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07 फ़रवरी 2024

हमारी परिचित का लॉन टेनिस का मैच

लॉन टेनिस तो आज भी उसी तरह से चल रहा है जैसा कि नब्बे के दशक में चला करता था, इक्का-दुक्का मैचों की अधिकता हो गई हो तो कह नहीं सकते. लॉन टेनिस के साथ-साथ एक क्रिकेट ही ऐसा खेल हुआ करता था, जिसे हम पूरी निष्ठा, ईमानदारी के साथ न केवल खेला करते थे बल्कि उन दिनों में होने वाले मैचों के बारे में पर्याप्त जानकारी रखा करते थे. यहाँ उन दिनों का तात्पर्य नब्बे के दशक से ही है. उस दौर में क्रिकेट के प्रति ये दीवानगी थी कि शायद कभी पढ़ने के लिए सुबह पाँच बजे न उठे हों मगर क्रिकेट खेलने के लिए इस समय जबरदस्त चैतन्य भाव रहता था. घर के सदस्य जाग न जाएँ इस कारण से ‘पिन ड्रॉप साइलेंस वाली अवधारणा का पूरी शिद्दत से पालन किया जाता था. 




बहरहाल, क्रिकेट के प्रति जिस कदर मुहब्बत थी, वो उसी अनुपात में घृणा में बदल गई. ये घृणा क्रिकेट मैच देखने के सन्दर्भ में है. जिस समय हैन्सी क्रोनिये और अन्य लोगों सहित मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया, उसके बाद से आज तक एक भी क्रिकेट मैच हमने नहीं देखा है. आज भले लोग कहते हैं कि सट्टाबाज़ी करना आसान नहीं रह गया है, सब तरफ से खिलाडियों पर नजर रखी जा रही है, टेक्नोलॉजी बदल गई है. हमारा आज भी पूरे विश्वास के साथ मानना है कि जिस तरह से क्रिकेट खेलने का अंदाज बदला है, उसी तरह से सट्टे का भी अंदाज बदला है. जिस तकनीक ने क्रिकेट को बदल दिया है तो वही तकनीक सट्टे को नहीं बदल सकती?


क्रिकेट की दीवानगी की तरह उस समय लॉन टेनिस के प्रति भी दीवानगी हुआ करती थी. इस दीवानगी के लिए सिर्फ और सिर्फ दो-तीन खिलाडी ही जिम्मेवार हुआ करते थे. इनमें एक खिलाडी स्टेफी ग्राफ, दूसरी खिलाडी गैबरीला सबातीनी, एक आंद्रे अगासी. उन दिनों, जबकि हम हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे तब भी कोशिश होती थी कि इन खिलाड़ियों का कोई मैच न छूटने पाए. उस समय एक कोई मैच स्टेफी ग्राफ का था, शायद कोई फाइनल मैच था. हॉस्टल का टीवी ख़राब पड़ा हुआ था, इस कारण वहाँ मैच देख पाना संभव नहीं था. आज के हजारों हजार चैनल के बीच यह आश्चर्य का विषय ही है मगर उन दिनों कुछ-कुछ मैचों का प्रसारण हुआ करता था. फिलहाल, हॉस्टल के टीवी पर तो स्टेफी ग्राफ के मैच के दर्शन होने न थे तो उसी शहर में रह रहे अपने चाचा जी के घर पहुँच गए. बात की बात में चाची ने कुछ कहा तो हमने कहा कि हमारी परिचित का मैच है, वही देखने आये हैं. इसके बाद तो न केवल चाची जी बल्कि हम भी जबरदस्त ठहाके लगा-लगा के दोहरे हो गए.




आज भी कभी-कभी समय निकाल कर लॉन टेनिस के मैच देख लेते हैं. नए-नए खिलाडियों ने तो मैचों का अंदाज बदल रखा है मगर उस दौर के खिलाड़ियों का अपना ही क्रेज था. संभव है कि आज की जबरदस्त फास्ट पीढ़ी को वे मैच कुछ स्लो समझ आएँ मगर हम तो इंटरनेट की सहायता से कभी-कभी उन मैचों को देखकर रोमांचित हो लेते हैं. आखिर हमारी परिचित के मैच जो होते हैं वे. 








 

19 नवंबर 2023

क्रिकेट को लेकर दिमागी उलझन न पालें

पिछले कई दिनों से बहुसंख्यक भारतीय जनमानस पर चढ़ा क्रिकेट बुखार बिना किसी दवाई के आज उतर गया. विश्वकप के इस फाइनल में यदि भारतीय क्रिकेट टीम की जीत होती तो यह बुखार सिर चढ़कर बहुत दिनों तक समूचे भारत को पागल किये रहता. इस पागलपन से बचने का हाल-फिलहाल तो कोई उपाय नजर आता नहीं है क्योंकि अब वो समय नहीं रहा जबकि क्रिकेट के मैच यदा-कदा हुआ करते थे. अब तो हर दूसरे-चौथे दिन किसी न किसी प्रतियोगिता का आयोजन होता रहता है और लगभग पूरे साल क्रिकेट का पागलपन, बुखार बहुतायत लोगों के सिर चढ़कर बोलता है. इस बुखार में एक जीत जहाँ खिलाड़ी को भगवान बना देती है वहीं अगले ही दिन एक हार उसी खिलाड़ी को राक्षस भी बनाती है. ऐसी स्थिति को सिवाय पागलपन के और कुछ नहीं कहा जा सकता है.




क्रिकेट के इस पागलपन के दौर में एक बात समझने लायक है और जिसे कोई भी क्रिकेट-प्रेमी समझने को तैयार नहीं होता कि क्रिकेट अब महज खेल नहीं रह गया है. क्रिकेट को समझने के लिए उसके गणित को समझना होगा. जिस तरह दस तक पहाड़ा याद कर लेने वाले को, सौ तक की गिनती याद कर लेने वाले को गणितज्ञ नहीं कहा जाता, उसी तरह क्रिकेट के मैच देखने वाले को क्रिकेट का महारथी नहीं कहा जा सकता. आप में से कितने इस तथ्य को जानते हैं कि भारतीय क्रिकेट टीम भारत देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती है? यह तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत दिसम्बर 1928 में गठित एवं पंजीकृत निकाय (ट्रस्ट) है. सो कम से कम किसी एक ट्रस्ट को देश के नाम से, उसकी प्रतिष्ठा से न जोड़ें.


आये दिन किसी न किसी खिलाड़ी के देवत्व को स्थापित करते हुए बताया जाता है कि उस खिलाड़ी के अति-निकट परिजन की मृत्यु के बाद भी वो देश के लिए मैच खेलने आया. एक बात समझिये, जो टीम ही देश की नहीं बल्कि एक ट्रस्ट की है उसका कोई खिलाड़ी देश के लिए कैसे खेलने आ सकता है? वह देश के लिए नहीं बल्कि उस ट्रस्ट के लिए खेलने आता है. दूसरी बात, वह किसी देश भावना से नहीं बल्कि ट्रस्ट के साथ हुए समझौते, विज्ञापन कंपनियों के साथ हुए करारनामे के बंधन में जकड़े होने के कारण खेलने आता है. एक अनुबंध के बाद करोड़ों की कमाई करने वाले खिलाड़ी का एक मैच न खेलना उसे आर्थिक चोट ही नहीं पहुँचायेगा बल्कि उसके कैरियर को भी बर्बाद कर देगा. (इसे कपोलकल्पना न मानिये. इसी विश्वकप की एक टीम श्रीलंका को ICC ने निलंबित कर दिया है. जानते हैं क्यों? नहीं जानते तो गूगल पर सर्च कर लीजिये, हाल का मामला है, पूरा का पूरा दिया गया है.) जहाँ पूरी की पूरी टीम का कैरियर ख़राब कर दिया गया है वहाँ एक अकेले व्यक्ति/खिलाड़ी की क्या औकात


और भी बहुत सी बातें हैं मगर बुखार उतरने के बाद आराम करने की आवश्यकता होती है, सो आराम करिए. इसी आराम की घड़ी में अपने परिवार के बच्चों को समझाइये कि ये महज खेल है जहाँ एक सट्टे में, एक विज्ञापन में महान से महान खिलाड़ी बिक जाता है. इसी क्रिकेट के तथाकथित भगवान और उनके कथित अवतार भी इस सट्टे के सामने घुटने टेक चुके हैं. इस क्रिकेट का या किसी भी खेल का उसी तरह आनंद लें जैसे कि किसी फिल्म का लेते हैं, गली-मोहल्ले में खेलते बच्चों के साथ लेते हैं. अनावश्यक दिमागी उलझन लेंगे तो आप नहीं आपके परिवार के बच्चों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा. लिख लीजिये इस बात को. 





 

05 दिसंबर 2021

अपने अन्दर के खिलाड़ी को चहकते, उल्लासित होते देखा

जनपद जालौन रचनात्मकता में सदैव आगे रहा है. किसी न किसी रूप में यहाँ की रचनात्मकता सभी आयु वर्ग के माध्यम से चारों तरफ बिखरती रहती है. संस्कृति, साहित्य, कला, संगीत, लेखन, अध्यापन, अध्ययन, पत्रकारिता, खेलकूद, राजनीति, समाज सेवा, व्यापार आदि कोई भी क्षेत्र क्यों न रहा हो यहाँ के सभी नागरिकों ने उसमें रचनात्मकता का परिचय दिया है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इस रचनात्मकता में बुजुर्ग आगे रहते हैं या फिर युवा. ये भी नहीं कहा जा सकता कि महिलाएँ आगे हैं या फिर पुरुष. इस बारे में भी कोई निश्चित मानदंड नहीं कि शहरी क्षेत्र के नागरिक आगे रहते हैं या फिर ग्रामीण क्षेत्र के. जनपद की किसी एक तहसील अथवा किसी एक स्थान को ही इसमें महारथ हासिल नहीं बल्कि जब जिसको अवसर मिलता है वह रचनात्मकता को प्रदर्शित कर देता है.


बहुत लम्बी समयावधि बाद ऐसा हुआ होगा जबकि लगभग दो वर्ष का समय बिना किसी सकारात्मक अभिव्यक्ति के गुजर गया. इसके पीछे एक तरफ कोरोना काल के समय लगाया गया लॉकडाउन तो था ही, दूसरी तरफ नागरिकों की सुरक्षा भी सर्वोच्च पायदान पर थी. हालाँकि देखा जाये तो इस कोरोना काल में भले ही साहित्यिक अथवा सांस्कृतिक रचनात्मकता देखने को न मिली हो मगर सामाजिक क्षेत्र में व्यापक रूप से सकारात्मकता देखने को मिली. बहरहाल, लम्बी समयावधि पश्चात् जनपद के एक सक्रिय युवा ने रचनात्मकता को सामने लाने की पहल की. इस पहल को आरम्भ में कुछ राजनैतिक रास्तों से गुजरना भले पड़ा हो मगर इस रचनात्मक पहल के द्वारा जनपद के युवा खिलाड़ियों में उत्साह देखने को मिल रहा है.




जनपद के सक्रिय युवा सुदामा दीक्षित द्वारा कालपी तहसील के अंतर्गत आटा कस्बे में ‘कालपी प्रीमियर लीग के द्वारा क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन किया जा रहा है. इस लीग में दिन के साथ-साथ रात को कृत्रिम दूधिया रौशनी में भी क्रिकेट मैचों का आयोजन किया जा रहा है. लगभग तीन सौ से अधिक क्रिकेट टीमों ने इसमें भाग लिया है. विशालकाय मैदान के बाहर चार बड़े-बड़े पोल के द्वारा आधिकारिक तरीके से फ्लड लाइट की स्थायी व्यवस्था करवाई गई है.





आज दिनांक, 05 दिसम्बर को हमें भी अपनी बिटिया अक्षयांशी के साथ इन मैचों को देखने का अवसर मिला. सोशल मीडिया के द्वारा इस आयोजन के बारे में वीडियो, चित्र आदि देखने को मिल जाते थे, उससे इसकी भव्यता के बारे में अंदाजा लग रहा था. आज जब स्वयं इसमें उपस्थित होकर देखा तो इस रचनात्मकता पर सुखद एहसास हुआ. एक मैच के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को सम्मानित करने का अवसर मिला. दूसरे मैच के लिए सहभागिता करने आई टीम के खिलाड़ियों को लीग से सम्बंधित ड्रेस प्रदान करने का मौका भी मिला. इसी के साथ-साथ बिटिया रानी को कृत्रिम दूधिया रौशनी में आरम्भ होने वाले एक मैच के लिए टॉस करने का अवसर देकर उसे भी खेल के प्रति, खिलाड़ियों के प्रति प्रोत्साहित किया गया. इस आयोजन में आज सहभागिता करके अपने कॉलेज के दिन याद आ गए. अपने अन्दर के खिलाड़ी को आज फिर चहकते, उल्लासित होते देखा. 


जनपद के एक छोटे से कस्बे में बड़ी सी रचनात्मकता सुखद माहौल में आगे बढ़ रही है. आसपास के ग्रामीण अंचलों के खिलाड़ियों में ऊर्जा भर रही है, उनको खेल के प्रति प्रोत्साहित कर रही है. इस आयोजन, कालपी प्रीमियर लीग (के.पी.एल.) के लिए सुदामा दीक्षित सहित उनके सभी सहयोगियों को शुभकामना, बधाई. 





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04 जून 2017

तोहफे में जीत न दे आना उनको

पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की कवायद तबसे चलनी शुरू हो गई थी, जबसे उसका जन्म हुआ था. आये दिन किसी न किसी कदम के द्वारा ऐसा होता दिखता है. सम्बन्ध सुधार के दौर में पाकिस्तान की तरफ से बारम्बार इसको बाधित करने का उपक्रम भी चलाया जाता रहा है. एक तरह शांति-वार्ताएं चलती हैं तो दूसरी तरफ अशांति की हरकतें की जाने लगती हैं. पाकिस्तान का अपना इतिहास रहा है नित्य ही भारत के लिए समस्याएँ पैदा करने का. कभी युद्ध के द्वारा, कभी घुसपैठ के द्वारा, कभी आतंकी हमलों के द्वारा, कभी संयुक्त राष्ट्र में बेवजह कश्मीर के मुद्दे को उठाने के द्वारा.


पाकिस्तान की बात ही क्या की जाये, यदि अपने देश के इन नेताओं की, जिम्मेवार लोगों की ही बात की जाये तो ताजा घटनाक्रम में ही भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच को ही लिया जा सकता है. दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध सहज हों, मधुर हों इसको स्वीकार करने वाले पर्याप्त संख्या में हमारे देश में मौजूद हैं. इसके साथ ही ऐसे लोग भी बहुत हैं जो खेलों के द्वारा, सांस्कृतिक वातावरण के द्वारा, साहित्य-कला के द्वारा दोनों देशों के संबंधों-रिश्तों को सुधारने की वकालत करते हैं. हालाँकि समस्त देशवासी ऐसा शत-प्रतिशत रूप से नहीं स्वीकारते हैं. बहुत से नागरिकों ने दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैच का एकसुर से विरोध किया है. सोचने की बात है कि एक तरफ देश में सैनिकों के साथ-साथ अनेक मासूम, निर्दोष नागरिकों को पाकिस्तानी आतंक के चलते अपनी जान गँवानी पड़ रही है वहीं दूसरी तरफ सम्बन्ध सुधारने की कवायद में मगन रहने वाले मैच खेलने में लगे हुए हैं. ये अत्यंत शर्मनाक स्थिति तो है ही साथ ही अत्यंत अपमानजनक भी है. ये अपमान उन तमाम शहीदों का है जो आतंकी हमले का शिकार हुए; ये अपमान उन सैनिकों का है जो आये दिन सीमा पर पाकिस्तानी आतंकियों का, पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का सामना करते हैं.

आज सम्पूर्ण विश्व इस बात को स्वीकारने लगा है कि भारत देश में आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है और इससे भी कोई इंकार नहीं करता है कि भारतीय सेना महज इस कारण खामोश रही है कि हमारे देश की सरकारों ने सदैव शांति-वार्ताओं के द्वारा हल निकालना चाहा है. सेना की ख़ामोशी को कमजोरी समझने की भूल न तो पाकिस्तान को करनी चाहिए और न ही भारत में बैठे पाकिस्तान-प्रेमियों को ऐसा करने की छूट है. क्रिकेट हो या फिर कोई और मसला सभी में देश की अखंडता का, देश की सेना के मनोबल का, देशवासियों की भावनाओं का सम्मान किया जाना अनिवार्य होना चाहिए.


अंत में अपनी बात क्योंकि मैच तो रद्द होने से रहा. क्रिकेट का स्व-घोषित महामुकाबला होने वाला है. बहरहाल मैच का परिणाम कुछ भी हो, हमें एक बात का विशेष ध्यान रखना है कि जीतने अथवा हारने वाला देश नहीं होगा बल्कि किसी देश की क्रिकेट टीम जीतेगी और किसी देश की टीम मैच हारेगी. यह सुनना स्वयं में कितना खराब लगता है कि भारत हारा. हालांकि इस तरह की गलती स्वयं हमसे भी हो जाती है पर हमें ही इस बात का ध्यान रखना है कि गलती बार-बार न हो. आप स्वयं देखिये कई बार हमारी टीम बहुत बुरी तरह से हारी है तो मीडिया ने लिख दिया कि फलां देश ने भारत को बुरी तरह से रौंदा. हमारी क्रिकेट टीम हार सकती है, जीत भी सकती है पर हमारा देश भारत कभी नहीं हार सकता, उसे तो बस जीतना है और जीतना ही है.


एक अन्तिम बात कि हमें तो डर लग रहा है कि कहीं पाकिस्तान से दोस्ती दिखाने के चक्कर में हमारी टीम उनको जीत का तोहफा न दे डाले. दोनों देशों के इतने बड़े-बड़े हुक्मरान बैठे होंगे और हमारे देश में वैसे भी पाकिस्तान के सम्बन्ध में बहुत ही कोमल दिल रहता है. कहीं इसी कोमलता के, सहिष्णुता के दर्शन मैच में न हो जायें?

15 जुलाई 2015

क्रिकेट अब सटोरियों का खेल


क्रिकेट का खेल अब धन का खेल बन चुका है, विवादों का, घोटालों का, भ्रष्टाचार का खेल बन चुका है. ऐसा कोई एक-दो उदाहरणों से नहीं वरन आये दिन होते नए-नए खुलासों से स्पष्ट होता रहा है. कभी क्रिकेट खेलने और देखने के परम शौकीनों में शामिल माने जाने वालों में हम भी रहे और एकाएक उस समय क्रिकेट से मोहभंग हुआ जब मैच फिक्सिंग का एक मामला अज़हरुद्दीन, हैंसी क्रोनिये आदि के रूप में सामने आया. तबसे क्रिकेट देखना पूरी तरह से बंद, हाँ, कभी-कभी खुद खेलने की दृष्टि से खेलते रहे. व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए वो खबर अपने आपमें भीतर तक हिला देने वाली थी. उसके मूल में ऐसा नहीं था कि हमारा किसी तरह का धन सम्बंधित मामले में लगा हुआ था या फिर हमारी संलिप्तता किसी भी रूप में उस मामले में थी. ऐसा होना इस कारण हुआ क्योंकि खेल को खेल की भावना का नाम देकर भी, भद्रजनों के खेल के रूप में परिभाषित खेल को भी खिलाड़ियों के द्वारा ही कलंकित किया गया था. भावनाएं इस कारण से भी आहत हुईं थी क्योंकि एक तरफ हम निस्वार्थ भाव से इन  खिलाड़ियों के पक्ष में चिल्लाते, नारे लगाते खेल को खेल की भावना से देखते, उसका आनंद उठाते, देश की जीत पर सारा आसमान सिर पर उठा लेते और हारने पर दुःख के सागर में गोते लगाने लगते और दूसरी तरफ ये खिलाड़ी बिना दर्शकों की, प्रशंसकों की भावनाओं का ख्याल रखे अपनी झोली भरने में लगे हुए थे. खेल के सहारे अपनी धनलोलुपता को पूरा करने की रही सही मानसिकता को आईपीएल ने पूरा कर दिया.
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अपने आरम्भ से ही आईपीएल में किसी न किसी तरह का विवाद सामने आता रहा है और अब पुनः आईपीएल विवादों के घेरे में है. टीमों को, खिलाड़ियों को, उनके मालिकों आदि को लेकर उठते विवादों के बीच हर बार सवाल यही आता है कि क्या इन खिलाड़ियों के लिए खेल से बढ़कर सिर्फ पैसा हो गया है? यदि ऐसा है तो ये कहीं न कहीं उन करोड़ों प्रशंसकों के साथ विश्वासघात है जो इन खिलाड़ियों को भगवान सा दर्ज़ा देते हैं; अपने समय, धन की परवाह न करते हुए इनकी हौसलाअफजाई करने में दिन-रात एक कर देते हैं. ये अपने आपमें आश्चर्य का विषय है कि समूचे विश्व में चंद देशों में खेले जाने वाले इस खेल में इतना धन आखिर आता कहाँ से है? भद्रजनों का खेल कहे जाने वाले इस खेल में सट्टेबाजी का खेल कब और कैसे शुरू हो गया? देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ी किस लालच में सट्टेबाजों के हाथों में खेलने लगे? किसी भी मैच में मैदान में अपना पसीना बहाकर जीत-हार तय करने वाले खिलाड़ियों का स्थान कब बुकियों ने ले लिया? इन सबके बीच मालामाल खिलाड़ी होने लगे, बुकी होने लगे, सट्टेबाज़ होने लगे खाली हाथ रहे तो बस वे दर्शक जो नितांत निस्वार्थ भाव से चिल्लाते हुए, शोर मचाते हुए मैच देखने में मगन रहे. हालाँकि मैच फिक्सिंग का मामला उस समय सामने आया था जबकि आईपीएल का कहीं नामोनिशान भी नहीं था तथापि क्रिकेट के इस संस्करण ने मैच फिक्सिंग के बजाय सट्टेबाजी को उभारने में अपनी भूमिका निभाई है.
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ऐसे में जबकि संभ्रांत माने जाने वाले खेल में अब विवादों का, सट्टेबाजी का साया पूरी तरह से स्पष्ट दिखने लगा है, तब क्रिकेट प्रशंसकों की अपेक्षा यही होनी चाहिए कि दोषियों पर कठोर कार्यवाही हो. ये भी किसी बड़े अपराध से कम नहीं है कि खिलाड़ी, टीम प्रबंधक सट्टेबाजों से मिलकर खेल में अपना खेल चालू रखते हुए दर्शकों की, प्रशंसकों की भावनाओं से खिलवाड़ करें. ये और बात है कि इतने विवादों के बाद भी, आईपीएल जैसे संस्करण को देश में लाने वाले ललित मोदी के विवादित होने के बाद भी, कई-कई खिलाड़ियों की संलिप्तता के बाद भी, टीम-प्रबंधकों की मिलीभगत के बाद भी दर्शकों, क्रिकेट प्रशंसकों के सिर से इसका बुखार उतरा नहीं है. वे अभी भी खिलाड़ियों को भगवान मानकर उन्हें सर्वोच्च स्थान दिए हैं, वे अभी भी मैच को लेकर अपनी दीवानगी की हद तक जाने को तैयार रहते हैं, वे अभी भी अपने समय-धन का अपव्यय करके सट्टेबाजों द्वारा निर्धारित खेल का हिस्सा बनने को तैयार रहते हैं. बावजूद इसके संजय मांजरेकर की टिप्पणी कि ‘क्रिकेट में प्रशंसकों का भरोसा कायम रखने के लिए जो कुछ किये जाने की जरूरत हो वो किया जाना चाहिए’ और पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी का कहना कि ‘जस्टिस मुदगल कमेटी के निष्कर्षों के बाद लोढ़ा कमेटी ताज़ा हवा का झोंका है’ अपने आपमें क्रिकेट के, आईपीएल के अंधकारमय, दुर्भाग्यपूर्ण, निराशाजनक माहौल में एक तरह की आश्वस्ति सी जगाते हैं. शायद क्रिकेट और क्रिकेट के तमाम संस्करण, खिलाडी, टीम प्रबंधन सट्टेबाजों के हाथों की कठपुतली बनने से बच कर प्रशंसकों में नए उत्साह का संचार कर सकें.

