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20 जुलाई 2025

गाली वाली रील पर गिरफ़्तारी किन्तु नग्न, अर्धनग्न वाली रील पर ख़ामोशी

सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी हुई कि संभल में दो लड़कियों को अश्लील कंटेंट बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करने के कारण गिरफ्तार किया गया. खबर के बाद उनकी रील देखी तो प्रथम दृष्टया जो बात समझ आई वो ये कि वे दोनों खुलेआम गालियाँ देते हुए रील बनाती हैं. उनकी तमाम सारी रील देखने के बाद भी कहीं शारीरिक नग्नता नहीं दिखी.


यदि सिर्फ गालियाँ देने के कारण ही उनकी गिरफ़्तारी हुई है तो ऐसी बहुतायत में रील हैं जिनमें खुलेआम गालियाँ दी जा रही हैं, खुलकर देह प्रदर्शन किया जा रहा है, नंगपन चरम सीमा पर है. इस तरह की रील बनाने वालों की गिरफ़्तारी क्यों नहीं हो रही हैकहाँ और कैसे शिकायत करने पर गिरफ़्तारी होगी, हमें वहाँ का पता दिया जाये. उनकी शिकायत करके उनकी भी गिरफ़्तारी सुनिश्चित करवाई जाएगी. 


यदि गालियाँ अश्लीलता है तो फिर नग्न होकर, अर्धनग्न होकर रील बनाना भी अश्लीलता है.

 

22 मार्च 2025

कामुकता, नग्नता का बाज़ार न बन जाये ये समाज

अवैध संबंधों में बाधक बनती पत्नी की हत्या कर लाश को ब्रीफकेस में भरा, प्रेमी के साथ मिलकर पत्नी ने पति की हत्या कर लाश के टुकड़े-टुकड़े करके ड्रम में छिपाया, रील बनाने से मना करने पर माँ ने बेटे की हत्या कर दी, आपत्तिजनक स्थिति में देख लेने पर बेटे ने माँ-बाप को मौत के घाट उतारा जैसी अनेक खबरों से नित्य ही हम सबका सामना होता है. ये दो-चार पंक्तियाँ बानगी हैं आज के समाज की जहाँ ऐसा लग रहा है कि न तो रिश्तों का कोई महत्त्व रह गया है और न ही मर्यादा का कोई स्थान बचा है. बहुसंख्यक लोगों की आँखों से शर्म-लिहाज पूरी तरह से समाप्त हो गई है. ऐसे लोगों द्वारा सगे रक्त-सम्बन्धियों के साथ, अपने परिजनों के साथ दुराचार करने, उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने का अपराध सहज रूप में किया जाने लगा है. ऐसा महसूस होने लगा है जैसे लोगों के लिए शारीरिकता का, यौन संबंधों का ही महत्त्व रह गया है. उनके लिए जीवन की पूर्णता यौन संतुष्टि प्राप्त करने में ही है. 


समाज का बौद्धिक वर्ग आये दिन ऐसी घटनाओं पर मंचों के माध्यम से, सोशल मीडिया के द्वारा चर्चा कर लेता है किन्तु इसके मूल में जाने का, उसके समाधान का प्रयास नहीं करता है. गौर करिए इक्कीसवीं सदी के आरम्भ होने के कुछ वर्ष पूर्व से ही, जबकि आधुनिकता, वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण शब्द सामाजिक आसमान पर तैरने में लगे थे. कालांतर में विकास के नाम पर चली आई तकनीकी क्रांति ने, मोबाइल क्रांति ने समूचे सामाजिक ढाँचे को हिला कर रख दिया. स्त्री-पुरुष संबंधों, पति-पत्नी के आंतरिक संबंधों की गोपनीयता एकदम से फटकर परदे से बाहर आ गई. आधुनिकता के नाम पर, पश्चिमीकरण के नाम पर, वैश्वीकरण के नाम पर नग्नता को, अश्लीलता को, यौन-संबंध को, दैहिक आकर्षण को प्रमुखता दी जाने लगी. किसी समय पारिवारिक नियोजन के लिए अपनाए गए निरोध का परिवर्तनीय उपयोग अवैध संबंधों में अनचाहे गर्भ से बचने के लिए, एचआईवी से सुरक्षित रहने के लिए होने लगा. उस सुरक्षित समझे जाने वाले उपाय के शालीन, शर्म भरे विज्ञापन उन्मुक्त, कामपिपासु मानसिकता का प्रदर्शन करते दिखने लगे.




दैहिक उन्मुक्तता का, वैचारिक फूहड़ता का, कामुकता का चित्रण इसी एक कदम के रूप में सामने नहीं आया बल्कि बहुसंख्यक विज्ञापनों में नजर आने लगा. उत्पाद स्त्रियों का हो या फिर पुरुषों का, वृद्धजनों का हो या फिर बच्चों का, घरेलू सामान हो या फिर पूजा की सामग्री, वस्त्र हों या फिर अधोवस्त्र, शैक्षिक सामग्री हो या फिर सौन्दर्य प्रसाधन सभी के किसी न किसी रूप में स्त्रियों की कामुक, अर्धनग्न छवि को उकेरा जाने लगा. इनके अलावा लाइव शो हों, कॉमेडी शो हो, संगीत का कार्यक्रम हो, बच्चों की नृत्य प्रस्तुति हो ये सब भी द्विअर्थी संवाधों, फूहड़ भाव-भंगिमा का प्रदर्शन करने लगे. ऐसा लगने लगा कि बिना सेक्स के, बिना यौनेच्छा के व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है. इस मानसिकता को और अधिक विकृत बनाने के लिए स्मार्टफोन, इंटरनेट का साथ मिल गया. अब हर हाथ में समूची दुनिया घूम रही थी. बच्चे उम्र के बहुत पहले ही स्त्री-पुरुष देह के अगोपन को गोपन कर रहे थे. बंद कमरे से भीतर पति-पत्नी के रूप में सामाजिक मान्यता प्राप्त संबंधों की दैहिक क्रिया को शिक्षण संस्थानों, पार्कों, खेतों आदि के सुनसान में क्रियान्वित किया जाने लगा. इस उच्छृंखल, अशालीन, अमर्यादित जीवन-शैली ने न केवल विवाह संस्था को कमजोर किया बल्कि समूची सामाजिक, पारिवारिक संरचना को ही ध्वस्त सा कर दिया.


परिवार में आपस में ही अविश्वास का माहौल दिखाई देने लगा. आपसी संबंधों में भी संदेह नजर आने लगा. रिश्तों की मर्यादा को तिलांजलि सी दे दी गई. संस्कारों का कहीं अंतिम संस्कार सा कर दिया गया. बहुतेरी सामाजिक गतिविधियाँ देह के इर्द-गिर्द ही घूमने लगीं. वैवाहिक समारोह में संगीत समारोह के नाम पर नग्नता, फूहड़ता ठुमके लगाने लगी तो खेलों में चियर्स लीडर के नाम पर दैहिक प्रदर्शन को थिरकने का अवसर दिया जाने लगा. सोचने वाली बात है कि समाज में देह, यौन सम्बन्ध को केन्द्र-बिन्दु कब, कैसे और क्यों बनाया जाने लगा? क्यों प्रतिभा को शारीरिक आकर्षण के पीछे धकेल दिया गया? क्यों अवैध शारीरिक संबंधों ने मर्यादित रिश्तों को निगल लिया? क्यों देह के आकर्षण ने संस्कारों की बुनियाद को खोखला कर दिया? सेल्युलाइड परदे के विकल्प के रूप में हर हाथ में सिमटी छोटी सी स्क्रीन में चमकते ओटीटी चैनल्स, सोशल मीडिया की रील्स आदि में थिरकती, चमकती, लहराती कामुक नग्न/अर्धनग्न देह पर सामाजिक चिंतन, विमर्श के द्वारा कोई ठोस कदम उठाना होगा. ऐसा न कर पाने की स्थिति में यह समाज संवेदनहीनता, फूहड़ता, कामुकता, नग्नता, अशालीनता का बाज़ार बना नजर आयेगा. 


25 फ़रवरी 2023

गालियाँ देने का फैशन

बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका सर्वाधिक नकारात्मक असर बच्चों पर, किशोरों पर देखने को मिल रहा है. तकनीकी भरे दौर में हर हाथ में स्मार्ट फोन और इंटरनेट के होने के कारण समूचा विश्व सबकी मुठ्ठी में समाहित है. मुठ्ठी में समाये इस विश्व में अब कुछ भी गोपन नहीं रह गया है. इसी अगोपन ने ओटीटी के बहुसंख्यक कार्यक्रमों, वेबसीरीज की अश्लीलता को भी सार्वजनिक कर दिया है. इन वेबसीरीज के पल-पल बदलते दृश्यों में, बात-बात पर गालियों भरे संवादों के आने ने बच्चों, किशोरों के दिल-दिमाग में गालियों के प्रति एक अजब सा आकर्षण पैदा कर दिया है.


ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर बनने वाले कार्यक्रम हों या फिर फ़िल्में, सभी में वास्तविकता दिखाने के नाम पर गालियों को जैसे ठूँसा जाने लगा है. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर बने अनेकानेक चैनलों पर भी सार्वजनिक रूप से गालियों का दिया जाना होता है, अश्लील भाव-भंगिमा, शब्दों के साथ प्रस्तुतियाँ दी जा रही हैं. इनके इस तरह से सार्वजनिक होते रहने का दुष्परिणाम यह निकल रहा है कि गालियों को लेकर, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्म, लिहाज बना हुआ था, वह लगभग समाप्त हो गया है. कम उम्र के युवाओं में बात-बात पर गालियाँ दिया जाना आम हो गया है. बच्चों में, किशोरों में अपने हमउम्र दोस्तों के साथ बातचीत में गालियों का प्रयोग करने के पीछे मानसिकता उनके साथ वैमनष्यता करने जैसी नहीं होती है. जरा-जरा सी बात पर अशालीन शब्दों का प्रयोग करने के पीछे उनकी मंशा सामने वाले को अपमानित करने की नहीं होती है. वे ऐसा महज उस आकर्षण के वशीभूत करते हैं, जिसे उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों में, सोशल मीडिया के मंचों पर देखा होता है.  




समाज में एक सामान्य सी धारणा बनी हुई है कि एक बच्चा आज्ञाकारी होगा. वह बड़ों का आदर-सम्मान करने वाला होगा. युवावस्था आने तक वह अपने भीतर ऐसे गुणों को धारण कर चुका होगा जो समाज, परिवार के हित में होंगे. बहुतायत में ऐसा करने वाले बच्चे मिलते भी हैं. किशोरावस्था का दौर अत्यंत ही संवेदित और बेहद महत्वपूर्ण होता है. किसी भी बच्चे का व्यक्तित्व विकास इसी दौर में होता है. इसी कारण से इस दौर में बच्चों का गालियों की दिशा में जाना, अश्लील शब्दावली की तरफ भटकना चिंतनीय है. बहुतेरे किशोर इन्हीं सबके चलते अनैतिक संबंधों के बनाने की हद तक चले जाते हैं. ऐसे में किशोर उम्र में उनकी तरफ विशेष ध्यान देना आवश्यक है.


ऐसे में सवाल यही उठता है कि बच्चों में, किशोरों में इस तरह के अशालीन व्यवहार को करने के पीछे उत्प्रेरक बने इन कार्यक्रमों से बचने का क्या रास्ता है? यह बात वर्तमान दौर में पूरी तरह से सही है कि वैश्विक खुलेपन के दौर में अब किसी विषय को, किसी जानकारी को परदे में रख पाना संभव नहीं रह गया है. तकनीक के बहाव भरे इस दौर में इन बच्चों की ऊर्जा को, उनके आकर्षण को उचित दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए. यह विचार करना अनिवार्य होना चाहिए कि जिस तरह के कार्यक्रम इस आयुवर्ग के बच्चों को उकसा रहे हैं, उनसे बच्चों को दूर कैसे रखा जाये. इस बिन्दु पर आकर स्वयं अभिभावकों को विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं उनके द्वारा तो इन बच्चों के लालनपालन में कोई कमी तो नहीं रह जा रही है?


वर्तमान में जिस तेजी से नगरीकरण तथा औद्योगिकरण ने हर व्यक्ति को अपने चपेट में लिया है, उसने सभी को धन कमाने की अंधी दौर में धकेल दिया है. इससे भी परिवार अपने ही बच्चों पर नियंत्रण रखने में तथा उनको संस्कारित करने में लगभग असफल हुए हैं. समयाभाव में अपने ही बच्चों को उनकी वैयक्तिक स्वंतत्रता के नाम पर बच्चों को, किशोरों को समय से पूर्व बड़ा हो जाने दिया है. इसने बच्चों में नैतिक मूल्यों का क्षरण किया है. इस बात को परिवारों को, अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं. उनका संस्कारवान होना, शालीन होना, सभ्य होना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वे इस समाज की, इस देश की धरोहर हैं. किसी भी समाज और देश का भविष्य इन्हीं के कंधों पर अपनी विकासयात्रा को पूरा करता है. ऐसी स्थिति में न केवल सरकारों की जिम्मेवारी है बल्कि परिवार की, समाज की, अभिभावकों की भी जिम्मेवारी है कि वे बच्चों के, किशोरों के, युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिये एक स्वस्थ्य सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण प्रदान करें. मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से अशालीनता, अश्लीलता, गालियाँ, अनैतिक संबंधों का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से किया जा रहा है, उस पर नियंत्रण लगाया जाये.







 

19 सितंबर 2022

कुंठित यौनेच्छा या स्वतंत्रता

समाज में किसी भी व्यक्ति द्वारा जो भी कृत्य किया जाता है वह किसी न किसी रूप में उसके द्वारा सोचा-विचारी की स्थिति के बाद ही होता है. कभी यदि कोई कदम अचानक से उठ भी जाता है तो उसके पीछे भी अचेतन में बैठी भावना या फिर तात्कालिक घटनाक्रम प्रमुख होता है. यही कारण है कि प्रत्येक कार्य के पीछे का कारण ही उस कार्य की दिशा तय करता है. अभी हाल में ही स्नान करती छात्राओं के वीडियो शेयर करने का जो मामला सामने आया, उसके पीछे भी कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा, ये और बात है कि अभी तक इस मामले की तह तक नहीं पहुँचा जा सका है. उस घटना का अंतिम और मुख्य उद्देश्य क्या होगा, ये तो यथासंभव जाँच के बाद ही सामने आएगा किन्तु समाज में जिस तरह से नग्नता को, सेक्स को पोषित-पल्लवित किया जा रहा है, उससे एक उद्देश्य यौनिक कुंठा से सम्बंधित भी समझ आता है.  


ये अपने आपमें एक परम सत्य है कि सेक्स किसी भी जीव की नैसर्गिक आवश्यकता है. न केवल इंसानों में वरन जानवरों में भी इसको देखा गया है, यहाँ तक कि पेड़-पौधों में भी आपस में निषेचन क्रिया संपन्न होती है, जो एक तरह से सेक्स का ही स्वरूप है. बहरहाल, जिस तरह से मानव समाज के विकास की स्थितियाँ बन रही हैं, विकसित हो रही हैं, उनके साथ-साथ सेक्स सम्बन्धी समस्याओं में, दुराचार की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिली है. वर्तमान में हालात ये हैं कि किसी भी तरह का कार्यक्रम हो, किसी भी तरह का विज्ञापन हो, किसी भी तरह की फिल्म या धारावाहिक हो सभी में सेक्स को, शारीरिक संबंधों को प्रमुखता से दिखाया जाता है. किसी दौर में ऐसी बातों को फिल्माने में किसी न किसी संकेत का, रूपक का सहारा लिया जाता था मगर अब स्वाभाविकता का नाम लेकर ऐसे दृश्यों का खुलेआम फिल्मांकन होता है. बच्चों के टीवी कार्यक्रमों में बच्चों को भौंड़ी, कामुक मुद्राओं में थिरकते देखा जाता है. उनको द्विअर्थी संवादों में प्रदर्शन करते देखा जा सकता है. अनेकानेक उत्पाद ऐसे हैं जिनको देखकर ऐसा ही लगता है कि उस उत्पाद का निर्माण एकमात्र इसी उद्देश्य से किया गया है कि विपरीतलिंगियों में आकर्षण पैदा हो जाये, उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाये. अब तो इनसे भी एक कदम आगे बढ़कर सोशल मीडिया में शार्ट वीडियो, रील्स आदि के माध्यम से अश्लीलता, नग्नता, कामुक मुद्राओं को हर हाथ में देखा जा रहा है. किसी भी तरह की आपत्ति पर इनको स्वतंत्रता के नाम का आवरण ओढ़ाया जाने लगता है.




आखिरकार यहाँ समझना ही होगा कि स्वतंत्रता है क्या? जीवनशैली आखिर किस तरह से संचालित की जाये? इसे भी समझने की जरूरत है कि कहीं जीवनशैली की स्वतंत्रता के नाम पर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर व्यक्ति सेक्स संबंधों में स्वतंत्रता तो नहीं चाह रहा है? कहीं स्वतंत्रता के नाम पर सेक्स को समाज में कथित तौर पर स्थापित करने की साजिश तो नहीं? सेक्स को लेकर, शारीरिक संबंधों को लेकर, विपरीतलिंग को लेकर समाज में जिस तरह से अवधारणा निर्मित की जा रही है, उसे देखते हुए लगता है जैसे इंसान के जीवन का मूलमंत्र सिर्फ और सिर्फ सेक्स रह गया है. दृश्य-श्रव्य माध्यमों में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों, विज्ञापनों में भी सेक्स का प्रस्तुतीकरण इस तरह से किया जाता है जैसे बिना इसके इंसान का जीवन अधूरा है. समस्या यहीं आकर आरम्भ होती है क्योंकि प्रस्तुतीकरण के नाम पर फूहड़ता का प्रदर्शन ज्यादा किया जाता है; दैहिक संतुष्टि के नाम पर जबरन सम्बन्ध बनाये जाने की कोशिश की जाती है; प्यार के नाम पर एकतरफा अतिक्रमण किया जाता है; स्वतंत्रता के नाम पर रिश्तों का, मर्यादा का दोहन किया जाता है. सोचना होगा कि कल को वे मानसिक विकृत लोग, जो दैहिक पूर्ति के लिए जानवरों तक को नहीं बख्शते हैं, अपने अप्राकृतिक यौन-संबंधों को जायज ठहराने के लिए सडकों पर उतर आयें, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर, जीवनशैली चुनने की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी जानवर के साथ को कानूनी स्वरूप दिए जाने की माँग करने लगें तो क्या ऐसे लोगों की मांगों को स्वीकारना होगा?


जिस तरह से इक्कीसवीं शताब्दी के नाम पर उत्पादों, विचारों, खबरों, कार्यक्रमों, भावनाओं का प्रचार-प्रसार किया गया है उसमें इंसान की वैयक्तिक भावनाओं को ज्यादा महत्त्व प्रदान किया गया है. उसके लिए सामूहिकता, सामाजिकता, सहयोगात्मकता आदि को दोयम दर्जे का सिद्ध करके बताया गया है, व्यक्ति की नितांत निजी स्वतंत्रता को प्रमुखता प्रदान की गई है, ये कहीं न कहीं सामाजिक विखंडन जैसी स्थिति है. पाश्चात्य जीवनशैली को आधार बनाकर जिस तरह से भारतीय जीवनशैली में दरार पैदा की गई है वह भविष्य के लिए घातक है. इसके दुष्परिणाम हमें आज, अभी देखने को मिल रहे हैं. जिस उम्र में बच्चों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए वे रोमांस में घिरे हुए हैं; जिस क्षण का उपयोग उन्हें अपना कैरियर बनाने के लिए करना चाहिए उन क्षणों को वे शारीरिक सुख प्राप्त करने में व्यतीत कर रहे हैं; जो समय उनको ज्ञानार्जन के लिए मिला है उस समय में वे अविवाहित मातृत्व से निपटने के उपाय खोज रहे हैं. जिस मोबाइल को संचार का, जानकारी का केन्द्र होना चाहिए था उसके द्वारा अश्लीलता का, कामुकता का प्रदर्शन किया जा रहा है.


हमारे देश की पीढ़ी सेक्स, समलैंगिकता, अविवाहित मातृत्व, विवाहपूर्व शारीरिक सम्बन्ध, सुरक्षित सेक्स आदि की मीमांसा, चिंतन करने में लगा हुआ है. संभव है कि ऐसे लोगों के सामने भारतीय संस्कृति का कोई व्यापक अथवा सकारात्मक अर्थ ही न हो क्योंकि इस पीढ़ी ने मुख्य रूप से दैहिक सम्बन्धों की चर्चा अपने आसपास होते देखी है. यहाँ आकर समझना होगा कि सेक्स, शारीरिक सम्बन्धों के मामले में नितांत खुला जीवन जीने वाले पाश्चात्य देशवासी भी कहीं न कहीं संयमित भारतीय जीवनशैली के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. सेक्स को, दैहिक तृष्णा को एकमात्र उद्देश्य मानकर आगे बढ़ती पीढ़ी न केवल सामाजिकता का ध्वंस कर रही है बल्कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ भुलाकर समाज में एक दूसरे तरह की गुलामी को जन्म दे रही है. काश! स्वतंत्रता के नाम पर अधिकारों को समझा जाए न कि अनाधिकार चेष्टा को; काश! वैयक्तिक जीवनशैली के नाम पर रिश्तों की मर्यादा को जाना जाए न कि उनके अमर्यादित किये जाने को; काश! निजी जिंदगी के गुजारने के नाम पर पारिवारिक सौहार्द्र को समझा जाए न कि जीवन-मूल्यों के ध्वंस को; काश! जीवन को जीवन की सार्थकता के नाम पर समझा जाये न कि कुंठित सेक्स भावना के नाम पर. काश....!!!

 





 

17 अप्रैल 2022

नग्न बदलाव की तरफ भागता समाज

समाज के लिए सेक्स हमेशा से एक ऐसा विषय रहा है जिस पर गम्भीर चर्चा से ज्यादा विवादपूर्ण चर्चा ही हुई है. इस विवाद के पीछे का कारण मूल रूप से स्त्री-पुरुष के बीच एक विभेदात्मक रेखा का खिंचा हुआ होना है. इधर देखने में आ रहा है कि इक्कीसवीं सदी के पूर्व से ही समाज में आधुनिकता के नाम पर ऐसे विषयों को उठाया जाने लगा था जो किसी रूप में भारतीय समाज में गोपनीय माने जाते रहे. वैश्वीकरण के दौर से बाहर निकल कर समाज ने जैसे ही इक्कीसवीं सदी में अपना कदम रखा, वैसे ही आधुनिकता की परिभाषा बदल गई. कपड़ों का सलीका बदल गया, रहन-सहन का तरीका बदल गया. बदलाव के इस दौर ने पति-पत्नी के बीच भी अपनी पहुँच बनाकर उनके संबंधों को बजाय सुधारने के बिगाड़ने का ही काम किया.


चर्चाओं का दौर लगातार बना हुआ है और देखना है कि समाज की यह गति कहाँ जाकर रुकती है. बस ध्यान रह रखना होगा कि यह गति सबको नग्नावस्था में लाकर न छोड़े.


