विधानसभा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विधानसभा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

18 दिसंबर 2024

समय की माँग है एक देश एक चुनाव

लम्बे समय से देश में एकसाथ चुनाव कराये जाने की चर्चा चलती रही है. एकसाथ चुनाव की प्रक्रिया को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के सन्दर्भ में लिया जाता रहा है. एकसाथ चुनाव कराने को कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दल सहमत नहीं हैं. उनके द्वारा सरकार के इस कदम का विरोध किया जा रहा है. एकसाथ चुनाव कराये जाने की चर्चाओं, बहस के बीच लोकसभा में यह बिल 198 के मुकाबले 269 मतों से पारित हो गया. कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मंगलवार को देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रावधान वाले संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक 2024 और उससे जुड़े संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक 2024 को लोकसभा में प्रस्तुत किया था.

 

वर्तमान में भले ही देश में एकसाथ चुनाव कराये जाने की प्रक्रिया पर विरोधी स्वर उठ रहे हों मगर ये कोई नवीन अवधारणा नहीं है. संविधान को अंगीकार किए जाने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के पहले चुनाव 1951-52 में एक साथ आयोजित किए गए थे. इसके बाद 1957, 1962 और 1967 के तीन चुनाव भी एकसाथ संपन्न हुए थे. ऐसा नहीं है कि सरकार ने एकसाथ चुनाव कराये जाने सम्बन्धी बिल अचानक से लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया. सरकार द्वारा सितम्बर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एकसाथ चुनाव कराने पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था. इस समिति का प्राथमिक उद्देश्य यह पता लगाना था कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एकसाथ चुनाव कराना कितना उचित होगा. इस हेतु सार्वजनिक और राजनैतिक विचारों को आमंत्रित किया गया और भविष्य में एकसाथ चुनाव प्रक्रिया संपन्न करवाए जाने से सम्बन्धित चुनौतियों का विश्लेषण किया गया. समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही एकसाथ चुनाव कराये जाने सम्बन्धी बिल का आधार तैयार किया गया. समिति ने एकसाथ चुनाव की व्यवस्था को दो चरणों में लागू किये जाने की सिफारिश की. चूँकि देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के साथ-साथ पंचायती चुनावों को भी संपन्न करवाना होता है. इसी को देखते हुए समिति ने सिफारिश की कि पहले चरण में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाएँ. दूसरे चरण में इन चुनावों के संपन्न होने के सौ दिन के भीतर नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराये जाएँ.

 



यह सच है कि भारत जैसे विशाल देश में निर्बाध रूप से निष्पक्ष चुनाव कराना हमेशा से एक चुनौती रहा है. यह चुनौती उस समय और बड़ी हो जाती है जबकि प्रतिवर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं. लगातार होते चुनावों के कारण देश सदैव चुनावी प्रक्रिया में बना रहता है. इससे न केवल बहुतायत में प्रशासनिक मशीनरी चुनाव प्रक्रिया में लगी रहती है बल्कि देश पर भारी आर्थिक बोझ भी पड़ता है. ऐसी स्थिति में कई बार लगता है कि एकसाथ चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने के कारण देश सहजता से विकास के रास्ते पर चल सकेगा. इस प्रक्रिया के विरोध में यह कह देना कि आज़ादी के बाद के समय में एकसाथ चुनाव संपन्न करवाना इस कारण सहज हुआ था क्योंकि तब जनसंख्या कम थी. आज अधिक जनसंख्या के कारण एकसाथ चुनाव करवाना कठिन होगा. इस विचार के साथ ये याद रखना होगा कि यदि देश की जनसंख्या बढ़ी है तो वर्तमान में तकनीक और अन्य संसाधनों का भी विकास हुआ है. न केवल संचार साधनों का बल्कि परिवहन व्यवस्था में भी क्रांतिकारी विकास हुआ है. ऐसे में आज़ादी के तत्काल वर्षों की तुलना में अब एकसाथ चुनाव करवाना ज्यादा सहज है, आसान है. 

