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14 जनवरी 2026

कुछ घाव समय के साथ भी नहीं भरते

लोग कहते हैं कि समय हर तरह के घावों को भर देता है मगर हमें लगता है कि कुछ घाव समय के साथ भी नहीं भरते. ये एक दर्द है, एक घाव है जो आजीवन साथ रहेगा, ताउम्र साथ चलेगा. हर पल में दर्द देगा, हर बात पर आँसू लाएगा. इसके बाद भी जीवन इसी के साथ चलेगा, तुम्हारे बिना तुमको साथ लेकर चलेगा.


प्रिय मिंटू 

ढेरों आशीर्वाद, जहाँ रहो सुखी रहो, खुश रहो.

16 जुलाई 2025

जहाँ हो वहाँ खुश रहो, सुखी रहो

आज की तारीख वैसे तो खुश होने की है मगर चाह कर भी खुश नहीं हो पाते हैं. ऐसा नहीं कि खुश रहना नहीं आता या फिर ख़ुशी ने अपना रास्ता बदल लिया है. इस तारीख को अब चाह कर भी खुश न रह पाने का कारण इसी तारीख वाले छोटे भाई से सम्बंधित है. आज छोटे भाई मिंटू का जन्मदिन है. जब उसका जन्म हुआ तब हमारी उम्र ने पूरी तरह से छह वर्ष की संख्या को छुआ नहीं था, इसके बाद भी उसके जन्म के समय की बहुत सारी घटनाएँ आज भी दिल-दिमाग में जीवित हैं.

 



जुलाई का महीना था और उस समय लोग आज की तरह कमरे में बंद रहकर, कूलर-एसी को अपनी आदत बनाकर नहीं सोते थे. सही कह रहे हैं, आखिर वो समय 1979 का था. उस समय सीलिंग फैन ही जबरदस्त हवा दिया करता था. रात में अनिवार्य रूप से छत पर सोने का उपक्रम हुआ करता था. उस रात भी हम लोग छत पर हँसते-गुनगुनाते सोने की तैयारी में लगे थे जबकि मिंटू के आने की खुशखबरी घर में आई.

 

बहरहाल, आज मिंटू के जन्मदिन को ख़ुशी से मना भी नहीं पा रहे हैं. जैसे ही खुश होने के विचार सामने आता है, जन्मदिन मनाने का भाव जगता है वैसे ही आँखों से आँसुओं की धार स्वतः चलने लगती है. आज से चार वर्ष पहले मिंटू की शारीरिक उपस्थिति हम लोगों के बीच शून्य में विलीन हो गई. उस दिन से उसका जन्मदिन मनाया जाता है मगर आँखों आँखों में, आँसुओं में, अकेले में.

14 जनवरी 2025

रुलाने वाली तारीख

रुलाने लगी है अब ये तारीख. 

लोग कहते हैं कि समय हर तरह के घावों को भर देता है मगर हमें लगता है कि कुछ घाव समय के साथ भी नहीं भरते. ये एक दर्द है, एक घाव है जो आजीवन साथ रहेगा, ताउम्र साथ चलेगा. हर पल में दर्द देगा, हर बात पर आँसू लाएगा. इसके बाद भी जीवन इसी के साथ चलेगा, तुम्हारे बिना तुमको साथ लेकर चलेगा.


प्रिय मिंटू 

ढेरों आशीर्वाद, जहाँ रहो सुखी रहो, खुश रहो.

16 जुलाई 2024

जहाँ रहो खुश रहो, सुखी रहो

आज की तारीख वैसे तो खुश होने की है मगर चाह कर भी खुश नहीं हो पाते हैं. ऐसा नहीं कि खुश रहना नहीं आता या फिर ख़ुशी ने अपना रास्ता बदल लिया है. इस तारीख को अब चाह कर भी खुश न रह पाने का कारण इसी तारीख वाले छोटे भाई से सम्बंधित है. आज छोटे भाई मिंटू का जन्मदिन है. जब उसका जन्म हुआ तब हमारी उम्र ने पूरी तरह से छह वर्ष की संख्या को छुआ नहीं था, इसके बाद भी उसके जन्म के समय की बहुत सारी घटनाएँ आज भी दिल-दिमाग में जीवित हैं.