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11 अक्टूबर 2013

हाय सचिन, तुम बड़ी जल्दी चले गए, हमें छोड़ के




हाय सचिन! (हाय-हाय नहीं कहा है...)
हाँ तो, हाय सचिन! तुम इतनी जल्दी चले गए, हमें छोड़ के...(छोड़ने का गलत अर्थ न लगिएगा..). अभी कुछ दिन तो और रुकना था...हमारे लिए न सही तो अपने रिकॉर्ड के लिए ही रुक लेते (हमारे लिए तो वैसे तुम अब मैदान में रुक ही नहीं पा रहे थे) अभी तो टीम-प्रबंधन तुमको कई-कई वर्षों तक ढोने के मूड में दिख रहा था. बाहर वालों का क्या है, वे तो बकबकाते ही रहते हैं...बकबकाते रहेंगे...पर तुमको भगवान के चोले में लिपटे रहकर अभी कुछ और रिकॉर्ड के लिए रुकना था. ‘रिकॉर्ड पर मेरी नज़र नहीं रहती’ का रिकॉर्ड बार-बार बजा कर तुम अपने को महान साबित करने में लगे रहे और उम्र को बल्ले पर हावी करते रहे. यदि रिकॉर्ड पर तुम्हारी नज़र नहीं रही होती तो अपनी असल महानता के समय संन्यास की चर्चा की होती. इसके लिए भी तुम दो सौ टेस्ट की आंकड़ेबाजी में न फंसे होते. तुमको शायद लिटिल मास्टर याद होंगे, जिनके संन्यास की घोषणा पर समूचे क्रिकेट-प्रेमियों ने समवेत स्वर में उनसे वापसी की गुहार लगाई थी. याद आया....पर तुम्हारे संन्यास से बहुतों ने राहत की सांस ली होगी, कि चलो अब किसी नए को मौका मिलेगा. बार-बार तुम्हारा ही शून्य देखने को नहीं मिलेगा.
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ओ सचिन! तुम्हारे इस तन्हा-शांत-शांत से संन्यासी माहौल को देख कपिल देव का संन्यास याद आ गया. वे भी रिकॉर्ड आंकड़ेबाजी के लिए एक-एक विकेट को हाँफते-जूझते रहे और श्रीनाथ बाहर बैठे-बैठे अपनी गेंद को अपनी पेंट पर रगड़ने के साथ-साथ अपनी एडियाँ भी रगड़ते रहे. इसमें कोई शक नहीं कि तुमने हपक के अपना बल्ला चमकाया...क्रिकेट को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया...अनछुए रिकॉर्ड को छूने लायक बनाया....पर समय के साथ गेंद की चमक की तरह तुम्हारी बल्लेबाज़ी की चमक-धार चली गई थी. यदा-कदा तो भीगे कारतूस भी फट पड़ते हैं...तुम भी कुछ वैसी ही हरकतें करने लगे थे. कभी एकाएक फट पड़ते और भगवान की कुर्सी से गिरते-गिरते फिर उस पर चिपक लेते. वैसे इसमें तुम्हारा भी कोई कसूर नहीं था, ये तो विज्ञापन सम्बन्धी क्रिकेट-व्यावसायिकता कही जाएगी जो तुम्हारे गीलेपन को धूप बनकर सुखाने में लगी थी.  इसी क्रिकेट-व्यावसायिकता के चलते तुम अपने पिता की मृत्यु पर भी नहीं थमे और ये भोले-नादान-पागल क्रिकेट-प्रेमी, तुम्हारे भक्त समझते हैं कि तुम क्रिकेट के प्रति अपना समर्पण दिखाने को अपना कष्ट भुलाकर चले गए थे. वाह रे समर्पण! वाह री दीवानगी! अनुबंधों पर टिकी व्यावसायिकता की दुनिया में सम्बन्ध-कष्ट-रिश्ते-सुख कैसे हवा हो जाते हैं, ये बात ये नादान क्या जानें.
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वाह रे सचिन! तुम तो खेलते रहे, विज्ञापन करते रहे, रिकॉर्ड बनाते रहे, नोट छापते रहे और...और...और......बस. तुमने देश से सम्मान लिया, भगवान का दर्जा लिया, लाखों-करोड़ों प्रशंसक लिए, तालियों-जय-जयकारों का शोर लिया पर तुमने वापसी में क्या दिया? (चोरी-छिपे क्या किया ये तुम्हारी धरोहर है...देश की सम्पदा क्या है). तुमको महान बताया गया कि तुमने शराब के, नशीले उत्पादों के विज्ञापन नहीं किये...पर तुम्हीं वो व्यक्ति थे जिसने अपनी कार के लिए शुल्क में छूट देने की बात कही थी; वायु सेना की मानद पदवी (कैप्टन रैंक) का तुम सम्मान भी नहीं कर सके; अपने चौके-छक्के पर, एक-दो रनों पर चीखते युवाओं को देश-सेवा के लिए प्रेरित न कर सके; भ्रष्टाचार की लड़ाई में सामने न आ सके; महिलाओं-बच्चियों के साथ होते बलात्कार के विरोध में न खड़े हो सके और तो और जाते-जाते, जाने की तैयारी करते-करते आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे दल के गले लटक राज्यसभा पहुँच गए. अपनी महानता की चकाचौंध में तुम पद-लोलुपता में कैसे घिर गए...क्या यहाँ भी कोई आँकड़ा तुमको दिख रहा था; क्या यहाँ भी कोई रिकॉर्ड तुमको बनाना था?
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प्रिय सचिन! हो सकता है कि तुम्हारी हर सफलता-असफलता पर चापलूसी की हद तक उतरने वाले तुम्हारे प्रशंसकों को, मीडिया को, कमेंट्री करने वालों को अवश्य ही कुछ दिन सूना-सूना लगेगा पर तुम उदास न हो ये सब भी बहुत ही जल्द किसी और को सामने स्थापित कर लेंगे; तुम्हारे भक्त किसी दूसरे में अपना भगवान तलाश लेंगे. इस समाज को रिक्त स्थान की पूर्ति करना बहुत अच्छे से आता है और बहुत जल्दी आता है. अरे, तुम तो महज एक खेल से, खेल के मैदान से जुड़े थे, जहाँ किसी के आने या चले जाने का देश-सञ्चालन पर प्रभाव नहीं पड़ता. यहाँ तो देश ने अपने सच्चे-असली नेताओं को खोने के बाद भी खुद को जीवित बनाये रखा; अपने श्रेष्ठ राजनीतिज्ञों के अलविदा कह देने के बाद भी अपनी राजनैतिक-गतिविधियों पर विराम नहीं लगने दिया; विदेशी हमलों के बाद भी खुद को बिखरने नहीं दिया; पड़ोसी देशों की कुत्सित हरकतों के बाद भी खुद को पंगु नहीं होने दिया वो एक तुम्हारे संन्यास से रुकने वाला नहीं है. इसलिए तुम क्रिकेट के सूनेपन को लेकर उदास न होना. तुम्हारी कमाई के लिए विज्ञापन अभी भी तुम्हारे पास हैं...तुम्हारे अनुबंधों पर संन्यास का कोई असर नहीं पड़ेगा, ऐसा समाचारों में आया है. बाकी संसद-सदस्यता तुम्हारे पास है, हाथ का पंजा तुम्हारे साथ है. वैसे हमने कभी तुमको नमस्कार सचिन भी नहीं कहा इसलिए ये कहने का अधिकार नहीं बनता है, फिर भी...जी ललचाये....बिना कहे रहा न जाए...इसलिए कहे देते हैं..... अलविदा सचिन.

23 अप्रैल 2011

महिलाओं की प्रस्थिति पर विचार महिलायें भी करें


आजकल बैडमिंटन में महिला खिलाडि़यों के स्कर्ट पहनने को लेकर आये आदेश के बाद से चारों तरफ खींचातानी का माहौल है। इस तरह के आदेशों पर हो-हल्ला ही नहीं मचना चाहिए बल्कि इस तरह के आदेशों के रद्द करवाने के सम्बन्ध में बाकायदा विरोध होना चाहिए।


इस ड्रेस कोड को लेकर हंगामा हो रहा है और इस बात का भी विरोध हो रहा है कि आयोजक मानते हैं कि इससे खेल में ग्लैमर बढ़ेगा और विज्ञापनों की संख्या में भी वृद्धि होगी। जागरूक महिलाओं और इन महिलाओं के शुभचिन्तकों की ओर से इस फैसले का विरोध होना स्वाभाविक था और हुआ भी। (हमें वैसे भी इस इंटरनेट की दुनिया में महिला-विरोधी मानसिकता का बताया जाता रहा है, ऐसे में हम कितना भी इन महिलाओं के पक्ष में लिखें तो भी नतीजा वही रहता है, ढाक के तीन पात वाला)


बहरहाल, विरोध के बीच कुछ बिन्दुओं को भी देखा जाये तो इन झंडा उठाये महिलाओं को कुछ और बिन्दू भी दिखाई देने लगेंगे। स्कर्ट को पहनने का विरोध हुआ उधर आई0पी0एल0 के चैथे संस्करण में चीयर बालाओं ने अपने ठुमके मारने जारी रखे। न्यायालय के आदेश के बाद भी कपड़ों की नाप उनके पूरे शरीर की नहीं ली जा सकी। वैसे भी कितना और क्या पहनना है यह तो वही बतायेगा/निर्धारित करेगा जिसे पहनना है, इस अधिकार से प्रत्येक टीम के लिए, प्रत्येक खिलाड़ी के कारनामें पर ठुमके मारती बालायें कपड़ों की नाप का पूरा ध्यान रखे हैं।

स्कर्ट लागू करने के पीछे आयोजकों की मंशा और आई0पी0एल0 में ठुमकती बालाओं की उपस्थिति के कुतर्क के पीछे से एकसूत्र यह निकलता है कि जो कुछ हो रहा है वह खेल को ग्लैमर प्रदान करने के लिए और दर्शकों के मनोरंजन के लिए। चलिए, अच्छा है किसी ने तो खेल के साथ एक और प्रकार का मनोरंजन तो सोचा पर इस सोच में भी आयोजकों ने अपनी संकुचित सोच दिखा दी। उन्होंने महिला दर्शकों को तो भुला ही दिया। यदि खेल में स्कर्ट का पहनना, चीयर बालाओं का ठुमकना मनोरंजन है, खेल का ग्लैमर है, दर्शकों का मनोरंजन है तो यह सब महिलाओं के लिए क्यों नहीं?


इसके लिए होना यह चाहिए था कि चीयर बालाओं के साथ कुछ अधनंगे से लालाओं को भी मैदान में ठुमकना चाहिए था। होना यह भी चाहिए था कि स्कर्टनुमा कोई पोशाक पुरुष खिलाडि़यों को भी पहननी चाहिए थी। इसका अर्थ यह लगाया जाये कि


महिलायें भी महिलाओं को अर्द्धनग्न रूप में देखना पसंद करती हैं?


महिलाओं को पुरुषों को इस रूप में देखना पसंद नहीं?


मैदान पर महिलायें अपनी उपस्थिति सिर्फ देह के रूप में ही करने जाती हैं?


बाजार में अब महिलायें सिर्फ और सिर्फ उत्पाद के रूप में स्थापित हो चुकी है?


अर्थ तो बहुत से निकाले जा सकते हैं और निकलने भी चाहिए किन्तु इसके पीछे छिपे मन्तव्य को, आयोजकों की मंशा को, कम से कमतर होते जा रहे कपड़ों में बिना बात ठुमकती बालाओं के हितों को, महिलाओं की बाजार के उत्पाद में परिवर्तित होती छवि के बारे में भी विचार करना होगा। विचार महिलायें भी करें और बिना इस पूर्वाग्रह के करें कि यह पोस्ट किसी पुरुष ने लिखी है, कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने लिखी है।


दोनों चित्र गूगल छवियों से साभार

29 मार्च 2011

पाकिस्तान से दोस्ती निभाने के चक्कर में जीत का तोहफा न थमा देना उन्हें




कल विश्वकप क्रिकेट का महामुकाबला होने वाला है। इस मैच को देखने के लिए, जैसी कि खबर है हमारे देश के प्रधानमंत्री, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, हमारे देश की बड़ी पार्टी की अध्यक्ष भी वहां होंगी तो उनके बच्चे भी साथ होंगे। इसी के साथ कलाकार भी अपना जलवा दिखायेंगे, जलवा दिखाने का ही मौका मिलेगा क्योंकि जलवा तो बिखेर पाना नहीं है।



इधर लगातार हवा बनाई जा रही है कि अब मानो दोस्ती हो ही गई इन दोनों देशों में। ऐसा भी लग रहा है कि इससे पहले जैसे इन दोनों देशों को मौका ही नहीं मिल पाया था बातचीत के द्वारा या खेल के द्वारा अपने बिगड़े रिश्ते सुधारने का। अब मौका मिला है तो चूके चौहान वाली स्थिति दिखाई देने लगी है।

बहरहाल कल के मैच का परिणाम कुछ भी हो, हमें एक बात का विशेष ध्यान रखना है कि कल जीतने अथवा हारने वाला देश नहीं होगा बल्कि किसी देश की क्रिकेट टीम जीतेगी और किसी देश की टीम मैच हारेगी। यह सुनना स्वयं में कितना खराब लगता है कि भारत हारा। हालांकि इस तरह की गलती स्वयं हमसे भी हो जाती है पर हमें ही इस बात का ध्यान रखना है कि गलती बार-बार न हो।



आप
स्वयं देखिये कई बार हमारी टीम बहुत बुरी तरह से हारी है तो मीडिया ने लिख दिया कि फलां देश ने भारत को बुरी तरह से रौंदा। हमारी टीम हार सकती है, जीत भी सकती है पर हमारा देश भारत कभी नहीं हार सकता, उसे तो बस जीतना है और जीतना ही है।

एक
अन्तिम बात कि हमें तो डर लग रहा है कि कहीं कल का मैच पाकिस्तान से दोस्ती दिखाने के चक्कर में हमारी टीम उनको जीत का तोहफा दे डाले। दोनों देशों के इतने बड़े-बड़े हुक्मरान बैठे होंगे और हमारे देश में वैसे भी पाकिस्तान के सम्बन्ध में बहुत ही कोमल दिल रहता है। कहीं कल इसी कोमलता के, सहिष्णुता के दर्शन कल के मैच में हो जायें।

चलिए
, आज का मैच श्रीलंका की टीम ने जीत लिया। अब इससे एक बात तो पक्की है कि विश्वकप हमारे भारतीय उपमहाद्वीप में ही रहेगा। क्रिकेट विश्वकप में एशिया का जलवा अगले चार वर्षों तक रहेगा।

तो
फिर जोर से बोलो ‘‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल।’’

दोनों चित्र गूगल छवियों से साभार