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20 फ़रवरी 2020

कांग्रेस का विकल्प नहीं उसकी टीम बी बनकर उभरी है आम आदमी पार्टी


दिल्ली एक बार फिर आम आदमी पार्टी की हो गई. विधानसभा निर्वाचन 2020 के आरम्भ होने के समय से ही इस चुनाव को आआपा के पक्ष में माना जा रहा था. परिणाम भी कमोवेश उसी तरह का आया. चुनाव परिणाम घोषित होते ही विश्लेषकों द्वारा आम आदमी पार्टी को कांग्रेस का विकल्प बताया जाने लगा. असल में वर्तमान चुनाव परिणामों की समीक्षा, विश्लेषण गंभीरता से नहीं किया जा रहा है. इसे सीधे-सीधे आम आदमी पार्टी की एकतरफा जीत बताकर और भाजपा की हानि बता कर प्रसारित किया जा रहा है. ऐसा यदि एक आम समर्थक द्वारा किया जाये, एक भावुक मतदाता के द्वारा किया जाये तो बात समझ आती है कि वह किसी भावना के वशीभूत अपना आक्रोश निकाल रहा है. इसके उलट जब खुद को बौद्धिक कहने वाले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी की वर्तमान जीत का अथवा विगत विधानसभा की जीत का सतही आकलन किया जाये तो लगता है कि अभी निष्पक्षता की बहुत आवश्यकता है. देश में लोकतंत्र की वकालत भले ही की जाये मगर अभी वैचारिक स्तर पर ही लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सका है.

पूरे देश में भाजपा विरोधी माहौल बहुत लम्बे समय से बना हुआ था मगर वर्ष 2014 के बाद से सिर्फ द्विपक्षीय लहर देखने को मिल रही है. इसमें एक भाजपा के पक्ष में और दूसरी भाजपा के विरोध में. यहाँ भाजपा-विरोधियों के पास अपने-अपने विकल्प खुले हुए हैं. ऐसा न केवल मतदाताओं, समर्थकों के साथ हो रहा है वरन दलीय स्वरूप में भी ऐसा देखने को मिल रहा है. दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी यही हुआ. यहाँ मतदाताओं की, भाजपा, आम आदमी पार्टी की स्थिति का सही-सही आकलन करने के लिए एक अन्य तीसरे दल कांग्रेस का भी आकलन करना होगा. बिना उसके दिल्ली विधानसभा चुनावों की सही तस्वीर सामने नहीं आ सकेगी. इसके लिए वर्तमान विधानसभा चुनावों से इतर विगत दो विधानसभा चुनावों का भी आकलन करना पड़ेगा.

ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस का चुनावी परिणाम सम्बन्धी आकलन, विश्लेषण ही तय करेगा कि आआपा कांग्रेस का विकल्प बनकर उभरी है अथवा उसकी टीम बी बनकर. वर्तमान चुनाव परिणामों से ध्यान हटाकर यदि वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों पर दृष्टि डाली जाये जबकि आम आदमी पार्टी ने अन्ना आन्दोलन की लहर में पहली बार चुनाव मैदान में कदम रखा था. पार्टी ने पहली बार में ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा भाजपा, आआपा और कांग्रेस के बीच ही सिमट गई. इस चुनाव में भाजपा 32 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी जबकि आआपा 28 सीटों के साथ दूसरे और सत्ताधारी कांग्रेस महज 08 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर आई. भाजपा विरोधी मानसिकता के कारण कांग्रेस ने आआपा को समर्थन देकर सरकार बनवाई जबकि अन्ना आन्दोलन से जन्मी आआपा का सबसे बड़ा विरोधी दल कांग्रेस ही बना था.


पहली बार में ही अपनी उपस्थिति को इस रूप में देखकर अरविन्द केजरीवाल को भ्रम हो गया कि वे भ्रष्टाचार के नाम पर कहीं भी, कैसी भी जीत, किसी के खिलाफ प्राप्त कर सकते हैं. विधानसभा में भी उनकी जीत कांग्रेस की सशक्त नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ थी. इसी सोच के चलते महज 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल लोकसभा चुनाव की तरफ मुड़ गए. अंततः लोकसभ चुनावों के पश्चात् दिल्ली ने 2015 में दोबारा चुनावों का मुँह देखा. यही वह स्थिति थी जबकि लोकसभा 2014 के बाद से बनी मोदी लहर और मोदी-विरोधी लहर का देशव्यापी रूप देखने को मिला. दिल्ली विधानसभा 2015 चुनाव परिणाम सोचने वाले थे, शोध करने वाले थे मगर किसी ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया. सोचने वाली बात है कि आआपा या फिर अरविन्द केजरीवाल ने महज 49 दिन में ऐसे कौन से काम कर डाले थे कि महज 28 सीटें जीतने वाली आआपा ने इन चुनावों में 63 सीटें हासिल कीं? यह भी सोचने वाली बात है कि जिस भाजपा की स्थिति कांग्रेस या शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुरी नहीं रही, उसने महज 49 दिन में ऐसे कौन-कौन से गलत कदम उठा लिए कि उसे मात्र तीन सीट पर सिमटना पड़ा?

इन सभी सवालों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी इसलिए अनदेखा कर दिया गया क्योंकि भाजपा-विरोधी मानसिकता के आगे और कुछ देखना ही नहीं था. 2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आआपा को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस ने 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2015 के चुनावों में दो सीटों, मंगोलपुरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत प्राप्त किये. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत से सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही है. यदि इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा की सीटें देखें तो भाजपा ने महज 17 सीटों पर 2013 के मुकाबले 2015 में कम मत हासिल किये. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज एक संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?