 



जुलाई का महीना था और उस समय लोग आज की तरह कमरे में बंद रहकर, कूलर-एसी को अपनी आदत बनाकर नहीं सोते थे. सही कह रहे हैं, आखिर वो समय 1979 का था. उस समय सीलिंग फैन ही जबरदस्त हवा दिया करता था. रात में अनिवार्य रूप से छत पर सोने का उपक्रम हुआ करता था. उस रात भी हम लोग छत पर हँसते-गुनगुनाते सोने की तैयारी में लगे थे जबकि मिंटू के आने की खुशखबरी घर में आई.

 

बहरहाल, आज मिंटू के जन्मदिन को ख़ुशी से मना भी नहीं पा रहे हैं. जैसे ही खुश होने के विचार सामने आता है, जन्मदिन मनाने का भाव जगता है वैसे ही आँखों से आँसुओं की धार स्वतः चलने लगती है. आखिर आज मिंटू होते तो 45 का आँकड़ा छू लिया होता. आज से तीन वर्ष पहले मिंटू की शारीरिक उपस्थिति हम लोगों के बीच शून्य में विलीन हो गई. उस दिन से उसका जन्मदिन मनाया जाता है मगर आँखों आँखों में, आँसुओं में, अकेले में.

11 अप्रैल 2022

मुठी भर कलम तबा की स्याही, ताको विद्या कभऊँ न आई

पिछले दो-तीन दिनों से अपने संग्रह के तमाम पेन की देखभाल का काम चल रहा है. उनकी धुलाई-पुछाई हो रही है, कुछ नए पेनों को काम पर लगाया जा रहा है, कुछ पुराने पेनों को आराम दिया जा रहा है. जो गिफ्ट किये गए पेन हैं, उनको सुरक्षित रखने का काम चल रहा है. इसी में एक पेन आँखों के सामने से गुजरा तो उससे जुड़ी एक घटना भी न चाहते हुए याद आ गई. घटना के बरबस याद आ जाने के पीछे छोटा भाई मिंटू है, जो अब बस यादों में है.


वो फाउंटेन पेन अपने आकार में बहुत छोटा है. उरई के परिचित दुकान वाले हमारे पेन के, विशेष रूप से फाउंटेन पेन के शौक को जानते हैं, ऐसे में यदि कोई विशेष पेन या नया पेन हुआ करता है उनके पास तो वे हमें सूचित कर देते हैं. बहुत साल पहले किसी सामान लेने के लिए दुकान पर पहुँचे तो पता चला कि एक बहुत छोटा पेन आया है, वो भी फाउंटेन. हमने दिखाने को कहा और पेन भी ऐसा था कि पहली नजर का प्यार हो गया उससे. बस बिना किसी संकोच के साथ उसके साथ सम्बन्ध जोड़ते हुए उसे घर ले आये.




नए-नए पेन का उपयोग करने का अपना ही मजा है, बस उसी मजे को लेते हुए घर आते ही उसमें स्याही भरी गई और लिखना शुरू. ऐसे ही एक दिन अपने कमरे में बैठे कुछ लिखा पढ़ी हो रही थी. उसी समय सबसे छोटे वाले भाई का आना हुआ. उसने पेन देखा और आश्चर्य से उसे अपने हाथ में लेकर बोला, ये तो बहुत अच्छा लग रहा, बहुत छोटा भी है. उसकी आँखों की चमक बता रही थी कि अगले को वो पेन चाहिए है. यहाँ एक पल रुक कर आप सबको बता दें कि पेन, घड़ी के शौक भी उसे हमारी तरह रहे हैं. हमने कहा कि वो पेन रख दो, तुम्हारे लिए अलग रखा है एक पेन.


उसे जब ये भरोसा हो गया कि उसके लिए भी छोटा सा पेन रखा है तो उसी ख़ुशी के साथ अचानक से उसका स्वर कुछ गम्भीर हुआ और हमसे बोला कि भाई जी, ऐसे छोटे पेन से न लिखा कीजिये. हमने उसकी तरफ सवालिया निगाह से देखा तो उसने पेन अपनी मुट्ठी में बंद करते हुए कहा कि आपने सुना तो होगा इसे....


मुठी भर कलम, तबा की स्याही,

ताको विद्या कभऊँ न आई.