 

एकसाथ चुनाव करवाए जाने की स्थिति में सबसे बड़ा लाभ यह है कि निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आदर्श आचार संहिता बहुत लम्बे समय तक लागू नहीं रहेगी. इसके चलते विकास कार्य लम्बी अवधि तक लम्बित नहीं रहेंगे और उनको समय से पूरा किया जा सकेगा. इसके साथ-साथ इससे बार-बार होने वाले चुनावों के कारण भारी-भरकम खर्च में कमी आएगी. संभव है कि एकसाथ चुनाव कराये जाने की स्थिति में धन का अपव्यय रुके और इससे काले धन, भ्रष्टाचार पर भी किसी तरह का अंकुश लग सके. एकसाथ चुनाव करवाया जाना जहाँ देश की राजनैतिक व्यवस्था के लिए, आर्थिक स्थिति के लिए लाभप्रद समझ आ रहे हैं वहीं इसका लाभ नागरिकों को भी मिलेगा. चुनावों के समय सक्रियता से अपना कार्य करने वाले सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को बार-बार चुनाव ड्यूटी पर लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. इससे जहाँ एक तरफ उनके समय की बचत होगी वहीं दूसरी तरफ वे चुनाव प्रक्रिया में बार-बार सक्रिय रहने के कारण होने वाली शारीरिक, मानसिक थकान से भी बच सकेंगे. ऐसा होने की स्थिति में वे अपने कर्त्तव्यों का पालन भी सही तरीके से कर पायेंगे.

 

एकसाथ चुनाव कराये जाने के विरोधी स्वरों को निश्चित रूप से समिति द्वारा सुना गया होगा, उस पर सकारात्मक रूप से विचार किया गया होगा. प्रथम दृष्टया एक देश एक चुनाव की अवधारणा में कोई बहुत बड़ी कमी नजर नहीं आती है. इसमें कोई दोराय नहीं कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा देश हर समय चुनावी प्रक्रिया में लगा रहता है. एकसाथ चुनाव होने से इस चक्रव्यूह से उसे मुक्ति मिलेगी. अब जबकि लोकसभा में इस सम्बन्ध में बिल पारित हो चुका है, ऐसे में सरकार से और विपक्षी दलों से अपेक्षा यही है कि वे सभी समवेत रूप में चुनावों के इस चक्रव्यूह से देश को निकालने के लिये व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलायें. इसके द्वारा राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोक का प्रयास हो और जनसामान्य में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना शामिल हो.


09 अक्टूबर 2024

चुनाव परिणाम भाजपा के लिए संजीवनी

अबकी बार चार सौ पार जैसा जबरदस्त नारा उछलने के बाद भी लोकसभा चुनावों में आशातीत सफलता न मिल पाने के बाद गैर-भाजपाई दलों द्वारा नए तरह के दुष्प्रचार राजनैतिक गलियारों में उछालने शुरू कर दिए थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली, भाजपा की डबल इंजन सरकार की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उठाते हुए विपक्षी दलों के उभरते गठबंधन और मुहब्बत की दुकान ने आने वाला समय अपना बताया. इस तरह की वैचारिकी को, विपक्षी दलों द्वारा फैलाये जा रहे दुष्प्रचार को उस समय और बल मिला जबकि चुनाव सर्वेक्षणों ने हरियाणा में गठबंधन को जबरदस्त सफल होते दिखाया. इसके उलट चुनाव परिणामों ने अलग कहानी लिख दी. 

 

हरियाणा विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने लगभग 40 प्रतिशत मतों के साथ 48 सीटों को भाजपा के पक्ष में देकर विपक्षी दलों द्वारा चलाये जा रहे अनेकानेक दावों, बयानों को गलत साबित कर दिया. पिछले विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने लगभग 37 प्रतिशत मतदान भाजपा के पक्ष में करते हुए 40 सीटों पर विजय दिलवाई थी. अबकी सीटों की संख्या और मतदान प्रतिशत दोनों में वृद्धि करते हुए हरियाणा के मतदाताओं ने भाजपा के विरुद्ध चलाये जा रहे तमाम दुष्प्रचार खारिज कर दिए. भाजपा की इस विजय से निश्चित ही विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस को जबरदस्त निराशा हुई होगी क्योंकि जिस तरह से हरियाणा में भाजपा विरोधी माहौल बनाया गया था, चुनाव सर्वेक्षणों में उसे एक पायदान नीचे दिखाया गया था उसके बाद कांग्रेस खुद को सत्तासीन समझ चुकी थी. यहाँ की जनता ने किसान विरोधी, पहलवान विरोधी, सेना विरोधी, सरकार विरोधी तमाम स्थितियों को आइना दिखा दिया. भाजपा की जीत ने अग्निवीर योजना पर मतदाताओं की मुहर लगाई, साथ ही यह भी साबित कर दिया कि महिला पहलवानों और किसानों का मुद्दा विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था.