इस तरह के मतों को देखकर विश्लेषण करने वाला, सांख्यिकी सम्बन्धी आँकड़ों से खेलने वाला कोई भी विद्यार्थी प्रथम दृष्टया ही बता सकता है कि ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का है. मतदाताओं का एक दल से दूसरे दल की तरफ, एक प्रत्याशी से दूसरे प्रत्याशी की तरफ ‘स्विंग’ कर जाना कोई नई घटना नहीं थी मगर समूची विधानसभा के मतदाताओं का ‘स्विंग’ कर जाना साधारण घटना नहीं है. कोई भी साधारण से साधारण विश्लेषक इसे खेल कहने का दुस्साहस कर सकेगा क्योंकि ये मामला 2015 विधानसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहा. भाजपा या कहें कि मोदी विरोधियों ने अपने कदम से और मतदाताओं के रुझान से इसका एहसास कर लिया कि अन्ना आन्दोलन के समय मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में आआपा को कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे.   

इस खेल में किसी भी तरह की कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की जाने लगी. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध बनाये रखा गया. समूची दिल्ली में केन्द्र सरकार के विरोध के बहाने मोदी को हराने की कोशिशें चलती रहीं. आम आदमी पार्टी के कामों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाने लगा. चुनावों में स्थिति कुछ और ही बनती, यदि परदे के पीछे की सांठ-गांठ जमीन पर न उतरती. शाहीन बाग का विरोध इसी का परिणाम कहा जा सकता है. इन सबके बाद भी विधानसभा 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी जीतने के बाद भी अपना पिछला कारनामा करने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार वह मात्र 35 सीटों पर ही ज्यादा मत प्राप्त कर सकी. भाजपा को 2015 के मुकाबले  57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुए, उनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास में सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी. 

आआपा की बढ़ती सीटों के पीछे भाजपा की कार्यप्रणाली, उसके नेतृत्व की स्थितियां भी प्रभावी होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी चर्चा किये बिना, परिणामों के आपसी सह-सम्बन्ध को परखे बिना आआपा को कांग्रेस का विकल्प बता देना अभी जल्दबाजी होगी. आआपा विशुद्ध रूप से कांग्रेस की टीम बी के रूप में देखी जा सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस चुनावों में पराजित हुई है वहाँ उसके द्वारा ईवीएम पर ऊँगली उठाई गई, केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये गए लेकिन दिल्ली के दो विधानसभा चुनावों में शून्य सीटें लाने के बाद भी उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया. कांग्रेस का विरोध करके जमीन बनाने वाली आम आदमी पार्टी को पहली बार में ही समर्थन देकर सरकार बनवाना, एक भी सीटें न मिलने के बाद भी ईवीएम पर हो-हल्ला न मचाना, एकाएक कांग्रेस के मतों में जबरदस्त गिरावट आना और उसी अनुपात में आम आदमी पार्टी के मतों का बढ़ना इसे कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि अवसरवादी राजनीति सिद्ध करता है.

28 अप्रैल 2019

ऐसे जागरूक मतदाताओं के सहारे जिंदा है हमारा लोकतंत्र


इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव को देश का महापर्व घोषित कर दिया गया है. शासन-प्रशासन अपने-अपने स्तर पर पूरा दम लगाकर अधिक से अधिक मतदान करवाने की कोशिश में लगा हुआ है. ऐसे में मतदान कितना होगा ये बाद की बात है मगर जैसा कि पहले भी कहा था कि मतदाता जागरूकता किसी के कहने से नहीं होती वरन यह स्व-स्फूर्त प्रक्रिया है जो अंतःकरण से उपजती है. जिसे भी जरा सा भी भान है अपनी जिम्मेवारी का, अपने कर्तव्य का, देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली के प्रति विश्वास का, देश की सरकार के कार्यों के प्रति सकारात्मकता का वह अपने आपको मतदान के लिए प्रेरित कर ही लेता है. मतदान के लिए खुद को तैयार कर ही लेता है. उसे न तो प्रशासन की गोष्ठियों की आवश्यकता होती है, न रैलियों की, न नारे लिखी तख्तियों की, न आदर्श बूथ की. ऐसे लोग अपने आप मतदान के लिए सतर्क रहते हैं, जागरूक रहते हैं.


ऐसा उदाहरण आज विश्व के पहले अनाज बैंक के बुन्देलखण्ड स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की उरई शाखा में देखने को मिला जबकि वहाँ की लाभार्थी खाताधारक महिलाएँ जनपद जालौन में 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा लेने के प्रति उत्साहित दिखीं. अनाज बैंक उरई शाखा प्रतिमाह दो बार एक महिला को पांच किलो अनाज प्रदान करता है, इस उद्देश्य के साथ कि कोई भी भूखा न सोये. सभी महिलाएं ऐसी हैं जो अकेली हैं, वृद्ध हैं, अत्यंत गरीब हैं, मजबूर हैं, निराश्रित हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं जो शिक्षित नहीं हैं. सामान्य अक्षर-ज्ञान से भी वंचित हैं, अपने नाम को लिखना भी नहीं जानती हैं. बहुत सी महिलाएं अत्यंत वृद्ध हैं. इसके बाद भी ख़ुशी की बात यह है कि दो-चार महिलाओं को छोड़कर सभी महिलाएं अभी तक मतदान करती रही हैं. अबकी बार कुछ महिलाओं के वोट कट गए हैं; कैसे, क्यों इसकी जानकारी उनको भी नहीं है और अनाज बैंक शाखा को भी समय से नहीं हो सकी.  

अप्रैल माह के दूसरे वितरण के दौरान आज सभी महिलाओं से मतदान करने सम्बन्धी चर्चा हुई. सभी महिलाओं ने पूर्व में अपने मतदान करने की बात कही. कुछ महिलाओं ने अपने वोट के इस बार कट जाने की समस्या बताई. उनकी बातों से लग रहा था, जैसे कि उनका वोट कट जाना गलत हुआ. उन्हीं महिलाओं में से अत्यंत वृद्ध महिला ने यहाँ तक कहा कि वह कल मतदान दिवस पर अपना आधार कार्ड लेकर अपने बूथ जाएगी. वहां किसी अधिकारी से बात करके वोट डलवाने के लिए कहेगी क्योंकि वह पहले वोट डालती रही है. सोचिये, जिस देश के नागरिकों में इस तरह का ज़ज्बा होगा, वहां का लोकतंत्र खतरे में कैसे आ सकता है? ये ऐसी महिलाएं हैं जिनको सीधे-सीधे अपने किसी जनप्रतिनिधि से काम नहीं पड़ना है. इनको किसी सरकार में बालू, शराब के ठेके नहीं चाहिए हैं. ये ऐसी महिलाएं हैं जिनके किसी परिजन को कोई सिफारिश भी नहीं करवानी है. ये सभी महिलाएं बस इतना समझ सकी हैं कि देश में सरकार के बनाने-गिराने में वोट का महत्त्व है. इसी कारण वे अपना वोट देना चाहती हैं. उनके ये जानने का प्रयास नहीं किया कि वे किसे अपना वोट देना चाहती हैं और न ही उन्होंने ये बताने-पूछने की चेष्टा की. 

सुखद ये लगा जानकर कि जहाँ आज के दौर में जनप्रतिनिधियों के क्रियाकलापों से रुष्ट होकर पढ़ा-लिखा मतदाता वोट डालने से विरक्त होने लगा है वहीं ऐसी महिलाएं अपने मतदान को लेकर सजग हैं. मतदान को छुट्टी का दिन मानकर पढ़ा-लिखा मतदाता कहीं सपरिवार पिकनिक पर निकल जाता है वहीं ये महिलाएं सबह-सुबह मतदान करने के प्रति जागरूक दिखीं. शिक्षित मतदाताओं के लिए शासन-प्रशासन द्वारा आये दिन तमाम तरह की नौटंकी करते हुए उनको जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं ये महिलाएं स्व-प्रेरण से मतदान के लिए जागरूक हैं. ऐसी महिलाओं, ऐसे मतदाताओं के कारण ही इस देश का लोकतंत्र जिन्दा है, इस देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली सक्रिय है. नमन है ऐसी महिलाओं को, ऐसे जागरूक मतदाताओं को.  

15 मई 2018

सियासी दाँव-पेंचों में उलझा कर्नाटक


कर्नाटक राज्य विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही बहुतेरे मीडिया केन्द्रों ने लगभग साबित सा कर दिया था कि वहां भाजपा को कोई लाभ होने वाला नहीं है. इस तरह के आकलन करने के पीछे उनके पास कोई ठोस नजरिया नहीं था और न ही कोई ठोस तथ्य मौजूद थे. कर्नाटक चुनाव का आकलन चुनाव विश्लेषकों द्वारा, मोदी-विरोधियों द्वारा, भाजपा-विरोधियों द्वारा उत्तर प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए गोरखपुर एवं फूलपुर लोकसभा उपचुनावों को आधार बनाकर किया जा रहा था. इन दोनों चुनावों में भाजपा हार गई थी और इनमें सपा-बसपा का गठबंधन विजयी रहा था. ऐसे में सभी ने ये स्वीकार सा कर लिया था कि यदि सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट हो जाये तो भाजपा को हराया जा सकता है. इसके साथ-साथ 2014 से लेकर अभी तक प्रत्येक छोटे-बड़े चुनाव में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा, चुनाव सर्वेक्षणों द्वारा मोदी छवि को ही आधार बनाया गया है. इस आधार को ऐसे लोग इस बार दरकता हुआ बताने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे थे. उनके इस तरह के विश्लेषण के पीछे पेट्रोल, डीजल की कीमतों की वृद्धि को, रुपये की कीमत में आती गिरावट को आधार बनाया जा रहा था. इसके अलावा जिस तरह से केंद्र सरकार ने नोटबंदी के तुरंत बाद जीएसटी को लागू किया, उससे ऐसा लगने लगा था कि देश का व्यापारी अवश्य ही केंद्र सरकार के खिलाफ विद्रोह करेगा. इन दो जगहों पर केंद्र सरकार को असफल दिखाने वाले विश्लेषकों ने रोजगार देने के मामले में भी केंद्र सरकार को पिछड़े पायदान पर दिखाया था. मोदी-विरोधियों द्वारा केंद्र सरकार की किसी भी योजना की, किसी भी कदम की सराहना करते नहीं दिखाया गया. देश भर में चलने वाले तथाकथित विरोध को कैसे न कैसे करके कर्नाटक चुनाव से जोड़ने की कोशिश करते हुए ये साबित किया जा रहा था कि वहां भाजपा की पराजय सुनिश्चित है.


आर्थिक स्तर पर ऐसी स्थितियों को बार-बार दिखाने वाले मोदी-विरोधियों द्वारा सफलता न मिलते देख कर कठुआ काण्ड की इबारत लिखी गई, जिन्ना तस्वीर का प्रकरण उठाया गया. इस तरह के मामले किसी न किसी तरह से भाजपा-विरोध में, मोदी-विरोध में उठाकर जनता के बीच लाया जा रहा था. इन सबके केंद्र में मुख्य रूप से कर्नाटक चुनाव ही बना हुआ था. ऐसे विश्लेषक जिनका विश्लेषण सिर्फ और सिर्फ पूर्वाग्रह पर आधारित रहता है वे किसी न किसी तरह भाजपा को कर्नाटक में हराते दिख रहे थे. इसके उलट असलियत ये है कि कर्नाटक में विगत पांच वर्ष के शासन में ऐसी तमाम विसंगतियाँ उभर कर सामने आईं जिनसे जनता का रुख भाजपा की तरफ हुआ. किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं हों, वहाँ पर भ्रष्टाचार होने का मुद्दा हो, राज्य का अलग झन्डा बनाये जाने का विचार हो, पेयजल की समस्या का होना हो या फिर चुनाव के ठीक पहले लिंगायत मुद्दे को हवा देना का मामला हो, सभी ने कांग्रेस को कई पायदान पीछे कर दिया था.