20 जून 2020

सोशल मीडिया को आवश्यकता है सम्पादकीय व्यवस्था की

कई बार लगता है कि सोशल मीडिया की ऐसी स्वतंत्रता अब बंद की जानी चाहिए. एडिट फ्री व्यवस्था ने जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है वहीं विचारों की गंदगी भी फैला रखी है. किसी समय अपने आलेख, साहित्यिक रचनाओं के सम्पादक के धन्यवाद पत्र के साथ वापस आने पर बुरी तरह गुस्सा आता था. कई बार मन में आता था कि किसी न किसी जुगाड़ के बिना पत्र-पत्रिकाओं में छपना संभव नहीं. इसी में कई बार अपने बीच के कई साथियों को प्रकाशित होना देखते, बहुत सी ऐसी प्रकाशित रचनाओं को देखते और अपनी रचनाओं की उनसे तुलना करते तो विश्वास होता कि जुगाड़ से ज्यादा रचना काम करती है. बाद में बिना किसी जुगाड़ के अपनी रचना प्रकाशित करने पर इस धारणा का भी खंडन हुआ. 


उस दौर के बाद जब ब्लॉग लेखन का, सोशल मीडिया का दौर देखा तो लगा कि अब कम से कम सम्पादकों का अनावश्यक हस्तक्षेप समाप्त होगा. उनका एक तरह का एकाधिकार समाप्त होगा. आरंभिक दौर में ऐसा देख कर अच्छा भी लगा. सोशल मीडिया पर, ब्लॉग पर बहुत ही सारगर्भित सामग्री पढ़ने को मिलती. वैचारिक भिन्नता के बीच वैचारिक मतभेद देखने को मिलता मगर सामग्री के सन्दर्भ में गिरावट देखने को नहीं मिलती. ब्लॉग को इस सन्दर्भ में बहुत ही समृद्ध कहा जा सकता था. कालांतर में जैसे-जैसे सोशल मीडिया का विकास होता रहा, हर एक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलती रही सामग्री की गंभीरता का लोप होता रहा. आज स्थिति ये है कि सिवाय आपसी कटुता के बहुत कुछ देखने को नहीं मिल रहा है.


सोशल मीडिया के दौर ने, माइक्रो ब्लॉगिंग के रूप ने ब्लॉग संसार को भी दिग्भ्रमित किया है. अब यहाँ भी चोर दिखाई देने लगे हैं. यहाँ भी विरोध के नाम पर मानसिकता हावी है. यहाँ भी अधजल गगरी छलकत जाए वाली बात सिद्ध हो रही है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों की स्वतंत्रता ने लोगों को पढ़ने से दूर कर दिया है. अब उनका एकमात्र काम बस लिखना, अपनी विचारधारा से इतर व्यक्तियों को अपमानित करना, अपनी ही प्रशंसा की फोटो-सामग्री को पोस्ट करना रह गया है. यहाँ अब बड़े-छोटे का लिहाज समाप्त हो गया है. यहाँ अब रिश्तों की, अनुभव की, उम्र की मर्यादा का लोप हो चुका है. यहाँ बाप-दादा की उम्र का हो वो भी फ्रेंड है, बेटे-बेटी की उम्र का हो वो भी फ्रेंड है. इसमें भी किसी तरह का सम्पादकीय प्रतिबन्ध नहीं है, किसी भी तरह के एडिटोरियल बोर्ड से गुजरना नहीं है सो चाहे जो मन आये लिख दिया जाता है, चाहे जो मन में आता है छाप लिया जाता है.

इसी का दुष्परिणाम है कि अब गंभीर सामग्री का विलोपन हो चुका है, उसकी जगह पर गालियाँ देखने को मिलती हैं. वैचारिक रूप से कुंद व्यक्ति एक-दूसरे को ही गाली नहीं दे रहे हैं बल्कि देश के प्रधानमंत्री को, मुख्यमंत्रियों को भी गाली देने में लगे हैं. किसी व्यक्ति की पोस्ट के खिलाफ आप कुछ बोलते हैं तो आपके ऊपर व्यक्तिगत, पारिवारिक आक्षेप लगाये जाते हैं. यदि सच्चे सबूत नहीं मिलते हैं तो फोटोशॉप का सहारा लिया जाता है. कुल मिलाकर सोशल मीडिया की स्वतंत्रता दूसरों को अपमानित करने के लिए रह गई है. किसी समय एडिटोरियल बोर्ड जैसी व्यवस्था को, सम्पादकीय जैसी व्यवस्था को कोसने की गलती हमने भी की थी मगर अब लगता है कि ये अत्यंत अनिवार्य व्यवस्था है. इस व्यवस्था के कारण अश्लीलता रुकी हुई थी, भ्रामक सामग्री रुकी हुई थी, आपसी कटुता रुकी हुई थी. अब लगता है कि सोशल मीडिया पर, ब्लॉगिंग पर भी सम्पादकीय व्यवस्था लागू की जानी चाहिए.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

05 मार्च 2018

सार्वजनिक स्तनपान : मातृत्व या विज्ञापन


ऐसा माना जाता रहा है कि पढ़-लिख कर व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. वह तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. ऐसे बहुत से उदाहरण देखने में आये हैं जबकि ऐसा हुआ भी है. शिक्षित व्यक्तियों ने अपने ज्ञान के आधार पर तर्कों पर तमाम निष्कर्षों को कसा है. इधर तकनीकी विकास के साथ साक्षर होती पीढ़ी ने, तकनीकी का सहारा लेकर कुछ कर-गुजरने वाली मानसिकता ने शिक्षित होने, साक्षर होने के बाद तर्क-वितर्क को कुतर्क के रास्ते पर उतार दिया है. इस तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे, महिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों पर, मामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं.

विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा है? कुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्यों? वाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहा, बहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्न, अर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहाल, स्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता है, सुखद अनुभूति होती है. स्तनपान के द्वारा वह न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रेक होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयता, संतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

ऑस्ट्रेलियाई संसद की कार्यवाही के दौरान अपनी बेटी को स्तनपान कराकर इतिहास रचने वाली सीनेटर लैरिसा वा‌र्ट्स
असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएं, अपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. इन्हें न माता से मतलब है, न शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. बाजार के लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग हों, चाहे पैड का नीला-लाल रंग हो, कंडोम की कामुकता हो, अगरबत्ती में छिपी मादकता हो, ब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गए, बहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?

05 फ़रवरी 2018

देह और यौन सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ती चर्चाएँ

जिस तेज़ी से समाज बदल रहा है, उतनी तेज़ी से समाज में चर्चाओं के विषय में भी परिवर्तन हो रहा है. ये बदलाव किसी तरह की सामाजिकता के चलते आता हुआ नहीं है बल्कि इसके पीछे भी एक तरह का सेक्सुअल कारक काम कर रहा है. सामान्य रूप से देखा जाए तो ऐसा लगता है जैसे समाज और यहाँ के चंद जागरूक नागरिक समाजिक बदलाव लाने को सचेत हैं. वे इसी सचेतन दशा में इन चर्चाओं को आगे लाते रहते हैं. वैसे समाज में कहीं भी किसी बदलाव के लिए चर्चाओं का होना ज़रूरी है. समाज में ही क्या कहीं भी किसी तरह के परिवर्तन के लिए चर्चा होती ही है. घर में कोई काम होना है तो चर्चा तय है. किसी की पढ़ाई का मामला हो, किसी की शादी का मामला हो, किसी की ख़रीददारी होनी हो, किसी के रोज़गार का विषय हो सभी में चर्चा का होना मुख्य है. होना भी चाहिए क्योंकि चर्चा करने से सम्बंधित विषय पर उपयुक्त राय मिल जाती है या फिर सही राह दिख जाती है. वैसे भी समवेत चर्चा से निकले निर्णयों के आधार पर ठोस परिणाम मिलने की अपेक्षा रहती है. इस अपेक्षा पर वे चर्चाएँ ही खरी उतरती हैं जिनमें कुछ सार्थकता होती है. इधर कुछ समय से बदलाव के दौर से गुज़रता समाज अतिशय चर्चाबाज़ हो गया है. चंद सार्थक चर्चाओं के चारों तरफ़ निरर्थक चर्चाओं की भीड़ लगी हुई है. सबकी अपनी चर्चाएँ हैं, सबके अपने मंतव्य हैं. 

चर्चाओं के चलते दौर लगातार परिवर्तित होकर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ जाते हैं. वैसे इधर चर्चाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अधिकता देखने को मिल रही है. चर्चा ही क्या दैनिक क्रियाकलाप भी इसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं. स्त्री ने ये किया, उस महिला ने वो पहना, फ़लाँ लड़की का फ़लाँ लड़के के साथ चक्कर है, वो आदमी उस महिला को घूर रहा है, फ़लाँ लड़का रोज़ नई लड़की को घुमा रहा है, उस व्यक्ति ने उस महिला को छुआ, वो उसे देख मुस्कुराई, उसने उसे अजीब नज़रों से देखा आदि-आदि विषय तो रोज़ चर्चा में रहते ही हैं. इनके अलावा भी कुछ क्रांतिकारी विषय चर्चा में आने लगे हैं. इनके मूल में समाजिक बदलाव की बात कही जाती है, किसी गोपन विषय पर अगोपन होने की मंशा व्यक्त की जाती है, व्यक्तिगत विषयों पर खुली बहस करवाने की बात की जाती है. सोशल मीडिया पर एक हैशटैग आंदोलन शुरू होता है और फिर सब खुलकर चर्चाओं में शामिल होने लगते हैं. फिर चर्चा काम प्रदर्शन शुरू होने लगता है. कौन कितनी अश्लीलता से खुलकर सामने आ सकता है, इसकी होड़ लग जाती है. कौन कितना अशालीन लिख सकता है, इस पर ज़ोर दिया जाने लगता है. किसके विषयों में, भावाभिव्यक्ति में कामुकता अधिक समाहित हो सकती है, इसको प्रमुखता दी जाने लगती है. महिला-पुरुष सम्बन्धों के सार्थक, सकारात्मक विस्तार के लिए शुरू होने वाली चर्चाएँ देह-विमर्श के रूप में बदलने लगती हैं. किसके दाग़ अच्छे हैं, किसकी दैहिक संतुष्टि अधिक है, कौन कितने मिनट टिक सकता है आदि चर्चा के विषय बनने लगते हैं. 

स्त्री हो या पुरुष, उसके सम्बन्धों को जब तक देह की तराज़ू पर तौला जाता रहेगा तब तक खुला विमर्श कामुकता, अश्लीलता की कहानी ही लिखता रहेगा. जिस तरह स्त्री देह की समस्या को लेकर खुली चर्चा की वकालत की जा रही है, उससे क्या लगता है कि सारी समस्या सुलझ जाएगी? क्या लगता है कि आज के तकनीकी, इंटरनेट युग में लोगों को माहवरी, उसकी समस्या, स्त्री की परेशानी के बारे में जानकारी न होगी? क्या लगता है कि ऐसे लोग पैड के बारे में न जानते होंगे? क्या लगता है कि खुली चर्चा से सभी एक-दूसरे की मदद करने लगेंगे उन पाँच दिनों में? क्या खुली चर्चा की सार्थकता तब होगी जब पारिवारिक मर्यादा को भूल लोग आपस में उन दिनों की चर्चा करने लगेंगे? आधुनिकता के कथित आवरण को ओढ़कर हम सोचने लगे हैं कि खुले दिमाग़ और विचार के हो गए हैं. जहाँ आज भी परीक्षा ड्यूटी के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा लड़की के हाथों  नक़ल  पर्ची छीनना छेड़खानी माना जाता हो, बाज़ार में किसी सहायता के लिए महिला  पुकारना या उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना फ़्लर्ट करना समझा जाता है, ज़हम महिला को देखना भी अपराध की श्रेणी में आता हो वहाँ ख़ुद महिलाओं से उनके पीरियड्स पर, पैड पर, उसके दाग़ पर खुली चर्चा की अपेक्षा करना समझा जा सकता है. ऐसे लोगों से, जो इस तरह के विषयों पर खुली चर्चा का दम भरते हैं, एक सवाल कि किसी ऐसी युवती  जो अपने काम करने में सक्षम नहीं है, किसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई द्वारा इसके पैड को बदलना-पहनाना सम्भव है? 

चर्चाएँ हों, खुलकर हों, इन्हीं विषयों पर हों पर उनके उद्देश्य को भटकाया न जाए, भटकने न दिया जाए. और ऐसा हाल-फ़िलहाल सम्भव नहीं दिखता है. 

23 अगस्त 2015

पोर्न के लिए भी है व्यक्तिगत स्वतंत्रता

एक तरफ मोमबत्तियां लेकर निकलते लोग, दूसरी तरफ पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध का विरोध करते लोग, क्या कहा जाये कि भटकाव का दौर चरम पर है या फिर हम सभी भटकाव का शिकार हैं? विरोध की राजनीति इस कदर होने लगेगी ऐसा सोचा जाना मुमकिन न था मगर जिस तरह से पोर्न साइट्स के प्रतिबन्ध को लेकर लोग मुखर होकर सामने आये उससे लगा कि नहीं, विरोध करने के लिए किसी भी निर्णय का विरोध किया जा सकता है. बिना आगा-पीछा सोचे कि पोर्न साइट्स का होना अथवा न होना हमारे घर, परिवार, बच्चों पर क्या प्रभाव डालेगा, हमने विरोध का झंडा बुलंद कर लिया. इस बुलंद किये गए झंडे के नीचे विरोधी स्वर अब गौरवान्वित महसूस कर रहे होंगे कि उनके जबरदस्त विरोध के चलते सरकार को अपना निर्णय चंद घंटों में ही बदलना पड़ा. विरोधी किस आत्मविश्वास से कहने में लगे थे कि आखिर सरकार को ये अधिकार किसने दिया कि अब वो तय करे कि लोगों को क्या देखना है, क्या नहीं. दलील इस बात की कि आखिर व्यक्तिगत रूप से क्या देखना, दिखाना चाहिए ये व्यक्ति के अपने विवेक पर हो. सही भी है, होना भी यही चाहिए पर क्या इस होने में, इस स्वतंत्रता में अपने परिवार को संयुक्त रूप से शामिल किया जा सकता है? क्या अपने माता-पिता, भाई-बहिन, बेटी-बेटा के साथ बैठकर इन साइट्स का ‘आनन्द’ उठाया जा सकता है? स्वतंत्रता की दृष्टि से क्या अपने घर-परिवार के सदस्यों के साथ ऐसी साइट्स के दृश्यों की चर्चा की जा सकती है? यदि ऐसा हम अपने परिवार के सदस्यों के साथ नहीं कर सकते तो फिर किसके लिए था विरोध? क्या महज अपनी कामेच्छा को आभासी रूप से संतुष्टि देने के लिए? कहीं न कहीं इस पोर्न कारोबार का एक हिस्सा बनने के लिए? या फिर मात्र इस कारण कि केन्द्र सरकार का विरोध करना है?
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समाज में इधर लगातार यौन दुष्कर्म की घटनाएँ बढ़ रही हैं, बलात्कार-सामूहिक बलात्कार की खबरें नित्य ही सामने आ रही हैं, छोटी-छोटी मासूम बच्चियों तक को अब शिकार बनाया जा रहा है, ऐसे में पोर्न साइट्स के प्रतिबन्ध को सकारात्मक रूप से लिए जाना चाहिए था. अरबों-खरबों के कारोबार को एक झटके में प्रतिबंधित कर देना किसी भी सरकार के बूते की बात नहीं है, इसके बाद भी यदि ऐसा कोई कदम उठाया गया था तो उसके समर्थन में पुरजोर तरीके से आना चाहिए था मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. बलात्कार की घटनाओं के साथ उठती बहस में हर बार पहनावे को लेकर सवाल खड़े होते हैं और उतनी ही बार उसके विरोध के स्वर सुनाई देने लगते हैं. ये माना जा सकता है कि पहनावा शत-प्रतिशत बलात्कार, छेड़छाड़ में प्रभावी नहीं होता मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि दृश्य का मानव-मष्तिष्क पर सर्वाधिक प्रभाव होता है. दृश्य-श्रृव्य माध्यम हमेशा से मानसिकता को प्रभावित करने में अहम् रहा है, उसके द्वारा सहज रूप में दिमागी परिवर्तन किये जा सकते हैं, दृश्य का प्रभाव लम्बे समय तक और बहुत गहराई तक होता है. पोर्न साइट्स के दृश्यों का देखा जाना, अंग-दिखाऊ वस्त्रों का पहना जाना, देहयष्टि के उभारों को कामुकता-पूर्ण तरीके से प्रदर्शित करते वस्त्रों को धारण करना आदि कामुक इंसान के मन-मष्तिष्क को सेक्स-संबंधों की दृष्टि से प्रभावित करता है. ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति के पास शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने की सुलभता है, जिस व्यक्ति के पास अपनी कामुकता को शांत करने का कोई सहज रास्ता है वो तो अपनी मानसिक उद्देलना से बाहर निकल आता है. इसके उलट वे व्यक्ति जो अपनी यौनेच्छा को शांत करने का मार्ग नहीं तलाश पाते हैं, उनके पास कोई सुगम रास्ता नहीं है वे दुष्कर्म की घटनाओं को अंजाम देने लगते हैं. यहाँ उन व्यक्तियों को अपवादस्वरूप समझा जा सकता है जो सब कुछ सहज उपलब्ध होने के बाद भी यौनिक दुष्कर्म को अंजाम देते हैं, ऐसे लोगों को यौन-विकृत कहा जा सकता है.