 



भाजपा ने हरियाणा में आरम्भ से ही अपना ध्यान राज्य के ओबीसी मतदाताओं पर लगाया जो हरियाणा की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हैं. यहाँ की राजनीति में मुख्य रूप से जाट समुदाय का प्रभुत्व बना हुआ है जो राज्य की कुल जनसंख्या का 25 प्रतिशत हैं. कांग्रेस सहित अन्य दलों का ध्यान जहाँ जाट मतदाताओं पर रहा वहीं भाजपा ने गैर-जाट मतदाताओं को आकर्षित कर अपनी जीत सुनिश्चित की. इसके अलावा भाजपा ने गाँवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दलित परिवारों तक पहुँच बनाई, जिसमें लखपति ड्रोन दीदी अभियान ने मुख्य भूमिका निभाई.

 

हरियाणा का चुनाव वहाँ की राजनैतिक स्थितियों के कारण चर्चा में रहा तो जम्मू-कश्मीर का चुनाव इसलिए राष्ट्रव्यापी विमर्श का हिस्सा बना क्योंकि धारा 370 हटाये जाने, केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद वहाँ यह पहला चुनाव था. इस चुनाव को लोकतान्त्रिक प्रणाली की परीक्षा भी माना जा रहा था. राज्य का इतिहास रहा है कि जहाँ पर आतंकवादियों और अलगाववादियों के भय के साए में चुनाव सपन्न हुआ करते थे, वहाँ भाजपानीत केन्द्र सरकार द्वारा लोकतंत्र की बहाली का रास्ता बनाते हुए 2019, 2020 एवं 2021 में क्रमशः ब्लॉक विकास परिषद् (बीडीसी), जिला विकास परिषद्  (डीडीसी) एवं पंचों-सरपंचों के चुनाव सहजता, शांतिपूर्वक करवा दिए. केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद हुए परिसीमन में जम्मू संभाग में 43 और कश्मीर संभाग में 47 सीटों का आवंटन किया गया. जम्मू-कश्मीर के चुनावों में देखा जाये तो यहाँ राष्ट्रीयता के स्थान पर क्षेत्रीयता और जनजातीय अस्मिता को महत्त्व दिया गया. राज्य में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन का पूरा जोर धारा 370 की वापसी, राज्य का दर्ज़ा बहाल करने, भू-स्वामित्व को सीमित करना आदि पर रहा. इसके माध्यम से गठबंधन राज्य के नागरिकों को लुभाने में सफल भी रहा. परिणामस्वरूप नेशनल कांफ्रेंस को 45 सीटों पर विजय प्राप्त हुई जबकि कांग्रेस को मात्र 06 सीटों से संतोष करना पड़ा.

 

भाजपा की दृष्टि से यह चुनाव कुछ लाभकारी कहा जा सकता है. पिछले चुनाव की 25 सीटों के मुकाबले इस बार उसे 29 सीटों पर विजय प्राप्त हुई. राज्य में कश्मीर मुस्लिम बहुल है जहाँ भाजपा की पैठ न के बराबर है. जम्मू में जहाँ हिन्दू जनसंख्या अपना प्रभाव रखती है वहाँ भाजपा के प्रदर्शन को संतोषजनक कहा जा सकता है. मतदाताओं के बीच भाजपा ने लोकतंत्र की स्थापना, क्षेत्रीय विकास, आतंकवाद-अलगाववाद को समाप्त करने आदि मुद्दों को पहुँचाने की कोशिश की लेकिन राज्य में उसके लिए बहुत अधिक राजनैतिक संभावनाओं के न होने के बाद भी 2014 की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन निश्चित ही भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं के लिए संजीवनी का काम करेगा. राज्य के चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि यहाँ नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनेगी किन्तु अबकी शासन, सरकार का स्वरूप पहले वाले जम्मू-कश्मीर जैसा नहीं होगा. केन्द्रशासित राज्य होने के कारण वर्तमान में उपराज्यपाल की शक्तियाँ अपना कार्य करेंगी, इस कारण अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए मुख्यमंत्री को उपराज्यपाल की अनुमति, सहमति की आवश्यकता होगी.

