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19 अप्रैल 2026

परिसीमन के जाल में उलझा महिला आरक्षण

लोकसभा में दो तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित न हो सका. केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन के उद्देश्य से इस विधेयक को लोकसभा में रखा गया था. इस विधेयक के द्वारा लोकसभा की सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करना था. देखा जाये तो इस विधेयक का उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को बदलना नहीं बल्कि लोकसभा की सीटों को अधिक करना था. ऐसा करने के पीछे का मंतव्य 2023 में पारित किये जा चुके नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने की अनिवार्य शर्त के रूप में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना था. 2023 में पारित इस अधिनियम के द्वारा महिलाओं को लोकसभा एवं राज्य की विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया जाना है लेकिन इसके लागू होने के सन्दर्भ में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना अनिवार्य शर्त के रूप में है. लोकसभा में परिसीमन विधेयक के पारित न होने ने भारतीय संघवाद, क्षेत्रीय संतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के आपसी संकटों को उजागर कर दिया है.

 

प्रथम दृष्टया देखा जाये तो इस विधेयक के पारित न हो पाने को लोकसभा सीटों के न बढ़ने के रूप में, देश पर आर्थिक बोझ न बढ़ने के रूप में देखा जा रहा है. इसके सापेक्ष यदि महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर विचार की दृष्टि से देखा जाये तो इस विधेयक का पारित न होना महिला आरक्षण के प्रति नकारात्मक भाव को उत्पन्न करता है. इस विधेयक के गिरने से 2029 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत भागीदारी मिलने की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गई है. इसे एक तरह के संवैधानिक धोखे के रूप में देखा जाना चाहिए जो महिलाओं को राजनैतिक प्रतिनिधित्व देने का सपना दिखाता है किन्तु उसके क्रियान्वयन को परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रिया से आबद्ध कर देता है.

 

लोकसभा सीटों का परिसीमन सदैव से एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील संवैधानिक मुद्दा रहा है. यही कारण है कि वर्तमान समय में भी लोकसभा की सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बना हुआ है. 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन को 2000 तक के लिए रोक दिया गया था. कालांतर में इस रोक को 2001 में 84वें संविधान संशोधन के द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया था. ऐसा करते समय तर्क दिया गया था कि 2026 तक देश में जनसंख्या वृद्धि की दर स्थिर हो जाएगी जिससे सीटों के बँटवारे में किसी राज्य को अन्याय महसूस नहीं होगा. ऐसे में यदि संविधान संशोधन के द्वारा परिसीमन पर लगी रोक को आगे न बढ़ाया गया तो 2026 के बाद संवैधानिक रूप से परिसीमन करवाना होगा. सीटों के बँटवारे को लेकर अन्याय जैसा भाव उत्तर और दक्षिण राज्यों के मध्य सदैव से बना रहा है. उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच जनसंख्या वृद्धि का असंतुलन है. दक्षिण भारतीय राज्यों ने दशकों तक प्रभावी ढंग से परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को लागू किया जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती रही. वर्तमान परिसीमन विधेयक के आने पर दक्षिण राज्यों का यही कहना था कि यदि आज की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन लागू किया गया जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों की संसद में हिस्सेदारी कम हो जाएगी.

 

विधेयक के पारित न होने ने जहाँ महिला आरक्षण की गति को अवरोधित किया है वहीं निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन रुकना भी एक प्रकार के नुकसान के रूप में सामने आया है. कई शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व का अधिक होना, ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटी सीटों का होना भी लोकतान्त्रिक प्रणाली में एक तरह की बाधा है. इससे एक वोट, एक मूल्य का लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर प्रतीत हो रहा है. वर्तमान में एक-एक सांसद बहुत बड़ी संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो कई बार सांसदों की संसदीय जवाबदेही को कम करता है. इस दृष्टि से लोकसभा में सीटों की संख्या न बढ़ना एक प्रकार की प्रशासनिक हानि है क्योंकि लोकसभा सीट न बढ़ने की स्थिति में मतदाताओं और उनके प्रतिनिधि के बीच की दूरी को कम करने का एक अवसर हाल-फ़िलहाल कम हुआ है.

 

परिसीमन विधेयक के लोकसभा में पारित न होने ने महिलाओं के राजनैतिक अधिकारों की प्राप्ति की राह में एक अवरोध उत्पन्न किया है. यहाँ इस विफलता के पीछे से एक सवाल उपजता है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पारित होने के समय लोकसभा सीट का परिसीमन होना अनिवार्य शर्त के रूप में परिलक्षित था तो अब परिसीमन विधेयक का विरोध क्यों? 2023 में महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक सभी संसद सदस्यों के पास पहुँचा होगा, उसी समय परिसीमन का विरोध न करके महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक को पारित करवा देना अलग ही कहानी कहता है. बहरहाल, महिला आरक्षण के भविष्य और लोकसभा सीटों के परिसीमन पर लगी रोक की समय-सीमा को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि परिसीमन केवल सीटों का गणित न बनकर भारतीय संघ के सभी घटकों के बीच विश्वास का आधार बने. वर्तमान स्थिति में परिसीमन विधेयक के गिरने को तात्कालिक राजनीतिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालिक संवैधानिक हितों के सन्दर्भ में देखने और सँवारने की आवश्यकता है.