उसके बहुत ही गंभीरता से इतना कहते ही हमने बहुत जोर का ठहाका लगाया. दो-तीन मिनट की हमारी अनियंत्रित हँसी को रोकने के बाद हमने उससे कहा कि दो पी-एच.डी. कर ली और कितनी विद्या चाहिए, जो मुठी भर कलम इस्तेमाल करने से न आएगी. हमारे इतना कहते ही उसकी भी हमारे अंदाज वाली हँसी गूँज उठी.


आज उस पेन को देखकर भरी आँखें लिए बस मुस्कुरा कर ही रह गए क्योंकि हमारी हँसी में अपनी हँसी मिलाने वाला वो भाई हमारे साथ न था.   


16 जनवरी 2022

तुमसे अब ऐसे ही मिलना हुआ करेगा

अभी तक तो हम तुमको देख पा रहे थे, भले ही पार्थिव रूप में. आज एक साल होने को आया जबकि हमने तुमको पञ्चतत्त्व में विलीन कर दिया. जिस किसी भी, भले ही वह तुम्हारा निर्जीव रूप था, तुमको देख रहे थे मगर आज के बाद तो तुमको देख भी नहीं सके, तुमको छू भी नहीं सके. हम तो उस दिन तुमको छूने में भी संकोच कर रहे थे. समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह के तुमको स्पर्श करें? उस दिन तो कोई आशीर्वाद भी तुम तक नहीं पहुँच रहा था. कोई आवाज़ भी तुम नहीं सुन रहे थे. दीपू ने कितनी बार कहा हमसे कि भाई जी मिंटू को बोलो कि उठे, मगर तुम किसी की सुन ही कहाँ रहे थे. तुम तक हमने बहुत बार हाथ बढ़ाया, बहुत बार तुमको छुआ मगर तुमने कोई जवाब नहीं दिया. तुमको उस दिन उठना ही नहीं था, तुम उठे भी नहीं.


कितनी बड़ी सजा है ये कि तुमको किसी दिन अपने कंधों पर उठाने वाले, तुमको खिलाने वाले उस दिन भी तुमको अपने कंधों पर लिए जा रहे थे मगर सबकी आँखों में आँसू थे. वे सब उस दिन खुश नहीं थे, हँस नहीं रहे थे. उस दिन गिरते-पड़ते हमने भी कुछ कदम तुमको अपने कंधे पर बिठाया था, ये सोच कर कि शायद तुम उठ बैठो मगर तुम न उठे. हम जानते थे कि तुमको अब नहीं उठाना है फिर भी खुद को धोखा देने का काम कर रहे थे. तुम उस धोखे में नहीं आये. तुम नहीं उठे.


बहरहाल, उस दिन को, उस बहुत बुरे दिन को आज एक साल हो गए हैं मगर ऐसा लगता है जैसे आज, अभी इसी समय की बात हो. एक पल भी तुम्हारे बिना नहीं गुजारा हमने. लोग पागल कह सकते हैं हमें, यदि उनको बताया जाये. कहने को कुछ भी कहा जाये मगर आज एक साल बाद भी एक सेकेण्ड तुम्हारे बिना नहीं गुजरा हमारा. आज पिंटू इंदौर में थे तो वो टिंकू, रश्मि और विक्रम सहित उज्जैन हो आये. तुम उज्जैन जाते रहते थे, रश्मि की भी ऐसी इच्छा थी. अब तुम हम सबके बीच या कहें कि तुम्हारे साथ हम सभी लोग इसी तरह बस संस्कारों के माध्यम से आते रहेंगे.







तुमको बार-बार आशीर्वाद, जहाँ रहो खुश रहो, सुखी रहो.

14 जनवरी 2022

एक पल जो वहीं ठहर गया


14 जनवरी को आना ही था, इसे न तो इस बार रोका जा सकता था और न ही पिछले साल रोका जा सका. समय को रोकना अपने हाथ में होता तो शायद समय आगे ही बढ़ पाता. कई बार समय का बढ़ना सुखद लगता है मगर बहुत बार समय का रुक जाने की कल्पना करना सुखद एहसास देता है. समय भले ही न रुकें मगर बहुत से पल होते हैं जो अपनी जगह रुके रह जाते हैं. समय के साथ सबकुछ आगे बढ़ता रहता है, बस वे पल ही आगे नहीं बढ़ते हैं. ऐसे ही बहुत सारे पलों में तुम भी शामिल हो गए हो. अब समय तो पिछले साल से यात्रा करते हुए आज की तारीख तक आ पहुँचा है मगर तुम अभी भी उसी पल के साथ रुके हुए हो. लाख कोशिशों के बाद भी तुमको उस पल से एक पल आगे न ला सके.


अब समय चल रहा है, हम सब चल रहे हैं, सबकुछ बढ़ रहा है, सबके साथ गति है बस तुम नहीं हो. तुम उसी एक पल के साथ रुक गए हो. हम अपने साथ तुमको लेकर चल तो रहे हैं मगर तुम न चल रहे हो. अब तुम्हारी यादें साथ चलती हैं, तुम्हारी बातें साथ चलती हैं, तुम्हारी शरारतें साथ चलती हैं. कितना कठिन हो जाता है तुम्हारे बिना एक कदम आगे बढ़ाना. दिल-दिमाग में सनसनाहट होती रहती है यही विचार करके कि चारों तरफ सबकुछ है बस तुम नहीं हो.


खैर, ये कौन सी इस एक दिन अकेले की कहानी है, ये कौन सा इसी एक जनवरी का हाल है, ऐसा पिछले साल भर से रोज हो रहा है, हर पल में हो रहा है. लोग कहते हैं कि समय हर तरह के घावों को भर देता है मगर हमें लगता है कि कुछ घाव समय के साथ भी नहीं भरते. ये एक दर्द है, एक घाव है जो आजीवन साथ रहेगा, ताउम्र साथ चलेगा. हर पल में दर्द देगा, हर बात पर आँसू लाएगा. इसके बाद भी जीवन इसी के साथ चलेगा, तुम्हारे बिना तुमको साथ लेकर चलेगा.


ढेरों आशीर्वाद, जहाँ रहो सुखी रहो, खुश रहो.

01 जनवरी 2022

बीते साल का दर्द

क्या नया साल, क्या पुराना साल सब एक जैसे दिखाई देते हैं जब सुबह उठते समय या फिर रात को सोते समय। यदि बदलाव कुछ दिखाई देता है तो वो उनसे जुड़े अनुभवों का, उन सालों से जुड़ी यादों का। बहुत कुछ ऐसा गुजर जाता है कि मन करता है कि ऐसा बार-बार गुजरे और कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि मन बार-बार कामना करता है कि ऐसा जीवन मे कभी न हो। बहुत कुछ अच्छा हो जाता है तो बहुत कुछ बुरा हो जाता है। कुछ ऐसा बुरा होता है जो स्मृतियों से अलग होता ही नहीं है। उसी समय वर्षों के बदलाव का अंतर समझ में आता है।


पिछले साल का जाना हुआ मगर बहुत ही दुखद घटना के साथ। दिल-दिमाग उसी घटना के इर्द-गिर्द घूमता राहत है। ऐसी घटना जिसे आजीवन न तो भुलाया जा सकता है और न ही उसके दर्द को कम किया जा सकता है। ये कहने वाली बात होती है कि समय के साथ बहुत से घाव कम हो जाते हैं अथवा मिट जाते हैं। गुजरे हुए वर्ष ने जो घाव दिया है वह समय के साथ भरेगा तो नहीं हाँ, हरा हमेशा बना रहेगा।


क्या कहा जाए, क्या लिखा जाए क्योंकि जैसे ही लिखने की शुरुआत करो तो हाथ काँपने लगते हैं और आँखें बहने लगती हैं। अपने छोटे का जाना अंदर तक हिलाकर रख गया है। न ये गया हुआ साल भुलाया जा सकेगा और न ही इसके द्वारा दिए गए घाव को। जनवरी आ गई है और वो दिन, वो घटना पूरे उफान के साथ दिल-दिमाग पर हावी  होने लगी है।


बस, कामना यही कि ये साल और आने वाले साल किसी को भी ऐसा दुख, ऐसा कष्ट न दे।

16 दिसंबर 2021

खुशियों को खोजा जा रहा है

प्रत्येक वर्ष ऐसा होता है कि उसमें दुःख भी मिलते हैं और सुख भी मिलते हैं. ऐसा सभी के साथ ही होता है. सुख-दुःख का अपना ही साथ है. शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जो कह सकता होगा कि उसे किसी वर्ष में सिर्फ और सिर्फ सुख ही मिला है. इसी तरह शायद ही कोई होगा जिसे किसी वर्ष में सिर्फ दुःख ही दुःख मिले हों. सुख और दुःख के मिलने का अनुपात कुछ भी हो सकता है, उसकी तीव्रता कुछ भी हो सकती है.


इस वर्ष का आगमन बहुत ही बुरी खबर से हुआ. उस खबर को बुरा ही नहीं कहा जायेगा बल्कि वह एक ऐसा ज़ख्म है जिसे आजीवन भरना नहीं है. उस खबर के बाद से बहुत से पल ऐसे आये जिनके साथ कुछ न कुछ ख़ुशी जैसी स्थिति आई मगर पूरे वर्ष भर की या कहें कि जीवन भर की खुशियों को उस एक बुरी खबर के बराबर भी खड़ा नहीं कर सकते हैं. आखिर कैसे जीवन भर की ख़ुशी छोटे भाई की मृत्यु पर भारी बैठ जाएगी?


फ़िलहाल तो बस खुशियों को खोजा जा रहा है, कब तक खोजा जाता रहेगा पता नहीं. हाँ, कुछ छोटे-छोटे कार्यों को करके, कुछ कार्यों में सहयोगी बनकर मन को बहला लिया जा रहा है. कुछ यही कर रहे हैं प्रतिमाह नर नारायण सेवा में सहयोग देकर. 








16.12.2021
 

05 अगस्त 2021

तुम्हारे पास आना बिन तुम्हारे

एक सफर सात साल के अंतराल वाला मगर अधूरा-अधूरा। 2014 का आरम्भ था वो जब ग्वालियर आना हुआ था तुम लोगों के पास, अब 2021 का मध्य है जब इंदौर आना हो रहा तुम लोगों के पास। उस समय खुशी थी, उत्साह था आने का और इस बार उदासी है, खालीपन है। इस बार सब हैं बस एक तुम नहीं हो। बिना तुम्हारे, तुम्हारे पास आना उदास भी किए है, दुखी भी किए है। 

सब समय है, यही सोचकर चलना है, आगे बढ़ना है। तुम्हारे बिन ही तुम्हारे साथ रहना है। 

मिंटू, अब तुम्हारे बिन ही तुम्हारे पास आना हुआ करेगा।

14 जून 2021

अब कहानियों, यादों में है हमारा मिंटू

समय को गुजरना ही होता है, सो गुजर रहा है. कुछ अच्छे पलों के साथ, कुछ बुरे पलों के साथ. इन अच्छे-बुरे पलों के साथ बहुत से लोग साथ हैं और बहुत से लोग कहानी बन गए हैं. ऐसे लोग जो कहानी बन गए हैं उनमें एक हमारा मिंटू भी शामिल हो गया है. आज पाँच महीने होने को आये मगर ऐसा लगता है जैसे अभी दरवाजे पर जोर से आवाज़ लगाएगा परी की. यह उसकी आदत बन चुकी थी कि वह कभी भी बिना किसी सूचना के घर आ जाया करता था. यदा-कदा उसकी डांट लगाईं तो वह हमें ही खबर करता था मगर इस निवेदन के साथ कि घर में किसी को, खासतौर से परी को मत बताइयेगा. परी उसकी भतीजी है यानि हमारी बेटी.


घर पर आने के बाद जोर से ‘परी की आवाज़ लगाते ही घर के अन्दर हलचल मच जाती. मिंटू और परी की ऐसे शरारतें चलती जैसे एक ही आयु-वर्ग के हों. कभी वो परी को सोते में भिगो देता, कभी परी उसके साथ कोई शरारत करती. कभी मिंटू हमारी घड़ी, पेन, चश्मा आदि को लेकर परी को परेशान करता तो कभी परी उसके सामानों को छिपाकर उसके साथ मस्ती करती. कभी-कभी चाचा-भतीजी की इस तरह की शरारत भरी मस्ती में हम ही दोनों की डांट लगा दिया करते.


बीच में मिंटू... अगल-बगल उनकी भतीजियाँ परी-पलक 


ऐसी शरारत उन दोनों के बीच इस बार इसी दीपावली पर हुईं. इसमें मिंटू की जबरदस्त डांट भी हमने लगाई. अंदाजा नहीं था कि चाचा-भतीजी के बीच इस तरह कि शरारत अंतिम बार हो रही है. दीपावली मनाने के बाद वापस लौटने के बाद सोचा भी नहीं था कि अब मिंटू कहानी बनकर हमारे बीच रहेगा. अब आये दिन बातचीत में मिंटू की किसी न किसी बात की चर्चा होती है. आये दिन कोई न कोई किस्सा, कोई न कोई शरारत, कोई न कोई घटना हमारी चर्चा में रहती है.


एक पल में एक व्यक्ति याद बन जाता है, स्मृति बन जाता है, एक झटके में कोई जीता-जागता, चलता-फिरता अपना परिजन एक कहानी बन जाता है. कल तक हम सबके बीच अपनी शरारत भरी उपस्थिति के साथ रहने वाला मिंटू अब कहानी बन गया है, अब हमारी स्मृतियों में है, अब हमारी बातचीत का हिस्सा है. मिंटू तुम्हारी बहुत सी कहानियाँ हमारे दिल में आज भी ज्यों की त्यों जीवित हैं, किसी दिन सबके बीच आएँगीं.




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29 मार्च 2021

होली : तुम्हारे साथ, तुम्हारे बिना

इस बार की होली जितनी ख़ामोशी से बीत गई उतनी खामोश पहले कभी नहीं निकली थी. यद्यपि इससे पहले भी ऐसे हादसों से परिवार गुजरता रहा मगर होली पर एक तरह की औपचारिकता होती ही रही. अपने लोगों के जाने का दुःख बराबर बना रहा, एक बार अइया के जाने के बाद होली का आना हुआ था और दूसरी बार पिताजी के जाने के चंद दिनों बाद ही होली आई थी मगर उन दोनों ही अवसरों पर मन, दिल इतना भारी नहीं था जितना इस बार था. इस बार परिवार ने अपने युवा सदस्य को खो दिया था, ऐसे में पल-पल बस उसकी ही याद आँखों को नम करती रही.


वे तमाम होली के दिन याद आते रहे जबकि खूब जमकर मस्ती, धमाल हुआ करता था. हम सभी भाई-बहिन, चाचा-चाची लोग इकट्ठे हुआ करते थे. ऐसा शायद ही किसी बार हुआ होगा कि होली उसी दिन से खेलना शुरू हुआ जिस दिन रंग की होली हो. ज्यादातर होली का हंगामा उसी रात से शुरू हो जाता था जबकि होलिका-दहन कार्यक्रम संपन्न होता था. हंगामा क्या जबरदस्त हुल्लड़ हुआ करता था. रात से शुरू हुल्लड़ दिन-रात चलता रहता. सोने के बाद भी किसी को न छोड़ना, किसी की मूँछ बना देना, किसी के बालों में सूखा रंग भर देना, ब्रश से रंगने की वो कला आदि न जाने क्या-क्या चलता रहता.


इस बार होली निपट खाली-खाली बीत गई. बच्चों ने ही अपनी-अपनी पिचकारियों से सबको रंग लगाने का काम किया. घर के बड़े सदस्य तो आने-जाने वालों से भेंट-मुलाकात में व्यस्त बने रहे. उनके साथ कभी हँसते रहे, कभी रोते रहे. एक यही होली तुम्हारे बिना नहीं गुजरी है बल्कि अब आने वाले हर त्यौहार तुम्हारे बिना ऐसे ही खाली-खाली गुजरने हैं.





(कुछ तस्वीरें बीते दिनों की)


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वंदेमातरम्

07 फ़रवरी 2021

तुम्हारे साथ जो गुजरी वो छोटी जिंदगानी है



तुम्हारे साथ जो गुजरी वो छोटी जिंदगानी है, 
वही बाकी निशानी है वही बाकी कहानी है। 
तुम्हारे दूर जाने से न जीवन सा लगे जीवन,
रुकी-रुकी सी है धड़कन न साँसों में रवानी है।

तुम्हारी याद के साए में अब जीवन गुजरना है,
लबों पर दास्तां तेरी इन आँखों को बरसना है।
नहीं तुम सामने मेरे मगर मुझको यकीं है ये,
मेरी आँखों में बसना है मेरे दिल में धड़कना है।

भुलाया जाएगा न जो तू ऐसा दर्द लाया है,
तुम्हारे संग हँसे-खेले तुम्हीं ने अब रुलाया है।
हुई होगी कोई गलती हमसे ही निश्चित ही,
तभी तो रूठ कर तुमने अपने को छिपाया है।





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वंदेमातरम्

31 जनवरी 2021

ज़िन्दगी भर का कष्ट दे गया वर्ष 2021

वर्ष 2020 को कोरोना के चलते बहुत बुरा समझा जा रहा था। देश, विदेश में तमाम परिवारों ने इस वर्ष में अपने परिजनों को खोया, निश्चित ही ऐसे परिवारों के लिए वर्ष 2020 अत्यंत दुखद, कष्टकारी कहा जाएगा। उस वर्ष के जल्द गुजर जाने और आने वाले वर्ष के सुखद, सुखमय होने की कामना लगातार की जा रही थी। 

वर्ष 2021 का आना हुआ। लोगों ने बीते दिनों के कष्टों, दुखों को भुलाते हुए नये साल का स्वागत किया। किस-किस के लिए यह वर्ष खुशियों को लेकर आया, किस-किस के लिए सुखद अनुभूति के साथ आया पता नहीं पर व्यक्तिगत हमारे परिवार के लिए अत्यंत दुखद, कष्टकारी पल लेकर आया। ऐसा दुख जिसे चाहकर भी न भुलाया जा सकता है। परिवार के युवा सदस्य का अचानक, असमय हमेशा-हमेशा को चले जाना घोर कष्टकारी है। हमारे सबसे छोटे भाई के जाने का दुःख एकबारगी हम भाइयों के लिए समय के सहन कर लिया जाएगा पर अम्मा को ताउम्र इस कष्ट से मुक्ति मिलना सम्भव नहीं। 



साल का पहला महीना, पहला सनातनी पर्व, मकर संक्रांति ज़िन्दगी भर के लिए एक दुख देकर चला गया। अब बस यादें हैं,  आँसू हैं, दर्द है, पीढ़ा है। एक रिक्तता के साथ आगे बढ़ना है, दर्द को महसूस करते हुए उसी दर्द के साथ आगे बढ़ना है। 



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वंदेमातरम्

27 जनवरी 2021

छोड़ कर नहीं गए हो, तुम तो बसे हो दिल में

तुम हम सबको हमेशा के लिए उसी शाम छोड़कर चले गए गए थे. उस शाम से लेकर तुम्हारी पार्थिव देह के पंचतत्त्व में विलीन हो जाने तक एक आस सी जगती कि यह खबर गलत हो जाये और तुम हमेशा की तरह अपनी शैतानियों के साथ, अपने खिलंदड़ स्वभाव के साथ हम सबके बीच आ जाओ. उस झूठी आस के साथ लगातार तमाम सारे संस्कार चलते रहे. तुम्हारी यादों के साथ आँखों में छलकते आँसुओं को पीते हुए अंतिम संस्कार से जुड़े तमाम सारे क्रिया-कलापों को संपन्न किया जाता रहा. तुमसे जुड़ी एक तरह की व्यस्तता सभी के साथ बनी रही. इसी बहाने तुम्हारा एहसास लगातार आसपास बनता-दिखता रहा.




आज त्रयोदशी संस्कार से जुड़े पूजन-हवन, शांति पाठ के दौरान भी सभी परिजनों की आँखें छलकतीं रहीं और तुम्हारी आत्मिक शांति के लिए पावन कृत्य संपन्न किये जाते रहे. हवन, शांति पाठ का समापन एकदम सामान्य, सादे तरह से संपन्न किया गया. ऐसी कोई उम्र नहीं थी तुम्हारी कि त्रयोदशी संस्कार के नाम पर कोई आयोजन किया जाता. इस समापन के बाद एकदम से अपने आसपास खालीपन सा महसूस होने लगा. अचानक से लगने लगा जैसे पिछले बारह-तेरह दिनों से चले आ रहे धार्मिक कृत्य, संस्कार के बाद तुम वाकई हम सभी से बहुत दूर चले गए हो, हमेशा के लिए दूर चले गए हो. 