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बहरहाल, विरोधी अपने मकसद में कामयाब रहे. पोर्न साइट्स से प्रतिबन्ध हट गया सिर्फ चाइल्ड पोर्नोग्राफी वाली साइट्स पर ही प्रतिबन्ध रहेगा. ऐसे में इन्हीं विरोधियों से सवाल किया जाना चाहिए कि आखिर कौन तय करेगा कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी वाली साइट्स कौन-कौन सी हैं? वैसे भी, इन विरोधियों के मन का हो गया है तो वे सब अपने-अपने कमरों में घुसे पोर्न साइट्स का आनंद उठाने में लगे होंगे और हो सकता है कि उनके बच्चे उनकी आँखों से दूर कहीं बंद कमरे में इसके लाइव संस्करण का आनन्द उठा रहे हों. आखिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता तो सबके लिए एकसमान है.

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20 अगस्त 2015

मुखिया के बोल कुबोल


दूसरे पर आरोप लगाने के, दूसरे को नीचा दिखाने के  हम सब इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि इसे अपनी आदत ही बना बैठे हैं. किसके लिए, कब कुबोल बोल जाएँ इसका अंदाज़ा ही नहीं रहता. हालाँकि कई बार ऐसा अनजाने में होता है किन्तु जब ऐसा बार-बार, लगातार होता रहे तो समझा जा सकता है कि ये हमारी मानसिकता है, हमारी आदत में शुमार है. कुछ इसी तरह का प्रदर्शन हाल में मुखिया के द्वारा किया गया, जिनकी जुबान पूर्व में भी लड़खड़ा चुकी थी. इस लड़खड़ाती जुबान की यात्रा ‘लड़कों के गलतियाँ होती रहती हैं’ से लेकर ‘चार पुरुष एक महिला का रेप नहीं कर सकते’ तक आ चुकी है. इस तरह के बयानों से उनकी मानसिकता तो समझ आती है किन्तु ये समझना मुश्किल है कि कुबोलों की ये यात्रा यहीं थमेगी अथवा और विकृत रूप में सामने आएगी.
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समझ नहीं आता कि आखिर इनके साथ समस्या कहाँ है? ऐसा भी नहीं है कि मुखिया मुँह में चाँदी की चम्मच लेकर पैदा हुए थे; ऐसा भी नहीं है कि उनको विरासतन राजनीति मिली हो; ऐसा भी नहीं है कि प्रदेश की सत्ता उनको बहुत सहजता से उपलब्ध हो गई हो, ऐसे में जबकि कोई व्यक्ति जमीन से उठकर इतनी ऊँचाई पर पहुंचा हो उसको किसी जाति-विशेष मात्र का समर्थन नहीं मिला होगा; लिंग-विशेष का समर्थन नहीं मिला होगा; उम्र-विशेष का समर्थन नहीं मिला होगा. ज़ाहिर सी बात है कि सब धर्मों का, सभी जातियों का, सभी लिंग का, सभी आयु-वर्ग का समर्थन उसके साथ है, तब उम्र के इस पड़ाव पर महिलाओं के लिए इस तरह से आपत्तिजनक बयान देकर वे क्या साबित करना चाहते हैं? किस वोट-बैंक को अपने साथ लाना चाहते हैं? किसे प्रभावित करना चाहते हैं? संभव है कि ऐसी मानसिकता के पीछे अहंकारी भाव रहता हो? प्रदेश में सत्ता का शीर्ष उनके पास है ही, देश में भी सत्ता का शीर्ष वे छू चुके हैं, ये और बात है कि शीर्ष पद प्राप्ति में वे एक कदम से ही चूक गए थे. ऐसे में सत्ताधारी हनक में ये लोग आम इन्सान को भुनगा मात्र समझने लगते हैं. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि ऐसे विवादित बयान महज मुखिया द्वारा नहीं दिए गए वरन उनकी पार्टी के कई नेताओं द्वारा समय-समय पर अपनी मानसिकता को दर्शाया गया है; कई दूसरे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय दलों के वरिष्ठ नेताओं द्वारा भी जुबानी नियंत्रण छूटा है. सत्ता की, शक्ति की हनक को इसका कारण इसलिए भी माना जा सकता है क्योंकि ऐसे कुबोल के पीछे केवल पुरुष ही नहीं हैं वरन महिलाएं भी शामिल हैं.  
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यहाँ मुखिया की बयानबाज़ी के सम्बन्ध में उनकी सत्ता हनक तो हो सकती है, साथ ही उनका पुत्र-प्रेम भी इसका कारण हो सकता है. देखा जाये तो उनके पुत्र के सत्तासीन होने के बाद से वर्तमान तक प्रदेश की स्थिति किसी भी रूप में संतोषजनक भी नहीं कही जा सकती है. कानून व्यवस्था बुरी तरह से ध्वस्त है, अराजकता अपने चरम पर है, गुंडाराज सड़कों से गुजरता हुआ घरों के भीतर तक घुस गया है. अपहरण, हत्या, छेड़छाड़, बलात्कार आदि की घटनाएँ आम हो चुकी हैं. ऐसे में मुखिया को आगामी वर्षों में होने वाले विधानसभा चुनाव का डर दिखाई देने लगा है, साथ ही पुत्र के दरकिनार किये जाने का भय भी उन पर हावी हो रहा होगा. आखिर एक बार तो दवाब की राजनीति करके पुत्र को सत्ता-सुख दिलवाया जा सकता है किन्तु ऐसा बार-बार कर पाना संभव नहीं होगा. संभव है कि सत्ता का उच्च अतीत, सत्ता की वर्तमान हनक और सत्ता से बेदखल का भावी भय उनको विक्षिप्त सा कर रहा हो. इस संक्रमण की स्थिति का नकारात्मक प्रभाव उनके मन-मष्तिष्क पर, उनकी जुबान पर हो गया हो और वे ऐसे कुबोल लगातार बोल जा रहे हों. बहरहाल सत्यता कुछ भी हो किन्तु एक बात स्पष्ट है कि राजनीति के उच्च पायदानों पर बैठे व्यक्तियों के लिए आम इंसान कीड़े-मकोड़े के समान है और उसमें भी उनके निशाने पर सहजता से महिलाएं ही आ जाती हैं. ऐसी सोच, ऐसे बयान निंदनीय हैं, इनकी समवेत निंदा होनी भी चाहिए और मौका लगने पर ऐसे लोगों को सबक भी सिखाया जाना चाहिए.

