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29 अगस्त 2015

रिश्तों को कलंकित होने से बचा लो


भारतीय समाज सदैव से परम्पराओं और मान्यताओं से संपन्न रहा है, जहाँ संबंधों और रिश्तों को गरिमापूर्ण तरीके से निभाया जाता रहा है. ऐसे समाज में अब आये दिन संबंधों और रिश्तों की पावनता को ठेस पहुँचाई जा रही है; रिश्तों और संबंधों की गरिमा को तार-तार किया जा रहा है. अब नित्यप्रति रिश्तों को कलंकित करने वाले समाचारों से दो-चार होना पड़ता है. हत्या, बलात्कार, डकैती, अपहरण जैसी जघन्य वारदातें रक्त-संबंधों में अब सहजता से देखने मिलने लगी हैं. ऐसी घटनाओं पर समाज अपने को शर्मसार बताता है किन्तु अगले ही क्षण ऐसी ही वारदात हो जाती है. समाज का लगातार शर्मसार होना और लगातार इस तरह की वारदात करते जाना अपने आपने अद्भुत है. लगता है जैसे समूचा समाज ऐसी वारदातों का अभ्यस्त हो गया है. यदि अब ऐसी किसी भी घटना पर विरोध होता है तो सिर्फ नेतागीरी चमकाने के लिए, प्रशासन को हलकान करने के लिए, मीडिया में छा जाने के लिए.
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समाज में पहली कोशिश इस बात की होनी चाहिए थी कि ऐसी वारदातें न हों, रिश्ते कलंकित न हों. देखा जाये तो पर्व, त्यौहार, आयोजन आदि इसी सबके लिए हुआ करते रहे हैं. धार्मिक आयोजन हों अथवा पारिवारिक समारोह, सभी का उद्देश्य कहीं न कहीं रिश्तों को सशक्त बनाना रहा है, संबंधों की गरिमा को बढ़ाने का रहा है. आज इसके उलट इन पर्वों, त्योहारों के द्वारा रिश्तों को कलंकित करने का काम किया जा रहा है, संबंधों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. किसी भी आयोजन का, किसी भी रिश्ते का, किसी भी सम्बन्ध का तात्पर्य सेक्स से, दैहिक संतुष्टि से जोड़ा जाने लगा है. इस तरह से दर्शाने का प्रयास किया जा रहा है कि आपसी संबंधों में स्वार्थ है, शरीर है, यौनेच्छा है, इसके अलावा संबंधों की, रिश्तों की कोई पहचान नहीं. इसको संसार के सबसे पवित्र रिश्ते – भाई, बहिन के रिश्ते के माध्यम से समझा जा सकता है. भाई-बहिन के पवित्र प्रेम, स्नेह के परिचायक पर्व रक्षाबंधन को भी कतिपय लोगों द्वारा कलंकित कर दिया गया है. राखी बंधवाकर रक्षा करने का वचन देने के बाद भी कुछ कुकर्मी भाइयों द्वारा उसी बहिन के साथ छल किया जाता है. लगभग ऐसी ही विकृति सभी संबंधों के बीच दिखाई देने लगी है.
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बहरहाल स्थितियाँ बहुत ही विकट हैं और इनका जल्द से जल्द समाधान किये जाने की आवश्यकता है. इसके लिए सर्वप्रथम संबंधों और रिश्तों की महत्ता सबको समझनी और समझानी होगी. आज जिस तरह से संयुक्त परिवार एकल और नाभिक परिवारों में बदलते जा रहे हैं उससे भी ऐसी समस्याएं बढ़ी हैं. ऐसे में हम सभी को परिवार की महती भूमिका को समझना होगा. संस्कारों, परम्पराओं, पर्वों, त्योहारों को रूढ़ियों के रूप में परिभाषित किया जाने लगा है, इससे भी गरिमामयी वातावरण समाप्त सा हुआ है. आने वाले समय को और अधिक विकृति से बचाने हेतु संस्कृति, सभ्यता, संस्कार आदि पर विशेष बल देने की आवश्यकता है. यदि आधुनिकता के नाम पर इन सबको विस्मृत किया जाता रहा तो एक दिन सिवाय दैहिक रिश्तों, संबंधों के अन्य कोई रिश्ता या सम्बन्ध नज़र नहीं आएगा. 
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02 नवंबर 2014

भ्रूण लिंग जाँच, कन्या भ्रूण हत्या का खेल चालू आहे



ये अपने आपमें अत्यंत शर्मनाक है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता की आदर्शवादिता दिखाने वाले समाज में खुलेआम भ्रूण लिंग जाँच जैसा कुकृत्य किया जा रहा है; गर्भ में बालिका की पहचान होने के पश्चात् उसका जीवन समाप्त किया जा रहा है. इससे भी अधिक शर्मनाक ये है कि इस तरह के कुकृत्यों में वो चिकित्सक भी सम्मिलित हैं जिनको समाज में भगवान का स्थान प्राप्त है. इधर हाल में देश की राजधानी में जिस तरह से खुलेआम वहाँ के नर्सिंग होम द्वारा एक महिला को अल्ट्रासाउंड सेंटर का पता बताया जाता है, जहाँ आसानी से भ्रूण लिंग जाँच की जाती है, तो ये कन्या भ्रूण हत्या निवारण की कोशिशों की गंभीरता को दर्शाता है. खुलेआम इस तरह के सेंटर के बारे में बताया जाना ये सिद्ध करता है कि इस तरह के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हौसले कितने बुलंद हैं और इसके निरोध के लिए बने अधिनियम (PCPNDT Act) का कोई भी खौफ इनके मन-मष्तिष्क पर नहीं है. कमोवेश ये स्थिति अकेले दिल्ली में ही नहीं है वरन देश के बहुतायत भागों में है. लेकिन ये कहकर कि इस कानून की धज्जियाँ उड़ाने वाले, इसका मखौल बनाने वाले, भ्रूण लिंग जाँच करवाने वाले, कन्या भ्रूण हत्या करने/करवाने वाले सम्पूर्ण देश में हैं, दिल्ली के अथवा देश भर के ऐसे अपराधियों को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता है, नज़रअंदाज़ किया भी नहीं जाना चाहिए. इसी के साथ सवाल खड़ा होता है तो इनको रोका कैसे जाए, इनके अपराध पर अंकुश कैसे लगाया जाये, इनकी कुप्रवृत्ति को समाप्त कैसे किया जाये. ऐसे सवालों का जवाब कई बार खुद ऐसे हालात ही बन जाते हैं. स्पष्ट है कि यदि कानून का ही डर होता तो देश भर में लिंगानुपात में भयंकर गिरावट देखने को न मिल रही होती. वर्ष २०११ की जनगणना में भले ही वर्ष २००१ की जनगणना के मुकाबले लिंगानुपात में किंचित मात्र सुधार होता दिखा है किन्तु ये भी संतुष्ट करने वाला नहीं कहा जायेगा क्योंकि इसी अवधि में शिशु लिंगानुपात में व्यापक कमी आई है.
