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04 मार्च 2024

आवश्यक है निर्वाचन आयोग की सख्ती

देश इस समय चुनावी मोड में आ चुका है. वर्तमान लोकसभा के कार्यकाल को देखते हुए जल्द ही निर्वाचन आयोग द्वारा आदर्श आचार संहिता लागू कर दी जाएगी. आचार संहिता में अनेकानेक तरह के कार्यों पर प्रतिबन्ध लग जाता है. निर्वाचन आयोग अपनी तरफ से पूरी तरफ मुस्तैद रहता है कि आचार संहिता के दौरान और चुनावों के समय भी किसी तरह का ऐसा कार्य न हो सके जिससे लोगों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति गलत सन्देश प्रसारित हो. इस बार आयोग द्वारा आदर्श आचार संहिता लगने के पहले ही राजनैतिक दलों को स्पष्ट रूप से सचेत कर दिया गया है कि उनकी बेवजह, अनावश्यक बयानबाजी पर निगाह रखी जाएगी. आयोग द्वारा यह भी समझाया गया है कि ऐसा करने वालों पर कार्यवाई की जाएगी. निर्वाचन आयोग की सक्रियता की यह एक मिसाल है जबकि उसने आदर्श आचार संहिता लागू होने के पहले ही अपने मंतव्य को स्पष्ट कर दिया है.  

 



आयोग के सामने चुनाव को निष्पक्ष करवाने के साथ-साथ अनेक प्रकार की चुनौतियाँ रहती हैं. उसके सामने महज राजनैतिक व्यक्तियों की अनर्गल बयानबाजी को, भाषाई अशालीनता को रोकना ही प्रमुख कदम नहीं है वरन अनेकानेक अवैध तरीकों से चुनावों को प्रभावित करने को रोकना भी एक जबरदस्त चुनौती है. आयोग द्वारा इससे पहले भी चुनाव सुधारों सम्बन्धी पहल की जा चुकी है. एक व्यक्ति के दो जगह से चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने, दो हजार रुपये से अधिक के गुप्त चंदे पर रोक लगने, उन्हीं राजनैतिक दलों को आयकर में छूट दिए जाने का प्रस्ताव जो लोकसभा-विधानसभा में जीतते हों आदि विचारों के द्वारा निर्वाचन आयोग ने अपनी स्वच्छ नीयत का सन्देश दिया है. किसी भी देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सफलता के लिए वहाँ की निर्वाचन प्रणाली का स्वच्छ, निष्पक्ष, कम खर्चीला होना आवश्यक है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता इसमें निहित है कि वहाँ की निर्वाचन प्रणाली कैसी है? वहाँ के नागरिक सम्बंधित निर्वाचन को लेकर कितने आश्वस्त हैं? निर्वाचन प्रणाली, प्रक्रिया में कितनी सहजता, कितनी निष्पक्षता है?

 

भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विगत कुछ दशकों से निर्वाचन प्रक्रिया सहज भी रही है तो कठिनता के दौर से भी गुजरी है. निर्वाचन प्रक्रिया भयावहता के अपने चरम पर होकर वापस अपनी सहजता पर लौट आई है. अब पूरे देश के चुनावों में, किसी प्रदेश के चुनावों में एकाधिक जगहों (पश्चिम बंगाल को छोड़कर) से ही हिंसात्मक खबरों का आना होता है. एकाधिक जगहों से ही बूथ कैप्चरिंग किये जाने के प्रयासों की खबरें सामने आती हैं. निर्वाचन को भयावह दौर से वापस सुखद दौर तक लाने का श्रेय बहुत हद तक निर्वाचन आयोग की सख्ती को रहा है तो केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा बलों की उपलब्धता को भी जाता है. इस सहजता के बाद भी लगातार चुनाव सुधार की चर्चा होती रहती है. राजनैतिक परिदृश्य में सुधारों की बात होती रहती है. निर्वाचन की खर्चीली प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाये जाने की कवायद होती रहती है. चुनावों में प्रयुक्त होने वाले कालेधन और अनावश्यक धन के उपयोग पर रोक लगाये जाने की नीति बनाये जाने पर जोर दिया जाता है.

 

प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के अवैध स्रोतों से चुनाव में खर्चा किया जाता है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. विगत चुनावों में उत्तर प्रदेश के एक अंचल में ‘कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा वोट सपोर्ट’ जैसे नारे खुलेआम लगने का स्पष्ट संकेत था कि चुनावों में ऐसे खर्चों के द्वारा भी मतदाताओं को लुभाया जाता रहा है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि ‘पेड न्यूज़’ के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है. बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाये जाने का काम मीडिया के द्वारा किया जाता है. धनबल से संपन्न प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के आयोजनों के द्वारा, विभिन्न आयोजनों को धन उपलब्ध करवाने के द्वारा भी निर्वाचन प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के उपक्रम किये जाते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है.

 

ऐसा नहीं है कि निर्वाचन आयोग को ऐसी स्थितियों का भान नहीं है. आयोग द्वारा उठाये गए तमाम क़दमों का प्रभाव है कि सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन से रोका जा सका है. आयोग के प्रयासों का सुफल है कि आज हाशिये पर खड़े लोगों को मतदान का अधिकार मिल सका है, वे बिना किसी डर-भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं. इसके बाद भी अभी बहुत से प्रयास किये जाने अपेक्षित हैं. धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धूल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. धनबल की यह स्थिति चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित करती है.

 

आयोग द्वारा प्रयास ये होना चाहिए कि चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सिर्फ धनबलियों, बाहुबलियों का कब्ज़ा होकर न रह जाये. उसको ध्यान रखना होगा कि चुनाव खर्च की बढ़ती सीमा से कहीं कोई चुनाव प्रक्रिया से वंचित तो नहीं रह जा रहा है. आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.