चुनाव रैलियों के दौरान जिस तरह से दोनों तरफ से बयानों के तीर छोड़े गए, उसमें अपनी उपलब्धियाँ कम बल्कि दूसरे की नाकामियां अधिक बताई गईं. मोदी के पक्ष में कहीं न कहीं केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजनायें, स्वच्छ भारत अभियान, अटल पेंशन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, स्टार्ट अप योजना, फसल बीमा योजना आदि भी काम करती दिख रही थीं. हाल ही में देश भर में विद्युतीकरण ने भी आम नागरिकों के मन में केंद्र सरकार की विकास नीति को गहरे से बैठा दिया था. इन योजनाओं के सहारे और मोदी छवि के सहारे भाजपा कर्नाटक में भले ही सरकार न बना सके किन्तु अपने पिछले प्रदर्शन से कहीं अधिक अच्छा प्रदर्शन कर सकेगी. इसके अलावा कांग्रेस प्रचारकों के पास वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री की सफलता गिनाने को भी नहीं थीं. ये स्पष्ट संकेत कर रहा था कि इन चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में अपनी सफलता की कहानी को दोहरा नहीं सकेगी. अपनी-अपनी योजनाओं की सफलता-असफलता के रथ पर चढ़कर चुनाव प्रचार में निकले मोदी के प्रति युवाओं के मन में अधिक आकर्षण, अधिक सम्मान देखने को मिल रहा था. कर्नाटक का आम मतदाता कर्नाटक की सरकारों के कार्यों का आपस में तुलनात्मक अध्ययन नहीं कर रहा था वरन उसके सामने वर्तमान कांग्रेस सरकार के पांच वर्षों के मुकाबले भाजपा के केंद्र में चार सालों का कार्य था. स्पष्ट है कि वे कार्य राज्य के कार्य पर भारी पड़े.

चुनाव परिणामों का आना अभी भी बना हुआ है. देर रात तक स्थिति स्पष्ट होगी कि कौन सरकार बनाएगा किन्तु चुनाव परिणामों से इतना स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा कर्नाटक में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आ रही है. बाकी सरकार बनाना इसी आँकड़ेबाजी के अधीन है. इसमें जो भी जादुई 113 का आँकड़ा छू लेगा वही जनता का प्रतिनिधित्व करने आगे आ जायेगा.  

06 अप्रैल 2018

अपने दायित्वों के प्रति सजग होना होगा सदन को


संसद का काम देश के सन्दर्भ में नीतियां बनाना होता है और इसीलिए देश भर से प्रति पांच साल में सांसद चुनकर भेजे जाते हैं. इनके चुनाव में जहाँ अरबों रुपये खर्च होते हैं वहीं संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में भी लाखों-करोड़ों रुपयों का व्यय होता है. ऐसी स्थिति के बाद भी वे सदस्य जिन्हें मतदाता, मीडिया माननीय पुकारते हुए थकता नहीं है विगत कई वर्षों से देशहित के प्रति लापरवाही दिखाते आ रहे हैं. इस बार लोकसभा और राज्यसभा को विपक्षियों द्वारा पूरी तरह से बाधित किया गया. यदि कहा जाये कि चंद सदस्यों ने समूची लोकसभा और राज्यसभा को बंधक बना रखा था तो कोई अतिश्योक्ति न होगी. आज जबकि संसद में बजट सत्र के दूसरे भाग का समापन हुआ तब दिए गए आँकड़ों से सामने निकल कर आया कि लोकसभा में महज चार विधेयक पारित किये जा सके. इसके साथ-साथ लोकसभा में कुल कार्य तेईस प्रतिशत हुआ जबकि राज्यसभा में यह थोड़ा सा अधिक जाकर अट्ठाईस प्रतिशत तक जा पहुँचा. सीधी सी बात है कि जिस सदन को शत-प्रतिशत चलना चाहिए, अपना कार्य करना चाहिय वह इस तरह से लापरवाह बना हुआ है. यहाँ के सदस्यों को समझना होगा कि उनकी कार्यवाही में खर्च होता धन उसी जनता का है जिसके हितार्थ वे सभी लोग सदन में भेजे गए हैं.


इसी तरह हालिया समाचारों से ज्ञात हुआ कि राज्यसभा के कुछ सदस्य तो ऐसे रहे जिन्होंने पूरे छह साल में एक भी सवाल नहीं पूछा. सदन में उपस्थिति को लेकर भी क्षोभजनक स्थिति रही. देश के लिए मानक समझे जाने वाले सदस्यों ने भी सदन में उपस्थित रहकर अपनी मर्यादा, दायित्व का बोध निर्वहन करना उचित नहीं समझा. ऐसे में किसी सदस्य का अपने वेतन का दान-स्वरूप दे देना ही उसे महान नहीं बना देता है. ऐसे सदस्यों को समझना होगा कि यदि वे निर्वाचित होकर अथवा मनोनीत होकर सदन में भेजे गए हैं तो वहां भी उनका कुछ कर्तव्य है, दायित्व है. वहां भी उनके कुछ कार्य हैं, उनकी कुछ जिम्मेवारियां हैं. इनको अपने-अपने कार्यों, अपने-अपने दायित्वों के प्रति सजग और जागरूक रहने की आवश्यकता है. यहाँ आकर सदन को भी स्वतः संज्ञान लेकर ऐसे लोगों पर कार्यवाही करने की जरूरत है.  

इधर देखने में आ रहा है कि सदन के अन्दर एक-दूसरे के दुश्मन सरीखे दिखाई देने वाले सदस्य सदन के बाहर गलबहियाँ करते दिखते हैं. ठहाके लगाते नजर आते हैं. यही सदस्य देशहित में पारित होने वाले विधेयकों को लेकर जबरदस्त खिलाफत करते दिखते हैं किन्तु अपने वेतन-भत्तों के सन्दर्भ में एकसुर से साथ देते नजर आते हैं. इन सभी को समझना होगा कि सदन किसी भी तरह से मौज-मस्ती या तफरी का मंच नहीं है और न ही खुद को देश भर में प्रसारित-प्रचारित करने का माध्यम नहीं है. किसी भी सदस्य को यहाँ भेजकर सम्बंधित क्षेत्र का मतदाता अपने विकास की राह यहाँ के द्वारा खुलती देखता है. इसके बाद भी इन सदस्यों का सदन को बाधित किये रहना न केवल मतदाताओं के साथ बेईमानी है वरन सम्पूर्ण देश के साथ धोखा है. ऐसी स्थिति में सदन को, माननीय अध्यक्ष, सभापति को संज्ञान लेने की आवश्यकता है. महामहिम राष्ट्रपति महोदय को भी ऐसे समय में कार्यवाही करने की आवश्यकता है. आखिर देश की सर्वोच्च शक्तियों में संविधान, सदन के साथ-साथ राष्ट्रपति महोदय को भी गरिमा हासिल है. इन सदस्यों को समझना होगा कि टीवी पर प्रसारित होने वाली कार्यवाही के चलते जनता भी इनके असल मंसूबों को समझ-जान चुकी है. ऐसे में इन सदस्यों को आपसी विरोध की नौटंकी बंद करके देशहित में सदन में कार्य करना चाहिए.