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11 अगस्त 2015

धर्म के नाम पर पाखंड


एक और नाम धर्म-कर्म में उछलकर सामने आया है, साथ में परिपाटी सा बनाये रखा हुआ एक सम्मानित शब्द जोड़कर. कुछ ‘बापू’ जोड़कर सामने आये, कुछ ‘बाबा’ लगाकर, कुछ ‘साध्वी’ के साथ आये तो ये ‘माँ’ जोड़कर भक्तों के सामने प्रकट हुई. जी हाँ, उन्हीं राधे माँ की चर्चा आजकल छिड़ी हुई है जिनपर किसी समय एक महिला पर हिंसा करने का आरोप लगा था और अब अश्लीलता फ़ैलाने का आरोप लगा है. भक्तिमय दरबार की तस्वीरें आने के साथ-साथ अब जो तस्वीरें सामने आई हैं उनमें वे किसी भी कोण से धार्मिक संत, साध्वी तो समझ नहीं आती हाँ, एक अच्छी भली मॉडल का भ्रम पैदा करती हैं. इन तस्वीरों को यदि अश्लीलता का पर्याय माना-समझा जाये तो फिर फ़िल्मी हीरोइन, विज्ञापनों की तमाम मॉडल्स को, टीवी आदि सहित अन्य कार्यक्रमों में प्रस्तुतीकरण देती महिला कलाकारों के खिलाफ भी कार्यवाही की जा सकती है, जो अत्यल्प वस्त्रों में समाज में अश्लीलता फैलाती रहती हैं. राधे माँ के नाम से संत-जगत में प्रसिद्द इस महिला के बारे में कहा जाता है कि वो अपने भक्तों को अनोखे अंदाज़ में आशीर्वाद देती है, उनके साथ घुलमिल कर नाचती है, आशीर्वाद में गले लगाती है, गुलाब का फूल अपने हाथ से देती है. राधे माँ की भक्ति का आनंद उठाने पहुंचे कई भक्तों ने तो यहाँ तक आरोप लगाये हैं कि उनके भक्ति दरबार में अश्लीलता का माहौल रहता है, उनकी और शिष्यों-भक्तों की भाव-भंगिमाएँ भी अश्लील होती हैं. कुछ इसी तरह के अन्य दूसरे आरोपों के चलते कुम्भ मेले में उनके प्रवेश को निषिद्ध कर दिया गया और इधर खबर मिली है कि उनके विरुद्ध सम्मन जारी किया जा रहा है.

सत्यता क्या है, कैसी है, कितनी है इस पर अब देशव्यापी बहस छिड़ी हुई है; सोशल मीडिया में राधे माँ के पक्ष-विपक्ष में अजब-अजब तर्कों-कुतर्कों की भरमार दिख रही है; आरोप-प्रत्यारोप के बादल गहराते, बरसते जा रहे हैं; उनके भक्त अपनी बात रख रहे हैं तो विरोधी अपने आरोपों को सत्य करने में लगे हैं. धार्मिक वातावरण में, धर्म-संसार में, संत-जगत में ये कोई पहला मामला सामने नहीं आया है जबकि किसी संत, साध्वी के चरित्र पर, उसकी हरकतों पर, उसके आश्रम, भक्ति-दरबार आदि के माहौल पर ऊँगली उठाई गई हो. इससे पहले भी कई-कई नाम संदेह के घेरे में आते रहे हैं और कई-कई का कानूनी तरीके से पर्दाफाश भी होता रहा है. अब इन संत महिला को कानूनी रूप से घेरे में लाये जाने की कवायद हो रही है, उसके विरुद्ध वातावरण का निर्माण हो रहा है, आरोपों का सिलसिला चल पड़ा है तब इसकी भी पहल आवश्यक लगती है कि ऐसे संतों-साध्वियों का वास्तविक उद्देश्य आखिर क्या होता है? एक साधारण सा व्यक्ति कैसे रातों-रात लाखों-लाख लोगों के लिए भगवान के रूप में दिखने लगता है? कैसे हजारों-लाखों लोग उसके एक इशारे पर उसकी बात मानने को तैयार हो जाते हैं? कैसे किसी अदना से व्यक्ति के पार धार्मिक कृत्य में संलिप्त होते ही अकूत संपत्ति जमा हो जाती है? इस पर भी चर्चा की जानी चाहिए कि आखिर मात्र हिन्दू धर्म से सम्बंधित संतों-साध्वियों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है? मीडिया में, समाज में, जागरूक कहे जाने वाले वर्ग में आलोचनाओं का शिकार आखिर महज हिन्दू धर्म ही क्यों होता है? ये भी गहन शोध का विषय है कि कहीं ऐसे लोगों को हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए अराजक तत्त्वों की तरफ से धन मुहैया तो नहीं करवाया जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये व्यक्तियों की धर्म सम्बन्धी कमजोर नस को पकड़ कर पहले उसकी भावनाओं के साथ स्वयं का तादाम्य स्थापित करते हैं और फिर धर्म के उच्च बिन्दु पर बैठने के बाद हिन्दू धर्म को रसातल में ले जाने के लिए संदेहास्पद कृत्यों में संलिप्त हो जाते हैं?

धर्म के नाम पर पाखण्ड फैलाते ये साधु, संत, साध्वियाँ जितने दोषी हैं उनसे कहीं कम वे लोग भी नहीं हैं जो इनके दरबारों को सजाने में लगे रहते हैं; इनके क्रियाकलापों को देव-क्रिया मानकर उनका अनुसरण करने लगते हैं; उन्हीं को भगवान समझकर उनके आगे नतमस्तक हो जाते हैं. जीवन की छोटी से छोटी ख़ुशी, समस्या के लिए ऐसे ढोंगियों का मुँह ताकना, इनके भरोसे अपनी जिन्दगी के फैसले करना, इन्हीं की तथाकथित दयादृष्टि पर अपने आपको निर्भर कर लेना आदि भी इनको समाज में स्थापित करवाता है. ऐसे में जबकि उनको आदर, सम्मान के उच्च पायदान पर बैठा दिया जाता है तब उनके विरुद्ध किसी भी तरह के आरोप समाज में वैमनष्यता को जन्म देते हैं. सामाजिक सौहार्द्र बिगाड़ने वाले प्रदूषकों के रूप में सामने आते हैं. ऐसे लोगों के विरोध के साथ-साथ चर्चा छिड़ जाती है कि गैर-हिन्दू धर्म के पाखंडियों को क्यों नहीं पकड़ा जाता है? क्यों नहीं गैर-हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों को कानूनी शिकंजे में जकड़ा जाता है? क्यों नहीं हिन्दू धर्म की कुरीतियों के नाम पर जबरन धर्मान्तरण करवाने वालों के विरुद्ध कार्यवाही की जाती है? ऐसे अन्य दूसरे सवाल भी समाज में विभेद पैदा करते हैं. एक दायित्व सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों का भी बनता है कि वे समाज में अपने क्रियाकलापों, धार्मिक अनुष्ठानों, धर्म के नाम पर लोगों को बहकाने वाले ढोंगियों का पर्दाफाश करें. लोगों को धर्म के नाम पर पाखंड कर रहे व्यक्तियों की वास्तविकता से परिचित करवाकर धर्म के साथ होने वाले खिलवाड़ को रोकने में मददगार बनें. ऐसा सबको समवेत रूप से करना होगा, भले ही वो किसी भी धर्म,जाति का ही क्यों न हो?