 

05 सितंबर 2023

साम्प्रदायिक राजनीति का बढ़ता चलन

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन के सनातन उन्मूलन सम्बन्धी बयान को महज मानसिकता समझ कर दरकिनार नहीं किया जा सकता है. असल में धर्म और राजनीति का आपस में जिस तरह से घालमेल कर दिया गया है, उसके बाद से ऐसे बयान आश्चर्य नहीं. इसके पहले भी अनेकानेक बार इस तरह के बयान सामने आये जहाँ कि राजनीति को धर्म के द्वारा चमकाने का काम किया गया. आज भले ही प्रत्येक राजनैतिक दल अपने हित साधने हेतु धर्म का सहारा लेते दिख रहे हों किन्तु यह कार्य स्वतंत्रता के पहले से होता आया है. अंग्रेजों ने धर्म का सहारा लेकर ही 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को प्रभावित किया था. उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि धर्म के नाम पर हिन्दू और मुसलमानों के बीच अनेक दंगे हुए और अंततः सन 1947 में देश को धार्मिक आधार पर विभाजित कर दिया गया.


साम्प्रदायिकता की इस आग ने देश को आज तक अपने कब्जे में ले रखा है. यह विचारणीय है कि ऐसा तब हो रहा है जबकि वर्ष 1976 में 42वें संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को अंकित कर भारत को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया. प्रस्तावना में इसके बाद स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि ‘हम, भारत के लोगभारत को एक संप्रभु समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने और इसके सभी नागरिकों को सुरक्षित करने का गंभीरता से संकल्प लेते हैं.’ यहाँ धर्मनिरपेक्ष का सीधा सा अर्थ है कि सरकार और धार्मिक समूहों के बीच सम्बन्ध संविधान और कानून के अनुसार निर्धारित हैं. यह राज्य और धर्म की शक्ति को अलग करता है.




धर्म और राजनीति का समाज पर गहरा प्रभाव रहता है. इनके द्वारा राष्ट्र के, मानव के विकास को नयी दिशा प्राप्त होती है. ऐसे में धर्म और राजनीति को समझने की आवश्यकता है. शास्त्रसम्मत विचार से जिसे धारण किया जा सके वह धर्म है. यह वो क्रिया है जो मानव को जीने का रास्ता दिखाती है. यदि विस्तीर्ण रूप में देखें तो हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि धर्म नहीं बल्कि सम्प्रदाय हैं. इसी तरह योजनाबद्ध नीति एवं कार्यक्रमों का सञ्चालन करना ही राजनीति है. जनता के सामाजिक, मानसिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्तर आदि को विकास की राह पर ले जाना ही इसका लक्ष्य होता है. धर्म में राजनीति को शामिल नहीं किया जा सकता किन्तु राजनीति बिना धार्मिकता के साथ नहीं हो सकती है. बिना धर्म के राजनीति मूल उद्देश्य से भटक जायेगी, मानव-कल्याण की भावना से परे हो जाएगी. मानव-कल्याणयुक्त धर्म से की गयी राजनीति ही धर्मनिरपेक्षता को प्रतिपादित करती है.


धर्म और राजनीति के इस विवेचन के मूल में छिपा है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होता है. वह सभी धर्मों का सम्मान करते हुए उनको एकसमान दृष्टि से देखता है. यह किसी भी शासन की राज्य की प्रमुखता में शामिल है कि वह किसी धर्म विशेष के विकास हेतु कार्य नहीं करेगा और न ही किसी तरह के धार्मिक हस्तक्षेप हेतु स्वयं को अग्रणी भूमिका में लायेगा. धर्मनिरपेक्षता का यही वास्तविक स्वरूप है. इसके बाद भी न केवल राजनैतिक व्यक्तित्व, राजनैतिक दल धर्म के द्वारा अपनी-अपनी राजनीति को चमकाने में लगे हैं बल्कि राज्य भी इसी तरह की गतिविधियों में लिप्त होने लगे हैं. ऐसी गतिविधियाँ चुनावों के समय स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती हैं. पूर्व में हुए चुनावों में शाही इमाम द्वारा एक दल विशेष को मतदान करने की अपील राजनैतिक मंच से की गई तो एक प्रतिष्ठित पत्रिका के पत्रकार ने टिप्पणी करते हुए लिखा था कि ‘समाजवाद और गणतंत्र की बात करने वाले लोग अगर इमाम के नाम से वोट पाना चाहेंगे तो हो सकता है कि कुछ लोग शंकराचार्य के नाम पर वोट माँगने लगें. फिर क्या, इस देश को शंकराचार्य और इमाम के बीच चुनाव करना होगा.’ यह सामान्य टिप्पणी नहीं है. आज बहुत तेजी के साथ यही हो रहा है. अब धार्मिक संगठनों से जुड़े लोग खुलकर राजनैतिक दलों के लिए, राजनेताओं के लिए वोट माँगते हैं.


धर्म किसी भी व्यक्ति के आंतरिक विश्वास का विषय होता है. इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल स्वयं को सुरक्षित समझता है बल्कि सकारात्मक रूप से प्रभावित भी मानता है. इतिहास में भी किसी समय शासन का आधार धर्म हुआ करता था. तब धर्म के आधार पर व्यक्तियों के, जनता के क्रियाकलापों को संचालित किया जाता था, नियंत्रित किया जाता था. वर्तमान में संवैधानिक रूप से ऐसा न होने के बाद भी राजनैतिक दलों द्वारा संवैधानिक अनुच्छेदों का कथित रूप से फायदा उठाकर धर्म के द्वारा राजनीति को चमकाया जा रहा है. संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, अनुच्छेद 26 के द्वारा धार्मिक संस्थानों की स्थापना का अधिकार मिला है, अनुच्छेद 29 और 30 नागरिकों, विशेष रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों को मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं. इन संवैधानिक अधिकारों को राजनैतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करते रहते हैं. सार्वजानिक स्थलों पर धार्मिक कृत्यों को समर्थन देना, शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में मजहबी शिक्षा प्रदान करना, अल्पसंख्यकों के नाम पर दबाव समूह के रूप में राजनीति करना इन्हीं अनुच्छेदों की आड़ लेकर किया जाने लगता है. समय-समय पर अलग राज्य की माँग, धार्मिक स्थलों का उपयोग राजनीतिक कार्यों के लिए करने जैसे कदम उठाये जाते रहते हैं. पंजाब, जम्मू-कश्मीर, दक्षिण भारत के राज्य इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. यहाँ धर्म के नाम पर ही अलगाव की स्थिति एक पल में ही हिंसक रूप धारण कर लेती है. इसी अलगाववाद का लाभ उठाकर राजनैतिक दलों द्वारा मतदान को प्रभावित कर लिया जाता है. धार्मिकता के आधार पर प्रत्याशियों का चयन, धर्म के आधार पर मतदान, उसी आधार पर मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व के द्वारा नागरिकों की धार्मिक भावनाओं से खेला जाता है.


देखा जाये तो ये राजनैतिक दल राजनीति में धर्म का समावेश नहीं कर रहे हैं बल्कि धर्म में राजनीति का घालमेल करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं. इसका खामियाजा समाज को, नागरिकों को भुगतना पड़ता है. जरा सी बात को हिन्दू, मुस्लिम अथवा किसी अन्य सम्प्रदाय से संदर्भित करके नागरिकों की भावनाओं को भड़का दिया जाता है. ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जबकि देश इस कारण से हिंसा की आग में जला. देश में वर्तमान दौर में अनेक धार्मिक, मजहबी प्रवृत्तियाँ राजनीति पर प्रभावी रूप से हावी हैं. इनका अराजक राजनैतिक रूप भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है. साम्प्रदायिकता के बढ़ते प्रभाव से देश की धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को खतरा है. इस समस्या का समाधान देश के लिए आवश्यक है और इसे हम सभी नागरिकों को, राजनैतिक दलों को मिलकर ही निकालना होगा. इसके लिए सर्वोपरि एक काम हो और वो है राजनीति से धार्मिक उन्माद का समाप्त होना. 





 

15 अगस्त 2021

राष्ट्रगान न गा सकने वाले भारतीय नागरिक

स्वतंत्रता दिवस का आयोजन हर्षोल्लास के साथ पूरा देश मना रहा है. हर तरफ से फोटो, वीडियो दिखाई दे रहे हैं, जिनमें लोगों की ख़ुशी झलक रही है. इन्हीं वीडियो में से एक ऐसा वीडियो देखने को मिला जिसे देखकर एकबारगी ये विश्वास ही नहीं हो रहा है ये ध्वज फहराने वाले इसी देश के नागरिक हैं. किसी तरह का कोई आपत्तिजनक वीडियो नहीं देखने को मिला. कहीं कुछ ऐसा नहीं मिला कि स्वतंत्रता दिवस पर किसी और देश का ध्वज फहरा दिया गया हो. ऐसा भी नहीं हुआ कि अपने राष्ट्रीय ध्वज को उल्टा फहरा दिया गया हो, जैसा कि अक्सर कई जगहों पर होने की खबरें विगत वर्षों में मिलती रही हैं. ऐसा वीडियो भी नहीं था जिसमें राष्ट्रगान का विरोध किया गया हो अथवा उसके गायन से इनकार किया हो, ऐसा भी विगत वर्षों में बहुत सी जगहों पर होता रहा है.


इस बार एक वीडियो देखने को मिला जिसमें एक राजनैतिक दल के द्वारा ध्वजारोहण किया गया. इसके पश्चात् उनके नेताओं द्वारा पूरे जोश के साथ राष्ट्रगान का गायन शुरू हुआ. आरंभिक दो-तीन पंक्तियों के बाद किसी के मुँह से राष्ट्रगान की पंक्तियाँ न उभरीं. सब के सब दो-तीन-चार गलत-गलत शब्द गाते हुए खामोश हो गए. बाद में सभी के द्वारा अजब-अजब सी आवाजों को निकाला जाता रहा और राष्ट्रगान का अंत जय हे, जय हे के साथ कर दिया गया. ऐसा नहीं कि ध्वजारोहण के समय वहां दो-तीन लोग ही उपस्थित थे और उनको पूरा राष्ट्रगान नहीं आया. उस अवसर पर वहाँ अच्छी-खासी भीड़ जमा थी और यह आश्चर्य का विषय है कि उस भीड़ में किसी को पूरा राष्ट्रगान याद नहीं था. यह शर्म की बात है.


फिलहाल, ऐसे बहुत से वीडियो आते रहते हैं जहाँ प्रेंक के नाम पर अजीब-अजीब सी हरकतें करते युवा दिखते हैं, उन्हीं अजीब हरकतों के बीच कई बार इस तरह के मौके भी दिख जाते हैं जबकि उन युवाओं को देश से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी नहीं होती है. कुछ ऐसा ही ध्वजारोहण के अवसर पर दिखाई पड़ना दुखद भी है, शर्मनाक भी है.


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27 अक्टूबर 2020

वोट बनने की जगह अब नागरिक बनना होगा

समाज में एक नागरिक के रूप में यहाँ के मंत्री भी रहते हैं और एक साधारण सा काम करने वाला भी. इसी नागरिक के रूप में एक प्रशासनिक अधिकारी की पहचान होती है तो एक सामान्य से क्लर्क की. इसी में बहुत बड़ा व्यापारी भी शामिल होता है और इसी में एक अत्यंत गरीब व्यक्ति भी. पद, प्रतिष्ठा, धर्म, जाति के आधार पर किसी की नागरिकता का निर्धारण नहीं होता बल्कि सभी इसी समाज के नागरिक कहे जाते हैं. ये और बात है कि पद, प्रस्थिति, प्रतिष्ठा, धन आदि के द्वारा उसको अलग स्थान दिया जाने लगता है. इसी अलग स्थान दिए जाने की मानसिकता के कारण देश के सभी राजनैतिक दलों ने नागरिकों को अपने हाथों का खिलौना बना दिया है. ये नागरिक अब महज नागरिक न होकर जाति, धर्म, क्षेत्र, राजनैतिक विचारधारा के लोग बना दिए गए हैं.


समाज में किसी भी घटना के बाद हम सभी उसके पहले हुई घटना के सापेक्ष राजनैतिक दलों की प्रतिक्रिया की तुलना करने लगते हैं. एक पल रुक कर सोचिए कि क्या राजनैतिक दलों ने वाकई किसी भी घटना पर प्रभावित पक्ष के लिए संवेदनात्मक रूप से कार्य किया है? इसमें किसी एक दल को दोषी नहीं ठहराया जा रहा है बल्कि सभी दल एकसमान रूप से दोषी हैं. उनके लिए कोई भी घटना महज एक घटना ही नहीं होती वरन एक तरह का मंच होती है, जिसके माध्यम से वे अपने दल के लिए अधिक से अधिक सहानुभूति, अधिक से अधिक मतदाता, अधिक से अधिक वोट का जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं. उनके किसी भी घटना के सन्दर्भ में उठने वाले कदमों की हम आलोचना करते हैं और उसी कदम की किसी अन्य घटना के सापेक्ष समर्थन भी करने लगते हैं. असल में एक नागरिक के रूप में हम सभी लोग ही स्थिर नहीं हैं. हमें किसी भी घटना के सापेक्ष खुद भी ज्ञात नहीं होता है कि हम चाहते क्या है? हम चाह क्या रहे हैं?