04 अप्रैल 2025

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 पारित

संसद ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 को पारित कर दिया है. लोकसभा के बाद यह विधेयक राज्यसभा में भी पारित हो गया. राज्यसभा में विधेयक पर लगभग बारह घंटे तक चली चर्चा के बाद देर रात दो बजे के बाद मत-विभाजन करवाया गया. इसमें विधेयक के पक्ष में 128 सदस्यों ने मतदान किया जबकि 95 सदस्यों ने विधेयक के विरोध में मतदान किया. लोकसभा पहले ही विधेयक को मंजूरी दे चुकी है. यहाँ इस विधेयक के पक्ष में 288 और विरोध में 232 मत पड़े.

 



अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने ये संशोधन बिल पेश किया था. विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि इस कानून से करोड़ों गरीब मुसलमानों को फायदा होगा और किसी भी तरह से यह किसी भी मुसलमान को नुकसान नहीं पहुँचाएगा. उन्होंने कहा कि यह कानून वक्फ संपत्तियों में हस्तक्षेप नहीं करता है. वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है, जिसमें विरासत स्थलों की सुरक्षा और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने के प्रावधान हैं. इस विधेयक का उद्देश्य संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाकर, वक्फ बोर्ड और स्थानीय अधिकारियों के बीच समन्वय को सुव्यवस्थित करके और हितधारकों के अधिकारों की रक्षा करके शासन में सुधार करना भी है. इस विधेयक का उद्देश्य वक्फ बोर्ड को अधिक समावेशी बनाना है.

 

इसी के साथ संसद ने मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2025 को भी मंजूरी दे दी है. यह विधेयक मुसलमान वक्फ अधिनियम 1923 को निरस्त करता है, जिसे राज्यसभा ने मंजूरी दे दी है. लोकसभा में पहले ही इस विधेयक को पारित किया जा चुका है.


18 दिसंबर 2024

समय की माँग है एक देश एक चुनाव

लम्बे समय से देश में एकसाथ चुनाव कराये जाने की चर्चा चलती रही है. एकसाथ चुनाव की प्रक्रिया को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के सन्दर्भ में लिया जाता रहा है. एकसाथ चुनाव कराने को कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दल सहमत नहीं हैं. उनके द्वारा सरकार के इस कदम का विरोध किया जा रहा है. एकसाथ चुनाव कराये जाने की चर्चाओं, बहस के बीच लोकसभा में यह बिल 198 के मुकाबले 269 मतों से पारित हो गया. कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मंगलवार को देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रावधान वाले संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक 2024 और उससे जुड़े संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक 2024 को लोकसभा में प्रस्तुत किया था.

 

वर्तमान में भले ही देश में एकसाथ चुनाव कराये जाने की प्रक्रिया पर विरोधी स्वर उठ रहे हों मगर ये कोई नवीन अवधारणा नहीं है. संविधान को अंगीकार किए जाने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के पहले चुनाव 1951-52 में एक साथ आयोजित किए गए थे. इसके बाद 1957, 1962 और 1967 के तीन चुनाव भी एकसाथ संपन्न हुए थे. ऐसा नहीं है कि सरकार ने एकसाथ चुनाव कराये जाने सम्बन्धी बिल अचानक से लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया. सरकार द्वारा सितम्बर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एकसाथ चुनाव कराने पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था. इस समिति का प्राथमिक उद्देश्य यह पता लगाना था कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एकसाथ चुनाव कराना कितना उचित होगा. इस हेतु सार्वजनिक और राजनैतिक विचारों को आमंत्रित किया गया और भविष्य में एकसाथ चुनाव प्रक्रिया संपन्न करवाए जाने से सम्बन्धित चुनौतियों का विश्लेषण किया गया. समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही एकसाथ चुनाव कराये जाने सम्बन्धी बिल का आधार तैयार किया गया. समिति ने एकसाथ चुनाव की व्यवस्था को दो चरणों में लागू किये जाने की सिफारिश की. चूँकि देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के साथ-साथ पंचायती चुनावों को भी संपन्न करवाना होता है. इसी को देखते हुए समिति ने सिफारिश की कि पहले चरण में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाएँ. दूसरे चरण में इन चुनावों के संपन्न होने के सौ दिन के भीतर नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराये जाएँ.

