शिवलिंग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शिवलिंग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

31 मई 2022

मुस्लिम समाज को सकारात्मक पहल करने का अवसर

काशी को केन्द्र और उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार होने के बाद से भगवान शिव की नगरी नहीं स्वीकारा गया है बल्कि महादेव की इस नगरी का जिक्र सनातन संस्कृति में अनादि काल से देखने को मिलता है. विगत कई वर्षों से जिस तरह से रामलला की जन्मभूमि को लेकर इस देश में विवाद मचा रहा, वैसा ही कुछ मसला काशी में ज्ञानवापी को लेकर बना रहा. अब जबकि विगत दिनों अदालत के आदेश के बाद हुए सर्वे से मस्जिद में यह स्पष्ट रूप से देखने में आया कि वुजू करने की जगह पर शिवलिंग स्थापित है. शिवलिंग जैसे पावन स्थल को, श्रद्धा के केन्द्र को किसने वुजू करने के स्थान में परिवर्तित किया होगा, ये अलग चर्चा का विषय है मगर इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सके कि ऐसा करने के पीछे तात्कालिक आतातायियों में मन में, दिल में हिन्दुओं और उनके आराध्यों के विरुद्ध नफरत का होना रहा होगा. 


ऐसा समझने के लिए किसी राकेट साइंस की आवश्यकता नहीं है. देश भर में सैकड़ों की संख्या में हिन्दुओं के, सनातनधर्मियों के आस्था के केन्द्रों को, उनके आराध्यों को क्षत-विक्षत किया गया. बहुतेरे मंदिरों, श्रद्धा केन्द्रों का ध्वंस करके उन आतातायियों ने अपने मजहबी स्थलों का निर्माण किया. कालांतर में सनातनधर्मियों के सहिष्णु व्यवहार और सरकारों के तुष्टिकरण नीति के कारण ऐसे स्थलों पर विवाद भले ही बना रहा हो मगर कब्ज़ा मुस्लिम समाज ने बनाये रखा.


कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराने का काम करता है. पूर्व में सरकारों के सामने, इतिहास लेखन करने वालों के सामने, इतिहास पढ़ाने वालों के सामने, पुरातत्त्व विभाग वालों के सामने, धार्मिक-मजहबी व्यक्तित्वों के सामने क्या स्थिति रही होगी कि उनके द्वारा भी सत्य को सामने लाकर विवादों को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया गया. बहरहाल, अब जबकि अदालत के आदेश पर हुए सर्वे में ज्ञानवापी में शिवलिंग मिला है. यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि ऐसा होने के चिन्ह मात्र नहीं मिले हैं, कोई ध्वंस अवशेष नहीं मिले हैं बल्कि स्पष्ट दृष्टिगोचर शिवलिंग मिला है. ऐसी स्थिति के बाद किसी तरह के विवाद की कोई गुंजाइश नहीं बचती थी मगर इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष की तरफ से ऐसा किया गया.




एक पल को ये स्वीकार लिया जाये कि मुस्लिम समाज बहुत लम्बे समय से उस स्थान पर अपने मजहबी कृत्य को अंजाम देता आ रहा था, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वर्तमान में जो प्रमाण मिला है उसे सिरे से नकार दिया जाये. इस स्थान पर सन 1993 तक नियमित रूप से श्रृंगार गौरी की पूजा होती थी, बाद में सन 1996-97 में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मों के त्योहार एक ही दिन पड़ गए थे. रामजन्मभूमि मामले के चलते पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से यहाँ केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की एक टुकड़ी की तैनाती कर दी. बाद में यही टुकड़ी यहाँ स्थायी हो गई. समय के गुजरने के साथ श्रृंगार गौरी जाने वाले रास्ते को भी पुलिस-प्रशासन ने बंद कर दिया. ऐसा होने के बाद मामला अदालत पहुँचा तो अदालत ने वासंतिक नवरात्रि के चौथे दिन दर्शन-पूजन करने का आदेश दिया. अदालत के आदेश के बाद श्रृंगार गौरी की साल में एक दिन वासंतिक नवरात्रि की चतुर्थी को दर्शन-पूजन की अनुमति प्रशासन ने दी. इसके बाद गत वर्ष 2021 में पाँच महिलाओं ने श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा-अर्चना की माँग को लेकर वाराणसी के सिविल जज सीनियर डिवीजन रवि कुमार दिवाकर की अदालत में याचिका दायर की. इन महिलाओं ने अदालत से ये माँग भी की थी कि नंदी, गणेश के साथ अन्य देवताओं की स्थिति जानने के लिए एक कमीशन बनाया जाए. सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत ने इसी के बाद एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया और कमीशन की कार्यवाही, वीडियोग्राफी की कार्यवाही पूरी कर रिपोर्ट देने के लिए कहा.


रिपोर्ट के बाद जब सच्चाई सामने आ ही गई थी तो मुस्लिम पक्ष को एक कदम आगे आकर उस स्थल पर पूर्व की भांति हिन्दुओं को पूजा-दर्शन करने की पहल की जानी चाहिए थी. ऐसा तो हुआ नहीं बल्कि इसके उलट जाकर शिवलिंग को फव्वारा बताये जाने की, औरंगजेब को दयालु बताये जाने की, तमाम मंदिरों के नीचे मस्जिद होने की अनर्गल बयानबाजियाँ होने लगीं. देश में एक तरफ सरकारें, अनेक बुद्धिजीवी, संस्थाएँ हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए जी-जान से लगी रहती हैं. बात-बात पर गंगा-जमुनी संस्कृति का उदाहरण दिया जाता है. बहुत से मुस्लिम व्यक्तित्वों को देश में भय लगने लगता है. असहिष्णुता बढ़ती दिखाई देने लगती है मगर जब भी मुस्लिम समाज के सामने इस तरह का कोई भी अवसर आता है जबकि वे सौहार्द्र, समन्वय का उदाहरण दे सकते हैं, उसी समय उनकी तरफ से अनर्गल बयान दिए जाने शुरू कर दिए जाते हैं.


इसे लोग भले ही सार्वजनिक रूप से न स्वीकारें मगर सत्य यही है कि विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने देश में हिन्दू धार्मिक स्थलों, सनातनधर्मी आस्था केन्द्रों को नष्ट करके उन पर अपने मजहब की इमारतों का निर्माण किया है. अब जबकि ज्ञानवापी में स्पष्ट रूप से शिवलिंग मिला है, कुतुबमीनार और ताजमहल की चर्चा जनमानस के बीच टहलने लगी है, तब मुस्लिम समुदाय को अपने सहिष्णु होने का उदाहरण देना चाहिए. अभी तक किसी भी मुस्लिम संगठन ने खुलकर ज्ञानवापी में स्थापित शिवलिंग पर कोई सकारात्मक बयान नहीं दिया है. किसी मुस्लिम बुद्धिजीवी, किसी मुस्लिम साहित्यकार ने, किसी मुस्लिम फ़िल्मी कलाकार ने अथवा किसी मुस्लिम राजनीतिज्ञ ने हिन्दुओं के पक्ष में कोई बयान या कोई अपील नहीं की है. एक मुस्लिम राजनीतिक व्यक्ति शिवलिंग के मिलने के दिन से बयान देने में लगे हैं, तो वे भी भड़काऊ हैं, मुस्लिम समाज को बरगलाने वाले हैं.


ज्ञानवापी पर जिस तरह से गैर-मुस्लिम नागरिकों द्वारा समर्थन आ रहा है, उसी तरह से देश के समस्त मुस्लिम नागरिकों को भी संगठित होकर इसका समर्थन करना चाहिए. यदि इसके बाद भी मुस्लिम नेताओं, मुस्लिम मजहबी संगठनों, मुस्लिम बुद्धिजीवियों द्वारा समर्थन नहीं किया गया तो न केवल आपसी समन्वय, सौहार्द्र कमजोर होने की आशंका है बल्कि अन्य स्थलों पर विवाद बढ़ना भी स्वाभाविक है.


.

13 सितंबर 2020

शिवलिंग को गुप्तांग बताना कुत्सित मानसिकता का परिचायक है

शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा क्यों?


अब सनातन संस्कृति के लोग खुद ही शिवलिंग को शिव भगवान का गुप्तांग समझने लगे हैं और दूसरे हिन्दुओं को भी ये गलत जानकारी देने लगे हैं। ऐसी भ्रामक स्थिति में सही तथ्यों को जानना बहुत जरूरी है।

कुछ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को बताया जाता है कि हिन्दू लोग लिंग और योनि की पूजा करते हैं। उन मूर्खों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है और अपने छोटे-छोटे बच्चों को सनातन संस्कृति के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है, इसे देववाणी भी कहा जाता है। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है जबकी जननेंद्रिय को संस्कृत मे शिशिन कहा जाता है। इस दृष्टि से शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक। इसे ऐसे भी और सहज रूप में समझा जा सकता है कि पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक। अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते हैं वे बतायें कि क्या स्त्री लिंग के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए?

शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (क्योंकि ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्ष/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत।


शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनि नहीं है। दरअसल यह गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और मलेच्छों यवनों  के द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने पर तथा बाद में मुगलों और षडयंत्रकारी अंग्रेजों के द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम हिन्दी के एक शब्द सूत्र को ही ले लें तो सूत्र का मतलब डोरी/धागा, गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है। जैसे कि नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र इत्यादि। उसी प्रकार अर्थ शब्द का भावार्थ : सम्पति भी हो सकता है और मतलब, आशय, अभिप्राय (मीनिंग) भी। बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है तथा इसे कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है। जैसे प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)

ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे हैं, ऊर्जा और प्रदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। विज्ञान का भी यही सिद्धांत है e=mc2

इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं। ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है। शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है। यह पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी है अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि दोनों समान हैं।

अब बात करते है योनि शब्द पर। मनुष्य योनि, पशु योनि, पेड़-पौधों की योनि, जीव-जंतु योनि आदि। योनि शब्द का संस्कृत में प्रादुर्भाव, प्रकटीकरण अर्थ होता है। जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। कुछ धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है, इसीलिए वे योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं। जबकि हिन्दू धर्म मे 84 लाख योनि बताई जाती हैं यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि धरती में 84 लाख प्रकार के जीव (पेड़, कीट, जानवर, मनुष्य आदि) हैं।

पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है, शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक, दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई। बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके। इसका कुछ विकृत, गंदी मानसिकता वाले गोरे अंग्रेजों के गंदे दिमागों ने इसमें गुप्तांग की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली। इसके पीछे के रहस्य की जानकारी न होने के कारण बहुत सारे अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं को भ्रमित किया गया। आज भी बहुतायत हिन्दू इस दिव्य ज्ञान से अनभिज्ञ हैं।

हिन्दू सनातन धर्म व उसके त्यौहार विज्ञान पर आधारित हैं जोकि हमारे पूर्वजों, संतों, ऋषियों-मुनियों तपस्वियों की देन है। आज विज्ञान भी हमारी हिन्दू संस्कृति की अद्भुत हिन्दू संस्कृति व इसके रहस्यों को सराहनीय दृष्टि से देखता है व उसके ऊपर शोध कर रहा है।

+
(एक सन्देश के रूप में प्राप्त इस जानकारी के वास्तविक लेखक की जानकारी नहीं है. इसे जानकारी की दृष्टि से भ्रमित लोगों के बीच प्रसारित किया जाए.)

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग