19 January 2021

तुम झींगुर जैसो उटक गये

बचपन के वे दिन याद आ गए जबकि हम तीनों भाइयों में तुम ही सबसे चंचल, सबसे शैतान थे। शैतानी के साथ तुम्हारी मासूमियत सबको हँसा देती थी। घर के लोग तुम्हारी शैतानी भूल जाया करते थे। तुम्हारी चंचलता तुमसे शैतानियाँ करवाती रहती। किस-किस को याद करें, कितना याद करें। अब बचपन से लेकर अभी तक की तुम्हारी हरकतें चंचल ही रहीं। उम्र से बड़े होते रहने के बाद भी तुम स्वभाव से कभी बड़े न हो सके। वैसी ही शरारतें, वैसा ही व्यवहार तुममें बचपना बनाए रहा। 

बचपन में शैतानी कर पल भर में गायब हो जाना, कभी इधर, कभी उधर उछलकूद मचाए रखना, कभी यहाँ चढ़ना, कभी उधर कूदना तुम्हारे खेल हुआ करते। बाबाजी ने एक दिन तुम्हारी इन्हीं हरकतों पर हँसते हुए अइया से कहा भी था कि जो झींगुरा जैसो उटकत है। एक पल में इधर, दूसरे पल में उधर। उस दिन के बाद तो जैसे यह झींगुर जैसा उछलना तुम्हारे स्वभाव का अंग मान लिया गया। हम सब अभी तक इस पर हँसते हुए चर्चा कर लेते थे, तुमको भी चिढ़ा देते थे। अब भी तुम्हारे घर में आने और एकदम से गायब होकर दोस्तों संग घूमने निकल पड़ने को हम लोग झींगुर सा उटकने की बात कह कर हँस लेते थे। 



इस बार भी तुम झींगुर जैसे उटके पर अबकी घर में कोई हँस नहीं रहा तुम्हारे इस उटकने पर। इस बार भी तुमने अपनी चंचलता भरा स्वभाव दिखा कर शैतानी कर दी पर अबकी इसमें कोई मासूमियत नहीं दिखी। इस बार की शैतानी पर कोई भी हँस नहीं रहा है। अबकी तुम्हारा झींगुर जैसा उटकना ज़िन्दगी भर को रुला गया। अबकी झींगुर सा उटक कर तुम इस दुनिया से उस दुनिया में चले गये। 

हम सब तुम्हारी स्थिरता पर, गम्भीरता पर भी हँस लेते, मुस्कुरा लेते बस तुम उम्र बढ़ने के साथ-साथ तुम थोड़ा सा गम्भीर होना सीख लेते, झींगुर सा उटकना छोड़ देते।



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वंदेमातरम्

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