भूल गए हैं) मगर हम यहाँ दे रहे हैं. यदि इसी वायरस के साथ जीवन बिताना है, इसकी आदत डालनी ही है तो तकनीकी क्षेत्र से जुड़े हुए लोग ऐसी कोई मशीन का आविष्कार करें जो कोरोना को नापने का काम करे. आखिर दिल की धड़कन नापने की, बीपी नापने की, शुगर नापने की, हीमोग्लोबिन नापने की, आँखों का प्रेशर नापने की, इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रिक उपकरणों की क्षमता नापने आदि की मशीन तो हैं ही.  इसी तरह की कोई मशीन आनी चाहिए ताकि वो व्यक्ति जो इस मामले में संवेदित है वह सम्बंधित वस्तुओं में कोरोना को नाप सके, लोगों में कोरोना नाप सके.

इसके अलावा बाजार की दुकानों को अलग-अलग वस्तुओं के हिसाब से अलग-अलग दिनों में खोले जाने जैसे कदम उठाये जाएँ. किसी भी शहर में दिव्यांगजनों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं के अलावा किसी अन्य को सार्वजनिक वाहन इस्तेमाल करने से रोका जाना चाहिए. बाजार आने अथवा एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए निजी वाहन (इसमें भी यदि साइकिल को मान्यता दी जाये तो बेहतर रहेगा) अथवा पैदल को वरीयता दी जाये. इससे एकसाथ कई-कई लोगों के बैठने की संभावना पर अंकुश लगेगा.

अब इसी तरह के उपाय खोजने होंगे, अमल में लाना होंगे, यदि वाकई इसी वायरस के साथ जीना है तो.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

05 मार्च 2020

जीवन-शैली का सुधार ही बीमारियों से बचाव है

इस समय कोरोना वायरस का हौआ इस कदर छाया हुआ है कि यदि किसी के बगल में पहुँच कर सामान्य सा खाँस दो या छींक दो तो अगला ऐसे देखेगा जैसे मौत को देख लिया हो. यदि किसी को जरा सा मौसमी जुकाम भी हो गया तो तुरंत मेडिकल के चक्कर में पड़ जायेगा. संभव है कि कोरोना एक भयंकर वाली बीमारी हो. इसके प्रभाव में आने वाले की जान पर बन आये मगर क्या वाकई जीवन के लिए एकमात्र यही घातक बीमारी है? देखने में आ रहा है कि जब से कोरोना के देश में चंद मामले सामने आये हैं, लोग मुँह पर मास्क लगाकर चलने लगे हैं. अभी कुछ दिन पहले सरकार, शासन, प्रशासन अपनी दम लगाकर दो-पहिया वाहन चालकों को हेलमेट के लाभ बता रहा था, उनको प्रेरित कर रहा था, बिना हेलमेट वालों पर जुरमाना भी लगाया जा रहा था मगर क्या मजाल कि सबके कानों में जूँ रेंगी हो. कुछेक लोगों को छोड़कर बाकी लोगों को हेलमेट टाँगे तो जरूर देखा मगर लगाये हुए न देखा. इधर कोरोना के आने की खबर मात्र से बहुतायत लोगों के मुँह पर मास्क चिपक गए.


बीमारी से बचाव अच्छी बात है. किसी भी समस्या के चक्कर में पड़ने के पहले ही यदि उससे सुरक्षा कर ली जाए तो बेहतर होता है. इन सबके बीच ऐसे कई बिंदु दिमाग में आये जबकि लगा कि अब हम सभी किस कदर नकली या कहें कि कृत्रिम जीवन जीते चले जा रहे हैं. दिन भर किसी न किसी तरह से ऐसे काम में संलग्न रहेंगे जो पर्यावरण के हित में नहीं हैं मगर एक बीमारी के काल्पनिक हमले से बचने के लिए मुँह पर मास्क लगा लेंगे. क्या कभी इस पर विचार किया है कि कोरोना की आहट के पहले कितने लोग मास्क लगाकर घर से बाहर निकलते थे? शायद इक्का-दुक्का लोग ही ऐसा करते होंगे. तब क्या किसी बीमारी का खतरा नहीं था? क्या गाड़ियों से निकलने वाला धुँआ इन्सान के लिए किसी अमृत के समान है? क्या वह मनुष्य के शरीर में नहीं जा रहा? क्या उसका खानपान ऐसा है कि उसके किसी तरह की बीमारी न हो? क्या वह नैसर्गिक रूप से अपने आपको प्रकृति से जोड़कर चल रहा है? क्या उसकी दिनचर्या ऐसी है जो उसके लिए लाभप्रद है?

बहुत से लोग जो आज कोरोना के भय से मास्क लगाये घूम रहे हैं, इनमें से बहुतायत में ऐसे लोग हैं जो दिन भर तम्बाकू का, गुटके का सेवन करते हैं. घड़ी-घड़ी इनके मुँह से सिगरेट का धुँआ निकलता रहता है. असल में अब बहुतायत लोगों ने अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन कर दिया है. उनकी दिनचर्या भी अलग तरह की हो गई है. खानपान भी बदल गया है. सेहत के नाम पर वे लोग सजग नहीं दिखाई देते हैं. यही कारण है कि आजकल बच्चे भी मोटापे का शिकार हो रहे हैं. नजर कमजोर हो रही है. बौद्धिक विकास भी त्वरित गति से नहीं हो रहा है. जरा सा परिश्रम करते ही साँस फूलने लगती है. कोरोना से बचाव का कारण उनकी जागरूकता नहीं है वरन मौत से उनका भय है. ऐसी किसी भी बीमारी से, जिसका कि इलाज संभव नहीं दिखता, व्यक्ति उसके प्रति जागरूक रहता है अन्यथा की स्थिति में वह लापरवाही करता ही करता है.


आज खेलकूद के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है. मैदान में न तो बच्चों की भीड़ दिखाई देती है और न ही बड़े लोगों की. सैर के नाम पर चंद बुजुर्ग लोग दिख जाते हैं. पैदल चलना जैसे आज तौहीन है, व्यक्तित्व पर दाग है. खुले में कुछ देर को बैठना, स्वच्छा हवा में साँस लेना आज के लोग जैसे जानते ही नहीं हैं. चौबीस घंटे वातानुकूलित वातावरण में रहने का आदी हो जाना, जंक फ़ूड की आदत लगा बैठना आदि नुकसान के सिवाय कुछ और नहीं कर रहे हैं. ऐसे में बीमारियों का पनपना आम बात है. ऐसे में ध्यान रखने की आवश्यकता है कि आज एक मास्क किसी को एकमात्र बीमारी से चंद पलों के लिए सुरक्षित रख सकता है क्योंकि वह मास्क भी तो संक्रमित होगा ही, किसी न किसी तरह से. उसे दोबारा उपयोग में लाने का अर्थ खुद को संक्रमित करना ही है. ऐसे में अपनी दिनचर्या को नियमित किया जाये. व्यायाम की तरफ ध्यान दिया जाए. शारीरिक श्रम करने की तरफ बढ़ा जाये. बच्चों को बजाय मोबाइल, कंप्यूटर के मैदान में खेलने को प्रोत्साहित किया जाये. ऐसा करके जहाँ एक तरफ कोई व्यक्ति अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकता है वहीं दूसरी तरफ खुद को अनेक बीमारियों से भी सुरक्षित कर सकता है. 
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