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09 जून 2026

पत्रों की अनमोल धरोहर

कुछ चीजें अचानक ही सामने आती हैं और तब उनकी ऐतिहासिकता का, उनके अनमोल होने का भान होता है.



चित्र में प्रदर्शित डाक लिफाफा हरेक के लिए महत्त्व का नहीं है. घर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में वर्षों से बंद सामान को खोला-टटोला गया कि यदि किसी काम का समझ आएगा तो रखा जायेगा
, अन्यथा कबाड़ी के हवाले किया जायेगा. इसी क्रम में हमारे बाबा जी से सम्बंधित बहुत सारे पत्र मिले; परिजनों के पत्र, उनके मित्रों के पत्र. इसी में एक पत्र यह भी मिला. 1934 में लिखे इस पत्र के समय बाबा जी कक्षा दस में थे. उरई में राजकीय पुस्तकालय के बगल में जो पुरानी इमारत है, उस समय वहीं  राजकीय विद्यालय चला करता था. कालांतर में यही राजकीय संस्था जीआईसी के पुराने भवन में संचालित होने लगी थी. यहाँ हमारे परिवार की तीन पीढ़ियों को पढ़ने का अवसर मिला, बाबा जी, उसके बाद हमारे चाचा जी और मामा जी, तथा उसके बाद हम और हमसे छोटा भाई.


इस पत्र को बाबा जी के किसी मित्र ने कोंच से भेजा था और इस लिफाफे में जो पत्र है, उसमें उन्होंने अपनी मानसिक व्यथा का वर्णन एक कहानी के रूप में किया है. बाबा जी को उसे भेजने के पीछे उनके मित्र का उद्देश्य उनकी व्यथा को पढ़ना-समझना और उस कहानी को संशोधित करना था. पठन-पाठन-लेखन की आनुवंशिक परम्परा बाबा जी से शुरू होकर पिताजी से चलती हुई हमारे बाद की पीढ़ी अर्थात् हमारी बेटियों तक पहुँच गई है.



27 सितंबर 2021

अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति संवेदित नहीं नागरिक

किसी भी समाज की ऐतिहासिक धरोहरों के द्वारा उस समाज के बारे में आसानी से जाना जा सकता है. बहुत सारे देश हैं जो आज भी अपनी हजारों साल पुरानी धरोहरों को सुरक्षित और संरक्षित रखे हुए हैं. बहुत बार पढ़ने में आता है कि फलां देश के किसी शहर के नागरिकों ने अपने किसी ऐतिहासिक महत्त्व के वृक्ष को कटने से बचाने के लिए आन्दोलन किया. कभी समाचार सुनाई देता है कि किसी देश के नागरिकों ने स्वेच्छा से अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के साफ़-सफाई का जिम्मा ले लिया है. ऐसा समाचार पढ़ते-सुनते-देखते समय मन में एक सवाल कौंधता है कि क्या ऐसा हमारे देश के नागरिक नहीं कर सकते?


इस सवाल के सापेक्ष पहली बात यह कि यह सारे नागरिकों के सन्दर्भ में नहीं है. दूसरी बात कि इस सवाल के साथ ही आप स्वयं अपने आसपास देखिये और महसूस करिए कि क्या हमारे सभी नागरिक अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, इमारतों के प्रति जिम्मेवारी का भाव लिए हैं? आइये, अब आगे बढ़ते हैं. हमारे देश में ऐतिहासिक महत्त्व की इमारतों, स्मारकों की कहीं कोई कमी नहीं. बहुत सारे किले, महल, मंदिर, स्मारक आदि हमारी ऐतिहासिकता की कहानी स्वयं कहते हैं. इन ऐतिहासिक महत्त्व की धरोहरों में से बहुतायत में ऐसी मिलेंगीं जहाँ पर किसी न किसी रूप में देश के नागरिकों ने अपनी नकारात्मक सक्रियता के निशान छोड़ दिए हैं. कहीं किसी आशिक का तीर घुसा हुआ दिल देखने को मिल जायेगा तो कहीं किसी दीवार पर किसी के प्रेम का नाम खुदा हुआ मिल जायेगा. कहीं किसी इमारत के कोने पर पीक की नक्काशी देखने को मिल जाएगी तो कहीं किसी ने रंगों से करामात दिखाई होगी. कहीं कुछ तोड़ा गया होगा तो कहीं से कुछ उखाड़ा गया होगा.


क्या हम नागरिकों में वाकई सामाजिक सोच समाप्त होती जा रही है? क्या हम नागरिकों में अपने इतिहास के प्रति गरिमा बोध मिटता जा रहा है? क्या वाकई हम नागरिक अपने इतिहास को कलंकित करने वाला समझने लगे हैं? क्या हमें अपनी ऐतिहासिक धरोहरों से प्रेम-स्नेह नहीं रह गया है? जो धरोहरें हैं उनमें से बहुतों के प्रति यदि सरकार संवेदित नहीं है तो इनके प्रति क्षेत्रीय नागरिक भी असंवेदित है. कहीं धन के लालच में इमारत को नुकसान पहुँचाया जा रहा है तो कहीं विद्वेष की भावना से धरोहर को क्षतिग्रस्त किया जा रहा है. ऐसी विषम स्थिति में यदि किसी व्यक्ति के अपने व्यक्तिगत प्रयासों से कोई धरोहर सुरक्षित, सुसज्जित नजर आती है तो दिल वाकई प्रसन्न हो उठता है.


जनपद जालौन के रामपुरा में वहाँ के कछवाह राजाओं की धरोहर, उनका किला और उसका बहुतायत साजो-सामान उनके वारिस कुँवर केशवेन्द्र सिंह द्वारा आज भी सुरक्षित, संरक्षित, सुसज्जित करके रखा गया है. अभी हाल ही में किले को देखने का, वहाँ भ्रमण करने का अवसर मिला. जल्द ही इस बारे में आपके साथ अपना अनुभव साझा किया जायेगा. 


कुँवर केशवेन्द्र सिंह 


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