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22 अप्रैल 2026

बाईस को हुए इक्कीस

कभी अपने बड़े-बुजुर्गों को कहते सुना था कि समय पंख लगाकर उड़ता है. ऐसा होता हुआ अब समझ में भी आता है. पता नहीं आप लोगों को ऐसा महसूस होता है नहीं पर हमें तो लगता है कि जैसे समय वाकई उड़ता है. वर्तमान में खड़े होकर अतीत की किसी भी घटना को याद किया जाये तो लगता है जैसे कल की ही बात है मगर जब समय का आकलन किया जाता है तो समझ आता है कि बहुत-बहुत समय गुजर गया है. ऐसा न केवल सुखद घटनाओं के सन्दर्भ में होता है बल्कि दुखद घटनाओं के सन्दर्भ में भी होता है.

 

अपने जीवन की बहुत सी न भुलाये जाने वाली घटनाओं में एक घटना आज, 22 अप्रैल को घटित हुई थी. आज पलट कर उस दिन को याद किया तो समझ आया कि ये कल की घटना नहीं बल्कि 21 वर्ष पुरानी बात है. चूँकि इस पर हमें आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पहले दिन से लेकर आजतक एक पल को भी उस घटना को भुला नहीं सके हैं. भुलाना चाहते तो भी न भुला पाते, आखिर वो घटना महज एक घटना नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व से जुड़ गई घटना थी. सुबह उठने से लेकर देर रात सोने तक एक-एक पल, एक-एक कदम, एक-एक काम उस घटना से जुड़ा रहता है, उस घटना को जीवित बनाये रखता है. ऐसी स्थिति में उस दिन को, उस घटना को भुलाया जाना सम्भव ही नहीं.

 



बहरहाल, जीवन की साँस, धड़कन की तरह हमारी ज़िन्दगी से जुड़ चुकी वह घटना आज पूर्ण रूप से बालिग़ हो गई है. 21 वर्ष की समयावधि पलक झपकते नहीं गुजरी है बल्कि इन 21 वर्षों के गुजरने ने बहुत बड़ी कीमत वसूली है, बहुत सारा दर्द दिया है, बहुत सारा कष्ट दिखाया है. बावजूद इसके चलना जारी है, समय का पूरे उत्साह से गुजरना बना हुआ है. शौक जिंदा है, एहसास जिंदा है.


19 मार्च 2025

अन्तरिक्ष यात्री बने अनुकरणीय उदाहरण

अन्तरिक्ष में फँसने के बाद भारतीय मूल की अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स की धरती पर सकुशल वापसी हो गई है. इनके साथ क्रू-9 के दो और अन्तरिक्ष यात्री अमेरिका के निक हेग और रूस के अलेक्सांद्र गोरबुनोव भी आये हैं. सुनीता विलियम्स और उनके सहयात्री बुच विल्मोर को अन्तरिक्ष से लाने वाला स्पेसएक्स का ड्रैगन अंतरिक्ष यान भारतीय समयानुसार 19 मार्च 2025 को प्रातः 3 बजकर 27 मिनट पर फ्लोरिडा तट पर उतरा. 5 जून 2024 को सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर ने नासा और बोइंग के आठ दिन के संयुक्त क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन के लिए बोइंग के अंतरिक्ष यान द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के लिए उड़ान भरी थी. इसका उद्देश्य बोइंग के स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट द्वारा किसी अन्तरिक्ष यात्री को अन्तरिक्ष में ले जाने और वापस लाने की क्षमता का परीक्षण करना था. अन्तरिक्ष स्टेशन पर मात्र आठ दिन के परीक्षण और खोज के लिए गए इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को सम्बंधित यान के थ्रस्टर में आई गड़बड़ी के चलते नौ महीने से ज्यादा समय तक रुकना पड़ा.