किसी भी घटना के हो जाने पर एक नागरिक के रूप में हमारी प्रतिक्रिया होने से पहले ही हम सभी खुद को धर्म, जाति, क्षेत्र, राजनैतिक विचारधारा के खाँचे में फिट कर लेते हैं. अब खाँचे में फिट हो जाने के बाद हम सभी की दृष्टि, सोच का दायरा सीमित हो जाता है. इसी सीमित दृष्टि के कारण हम उस घटना के सन्दर्भ में राजनैतिक दलों से किसी तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करने लगते हैं. समाज के नागरिक बनने के बजाय आलोचक बनके राजनैतिक दलों की पिछली किसी भी घटना पर उपजी प्रतिक्रिया की तुलना में लग जाते हैं. यही वह बिंदु होता है जहाँ कोई भी अपराधी अपने आपको मजबूत स्थिति में पाता है. वह समझ लेता है कि उसके अपराध का विरोध, उसके कृत्य का विरोध हम एक नागरिक के रूप में कभी करने की स्थिति में नहीं हैं. हम किसी भी अपराधी के कृत्यों के विरोध के लिए भी राजनैतिक दलों का मुँह ताकने लगते हैं.


इसी तरह की मानसिकता ने समाज में नागरिकों को कमजोर किया है और अपराधियों को बढ़ावा दिया है. हम सभी को एक नागरिक के रूप में स्वयं में सक्षम होना चाहिए. समाज में होने वाली किसी भी घटना के सन्दर्भ में हम सभी को एकजुट होकर अपराधियों का विरोध करना चाहिए. यदि समाज के सभी नागरिक एकसमान रूप से एकजुट होकर किसी भी अपराधी के कृत्य का विरोध करने उतर पड़ेंगे तो किसी भी बड़े से बड़े अपराधी की हिम्मत नहीं कि वह अगली बार किसी तरह का अपराध करे. घटना किसी भी प्रदेश में हो, किसी भी व्यक्ति के साथ हो, अपराधी का निशाना बेटी है या बेटा, युवा है या वृद्ध, गरीब है या अमीर इन सबका आकलन करने के बजाय अपराधी का विरोध होना चाहिए. यदि हम सभी एक नागरिक के रूप में एकजुट होकर ऐसा नहीं कर पाते हैं तो अपराधी खुलेआम सड़क पर अपराध करते रहेंगे, राजनैतिक दल हम नागरिकों को अपने वोट में बदलते रहेंगे.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

12 मई 2019

मतभेद किसी तरह मनभेद में न बदले


विगत पांच सालों से जबसे केंद्र में भाजपा की सरकार आई है तबसे लोगों की मानसिकता में दो तरह के वर्ग साफ़ दिखाई देने लगे हैं, एक भाजपा-समर्थक, दूसरा भाजपा-विरोधी. इन दोनों वर्गों के अपने-अपने पूर्वाग्रह हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. ऐसे में दोनों ही वर्ग अपने-अपने विचारों, अपने-अपने तथ्यों को ही प्रामाणिक बताने की कोशिश में लगे रहते हैं. इसी कारण से इन्हीं पांच वर्षों में लोगों के बीच विभेद भी बढ़ता दिखाई दिया है. बहुत से भाजपा-विरोधी लोगों का मानना है कि ऐसा मोदी के कारण हुआ है. क्या वाकई ऐसा है? क्या मोदी ने किसी भी भाषण में, किसी भी रैली में, किसी भी आयोजन में लोगों से कहा है कि जो भी भाजपा या मोदी समर्थक है वह अपने विरोधियों से वैमनष्यता रखे? क्या कहीं भी मोदी ने इन दोनों वर्गों की मानसिकता रखने वालों को आपस में लड़ने-झगड़ने को कहा है? इसका जवाब यदि पूर्वाग्रह से रहित होकर दिया जायेगा तो निश्चित ही नहीं में आएगा. मोदी ने किसी भी क्षण ऐसी कोई बात नहीं की जिससे आपस में वैमनष्यता फैले. इसके बाद भी बहुतायत मोदी-विरोधियों का मानना है कि ऐसा सिर्फ मोदी के कारण हो रहा है.


आपसी वैमनष्यता महज सोशल मीडिया पर ही तैरती नहीं दिख रही है वरन आम जीवन में भी इसे साफ़-साफ़ देखा जा रहा है. रोज के मिलने वालों के बीच भी राजनैतिक वैचारिकी को लेकर बहस हो रही है. कहीं-कहीं यह बहस मनमुटाव के रूप में भी देखने को मिल रहा है. यहाँ समझना यह चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सोच, अपनी विचारधारा होती है और उसे उसके हिसाब से स्वतंत्र ही बने रहने देना चाहिए. विचारों को लेकर विरोध की स्थिति वहीं आकर खड़ी होती है जहाँ कि एक-दूसरे पर अपने विचारों को आरोपित करने की कोशिश की जाने लगती है. यहाँ यह भी विचार उठता है कि ऐसा केंद्र में भाजपा सरकार आने के पहले क्यों नहीं हो रहा था? या यदि ऐसा हो भी रहा था तो उसका प्रभाव वर्तमान की तरह क्यों नहीं दिख रहा था? साफ़ सी बात है कि विगत लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरह की लहर या जिस तरह का आकर्षण नरेन्द्र मोदी के पक्ष में दिखाई दिया वह अपने आपमें अकल्पनीय है. ऐसे में भाजपा के और मोदी के समर्थकों में विश्वास का चरम देखने को मिल रहा है. उनके अन्दर यह विश्वास पैदा हो गया है कि मोदी के साथ भाजपा की, उनकी विचारधारा की जीत सहज रूप में हो सकती है. बस यही बिंदु भाजपा-विरोधियों के लिए सहज स्वीकार नहीं हो रहा है. 

