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17 अक्टूबर 2023

सिक्किम बाढ़ विभीषिका : जलवायु परिवर्तन से आया संकट

भीषण बाढ़ के रूप में जो त्रासदी सिक्किम पर पड़ी, उसे लेकर अब चिंतन-मनन चल रहा है कि इतनी बड़ी आपदा का कारण बादलों का फटना रहा या फिर कुछ और. पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम की तीस्ता नदी की बाढ़ में इस पर बना चुंगथांग बाँध बह गया. इसके साथ-साथ इस भीषण बाढ़ में ग्यारह पुल बह गए. एक अनुमान के अनुसार इस बाढ़ से बाईस हज़ार से ज़्यादा लोग प्रभावित बताए गए हैं. राज्य सरकार ने इस तबाही को प्राकृतिक आपदा घोषित कर दिया है. 


आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि तीस्ता नदी में विनाशकारी बाढ़ आ गई? इसका प्रथम दृष्टया कारण राज्य के उत्तर-पश्चिम में सत्रह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित दक्षिण लोनाक झील को बताया जा रहा है. लोनाक झील ग्लेशियर के पिघलने से बनी बड़ी हिमनद झील है. हिमनद के फटने से आई बाढ़, जिसे तकनीकी अर्थों में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) कहा जाता है, ने तबाही मचा दी. जब ग्लेशियरों से बनी झील अपने मोराइन जो बर्फ, रेत, तलछट, प्राकृतिक मलबे आदि से बनते हैं, से मुक्त हो जाती है तो ग्लेशियल झील टूट जाती है. परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में पानी बहने से विनाशकारी बाढ़ आती है. जलवायु परिवर्तन के कारण से विगत वर्षों में जीएलओएफ़ की घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है.




इस बाढ़ के पीछे दो कारणों पर विशेषज्ञों का ध्यान जा रहा है. इसमें एक तो बादलों का फटना अथवा भारी बारिश का होना है और दूसरा कारण नेपाल, दिल्ली सहित अनेक जगह आने वाले भूकंप हैं. भारी बारिश को लेकर मौसम विज्ञान विभाग का कहना है कि दक्षिणी सिक्किम में अवश्य भारी बारिश हुई किन्तु उत्तरी सिक्किम में ऐसा कुछ नहीं रहा. भारी बारिश से इतर भूकंप को जीएलओएफ के लिए जिम्मेवार माने जाने सम्बन्धी अटकलें इसलिए व्यक्त की जा रही हैं क्योंकि लोनाक झील और भूकंप केंद्र के बीच मात्र सात सौ किमी की दूरी है. संभव है कि नेपाल और दिल्ली में आये भूकम्पों की श्रृंखला ने एक ट्रिगर का काम किया हो.


सिक्किम में आई इस बाढ़ के पीछे कारण कुछ भी रहा हो मगर ये सत्य है कि जलवायु परिवर्तनों की इसमें बहुत बड़ी भूमिका है. ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी सिक्किम में स्थित दक्षिण लोनाक ग्लेशियर कथित तौर पर सबसे तेजी से पीछे हटने वाले ग्लेशियरों में से एक है. 1962 से 2008 तक 46 वर्षों में यह ग्लेशियर अपने स्थान से लगभग दो किमी पीछे चला गया. इस कारण इसका क्षेत्रफल भी बढ़ता जा रहा था. वर्ष 1990 में जब इसमें पानी भरना आरम्भ हुआ तो उस समय मात्र सत्रह हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली इस झील का विस्तार लगभग 168 हेक्टेयर में हो चुका था. स्पष्ट है कि इस पीछे हटने से बनी झील में पानी की मात्रा लगातार बढ़ती रही. एक अनुमान के अनुसार जिस समय लोनाक झील टूटी, उसमें छह हजार करोड़ लीटर पानी था.


राज्य सरकार ने इस तबाही को प्राकृतिक आपदा घोषित कर दिया है. बचाव कार्य चल रहे हैं. त्रासदी के कारण भी तलाशे जा रहे हैं. इन सबके बीच सबसे आवश्यक कदम पर्यावरण संरक्षण को लेकर उठाने सम्बन्धी है. इसके साथ-साथ संवेदनशील क्षेत्रों में हिमनद झीलों की वृद्धि और स्थिरता पर नज़र रखने के लिये एक व्यापक निगरानी प्रणाली की स्थापना करना भी आवश्यक है. उपग्रह, ड्रोन आदि के द्वारा इन  झीलों की स्थिति का, उनकी जल मात्रा का नियमित आकलन किया जाना चाहिए. प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, बाढ़ सुरक्षा उपायों, सुरक्षात्मक अवरोधों, जनजागरूकता, निचले प्रवाह क्षेत्रों में निकासी प्रक्रियाओं, सुरक्षा उपायों को मजबूत किया जाये. ऐसी घटनाओं से सबक लिया जाये न कि महज एक हादसा मानकर भुला दिया जाये. 





 

11 जुलाई 2023

जनसंख्या सिद्धांत और प्राकृतिक आपदाओं का सह-सम्बन्ध

प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है. बढ़ती जनसंख्या के चलते बनने वाले दबाव और उसके द्वारा उत्पन्न होने वाले नुकसानों पर भी चर्चा की जाती है. इस वर्ष जनसंख्या के सम्बन्ध में चर्चा करना इस कारण भी महत्त्वपूर्ण समझ आ रहा है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषित आँकड़ों के अनुसार भारत ने 1428.6 मिलियन की जनसंख्या के साथ चीन (1425.7 मिलियन) को पीछे छोड़ दिया है. स्पष्ट सी बात है कि बढ़ती जनसंख्या से प्राकृतिक संसाधनों का भी ज्यादा दोहन होगा. इन संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से सतत विकास की प्रक्रिया भी अवरुद्ध होती है. देश की बहुतायत जनसंख्या का कृषि पर निर्भर होने के कारण कृषि क्षेत्र पर भी भार बढ़ेगा. कृषि विकास बाधित होगा, प्रति व्यक्ति आय में नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, नागरिकों के हितों की सुरक्षा पर भी संकट आएगा, इसके साथ ही साथ प्राकृतिक आपदाओं के आने की आशंका बढ़ेगी.  




बढ़ती जनसंख्या के बीच बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं वाली बात शायद आश्चर्य सा जगाये किन्तु जनसंख्या सिद्धांत के द्वारा इसे स्पष्ट किया जा चुका है. जनसंख्या का सम्बन्ध सदैव से उपलब्ध संसाधनों से रहा है. जनसंख्या और संसाधन के बीच यह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अनेकानेक सिद्धांत प्लेटो के समय से सामने आते रहे हैं. इन सिद्धांतों में दो तरह के सिद्धांत सामने आये. पहला, प्राकृतिक सिद्धांत और दूसरा, सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत. जिस जनसंख्या सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व मिला, उसे थॉमस राबर्ट माल्थस द्वारा प्रतिपादित किया गया था. इसे प्राकृतिक सिद्धांत में शामिल किया जाता है. माल्थस ब्रिटेन के निवासी थे तथा इतिहास तथा अर्थशास्त्र विषय के ज्ञाता थे. इन्होंने अपने एक निबंध प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन में एक तरफ जनसंख्या की वृद्धि एवं जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का तथा दूसरी तरफ सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिवर्तनों का उल्लेख किया. यह निबंध वर्ष 1798 में प्रकाशित भी हुआ था. माल्थस ने अपने निबंध में संसाधन शब्द के स्थान पर जीविकोपार्जन के साधन का प्रयोग किया था. उन्होंने विचार दिया कि मानव में जनसंख्या बढ़ाने की क्षमता बहुत अधिक है और इसकी तुलना में पृथ्वी में मानव के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाने की क्षमता कम है. उनके अनुसार जनसंख्या वृद्धि गुणोत्तर श्रेणी या ज्यामितीय रूप में होती है अर्थात जनसंख्या 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64... की दर से बढ़ती है. इसके उलट जीविकोपार्जन के साधन समान्तर श्रेणी या अंकगणितीय रूप में अर्थात 1, 2, 3, 4, 5, 6... की दर से बढ़ते हैं. 


ऐसी आनुपातिक स्थिति के चलते माल्थस का मानना था कि उत्पादन चाहे कितना भी बढ़ जाए, जनसंख्या की वृद्धि दर उससे सदा ही अधिक रहेगी. उन्होंने जनसंख्या एवं संसाधनों की अनुपात की तीन अवस्थाओं को बताया. पहली, जब संसाधन उपलब्ध जनसंख्या की तुलना में अधिक हो; दूसरी, जब संसाधन और जनसंख्या दोनों लगभग समान हो और तीसरी, जब संसाधन के तुलना में जनसंख्या अधिक हो. पहली और दूसरी स्थिति में जनसंख्या के कम अथवा समान होने के कारण जनसंख्या संबंधी समस्याओं की पहचान नहीं हो पाती लेकिन तीसरी स्थिति में, जबकि जनसंख्या संसाधनों से अधिक होती है तब जनसंख्या वृद्धि एक भयावह चुनौती के रूप में सामने आती है. इस स्थिति में जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच की खाई अधिक बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप पूरा समाज अमीर और गरीब में विभाजित हो जाता है. इसी के चलते पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो जाती है. इस अवस्था में खाद्यान्न संकट वृहद स्तर पर उत्पन्न होता है और जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की समस्या प्रमुख हो जाती है. संसाधनों पर अधिक दबाव की स्थिति में भुखमरी, महामारी, युद्ध और प्राकृतिक आपदा की स्थिति उत्पन्न होने लगती है. ऐसी स्थिति के कारण हुई मौतों के पश्चात् जनसंख्या में कमी आती है अर्थात जनसंख्या प्रकृति द्वारा नियंत्रित हो जाती है और पहली अथवा दूसरी  अवस्था में जाने लगती है. 


उनका स्पष्ट मत था कि जनसंख्या को यदि नियंत्रित न करके जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित नहीं किया जाता है तो प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित लेती है. जनसंख्या नियंत्रण के इन कारणों को माल्थस ने सकारात्मक उपाय कहा है. इसके साथ-साथ माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए इन सकारात्मक उपायों के अतिरिक्त भी नियंत्रण के प्रभावी उपाय किए जाने पर जोर दिया. उनका कहना था कि यदि मनुष्य स्वयं ही ब्रह्मचर्य का पालन, आत्मसंयम, देर से विवाह और विवाह के बाद भी आत्मसंयम जैसे नैतिक उपायों पर जोर दे तो न ही जनाधिक्य की स्थिति उत्पन्न होगी और न ही जनसंख्या विस्फोट की स्थिति होगी. यदि उक्त सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में विगत एक दशक की प्राकृतिक घटनाओं पर ही नजर डालें तो समझ आएगा कि लगभग समूचा विश्व अपने आपमें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में लगातार आता रहा है. जंगलों की आग, सूनामी जैसी स्थिति, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, सार्स, इबोला, मर्स आदि महामारियाँ, चक्रवाती तूफ़ान आदि-आदि ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ हैं जिनके द्वारा संभव है कि प्रकृति समय-समय पर जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित कर रही हो. कहीं यह प्रकृति द्वारा संतुलन बनाने का प्रयास तो नहीं?


कुछ भी हो मगर यह सत्य है कि जब-जब जनसंख्या उपलब्ध संसाधनों से अधिक होगी तो अराजकता की स्थिति आएगी. सामानों, उत्पादों के लिए लूट मचेगी. सक्षम लोगों तक इनकी उपलब्धता हो सकेगी जो इससे वंचित रहेंगे वे भुखमरी, कुपोषण आदि का शिकार होंगे. स्पष्ट है कि प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित कर लेगी. हम सभी को जनसंख्या नियंत्रण के उपायों पर गम्भीर होना ही होगा. यदि ऐसा नहीं कर सके तो आने वाला समय लगातार ऐसी ही किसी न किसी महामारी का, विभीषिका का शिकार बनता रहेगा.

 







 

03 जून 2021

प्राकृतिक आपदाओं का माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत से सह-सम्बन्ध

सकल विश्व वर्तमान में एक चीनी वायरस, कोरोना की चपेट में आया हुआ है. यद्यपि इस सम्बन्ध में यूरोप की कुछ प्रयोगशालाओं द्वारा इसके प्राकृतिक वायरस होने की बात कही गई है तथापि इस थ्योरी पर कोई विश्वास नहीं कर रहा है. इस अविश्वास का कारण स्वयं चीन है. बहरहाल, अभी इस पर चर्चा नहीं. आज हम चर्चा करते हैं जनसंख्या सिद्धांत की. जनसंख्या का सम्बन्ध सदैव से उपलब्ध संसाधनों से रहा है. जनसंख्या और संसाधन के बीच यह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अनेकानेक सिद्धांत प्लेटो के समय से सामने आते रहे हैं. इन सिद्धांतों में दो तरह के सिद्धांत सामने आये. पहला, प्राकृतिक सिद्धांत और दूसरा, सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत. जिस जनसंख्या सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व मिला, उसे थॉमस राबर्ट माल्थस द्वारा प्रतिपादित किया गया था. इसे प्राकृतिक सिद्धांत में शामिल किया जाता है.



माल्थस ब्रिटेन के निवासी थे तथा इतिहास तथा अर्थशास्त्र विषय के ज्ञाता थे. इन्होंने अपने एक निबंध प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन (Principle of Population) में एक तरफ जनसंख्या की वृद्धि एवं जनसांख्यिकीय परिवर्तनों (demographic changes) का तथा दूसरी तरफ सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिवर्तनों का उल्लेख किया. यह निबंध वर्ष 1798 में प्रकाशित भी हुआ था. माल्थस ने अपने निबंध में संसाधन शब्द के स्थान पर जीविकोपार्जन के साधन का प्रयोग किया था. उन्होंने विचार दिया कि मानव में जनसंख्या बढ़ाने की क्षमता बहुत अधिक है और इसकी तुलना में पृथ्वी में मानव के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाने की क्षमता कम है. उनके अनुसार जनसंख्या वृद्धि गुणोत्तर श्रेणी या ज्यामितीय रूप (Geometrical Progression) में होती है अर्थात जनसंख्या 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 128, 256... की दर से बढ़ती है. इसके उलट जीविकोपार्जन के साधन समान्तर श्रेणी या अंकगणितीय रूप (Arithmetic Progression) में अर्थात 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9... की दर से बढ़ते हैं. 

