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20 फ़रवरी 2025

दिल्ली मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण में आम आदमी पार्टी की अनुपस्थिति

आज, 20 फरवरी 2025 को दिल्ली विधानसभा के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह रामलीला मैदान में आयोजित किया गया. पिछले 26 सालों से विपक्षी गलियारे में टहलने वाली भाजपा को उसकी मेहनत और विचारधारा के कारण दिल्ली के मतदाताओं ने इस बार बहुमत के साथ सरकार बनाने का अवसर दिया. भाजपा की तरफ से पहली बार विधायक बनी रेखा गुप्ता ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की. इससे पहले वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा कुछ सीटों के अंतर से सरकार बनाने से चूक गई थी. इसी मौके का फायदा उठाकर कांग्रेस ने अन्ना आन्दोलन के दौरान रहे उसके धुर विरोधी आम आदमी पार्टी, अरविन्द केजरीवाल टीम को समर्थन देकर सरकार बनाने का अवसर दे दिया था. इस अवसर का फायदा उठाते हुए आम आदमी पार्टी ने अगले दो चुनावों में प्रचंड बहुमत से सरकार तो बनाई मगर दिल्ली के मतदाताओं के दिल में प्रचंड रूप में अपना स्थान नहीं बना सके.

 



तमाम सारी मुफ्त की योजनाओं, विरोधी दलों पर आरोपों की बौछारों, स्वयं को एकमात्र ईमानदार सिद्ध करने की मानसिकता के बाद भी इस वर्ष के चुनावों में मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी को नकारते हुए भाजपा को सरकार बनाने का मौका दिया. आम आदमी पार्टी या कहें कि केजरीवाल के पिछले कार्यकाल जिस तरह से गुजरे उसके अनुसार वे केन्द्र सरकार के प्रताड़ित व्यक्ति जैसे खुद को साबित करने की कोशिश में लगे रहे. अनाप-शनाप बयानबाजी, अनर्गल आरोपों के चलते उनकी और पार्टी की छवि लगातार गिरती रही. ये गिरावट आज मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भी देखने को मिली. आम आदमी पार्टी, अरविन्द केजरीवाल की तरफ से कोई भी इस समारोह में उपथित न हुआ. देखा जाये तो यह राजनैतिक गरिमा की निम्नतम गिरावट है. इससे पूर्व किसी भी शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी दलों के नेताओं का, पूर्व मुख्यमंत्रियों का उपस्थित रहना हुआ करता था.

 

आज की हरकत एक तरह से आम आदमी पार्टी का, अरविन्द केजरीवाल एंड फ्रेंड्स कंपनी का भविष्य भी तय करती सी दिख रही है. लोकतान्त्रिक मूल्यों में, विषयों में जितना महत्त्वपूर्ण कोई नेता होता है, उतना ही महत्त्वपूर्ण एक-एक मतदाता भी होता है. आज की हरकत से कम से कम वे लोग जो वाकई में राजनीति में शुचिता, ईमानदारी, गरिमा आदि देखना पसंद करते हैं, आम आदमी पार्टी से दूर होने की राह चल दिए होंगे. बाकी तो पिछला इतिहास ही आम आदमी पार्टी की कहानी लिखेगा.


08 फ़रवरी 2025

नकारात्मक कार्य-शैली का नतीजा आप की हार

सत्ताईस बरसों तक विपक्षी गलियारे में टहलते रहने के बाद भाजपा को दिल्ली विधानसभा का सत्ता सुख प्राप्त हो गया. 70 सीटों वाली दिल्ली में भाजपा ने 48 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया जबकि पिछले बारह सालों से सरकार चला रही आम आदमी पार्टी 22 सीटों में ही सिमट गई. आम आदमी पार्टी का इतनी कम सीटों में सिमट जाना संख्यात्मक रूप से इस कारण आश्चर्यजनक लग रहा है कि अपने पहले चुनाव में ही आम आदमी पार्टी द्वारा चमत्कारिक रूप से 28 सीटें जीत कर अपनी पहचान को साबित किया था. अन्ना आन्दोलन की लहर, लोकपाल बिल बनाये जाने का मुद्दा, भ्रष्टाचार विरोधी छवि के साथ पहले चुनाव के चमत्कारिक प्रदर्शन को अद्भुत प्रदर्शन में बदलते हुए 2015 एवं 2020 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने क्रमशः 67 एवं 62 सीटों पर विजय हासिल की थी. केन्द्रीय राजनीति में बेहतर प्रदर्शन करने वाली भाजपा को इन दोनों विधानसभा चुनावों में क्रमशः 03 एवं 08 सीटों से संतोष करना पड़ा था, वहीं कांग्रेस इन दोनों चुनावों में अपना खाता ही नहीं खोल सकी. आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली की सभी सात सीटों पर विजय हासिल की थी किन्तु विधानसभा में उसका प्रदर्शन एकदम लचर रहा.

 

आम आदमी पार्टी के पहले चुनाव की सफलता को अन्ना आन्दोलन लहर की सहानुभूति का परिणाम मानने वालों को भले ही चुनाव परिणामों की संख्यात्मकता ने गलत साबित किया हो मगर आम आदमी पार्टी खुद को सही साबित करने में विफल ही रही. यही कारण रहा कि दो बार प्रचंड बहुमत से आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता प्रदान किये जाने के बाद भी अंततः इस बार दिल्ली के मतदाताओं ने उससे किनारा करना ही उचित समझा. वर्तमान 2025 विधानसभा चुनाव परिणामों को आम आदमी पार्टी के समर्थक भले ही सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकम्बेंसी) कह कर खुद को सांत्वना देने का प्रयास करें मगर सत्यता यही है कि पिछले बारह बरसों के अपने कार्यकाल में आम आदमी पार्टी द्वारा अपनी उसी विचारधारा, अपने उन्हीं सिद्धांतों से लगातार दूरी बनाई जाती रही, जिनके सहारे वह सत्ता में आई थी. अपने कार्यों, अपने विचारों, अपनी कार्य-शैली आदि के चलते आम आदमी पार्टी ने और स्वयं अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह से नकारात्मक माहौल बना रखा था, उससे दिल्ली के मतदाताओं में निराशा उत्पन्न हो चुकी थी. यही कारण रहा कि दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्य-शैली पर भरोसा करते हुए इस बार विधानसभा भाजपा को सौंप दी. दिल्ली के मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए अरविन्द केजरीवाल को भी हराया, मनीष सिसौदिया के साथ-साथ सत्येंद्र जैन और सौरभ भारद्वाज को भी बाहर का रास्ता दिखाया. एक दशक से अधिक समय की कार्य प्रणाली, व्यवहार को देखने के बाद मतदाताओं को न मुफ्त की रेवड़ियाँ पसंद आईं और न ही कट्टर ईमानदार वाली कथित छवि ने प्रभावित किया.

 



आम आदमी पार्टी की हार के पीछे भले ही भाजपा की अपनी तैयारी, रणनीति, मोदी का चेहरा समेत अनेक कारक समाहित माने जा सकते हैं, किन्तु आम आदमी पार्टी और उनके शीर्ष नेताओं के कारनामे भी उसकी हार के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं. यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जो दल भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से जन्मा हो, जिस राजनैतिक दल के खिलाफ पूरा आन्दोलन छेड़े रहा हो सत्ता में आने के लिए उसी से हाथ मिला लिए. कांग्रेस की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ सैकड़ों पृष्ठों के जो सबूत सार्वजनिक मंच से दिखाए जाते थे, वे अचानक ही गायब हो गए. भ्रष्टाचार विरोध के द्वारा सत्ता में आने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने लगे. खुद को कट्टर ईमानदार कहने वाले अरविन्द केजरीवाल भी इससे बच न सके. उनके सहित मनीष सिसौदिया, सत्येंद्र जैन को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाना पड़ा.

 

नई तरह की साफ-सुथरी, ईमानदार और वैकल्पिक राजनीति का वादा करने वाले केजरीवाल ने तो सिद्धांतों की, ईमानदारी की उस समय धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं जबकि उनको जेल जाना पड़ा. बात-बात पर नैतिकता की दुहाई देने वाले अरविन्द केजरीवाल द्वारा जेल जाने के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया गया. इसके बजाय उनके द्वारा जेल से ही सरकार चलाने की ऐसी जिद दिखाई गई जो भारतीय राजनीति में अचम्भित करने वाली घटना थी. भ्रष्टाचार विरोध, नैतिकता की बात करने वाले केजरीवाल ने सत्ता सुख के लिए अनेक राज्यों में उन्हीं दलों, नेताओं के साथ हाथ मिलाया जिनके दामन में भ्रष्टाचार, दंगों, घोटालों आदि के दाग लगे हैं. व्यवस्था परिवर्तन करने, राजनीति का ढंग बदलने की बात करने वाले केजरीवाल और उनके साथी लगातार न केवल भ्रष्टाचार में लिप्त होते चले गए बल्कि काम-काज के मामलों में भी असफल सिद्ध हुए. सरकारी विद्यालयों, चिकित्सालयों, मोहल्ला क्लीनिक, सड़कें, यमुना साफ़-सफाई, बिजली, पानी आदि के मामलों में आम आदमी पार्टी लगातार असफल ही रही. विडम्बना यह रही कि तमाम सारी नाकामियों के बाद भी केजरीवाल द्वारा इनका जिम्मेदार स्वयं को, अपने नेताओं को, अपनी पार्टी को न मानकर दूसरों पर दोषारोपण किया जाता रहा. अलग तरह की राजनीति के नाम पर बिना किसी सबूत के, बिना किसी आधार के बाकी सभी पार्टियों और उनके नेताओं को चोर-बेईमान बताया जाने लगा. इसकी हद तो उस समय हुई जबकि वर्तमान चुनाव से ठीक पहले उन्होंने सीधे-सीधे हरियाणा की भाजपा सरकार पर यमुना के पानी में जहर मिलाने, नागरिकों के नरसंहार की साजिश रचने का अत्यंत गम्भीर आरोप लगा दिया. यह कदम केजरीवाल की गैर-जिम्मेदार राजनीति की सारी सीमाओं का लाँघना था.

 

फिलहाल तो आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के कारनामों की लम्बी सूची है, उनके कांड भी लम्बे-चौड़े हैं, अमानतुल्लाह खान, ताहिर हुसैन पर दंगों के आरोप तय हो चुके हैं, इस वास्तविकता को न केवल आम आदमी पार्टी के नेताओं ने समझा बल्कि दिल्ली के मतदाताओं ने भी समझा. यही कारण रहा कि दिल्ली में चुनावी मौसम के ठीक बीच में आम आदमी पार्टी के सात विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. यहाँ पार्टी छोड़ने की परम्परा भी पार्टी के सत्ता में आने के साथ ही शुरू हो गई थी. शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, मयंक गांधी, कुमार विश्वास, कैलाश गहलोत आदि ऐसे नाम हैं जो केजरीवाल की कार्यप्रणाली, उनकी मनमानी से असहमति के चलते पार्टी से बाहर हो गए. इन सब बातों का भी असर चुनाव परिणाम पर पड़ा. मतदाताओं में यह धारणा बन चुकी थी कि अब पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है.

 

दिल्ली चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठना बेवजह भी नहीं. क्षेत्रफल की दृष्टि से भले ही दिल्ली छोटा राज्य हो मगर देश की राजधानी होने के कारण वह राजनीति के केन्द्र में रहता है. देश की राजनीति की तरह ही यहाँ की राजनीति भी विचारधारा और पार्टी के मजबूत शीर्षक्रम पर आधारित है. स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति आम आदमी पार्टी के पास नहीं है. आम आदमी पार्टी भले ही स्वयं को कट्टर ईमानदारी, अलग तरह की राजनीति करने वाली, व्यवस्था परिवर्तन करने वाली विचारधारा का पोषण करने वाली बताती रही हो मगर सत्यता यही है कि उसकी कोई विचारधारा नहीं है. उसका जन्म किसी विचारधारा के कारण नहीं बल्कि सत्ता में आने के उद्देश्य से ही हुआ है. आम आदमी पार्टी का गठन करते समय केजरीवाल के स्वयं ही कहा था कि मजबूरी में हम लोगों को राजनीति में उतरना पड़ा. हमें राजनीति नहीं आती है. हम इस देश के आम आदमी हैं जो भ्रष्टाचार और महँगाई से दुखी हैं, उन्हें वैकल्पिक राजनीति देने के लिए आए हैं. ऐसे में पार्टी के लिए बिना किसी ठोस विचारधारा के उसके विधायकों का वैचारिक दृष्टिकोण से एकजुट बने रहना भी एक चुनौती होगी. दिल्ली की सत्ता में रहते हुए केजरीवाल को अपने विधायकों को सँभाले रखना मुश्किल हो रहा था, अब विपक्ष में रहते हुए उनको साधे रखना आसान नहीं होगा. विचारधारा शून्यता के साथ-साथ शराब घोटाले और शीशमहल जैसे मुद्दों ने पार्टी की कट्टर ईमानदारी छवि पर भी दाग लगाया है. केजरीवाल, सिसौदिया का हारना अन्य प्रदेशों की इकाइयों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा. ऐसे में यदि आम आदमी पार्टी को, केजरीवाल को राजनीति का लम्बा रास्ता तय करना है तो उनको दूसरों पर दोषारोपण करने के स्थान पर अपने गिरेबान में झाँकना होगा. अपने कारनामों पर, अपनी कार्य-शैली पर चिंतन करना होगा. कट्टर ईमानदार, अजेय बने रहने के अहंकारी दम्भ से बाहर निकलना होगा.  


05 फ़रवरी 2025

दिल्ली विधानसभा चुनाव का खेल

दिल्ली विधानसभा चुनाव का मतदान समाप्त होते ही कई एजेंसियों ने अपने एग्जिट पोल जारी किये. कुछ प्रमुख एजेंसियों में से सात ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और दो ने आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार का अनुमान दिखाया है. कांग्रेस को किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया है. देखा जाये तो कांग्रेस पिछले चुनाव से ही दिल्ली में हाशिए पर है. वर्तमान चुनावों का अंतिम परिणाम क्या होगा ये मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा किन्तु दिल्ली विधानसभा चुनाव की स्थिति का आकलन करने के लिए कांग्रेस का भी आकलन करना होगा, बिना इसके विधानसभा चुनावों की सही तस्वीर सामने नहीं आएगी. इसके लिए विगत तीन विधानसभा चुनावों का आकलन करना होगा.

 

दिल्ली विधानसभा 2015 और 2019 के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस पूरे परिदृश्य से गायब हुई उसे देख कहा जाने लगा कि कांग्रेस का विकल्प आप है. 2013 में आप ने अन्ना आन्दोलन लहर के साथ पहली बार चुनाव में उतरते ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. 70 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 32 सीटों के साथ पहले स्थान पर, आप 28 सीटों के साथ दूसरे और सत्ताधारी कांग्रेस महज 08 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर आई. भाजपा विरोधी मानसिकता के कारण कांग्रेस ने आप को समर्थन देकर सरकार बनवाई जबकि अन्ना आन्दोलन से जन्मी आप का सबसे बड़ा विरोधी दल कांग्रेस ही बना था.

 



पहली बार में ही अपनी उपस्थिति को इस रूप में देखकर अरविन्द केजरीवाल को भ्रम हो गया कि वे भ्रष्टाचार के नाम पर कहीं भी, कैसी भी जीत, किसी के खिलाफ प्राप्त कर सकते हैं. विधानसभा में भी उनकी जीत कांग्रेस की सशक्त नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ थी. इसी सोच के चलते महज 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल लोकसभा चुनाव की तरफ मुड़ गए. लोकसभा चुनावों के पश्चात् दिल्ली ने 2015 में दोबारा चुनावों का मुँह देखा. दिल्ली विधानसभा 2015 चुनाव परिणाम सोचने वाले थे कि आप या अरविन्द केजरीवाल ने महज 49 दिन में ऐसे कौन से काम कर डाले थे कि 2013 चुनाव में 28 सीटें जीतने वाली आप ने इन चुनावों में 63 सीटें हासिल कीं? यह भी सोचने वाली बात थी कि जिस भाजपा की स्थिति कांग्रेस या शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुरी नहीं रही, उसने महज 49 दिन में ऐसे कौन-कौन से गलत कदम उठाए कि उसे मात्र तीन सीट पर सिमटना पड़ा?

 

इन सभी सवालों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी अनदेखा किया गया. 2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आप को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस को 2013 के चुनाव के मुकाबले 2015 में दो सीटों, मंगोलपुरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत मिले. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत सी सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही. इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा ने 2013 के मुकाबले 2015 में महज 17 सीटों पर कम मत प्राप्त किये. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?

 

दरअसल ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का था. मतदाताओं का एक दल से दूसरे दल की तरफ, एक प्रत्याशी से दूसरे प्रत्याशी की तरफ स्विंग कर जाना कोई नई घटना नहीं थी मगर समूची विधानसभा के मतदाताओं का स्विंग कर जाना साधारण घटना नहीं थी. भाजपा या कि मोदी विरोधियों ने एहसास कर लिया कि अन्ना आन्दोलन से मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में आप को कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे. अरविन्द केजरीवाल के वे सारे सबूत कहीं गायब हो गए जो शीला दीक्षित के खिलाफ मंचों से दिखाए जाते रहे थे. इस खेल में किसी तरह की कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की गई. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध किया गया.

 

इसके बाद भी विधानसभा 2019 में आप अपना पिछला कारनामा दोहराने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार मात्र 35 सीटों पर ही ज्यादा मत प्राप्त हुए. भाजपा को 201के मुकाबले 57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुएउनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी. 

 

आप की बढ़ती सीटों के पीछे भाजपा की कार्यप्रणाली, उसके नेतृत्व की स्थितियाँ भी प्रभावी रही होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी चर्चा किये बिना, परिणामों के आपसी सह-सम्बन्ध को परखे बिना आप को कांग्रेस का विकल्प बता देना अभी जल्दबाजी होगी. आप विशुद्ध रूप से कांग्रेस की टीम बी के रूप में देखी जा सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस चुनावों में पराजित हुई है वहाँ उसके द्वारा ईवीएम पर ऊँगली उठाई गई, केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये गए लेकिन दिल्ली के दो विधानसभा चुनावों में शून्य सीटें लाने के बाद भी उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया. कांग्रेस का विरोध करके जमीन बनाने वाली आम आदमी पार्टी को पहली बार में ही समर्थन देकर सरकार बनवाना, एक भी सीटें न मिलने के बाद भी ईवीएम पर हो-हल्ला न मचाना, एकाएक कांग्रेस के मतों में जबरदस्त गिरावट आना और उसी अनुपात में आम आदमी पार्टी के मतों का बढ़ना इसे कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि अवसरवादी राजनीति सिद्ध करता है.

 


27 फ़रवरी 2020

हिंसात्मक चिंगारी भड़कने का डर हमेशा रहेगा

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारत आगमन के समय ही दिल्ली में हिंसात्मक गतिविधियों का होना एक तरह का षड्यंत्र समझ आया मगर इसके पीछे खतरनाक कदम, मंसूबे छिपे होंगे ये अंदाज शायद किसी को नहीं रहा होगा. जबरदस्त उत्पात के बाद, खुलेआम कत्लेआम जैसी स्थिति बनाये रखने के बाद जब दिल्ली में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए, तब हालात नियंत्रण में आते दिखे. इस नियंत्रित स्थिति के बाद स्थिति की भयावहता सामने आने लगी है. पुलिस के एक हेड कांस्टेबल की मृत्यु इसी हिंसात्मक गतिविधि में हुई. उसके साथ ही एक आईबी अधिकारी की हत्या किये जाने और उनकी लाश को नाले में फेंक दिए जाने की खबर सामने आई. डॉक्टर्स के द्वारा पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट के अनुसार उस अधिकारी के लगभग हर अंग में चाकुओं से वार किया गया है. आंतें निकाल ली गईं हैं. पूरे शरीर में अनगिनत घाव हैं. इस तरह की जघन्य हत्या आखिर किसलिए? इस हत्या के पीछे आम आदमी पार्टी के एक मुस्लिम पार्षद को आरोपी माना जा रहा है. मीडिया द्वारा, सोशल मीडिया पर अपलोड विभिन्न वीडियो द्वारा जानकारी मिली कि इस हत्या तथा उत्पात के पीछे यही मुस्लिम पार्षद का हाथ है. उसकी छत से पेट्रोल बम फेंकने, पत्थर फेंकने के कई वीडियो सामने आये. इसी के साथ-साथ जब मीडिया द्वारा सम्बंधित जगह का मुआयना किया गया तो छत पर पेट्रोल, तेजाब, पत्थर का व्यापक जखीरा पकड़ में आया.


सोचने वाली बात है कि ये हिंसा महज CAA का विरोध है? क्या CAA में ऐसे प्रावधान हैं जिनके चलते देश के या कहें कि दिल्ली के मुसलमान इस कदर हिंसा पर उतारू हो गए. पिछले दो महीने से अधिक समय से शाहीन बाग़ में दिया जा रहा धरना, सड़क का अवरोध शायद इनके लिए पर्याप्त नहीं था. न्यायालय द्वारा, केन्द्र सरकार द्वारा, दिल्ली सरकार द्वारा पूरे मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया. दो महीने से अधिक समय तक किसी सड़क को रोके रखना, इस्लाम समुदाय के प्रमुखों द्वारा लगातार उत्तेजक भाषण देना आदि इनको नहीं दिखाई दिया. दिन-प्रतिदिन मामला अन्दर ही अन्दर सुलग तो रहा ही था साथ ही किसी बड़े हमले की, हिंसात्मक गतिविधि की योजना भी बनाई जा रही थी. यही कारण है कि इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के देश में रहने का समय चुना गया. सोचा गया होगा कि इस बहाने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी ये बात फ़ैल जाएगी कि केन्द्र सरकार किसी राष्ट्राध्यक्ष के समय अपने देश की स्थिति को नियंत्रित नहीं रख सकी. इसके साथ-साथ CAA के प्रति भी एक तरह की नकारात्मकता वैश्विक स्तर पर फ़ैल जाएगी. इसी मंसूबे के चलते हिंसा का आरम्भ हुआ.

इस हिंसा ने लाखों-करोड़ों रुपये का नुकसान तो किया ही साथ ही दो दर्जन से अधिक इंसानों को भी अपनी चपेट में निगल लिया. इससे अधिक नुकसान एकबार फिर उस विश्वास का हुआ जो विगत कई वर्षों से सभी के द्वारा समय-समय पर बनाया जाता रहता है. एक बार फिर आपसी सद्भाव, समन्वय की उस स्थिति की हत्या हुई है जिसे अभी हाल में बड़ी मुश्किल के साथ बनते, स्थापित होते महसूस किया जा रहा था. दिल्ली के दिलवाले मतदाताओं को बुद्धिजीवी बताया जा रहा था और जिस पार्टी को व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए आया हुआ बताया जा रहा था, उसके सदस्यों द्वारा इस तरह के जघन्य कृत्य में शामिल होने ने भरोसे का ही खून किया है. जो लोग यह कहते नहीं थकते हैं कि किसी के बाप का नहीं है हिन्दुस्तान, वे भी इस हिन्दुस्तान को खून से लाल करने चल दिए.



अभी तक ऐसा लग रहा था कि ये लोग सिर्फ सीएए के विरोध करने में लगे हैं. काल्पनिक एनआरसी का विरोध करने में लगे हैं मगर जिस तरह के चित्र सामने आ रहे हैं, जिस तरह के वीडियो सामने आये हैं, जैसी खबरें मीडिया के द्वारा दिखाई जा रही हैं उनको देखकर लगता है कि इनका असल मंसूबा दिल्ली को भयानक दंगाक्षेत्र में बदल देना था. इना उद्देश्य समाज में बुरी तरह से कत्लेआम करना था. इनका मकसद गैर-मुस्लिमों के मन में भय पैदा करना था. देखा जाये तो ये कहीं न कहीं इसमें सफल भी हुए हैं. हाल-फिलहाल तो स्थिति नियंत्रित लग रही है मगर कितने समय तक ये स्थिति बनी रहेगी कहा नहीं जा सकता. शाहीन बाग़ का अनशन अभी भी चल रहा है. अदालत ने अगले माह तक के लिए तारीख देकर एक तरह से उनके प्रति ही समर्थन दर्शाया है. ऐसे में यदि इस विभेदकारी आग को, हिंसात्मक वृत्ति को पूरी तरह से समाप्त न किया गया तो दिल्ली में सुलगी हिंसात्मक चिंगारी भड़कने का डर हमेशा लगा रहेगा. 
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

20 फ़रवरी 2020

कांग्रेस का विकल्प नहीं उसकी टीम बी बनकर उभरी है आम आदमी पार्टी


दिल्ली एक बार फिर आम आदमी पार्टी की हो गई. विधानसभा निर्वाचन 2020 के आरम्भ होने के समय से ही इस चुनाव को आआपा के पक्ष में माना जा रहा था. परिणाम भी कमोवेश उसी तरह का आया. चुनाव परिणाम घोषित होते ही विश्लेषकों द्वारा आम आदमी पार्टी को कांग्रेस का विकल्प बताया जाने लगा. असल में वर्तमान चुनाव परिणामों की समीक्षा, विश्लेषण गंभीरता से नहीं किया जा रहा है. इसे सीधे-सीधे आम आदमी पार्टी की एकतरफा जीत बताकर और भाजपा की हानि बता कर प्रसारित किया जा रहा है. ऐसा यदि एक आम समर्थक द्वारा किया जाये, एक भावुक मतदाता के द्वारा किया जाये तो बात समझ आती है कि वह किसी भावना के वशीभूत अपना आक्रोश निकाल रहा है. इसके उलट जब खुद को बौद्धिक कहने वाले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी की वर्तमान जीत का अथवा विगत विधानसभा की जीत का सतही आकलन किया जाये तो लगता है कि अभी निष्पक्षता की बहुत आवश्यकता है. देश में लोकतंत्र की वकालत भले ही की जाये मगर अभी वैचारिक स्तर पर ही लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सका है.

पूरे देश में भाजपा विरोधी माहौल बहुत लम्बे समय से बना हुआ था मगर वर्ष 2014 के बाद से सिर्फ द्विपक्षीय लहर देखने को मिल रही है. इसमें एक भाजपा के पक्ष में और दूसरी भाजपा के विरोध में. यहाँ भाजपा-विरोधियों के पास अपने-अपने विकल्प खुले हुए हैं. ऐसा न केवल मतदाताओं, समर्थकों के साथ हो रहा है वरन दलीय स्वरूप में भी ऐसा देखने को मिल रहा है. दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी यही हुआ. यहाँ मतदाताओं की, भाजपा, आम आदमी पार्टी की स्थिति का सही-सही आकलन करने के लिए एक अन्य तीसरे दल कांग्रेस का भी आकलन करना होगा. बिना उसके दिल्ली विधानसभा चुनावों की सही तस्वीर सामने नहीं आ सकेगी. इसके लिए वर्तमान विधानसभा चुनावों से इतर विगत दो विधानसभा चुनावों का भी आकलन करना पड़ेगा.

ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस का चुनावी परिणाम सम्बन्धी आकलन, विश्लेषण ही तय करेगा कि आआपा कांग्रेस का विकल्प बनकर उभरी है अथवा उसकी टीम बी बनकर. वर्तमान चुनाव परिणामों से ध्यान हटाकर यदि वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों पर दृष्टि डाली जाये जबकि आम आदमी पार्टी ने अन्ना आन्दोलन की लहर में पहली बार चुनाव मैदान में कदम रखा था. पार्टी ने पहली बार में ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा भाजपा, आआपा और कांग्रेस के बीच ही सिमट गई. इस चुनाव में भाजपा 32 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी जबकि आआपा 28 सीटों के साथ दूसरे और सत्ताधारी कांग्रेस महज 08 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर आई. भाजपा विरोधी मानसिकता के कारण कांग्रेस ने आआपा को समर्थन देकर सरकार बनवाई जबकि अन्ना आन्दोलन से जन्मी आआपा का सबसे बड़ा विरोधी दल कांग्रेस ही बना था.


पहली बार में ही अपनी उपस्थिति को इस रूप में देखकर अरविन्द केजरीवाल को भ्रम हो गया कि वे भ्रष्टाचार के नाम पर कहीं भी, कैसी भी जीत, किसी के खिलाफ प्राप्त कर सकते हैं. विधानसभा में भी उनकी जीत कांग्रेस की सशक्त नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ थी. इसी सोच के चलते महज 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल लोकसभा चुनाव की तरफ मुड़ गए. अंततः लोकसभ चुनावों के पश्चात् दिल्ली ने 2015 में दोबारा चुनावों का मुँह देखा. यही वह स्थिति थी जबकि लोकसभा 2014 के बाद से बनी मोदी लहर और मोदी-विरोधी लहर का देशव्यापी रूप देखने को मिला. दिल्ली विधानसभा 2015 चुनाव परिणाम सोचने वाले थे, शोध करने वाले थे मगर किसी ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया. सोचने वाली बात है कि आआपा या फिर अरविन्द केजरीवाल ने महज 49 दिन में ऐसे कौन से काम कर डाले थे कि महज 28 सीटें जीतने वाली आआपा ने इन चुनावों में 63 सीटें हासिल कीं? यह भी सोचने वाली बात है कि जिस भाजपा की स्थिति कांग्रेस या शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुरी नहीं रही, उसने महज 49 दिन में ऐसे कौन-कौन से गलत कदम उठा लिए कि उसे मात्र तीन सीट पर सिमटना पड़ा?

इन सभी सवालों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी इसलिए अनदेखा कर दिया गया क्योंकि भाजपा-विरोधी मानसिकता के आगे और कुछ देखना ही नहीं था. 2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आआपा को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस ने 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2015 के चुनावों में दो सीटों, मंगोलपुरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत प्राप्त किये. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत से सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही है. यदि इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा की सीटें देखें तो भाजपा ने महज 17 सीटों पर 2013 के मुकाबले 2015 में कम मत हासिल किये. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज एक संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?

इस तरह के मतों को देखकर विश्लेषण करने वाला, सांख्यिकी सम्बन्धी आँकड़ों से खेलने वाला कोई भी विद्यार्थी प्रथम दृष्टया ही बता सकता है कि ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का है. मतदाताओं का एक दल से दूसरे दल की तरफ, एक प्रत्याशी से दूसरे प्रत्याशी की तरफ ‘स्विंग’ कर जाना कोई नई घटना नहीं थी मगर समूची विधानसभा के मतदाताओं का ‘स्विंग’ कर जाना साधारण घटना नहीं है. कोई भी साधारण से साधारण विश्लेषक इसे खेल कहने का दुस्साहस कर सकेगा क्योंकि ये मामला 2015 विधानसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहा. भाजपा या कहें कि मोदी विरोधियों ने अपने कदम से और मतदाताओं के रुझान से इसका एहसास कर लिया कि अन्ना आन्दोलन के समय मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में आआपा को कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे.   

इस खेल में किसी भी तरह की कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की जाने लगी. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध बनाये रखा गया. समूची दिल्ली में केन्द्र सरकार के विरोध के बहाने मोदी को हराने की कोशिशें चलती रहीं. आम आदमी पार्टी के कामों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाने लगा. चुनावों में स्थिति कुछ और ही बनती, यदि परदे के पीछे की सांठ-गांठ जमीन पर न उतरती. शाहीन बाग का विरोध इसी का परिणाम कहा जा सकता है. इन सबके बाद भी विधानसभा 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी जीतने के बाद भी अपना पिछला कारनामा करने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार वह मात्र 35 सीटों पर ही ज्यादा मत प्राप्त कर सकी. भाजपा को 2015 के मुकाबले  57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुए, उनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास में सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी. 

आआपा की बढ़ती सीटों के पीछे भाजपा की कार्यप्रणाली, उसके नेतृत्व की स्थितियां भी प्रभावी होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी चर्चा किये बिना, परिणामों के आपसी सह-सम्बन्ध को परखे बिना आआपा को कांग्रेस का विकल्प बता देना अभी जल्दबाजी होगी. आआपा विशुद्ध रूप से कांग्रेस की टीम बी के रूप में देखी जा सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस चुनावों में पराजित हुई है वहाँ उसके द्वारा ईवीएम पर ऊँगली उठाई गई, केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये गए लेकिन दिल्ली के दो विधानसभा चुनावों में शून्य सीटें लाने के बाद भी उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया. कांग्रेस का विरोध करके जमीन बनाने वाली आम आदमी पार्टी को पहली बार में ही समर्थन देकर सरकार बनवाना, एक भी सीटें न मिलने के बाद भी ईवीएम पर हो-हल्ला न मचाना, एकाएक कांग्रेस के मतों में जबरदस्त गिरावट आना और उसी अनुपात में आम आदमी पार्टी के मतों का बढ़ना इसे कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि अवसरवादी राजनीति सिद्ध करता है.

15 फ़रवरी 2020

कांग्रेस की टीम बी है आआपा?

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों के आने के बाद खूब बमचक मची हुई है. कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ बता रहा है. कुछ लोगों को यह सुनकर बुरा लग रहा है कि आम आदमी पार्टी को हमने कांग्रेस की टीम बी कह दिया. यह सही है. इसे एकबारगी चुनाव में मिले मतों के आधार पर खुद ही देख लीजिये. बहुत सी बातों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी इसलिए अनदेखा कर दिया गया क्योंकि भाजपा-विरोधी मानसिकता के आगे और कुछ देखना ही नहीं था. जिस सच को देखकर भी अनदेखा किया गया यदि वह सामने लाया जाता तो आआपा के कार्यों को आधार मिलना मुश्किल होता.

2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आआपा को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस ने 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2015 के चुनावों में दो सीटों, मंगोल पूरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत प्राप्त किये. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत से सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही है. यदि इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा की सीटें देखें तो भाजपा ने महज 17 सीटों पर 2013 के मुकाबले 2015 में कम मत हासिल किये अर्थात उसे 53 सीटों पर पिछले चुनाव के मुकाबले अधिक मत मिले. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज एक संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?


इस तरह के मतों को देखकर विश्लेषण करने वाला, सांख्यिकी सम्बन्धी आँकड़ों से खेलने वाला कोई भी विद्यार्थी प्रथम दृष्टया ही बता सकता है कि ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का है. कोई भी साधारण से साधारण विश्लेषक इसे खेल कहने का दुस्साहस कर सकेगा क्योंकि ये मामला 2015 विधानसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहा. भाजपा या कहें कि मोदी विरोधियों ने अपने कदम से और मतदाताओं के रुझान से इसका एहसास कर लिया कि आआपा को अन्ना आन्दोलन के समय मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे.  

परदे के पीछे चलने वाले खेल में कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की जाने लगी. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध बनाये रखा गया. समूची दिल्ली में केन्द्र सरकार के विरोध के बहाने मोदी को हराने की कोशिशें चलती रहीं. आम आदमी पार्टी के कामों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाने लगा. चुनावों में स्थिति कुछ और ही बनती, यदि परदे के पीछे की सांठ-गांठ जमीन पर न उतरती. मतदाता किसी न किसी रूप में भाजपा के पक्ष में अपना मन बना चुके थे मगर शाहीन बाग का विरोध कहीं न कहीं मतदाताओं को भाजपा के, मोदी के खिलाफ करने की साजिश रचता नजर आया. इन सबके बाद भी विधानसभा 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी जीतने के बाद भी अपना पिछला कारनामा करने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार वह मात्र 35 पर ही ज्यादा मत प्राप्त कर सकी. भाजपा को 2015 के मुकाबले  57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुए, उनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास में सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी.

15 फ़रवरी 2015

लोकतान्त्रिक मूल्यों की बात करने वाले लोकतंत्र ही बचाए रहें, बस

दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त करने वाली आम आदमी पार्टी सहित सभी दलों और मतदाताओं को सोचने के लिए विवश किया है. प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता पर दोबारा आसीन होने वाली आम आदमी पार्टी ने निःसंदेह सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन किया है. इसके साथ ही दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों - भाजपा और कांग्रेस - ने अपना निकृष्ट दर्शाया है. 70 सीटों की दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी ने जहाँ 67 सीटों पर विजय प्राप्त की वहीं भाजपा को मात्र 03 सीटों पर ही विजय प्राप्त हुई और कांग्रेस सहित अन्य दलों को एक भी सीट प्राप्त नहीं हुई. 
.
अप्रत्याशित चुनाव परिणामों के बाद जहाँ एक तरफ आम आदमी पार्टी द्वारा मुफ्त बिजली, पानी, वाई-फाई आदि के साथ-साथ मुस्लिम तुष्टिकरण की चर्चा हुई वहीं भाजपा द्वारा आखिरी महत्त्वपूर्ण समय में किरण बेदी को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बना कर उतारना, दूसरे दलों से भाग-भाग कर आये लोगों को टिकट देना, नकारात्मक चुनाव प्रचार करना आदि चर्चा का विषय बना. ये सत्य है कि आम आदमी पार्टी ने मतदाताओं को मुफ्त का स्वप्न दिखाते हुए अपने आपको आगे लाने का काम किया (ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि चुनाव परिणाम वाले दिन दिल्ली के मतदाता 'बिजली-पानी माफ़, भाजपा साफ़' जैसे नारे लगाते देखे गए) वहीं भाजपा ने जमीनी स्तर पर काम न कर पाने का खामियाजा भुगता. 
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भाजपा को लेकर ये भी आलोचना का बिंदु रहा कि उसको भितरघात का शिकार होना पड़ा. यदि ठीक एक वर्ष पूर्व हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों पर निगाह डालें तो मात्र 18 सीटों पर भाजपा को पिछले मतों के मुकाबले कम मत मिले (कहीं-कहीं तो मतों का अंतर नगण्य सापेक्ष है). इसका सीधा सा अर्थ है कि भाजपा को अपने मत तो मिले किन्तु वह नए मतदाताओं को अपने पक्ष में मतदान करवाने में असफल रही. इसको इस कारण से समझा जा सकता है क्योंकि आम आदमी पार्टी ने लगभग सभी सीटों पर पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार अधिक मतों को प्राप्त किया. इसके पीछे कांग्रेस और अन्य दलों के मतों का आम आदमी पार्टी की तरफ मुड़ना कहा जा सकता है. 70 सीटों में से मात्र 02 सीटों पर कांग्रेस को पिछले चुनाव के मुकाबले अधिक मत प्राप्त हुए हैं शेष 68 सीटों पर पिछले मतों के मुकाबले बहुत कम मत प्राप्त हुए हैं. (इसे नीचे दी गई तालिका से देखा-समझा जा सकता है) 
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मतदाताओं के स्तर पर ये समझने की जरूरत है कि महज 49 दिन में आम आदमी पार्टी ने ऐसा कोई कारनामा नहीं किया था कि उसके पक्ष में मतदान इतना अधिक रहा. जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने मुफ्त का वादा किया, जिस तरह से मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने का काम किया गया वो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में पुनः समझने की विषय-वस्तु है. कांग्रेस के मतदाताओं का आम आदमी पार्टी की तरफ मुड़ना भी एक तरह की कहानी कहता है. बहरहाल दिल्ली में अब आम आदमी पार्टी की सरकार है वो भी प्रचंड बहुमत के साथ. देखना अब ये है कि जिस राजनैतिक व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर ये लोग राजनीति में उतरे थे उसके आरम्भ में ही मुफ्तखोरी का वादा, मुस्लिम तुष्टिकरण जैसे कदमों के बाद खुद को कहाँ से और किस तरह से अलग साबित कर पायेंगे? राजनीति के आरंभिक कदम आम आदमी पार्टी को किसी भी दूसरे दल से कहीं से भी अलग नहीं दर्शाते हैं, बस लोकतान्त्रिक मूल्यों की बात करने वाले लोकतांत्रिक व्यवस्था को, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ही बचाए रहें यही बहुत बड़ी बात होगी दिल्ली के लिए.  


 
SN
Seat
AAP
2013
AAP
2015
BJP
2013
BJP
2015
Cong
2013
Cong
2015
1
ADARSHNAGAR
26929
54026
36985
33285
25554
15341
2
AMBEDKAR NAGAR
36239
66632
24569
24172
19753
5336
3
BABARPUR
25723
75928
34180
40440
29673
9916
4
BADARPUR
20833
94242
45344
46659
31490
18930
5
BADALI
31098
72795
31263
28238
54372
37419
6
BALLIMARAN
13103
57118
24012
23241
32105
13205
7
BAWANA
42768
109259
68407
59236
42054
14846
8
BIJWASAN
33574
65006
35988
45470
18173
5258
9
BURARI
60164
124724
49813
56774
31649
6750
10
CHANDNI CHOWK
15312
36756
18092
18469
26335
17930
11
CHHATARPUR
22285
67645
49975
45405
33851
9339
12
DELHI CANTT
26124
40133
25769
28935
11988
7087
13
DEOLI
51646
96530
34538
32593
26140
4968
14
DWARKA
37537
79729
42734
40363
23487
12532
15
GANDHI NAGAR
16546
50946
31936
43464
48897
16228
16
GHONDA
23621
60906
47531
52813
35599
18892
17
GOKALPUR
29633
71240
34888
39272
15902
3344
18
GREATER KAILASH
43097
57589
30005
43006
19714
6102
19
HARI NAGAR
38912
65814
30036*
39318
23111
6221
20
JANAKPURI
40242
71802
42886
46222
17191
4699
21
JANGPURA
29701
43927
18978
23477
27957
22662
22
KALKAJI
28639
55104
30683
35335
25787
13552
23
KARWAL NAGAR
46179
101865
49262
57434
20950
5362
24
KAROL BAGH
35818
67429
34068
34549
29358
9144
25
KASTURBA NAGAR
33609
50766
28935
34870
24227
11233
26
KIRARI
23757
97727
72283
52555
18515
2086
27
KONDLI
36863
63185
29373
38426
24730
13562
28
KRISHNA NAGAR
17498
65919
69222
63642
26072
6189
29
LAKSHMI NAGAR
43052
58229
33849
53383
35300
23627
30
MADIPUR
36393
66571
35290
37184
25545
10350
31
MALVIY NAGAR
32258
51196
24486
35299
20500
5555
32
MANGOL PURI
44383
60534
31232
27889
33798
37835
33
MATIA MAHAL
18668
47584
6061
9105
19841
21488
34
MATIALA
66051
127665
70053
80661
48358
20284
35
MAHRAULI
32917
58125
37481
41174
21494
12065
36
MODEL TOWN
38492
54628
30617
37922
23983
8992
37
MOTI NAGAR
26578
60223
42599
45002
25393
6111
38
MUNDKA
23872
94206
45430
53380
19157
13446
39
MUSTAFABAD
19759
49791
54354
58388
56250
52357
40
NAFAZGARH
22798
55598
54358
39462
10633
8180
41
NANGLOI JAT
25743
83259
57449
46235
46434
15756
42
NERELA
24031
96143
54622
55851
26311
4643
43
NEW DELHI
44269
57213
17952
25630
18405
4781
44
OKHLA
23459
104271
23358
39739
50004
20135
45
PALAM
34461
82637
42833
51788
19531
10529
46
PATEL NAGAR
38899
68868
32637
34230
25016
10766
47
PATPADGANJ
50211
75477
38735
46716
28067
16260
48
RKPURAM
27691
54645
28017
35577
19679
4042
49
RAJINDER NAGAR
33917
61354
35713
41303
20817
8971
50
RAJAURI GARDEN
17022
54916
41721*
44880*
30713
14167
51
RITHALA
48135
93470
73961
64219
18107
5367
52
ROHINI
47890
54499
46018
59866
13954
3399
53
ROHTAS NAGAR
34973
62209
49916
54335
32156
15548
54
SADAR BAZAR
34079
67507
33283
33192
31094
16331
55
SANGAM VIHAR
24851
72131
24074
28143
16435
3423
56
SEELAM PUR
12969
57302
24724
29415
46452
23791
57
SEEMAPURI
43199
79777
24356
30956
31223
10674
58
SHAHDRA
23512
58523
45364
46792
30247
9423
59
SHAKUR BASTI
40232
51530
33170
48397
18799
4812
60
SHALIMAR BAGH
47235
62656
36584
51678
15659
3200
61
SULTANPUR MAJRA
30346
80269
15866
15830
31458
15036
62
TILAK NAGAR
34493
57180
32405
37290
19117
7303
63
TIMARPUR
39650
64477
36267
43830
32825
14642
64
TRINAGAR
34161
63012
36970
40701
24962
7939
65
TRILOKPURI
44082
74907
26397
45153
19774
4149
66
TUGLAKABAD
12465
64311
34009
30610
9781
4269
67
UTTAMNAGAR
33619
85881
48377
55462
42031
20703
68
VIKASPURI
62032
132437
61627
54772
47331
19540
69
VISHWAS NAGAR
30388
47966
44801
58124
37002
20634
70
WAZIRPUR
31732
61208
37306
39164
24750
8371
(आँकड़े निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के आधार पर)