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19 अगस्त 2021

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर कुछ हमारी क्लिक्स

विश्व फोटोग्राफी दिवस को मनाने के पीछे भी एक कहानी है. दरअसल फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेक्स और मेंडे डाग्युरे ने सबसे पहले सन 1839 में फोटो तत्व की खोज की थी. ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम हेनरी फॉक्सटेल बोट ने निगेटिव-पॉजीटिव प्रोसेस का आविष्कार किया और सन 1834 में टेल बॉट ने लाइट सेंसेटिव पेपर की खोज करके खींची गई फोटो को स्थायी रूप में रखने में मदद की.  

फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो की फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट को तत्कालीन फ्रांस सरकार ने खरीदकर 19 अगस्त 1939 को आम लोगों के लिए फ्री घोषित कर दिया था. इसी उपलब्धि की याद में 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. आपके लिए खुद की क्लिक की गई कुछ फोटो लाये हैं. उनके साथ आज का आनंद लीजिये. 










 

19 अगस्त 2020

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर घरेलू फोटोग्राफी

फोटोग्राफी की जब भी बात होती है, हम सभी लोगों की निगाह में प्रकृति, सूरज, चाँद, पर्वत, नदी आदि सहित बहुत सी मनोहारी प्राकृतिक वस्तुएँ उमड़ने लगती हैं. प्रकृति के अंगों-उपांगों की हम सभी खूब फोटो खींचते हैं, खुद हम भी ऐसा ही करते हैं. आज विश्व फोटोग्राफी दिवस पर मन में आया कि इस बार इनकी फोटो खींचने की बजाय घरेलू सामानों की फोटो खींची जाये. 

इस बार के विश्व फोटोग्राफी दिवस पर कुछ घरेलू फोटो. संभवतः आप सबको पसंद आयें. 













19-08-2020
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

20 अगस्त 2019

चित्रों के साथ अपने पलों को अमर बनायें


इन्सान ने अपनी भाषा का आविष्कार, शब्दों का निर्माण बाद में किया था सबसे पहले उसने चित्रों का प्रयोग करना शुरू किया था. उनके बीच बातचीत का माध्यम चित्र ही हुआ करते थे. वे चित्र या तो दीवारों पर जिंदा रहे या फिर किसी धातु के टुकड़े पर. ये चित्र मानव मन की कल्पना भी थे, उसके द्वारा देखे गए दृश्य भी थे और विचारों की अभिव्यक्ति भी मगर अनेक बार कई कारणों से ये दीर्घकालिक न रह पाते थे. कालांतर में तकनीक का विकास होता रहा और चित्र भी सदा-सदा को जीवित रहने लगे. कहा भी जाता है कि जिस पल को तस्वीरों के माध्यम से कैद कर लो वो अमर हो जाता है. इंसानों के द्वारा गुजारे गए पल इन्हीं चित्रों के द्वारा अजर-अमर हो जाते हैं. जब भी उसका मन करता है वह इन्हीं चित्रों के सहारे अपने अतीत की यात्रा कर लेता है. वर्तमान दौर की सत्यता यही है कि फोटोग्राफी की तकनीक एक वरदान के रूप में सामने आई है. इंसान के पास जब कैमरे नहीं थे तब भी वह तस्वीरें बनाता था. इनके जरिये उसने अपनी भावी पीढ़ी के लिए ज्ञान का, जानकारी का भंडार भी छोड़ा. बाद में जब कैमरे का आविष्कार हुआ तो फोटोग्राफी इंसान के लिए अपनी रचनात्मकता को प्रदर्शित करने का जरिया बना.

विश्व फोटोग्राफी दिवस को मनाने के पीछे भी एक कहानी है. दरअसल फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेक्स और मेंडे डाग्युरे ने सबसे पहले सन 1839 में फोटो तत्व की खोज की थी. ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम हेनरी फॉक्सटेल बोट ने निगेटिव-पॉजीटिव प्रोसेस का आविष्कार किया और सन 1834 में टेल बॉट ने लाइट सेंसेटिव पेपर की खोज करके खींची गई फोटो को स्थायी रूप में रखने में मदद की.  फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो की फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट को तत्कालीन फ्रांस सरकार ने खरीदकर 19 अगस्त 1939 को आम लोगों के लिए फ्री घोषित कर दिया था. इसी उपलब्धि की याद में 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. यह दिवस वैसे तो कल मना लिया गया किन्तु आज आपके लिए खुद की क्लिक की गई कुछ फोटो लाये हैं. उनके साथ आज का आनंद लीजिये. 