वे अपने सिद्धांत में मानते थे कि प्रत्येक 25 वर्षों के बाद जनसंख्या दुगनी हो जाती है. इस स्थिति के अनुसार वे आकलन करके बताते हैं कि दो सौ वर्षों में जनसंख्या और संसाधनों में 256 तथा 9 का अनुपात हो जाता है अर्थात दो सौ वर्षों में जनसंख्या में 256 इकाइयों की वृद्धि होती है जबकि संसाधनों में मात्र 9 इकाइयों की. यदि यह बिना नियंत्रण के आगे बढ़ता रहे तो यह अंतर लगभग अनिश्चित हो जायेगा. इस तरह की स्थिति के कारण जनसंख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि उसका भरण-पोषण लगभग असंभव हो जायेगा. इसके चलते भुखमरी, कुपोषण सहित अन्य समस्याओं का जन्म होता है.

ऐसी आनुपातिक स्थिति के चलते माल्थस का मानना था अतः उत्पादन चाहे कितना भी बढ़ जाए, जनसंख्या की वृद्धि दर उससे सदा ही अधिक रहेगी. उन्होंने जनसंख्या एवं संसाधनों की अनुपात की तीन अवस्थाओं को बताया.

1- जब संसाधन उपलब्ध जनसंख्या की तुलना में अधिक हो.
2- जब संसाधन और जनसंख्या दोनों लगभग समान हो.
3- जब संसाधन के तुलना में जनसंख्या अधिक हो.

पहली और दूसरी स्थिति में जनसँख्या के कम अथवा समान होने के कारण जनसंख्या संबंधी समस्याओं की पहचान नहीं हो पाती लेकिन तीसरी स्थिति में, जबकि जनसंख्या संसाधनों से अधिक होती है तब जनसंख्या वृद्धि एक भयावह चुनौती के रूप में सामने आती है. इस स्थिति में जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच की खाई अधिक बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप पूरा समाज अमीर और गरीब में विभाजित हो जाता है. इसी के चलते पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो जाती है. इस अवस्था में खाद्यान्न संकट वृहद स्तर पर उत्पन्न होता है और जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की समस्या प्रमुख हो जाती है. संसाधनों पर अधिक दबाव की स्थिति में भुखमरी, महामारी, युद्ध और प्राकृतिक आपदा की स्थिति उत्पन्न होने लगती है. ऐसी स्थिति के कारण हुई मौतों के पश्चात् जनसंख्या में कमी आती है अर्थात जनसंख्या प्रकृति द्वारा नियंत्रित हो जाती है और पहली अथवा दूसरी  अवस्था में जाने लगती है. 


उनका स्पष्ट मत था कि जनसंख्या को यदि नियंत्रित न करके जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित नहीं किया जाता है तो प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित लेती है. जनसंख्या नियंत्रण के इन कारणों को माल्थस ने सकारात्मक उपाय कहा है. इसके साथ-साथ माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए इन सकारात्मक उपायों के अतिरिक्त भी नियंत्रण के प्रभावी उपाय किए जाने पर जोर दिया. उनका कहना था कि यदि मनुष्य स्वयं ही ब्रह्मचर्य का पालन, आत्मसंयम, देर से विवाह और विवाह के बाद भी आत्मसंयम जैसे नैतिक उपायों पर जोर दे तो न ही जनाधिक्य की स्थिति उत्पन्न होगी और न ही जनसंख्या विस्फोट की स्थिति होगी.

यदि उक्त सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में विगत एक दशक की प्राकृतिक घटनाओं पर ही नजर डालें तो समझ आएगा कि लगभग समूचा विश्व अपने आपमें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में लगातार आता रहा है. जंगलों की आग, सूनामी जैसी स्थिति, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, सार्स, इबोला, मर्स आदि महामारियाँ, चक्रवाती तूफ़ान आदि-आदि ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ हैं जिनके द्वारा संभव है कि प्रकृति समय-समय पर जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित कर रही हो. वर्तमान में कोरोना वायरस को इसी रूप में देखा जा सकता है. इसकी पहचान होने के समय मौसम के प्रभावी होने की बात करते हुए कहा जा रहा था कि कोरोना वायरस गर्म क्षेत्रों में ज्यादा समय तक जिन्दा नहीं रहता है. यदि एकबारगी इसे सच मान लें तो हम सभी देख रहे हैं कि आज, मार्च की समाप्ति के बाद भी देश में गर्मी नहीं पड़ी है. लगभग हर दूसरे-चौथे दिन यहाँ बारिश होने के चलते मौसम ठंडा हो जा रहा है. कहीं यह प्रकृति द्वारा संतुलन बनाने का प्रयास तो नहीं?

कुछ भी हो मगर यह सत्य है कि जब-जब जनसंख्या उपलब्ध संसाधनों से अधिक होगी तो अराजकता की स्थिति आएगी. सामानों, उत्पादों के लिए लूट मचेगी. सक्षम लोगों तक इनकी उपलब्धता हो सकेगी जो इससे वंचित रहेंगे वे भुखमरी, कुपोषण आदि का शिकार होंगे. स्पष्ट है कि प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित कर लेगी. वर्तमान कोरोना परिदृश्य में, भले ही यह चीन द्वारा निर्मित वायरस है, हम सभी को जनसँख्या नियंत्रण के उपायों पर गम्भीर होना ही होगा. यदि ऐसा नहीं कर सके तो आने वाला समय लगातार ऐसी ही किसी न किसी महामारी का, विभीषिका का शिकार बनता रहेगा.


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19 मई 2020

हताशा, निराशा, कुंठा तो आपने ओढ़ ही ली है

अचानक से परिवार के सामने ऐसी स्थिति आ जाये जो कभी सोची न हो, जैसी स्थिति कभी सामने आई न हो तो क्या स्थिति होती है दिमाग की? किसी पारिवारिक आपदा के समय अचानक से ऐसा निर्णय लेना पड़ जाये जो किसी एक-दो व्यक्तियों के लिए नहीं वरन सम्पूर्ण परिजनों पर प्रभाव डालेगा तो उस समय आपकी क्या हालत होती है? कभी विचार किया है कि अपने परिवार के किसी ख़ुशी के समारोह की तैयारी भी हम सभी सूचीबद्ध तरीके से करते हैं उसके बाद भी अंतिम समय में कोई न कोई चूक हो जाती है. कभी कोई सामान कम पड़ जाता है, कभी कोई सामान लाना भूल जाया जाता है. ऐसा तब होता है जबकि आप ख़ुशी का कार्यक्रम संपन्न कर रहे हों. याद करिए, आपके साथ भी हुआ होगा जबकि किसी कार्यक्रम से सम्बंधित निमंत्रण/आमंत्रण पत्र बाँटने पड़े हों. कई-कई बार की सूची बनाने के बाद, कई-कई लोगों से जानकारी लेने के बाद भी आपका कोई नजदीकी अवश्य ही छूट गया होगा. चलिए नजदीकी न सही कोई न कोई ऐसा रह गया होगा उस आमन्त्रण पत्र पाने से जिसे आप न्यौता देना चाहते थे. ऐसा तब हो जाता है जबकि आप सबकुछ एक प्लानिंग के द्वारा करते हैं.