 



सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में कुल 286 दिन बिता चुकी हैं. इसके साथ ही वह एक यात्रा में आईएसएस पर सबसे ज्यादा दिन बिताने वाली तीसरी महिला वैज्ञानिक बन गई. एक यात्रा में सबसे अधिक समय बिताने वाली महिला अन्तरिक्ष यात्री के रूप में पहले स्थान पर क्रिस्टीना कोच हैं, जिन्होंने 328 दिन बिताये हैं, वहीं पिग्गी वीटस्न 289 दिन व्यतीत करने के साथ दूसरे स्थान पर हैं. सुनीता विलियम्स अब तक नौ बार स्पेस वॉक कर चुकी है. इस दौरान उन्होंने 62 घंटे 6 मिनट स्पेसवॉक में बिताए हैं. इस मामले में वे पहले स्थान पर हैं. सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर के अन्तरिक्ष स्टेशन से उनको लाने के प्रयास किये गए. तकनीकी और अन्य कारणों से हर बार वापसी के कार्यक्रम को स्थगित करना पड़ा. ऐसी विषम स्थिति के बाद भी सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर ने खुद को सक्रिय बनाये रखा. उन्होंने अंतरिक्ष में नौ महीने से अधिक अवधि तक रहने के दौरान 150 से ज्यादा प्रयोग किए. उन्होंने स्पेस स्टेशन का रखरखाव करने के साथ-साथ स्पेसवॉक करते हुए अंतरिक्ष यान की मरम्मत भी की. अन्तरिक्ष स्टेशन के उपकरणों की मरम्मत करते हुए एनआईसीईआर एक्स-रे टेलीस्कोप पर लाइट फिल्टर लगाए और एक अंतरराष्ट्रीय डॉकिंग एडेप्टर पर एक रिफ्लेक्टर डिवाइस को भी बदला.

 

अब जबकि दोनों अन्तरिक्ष यात्री धरती पर वापस लौट आये हैं तब भी उनकी दिक्कतें दूर होने वाली नहीं हैं. लौटने के बाद उन दोनों को बेबी फीट समस्या का सामना करना पड़ेगा, जिस कारण चलने में परेशानी होगी. लम्बे समय तक अंतरिक्ष में रहने के कारण पैर की ऊपरी मोटी चमड़ी खत्म हो जाती है. इससे पैर छोटे बच्चों की तरह मुलायम और कमजोर हो जाते हैं. जीरो गुरुत्वाकर्षण के कारण पैर कमजोर होने लगते हैं, चलने-फिरने, संतुलन बनाने में परेशानी होती है. इसके अलावा मनोवैज्ञानिक समस्याओं, बेचैनी, अवसाद, बोलने में दिक्कत जैसी अनेक समस्याएँ सामने आती हैं. इसके चलते सामान्य जीवन स्थिति आने में काफी समय लग सकता है.

 



इस तरह की अनेकानेक समस्याओं का सामना करने में, उनसे उबरने में अब दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को संभवतः उतनी मानसिक परेशानी नहीं होगी, जितनी कि अन्तरिक्ष में रहते हुए हुई होगी. यहाँ तो वे दोनों अब अपने परिजनों की देखभाल में, योग्य चिकित्सकों की निगरानी में, धरती के वातावरण में रहते हुए खुद को सामान्य बनाने का प्रयास करेंगे. विचार करिए अन्तरिक्ष की उस स्थिति का जहाँ न तो पृथ्वी जैसा वातावरण है, जहाँ जीरो गुरुत्वाकर्षण वाली असामान्य स्थिति है, नितान्त अकेलेपन के बीच सिर्फ मशीनों का साथ है. इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों से आज के उन युवाओं को, उन अनेकानेक लोगों को सीख लेने की आवश्यकता है जो जरा-जरा सी स्थिति में खुद को तनावग्रस्त कर लेते हैं. किसी भी छोटी सी समस्या को अपने जीवन से बड़ा मानते हुए अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. किसी भी एक-दो असफलताओं के कारण हताशा-निराशा में, अवसाद में चले जाते हैं.

 