 



यह सच है कि भारत जैसे विशाल देश में निर्बाध रूप से निष्पक्ष चुनाव कराना हमेशा से एक चुनौती रहा है. यह चुनौती उस समय और बड़ी हो जाती है जबकि प्रतिवर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं. लगातार होते चुनावों के कारण देश सदैव चुनावी प्रक्रिया में बना रहता है. इससे न केवल बहुतायत में प्रशासनिक मशीनरी चुनाव प्रक्रिया में लगी रहती है बल्कि देश पर भारी आर्थिक बोझ भी पड़ता है. ऐसी स्थिति में कई बार लगता है कि एकसाथ चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने के कारण देश सहजता से विकास के रास्ते पर चल सकेगा. इस प्रक्रिया के विरोध में यह कह देना कि आज़ादी के बाद के समय में एकसाथ चुनाव संपन्न करवाना इस कारण सहज हुआ था क्योंकि तब जनसंख्या कम थी. आज अधिक जनसंख्या के कारण एकसाथ चुनाव करवाना कठिन होगा. इस विचार के साथ ये याद रखना होगा कि यदि देश की जनसंख्या बढ़ी है तो वर्तमान में तकनीक और अन्य संसाधनों का भी विकास हुआ है. न केवल संचार साधनों का बल्कि परिवहन व्यवस्था में भी क्रांतिकारी विकास हुआ है. ऐसे में आज़ादी के तत्काल वर्षों की तुलना में अब एकसाथ चुनाव करवाना ज्यादा सहज है, आसान है. 

 

एकसाथ चुनाव करवाए जाने की स्थिति में सबसे बड़ा लाभ यह है कि निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आदर्श आचार संहिता बहुत लम्बे समय तक लागू नहीं रहेगी. इसके चलते विकास कार्य लम्बी अवधि तक लम्बित नहीं रहेंगे और उनको समय से पूरा किया जा सकेगा. इसके साथ-साथ इससे बार-बार होने वाले चुनावों के कारण भारी-भरकम खर्च में कमी आएगी. संभव है कि एकसाथ चुनाव कराये जाने की स्थिति में धन का अपव्यय रुके और इससे काले धन, भ्रष्टाचार पर भी किसी तरह का अंकुश लग सके. एकसाथ चुनाव करवाया जाना जहाँ देश की राजनैतिक व्यवस्था के लिए, आर्थिक स्थिति के लिए लाभप्रद समझ आ रहे हैं वहीं इसका लाभ नागरिकों को भी मिलेगा. चुनावों के समय सक्रियता से अपना कार्य करने वाले सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को बार-बार चुनाव ड्यूटी पर लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. इससे जहाँ एक तरफ उनके समय की बचत होगी वहीं दूसरी तरफ वे चुनाव प्रक्रिया में बार-बार सक्रिय रहने के कारण होने वाली शारीरिक, मानसिक थकान से भी बच सकेंगे. ऐसा होने की स्थिति में वे अपने कर्त्तव्यों का पालन भी सही तरीके से कर पायेंगे.

 

एकसाथ चुनाव कराये जाने के विरोधी स्वरों को निश्चित रूप से समिति द्वारा सुना गया होगा, उस पर सकारात्मक रूप से विचार किया गया होगा. प्रथम दृष्टया एक देश एक चुनाव की अवधारणा में कोई बहुत बड़ी कमी नजर नहीं आती है. इसमें कोई दोराय नहीं कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा देश हर समय चुनावी प्रक्रिया में लगा रहता है. एकसाथ चुनाव होने से इस चक्रव्यूह से उसे मुक्ति मिलेगी. अब जबकि लोकसभा में इस सम्बन्ध में बिल पारित हो चुका है, ऐसे में सरकार से और विपक्षी दलों से अपेक्षा यही है कि वे सभी समवेत रूप में चुनावों के इस चक्रव्यूह से देश को निकालने के लिये व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलायें. इसके द्वारा राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोक का प्रयास हो और जनसामान्य में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना शामिल हो.


07 जून 2024

राक्षस अभी जिंदा हैं

हम लोग 1990-92 में विद्यार्थी हुआ करते थे. बाद के कालखण्ड में लोग मौज लेते थे कि रामलला हम आयेंगे, तारीख नहीं बताएँगे.... उस समय मन के किसी कोने में खुद से संशय करते थे कि क्या वाकई राममंदिर नहीं बन सकेगा?


कालांतर में मोदी जी के आने के बाद लगा कि राममंदिर बन जायेगा, बना भी. अपने आपमें गर्व की अनुभूति हुई. लगा कि उन राक्षसों को मुँहतोड़ जवाब मिला है जो राममंदिर निर्माण के विरुद्ध थे, जिन्होंने निहत्थे कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई हैं.


अब इस चुनाव परिणाम के बाद समझ आ रहा है कि राक्षसों का अस्तित्व अभी जिंदा है. श्रीराम का मंदिर बना है मगर उनकी वनवास से वापसी नहीं हुई है. कारसेवकों के हत्यारे फिर जीवन पा गए.


इस कष्ट को वही समझ सकते हैं जिन्होंने बाबरी ध्वंस के समय के कष्ट को सहा है. बाकियों के लिए ये राजनीति की गणित मात्र है.

06 जून 2024

लोकसभा चुनाव परिणाम पश्चात् विपक्ष

लोकसभा चुनाव का अंतिम परिणाम सामने आ चुका है. पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने दावों-वादों से कहीं अलग इस बार का चुनाव परिणाम सामने आया है. भाजपा के चार सौ पार के नारे ने असर न दिखाया तो गठबंधन के दावे कि चार जून को नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे ने भी असर न दिखाया. देश-प्रदेश स्तर पर चुनावी स्थितियाँ अलग रहीं और उसी के हिसाब से परिणाम भी सामने आये. चुनाव परिणामों ने कहीं ख़ुशी का माहौल बनाया तो कहीं दुःख भी प्रकट हुआ. इसमें सबके अपने-अपने भाव, अपनी-अपनी मानसिकता ने भी काम किया.

 



लोकसभा के चुनाव में परिणाम क्या रहा, किसे सत्ता मिली, कौन विपक्ष में रहा ये एक अलग विषय है मगर इस बार सबसे ज्यादा प्रभावी विषय यही रहा कि किसी भी भाजपा-विरोधी दल द्वारा ईवीएम को दोषी नहीं बताया गया. कहीं के चुनाव परिणामों के चलते इस पर आरोप नहीं लगाया गया, केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया गया. ईवीएम को हैक करने जैसी किसी भी खबर ने कहीं भी स्थान नहीं पाया. इससे साफ़ समझ आता है कि भाजपा-विरोधी दल विगत दस सालों में किस कदर बौखलाए हुए हैं. तमाम तरह की जुगत बिठाने के बाद भी वे सत्ता हासिल नहीं कर पा रहे हैं. सत्ता तो बहुत दूर की बात है, विगत दो बार से वे लोकसभा में सदन के भीतर अपना नेता सदन नहीं बना पा रहे हैं. इसका एकमात्र कारण नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने के लिए आवश्यक मतों का न मिल पाना रहा है. इसी तरह से लोकसभा उपाध्यक्ष पद भी खाली बना रहा. सामान्य सी मान्यता है कि सत्ता पक्ष को लोकसभा अध्यक्ष का और विपक्ष को लोकसभा उपाध्यक्ष का पद प्रदान किया जाता है. विपक्ष की स्थिति इस तरह की बनी रही कि लोकसभा उपाध्यक्ष का पद भी खाली बना रहा.

 

यहाँ अब विशेष ये होगा कि तमाम दलों द्वारा जो गठबंधन सरकार बनाने के लिए, खुद को सत्ता में लाने के लिए किया गया था क्या वही गठबंधन विपक्ष में होने के बाद सदन को चलने देगा? विगत वर्षों की तरह सदन के सञ्चालन में व्यवधान उत्पन्न करके देश का धन बर्बाद करने की उनकी मंशा तो इस बार भी नहीं है?


24 अप्रैल 2024

माधवी लता के तीर की हलचल

लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ अपने चरम पर हैं. उम्मीदवारों का अपना जोश है और उनके समर्थक अपने ही अलग जोश में है. इस जोश में, उत्साह के बीच कुछ लोकसभा सीटें और कुछ प्रत्याशी ऐसे भी हैं जिनको व्यापक लोकप्रियता मिली हुई है, वे पर्याप्त चर्चा के केन्द्र में हैं. सात चरणों में संपन्न होने वाले चुनावों का अभी पहला चरण ही पूरा हुआ है मगर सूरत लोकसभा सीट, हैदराबाद लोकसभा सीट, उम्मीदवार माधवी लता लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं. सूरत सीट के चर्चा में आने का कारण वहाँ से भाजपा के प्रत्याशी मुकेश दलाल का निर्विरोध निर्वाचित होना है. इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवारी खारिज हो जाने और अन्य प्रत्याशियों द्वारा नाम वापस लेने के कारण भाजपा प्रत्याशी को निर्विरोध विजयी घोषित करने के बाद से यह सीट लगातार चर्चा में बनी हुई है.

 

कुछ इसी तरह की चर्चा का विषय, लोकप्रियता के केन्द्र में हैदराबाद की सीट बनी हुई है. इस सीट पर विगत कई वर्षों से अपना कब्ज़ा बनाये असदुद्दीन ओवैसी के सामने भाजपा ने नए चेहरे माधवी लता को उतारा है. आजादी के बाद से लोकसभा के यहाँ संपन्न हुए कुल सत्रह चुनावों में दस बार ओवैसी परिवार की जीत हुई है. 1984 में असदुद्दीन ओवैसी के पिता सलाहुद्दीन ओवैसी ने पहली बार कांग्रेस के विजय अभियान को रोका था. उसके बाद से लगातार छह चुनाव सलाहुद्दीन ओवैसी ने और चार चुनाव असदुद्दीन ओवैसी ने जीते हैं. उनके खिलाफ मैदान में उतरी माधवी लता भले ही नया चेहरा हो मगर हैदराबाद की राजनीति में वे पिछले काफी समय से लगातार सक्रिय हैं. उनकी पहचान प्रखर हिन्दू नेता के साथ-साथ सजग सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में बनी हुई है. उनके हिन्दूवादी बयानों ने जहाँ उनको ओजस्वी वक्ता के रूप में पहचान दी वहीं झुग्गी-झोपड़ियों की मुस्लिम महिलाओं के सहायतार्थ काम करने ने उनको संवेदनशील व्यक्ति के रूप में भी जाना है.

 



इस चुनाव में ओवैसी पिछले कई वर्षों का चुनावी अनुभव लेकर उतरे हैं मगर माधवी लता पहली बार चुनावी मैदान में हैं. अपना पहला चुनाव होने के बावजूद माधवी के जोश में, उत्साह में किसी तरह की कमी नहीं दिखती है. इसी जोश, उत्साह में रामनवमी के अवसर पर उनका एक काल्पनिक तीर देशव्यापी चर्चा का विषय बन गया. इंटरनेट पर वायरल हुए एक वीडियो में रामनवमी की शोभायात्रा के अवसर पर माधवी लता बिना वास्तविक धनुष-वाण लिए इस तरह की भाव-भंगिमा बनाती हैं जैसे वे धनुष पर तीर चढ़ाकर उसे किसी पर चला रही हैं. उनके इस काल्पनिक तीर चलाने को लेकर इस आरोप के साथ प्राथमिकी दर्ज की गई कि उन्होंने शोभायात्रा के दौरान रास्ते में पड़ने वाली एक मस्जिद को निशाना बनाते हुए अपना काल्पनिक तीर चलाया था. उनके इस कृत्य से, भाव-भंगिमा से मुस्लिम समाज आहत हुआ है. अपने ऊपर दर्ज प्राथमिकी का विरोध करते हुए माधवी लता ने भी ओवैसी के विरुद्ध चुनाव आयोग में शिकायत की है. माधवी लता ने एक वीडियो का जिक्र करते हुए शिकायत की कि ओवैसी अपने चुनाव प्रचार के दौरान कसाइयों को गाय काटने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. वीडियो में वह ‘काटते रहो’ कहकर ‘बीफ जिंदाबाद’ का नारा भी लगा रहे हैं. यह एक प्रकार से खुलेआम गोमाँस खाने का समर्थन है. इससे एक समुदाय विशेष की भावनाएँ आहत हुई हैं.

 

हिन्दू, मुस्लिम समाज की भावनाओं के आहत होने की बात हो, तीर चलाने की मुद्रा बनाना हो, बीफ जिंदाबाद का नारा लगाना हो, ये सब राजनैतिक गलियारे की हलचल हैं. सोचने वाली बात ये है कि मुस्लिम समाज की खुलेआम कट्टरता से, उनके अतिवाद से हिन्दू समाज की भावनाएँ आहत नहीं होती हैं मगर एक काल्पनिक तीर पूरे समाज को आहत कर जाता है. यदि हैदराबाद के चुनावी माहौल को देखें तो इस बार स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि भाजपा का जिस तरह से दक्षिण में विस्तार हो रहा है उससे उसके विरोधियों में हलचल मची हुई है. वैसे तो हैदराबाद मुस्लिम बहुल सीट है किन्तु इस बार पाँच लाख से अधिक मतदाताओं के कम हो जाने तथा माधवी लता के प्रचार के निराले अंदाज से विरोधी खेमे में बेचैनी है. इस बेचैनी का एक और कारण असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा का तेलंगाना विधानसभा चुनाव के दौरान किया गया दावा भी है. उन्होंने दावा किया था कि राज्य की सत्ता में आने पर तीस मिनट के भीतर हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर कर दिया जाएगा. केंद्रीय मंत्री और तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष जी. किशन रेड्डी ने भी इसी तरह का बयान देकर हैदराबाद नाम परिवर्तन की राजनीति को हवा दी. विगत लम्बे समय से भाजपा जिस तरह से सनातन संस्कृति, राष्ट्रीय भावना को लेकर काम कर रही है उसे लेकर हैदराबाद का नाम भाग्यनगर किये जाने के समर्थकों में जबरदस्त उत्साह है.  

 

हैदराबाद में मुस्लिम लगभग साठ प्रतिशत, हिन्दू पैंतीस प्रतिशत और शेष में अन्य समुदाय हैं. भले ही 1984 में पहली जीत के बाद से ओवैसी परिवार का मत प्रतिशत बढ़ता रहा हो किन्तु माधवी लता द्वारा गरीब मुस्लिम महिलाओं के लिए काम करते रहने से उनको मुस्लिम समाज का समर्थन मिल रहा है. निवर्तमान सांसद एवं प्रत्याशी असदुद्दीन ओवैसी अथवा भाजपा के नए चेहरे माधवी लता में से किसका निर्वाचन होगा, ये तो यहाँ के मतदाताओं पर निर्भर है. यदि ओवैसी अपने पिछले रिकॉर्ड को बनाये रख पाते हैं तो सबकुछ जैसे का तैसा नजर आएगा किन्तु यदि माधवी लता की जीत होती है तो निश्चित ही इस शहर की पहचान की पुनर्व्याख्या तय होगी. चुनाव परिणाम कुछ भी हो ओवैसी के गढ़ में एक महिला का खम ठोकना दिलचस्प है. आत्मविश्वास से भरी हुई माधवी लता जोरदार चुनौती दे रहीं है. लोकसभा चुनाव परिणाम कुछ भी हो, हैदराबाद का भाग्य किसी भी करवट बैठे मगर इस सितारे का राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर चमकना तय है, एक उत्कृष्ट महिला नेत्री का उदय अवश्य है. 






 

28 मई 2023

नया संसद भवन देश को समर्पित

देश आज़ादी का अमृतकाल मना रहा है और इसी काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को स्वदेशी, नया संसद भवन समर्पित किया. पारंपरिक पूजा-पाठ के द्वारा नए संसद भवन का उद्घाटन समारोह आरम्भ हुआ. इसमें प्रधानमंत्री द्वारा ऐतिहासिक और धार्मिक सेंगोल को भी स्थापित किया गया. इस नए संसद भवन की आधारशिला 10 दिसंबर 2020 को रखी गई थी. इस भवन को आर्किटेक्ट बिमल पटेल ने डिजाइन किया और निर्धारित समयसीमा के भीतर यह बनकर तैयार भी हो गया. 




देश को मिला नया संसद भवन चार मंजिला है. 64 हजार 500 वर्ग मीटर में बने इस नए संसद भवन में तीन द्वार हैं, इन्हें ज्ञान द्वार, शक्ति द्वार और कर्म द्वार नाम दिया गया है. लोकतंत्र का प्रतीक संसद भवन 862 करोड़ रुपये की लागत में बनकर तैयार हुआ है. इस नए संसद भवन में संविधान हॉल है. इसी हॉल में संविधान की प्रति रखी जाएगी. संविधान हॉल के एक तरफ लोकसभा और दूसरी तरफ राज्यसभा है. नए संसद भवन में लोकसभा को 3015 वर्ग मीटर के क्षेत्र में तैयार किया गया है. इसे राष्ट्रीय पक्षी मयूर थीम पर बनाया गया है. राज्यसभा कुल 3,220 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में राष्ट्रीय फूल कमल थीम पर बनाया गया है.




भारत की प्रगति और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले नए संसद भवन के लिए एक विश्व स्तरीय बुनियादी ढाँचा निर्मित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले कारीगरों को स्किल इंडिया ने प्रमाणित किया है. इनके द्वारा नए संसद भवन का फर्नीचर ऐसे तैयार किया है कि लोकसभा में 888 और राज्यसभा में 384 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है. संयुक्त सत्र के दौरान लोकसभा भवन में 1272 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है. नए संसद भवन के लोकसभा में सेंगोल की स्थापना की गई है. इसे लोकसभा स्पीकर के आसन के पास लगाया गया है. सेंगोल राजदंड सिर्फ सत्ता का प्रतीक नहीं बल्कि राजा के सामने हमेशा न्यायशील बने रहने और जनता के प्रति समर्पित रहने का भी प्रतीक रहा है. 






 

10 अप्रैल 2018

चुनावी आहट और उनकी साजिश भरी हलचल

लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई देने लगी है. इस आहट को सुनकर सभी राजनैतिक दल अपने-अपने हथकंडे आजमाने की जुगत भिड़ाने लगे हैं. इन्हीं हथकंडों के रूप में एक सप्ताह में भारत ने दो भारत बंद का सामना किया. भारत बंद की इस राजनीति में क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम परिलक्षित हुआ. उच्चतम न्यायालय के निर्णय के विरोध में शुरू हुए आन्दोलन को आहिस्ता से केंद्र सरकार विरोधी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विरोधी बना दिया गया. दलितों से सम्बंधित संगठनों और कुछ राजनैतिक दलों ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को अपने हथकंडों के रूप में परिभाषित किया और देश भर के तमाम दलितों के बीच सन्देश फैलाया कि उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार की मंशा से एससी/एसटी एक्ट को समाप्त कर दिया है. इसके साथ-साथ अब केंद्र सरकार आरक्षण को भी समाप्त करने की योजना बना रही है. इस तरह के कुत्सित प्रचार के चलते दलितों में असंतोष के साथ-साथ आक्रोश भी दिखाई देने लगा और उसकी परिणति दो अप्रैल को हुए भारत बंद के दौरान हिंसा के रूप में सामने आई. इसी हिंसा की प्रतिक्रिया के रूप में सोशल मीडिया को मंच बनाया गया जिसके चलते एक और नेतृत्वविहीन भारत बंद का भय देखने को मिला.