19 अगस्त 2018

चित्र वही जो बिना शब्द के सब कुछ कह दे - विश्व फोटोग्राफी दिवस


आज विश्व फोटोग्राफी दिवस है. ऐसा माना जाता है कि सन 1839 में सबसे पहले में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेकस तथा मेंडे डाग्युरे ने फोटो तत्व को खोजने का दावा किया था. फोटोग्राफी की आधिकारिक शुरुआत लगभग 180 वर्ष पहले, वर्ष 1839 में हुई थी. फ्रांस सरकार ने 19 अगस्त, 1839 को इस आविष्कार को मान्यता दी थी, इसलिए 19 अगस्त को अब विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाता है. फोटोग्राफी के आने से  लोगों में एक-दूसरे को जानने की भावना का विकास तो हुआ ही, साथ ही अपनी संस्कृति-सभ्यता को संरक्षित रखने की भावना भी बढ़ी. फोटोग्राफी ने घुमक्कड़ी करने वालों को भी लाभान्वित किया और उन्हें भी लाभान्वित किया जो घर बैठे ही घुमक्कड़ जिज्ञासा को पूरा करना चाहते हैं.

किसी समय में फोटोग्राफी भले ही कठिन और जटिल शौक में शामिल माना जाता हो मगर आज जबसे मोबाइल सबके हाथ आया है, फोटोग्राफी सहज-सरल हो गई है. तकनीकी, कौशल, ज्ञान आदि की क्लिष्टता से बचने वाला व्यक्ति मोबाइल की सुविधा के चलते आसानी से फोटोग्राफी के शौक को पूरा करने में लगा है. राह चलते, सफ़र में, बस में, ट्रेन में, हवाई यात्रा में, नदी में, समुद्र में, पहाड़ों पर, मैदान में, बाग़ में, सुनसान में, रेगिस्तान में, हरियाली में, ऑफिस में, बाजार में, कार्यक्रमों में, बारिश में, धूप में, जाड़े में, गर्मी में कहाँ-कहाँ गिनाया जाये, ऐसा कोई क्षेत्र बचा नहीं जहाँ इन्सान अब फोटोग्राफी करता नहीं दिखता है.

फोटोग्राफी के सम्बन्ध में, अच्छी फोटो के संबंध में उच्च कोटि के फोटोग्राफर्स के भी अपने-अपने विचार हैं. कोई फोटो अच्छी क्यों होती है, उस फोटो में अच्छा क्या होता है, इस सम्बन्ध में प्रख्यात चित्रकार प्रभु जोशी का कहना है कि हमें फोटो के लिए उसके फ्रेम में क्या लेना है, इससे ज्यादा इस बात का ज्ञान जरूरी है कि हमें क्या-क्या छोड़ना है. देश के सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर में शामिल माने जाने वाले रघुराय का कहना है कि वे कोई भी फोटो खींचने के लिए पहले से उसकी कोई तैयारी नहीं करते. उनका कहना है कि वे किसी भी फोटो को उसके वास्तविक रूप में ही लेना पसंद करते हैं. देखा जाये तो कोई भी फोटो कितना भी अच्छी तरह से क्यों न क्लिक किया गया हो, उसमें तकनीकी पक्ष कितना भी सबल क्यों न हो मगर उसे तब तक बेहतर नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि उसमें कोई विचार न दिखाई दे. एक अच्छा चित्र उसी को माना जाना चाहिए जो मानवीय संवेदनाओं को जगाकर झकझोर दे. सामान्य शब्दों में कहा जाये तो एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होना चाहिए, जो बिना किसी शब्द के सबकुछ कह दे.

आज आपको अपनी कुछ फोटो से, जो मोबाइल से निकाली हैं, आपका परिचय कराते हैं. अच्छी हैं या नहीं, ये आप विचार करियेगा. हमने बस खींच लीं, अपनी समझ से.








19 अगस्त 2017

उस दौर में फोटो देखने का भी अलग मजा था

आज विश्व फोटोग्राफी दिवस है. ऐसा माना जाता है कि सन 1839 में सबसे पहले में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेकस तथा मेंडे डाग्युरे ने फोटो तत्व को खोजने का दावा किया था. फोटोग्राफी की आधिकारिक शुरुआत आज से 175 साल पहले, वर्ष 1839 में हुई थी. फ्रांस सरकार ने 19 अगस्त, 1839 को इस आविष्कार को मान्यता दी थी, इसलिए 19 अगस्त को अब विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाता है. 