03 अप्रैल 2018

गठबंधन की राह आसान नहीं होगी


दो दशक से अधिक समय की वैमनष्यता को दरकिनार कर सपा-बसपा ने गलबहियाँ कर ली हैं. जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद प्रदेश की राजनीति में किसी को अंदाजा भी नहीं होगा कि ये दो दल कभी एकसाथ चुनावी मैदान में उतरेंगे. राजनीति में कोई स्थायी मित्र नहीं होता और न ही कोई स्थायी शत्रु होता है, इसी सिद्धांत का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश में अचंभित करने वाला गठबंधन देखने को मिला. लोकसभा की दो सीटों के उपचुनाव और राज्यसभा के लिए इस गठबंधन की कहानी लिखी गई. इससे पहले गत वर्ष हुए विधानसभा के चुनाव-परिणामों के समय दोनों तरफ से आ रहे बयानों से भी गठबंधन-युक्त सरकार बनाये जाने के संकेत मिले थे. ये और बात है कि जनता जनार्दन ने भाजपा को प्रचंड बहुमत देते हुए इन दोनों दलों के गठबंधन करने के किसी भी सपने को चकनाचूर कर दिया था. राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के लिए बने सपा-बसपा के गठबंधन ने लोकसभा उपचुनावों की दोनों सीटों पर कब्ज़ा कर लिया. गठबंधन की इस जीत को इस कारण भी महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आगामी वर्ष में लोकसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में न केवल सपा-बसपा में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी वरन भाजपा-मोदी विरोधियों में भी आशा का संचार हुआ है. इन सभी को एहसास होने लगा कि यदि सब एकजुट हो जाएँ तो भाजपा को हराना संभव है.


इस विजय के आधार पर आगामी लोकसभा चुनाव की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है. यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान में रखनी होगी कि वर्तमान चुनाव एक उपचुनाव था जिसमें निर्वाचित जनप्रतिनिधि लगभग एक वर्ष तक ही अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर पायेगा. इसके अलावा इन दो संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं के साथ-साथ सम्पूर्ण प्रदेश के मतदाताओं को भली-भांति ज्ञात था कि इन दो सीटों की हार-जीत से केंद्र सरकार की स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. इसी तरह इन सीटों के परिणामों से प्रदेश की भाजपा सरकार भी अप्रभावित रहनी है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इन संसदीय क्षेत्रों के मतदाताओं ने क्या वाकई गठबंधन को विजयी बनाया है?

हाल फ़िलहाल यदि इन्हीं दो सीटों, गोरखपुर और फूलपुर के मतदान प्रतिशत का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो बहुत कुछ स्पष्ट नजर आता है. इन उपचुनावों में जहाँ मतदान प्रतिशत गोरखपुर में 43 प्रतिशत और फूलपुर में 38 प्रतिशत मतदान हुआ. यह मतदान प्रतिशत लोकसभा चुनाव 2014 में इन्हीं सीटों पर हुए मतदान प्रतिशत से बहुत कम रहा. तब इन्हीं सीटों पर मतदान प्रतिशत गोरखपुर और फूलपुर में क्रमशः 54 प्रतिशत और 50 प्रतिशत हुआ था. इसके साथ-साथ वर्तमान उपचुनाव में गठबंधन के प्रत्याशी को गोरखपुर में 456513 मत प्राप्त हुए, फूलपुर में उनके प्रत्याशी को 342922 मत मिले. गोरखपुर में गठबंधन की विजय 21881 मतों से हुई जबकि फूलपुर में विजय 59460 मतों से मिली. इन मतों के सापेक्ष यदि 2014 के लोकसभा चुनाव के मतों को देखें तो गोरखपुर में गठबंधन (यदि सपा और बसपा के मतों को जोड़ दिया जाये) को 402756 मत (भाजपा 529127 मत) और फूलपुर में 358966 मत (भाजपा 503564 मत) मिलते हैं. स्पष्ट तस्वीर सामने है कि मतदान प्रतिशत की कमी के चलते भाजपा को अपने मतों का नुकसान हुआ है. यदि दोनों चुनावों में गठबंधन को मिले मतों का विश्लेषण किया जाये तो साफ़ है कि उनके मतों में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी नहीं हुई है. गठबंधन के मत लोकसभा 2014 के चुनाव में मिले मतों के आसपास ही दिखते हैं.  स्पष्ट है कि भाजपा को जो नुकसान हुआ है वह गठबंधन के चलते नहीं बल्कि कम मतदान के कारण हुआ है. ऐसे में यदि आगामी लोकसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ता है तो उसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा न कि गठबंधन को.


इन दो सीटों के स्थान पर यदि समूचे प्रदेश के मतदान व्यवहार को देखें तो भी गठबंधन फायदे में नहीं दिखता और भाजपा भी उतने नुकसान में नहीं दिख रहा है जैसा कि लगातार दर्शाया जा रहा है. भाजपा द्वारा हारी गई सात सीटों को विश्लेषण से बाहर करके यदि शेष सीटों को विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि पूरे प्रदेश में लगभग 36 सीटों पर गठबंधन बढ़त बनाये हुए था. इनमें भी एक लाख मतों से अधिक की बढ़त वाली सीटें मात्र तेरह थीं. क्या वाकई प्रदेश का मतदाता भाजपा सरकार से या मोदी से इतना नाराज है कि वह गठबंधन को ये सीटें सहजता से जीतने देगा? संभव है कि जिन आशाओं, अपेक्षाओं के साथ केंद्र में भाजपा को मतदाताओं ने पहुँचाया है, उसमें शत-प्रतिशत सफलता न मिली हो. इससे मतदाताओं में नाराजगी होना स्वाभाविक है किन्तु विगत चार वर्षों की साफ़-सुथरी सरकार, भ्रष्टाचार-मुक्त मंत्रिमंडल, वैश्विक स्तर पर देश की सशक्त छवि के बनने से आमजन में केंद्र सरकार के प्रति सकारात्मक धारणा भी बनी हुई है. यही वह विश्वास है जो गठबंधन को मदद करे या न करे किन्तु भाजपा को कमजोर नहीं होने देगा.

जिस-जिस को राजनैतिक प्रणाली में, उसकी क्रियाविधि में रुचि होगी उसे सामान्य रूप में इसका भान होगा ही कि लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय चुनावों का अपना-अपना प्रभाव होता है. लगभग न के बराबर स्थिति में एक की प्रकृति दूसरे को प्रभावित करती है. ऐसे में ये उपचुनाव भले ही लोकसभा के लिए हुए हों मगर इनकी अप्रत्यक्ष स्थिति किसी विधानसभा चुनाव से अलग नहीं कही, समझी जा सकती है. इन दो चुनावों में न तो केन्द्रीय, राष्ट्रीय मुद्दे उठाये गए. इन चुनावों से न तो केन्द्रीय सत्ता को प्रभावित किया जाना था. ऐसे में देखा जाये तो यह निर्वाचन मुख्यतया सपा-बसपा गठबंधन के लिए प्रयोग का विषय था. महज दो उपचुनाव सीटों की विजय से ही इसे सफल माना जाना जल्दबाजी ही होगी. हाँ, आगामी चुनाव लोकसभा के स्थान पर विधानसभा का होता तो गठबंधन के प्रति सकारात्मक माहौल बनना संभव था. इसके बाद भी एक बात साफ़ है कि राजनीति में किसी तरह के विश्लेषण अंतिम नहीं होते. उनमें बदलाव समय के साथ होता रहता है. केंद्र की भाजपा सरकार की नीतियों और कार्यों की समीक्षा की जाये तो मतदाताओं में उतनी नाराजगी नहीं है जैसा कि प्रसारित किया जाता है. प्रदेश के ही नहीं बल्कि देश के मतदाताओं ने केंद्र सरकार को नोटबंदी, जीएसटी जैसे बड़े-बड़े मुद्दों पर खुलकर समर्थन दिया है. ऐसे में गठबंधन की महज दो सीटों पर उपचुनाव वाली विजय को भाजपा की हार का आधार नहीं बनाया जा सकता है.

25 जनवरी 2018

राष्ट्रीय मतदाता दिवस के अतिरिक्त और भी कदम उठाना होगा

आज, 25 जनवरी 2018 को आठवाँ राष्ट्रीय मतदाता दिवस देशभर में मनाया जा रहा है. इसका आयोजन सभी नागरिकों को राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निर्वहन को प्रेरित करने के लिए किया जाता है. इस दिन बताया जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए मतदान करना ज़रूरी है. राष्ट्रीय मतदाता दिवस का आरम्भ चुनाव आयोग के 61वें स्थापना वर्ष पर 25 जनवरी 2011 (चुनाव आयोग का गठन 25 जनवरी 1950 को किया गया था) को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने किया था. तबसे भारत में राष्ट्रीय मतदाता दिवस प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को मनाया जाता है. इस दिवस के मनाए जाने के पीछे निर्वाचन आयोग का उद्देश्य है कि देश भर में प्रत्येक वर्ष उन सभी पात्र मतदाताओं की पहचान की जाए जिनकी उम्र एक जनवरी को 18 वर्ष पूर्ण हो चुकी है. इस क्रम में 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज किए जाएं और उनके निर्वाचन फोटो पहचान पत्र बनाये जाएं. इस अवसर पर मतदाताओं के पंजीकरण के साथ-साथ निम्न शपथ भी दिलाई जाती है.
हम भारत के नागरिक, लोकतंत्र में आस्‍था रखने वाले शपथ लेते हैं कि हम देश की स्‍वतंत्रत, निष्‍पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने की लोकतांत्रिक परम्‍परा को बरकरार रखेंगे. प्रत्‍येक चुनाव में धर्म, नस्‍ल, जाति, समुदाय, भाषा आधार पर प्रभावित हुए बिना निर्भीक होकर मतदान करेंगे.


ये अपने आपमें शर्म का विषय होना चाहिए कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बाद भी हमारे देश में अभी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति जागरूकता नहीं है. मतदाताओं में से बहुत बड़ी संख्या में युवाओं का होने के बाद भी मतदान प्रतिशत बढाए जाने पर जोर दिया जाता है. चुनाव आयोग द्वारा मतदान प्रतिशत बढ़ाये जाने को लेकर, अधिक से अधिक लोगों का मतदान करने को जाने के लिए किसी भी चुनाव क्षेत्र में मतदान दिवस को सार्वजनिक अवकाश किये जाने का प्रावधान किया गया. इसके बाद भी लोगों में मतदान के प्रति उतनी जागरूकता नहीं आ सकी है, जितनी कि अपेक्षित है. मतदान दिवस को मिला सार्वजनिक अवकाश लोगों के पिकनिक मनाये जाने के काम आने लगा है. इसके साथ-साथ देखने में आया है कि राजनैतिक दलों द्वारा गंभीर व्यक्तियों के चुनाव मैदान में न उतारने के कारण भी मतदाताओं में मतदान के प्रति सुसुप्तावस्था देखने को मिली है. लोगों ने मन में बैठा लिया है कि किसी को भी मतदान किया जाये मगर उसका अंतिम प्रतिफल नकारात्मक ही मिलना है. आम धारणा यही बनी है कि सारे राजनैतिक व्यक्ति लुटेरे, माफिया ही हैं. आम जनमानस में अब ये धारणा गहरे से बैठ गई है कि राजनीति में, चुनाव में भले लोगों के लिए किसी भी तरह की जगह नहीं रह गई है. इस कारण से भी लोगों में मतदान के प्रति जागरूकता, उत्साह नहीं दिखाई देता है.


