साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

09 अप्रैल 2026

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों पर रॉयल्टी

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी



शारदा जी से पहली मुलाकात हुई थी हमारे ही जनपद के कोंच में एक साहित्यिक कार्यक्रम में. परिचय इस मुलाकात से भी पुराना था और ये दोनों बातें ही श्वेतवर्णा के जन्म लेने से भी बहुत पुरानी थीं.


बहरहाल, श्वेतवर्णा का अस्तित्व में आना हुआ और हम जैसे स्वान्तः सुखाय लेखकों को भी जीवन मिला. अपने छपास रोग के आरम्भिक दिनों में कुछ पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं ही करवाया. इसके बाद एक-दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ अपने मित्रों के सहयोग से. उसी समय शारदा जी ने श्वेतवर्णा की जानकारी दी. इसके बाद तपती दुपहरी की शाम के साथ पुराने परिचय-सम्बन्ध-विश्वास ने ऐसा रंग जमाया कि अपनी पुस्तकों का कहीं और से प्रकाशन का सोच भी नहीं सके. जिस विश्वास से हमने पुस्तकों का प्रकाशन जारी रखा, उसी अधिकार से एक बार शारदा जी ने धमकी भी दे डाली थी कि हमने कहीं और से पुस्तकें प्रकाशित करवाईं तो अच्छा नहीं होगा.


आज उसी विश्वास-अपनत्व ने सुखद एहसास करवाया. इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी भी प्राप्त हुई है. यह सुखद एहसास विगत कई वर्षों में पहली बार मिला है. इसमें हमारी एकल लेखन वाली पुस्तकें तो हैं ही, इसके साथ ही देवेन्द्र सिंह जी की पुस्तक और ऋचा सिंह राठौर के साथ लिखी गईं पुस्तकें भी शामिल हैं. (हालाँकि इन लोगों के साथ वाली पुस्तकों की रॉयल्टी हम ही डकार जायेंगे)


संलग्न चित्र में बाकी विवरण इसीलिए छिपा दिया है ताकि कुछ लोग जलन महसूस न करने लगें. विवरण के लिए ऐसे लोग आकुल-व्याकुल न हों. ये विवरण हमारी थाती है, हमारे-शारदा जी के-श्वेतवर्णा के आपसी विश्वास, अपनत्व-अधिकार का परिचायक है.




01 सितंबर 2025

वर्तमान दौर की कविता

कविता लिखना

कितना आसान हो गया है अब.

कुछ भी लिखते जाओ

छोटे छोटे वाक्यों में.

न छंद की चिंता

न लय की फ़िकर,

जो मन में आए

उसे शब्दों में ढाल दो,

कई-कई हिस्सों में बाँट दो

फिर देखो गौर से

तुमको दिखेगी एक कविता

बलखाती काव्य रचना.

मत परवाह करो

कि रस, अलंकार, मात्राएँ

सिरे से गायब हैं,

तुकांत, अतुकांत का

सिरदर्द पाले बिना

बस लिखते जाओ कुछ भी,

शब्द भारी भरकम हों

या फिर हों आम बोलचाल के

बस, शब्द होने चाहिए.

न कोई ज्ञान

न कोई आदर्श

न किसी तरह का प्रवचन,

बस, लिखते जाओ

जब तक कि

तुम ख़ुद न थक जाओ

लिखते-लिखते,

शब्दों को

धकेलते-धकेलते,

रुको, रुक कर देखो

नजर आने लगी कविता?

देखो न!

देखो जरा ध्यान से

ये भी तो

बन गई है एक कविता.

करो वाह वाह

या कि आह आह

हमें इससे क्या?

हमें तो लीपना था,

कुछ थोपना था

सो रख दिया सामने,

समझ सको तो ठीक

न समझ सको

तो भी हमें क्या?

हमने तो लिख दी

एक कविता,

आज के दौर की

एक अद्भुत कविता.

 

01 अगस्त 2025

प्रेमचन्द का इस्लामिक तुष्टिकरण

आये दिन चर्चा होती है फिल्मों में तुष्टिकरण के सम्बन्ध में. नायक को हिन्दू देवी-देवताओं से नफरत होती है पर 786 के बिल्ले पर विश्वास होता है. साधु-संत ढोंगी दिखाए जाते हैं मगर मौलवी-मौलाना विश्वासी होते हैं. ऐसी अनेकानेक घटनाएँ हैं, अनेकानेक फ़िल्में हैं. गौर करियेगा, ये फ़िल्मी बातें आज़ादी के बहुत बाद की हैं. किसी दौर में तो मुस्लिम अभिनेताओं को भी अपना स्थान बनाये रखने के लिए हिन्दू नाम अपनाने पड़े थे. बहरहाल, फिल्मों में इस तरह की हरकतें आज़ादी के बहुत बाद शुरू हुईं जबकि हिन्दू पात्र खलनायक और मुस्लिम पात्र नायक दिखाए गए. हिन्दू आस्था को ढोंग बताया गया और इस्लामिक पद्धति को स्वीकारा गया.

 



आज़ादी के बहुत पहले 1933 में एक कहानी प्रकाशित हुई थी ईदगाह, आप सबने पढ़ी होगी. लेखक हैं इसके प्रेमचन्द. गौर करियेगा, इस कहानी में हामिद दया का मानक बनता है, अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है. आखिर ऐसा पात्र हिन्दू भी गढ़ा जा सकता था लेकिन प्रेमचन्द ने नहीं गढ़ा. प्रेमचन्द ने हिन्दू पात्र में रचा घीसू और माधव को, कहानी को (उपन्यास) नाम दिया कफ़न. जिस-जिसने इसे पढ़ा होगा वे अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह का हिन्दू पात्र रचा गया. ऐसा उस लेखक द्वारा किया गया जिसे उपन्यास सम्राट कहा गया. जिसकी कोई फंडिंग इस्लामिक देशों से नहीं थी. समझना कठिन नहीं कि हिन्दू विरोधी नैरेटिव बरसों से बहुत ही सहजता के साथ चलाया-फैलाया जाता रहा है.

 


01 मार्च 2025

विलुप्त होती डायरी लेखन विधा

कई बार बहुत सी बातें अनायास ही निकल आती हैं, ऐसी बातें जिनका कोई चर्चा नहीं हो रहा होता है, जिनके बारे में कोई बात नहीं चल रही होती है. ये मानवीय स्वभाव है कि किसी भी बात को अन्य दूसरी बात से सम्बंधित कर ही लेते हैं. ऐसी ही किसी बात की चर्चा के दौरान अचानक से डायरी लेखन की चर्चा होने लगी. इस चर्चा के आरम्भिक बिन्दु में पहली बात यही उठी कि क्या आजकल डायरी लेखन बंद हो गया है? या फिर साहित्य की इस महत्त्वपूर्ण विधा को महत्त्व नहीं दिया जा रहा है? इन दो सवालों से इतर बात कोई और भी हो तो कहा नहीं जा सकता मगर एक बात ये तो है कि वर्तमान में डायरी लेखन की चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं हो रही है.

 

इधर सामान्य चर्चा के दौरान बात हो रही थी व्यक्ति के व्यवहार की, उसकी मनोदशा की और उससे बाहर निकलने की. इसी में एक बिन्दु यह भी सामने आया कि कोई व्यक्ति यदि किसी बात को लेकर परेशान है, समस्या से ग्रस्त है ऐसे में यदि उसके पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिससे वह अपनी बात को खुलकर कह सके तो यदि वह अपनी बात को लिखकर व्यक्त कर दे तो उसकी समस्या का बहुत बड़ा हिस्सा स्वतः ही वहीं समाधान में बदल जाता है. किसी के लिए यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है, कितनी प्रभावी है इसका तो पता नहीं पर व्यक्तिगत रूप से इस कदम से हमें बहुत लाभ हुआ है. किसी तरह की समस्या होने पर, कुछ दिक्कत होने पर अपनी बात न कह पाने की स्थिति में कागज़ पर कुछ लिख देने से, कोई कविता लिख देने से, उस विषय से सम्बंधित कोई लेख लिख देने से दिल-दिमाग को बहुत आराम मिलता है. संभवतः डायरी विधा के जन्मने का एक कारण यह भी रहा होगा.

 

आजकल देखने में आ रहा है कि कम उम्र के बच्चे भी हताशा-निराशा में आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं, मौत को गले लगा रहे हैं. दुनियादारी की भागदौड़ इस कदर तेज है कि अपने परिवार में ही रुककर किसी दूसरे सदस्य की समस्या को देखने की फुर्सत नहीं है, ऐसे में समाज से क्या उम्मीद की जाये. आज के बच्चे अपने आपमें ही नितांत एकाकी जीवन गुजार रहे हैं, ऐसे में उनके सामने अपनी बात कहने की, अपनी समस्या कहने की दिक्कत तो है ही. उनको न तो उनकी पढ़ाई के दौरान, न ही पारिवारिक क्षणों में इस तरह की किसी भी प्रक्रिया से परिचित करवाया गया है. ऐसी स्थिति में उनको डायरी लेखन की वास्तविकता से क्या ही अवगत कराया गया होगा, ये सोचा-समझा जा सकता है.

 

इधर सामान्य चर्चाओं में बहुत से लोगों द्वारा डायरी लेखन और ब्लॉग लेखन को एकसमान, एक जैसा बताने का प्रयास किया जा रहा है. देखा जाये तो ये दोनों स्थितियाँ ही अलग हैं. इन दोनों के बीच किसी भी तरह का कोई साम्य नहीं है. आज की पीढ़ी को डायरी लेखन का महत्त्व समझाना होगा. हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में इसे किसी पेपर के एक बिन्दु के रूप में रखने से इस विधा का भला नहीं हो रहा. डायरी लेखन विधा को एक स्वतंत्र विधा के रूप में विकसित करने की, स्थापित करने की आवश्यकता है.


10 नवंबर 2024

साहित्य आजतक में उर्फी जावेद?

ये फ़ोटो आज चर्चा में है. ये फ़ोटो एडिट लग रही है क्योंकि आज तक के आधिकारिक पेज पर साहित्य कार्यक्रम में इसका नाम नहीं है. हाँ, ऐसी जानकारी मिली कि ये 2022 के कार्यक्रम में चर्चा में आई थी. साहित्य का कार्यक्रम है और लोगों की आपत्ति है कि ये कौन सी साहित्यकार है? यहाँ एक बात सबको समझनी जाननी चाहिए कि सिनेमा अब हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम का हिस्सा है. सिनेमा अब विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है. हिन्दी साहित्य से जुड़े बहुत से लोग वर्तमान में सिनेमा पर व्याख्यान देते हैं, किताबें लिखते हैं.

 

ऐसे में इस प्रतिभा का स्वागत होना चाहिए. आख़िर प्रसिद्ध तो है ही और लोग भी किसी भी साहित्यकार से ज़्यादा इसे पहचानते होंगे. न हो विश्वास तो आप अपने मोहल्ले में ही किसी वर्तमान साहित्यकार का नाम लेकर उसका परिचय पूछिए और इसका परिचय पूछिए. स्थिति स्पष्ट हो जायेगी.

 




31 जुलाई 2024

प्रेमचन्द से इतर भी है साहित्य

विषयों और विमर्शों का ताना-बाना बुनते हुए समाज निरंतर आगे ही बढ़ता रहता है. साहित्य अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किसी भी बहस, विमर्श पर अपनी नजर बनाये रखता है, इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है. समय के साथ हुए अनेक परिवर्तनों को समाज ने स्वीकारा है किन्तु साहित्यिक जगत ने ऐसा करने में बहुत हद तक कंजूसी की है, आज भी करता है. इक्कीसवीं सदी आने के साथ ही वैश्विक रूप से बहुत कुछ बदला है. जीवन-शैली, मूल्यों, विचारों, परिवार, संस्कृति, रिश्तों आदि में न केवल परिवर्तन हुए हैं वरन पुरातन ढाँचों का विखंडन, विध्वंस भी हुआ है. ये और बात है कि प्रत्येक परिवर्तन, विखंडन, विध्वंस के साथ विरोधात्मक स्वरों का उठना होता रहा किन्तु परिवर्तनों को आवश्यकतानुरूप स्वीकारा भी जाता रहा. परिवर्तनों के इन्हीं विध्वंस और नव-निर्माण के क्रम से सामाजिक ताने-बाने का विस्तार होता रहा.

 

साहित्य में परिवर्तनों को स्वीकारने में खुलापन न मिलने को यदि आज की तारीख के सन्दर्भ में देखा जाये तो और भी स्पष्ट होता है. प्रतिवर्ष 31 जुलाई को साहित्य जगत में प्रेमचन्द जयंती का आयोजन देश भर में होता है. इन आयोजनों, कार्यक्रमों में प्रेमचन्द की परम्परा का जिक्र होता है, उनके साहित्य पर चर्चा होती है, उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला जाता है. इन सबके बीच कई सवाल भी खड़े होते हैं किन्तु उन पर विमर्श की दृष्टि से विचार करने की बजाय एकांगी रूप में विवाद किया जाता है. सवाल यह नहीं कि जिस कालखण्ड में प्रेमचन्द लेखन कर रहे थे, क्या उसी समय में उनके साथ कोई दूसरा लेखक साहित्य सृजन नहीं कर रहा था? सवाल यह भी नहीं कि जिस समय, परिस्थिति को देखते हुए प्रेमचन्द ने कहानियों, उपन्यासों का लेखन किया वे स्थितियाँ आज हैं अथवा नहीं? सवाल यह भी नहीं कि प्रेमचन्द की साहित्यिक परम्परा दक्षिणपंथी हैं, वामपंथी हैं या फिर कलावादी? सवाल यह भी नहीं कि प्रतिवर्ष जिस गम्भीरता से प्रेमचन्द के विचारों को प्रासंगिक मानते हुए मात्र मंचीय परम्पराओं में प्रसारित किया जाता है उनको उतनी ही गम्भीरता से आत्मसात क्यों नहीं किया जाता? सवाल यह भी नहीं कि आज की कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली पीढ़ी को प्रेमचन्द के उस साहित्य द्वारा क्या सन्देश दिया जा रहा है जो आज से लगभग एक सदी पूर्व लिखा गया था?

 



ऐसे सवाल इसीलिए खड़े होते हैं क्योंकि हिन्दी साहित्य ने विस्तीर्ण रूप से सोचने में, नवोन्मेषी साहित्यकारों को आत्मसात करने में दरियादिली नहीं दिखाई है. ऐसा लगभग प्रत्येक कालखंड में हुआ है जबकि नए रचनाकार को, किसी भी नई रचना को आलोचना के केन्द्र में रखते हुए उस पर स्वीकारात्मक दृष्टि नहीं डाली गई वरन अस्वीकरण भाव रखा गया. यदि प्रेमचन्द के समकालीन लेखकों पर ही समीक्षात्मक रूप से विचार किया जाये तो जयशंकर प्रसाद, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, शिवपूजन सहाय, राहुल सांकृत्यायन, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ आदि ऐसे साहित्यकार रहे हैं जिनकी गद्य रचनाओं का समग्र रूप में मूल्यांकन नहीं किया गया है. 1936 में प्रेमचन्द के निधन से पूर्व ही जैनेन्द्र, भगवती चरण वर्मा जैसे साहित्यकार अपने उपन्यासों के द्वारा साहित्यिक जगत में चमकने लगे थे. तत्कालीन साहित्यिक परिदृश्य में प्रेमचन्द के समकालीन साहित्यकारों पर विहंगम दृष्टि क्यों नहीं आरोपित की गई, इसके कारण भी तत्कालीन स्थितियों से निर्मित हुए होंगे लेकिन वर्तमान स्थितियों में हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रमों से समकालीन साहित्यकारों का, नवोन्मेषी साहित्यकारों का, रचनाओं का गायब रहना निश्चित ही अचंभित करने वाला तो है ही, शोध का विषय भी है.

 

आज जैसे ही पाठ्यक्रम परिवर्तन की चर्चा होती है, साहित्यकारों के नामों में बदलाव की बात होती है तो भूचाल सा आ जाता है, ऐसा एकाधिक बार हो चुका है. सोचने वाली बात है कि इक्कीसवीं सदी में जबकि सोचने, समझने, काम करने, रहन-सहन आदि का तरीका बदल चुका है; परिस्थितियों में परिवर्तन आ चुका है; तकनीकी में परिवर्तन आ चुका है; सामाजिक ढाँचे में बदलाव देखने को मिल रहे हैं; जीवन-मूल्यों में बदलाव आया है तब भी साहित्य के नाम पर लगभग विलुप्त हो चुकी स्थितियों को थोपने जैसा कार्य किया जा रहा है. हिन्दी साहित्य पाठ्यक्रमों में प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा स्तर तक या कहें कि शोध के स्तर तक प्रेमचन्द उपस्थित हैं. साहित्य महज पठन-पाठन का नहीं बल्कि खुद को समाज के सापेक्ष समझने-समझाने वाला माध्यम है. एक पल को विचार कीजिये कि वैश्विक मानकों से सम्बन्ध रखने वाली पीढ़ी किस तरह अतीत के उन मानकों के साथ समन्वय बनाएगी जो अब अस्तित्व में ही नहीं हैं? आज के वैश्वीकरण दौर में आज़ादी के पहले की मूल्य व्यवस्था से किस तरह तारतम्य जोड़ सकेगी? सुपरसोनिक गति का अनुभव करने वाली पीढ़ी बैलगाड़ी की गति को कैसे समझेगी?

 

विद्यार्थी वर्ग में साहित्यिक उदासीनता का एक कारण यह भी है. पाठ्यक्रमों में आज भी वह साहित्य आरोपित है जिसकी काल-सापेक्षता से वर्तमान पीढ़ी स्वयं को जोड़ नहीं पा रही है. ऐसा नहीं है कि प्रेमचन्द को वर्तमान परिदृश्य में खारिज कर दिया जाये. इसे भी पारिवारिक संरचना के रूप में समझने की आवश्यकता है. समय के साथ परिवार में प्राचीन मूल्यों का सम्मान करते हुए नवीन अवधाराणाओं को स्वीकार लिया जाता है; बुजुर्गों के अनुभवों से लाभान्वित होते हुए नव-विचारों को उन्मुक्त आकाश उपलब्ध कराया जाता है उसी प्रकार प्रेमचन्द की साहित्यिक छाँव में नवोन्मेषी साहित्य को, साहित्यकारों को भी पुष्पित-पल्लवित होने का अवसर मिलना चाहिए.

 


03 अगस्त 2023

इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल 'बोहल शोध मंजूषा' में हम भी संदर्भित

इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल 'बोहल शोध मंजूषा' के जुलाई 2023 अंक में प्रकाशित शोध-पत्र में हमें भी संदर्भित किया गया है. (पृष्ठ 12)

+
शोध-पत्र शीर्षक - दलित साहित्य और भारतीय समाज

शोधार्थी - बाबु बिगुल्ला

हिन्दी विभाग, डॉ. अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, हैदराबाद

++
प्रकाशक - गुगनराम एजुकेशनल एण्ड सोशल वैलफेयर सोसायटी, भिवानी (हरियाणा)

सम्पादक - डॉ. नरेश सिहाग 'बोहाल'





06 अप्रैल 2023

लोकप्रियता को स्वीकारना ही होगा

अधिकतर देखने में आता है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में, बोर्ड में हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में जैसे ही किसी तरह का बदलाव होता है, वैसे ही न केवल लेखक-संसार में बल्कि आलोचक वर्ग में भी उथल-पुथल मच जाती है. अभी तक बदलाव का मुख्य विरोध किसी साहित्यकार के नाम को हटाने, जोड़ने से संदर्भित हुआ करता था. यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है कि समाज में किसी भी तरह के बदलाव का उसने सदैव विरोध किया है. साहित्य जगत में बदलाव का विरोध कुछ दिनों से बना हुआ है. खबर आई कि गोरखपुर विश्वविद्यालय में अब परास्नातक के विद्यार्थी हिन्दी साहित्य में वे चुनिन्दा उपन्यास पढ़ सकेंगे, जिनको लुगदी साहित्य कहकर साहित्य की मुख्यधारा से बाहर रखा गया है. इस खबर के आते ही हिन्दी साहित्य जगत में जैसे कोहराम मच गया. लगातार एक बहस सी मची हुई है. मीडिया, सोशल मीडिया पर अपने-अपने तरह के बयान लगातार आ-जा रहे हैं. यहाँ लोगों का विरोध एक तो इस बात के लिए है कि सस्ते साहित्यकार कहे जाने वाले या फिर लुगदी साहित्य कहे जाने वाले उपन्यास, उपन्यासकारों के लिए स्थापित, नामचीन साहित्यकारों को पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया है. विरोध इसका भी है कि लुगदी साहित्य के नाम से समाज में चल रहे उपन्यासों के द्वारा किस तरह का जीवन-दर्शन, जीवन-मूल्य विद्यार्थियों के बीच पहुँचाने का प्रयास विश्वविद्यालय द्वारा किया जा रहा है.


यहाँ बहुतों को अभी इसका भान ही नहीं है कि विश्वविद्यालय ने इन उपन्यासकारों को लोकप्रिय साहित्य की श्रेणी में पाठ्यक्रम में जोड़ा है, किसी भी साहित्यकार को हटाया नहीं है. स्थापित साहित्यकारों ने, साहित्य-जगत ने भले ही इन उपन्यासकारों को, उनके लेखन को मान्यता न दी हो मगर इसमें कोई दोराय नहीं कि इन उपन्यासकारों के उपन्यासों ने लोकप्रियता के आयामों को छुआ है. साठ और सत्तर के दशक में गुलशन नन्दा इस दुनिया के बेताज़ बादशाह रहे. ऐसा कहा जाता है कि वेद प्रकाश शर्मा के बहुचर्चित उपन्यास ‘वर्दी वाला गुण्डा’ की पहले ही दिन पंद्रह लाख प्रतियाँ बिक गयी थीं. सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक-एक उपन्यास के एक-एक संस्करण में तीस हजार से अधिक प्रतियों का प्रकाशन हुआ करता है. इस तरह की लोकप्रियता अपने देश में किसी भी हिन्दी उपन्यास अथवा हिन्दी उपन्यासकार के सन्दर्भ में देखने को नहीं मिलती है.




जहाँ तक बात लुगदी उपन्यासों के द्वारा विद्यार्थियों में जीवन-मूल्यों, संस्कारों की है तो ऐसा नहीं है कि इस श्रेणी के सभी उपन्यासों में सेक्स का तड़का रहता हो. किसी समय में अपने दो मित्रों-राही मासूम रज़ा और इब्ने सईद की बात को चुनौती की तरह लेते हुए इब्ने सफ़ी ने साफ़-सुथरे जासूसी उपन्यासों की लम्बी कतार लगा दी थी, जिनमें अश्लीलता बिलकुल नहीं हुआ करती थी. जासूसी उपन्यास लेखन के मामले में जैसी लोकप्रियता इब्ने सफ़ी को प्राप्त हुई वैसी किसी को नसीब न हुई. एकबारगी इन उपन्यासों की, उपन्यासकारों की लोकप्रियता को साहित्य का मानक न माना जाये मगर इस बहस के बहाने एक विमर्श और भी शुरू किया जाना चाहिए कि क्या वाकई साहित्य के द्वारा मूल्यों की स्थापना संभव है? जिन साहित्यकारों को, उनके साहित्य को समाज ने मान्यता दे रखी है, क्या उनकी सभी कृतियों में, उपन्यासों में उत्कृष्टता का भाव समाहित है? साहित्य जगत में आधुनिक काल से लेकर वर्तमान तक स्थापित माने गए तमाम साहित्यकारों की कृतियों से क्या समाज ने मूल्य स्थापना के लिए, संस्कार ग्रहण करने के लिए, जीवन को सहज बनाने के लिए वाकई सकारात्मक, सार्थक कदम उठाये हैं?


यहाँ विचार किया जाना आवश्यक हो जाता है कि किसी पाठ्यक्रम में साहित्य जगत के समस्त साहित्यकारों को शामिल नहीं किया जा सकता है. ऐसे में जिनको शामिल नहीं किया जा सका है, क्या वे साहित्यकार उच्च कोटि के नहीं? क्या उनकी रचनाएँ स्तरीय नहीं? इसके अलावा जिन साहित्यकारों को शामिल किया जाता है क्या उनकी सभी कृतियों को, रचनाओं को पाठ्यक्रम में स्थान मिलता है? इसका क्या अर्थ निकाला जाये कि जिन रचनाओं को, कृतियों को पाठ्यक्रम में स्थान नहीं मिला है, वे स्तरीय नहीं हैं? या उनके द्वारा किसी तरह के मूल्यों, संस्कारों की स्थापना करने में मदद नहीं मिलेगी? इसी तरह यदि शिक्षा जगत में साहित्य की उपस्थिति का ही आकलन किया जाये, उसके द्वारा मूल्य स्थापना की बात को स्वीकारा जाये तो क्या साहित्य के विद्यार्थियों के अतिरिक्त अन्य संकाय के विद्यार्थी मूल्य स्थापना के योग्य नहीं समझे जाते? क्यों नहीं इंजीनियरिंग, चिकित्सा, वाणिज्य, प्रबंधन आदि पाठ्यक्रमों में साहित्य को पढ़ाया जाता?


इसी बिन्दु के सापेक्ष इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि आज जिस तरह से हर हाथ में इंटरनेट सुविधा से संपन्न स्मार्ट फोन है, आज जिस तरह से इंटरनेट के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म पर अश्लील दृश्य, अश्लील भाषा शैली, गालियाँ नितांत अगोपन रूप में प्रस्तुत की जा रही हैं तब मात्र साहित्य के द्वारा नैतिकता, संस्कार, सभ्यता, आदर्श की बातें करना कहाँ तक उचित है. यह हमेशा से कहा जाता रहा है कि साहित्य समाज का दर्पण है. क्या आज का समाज प्रेमचन्द की नैतिकता को, आदर्शों को स्वाभाविक रूप में अपने जीवन में उतारता है? लुगदी साहित्य कहकर जिन उपन्यासों को अभी तक समाज की मुख्यधारा से बाहर रखा गया क्या उनके सापेक्ष इस पर विचार किया गया कि जो उपन्यास उत्कृष्ट साहित्य के रूप में स्वीकारे गए हैं, वे संस्कार, सभ्यता, शालीनता का पाठ पढ़ा रहे हैं? यदि साहित्य ही संस्कारों को, आदर्शों को, शालीनता को समाज में स्थापित करने की क्षमता रखता तो आज आज़ादी के अमृत्काल में समाज में अनेकानेक बुराइयाँ परिलक्षित न हो रही होतीं.


निःसंदेह जो साहित्य उत्कृष्ट है, अनुकरणीय है, विचारपरक है उसका अनुगमन किया जाना चाहिए. इसके बाद भी समाज की दिशा और उसकी मानसिकता को पहचानते हुए भी आधुनिकता को स्वीकारना ही होगा. आज की पीढ़ी को अपने अतीत के साथ-साथ वर्तमान से भी परिचित होने का अधिकार है. इसी बहाने आज की पीढ़ी में आलोचनात्मक दृष्टि का उद्भव होगा. उनके भीतर कल्पनाशीलता, फैंटेसी, वास्तविकता, संस्कार, शालीनता, अश्लीलता, लेखन, विषय, शोध आदि की व्यापक समझ पैदा हो सकेगी. ध्यान रखना होगा कि आज के दौर में किसी भी विषय को, वो चाहे नितांत गलत हो, पूर्णतः सही हो एकदम से नकारा नहीं जा सकता है. यदि किसी भी कृति में पठनीयता है, कल्पनाशीलता है, दृश्यता है, स्वीकारता है तो उसका आकलन करने के लिए एक बार उसे भी मुख्यधारा में आने का अवसर देना होगा. एक बार दिया जाने वाला अवसर पत्थर की लकीर नहीं है, जिसे मिटाया नहीं जा सकता किन्तु पूर्वाग्रहयुक्त कोई भी निर्णय भ्रम और संशय के ही द्वार खोलता है. 






 

03 अप्रैल 2023

मौलिकता, रोचकता के आधार पर एक अवसर देना सही है

एक खबर प्रकाशित हुई कि गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी लोकप्रिय साहित्य के अंतर्गत गुलशन नंदा, वेदप्रकाश, सुरेन्द्र मोहन के उपन्यास पढ़ सकेंगे. इनमें इब्ने सफी की जासूसी दुनिया, गुलशन नंदा के नीलकंठ, वेदप्रकाश शर्मा के वर्दी वाला गुंडा को स्थान दिया गया है. इस खबर के आते ही साहित्य जगत में शालीनता की खेती करने वाले बहुतेरे छुपे रुस्तमों के पेट में मरोड़ उठना शुरू हो गई. इस मरोड़ उठने का एक कारण तो ये भी है कि अभी तक हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है कि तर्ज़ पर ऐसे लेखकों ने गुलशन नंदा, वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे लेखकों-उपन्यासकारों की कृतियों को लुगदी साहित्य का नाम देकर चलन से बाहर कर रखा था. बावजूद इसके इन लेखकों की, इनके उपन्यासों की माँग जबरदस्त रूप से रहती है. इनके पाठकों की संख्या लाखों में है.




छटपटाहट से भरे ऐसे तमाम लेखकों ने इस निर्णय का विरोध किया. सामग्री, साहित्यकार, शालीनता आदि का वास्ता देकर इनको कूड़े का बताना शुरू कर दिया गया. संभव है कि लुगदी साहित्य कहे जाने वाले इन उपन्यासों में अश्लीलता जबरन ठूंसी जाती रही हो मगर सभी उपन्यासों में ऐसा होता है ऐसा नहीं है. इन्हीं में से बहुतेरे उपन्यास ऐसे हैं जिन पर हिन्दी फिल्म बनी हैं और बहुत लोकप्रिय भी रही हैं. जहाँ तक सामग्री की, शालीनता की बात है तो ऐसा लगता है कि इन विरोधी स्वर उचारते लेखकों ने, पाठकों ने उन लेखकों को नहीं पढ़ा है जो स्वयंभू रूप में साहित्य में सबसे ऊपर होने का दावा करते हैं मगर उनकी रचनाओं में रति-क्रिया का वर्णन किसी अश्लील साहित्य से कम नहीं. जिन विरोधी आवाजों ने मित्रो मरजानी, दिल्ली, चाक, पीली छतरी वाली लड़की आदि को पढ़ लिया होगा वे कहना भूल जाएँगे कि शालीनता क्या होती है.


रही बात लोकप्रियता के नाम की तो क्या ये आवश्यक है कि प्रत्येक कालखंड में सदियों पुराने, दशकों पुराने लेखकों को ही पढ़ते रहा जाए? क्या तकनीक के इस दौर में शालीनता पर वैसा ही पर्दा पड़ा हुआ है जैसा कि आज से कोई दो-तीन दशक पहले पड़ा हुआ था? फिल्मों, धारावाहिकों में सत्यता, वास्तविकता के नाम पर जिस तरह से अश्लीलता, गालियों का आना हुआ है वह ये बताने को पर्याप्त है कि अब किसी से कुछ भी गोपन नहीं है. विश्वविद्यालय के परास्नातक के विद्यार्थी किशोरावस्था के नहीं हैं. संभवतः उनमें सही-गलत को समझने का नजरिया होगा. आज हर हाथ में स्मार्ट फोन, इंटरनेट ने अश्लीलता को, पोर्नोग्राफी को सर्वसुलभ बना दिया है. ऐसे में इस साहित्य के द्वारा अश्लीलता का फैलना सिवाय गाल बजाने के कुछ और नहीं लगता है. कम से कम इन उपन्यासों की मौलिकता, रोचकता देखकर एक बार इनको अवसर दिया जाना उचित है. 





 

20 जून 2022

स्कूटी वाली लड़की - कहानी संग्रह

हमारा बहुप्रतीक्षित कहानी संग्रह स्कूटी वाली लड़की प्रकाशित होकर आ गया है. आप सभी से निवेदन है कि उसे पढ़कर अपनी राय से अवगत कराने का कष्ट करें. 
पुस्तक अमेज़न और श्वेतवर्णा की साईट पर उपलब्ध है... 
अमेज़न: 279/-
श्वेतवर्णा: 225/-

++
https://www.amazon.in/dp/9392617720

++

https://shwetwarna.com/.../scooty-wali-ladaki-kumarendra/ 


27 मई 2022

हिन्दी साहित्यकार गीतांजलि श्री को बुकर पुरस्कार

आज सुबह-सुबह ही खबर सुनाई दी कि हिन्दी लेखिका गीतांजलि श्री को अन्तर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार (साहित्य के क्षेत्र में सबसे प्रतिष्ठित) से सम्मानित किया गया है. गीतांजलि श्री हिन्दी की पहली लेखिका हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है. यह पुरस्कार उनके उपन्यास रेत समाधि के अंग्रेज़ी अनुवाद टोम्ब ऑफ़ सैंड के लिए दिया गया. इसका अनुवाद प्रसिद्ध अनुवादक डेज़ी रॉकवाल ने किया है. यह पहला मौक़ा है जब कोई हिन्दी कृति बुकर के लिए पहले लॉन्गलिस्टेड फिर शॉर्टलिस्टेड होकर बुकर से सम्मानित हुई हो. वास्तव में यह पल हिन्दी भाषी पाठकों, लेखकों के लिए ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतीय भाषाओं के लिए गौरवशाली है. साहित्य के क्षेत्र का सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार माने जाने के कारण एक सर्वमान्य धारणा यही बनी हुई थी कि यह पुरस्कार सिर्फ विदेशी भाषाओं को ही प्रदान किया जाता है. गीतांजलि के रूप में हिन्दी कृति को यह सम्मान मिलने से यह धारणा भी दूर हुई है. संभव है कि इस पल से प्रभावित होकर हिन्दी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक, साहित्यकार उत्कृष्ट लेखन की तरफ अग्रसर हों.




इस सुखद समाचार के साथ-साथ सोशल मीडिया पर बहुत सी ऐसी बातें भी सुनाई-दिखाई दीं, जिनको देखकर दुःख हुआ. हिन्दी भाषा के उपन्यास के लिए मिले इस सम्मान को बहुत से लोग पचा नहीं पा रहे हैं. ऐसे में उनके लिए बजाय गर्व करने के वे रचनाकार की, कृति की, अनुवाद की कमियाँ निकालने-बनाने में लगे हैं. यह सच हो सकता है कि बहुधा देखने में आता है कि एक साहित्यकार दूसरे साहित्यकार की आलोचना करता है, आलोचना भी बुराई करने के स्तर तक, दोषारोपण करने की हद तक मगर आज का दिन ख़ुशी मनाने का दिन होना चाहिए था. साहित्यकार को लेकर, कृति को लेकर, उसके अनुवाद को लेकर आलोचना, समीक्षा होनी चाहिए और ऐसा आगे भी किया जा सकता है. आज इस एक पल के लिए सोचना चाहिए था कि ख़ुशी गीतांजलि के लिए न मनाई जाये, ख़ुशी उनके उपन्यास रेत समाधि के लिए न हो, उनके अनुवाद टोम्ब ऑफ सैंड के लिए भले ही प्रसन्नता व्यक्त न की जाये, भले ही अनुवादक डेज़ी रॉकवाल को इसका श्रेय न दिया जाये मगर कम से साहित्य के लिए, हिन्दी भाषा के लिए, भारतीय भाषाओं के लिए तो ख़ुशी प्रदर्शित की ही जा सकती थी.


खैर, जिसका जैसा स्वभाव, वो वैसा ही करेगा. गीतांजलि श्री को बधाई के साथ-साथ सभी हिन्दी भाषी पाठकों, साहित्यकारों, समस्त भारतीय भाषाओं के पाठकों, साहित्यकारों को भी बधाई-शुभकामना.




23 फ़रवरी 2022

बचपन से परिचित नाम जुड़ा डिग्री में भी, कैरियर में भी

वृन्दावन लाल वर्मा, इस नाम से परिचय बचपन में ही हो गया था. यद्यपि उस समय आपके बारे में बहुत जानकारी नहीं थी तथापि इतना अवश्य पता चल गया था कि ये कहानियों जैसा, किताबों जैसा कुछ लिखते हैं. सात-आठ वर्ष की उम्र में साहित्य के नाम पर बस कहानी, कविता शब्द ही समझ आते थे क्योंकि इनको अपनी पाठ्य-पुस्तकों में देख-पढ़ रहे थे. इसके अलावा घर पर पढ़ने का माहौल बना होने के कारण भी पुस्तकों के रूप में वृन्दावन लाल वर्मा नाम देखने को मिल रहा था. बाद में टीवी पर आने वाले मृगनयनी धारावाहिक को देखने के दौरान और भी स्पष्ट जानकारी हुई. उसी धारावाहिक को देखने के दौरान मृगनयनी उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला.


बाद में कक्षाओं में, पाठ्य-पुस्तकों में ऐसे उलझे कि साहित्य के नाम पर बहुत सी पुस्तकों से परिचय स्नातक अध्ययन के दौरान ही कॉलेज के पुस्तकालय के माध्यम से हुआ. उसमें भी वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य को अलग-अलग करके नहीं देखा-समझा. झाँसी की रानी और गढ़ कुंडार उसी दौरान पढ़ने को मिले. बस पढ़ने का शौक था, सो पढ़ लिया मगर कभी सोचा नहीं था कि बचपन से सुनते चले आ रहे इस नाम का सम्बन्ध हमारे कैरियर से, हमारी डिग्री से भी हो जायेगा.


हिन्दी साहित्य से परास्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पितातुल्य ब्रजेश अंकल के द्वारा पीएच.डी. करने का आदेश हुआ. हमारी तरफ से बहुत दिनों से इस मामले को लेकर टालमटोल हो रही थी. एक दिन अंकल ने न केवल आदेश दिया बल्कि हमारे ऊपर अत्यंत स्नेह भाव, वरदहस्त रखने वाले डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी के पास भी ले गए. उनके सामने शिष्य भाव से जाकर बैठ गए. उस समय तक दिमाग में ये था कि जब परास्नातक की डिग्री ले ली है तो अपने नाम के आगे डॉ. अवश्य ही लगवाएंगे मगर ऐसा कब करेंगे, किस विषय से करेंगे ये न सोचा था. विषय का चक्कर इसलिए भी था क्योंकि हिन्दी साहित्य से परास्नातक के पूर्व हम अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल कर चुके थे.


खैर, दो-चार सवाल इधर-उधर के होने के बाद, सामान्य सी बातचीत होने के बाद डीपी सर (डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी को सामान्य बोलचाल में इसी संबोधन से पहचाना जाता रहा है) ने हिन्दी साहित्य में हमारी रुचि और हमारे पसंद के शोध क्षेत्र की जानकारी ली. सर को बताया कि गद्य में ज्यादा रुचि है और हम चाहते हैं कि हमारी पीएच.डी. किसी भी विषय में हो पर क्षेत्र बुन्देलखण्ड का हो. ऐसा जानते ही सर ने तत्काल कहा कि वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य में कर लो, उनका साहित्य मूलतः गद्य ही है. चूँकि इस नाम से हम बचपन से ही परिचित थे, सो हमने भी तुरंत सहमति में अपना सिर हिला दिया.


उसी समय सर ने शोध-विषय ‘वृन्दावन लाल वर्मा के साहित्य में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन’ निर्धारित कर दिया. अगले दिन सिनोप्सिस बना कर विश्वविद्यालय जमा करने का आदेश दिया. बाद में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा संशोधन के बाद हमें शोध-कार्य करने के लिए ‘डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन’ शीर्षक अनुमोदित हुआ. दो वर्षों की अवधि में अपना शोध-कार्य विश्वविद्यालय में जमा करके अगले वर्ष सम्पूर्ण आवश्यक प्रक्रिया के बाद अपने नाम के आगे डॉ. लगाने की अनुमति और गौरव प्राप्त हुआ. किसी समय बस नाम से परिचित होने वाले व्यक्तित्व से अपने शोध-कार्य के दौरान व्यापकता के साथ परिचय हुआ. यह बात हमें आज भी गौरवान्वित करती है कि बचपन से परिचित नाम हमारे साथ न केवल डिग्री रूप में जुड़ा बल्कि यही डिग्री आगे चलकर हमारा कैरियर बनी. वर्ष २००५ में हिन्दी साहित्य से ही स्थानीय गांधी महाविद्यालय में अध्यापन करने का अवसर मिला और सहायक प्राध्यापक के रूप में हमारा चयन हुआ. इसके साथ ही हमारे लिए यह भी गौरव का विषय आज तक है कि हमारे शोध-निर्देशक डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी देश में तीसरे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने दो विषयों में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की हुई थी. डीपी सर ने हिन्दी साहित्य और भाषा विज्ञान में डी.लिट्. उपाधि हासिल की थी.




एम.ए. करने के बाद अपने नाम के आगे डॉ. लगाने की इच्छा रखने की पूर्ति इस रूप में हुई कि हिन्दी साहित्य के साथ-साथ अर्थशास्त्र विषय से भी बाद में पीएच.डी. उपाधि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी से प्राप्त की. अपनी पढ़ाई के दौरान से ही हम पर विशेष स्नेह रखने वाले डॉ. शरद जी श्रीवास्तव सर ने निर्देशन में अर्थशास्त्र विषय में पीएच.डी. उपाधि हासिल करने का सौभाग्य मिला. इसका भी शोध-क्षेत्र हमने बुन्देलखण्ड ही चुना.


आज, २३ फरवरी को प्रसिद्द उपन्यासकार, नाटककार वृन्दावन लाल वर्मा जी की पुण्यतिथि है.  हिन्दी उपन्यास के विकास में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है. उन्होंने ऐसे दौर में जबकि प्रेमचंद उपन्यास विधा में एक युग बन चुके थे, उपन्यास के क्षेत्र में न केवल प्रवेश किया बल्कि ऐतिहासिक उपन्यासों की सफल रचना करके अपना एक अलग, विशिष्ट स्थान बनाया. देखा जाये तो वृन्दावन लाल वर्मा जी ने एक तरफ प्रेमचंद की सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाया तो दूसरी तरफ हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यास की धारा को उत्कर्ष तक पहुँचाया.


आज उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.


09 जनवरी 2022

सिर्फ ऐतिहासिक उपन्यासकार ही नहीं थे वृन्दावन लाल वर्मा जी

आज प्रसिद्द उपन्यासकार वृन्दावन लाल वर्मा जी का जन्मदिन है. उनका जन्म आज ही के दिन १८८९ उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के मऊरानीपुर को हुआ था. वृन्दावन जी को मुख्य रूप से ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में जाना जाता है. बहुत से कम लोगों को ये जानकारी है कि उन्होंने सामाजिक उपन्यास भी कम नहीं लिखे हैं. ऐसा होना निश्चित रूप से उनकी लेखकीय प्रतिभा का पूरा सम्मान नहीं है. उनको ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में स्वीकारने का मुख्य कारण उनके दो प्रमुख उपन्यास ‘गढ़ कुंडार और ‘मृगनयनी भी हैं. आम लोगों ने उनको इसी कारण से विशुद्ध ऐतिहासिक लेखक या कहें कि उपन्यासकार के रूप में जाना है.




इस पोस्ट का उद्देश्य वृन्दावन लाल वर्मा जी के बारे में यही जानकारी देनी है कि वे मात्र ऐतिहासिक लेखक नहीं हैं, न ही वे विशुद्ध उपन्यासकार हैं बल्कि उन्होंने उपन्यास के अलावा अन्य कृतियों की भी रचना की है, ऐतिहासिक कृतियों के अलावा सामाजिक कृतियाँ भी साहित्य जगत को दी हैं. जब ये उन्नीस साल के किशोर थे तो इन्होंने अपनी पहली रचना ‘महात्मा बुद्ध का जीवन चरित’(१९०८) लिख डाली थी। उनके लिखे नाटक ‘सेनापति ऊदल’(१९०९) में अभिव्यक्त विद्रोही तेवरों को देखते हुये तत्कालीन अंग्रजी सरकार ने इसी प्रतिबंधित कर दिया था. सन १९२० ई० तक छोटी-छोटी कहानियाँ लिखते रहे. इन्होंने मुख्य रूप से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास, नाटक, लेख आदि गद्य रचनायें लिखी हैं साथ ही कुछ निबंध एवं लधुकथायें भी लिखी हैं. उनकी रचनाओं को यहाँ सामान्य परिचय के रूप में यहाँ आप सबकी जानकारी के लिए दिया जा रहा है.


ऐतिहासिक उपन्यास

  • गढ़ कुंडार (1930 ई.)
  • टूटे काँटे (1945 ई.)
  • झाँसी की रानी (1946 ई.)
  • महारानी दुर्गावती
  • मुसाहिबजू (1946 ई.)
  • कचनार (1947 ई.)
  • मृगनयनी (1950 ई.)
  • माधवजी सिंधिया (1950 ई.)
  • रामगढ़ की रानी (1950 ई.)
  • भुवनविक्रम (1957 ई.)
  • ललितादित्य
  • अहिल्याबाई
  • देवगढ़ की मुस्कान


सामाजिक उपन्यास

  • प्रत्यागत (1927 ई.)
  • संगम (1928 ई.)
  • प्रेम की भेट (1928 ई.)
  • कुंडलीचक्र (1932 ई.)
  • कभी न कभी (1945 ई.)
  • अचल मेरा कोई (1948 ई.)
  • सोना (1952 ई.)
  • अमरबेल (1953 ई.)
  • सोती आग
  • डूबता शंखनाद
  • लगन
  • उदय किरण
  • अमर-ज्योति
  • कीचड़ और कमल
  • आहत


नाटक

  • धीरे-धीरे
  • राखी की लाज
  • सगुन
  • जहाँदारशाह
  • फूलों की बोली
  • बाँस की फाँस
  • काश्मीर का काँटा
  • हंसमयूर
  • रानी लक्ष्मीबाई
  • बीरबल
  • खिलौने की खोज
  • पूर्व की ओर
  • कनेर
  • पीले हाथ
  • नीलकण्ठ
  • केवट
  • ललित विक्रम
  • निस्तार
  • मंगलसूत्र
  • लो भाई पंचों लो
  • देखादेखी


कहानी संग्रह

  • दबे पाँब
  • मेढ़क का ब्याह
  • अम्बपुर के अमर वीर
  • ऐतिहासिक कहानियाँ
  • अँगूठी का दान
  • शरणागत
  • कलाकार का दण्ड
  • तोषी


निबन्ध

  • हृदय की हिलोर 

 

04 जनवरी 2022

साहित्यिक सामग्री की खुलेआम चोरी

Faculty Induction Programme का एक सप्ताह निकल चुका है। इस दौरान बहुत से विद्वानों ने आकर विभिन्न विषयों पर अपना व्याख्यान दिया। उनके अनुभवों, उनके कार्यों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। कुछ ऐसे विषयों से भी परिचय हो रहा है जो कि जानकारी मे तो थे किन्तु उसने प्रति बहुत ज्यादा सजगता नहीं थी। विषयों में साहित्यिक चोरी (Plegarism) और उद्धरण (Citation) को लिया जा सकता है। विगत कुछ वर्षों से इन दोनों विषयों पर जोर-शोर से बात हो रही है, इसके बारे में शोध-कार्यों मे बताया, समझाया जा रहा है मगर स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही थी। वर्तमान में चल रहे Faculty Induction Programme में आए वक्ता द्वारा इस पर विस्तार से प्रकाश डाला  गया। उनके द्वारा समझाया गया कि किस तरह शब्दों की चोरी भी व्यक्ति के कैरियर को नुकसान पहुँचा  सकती है।


यहाँ देखने में आ रहा है कि जबसे यू जी सी द्वारा शोध और शिक्षण को एकसाथ जोड़कर किसी भी प्राध्यापक के लिए अनिवार्य सा कर दिया है, उसी समय से प्राध्यापकों पर एक तरह का दवाब बढ़ गया है। अब उनके द्वारा शिक्षण कार्य के साथ-साथ शोध-कार्य करवाए जाने का, रिसर्च पेपर लिखने का भी दवाब है। ऐसी स्थिति में बहुत से लोग ऐसे हैं जो इधर-उधर की जुगाड़ से रिसर्च पेपर लिखने मे लग गए हैं। ऐसे लोग ही सामग्री की चोरी करने मे सबसे आगे होते हैं। सामग्री की चोरी के साथ-साथ उद्धरण का लगाया जाना या कहें कि उसकी चोरी रोकने के भी अनेकानेक नियम बने हुए हैं मगर शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग इन नियमों को एक किनारे लगाकर खुलेआम चोरी करने मे लगे हुए हैं। 

09 जनवरी 2021

ऐतिहासिकता को जीवंत स्वरूप प्रदान करने वाले साहित्यकार

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 131वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे.  उनकी प्रतिज्ञा अपने आपसे थी, इसी कारण वे इतिहास की सत्यता सामने लाने के लिए लगातार प्रयत्नशील बने रहे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली. गढ़कुंडार जैसे विस्तृत उपन्यास की कथा-वस्तु के बारे में उनका स्वयं का कहना है कि एक शिकार कार्यक्रम के दौरान रात भर उस किले की छवि देखते-देखते ही उन्होंने उसकी एतिहासिकता की कथा को स्वरूप प्रदान कर दिया था. 


उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. ऐसे दौर में इतिहास जैसे विषय पर लेखन करना और उसे जनसामान्य के बीच सहज मान्यता प्रदान करवाना सरल नहीं था. वृन्दावन लाल वर्मा जी की सरल और रोचक लेखन-शैली का ही कमाल कहा जायेगा कि उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास ने उन्हें पर्याप्त ख्याति प्रदान करवा दी. उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.




भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.

आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...


.

वंदेमातरम्



02 जनवरी 2021

सपनीली राह पर हकीकत के कदम

कोरोनाकाल का संकट झेलते-देखते हुए आखिरकार लोगों के सामने नया साल 2021 आ ही गया. वैसे भी उसे अपने समय से आना ही था मगर जिस तरह से लोगों में कोरोना का भय पैदा किया गया, मौत के आँकड़ों के सहारे जिस तरह से लोगों के बीच डर का माहौल बनाया गया उसके बाद से लोग जल्द से जल्द वर्ष 2020 के जाने की बात करने लगे. यह समय के हाथों में ही रहता है अन्यथा लोग मई-जून में ही वर्ष 2020 को समाप्त करवा कर वर्ष 2021 को ला देते. इस आये हुए नए साल में क्या-क्या सुखद छिपा है, क्या-क्या दुखद छिपा है यह तो तभी मालूम चल सकेगा जबकि यह साल अपने परदे हटाएगा मगर फिलहाल उसकी आहट सुखद खबर के साथ हुई है. कोरोना की वैक्सीन आने की खबर मिली.


वैक्सीन के बारे में, उसके परीक्षण, उसके परिणाम पर चर्चा उनके लिए जो इस बारे में बड़ी तन्मयता से अपनी नजर लगाए हैं. इस बारे में अभी कुछ कहना-बताना उचित भी नहीं क्योंकि अभी इसके निश्चित परिणाम के बारे में कोई खबर भी नहीं. नए साल के हमारे पहले दो दिन सामान्य रूप में वैसे ही निकले जैसे कि पिछले साल के निकले थे. कोरोना का, लॉकडाउन का, अनलॉक का विशेष प्रभाव हमारी दिनचर्या पर नहीं पड़ा था, हाँ शाम का नियमित घूमना-फिरना बंद हो गया था.




नए साल में कभी भी किसी भी तरह से कोई संकल्प लेने का, कोई काम पूरा करने जैसा कोई काम कभी नहीं किया. अपनी तरफ से हमेशा यही प्रयास रहा कि कुछ न कुछ नया किया जाये मगर किसी काम को ही करने का संकल्प जैसा कुछ नहीं किया. इस बार विचार किया है (जो विगत साल-दो साल से विचार ही बना हुआ है) कि कुछ नया लिखा जाये. नया से मतलब कुछ अलग हटकर. पिछले काफी समय से जिस तरह से लेखन किया जा रहा है, वह अब मजा नहीं दे रहा है. पढ़ने का शौक तो ज्यों का त्यों बना हुआ है, लिखने का शौक भी ज्यों का त्यों बना हुआ है, यह सुखद है.


दिमाग दौड़ाते हैं कि किस तरह के विषयों पर लिखना है, कैसा लिखना है. लिखने के साथ-साथ कोशिश यही रहेगी कि वह सबको अधिक से अधिक पढ़ने को भी मिले. बीते वर्ष में किंडल संस्करण पर भी अपना लेखन ले गए, इस वर्ष उसको और विस्तार देने का प्रयास रहेगा. इसके साथ-साथ मित्रों के सहयोग से यदि पुस्तकों का प्रकाशन भी होता रहेगा तो उससे भी पीछे नहीं हटा जायेगा.


चलिए फिर, इंतजार करिए किसी नए विषय पर हमारा लिखा पढ़ने का. हम भी प्रयास करते हैं कुछ नया, अलग हटकर, कुछ विशेष आप सबको पढ़वाने का.

 

.
वंदेमातरम्

28 अगस्त 2020

पत्रिकाएँ बंद होती रहेंगी, हम स्यापा करते रहेंगे

आज सोशल मीडिया कादम्बिनी और नंदन पत्रिकाओं के बंद किये जाने की सूचना से आहत दिखाई दिया. बहुतों की पोस्ट से आँसू भी बहते नजर आये. समझ नहीं आया कि इन पत्रिकाओं के बंद होने का ये दुःख वास्तविक है या फिर सोशल मीडिया के प्रदर्शनकारी मंच पर सबको यह दिखाना है कि हम इन पत्रिकाओं के कितने बड़े प्रशंसक हैं? जिस अनुपात में सोशल मीडिया में इन पत्रिकाओं के पक्ष में पोस्ट दिखाई दीं यदि बस उतने लोग ही इन दो पत्रिकाओं के पाठक हो जाते तो इनके बंद होने की स्थिति कतई नहीं आई होती. इस बात को हम इसलिए कह सकते हैं क्योंकि विगत कई वर्षों से हम भी एक लघु-पत्रिका का संपादन-प्रकाशन कर रहे हैं, वह भी बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के. कादम्बिनी, नंदन पत्रिकाओं का प्रकाशन समूह कोई आर्थिक स्थिति से कमजोर लोगों का समूह नहीं है. ऐसे में इन पत्रिकाओं को बंद करने का कारण महज आर्थिक नहीं है.


आज जो लोग सार्वजनिक प्रचार-प्रसार के मंच पर स्यापा फ़ैलाने में लगे हैं, उनमें से कितने लोग होंगे जिन्होंने विगत एक वर्ष में ही इन दोनों पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ा होगा? मुश्किल से दो-चार व्यक्ति ऐसे मिल जाएँ तो बहुत बड़ी बात है. तकनीक के दौर में जहाँ अब लोग प्रकाशित सामग्री से दूरी बनाते जा रहे हैं, लोगों के सामने तमाम वेबसाइट और किंडल संस्करण बेहतर विकल्प के रूप में उपस्थित है तो लोग पत्रिकाओं के खरीदने का कष्ट क्यों करेंगे? विगत वर्षों में लोगों का रुझान पढ़ने से जिस तरह हटा है, जिस तरह प्रकाशित सामग्री से पाठक दूर हुआ है उसने बहुत कुछ स्पष्ट कहानी रच दी है. इनके साथ-साथ एक और स्थिति स्पष्ट देखने को मिल रही है कि अब व्यक्ति न तो स्वयं पढ़ने के प्रति लालायित दिखाई दे रहा है और न ही अपने बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है. जो चंद लोग पढ़ने के प्रति जागरूक दिखाई देते हैं वे भी ऑनलाइन सामग्री को वरीयता देते दिख रहे हैं. ऐसे में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं की स्थिति दोयम दर्जे की होनी ही है.


पाठकों की कमी का कारण क्या है, इसे खोजा जाना आवश्यक है. यदि ये कहा जाये कि पढ़ने वालों की संख्या में एकदम से गिरावट आ गई है या फिर ये कहा जाये कि पुस्तक पढ़ने के शौक़ीन अब नहीं रहे तो यह भी झूठ होगा. ये भी कहना गलत होगा कि हिन्दी पाठक अब कम हो गए हैं. ऐसा इसलिए कि यदि पढ़ने वालों की संख्या में गिरावट आ गई होती, प्रकाशित सामग्री के प्रति लोगों का रुझान न के बराबर होता, हिन्दी पाठकों की संख्या कम हो गई होती तो फिर किसी अंग्रेजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद क्यों लाखों प्रतियों में बिकता? अभी हाल के कुछ वर्ष इसके उदाहरण हैं जबकि ऐसी पुस्तकों की बिक्री लाखों प्रतियों में रही है. ये प्रकाशित प्रतियाँ मँहगे दामों में भी लगातार बिकती रही हैं. ऐसे में कुछ न कुछ तो है जिसे न तो प्रकाशक समझ पा रहे हैं और न ही पाठक इसे समझना चाहते हैं.

जहाँ तक हमारा अपना अनुमान है कि पत्रिकाओं के प्रति लोगों का झुकाव कम अवश्य हुआ है. पत्रिकाओं को यदि मासिक ही मान लिया जाये तो प्रतिमाह खरीदना किसी आम पाठक को एक बोझ सा समझ आने लगा है. बच्चों की पत्रिकाओं के प्रति अब पहले जैसा रुझान देखने को नहीं मिलता है. प्रकाशन के मंहगे होने ने भी पाठकों को पत्रिकाओं की तरफ से दूर किया है. पत्रिकाओं का मंहगा होना, उनके संग्रहण की समस्या होना, पत्रिकाओं का समय निकल जाने के बाद उनका समुचित मूल्य न मिलना, पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ने से ज्यादा माँगकर पढ़ने की प्रवृत्ति रखने ने भी पत्रिकाओं के सामने संकट उत्पन्न किया है.

इन दो पत्रिकाओं के बंद हो जाने के बाद और कितनी पत्रिकाएँ बाजार में शेष हैं बंद होने को, इसकी गिनती की जानी चाहिए. इस हालत के बाद भी न पाठक सुधरने वाले और न ही प्रकाशन समूह. हम बच्चों में पुस्तकें पढ़ने की आदत को विकसित नहीं कर सकेंगे, ये भी परम सत्य है. हम स्वयं अपनी पुरानी आदत को फिर से जिन्दा नहीं कर सकेंगे, ये भी परम सत्य है. ऐसी स्थिति में अपार खर्च उठाकर कोई भी समूह पत्रिकाओं का निरंतर प्रकाशन नहीं करेगा, ये भी परम सत्य है. इस तमाम सत्यों के बीच एक सत्य यह है कि हिन्दी साहित्य का हाल हम हिन्दी भाषियों ने ही बुरा किया है. हम ही इसके लिए दोषी हैं, हम ही जिम्मेवार हैं.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग