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05 मार्च 2019

पता नहीं किस गर्भनाल से जुड़े हैं हम सब

सत्यपाल, तुम्हारे और हमारे बीच क्या रिश्ता था? न सगे सम्बन्धी, न कोई रिश्तेदारी. जब पहली बार मिले 1991 में उससे पहले से भी कोई परिचय नहीं. मिलने के बाद भी बहुत लम्बा समय साथ नहीं गुजरा. मात्र दो साल साथ बीते, वे भी बहुत आत्मीयता से नहीं, बहुत अंतरंगता से नहीं. एक भाव था हमारे-तुम्हारे मिलने में. एक बड़े-छोटे का लिहाज, एक जूनियर-सीनियर की अप्रत्यक्ष सी दीवार का. उस दीवार का जिसे हम हॉस्टल वाले भाइयों के कभी का गिरा दिया था. उस दीवार के गिरने के बाद हॉस्टल में बस एक ही रिश्ता रह गया था भाई का. वो चाहे कुछ दिन रहा हो या बहुत दिन मगर जितने दिन रहा तो भाई बनकर. तो क्या हम दोनों भाई वाले रिश्ते से साथ जुड़े थे? ये सवाल आज भी कौंधा हमारे मन में जब तुम इस निस्सार संसार को छोड़कर जा चुके थे. ये सवाल बार-बार कौंधा मन में जबसे तुम्हारे सबको छोड़ कर जाने की खबर सुनी. क्या बस भाई का रिश्ता था हम दोनों के बीच? ऐसा इसलिए कि जबसे तुम्हारे बारे में सुना, तबसे यही सोचने में लगे कि तुमसे इस अवस्था में भी मिलने की आतुरता क्यों? तुमको क्यों इस अंतिम अवस्था में देख लेने की कामना क्यों? क्यों विचार आया बार-बार मन में कि तुम्हें तो पंचतत्त्व में विलीन हो जाना ही है फिर क्यों इतनी आकुलता तुम्हारे अंतिम दर्शन कर लेने की? क्यों? ये समझ न सके, समझ भी नहीं पा रहे.


जितना समझने की कोशिश की, उतनी बार ही असफल रहे. हॉस्टल में तो हम लोग महज दो साल के लिए मिले. वे भी बहुत अंतरंगता से नहीं मिले. बहुत आत्मीयता से नहीं मिले. यकीन मानो उन दो सालों की एक-दो बातों को छोड़ कोई बातें याद नहीं कि हम दोनों ने बहुत आत्मीय पल एकसाथ गुजारे हों. फिर क्यों ऐसी आकुलता तुमको देखने की? क्यों ऐसी आकांक्षा तुमसे अंतिम बार कुछ बात कहने की? विचार करते हैं कई बार तो लगता है कि हॉस्टल में तो बहुत लोग रहने को आये, बहुत से लोग रहे  और चले गए. बहुत से लोगों ने हॉस्टल को बस एक तरह का धर्मशाला समझ लिया था. हम-तुम जैसे बहुत से भाई ऐसे रहे जिन्होंने हॉस्टल को एक घर माना और एक घर में रहने वाले आत्मा से, दिल से जुड़े होते हैं, किसी रिश्ते से नहीं. बहुत से भाई ऐसे हैं जिनका और हमारा कोई साथ न हुआ हॉस्टल में, कभी देखा भी नहीं एक-दूसरे को मगर वे किसी भी छोटे भाई से ज्यादा अपने लगते हैं. 


बहुत बार लगता है कि यही हॉस्टल के पानी का कमाल है कि न जाने कितने अनजान भाइयों को एक धागे में बाँध दिया है. अलग-अलग माताओं की कोख से जन्मने के बाद भी लगता है कि सबकी गर्भनाल एक ही है. सब इसी एक गर्भनाल से आपस में जुड़े हुए हैं. इसी का असर है कि आज सबकी आँखों में आँसू हैं. कोई काले चश्मे की आड़ में छिपा रहा है, कोई किसी साफी के द्वारा पोंछ रहा है, कोई बातचीत में नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहा है. मात्र दो सालों का सम्बन्ध ऐसा नहीं होता, वो भी तब जबकि हॉस्टल छोड़ने के बाद दशकों तक कोई मुलाकात न हो. इसका मतलब है कि कोई अप्रत्यक्ष गर्भनाल हम सबके बीच जुड़ी हुई है, न सही जन्म देने वाली माँ की वरन कर्मक्षेत्र वाली माँ की. सत्यपाल, सुन लो, तुम किसी भी रूप में हो, कहीं ही हो.... तुमको अपने से अलग न होने देंगे. मोक्ष मिलेगा या नहीं ये भविष्य की बात है मगर हॉस्टल वाले भाई हर कदम पर मिलेंगे, ये विश्वास रखना. तुम अपने को अकेले न समझना इस राह पर, हम सब हॉस्टल वाले भाई हैं तुम्हारे साथ. हॉस्टल का कोई भी भाई तब भी अकेला न था, आज भी अकेला नहीं है, कल भी अकेला न रहेगा.

20 जनवरी 2019

तुम जान बने हो हम सबकी


तुमसे ही ताकत हम सबकी,
तुमसे ही हिम्मत हम सबकी.
जीवन को जीना सिखा दिया,
तुम जान बने हो हम सबकी.

सुख-दुःख सीखें हँसना तुमसे,
खुशियों को तुमसे ख़ुशी मिले,
धरती, सूरज, चंदा तारे सब,
रोशन होना तुमसे सीख रहे,
खिलना है सबको सिखा दिया,
तुम आन बने हो हम सबकी.

खुद में खुद का विश्वास अटल,
है स्वाभिमान का अतुलित बल,
जिजीविषा तुम्हारी बन उभरी,
संयम, साहस और धैर्य प्रबल,
ह्रदय में सबको बसा लिया,
तुम जान बने हो हम सबकी.


+
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
19-01-2019


14 नवंबर 2018

आधी रात और वो खिड़की का भूत

रात गहरा चुकी थी और हम मित्रों द्वारा बातों के बताशे बनाने भी बन्द किये जा चुके थे, सो नींद के आगोश में मजबूरीवश जाना ही था. सभी ने विदा ली और अपने-अपने कमरों की ओर चल दिये. ठण्ड के दिन होने के कारण रजाई में घुसते ही नींद ने अपना असर दिखाना शुरू किया. लेटते ही नींद का आना तो होना नहीं था, दोस्त-यारों के साथ हुई बातों को सोच-सोच मन ही मन हँसते-मुस्कराते सोने का उपक्रम करने लगे. सोचते-विचारते, हँसते-मुस्कराते कब नींद लग गई पता ही नहीं चला.