अब इसी सन्दर्भ में एक  बार केन्द्र सरकार के बारे में अथवा किसी भी राज्य सरकार के बारे में विचार करिए. क्या आपने कभी सोचा था कि लॉकडाउन जैसी स्थिति इस देश में आएगी? क्या आपने कभी विचार किया था कि एक दिन ऐसा आएगा जबकि आपको बाहर से आने के बाद अपने ही परिजनों से दूर रहना पड़ेगा? इससे पहले बहुत से लोगों ने देश में युद्ध की स्थिति के समय को देखा होगा, झेला होगा मगर वह वक्त भी इतना भयावह नहीं था. उस समय आपके घर के बगल में दुश्मन की गोली चलने का, बम फूटने का भय नही हुआ करता था. आपके किसी के छू लेने से आपको गोली लगने का डर नहीं हुआ करता था. आज इसके ठीक उलट है. आपको किसी व्यक्ति से ही नहीं बल्कि किसी सामान से भी संक्रमित होने का खतरा है. किसी के छींकने, थूकने से भी आपको खतरा है. ऐसे में विचार करिए कि जिस आपने पहली बार कोरोना के संक्रमण की खबर सुनी थी, क्या आपने उस समय भी लॉकडाउन के बारे में विचार किया था?


अब आपके सामने दो महीने के आसपास की स्थिति है. आप घर पर बैठे टीवी, मोबाइल पर अपनी विद्वता पेलने में लगे हैं. इसी सबको देखते हुए अब आप सरकारों को सलाह देने के काबिल हो गए हैं. सरकारों के कदमों की आलोचना करने लायक हो गए हैं. ये ठीक वैसा ही है जैसे आप अपने सोफे में धँसे, कुछ न कुछ अपने हलक में उतारते हुए किसी बल्लेबाज को गेंद खेलने का तरीका बताने लगते हैं, किसी गेंदबाज को गेंद फेंकने का तरीका समझाने लगते हैं. कभी विचार किया है कि मैदान पर पिच के ऊपर खड़े बल्लेबाज को किस गति की गेंद का सामना करना पड़ता है? नहीं न, क्योंकि आपको महज अपना मुँह चलाने की विशेषज्ञता हासिल है.

आपके परिवार में एक व्यक्ति गंभीर बीमारी का शिकार हो जाता है तब आपके होश उड़ जाते हैं. बहत्तर लोगों से विचार करते हैं मगर समझ नहीं पाते हैं कि कौन से डॉक्टर को दिखाया जाये? कौन सा इलाज करवाया जाये? कहाँ ले जाया जाये? हर एक बार निर्णय लेने के बाद उससे उपजे परिणामों को देखने के बाद आप अगला कदम उठाते हैं. कभी विचार किया है कि आप महज एक व्यक्ति के इलाज को लेकर किस स्थिति तक परेशान होते हैं? इस समय आप सरकारों के निर्णयों को लेकर हमलावर हो सकते हैं क्योंकि आप अपने घर में सुरक्षित हैं. ऐसा इसलिए भी कर सकते हैं क्योंकि आप किसी रूप में खुद को सरकारी क़दमों में सहयोगी नहीं मान रहे हैं.

ये इस देश की सबसे बुरी स्थिति है, यहाँ चाहे ख़ुशी का अवसर हो या फिर दुःख का, कोई सामान्य सी स्थिति है या फिर आपदा की आपको सरकारों के निर्णयों में बस कमी ही दिखाई देती है. ऐसा इसलिए क्योंकि आपके लिए घटनाओं को देखने के बाद उनका विश्लेषण करने की कला आती है. कभी विचार किया है कि इसी देश की सरकारों ने सुनामी जैसी विभीषिका से आपको सुरक्षित बनाये रखा. कभी सोचा है कि केदारनाथ की भयंकर आपदा में भी सरकारों ने आपके लोगों को सुरक्षित रखा. कभी ध्यान दिया कि ऐसी अनेक आपदाओं से आपको या फिर आपके नजदीकी लोगों को बचाए रखा. ऐसी-ऐसी जगह सरकारों द्वारा बचाव कार्य सफलतापूर्वक पूरे किये गए जहाँ आप सामान्य दिनों में जाने की सोचकर भी काँप जाएँ.

फिर विचार करिए अपनी मानसिकता पर कि कहीं आप बौद्धिक रूप से हताश तो नहीं? सोचिये कि कहीं आप विरोध करते रहने की मानसिकता के चलते अवसाद में तो नहीं जा चुके हैं? अपनी स्थिति को देखिये और विचार करिए कि कहीं आप पर कुंठित पागलपन तो हावी नहीं हो चुका है? देखिये और सोचिये, ये सब सही है क्योंकि इस पोस्ट के बाद अभी और न जाने क्या-क्या बकने वाले हैं. फिर विचार करिए कि सरकारें जो कर रही हैं वो अलग, आप ऐसा क्या कर रहे हैं जिससे ये देश आपका ऋणी रहे, ये देशवासी आपका एहसान मानें? सोचियेगा, अन्यथा हताशा, निराशा, कुंठा तो आपने ओढ़ ही ली है.

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12 अगस्त 2017

दोषियों पर तत्काल सख्त कार्यवाही हो

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. ये सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही का मामला है. इस घटना का कारण बताया जा रहा है कि मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों के वार्ड में लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित हुई थी. ऐसा बताया गया कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का लाखों रूपया बकाया होने के बाद उसके द्वारा सप्लाई रोकने की बात भी कही जा चुकी थी. ऐसी स्थिति के बाद भी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा उसके बकाया का भुगतान न करना, ऑक्सीजन की व्यवस्था करने के उपाय न करना आदि दर्शाता है कि वह किस स्तर तक लापरवाह बना हुआ है. इसी मामले में प्रबन्ध तंत्र की तरफ से विशुद्ध लीपापोती होती दिख रही है. उसके द्वारा जानकारी सार्वजनिक की जा रही है कि लिक्विड ऑक्सीजन की किसी भी तरह कमी नहीं थी. कोई भी मौत इसकी कमी से नहीं हुई. ये भी अपने आपमें विशुद्ध गैर-जिम्मेवाराना हरकत है. एक पल को मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में कोई भी मौत लिक्विड ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई पर इससे कैसे इंकार किया जायेगा कि वहाँ तीस बच्चों की मृत्यु हुई है.