 

बहरहाल हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को उस क्षेत्र विशेष के सन्दर्भ में, वहाँ की राजनैतिक, नागरिक स्थितियों के सन्दर्भ में देखने की आवश्यकता है. केन्द्र की भाजपानीत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा-मुक्त, शांतिपूर्वक चुनाव करवाकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना का आधार निर्मित किया है वहीं हरियाणा में भाजपा द्वारा लगातार तीसरी जीत ने बहुत सारे दुष्प्रचारों को खारिज किया है. इस जीत से निश्चित ही चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा, उसके सहयोगी दलों और कार्यकर्ताओं में उत्साह, ऊर्जा का संचार होगा.

17 फ़रवरी 2022

जालौन प्रशासन की चुनावी कसरत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर चारों तरफ सरगर्मी दिखाई दे रही है. प्रशासन अपने स्तर पर सक्रिय है, राजनैतिक दल अपनी तरह से सक्रिय हैं, मीडिया अपनी तरह से सक्रिय है. मीडिया जगह-जगह पहुँच कर मतदाताओं के विचार जान रहा है. जनता में किस दल को लेकर, किस प्रत्याशी को लेकर क्या मंथन हो रहा है इस पर लगातार अपने कार्यक्रमों का संचालन-प्रसारण कर रहा है. राजनैतिक दल अपने-अपने स्तर पर मतदाताओं को लुभाने में लगे हुए हैं. सच्चे-झूठे वादों को फेंका-लपेटा जा रहा है. अपने-अपने कामों की गलत-सही सूची दिखाई जा रही है. विभिन्न दलों के कार्यकर्ता अपने-अपने हिसाब से पूरा जोर लगाये पड़े हैं. इनके साथ-साथ प्रशासन अपने स्तर पर सक्रिय है. उसके सामने निष्पक्ष, पारदर्शी, ईमानदार, हिंसामुक्त चुनाव को सम्पन्न करवाने की चुनौती है. इस चुनौती के साथ-साथ अधिक से अधिक मतदान के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए भी वह सक्रिय बना हुआ है.


प्रदेश के अन्य जनपदों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है मगर जनपद जालौन में जिला प्रशासन द्वारा अधिक से अधिक मतदान के लिए कुछ ज्यादा ही मेहनत की जा रही है. इस मेहनत में उसके द्वारा शिक्षा विभाग को भी दौड़ा दिया गया है. जनपद स्तर पर मतदाताओं को प्रोत्साहित करने या कहें कि मतदान करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. इसके लिए महाविद्यालयों में बुलउआ (बुलावा) टोली का निर्माण करने का आदेश भी महाविद्यालयों में प्रेषित किया गया. इस टोली के द्वारा मतदान दिवस के पूर्व मोहल्ले-मोहल्ले जाकर लोगों को पीले चावल देकर मतदान के लिए आमंत्रित करना है. मतदान वाले दिन भी इस टोली के सदस्यों द्वारा मतदाताओं को आमंत्रित करना है.


प्रशासन द्वारा एक और काम करवाने की कवायद की गई, जो संभवतः पूरे प्रदेश में अकेले जनपद जालौन में हुआ होगा. इसकी पहल भी संभवतः शिक्षा विभाग द्वारा की गई है, ऐसा सम्बंधित आदेश और गतिविधि को देखकर लगता है. इस आयोजन में विद्यार्थियों द्वारा अपने बांयी हथेली पर मेंहदी लगानी है. इसमें उसे किसी तरह की कोई डिजायन नहीं बनानी है बल्कि उसे अपनी हथेली पर लिखवाना है ‘जालौन वोट करेगा अबकी बार, 20 फरवरी दिन रविवार.’ प्रत्येक महाविद्यालय से कम से कम पचास विद्यार्थियों को ऐसा करना है.