यह एहसास हमें भी है कि तुम्हारे दूर चले जाने का दुखद एहसास अब कभी भी दिल से दूर नहीं हो सकेगा. हमें यह भी मालूम है कि तुम प्रत्यक्ष में भले ही बहुत दूर चले गए हो मगर कभी हमारे दिल से दूर नहीं हो सकोगे. यह भी हमें जानकारी है कि तुम कभी हमें दिखाई नहीं पड़ोगे मगर तुम्हारी अनुभूति अब सदैव हमें अपने आसपास महसूस होती रहेगी.


तुम्हारा असमय जाना अत्यंत कष्टकारी है. हमें अपने शरीर के साथ लिए फिरते एक कष्ट के साथ-साथ अब अपने दिल पर इस कष्ट को लेकर भी आजीवन चलना है. अपने दिल पर, मन पर एक कष्ट लेकर हम सदा चलते रहेंगे मगर तुमको अपने दिल से, यादों से, अपने आसपास से, अपने अस्तित्व से, परिवार से सदैव जोड़े रखेंगे, अपने से बाँधे रखेंगे. हमें अपने बड़े होने का यह दायित्व आजीवन निर्वहन करना ही है.




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वंदेमातरम्

19 जनवरी 2021

तुम झींगुर जैसो उटक गये

बचपन के वे दिन याद आ गए जबकि हम तीनों भाइयों में तुम ही सबसे चंचल, सबसे शैतान थे। शैतानी के साथ तुम्हारी मासूमियत सबको हँसा देती थी। घर के लोग तुम्हारी शैतानी भूल जाया करते थे। तुम्हारी चंचलता तुमसे शैतानियाँ करवाती रहती। किस-किस को याद करें, कितना याद करें। अब बचपन से लेकर अभी तक की तुम्हारी हरकतें चंचल ही रहीं। उम्र से बड़े होते रहने के बाद भी तुम स्वभाव से कभी बड़े न हो सके। वैसी ही शरारतें, वैसा ही व्यवहार तुममें बचपना बनाए रहा। 

बचपन में शैतानी कर पल भर में गायब हो जाना, कभी इधर, कभी उधर उछलकूद मचाए रखना, कभी यहाँ चढ़ना, कभी उधर कूदना तुम्हारे खेल हुआ करते। बाबाजी ने एक दिन तुम्हारी इन्हीं हरकतों पर हँसते हुए अइया से कहा भी था कि जो झींगुरा जैसो उटकत है। एक पल में इधर, दूसरे पल में उधर। उस दिन के बाद तो जैसे यह झींगुर जैसा उछलना तुम्हारे स्वभाव का अंग मान लिया गया। हम सब अभी तक इस पर हँसते हुए चर्चा कर लेते थे, तुमको भी चिढ़ा देते थे। अब भी तुम्हारे घर में आने और एकदम से गायब होकर दोस्तों संग घूमने निकल पड़ने को हम लोग झींगुर सा उटकने की बात कह कर हँस लेते थे। 



इस बार भी तुम झींगुर जैसे उटके पर अबकी घर में कोई हँस नहीं रहा तुम्हारे इस उटकने पर। इस बार भी तुमने अपनी चंचलता भरा स्वभाव दिखा कर शैतानी कर दी पर अबकी इसमें कोई मासूमियत नहीं दिखी। इस बार की शैतानी पर कोई भी हँस नहीं रहा है। अबकी तुम्हारा झींगुर जैसा उटकना ज़िन्दगी भर को रुला गया। अबकी झींगुर सा उटक कर तुम इस दुनिया से उस दुनिया में चले गये। 

हम सब तुम्हारी स्थिरता पर, गम्भीरता पर भी हँस लेते, मुस्कुरा लेते बस तुम उम्र बढ़ने के साथ-साथ तुम थोड़ा सा गम्भीर होना सीख लेते, झींगुर सा उटकना छोड़ देते।



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वंदेमातरम्