एक तरफ चुनाव आयोग राष्ट्रीय मतदाता दिवस के नाम पर देशभर में आयोजन करता है दूसरी तरफ उसका कोई सकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिल रहा है. यदि वाकई चुनाव आयोग किसी तरह से मतदान प्रतिशत बढ़ाये जाने की दिशा में काम करना चाहता है तो उसे सबसे पहले राजनैतिक दलों पर दवाब डालना होगा कि वे साफ़ छवि के लोगों को चुनाव में उतारें. किसी भी तरह से दागी व्यक्ति को निर्वाचन से बाहर रखा जाये. लोगों में भय, डर की भावना पनपने न पाए. चुनाव में वोट खरीदने के लिए दिए जाने वाले प्रलोभनों, धमकियों आदि को भी रोकने का प्रावधान चुनाव आयोग को करना होगा. यदि ऐसा करने में वह सफल नहीं होता है तो फिर मतदान प्रतिशत बढ़ने में अभी संशय ही है. 

28 दिसंबर 2017

अनुशासनहीनता का पुरस्कार देने को उतावली पार्टी

ये फोटो अपने आपमें बहुत कुछ कहती हैं. जितने समय तक नगर पालिका चुनाव चले, उतने समय अनिल बहुगुणा जी भाजपा के बागी प्रत्याशी के रूप में मैदान में रहे. इस दौरान भी उनके और उनके समर्थकों द्वारा बराबर ये प्रचारित किया जाता रहा कि भाजपा उनके डीएनए में शामिल है. उनकी खुली बगावत के बाद भी न तो उन्होंने पार्टी छोड़ी और न ही पार्टी ने उन्हें निष्कासित किया. बहरहाल, अनिल बहुगुणा जी चुनाव जीते और जीतते ही धमाकेदार बयान दिया कि उनकी बगावत को प्रदेश अध्यक्ष की मौन सहमति थी, वे इस दौरान लगातार उनके संपर्क में रहे. ऐसा सुनते ही एक तरफ जहाँ बहुगुणा जी को वोट करने वाले मुस्लिम मतदाता सकते में आ गए वहीं भाजपा के लिए समर्पित कार्यकर्त्ता भी हतप्रभ रह गए.


केशव प्रसाद मौर्य की सभा के बाद जिला अध्यक्ष द्वारा कार्यवाही की प्रक्रिया दिखावा ही साबित हुई. हालाँकि इससे पार्टी में अनुशासन बहाल होने की आशा जागी थी मगर बहुगुणा जी के चुनाव जीतते ही वो भी समाप्त हो गई. पार्टी प्रदेश कार्यकारिणी की तरफ से बागी प्रत्याशी पर कार्यवाही तो दूर की बात, उनको सिकंदरा उपचुनाव में प्रचार के लिए भी भेजा गया. पदाधिकारियों, मंत्रियों के साथ बागी प्रत्याशी भी प्रचार-बैठकें करते नजर आये.

जनपद जालौन के समर्पित कार्यकर्त्ता खुद को निपट अंधकार में मानने लगे. उनको अपने साथ छल होता दिखाई देने लगा. ऐसे में चोट उस समय भी लगी जबकि बहुगुणा जी के शपथ ग्रहण समारोह में न केवल जिला कार्यकारिणी के कई पदाधिकारी शामिल हुए वरन सदर विधायक गौरी शंकर वर्मा भी अनिल बहुगुणा के साथ गलबहियाँ करते देखे गए.

कार्यकर्ताओं की संख्या के आधार पर विश्व की सबसे बड़ी और अनुशासित पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा अनुशासनहीन को गले लगाती नजर आई. इससे पार्टी में अंदरूनी स्तर पर विवाद और दो-फाड़ की सम्भावना दिखाई दे रही है. इस बीच किसी भी स्तर पर सुधार की कोई पहल तो दिखाई नहीं दी वरन कार्यकर्ताओं के सामने अनुशासनहीनता को और स्थापित करने का प्रयास किया गया जबकि भाजपा के जनपद जालौन के दो विधायकों के साथ बागी अनिल बहुगुणा राष्ट्रीय कार्यकारिणी पदाधिकारियों संग फोटो खिंचवाते पाए गए, मिठाई खाते देखे गए.


इस बीच गुप्त सूत्रों से खबर आई कि अनिल बहुगुणा के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल भाजपा के विधायक और पदाधिकारियों को नेतृत्व से नोटिस जारी किया गया है किन्तु इसे भी अपने प्रभाव से दबा दिया गया है.


पार्टी खुद में कितनी भी अनुशासित होने का दावा करे किन्तु इस तरह के कदमों से उसने अपनी साख ही खोई है. नगर पालिका चुनाव अंतिम चुनाव नहीं है. अनिल बहुगुणा अंतिम प्रत्याशी नहीं हैं. गौरी शंकर वर्मा, नरेन्द्र सिंह जादौन, मूलचंद्र निरंजन अंतिम विधायक नहीं हाँ. चुनाव आगे भी आने हैं, विधायक प्रत्याशी आगे भी आने हैं मगर कार्यकर्त्ता वही रहने हैं, मतदाता वही रहने हैं.


अब पार्टी खुद तय करे कि उसे करना क्या है क्योंकि मतदाता पर बहुत ज्यादा सकारात्मक असर नहीं हुआ है कांग्रेस की जगह भाजपा को लाने का और बहुत ज्यादा नकारात्मक असर फिर न पड़ेगा भाजपा को वापस करने में. 