देश की आज़ादी के बाद से लम्बे समय तक कांग्रेस ही जनमानस के बीच कार्य करती रही, सत्ता में बनी रही. यदा-कदा उसे राजनैतिक चुनौती भी मिली मगर वह लम्बे समय तक नहीं टिक सकी. ऐसे में कांग्रेस समर्थक स्वयं को, अपने दल को अपराजेय समझने लगे थे. इस मानसिकता में उस समय कुठाराघात हुआ जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने केंद्र में अपनी सत्ता स्थापित की. उसने न केवल सत्ता स्थापित की वरन मोदी के रूप में वैश्विक नेतृत्व को भी जन्म दिया. ऐसे में कांग्रेस समर्थकों को हताशा, निराशा लगनी स्वाभाविक थी. इसी के चलते न केवल कांग्रेस समर्थक बल्कि अन्य भाजपा-विरोधी भी सक्रियता से ऐसा माहौल बनाने में लग गए कि जिस तरह की विरोधात्मक स्थितियाँ वर्तमान में बनी हैं वे बस भाजपा की या मोदी की देन हैं. असल में यह उनकी राजनैतिक चाल है, जिसके द्वारा वे भाजपा को जनमानस की स्वीकार्यता से बाहर करके उसे सत्ता से बाहर करने का ख्वाब देख रहे हैं. जनमानस में फैली या कहें कि फैलाई गई विरोधी लहर के पीछे सिर्फ और सिर्फ गैर-भाजपाई दलों का हाथ है. इसी लहर के द्वारा वे केंद्र की सत्ता तक पहुँचने का मंसूबा पाले हैं. इस बात को आम जनमानस को समझना होगा. यदि ऐसा नहीं होता है तो आपसी मतभेद मनभेद में बदलते भी देर न लगेगी.

08 मार्च 2019

चुनाव सुधार के लिए सख्त होना होगा निर्वाचन आयोग को

देश इस समय चुनावी मोड में आ चुका है. वर्तमान लोकसभा के कार्यकाल को देखते हुए निकट समय में जल्द ही चुनाव आयोग चुनाव की तारीखें घोषित कर सकता है. इसके साथ ही आचार संहिता भी लागू हो जाएगी. आचार संहिता में अनेकानेक तरह के कार्यों पर प्रतिबन्ध लग जाता है. चुनाव आयोग भी अपनी तरफ से पूरी तरफ मुस्तैद रहता है कि आचार संहिता के दौरान और चुनावों के समय भी किसी तरह का ऐसा कार्य न हो सके जिससे लोगों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति गलत सन्देश प्रसारित हो. वर्तमान केंद्र सरकार ने देश में तमाम सारे परिवर्तनों, संशोधनों को लागो किया जिनको देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारा देश इस समय एक नए दौर से गुजर रहा है. जैसे केंद्र सरकार ने जहाँ नोटबंदी के द्वारा कालेधन पर चोट करने का सन्देश दिया, भारतीय अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने का रास्ता दिखाया, एयरस्ट्राइक के द्वारा आतंकवाद को खुली चुनौती दी, ठीक उसी तरह निर्वाचन आयोग ने भी चुनाव सुधारों सम्बन्धी पहल करने की मंशा ज़ाहिर की है. एक व्यक्ति के दो जगह से चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने, दो हजार रुपये से अधिक के गुप्त चंदे पर रोक लगने, उन्हीं राजनैतिक दलों को आयकर में छूट दिए जाने का प्रस्ताव जो लोकसभा-विधानसभा में जीतते हों के द्वारा निर्वाचन आयोग ने अपनी स्वच्छ नीयत का सन्देश दिया है.


किसी भी देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सफलता के लिए वहाँ की निर्वाचन प्रणाली का स्वच्छ, निष्पक्ष, कम खर्चीला होना आवश्यक है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता इसमें निहित है कि वहाँ की निर्वाचन प्रणाली कैसी है? वहाँ के नागरिक सम्बंधित निर्वाचन को लेकर कितने आश्वस्त हैं? निर्वाचन प्रणाली, प्रक्रिया में कितनी सहजता, कितनी निष्पक्षता है? भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विगत कुछ दशकों से निर्वाचन प्रक्रिया सहज भी रही है तो कठिनता के दौर से भी गुजरी है. निर्वाचन प्रक्रिया भयावहता के अपने चरम पर होकर वापस अपनी सहजता पर लौट आई है. अब पूरे देश के चुनावों में, किसी प्रदेश के चुनावों में एकाधिक जगहों से ही हिंसात्मक खबरों का आना होता है. एकाधिक जगहों से ही बूथ कैप्चरिंग किये जाने के प्रयासों की खबरें सामने आती हैं. निर्वाचन को भयावह दौर से वापस सुखद दौर तक लाने का श्रेय बहुत हद तक निर्वाचन आयोग की सख्ती को रहा है तो केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा बलों की उपलब्धता को भी जाता है. इस सहजता के बाद भी लगातार चुनाव सुधार की चर्चा होती रहती है. राजनैतिक परिदृश्य में सुधारों की बात होती रहती है. प्रत्याशियों की आचार-संहिता पर विमर्श होता रहता है. निर्वाचन की खर्चीली प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाये जाने की कवायद होती रहती है. चुनावों में प्रयुक्त होने वाले कालेधन और अनावश्यक धन के उपयोग पर रोक लगाये जाने की नीति बनाये जाने पर जोर दिया जाता है.

प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के अवैध स्रोतों से चुनाव में खर्चा किया जाता है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. विगत चुनावों में उत्तर प्रदेश के एक अंचल में कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा वोट सपोर्टजैसे नारे खुलेआम लगने का स्पष्ट संकेत था कि चुनावों में ऐसे खर्चों के द्वारा भी मतदाताओं को लुभाया जाता रहा है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि पेड न्यूज़के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है. बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाये जाने का काम मीडिया के द्वारा किया जाता है. धनबल से संपन्न प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के आयोजनों के द्वारा, विभिन्न आयोजनों को धन उपलब्ध करवाने के द्वारा भी निर्वाचन प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के उपक्रम किये जाते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है.