फोटो खींचना भी अपने आपमें एक कला है. आज विश्व फोटोग्राफी दिवस पर कतिपय व्यस्तताओं के चलते इस कला का उपयोग नहीं किया जा सका. दरअसल फोटोग्राफी किसी समय में मंहगा शौक तो था ही, बहुत ही उत्सुकता जगाने वाला भी था. रील वाले कैमरे होने के कारण बहुत सहेज कर, गंभीरता के साथ फोटो खींचना होती थी. आज की तरह खटाखट फोटो खींचते रहने की स्थिति थी ही नहीं. रील के अंतिम चरण में तो बहुत सोच-समझ कर फोटो का खींचना होता था. कहीं घूमने जाने की स्थिति में, किसी शादी-विवाह के अवसर पर भी अत्यंत आवश्यक दशा में ही फोटो का खींचना होता था. अकसर ऐसी दशा में कई बार मजाक के तौर पर हम लड़के लोग शरारत में कैमरे का फ्लैश चमकाए लोगों को उल्लू बनाते रहते थे. उस समय जितना शौक फोटो खिंचवाने का रहता था, उससे कहीं ज्यादा उत्सुकता रील साफ़ होने के बाद आने वाली फोटो को देखने की भी रहती थी. लैब से फोटो आने के पहले ही घर के बड़े सदस्य द्वारा एक तरह का फरमान जारी हो जाता था, सबसे पहले उसी को फोटो देखने का. फोटो आने के बाद लोगों की भाव-भंगिमा पर खूब हँसी-ठहाके लगते. लोगों के पोज पर भी खूब मौज ली जाती. 

घर का सबसे पुराना कैमरा. हमने इस पर तो नहीं पर इस जैसे पर भी हाथ आजमाया है 
अब ये सब गायब हो गया है. अब फोटो सैकड़ों की संख्या में निकाली जाती हैं मगर उनको देखने की उत्सुकता न खींचने वाले में होती है और न ही खिंचाने वाले में. अनगिनत फोटो निकालने के बाद भी घरों में एल्बम की कमी पाई जाती है. अब पहले जैसी स्थिति भी नहीं रही एल्बम देखने-दिखाने को लेकर. पहले घर में मेहमान आने पर उसका स्वागत एल्बम से अवश्य ही किया जाता था. अब तो बस डिजिटल क्लिक है जो धीरे-धीरे सेल्फी में आकर सिमट गया है. बचपन से कैमरों के साथ खेलते आने के कारण फोटोग्राफी का भरपूर शौक रहा है. मौका मिलते ही अपने कैमरे के साथ निकल जाते हैं सडकों की, मैदानों की तरफ और बस कैद करते रहते हैं अपने मन के दृश्यों को.

मामा जी द्वारा गिफ्ट किया कैमरा. हम थे शायद कक्षा आठ या नौ में 
आज, 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाता है. कतिपय कारणों से इतनी व्यस्तता रही कि आज क्लिक्याना नहीं हो पाया. इस दिन वे साथी याद आये जिन्होंने क्लिक करने के शौक को बड़ी गंभीरता से निभाने में अपना पूरा साथ दिया. रील वाला कैमरा हमने बचपन से ही देखा और चलाया. फिर मामा जी की तरफ से कक्षा आठ या नौ में गिफ्ट मिला था क्लिक III कैमरा. सादा फोटो की दुनिया से बाहर निकलने पर रंगीन फोटो वाले कई कैमरे उपयोग किये. 110 वाला कैमरा भी, जिसमें एकदम पतली रील पड़ती थी और याशिका के कई कैमरे. डिजिटल कैमरों का युग चाहे जब शुरू हुआ हो मगर हमने पहला डिजिटल कैमरा लिया था वर्ष 2009 में, मुंबई यात्रा के समय. उसके बाद तीन डिजिटल कैमरे और लिए गए. अंतिम रूप से पिछले वर्ष निकोन का DSLR लिया गया. मोबाइल ने चाहे जितनी तरक्की कर ली हो मगर कैमरे की फोटो का अपना ही आनंद है. इसके बाद भी ये स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं कि कभी-कभी आकस्मिक रूप से मोबाइल भी फोटोग्राफी में भरपूर साथ दे देता है हमारा.

रील वाला अंतिम कैमरा, जिसे हमने खरीदा 
आज भले ही डिजिटल कैमरों ने, मोबाइल ने फोटोग्राफी को एकदम से आसान बना दिया हो, फोटोग्राफी में भले ही आज सरलता हो गई हो, पहले से ज्यादा आनंद आने लगा हो किन्तु फोटो देखने का असली मजा उसी समय था जबकि रील के द्वारा फोटो का खींचना होता था.