19 जनवरी 2017

राजनैतिक सुधार के लिए उतरो मैदान में

चुनाव आते ही सम्बंधित प्रदेश के लोग, लगभग सभी लोग अपनी-अपनी तरह से सक्रिय हो जाते हैं. राजनीतिज्ञ अपने स्तर पर सक्रियता दिखाने लगते हैं तो उनके समर्थक अपनी तरह की सक्रियता में संलिप्त हो जाते हैं. इसके साथ ही निर्वाचन आयोग, जिला प्रशासन भी सक्रियता से अपने दायित्वों का निर्वहन करने में जुट जाते हैं. चुनावों में इन दो पक्षों की प्रत्यक्ष भूमिका के अलावा बहुत से ऐसे पक्ष होते हैं जो कहीं न कहीं सक्रिय राजनीति में संलिप्त न होने के बाद भी पूरे चुनावी मौसम में सक्रिय दिखाई देते हैं. ऐसे लोगों में एक तो वे लोग होते हैं जो किसी न किसी रूप में चुनावी कार्यों से जुड़े होते हैं. इनमें बैनर, पोस्टर, होर्डिंग छापने वाले, राजनीतिज्ञों के पक्ष में प्रचार-प्रसार करने वाले लोग शामिल होते हैं. इसके अलावा एक दूसरा पक्ष वो होता है जिसकी चुनावों में किसी तरह की कोई भागीदारी नहीं होती है, सिवाय मतदान करने के किन्तु इसके बाद भी उसके द्वारा सर्वाधिक सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया जाता है. ये पक्ष चुनावी क्षेत्र में सभी जगह पाया जाता है. क्या गाँव, क्या शहर. क्या गली क्या चौराहा. क्या चाय की दुकान क्या पान की गुमटी. क्या दफ्तर क्या बाज़ार. सर्वत्र इस पक्ष की उपस्थिति रहती है. और सर्वाधिक गौर करने वाली स्थिति ये होती है कि इस पक्ष के द्वारा अपने-अपने तर्कों से अपने-अपने समर्थन वाले दल की सरकार तक बनवा दी जाती है. अपने मन का प्रतिनिधि चुनवा लिया जाता है. अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बना लिया जाता है. 



देश, प्रदेश को संचालित करने वाली सबसे अहम् प्रक्रिया को, सबसे महत्त्वपूर्ण कदम राजनीति को आज उससे दूर होते जा रहे प्रबुद्ध वर्ग ने नाकारा साबित करवा दिया है. राजनीति को सबसे निकृष्ट कोटि का काम सिद्ध करवा दिया है. इसी कारण गली-चौराहे-नुक्कड़ पर खड़े लोग राजनीतिक चर्चा में तो संलिप्त दिखाई पड़ जाते हैं, उसकी अच्छाइयों से ज्यादा उसमें बुराइयों को खोजने का काम करते हैं, उसमें सक्रिय ईमानदार लोगों से अधिक उसमें सक्रिय भ्रष्ट-माफिया लोगों की अधिक चर्चा करते हैं. इसका दुष्परिणाम ये होता है कि राजनीति के नकारात्मक प्रचार का एक से बढ़ते हुए अनेक तक चला जाता है और समाज की एक सोच ये बनती चली जाती है कि वर्तमान में राजनीति से अधिक घटिया, अधिक बुरी कोई चीज नहीं. आखिर, किसी ने कभी इस पर विचार किया है कि राजनीति कब, कैसे भ्रष्ट बना दी गई? कब, कैसे राजनीति को बुराई का समर्थन करने वाला सिद्ध कर दिया गया है? किसने राजनीति को गन्दा बना दिया है? शायद राजनीति पर, गठबंधन पर, चुनावों पर, जनप्रतिनिधियों पर, सरकार के कार्यों पर लम्बी-लम्बी बहस करने का समय सबके पास है. अपने-अपने बनाये निष्कर्षों को थोपने का समय सबके पास है. अपने पूर्वाग्रहों को दूसरों पर लादने के लिए अनुभव सबके पास है. यदि किसी के पास कुछ नहीं है तो वो ये कि लोगों के बीच जाकर राजनीति की असलियत को समझाने का काम किया जाये. यदि समय नहीं है तो इस बात का कि अपनी आने वाली पीढ़ी को बता सकें कि बिना राजनीति के ये देश एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता है. यदि समय नहीं है तो इसके लिए नहीं है कि लोगों को राजनीति के विरुद्ध करते नकारात्मक प्रचार से रोका जा सके.


राजनीति के प्रति राजनीति से प्रबुद्धजनों के मोह-भंग ने, राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण ने, राजनीति के प्रति होते नकारात्मक प्रचार ने, राजनीति के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को प्रेरित न कर पाने ने राजनीति को दो कौड़ी का बना दिया है. आज प्रत्येक मतदाता राजनीति पर बड़ी लम्बी-लम्बी चर्चा करने का दम रखता है मगर अपनी संतानों को राजनीति में आने को प्रेरित नहीं करता. उसके द्वारा राजनीति में आती गिरावट पर चिंता व्यक्त की जाती है मगर उसके उसमें सुधार के लिए भावी पीढ़ी को आगे नहीं किया जाता. ऐसे लोगों की बातों में राजनीति की गिरावट दिखती है मगर इनके मन में बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के लुभावने पैकेज के सपने सजे होते हैं. प्रत्येक नागरिक को समझना होगा कि किसी भी सदन के लिए एक निश्चित समयावधि के बाद अपनी सीटों को भरा जाना अनिवार्य है. यदि अच्छे लोग राजनीति में आकर चुनावों में नहीं उतरेंगे तो सदन अपने आपको ऐसे लोगों से भर लेगा जो उस समय चुनाव-मैदान में होंगे. ये स्थिति धीरे-धीरे बढ़ती गई और आज बहुतायत में हालत ये है कि अच्छे लोग राजनीति से, चुनावी मैदान से बाहर हैं और अपराधी किस्म के लोग राजनीति में प्रवेश करते जा रहे हैं. राजनीति में आती जा रही गंदगी सिर्फ बातें करने से, अनावश्यक बहस करने से दूर नहीं होने वाली. यदि इसे साफ़ करना है, राजनीतिक गंदगी को मिटाना है तो राजनीति की बातें नहीं वरन राजनीति करनी होगी. आज के लिए न सही, कल के लिए.... अपने लिए न सही, अपनी भावी पीढ़ी के लिए लोगों को जागना होगा.