ऐसा नहीं है कि निर्वाचन आयोग को ऐसी स्थितियों का भान नहीं है. ऐसा भी नहीं कि उसके द्वारा ऐसी स्थितियों पर अंकुश लगाये जाने के सम्बन्ध में कोई कदम उठाया नहीं जा रहा है. निर्वाचन आयोग द्वारा उठाये गए तमाम क़दमों का प्रभाव है कि सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन से रोका जा सका है. निर्वाचन आयोग के कार्यों का सुखद परिणाम है कि चुनावों में होती आई धांधली को रोकने में मदद मिली. निर्वाचन आयोग के प्रयासों का सुफल है कि आज हाशिये पर खड़े लोगों को मतदान का अधिकार मिल सका है, वे बिना किसी डर-भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं. इसके बाद भी अभी बहुत से प्रयास किये जाने अपेक्षित हैं. निर्वाचन आयोग को अब इस दिशा में कार्य करना चाहिए कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में किसी व्यक्ति के बजाय वहाँ राजनैतिक दल ही चुनाव में उतरे. सम्बंधित क्षेत्र में जिस राजनैतिक दल की विजय हो वो अपना एक प्रतिनिधि सम्बंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि के रूप में भेजे, जो अपने कार्यों के आधार पर ही निश्चित समयावधि तक कार्य करेगा. इससे एक तरफ मतदाताओं को उस व्यक्ति के कार्यों के आधार पर उसकी स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता को निर्धारित करने का अधिकार मिल जायेगा. दूसरे उसकी असमय मृत्यु होने पर सम्बंधित क्षेत्र में उप-चुनाव जैसी व्यवस्था स्वतः समाप्त हो जाएगी. ऐसा होने से चुनाव सम्बन्धी खर्चों पर भी रोक लग सकेगी.

धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. बैनर, होर्डिंग्स, स्टिकर, पैम्पलेट आदि को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. ये सामग्री अनावश्यक खर्चों को बढ़ाकर चुनावों को खर्चीला बनाती हैं. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. इसे साथ-साथ देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धूल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. इसके साथ ही डमी प्रत्याशियों के दम पर अनेकानेक गाड़ियाँ प्रचार में घूमती पाई जाती हैं. ये धनबल की स्थिति चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं. इसके लिए निर्वाचन आयोग को चार पहिया वाहनों से प्रचार पर पूर्णतः रोक लगानी चाहिए. सिर्फ उसी वाहन को अनुमति मिले जिसमें प्रत्याशी स्वयं बैठा हो, उसके अलावा किसी भी तरह के चौपहिया वहाँ से किया जा रहा प्रचार अवैध माना जाये, वाहन को अवैध मानकर प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में लिया जाये. यहाँ निर्वाचन आयोग को समझना चाहिए कि जिस दौर में तकनीक आज के जैसी सक्षम नहीं थी तब भी बिना चौपहिया वाहनों के प्रचार हो जाया करते थे. आज प्रत्याशियों को तकनीक लाभ उठाने पर जोर दिया जाना चाहिए. चौपहिया वाहनों पर रोक लगने से जहाँ एक तरफ पेट्रोलियम पदार्थों की अनावश्यक बर्बादी को रोका जा सकेगा. साथ ही चुनाव के खर्चे पर भी अंकुश लग सकेगा. 

निर्वाचन आयोग द्वारा प्रयास ये होना चाहिए कि चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सिर्फ धनबलियों, बाहुबलियों का कब्ज़ा होकर न रह जाये. निर्वाचन आयोग को ध्यान रखना होगा कि चुनाव खर्च की बढ़ती सीमा से कहीं कोई चुनाव प्रक्रिया से वंचित तो नहीं रह जा रहा है. निर्वाचन आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.

13 दिसंबर 2018

इसे भी संसद पर हमला कहा जायेगा

13 दिसम्बर की तारीख शायद कोई नहीं भूला होगा, जबकि संसद पर आतंकी हमला हुआ था. हमला करने वाले आतंकी मारे गए, हमले को नाकाम करने वाले सुरक्षाकर्मी भी शहीद हुए और लोकतंत्र का मंदिर कहे कहे जाने वाले संसद भवन को बचा लिया गया. देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर, सुरक्षा व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगने से बचा लिया गया. इसके बाद भी सवाल उठता है कि आखिर कहाँ चूक हुई कि संसद भवन के आसपास भी हथियारबंद आतंकी घुसने में, हमला करने में, गोलीबारी करने में सफल हो गए. वो आतंकी हमला अभी तक का पहला और आखिरी हमला था, जो बाहर से हुआ और उससे निपट भी लिया गया किन्तु उसके बाद भी संसद में आंतरिक हमले लगातार हो रहे हैं और इनसे निपटने के उपाय सहज रूप में दिखाई नहीं दे रहे हैं. हो सकता है कि आपको ये पढ़कर आश्चर्य लगे किन्तु ये सत्य है अपने आपमें. 


आप खुद गौर करिए, विगत कई वर्षों से संसद में उसके सत्रों के दौरान काम कम हुआ है और सदन की कार्यवाही स्थगित ज्यादा हुई है. वर्तमान सत्र का ही उदाहरण लिया जाये तो पहले दिन का सदन दिवंगत सदस्यों को श्रद्धांजलि देने के साथ अगले दिन के लिए टाल दिया गया. अब दूसरे दिन कार्यवाही शुरू होते ही सदस्यों का हंगामा शुरू हुआ और फिर सदन को स्थगित करना पड़ा. मामला राफेल विमान सौदे से जुड़ा हुआ था. विमान सौदे की सत्यता क्या है ये खरीदने-बेचने वाले जानें मगर जिस तरह से विपक्षी दलों द्वारा इस पर राजनीति की जा रही है, सदन के अन्दर क्रियाविधि की जा रही है वह कतई उचित नहीं समझ आती. ये एक बिंदु या मुद्दा मात्र है जिसको लेकर विपक्षी हंगामा करने में लगे हैं. इसके अलावा और भी तमाम मुद्दे हैं, विधेयक हैं जिन पर चर्चा होनी है मगर यह सभी को भली-भांति मालूम है कि उन पर चर्चा से ज्यादा, बहस से ज्यादा शोरगुल होना है, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप किया जाना है.

