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09 जनवरी 2023

वृन्दावनलाल वर्मा जी को याद करते हुए

आज, 09 जनवरी को सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. वृन्दावनलाल वर्मा जी की जन्मतिथि है.

हिन्दी साहित्य में उनका अपना एक विशेष स्थान है. ऐसा इसलिए क्योंकि जिस समय उपन्यास के क्षेत्र में प्रेमचन्द एक युग की भांति छाए हुए थे, उस समय ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखन का जोखिम वृन्दावनलाल वर्मा जी ने उठाया. उन्होंने अपने उपन्यासों के द्वारा न केवल ऐतिहासिकता को चित्रित किया बल्कि बुन्देलखण्ड की संस्कृति को भी बखूबी उभारा है.


ये हमारा सौभाग्य है कि हिन्दी साहित्य में वाचस्पति उपाधि (पीएच.डी.) आपके ही उपन्यासों पर शोध कार्य करने पर प्राप्त हुई.

शोध शीर्षक 'डॉ. वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन' के द्वारा वृन्दावनलाल वर्मा जी के ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन करने का प्रयास किया था.  

वृन्दावनलाल वर्मा जी को सादर नमन. 







 

23 फ़रवरी 2022

बचपन से परिचित नाम जुड़ा डिग्री में भी, कैरियर में भी

वृन्दावन लाल वर्मा, इस नाम से परिचय बचपन में ही हो गया था. यद्यपि उस समय आपके बारे में बहुत जानकारी नहीं थी तथापि इतना अवश्य पता चल गया था कि ये कहानियों जैसा, किताबों जैसा कुछ लिखते हैं. सात-आठ वर्ष की उम्र में साहित्य के नाम पर बस कहानी, कविता शब्द ही समझ आते थे क्योंकि इनको अपनी पाठ्य-पुस्तकों में देख-पढ़ रहे थे. इसके अलावा घर पर पढ़ने का माहौल बना होने के कारण भी पुस्तकों के रूप में वृन्दावन लाल वर्मा नाम देखने को मिल रहा था. बाद में टीवी पर आने वाले मृगनयनी धारावाहिक को देखने के दौरान और भी स्पष्ट जानकारी हुई. उसी धारावाहिक को देखने के दौरान मृगनयनी उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला.


बाद में कक्षाओं में, पाठ्य-पुस्तकों में ऐसे उलझे कि साहित्य के नाम पर बहुत सी पुस्तकों से परिचय स्नातक अध्ययन के दौरान ही कॉलेज के पुस्तकालय के माध्यम से हुआ. उसमें भी वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य को अलग-अलग करके नहीं देखा-समझा. झाँसी की रानी और गढ़ कुंडार उसी दौरान पढ़ने को मिले. बस पढ़ने का शौक था, सो पढ़ लिया मगर कभी सोचा नहीं था कि बचपन से सुनते चले आ रहे इस नाम का सम्बन्ध हमारे कैरियर से, हमारी डिग्री से भी हो जायेगा.


हिन्दी साहित्य से परास्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पितातुल्य ब्रजेश अंकल के द्वारा पीएच.डी. करने का आदेश हुआ. हमारी तरफ से बहुत दिनों से इस मामले को लेकर टालमटोल हो रही थी. एक दिन अंकल ने न केवल आदेश दिया बल्कि हमारे ऊपर अत्यंत स्नेह भाव, वरदहस्त रखने वाले डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी के पास भी ले गए. उनके सामने शिष्य भाव से जाकर बैठ गए. उस समय तक दिमाग में ये था कि जब परास्नातक की डिग्री ले ली है तो अपने नाम के आगे डॉ. अवश्य ही लगवाएंगे मगर ऐसा कब करेंगे, किस विषय से करेंगे ये न सोचा था. विषय का चक्कर इसलिए भी था क्योंकि हिन्दी साहित्य से परास्नातक के पूर्व हम अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल कर चुके थे.


खैर, दो-चार सवाल इधर-उधर के होने के बाद, सामान्य सी बातचीत होने के बाद डीपी सर (डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी को सामान्य बोलचाल में इसी संबोधन से पहचाना जाता रहा है) ने हिन्दी साहित्य में हमारी रुचि और हमारे पसंद के शोध क्षेत्र की जानकारी ली. सर को बताया कि गद्य में ज्यादा रुचि है और हम चाहते हैं कि हमारी पीएच.डी. किसी भी विषय में हो पर क्षेत्र बुन्देलखण्ड का हो. ऐसा जानते ही सर ने तत्काल कहा कि वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य में कर लो, उनका साहित्य मूलतः गद्य ही है. चूँकि इस नाम से हम बचपन से ही परिचित थे, सो हमने भी तुरंत सहमति में अपना सिर हिला दिया.


उसी समय सर ने शोध-विषय ‘वृन्दावन लाल वर्मा के साहित्य में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन’ निर्धारित कर दिया. अगले दिन सिनोप्सिस बना कर विश्वविद्यालय जमा करने का आदेश दिया. बाद में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा संशोधन के बाद हमें शोध-कार्य करने के लिए ‘डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन’ शीर्षक अनुमोदित हुआ. दो वर्षों की अवधि में अपना शोध-कार्य विश्वविद्यालय में जमा करके अगले वर्ष सम्पूर्ण आवश्यक प्रक्रिया के बाद अपने नाम के आगे डॉ. लगाने की अनुमति और गौरव प्राप्त हुआ. किसी समय बस नाम से परिचित होने वाले व्यक्तित्व से अपने शोध-कार्य के दौरान व्यापकता के साथ परिचय हुआ. यह बात हमें आज भी गौरवान्वित करती है कि बचपन से परिचित नाम हमारे साथ न केवल डिग्री रूप में जुड़ा बल्कि यही डिग्री आगे चलकर हमारा कैरियर बनी. वर्ष २००५ में हिन्दी साहित्य से ही स्थानीय गांधी महाविद्यालय में अध्यापन करने का अवसर मिला और सहायक प्राध्यापक के रूप में हमारा चयन हुआ. इसके साथ ही हमारे लिए यह भी गौरव का विषय आज तक है कि हमारे शोध-निर्देशक डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी देश में तीसरे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने दो विषयों में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की हुई थी. डीपी सर ने हिन्दी साहित्य और भाषा विज्ञान में डी.लिट्. उपाधि हासिल की थी.




एम.ए. करने के बाद अपने नाम के आगे डॉ. लगाने की इच्छा रखने की पूर्ति इस रूप में हुई कि हिन्दी साहित्य के साथ-साथ अर्थशास्त्र विषय से भी बाद में पीएच.डी. उपाधि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी से प्राप्त की. अपनी पढ़ाई के दौरान से ही हम पर विशेष स्नेह रखने वाले डॉ. शरद जी श्रीवास्तव सर ने निर्देशन में अर्थशास्त्र विषय में पीएच.डी. उपाधि हासिल करने का सौभाग्य मिला. इसका भी शोध-क्षेत्र हमने बुन्देलखण्ड ही चुना.


आज, २३ फरवरी को प्रसिद्द उपन्यासकार, नाटककार वृन्दावन लाल वर्मा जी की पुण्यतिथि है.  हिन्दी उपन्यास के विकास में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है. उन्होंने ऐसे दौर में जबकि प्रेमचंद उपन्यास विधा में एक युग बन चुके थे, उपन्यास के क्षेत्र में न केवल प्रवेश किया बल्कि ऐतिहासिक उपन्यासों की सफल रचना करके अपना एक अलग, विशिष्ट स्थान बनाया. देखा जाये तो वृन्दावन लाल वर्मा जी ने एक तरफ प्रेमचंद की सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाया तो दूसरी तरफ हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यास की धारा को उत्कर्ष तक पहुँचाया.


आज उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.


09 जनवरी 2022

सिर्फ ऐतिहासिक उपन्यासकार ही नहीं थे वृन्दावन लाल वर्मा जी

आज प्रसिद्द उपन्यासकार वृन्दावन लाल वर्मा जी का जन्मदिन है. उनका जन्म आज ही के दिन १८८९ उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के मऊरानीपुर को हुआ था. वृन्दावन जी को मुख्य रूप से ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में जाना जाता है. बहुत से कम लोगों को ये जानकारी है कि उन्होंने सामाजिक उपन्यास भी कम नहीं लिखे हैं. ऐसा होना निश्चित रूप से उनकी लेखकीय प्रतिभा का पूरा सम्मान नहीं है. उनको ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में स्वीकारने का मुख्य कारण उनके दो प्रमुख उपन्यास ‘गढ़ कुंडार और ‘मृगनयनी भी हैं. आम लोगों ने उनको इसी कारण से विशुद्ध ऐतिहासिक लेखक या कहें कि उपन्यासकार के रूप में जाना है.




इस पोस्ट का उद्देश्य वृन्दावन लाल वर्मा जी के बारे में यही जानकारी देनी है कि वे मात्र ऐतिहासिक लेखक नहीं हैं, न ही वे विशुद्ध उपन्यासकार हैं बल्कि उन्होंने उपन्यास के अलावा अन्य कृतियों की भी रचना की है, ऐतिहासिक कृतियों के अलावा सामाजिक कृतियाँ भी साहित्य जगत को दी हैं. जब ये उन्नीस साल के किशोर थे तो इन्होंने अपनी पहली रचना ‘महात्मा बुद्ध का जीवन चरित’(१९०८) लिख डाली थी। उनके लिखे नाटक ‘सेनापति ऊदल’(१९०९) में अभिव्यक्त विद्रोही तेवरों को देखते हुये तत्कालीन अंग्रजी सरकार ने इसी प्रतिबंधित कर दिया था. सन १९२० ई० तक छोटी-छोटी कहानियाँ लिखते रहे. इन्होंने मुख्य रूप से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास, नाटक, लेख आदि गद्य रचनायें लिखी हैं साथ ही कुछ निबंध एवं लधुकथायें भी लिखी हैं. उनकी रचनाओं को यहाँ सामान्य परिचय के रूप में यहाँ आप सबकी जानकारी के लिए दिया जा रहा है.


ऐतिहासिक उपन्यास

  • गढ़ कुंडार (1930 ई.)
  • टूटे काँटे (1945 ई.)
  • झाँसी की रानी (1946 ई.)
  • महारानी दुर्गावती
  • मुसाहिबजू (1946 ई.)
  • कचनार (1947 ई.)
  • मृगनयनी (1950 ई.)
  • माधवजी सिंधिया (1950 ई.)
  • रामगढ़ की रानी (1950 ई.)
  • भुवनविक्रम (1957 ई.)
  • ललितादित्य
  • अहिल्याबाई
  • देवगढ़ की मुस्कान


सामाजिक उपन्यास

  • प्रत्यागत (1927 ई.)
  • संगम (1928 ई.)
  • प्रेम की भेट (1928 ई.)
  • कुंडलीचक्र (1932 ई.)
  • कभी न कभी (1945 ई.)
  • अचल मेरा कोई (1948 ई.)
  • सोना (1952 ई.)
  • अमरबेल (1953 ई.)
  • सोती आग
  • डूबता शंखनाद
  • लगन
  • उदय किरण
  • अमर-ज्योति
  • कीचड़ और कमल
  • आहत


नाटक

  • धीरे-धीरे
  • राखी की लाज
  • सगुन
  • जहाँदारशाह
  • फूलों की बोली
  • बाँस की फाँस
  • काश्मीर का काँटा
  • हंसमयूर
  • रानी लक्ष्मीबाई
  • बीरबल
  • खिलौने की खोज
  • पूर्व की ओर
  • कनेर
  • पीले हाथ
  • नीलकण्ठ
  • केवट
  • ललित विक्रम
  • निस्तार
  • मंगलसूत्र
  • लो भाई पंचों लो
  • देखादेखी


कहानी संग्रह

  • दबे पाँब
  • मेढ़क का ब्याह
  • अम्बपुर के अमर वीर
  • ऐतिहासिक कहानियाँ
  • अँगूठी का दान
  • शरणागत
  • कलाकार का दण्ड
  • तोषी


निबन्ध

  • हृदय की हिलोर 

 

09 जनवरी 2021

ऐतिहासिकता को जीवंत स्वरूप प्रदान करने वाले साहित्यकार

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 131वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे.  उनकी प्रतिज्ञा अपने आपसे थी, इसी कारण वे इतिहास की सत्यता सामने लाने के लिए लगातार प्रयत्नशील बने रहे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली. गढ़कुंडार जैसे विस्तृत उपन्यास की कथा-वस्तु के बारे में उनका स्वयं का कहना है कि एक शिकार कार्यक्रम के दौरान रात भर उस किले की छवि देखते-देखते ही उन्होंने उसकी एतिहासिकता की कथा को स्वरूप प्रदान कर दिया था. 


उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. ऐसे दौर में इतिहास जैसे विषय पर लेखन करना और उसे जनसामान्य के बीच सहज मान्यता प्रदान करवाना सरल नहीं था. वृन्दावन लाल वर्मा जी की सरल और रोचक लेखन-शैली का ही कमाल कहा जायेगा कि उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास ने उन्हें पर्याप्त ख्याति प्रदान करवा दी. उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.




भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.

आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...


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वंदेमातरम्



09 जनवरी 2019

इतिहास का सच दर्शाने वाले कलमकार को नमन

आज, 9 जनवरी हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट के रूप में प्रसिद्द वृन्दावनलाल वर्मा की का जन्मदिन है. वाल्टर स्कॉट मूलतः शिकारी साहित्य के उपन्यासकार माने गए हैं. इसके साथ-साथ उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे. उनसे प्रेरणा पाकर और अपने बचपन में भारतीय इतिहास के प्रति गलत धारणा देखकर वृन्दावन लाल वर्मा जी के मन में देश का सही साहित्य, इतिहास लिखने का संकल्प जगा. उसी के कारण उन्होंने प्रेमचंद जैसे साहित्यकार के काल में ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की दिशा में कदम बढ़ाया.


वृन्दावन लाल वर्मा जी का जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में 9 जनवरी 1889 को हुआ था. अपने चाचा के पास ललितपुर में रहकर उन्होंने साहित्य के प्रति अनुराग पैदा हुआ. जब वे कक्षा नौ में पढ़ते थे तभी इन्होंने तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस, प्रयाग को भेजे. इन नाटकों के लिए उनको पुरस्कारस्वरूप 50 रुपये प्राप्त हुए थे. मात्र बीस वर्ष की उम्र में उन्होंने सेनापति ऊदल नाटक लिखा था. इस नाटक में निहित राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा दी थी और इसकी प्रतियाँ जब्त कर ली गईं. 

उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में गढ़कुंडार, विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम , अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि प्रसिद्ध हैं. गढ़कुंडार उपन्यास के बहुत से अंश तो उन्होंने एक रात शिकार के दौरान उस किले को देखते-देखते ही तैयार कर लिए थे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यासों के अलावा संगम, लगन, प्रत्यागत, अचल मेरा कोई, सोना, प्रेम की भेंट, अमरवेल सरीखे सामाजिक उपन्यास भी लिखे. इन उपन्यासों में उन्होंने समाज की वास्तविक कहानियों को आधार बनाया था. इनके द्वारा लिखित उपन्यास संगम और लगन पर हिन्दी फिल्में भी बनी हैं जो कई भाषाओं में अनुदित हुयी हैं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.

भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया. हिन्दी साहित्य में परास्नातक उपाधि उत्तीर्ण करने के  पश्चात् पी-एच०डी० उपाधि के लिए गुरुजनों (डॉ० ब्रजेश अंकल, डॉ० दुर्गा प्रसाद खरे) द्वारा आदेशित किया गया. चूँकि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के किसी साहित्यकार पर शोध-कार्य करने की अभिलाषा थी. अपने मन की बात जब अपने गुरुजन के समक्ष रखी तो अगले ही पल उन्होंने वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य पर कार्य करने को प्रेरित किया. इसके बाद वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन नामक शोध विषय के रूप में अपना शोध-कार्य डॉ० दुर्गा प्रसाद खरे जी के निर्देशन में आरम्भ किया. इसी शोध-कार्य के सुफल रूप में विद्या वाचस्पति (Ph.D.) उपाधि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी से प्राप्त हुई. 

आज उनकी जयंती पर उनको सादर नमन.

09 जनवरी 2018

ऐतिहासिकता और जीवंतता का सम्मिश्रण

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 129 वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली.

उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. इसके बाद भी उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.

भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.



आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...