हमारे महाविद्यालय में भी इस मेंहदी कार्यक्रम का आयोजन किया गया. बहुत सारे विद्यार्थियों द्वारा अपनी हथेली पर मेंहदी द्वारा उक्त स्लोगन को लिखा गया. विद्यार्थियों में छात्र भी शामिल रहे. महाविद्यालय में ऐसे कार्यक्रमों में प्राध्यापकों की भी सहभागिता रहती है, सो इस आयोजन में यहाँ के प्राध्यापकों ने भी जोर-शोर से सहभागिता की. वैसे जोर-शोर से सहभागिता तो जिला प्रशासन की भी रही. इसमें जिलाधिकारी और जिला विद्यालय निरीक्षक भी अपनी हथेलियों पर मेंहदी लगवाते देखे गए.

जिलाधिकारी जालौन 

जिला विद्यालय निरीक्षक जालौन 

गांधी महाविद्यालय, उरई प्राध्यापकजन 

गांधी महाविद्यालय, उरई के विद्यार्थी 

हमने भी लगवा ली मेंहदी 

हिन्दी विभाग प्राध्यापक 

जिला विद्यालय निरीक्षक जालौन सहित अन्य प्रतिष्ठित जन


17 मई 2018

कर्नाटक में भाजपा की अग्नि-परीक्षा


अंततः कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में येदियुरप्पा ने शपथ ग्रहण कर ली है. उनके शपथ लेने के बाद भी ये अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या वे सदन में बहुमत सिद्ध कर सकेंगे? चुनाव परिणामों के बाद की अंतिम स्थिति में भाजपा के पास बहुमत के आँकड़े से कम सीटें रहीं. भाजपा जहाँ खुद को सबसे बड़े दल के रूप में देखने के बाद पहले सरकार बनाने के रूप में स्वीकारोक्ति चाह रही थी वहीं दोनों विपक्षी दलों ने अपनी संयुक्त सीटों की संख्या के आधार पर सरकार पहले बनाने का दावा पेश किया. ऐसी विषम स्थिति में गेंद राज्यपाल के पाले में आ गई थी. तमाम ऊहापोह के बाद कर्नाटक के राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. कांग्रेस जैसे पहले से ही तैयार बैठी थी, राज्यपाल का फैसला भाजपा के पक्ष में आते ही उसने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. देर रात तक चली तीन सदस्यीय पीठ ने येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार करते हुए शपथ ग्रहण का रास्ता खोल दिया.


बड़े दल के रूप में उभर कर आने के कारण राज्यपाल द्वारा भाजपा को पहले सरकार बनाने का आमंत्रण देना क्या वाकई संवैधानिक त्रुटि है? क्या वाकई ये लोकतान्त्रिक मूल्यों की हत्या है? क्या वास्तव में राज्यपाल के इस कदम को नैतिकता की हार कहा जायेगा? ऐसे और भी प्रश्न हैं जो अब भारतीय राजनैतिक पटल पर उभरने लगे हैं. यहाँ संविधान विशेषज्ञों की अपनी-अपनी राय है और लगभग सभी की राय में किसी भी राज्य में राज्यपाल द्वारा सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का आमंत्रण देना गलत नहीं है. ऐसा उस स्थिति में गलत कहा जा सकता है जबकि चुनाव पूर्व गठबंधन वाले दलों की संयुक्त सीटों की अधिक संख्या होने के बाद भी उन्हें सरकार बनाने के लिए न्यौता नहीं दिया जाता है. येदियुरप्पा को आमंत्रित करने के साथ ही चिर-परिचित भाजपा-विरोधी माहौल बनता दिखाई देने लगा.

इस विरोध के बीच कई घटनाओं, स्थितियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही बहुत से विश्लेषकों ने लगभग साबित कर दिया था कि वहां भाजपा को लाभ मिलने वाला नहीं है. असल में 2014 से लेकर अभी तक प्रत्येक छोटे-बड़े चुनाव में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा, चुनाव सर्वेक्षणों द्वारा मोदी छवि को ही आधार बनाया गया है. उनके इस तरह के विश्लेषण के पीछे पेट्रोल, डीजल की कीमतों की वृद्धि को, रुपये की कीमत में आती गिरावट को आधार बनाया जा रहा था. केंद्र सरकार को असफल दिखाने वाले विश्लेषकों ने रोजगार देने के मामले में भी केंद्र सरकार को पिछड़े पायदान पर दिखाया था. कोशिश ये रही कि कैसे न कैसे करके इन स्थितियों को कर्नाटक चुनाव से जोड़ते हुए ये साबित किया जाये कि वहां भाजपा की पराजय सुनिश्चित है.