सदन में पहले भी हंगामे होते रहे हैं, पहले भी समय बर्बाद होता रहा है लेकिन किसी भी सत्र में इस पर विचार नहीं किया गया कि कैसे सदन के समय को बचाया जाये, कैसे देश का धन अपव्यय होने से बचाया जाये. देखा जाये तो यह भी किसी हमले से कम नहीं कहा जायेगा. संसद देश की नीतियां बनाने के लिए, देशहित में विधेयक बनाने के लिए कार्य करता है, इसकी पल-पल की कार्यवाही में जबरदस्त धन खर्च होता है इसके बाद भी सदन की कार्यवाही के प्रति लापरवाही देश के समय, धन की बर्बादी है. साफ़ सी बात है जो लोग भी देश का समय, धन, शक्ति बर्बाद करने में पीछे नहीं रहते हैं वे किसी न किसी रूप में सदन पर हमला ही कर रहे हैं. आवश्यक नहीं कि हर हमले में किसी की जान जाए. आवश्यक नहीं कि बम, गोलियों की आवाज को ही हमला कहा जाये. जरूरी नहीं कि जब तक आतंकी किसी तरह का नुकसान न पहुंचाएं तब तक उसे हमला नहीं कहा जायेगा. असल में जिस तरह की गतिविधियाँ विगत कई वर्षों से सदन में होती आ रही हैं वे धन, समय पर हमला तो हैं ही उसके साथ-साथ देश की अस्मिता, नागरिकों के हितों, राष्ट्रनीतियों पर हमला कहा जायेगा. जनप्रतिनिधियों को इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है.


12 दिसंबर 2018

ईवीएम और राजनैतिक मसखरी


पांच राज्यों के विधानसभा नतीजे सामने आ चुके हैं. प्रमुख तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है. इस हार के साथ गैर-भाजपाई दलों के लिए ईवीएम निष्कलंक हो गई है. साथ ही साथ निर्वाचन आयोग भी निष्पक्ष हो गया है. चुनाव परिणाम क्यों ऐसे आये, उनके पीछे के कारण क्या रहे ये एक अलग विषय है. इसके अलावा ईवीएम एक विषय अवश्य है कि जब भाजपा जीतती है तो वहाँ ईवीएम हैक कर ली जाती है और जहाँ भाजपा की हार हो जाती है, कोई विपक्षी दल विजयी हो जाता है तो वहाँ से ईवीएम खराबी की, उसके हैक करने की कोई खबर नहीं आती. वर्तमान चुनावों में ही सामने आया, जिन तीन राज्यों में कांग्रेस ने भाजपा पर बढ़त बनाई तो वहाँ ईवीएम सही रही, उस पर कोई सवालिया निगाह नहीं उठाई गई किन्तु जिस राज्य से कांग्रेस का सफाया हुआ वहीं के लिए ईवीएम हैक किये जाने की शिकायत कर दी गई. सोचा जा सकता है कि राजनीति किस स्तर तक ले जाना चाहते हैं ये पढ़े-लिखे राजनीतिज्ञ? 


चुनावों में मतदान के बाद सोशल मीडिया पर वीडियो आये, खबरें आईं, चित्र भी सामने आये जिनमें दिखाया गया कि कोई पत्रकार होटल में ईवीएम लिए बैठा है. कहीं दिखाया गया कि सड़क पर सीलबंद ईवीएम पड़ी हुई है. कहीं से खबर आई कि किसी इंजीनियर को, कही किसी चुनाव अधिकारी को ईवीएम मशीन के साथ पकड़ा गया, देखा गया. आखिर इस तरह की भ्रामक खबरों के प्रचार के निहितार्थ क्या हैं? ईवीएम को उसी स्थिति में ख़राब बताने का, हैक किये जाने का प्रचालन क्यों है जबकि भाजपा के जीतने की सम्भावना होती है? इन चुनावों में भाजपा के विरोध में पर्याप्त माहौल बनाया जा चुका था. खुद भाजपा की तरफ से भी ऐसे कदम उठाये गए जिन्होंने भाजपा को एक कदम पीछे आने के संकेत दिए थे. इसके बाद भी विरोधी कहीं भी ईवीएम से छेड़छाड़ किये जाने का अंदेशा दिखाने से नहीं चूक रहे थे. उनके प्रचार में नियमित रूप से ईवीएम के प्रति संदेह व्यक्त किया जाता रहा. अब जबकि कांग्रेस तीन राज्यों में भाजपा से आगे है तब वहाँ से ईवीएम ख़राब होने, उसके संदिग्ध होने की कोई शिकायत, कोई खबर नहीं आई है.

सोचने वाली बात है कि इक्कीसवीं सदी में लगभग दो दशक की यात्रा करने के बाद भी देश का लोकतंत्र अभी भी मसखरी राजनीति का शिकार बना हुआ है. आज भी यहाँ शीर्ष राजनैतिक व्यक्तित्व मसखरी करते हुए तथ्यों से, आँकड़ों से खिलवाड़ करते हुए मतदाताओं को बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं. इक्कीसवीं सदी का मतदाता, जिसे जागरूक कहकर पुकारा जाने लगा है, वह भी सहजता से इस मसखरी का शिकार बनता हुआ खुद ही हँसी का पात्र बन रहा है. जहाँ स्वार्थ भरा एक कदम किसी दल को आगे खड़ा कर देता है, कहीं एक वस्तु का लालच उस व्यक्ति को सबसे आगे ला देता है, जहाँ जिसे चोर बताते थका नहीं जाता है उसी के हाथों में अपना भविष्य सौंप दिया जाता है. ऐसे में समझने का विषय है कि अभी देश के लोकतंत्र को परिपक्व होने में दशकों लगेंगे. फ़िलहाल खुश होइए कि ईवीएम निष्कलंक साबित हुई इन चुनावों में. 