एकाएक खर्र-खर्र की आवाज ने चौंक कर उठा दिया. हाथ बढ़ा कर मेज पर रखे टेबिल लैम्प को रोशन किया. आवाज बन्द. इधर-उधर, कमरे में निगाह मारी कि कहीं बिल्ली या फिर कोई चूहा आदि न घुस आया हो पर कहीं कुछ नहीं. सपना समझ कर सिर को झटका और टेबिल लैम्प की लाइट को बुझा कर रजाई में फिर से घुस गये. खर्र-खर्र की आवाज आनी फिर शुरू. जैसे ही हाथ बढ़ा कर लाइट जलाई आवाज आनी बन्द. एक-दो मिनट लाइट को जलने दिया तो आवाज नहीं हुई. अबकी पलंग पर बैठे ही रहे और लाइट बन्द कर दी. जैसे ही रोशनी गई आवाज आनी शुरू हुई. वहीं डरावनी सी खर्र-खर्र. बिना टेबिल लैम्प को जलाये आवाज को सुनने का प्रयास किया कि आ कहाँ से रही है? अगले ही पल समझ में आ गया कि आवाज खिड़की की तरफ से आ रही है.

टेबिल लैम्प जलाया तो आवाज आनी बन्द हो गई. लगा कि दोस्त लोग डराना चाह रहे हैं क्योंकि आज हमारे रूम-पार्टनर, राजीव त्रिपाठी भी नहीं थे. हॉस्टल में किसी न किसी रूप में भूत-प्रेत-चुड़ैल आदि के किस्से सुनाये जाते थे. किसी कमरे को भुतहा बनाया जाता, किसी पेड़ पर भूत का निवास बताया जाता. इससे डर का माहौल बना ही रहता. यह सब लगभग रोज का नियम होता था. आज भी महफिल जमी थी बातों-बातों में डरावने किस्से भी तैर चुके थे. एक-दो आवाजें दीं पर कोई आहट भी नहीं मिली. लाइट जलता छोड़कर रजाई ओढ़ कर लेटे पर आवाज नहीं आई. लाइट बन्द की और आवाज आनी शुरू. हम चुपचाप बिना आहट के यह समझने और देखने की कोशिश करने लगे कि कहीं खिड़की पर कोई है तो नहीं? लगभग चार-पाँच मिनट की कोशिश के बाद भी कोई समझ न आया और कोई आहट भी नहीं समझ आई, हाँ, खर्र-खर्र की आवाज लगातार होती रही.

अब थोड़ा सा डर लगा. एक तो अकेले होने का डर और ऊपर से हॉस्टल के चर्चित भूतों का डर. हालांकि हमें कभी भी भूत-प्रेत जैसी बातों से डर नहीं लगा किन्तु माहौल का नया-नया होना और फिर रोज-रोज के वहीं किस्सों ने आज मन में डर पैदा कर दिया. बहुत हिम्मत करके लाइट जलाई और एकदम से कूद कर खिड़की पर आ गये. यह सोचा कि यदि भूतों के हाथों मरना लिखा होगा तो यही सही और यदि दोस्त लोग हैं तो उनको सीधे-सीधे पकड़ा जा सकता है. खिड़की से जो देखा उसने डर तो दूर कर दिया पर चौकीदार बाबा के ऊपर गुस्सा ला दिया. चिल्ला कर बाबा को बुलाया. खर्र-खर्र की आवाज को पैदा करने वाला कोई भूत नहीं और न ही हमारे कोई मित्र वगैरह थे. एक आवारा गाय हमारे कमरे के ठीक नीचे खड़े होकर वहाँ लगे पेड़ के तने से अपना सींग रगड़ती थी तो खर्र-खर्र की डरावनी सी आवाज होने लगती थी. जैसे ही लाइट जलती वह सींग रगड़ना रोक देती और जैसे ही लाइट बन्द होती वैसे ही उसका सींग पेड़ के तने पर रगड़ना शुरू हो जाता.

चौकीदार बाबा ने आकर उस गाय को वहाँ से दूर भगाया और हम भी अपने मन में एक पल को बिठा चुके भूत को भगा कर फिर से रजाई में दुबक गये.


08 सितंबर 2018

ज़िन्दगी की भयावहता ज़िन्दगी जीने वाले जानते हैं


ज़िन्दगी उतनी भी हसीन नहीं जितनी हम समझते हैं और मौत उतनी भी भयानक नहीं जितनी हमने मान रखा है. ऐसा अपने अनुभव के आधार पर ही कहा जा सकता है. ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे, ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसने जिन्दगी को करीब से जिया है, महसूस किया है वह समझ सकता है. असल में हममें से बहुत से लोग ज़िन्दगी जीना भूल चुके हैं या कहें कि ज़िदगी जीना ही नहीं जानते. आज भी बहुतायत लोग खाने-कमाने को ही ज़िन्दगी माने बैठे हैं. यही कारण है कि ऐसे लोगों की सोच के कारण न केवल इनकी ज़िन्दगी वरन सम्पूर्ण समाज का ढाँचा विकृत स्थिति में पहुँच गया है. इन लोगों के लिए सुबह उठने से लेकर रात सोने तक सिर्फ अपने परिवार के चंद लोगों की चिंता करना ही ज़िन्दगी है. ऐसे लोगों के लिए स्वार्थ में संकुचित रहना ही ज़िन्दगी है. यही लोग वे हैं जो ज़िन्दगी को एक निश्चित दायरे से बाहर जाने देना नहीं चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए ही ज़िन्दगी दिव्य और भव्य होती है. देखा जाये तो ज़िन्दगी इससे कहीं अधिक बड़ी है, विस्तृत है. ज़िन्दगी का तात्पर्य सिर्फ अपना परिवार नहीं. ज़िन्दगी का मतलब अपने परिजन नहीं. ज़िन्दगी का मतलब चंद लोग नहीं हैं.


ज़िन्दगी अपने आपमें व्यापक अवधारणा, विस्तृत सन्दर्भ रखती है. उसके लिए किसी एक व्यक्ति, किसी एक परिवार का कोई मोल नहीं. असल में ज़िन्दगी एक व्यक्ति से आरम्भ होकर अपने में सम्पूर्ण का प्रसार करती है. वह आरम्भ तो होती है किसी एक व्यक्ति के द्वारा और फिर अपना विस्तार करते हुए उसे सन्दर्भ प्रदान करती है. ज़िन्दगी का विस्तार और संकुचन भले ही संदर्भित व्यक्ति को अलग-अलग रूपों में सुखद दिखाई देता हो मगर मूल रूप में वह अत्यंत कष्टप्रद होता है. जिसने ज़िन्दगी का सन्दर्भ व्यापकता में देखा हो उसे ज़िन्दगी कष्टप्रद ही नहीं भयावह नजर आती है. विगत कुछ दिनों में न केवल हमने बल्कि हम जैसे अनेक भाइयों ने ज़िन्दगी की भयावहता को बहुत नजदीक से देखा-महसूस किया है. ज़िन्दगी के आनंद के क्षणों को कहीं गायब होते देखा है. पल-पल ज़िन्दगी के रूप में मौत को पास आते देखा है. ऐसा हम सभी भाइयों ने तभी महसूस किया है जबकि हम सभी ने ज़िन्दगी को आपस में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ देखा है. दिन-रात का एक-एक पल हम भाइयों के लिए न केवल कष्टप्रद रहा वरन डरावना भी रहा. जो भाई अपने उस हिम्मती भाई के पास थे वे स्थिति को देख-समझ रहे थे मगर उनकी हालत बहुत ख़राब थी जो उस भाई से दूर थे.


किसी भी फोन की घंटी पर सहम जाना, किसी भी मैसेज की आवाज़ पर सिहर जाना, बातचीत का सिरा पकड़ते हुए आवाज़ में कम्पन आना सबकुछ ऐसा था जो बता रहा था कि हम सब एक हैं. इस एक होने के बाद भी हम सब ज़िन्दगी का संगठित रूप प्रस्तुत नहीं कर पा रहे थे. सबके सब अपनी-अपनी ज़िन्दगी के अनमोल पलों में से बहुत सारा जीवन उस भाई को देने को तैयार बैठे थे मगर ज़िन्दगी के द्वारा ज़िन्दगी नहीं दी जा सकती है. यही कारण है कि सुखद होने के बाद भी ज़िन्दगी अत्यंत भयानक है. जहाँ एक व्यक्ति अपनी ज़िन्दगी का सुखद पल अपने साथ लिए बैठा होता है और उसी का अभिन्न भाई ज़िन्दगी में से ज़िन्दगी का एक-एक पल अपने लिए तलाश रहा होता है. ये तो विश्वास, संयम, हिम्मत ही कही जाएगी उस भाई की, जिसने ज़िन्दगी के बाद भी ज़िन्दगी को अपने से अलग नहीं होने दिया. उसके आत्मविश्वास ने, उसकी जिजीविषा ने, उसके स्नेह ने, उसकी भावुकता ने ज़िन्दगी को उससे अलग नहीं होने दिया. विश्वास, स्नेह, आशीर्वाद की दम पर ज़िन्दगी को अपने बगल में बैठा लेने पर मजबूर कर देने वाले अपने उस छोटे भाई के दीर्घायु होने की कामना.

17 अगस्त 2018

वो सवाल ही दोहरा देते खामोश जाते अटल जी


मौत से कई बार ठनी और हर बार मौत को सामने से वार करने की चुनौती देकर वापस लौटाते रहे. इस बार फिर मौत से ठनी. इस बार की ठना-ठनी कुछ गंभीरता से हो गई. अबकी न मौत वापस जाने को तैयार दिखी और न ही राजनीति के अजातशत्रु हारने को राजी हुए. भाजपा के ही नहीं वरन राजनीति के भीष्म पितामह रूप में स्वीकार अटल जी विगत लगभग एक दशक तक अटल बने रहे. महाभारतकालीन भीष्म पितामह की भांति अटल जी ने कोई प्रतिज्ञा तो नहीं ले रखी थी किन्तु भाजपा रुपी हस्तिनापुर को वे सुरक्षित देखना चाहते थे; भारत माता को सुरक्षित हाथों में देखना चाहते थे; संसद में किसी समय संख्याबल को लेकर हुए उपहास पर दिए गए जवाब को सार्थक देखना चाहते थे; अंधियारी रात में हवा-पानी के किनारे किये गए हुँकार कि कमल खिलेगा, अवश्य खिलेगा को साकार होते देखना चाहते थे; इसी कारण पिछले एक दशक से अधिक का समय वे नितांत एकांतवास की स्थिति में व्यतीत करने के बाद भी आमजनमानस के बीच पूरी तरह रचे-बसे रहे. मौत से ठना-ठनी होने के बाद भी मौत के साथ चलने को तब तक तैयार नहीं हुए जब तक कि वह सब नहीं देख लिया जो वे देखना चाहते थे. ऐसा लगा मानो भीष्म पितामह की भांति समय का इंतजार करने के बाद उन्होंने मौत को सीधे-सीधे हराने के बजाय उसे जिताकर हराने का विचार बनाया.


मौत से उनकी वर्षों पुरानी ठना-ठनी बंद हुई. वे मौत को जिताने का भ्रम पैदाकर खुद जीतकर अनंत यात्रा पर उसके साथ निकल गए. लगभग एक दशक तक सार्वजनिक जीवन से लगभग विलुप्त, दूर रहने के बाद भी जब वे तिरंगे का आँचल लपेट मौत के साथ कदम से कदम मिलाते हुए चले तो वे अकेले नहीं थे. उनका विशाल भाजपा परिवार उनके साथ था. उनकी भारतमाता की संतानें उनके साथ थीं. उनके सहृदय व्यवहार के कायल सभी धर्म, जातियाँ, वर्ग उनके साथ थे. उनकी राजनैतिक शुचिता के प्रशंसक अनेक राजनैतिक दल, व्यक्ति उनके साथ थे. अपनी कार्यप्रणाली और निर्भीक निर्णय क्षमता का वैश्विक स्तर पर लोहा मनवाने वाले देशों के लोग उनके साथ थे. सारा देश ही नहीं वरन समूचा विश्व उनके साथ चल रहा था. ये सब उनकी वो थाती है जो मौत के जीत जाने के बाद उसे हारा साबित कर रही थी. वे अब एक शरीर के रूप में नहीं, एक व्यक्ति के रूप में नहीं, एक कवि के रूप में नहीं, एक राजनेता के रूप में नहीं वरन एक-एक व्यक्ति के रूप में जीवित हो उठे थे; एक-एक नागरिक के रूप में जिन्दा दिख रहे थे; एक-एक साँस में जीवन निर्वहन करते दिख रहे थे; अपनी अंतिम यात्रा में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शामिल एक-एक व्यक्ति में वे एक एहसास के सहारे जिंदा दिखे. यह देखकर मौत खुद हतप्रभ दिखी. जीतने के बाद भी हारी हुई लगी. उनके लम्बे एकांतवास को तोड़कर मौत जब उन्हें बाहर लेकर आई तो सोचा होगा कि वे खामोश ही रहेंगे. उनका बाहर आना हुआ तो उनकी कविताएँ बोलने लगीं, उनके संसद में दिए गए चुटीले अंदाज के कथन बोलने लगे, सार्वजनिक सभाओं में दिए गए उनके भाषण बोलने लगे, समरसता, मानवता, शांति के लिए किये गए उनके प्रयास बोलने लगे.


आज भी याद है उनका वो बोलना. हास-परिहास के उसी चिर-परिचित अंदाज में उनका बोलना. परिवार के बुजुर्ग की तरह से पढ़ाई के बारे में पूछना. ढाई दशक से अधिक समय पहले उनका पहली बार स्पर्श. उनके चरणों का स्पर्श. उनका प्यार से सिर पर हाथ फिराना. खुश रहो का आशीर्वाद देना. उस समय भी और आज भी अटल जी सम्मोहित व्यक्तित्व दिखे. ग्वालियर के शैक्षिक प्रवास के दौरान अनेकानेक गतिविधियों में सहभागिता बनी ही रहती थी. ऐसी ही एक सहभागिता के चलते पता चला कि अटल जी का एक कार्यक्रम है. हम हॉस्टल वालों को कुछ जिम्मेवारियों का निर्वहन करना है. कोई मंच की व्यवस्था में, को खानपान की व्यवस्था में, कोई जलपान की व्यवस्था में, कोई यातायात की व्यवस्था में, कोई अतिथियों के व्यवस्थित ढंग से आने-जाने की व्यवस्था में. सहज आकर्षित करने वाले, सम्मोहित करने वाले, मुस्कुराते चेहरे के साथ अटल जी मंचासीन हुए. सामान्य सा मंच, सामान्य सी व्यवस्था, गद्दे-मसनद के सहारे टिके, अधलेटे, बैठे मंचासीन अतिथि. अटल जी से मिलने का लोभ हम हॉस्टल के भाइयों में था. व्यवस्था हमारे ही हाथों थी सो कभी कोई किसी बहाने मंच पर जाता, तो कभी कोई किसी और बहाने से. आज की तरह कोई तामझाम नहीं, कोई अविश्वास नहीं, फालतू का पुलिसिया रोब नहीं. मंचासीन अतिथियों से मिलने का सबसे आसान तरीका था पानी के गिलास पहुँचाते रहना. तीन-चार बार की जल्दी-जल्दी पानी की आवाजाही देखने के बाद अटल जी ने मुस्कुराते हुए बस इतना ही कहा कि क्या पानी पिला-पिलाकर पेट भर दोगे? भोजन नहीं करवाओगे? अपने पसंदीदा व्यक्ति से बातचीत का अवसर, बहाना खोजते हम लोगों से पहला वार्तालाप इस तरह मजाकिया, सवालिया अंदाज में हो जायेगा, किसी ने सोचा न था. हम सब झेंपते हुए मंच से उतर आये मगर कार्यक्रम के बाद भोजन के दौर में खूब बातें हुईं. खुलकर बातें हुईं.  

काश कि वे आज भी वैसे ही बोल देते. काश कि आज उनको पानी पिलाने के बहाने उनके पास तक जाना हो पाता तो शायद वे वही सवाल दोहरा बैठते. काश कि वे आज चरण स्पर्श करने पर उसी तरह आशीर्वाद भरा हाथ सिर पर फिरा देते. अब तो बस काश ही काश है, याद ही याद है.  



14 अगस्त 2018

एक जंग ज़िन्दगी की अनिश्चितता से


ज़िन्दगी अनिश्चय से भरी होती है, ये बहुत पहले से सुनते आये हैं. कब किसके साथ क्या गुजरे कहा नहीं जा सकता है, ये भी सत्य है. आने वाले कल का कोई भरोसा नहीं रहता है यह भी अपने आपमें सत्य है. ऐसे में क्या किया जाये, क्या ज़िन्दगी को बिना किसी परवाह के खुला छोड़ दिया जाये? क्या आने वाले कल की अनिश्चितता देखकर भविष्य के लिए किसी तरह की योजना न बनाई जाये? किसके साथ कब क्या हादसा, बुरा हो जाये इससे बचने के लिए क्या सदैव डरे-सहमे से बना रहा जाये? जो-जो लोग ज़िन्दगी को अनिश्चित मानते-बताते हैं वे भी इन सभी बातों को नकार देंगे. ज़िन्दगी को अनिश्चय के बाद भी निरुद्देश्य, निष्प्रयोज्य, निरंकुश तरीके से नहीं जी जा सकती है. इसी कारण व्यक्ति ज़िन्दगी की अनिश्चितता को निश्चिंतता में बदलने के लिए हमेशा किसी न किसी जद्दोजहद में लगा रहता है. भविष्य के लिए योजनायें बनाता रहता है. अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए सुनहरे सपने देखता रहता है. हर व्यक्ति जानता है कि अनिश्चय भरी ज़िन्दगी कब उसको अन्दर तक हिलाकर रख देती है, कहा नहीं जा सकता. ज़िन्दगी की इस अनिश्चितता से जब कोई अपना गुजरता है तो ज़िन्दगी की इस भयावहता के बारे में सोचकर कंपकंपी छूट जाती है. अंधियारे से दिखते भविष्य के बारे में सोचकर ही सबकुछ हाथ से ऐसे फिसलता दिखता है जैसे रेत. लाख सुन्दर और मोहक होने के बाद भी ज़िन्दगी की ये भयावह सच्चाई डराती है. इससे लड़ने के लिए, आगे बढ़ने के लिए, ज़िन्दगी की जंग जीतने के लिए व्यक्ति का आत्मविश्वास, उसका स्वाभिमान, उसकी जिजीविषा सहयोगी भूमिका निभाते हैं.


इसी तरह की जंग से लड़ते, ज़िन्दगी की भयावह सच्चाई से सामना करते, लगातार झटकों के बाद भी अपने विश्वास को, अपनी जिजीविषा को जीवित बनाये रखने का ज़ज्बा विगत काफी समय से बहुत नजदीक से देखा है. बार-बार लड़खड़ाने के बाद भी खुद को खड़ा करने की अदम्य इच्छाशक्ति के चलते ऐसा लगता है कि इस बार ये जंग अंतिम जंग होनी चाहिए और ज़िन्दगी की भयावहता हारकर उसकी ज़िन्दगी को फिर गुलज़ार करेगी किन्तु ऐसा बस सपना सा प्रतीत होता है. ज़िन्दगी की भयावहता हरबार उसे हराने के लिए उठ खड़ी होती है. हर बार ज़िन्दगी और मौत की जंग में वह ज़िन्दगी को अपने साथ खींच लाता है. हर बार उसमें जोश, हिम्मत, हौसला हम सब देखते हैं. इसके बाद भी अबकी मिलने पर हमारे बीच शब्दों का गुम हो जाना समझ न आया. हाथों में हाथों के द्वारा जैसे हम एक-दूसरे को दिलासा देते समझ आये. अपने-अपने होंठों की मुस्कान के पीछे जैसे आँसुओं को छिपाने की कोशिश की जा रही हो. सामने बैठे होने के बाद भी पीठ फेरना जैसे परिस्थितियों को हराने का प्रयास किया जाना रहा हो. परिस्थितियाँ क्या बनेगी, कौन जीतेगा, आत्मविश्वास कब तक बना रहेगा, जिजीविषा कितना साथ देगी कहा नहीं जा सकता. इसके बाद भी कामना है कि ज़िन्दगी की अनिश्चितता की तरह यह भी अनिश्चित हो जाये और सबकुछ वैसा ही हो जाये जैसा कभी छोड़ा था, देखा था.  

09 अप्रैल 2018

थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है


आठ अप्रैल निकल गई. निकल गया एक पूरा साल जबकि कई सालों का जीवन एकसाथ हँसते-गाते बिताया गया. हॉस्टल के सभी भाई सपरिवार बरसों बाद मिले. यादें ताजा की गईं, परिवार के सदस्यों को अपने उस जीवन का अनुभव कराया गया, जो बिंदास, अलमस्त होकर जिया गया. उसी अवसर पर याद आई वो इमारत भी जिसने हम सबकी जिंदगी को बहुत करीब से देखा. पल-पल उसने हम सबको देखा-परखा. हॉस्टल की वो भव्य, अपनी सी लगने वाली इमारत आज भले ही सुनसान दिखाई देती हो पर हम सभी के दिल के बहुत करीब है. अनेकानेक कहानियों को अपने में समेटे वो इमारत आज भी हम सबके लिए एक घर सरीखी है. चंद पंक्तियाँ उसी इमारत और उस इमारत के साए में बिताये गए जीवन के लिए - 


++++++++++ 

खामोश खड़ी अनगिनत कहानियाँ सुनाती है
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

चढ़ती रात कमरे का दरवाजा खटकना,
मैस में बुलाया है, बाबा का स्वर उभरना.
अनजान डर के साये में चलती वो इंट्रो पार्टी,
आज भी हौले से गुदगुदा जाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

किसी एक के कमरे में जमकर बैठ जाना,
घर से लाये नाश्ते का चट से उड़ जाना.
हँसी-ठहाकों के बीच वो भूतों की कहानी,
आज भी मीठा सा डर जगाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

छोटे जेबखर्च में बड़ी-बड़ी खुशियाँ सहेजना,
बिना बात पार्टी, अकारण वीडियो का चलना.
सखा विलास की चाय, वो स्टेशन की कॉफी,
आज भी अपने स्वाद को ललचाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

टंकी के बहते पानी में वो बेलौस मस्ती,
अगले ही पल तू-तू, मैं-मैं, झींगा-मुश्ती.
ऊँगली उठाकर तुझे देख लेने की वो नादानी,
आज भी रह-रह कर हँसाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

इसकी जींस, उसकी शर्ट से नित नया फैशन
कुड़ी के चक्कर में चकरघिन्नी बनने का पैशन.
कारतूस बीनने वाले होंगे लखपति की वो धमकी,
आज भी दिल को रोमांचक बनाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

बाड़े की रौनक, बलवंत भैया की कोठी का सूनापन
फिल्मिस्तान की मस्ती, कटोराताल का हुडदंग.
हर जगह की वो अपनी नई सी शरारत,
आज भी दिल को जिंदादिल बनाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

महफ़िलें लल्ला, जगदीश, जैन के ठिकानों की,
संसद चलती रहती जहाँ हॉस्टल के मस्तानों की.
वो चाय, समोसे और मंजू के पान की मिठास,
आज भी होस्टलर्स को दीवाना बनाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

मिलने का उत्साह तो बिछड़ने का ग़म,
गले मिलते मुस्कुराते पर आँखें रहती नम.
डायरी के पन्नों पर सजी पते-ठिकानों की इबारत,
आज भी सबके साथ का एहसास दिलाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.






01 मार्च 2018

इंतज़ार रहता था सबको मिलने वाले टाइटल का

हॉस्टल में हर होली पर लोगों को टाइटल देने का एक काम शुरू किया गया. इसमें साथियों को तो लपेटा ही जाता, शिक्षक भी लपेट लिए जाते. पूरे कॉलेज को मालूम रहता कि तये काम सिर्फ़ हॉस्टल वालों का है मगर आपस में कोई मनमुटाव न होता. आख़िर हम लोग भी शालीनता बनाए रखते थे. होली पर टाइटल निकालने का काम हम इंटरमीडिएट के दौरान भी करते रहे हैं. तब स्कूल में मास्टर साहब के द्वारा पिटाई का डर रहता था सो बड़े पैमाने पर वो काम न करके क्लास स्तर पर निपटा लिया जाता. आपस के कुछ मित्रों के बीच टाइटल का आदान-प्रदान हो जाता और फिर धीरे-धीरे सब उसका प्रसार पूरे स्कूल में कर देते. किसी को कोई शक भी न होता कि ये काम किसका किया है. इंटर कॉलेज से निकल कर स्नातक की पढ़ाई के दौरान जब हॉस्टल में रहना हुआ तब होली के नजदीक आने पर इस टाइटल निकालने के कीड़े ने कुलबुलाना शुरू कर दिया. हॉस्टल का माहौल समझा, बड़े भाइयों की सहमति ली, साथियों का साथ लिया और बस जुट गए टाइटल बनाने में.


उस समय आज के जैसे तकनीक हम लोगों के पास नहीं थी. बाज़ार जाकर चार्ट पेपर, कई रंगों की स्केच खरीदी गईं. हॉस्टल में बहुत गुपचुप तरीके से इस काम को अंजाम दिया गया ताकि होली के ठीक पहले जब छुट्टी हो, तभी सबको सरप्राइज मिले. कॉलेज में कई सारे लड़के-लड़कियाँ ऐसे होते थे जो अपने आपको बहुत ज्यादा हीरो-हीरोइन समझते थे तो उनका टाइटल बनाया ही नहीं जाता. इसका साफ़ सा संकेत ये देना होता था कि उनको कोई जानता ही नहीं कॉलेज में तभी उनका टाइटल नहीं बना. कुछ छात्र-छात्राओं के और प्राध्यापकों के बड़े शालीन से टाइटल बनाये जाते तो कुछ के उनकी हरकतों के हिसाब से. होली पर जब पहली बार टाइटल निकाले गए तो सभी ने उनको बहुत पसंद किया था. उसके बाद होली का एक-वर्षीय इंतजार करना लोगों को रास न आया तो दीपावली पर टाइटल लगाने का काम शुरू किया गया. बिना किसी आरोप-प्रत्यारोप के सहजता से सब उनका स्वागत करते.



दो-तीन बार की मेहनत के बाद लगा कि सब सहजता से इसे ले रहे हैं तो एक साल जोड़े के साथ टाइटल बनाये गए. लड़कों और लड़कियों के जोड़े बनाये गए और प्राध्यापकों के भी जोड़े बनाये गए. कुछ प्राध्यापकों के किस्से महाविद्यालय में बड़े चर्चा में रहे, उनको भी शामिल किया गया. जोड़े से बने टाइटल ने तो जैसे एकदम से धमाल मचा दिया. लड़कों-लड़कियों में तो उसकी प्रतिक्रिया ऐसे आई जैसे उनकी शादी ही करवा दी गई हो. कुछ लड़के अपने साथियों के बीच रोब गाँठने लगे. उन बेचारों, बेचारियों को भी, बड़ी मायूसी हाथ लगी जिनका जोड़ा न बनाया गया. हँसी-मजाक के इसी क्रम में किसी ने बड़ा ज़ालिम सा बयान भी जारी किया था कि ‘फलां लड़की की तरफ कोई आँख उठाकर न देखे, अब वो तुम सबकी भाभी है. यदि किसी ने बात न मानी तो इतने कारतूस चलेंगे कि खोखे बीनने वाले लखपति हो जायेंगे.’ हम लोग बहुत लम्बे समय तक इस कथन के सहारे उन साहब की मौज लेते रहे. अब जबकि कॉलेज छोड़े दो दशक से अधिक का समय बीत गया है, कभी-कभी मन कर जाता है टाइटल बनाने का. अब तो नगर के कुछ लोगों के, राजनीति के कुछ लोगों के, अपने कॉलेज के कुछ लोगों के टाइटल खुद ही बना लिया करते हैं, खुद ही पढ़ लिया करते हैं, खुद ही मजा ले लिया करते हैं. 

आज होलिका दहन है. इसी अवसर पर कविता पढ़िए. बाक़ी कुछ समय बाद...
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चहक उठते हैं त्योहार,
जब अपने साथ होते हैं.
महक जाते हैं मौसम,
जब अपने साथ होते हैं.

देखो तो दिल की धड़कन,
साँसें भी कहाँ अपनी हैं,
मुरझाए भी खिल जाते हैं,
जब अपने साथ होते हैं.

मुस्कुराते रहो सदा खुलकर,
ये जीवन क्षणभंगुर है.
मुस्कुरा देते हैं आँसू भी,
जब अपने साथ होते हैं.

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*होली की माँगलिक शुभकामनाएँ*

28 फ़रवरी 2018

समाजोपयोगी कार्य से अपने सदा रहेंगे दिल में


किसी समय हॉस्टल में सर्वाधिक प्रिय रहे और हॉस्टल छोड़ने के बाद भी बराबर अपने साथियों, अपने बड़े-छोटे भाइयों में लोकप्रिय रहे श्री सोमेन्द्र सिंह को आज भी कोई भूल नहीं पाया है. हो सकता है कि आज उनके साथ पढ़े, साथ खेले, साथ शरारतें करने वाले उनके साथी सहजता से न पहचान पायें मगर जैसे ही जिसको भी कुक्कू शब्द सुनाई देता है उसकी स्मृति में तुरंत ही एक मनमोहक सी, सुन्दर सी, अपनी सी छवि बन जाती है. एक नजर में सबको मोहित कर लेने वाले, एक आवाज़ पर सबके लिए खड़े हो जाने वाले, एक बार खुद से जोड़कर कभी न छोड़ने वाले कुक्कू भैया अचानक ही बिना किसी से कुछ कहे-सुने वर्ष 2016 में हम सबको छोड़कर चले गए. वर्ष 2016 का फरवरी माह का अंतिम दिन. कुक्कू भैया अस्वस्थ अवश्य चल रहे थे किन्तु ये भान किसी को नहीं था कि ऐसी बुरी खबर सुनने को मिलेगी. बहरहाल, जो लिखा था वो हुआ. सबके साथ अपने आपको जोड़ लेने वाले कुक्कू भैया एकदम वर्तमान से अतीत बन गए. कुक्कू भैया को उनके हॉस्टल के साथियों ने, भाइयों ने अतीत नहीं होने दिया. कभी न कभी, कहीं न कहीं उनके साथ के भाइयों से जब भी मुलाकात होती तो कुक्कू भैया जाने कितने-कितने संस्मरणों के सहारे सबके साथ आकर खड़े हो जाते. अतीत को वर्तमान में उतार लाने की इसी एकजुटता और संवेदनशीलता ने हर बार कुक्कू भैया की अनुपस्थिति को शिद्दत से महसूस किया. भाइयों की आँखों को नम किया. आवाज़ में लरजन पैदा की. 



आज फिर वही दिन आया. फरवरी का अंतिम दिन, 28 फरवरी. पूरे दो साल होने को आये मगर ऐसा लगता जैसे कल की ही बात हो. दो साल की समयावधि बहुत लम्बी नहीं होती किसी दुःख को कम करने के लिए. कम से कम परिजनों के लिए तो बिलकुल भी नहीं होती. इसके बाद भी कुक्कू भैया के परिजनों ने आँसू बहाने के बजाय कुछ लोगों के आँसू पोंछने का विचार बनाया. 28 फरवरी यद्यपि समूचे परिवार के लिए कष्टप्रद दिन है मगर इसके बाद भी कुक्कू भैया की धर्मपत्नी शशि भाभी ने और उनके बेटे सोमेश ने अपने दुःख को अपने में समेट समाज के जरूरतमंद लोगों के दुःख को दूर करने वाला कार्य किया. सबकी सहायता के लिए दिन-रात एक कर देने वाले कुक्कू भैया की दूसरी पुण्यतिथि पर उनकी धर्मपत्नी शशि सिंह भाभी और बेटे ने रक्तदान शिविर का विचार साकार किया. जनपद जालौन में कार्य कर रही कई सामाजिक संस्थाओं से संपर्क करने के बाद उनका विचार मूर्त रूप में सामने आया.




कुक्कू भैया अपने सामने जिस स्कूल ऑक्सफोर्ड एकेडमी की स्थापना कर गए थे, उसके तत्त्वावधान में रक्तदान शिविर का आयोजन इंद्रा पैलेस नामक उस जगह हुआ जिसे कुक्कू भैया ने अपनी दादी के नाम पर सजाया-संवारा था. मेडिकल कॉलेज, झाँसी की टीम उरई उपस्थित हुई और कुक्कू भैया की पुण्यतिथि में बनाई गई पुनीत योजना में सहयोगी बनी. उरई शहर के लोग कुक्कू भैया के नाम से बहुत गहरे से परिचित रहे हैं. उनकी अनुपस्थिति के दो वर्षों ने भी उनकी छवि को धूमिल नहीं होने दिया है. यही कारण है जब नागरिकों को उनकी पुण्यतिथि पर रक्तदान शिविर आयोजन की जानकारी हुई तो न केवल कुक्कू भैया और उनके परिवार से जुड़े परिवार वहां उपस्थित हुए वरन जनपद के प्रशासनिक अधिकारी सहित अनेक वर्तमान और पूर्व प्रतिनिधि भी उपस्थित हुए. रक्तदान शिविर में कुल 95 लोगों ने अपना पंजीकरण करवाया. इसमें से 47 लोगों ने रक्तदान किया. इस रक्तदान की विशेष बात यह रही कि सुबह ये खबर जब हॉस्टल से सम्बंधित अपने ग्रुप में लगाई तो छोटे भाई ललित तोमर कुक्कू भैया को समर्पित करते हुए ग्वालियर में रक्तदान किया. ये हम सभी हॉस्टल भाइयों की संवेदनशीलता और एक अदृश्य डोर से बंधे होने का परिचायक ही है.