पहले दो अप्रैल को हुए भारत बंद और उसके साथ हुई हिंसा की बात कर ली जाये. आखिर ये दुष्प्रचार किसने किया कि एससी/एसटी एक्ट को समाप्त कर दिया गया है? इस दुष्प्रचार के पीछे किसकी सोच काम कर रही थी कि अगले कदम के रूप में केंद्र सरकार आरक्षण को समाप्त करने जा रही है? यहाँ देश भर के राजनीति का विश्लेषण करने वालों को, सोशल मीडिया पर उछल-कूद करने वालों को, बिना बात किसी भी बात को हवा देने वालों को विचार करना होगा कि वे अपने दुष्प्रचार के द्वारा करना क्या चाहते हैं? केंद्र सरकार क्या करने वाली है, चुनावों के पहले नरेन्द्र मोदी ने क्या कहा, किसने कौन सा बयान दिया इसे फोटोशॉप करने के बजाय मूल-रूप में सबको बताया जाये. किसी भी बात को कभी नरेन्द्र मोदी का बयान कह कर, किसी भी घटना को कभी केंद्र सरकार का कदम बताकर, किसी भी स्थिति को आगामी आशंका बताकर देश में जिस तरह से अराजकता का माहौल बनाया जा रहा है वह किसी के लिए भी सुखद नहीं है. इस तरह की कुत्सित नीति अपनाने वाले असल में राजनीति नहीं कर रहे हैं वरन देश को रसातल में ले जाने का रास्ता बना रहे हैं. कभी सबके खाते में पंद्रह लाख रुपये आने की बात, कभी पाकिस्तान पर हमला करने की बात, कभी कश्मीर, कभी अयोध्या, ये बातें किसी भी रूप में राजनीति नहीं हैं.

यहाँ समझने वाली बात ये है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध असंतोष व्यक्त किया जा सकता है, उसके खिलाफ आन्दोलन भी किया जा सकता है, उसके निर्णय से असहमति भी बनाई जा सकती है पर ये किस संविधान में लिखा है कि किसी निर्णय के विरोध में सार्वजनिक संपत्ति को आग लगा दी जाए? किस दलित पुरोधा ने संविधान में उल्लेख किया है कि आन्दोलन के दौरान घर की बालकनी में खड़े युवा को गोली मार दी जाए? ये सब सोची-समझी साजिश का हिस्सा है, जिसका शिकार उन दलितों को आसानी से बना लिया गया है जो आज भी आरक्षण का लाभ लेने के इंतजार में हैं. उन दलितों के हाथों में झंडों के साथ-साथ हथियार थमा दिए गए हैं जो एससी/एसटी एक्ट होने के बाद आज भी प्रताड़ित हैं. सीधी सी बात है भारत बंद के दौरान हुई हिंसा का लाभ जिसे मिलना था, उसने पूरी रूपरेखा बनाई और एक सामान्य से निर्णय को इस तरह बढ़ा-चढ़ा कर बताया मानो देश में दलितों पर सिर्फ और सिर्फ अत्याचार ही होना है. ऐसी स्थिति में आकर इन्हीं दलितों को समझना होगा कि उनकी नेता मायावती ने जब इसी एक्ट में संशोधन करके किसी दलित की गवाही को अनिवार्य किया था तब किसी नेता ने, किसी दलित संगठन ने, किसी राजनैतिक दल ने इसे संविधान के साथ खिलवाड़ क्यों नहीं बताया था? तब किसी दलित ने इस एक्ट के समाप्त होने की बात करते हुए मायावती के खिलाफ आन्दोलन क्यों नहीं किया था? सोचने वाली बात है कि तब तो एक व्यक्ति ने ऐसा निर्णय लिया था जबकि अबकी ऐसा निर्णय, ऐसी किसी भी रिपोर्ट पर गिरफ़्तारी से पहले जाँच होगी, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया.

साफ़ सी बात है कि चुनाव सामने दिख रहे हैं और देश के तमाम दल इस समय मुद्दे-विहीन हैं, विषय-विहीन हैं. ऐसे में उनके सामने अस्तित्व का संकट है. इसी संकट से खुद को निकालने के लिए भारत बंद का ऐलान किया गया, उसमें हिंसा की गई और फिर उनके द्वारा ही प्रतिक्रियास्वरूप सवर्ण-पिछड़ा वर्ग का भारत बंद ऐलान करवाया गया. जब तक लोकसभा के चुनाव नहीं हो जाते तब तक भाजपा-विरोधी राजनैतिक दलों, व्यक्तियों द्वारा ऐसे कदमों को झेलना, सहना, देखना आम नागरिक की मजबूरी होगी.