ऐसे विश्लेषक जिनका विश्लेषण सिर्फ और सिर्फ पूर्वाग्रह पर आधारित रहता है वे किसी न किसी तरह भाजपा को कर्नाटक में हराते दिख रहे थे. इस तरह के विश्लेषणों के बाद कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस इसके लिए आश्वस्त हो गई थी कि कर्नाटक में वहां के मतदाता उसे ही चुनेंगे. कांग्रेस राज्य में अपनी पुनर्वापसी को लेकर पूर्णतः आश्वस्त हो गई थी. कर्नाटक में इन विश्लेषणों के उलट असलियत ये रही कि राज्य में विगत पांच वर्ष के शासन में ऐसी तमाम विसंगतियाँ उभर कर सामने आईं जिनसे जनता का मोह कांग्रेस से भंग हो गया था. मोदी छवि के सहारे भाजपा कर्नाटक में भले ही बहुमत का जादुई आँकड़ा न छू सकी हो किन्तु अपने पिछले प्रदर्शन से कहीं अधिक अच्छा प्रदर्शन कर सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई है.

राज्यपाल ने सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को आमंत्रित किया. येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ले ली. इसके बाद भी सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर 104 की संख्या को बढ़ाकर कैसे बहुमत के जादुई अंक तक ले जाया जायेगा? फ़िलहाल तो अभी सदन में बहुमत सिद्ध करने का कार्य बाकी है और जेडीएस की तरफ से भाजपा पर प्रति विधायक सौ करोड़ रुपये की पेशकश का आरोप भी लगाया जा चुका है. संवैधानिक विशेषज्ञों की राय के अनुसार कर्नाटक के राज्यपाल ने भले ही सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को बुलाकर संवैधानिक कदम ही उठाया है किन्तु कहीं न कहीं बहुमत के आँकड़े को छूने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का अवसर भी तो उपलब्ध करवाया है. ये कहकर कि पूर्व में कांग्रेस की ओर से भी इसी तरह की स्थितियाँ उत्पन्न करके सरकारें बनाई जाती रही हैं, विपक्षियों को रोका जाता रहा है कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है. सदन में भाजपा, येदियुरप्पा क्या सिद्ध करते हैं, ये समय के गर्भ में है पर कुल मिलाकर उनकी अग्नि-परीक्षा शुरू हो चुकी है.  

15 मई 2018

सियासी दाँव-पेंचों में उलझा कर्नाटक


कर्नाटक राज्य विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही बहुतेरे मीडिया केन्द्रों ने लगभग साबित सा कर दिया था कि वहां भाजपा को कोई लाभ होने वाला नहीं है. इस तरह के आकलन करने के पीछे उनके पास कोई ठोस नजरिया नहीं था और न ही कोई ठोस तथ्य मौजूद थे. कर्नाटक चुनाव का आकलन चुनाव विश्लेषकों द्वारा, मोदी-विरोधियों द्वारा, भाजपा-विरोधियों द्वारा उत्तर प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए गोरखपुर एवं फूलपुर लोकसभा उपचुनावों को आधार बनाकर किया जा रहा था. इन दोनों चुनावों में भाजपा हार गई थी और इनमें सपा-बसपा का गठबंधन विजयी रहा था. ऐसे में सभी ने ये स्वीकार सा कर लिया था कि यदि सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट हो जाये तो भाजपा को हराया जा सकता है. इसके साथ-साथ 2014 से लेकर अभी तक प्रत्येक छोटे-बड़े चुनाव में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा, चुनाव सर्वेक्षणों द्वारा मोदी छवि को ही आधार बनाया गया है. इस आधार को ऐसे लोग इस बार दरकता हुआ बताने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे थे. उनके इस तरह के विश्लेषण के पीछे पेट्रोल, डीजल की कीमतों की वृद्धि को, रुपये की कीमत में आती गिरावट को आधार बनाया जा रहा था. इसके अलावा जिस तरह से केंद्र सरकार ने नोटबंदी के तुरंत बाद जीएसटी को लागू किया, उससे ऐसा लगने लगा था कि देश का व्यापारी अवश्य ही केंद्र सरकार के खिलाफ विद्रोह करेगा. इन दो जगहों पर केंद्र सरकार को असफल दिखाने वाले विश्लेषकों ने रोजगार देने के मामले में भी केंद्र सरकार को पिछड़े पायदान पर दिखाया था. मोदी-विरोधियों द्वारा केंद्र सरकार की किसी भी योजना की, किसी भी कदम की सराहना करते नहीं दिखाया गया. देश भर में चलने वाले तथाकथित विरोध को कैसे न कैसे करके कर्नाटक चुनाव से जोड़ने की कोशिश करते हुए ये साबित किया जा रहा था कि वहां भाजपा की पराजय सुनिश्चित है.