कुक्कू भैया के स्मृति दिवस को यादगार बनाकर उनके परिवार ने समाज को एक सीख दी कि यदि हमें अपने परिजनों को बराबर अपने बीच महसूस करना है, उनकी उपस्थिति का आभास सबको करवाना है तो उनके जाने के बाद भी उनको सामाजिक रूप से याद करते रहना चाहिए. एक सार्थक कदम के साथ, समाजोपयोगी कदम के साथ अपने परिजनों को याद करना उनको अपने दिल में ही नहीं वरन सभी के दिलों में बराबर जीवित बनाये रखता है. ऐसा करके कुक्कू भैया के परिवार ने एक नई मिसाल कायम करते हुए नए मानक की स्थापना की है, जो भविष्य में बहुत से लोगों को राह दिखायेगा, समाजोपयोगी कार्य करने को प्रेरित करेगा. 

06 फ़रवरी 2018

चंद पलों में कई जीवन जीना

बीते दिन दिल में हरदम बसे रहते हैं और जैसे ही कोई अपना मिलता है, वे सामने आ जाते हैं. साइंस कॉलेज, ग्वालियर के छात्रावास में रहने के बजाय उस छात्रावास जीवन को आत्मसात कर चुके लोग किसी अनदेखी डोर से आज तक बँधे हुए हैं. इसी डोर के सहारे सब खिंचे चले आते हैं, अपने-अपने समय को वर्तमान में उतार लाते हैं. उसके बाद तो सारी व्यस्तता ग़ायब, सारी ज़िम्मेवरियाँ एक तरफ़, सारी गम्भीरता उड़नछू. बस होती हैं तो कहानियाँ, पुराने लोगों की बातें, हँसी-ठहाके, शरारतें. 


कुछ ऐसा ही हुआ 05 फ़रवरी 2018 को छात्रावासी भाई की बेटियों के वैवाहिक अवसर पर. कुछ भाई मिले और विवाह का उल्लास कई-कई गुना बढ़ गया. हँसी-ठहाकों से पंडाल गूँज रहा था, आगंतुक भी विस्मित थे. उसी समय सुरक्षा-कर्मियों से घिरे, भीड़ के बीच गम्भीर मुख-मुद्रा में किसी का प्रवेश हुआ. छतरवासी भाइयों ने अपने ठहाकों को विराम देकर एकसुर में पुकारा, बघेल भाईसाहब. अगले क्षण उस आने वाले व्यक्ति को ज्यों ही सबने परिचय दिया, उनकी मुख-मुद्रा की गम्भीरता ग़ायब हो गई. चेहरे पर प्रसन्नता के भाव तैरने लगे. उनकी भाव-भंगिमा देख कर उनके सुरक्षा-कर्मी निश्चिन्त हो गए कि वे अपने परिवार के बीच ही हैं. 


जी हाँ, वे भी साइंस कॉलेज छात्रावास परिवार के सदस्य हैं. ऐसे सदस्य जिन्होंने हॉस्टल लाइफ़ को न केवल जिया बल्कि उसे आज तक सहेजे रखा. वे अब अपने समय की चर्चा कर रहे थे, हम सबकी शैतानियाँ पूछ रहे थे. अपने और अपने साथी भाइयों के बारे में बता रहे थे और हॉस्टल की पारिवारिक मर्यादा को भी याद कर रहे थे. चार-पाँच बार के संसद सदस्य, वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री एसपी सिंह बघेल भाईसाहब वैवाहिक कार्यक्रम में चंद पलों के लिए ही आए थे पर हॉस्टल परिजनों को देख समय को भूल बैठे. 


उनकी सहजता, हॉस्टल लाइफ़ के अनुभवों पर साफ़गोई देखकर एहसास हुआ कि हमारे बड़े भाइयों ने जिस पारिवारिक संस्कारों का बीज हॉस्टल में बोया था, वह सुखद छाँव हम सभी भाइयों को दे रहा है. 

08 अप्रैल 2017

वर्तमान के साये में अतीत की यात्रा

जिंदगी कई बार बहुत लम्बी लगती है तो कभी बहुत छोटी सी. इसी तरह समय कई बार काटे नहीं कटता और कई बार रोके नहीं रुकता. कुछ ऐसा ही एहसास हुआ आज जबकि चौबीस साल पुराने समय को फिर से आज में उतार लाने की कोशिश की गई. तीन वर्ष की बेहतरीन ज़िन्दगी को कुछ घंटों में जीने की कोशिश की गई. यदि कहा जाये कि किसी अदृश्य टाइम मशीन के द्वारा अतीत को वर्तमान में खड़ा करने का प्रयास किया गया या फिर वर्तमान को उसी अतीत में पहुँचा दिया गया तो अतिश्योक्ति न होगी. सोशल नेटवर्किंग के जरिये एक-एक करके इधर-उधर बिखरे रत्नों को, मोतियों को समेटा-सहेजा जाने लगा. उन सभी को एक-एक करके फिर से खोजा जाने लगा जो समाज में जिंदगी की आपाधापी में कहीं खो गए थे. या कहें कि हमारे आसपास होते हुए भी हमें दिखाई नहीं दे रहे थे क्योंकि हम सभी अपने-अपने परिवार, अपने-अपने रोजगार, अपने-अपने कार्यों में उलझे हुए थे. एक-एक को जोड़ते हुए फिर वही संसार बनाने की एक पहल की गई. किन्तु-परन्तु के बीच पहल की उड़ान शुरू हुई. 