निश्चित ही इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों का मानसिक स्तर, उनकी मानसिक शक्ति अत्यंत प्रबल रही होगी क्योंकि अन्तरिक्ष स्टेशन के लिए उड़ान भरते समय दोनों के मन-मष्तिष्क में स्पष्ट रूप से सिर्फ आठ दिन रुकने का भाव रहा होगा जबकि उनको नौ महीने से अधिक समय तक रुकना पड़ गया. इस तरह की स्थिति निश्चित रूप से अवसाद पैदा करने वाली हो सकती थी मगर दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों ने खुद को अपने काम में लगा दिया. अन्तरिक्ष के अकेले वातावरण में खुद को किसी भी तरह की नकारात्मकता से दूर रखने के लिए उनका मिशन सम्बन्धी कामों में लगे रहना, अन्तरिक्ष सम्बन्धी भावी स्थितियों के लिए नए विकल्पों की तलाश करना उनकी जिजीविषा को दर्शाता है. शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को स्वस्थ रखने के लिए उनके द्वारा खान-पान के साथ-साथ योग, व्यायाम पर भी ध्यान दिया गया. आज अवसरों की अनुपलब्धता, सकारात्मक वातावरण की कमी का होना, कार्य स्थितियों का अनुकूल न होना आदि समस्याओं की चर्चा करना आम बात है. ऐसे में इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों को अनुकरणीय उदाहरण के रूप में स्वीकार्य होना चाहिए. ये आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए समाज में अनुकूल वातावरण, सकारात्मक परिस्थितियाँ, सहयोगात्मक भूमिका आदि की उपस्थिति रहे. ऐसे में व्यक्ति को अपनी मानसिक स्थिति को, आत्मविश्वास को सकारात्मक रूप से सशक्त बनाये रखने की दिशा में काम करना चाहिए. परिस्थितियों का रोना रोने से बेहतर है कि उनको सुधारने  का प्रयास करना चाहिए. निस्संदेह दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों की सकुशल वापसी के वैज्ञानिक क्षेत्र में नासा का सफल अभियान है, इसी तरह सामाजिक क्षेत्र के लिए दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों की मानसिक शक्ति, जिजीविषा, आत्मविश्वास अनुकरणीय उदाहरण है.  


03 मई 2021

आत्मबल से मिली साँसों को ज़िन्दगी

कल, 02 मई को खबर मिली कि शिवम मिश्रा जी की तबियत ठीक नहीं है। ऑक्सीजन लेवल 80-84 पर घूम रहा है। इसके बाद कई मित्रों को फोन खटखटाए सहायता के लिए। पवन मिश्रा जी, अजय कुमार झा जी, कंचन सिंह चौहान जी, ललित कुमार जी, छोटे भाई सुनील चौहान ने पूरी तत्परता, सक्रियता दिखाई। राजनीतिक, प्रशासनिक स्तर पर अलग सक्रियता बनी हुई थी। उधर मैनपुरी में शिवम के परिजन अपने प्रयास कर रहे थे।

इस दौरान शिवम से लगातार फोन से बातचीत होती रही। बातचीत में हँसी, मजाक भी होता रहा। उनको लखनऊ ब्लॉगर सम्मेलन की उनकी एक बात याद दिलाई, जबकि भोजन के समय हाॅल में भीड़ थी तो शिवम बोले थे कि कहो तो कमर का एक ठुमका लगा कर भीड़ इधर-उधर कर दें?

कल उनसे यही कहा कि जल्दी एक ठुमका लगा कर ये बीमारी इधर-उधर कर दो।

शिवम जी की सक्रियता ब्लॉग पर, सोशल मीडिया पर लगातार बनी रहती है। उनकी ज़िन्दादिली और मित्रता निभाने का जज्बा बहुत सारे लोगों को उनका प्रशंसक बनाए है। इसी के चलते सोशल मीडिया पर भी लगातार उनके स्वास्थ्य को लेकर लोगों के मैसेज, फोन आ रहे थे। काफी देर से शिवम जी के हालचाल न लिए थे सो फोन करने के बजाय रात 12:15 पर मैसेज किया तो उन्होंने ये चित्र भेजा। ऑक्सीजन लेवल देख अपार खुशी हुई। ये स्थिति बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के बनी हुई थी।



उसी समय उनके मैसेज "आप के ठुमके वाली बात की लाज रखनी थी" के साथ उनकी वीडियो काॅल आई। आवाज़ में वही पुरानी खनक, होंठों पर वही हँसी। 

ब्लॉग संसार के ज़िन्दादिल, यारबाज व्यक्तित्व ने अपनी ज़िन्दादिली से खुद को सुरक्षित घेरे में पहुँचाया। 

जो लोग किसी भी तरह से परेशान हैं, वे प्रेरणा ले सकते हैं शिवम मिश्रा से।

रात साढ़े बारह बजे वीडियो काॅल का स्क्रीनशॉट 

❤😍



वंदेमातरम्

10 दिसंबर 2019

प्रबल आत्मविश्वास ने ज़िन्दगी को जीना सिखलाया

किसी भी व्यक्ति के विकास में उसके आत्मविश्वास का बहुत बड़ा योगदान होता है. इस बात को न केवल कहा जाता रहा है बल्कि बहुत से व्यक्तियों ने इसे अमल में लाकर इसे सच भी साबित किया है. विश्वास से ओतप्रोत व्यक्ति के चेहरे की आभा, उसके बातचीत का तरीका, कार्य करने का ढंग सबसे अलग ही नजर आता है. उसका सबसे अलग अंदाज ही उसे सबका प्रिय भी बनाता है और जीवन में सतत सफलता की राह पर भी ले जाता है. विश्वास, आत्मविश्वास को बनाये रखना किसी और के हाथ में नहीं वरन उसी सम्बंधित व्यक्ति के हाथ में होता है. उसकी खुद की सोच, उसकी खुद की मनोदशा, उसकी खुद की प्रकृति निर्धारित करती है कि उसके विश्वास का बिंदु किस ऊँचाई तक जा सकता है.


अपने जीवन में अनेक व्यक्तियों से मिलना हुआ, जिनमें विश्वास का चरम देखने को मिला. बहुत से लोग ऐसे मिले जो सहज रूप में अपनी जीवन-शैली का निर्वहन करते आ रहे हैं. ऐसे लोगों के जीवन में भले ही सुविधाओं की अतिशयता न रही हो मगर उनके सामने समस्याओं का, मजबूरी का, किसी कमी का होना भी नहीं रहा है. ऐसे लोग बिना किसी परेशानी के, स्वयं ही अत्यंत सहजता से अपने विश्वास के द्वारा अपनी सफलता की राह निर्मित करते मिले. इसके साथ-साथ ऐसे लोगों से भी मिलना होता रहा जिनके जीवन में अभाव बुरी तरह से रहे. ऐसे लोगों से भी मिलना हुआ जिनके लिए किसी तरह की सशक्त, समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि उपलब्ध नहीं रही. बहुत से ऐसे लोग मिले जिन्होंने अपने जीवन का बहुत बड़ा समय समस्याओं को हल करने में, अपनी परेशानियों को हल करने में ही लगाया. बहुत से ऐसे व्यक्तियों से भी परिचय होता रहा जिनकी शारीरिक स्थिति सामान्य व्यक्तियों की तरह से नहीं रही. ऐसे सभी लोगों के पास भले ही संसाधनों का अभाव रहा हो, भले ही पारिवारिक समृद्धि उनके लिए रास्तों का निर्माण नहीं कर सकी हो, भले ही उनकी शारीरिक स्थिति ने उन्हें समाज में सामान्य व्यक्ति की तरह से अनेक क्रियाकलापों से दूर कर रखा हो मगर ऐसे लोगों ने अपने विश्वास के बलबूते, आत्मबल के सहारे खुद को अपने-अपने क्षेत्रों में स्थापित किया है.

आत्मविश्वास से लबरेज एक ऐसे व्यक्ति से आज लगभग दो दशक पुरानी दुर्घटना की याद के सहारे मिलना हुआ. उस समय अपने करीबी, बड़े भाई सरीखे अभिन्न मित्र के परिजन का एक ट्रेन दुर्घटना में अत्यंत गंभीर रूप से घायल होने का समाचार मिला. युवावस्था में कदम रखने के दौरान, जबकि आँखों में भावी जीवन के सपने बनने शुरू ही हुए होंगे, तकनीकी शिक्षा का आरम्भ अभी हुआ ही था लगा जैसे उसके सपने बिखर गए हैं. लगा जैसे कि जीवन आरम्भ होने के पहले ही किसी स्पीड ब्रेकर पर थमने सा लगा है. समय गुजरता रहा. उस होनहार युवक के बारे में लगातार जानकारियाँ मिलती रहीं. उसके द्वारा आत्मविश्वास के लगातार सहारे उन्नति के रास्ते पर बढ़ने के समाचार मिलते रहे. इन सबके बाद भी कभी मिलने का अवसर नहीं मिल सका. न मिलने के बाद भी महसूस होता रहा कि अपनी युवावस्था में दुर्घटना के द्वारा देह के स्तर से उपजी अक्षमता को उस होनहार, प्रसन्नचित्त, आत्मविश्वासी युवक ने जैसे हरा दिया है. अब जबकि उससे मिलना हुआ तो उसे वैसा ही पाया जैसा कि हम महसूस करते थे. आज पहली बार मिलना हुआ, उस युवक से. ढेर सारी बातें हुईं. पुरानी बातों को याद न करते हुए वर्तमान पर ही चर्चा हुई. हँसी-ख़ुशी के माहौल में उसका हँसमुख व्यवहार, विश्वास से दमकता चेहरा, मिलनसार व्यक्तित्व निश्चित रूप से उस निकटता को और बढ़ा गया, जो निकटता लगभग दो दशक पहले उसकी दुर्घटना की खबर सुनने के बाद बनी थी. निश्चित ही ऐसे युवक समाज में ऐसे लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं, जो सभी तरह से सक्षम होने के बाद भी अपनी असफलताओं का रोना रोते रहते हैं. खुद को समाज की मुख्यधारा से अपने कमजोर विश्वास के हाथों हाशिये पर लगाये रहते हैं.