आर्थिक स्तर पर ऐसी स्थितियों को बार-बार दिखाने वाले मोदी-विरोधियों द्वारा सफलता न मिलते देख कर कठुआ काण्ड की इबारत लिखी गई, जिन्ना तस्वीर का प्रकरण उठाया गया. इस तरह के मामले किसी न किसी तरह से भाजपा-विरोध में, मोदी-विरोध में उठाकर जनता के बीच लाया जा रहा था. इन सबके केंद्र में मुख्य रूप से कर्नाटक चुनाव ही बना हुआ था. ऐसे विश्लेषक जिनका विश्लेषण सिर्फ और सिर्फ पूर्वाग्रह पर आधारित रहता है वे किसी न किसी तरह भाजपा को कर्नाटक में हराते दिख रहे थे. इसके उलट असलियत ये है कि कर्नाटक में विगत पांच वर्ष के शासन में ऐसी तमाम विसंगतियाँ उभर कर सामने आईं जिनसे जनता का रुख भाजपा की तरफ हुआ. किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं हों, वहाँ पर भ्रष्टाचार होने का मुद्दा हो, राज्य का अलग झन्डा बनाये जाने का विचार हो, पेयजल की समस्या का होना हो या फिर चुनाव के ठीक पहले लिंगायत मुद्दे को हवा देना का मामला हो, सभी ने कांग्रेस को कई पायदान पीछे कर दिया था.

चुनाव रैलियों के दौरान जिस तरह से दोनों तरफ से बयानों के तीर छोड़े गए, उसमें अपनी उपलब्धियाँ कम बल्कि दूसरे की नाकामियां अधिक बताई गईं. मोदी के पक्ष में कहीं न कहीं केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजनायें, स्वच्छ भारत अभियान, अटल पेंशन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, स्टार्ट अप योजना, फसल बीमा योजना आदि भी काम करती दिख रही थीं. हाल ही में देश भर में विद्युतीकरण ने भी आम नागरिकों के मन में केंद्र सरकार की विकास नीति को गहरे से बैठा दिया था. इन योजनाओं के सहारे और मोदी छवि के सहारे भाजपा कर्नाटक में भले ही सरकार न बना सके किन्तु अपने पिछले प्रदर्शन से कहीं अधिक अच्छा प्रदर्शन कर सकेगी. इसके अलावा कांग्रेस प्रचारकों के पास वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री की सफलता गिनाने को भी नहीं थीं. ये स्पष्ट संकेत कर रहा था कि इन चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में अपनी सफलता की कहानी को दोहरा नहीं सकेगी. अपनी-अपनी योजनाओं की सफलता-असफलता के रथ पर चढ़कर चुनाव प्रचार में निकले मोदी के प्रति युवाओं के मन में अधिक आकर्षण, अधिक सम्मान देखने को मिल रहा था. कर्नाटक का आम मतदाता कर्नाटक की सरकारों के कार्यों का आपस में तुलनात्मक अध्ययन नहीं कर रहा था वरन उसके सामने वर्तमान कांग्रेस सरकार के पांच वर्षों के मुकाबले भाजपा के केंद्र में चार सालों का कार्य था. स्पष्ट है कि वे कार्य राज्य के कार्य पर भारी पड़े.

चुनाव परिणामों का आना अभी भी बना हुआ है. देर रात तक स्थिति स्पष्ट होगी कि कौन सरकार बनाएगा किन्तु चुनाव परिणामों से इतना स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा कर्नाटक में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आ रही है. बाकी सरकार बनाना इसी आँकड़ेबाजी के अधीन है. इसमें जो भी जादुई 113 का आँकड़ा छू लेगा वही जनता का प्रतिनिधित्व करने आगे आ जायेगा.