हॉस्टल की वो दुनिया अपने आपमें अद्भुत ही कही जाएगी, जहाँ कोई चिंता नहीं, कोई फिकर नहीं, कोई जिम्मेवारी नहीं, कोई बोझ नहीं बस मस्ती ही मस्ती, हुडदंग ही हुडदंग. हॉस्टल से निकल कर अपने-अपने संसार में सिमटे-लिपटे लोगों के मन में लगातार रहा कि क्या कभी अपने पुराने साथियों से मिलना हो पायेगा? क्या उन साथियों के साथ फिर वही मस्ती भरी हरकतें, शरारतें की जा सकेंगी जो उन कभी हुआ करती थी? और भी सवाल उपजते फिर आपाधापी में खो जाते. जिस भविष्य की कभी चिंता नहीं की उसी भविष्य के संवर जाने के बाद भी सवालों के घेरे साथ चलते. आखिर भावनात्मकता कब तक सवालों के बोझ को सहती? कब तक अपने अत्यंत प्रिय साथियों से बिछड़कर दूर रहती. किसी समय में तकनीक से दूर साथियों ने अपने-अपने डायरी के पन्ने अपने-अपने साथियों के पते-ठिकानों से सजाये थे. उन पते-ठिकानों का लगातार बदलना जारी रहा. शुरुआती पत्र-व्यवहार और गर्मजोशी समय के साथ परिवर्तित होती रही. इस परिवर्तन का असर ये हुआ कि सब अपने में सिमट गए. कुछ मिलते रहे, कुछ और दूर होते चले गए. 





और फिर अंततः वह दिन आ ही गया जिसका सभी को उस दिन से इंतज़ार थाजिस दिन सभी से दूर हुए थे. हॉस्टल के दिनों को हॉस्टल के साथियों ने फिर से जिंदा कर दिया. जिंदगी की आपाधापी में अपने से भी दूर हो गए लोगों को फिर सबसे जोड़ा गया. इस बार वे जुड़े मगर अकेले नहीं. अबकी उनके साथ समूचे हॉस्टल से जुड़ा उनका परिवार भी, उनकी जीवनसाथी भी, उनके बच्चे भी. एक-एक से मिलते-मिलते, सूत्र बटोरते-समेटते सब फिर सामने नजर आने लगे. तकनीक ने सबको जोड़ने में सहयोग दिया. मिलन की उत्कंठा ने सबको और प्रेरित किया. भावनात्मकता का ज्वार उमड़ने लगा. देखते-देखते वह दिन आ ही गया जबकि सबकी सहमति से सबने आपस में अतीत में जाने का, अतीत को वर्तमान में लाने का निश्चय किया. सम्मिलन केंद्र बना वही स्थान जो कि किसी समय हम सभी की कर्मभूमि हुआ करता था. हम सभी के कदमों से जहाँ हलचल मचा करती थी. हम सभी के कार्यों से जहाँ विचलन हुआ करता था. अबकी हम सब अकेले न थे बल्कि साथ में थे वे लोग जो वर्षों से हम सभी की हॉस्टल की कहानियाँ सुनते आ रहे थे. वे साथ थे जो वर्षों से तत्कालीन फोटो देख-देखकर उस अतीत को वर्तमान की निगाहों से देखना चाहते थे. अपने-अपने जीवनसाथी, बच्चों के साथ सबने पूरी आत्मीयता से अपनी उपस्थिति को दर्शाया. 



सम्मिलन के निश्चय से पहले के किन्तु-परन्तु सभी साथियों की सक्रियता, उत्साह, मिलन की तीव्रता देखकर धराशाही हो गए. गले मिलते लोग, उसी बेलौस अंदाज़ में हँसते-बोलते-बतियाते मित्र, फिर से न बिछड़ने देने की नीयत से बारम्बार बाँहों में जकड़ने का अपनापन. सभी के बच्चे, जीवनसाथी बस मुँह खोले आत्मीयता का, अपनेपन का चरम देख रहे थे. शायद उन लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि डेढ़-डेढ़, दो-दो दशकों के बाद मिलते लोग, कुछ परिचित, कुछ अपरिचित चेहरों से मिलते लोग इतनी आत्मीयता दिखायेंगे. भावनात्मकता, अपनत्व के चरम से सराबोर होकर एक दूसरे को सराबोर करते हुए समूचे माहौल को रसमय बना देंगे. सन 1975 से शुरू हॉस्टल यात्रा को कतिपय कारणोंवश विराम लगा सन 2003 में पर तब तक गंगा-जमुना में बहुत सारा पानी बह गया था. काल की धार में बहते रत्न फिर मिले. बहुत से पुराने अनमोल मोतियों ने अपनी उपस्थिति दिखाते हुए अपना उत्साह दिखाया. आश्चर्य लगा कि वर्ष 1988 से लेकर वर्ष 2003 तक के बैच के बहुतायत मित्र सपरिवार समूचे सम्मिलन समारोह में पूरी आत्मीयता, अपनत्व बरसाते रहे. इससे भी अधिक आश्चर्य की बात ये रही कि हॉस्टल के उन बिंदास, बेलौस, बेफिक्र मित्रों से पहली बार मिलते अन्य परिजनों में भी गज़ब का उत्साह था. सबके मन में हॉस्टल देखने की हार्दिक इच्छा, अपने जीवनसाथी के अन्य दूसरे मित्रों के बारे में, उनके परिजनों से मिलने की उत्कंठा दिखी. 



हँसी-मजाक, हुल्लड़ करते समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. एकबारगी किसी का ध्यान अपने मोबाइल की तरफ नहीं गया. पूरे दिन लोगों के अपडेट सोशल नेटवर्किंग में देखने को नहीं मिले. ऐसा लग रहा था जैसे लोग वर्तमान में नहीं वरन अतीत की यात्रा कर रहे हों. जर्जर खड़ी बुलंद इमारत को फिर से जिंदाकर अपने उन्हीं दिनों में खो गए हों. उन दिनों की यादें, उस समय के किस्से, सबकी मासूम सी गोपनीयता को उन्हीं के परिजनों के सामने खोलते, लगा ही नहीं कि सदन में उपस्थित कोई भी व्यक्ति वर्तमान में है. हॉस्टल के तत्कालीन नारे, तत्कालीन जयघोष, वैसी ही शरारतें कुल मिलाकर सबको उसी कालखंड में ले गई थीं जहाँ कि वे कभी रहा करते थे. सूरज के उगने से शुरू हुआ मस्ती भरा दिन कब शाम में बदल गया पता ही नहीं चला. शाम के गहराने के साथ शुरू हुआ फिर से उसी वर्तमान में जाने का क्रम जहाँ जिम्मेवारियाँ हैं, दायित्व हैं, कर्तव्यबोध है. फिर शुरू हुआ वही दशकों पुराना क्रम. गले मिलते, हँसते, आँखों को गीला करते और फिर अपनी राह चलते. दशकों पहले के और अब के समय में एक अंतर दिखा. तक के डायरी-पेन से इतर इस बार तकनीक साथ थी. अगली बार मिलने का निश्चय साथ था. इस वादे के साथ कि हर वर्ष सबका मिलना निश्चित है, हम सभी अतीत की कुछ घंटों की यात्रा के बाद वर्तमान में लौट आये.