22 जुलाई 2018

अपनी ही क्षमता नापने के लिए अ(र्द्ध)विश्वास

चारों तरफ से गूंजते गठबंधन, महागठबंधन के स्वर सरकार से ज्यादा विपक्ष को परेशान किये थे. जिन्हें गठबंधन से कोई सरोकार नहीं था वे उसकी चर्चा करने में लगे थे और जिन्हें गठबंधन को अमली जामा पहनाना था वे अपने लबों पर चुप्पी साधे थे. शायद वे लोग उस सिद्धांत का पालन करने में लगे थे जिसमें कहा गया है कि जोड़ियाँ ऊपर वाला बनाता है. दसों दिशाओं से तमाम सूरमा एकसाथ होने को आतुरता दिखाने के बाद भी आतुर नहीं लग रहे थे. प्रत्यक्ष में दिखने वाली तूफानी ख़ामोशी के पीछे बहुत कुछ ऐसा था जो सामने नहीं आ रहा था. ये ख़ामोशी उस महासमर के ठीक पहले की थी जो निकट भविष्य में होने वाला है. यद्यपि महासमर का दिन अभी तय नहीं किया जा सका है किन्तु सभी सूरमा अपने-अपने हथियारों को खंगालने में लगे हैं. कुछ चोरी-छिपे अपने दाँव आजमाने के लिए इधर से उधर करने में लगे हैं. महासमर के पहले का ये खेल बहुत ही रोमांचक दिख रहा है.


गठबंधन की आधारशिला के पूर्व वे सूरमा आगे-आगे नजर आ रहे हैं, जिनके पास कुछ संख्याबल है. इसके आगे और भी हास्यास्पद स्थिति है कि वे और भी आगे-आगे या कहें कि आगे में भी सबसे आगे हैं जिनके पास संख्याबल के नाम पर आर्यभट्ट की खोज है. ऐसे सभी लोग मिलकर महासमर के लिए एक नई सेना गठित करने का विचार बना चुके हैं. इस नई सेना में सबकी अपनी-अपनी सहभागिता कैसी और कितनी होगी, इस पर अभी तक कोई चर्चा नहीं हुई. बस सबके दिमाग में गठबंधन, महागठबंधन जैसी शब्दावली ही है और उसके आधार पर आने वाले महासमर में मजबूत विरोधी से लड़ना है.

कौन किस आधार पर, कितनी क्षमता से मैदान में उतरेगा. कौन किस-किस अस्त्र-शस्त्र का उपयोग करके विरोधी को परस्त करने की स्थिति में है. किस दल की स्थिति किस रणक्षेत्र से ज्यादा सशक्त है अभी इस पर चर्चा नहीं हुई. सब आपस-आपस में ही मेल-मिलाप करके खुद को सशक्त बताने में लगे हैं. महासमर में अधिक से अधिक शक्ति अपने पास रखने का संकेत कर चुके हैं. अधिक से अधिक संख्याबल का निर्धारण अपने पक्ष में करने की वकालत करते दिख रहे हैं. संभावित गठबंधन के सूरमाओं का रणनीति से अधिक ध्यान इस पर है कि महासमर में यदि विजय प्राप्त होती है तो ताज किसके सिर पर सजेगा. तमाम सारी कपोल-कल्पनाओं से इतर वे सब मिलकर न तो अपना सेनापति बना पाए हैं और न ही गठबंधन सुसज्जित कर पाए हैं.

इन सबकी उधेड़बुन में लगे ही थे कि मानसून आ गया. संभावित गठबंधन की आशा में बैठे तमाम सूरमाओं को जैसे कोई मनचाहा मौसम मिल गया. वे सब चहक पड़े. विरोधी से ज्यादा अपनी क्षमताओं का आकलन करने को बेताब दिखने लगे. आनन-फानन समस्त सूरमाओं को एकत्र किया गया. मानसून में ही विरोधी को पस्त करने के मंसूबे बांधे जाने लगे. महासमर से पहले ही एक रणक्षेत्र तैयार किया जाने लगा. शाब्दिक मल्लयुद्ध के द्वारा विरोधी को उसी में दाँव में लेने के प्रयास किये जाने लगे. शून्य संख्याबल को अपने पीछे जोड़कर संख्याबल को कई-कई गुना बनाये जाने के दावे किये जाने लगे. सारी रणनीति गोपन से अगोपन न हो जाये सो गुपचुप मानसून का इंतजार किया जाने लगा.

बंद कमरे के खुलेपन में बैठकर समस्त योद्धाओं ने बजाय गठबंधन निर्मित करने के, बजाय अपना सेनापति घोषित करने के, बजाय रणक्षेत्र का निर्धारण करने के विरोधी को मात देने की योजना बनाई. आपस में कानाफूसी करके, एक-दूसरे के विश्वास को अविश्वास, अर्द्धविश्वास से नापते हुए एक निर्णय पर सहमति बनाई गई. विरोधी की ताकत का आकलन करने के बाद भी दिवास्वप्न देखने की हिम्मत की गई. आम सहमति होने के बाद सबने मिलकर एकदूसरे के हाथों में हाथ भर लिए.

संख्याबल की स्थिति जानने के कारण सभी सूरमा जानते थे कि इस कदम से विरोधी परास्त होने वाला नहीं. इस कदम से मानसून का मजा लेने से विरोधी को रोका जा सकता है. बिल रोके जा सकते हैं. विरोधी पर आरोप-प्रत्यारोप लगाये जा सकते हैं. विरोधी को मानसून का आनंद लेने के बजाय लटके-झटके में अटकाये रहना है. जैसे ही आपस में यह तय हुआ कि विरोधी की ताकत का, उसके विश्वास का आकलन वे सब कर चुके हैं अब बस अपनी ही ताकत का, अपने ही विश्वास का आकलन करना है. विरोधी को परस्त करने से रहे पर खुद को भी पराजित होने से बचाना है. गठबंधन की संभावित स्थिति को इसी मानसून में निर्धारित करना है.

बस, सभी ख़ुशी से चिल्ला उठे. एकदूसरे के गले लगते हुए गठबंधन, महागठबंधन के शोर के बीच एक शोर और तैर गया कि अब विरोधी को हमारे अविश्वास का सामना करना पड़ेगा. यह शोर भले ही मानसून में गूंज गया हो मगर सभी गठबंधित सूरमाओं के मन में, दिमाग में, दिल में शोर चल रहा था कि ये अविश्वास विरोधी के लिए नहीं वरन आपस में एकदूसरे के अविश्वास, अर्द्धविश्वास को मापने के लिए लाया जा रहा है.