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28 जून 2015

आभासी दुनिया में दोहरा चरित्र


नैतिकता, शालीनता, मर्यादा आदि शब्दों के अनुपालन में इंसान किस कदर दोहरे चरित्र के दर्शन करवाता है ये खुद उस इंसान के लिए ही समझना मुश्किल है. कोई एक ही तरह का कार्य उसके लिए नैतिक होता है और दूसरे के द्वारा करने पर उसे उसमें अनैतिकता दिखाई देने लगती है. घर के भीतर के रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा-पहनावा आदि से लेकर सामाजिक क्रियाकलापों तक के निर्वहन में  इंसान द्वारा दोहरे मापदंडों का प्रयोग किया जाता है. किसी भी कदम के लिए उसके द्वारा निर्धारित वर्जनाएँ एक झटके में स्वयं उसी के द्वारा निष्प्रभावी सी कर स्वयं के लिए स्वीकार्य बना ली जाती हैं. समाज में, घर में महिलाओं-पुरुषों के निर्धारित कार्यों, उनके पहनावे, रहन-सहन, अन्य क्रियाकलापों आदि पर दिखने वाले विभेद को एकपल को नजरअंदाज़ कर भी दिया जाए तो भी बहुत कुछ ऐसा है जो पुरुष-पुरुष के क्रियाकलापों में, महिला-महिला के क्रियाकलापों में दोहरे चरित्र को दर्शाता है.
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इस दोहरे चरित्र-निर्वहन को समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सहजता से देखा जा सकता है. सामाजिक आयोजनों में, कार्यक्षेत्र में, परिवार में इस तरह की मानसिकता के चलते ही वाद-विवाद की स्थितियाँ पैदा होती हैं. सामाजिक पटल पर इस तरह के दोहरे चरित्र के लोग पहले सहजता से चिन्हित नहीं किये जा पाते थे और उनकी पहचान छिपी रहने के कारण बहुधा विभ्रम की स्थिति बनी रहती थी. कालांतर में सामाजिक विकास ने तकनीक को विकसित किया, व्यक्ति को अपने आपको प्रदर्शित करने के विविध आयाम विकसित किये और उसका परिणाम अथवा दुष्परिणाम ये हुआ कि सोशल मीडिया पर दोहरे चरित्र के लोगों की भरमार देखने को मिलने लगी. ऐसा नहीं कि सोशल मीडिया के कारण से दोहरे चरित्र के इंसान जन्म लेने लगे, ये फितरत किसी भी इंसान में पहले से विराजमान थी, बस सोशल मीडिया ने उसे सामने ला दिया. इंसान की जिस दोहरी मानसिकता को समझने में वर्षों लग जाया करते थे वे सोशल मीडिया के चलते एक पल में सामने आने लगे. इस तरह की दोहरी मानसिकता वाले लोग अपनी पोस्ट के सहारे, अपने स्टेटस के सहारे, अपनी विविध मुद्राओं में चिपकाई जाने वाली फोटो के सहारे खुद को महान आदर्शवादी, परम सत्यवादी, सद्चरित्र वाला प्रदर्शित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं और यही लोग परदे के पीछे से अपना निकृष्टम, कुंठित, मानसिक दीवालियेपन का चेहरा प्रदर्शित करने लगते हैं. इनमें से बहुत तो इस मानसिकता के होते हैं जो महिलाओं की दृष्टि में भले बनने के चक्कर में सार्वजानिक रूप से महिलाओं को आदर देने वाली पोस्ट लगाते हैं और देर रात महिलाओं के मैसेज बॉक्स में घुस प्रणय निवेदन करने से भी नहीं चूकते. कुछ इस तरह की स्थितियों का भुक्तभोगी पुरुष वर्ग भी होता है जहाँ उसके साथ इस तरह का दोहरा मापदंड महिलाओं द्वारा अपनाया जाता है. महिला-समर्थक बनी ऐसी महिलाएँ पुरुषों को लम्पट होने का, महिला-शोषक होने के साथ-साथ उनके देह के लालची होने तक का आरोप लगाती देखी जा सकती हैं.
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दरअसल देखा जाये तो इस तरह की दोहरी मानसिकता वाले इंसान खुद में न तो पुरुष कहे जाने योग्य हैं और न ही महिला. ऐसी मानसिकता वाले इंसानों का एकमात्र उद्देश्य किसी न किसी रूप में खुद को सामाजिक प्राणी साबित कर सामने वाले का शोषण करना होता है. क्या घर, क्या बाहर इनके लिए पुरुष-महिला दोनों ही खिलौने सदृश्य होते हैं. ऐसी मानसिकता के इंसान महिलाओं को पुरुष-भोगी, तो पुरुषों को स्त्री-देह का भूखा बताने के अतिरिक्त दोनों को समलैंगिक साबित करने से भी नहीं चूकते हैं. यही वे प्राणी होते हैं जो अपने घरों की मासूम बेटियों, बालकों का यौन शोषण करते हैं; यही वे लोग हैं जो सामाजिक परम्पराओं की दुहाई देते हुए पहनावे, रीति-रिवाजों, रहन-सहन पर उंगली उठाकर सामाजिक वैमनष्यता पैदा करते हैं; यही वे लोग होते हैं जो स्त्री-पुरुष की बराबरी का दम भरते हैं किन्तु मौका मिलते ही दोनों का शोषण करने से नहीं चूकते हैं; यही वे इंसान होते हैं जिनके लिए खुद को ईमानदार, आदर्श, नैतिकता का पुतला साबित किया जाता है और इसी चेहरे की आड़ में काले कारनामे किये जाते हैं. वास्तविकता ये है कि इन दोहरी मानसिकता वाले लोगों ने ही समाज का चाल-चलन बिगाड़ दिया है; सामाजिक सौहार्द्र को ख़राब किया है; इंसान-इंसान के बीच गहरी खाई का निर्माण किया है.
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अब जबकि ऐसे लोगों को सोशल मीडिया के कारण से सहजता से चिन्हित कर लिया जा रहा है; इनको अपनी पहचान छिपाए रखना मुश्किल हो गया है तो लोगों का ये कर्तव्य बनता है कि इनका सामाजिक बहिष्कार किया जाये. समाज में, सोशल मीडिया में ऐसे लोगों के दोहरे चेहरे को सबूत के साथ उन सबके सामने लाना आवश्यक है जिनको ऐसे लोगों के दूसरे चेहरे की जानकारी नहीं है. ये सोचकर कि ऐसे लोग महज सोशल मीडिया में सक्रिय हैं; मैसेज बॉक्स में जबरन घुसकर; हाय-हैल्लो के बहाने से अश्लील सन्देश भेजने के और क्या कर लेंगे, हम स्वयं ही कहीं न कहीं इनके अपराध को बढ़ाने का, इनको प्रोत्साहित करने का काम कर रहे हैं. देखा जाये तो सोशल मीडिया ऐसे लोगों के लिए एक तरह की प्रयोगशाला के रूप में कार्य करती है, जहाँ ये लोग अपनी विकृत मानसिकता का, अपनी कुंठित सोच का, अपने दोहरे चरित्र का प्रयोग कर उसकी सफलता-असफलता की जाँच करते हैं. न केवल समाज के लिए वरन अपने छोटे-छोटे मासूम बच्चों के लिए, समाज में फैलने वाले विद्वेष को रोकने के लिए, आपसी वैमनष्यता को दूर करने के लिए ऐसे लोगों का बेनकाब होना तो आवश्यक है ही, इनको सजा मिलनी भी आवश्यक है. अब महज ‘सब चलता है’, ‘जो होगा देखा जायेगा’ सोचकर शांत बैठने की आवश्यकता नहीं क्योंकि ऐसे इंसान न केवल समाज को वरन हमारे घरों को भी दूषित कर रहे हैं. आइये उठ खड़े हों और ऐसे दोहरे चरित्र वालों के चेहरे से उनका नकली चेहरा निकाल कर वास्तविक कलुषित चेहरे से समाज को परिचित करवाएं, इनको दण्डित करवाएं.

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