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चित्र परिचय –
काले सूट में गीत, जो लगभग दो दशक पहले एक ट्रेन दुर्घटना में अपने दोनों पैर और बायाँ हाथ खो चुके हैं. उस समय वह इंजीनियरिंग के छात्र थे. अपनी शिक्षा को उसके बाद भी उन्होंने पूरा किया. इस स्थिति में भी अपने विश्वास को, आत्मबल को उन्होंने कमजोर न पड़ने दिया. शिक्षा पूरी करने के बाद वे वर्तमान में स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, SAIL में कार्यरत हैं.
आप जनपद जालौन के प्रसिद्द रंगकर्मी, फिल्मकार प्रभात तिवारी (कुरते में बैठे हुए) के भांजे हैं.

22 दिसंबर 2018

लड़ने वाला ही जीतता है

संघर्षों से लड़कर आगे बढ़ने वाले ही विजयी होते हैं. उनको पता होता है कि कैसे किस तरह से परिस्थितियों से लड़ा जाए. ये बात हम सभी जानते-समझते हैं कि परिस्थितियों का निर्माण स्वतः भी होता है और मनुष्य भी करता है. ऐसे में जबकि कोई भी स्थिति, परिस्थिति जो मानव-जनित हो उसका समाधान, उससे लड़ने का तरीक़ा मानव के पास निकल ही आता है या कहें कि वो ऐसा करने में सक्षम होता है पर ऐसा प्रकृति-जन्य परिस्थितियों में नहीं कहा जा सकता. प्राकृतिक परिस्थितियाँ कब, किस तरह के रूप में सामने आएँ कहा नहीं जा सकता है. ऐसी अकस्मात् उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए कोई भी व्यक्ति ख़ुद को तैयार तो रखता है पर बिना यह विचार किए कि ऐसी स्थिति से लड़ने के लिए ख़ुद में कितना सामर्थ्य, कितना विश्वास, कितनी शक्ति जुटाने की आवश्यकता है.

किसी भी स्थिति से लड़ने, उससे जीतने के लिए व्यक्ति का विश्वास, उसकी जिजीविषा, उसका आत्मबल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. समाज का कोई भी क्षेत्र हो सभी में प्रत्येक कालखंड में समस्याएँ रहीं हैं, मुश्किलें आईं हैं किंतु उनसे पार वही लोग पा सके हैं जिन्होंने अपने विश्वास, आत्मबल को बनाए रखा. ऐसा करना महज़ जीतने के लिए नहीं बल्कि अपने साथ के लोगों संग, अपने परिचितों के संग, समाज के अन्य लोगों संग विश्वास में वृद्धि के लिए भी अपेक्षित होता है. परिस्थितियों से, विषम स्थितियों से लड़ना, उन पर विजय पाना सम्बंधित व्यक्ति के विश्वास, उसके व्यक्तित्व को भी निखारने का काम करता है. इतिहास साक्षी है कि समाज में जो लोग भी दैदीप्यमान हैं वे संघर्षों से लड़कर ही आगे आए हैं. आज प्रत्येक क्षेत्र में चुनौतियाँ हैं, हर जगह किसी न किसी रूप में इम्तिहान हैं ऐसे में व्यक्ति को ख़ुद को निखारने की प्रक्रिया भी इनसे लड़ना है. ऐसे में बजाय घबराने के यह समझने की ज़रूरत है कि यदि ख़ुद को सक्षम बनाना है, अपने व्यक्तित्व को निखारना है, विजयी बनना है तो किसी भी समस्या से घबराना नहीं है, किसी भी परिस्थिति से हार नहीं माननी है. ध्यान रखना होगा कि संघर्ष करने वाला ही विजयी होता है.