इस घटना का संज्ञान बहुत ही संवेदनशीलता से इसलिए भी लिया जाना चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं इस घटना के एक दिन पहले मेडिकल के दौरे पर थे. वैसे तो मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका अपने गृहनगर गोरखपुर में ये सातवाँ दौरा था किन्तु इस बार का दौरा उन्होंने विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही किया था. खुद इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से घंटों मुलाकात करने के बाद उन्होंने इसके इलाज से सम्बंधित सभी पक्षों, सुविधाओं, दवाइयों आदि की जानकारी लेने के लिए एक लम्बी मीटिंग भी की थी. इसके बावजूद इस तरह की घटना बताती है कि अकर्मण्य और गैर-जिम्मेवार अधिकारीयों, प्रशासन पर अपने मुख्यमंत्री का भी असर नहीं है. प्रथम दृष्टया ये मामला भले ही चिकित्सकीय सेवाओं, सुविधाओं में लापरवाही का दिखाई देता हो मगर यदि जरा सी गंभीरता से विचार किया जाये तो आसानी से समझ आ जायेगा कि इसके पीछे कितनी बड़ी प्रशासनिक लापरवाही है. दरअसल भाजपा द्वारा प्रशासनिक कार्यप्रणाली को सुचारू बनाने, उसे पारदर्शी बनाने, अधिकारियों को निर्भय होकर काम करने देने की एक प्रणाली विक्सित करने का प्रयास किया गया. इसी क्रम में प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से शीर्ष नेतृत्व की तरफ से प्रशासन को, अधिकारियों को स्वतंत्रता से कार्य करने को कहा जा रहा है. भाजपा द्वारा अपने विधायकों, पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं को भी रोका गया है कि वे प्रशासनिक अधिकारियों पर किसी तरह का दबाव न बनायें. इस तरह के निर्देशों से प्रशासनिक अधिकारियों में कार्य के प्रति जवाबदेही आणि चाहिए थी वो न आने के बजाय निरंकुशता आ रही है. अभी भी बहुतायत में वे अधिकारी काम कर रहे हैं जो पिछली सरकार के प्रिय बने हुए थे. ऐसे में उनके द्वारा न केवल भाजपा पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं की अवहेलना की जा रही है वरन जनता के हितों को भी अनदेखा किया जा रहा है.


देखा जाये तो गोरखपुर की ये ह्रदयविदारक घटना इसी स्वतंत्रता का दुष्परिणाम है. सोचने वाली बात है कि प्रशासनिक अधिकारी इस कदर स्वतंत्र हो गए हैं कि महज एक दिन पहले मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन करना भी उनको उचित न लगा. यदि ऑक्सीजन की सप्लाई किसी कारण से बाधित होने की आशंका थी तो इसके लिए पहले से समुचित प्रबन्ध क्यों नहीं किये गए थे? वे भी तब जबकि इस बीमारी से भर्ती होने वालों में बच्चों की संख्या ज्यादा था. गोरखपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा जानकारी देने के बाद भी बकाया चुकता करवाने, लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई सुचारू करवाने की तरह क्यों नहीं ध्यान दिया? बच्चों की मृत्यु के बाद जिस तरह की सजगता वहाँ का प्रशासन दिखाने में लगा है यदि उसका शतांश भी पूर्व में दिखा लिया होता तो संभवतः बच्चों को बचा लिया गया होता. अब भले ही चिकित्सालय प्रबंधन अपने आपको सही सिद्ध करने के लिए किसी भी तरह की लीपापोती करे; सरकार अपने बचाव के लिए चाहे कुछ कहती रहे मगर कटुसत्य यही है कि बच्चों को वापस नहीं आना है. इस मामले में स्वयं मुख्यमंत्री योगी जी को विशेष रूप से संज्ञान लेते हुए न केवल चिकित्सकीय लापरवाही के बल्कि अन्य दूसरे पक्षों की भी जाँच करवानी चाहिए. जिस तरह से देश-प्रदेश में भाजपा-विरोधी माहौल उसके विरोधियों द्वारा बनाया जा रहा है; जिस तरह से असहिष्णुता जैसे शब्द के द्वारा लोगों में डर-भय का वातावरण बनाया जा रहा है; जिस तरह से शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति भी गैर-जिम्मेवाराना बयान देने लगता है उससे इस घटना के पीछे किसी तरह की साजिश से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. इसलिए स्वयं योगी जी द्वारा सम्पूर्ण घटनाक्रम का गंभीरतापुर्वक संज्ञान लेते हुए सभी गैर-जिम्मेवार लोगों पर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए. अन्यथा की स्थिति में न केवल उनकी कार्यप्रणाली पर धब्बा लगेगा बल्कि विपक्षियों को इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने का अवसर हाथ लगेगा, जो कम से कम इस समय कदापि उचित नहीं होगा.  

28 मई 2016

रोते, सिसकते तन्हा गाँव

शाम का धुंधलका होते ही घर के पास बने कुंए से पानी खींचना और घर के सामने की जगह पर छिड़क कर जमीन की गर्मी, धूल को दबाने का काम शुरू हो जाता. कई-कई बाल्टी पानी खींचना, कई-कई बार का चक्कर लगाना, जमीन की दिन भर की गर्मी को शांत करने की सफल कोशिश के बाद मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक से मन झूम जाता. चारपाई बिछाने का काम भी होने लगता. कोई अपनी चटाई बिछाकर पहले से अपनी जगह को घेरने लगता. फैलते अंधियारे में कभी चाँद की चाँदनी तो कभी लालटेन की रौशनी फैलाती दिखती. इसी रौशनी के सहारे आसपास के बुजुर्ग, युवा, बच्चे, पुरुष, महिलाएँ अपने-अपने झुण्ड बनाकर विस्तार में फैली जगह में चहचाहट भर रहे होते. घर के सामने बने विशाल चबूतरे पर रामचरित मानस का नियमित पाठ होता, उसे नियमित सुनने वाले भी अपनी-अपनी जगह पर बैठे होते. बच्चों की शरारतों, युवाओं के ठहाकों, महिलाओं की रुनझुन करती हँसी के साथ-साथ मानस की चौपाइयों की स्वर-लहरी भक्तिमय रूप में घुलती रहती. शाम का धुंधलका घहराते-घहराते रात में बदलता जाता. गली भर में, चबूतरों पर, नीम के पेड़ों के नीचे पाए जाते झुण्ड भी परिवर्तित होते रहते. लोगों की जगह बदलती रहती, बैठने का स्थान बदलता रहता, आपसी वार्तालाप का विषय बदलता रहता. कभी एकदम से चिल्ला-चोट, कभी संशय भरी खुसफुसाहट, कभी ठहाके तो कभी नितांत ख़ामोशी सी.

रात में अँधेरे में सिमटती जाती अपनी-अपनी दुनिया में निमग्न ये छोटे-छोटे समूह चलायमान भी बने रहते. कुछ के घर से भोजन कर लेने की पुकार उठती. कुछ भोजन करके ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बनते, कुछ समूह का हिस्सा बने लोगों को अपने साथ ले जाकर भोजन का आनंद उठाते. कुछ ज्यादा ही मनमौजी टाइप के लोग अपनी थाली सहित सबके बीच ही प्रकट हो जाते. एक थाली, कई-कई हाथ, न जाति का पूछा जाना, न बड़े-छोटे का भान. छोटे-छोटे कौर परमानन्द की प्राप्ति कराते हुए थाली के भोजन को समाप्त करते जाते. थाली खाली होने के पहले ही भर जाती. कभी इस घर से सूखी सब्जी आ जाती तो कभी उस घर की रसीली सब्जी का स्वाद मिलता. कहीं से दाल आकर लोगों को ललचाती तो कहीं से तीखा अचार आकर चटखारे बढ़ा देता. अनौपचारिक रूप से सब एक-दूसरे से हिले-मिले कहानी, किस्सों, लोकगीतों के हिंडोले पर कब नींद के आगोश में खो जाते, पता ही नहीं चलता. ऐसा नहीं कि रातें ही ऐसे खुशगवार गुजरती वरन सुबह से लेकर शाम आने तक जिंदगी ऐसे ही खुशगवार तरीके से गुजरती. दिन भर धूप की, गर्मी की चिंता से मुक्त कभी खलिहान, कभी बगिया की सैर. कभी नीम के झोंके पकड़ने की होड़ में झूलों की पेंग कभी तालाब की गहराई नापने की होड़ तो कभी बम्बा की धार को पीछे छोड़ने की सनक. आम, अमिया पर निशाना साधने को फेंके जाते पत्थर; तरबूज-खरबूज को एक मुक्के से तोड़ने की प्रतियोगिता दिन-दिन भर बच्चों के बीच चलती रहती.


गर्मी हो या सर्दी, सभी मौसम में बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक की एकसमान गतिविधियाँ. सभी की सहयोगात्मक स्थिति. सभी के बीच प्रेम, स्नेह, सौहार्द्र का गुलशन लगातार महकता रहता. बच्चों से लेकर बड़ों तक अपनापन दिखाई देता. किसी के बीच किसी तरह भेदभाव समझ नहीं आता. घर की चौखटों पर कोई प्रतिबन्ध न दिखाई देता. गलियाँ चहकती-महकती रहती. समय ने बहुत कुछ बदल दिया. इंसानों को भी बदला. गाँवों की संस्कृति को भी बदला. खेतों, खलिहानों, बगीचों, गलियों की मिट्टी की सुगंध को बदला. नीम के पेड़ों पर पड़े झूलों को बदला, तालाबों, नदियों, बम्बों के पानी को बदला. गुलजार रहने वाले खेत, खलिहान, बगीचे, गलियाँ अब सुनसान से दिखाई देते हैं. चबूतरे वीरान हैं, नीम तन्हा खड़े हैं, झूले खामोश लटके हैं, गलियों में सुगन्धित मिट्टी की जगह सीमेंट की गर्मी उड़ रही है. एक थाली में भोजन की परम्परा की जगह घर के आँगन में दीवार खिंची है. अपनेपन की जगह स्वार्थ दिखाई देने लगा है. प्रेम-स्नेह की जगह वैमनष्यता ने ले ली है. अब न दिन चहकते दिखते हैं और न ही रातें गुलज़ार दिखती हैं. कुँओं की जगत पर खिलखिलाहट नहीं सुनाई देती. गली के मकानों से भोजन कर जाने की आवाजें भी नहीं उठती. सब अपने-अपने में मगन हैं. सब अपने-अपने घरौंदों में सिमटे हैं. कभी चहकता-महकता दिखता गाँव तन्हा है, खामोश है. अपने में सिसकता है, अपने में रोता है किन्तु अब उसके आँसू देखने वाला कोई नहीं, उसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं, उसके हालचाल जानने वाला कोई नहीं. 

26 अप्रैल 2016

भयावह जल-संकट की स्थिति में बुन्देलखण्ड

पानी के लिए लगभग समूचे देश में हाहाकार मचा हुआ है. इस हाहाकार में सर्वाधिक बुरी स्थिति में बुन्देलखण्ड क्षेत्र दिखाई दे रहा है. अब तो नित्य ही खबरें सामने आ रही हैं जिनसे ज्ञात हो रहा है कि कई-कई इलाकों में तो दसियों दिन से पानी की एक बूँद के दर्शन भी नहीं हुए हैं. कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ भूगर्भीय जल स्तर पिछले वर्षों के मुकाबले और नीचे चला गया है. ये जानते-समझते हुए कि पानी न केवल मनुष्य के जीवन हेतु वरन जीव-जंतुओं के लिए भी अनिवार्य तत्त्व है, जल संरक्षण के उपाय गंभीरता से किये ही नहीं जा रहे हैं. बुन्देलखण्ड के सन्दर्भ में देखें तो यहाँ के भू माफियाओं ने, खनन माफियाओं ने विगत कई वर्षों से हरे-भरे बुन्देलखण्ड को उजाड़ने का कुचक्र रचाया हुआ है. कुछ गंभीर अध्येताओं के अध्ययन रिपोर्टों को आधार बनायें तो वर्तमान में बुन्देलखण्ड में कुल क्षेत्रफल का दस प्रतिशत से कम जंगल बचे हुए हैं. किसी समय में इस वन-सम्पदा का क्षेत्रफल चालीस प्रतिशत के आसपास ठहरता था. इन जंगलों के समाप्त होने के मूल में यहाँ के पर्वतों का लगातार मिटते जाना भी है. पत्थरों के द्वारा आर्थिक लाभ लेने के स्वार्थ ने यहाँ के माफियाओं ने पहाड़ों को, जंगलों को पूरी तरह से मिटा दिया है. एक बहुत बड़े इलाके में दिन-रात चलती क्रेशर मशीनों के कारण किलोमीटरों तक धूल के बादल बने दिखाई देते हैं. इस धूल ने रहे-सहे वृक्षों पर, पेड़-पौधों पर, उपजाऊ जमीन पर अपना कब्ज़ा कर रखा है. हरियाली के स्थान पर सफ़ेद चादर सी लगातार गहराती जा रही है. 

बुन्देलखण्ड में जल-संकट का हाल तब है जबकि यहाँ नदियों, जलाशयों, कुँओं आदि की पर्याप्त उपलब्धता है. यमुना, बेतवा, नर्मदा, काली, सिंध, धसान, केन आदि नदियों; कीरत सागर, मदन सागर, सेमरताल आदि के साथ-साथ बुन्देलखण्ड का कश्मीर कहा जाने वाला चरखारी है, जो अपनी झीलों के कारण प्रसिद्द है. इसके अलावा पातालतोड़ कुँओं की उपलब्धता भी यहाँ है. असीमित भूगर्भीय जलस्त्रोत धुरहट जैसे स्थान बुन्देलखण्ड में हैं. इसके बाद भी यहाँ जल संकट का होना यहाँ के निवासियों के जागरूक न होने, संवेदनशील न होने का ही परिचायक है. भू एवं खनन माफिया तो लगातार यहाँ की वन सम्पदा का, पर्वत श्रेणियों का नाश करके जल-संकट पैदा कर ही रहे हैं, ज्यादा से ज्यादा आर्थिक लाभ लेने के लालच में बड़े-बड़े किसानों द्वारा भी भूगर्भीय जल स्त्रोतों का जबरदस्त ढंग से विदोहन किया जा रहा है. इसने भी जल स्तर को लगातार कम करके भी जल-संकट पैदा किया है. एक अनुमान के अनुसार बुन्देलखण्ड में औसत बारिश 95 सेंटीमीटर होती है. इसके चलते कृषि योग्य जलसंकट लगभग बना ही रहता है. ऐसे में यहाँ उन्हीं कृषि फसलों को वरीयता दी जाती रही है जिनमें सिंचाई के लिए कम से कम पानी की आवश्यकता हो. इधर कुछ वर्षों से आर्थिक लाभ के चलते ऐसी फसलों का चयन भी किसानों द्वारा किया जाने लगा जिनमें अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है. इस कारण से नलकूपों के माध्यम से भू-गर्भीय जल स्त्रोतों से पानी खींचकर उन्हें सुखाया जाने लगा. एक अनुमान के मुताबिक बुन्देलखण्ड में प्रतिवर्ष भूजल स्तर में दो से चार मीटर तक की गिरावट आ रही है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि हालात कितने भयावह होते जा रहे हैं.


अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल कर, अव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता है, शेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबों, जलाशयों, कुँओं आदि को गन्दगी से, कूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव हो, नए-नए तालाबों, कुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर पर, सीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैं, उपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगे? भविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.
 

(चित्र चित्रकूट जिले में विशेष बुन्देलखण्ड पैकेज से निर्मित रसिन बाँध है. इसे प्रवासनामा से लिया गया है.)

30 दिसंबर 2015

सुलझाएँ किसानों की समस्याओं को


देश के लगभग हर राज्य में किसान अपनी समस्याओं से पीडि़त हैं और सरकारी तन्त्र द्वारा उनकी समस्याओं के समाधान की बात तो की जाती है किन्तु किसी प्रकार का समाधान उनके द्वारा होता दिखता नहीं है. उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र में भी किसान बुरी तरह से समस्याग्रस्त हैं. विगत कई वर्षों से यहाँ के किसानों की स्थिति बहुत खराब बनी हुई है. कृषि कार्य में अनियमितता, बैंक ऋण की समस्या, बाजार से फसल का सही मूल्य न प्राप्त होना, मजदूरी आदि के अवसरों का लगातार कम होते जाने की अनेकानेक समस्याओं के साथ-साथ सरकार की ओर से किसी तरह की राहत न मिलने, कृषि हेतु पर्याप्त अनुदान न मिलने, बैंक ऋण में रियायत अथवा माफी न होने आदि के कारण भी यहाँ के किसान लगातार गरीबी, बदहाली, भुखमरी की मार सह रहे हैं. इन समस्याओं के निस्तारण न होने से, कोई रास्ता न दिखाई देने से वे आत्महत्या जैसा अमानवीय एवं कठोर कदम उठा रहे हैं. बुन्देलखण्ड के किसानों द्वारा आत्महत्या का सरकारी आँकड़ा अपने आपमें चैंकाने वाला तो है ही साथ ही वीभत्स भी है. सरकारी रूप में जारी आँकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष पाँच सौ की संख्या से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. इसके बाद भी न तो सरकार का ध्यान बुन्देलखण्ड के किसानों की ओर जा रहा है और न ही किसी राजनैतिक दल ने हताश-निराश किसानों की सहायता के लिए अपने कदम बढ़ाये हैं.
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देखा जाये तो सरकारी अनियमितताओं की तरह ही मौसम भी किसानों के साथ अत्याचार करने लगा है. विगत कई वर्षों के मौसम को देखा जाये तो ऐसा लगता है मानो इंसानी फितरत की तरह ही मौसम अपनी फितरत बदलने में माहिर हो गया है. गर्मी के मौसम में बारिश, सर्दी के मौसम में देर तक सर्दी का एहसास न होने देना, वर्तमान में बुन्देलखण्ड इस सर्दी के मौसम में भी तेज धूप से गुजर रहा है. फसलों को पकने में जिस मौसम की अपेक्षा होती है वैसा न मिलने से फसलों की वृद्धि में गिरावट साफ़-साफ़ देखने को मिल रही है. मौसम के इस तरह असमय अपने अनियमित रंग दिखाने से किसान बुरी तरह से मायूस हैं, हताश हैं और कई किसानों ने विगत दिनों इसी हताशा, निराशा में आत्महत्या तक कर ली है. ऐसे आपदा भरे दौर में जहाँ किसानों को किसी तरह की सरकारी अथवा गैर-सरकारी सहायता मिलना सुलभ नहीं हो रहा था वहाँ राष्ट्रीय स्तर के एक अभियान और एक स्वनामधन्य सामाजिक संस्था द्वारा बुन्देलखण्ड के किसानों के साथ भद्दा मजाक करते हुए उन्हें घास की रोटी खाने को विवश बताया गया. चूँकि विगत कई वर्षों से पृथक बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण की माँग उठती रही है, जिसके चलते विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा, अनेक स्वार्थी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा इस माँग से अपनी आवाज मिलाने का भरसक नाटक किया जाता है किन्तु मुसीबत में घिरे किसानों के पक्ष में कोई खड़ा नहीं दिखा. घास की रोटी खाने को दिखाना भी कुछ इसी तरह का कदम है जो संभव है कि किसी प्रोजेक्ट के लिए, किसी विदेशी संस्था से फंड प्राप्ति के लिए उठाया गया है न कि किसानों की मदद के लिए. असलियत से दूर ये सर्वे बुन्देलखण्ड क्षेत्र के किसानों के साथ मजाक है, उनकी मजबूरी के साथ खिलवाड़ है, उनकी समस्याओं के समय में जले पर नमक छिड़कने के समान है.
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विद्रूपता ये है कि इन हालातों में सरकार द्वारा किसानों के लिए सार्थक कदम नहीं उठाये जा रहे हैं. मुआवजे के नाम पर खिलवाड़ लगातार चल रहा है. चंद रुपयों के द्वारा सरकारें अपनी सहायता करने का दंभ भरती हैं. इसके अलावा राज्य सरकारों का अपना-अपना रोना है और आरोपों का ठीकरा केंद्र पर फोड़ दिया जाता है. इस तरह के कदमों से किसानों का भला नहीं होने वाला है. सरकारों को चाहिए कि तत्काल मशीनरी को संवेदित करते हुए जमीनी सर्वे करवाकर किसानों को तुरंत राहत और पर्याप्त मुआवजा दिलाया जाये. यहाँ विचारणीय है कि यदि इन किसानों की जगह कोई औद्योगिक आपदा आ गई होती तो सरकारों ने न जाने कौन-कौन से राहतकोष खोल दिए होते. आज भले ही कृषि में उद्योगों की तरह मुनाफा नहीं है किन्तु ये बात सबको याद रखनी होगी कि कृषि देशभर को खाद्यसामग्री उपलब्ध करवाती है, उसे उद्योग अथवा मुनाफाखोरी करने का साधन माना भी नहीं जाना चाहिए. इसके बाद भी सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वो किसानों को उद्योगपति समझते हुए, कृषि को उद्योग मानते हुए इस बारे में सजगता से काम करे. ऐसा न होने की दशा में ये किसानों के भविष्य के लिए, उनके परिवार के लिए, उनके जीवन के लिए सही नहीं होगा. वर्तमान हालातों में इन बातों पर चर्चा कर लेने से किसानों की समस्याओं का हल नहीं निकलने वाला है. सरकारों को, चाहे वो केंद्र सरकार हो अथवा राज्य सरकारें, मिलजुलकर किसानों के हितार्थ योजनों को महज बनाने की नहीं वरन उन्हें तत्काल प्रभाव से लागू करने की जरूरत है. हम सबको भी नियंत्रित, निष्पक्ष भाव से एक नागरिक समझकर ही किसानों की मदद को आगे आयें. जिस तरह का राजनैतिक परिदृश्य वर्तमान में दिख रहा है उससे नहीं लगता है कि कोई भी सरकार निष्पक्ष रूप से किसानों की सहायता के लिए मुक्त-हस्त से आगे आएगी. इन सबका असर कहीं न कहीं किसानों को  मिलने वाली मदद, मुआवजे पर ही पड़ेगा. कुछ समय राजनीति न करते हुए किसानों के हितार्थ एकजुट हो लिया जाये; सरकार को जगाने के लिए खड़ा हो लिया जाये.