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ऐसी स्थिति में जबकि लिंगानुपात में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, सरकारें बेटी बचाओ अभियान के द्वारा जागरूकता लाने में लगी हुई हैं, गैर-सरकारी संगठन और अनेक व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर बेटियों के हितार्थ कार्य करने में लगे हैं इसके बाद भी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. इस विकृति से निपटने के लिए हर बार जन-जागरूकता की बात की जाती है किन्तु अब जबकि खुलेआम ऐसे सेंटर की जानकारी दिए जाने से लगता है कि जनता ने भी जागरूकता से किनारा करना शुरू कर दिया है. जनसहयोग के साथ-साथ प्रशासन को सख्ती से कार्य करने की जरूरत है. सरकारी, गैर-सरकारी चिकित्सालयों में इस बात की व्यवस्था की जाये कि प्रत्येक गर्भवती का रिकॉर्ड बनाया जाये और उसे समय-समय पर प्रशासन को उपलब्ध करवाया जाये. ध्यान देने योग्य ये तथ्य है कि एक महिला जो गर्भवती है, उसे नौ माह बाद प्रसव होना ही होना है, यदि कुछ असहज स्थितियाँ उसके साथ उत्पन्न नहीं होती हैं. ऐसे में यदि नौ माह बाद प्रसव संपन्न नहीं हुआ तो इसकी जाँच हो और सम्पूर्ण तथ्यों, स्थितियों की पड़ताल की जाये. यदि किसी भी रूप में भ्रूण हत्या जैसा आपराधिक कृत्य सामने आता है तो परिवार-डॉक्टर को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. ऐसे परिवारों को किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ लेने से वंचित कर दिया जाये, चिकित्सक का लाइसेंस आजीवन के लिए रद्द कर दिया जाये, ऐसे सेंटर्स तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिए जाएँ और दंड का प्रावधान भी साथ में रखा जाये.
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इतने सालों की जद्दोजहद से ये स्पष्ट हो चुका है कि बेटी होने पर किसी योजना का लाभ देने का मंतव्य, सरकारी योजनाओं से लाभान्वित किये जाने सम्बन्धी प्रयासों, कानूनी प्रक्रियाओं आदि से सुधार होने के आसार दिख नहीं रहे हैं. ऐसे में कुछ समय तक कठोर से कठोर क़दमों की जद्दोजहद किये जाने की जरूरत है. यदि ऐसा नहीं किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब कि ऐसे धूर्त और कुप्रवृत्ति के चिकित्सकों के प्रतिनिधि घर-घर जाकर लोगों को भ्रूण लिंग जाँच-कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित करेंगे. इसके साथ वह दिन भी दूर नहीं होगा जबकि बेटों के विवाह के लिए बेटियाँ मिलनी बंद हो जाएँगी और समाज एक तरह की कबीलाई संस्कृति में परिवर्तित हो जायेगा. 
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02 अक्टूबर 2014

मानसिक विकारों की सफाई हेतु भी अभियान चले



महात्मा गाँधी जी जयंती पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वच्छता अभियान का आरम्भ करके गाँधी जी के कार्यों को व्यावहारिक रूप देने का प्रयास किया है. ये अपने आपमें एक सराहनीय कदम है और इसे राजनीति से इतर देखने की जरूरत है. शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जो समाज में सफाई की महत्ता से इंकार करे; शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जो गंदगी में रहना चाहता हो. ये एक सार्वभौम सत्य है कि स्वच्छता से ही स्वास्थ्य जुड़ा हुआ है और इसके बिना स्वस्थ समाज की, स्वस्थ इंसान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. ऐसे में हम सबका दायित्व इतना तो बनता ही है कि स्व-स्फूर्त रूप से हम सब सफाई के लिए, स्वच्छता के लिए आगे बढ़ते, न कि प्रधानमंत्री के कहने पर औपचारिकता मात्र करते.
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ये तो स्पष्ट है कि २ अक्टूबर को सभी कार्यालयों में सफाई अभियान चलाया जायेगा. जहाँ मंत्रियों, नेताओं, सांसदों, विधायकों को सफाई करने का कार्य करना है वहाँ सफाई पहले से रहेगी और चंद टुकड़े गंदगी के इनके लिए ही सुनियोजित तरीके से बिखेरे जायेंगे. महज एक दिन की औपचारिकता दिखाने से न तो सफाई हो पानी है और न ही स्वच्छ समाज बनना है. दरअसल गंदगी अब हमारे दिमाग में बैठ चुकी है. अपने घर को, अपने आँगन को तो हम चमकाना चाहते हैं, साफ़ रखते हैं किन्तु घर के आसपास को स्वच्छ नहीं रखना चाहते हैं. घर के कूड़े-करकट को निर्धारित स्थान पर फेंकना हम तौहीन समझते हैं और कूड़े को इधर-उधर फेंक देने में हमने महारत हासिल कर रखी है. सड़क चलते जहाँ-तहाँ थूक देना, पान-गुटखे की पीक से चित्रकारी कर देना हमें गर्वोन्मत्त करता है. इस तरह की स्थितियों के चलते स्वच्छ समाज का, स्वच्छ वातावरण का विचार लाना कपोलकल्पना ही लगती है.
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          इस दिखती गंदगी का मुख्य कारण हमारी मानसिकता है, जो निम्न स्तर तक पहुँच चुकी है. यदि प्रधानमंत्री के आगे आने से और जन-सहयोग से समाज में दिखती गंदगी मिट भी गई, सब तरफ साफ़-सफाई दिखने लगी, सड़क, घर, दुकान, पार्क, कार्यालय आदि-आदि आईने की तरह चमकने लगे पर मानसिक गंदगी के रहते ये सब बेमानी ही कहा जायेगा. ये दिखती गंदगी भी साफ़ हो और मन में बसी गंदगी भी साफ़ हो. बेटे के लिए बेटियों को मार डालना; औरतों को उपभोग की वस्तु समझना; महिलाओं का शारीरिक शोषण करना; धर्म-जाति के नाम पर वैमनष्यता फैलाना; संपत्ति विवाद में भाई-भाई की हत्या कर देना; चोरी, डकैती, हत्या, लूटमार, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मिलावतखोरी आदि वे स्थितियाँ हैं जिनका सम्बन्ध सीधे-सीधे हमारी मानसिकता से है. इसके साफ़ किये बिना, इसको स्वच्छ किये बिना, इसको स्वस्थ बनाये बिना किसी भी तरह का सफाई अभियान अधूरा ही रहेगा. आइये गंदगी साफ़ करने के लिए कार्यालयों में, घरों में झाड़ू लगायें और मानसिक विकारों पर भी झाड़ू चलायें.
 

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03 सितंबर 2014

भारत सतर्क रहे पाकिस्तान के अंदरूनी बिगड़ते हालातों से



बँटवारे, नफरत, हिंसा आदि की जमीन पर निर्मित पाकिस्तान में जब कुछ समय पूर्व लोकतान्त्रिक सरकार का गठन हुआ तो वहाँ सुखद स्थितियों के बनने का आभास हुआ। लोकतान्त्रिक तरीके से संपन्न चुनाव से हर उस व्यक्ति को पाकिस्तान में कुछ शांति की आशा की किरण दिखाई दी, जो वहाँ की स्थिरता-अस्थिरता को भारतीय सन्दर्भ में देखते हैं। पाकिस्तान में शांति, स्थिरता न केवल पाकिस्तान की दृष्टि से वरन भारतीय परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। इसका प्रमुख कारण ये है कि पाकिस्तान की तरफ से आज़ादी के बाद से अद्यतन देश में अराजकता का माहौल बनाने की कोशिशें होती रही हैं; देश के विभिन्न भागों में आतंकवादियों की मदद से खून-खराबा मचाया जाता रहता है; सीमा-पार से आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है; सीमा पर आये दिन गोलीबारी की जाती रहती है; आये दिन जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद की हवा चलाई जाती है; प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से देश के विभिन्न अंदरूनी भागों में; विभिन्न विभागों में, कार्यालयों में जासूसी करवाए जाने के कारनामे भी सामने आते रहे हैं। इस कोढ़ में खाज का काम यहाँ के उन फिरकापरस्त लोगों द्वारा किया जाता है जो तुष्टिकरण के नाम पर देश के मुसलमानों को वोट-बैंक में परिवर्तित करने में लगे हैं।
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अब पाकिस्तान में कुछ दिनों से फिर अराजकता का माहौल बना हुआ है। उसकी अंदरूनी राजनीति में उठापटक जैसे आसार दिख रहे हैं। विद्रोही लोगों ने पाकिस्तान टीवी पर, सचिवालय पर कब्ज़ा कर लिया है। नवाज़ शरीफ के इस्तीफे की लगातार माँग की जा रही है। सेना ने भी कार्यवाही करने जैसी मंशा दिखाई है, जिससे पाकिस्तान का लोकतंत्र पुनः सेना के बूटों तले रौंदे जाने के आसार दिखने-बनने लगे हैं। भारत सरकार को सतर्क रहने की आवश्यकता है। इतिहास गवाह रहा है जब भी पाकिस्तान के अंदरूनी हालात बिगड़े हैं तब-तब पाकिस्तानी हुकुमरानों की तरफ से सीमा पर घुसपैठ, गोलीबारी जैसी स्थितियाँ निर्मित कर दी गईं। इनके पीछे पाकिस्तानी जनता का, विद्रोहियों का, सेना का ध्यान अंदरूनी विवाद से हटाकर भारत-विवाद पर केन्द्रित कर देना रहा है। वर्तमान परिदृश्य में यदि ऐसे हालात बनते हैं तो वे भारत की सुरक्षा की दृष्टि से, आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से, नागरिक सुरक्षा की दृष्टि से नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। विगत कुछ समय से जिस तरह से मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल खेला जा रहा है, अवैध शरणार्थियों को वैधता देने के प्रयास किया जा रहा है वो एक अलग कहानी कहता दिख रहा है। सरकारों द्वारा किसी न किसी रूप में देश के मुस्लिमों के वोटों के लालच में सीमापार से चलते इस्लामिक आतंकवाद पर भी एकतरफा नजरिया बना लिया गया है; शरणार्थियों को (जो अवैध तरीके से देश में बसने के साथ-साथ अवैध कार्यों में, अराजक कार्यों में, आतंकी कार्यों में लिप्त होते पाए गए हैं) भारतीय नागरिक के रूप में बसाये जाने की कवायद होती रहती हैं; ऐसे लोगों के निवास प्रमाण-पत्र, वोटर कार्ड, राशन कार्ड आदि भी अवैध तरीके से बनवाकर इनको वैध करने का प्रयास किया जा रहा है। ये सब कहीं न कहीं मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर, उनके वोट पाने के लालच में किया जा रहा है।
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इन सबके अलावा विगत कुछ समय से जिस तरह से हिन्दू लड़कियों के साथ शादी करके उनका जबरन धर्म-परिवर्तन करवाने की कोशिश, उन पर शारीरिक अत्याचार करने, बलात्कार, गैंग-रेप जैसी वारदातों के अंजाम देने में मुस्लिम युवकों की संलिप्तता पाई जा रही है, वो कहीं न कहीं एक दूसरी तरह का आतंकवाद कहा जा सकता है। पाकिस्तान इस बात को विगत कई युद्धों और छिटपुट झड़पों के दौरान भली-भांति समझ चुका है कि आमने-सामने की लड़ाई में वो भारत से किसी भी रूप में जीत नहीं सकता है, ऐसे में उसके द्वारा देश में अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध छेड़ रखा गया है। यदि उसके अंदरूनी हालात और बिगड़ते हैं, वहाँ सत्ता-परिवर्तन की आहट दिखाई देती है, सेना के सत्ता पर कब्ज़ा कर लेने जैसी स्थितियाँ बनती हैं तो अपनी आदत के अनुरूप पाकिस्तान सीमा पर तो अपनी कारगुजारी दिखा सकता है, साथ ही वो देश में छिपे अपने गुर्गों के द्वारा माहौल को अशांत बना सकता है। इस तरह की एक हरकत को देश मुम्बई-काण्ड के रूप में पहले भी भुगत चुका है। पूर्व में देश के भीतर की आतंकी साजिशों में पाकिस्तान आतंकवादियों के, पाकिस्तान के संलिप्त होने, अवैध रूप से घुसपैठ करने के, सीमा पर बार-बार शांति-विराम का उल्लंघन करने के, देश में माहौल ख़राब करने के पर्याप्त सबूत मिल चुके हैं। उन सभी के और वर्तमान माहौल के आलोक में पाकिस्तान में चल रहे उपद्रव, सरकार के विरुद्ध होते विद्रोह पर केन्द्र सरकार को, राज्य सरकारों को, ख़ुफ़िया एजेंसियों को, सशस्त्र-बलों को, सेनाओं को व्यापक नज़र रखनी होगी। हमारे पड़ोसी की अशांति हमारे देश में अराजकता ला दे, नागरिकों को असुरक्षित कर दे तो ये किसी भी रूप में सही नहीं होगा।
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27 अगस्त 2014

आज़म खान की आक्रामकता का राज़



मंत्री जी एक सामाजिक कार्यक्रम में आये और जैसी की उनसे अपेक्षा थी ठीक वैसा ही भाषण देकर, विवाद सा छेड़कर निकल लिए. उत्तर प्रदेश के केन्द्रीय मंत्री आज़म खान भाषण दें और बिना किसी विवादस्पद विषय के, विवादस्पद शैली के उनका भाषण समाप्त हो जाये ऐसा संभव नहीं होता है. आज़म खान और उनकी शैली का चोली-दामन का साथ रहा है, साथ ही विवादित बयानबाज़ी भी उनकी शैली बनती रही है. कार्यक्रम चाहे राजनैतिक हो अथवा सामाजिक, हिन्दुओं के मध्य हो या फिर मुसलमानों के मध्य, प्रदेश की राजधानी में हो या फिर किसी छोटे से कस्बे में, किसी बड़े मुद्दे-व्यक्ति-समस्या पर बोल रहे हों अथवा बहुत छोटे विषय पर चर्चा कर रहे हों उनकी कोशिश विवादित बयान देने की ही रहती है.
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देखा जाये तो उनके भाषणों के, बयानों के केंद्र में मुसलमान ही रहते हैं. वे किसी न किसी रूप में खुद को मुसलमानों का एकमात्र नेता साबित करने की कोशिश में लगे हुए हैं. यदि इस पूरी कवायद पर निगाह डालें तो स्पष्ट रूप से दिखता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहने के बाद भी समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह खुद को केन्द्रीय राजनीति में स्थापित करने में लगे हुए हैं. उनका पूरा ध्यान विगत कई वर्षों से प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के स्थान पर देश का प्रधानमंत्री बनने पर लगा हुआ था. ऐसे में पार्टी के कई बड़े नेता खुद को प्रदेश के मुख्यमंत्री का दावेदार समझने लगे थे. और जब लैपटॉप, टैबलेट के लालच में और तत्कालीन बसपा सरकार की निराशात्मक व्यवस्था से निकलने के लोगों ने समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत से प्रदेश में सत्ता सौंप दी तो इन्हीं बड़े-बड़े नेताओं में शामिल आज़म खान को भी अपने मुख्यमंत्री बनने कि अपार संभावनाएं दिखाई देने लगी थीं. ऐसा इसलिए भी संभव दिख रहा था क्योंकि समाजवादी पार्टी के पास दूसरा कोई नेता ऐसा नहीं है जिसे मुस्लिम चेहरे के रूप में पेश किया जा सके. वैसे भी अयोध्या मामले में माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद के आदेश के बाद से समाजवादी पार्टी अथवा मुलायम सिंह के पास मुसलमानों को प्रसन्न करने के लये, अपने पक्ष में उनके वोट करने के लिए कुछ बचा नहीं था, इस दृष्टि से भी आज़म खान मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में सबसे आगे चल रहे थे. उनकी इस दबी-छिपी महत्त्वाकांक्षा पर मुलायम सिंह के पुत्र-मोह ने तुषारापात कर दिया. यदि घटनाक्रम याद हो तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अखिलेश यादव के आसीन होने के बाद आज़म खान नाराज़ भी रहे और बाद में भी कई मौके ऐसे आये जब आज़म खान को नाराज़ होते देखा गया.
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इधर अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने से तुषारापात तो हुआ ही साथ ही लोकसभा चुनाव परिणामों ने समाजवादी पार्टी और मुस्लिम वोट-बैंक के नाम पर होती आ रही राजनीति को आईना दिखा दिया. इधर समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन भी निराशाजनक रहा वहीं सरकार का प्रदर्शन भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है. उस पर मुलायम सिंह का पुनः अमर सिंह के प्रति झुकाव कोढ़ में खाज का काम करता दिख रहा है. लोकसभा चुनावों में जिस तरह से भाजपा को बहुमत मिला है उससे एक बात तो साफ होती है कि तमाम गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों द्वारा मुसलमानों को जिस तरह से भाजपा का, हिंदुत्व का डर दिखाया जा रहा था, वह सफल नहीं हो सका. इन सबके चलते ज़ाहिर है कि आज़म खान अपनी आक्रामक शैली के चलते और प्रत्येक बयान को मुस्लिमों के इर्द-गिर्द रखकर वे अपनी भविष्य की राह का निर्माण करने में लगे हैं. कहीं न कहीं उनके मन में प्रदेश स्तर से ऊपर राष्ट्रीय राजनीति में खुद को मुस्लिम चेहरे के रूप में स्थापित करने की आकांक्षा है. इसका कारण भी साफ है कि किसी भी दल में ऐसा कोई स्थापित नेता दिखता नहीं है जो आज़म खान की भांति आक्रामक और बेबाक अंदाज़ में मुसलमानों का पक्ष लेता हो.
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आज़म खान के पास जितना राजनैतिक अनुभव है उसके अनुसार वे भी सहजता से इस बात को समझ रहे हैं कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी का भविष्य क्या है; मुलायम सिंह के अमर-प्रेम के पुनः पनपने पर उनका वजूद क्या है. और यदि अपनी स्थिति को वे प्रदेश से राष्ट्रीय स्तर पर ले जाना चाह रहे हैं तो कतई गलत नहीं है बस उसका तरीका गलत है. उनके भाषणों, बयानों से वैमनष्यता की, ईर्ष्या की, उकसाने की भावना स्पष्ट झलकती दिखती है, जो समाज के लिए कहीं से भी उचित नहीं है. एक तरफ खुद उन्हीं के द्वारा भाजपा पर, आरएसएस पर वैमनष्यता की राजनीति करने का  आरोप लगाया जाता है और दूसरी तरफ खुद उसी तरह की राजनीति करते दिखते हैं; एक तरफ हिन्दू पक्ष में आते बयानों का विरोध करते हैं तो दूसरी तरफ वे खुद को मुसलमानों का पहरेदार बताते हैं; एक तरफ मुलायम सिंह को बड़े भाई के जैसा बताते हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं के विरोध में बयानबाज़ी करने से नहीं चूकते हैं; एक तरफ हिन्दू-मुसलमान के संयुक्त प्रयासों से संपन्न होते सामाजिक कार्यक्रम में जाते हैं और दूसरी तरफ हिन्दुओं को गरियाते हुए उनको मुसलमानों पर हिंसक हमलों का आरोपी बताते हैं. ये रणनीति उनके मंसूबों को स्पष्ट करती है कि वे खुद को सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम नेता के रूप में स्थापित करना भर है. वर्तमान में वे किसी उपयुक्त अवसर की तलाश में हैं. कहा भी जाता है कि राजनीति में कोई माई-बाप नहीं, जहाँ से सत्ता सुख मिले उसी तरफ चले जाओ. 
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