06 अप्रैल 2018

अपने दायित्वों के प्रति सजग होना होगा सदन को


संसद का काम देश के सन्दर्भ में नीतियां बनाना होता है और इसीलिए देश भर से प्रति पांच साल में सांसद चुनकर भेजे जाते हैं. इनके चुनाव में जहाँ अरबों रुपये खर्च होते हैं वहीं संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में भी लाखों-करोड़ों रुपयों का व्यय होता है. ऐसी स्थिति के बाद भी वे सदस्य जिन्हें मतदाता, मीडिया माननीय पुकारते हुए थकता नहीं है विगत कई वर्षों से देशहित के प्रति लापरवाही दिखाते आ रहे हैं. इस बार लोकसभा और राज्यसभा को विपक्षियों द्वारा पूरी तरह से बाधित किया गया. यदि कहा जाये कि चंद सदस्यों ने समूची लोकसभा और राज्यसभा को बंधक बना रखा था तो कोई अतिश्योक्ति न होगी. आज जबकि संसद में बजट सत्र के दूसरे भाग का समापन हुआ तब दिए गए आँकड़ों से सामने निकल कर आया कि लोकसभा में महज चार विधेयक पारित किये जा सके. इसके साथ-साथ लोकसभा में कुल कार्य तेईस प्रतिशत हुआ जबकि राज्यसभा में यह थोड़ा सा अधिक जाकर अट्ठाईस प्रतिशत तक जा पहुँचा. सीधी सी बात है कि जिस सदन को शत-प्रतिशत चलना चाहिए, अपना कार्य करना चाहिय वह इस तरह से लापरवाह बना हुआ है. यहाँ के सदस्यों को समझना होगा कि उनकी कार्यवाही में खर्च होता धन उसी जनता का है जिसके हितार्थ वे सभी लोग सदन में भेजे गए हैं.


इसी तरह हालिया समाचारों से ज्ञात हुआ कि राज्यसभा के कुछ सदस्य तो ऐसे रहे जिन्होंने पूरे छह साल में एक भी सवाल नहीं पूछा. सदन में उपस्थिति को लेकर भी क्षोभजनक स्थिति रही. देश के लिए मानक समझे जाने वाले सदस्यों ने भी सदन में उपस्थित रहकर अपनी मर्यादा, दायित्व का बोध निर्वहन करना उचित नहीं समझा. ऐसे में किसी सदस्य का अपने वेतन का दान-स्वरूप दे देना ही उसे महान नहीं बना देता है. ऐसे सदस्यों को समझना होगा कि यदि वे निर्वाचित होकर अथवा मनोनीत होकर सदन में भेजे गए हैं तो वहां भी उनका कुछ कर्तव्य है, दायित्व है. वहां भी उनके कुछ कार्य हैं, उनकी कुछ जिम्मेवारियां हैं. इनको अपने-अपने कार्यों, अपने-अपने दायित्वों के प्रति सजग और जागरूक रहने की आवश्यकता है. यहाँ आकर सदन को भी स्वतः संज्ञान लेकर ऐसे लोगों पर कार्यवाही करने की जरूरत है.  

इधर देखने में आ रहा है कि सदन के अन्दर एक-दूसरे के दुश्मन सरीखे दिखाई देने वाले सदस्य सदन के बाहर गलबहियाँ करते दिखते हैं. ठहाके लगाते नजर आते हैं. यही सदस्य देशहित में पारित होने वाले विधेयकों को लेकर जबरदस्त खिलाफत करते दिखते हैं किन्तु अपने वेतन-भत्तों के सन्दर्भ में एकसुर से साथ देते नजर आते हैं. इन सभी को समझना होगा कि सदन किसी भी तरह से मौज-मस्ती या तफरी का मंच नहीं है और न ही खुद को देश भर में प्रसारित-प्रचारित करने का माध्यम नहीं है. किसी भी सदस्य को यहाँ भेजकर सम्बंधित क्षेत्र का मतदाता अपने विकास की राह यहाँ के द्वारा खुलती देखता है. इसके बाद भी इन सदस्यों का सदन को बाधित किये रहना न केवल मतदाताओं के साथ बेईमानी है वरन सम्पूर्ण देश के साथ धोखा है. ऐसी स्थिति में सदन को, माननीय अध्यक्ष, सभापति को संज्ञान लेने की आवश्यकता है. महामहिम राष्ट्रपति महोदय को भी ऐसे समय में कार्यवाही करने की आवश्यकता है. आखिर देश की सर्वोच्च शक्तियों में संविधान, सदन के साथ-साथ राष्ट्रपति महोदय को भी गरिमा हासिल है. इन सदस्यों को समझना होगा कि टीवी पर प्रसारित होने वाली कार्यवाही के चलते जनता भी इनके असल मंसूबों को समझ-जान चुकी है. ऐसे में इन सदस्यों को आपसी विरोध की नौटंकी बंद करके देशहित में सदन में कार्य करना चाहिए.