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18 मार्च 2015

किसानों के लिए सरकार जागे अब


इन्सान की फितरत की भांति ही अब मौसम अपनी फितरत बदलने में माहिर हो गया है. गर्मी के मौसम में बारिश, सर्दी के मौसम में देर तक सर्दी का एहसास न होने देना, अब बसंत के मौसम में घनघोर बारिश के द्वारा वो अपनी मनमर्जी का संकेत दे रहा है. लगभग सम्पूर्ण देश में मौसम के इस बदलाव को देखा और महसूस किया जा रहा है. अभी महज एक सप्ताह पूर्व असमय आई तेज बारिश, आंधी, ओलावृष्टि ने किसानों की कमर तोड़कर ही रख दी है. खेतों में पकी खड़ी फसल अथवा पकने को तैयार फसल पूरी तरफ से मिट्टी में बिछ गई है , जिससे कि अब एक दाना मिलने की भी उम्मीद नहीं है. किसान बुरी तरह से मायूस है, हताश है और कई किसानों ने विगत दिनों इसी हताशा, निराशा में आत्महत्या तक कर ली है.
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संभव है कि हम में से बहुत से अतिजागरूक लोग इस आपदा को मानवजनित कहकर अपना आख्यान प्रस्तुत करने लगें. ये भी संभव है कि बहुत से लोगों को किसानों की आत्महत्याओं में कोई दर्द मालूम न हो और वे इस पूरे घटनाक्रम को भी राजनैतिक रंग देने से न चूकें. हो सकता है कि किसानों की सहायता के नाम पर भी तमाम राजनैतिक दलों के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चालू हो जाये. आसमान से टपकी इस आपदा के लिए कौन कसूरवार है कौन नहीं, किसके द्वारा प्रकृति का नुकसान ज्यादा किया गया किसने कम नुकसान, किस राजनैतिक दल ने किसे सहायता दी किसे नहीं दी आदि का आकलन, विश्लेषण बाद में भी हो सकता है. ये भी हम सभी जानते हैं कि मानव की अदम्य लालसा ने, लोभ ने प्रकृति का भयानक दोहन किया है और उसे बुरी तरह से नष्ट किया है, किन्तु वर्तमान हालातों में इन बातों पर चर्चा कर लेने से किसानों की समस्याओं का हल नहीं निकलने वाला है. वर्तमान में सरकारों को, चाहे वो केंद्र सरकार हो अथवा राज्य सरकारें, मिलजुलकर किसानों के हितार्थ योजनों को महज बनाने की नहीं वरन उन्हें तत्काल प्रभाव से लागू करने की जरूरत है.
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हास्यास्पद और विद्रूपता वाली स्थिति ये है कि आज के हालातों में किसी भी सरकार द्वारा किसानों के लिए सार्थक कदम नहीं उठाये जा रहे हैं. फसल बीमा योजना के नाम पर खिलवाड़ पिछली केंद्र सरकार के समय से चल रहा है. राज्य सरकारों का अपना-अपना रोना है और आरोपों का ठीकरा केंद्र पर फोड़ दिया जाता है. इस तरह के कदमों से किसानों का भला नहीं होने वाला है. सरकारों को चाहिए कि तत्काल सरकारी मशीनरी को संवेदित करते हुए जमीनी सर्वे करवाकर किसानों को तुरंत राहत, मुआवजा दिला दिया जाये. सोचने वाली बात है कि यदि इन्हीं किसानों की जगह कोई औद्योगिक आपदा आ गई होती तो सरकारों ने न जाने कहाँ-कहाँ से राहत के खाते खोल दिए होते. किसानों को उद्योगपति समझते हुए, खेती को भी उद्योग मानते हुए सरकारों को इस बारे में सजगता से काम करना होगा. ऐसा न होने की दशा में समाज में नकारात्मकता का प्रसार होगा जो किसी भी रूप में किसानों के भविष्य के लिए, उनके परिवार के लिए, उनके जीवन के लिए सही नहीं होगा.
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हाँ, एक अंतिम बात सरकारों के साथ-साथ किसी भी दल के आम समर्थकों से कि वे भी अपना संयम न खोएं, अपने आपको नियंत्रित भाव से एक नागरिक समझकर ही किसानों की मदद को आगे आयें. जिस तरह का राजनैतिक परिदृश्य वर्तमान में दिख रहा है उससे नहीं लगता है कि कोई भी सरकार निष्पक्ष रूप से किसानों की सहायता के लिए मुक्त-हस्त से आगे आएगी. और जो-जो सरकारें सामने आएँगी भी वे हमारे इन्हीं सामान्य कार्यकर्ताओं, समर्थकों के कारण लगातार आरोपी बनाई जाति रहेंगी, आलोचना का शिकार होती रहेंगी. इन सबका असर कहीं न कहीं किसानों को  मिलने वाली मदद, मुआवजे पर ही पड़ेगा. तो न सही कुछ समय की राजनीति, कुछ समय किसानों के हितार्थ एकजुट हो लिया जाये; सरकार को जगाने के लिए खड़ा हो लिया जाये.

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(सभी चित्र लेखक के स्वयं निकाले हुए हैं....)